Sant Kasturi
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अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-3
शाहजहाँपुर
15/7/1948
पत्र मिला, दिल को खुशी हुई। तुमको यह अन्दाज़ हो गया होगा, कि जिस रास्ते पर तुम हो, ठीक है। ईश्वर का कोई रूप नहीं, इसलिये सर्वव्यापी कहा गया है। अगर उसका कोई रूप होता, तो उसका क्याम एक ही जगह होता। अपनी निगाह को वसी (व्यापक) बनाना चाहिये। तंग दायरा तंग नज़री से होता है। हममें ऐसे लोग मौजूद हैं, कि जो ठोस पूजा को उमर भर नहीं छोड़ते। हालांकि चाहिये यह कि जो ठोस अवस्था ज़्यादा लिये हुए हैं, उनको ठोस पूजा में डालकर, धीरे-धीरे उससे निकाल कर, सूक्ष्म की तरफ ले जाना चाहिए। मगर चूँकि हम स्वयं ठोस हैं, इसलिए अगर ठोसता की तरफ डाल भी दिया जाये, तो फिर उससे निकलने को जी नहीं चाहता, और सही रास्ता मालूम होने पर भी दिल उससे हटता ही नहीं। अगर मैं यह बात प्रत्येक मनुष्य से कह दूँ, तो वह यही समझेंगे कि मूर्ति-पूजन के खिलाफ़ हूँ। मगर मेरी यह मन्शा नहीं है। यह उन लोगों के लिये है, जिनका ख़याल सिर्फ़ ठोसता पर काम कर सकता है। मगर हमेशा उसी चीज को लिये बैठे रहने का नतीजा यह होगा कि वही ठोस असरात उसके दिल में पैदा हो कर दिल सख्त कर देंगे, जिसको हटाने में बहुत देर लगेगी।

मूर्ति-पूजन मैंने भी की है। मगर बहुत थोड़े दिनों। मगर मुझको तस्सली न हुई और उस चीज को बेकार समझकर छोड़ दिया। अगर हम किसी से यह कहें, उस मनुष्य से, जो इस रास्ते पर जा चुका हो और वह इसको न माने, तो क्या कहा जा सकता है, कि उसको सही रास्ते पर विश्वास है। बहादुरों की पूजा हिंदुस्तान में सदा से चली आ रही है, जिसका नतीजा यह हुआ कि लोग बस उसी की पूजा के हो रहें है और मूर्तियाँ स्थापित हो गई अगर मैं मूर्ती-पूजन करता होता और सही रास्ता मुझको, जो इससे कहीं अच्छा है, मिल जाता और सिखाने वाला मुझसे इसको छोड़ने के लिए कहता तो शायद ये क्या, मैं अपने आप को भी छोड़ने के लिए तैयार हो जाता।

इस मार्ग में बुराइयाँ छूटती हैं और फिर अच्छाइयों के तरफ भी रगबत नहीं रहती, तब कर्म-बन्धन से छुटकारा होता है। चौबे जी को मैंने डर की वजह से यह बात नहीं लिखी, तुम्हे लिख रहा हूँ, इसलिये कि मुमकिन है, ईश्वर की यही मर्ज़ी हो कि तुम आला तरक्की करो। रौशनी जो तुम्हे कभी-कभी नज़र आ जाती है, यह आत्मा की झलक है और उन्नति का चिन्ह। मगर उन्नति के लिये यह आवश्यक नहीं कि हर शख्स को यह चीज नज़र आवे। अपने-अपने संस्कार व प्रकृति पर है। मैं समझता हूँ कि तुम यही पसन्द करोगी कि हम उस ईश्वर से प्रेम करें, जिस पर ज़मीनी क्या, बल्कि ख्याली आवरण भी चढ़ा हुआ नहीं है। बाकी हालतें जो तुमने लिखी हैं, वह बहुत अच्छी हैं। इनके बारे में मैं थोड़े दिनों बाद लिखूंगा।

मैं तुम्हारी माता जी से कहता हूँ और चलते समय मैंने उनसे कहा था कि चौबे जी को संभाल लेना, उनके हाथ में ही है। स्त्री पहले स्वयं करे। उसके बाद पति को उस अच्छी बात को करने में सहायता दे और बेटी! यह वक्त अब बार-बार न आयेगा। इसको मुमकिन है कि कुछ लोग समझते भी हों।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-5
शाहजहाँपुर
24/7/1948
पत्र मिला, हाल मालूम हुआ। प्रकाश के बारे में मैं पहले लिख चुका हूँ कि किसी को दिखलाई पड़ता है, और किसी को नहीं, और इससे तरक्की में कोई हर्ज़ नहीं पड़ता। फिर लिखता हूँ कि मार्ग मिल जाने पर, बस उसी पर चलना चाहिये और उसी के उसूलों पर आरुढ़ रहना चाहिये। तुम्हारे पिता जी तुम सब लोगों की उन्नति चाहते हैं, इसमें संशय नहीं। तुम्हें भी ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिये कि वह भी इस मार्ग में अच्छी उन्नति करें और वह बाधाएँ छूट जायें जो उन्नति में बाधक हैं।

देखो किसी कवि ने कितना सुन्दर कहा है -

‘एक हि साधे सब सधै, सब साधे सब जाये।’

इस पर तुम सब को अमल करना चाहिए, यह बड़ी अच्छी बात है। दुनिया के नियम कुछ ऐसे हो रहे हैं कि अपने मतलब की गरज़ से जाने कितनी पूजाएँ ईज़ाद कर लीं। एक से अनेक में तबियत फिरने लगी। विचार की बहुत सी धाराएँ पैदा हो गई, और फिर वह अपने देवता के इर्द-गिर्द फिरने लगीं। हालत ऐसी हो गई, जैसे फव्वारे में पानी हजारों धारें बन कर निकलता है। एकाग्रता जाती रही। असल से दूर होते गये। अब समझाने से भी नहीं मानते, ऐसी हालत बन गई। इलाज सबका बस यही है कि सिर्फ़ ईश्वर प्राप्ति ही अपना उद्देश्य रहे। हजारों वर्ष हम दुनिया में रहे और लाखों वर्ष और दुनियाँ में रहना चाहते हैं। हम वह तरीका क्यों न ग्रहण करें कि जहाँ से आये हैं, वहीं समा जायें और उन आगामी लाखों वर्षों को बचा लें।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-8
शाहजहाँपुर
14/9/1948
पत्र मिला। जवाब शीघ्र इसलिये न दे सका कि कोई लिखनेवाला मौजूद न था। बहुत से खत पड़े हुए हैं। अब सब का जवाब दे रहा हूँ।

तुम्हारी आत्मिक-दशा जान कर चित प्रसन्न हुआ। ईश्वर तुम्हे अपने उद्देश्य में सफल करे। बेचैनी ईश्वर की याद के लिये पैदा होना बड़ा अच्छा है। मैं इसका वर्षों शिकार रहा हूँ यही एक चीज है जो धुर तक पंहुचा देती है और हमारे लिये यही शान्ति है। भक्त की तारीफ यही है कि वह ‘मालिक’ की याद में बेचैन रहे। लोग शान्ति दूढ़ते हैं, जंगल में जाते हैं, मगर इस अनमोल रत्न पर कोई बिरला ही आकर्षित होता है। तुम आइन्दा खत में लिखना कि अब भारीपन किस कदर है। इस भारीपन की दो वजह हुआ करती हैं। एक वजह तो यह होती है कि जो लोग मूर्ति-पूजन करते हैं, उनके दिल में जो ठोसता पैदा हो जाती है, उसको जब यह चीज़ दूर करती है, तो यह बात महसूस होने लगती है। दूसरी वज़ह यह होती है कि आत्मिक-बल हृदय में प्रेम द्वारा ज़्यादा समा गया हो और वह हज़्म न हुआ हो। पहली वज़ह जब होती है, तो दिल में सख्ती ज्यादा मालूम होती है। दूसरी वज़ह कमतर होती है। अब तुम लिखना कि इस की वज़ह जो तुम्हारे समझ में आवे। सम्भव है कि यह बात कम हो गई हो। मैं चाहता हूँ, यह चीज स्वयं ही दूर हो जावे, ताकि तकलीफ न हो।

ता. २७.८.४८ को श्री कृष्ण जन्माष्टमी का दिन था। मेरे लिये आज्ञा यह है कि इस दिन जो लोग जहाँ-जहाँ व्रत रखते हैं, उनको आत्मिक लाभ पहुँचाऊँ इस लिये, उस रोज़ में घण्टों यही काम करता रहा। आज्ञा यह भी हुई थी कि दूसरे दिन भी व्रत रखूं, यानी दो दिन व्रत के लिये हुक्म था। मगर शरीर निर्बल होने के कारण आज्ञा मिली कि एक रोज मैं व्रत रखू और दूसरे रोज़ एक गुरुभाई, जो आत्मिक उत्रति के उच्च शिखर पर है, जिनका नाम पण्डित रामेश्वर प्रसाद मिश्र है, व्रत रखें । यह बात दो-तीन वर्ष से चली आ रही है। तुमने अपने पिता जी की आत्मिक उन्नति के लिये, जैसा कि मैंने किसी पत्र में लिखा था, प्रार्थना की होगी।

मैं तुम्हारे पिछले पत्र का उत्तर लिख चुका था। आज १६ सितम्बर को दूसरा पत्र मिला। उसमें तुमने एक बात लिखी है, वह मेरी समझ में नहीं आई, कि क्या मतलब था। वह यह है कि ‘जो पहले हालत थी, अब नहीं है’। पहले वह कौन सी हालत थी कि जिसके अब न होने से चित्त में ग्लानि है। कदम आगे ही बढ़ना चाहिये और ईश्वर से इसी की प्रार्थना करनी चाहिये। 'वह’ सब कुछ कर सकता है। केसर और तुम्हारी माता जी पूजा करती हैं, यह सुन कर खुशी हुई।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-10
शाहजहाँपुर
26/9/1948
पत्र मिला-तबियत प्रसन्न हुई। तुमने जब अपने भारीपन का हाल लिखा था, मैंने ईश्वर से तुम्हारे लिये प्रार्थना की। ईश्वर-विषय में मैं और तुम दोनों ही भिखारी हैं। उसकी जो मर्ज़ी होती है वही होकर रहता है। वह जिसको अपनी ओर खींच लेवे, वही कामयाब है। एक फ़ारसी कवि ने कहा है:- जिसका मतलब यह है कि- ‘बिना तेरी मर्ज़ी के तेरे दर्शन नहीं होते’। अब दर्शन किसको कहते हैं वह वाकई हालत क्या है, और आम जनता इसको क्या समझ रही है? अगर मैं इसकी व्याख्या करूँ तो बहुत कुछ हो सकती है मगर वाक़ई में मैं इसकी व्याख्या उस रोज करूँगा, जब ईश्वर तुममें वह हालत पैदा कर दे। मैं उस प्रतिज्ञा से बहुत खुश हुआ। तुमको ईश्वर करे, इसमे सफलता प्राप्त हो। ईश्वर करें तुम अपने घर को उजाला करो। यही नहीं, ईश्वर वह समय लावे कि तुमसे दु:खी लोग फायदा उठावें। अगर तुम दिल से प्रार्थना चौबे जी के लिये कर दोगी, तो खाली नहीं जा सकती। ईश्वर तुमको अहंकार से बचावे। चौबे जी अब अच्छे हैं, मगर तुम्हारी माता कुछ ऐसी भंभेर में पड़ी हैं, कि उस सर्व-शक्तिमान ईश्वर की तरफ उनका झुकाव सही मानों में नहीं होता। हमें तो उससे प्रेम करना है, जिसका रंग व रुप कुछ नहीं। यह चीज़ जो तुम कर रही हो, और हम सब लोग कर रहे हैं पर उसी का झुकाव और विश्वास पूरी तौर पर हो सकता है जिसको कि ईश्वर अब इस चोला छोड़ने के बाद दुनिया में लाना नहीं चाहता।

अपनी माता जी से नमस्ते कह देना व पूज्य चौबे जी से भी। अपनी बहनों से भी मेरा आशीर्वाद कह देना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-12
शाहजहाँपुर
23/10/1948
पत्र मिला-खुशी हुई। ईश्वर का धन्यवाद है कि तुम्हारा रुझान उसकी तरफ हो रहा है। ईश्वर तुमको खूब रुहानी तरक्की देवे । तुमने जो कैफ़ियत शान्ति की लिखी है, अच्छी है, मगर, इस शान्ति में अगर बेकरारी न हो तो ऐसा है, जैसे अच्छे भोजन में नमक न डाले। कैफ़ियत अपनी लिखती रहा करो। मुर्दे की सी दशा, जो तुमने लिखी है, इसका जवाब मैं बहुत दिनों बाद दूँगा, अगर याद रही। इस पर अभी ज़्यादा लिखना मुनासिब नहीं समझता। एक खत में किसी हालत के बारे में पहले भी यही लफ़्ज़ लिख चुका हूँ, कि फिर जबाब दूँगा। अगर इनको किसी डायरी में नोट कर लो, तो मुमकिन है कि मुझे याद दिलाने पर याद आ जावे। केसर की मुझको याद अक्सर आ जाती है। उसके भजन मुझे बहुत पसन्द आये थे, इस वजह से मुझे और भी याद आ जाती है। तन्दुरुस्ती तुम, जहाँ तक हो सके अपनी बनाने की कोशिश करो, यह बात बहुत आवश्यक है। माता जी से मेरा प्रणाम कहना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-14
शाहजहाँपुर
2/11/1948
पत्र मिला खुशी हुई। ईश्वर तक पहुँचते-पहुँचते जाने कितनी दशायें परिवर्तित होती रहती हैं। ये हालतें प्रत्येक अभ्यासी पर गुजरती हैं। लगन अगर अच्छी है, तो अक्सर दशाएँ Feel होती हैं। तुम्हारे खत मैं रखता जाता हूँ। हर दशा पर एक-एक कर के प्रकाश डाला जा सकता है, मगर मैं उस वक्त इन दशाओं को लिखना चाहता हूँ, जब कि ये दशायें बहुत कुछ पार हो कर ऊँची उठ जाएँ। ईश्वर से कुछ दूर नहीं, वह सब कुछ कर सकता है। हमारी भूल यह है कि उसको अपने पास होते हुए भी अनुभव नहीं करते। अपनी माता जी से मेरा प्रणाम कहना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-18
शाहजहाँपुर
19/11/1948
तुम्हारे दोनों पत्र मिले, पढ़ कर खुशी हुई। यह ईश्वर की कृपा है कि तुम्हारा रुझान उस तरफ बढ़ता जाता है। तुमने जो कुछ भी लिखा है, उससे यह मालूम होता है कि तुम्हारी लय-अवस्था बढ़ रही है, मगर अभी स्थाई रुप में नही हुई है। हो जावेगी, अगर ईश्वर ने कृपा की और तुमने अपनी मेहनत जारी रखी। उस काम के लिये तन्दुरुस्ती की भी जरुरत है, लिहाज़ा इसकी भी फ़िक्र रखनी चाहिये। तन्दुरुस्त मैं भी नहीं हूँ। हर वक्त के दर्द ने मुझको कमज़ोर कर दिया है, मगर यह हालत मेरी बहुत कुछ सीखने के बाद हुई थी। ईश्वर कमज़ोर की आवाज़ ज्यादा सुनता है, मगर उसके सुनने से पेश्तर हमको उपाय और अभ्यास करना पड़ता है, ताकि हम इस क़ाबिल बन जावें कि हमारी आवाज़ ‘मालिक’ तक पहुँचा सके और इसके लिये तंदुरुस्ती की आवश्यकता है

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-20
शाहजहाँपुर
10/12/1948
पत्र मिला-पढ़कर खुशी हुई। तुम्हारी हालत उन्नति पर है ‘मालिक’ का धन्यवाद है। कोशिश से सब कुछ हो जाता है, और मैं समझता हूँ, ईश्वर से मिलना आसान है। सिर्फ उस तरफ दिल का रुझान करने की ज़रूरत है और यह बात मैं हर एक से कहता हूँ। लय-अवस्था तुम्हारी बढ़ रही है। ईश्वर ने कृपा की और तुम्हारी कोशिश जारी रही तो स्थायी रुप में भी हो जावेगी, इसमें उन्नति का कोई ओर-छोर नहीं। सिर्फ लय-अवस्था ही स्थाई रुप में आ जाना काफी नहीं है। इसके आगे भी बहुत कुछ है और फिर उसका भी ओर-छोर नहीं। अगर मनुष्य सबसे ऊँची दशा में आ जावे और वह ऐसी दशा हो कि जब से दुनिया पैदा हुई, तब से और किसी को यह बात नसीब न हुई हो, तो भी उसके बाद बहुत कुछ जानने को रह जावेगा। न मालूम इस ज़माने में मनुष्य अपने आप को पूर्ण कैसे समझ लेता है। पूर्णता सिर्फ ईश्वर में है। इन लोगों की मिसाल ऐसी होती है, जैसे किसी शख्स को एक हल्दी की गाँठ मिल जावे और वह अपने आप को पंसारी समझ बैठे। ‘नेति-नेति’ वेदों ने कहा है। एक बात ज़रुर ध्यान में रखना चाहिये कि किसी शख्स से ऐसे शब्द न कहे जायें, जो अगर वैसे ही हो जाय तो उससे उसको तकलीफ पहूँचे।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-24
शाहजहाँपुर
16/1/1949
मुझे हर्ष है कि ऐसे अच्छे पत्र आध्यात्मिक उन्नति के मिले जाते हैं। ईश्वर को धन्यवाद है। मुझे कोई नहीं पूछता और न मेरी कोई खबर लेता है। और पूछे भी कौन, जब कि मेरे पास ज़ाहिरा कोई दौलत मालूम नहीं होती। लोग आते तो अवश्य हैं और मुझसे सीखते भी हैं, परन्तु बहुत कम। एक-आध इस गरीब को पत्र द्वारा पूछ लेते हैं। मेरे पास अब सिवाय गरीबपन के और कुछ नहीं है, जिससे लोग मेरी तरफ आकर्षित हों। तोशा (सफर का सामान) तो मैंने रखा ही नहीं, क्योंकि अब सफर करना ही नहीं हैं। अब अगर किसी से मैं यह कहूँ कि तुम सफर करो अपने वतन का तो क्या वह यह कहने का हकदार नहीं है कि ऐसे सफर से तो दर गुज़रा की मंजिल होते ही या उस पर पहुँचते ही अपना तोशा भी रख दूँ। सामान जब सब खो दिया, तो अपने पास रह ही क्या गया? क्या सफर का यही नतीजा है? फिर बात-चीत और सत्संग से लोग जब यह जानने लगते हैं, तो अक्सर उनकी तबियत हटने लगती है। इसकी मिसाल एक शाहजहाँपुर में मौजूद है।

तो प्यारी बेटी! अब मेरे पास क्या है जो मैं तुम सबको दूँ? अगर खोई हुई चीज़ फिर से हाँसिल करने की कोशिश करूँ, तो वह भी नहीं होता। इसलिए, क्योंकि मैंने उससे इस सफ़र की कीमत अदा की है। अब रह क्या गया मेरे पास? बस कुछ नहीं, और उसको लेने के लिये इक्का-दुक्का तैयार कठिनता से होते हैं। तो क्या तुम्हें यह चीज़ भली मालूम होती है? प्रेम और मोहब्बत, जिसको तुम चाहती हो, मेरे पास अब वह भी न रही, जो तुमको दे डालूं। हाँ, यह हो सकता है कि हम तुम दोनों हाथ पसार कर ईश्वर के सामने इसको देने की प्रार्थना करें। उसमें डर यह भी है कि कहीं 'उसने' (ईश्वर) यह कह दिया कि जिसने मुझे अपना सब कुछ दे डाला, तो अगर उसे प्रेम दिया जाये, तो क्या वह गरीब रख सकेगा। मुमकिन है कि ईश्वर अपना प्रेम तुमको दे देवे और भाई, अपने लिये तो मुझे शक है कि जाने वह देगा या नहीं। इस लिये कि मेरी कलई उस पर खुल चुकी है। तुमने अपनी जो कुछ भी हालत लिखी है, डर है कि मेरी तरह कहीं धोखे से इस सफर की कीमत अदा न कर दो और एक गरीब बेनवा (बेसरो-सामान) की तरह न बन जाओ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-26
शाहजहाँपुर
9/2/1949
पत्र तुम्हारा २४.१.४९ का लिखा हुआ मिला। अब उत्सव के पश्चात् उसका उत्तर दे रहा हूँ। तुमने जो मेरे खत का जवाब दिया है कि एक गरीब आदमी, अपनी गरीबी दे सकता है। यह उसका जवाब था, जिसको मैंने यह लिखा है कि मैं बहुत गरीब हूँ।

गरीबी की हालत वह है, जिसको लोग तरसते चले गये हैं, और सम्भव है इसका मज़ा बहुत से ऋषियों ने भी न चखा हो। अगर हम मालदार नहीं हैं तो इसके माने यह है कि हम गरीब हैं। मालदार आदमी के पास सब कुछ होता है, गरीब आदमी के पास कुछ नहीं होता है, अर्थात् जो गरीब है, उसके पास कुछ नहीं है। अब जिसके पास कुछ नहीं है, उसके पास क्या चीज़ हो सकती है, जो दूसरों को दे? अब यदि दे, तो उस चीज का नाम ‘कुछ नहीं’ रख लिया जाये तो यह एक ऐसी चीज़ बन जाती है जो कि देने के काबिल नहीं रहती। एक आदमी है, जो किसी समय धनी था, अपनी पूँजी दूसरों को दे सकता था। जब गरीबी बढ़ती गई, उसका देना कम होता गया। जब कुछ न रहा, तो कुछ न दे सका। अब उससे माँग कर देखो तो भला उसके पास क्या है, जो देगा? अगर मुझको ऐसा ही समझ लिया जावे, तो मेरे पास देने को कुछ नहीं रहता। हाँ, इसके अन्दर एक बात ज़रूर है कि ‘कुछ नहीं’ की तह में यानी जिसको ‘कुछ नहीं’ कहा है, कोई चीज़ ज़रूर है, जो की दी जा सकती है। इसके आगे कुछ भी नहीं रहता। वहाँ पर देना और लेना सब समाप्त हो जाता है। अब इस हालत में पहुँचने के लिये तरीका बिल्कुल साफ है कि मालदार आदमी के पास जो कुछ सामान हो, उसको छीनता चले। आखिर में जब उसके पास ‘कुछ न’ रह जायेगा, तो वह गरीबी की हालत पर आ जायेगा । तो तुम चौबे जी साहब से पूछ कर लिखना कि किसी का माल व असबाब छीनना शास्त्र के विरुद्ध तो न होगा? अगर इसका जवाब वह यह दें कि सामान रहते हुए, उससे बेखबर हो जावे तो यह सवाल पैदा होता है कि किसी न किसी शक्ल में सामान तो उसके पास रहा ही, फिर सामान रहते हुए गरीबी कैसे आ सकती है और अगर बेखबर भी हो गया, तो समय पर ज़रुरत उसको सचेत कर देगी। अब क्या होना चाहिये? बस यही तरकीब हो सकती है कि सामान को ऐसी जगह रखवा देवे कि ज़रुरत पड़ने पर उसकी खबर हो जावे, तो ख्याल पैदा होता है कि यह चीज़ दूसरे के पास धरोहर रखी हुई है। यह शुरु का तरीका है, और आगे बढ़ने पर इस सामान को, जो बतौर धरोहर दूसरे के पास रखा हुआ है, ‘उसका’ ही समझ लें और अपना कोई अधिकार उस पर बाकी न रखे, तब यह बात पैदा हो सकती है कि सब कुछ होते हुए अपने पास कुछ न महसूस हो। अब मान लो कि हमारे पास जो अन्दरुनी ताकतें व सिद्धियाँ हैं, यानी जो ताकतें हमको ईश्वर से मिली हैं, उसको अगर हम सब ईश्वर की समझ लेवें और उसको इन पर काबू और अख्तियार दे देवें, या दूसरे शब्दों में इनको ‘उसके’ हाथ बेच डालें, तो हम हर चीज़ से खाली हो जाते हैं। अब यह चीज़ पैदा होती है ऐसे अमानतदार को ढूँढ़े कैसे, कि यह चीज़ उसके हवाले कर सकें? वह तो इतनी दूर है, जैसा कि ख्याल है, कि वहाँ तक पहुँचना कठिन है और अगर वह सबसे नज़दीक भी है तो उसका यह हाल है कि जैसे अपनी आँख खुद अपनी आँख को नहीं देख सकती है। तो भला ऐसे अमानतदार को कैसे पावें? जवाब इसका यही है कि हम अगर सिर से पैर तक आँख बन जावें तो कम से कम हमको कहने को ज़रुर रह जायेगा कि हम अब कुल आँख ही आँख हो गये। अब ज़रुरत सिर्फ इस बात की रह जायेगी कि हम उसको तलाश करें। जब हम कुल आँख ही आँख बन गये, तो इसके माने यह हुए कि देखने की ताकत हमारे कुल बदन में है। अब देखना क्या रहा, जब हम कुल आँख ही आँख रह गये और अब हमारे पास सिवाय इस चीज़ के कुछ न रह गया। अब यह बात भी जाती रही कि आँख को आँख नहीं देख सकती, इसलिये कि वह ताकत जो उसके देखने की तरफ हमको मायल कर रही थी, उसका अब खात्मा हो गया और इसलिये कि उन ताकतों की जगह पर जो अनेक रुप में हैं, अब आँख ही रह गई है। अब तो बेटी! यह हो गया है, कि हर तरफ वह चीज़ है, जिससे कि रोशनी निकलती है। जो आँख - आँख को देखना चाहती थी, वह अब सिर से पैर तक एक हो गई है। उसको देखने की अब अपने आप को ज़रुरत भी नहीं रही।

इस कुल इबारत का मजमून यह है कि जैसे आँख ही आँख अपने में दिखलाई देती थी, तो वह चीज़ें जाती रहीं, जिससे आँख को आँख देख सकती थी। इसी तरह से अगर हम बजाय आँख के ईश्वर ही ईश्वर को भास करने लगें तो फिर हमको अमानतदार की तलाश नहीं रह जाती। इसलिये कि फिर वह कुल चीज़ असली रुप में हो जाती है, जिसको हम अमानतदार के हवाले करना चाहते थे। अब गरीबी आई, मगर हमको मालदारी और गरीबी, दोनों का खात्मा करना है। जो तब ही हो सकता है, कि बजाय कुल आँख सिर से पैर तक बनने में वही असली आँख जो ईश्वर है बन जावें ऐसा स्वाभाविक है कि इसका भी पता न रहे, तब मालदारी और गरीबी दोनों गायब होती है। पिछली चिट्ठी में जो मैंने अपनी गरीबी का जिक्र किया था, वह हालत बन्दे की है और इसके आगे बड़ी Personality और इससे आगे अवतारों की है। इस पत्र का उत्तर अगर बेटी! तुम लिखो तो मेरा दिल बड़ा खुश हो और लिखो ही क्या, ऐसा ही होने की प्रार्थना करो। ईश्वर से कुछ दूर नहीं, वह सब कुछ कर सकता है। तुम जब शाहजहाँपुर में थीं, तो तुमने मुझसे कहा था कि बाबूजी मुझे नौकर रख लो। मैं इन प्रेम भरे शब्दों से खुश हुआ बेटी! केवल तन्दुरुस्ती का इन्तज़ार है और इसी की वजह से धीरे-धीरे का मजमून है, वरना रुहानियत असल रुप में पैदा हो जाना एक क्षण-मात्र का काम है। इस नौकरी की तनख्वाह तुमने छ: सिटिग रोज़ माँगी हैं। ईश्वर ने चाहा तो तुम्हारी वह हालत पैदा होगी कि हर समय सिटिंग ही सिटिंग रहेगी। फिर क्या होगा, जिसका मैं नौकर हूँ, उसकी ही नौकरी तुम कर लेना।

केसर ने मुझे पत्र तुम्हारे पत्र के साथ भेजा है। उसका जवाब यह है कि वह तो हमारी लड़की या बहन है और उससे ऐसा नाता भी है। मैं तो कुल दुनिया को चाहता हूँ कि मुझ से अच्छा बने और मेरी प्रार्थना भी यही है, कि इसके बदले में मुझे जितनी सज़ायें भी मिलें, मुझे सब बर्दाश्त है। इस पत्र में मैंने वैराग्य और लय-अवस्था दिखलाई है और यह भी दिखलाया है कि ईश्वर-दर्शन क्या है। ईश्वर-दर्शन की हालत और उसका आनन्द ऐसा समझ लो जैसे संग(पत्थर) बे-नमक और आखिर पर यही कैफ़ियत हो जाती है। इसके लिये जन्म-जन्मान्तर लोग मेहनत करते हैं और इसके एवज़ में जो मिलता है, उसको अगर शुरु में दिया जावे तो लोग भागने के लिये तैयार हो जायें और ईश्वर की तरफ कोई न रागिब हो।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-34
शाहजहाँपुर
8/5/1949
पत्र मिला, पढ़कर खुशी हुई। मैं तुम्हारे साथ में बहन का बर्ताव रखना चाहता हूँ, इसलिये कि हम सब 'लाला जी' की औलाद हैं और उन्हीं के सेवक। मगर बेटी की निगाह से मैं देखता चला आया हूँ, इसलिये दिल में बेटी का ही भाव बनता है, मगर ज़ाहिरा मैं बहन का ही भाव रखूँगा। अन्दर अगर यह भाव बहन का बन जाये, तो अच्छा है। तुम्हारी अन्य सभी बहनों से तो बहन का भाव रहता है, मगर तुमसे यह भाव नहीं बनता। तुम किसी वक्त मुमकिन है, किसी ऋषि की लड़की हो, और मोक्ष तो तुम्हारी एक बार हो चुकी है। चाभी खत्म होने के बाद फिर वापिस आना पड़ा है। अब यह नहीं कह सकता कि कितने जन्म तक आना पड़ा। अब Liberation की बारी है, अगर ईश्वर दे दे। कुछ ख्याल ऐसा भी होता है कि ऋषि पंतजली के वक्त में तुम मौजूद थी और तुम उनको जानती थीं, और उनके वाक्य सिर्फ सुने सुनाये दिल में तैरा करते थे। उस जन्म के बाद तुमने योगाभ्यास भी किया था, मगर उसको पूरा न कर सकी और उसी में मोक्ष पा गई। मुमकिन है, इस रिश्ते की वजह से तुम पर निगाह पुत्री की पड़ती है। इस भेद को मैं इस पत्र में खोलना नहीं चाहता इस लिये कि लोग इस पत्र को पढ़ें तो न मालूम मेरे बारे में क्या ख्याल करें। अगर इसके जानने की ज्यादा curiosity हो तो मास्टर साहब से पूछ लेना। मगर चौबे जी से डर लगता है। मौजूदा जन्म से पेश्तर तुम एक किसान की भोलीभाली लड़की थीं और चौदह साल की उम्र में तुम्हारी मृत्यु हुई। Innocent बहुत थीं। यह बात मैं खत के जवाब से बाहर लिख गया।

एक बात मैं तुम्हें लिखे देता हूँ और यह स्वामी विवेकानन्दजी ने भी कही है कि सिखाने वाले से जितने भी मनुष्य सीखते हैं, वे ख्वाह उम्र में बड़े हों या छोटे, सब उसकी रुहानी औलाद होते हैं। मगर कहीं इससे यह न समझ जाना कि मैं सिखाने वाला हूँ। सिखाने वाला कोई और है, जो हम सब को सिखाता है। केसर की हालत ईश्वर की कृपा से अच्छी है और उसकी चौबेजी ने सिफारिश भी की है। मगर उससे कह देना कि अभी दिल्ली दूर है, कोशिश किये जाये।

अभ्यासी को सन्तुष्ट कभी नहीं होना चाहिये और ‘मालिक’ की याद जितनी कर सके, करे। हमारा धर्म यही है कि हमें सन्तोष उसकी याद का न आने पावे। अब यह ‘मालिक’ की देन है और उसके हाथ में है कि कब सन्तुष्ट कर दे। जो नियम कि तुमने Quote किया है, वह Beginners के लिये है, कि ऐसी हालत पैदा करें। वास्तव में प्रार्थना वही है कि जैसी तुम करती हो, शून्य-दशा पैदा हो जाये। मेरा पहले वाला खत देख लेना, जिसकी नकल मास्टर साहब के पास है। सम्भव है कि चौबे जी के पास भी हो। जब अभ्यासी का सम्बन्ध ऊपर की दुनियाँ से जुड़ जाता है और वहाँ रहन होने लगती है, तो उसको यही प्रतीत होता हे कि यह मेरा घर है। मेरी भी किसी समय ऐसी हालत रही है। तुमने यह जो लिखा है कि- ‘मैं कभी-कभी रसोई घर भी भूल जाती हूँ और भौचक्की सी रह जाती हूँ’, चौबे जी की ज़बान में तो इसका जवाब यह है कि तुम्हें भूख ही नहीं लगती, स्वास्थ्य न ठीक होने की वजह से। मेरा जवाब यह है कि भूल की अवस्था पैदा हो रही है। मगर इसकी इतनी ज्यादती इस हालत में हो जाना कुछ-कुछ कमज़ोर दिमाग की भी वजह है। भौंचक्की सी रहजाना, यह एक आध्यात्मिक हालत है, जिसकी अभी शुरुआत है, पूर्णरुप में अभी नहीं आई है। मैं यह बताना नहीं चाहता कि पूर्ण रुप में आ जाने के क्या Symptoms हैं, इसलिये कि यह ख्याल तुम हालत आने से पहले ही कहीं बाँध न बैठो। Godly Science के खुलने कि शुरुआत उसी वक्त होती है, when a man begins to wonder.

Swami Vivekanand (८.१५. सांय):- This condition is rarely found. All Abhyasis approach, but do not stay. It is bestowed, no doubt. Daughter ! Excellent letter it is. See the approach. You will not be getting such a Master. I am sorry. Nobody comes to Him for this sort of training. All are over whelmed. Such a Master will not appear in future, Masterly command he has got. People are still sleeping in deep slumber inspite of my repeated warnings. Avail daughter, tThis opportunity. May God bless you. You do not know the condition of your father and mother. They too are unaware of it. What He (Ramchandra) has achieved at Lakhimpur, others require a thousands of years. See his efficacious training; salvation is sure for your mother because she has brought forth such a good master. Stones cannot breed such a good master. It is she only and her kinsman.

लालाजी साहब तुम्हारी माताजी की इस वक्त तारीफ़ कर रहे हैं कि वास्तव में ख़्याल पुत्र का जमाने वाला हो तो ऐसा ही हो, जैसे तुम्हारी माँ, तब फायदा है। मास्टर साहब से कह देना कि मैंने इन खतों की नकलें नहीं रखी हैं। अगर रखना चाहें तो चौबे जी से करा लें।

मैं अपनी रौध में लिख गया, फिर मेरे दिल में खेद पैदा हुआ कि मैंने तुमको किसान की बेटी बतला दिया। सही बात राम जाने। मेरी समझ में आया सो ना मालूम मैं क्यों लिख गया। अगर बुरा मालूम हो, तो क्षमा करना। और इस खत की नकल किसी को न करने देना, बल्कि फाड़ देना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-36
शाहजहाँपुर
15/5/1949
पत्र मिला, पढ़कर खुशी हुई। ईश्वर तुमको रोज़-व-रोज़ रुहानी तरक्की दे। मैं यह चाहता हूँ कि तुम अपनी जीवनी लिखना शुरु कर दो और जब से तुमने ब्रह्म-ज्ञान सीखना शुरु की है, उस तारीख तक आने पर अपनी रुहानी हालतें लिखती चलो। मेरे पास तुम्हारे सब खत मौजूद हैं, जो मैं भेज दूँगा। उनमें जो हालतें लिखी हैं, वह सब लिखती जाना। शुरु के हाल तुम्हारी माता जी को सब मालूम होंगे, उनसे सब पूछ लेना और अपने spiritual Development के लिये जो तरीके तुमने किये हैं, वह सब लिखते जाना।

अपनी माता जी से प्रणाम कहना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-39
शाहजहाँपुर
2/6/1949
पत्र मिला, कुछ कामों में मैं ऐसा व्यस्त रहा कि मुझे पत्रोत्तर भेजने का मौका न मिला। फैलाव जो तुम्हें मालूम होता है, वह दिल के बीच के मुकाम की कैफ़ियत है। इससे यह समझना चाहिये कि तुमने उस हिस्से से अपना सम्बन्ध जोड़ लिया है, जिसके बाद ही ठोस हालत शुरु होती है। यानी उसकी सूक्ष्म कैफ़ियत में तुम्हारी पहुँच है, उसमें तुम फैल रही हो। सम्भव है बहुत जल्द ही इससे ऊँचे जाने की खुशखबरी मिले।

अपने आपको बच्चा समझ कर जो मुझसे खेलती हो, यह ईश्वरीय ख्याल कायम रखने का एक तरीका है। ख्याल एक ही होना चाहिये, रुप बदलने में कोई हर्ज नहीं और ऐसा करने से दिमाग को आराम भी मिल जाता है।

मैं पहले पत्र का उत्तर लिख चुका था कि तुम्हारा दूसरा पत्र भी आ गया। अब उसका भी उत्तर लिख रहा हूँ। इस खत ने मुझको यह उम्मीद दिला दी कि अब उस हालत के करीब हो, जहाँ कि लय-अवस्था की सूक्ष्म गति शुरु होती है। मगर यह सब हृदय-चक्र की हालतें है; अभी कुछ सैर इसकी और बाकी है। इसके बाद दूसरी इससे बेहतर हालत की खुशखबरी मिलेगी। यह हालत पहले ही चक्र की है; अभी बहुत से चक्रों का crossing बाकी है। और इसके बाद ईश्वर जाने क्या-क्या हालतें हैं, फिर भी छोर नहीं। तुमने जो यह लिखा है कि यह याद नहीं रहतीं कि ‘मालिक’ की याद थी या नहीं थी, इस चीज़ का पैदा हो जाना इस बात की दलील है कि उसकी याद आंतरिक पहुँच चुकी है, मगर यह कार्य ईश्वर का है। हमारा काम यही है कि जिस तरह हो सके, उसकी याद रखें। हमारे यहाँ अभ्यासी को यदि थोड़ी सी भी लगन लग जाती है, तो अनजाने उसकी याद कायम ही रहती है। जब हम अपना ख्याल उसमें कायम कर देते हैं, तो तेज़ मालूम लगती है। भौंचक्के होने का जवाब मैं पिछले खत में दे चुका हूँ।

नींद के बारे में जो तुमने लिखा है, उससे यह मतलब निकल रहा है कि तुम सुषुप्ति की हालत में तेज़ जाती हो और आँख खुलने पर यह मालूम होता है कि किसी नये देश से आयी हो। इसका मतलब यह है कि यह अन्दाज़ होने लगता है कि तुम सुषुप्ति में जाती हो। वैसे दूसरे आम लोगों को जो गाढ़ निद्रा में जाते हैं, जागने पर यह एहसास नहीं होता कि हम कहीं से आये हैं। इस चीज में लय हो जाना (मगर इसमें कोशिश नहीं की जाती) और फिर उसमें बका (जिन्दगी) की हालत पैदा हो जाना तुरीय का अंदाज है। मगर इसमें अभी बहुत देर है। माता जी को Sitting देने का तरीका मास्टर साहब बतला देंगे।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-47
शाहजहाँपुर
27/7/1949
पत्र मिला, हाल मालूम हुआ। हमारे यहाँ कोई नहीं रुकता, अगर विश्वास ठीक हो तो ऐसे Station ज़रुर आते रहते हैं, जहाँ पर ठहराव कुछ हो जाता है। अगर ज्यादा दिनों तक ठहराव रहे तो तरक्की में उतने दिनों कमी रहती है और अगर कम रहे तो कोई हर्ज़ नहीं होता। यह ठहराव भी बड़ा मुबारक है। इससे आगे बढ़ने की ताकत पैदा हो जाती है। एक कारण रुकाव का और हो जाता है। वह यह है कि ज्यादा खा जाने से, हज़्म नहीं होने की वज़ह से यह बात पैदा होती है। महात्माओ ने इसको भी मुबारक कहा है। कहा तो यहाँ तक है कि अक्सर अभ्यसियों की बरसों यह कैफ़ियत रही है और इसको कब्ज़ (spiritual constipation) कहा है, मगर यह हमारे गुरु महाराज की बरकत है कि इस प्रकार का कब्ज़ जो रुकावट डाले, पैदा नहीं होता। तुम्हारी हालत कब्ज़ की न थी और न होगी, यदि ईश्वर ने चाहा। बल्कि एक Stage पार करने के बाद और उसके आगे आने वाली Stage के बीच की हालत थी। यह बीच की जगहें हर अभ्यासी को पड़ती हैं। मैंने अपनी आत्मिक बल की एड़ उससे तुम्हें निकालने को नहीं लगाई। तुम अपनी ताकत से स्वयं निकल आई, और मैं चाहता भी यही था। अगर अब तक उस हालत से न निकलतीं तो जरुर मैं अपनी will exercise करता। सबसे अच्छा चलना तो उसी को कहते हैं कि अपनी मेहनत से आगे बढे। तुम्हे अपने चित्त में गलानी नहीं करनी चाहिये, इसलिये कि अगर यह हालत न होती तो तुम उससे निकलने की कोशिश नहीं करती। अब चूकि इससे निकलने के लिये अपने हाथ-पैर चलाये हैं, इसलिये आगे बढ़ने की और ताकत आ गई। जिस्म में तुमने रेंगन लिखी है, वह चीज़ ज़िस्म में गुदगुदी पैदा करती है, या सिर्फ़ उसका कोई action सा पैदा होता है। दूसरी बात यह है कि यह चीज़ बढ़ रही है या उतनी ही है, और किसी वक्त मालूम होती है या नहीं?

माता जी से मेरा प्रणाम कहना, तथा बच्चों से दुआ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-51
शाहजहाँपुर
25/8/1949
जब आदमी उजेले की तरफ देखता है, आँख का रेटिना (Retina) glaze करने पर expand हो जाता है। नतीजा यह होता है कि उस उजेले में भी अंधेरा प्रतीत होता है। यह कैफ़ियत अधिकतर त्रिकुटी के मुकाम पर पहुँचने से होती है। वहाँ पर उजेला बहुत है, इसलिये अंधेरा प्रतीत होता है। यह बात मैं आगे के लिये लिखा चुका। तुमने जो लिखा है कि लखीमपुर परदेश मालूम होता था और घर वाले सब ऐसे मालूम होते थे, जिन्हें मैं जानती ही नहीं थी। ऊपर लिखे हुए नियम के अनुसार जब अभ्यासी ‘रुह’ में लय होना शुरू हो जाता है, यानी उसकी जड़ ‘उसमे’ गड़ जाती है तो अपनायत केवल अपनी रुह से होने लगती है। अपनायत के contrary जो outward vision है, वह dull हो जाती है। अपनी असली ताकत ही में निगाह जम कर रह जाती है। जो चीज़ सामने अधिकतर रहती है, पहले वह dull मालूम होती है। उसके बाद कुल दुनिया ऐसी ही मालूम होने लगती है। उसके बाद हालत और बदलती है, जिसका इस समय खोलना मैं मुनासिब नहीं समझता। खाली रहना अच्छा है और इसके यह माने होते हैं कि हमारे बहुत कुछ आवरण उतर चुके हैं। दिल पर निगाह अधिक अभ्यास हो जाने पर ठहरा नहीं करती इसलिये कि हमने दिल का बिन्दु किसी Plane of Region में जाने के लिये बनाया था, इसलिये जरुरी नहीं रहता कि दिल ही पर हम बार-बार जबरदस्ती निगाह को कायम करें। शुरु में ध्यान दिल पर किया, फिर वह जिस Plane में स्वयं चला जाये वहीं पर रखें। माथे और सिर के पीछे के हिस्से में, जो तुमने लिखा है, मालूम होता है, कुछ खुल गया। माथे में तो असर ज़रूर है, मगर पीछे के भाग में अभी झंकार है और अभ्यासियों को हमारे यहाँ अक्सर मालूम होती है। इसलिये कि मैं ऐसी सादा तवज्जह (sitting) देता हूँ, जिसका असर जहाँ पर भी यह चीज़ है, जल्द पड़ता है। तुम यह भी लिखना कि जब तुम पहूँची, तब घर का वायुमण्डल क्या कुछ बदला हुआ पाया? यदि पाया तो किस कदर। इति:-

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-61
शाहजहाँपुर
10/9/1949
तुम्हारे कई पत्र आये, मगर जवाब न दे सका। अब कुछ थोड़ा सा संक्षेप में लिख रहा हूँ। तुम्हारी जो कुछ भी हालत है, यह जहाँ तक मेरा ख्याल है, हृदय चक्र की सैर (To the extent of Pind Desh) पूरी हो चुकी है, और आत्मा-चक्र की सैर अब दर पेश है। मैंने ‘जहाँ तक’ का लफ्ज़ इसलिये इस्तेमाल किया है कि मेरे सिर में इस समय भारीपन है, इसलिये अनुभव शायद ठीक न हो सका हो। यकीन है कि ठीक होगा।

‘मालिक’ का बन्दे की याद में संलग्न होने के माने यह है कि बन्दे की ज़ज्बे की आग ‘मालिक’ तक पहुँच चुकी है और उसको यह खबर हो गई है कि कोई बन्दा मेरी याद करता है, या दूसरे मानों में तुम्हारी आवाज़ ‘मालिक’ के कानों तक पहुँच चुकी है। जब आवाज़ किसी शख्स की किसी को पुकारने की आती है, तो जिसको कि पुकारते हैं, वह मुखातिब हो जाता है और मुखातिब होने के बाद यदि उस शख्स को यह प्रतीत हो जाता है कि यह प्रेम और ज़ज्बे से मुझे पुकारा गया है, तो उसमें भी पुकारने वाले की मोहब्बत पैदा हो जाती है। कबीर साहब ने लिखा है कि-

‘मेरा राम मुझे भजे जब, तब पाऊँ विश्राम।’

यह हालत बहुत काबिले तारीफ़ है और बुजुर्गों ने इसके माने यह निकाले हैं कि ऐसी हालत में ईश्वर प्रेमी होता है और बन्दा प्रीतम। भक्ति मार्ग में इसको बहुत अच्छा कहा है और हम भक्ति भाव से चलते हैं, और यदि इसकी कहीं Philosophy हम बयान करें, तो फिर यह चीज़ ज्ञान-मार्ग में आ जाती है। इसलिये मैं इसको बयान नहीं करता और इसकी Philosophy जहाँ तक मेरा ख्याल है, किसी बुजुर्ग ने बयान भी नहीं की, क्योंकि यह बात Etiquette और अदब के खिलाफ़ मालूम होती है। तुम जब उस Point पर आ जाओ जिसको मैंने आयन्दा छपने वाली किताब में Central Region कहा है, तो समझा दूँगा।

तुमने यह जो लिखा है कि ‘मेरी यह हालत कि जो पूजा आरम्भ करने से पहले थी’। इसकी कुछ-कुछ रमक तो आ जाती है, मगर पूरी तौर से आ जाने का इन्तजार है और जैसा मैं चाहता हूँ, वह अभी दूर है। यह बिल्कुल ईश्वरीय हालत है। इसके परिपक्व हो जाने पर इन्सान सन्त और ठीक आ जाने पर परम् सन्त कहलाता है। यह एक कैफ़ियत मुर्दा की सी होती है। इंसान ज़िन्दगी में ही मुक्ति का तमाशा देखता है और इसमें परिपक्व हो जाने पर जीवन-मुक्ति की दशा आ जाती है और बीज दग्ध हो जाता है। यहाँ पर इन्सान को इन्सान कह सकते हैं, इससे पहले इन्सान बसूरत हैवान है।

तुमने Hospital में जो Scene देखा था और उसे देख कर घर पर जो भीष्म पितामह की मिसाल सामने आकर ख्याल गूंजे थे, यह हिम्मत दिलाने वाले थे। इनसे कोई रुहानियत का सम्बन्ध नहीं है, और तुमने जो यह लिखा कि बाद को कमज़ोरी मालूम हुई, उसकी वज़ह यह मालूम पड़ती है कि चूँकि तुम कमज़ोर हो, जोश आने पर खून की गर्मी बढ़ी और जोश समाप्त हो जाने पर यह फिर Normal Condition पर आ गया। लिहाज़ा जो ताकत किसी जोश में खर्च हुई, ज़िस्म में कम हो गई, इसलिये कमज़ोरी मालूम हुई। जैसे जब दिल कमज़ोर होता है और इसको कोई Stimulant दिया जाता है, तो ताकत मालूम होती है और जब इसका असर खत्म हो जाता है, तो जितनी ताकत दवा ने बढ़ाई थी, वह तो जाती ही रहती है और अपनी भी कुदरती ताकत उसमें खर्च हो जाती है, इसलिये कमज़ोरी मालूम होती है। इसलिये कि दिल ने अब ज्यादा काम किया तो कमज़ोर होने की वज़ह से उसे थकान भी लाज़िमी है, जिसको कमज़ोरी कहते हैं।

अब रहा, जो तुमने अपनी बुआ के बारे में अफसोस ज़ाहिर किया है, वह तकाजाय वर्शारयत है। सबसे छोटे बच्चे पर तर्स ज़रूर मालूम होता है, मगर ईश्वर ‘मालिक’ है, उसके सब काम मसलेहत्त् के ही होते हैं। इसकी दो ही सूरतें थीं। या मैं पहले जाता या वह। मेरे पहले जाने में यह मुमकिन था कि उनकी आहट या आवाज़ मेरे कानों तक न पहुँचती और उनका काम इतना अच्छा न बनता। जो बन जरुर जाता, इसलिये की ‘लाला’ जी ने एक मर्तबा मुझ से फ़रमाया है, जिसका यह मतलब है कि उसने खूब झाड़ फटकार तुम पर की और तकलीफ़ दी, जिसकी वज़ह से तुम्हारी सहनशीलता की आदत पड़ गई, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिये ज़रुरी है, इसलिये वह आज़ाद जायेगी। आज़ाद करना तो बुजुर्गों के बाँये हाथ का काम है, कर ही देते हैं और यह उन्होंने किया भी। ‘नाम मेरा और गाँव तेरा’।

केसर, बिट्टी को दुआ। माता जी को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र "
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-62
शाहजहाँपुर
9/10/1949
मैं पिछले पत्रों के जवाब दे चुका हूँ, जो इसी खत के साथ है। जो खत मास्टर साहब कल अपने-साथ लाये हैं, उसका जवाब दे रहा हूँ।

तुमने अपनी आत्मिक-दशा जो कुछ भी लिखी है, अच्छी है। हमारी कोशिश यही होनी चाहिये कि जिस तरह से हो सके ‘मालिक’ की याद करें। यद्यपि यह जरूर होता है कि एक वक्त वह भी ज़रूर आता है कि ‘मालिक’ की याद भूलने लगती है। मगर हमको इस पर नहीं रहना चाहिये। जब किसी तरह से याद न हो सके तो उसके रुप बदल-बदल कर याद करना चाहिये और जब किसी रुप में याद न हो सके तो Suppose कर ले कि हम उसकी याद में हैं। इसके बाद जब किसी को हालत शुरु होगी, तो आगे बतला दूँगा।

माता जी को प्रणाम तथा सब बच्चों को आशीर्वाद।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-66
शाहजहाँपुर
11/11/1949
अब तुम ईश्वर की कृपा से अच्छी होगी। मैंने एक दिन तुम्हारा काम देखा, कचहरी में था। तबियत खुश हुई। ख्वाह वह Automatic हो, ख्वाह वह खुद कर रही हो, तरीका ठीक था। यह हिन्दुस्तान की शुद्धता के बारे में था। अच्छा हो जाने पर अपना हाल लिखना। अब की बार पहुँचने पर ईश्वर को अगर मंजूर हुआ तो तुम्हारे अनुभव करने की शक्ति भी खोल दूँगा, और वह Point तुम्हें भी बतला दूँगा, जिसके खुलने से अनुभव शक्ति में वृद्धि होती है, मगर यह शक्ति बहुत कुछ उसके बाद practice पर भी, depend करती है, अर्थात अगर कोई Faculty खुल जावे और उससे काम न लिया जावे तो उसमें अधिक वृद्धि नहीं होती। तुम्हें जो ईश्वर ने पिण्ड-देश और ब्रह्माण्ड-देश की विलायत दी है, उसके माने ये हैं कि ‘पिण्ड-देश की विलायत के अर्थ mastery over individuality यानी पिण्ड पर निपुण होना और ब्रह्माण्ड-देश की विलायत के अर्थ यह है कि Mastery overcosmic power यानी ब्रह्माण्ड-देश पर निपुण होना’। किसी वक्त अगर कुछ मेरी समझ में आ गया और ऊपर से इशारा मिल गया तो फिर लिखूँगा। अलावा इसके मैंने यह भी किया है कि तुम्हारी हर Nerve को और जिस्म के हर हिस्से को spiritual force से भर दिया है। इसको हज़्म करने के लिये वर्षों चाहिये। ईश्वर की मर्ज़ी अगर शामिल हाल है, तो मैं कोशिश करूँगा कि साल-दो-साल में यह हज़म हो जाये। हालांकि यह वक्त बहुत थोड़ा है। मुझको चूंकि तुमसे काम लेना था, इसलिये मैंने ऐसा किया और तुमने मुझे मजबूर भी कर दिया था। एक नुस्खा इसके हज़्म करने का लिखता हूँ, जो इसमें मदद देगा। वह क्या है? मालिक की याद। वैसे तो भाई एक उमर गुज़र जाती है और यह चीज़ हज़्म नहीं हो पाती है और हज़्म न होने से कोई हानि भी नहीं हैं, मगर मुमकिन है, मेरी तबियत किसी वक्त और भरने को चली आवे तो गुंजाइश मिले। अच्छी तन्दुरुस्ती और लोगों को सिखाना भी हाज़में में मदद देता है। तुम्हारी बहनें और माता जी तो पूजा के लिये तुम्हारे पास बैठती ही होंगी और स्त्रियाँ अगर आ जावें तो बड़ा अच्छा है। तुम्हें जो सिखाने में अड़चन मालूम पड़े, मास्टर साहब से पूछ लेना। ईश्वर ने तुमको सब कुछ दिया है, यह माना, मगर जैसे ‘वह’ Unlimited है, वैसे ही अपनी तरक्की की भी Limit नहीं। मैं तो भाई, अपने लिये डंके की चोट पर कहने के लिये तैयार हूँ कि ‘मैंने यही जाना, कि कुछ नहीं जाना।’ और भाई, हमारे यहाँ हमारे गुरु महाराज के तो सिखाये हुओं का यह हाल है कि – ‘जिसको मिल गई गाँठ हल्दी की, उसने जाना कि हूँ मैं पंसारी’। यह आध्यात्मिक विद्या का समुन्द्र इतना लम्बा चौड़ा है कि इन्सान ज़िन्दगी में भी तैरे और ज़िन्दगी के बाद भी, मगर छोर कभी भी नहीं मिलता। मैं यह मुनासिब समझता हूँ कि शुक्रिया का प्रसाद तुम वहीं चढ़ा दो। इस खत की नकल केसर से करवा कर यहाँ भेज देना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-69
शाहजहाँपुर
16/11/1949
तुम्हारा पत्र मिला और केसर का भी खत मिला। मैं स्पष्ट रुप से उत्तर देना चाहता था, परन्तु इस समय रात का एक बज गया है, इसलिये थोड़ा और जरुरी ही लिख रहा हूँ। बेचैनी मुबारक हो। तुम जो कुछ काम कर रही हो, ठीक कर रही हो और इतना करो कि दिमाग न थके। तुम इलाहाबाद जाना चाहती हो। इसको चौबेजी की राय पर छोड़ दो। इलाहाबाद मेरे जाने का इरादा है और ईश्वर ने कृपा की तो पहुँच जाऊँगा, मगर मेरे वहाँ होने से सिवाय इसके कि तुम्हें यह ख्याल रहे कि मैं वहाँ पहुँच गया और कोई फ़ायदा समझाने बुझाने का नहीं हो सकता। इसलिये कि वहाँ मेरे सामने तुम सब का निकलना मुनासिब न होगा। क्योंकि और रिश्तेदार मौजूद होंगें - पर्दे का लिहाज ज़रुर रखना चाहिये। केसर ने जो हाल लिखा है, उससे यह मालूम होता है कि अब उन्हें शौक बढ़ रहा है। इससे पेश्तर चौबेजी ने भी कहा और मास्टर साहब ने भी, मगर मेरी राय इसके खिलाफ ही रही। मगर अभी और शौक बढ़ने का इन्तज़ार है। अभी वह इस सूरत में नहीं आई कि इसके शौक पर एतबार कर लिया जावे। और मुझे तो किसी की सेवा करने में कभी आर नहीं होना चाहिये। और न है। मुझे तो जिधर तुम सब लोग घुमा दो, घूम जाता हूँ। मैं अपना अगर हूँ तो अपने काबू की बात करूँ। भाई अब समय ज़्यादा हो गया है, खत बन्द करता हूँ फिर कभी लिखूंगा। इसी में केसर के खत का भी जवाब है।

तुम्हारा शुभचिंतक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-73
शाहजहाँपुर
5/12/1949
तुम्हारे दो पत्र मिले। एक इलाहाबाद जाने से पहले और एक कल तीसरी दिसम्बर को। इलाहाबाद में मेरी खूब तबियत लगी रही। तुम्हारी बहन शकुन्तला बेचारी मेरी वजह से इलाहाबाद आई। अपने दिल के दौरे की कुछ परवाह न की और वहाँ भी उसको कई दौरे हुए। मुझे यह देख कर बड़ा तरस आया और मुझे यह देख कर बड़ा दुख भी हुआ कि ऐसी लड़की की याद, बावजूद कितनी मर्तबा चौबे जी के कहने पर भी मुझे न आती थी। जाने से पहले बड़ी कोशिश से दो-चार दफे उसका ख्याल आया। एक रोज़ उसका दिल बहुत ज़्यादा धड़क रहा था और मुझे देख कर बड़ी तकलीफ़ हुई। बस, उसकी सिफारिशों पर ख्याल करते हुए और उसकी हालत पर तरस खाते हुए मैं उसकी आत्मिक उन्नति के लिये ख्याल करता रहा। ईश्वर ने मेरी सुन ली। उसके पिण्ड के मुकामात (चक्र) मय सैर के पूरे हो गये और उसका वास ब्रह्माण्ड-मण्डल में है। उसके कुल ज़िस्म में ईश्वरीय-प्रकाश छा गया और अनहद खुल गया अर्थात् हर रोम-रोम से अजपा जाप शुरु हो गया। चूंकि वह कमज़ोर थी और दिल की बीमारी, इस लिये इस काम को इस तरीके पर किया कि बात वही हो जाय, मगर दिल पर ज़ोर न पड़े। चलते वक्त उसने मुझसे फिर कह दिया कि मेरी याद रखना। मैंने उससे कह दिया कि अपनी बहन कस्तूरी को लिखो कि वह अब तुम्हारी याद रखे। इतना खत मैं लिख चुका था कि तुम्हारा एक पत्र आज और मिला।

याद से जहाँ तक हो सके गाफ़ील नहीं होना चाहिये। जितनी याद हल्की पड़ती जावे, उतना ही हल्का रूप, उसकी याद करने के लिये लेना चाहिये। और फिर आखिर में जो कुछ हो जावे, यह ‘मालिक’ की मर्ज़ी। तुमने यह जो लिखा कि - ‘कल शाम को तो मेरे अन्दर न मालूम क्या हो रहा था। ऐसा लगता है कि भीतर जैसे आँख सी खुल गई है’। इसका मतलब मेरी समझ में नहीं आया। आँखें खुलने से क्या जिस्म के अन्दरुनी organs मालूम होने लगे या प्रकाश, या कोई और बात महसूस हुई - लिखना।

अब पिछले खत का जवाब देता हूँ। ईश्वर की याद में पूजा कराने से दूसरे में जागृति बहुत पैदा होती है। इसलिये इन्सान सोते हुए अपने आप को जाग्रत हालत में महसूस करता है। मगर तुमने अपनी हालत तो लिखी ही नहीं कि तुम्हें नींद कैसी आती है। सोते हुए जागने का एहसास होता है या गहरी नींद में सोती हो। मैं तो भाई खूब गहरी नींद सोता हूँ, मगर फ़कीर के लिये गहरी नींद में सोना वर्जित है। मुझे शायद चौबीसो घंटे नींद न आवे, अगर ऊपर से सुलाने के लिये धार न बहे। यह तकलीफ़ मेरी वजह से मेरे गुरु महाराज को उठानी पड़ती है। न मालूम यह क्यों मेरे साथ रियायत है, यह ‘वह’ जानें।

पण्डित महादेव प्रसाद के यहाँ जब तुम गई थीं और वहाँ तुमको भारीपन महसूस हुआ। यह उनके ठोस विचार और ठोस पूजा का असर है। ठोस पूजायें जो आम तौर से हो रही हैं, इसका फल यह होता है कि आदमी जन्म-जन्मांतर के लिये ईश्वर प्राप्ति के लायक नहीं रहता। यह बात जिससे कहूँ, वह लड़ बैठे। ज़ब किसी को Liberation प्राप्त करना होगा, सिवाय इस तरीके, राजयोग जो हम सब कर रहे हैं, कोई हो ही नहीं सकता। यह स्वामी विवेकानन्द ने भी कहीं पर कहा है। सिवाय इस योग के कोई योग ही नहीं जो धुर तक पहुँचा सके। हठ योग सिर्फ़ आज्ञा चक्र तक पहुँचा सकता है। यह चक्र दोनों भौंहों के बीच में है। इसके आगे राजयोग की ही ताकत है।

तुम्हारे खत का जवाब कुछ अंग्रेजी में भी दिया है, जो स्वामी जी का Dictate है। अगर समझ में न आवे तो मास्टर साहब से समझ लेना, और किसी को बतलाने की जरुरत नहीं। किसी शख्स की जान की हिफ़ाज़त करने का तरीका यह है कि उसके चारों तरफ़ एक ख्याली circle अपनी will से यह ख्याल करते हुए बना लेवे कि यह चीज़ उसकी रक्षा करेगी और किसी-किसी वक्त ख्याल रखे। हर वक्त ख्याल रखने की जरुरत नहीं। यह वह कुण्डली (circle) है, जिसको लक्ष्मण जी ने सीता के चारों ओर बनाई थी, जब मारीच हिरण के रुप में जंगल में आया था और रामचन्द्र जी उसके शिकार को चल दिये थे और बाद में लक्ष्मण जी को भी जाना पड़ा। आज स्वामी सुखदेवा नन्द के मुमुक्ष आश्रम में जलसा है। यह ३-४ दिन रहेगा। उसके लिये Public ने पन्द्रह हजार रुपये चन्दा दिया है। महात्मा लोग Lectures देगें। सिर्फ दो घंटे के लिये एक साहब के कहने से मैं भी आज जा रहा हूँ। काम इतना करो कि दिमाग थक न जावे।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-77
शाहजहाँपुर
1/1/1950
तुम्हारा पत्र १५ दिसम्बर का लिखा हुआ मिला। बड़े दिन में मैं गाँव चला गया था और इससे पहले जवाब देने का समय नहीं मिला। इसलिये ज़वाब में देर हुई। तुमने जो यह लिखा है कि किसी वक्त तबियत उदास हो जाती है। मैं समझता हूँ कि कोई फ़िक्र पैदा नहीं होती होगी, बल्कि यह एक हालत है जो ईश्वर की कृपा से तुममें मौजूद है। इसके जरा तेज हो जाने पर तुमको उदासी feel होती है। इस हालत को उदासीनता की हालत कहते हैं। तबियत अभ्यासी की ऐसी बन जावे कि जो काम करे वह इस तरह का हो जैसे परवाना जाने के बाद दिल में फिर उसका ख्याल भी नहीं लाता अर्थात् परवाना कर आने के बाद फिर परवाने का ख्याल भी नहीं लाता। हर काम दुनियादारी का इसी तरह से होता रहे कि उसके करने के बाद ख्याल का weight उस पर कम रहे। इसको उदासीनता की हालत कहते हैं। इस जमाने में एक उदासी फिरका भी है। मगर उसका अब नाम ही नाम रह गया है। यह हालत उनमें से शायद ही किसी में हो। तुमने लिखा है कि -’एक मन सब काम कर रहा है यह एहसास ठीक है। जब गिलास में पानी भर कर ज़ोर से फेंका जाता है, तो उसका एक मुँह फेंकने वाले की तरफ़ हो जाता है और दूसरा मुँह दूसरी तरफ़, चीज़ एक ही है। जिसका मुँह मालिक की तरफ़ है वह ‘मालिक’ की याद करता है और जिसका मुंह दुनिया की तरफ़ है, उसको दुनियादारी की याद रहती है। मैंने यह बात बहुत संक्षेप में लिख दी, उसकी Philoshpy बयान नहीं की। मन में जब जागृति पैदा होती है, तब उसका रुझान ईश्वर की तरफ़ हो जाता है और जरुरत भर दुनियाँ की तरफ़ रहता है। सर्दी का एहसास कम होने के मतलब यह है कि रुझान ऊपर की तरफ़ बहुत तेज होने की वजह से इसका एहसास कम हो गया। मगर मुझे तो बहुत सर्दी लगती है और इस वजह से देर करके उठता हूँ और कुछ काम भी नहीं कर पाता।

एक बात से मुझको बड़ी तकलीफ़ होती है और मेरा कुछ बस नहीं चलता। वह यह है कि तुम्हारे पिताजी की जब आर्थिक तकलीफ़ की तरफ जब ध्यान जाता है, तो बहुत फ़िक्र पैदा हो जाती है। मैंने ईश्वर से प्रार्थना भी की मगर नहीं मालूम वह क्यों नहीं सुनते। या तो यह हो सकता है कि यह हमारे मतलब की बात नहीं है, या कोई और वजह हो। यह ज़रुर देखा गया है कि जब ईश्वर के मतलब की बात होती है, तो ख्याल आते ही ‘वह’ कर देते हैं। प्रार्थना की नौबत ही नहीं आती। इस तकलीफ़ को दूर करने की तुम ही दुआ करो। मुमकिन है ‘वह’ तुम्हारे ही कहने से कुछ कर देवे। मुझे तो, मैं सच कहता हूँ, कुछ शर्म सी मालूम होती है कि इतना छोटा सा काम मुझ से नहीं होता।

तुम्हारी माता जी को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-80
शाहजहाँपुर
12/1/1950
तुम्हारा खत २९.१२.४९ को लिखा हुआ आया। उसमें जो तुमने लिखा है कि ‘अपने शरीर का एहसास भी करीब-करीब खत्म हो गया है’। यह बड़ी अच्छी हालत है। इसको लय अवस्था कहते हैं। फ़ारसी में इसको फ़ना कहते हैं। अभी यह चल रही है, इसके बाद और अच्छी हालत आवेगी, ईश्वर ने चाहा। जब आवेगी। तो बता दूँगा। पहले से बताना नहीं चाहता। सोते वक्त और लोगों को चाहिये कि एकदम से न जगायें। एकदम से जगाने से ख्याल जो लगा हुआ है, एकदम से हटता है, इसलिये उसको shock होता है और तकलीफ़ भी हो जाती है। किसी अभ्यासी को एकदम से नहीं जगाना चाहिये। मेरा तो यह हाल है कि जगने की हालत में अगर कोई चारपाई हिला दे, तो मुझे तकलीफ़ हो जाती हैं।

तुम्हारा एक खत ८.१.५० का लिखा हुआ आया। उसमें यह लिखा हुआ है कि ‘एक दिन जब Working कर रही थी तो India में ॐ शब्द सा दिखलाई दिया’। यह एहसास बिलकुल ठीक है। यह ऐसा समय है कि मुद्दतों ऐसे वक्त का आना दुर्लभ है। ईश्वर की शक्ति अपने खालिस रुप में किसी बड़ी Personality के द्वारा उतरी हुई है। इसका सबूत यह है कि किसी जगह पर बैठकर देखें और यह ख्याल करें कि मैं उस Personality से आध्यात्मिक लाभ उठा रहा हूँ, जिसमें खालिस रुप में ईश्वर की शक्ति उतरी हुई है, तो उसको फ़ौरन फ़ायदा पहुँचेगा। इस ॐ की शक्ति के साथ मुमकिन है, इससे पहले कोई महात्मा न आया हो। हाँ, मेरे गुरु महाराज इसमें Exception है, इसलिये कि उनमें ऐसी शक्ति पैदा करने की ताकत है, फिर ऐसे गुरु की ताकत का क्या ठिकाना। यह शक्ति जब उतरेगी तो संहार भी होगा और उससे चिपटे हुओं को फ़ायदा भी Unlimited होगा। महाभारत में इस शक्ति का ज़हूर इतने पूर्ण रुप में न था। था ज़रुर, इस तरीके पर कि ‘उसको’ Destruction और Construction का पूरा अख्तयार था और उस वक्त उस शक्ति में से फुहार निकाल कर काम कर रही थी। इस वजह से संग्राम पूरी शक्ति से नहीं हो रहा था। उस वक्त इतनी ही ज़रुरत थी और इस वक्त उससे ज्यादा जरुरत है मामला World Destruction का पेश है। वक्त कितना ही लग जाये। मगर साथ- साथ में Construction भी है। महा प्रलय के वक्त भी कोई शक्ति कुल Universe के खत्म करने के लिये काम करेगी। उस वक्त Construction work खत्म हो जायेगा। तुलसीदास ने जो यह लिखा है कि एक दिन सब को मरना है, इसलिए पढ़ना बेकार है। उनसे यह कहना चाहिये कि जितने दिन सबको जीना है, उतने वक्त के लिये पढ़ना ज़रुरी है। इस ख्याल को उनके तुम्हीं साफ कर दो। जैसा ख्याल बाँधोगी, वैसा ही दूसरे में असर होगा।

एक बात तुम्हें और बतलाता हूँ - भगवान् कृष्ण का अवतार महामाया के स्थान से था और यह बात हमारे गुरु महाराज ने कहीं पर कही है। यह स्थान वह है, जहाँ पर माया एक घुमाव की शक्ल में बहुत ज़ोरदार होती है। उसमें वह ताकत होती है, कि चाहे सो कर गुज़रे, इसलिये श्री कृष्ण जी महाराज में इन्तहा ताकत थी। इस ताकत की बराबरी कोई नहीं कर सकता, इसलिये कि बिल्कुल परिपक्व हालत से श्री कृष्ण जी का अवतार हुआ था। इससे ऊँचा एक रुहानी मुकाम है और वह भक्तों को नसीब होता है और वहाँ पर गिने चुने लोग पहुँचते हैं। मगर उसकी complete हालत हज़ारों वर्ष बाद किसी एक को नसीब होती है। श्री कृष्ण जी को महामाया के स्थान पर पूरा कमाल हासिल था और उनका कदम इस रुहानी स्थान पर था, जिसका मैंने ज़िक्र किया था। अब शक्ल इसके खिलाफ़ है। वह बड़ी हस्ती है, जिससे कि ईश्वर काम ले रहा है। उसको ‘उस’ हालत पर ईश्वर ने कमाल दिया है। श्री कृष्ण जी महाराज को समयानुसार महामाया के स्थान पर कमाल हासिल था और अब मौजूदा हस्ती को उस पर कमाल हासिल है।

गाँधी जी की मृत्यु के बाद अरविन्द घोष से पूछा गया था कि गाँधी जी तो चल बसे, अब कहीं हिन्दुस्तान में Light मौजूद है? उन्होंने जवाब दिया था ‘There is still light in Northern India’. इससे ज़ाहिर होता है कि कोई Personality ज़रुर काम कर रही है। अरविन्द घोष एक अच्छे महात्मा कहे जाते हैं और कुल जग उनको मानता है। उनकी पहुँच ब्रह्माण्ड मण्डल तक थी और उनका कदम इस वक्त तक इससे आगे जा भी नहीं रहा था। मगर चूँकि मेहनत अच्छी की थी, इसलिये उनमें बिजली ज्यादा है। अगर कहीं हमारे यहाँ लोग मेहनत कर जायें, अर्थात् अपने आप ऊपर बढ़े, मुझ से मेहनत कम लें, तो मैं समझता हूँ, हमारी संस्था में बहुत से अरविन्द घोष थोड़े ही दिनों में नज़र आने लगें। अपने आप रगड़ करने से ताकत अपने वश में रहती है। यह स्थान बहुत ऊँचा है। श्री कृष्ण भगवान ने अर्जुन को अपना विराट रुप इसी जगह से दिखलाया था। मगर हमारे यहाँ इन मुकामत की कदर ही नहीं रही और यह बहुत सस्ती चीज़ हो गई। इस बड़ी नियामत (Blessing) की बेकदरी की जिम्मेदारी हमारे ऊपर है कि एक तो हमारी जल्दी की आदत है, दूसरे यह ख्याल कि जल्दी से जल्दी लोग आगे बढ़े। तीसरे यह कि वह ज्यादा मेहनत और Sacrifice नहीं करते हैं। मैं चाहता हूँ कि अपनी ज़िन्दगी में कुछ थोड़ा बहुत जहाँ तक हो सके बढ़ा जाऊँ कम से कम लोग इतने तो अवश्य हो जावें कि इस दुनिया में उनकी पैदाइश रुक जावे और अगर यह भी न हो सके तो आगामी जन्म में तो तरक्की कर सकें। एक चीज़ मुझे ज़रुर प्रिय है और उसका इन्तज़ार करता हूँ कि जब ईश्वर पर Faith अच्छा हो जाता है, तो मेरी तबियत उसकी तरक्की के लिये जल्दी रुजू होती है, और नहीं मालूम मैं किस चीज़ के इन्तज़ार में रहता हूँ - यह मुझे अब भी पता नहीं है। यह बात अगर पैदा हो जाती है, तब तो भाई, जब मुझे कोई रोकता है, तब रुक पाता हूँ। तुम्हीं लिखना अगर तुम्हें मालूम हो, ताकि मुझे भी मालूम हो जाये। मुझे एक मीनियाँ यह भी रहता है कि कोई शख्स ऐसा मिल जाये कि मैं अपनी हालत से जो कुछ भी मुझे मेरे गुरु की कृपा से मिली है, उससे मैं उसे Sitting दे देता। चाहता मैं अब भी हूँ, और कोई इस हद तक आ गया तो मैं चूक नहीं सकता, मगर अब इसकी ख्वाहिश जाती रही, इसलिये कि मुझे एक मौका ज़रुर मिल गया। किस वक्त? जब कि प्रकाश की माँ परलोक सिधारने की तैयारी कर रही थीं। वह भी सिर्फ पाँच या छ: सेकण्ड का। मैंने उनको ईश्वरी Region से Sitting दी थी। इससे ऊपर के हिस्से में तवज्जह देने का ख्याल ही न आया। मृत्यु के बाद ख्याल आया, तो एक बार, पर उसके लिये आज्ञा ही नहीं मिली। न मालूम क्यों मेरी तबियत चाही, जो मैंने यह सब तुमको लिख दिया। हालांकि तुम्हारे खत के जवाब से इसका कोई ताल्लुक नहीं।

Swami Viveka Nandji Maharaj - Dictate - १४.०१.५०

You are totally correct in writing that Lord krishna was bestowed with the Power of destruction, but he was not given the construction power. Atmosphere had grown poisonous during the days of Mahabharata. The responsibility of this was on the kauravs and other people. They were the main Cause, so they were annihilated. More over the power they had gained was mis-utilized and that ought to be finished. Lord Krishna did all that and finished the Power. Intensity of the force of Lord Krishna was Located to the point of India. There was no necessity of going abroad or swimming above it. Now there is the different question.

A thorough overhauling of the bones. You will not find so many people in the world, as you see today. Intensity of force was for India alone and that was the power required at that time. What else do you want to clarify? As to me jumping in toto at the spiritual point is far above than the power of Lord Krishna bestowed at that time. It is far above but it does not mean that the Power Lord Krishna had in body and mind, you have got it. He had force of arms and body.

Lord Krishna will give dictation -

ज़माने की खूबी ने वह चीज़ झलका दी, जो मुझमें मौजूद थी और उस चीज़ को दबा दिया, जिसकी अब ज़रुरत है। मैं उसी चीज़ के मातहत हूँ, जिसका नतीजा मेरा अवतार है।

Can anybody call Lord Krishna, as you call? Is there any one who has such powers? who can call greater Personalities including Lord Krishna? The reply is pregnant in the Short sentences of Lord Krishna given above. Do you want any Thing more for kasturi you have correctly written in your book that the atmosphere at the present is not so poisonous as during the days of mahabharata. There the person residing in India having great powers made the atmosphere above then coarse and bad. Here all the people of the world are contributing some thing black to there Surroundings and they are not so powerful as were here during those day.

अवतार की कल उतनी ही उमेठी जाती है, जितनी ज़रुरत होती है। उससे आगे वह काम नहीं कर सकता। Power कितनी ही हो, इससे मतलब नहीं, मगर काम का दायरा वही रहेगा।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-83
शाहजहाँपुर
1/2/1950
मैं लखीमपुर से चलकर यहाँ कुशल पूर्वक आ गया। ईश्वर की अपार दया है कि ‘उसने’ तुमको पार-ब्रह्म मण्डल की सैर पूरी तौर से करवा कर अब उससे आगे बढ़ा दिया। यह सिर्फ ईश्वर की ही कृपा है और ‘उसी’ का काम ! मेरी एक आदत है कि मैं जिस मुकाम या मण्डल से आगे बढ़ाता जाता हूँ, वह कह देता हूँ। इस कहने से किसी को ईश्वर न करे अहंकार हो जाये। और तुममें तो ईश्वर की कृपा से यह बात कभी पैदा न होगी। तुम अपनी हालत पर गौर करती रहा करो और इसलिये मैं बताता चलता हूँ। इससे तुम्हें एक से दूसरे का फ़र्क मालूम होगा और आगे चलकर यह फ़र्क बहुत मुश्किल से समझ में आयेगा। मेरी तबियत आज ही से यह चाह रही है कि मैं इस मण्डल की भी सैर शुरु करा दूँ। इसलिये कि वह पाँच Circles मेरी निगाह के सामने हैं और ग्यारह उसके बाद। मैं चाहता हूँ कि अपनी ज़िन्दगी में ही ऊँची से ऊँची तरक्की दूसरों की अपनी आँखों से देख लूँ। यह सही है कि ईश्वर की कृपा से इन सोलहों Circles का पार करा देना बहुत ज्यादा वक्त का काम नहीं है। अगर ‘वह’ कृपा करे तो एक सेकण्ड भी काफ़ी हो सकता है और इसका तजुर्बा भी है और इसी से हिम्मत भी होती है। प्रकाश की माता जी ने इन सोलहों Circles को पार करके दम तोड़ी थी। उस समय यह ग्यारह Circles निगाह में न थे, मगर खालिस हालत पर पहुँचाने के लिये इन सब को ईश्वर ने पार करा ही दिया। उसे कोटिशः धन्यवाद है।

मेरी हालत बिटिया! लोगों को मालूम नहीं और मुमकिन है कि आगे भी न मालूम हो पावे। गुण में कुछ नहीं रहा – रुहानियत या आध्यात्मिकता भी अगर सही पूछती हो तो अब नहीं हैं यह चीज़ भी बहुत भारी है। अब तुम्हीं बताओ किस बात पर मैं गर्व करूँ? जिसके पास कुछ हो, उसे गर्व भी हो।

Dictate by Swami Viveka Nand ji:-

A very beautiful sentence, who will understand it? This is absolute base.

बिटिया ! आज मैंने अपनी सारी हालत तुमको लिख दी। अगर लोगों को यह मालूम हो जाये, तो मेरे पास कोई फटके भी नहीं। आध्यात्मिक विद्या की तलाश में फिर वह भला ऐसे शख्स के पास जावे जिसमें यह न हो। Dictate by Swami Viveka Nand ji:-
This is too philosophical to tell you the truth, even Vedic Rishis.
That is too much. No body can have Conception of it. Here we are Powerless.
मुमकिन है लोग मेरे पास इसी वजह से न आते हों।
Dictate by Swami Viveka Nand ji:-
‘See this time. Leaving valuable aside and Searching for stones. See the mentality of the general folk. When egoism dies out, this is the result.’
मैंने तुम्हें वैसे ही लिखा दिया। तुम अपने काम में लगी रहो। ईश्वर सब कुछ कर सकता है और सब ‘उसके’ हाथ में है।

इस खत की नकल मास्टर साहब को करके देना, ताकि फाइल में लगी रहे। मैंने इस खत की नकल नहीं रखी, इसलिये वहाँ इसकी ज़रुरत है।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-87
शाहजहाँपुर
3/2/1950
पत्र तुम्हारा मिला। यह बड़ी अच्छी बात है कि तुम्हारे ध्यान में सिर्फ ‘मालिक’ ही है। अभ्यासी को सिर्फ ‘मालिक’ से ही गरज होना चाहिए। इसी से सब कुछ हो जाता है। मेरी कुछ आदत ऐसी हो गई है कि हर शख्स की तरक्की मैं बताता चलता हूँ। ऐसा शायद किसी सिखाने वाले ने नहीं किया। कहीं-कहीं पर Hint हमारे गुरु महाराज दे जाते थे। अब यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं यह गलती कर रहा हूँ या ठीक है। मैं चीज़ ही क्या हूँ? बड़े-बड़े उच्च महात्माओं ने यह नहीं किया है। मेरे सोचने से यह समझ में आता नहीं। अब मैं यह बात किसी से पूछूँगा, चौबे जी से भी और मास्टर साहब से भी। देखो उनकी राय क्या पड़ती है, और तुम्हारे समझ में अगर आ जाये, तो तुम भी लिखना, ताकि मैं सही बात करने लगूं।

पाँच circles या ग्यारह circles या इसके बाद भी और जो कुछ भी है या जो कुछ भी मेरी समझ में आता जाता है, मैं दूसरों को ज़बानी या तहरीरी (लिखित रुप में) बताता जाता हूँ, ताकि मेरे बाद दूसरे लोगों को इससे आगे मालूम करने का मौका मिले और मुझे जो मालूम हो जाये वह अपने सीने में छिपाकर तो न जाऊँ और भाई, एक बात यह भी है कि लोग जितना सीखते जाते हैं, उसको कहीं काफ़ी न समझ बैठे। अभी तक तो भाई, जहाँ तक मेरी निगाह पहुँचती है, यही हुआ है कि जरा सी हालत कहीं पैदा हो गई और कुछ शान्ति निखर आई, वह अपने आप को पूर्ण समझने लगे और बिल्कुल ऐसा ही हुआ है- ‘जिसको मिल गई गाँठ हल्दी की, वह यह समझा कि हूँ मैं पंसारी’। मेरा तजुरबा यह है इस वक्त कि मैंने यही जाना कि कुछ नहीं जाना। और मुझको उसका पूर्ण छोर न मिला। पूर्ण होना किसको कहते हैं? कुछ बातें मैं मास्टर साहब के खत में लिख रहा हूँ, वह अपने जानने के लिये उनसे पढ़वा कर सुन लेना। इसलिये कि तुम भी ट्रेनिंग का काम कर रही हो और करोगी।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-88
शाहजहाँपुर
5/2/1950
पत्र तुम्हारा मिला, जो २७ फरवरी का लिखा हुआ था। उदासीनता की हालत रहना अच्छा है। हर काम करने से पहले और छोड़ने के बाद ख्याल न रहने के माने यह है कि आगामी संस्कार बनना बन्द हो चुके हैं। तुमने लिखा है कि उदासी की हालत में फैलाव मालूम होता है, यह तुम्हारा Self Expansion है, जो तुम्हारी दृष्टि से महसूस होता है। यह हालत अभी और बढ़ेगी। अभी लय अवस्था पूर्ण रुप में पैदा नहीं हुई है। इसके पैदा होने का इन्तज़ार है - उसके Symptoms मैं पहले से बताना नहीं चाहता, इसलिये कि तुम उसका, हालत पैदा होने से पहले ख्याल न बाँध दो। यह हालत जब well developed हो जाती है, और लय अवस्था अपने पूर्ण रुप में आकर अपनी अवस्था को भी उसमें लय कर देती है, उस वक्त भोग की शक्ल बदल जाती है। इसमें देर नहीं मालूम हो रही है। ईश्वर जल्द देगा। उसका नतीजा भी तुम्हें बता दूँ, मगर उससे अफसोस नहीं होना चाहिये। जो बात मैं कहना चाहता हूँ, वह तुम्हारे लिये है। इसलिये कि जिस तर्ज और तरीके से तुम इस हालत पर आ रही हो, उसका नतीजा यह होता दिखाई देता है कि पिछले संस्कार खत्म होने के लिये ‘मुझे’ भी भोगना पड़ेगा, अर्थात् कुछ तुम भोगोगी, कुछ मैं। अब यह डर है कि मैं अपने संस्कार भी भोगूं और तुम्हारे भी भोगूं, गोया Double Working हो गया, ऐसा नहीं है। मेरे संस्कार, मेरी एवज़ में, मेरे गुरु महराज ने भोगे हैं। भक्ति के लिहाज़ से इसका शुक्रिया कहाँ तक अदा किया जावे । मगर Law of Nature के लिहाज़ से ‘वह’ ऐसा करने से मजबूर थे। इसी तरह मैं भी मजबूर हूँगा। अब अपनी कैफ़ियत सुनो कि जब तुम अपने संस्कार से खाली हो गई तो, जिन्दगी कायम रखने के लिये दूसरों के संस्कार तुमको भोगने पड़ेगें। जब तक कि कोई खास Personality अपनी ऐसी हालत पैदा नहीं कर लेती कि उसके सिखाने वाले को भोगना न पड़े। सिखाने वाला बिना ताल्लुक लोगों के संस्कार भोगता है। इस जमाने में गुरु बनना बहुत आसान है जहाँ किसी के कीर्तन की लय अच्छी मालूम हुई, दूसरे ने उसको गुरु कर लिया और वह भी खुश हो गये कि – वाह ! चेला मिल गया। किसी ने अपनी इज्ज़त बढ़ाने के लिये, ईश्वर का ज्ञान सिखाने के बहाने चेला बनाना शुरु कर दिया और किसी ने अपना गोल बढ़ाने के लिये ईश्वर के नाम पर भीख माँगना शुरु कर दिया। क्या रफ्तार ज़माने की हो रही है। गुरुआई इतनी मुश्किल चीज़ है, कि ईश्वर ही जानता है। और भाई, मैं इसलिये गुरु नहीं बन सकता कि उस मुसीबत को कौन भोगेगा, जबकि बिरादराना तौर पर तालीम देने में इन दिक्कतों का सामना हो रहा है। मेरा ख्याल यह है कि गुरु बन कर अगर चेला को भवसागर पार न उतार सका तो कम से कम उसकी तरक्की का रास्ता न खोल दिया, तो ऐसे गुरु के लिये इतनी बड़ी सजा मिलती है कि मुमकिन है कि वह एक हज़ार जन्म तक कम से कम अन्धेरे में पड़ा रहे। यह बात स्वामियों को सुनाने वाली है, जो ईश्वर के जीवों को इतना धोखा दे रहे हैं। जिसका नतीजा यह हो रहा है कि वह (यानी चेले) सैकड़ों वर्ष ईश्वर की बादशाहत के किनारे नहीं पहुँचते। मैं सबसे ज्यादा दोष उन गुरुओं को देता हूँ, जिन्होंने चेलों का परलोक बिगाड़ दिया।

मैं इस इबारत का मतलब नहीं समझ सका कि – ‘अपनेपन का एहसास अब शायद ‘मालिक’ के प्रति भी खत्म सा है’। इसको अगले पत्र में Explain कर देना। तुमने जो यह लिखा है कि – ‘वह मेरी याद में मस्त रहता है’। इसके बारे में कबीर साहब ने लिखा है कि – ‘मेरा राम मुझे भजे जब, तब पाऊँ विश्राम’। तुम्हें मालूम है कि जाति-पाति किसकी नहीं होती? - सन्यासी की। वह वर्ण-व्यवस्था से परे हो जाते हैं और यह एक हालत है, जिसको वैराग्य का Essence कहना चाहिये यह चीज़ जब परिपक्व हो जावे, तब सन्यास लेने का इन्सान अधिकारी होता हैं। मगर आजकल बिना मेहनत किये हुए आसानी से सन्यासी हो जाते हैं। कहो - इस ज़माने में सन्यास कितना आसान हो गया है। यह क्यों? बाबा जी को अपने चेलों की तादाद बढ़ानी थी।

तुमने जो मास्टर साहब और चौबे जी की सिफारिश की है, तो हमें खेद है कि तुमने हमारी सिफ़ारिश क्यों नहीं की। तुम कहोगी कि आपकी सिफ़ारिश मैं किस से करती। इसका जवाब यह है कि जिससे तुमने इन दोनों की सिफ़ारिश की। कितनी अचम्भे की बात है कि जिस शख्स में रुहानियत न रही हो, उसकी उन्नति की सिफारिश न की जावे और जिनमें रुहानियत हो, उनकी सिफारिश की जावे। पण्डित रामेश्वर प्रसाद का यह कहना है कि जिनकी तुम सिफारिश करती हो, उसके लिये तुम खुद क्यों नहीं करती। तुमने जो अपनी हालत पिछले पत्र में लिखी थी, वह बहुत अच्छी थी। पण्डित जी उसके लिये तुम्हें बधाई देते हैं। तुमने यह जो शिकायत की है कि – ‘मैं उसकी याद, जितनी चाहिये, उतनी नहीं कर पाती’। मुझे भी यह शिकायत हमेशा रही है। जब मुझे अपनी शिकायत दूर करने का कोई नुस्खा न मिला तो तुम्हें क्या बताऊँ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-93
शाहजहाँपुर
27/2/1950
तुम्हारा खत आया था, कई हफ्ते हुए, हाल मालूम हुआ। मैंने जो जुमले जवाब देने लायक थे, उनमें सुर्ख निशान भी बनाये थे और वह खत मैंने कहीं रख दिया है, अब मिलता नहीं है। इसका मुझे अफसोस है और यहाँ communal disturbance कि वजह से कोई लिखने वाला भी नहीं मिला जवाब में देर होती रही और बहुत दिन गुज़रने की वजह से मुझे याद भी नहीं रहा कि क्या लिखा था। अभी अजीजम नारायण ने तुम्हारे दो पत्र और दिये। उनको पढ़कर तुम्हारी हालत का अन्दाजा लगा लिया। हालत तो ईश्वर की कृपा से अच्छी है। मगर बिटिया, सच अगर पूछती हो तो अभी उर्द में सफ़ेदी आई है, इसका कहीं ओर-छोर नहीं। मैं समझता हूँ कि जब से दुनिया पैदा हुई, उस वक्त से अगर कोई शख्स ब्रह्म - विद्या में बढ़ता चले और दुनिया खत्म होने से कुछ पहले तक उसका छोर नहीं मिलेगा। मुझे ताज्जुब है कि लोग अपने आपको पूर्ण समझ बैठते हैं। उर्द की सफेदी से मेरा मतलब यह है कि अब उसकी अपार दया से असलियत का छींटा लगा है और यही छींटा develop करेगा। यह हालत उदासीनता के कमाल की है। उदासीनता के कमाल पर जो कैफ़ियत शुरु होती है, वह अब है। इसके इन्तहा के पहुँचने का इन्तज़ार है। वह भी ईश्वर ने चाहा, तो जल्दी पैदा होगी। पूजा करना तुम्हारे लिये लाज़मी नहीं, चाहो करो, चाहो न करो। मैं तो यही चाहता हूँ कि मेरी जिन्दगी में मेरे सामने कुछ लोग बन जाते (मगर ज्यादा तादाद इस तरफ़ हिम्मत नहीं करती) तो इस बहार को मैं स्वयं देख लेता। मगर यह सब ईश्वर के हाथ में है। जो ‘वह’ चाहेगा, वही होगा। अपना इसमें बस नहीं है। मैं चाहता हूँ कि अपनी जिन्दगी में जितनी तरक्की मैं दे सकता हूँ, दे जाऊँ मगर मैंने तुमको इसका मोहताज नहीं रखा। हालांकि जो मेरी जगह पर हो (कौन होगा, कहा नहीं जा सकता) उसकी इज़्ज़त सब पर वाजिब होगी। तुम्हारी मोहताज़ी यों खत्म है कि मैं होऊँ या न होऊँ तुम्हारी Stages directly तय होती रहेगी, क्योंकि मैंने अपना पीछा छुड़ाकर ईश्वर से बराह रास्त तुम्हारा सम्बन्ध कर दिया है। तुम्हारे काम में उसको मंजूर है तो कोई रुकावट नहीं। हमारे पूज्य चौबेजी को गायबाना तवज़्ज़ोह दिया करो, मगर खास तौर पर उनकी सफाई का लिहाज़ रखो। वह जरा सी देर में अपने आप को खराब कर लेते हैं और मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ती है।

तुमने जो लिखा है कि हर समय एक ईश्वरीय धारा बहती रहती है। यह बिल्कुल ठीक है और यह इस बात का सबूत है कि तुम्हारा Direct सम्बन्ध ईश्वर से हो गया है।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-98
शाहजहाँपुर
1/5/1950
पत्र मिला, पढ़ कर खुशी हुई और यह अचम्भा भी हुआ कि तुम्हें यह बेकार का ख्याल (Baseless) कैसे हुआ, कि मैं तुमसे नाराज़ हूँ। इस ख्याल को कभी मत बाँधो। इसमें हानि है। मैं अपनी सुनाता हूँ। यदि मैं ख्याल बाँधू कि गुरु महाराज मुझसे नाराज़ हैं, तो हमारे लाला जी की आँखें हमारे ऊपर फौरन बदल जायेंगी। जिस degree तक मैं उनकी नाराज़गी का ख्याल बाँधूगा, उतनी degree तक ‘वह’ मुझ से नाराज हो जावेंगें। अगर मान लो कि मुझसे कोई गलती हो जावे और मैं उस गलती को दिल से महसूस करूँ तो तुरन्त लालाजी उसकी सज़ा देने को तैयार हो जावें (और गलती हर एक से हो ही सकती है) ईश्वर कृपा करें। इसीलिये अगर मैं कहीं पर गलती कर भी जाऊँ, तो भी यह ख्याल नहीं होता कि मैं गलती कर रहा हूँ। जब कोई हालत पैदा होती हैं तो पहले उसका वहम् होता है, इसके बाद वह असली सूरत में दरसने लगती है। इस वहम् में यदि कोई सुनी सुनाई बात उस दशा में पड़ जाती है, तो उसका भी असली रूप मालूम होने लगता है। या पड़ी हुई बात यदि कहीं सामने आ जाती है, तो वह भी अपनी ही हालत मालूम होती है। मैंने मास्टर साहब को यह लिखा था कि इस हालत में जो तुमने लिखा है, कुछ वहम् भी शामिल है, अर्थात् इसमें असलियत तो है, मगर कुछ वहम् का असर भी है। इसमें तुमको ग्लानि नहीं होनी चाहिये। यह तो होता ही रहता है।

तुम रुकी हुई नहीं हो, चल रही हो। वहाँ पर जो ठहराव है, उसको रुका होना समझ लिया है। यह ज़रुर होता रहता है कि चाल कहीं पर मध्यम होती रहती है और कहीं पर तेज। तुम्हारी चाल मध्यम ज़रुर पड़ गई है। जब अभ्यासी एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना चाहता है, उस वक्त यह मध्यमपना ज़रुर पड़ जाता है। इसके यह माने नहीं समझ लेना चाहिये कि मैं रुक गया। और यह भी होता है कि जब किसी चक्र या मुकाम पर सूरत फैलती है, तो भी मध्यमपन महसूस होने लगता है। इसका पहिचानना जरा मुश्किल है। तुम्हारे बारे में मैंने कह दिया है कि तुम्हारा सम्बन्ध ईश्वर से Direct हो गया है। तुम्हारी तरक्की नहीं रुकी है। कोई तुम्हें बढ़ाये या न बढ़ाये, ईश्वर तुम्हें खुद आध्यात्मिक उन्नति देता रहेगा। और पूजा-पाठ तो अब तुमसे होने से रही। ‘मालिक’ को ‘मालिक’ समझना और ‘उसके’ हुक्म को Carry Out करना, यही तुम्हारे लिये पूजा है। Working तुम अच्छा कर रही हो, किये जाओ। तुम्हारी दशा, जो वर्तमान है, वह उससे कहीं तेज़ Working कर रही हो, जो उससे पहले थी। पूजा तो मैं भी नहीं करता हूँ और दूसरों को बताता हूँ। लोग जो सुने, वह यह कहेंगे कि दूसरों को तो उपदेश देते हैं और अपने को फ़ज़ीहत। भाई, सच तो यह है कि पूजा होती ही नहीं। इस हालत पर मैं कह सकता हूँ कि - ‘बिना भक्ति तारो, तब तारिबो तुम्हारो है’। और लोग तो शुरु से ही यह पढ़ कर कहने लगते हैं। मगर ऐसे लोगों की बातें या पद ईश्वर सुनता भी नहीं है। मैं समझता हूँ, मास्टर साहब के एहसास ने ‘उनको’ धोखा दिया। उनके एहसास ने उनको धोखा नहीं दिया, बल्कि जिसको उन्होंने काले धुएँ की तरह मैल समझा है, वह असलियत का रंग है, और ईश्वर से किसी हद तक सम्बन्ध हो जाने की दलील है। मास्टर साहब का एहसास ज़रुर काबिले तारीफ़ है और मैं इस बारीकबीनी पर खुश हुआ। मगर बेचारों को यह खबर न थी कि यह चीज़ क्या है। किसी वक्त ईश्वर को मंजूर है, मैं अनुभव करा के उनको असल कालिख और इस किस्म की तमीज़ करा दूँगा। यही रंग आखिर तक चला जाता है। मगर उसमें भी अनगिनत हालतें हैं। यह चीज़ बहुत अच्छी है और यह भी एक Direct सम्बन्ध होने की वज़ह है। मेरी जब यह दशा पैदा हुई थी तो मैंने अपने गुरु महाराज को इतिला दी थी, और ‘वह’ अवश्य बहुत खुश हुए होंगे।

‘Live long my daughter. Be complete in the run of your life; the condition is hard by under standable. It is He (Ram Chandra) who has tasted the nectar of real life and He is imparting you all. Be gracious on the tumbling block who are rolling on the dirty street.’...says Swami Vivekanand Ji

यह तो बड़ी अच्छी हालत है। इससे चित्त में ग्लानि पैदा नहीं होनी चाहिये। ईश्वर मुबारक करे और आगे और बढ़ाता ज़ाये। ...These are the words from Lalaji.

अंग्रेज़ी के इबारत के मतलब यदि समझ में न आवे तो मास्टर साहब से समझ लेना। चौबे जी भी इसको समझा देंगे। मैंने विमला के खत का जवाब लिख दिया है। एक बात मैं यह चाहता हूँ कि तुम अपनी जीवनी थोड़ी-थोड़ी लिखती चलो। तुम्हारे माता और पिता तुम्हारे बचपन की बहुत सी बातें बता देगें और जब से अभ्यास शुरु किया है और खत तुमने मुझे भेजे हैं और मैंने उनका उत्तर दिया है, वह सब उसमें आ जाना चाहिये। तुम्हारे खत सब मेरे पास मौजूद हैं जब लिखो, तब मंगा लेना। मेरे खतों के जवाब तुम्हारे पास मौजूद होगें।

शकुन्तला बेचारी दिल के मर्ज में मुब्तला है, ज्यादा अभ्यास नहीं कर सकती। मुझे उस पर बड़ा तरस आता है। तुम्हारे ताऊ जी और माता जी ने उसकी बहुत सिफारिश की है। और उसने तुम्हें भी लिखा है कि उसकी याद मुझे दिला दिया करो। मुझे याद आई या न आई, यह और सवाल है। यदि तुम्हारी राय हो और माता जी हुक्म दें और ताऊ जी भी यह बात चाहें, तो उसको Higher Region में पहुँचा दिया जावे, मगर उसका पिण्ड-देश और ब्रह्माण्ड-देश खुद साफ़ करो। मगर इसके दिल पर अपनी Will का झटका न देना और इसको जल्दी से जल्दी साफ़ करो। मगर यह ज़रूर है कि शकुन्तला को Higher Region में जल्द पहुँचा देने से कुछ मजा नहीं आवेगा और वह शिकायत करेगी कि मैंने कुछ तरक्की नहीं की। अब यह तुम सब मिलकर सोच लो। जैसी तुम्हारी सबकी राय हो, वैसा लिखना। पत्रों के जवाब, मैं इसलिये नहीं दे पाता कि जब से नारायण गये हैं, कोई लिखने वाला किस्मत से मिलता है। तुम्हारे हरि भाई साहब को अपने ही से फुर्सत नहीं। तुम्हीं उनको साफ़ करो कि आगे चल निकलें। अब तुम अपना हाल लिखना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-103
शाहजहाँपुर
25/6/1950
तुम्हारे कई खत आये। जवाब इसलिये नहीं दे पाता हूँ कि कोई लिखने वाला नहीं मिलता तुम्हारी बीमारी सुनकर कुछ फिक्र ज़रूर हो जाती है, मगर इसमें अपना वश नहीं। ईश्वर की यह तारीफ़ है कि ‘जो है, सो है’। हमें भी उसी दशा की ओर जाना चाहिये, जो उसकी तारीफ है। अब जितना जा सके, यह उसकी देन है। हमारी अवस्था साम्य होनी चाहिये। तराजू के दोनों पलड़े बराबर रहने चाहिये। जब तौलने का समय आ जाये तो, नीचे-ऊँचे थोड़ी देर के लिये हो जाये, तथा फिर बराबर आ जावे। दया और रहम वहीं पर होना चाहिये, जहाँ पर इसकी ज़रूरत है। मैं राजा हरिश्चन्द्र से माफ़कत नहीं करता कि सब कुछ देकर भंगी के हाथ में अपने आप को बेच डाला। यह धर्म नहीं था, बल्कि एक प्रकार की Suicide थी और यह चीज़ जो कि उन्होंने की, असल में मनुष्यता के विरुद्ध थी। मेरी समझ से सिवाय नामवरी और तकलीफ उठाने के इससे कोई लाभ नहीं निकला। क्या हुआ कि तराजू का पलड़ा एक झुका ही रहा। मशीन की कल अगर ठीक Adjust नहीं है, तो वह मशीन ठीक हालत में नहीं कही जा सकती। अगर यह खराबी कहीं मशीन में हो जाये तो फिर इंजीनियर की जरूरत पड़ती है। असल उसूल को जानने वाले हमेशा कम रहे हैं, गो अच्छे ज़माने में कुछ तादाद ज्यादा रही। ईश्वर का मिलना तो भाई यही है कि हम में भी वही झलक पैदा हो जाये और बातें भी आ जायें, जो ‘उसमें’ हैं। देखने में भी जो सिन्धु और बिन्दु का फ़र्क क्यों न मालूम हो अब अपने खत के जवाब में यह समझ लो कि जिन बातों की ज़रूरत है, वह धीरे-धीरे आ रही हैं। पूजा तुम हर वक्त करती रहती हो, तुम्हें चाहे इसका पता हो या न हो। आगे यह चीज़ भी आ सकती है कि जाहिरा पूजा होती ही नहीं, बल्कि कोशिश करने से जी घबड़ाने लगता है और फिर यह ज़रूरी ही नहीं कि तमाम उम्र कोई पूजा करता ही रहे। जिस ध्येय के लिये पूजा की जाती है, उसकी प्राप्ति के बाद उसकी आवश्यकता नहीं रहती, मगर इस बात को instructor तय करता है। अपने आप तय नहीं कर लेना चाहिये। स्वामी विवेकानन्द जी ने भी लिखा है कि ईश्वर की पूजा दो तरह के इन्सान नहीं करते। एक तो inhuman brute और दूसरे जो अपने से काफ़ी उठ चुके हैं।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-105
शाहजहाँपुर
7/7/1950
पत्र तुम्हारा मिला। तुम्हारे सब पत्र मेरे पास रखे हैं। मैं चाहता हूँ कि हर पत्र का उत्तर विस्तार पूर्वक लिखूँ। मगर मजबूरी यह है कि मुझे कोई लिखने वाला नहीं मिलता है और अपने आप जब लिखना चाहता हूँ तो विचार आना बन्द हो जाते हैं। पत्रों के उत्तर में इसलिये अब देर भी हो जाती है। नारायण से मुझको बड़ी मदद मिलती थी और हरि को फुर्सत कम रहती है। उसकी जब मर्ज़ी होगी तो यह भी हो जावेगा। इस पत्र का उत्तर अगर विस्तारपूर्वक दिया जावे तो कम से कम बीस-पच्चीस पन्ने हो जावेगें, इसलिये संक्षेप में लिख रहा हूँ।

मेरी तबियत अब अच्छी है। दो-तीन दिन तुमने अपनी Will Power Exercise की। मुझे इस कदर फ़ायदा हुआ कि कहा नहीं जा सकता। अपने आप को देखता था, मगर कोई बात समझ में नहीं आती थी। इतनी बात समझ में आती थी कि यह प्रार्थना का असर है। working हरगिज़ नहीं छोड़नी चाहिये। तुम्हारे लिये working करना और दूसरों को सिखाना, अब यही पूजा है। मैंने तुमको ब्रह्म मण्डल की mastery इसलिये दी है कि working तुम्हारे सुपुर्द हो और उसको ठीक तरीके से करो। यह जहाँ तक मेरा ख्याल पहुँचता है पहली ही Example है। मुमकिन है यह काम शायद ही किसी स्त्री जाति के सुपुर्द हुआ हो। तुम्हारी वर्तमान हालत renunciation in pure form (वैराग्य) है और लय-अवस्था भी अच्छी चल रही है। हमारी हालत यही होनी चाहिये, मगर इसकी नकल करने की ज़रूरत नहीं। तुममें ज़रूर उस हालत की शुरुआत ईश्वर की कृपा से, हो चुकी है, इसलिये लिखता हूँ। जब हम किसी को रंज में देखें, तो हमारी तबियत भी रंजीदा हो जानी चाहिये और जब हम किसी को खुशी में देखें तो हमारी तबियत भी खुश हो जानी चाहिये। मगर जब हम वहाँ से हटें तो न हमें रंज हो और न ही खुशी। मेरठ में आँसू निकल आने का भी यही कारण था।

माता जी को प्रणाम तथा बच्चों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-129
शाहजहाँपुर
22/12/1950
तुम्हारा खत नारायण के हाथ पहुँचा। तुमने जो अपना तरीका काम के लिये लिखा है, वह बहुत अच्छा है। जब तुम काम करोगी, तरीके स्वयं ही समझ में आते रहेंगे। मतलब काम से है, तरीका कोई भी कर लिया जावे। और सब अच्छी तरह है।

दुआगो,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-142
शाहजहाँपुर
14/3/1951
खत तुम्हारा मिला। तुमने जो उचाट वाली हालत के विषय में लिखा, वह वाकई में उचाट हालत नहीं है, बल्कि उसे Whole hearted attention कहना चाहिये और झुंझलाहट भी इसी कारण से होती है, कि जब कोई बात करता है, तो तबियत को उस हालत से हटना पड़ता है, जो नागवार होता है। यह जो ख्याल तुम्हें आते हैं, वह वाकई तुम्हारे ख्याल नहीं हैं, बल्कि वह तुम्हारे विराट् देश में फैलाव का सबूत है और यह जो आग लगना, हल्ला सुनना आदि है, यह वह वारदातें हैं, जो वाकई में सब तरफ हो रही हैं। जो हालत २ मार्च के खत में लिखी है, वह वास्तव में असल शान्ति का तलछट है। तुमने लिखा है कि – “बका की हालत खुल रही है”। बका की हालत को तुरिया की हालत कह सकते हैं, क्योंकि जब मैं बका की हालत और तुरिया की हालत पर गौर करता हूँ तो एक ही पाता हूँ।

भाई-बहनों को दुआ। अम्मा को प्रणाम।


तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-146
शाहजहाँपुर
3/4/1951
खत तुम्हारे सब मिल गये। हाल मालूम हुआ। तुमने जो यह लिखा है कि “मुझमें प्रेम वगैरह बिल्कुल नहीं है” इसका उत्तर यही है कि ज्यों-ज्यों फ़नाइयत बढ़ती जावेगी, त्यों-त्यों यही बात मालूम पड़ती रहेगी। मैंने लिखा था कि तुम्हारी फ़नायेफ़ना की बका की कैफ़ियत खुल रही है, और भाई, बका में भी तो फ़ना होता है।

तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ। अम्मा को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-150
शाहजहाँपुर
4/5/1951
ख़त तुम्हारा और केसर का आया। हाल मालूम हुआ। तुमने लिखा है कि – “जब कोई तारीफ़ करता है तो मुझे न तो शर्म का भाव मालूम होता है, और न कुछ समझ में ही आता है।” यह हालत अच्छी है। योगी की तारीफ यही है कि मान में खुश न हो और अपमान में नाखुश न हो। काम का Automatically होना, यह ईश्वरीय गुण है और ऐसी दशा में संस्कार नहीं बनते। जब यह भी अन्दाज़ खत्म हो जाये कि काम Automatically हो रहा है, तब असली हालत है। मैंने इसी दशा को “Efficacy of Raj Yoga” के Description में दिखलाया है। हमारे यहाँ अभ्यासी आगे ही बढ़ते चले जाते हैं, इसलिये कि जिस दशा पर ठहर जावें, तो उसके अर्थ यह हैं कि अब आगे बढ़ना बन्द है। दीनता और Innocence की हालत का महसूस न होना के मानी यह है कि यह चीज़े अपनी अच्छी खासी हालत में आ चुकी हैं और कदम अब इससे आगे है।

जब सिर से पैर तक अभ्यासी याद ही याद हो जाता है, तब याद कोशिश करने से क्षणमात्र के लिये है। एक बात तुमने यह लिखी है कि – “जब मैं किसी के यहाँ जाती हूँ तो जिनसे अपरिचित होती हूँ, वह भी अपने मालूम होते हैं”। इसका जवाब तुमने स्वयं दे दिया है। वह यह है कि अपना-पराया क्या होता है, यह कुछ भी मालूम नहीं रह गया है। तुमने लिखा है कि – “मुझे फैज़ इत्यादि की पहचान नहीं रह गई है।” इसकी वजह मुझे यह मालूम पड़ती है कि तुम हर समय फैज़ में डूबी रहती हो और डूबे हुए की आँख के सामने सिवाय पानी के और कुछ नहीं होता। जब कोई दूसरी चीज़ हो, तब differ कर सकती हो।

अम्मा को प्रणाम। भाई-बहनों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-154
शाहजहाँपुर
4/6/1951
जब तुमने मुझे स्वप्न में देखा था, उस समय मुझे दिन और रात में दो बार दौरे तेज़ हो रहे थे। अब चौथे रोज़ दौरा कल पड़ा। ज़्यादा चिन्ता नहीं करनी चाहिये। यह चीज़ जायेगी यदि ईश्वर को मंजूर है। इसलिये कि ऐसी दशा में बहुत काम पूरी तरह से करना कठिन होगा। अब १५ मई के पत्र का उत्तर दे रहा हूँ। पहले मेरा ख्याल या इरादा ‘मालिक’ के प्रति बेहद मजबूत था और अब तो यह ख्याल या इरादा ही महसूस नहीं होता। अभ्यासी का लय अवस्था पर आ जाना, यह ईश्वरीय बरक़त है। जितना ज्यादा अपने को लय कर सकें, उतनी ही ज्यादा मंजिल पर पहुँचा हुआ समझना चाहिये। ख्याल की मजबूती उसी समय तक मालूम होती है, जब तक उसके फैलाव की सूरत पैदा न हो जाये। जितनी फैलाव की शक्ल पैदा होती जाती है, उतना ही अभ्यासी हल्का-फुल्का होता जाता है। ईश्वर इतना हल्का है कि उसमें कोई बोझ नहीं। ख्याल की जो मज़बूती या ज़ोर, शोर इसकी शुरुआत में ज़रूरत है। इसका वज़न आगे चलकर कम हो जाता है। यहाँ तक कि बिल्कुल नहीं रहता। यह बुनियाद है। “खालिस असलियत” पर पहुँचने की। सब कुछ होते हुए दिल्ली अभी दूर है। लाला जी ने एक बार अपनी दशा मुझसे इज़हार की थी। क्या कहना इस हालत का, जो उन्होंने बयान किया। ईश्वर यह चीज़ सब को दे। एक छोटी सी हालत मैं अपनी भी बयान किये देता हूँ, और वह इसलिये कि तुम्हें जब ईश्वर इस हालत के करीब लाने की कोशिश करे, तो परेशानी न हो। मैं इन शब्दों में अपनी हालत बयान करता हूँ – “मुझे जिस्म और जान तथा आध्यात्मिक उन्नति यह कुछ नहीं मालूम होती। आकाश तत्व जो सबसे हल्का कहा गया है, वह अपने से भारी मालूम होता है”।

२४ मई के खत में जो इज्ज़त और अदब के बारे में लिखा है, उसका जवाब देने की ज़रूरत नहीं है। जब तुम अपनी हालत में होती हो, उसमें एकता भासती है और उसमें इज्ज़त और अदब का ख्याल नहीं रहता, क्योंकि वहाँ पर सब एक हैं। वह एकताई अभी पूरी सीमा तक ही पहुँची और किसी के कहने सुनने का असर न होना, यह सहनशीलता है, जो बहुत अच्छी चीज़ है।

शेष शुभ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-156
शाहजहाँपुर
6/6/1951
तुम्हारा पत्र मिला। तुमने लिखा है कि ऐसी कृपा बनाये रखें कि जल्दी उन्नति हो। इसका उत्तर यह है कि मेरे पास जो कुछ भी गुरु महाराज की दी हुई वस्तु है, वह तुम्हारे ही घर भर में भरती चली जा रही है। तुमने जो अपना हाल लिखा है कि Control नहीं रहा। इसका मतलब समझ में नहीं आया। इसे फिर लिखो। बाकी अन्दरुनी कैफ़ियत तो समझ में आ गई और उसका असर यह होना चाहिए कि ‘गुमसुम’ की कैफ़ियत रहना चाहिये। अगर शुरु हो गई हो तो अभी और बढ़ेगी। प्राचीन महात्माओं ने तुरीय और तुरीयातीत तक लिखा है, अर्थात् तुरीया के बाद तुरीयातीत ही होती है। हमारे गुरु महाराज ने तीन प्रकर की तुरीय लिखी हैं। तुम्हारी दशा जो मैनें बका की लिखी है, उसको तुरीय ही कहते हैं। इसकी भी लय-अवस्था शुरु हो गई है, परन्तु बहुत खफ़ीफ है। शेष शुभ है।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-158
शाहजहाँपुर
10/7/1951
खत तुम्हारा और केसर का आया। केसर जो बात चाहती है, उसके लिये वह कोशिश कर रही है, नतीजा - ईश्वर के हाथ में है। वह सब कुछ कर सकता है और भक्ति भाव भी यही है कि सब कुछ करते हुए, ईश्वर के ऊपर छोड़ देना चाहिए। हुआ ऐसा ही है कि “जो ईश्वर की तरफ़ दो कदम बढ़ा, ईश्वर उसके लिये चार कदम बढ़ा”। मैंने तुम्हारी हालत के बारे में कुछ पहले खत में लिखा था और आने वाली हालत का उसमें बहुत कुछ इशारा था। तुम्हारी हालत इस समय बहुत कुछ बेखबरी की है। रंज की वजह से हालत में इससे ऊपर अभी तक कदम नहीं रख पाया और हालत इसीलिये अभी अच्छी तरह खुली नहीं। अब रंज का असर बिल्कुल जाता रहेगा तो ईश्वर ने चाहा, फिर बढ़ने लगेगी। मुझे ऐसे समय पर आना ज़रूर चाहिये था, क्योंकि मेरा फ़र्ज भी है, मगर इलाज और बीमारी की हालत कुछ ऐसी थी कि मैं मजबूर था। मैं आऊँगा ज़रूर, मगर तारीख अभी मुकर्रर नहीं कर सकता।

माता जी को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-162
शाहजहाँपुर
24/8/1951
तुमने जो २३.७.५१ को खत लिखा था, उसका जवाब मैंने ३०.७.५१ को दिया था, मगर डाकखाने की गलती से तुमको मिला नहीं। उसमें स्वामी जी का एक छोटा सा Dictate भी था। यह याद नहीं कि क्या क्या लिखा था। थोड़ा बहुत जो कुछ याद आता है फिर लिखे देता हूँ और कोई नई बात अगर याद आ गई तो लिख दूँगा। तुमने लिखा है कि “मेरी मौजूदा हालत अभ्यास से हल्की मालूम होती है”। यह सही है। अभ्यास कितना ही सूक्ष्म क्यों न बताया जाये फिर भी वह कर्म है। जिस्मानी मेहनत से कहीं भारी है। और खाली मेहनत, मेहनत से कहीं भारी है। अर्थात उसका जो नतीजा होता है, उससे वह चीज़ बहुत भारी है। तुमने जो मुर्दा की कैफ़ियत पहले लिखी थी, शुक्र है, ‘मालिक’ का, कि यह कैफ़ियत मैं अपनी ज़िन्दगी में पहली मर्तबा अपनी आँखों से देख रहा हूँ। कितनी ही कोशिश की जाये, जब तक ईश्वर मदद न करे, अपनी ताकत से प्राप्त नहीं होती। मगर भाई, हममें ईश्वर की मदद तलब ही कौन करता है। खुशामद करने वाले तो ईश्वर के बहुत मिलते हैं, मगर अपने आप को उसके हाथ बेच डालने वाले बहुत कम। हमारे circle में मोहताज़गी इस कदर बढ़ी हुई है कि हर शख्स माँगने के लिये प्याला सामने किये हुए है। अपने आपको इस हद तक कोई भी बनाने के लिये तैयार नहीं होता कि ‘मालिक’ को इतनी दया आ जाये कि माँगने की ज़रूरत ही न पड़े। तुमने देखा होगा कि भीख माँगने वाले लोग दर-दर फिरते हैं और पूरे दिन में कहीं उनका प्याला इतना भर पाता है कि मुश्किल से शाम तक पेट भर खा सकें। और एक वह है कि जो ‘मालिक’ की याद में एक बबूल के साये में बैठा हुआ है, उन्हें खाने को इतना मिलता है कि स्वयं खाते हैं और दूसरों को भी खिलाते हैं, तिस पर भी काफी बचा रहता है। यह तो भिखारी की शान है, और पहले वालों को भिखमंगा कहना चाहिये।

जब मुर्दा वाली हालत पैदा हो जाये, तब उसे आध्यात्मिक विद्या की शुरुआत कहना चाहिये, नहीं नहीं, बल्कि यह हालत होते हुए इसका ख्याल तक बाकी न रहे। यहाँ तक कि सोचने और गौर करने से भी यह हालत एहसास में न आवे, तब असल हालत है और आध्यात्मिक विद्या की शुरुआत। इसी के आगे कुछ Dictate पहले आया था, जिसके मतलब यह थे कि “जहाँ और सब लोग खत्म करते हैं, वहाँ से रामचन्द्र शुरुआत करता है”। और यह ठीक है। इसी हालत से बन्धन से छुटकारा मिलता है। मैंने अक्सर खतों में इसी हालत की इन्तजारी के लिये लिखा है।

अब जो खत तुमने २२.८.५१ को भेजा है, उसका जवाब लिखता हूँ। अब ईश्वर की कृपा से वह कैफ़ियत भी पैदा हो रही है कि मुर्दा वाली कैफ़ियत रहते हुए भी उसका एहसास न हो। मगर अभी पूरी हालत पर नहीं आई है। इसमें अभी कुछ वक्त लगेगा। ईश्वर उसको भी परिपक्व करेगा। तुमने लिखा है कि - "अब तो ‘मालिक’ की कृपा से यह हो गया है कि हर चीज़ में से रोशनी या ज़िन्दगी निकलती हुई मालूम पड़ती है और वह रोशनी भी कैसी, जिसमें अंधियारी या उजियाला कुछ महसूस नहीं होता”। जिस जगह पर कि तुम हो, वहाँ की कैफ़ियत बाहर भी मालूम होती है और मेरा भी अभ्यास की हालत में यही हाल था कि जो अन्दर मालूम होता था, वही बाहर जाहिर होता था।

माता जी को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-164
शाहजहाँपुर
30/8/1951
तुम्हारे सब पत्र मिल गये। तुम ईश्वर की कृपा से जिस हालत में हो, इस हालत में अभ्यास का होना बड़ा कठिन है। यह अभ्यास का फल है। ऐसी हालत में जो अभ्यास इससे सम्बन्ध रखता है, वह बिना जाने हुए खुद-ब-खुद होता रहता है। वैसे अगर Faith ठीक है तो हमारे यहाँ हर आदमी (अभ्यासी) बिना उसके जाने हुए भी ईश्वर की तरफ लगा रहता है, इसलिये कि मन का गोता ‘ब्रह्माण्ड-मण्डल की दशा’ में दे दिया जाता है और इस वज़ह से उसमें कुछ रंग वैसा ही आ जाता है और मैं तो ऐसा भी करता हूँ कि मन का रुख बहुत कुछ ऊपर को कर दिया करता हूँ। इससे इसकी ताकत रफ़्ता-रफ़्ता नीचे जाने, अर्थात् दुनिया की तरफ़ कम होने लगती है। जिसने लय-अवस्था प्राप्त कर ली और जिस हद तक प्राप्त कर ली तो Guidance खुद-ब-खुद होती रहती है। मैंने भी जब अभ्यास शुरु किया था और जो बात शुरु की थी और शुरु ही क्या, बल्कि खुद-ब-खुद हो गई थी, उस चीज़ ने मुझे जब तक धुर तक न पहुँचा दिया, कुछ न कुछ अपने उद्देश्य तक पहुँचने को बताती ही रही। या यों कहिये कि ईश्वर की कृपा से मैं उस पर आता ही गया। अब जो चीज़ मैंने प्रारम्भ की थी, यदि मैं वही चीज़ दूसरों को बताऊँ तो नहीं मालूम वह मेरे बारे में क्या ख्याल करने लगें और बताते हुए भी मुझे शर्म आती है और यदि बताने की नौबत आ जाती है, तो उस समय तक अभ्यासी उस काबिल रहता ही नहीं कि इसको पूर्ण तरह से कर सके। तुमने जो अपनी मुर्दा की तरह की कैफ़ियत लिखी है, वाक़ई यही एक कैफ़ियत है, जिस पर आने की हर शख्स को कोशिश करनी चाहिये। असल आध्यात्मिक विद्या यहाँ से आरम्भ होती है और यह अ, आ का पढ़ना यही से प्रारम्भ होता है। नहीं, बल्कि मुर्दा की सी कैफ़ियत किसी तरीके से ख्याल में न आवे, वहाँ से आध्यात्मिक विद्या का अ, आ प्रारम्भ होता है।

Dictate By Sri Vivekanandji Maharaj :-
"This is a very high thought daughter. People end their spirituality at this Stage, and HE (Ram Chandra) begins from here. The idea is Correct. Can you find such man? People will laugh at. This is end of all activities, but really it is the beginning of spirituality".

तुम्हारा यह कहना बिल्कुल सही है कि “अभ्यास से अपने आप को बहुत हल्का पाती हूँ”। अभ्यास को तो ऐसा समझना चाहिये, जैसे एक चीज़ जो किसी दूसरी चीज़ को working Order में लाती है, इससे ज्यादा इसका कोई ताल्लुक नहीं और जब कोई चीज़ Order में आ गई तो उसका Function ठीक होने लगेगा। हांसिल करना तो लय अवस्था है। सालोक्य, सामुज्य, सामीप्य और सारुप्य सब इसी की Stages हैं। मैं तो सब कुछ चाहता हूँ मगर इस वक्त इधर आने की मुझ को खुशखबरी नहीं मिलती। ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ कि मैं यह हालत अपनी ज़िन्दगी में तुम्हारी देख रहा हूँ। इस हालत में आकर बंधन से छुटकारा मिलता है और चीज़ वाकई अपने काबू की नहीं, ईश्वर की देन है। तुमने लिखा है – “शरीर का ज़र्रा-ज़र्रा पिघल कर बहा जा रहा है” यह एहसास ठीक है। जब पानी बरसता है तो मिट्टी और धूल , जो दरख्तों पर होती है, वह सब धुल जाती है। मगर यह पानी ऐसा है कि ज़र्रा-ज़र्रा में मिटता जाता है और अपनी चमक लेने के लिए Unwanted चीज अलहदा हो जाती हैं।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-169
शाहजहाँपुर
30/9/1951
खत तुम्हारे सब मिल गये। तुम्हारी उरुज (चढ़ाव) व नुजूल (नीचे गिरना) की हालत है। आदमी जितना ऊँचा जाता है, उतना ही नीचे की ओर देखता है। नुजूल में दीनता और नफ़ी (शून्य) की हालत है। तुम्हारे जो ख्यालात आते हैं, वह तुम्हारे नहीं हैं, बल्कि जो विचार उतर रहे हैं, यह उनकी झंकार है। अभी तुम्हारा दूसरा खत मिला। उसका जवाब फिर विस्तार पूर्वक दूँगा। तुम्हारी हालत इन्तहाई मक़सदा नुक्ते पर पहुँचने की उम्मीद दिला रही है।

अम्मा को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।
तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-170
शाहजहाँपुर
1/11/1951
अब मैं पहले से अच्छा हूँ। तुम्हारे १७ सितम्बर के खत का जवाब दे रहा हूँ। तुमने लिखा है कि – “जीवन में मोक्ष का आनन्द प्राप्त हो रहा है”। यह कैफ़ियत तो बहुत ही अच्छी है। इस कैफ़ियत को आखिरी हद तक पहुँचा देने से, इस तरह कि उसका भास न हो, ‘जीवन-मोक्ष दशा’ कहलाती है। यह उसकी शुरुआत है। अब यह जहाँ तक बढ़ जावे। मगर मैं अपने ख्याल की क्या कहूँ कि मुझे किसी जगह पर तृप्ति नहीं होती। मान लिया कि अभ्यासी ‘जीवन-मोक्ष की पूर्ण दशा’ पर आ जावे, तो भी बहुत कुछ आगे मौजूद है। मुझे कुछ इशारात किसी समय हमारे पूज्य लालाजी ने दिये थे, इसको देख कर मेरे होश उड़ते थे। मगर अब न मालूम मुझे क्या हो गया है कि मुझे अपने ठिकाने का भी पता न रहा। सिर्फ लाला जी साहब से कभी-कभी इतनी रोशनी मिल जाती है कि मैं Swim कर रहा हूँ और यह खबर उस समय होती है, जब कि तुम्हारी बड़ी उम्दा-उम्दा हालतें जब मैं खतों में देखता हूँ, तो मुझे बड़ी खुशी होती है और अगर सच पूछो तो यह सब तुम्हारी ही मेहनत का नतीजा है। मैंने तुम पर मेहनत की ही नहीं। और लोगों पर जो मेहनत करता हूँ, तो उतना अच्छा नतीजा बरामद नहीं होता, तो मेरी काबिलयत तो यह है। अगर तुम कहो कि यह सब तुम्हारी काबिलयत का नतीजा है, तो उनमें यह सब बातें पैदा क्यों नहीं होती। अपनी मेहनत ही काम देती है। यह खुशी मुझे ज़रूर है कि ‘जीवन-मोक्ष दशा’ की हालत के तलछट ही ABCD ज़रूर है। तुमने लिखा है कि हल्केपन का भी एहसास नहीं रहा है। इसका जवाब ऊपर दे चुका हूँ। और यह लिखा है कि अपने होने का भी एहसास नहीं है और न अपने न होने का ही एहसास है। यह लय-अवस्था की बहुत उच्च हालत है। सब की उन्नति चाहना, यह ख्याल बहुत अच्छा है। यह एक किस्म की सेवा है। जो अभ्यासी जितना आगे बढ़ता है, यह चीज़ बढ़ती जाती है और मुझमें भी यही बात है। अपने फैलाव का महसूस होने के मानी यह होते हैं, कि विराट देश में हम विचरने लगे हैं। फैलाव की शुरुआत यहीं से होती है और जितना आगे पहुँचता जाता है, उतना ही यह फैलाव की कैफ़ियत भी बदलती है। और, खैर, मैं लिखे देता हूँ, यह समझ कर कि तुम इस दशा का ख्याल उस समय तक नहीं बाँधोगी, जब तक यह दशा खुद-व-खुद न आ जावे। जब तक अभ्यासी ईश्वरीय-दशा में रहता है, तब तक इस फैलाव की सूरत बदलती रहती है। उसके पार कर लेने के बाद फिर फैलाव महसूस नहीं होता उसकी शक्ल कुछ और ही हो जाती है, यहाँ तक बन्धन है। जिस ईश्वर को हम पुकार रहे हैं, वहाँ तक बन्धन मौजूद है। मोक्ष इससे पहले हो जाती है। यह इतनी बड़ी चीज़ नहीं है जितनी यह मालूम होती है। जिस ईश्वर की हम तमाम उम्र याद करते हैं, वही हमारे फंसाव का वायस हो जाता है। जिस समाज में यह बात कही जाये, मुमकिन वह मुझको नास्तिक समझने लगे, मगर मैं उससे एक क्षण भी अलहदा नहीं रहता, इसलिये नास्तिक कहना गलती होगी। अब इस फैलाव में भी अभी बहुत कमी है। उसमें एक चीज़ जिसको पहले से मैं नहीं लिखूँगा और पैदा होनी चाहिये।

अब मैं २६ अक्टूबर के खत का जवाब दे रहा हूँ। तुममें एकाग्रता मौजूद है और बिना जाने बूझे भी तुम्हारे ख्याल की लड़ी ‘मालिक’ की तरफ जुड़ी रहती है, इस लिये जब कोई ज़ोर से बोलता है तो उसकी आवाज़ से उसके तनाव में झटका लगता है, इसलिये तकलीफ़ हो जाती है। तुमने जो कुछ अपना अनुभव मारकाट और अकाल का देखा है, यह सब होने वाली बातें हैं। बिना इसके दुनिया का सुधार नहीं होगा। अभी तीन-चार दिन हुए मैंने तुमको अगले मुकाम पर खड़ा कर दिया है। बस, यह छोटी सी मदद तुम्हारी करता रहता हूँ। जब मैं देख लेता हूँ कि इस मुकाम में फैलाव हो चुका है और सूरत आगे को जाना चाहती है, मगर जा नहीं पाती, तो मैं कुछ धक्का दे देता हूँ।

माता जी को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-173
शाहजहाँपुर
18/11/1951
पत्र तुम्हारा मिला। तुमने जब अपनी हालत लिखी, तो मुझे अचम्भा हुआ कि तुम अपनी हालत लिख रही हो, या मेरी। सोचा तो मालूम हुआ कि मेरी गड़ी हुई हालत जो किसी वक्त में थी, अब तुममें उखड़ रही है। ‘मालिक’ का धन्यवाद है कि इसकी पुनरावृत्ति कहीं हो तो रही है। तुम्हारे रोम-रोम का हर मुकाम अब खुल रहा है। इस की मास्टरी हो जाना अवतारों में पाई जाती है। मगर सिर्फ यही बात अवतारों के लिये काफ़ी नहीं है। यह उसका एक छोटा सा अंग है। हर रोम-रोम पर प्रभुत्व कृष्ण जी महाराज को था, मगर अफ़सोस यह है कि हमारे रामचन्द्र जी महाराज भी अवतार थे मगर यह चीज़ उनमें न थी। अगर मैं कहीं इन दोनों अवतारों की तुलना करूँ, तो मैं समझता हूँ कि एक हजार कोस का फ़र्क पड़ेगा। रामचन्द्र जी महाराज में Thought के द्वारा Destruction करने की ताकत न थी और कृष्ण जी महाराज में यह चीज़ कूट-कूट कर भरी थी। एक बात मैं अजीब लिखता हूँ कि कृष्ण जी महाराज को अपने जिस्म का भान न था और रामचन्द्र जी महाराज की यह हालत न थी। हम लोग कृष्ण जी महाराज की पैरवी करते हैं, यही वजह है कि उसी निस्बत से हमारी लय-अवस्था आती है। मैंने पिछले खत में जीवन-मोक्ष दशा के बारे में कुछ लिखा था कि उसका तलछट तुममें कुछ आ चुका है। अब उससे और Advanced हो गया। ईश्वर ने चाहा तो उस हालत का मज़ा चखोगी। एक गाँठ मालूम होती है, उसके टूटने से यह हालत, ईश्वर ने चाहा, पैदा हो जावेगी और न जाने क्या बात है कि तुम्हारे लिये इस गाँठ को तोड़ने की अपनी ताकत से तबियत नहीं चाहती और कोई अगर होता तो मुमकिन था कि मैं यह कर बैठता। चाहता यह हूँ कि तुम अपने अभ्यास और ख्याल की ताकत से चलो और उससे यह टूट जाये। मदद मैं ज़रूर दूँगा। यह मेरा धर्म है।

माता जी को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-181
शाहजहाँपुर
15/1/1952
तुम्हारे दोनों खत मिल गये। यह सब हालतें, जो तुमने लिखी है, यह सब लय-अवस्था की बरकत है। जितनी अच्छी जिसकी लय-अवस्था है, उतनी ही ज़्यादा वह कामयाब है। यह चीज़ ज़्यादा मोहब्बत और बार-बार याद से पैदा हो जाती है। इसके लिये तरकीबें भी हैं, मगर उसको बताते हुए मुझे जरा अच्छा मालूम नहीं होता और बहुत अर्से में जिन दो-एक अभ्यासियों को बताई भी उसमें से सिर्फ एक शख्स थोड़ा बहुत कर रहा है। यह चीज़ ऐसी है कि बिना बताये हुए खुद-ब-खुद उसे आ जाना चाहिये। लालाजी ने यह चीज़ किसी को गालिबन नहीं बताई मगर उसके करने वाले निकले और हमारे यहाँ यह है कि इशारे से अगर बतला भी दिया जावे तो कोई उसको grasp नहीं करता। पिछले उत्सव में मैंने एक मज़मून लिखा था, जिसका सब मतलब यही था। मगर उसके सुनने के बाद अब साल खत्म हो रहा है, किसी को फिर याद भी न आई। सच तो यह है कि जबरदस्ती हम ठूंस-ठूंस कर रहे हैं, असली शौक इक्का-दुक्का को होगा। अब इससे जो कुछ फायदा जिसको हो। ‘लालाजी’ साहब ने भी मुझसे महासमाधि लेने से कुछ दिन पहले यही कहा था कि अब तक लोगों में लय-अवस्था भी पैदा न हुई और ज़िन्दगी का रास्ता बिना लय-अवस्था पैदा किये हुए, जिसको फ़नाइयत या मर मिटना भी कहते हैं, नहीं मिलता। अब तुम्हारे यहाँ पर यह चीज क्यों भर रही है? इसका कारण यही है, हमारे साथियों में ईश्वर की कृपा से सब से अच्छी लय-अवस्था तुममें मौजूद है। उसके बाद नम्बर केसर का है, बाकी एक शख्स में और रुपये में करीब एक आना या दो आने भर मौजूद है। मुमकिन है, हालाँकि इसमें शक है, कि छदाम या दमड़ी भर किसी एक और में हो। बाकी भाई, इस वक्त तक सब खाली हैं। अब ईश्वर आगे जिसे दे दे, वह ‘मालिक’ और मुख्तियार है। ब्रह्म विद्या की तालीम बहुत कम इसी वजह से रही है, कि इसके सीखने वाले ज़माने के लिहाज़ से बहुत कम रहे और अब कुछ आँखों पर पर्दा ऐसा पड़ गया है कि लोग इस किस्म की विद्या पर जो अपने यहाँ है, एतबार ही नहीं करते। तुम्हारे घर वालों को मुझ से मोहब्बत बहुत है, इससे भी फायदा अच्छा हो रहा है और जहाँ यह चीज़ है, वहाँ भी फ़ायदा ही है।

तुम्हारी हालत के बारे में मैं क्या लिखूँ? बस ईश्वर का शुक्र है। ऐसी हालतों के लिये हमारे ‘लालाजी’ कहा करते थे कि यह चीज़ अपनी ताकत से पैदा नहीं होती, बल्कि ईश्वर जिसे दे दे। यह तुम्हारी जो कुछ हालत है, इसको मैं ईश्वरी हालत कहता हूँ, मगर जिस हालत पर पहुँचना है, वह अभी बहुत दूर है। ईश्वर वह भी देगा। अव्वल तो इस हालत पर भी जब तक ईश्वर की खास मेहरबानी न हो, पहुँचना बहुत मुश्किल है और कोई अगर पहुँच भी गया, तो बस इसको वह काफ़ी समझ लेता है। वह असल कैफ़ियत, जो वाकई कैफ़ियत है, उसकी यहाँ पर शुरुआत भी नहीं हो पाती। दूसरी चीज़ एक यह भी हालत होती है कि अगर अभ्यासी जहाँ तक पहुँचने की हिम्मत भी करे और पहुँच जावे तो आगे अपनी हिम्मत से जाना मुश्किल क्या, बल्कि नामुमकिन सा है, इसलिये कि ऊपर की ताकत जो दुनिया की तरफ Focus किये हुए है, उसमें चढ़ाई मुश्किल पड़ जाती है। किसी गुरु को उस ताकत पर बहुत कुछ command हो गया हो, तब इसके आगे वह अभ्यासी को फेंक सकता है। हमारे यहाँ यह सब बरकत इस वजह से है कि हमारे ‘लालाजी’ ने इन्तहाई दखल और पहुँच उस या इस हद तक कर लिया था, अपनी ज़िन्दगी में ही जहाँ तक कि एक इन्सान का पहुँचना मुमकिन है और अब तो वह Unlimited हो रहे हैं। अब उनकी ताकत का ठिकाना ही क्या? तुम्हारे वैराग्य की जैसा कि पिछले खत से मालूम हुआ पूर्ण अवस्था है, मगर उसमें Firmness होना बाकी है, यह भी हो जावेगा। यह हालत वैराग्य से बहुत ऊंची है, जो तुमने लिखी है। मेरा जी अब उस हालत से ऊँचा पहुँचाने को चाहता है, मगर मैं उसको अभी तय नहीं कर सका। मुमकिन है, अगर तबियत ने तय कर लिया तो आज ही निकाल दूँगा। खैर, तुमको पता चल पायेगा।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-190
शाहजहाँपुर
5/3/1952
खत तुम्हारा मिला। पढ़ कर बाग़-बाग़ हो गया। तुमने जो लिखा है – “उदासी की हालत गाढ़ी होती जाती है”। इसका मतलब मेरी समझ में नहीं आया। उदासीपन से मतलब Indifferent from the Worldly things से है, या महज़ सुस्ती से। यह हालत दृढ़ वैराग्य से पहुँचती है। तबियत में उचाटपन रहना अलामत (निशानी) इस बात की है कि घर की याद आती है। घर का मेरा मतलब तुम्हारी कोठी से नहीं है, बल्कि वतन से है, जहाँ से हम सब आये हैं। तुमने लिखा है कि यदि दिन भर छाती कूटा-करूँ, तब भी आराम नहीं मिलता। वाह! वाह! क्या हालत है। हजारों सल्तनतें इस प्रेम पर कुर्बान हैं। बस, इस हालत में डूब कर अगर तुम कहीं दूसरों को तवज्ज़ो दोगी तो मज़ा आ जायेगा। मैं इस हालत में केवल तीन दिन रहा। These are the Things for Living dead. मैं यह चाहता हूँ कि तुम अपनी हालत हर दूसरे या तीसरे दिन बराबर लिखती रहा करो। अगर हालत ज़ब्त से बाहर मालूम पड़े तो अपने पूजा के कमरे में कोच के करीब बैठ जाया करो। ख्याल मैं भी रखूँगा। यद्यपि हालत इतनी ज़ब्त से बाहर नहीं हो सकेगी, क्योंकि पूज्य समर्थ श्री ‘लालाजी’ साहब मुझसे तुम्हारी निगरानी का वायदा कर चुके हैं।

तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ, अम्मा को प्रणाम।
तुम्हारा शुभचिन्तक, रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-197
शाहजहाँपुर
22/3/1952
तुम्हारे सब खत मिल गये। लिखने वाला न मिलने की वजह से हिन्दी में न लिख सका। मामूली बातें तो मैं खुद लिख सकता हूँ, मगर जब ज़्यादा सोचकर लिखना पड़ता है, तो लिखना और सोचना दोनों काम साथ-साथ नहीं हो पाते। हालतें आध्यात्मिक बहुत सी ऐसी हैं, जो आती ही रहती हैं। जो attentive रहता है, और ‘मालिक’ के साथ-साथ जाता है, उसको वहाँ की रंगतें और घाटियाँ अच्छी तरह मालूम हो जाती हैं। आँखे फोड़कर चलने वाले तो बहुत मिलेंगे, हमारे यहाँ इनकी अच्छी तादाद है। पूजा की और बेगार टाली, फिर कुछ मतलब नहीं - यह मेरी नादानी है कि मैंने ऐसे लोगों को अक्सर बढ़ाया है और उससे कोई फायदा नहीं हुआ। बहुतेरों को अब तक समझ में नहीं आया कि क्या चीज़ वह पा गये, इसलिये अब इसमें मैंने बहुत कमी कर दी है। लोगों को शौक और दिलचस्पी पैदा नहीं होती, वरना उनको मज़ा आ गया होता।

तुमने आज के खत में एक बहुत हंसी की बात लिखी है, कि आनन्द की पूरी कैफ़ियत पोती होने की खुशी में ही दे दो। पोती मेरे ज़रूर हुई है, और ईश्वर का शुक्र है। उसकी बड़ी उम्र हो और खुश व खुर्रम रहे, मगर हमें तो इसका एहसास ही नहीं होता कि हमारे पोती हुई है, तो फिर खुशी का एहसास कहाँ से आवे? मगर हमें यह ताज्जुब ज़रूर है कि क्या मैं चीज़ देने को तैयार नहीं, जो तुमने यह लिखा है। मौजूदा हालत तुम्हारी जो कुछ भी है, वह उस आनन्द की कैफ़ियत से बहुत बेहतर है, कि जिसको तुम चाहती हो। पहले steam वाला उभार था और अब बिजली का उभार समझ लो। और यह उससे कई गुणा अच्छा है। तुम्हारे कहने को मुझे टालना नहीं आता, इसलिये बेअख्तियार तबियत चाहती है कि फिर उस हालत में लाकर खड़ा कर दूँ। मगर इसके मानी यह होंगे कि तुमको ऊंचे से नीचे गिरायें। खैर तबियत नहीं मानती, या तो मैं प्रार्थना से इसको control करूँगा या सिर्फ एक दिन के लिये ऐसी हालत पैदा करने के लिये प्रार्थना करूँगा। अभ्यासी को चाहिये कि हर कदम ऊपर को ही जाये। इस हालत में निगरानी इसलिये की जाती है कि कोई अवधूत न हो जावे और आगे की तरक्की रुक जाये और इसीलिये लालाजी ने तुम्हारी निगरानी की।

यह तो बिटिया असल आनन्द का तलछट था और मायावी बू इसमें शामिल थी। मेरी जब यह हालत गुजरी तो मुझसे बर्दास्त नहीं होती थी और एक साहब ने अपनी समझ से अच्छा ही किया, मगर मेरी मौजूदा समझ के मुताबिक उन्होंने गलती की और वह इसको properly handle न कर सके। तुम्हारी हालत तो लालाजी की कृपा से मैंने बहुत systematically ठीक की है। यह मुमकिन है कुछ जल्दी कर गया हूँ। अब चूंकि यह हालत मुझ पर गुज़र चुकी है और तुम भी इसका काफ़ी मज़ा ले चुकी हो, मगर मुझसे अगर कोई कहे कि तुम अपनी मौजूदा हालत पर रहना चाहते हो, जिसमें कोई आनन्द नहीं नज़र पड़ता और न गैर आनन्द नज़र पड़ता है। तो मैं कभी तुम्हारी आनन्दी कैफ़ियत कायम करने के लिये तैयार न हूँगा। मैं तो अपनी मौजूदा हालत में बहुत खुश हूँ जिसका धन्यवाद गुरु महाराज को कहाँ तक दिया जावे। मैं तुमको दूसरी Stage पर पहुँचाने वाला था, जिसको [B] समझ लो। अब मेरी समझ में नहीं आता, मैं क्या करूँ। तुम्हारा कहना टालने की भी तबियत नहीं चाहती। अब तुम जैसा लिखो, वैसा करूँ। मैं सख्त मुश्किल में पड़ गया। नीचे उतारना तरक्की करने वाले को धर्म भी इज़ाज़त नहीं देता और उतारने में झटका भी लग सकता है और बेचैनी भी बढ़ सकती है। मैं आज लालाजी साहब से दर्याफ्त करूँगा कि बिना उतारे हुए कोई शक्ल ऐसी पैदा हो सकती है, गो मेरी समझ से नहीं हो सकती। बिजली की ताकत तो तेज़ की जा सकती है, मगर Steam वाली कैफ़ियत बिना उतारे पैदा नहीं हो सकती। अगर तुम अपनी पिछली दशा को थोड़ी देर को झुका दो तो मौजूदा कैफ़ियत पर अगर गौर करो तो कहीं अच्छी पाओगी। जो आगे stage आती है, उसमें सफ़ाई और सादगी कहीं ज़्यादा होती है।

अभी तो बेशुमार पर्दे तोड़ने को बाकी हैं। उनको देखते हुए अभी Spirituality की शुरुआत ही है। हर मुकाम पर इतनी देर लगाने में हजारों वर्ष चाहिए और मैं अपनी ज़िन्दगी में तुमको ‘धुर’ तक पहुँचाना चाहता हूँ। तुमने जो रोने वाली दशा अपनी लिखी है, उसमें कबीर साहब ने बड़ा अच्छा दोहा लिखा है:-

“हंसी-खेल नहिं पाइयाँ, जिन पाया तिन रोय। हाँसे-खेले पिव मिले, तो कोन दुहागिन होय।।”


तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिंतक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-205
शाहजहाँपुर
6/4/1952
तुम्हारे खत मिल गये - पढ़कर खुशी हुई। तुम्हें sitting देने में बहुत दिन गाफ़िल रहा, मगर अब दिन में कई मर्तबा देखना पड़ता है। जितना ज़्यादा तुमसे गाफ़िल रहा, उतना ही ज्यादा ख्याल रखना पड़ता है, इसलिये और बराबर हो गया। अब तो चाहे कोई दिन छूट जावे, नहीं तो मुझे हर रोज Sitting देनी पड़ती है। कुछ मेरी तबियत यह भी चाहती है कि दो-तीन points के बाद फिर ज्यादा तुम्हें न ठहरायें। खैर, यह अभी तय नहीं किया है, यह हालत देख-देख कर तय किया जावेगा। एक बात मैं तुम्हें और बता दूँ ताकि तुम्हें वाकफियत होती चले और यह मालूम होता चले कि जब तुम किसी को Stages तय कराओ तो तुम्हें क्या करना चाहिए। मैं नातजुरबेकारी की वजह से कुछ गलती भी कर जाता हूँ। बात यह है कि मुझमें जो कुछ भी ताकत गुरु महाराज ने दी है, उसका अन्दाज़ा नहीं हो पाता। मैंने जब [B] point पर तुम्हें खींचा और फिर वहाँ तवज्जो दी तो मैं ज़्यादा दे गया। चुनान्चे point [B] की हालत में ज्यादा concentrated force पैदा हो गया। अब इसको फैलाया जावे, तब यह सैर हो। आज यह सुबह उठते वक्त ख्याल आया। सही तो हो ही जावेगा, इसलिये कि लालाजी साहब सब कुछ कर सकते हैं।

तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिंतक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-207
शाहजहाँपुर
11/4/1952
तुम्हारा खत आया-उसने काफ़ी ढाढ़स दिया। मुझे फिकर बस इतनी रहती है कि लोग ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठावें। कभी यह भी ख्याल होता है कि जो कुछ थोड़ा बहुत मुझे मालूम है, यह सब सीने में रखकर कहीं ले न जाऊँ। कुछ कायरों का यह भी ख्याल है कि मैं जब चाहूँगा एक मिनट में सब कुछ कर दूंगा। ऐसा अगर गुरू महाराज की प्रार्थना की मदद से कर भी दिया जावे, तो उसका कुछ फायदा सिवाय इसके कि बहुत ऊंची पहुंच वाला संत हो जावे और कुछ दिखाई नहीं पड़ता। अगर पूरी ताकत लगा दी जावे तो ज़रूर उसका फायदा हो सकता है, मगर ऐसी दशा में मौत यकीनी है। जब तक रास्ता और घाटी-घाटी अपनी मेहनत करके नहीं देखता, तब तक हर हालत पर Command (प्रभुत्व) नहीं होता और किसी ख़ास हालत को दूसरे पर तारी करने के लिये हिम्मत पैदा नहीं होती। मुझमें कैफियत तारी करने की शक्ति गुरू महराज ने दी है। यह उनका काम था, मैंने उनकी मेहरबानी से अपना लिया, जिसका नतीजा उनकी कृपा से यह है कि मुझे हर कैफियत से वाकफियत है और इसीलिये दूसरों पर फौरन तारी हो सकती है। सच बात यह है कि इस विद्या को ग्रहण करने के लिये सच्चे जिज्ञासु नहीं मिलते। लोगों को अभी तक मज़ा आ गया होता अगर मेहनत और मोहब्बत से काम लेते। मिशन तो तरक्की करेगा ही, मगर अच्छा यह होता कि इस तरक्की को हम खुद देख लेते और लोगों में वह हालतें पैदा कर देते जो मुमकिन है आइन्दा इतनी जल्दी न हो सके।

तुम्हारे खत पढ़ने से तुम्हारी सब हालत मालूम हो गई। यह अंधेरे की हालत मुमकिन है पहले भी पैदा हुई हो, मगर मेरी जल्दी की वजह से तुम्हें भास न हुई हो। यह असल हालत की एक भद्दी तस्वीर है और पहले से यह चीज़ ज़्यादा सूक्ष्म है, इसमें अभी और तरक्की होगी। अभी असलियत बहुत दूर है। मुझ पर यह हालत गुज़र चुकी है, और मुझे याद है और खत लिखाते वक्त इस हालत का फिर भास होने लगा। जो एक चक्र पर हालत है, वही सूक्ष्म होते हुए हर चक्र पर मिलती है। यहाँ शायद षटचक्र कहे गये हैं। लय-अवस्था और लय की लय-अवस्था तुमको बड़े दरबार से पहले ही बख्शी जा चुकी है और बका भी। अब बका की हालत की लय-अवस्था हो रही है। ऐसी जाने कितनी बका और उनकी लय-अवस्था अभी और होंगी, उसका छोर नहीं और सच्चे जिज्ञासु को चैन तो उसी समय मिलता है, जब कोई हालत नहीं रहती। अगर मैं यह कहूँ कि सोलह Circles & Seven Rings (सर्किल और सात रिंग्स) पार करने के बाद चैन मिलता है और वह चैन ऐसा है कि किसी हालत में बेचैन होने ही नहीं देता तो पुराने आध्यात्मिकता के इतिहास मुबारक देंगें, क्योंकि यह इज़ाद हमारे लाला जी की है और आप ही ने ज़िन्दगी रखते हुए यह चीज़ मुमकिन कर दी। मैं तो यही चाहता हूँ कि सब लोग इनको Cross (पार) करें, मगर मेरे चाहने से क्या होता है। यह तो ईश्वर की देन है, वह जिसे चाहे दे दे।

तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-208
शाहजहाँपुर
13/4/1952
पत्र-मिला, पढ़कर खुशी हुई। तुमने अपने कुल खत का जवाब खुद दे लिया है, वह यह है, “मेरी निगाह तो उस आफ़ताब में गड़कर विलीन हो गई है!” इसको तुमने सुषुप्ति कहा है। यह सुषुप्ति नहीं, बल्कि Forgetful State (भूल की दशा) है। हर मुकाम पर एक लय अवस्था होती और You gain Mastery over that region by absorbing in it. The Same is the Condition now, Sushupti is everywhere in the human approach but it gets thinner and thinner as we advance. At higher pitch it is named as Turia (तुमने उस मुकाम पर लय होकर उस स्थान पर प्रभुत्व प्राप्त कर लिया है। यही अवस्था अब है। सुषुप्ति की अवस्था मानव की पहुंच के भीतर है। जैसे-जैसे हम उन्नति करते जाते हैं वैसे ही वैसे वह सूक्ष्म से सूक्ष्म होती जाती है। इसकी उच्चतर अवस्था को ‘तुरिया’ कहते हैं।)

मैं जो High (ऊंची) चीज़ सोचता हूँ, उसको खुद लिख नहीं पाता हूँ। अम्मा को प्रणाम, छोटे भाई-बहनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-212
शाहजहाँपुर
4/5/1952
तुम्हारा खत 23 व 30 अप्रैल दोनों का मिल गया। तुमने अपने अप्रैल के खत में जो जवाब दिया है, वह बिल्कुल सही है। अगर मैं उस सवाल का जवाब लिखूं, जो तुमसे पूछा है, तो उसी चीज को बस दूसरे तरीके में लिख देना होगा। मैंने मास्टर साहब को एक खत लिखा था कि मैंने तुम्हें 'C point' (सी प्वाइंट) पर खींच दिया है। यह दोनों तारीखों के खत उसी जगह की हालत बता रहें हैं। अब जितना आगे बढ़ती जाओगी उतना एहसास तो रहेगा, मगर उसकी अभिव्यक्ति (expression) के लिए शब्द मिलना मुश्किल होंगे। मैं जब यह सोचता हूँ कि तुमको, बशर्ते कि तुम्हारी यह हालत रही और यही शौक और ईश्वर से प्रेम रहा, जिसकी उम्मीद भी है, तो तुमको धुर तक पहुंचाना है, तो मेरे होश उड़ते हैं। वैसे तो लाला जी के लिए धुर तक पहुंचा देना एक क्षण का काम है, मगर उसमें यह बात होती है कि हर बात पर प्रभुत्व देने (Command) की हिम्मत पैदा नहीं होती। हालांकि अब तक जिसको भी जल्दी से ऊंचा पहुंचाया गया उसमें से ज़्यादातर ऐसे लोग हैं, जिनको कि मैंने सैर भी करा दी, मगर वह ज़्यादा कारगर यों साबित न हुए कि हर एहसास पर उन्होंने लय-अवस्था कायम नहीं कर पाई। वजह उसकी यह थी कि उन्होंने अपनी आदत Constant Remembrance (सतत् स्मरण) की न डाली थी। Constant Remembrance (सतत् स्मरण) तो बड़ी सहल चीज़ है। मेरी समझ से उसको कायम करने में दस-बारह रोज़ से ज्यादा नहीं लगते। मगर यहाँ कोई करना नहीं चाहता। उन्होंने समझ लिया कि जिसको गरज़ होगी वह अपने आप देगा, हम मेहनत क्यों करें। किसी ने बातों से खुशामद करके हमें पोटना (बहकाकर) चाहा और किसी ने अपने जिस्म की Activity (वाह्य क्रिया-कलाप) ऐसी बना ली कि गोया फर्माबरदार (आज्ञाकारी) हैं। और मैं इसको खूब समझता हूँ और मेरी चाहे गरज़ समझ लो कि जब मैं यह समझता हूँ कि यह आगे नहीं बढ़ते तो मैं जल्दी से उसको खींचता चला जाता था। जल्दी मैं अब भी करूंगा, मगर उस वक्त जब कि अभ्यासी खुद जल्दी करे। मगर यह ग़लती कि कोई खुद आगे बढ़ने की कोशिश नहीं करता और मैं उसको खीचता चला जाऊं, सम्भव है कि आइन्दा न हो। चौबे जी के साथ में जो मैंने जल्दी की वह इसलिये कि उनपर मुझको बहुत तरस आता था। इसलिये कि उन्होंने असलियत के हासिल करने के लिये बड़ी खाक छानी है। मगर यह जरूर है, साथ ही साथ कि असलियत के जानने की कोशिश नहीं की वरना मेरे मिलने में पहले उनको कोई रास्ता दिखाने वाला मिल गया होता। मैंने प्रकाश की शादी में एक दरख़्त के नीचे बैठालकर उनको Sitting (सिटिंग) दी थी, उसमें उनकी रूह को यह तवज्जो दी थी कि Central Region (मुख्य केन्द्र) तक पहुंचना है। दूसरे मानों में उनके धुर तक पहुंचने का रास्ता बना दिया है। साथ ही मैंने उनकी सुरति को Constant Remembrance (सतत् स्मरण) में लगा दिया है।

मैंने जो यह कहा है कि “मैं” तुम्हें धुर तक पहुंचाना चाहता हूँ, मगर मेरे होश उड़ते हैं। इसका मतलब यह है कि अभी तुमको बहुत चलना है और मैं यह सोचता रहता हूँ कि कितना-कितना समय लगाया जावे ताकि तुम्हें जानकारी भी होती चले और पहुंच भी जाओ। अक्सर यह सोचने लगता हूँ और मैं तो हर शख़्स के लिये यह चाहता हूँ कि वह धुर तक पहुंचे और हर कोशिश करने के लिये तैयार हो, मगर कोई मुझसे काम ही नहीं लेना चाहता। मैं बीमार कितना ही रहूँ, तुम्हें फिक्र नहीं करनी चाहिये, इसलिये कि अभी मेरा वक्त नहीं है।

एक बात लिखने से भूल गया कि मैंने रात सिटिंग (Sitting) ‘C’ स्थान के सैर की दी हैं। इससे पहले मैं एक काम में लगा हुआ था और दिमाग भी कम काम देता था, इसलिये मैंने नहीं दी। बड़े-बड़े स्थान लिये लेता हूँ और अगर हर छोटा मुकाम लिया जावे, जो बड़े स्थान के अन्दर है, तब तो शायद दस हजार वर्ष की ज़िन्दगी भी काफी नहीं है, मगर साथ ही घुमा सब में देता हूँ। सैर का हाल लिखना, इसलिये कि अब तेज़ी से कराना चाहता हूँ जिसमें जल्दी हो जावे। मुमकिन है कि इस मुकाम की सैर के बाद सात-सात, आठ-आठ रोज़ के बाद दूसरे मुकाम की हालत आती रहे। अब इस जल्दी में यह काम तुम्हारा है कि इसमें लय-अवस्था प्राप्त करती रहो। मैंने पंडित रामेश्वर प्रसाद के मुकामात जब तय कराये तो ‘K’ तक तो मैंने गिने थे, उसके आगे मैंने गिनना छोड़ दिया।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-215
शाहजहाँपुर
7/5/1952
तुम्हारा खत 4.5.52 का बज़रिये डाक पहुंचा और 7.5.52 का खत माता जी के द्वारा मिला। तुमने ताऊजी की दशा जो लिखी है, उसमें कुछ तो सही है। उनके संस्कार बनना करीब-करीब बन्द हो चुके हैं, और साम्यावस्था जो लिखी है, उसकी बहुत सी किस्में हैं। बहुत नीचे किस्म की साम्य अवस्था उनमें अन्दर मौजूद मालूम होती है, क्योंकि मैंने इस किस्म की उनको तवज्जो भी दी है।

तुमने अपनी हालत Inactive (स्वतःचालित) होने की जो लिखी है, हमारे यहाँ Inactivity (स्वतःचालित) बिल्कुल शुरू से चलती है, पहले ही दिन से। यानी जिस हालत पर कि पहुंचना है, उसका बीज शुरू में ही बो दिया जाता है। जितना Advancement (उन्नति) होता जाता है, उतनी ही वह चीज़ ज़्यादा मालूम होती है। किसी चीज़ के याद आने में जो हालत उतरी हुई मालूम होती है, उसकी वजह यह है कि एकाग्रता कुछ Disturb (भंग) हो जाती है। तुमने यह जो लिखा है कि “मेरी तामसी हालत मालूम पड़ती है, इसलिये कि कभी-कभी नींद में रहने की तबियत चाहती है और कभी तबियत चाहती है कि हाथ-पैर कुछ न हिलाऊं।“ यह तामसी हालत नहीं है, बल्कि इन्द्रियों की बहुत कुछ लय-अवस्था हो जाने की दलील है और तुमने यह जो लिखा है कि “जो किसी के दिल में होता है, वैसी ही मैं बातें करने लगती हूँ।“ यह शुद्ध हृदय होने की पहिचान है। मेरी हालत यह किसी वक्त बहुत तेज़ थी और अब न जाने कहाँ चली गई। ताज्जुब यह है कि लाला जी में यह बात आखिर वक्त तक रही और मुझमें अब यह बात महसूस नहीं होती। तुमने सात मई को खत में जो Inactivity (स्वतःचालित) को भी गुम करना लिखा है, यह तो बहुत अच्छी चीज़ है। बाकी उस कुल खत का जवाब यह है कि मन जब तक उस जगह पर नहीं पहुंच जाता जहाँ से कि वह आया है तब तक उसकी Seriousness (गहन अवस्था में विलीन होने का) के भाव कुछ न कुछ मालूम पड़ते हैं।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-218
शाहजहाँपुर
16/5/1952
तुम्हारे खत मिल गये। जवाब की कोई ज़रूरत तो है नहीं, मगर खैर कुछ लिखे देता हूँ।

कोई दुनियाबी मामलात में परेशान, कोई कुछ और ज़रूरी बातों में अपनी तबियत लगाता है, और मुझे यह फ़िकर। जब तुम्हारी हालत, मैं Read (पढ़ता) करता हूँ, तो हो जाती है कि अगले मुकामात में कितने दिनों रोका जावे, क्योंकि जो मुकामात आगे आ रहें हैं, उनमें कुछ ज़्यादा मुफीद मालूम होता है और मेरा ख्याल यह है कि जैसे मैंने अपनी जवानी और लड़कपन में गुरू-कृपा से काम निपटा लिया; ऐसा ही मैं चाहता हूँ कि जो लोग आगे बढ़ने की हिम्मत रखते हैं, उनका काम भी जल्दी निबटा दूं। अब मास्टर साहब के काम में बहुत जल्दी की गई, उससे फायदा यह हुआ कि मुझे ज़्यादा Sitting (सिटिंग) देनी नहीं पड़ती हैं। कभी-कभी कुछ मदद दे देता हूँ या उसके निखारने की कोशिश करता हूँ।

मैं तुम्हारे ‘C’ point (सी प्वाइंट) पर अक्सर तवज्जो देता हूँ। सैर की हालत अभी शुरू नहीं हुई है, मगर अब शुरू होना चाहती है। मैंने लिखा था कि सात-सात, आठ-आठ रोज़ हालत पर रखूंगा। ‘C’ (सी) के बाद उससे अगली हालत में खींच लूंगा। मगर मैं गौर करता हूँ तो अगला मुकाम है उसमें और भी Broader Vision (व्यापक नज्ज़ारा) मौजूद है। अब मेरी समझ में नहीं आता कि क्या करना चाहिये। मैं लाला जी से इस बारे में Dictate (डिक्टेट) लूंगा कि उन्होंने मेरे मुकाम किस तरीके से तय कराये। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

शुभचिन्तक
राम चन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-224
शाहजहाँपुर
29/5/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी खुश रहो।

तुम्हारे पत्र मिल गये। 17 जून का जो खत है, उसकी सिर्फ दो बातों का जवाब दे रहा हूँ। सिर में नन्हीं-नन्हीं फुहार जो गिर रही है, उसकी वजह यह है कि जब तुम मास्टर साहब के यहाँ बैठी थी, तो तुमने बतलाया था कि सिर में कुछ गर्मी मालूम होती है। उस वक्त मैंने ज़रा ठण्डी और नन्हीं-नन्हीं फुहार गिराई, ताकि गर्मी की तकलीफ़ जाती रहे। अब चूंकि तुममें प्रेम की वजह से आकर्षण शक्ति बढ़ी हुई है, और ग्रहण करने का माद्दा भी बढ़ा है, इसलिये यह चीज़ कुछ कायम हो गई है। ख्याल में जिन्दगी होती है और अगर वह माया से सम्बन्धित नहीं रहती तो उसमें ईश्वरीय शक्ति की वृद्धि हो जाती है। इसलिये यह हो ही नहीं सकता कि उसका असर न पड़े और यह तुम्हारी काबलियत है कि तुमने उस असर को अब तक कायम रखा। तुमने उसी खत में जो लिखा है कि एक अजीब कैफियत के मैदान में निश्चिन्त तैरती चली जा रही हूँ, जिसका कहना शब्द और वाणी से परे है। यह तो बहुत ही अच्छी हालत है। लालाजी साहब ने किसी वक्त कहा था कि आध्यात्मिक-उन्नति क्या है? बस एक चटियल मैदान है, जिसमें बस चले ही जाना है - मगर अभी दिल्ली दूर है। यह चटियल मैदान जो निगाह के सामने है, इसी में बस तैरते जाना है। अब रास्ता खुल गया और रूहानियत की शुरूआत ठीक-ठीक हो गई, अब इसमें जितनी तरक्की है, वह रूहानियत से सम्बन्ध रखेगी।

Dictate from Lalaji (श्री लाला जी का डिक्टेट):

“मगर किसी हालत को काफी नहीं समझना चाहिये। “रामचन्द्र” ऊपर लिख चुका है कि अभी दिल्ली दूर है - जो सही है। अभी तुमने देखा ही क्या है, देखने वाली हालतें तो अब आ रहीं हैं, जिसके एहसास करने के लिये बड़े दिल वाले की ज़रूरत है और बड़ी समझ की और Intelligence (बुद्धिमानी) की। हमारे यहाँ यह हालतें सब पर गुजरती हैं, मगर लोग एहसास करने की काबलियत नहीं रखते, इसलिये उनका मज़ा फीका पड़ जाता है। बाकी जो 23 जून का खत है, उसके जवाब की कोई ज़रूरत नहीं। उसमें तो एक हालत का Description (वर्णन) है। अब मैं लिख चुका - खुश रहो। रामचन्द्र जो समझेगा, जवाब देगा।“

कल ता. 28 दिन शनिवार को किसी वक्त मुझे यह मालूम हुआ कि तुममें कुछ ख्याली थकान सी है, आज यह चीज नहीं है। ज़्यादा तेजी से जाने में यह हो जाता है कि कुछ थकान सी मालूम होने लगती है। उसमें फिर Energy (शक्ति) बढ़ा दी जाती है। मुझे भी यह चीज़ बड़े-बड़े मुकामात को तय करने में महसूस हुई है और इसमें कोई हर्ज नहीं। अभी मेरी समझ में यह नहीं आया कि ‘D’ के मुकाम पर कब तक रोकूँ खैर, यह दो एक रोज़ में तय कर लूंगा। फिर जैसी मुझे रोशनी मिल जावे वैसा काम करूँगा।

अब 24 जून का खत जो मिला है, वह तो बड़ी अच्छी हालत है। मैं भी इस हालत को तरसता हूँ। यह इतनी उम्दा हालत देखने में आई है कि मैं इस हालत पर सैकड़ों सल्तनतें अगर मेरे पास होतीं तो न्योछावर कर देता मगर इसकी मानी यह न समझ जाना कि अब कुछ करने को बाकी नहीं रहा, बस यही काफ़ी है।

हंसी-खेल नहि पाँइयाँ, जिन पाया तिन रोय । हाँसे खेले पिऊ मिलें, तो कौन दुहागिन होय।।

शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-230
शाहजहाँपुर
17/7/1952
परम पूज्य समर्थ श्री लालाजी साहब का Dictate (डिक्टेट) :-

"दुख्तरे नेक अख्तर नूरचश्मी कस्तूरी (भाग्यवान बेटी)
ब आफियत बाशन्द (प्रसत्र रहो)"

मेरा इरादा था कि कुछ लोग रामचन्द्र से बन जाते तो अच्छा था, मगर मेरी हिरास की हिरास है। अभी उम्मीद कर सकता हूँ कि कुछ लोग बन जावें, मगर रामचन्द्र की माद्दी (जिस्मानी) कमज़ोरी देखकर, यह ख्याल पैदा होता है कि इस कदर बार (बोझ) उसकी तन्दुरुस्ती कैसे बरदाश्त कर सकेगी। रूहानियत में तो वह जवान है और जवान ही रहेगा मेहनत ज़रूर जिस्म की तन्दुरूस्ती पर मबनी (निर्भर) है। यहाँ तो लोग यह समझते हैं कि रूहानियत मुंह का निवाला है, जब चाहेंगे मुंह में रख लेंगे। मेहनत करना कोई जानता ही नहीं। जिला देना (चमक देना) कोई पढ़ा ही नहीं। बस आला तरक्की का नाम सुन लिया है और किताब पढ़कर यह समझ लिया है कि ज़्यादा से ज़्यादा हमें यहाँ तक पहुंचना है। बजाय दुनिया की बेलौसी के ‘मालिक’ से बेलौस हो रहे हैं। इसने (रामचन्द्र ने) खतूत भी लिखे, समझाया भी, मगर जूं नहीं रेंगी - अब सिवाय इसके और क्या कहा जावे कि मर्ज़ी ईश्वर की ऐसी है। आदमी थोड़े हों या बहुत हों, इससे बदर्जहा बेहतर है कि बहुत हों और थोड़े बनें। इसके यह माने नहीं कि लोग ज़्यादा शामिल न किये जायें, तो दरवाज़ा तो सबके लिये खुला है। अब मान लो कि तुम पर उम्मीद रखी जावे तो तुम्हारी ही तन्दुरूस्ती नागुफ्ताबे है(नाकाबिल इतनी कि जिसके विषय में कुछ कहा न जावे), परन्तु तुम्हारा शौक और ‘मालिक’ की मोहब्बत यह जरूर है कि बहुत कुछ करके दिखा दोगी और हमें तुम्हारी तरक्की की उम्मीद रखनी भी चाहिये, और यह भी अगर लड़के न सही तो लड़की ही सही। लड़का और लड़की में कोई फर्क नहीं है, सिर्फ़ ज़माने ने अलग करके दिखला दिया है। एक ही अज़ो (अंग) की दो हडिड़याँ है, जो एक ही जड़ से निकलती हैं, कोई ज़्यादा फर्क नहीं। काम ऐसा होना चाहिए कि मिशन को जिला तैयार किये-कमोवेश जरूरत के लिए, तो अव्वल तो कोई इनसे काम लेने वाला नहीं मिलता और मिलता भी है तो वही डेढ़ ईट की मस्जिद बनी बनाई अपने साथ ले कर लाता है। अगर इन लोगों (तालीम देने वालों) में से भी मैं चुनूं तो सिर्फ एक मास्टर साहब रह जाते हैं, जिनसे आगे उम्मीद पाई जाती है, मगर हर शख़्स को हर काम मल्का नहीं होता, जो जिसका काम है, वही ठीक कर सकता है। एक आदमी को अगर सब काम सुपुर्द कर दिये जावें तो वह कोई भी काम ठीक न कर सकेगा। Dictate - Swami Vivekanand जी – “There should be certain blocks for certain work”, ( स्वामी विवेकानंद जी का डिक्टेट - ख़ास काम के लिये खास व्यक्ति होने चाहियें )।

यहाँ तो यह हाल है कि लिखे भी एक शख़्स, मदद करें भी तो एक ही शख्स। Function (उत्सव) का Celebration (मनाना) और उनका इन्तज़ाम भी करें तो एक ही, क्योंकि उसके दिल से लगी है और दूसरे लोग उसको कैफ़ियत नहीं देते, यह ज़रूर हैं कि चोंबे जी की भी दिलचस्पी बहत कुछ इस तरफ़ हैं, मगर रामचन्द्र को भी उनसे कुछ कम दिलचस्पी नहीं। वह तरक्की कर रहें हैं और उनका ख्याल मिशन की अच्छी तरक्की के लिये भी हैं। मेरे ख्याल से हमेशा एक दरवाजे पर रहने वाले की क़द्र ज़्यादा होती है। मैं तो ऐसे आदमी को पसन्द करता हूँ कि जैसा कि रामचन्द्र, उसकी गर्दन पर कोई छुरी भी रख दे तो भी सही बात कहने से न हटेगा - कुछ परवाह नहीं कि कोई ख़िलाफ हो या बुरा माने, नतीजा यह है कि मुमकिन है कि उसके उसूल से मुआफिकत लोग न करें, परन्तु उसके खिलाफ कोई भी नहीं होता। अब कहो, तुम्हारी तरक्की की तारीफ़ करूं ताकि तुम्हारी तबियत खुश हो जावे। मैं समझता हूँ कि तुम्हारी तारीफ़ इतनी ही बहुत है कि मैं तुमसे खुश हूँ। आज सुबह प्यास की तेज़ी रामचन्द्र में इस कदर बढ़ी; किस बात की? काम लेने की। वह इसके ढंग जाने क्या-क्या सोचने लगा। कहीं यह ख़याल था कि किसी को ख्याल की ताकत से काम लेने के लिये तैयार करूं, कहीं यह कि किसी और जरिये से मिशन की Service (सेवा) ली जावे और उसके पास तमाम उम्र यही काम रखा जावे। अब इसमें अपने आपको कौन-कौन Offer (प्रस्तुत) करते हैं। किसमें कौन सी ताकत अच्छी है, सोचकर लिखें ताकि वही काम सुपुर्द किया जाये और इसमें मेरी दोनों आँखें बराबर हैं यानी लड़के और लड़कियाँ दोनों शामिल हैं। लड़कियाँ ज़रूर कुछ Restrictions (बंधन) के साथ और लड़के किसी कदर आज़ादी के साथ। Duties (डयूटीज़) मैं लगाऊंगा।

शेर – “मन आँ मोरम कि अज़ पायम बेमालन्द। न जम्बूरम कि अज़नेशम बेनालन्द ।“

अर्थ - मैं वह चींटी हूँ कि लोग मुझे पाँव से मसल डालें - मैं वह बरैया नहीं हूँ कि लोग मेरे कारण दु:ख पावें।

शुभचितंक
समर्थ श्री रामचन्द्र जी महाराज
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-233
शाहजहाँपुर
24/7/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत मिला। मैंने आज ही तुमको Point ‘E’ ( प्वाइंट ई ) से निकाल कर ‘F’ ( एफ ) पर पहुंचा दिया है। अब जो तुम्हारा अनुभव हो लिखना। मैं सोचता तो यह हूँ कि इन मुकामात पर ज़्यादा न रोकूँ। मगर कहीं पर रोकने की ज़रूरत पड़ गई तो मजबूरी हो जावेगी। हमारे यहाँ संत्सग में इन मुकामात की कदर नहीं। यहाँ तो लोग पहले ही मुकाम से निकलना नहीं चाहते। ऐसे भी हैं जो शुरू से शान्ति का मज़ा चाहते हैं और अगर कहीं पहली या दूसरी Sitting ( सिटिंग ) में ही उन्हें शान्ति न मालूम हुई तो मैं बिल्कुल बेकार और निकम्मा उनके ख्याल में आता हूँ। मैं भी भाई कोशिश करता हूँ कि पहली ही Sitting ( सिटिंग ) में उनको कुछ शान्ति मालूम हो। मजबूरन लाला जी की बरकत उन पर उतरने लगती है। मगर इसको भी एकाध ऐसे भी मिले जो अपनी काब्लियत समझ बैठते हैं कि एक महात्मा का ख्याल ले कर आया था, इसलिये यह शान्ति मालूम हुई और यह चीज़ भाई मेरे ही साथ है। देखा है कि लोग महात्माओं के पास, जो इस वक्त मशहूर हो रहे हैं, मसलन सुखदेवानंद, नारदानंद इत्यादि जाते हैं और महीनों जाते हैं , मगर वहाँ के लिए यह शान्ति का सवाल क्यों नहीं उठता। तुम्हारी समझ में इसकी क्या वजह मालूम होती है। एक या दो Sitting ( सिटिंग ) में शान्ति पैदा होना बड़ा मुश्किल है। यह तो अभ्यास के करने की चीज है। मेरा काम सिर्फ़ यह है कि ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर दूं, कि यह चीज़ पैदा होने लगे। मैं समझता हूँ यह शान्ति जो उन लोगों में पैदा हो जाती है, सिर्फ इस बात पर कि ‘लालाजी’ मुझको उनकी नज़रों में नाकाबिल ठहराना नहीं चाहते। इसका ‘उनको’ हज़ार बार धन्यवाद है। और भाई मेरी उम्र तो पूरे 22 वर्ष अभ्यास के अशान्ति में ही कटे थे और इसमें वह मज़ा था कि शान्ति में नहीं मिलता।

एक बात तुमने किसी खत में पूछी थी, वह लिखने की याद ही न रही। अब लिख रहा हूँ। तुमने पूछा था कि अब क्लोरोफार्म का असर तो नहीं है? इसमें कमी तो ज़रूर हुई होगी मगर अभी महसूस नहीं हुई। मैं तुमको काम करने का तरीका बताता हूँ । कोई काम करो तो यह समझ लो कि तुम मेरी ही Will ( इच्छा शक्ति ) से काम ले रही हो । यह नुस्खा किसी को रूहानी तरक्की देने में या ईश्वरीय काम करने में बहुत जल्द Desired effect ( इच्छानुसार प्रभाव ) पैदा कर देता है। अगर किसी शख़्स की, ईश्वर कृपा करे जब सोलह आने भर लय अवस्था अपने गुरू में हो जाती है तब इसकी ज़रूरत नहीं रहती। इससे पहले अगर किसी को Sitting ( सिटिंग ) भी दी जावे तो यही समझा जाता है कि सिखाने वाला दे रहा है। इसका असर बहुत अच्छा होता है। यह बात हर सिखाने वाले को जानना चाहिये। इसके ख्याल रखने की ज़रूरत है और तवज्जोह देते वक्त यह समझ लिया जाता है कि मैं नहीं हूँ , बल्कि मेरा सिखाने वाला है , जो तवज्जोह दे रहा है। संक्षेप में यह कि अपने आपको उस वक्त गुरू का रूप समझ लेना चाहिये। अर्थात् मान लो कि मैं तवज्जोह दूं तो मुझे यह समझना चाहिये कि मेरा जिस्म, ख्याल, दिल व दिमाग़ जो कुछ भी है, यह सब स्वयं “लाला जी” हैं और फिर तवज्जह देना चाहिये।

तुम्हारा ता. 23.7.52 का खत भी मिला। सुस्ती की शिकायत जो तुमने लिखी है - यह Soul ( आत्मा ) का ख़ासा है। जब हम उसके निकट होते जाते हैं तो उसका खवास जो कि inactive ( अकर्मण्य) है अनुभव होता है और हमारे ज़ाहिरा तौर व तरीकों में वह असर दिखलाता है। अम्मा को प्रणाम ।

शुभचितंक रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-238
शाहजहाँपुर
31/7/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत ता. 26.7.52 का लिखा हुआ मिला- यह Point ‘E’ की हालत है। खुश्क हालत तो बहुत अच्छी है, इसको बेकैफी की हालत कहते हैं यानी कोई कैफियत न होना। इस हालत का पूरी तौर पर कायम हो जाना ही कमाल है। तुमने जो आकर्षण शक्ति ‘मालिक’ में होने के बारे में लिखा है, मुमकिन है कि हो-फिर अनुभव करके लिखना। तुमने जब लिखा तो मैंने गौर किया तो मुझे भी मालूम हुई; कृष्ण जी के वक्त में यह बात जरूर थी। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

शुभ चिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-239
शाहजहाँपुर
31/7/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

30 जुलाई का पत्र मिला। तुम्हारा ठहराव जैसा कि मैं लिख चुका हूँ Point ‘F’ पर है, मगर मेरी तवज्जो अभी Point ‘F’ की सैर के लिए काम नहीं दे रही है, और वह मुकाम अच्छी तरह से अभी नहीं खुल रहा है। वजह कुछ नहीं मालूम होती है। तुमने लिखा है कि अब तो दशा न हरी लगती है न सूखी, इसके माने यह हैं कि आत्मा के निकट पहुँच चुकी हो। मगर अभी तुम्हारे ख़्याल में हरे और सूखे की तमीज बाकी है। हालत यह है कि उसकी भी तमीज़ न रहे। ईश्वर यह चीज़ भी देगा बशर्ते कि ईश्वर करे कि तुम इसी भाँति लगी रहो। तुमने लिखा है कि “कुछ अब तो शायद चटियल मैदान भी मेरे में हजम होता सा लगता है।“ यह ऐसी दशा है कि जब किसी की बस्ती या घर चटियल मैदान ही बन जाता है, तो रहते-रहते वह चीज और जगह ऐसी मालूम होती है कि गोया यह अपनी ही है और फिर उसका एहसास नहीं होता। चरियल मैदान का हजम करना जो तुमने लिखा है यह किस एहसास से तुमने लिखा है? लिखना। अगर इसके माने यह है कि “बिन्दु में सिन्धु” समा गया है, तब तो बहुत अच्छी हालत है।

तुमने लिखा है कि मेरा ख्याल अब अकस्मात् ‘मालिक’ के ख्याल में घुस गया है, यह भी बहुत अच्छा है। जब जिस्म गायब हो जाता है, यानी अपने जिस्म का भान नहीं रहता और ख्याल भी ‘मालिक’ में बहुत कुछ चिपट जाता है तो ऐसा महसूस होता है। इसकी शुरुआत है, अभी पूरी हालत नहीं आई। यह सब ईश्वर के हाथ में है, इसमें अपना वश नहीं वह जिसे दे देवे। मैंने जो तुम्हें लिखा था कि मेरा ख्याल समझ कर किसी काम को करो, यानी यह समझ लो कि मेरा ख़्याल ही काम कर रहा है। इसके बारे में तुमने यह लिखा है कि आत्मिक उन्नति के लिये यह बढ़िया नुस्खा है - यह बात मेरी समझ में नहीं आई है -लिखो ताकि समझ जाऊं। एक चीज आत्मिक-उन्नति के लिए बहुत हानिकारक है। वह है अहंकार और इल्मी-काब्लियत का जो अहंकार होता है, वह तो बहुत ही खराब होता है। लोगों को इसका पता नहीं चलता है, मगर अपना रंग ले हो आता है। दूसरी चीज़ जो और भी ज़्यादा हानिकारक है वह है हसद या Jealousy | स्वामी विवेकानन्द जी ने Transcendental person (श्रेष्ठ व्यक्ति) की तारीफ यह लिखी है “One who is jealous to none” (जिसको किसी से ईर्ष्या न हो) जो शख्स अपनी यह दो बातें दूर नहीं करता उसका कोई एतबार नहीं कि कब ऐसा गिरे कि उठ न पावे। हम अगर यह देखें कि किसी शख्स पर ईश्वर की बड़ी मेहरबानी है, तो हमें खुश होना चाहिए। यहाँ तो यह हाल है कि अगर यह नुक्स किसी में हो और मैं इसलिए कह दूं कि वह भी इसके दूर करने की कोशिश करे तो शायद उसे इस क़दर बुरा मालूम हो कि वह मेरी शक्ल देखना पसन्द न करे। अब मुझसे इतनी मेहनत नहीं होती कि मैं अगर किसी में समझ लूं कि यह नुक्स है तो मैं तो अपने आध्यात्मिक बल से दूर करूँ ऐसे कि उसको खबर न हो और मैं इसीलिए, अगर मुझे किसी का कोई नुक्स मालूम हो जाता है, उससे कहता नहीं हूँ बल्कि अपनी कमजोरी समझ लेता हूँ। तुम्हारे भाई-बहनों को आशीर्वाद ।

शुभ चिन्तक
रामचन्द्र

उसूल यह है कि सिखाने वाले से जितने तालीम पा रहे हैं और खासकर वह लोग जो Initiated (गुरु द्वारा दीक्षित अभ्यासी) हैं, उम्र में कितने ही बड़े हों, उसकी आध्यात्मिक औलाद हैं। मैंने इस सब बातों का ख़्याल न करते हुए उम्र व बुजुर्ग का हमेशा ख्याल रखा। कोई मुझसे कुछ कह ले, मैं बिल्कुल बुरा नहीं मानता। कोई गाली दे या मारे, इसका कुछ असर हमारे ऊपर होने का नहीं- अगर यकीन न हो तो इसको कोई आजमा कर देख ले और लगेगा भी, क्योंकि मैं इन्सान हूँ, तो भी मिनट-दो मिनट के लिए और फिर जैसा का तैसा।
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-243
शाहजहाँपुर
13/8/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

खत तुम्हारे सब मिल गये। तुमने जो लिखा है कि बेख़्याली की सी दशा महसूस होती है। यह हालत बहुत अच्छी है, मगर अभी तुम में बेख्याली की तमीज बाकी है, अर्थात् ख़्याल और बेख़्याल दोनों का अन्दाज़ अभी तुममें बाकी है। यह चीज़ भी नहीं रहनी चाहिये तब Originality (वास्तविकता) की शुरूआत समझो। हिम्मत है तो यह चीज़ भी ईश्वर देगा। यह इतनी बारीक चीज है कि हर शख्स को इसका अन्दाजा भी नहीं हो सकता। इसका मज़ा चखने वाला ही समझ सकता है। ईश्वर करे यह हालत पैदा हो जावे। एक बात मेरे समझ में आ गई वह तुम्हारे खत से ताल्लुक नहीं रखती, मगर लिखे देता हूँ। तुम्हारी और श्यामपती जी की गुफ्तगू नारायण ने सुनाई थी कि श्यामपती जी को ताज्जुब हुआ कि जब तुमने उनके यहाँ का वातावरण बता दिया। एक बात का तजुर्बा करना, मेरा तजुर्बा नहीं है और मैं भी देखूंगा, यह चीज़ नई ख्याल में आई है और इसको याद भी रखना, मुमकिन है मैं भूल जाऊं। किसी चीज़ की मौजूदगी या असर वातावरण पर असर डालती है। जो मनुष्य या औरत सामने आवे तो उसके ख्याल जैसे भी हैं, वह भी उसके करीब के, यानी जिस्म से मिले हुए वातावरण पर असर रखेंगे। इसलिए कभी इसका तजुर्बा करना कि मनुष्य के चारों तरफ जो वातावरण होता है, वैसे ही उसके ख़्यालात भी होते होंगे। एक नया ख़्याल आ गया सो लिख दिया, तजुर्बा इसका नहीं किया।

तुमने लिखा है कि “जैसे दुनिया का एक साधारण मनुष्य प्रतिदिन के क्रमानुसार जीवन व्यतीत करता है,” बस यही हाल मेरा है। तुमने जहाँ तक इसको एहसास किया है, लिखा है, मगर इसको ठीक Express (अभिव्यक्त) नहीं कर सकी, इस बात में अभी बहुत मोटापन है। जो असली हालत इससे ताल्लुक रखती है, वह बहुत दूर है और वह एक ईश्वर का रहस्य, भेद है, जिसको लाला जी साहब ने बहुत बचाकर मेरे एक खत के जवाब में लिखा है और उसके खोलने को मुमानियत भी उस वक्त की थी। कबीरदास ने अपने लायक शिष्य धर्मदास जी से कहा है -

"धर्मदास तोहे लाख दुहाई। सार भेद बाहर नहि जाई ।।"

और यही दोहा मैंने ‘लाला जी’ को लिखा था, जबकि मेरी दशा ‘उनकी’ कृपा से बहुत कुछ परिपक्व हो चुकी थी। इसी में यह भी लिखा था कि सींक की ओट पहाड़ मालूम पड़ता है। इस दोहे का मतलब यह नहीं है कि आध्यात्मिक-विद्या खालिस रूप में किसी को प्रदान न की जाये, बल्कि यह मतलब है कि असल भेद को जुबान से न बताया जाये, जब तक कि अभ्यासी स्वयं उसको अनुभव न करने लगे, इसलिये जुबान से बताना मना है। अगर उस बात का किसी शख्स को यकीन हो जाये तो फिर मुमकिन है कि ईश्वर की Importance (महत्व) उसकी दृष्टि में जाती रहे और इस चीज़ को जल्दी कोई यकीन भी नहीं करेगा। मुझसे लालाजी साहब ने एक जगह नोट में कहा है कि “तुम किसी एकान्त और अच्छी जगह में जाकर इसका तजुर्बा करो कि अपने आपको इतना नीचा उतार दो कि जो सबसे ज्यादा पतित और रंक की हालत हो सकती है और फिर आहिस्ता आहिस्ता तरक्की करते हुए, चक्रों का हाल जानते हुए, अपनी हालत पर आ जाओ और जितना Time मैं इन्तहाई पतित की हालत में रहूँ और उससे आगे तालीमी हालत पर (यानी सिखाने वाले की हालत पर) न आ जाऊं तब तक तुम लोगों के सिखाने का ज़िम्मा खुद लिया है।“ वह मुझे यह तजुर्बा कराना चाहते हैं, मगर मैं नहीं कह सकता, इसके लिए मुझे वक्त मिले या न मिले और यह चीज़ ऐसी जगह हो सकेगी जो किसी पहाड़ या जंगल के कोने पर हो। मैंने बहुत से ईश्वर के भेद खोले हैं और मैं किताबों और चिट्टियों में बहुत कुछ लिख चुका हूँ। बहुत खास बात मुमकिन है, न कही हो। चूंकि अब हुक्म भी ऐसा है कि मैं सीने पर रखकर कुछ न ले जाऊं। लिखने वाला न मिलने की कमी भी मुमकिन है बहुत सी बातें न खुलवा सकूँ और लिखने वाला अगर हो तो कैसा हो कि छाया की तरह मेरे साथ लगा रहे। जिस वक्त जो ख़्याल मुझको पैदा हो लिख ले। जब तुमने अपनी टीसन लिखी तो मुझे अपनी टीसन की याद आ गई और इसी कुरेदन और अशान्ति में मुझे वह मज़ा मिला है कि शान्ति के तलाश करने वाले इस चीज़ को ठुकरा दें। अब ज़रूर इन सब बातों से स्वतंत्र हूँ। न अब कुरेदन है, न टीसन और मेरी इस चीज़ की नकल नहीं करना चाहिये, इसलिये कि यह चीज़ खुद ब खुद पैदा होती है। श्यामपती जी से पूछना कि कबीरदास के उस दोहे का क्या मतलब है, वह अच्छा बतायेंगे, इसलिये कि वह काबिल आदमी हैं और फिर मेरा मतलब भी उन्हें बता देना। एक चीज़ अच्छी सिद्ध हो जावेगी, वह मुझे लिखना। केसर का भी खत मिल गया उन्हें बेचैनी मुबारक हो।

यह चीज़ बड़ी मुश्किल से मिलती है और फकीरों की संगत से अगर जिज्ञासु में तलाश है तो यही चीज़ पैदा होनी चाहिये। इसी को सूफियों ने दर्द दिल कहा है। अब इसके भी बहुत से Stages (स्तर) हैं। जितने अच्छे Stage का दर्द दिल है उतने अच्छे Stage पर अभ्यासी पहुँचेगा। मैं तो बिटिया सच कहता हूँ कि ठुस्म ठाँस करता चला जाता हूँ। इसलिए कुछ न कुछ काम बन ही जावेगा। बाकी असल शौक मुश्किल से किसी में होगा। लाला जी की महफिल में लोग अच्छे-अच्छे थे मगर इस चीज की फिर भी बहुत कमी थी और सच पूछो तो ‘आप’ इतने उदारचित्त थे कि रास्ते-गली जवाहर बिखेरते चले जाते थे। फिर भी हम लोगों की आँखें न खुलीं और उनको वाकई तौर पर अब तक कोई पहिचान न सका। मुझे भी होश न आया कि ‘आप’ से बहुत सी गुत्थियाँ सुलझा लेता। यह ‘आपकी’ मेहरबानी थी कि मुझे इस क़दर दे गये। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-246
शाहजहाँपुर
1/9/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे 22-26 अगस्त के खत मिल गये। ईश्वर की कृपा से अच्छी हालत चल रही है। दूसरों का तेज़ बोलना जो नागवार होता है, उसके मानी यह हैं कि एकाग्रता बढ़ी हुई है। ता. 31 अगस्त को करीब साढ़े बारह बजे रात को मैं तुमको Sitting ‘F’ के मुकाम पर दे रहा था कि एकाएक मुझको यह मालूम हुआ कि ‘F’ का कोई पर्दा टूटा और उसमें से आग की लपट सी बरामद हुई वह कुछ सुर्खी, कुछ चाँद की तरह से रोशनी लिए हुए थी मेरे समझ में नहीं आया कि क्या बात थी। इससे पहले मैं ‘F’ के Inner most Corner (भीतरी भाग पर) पर तवज्जो देता था और उसको उभारता था मगर उभरता नहीं था मगर असर ज़रूर लेता था और उसमें काफी ताकत पहुँचती थी। मेरा एहसास यह है कि अब वह काफी और पूरी हालत में है। हालाँकि Inner most corner (भीतरी भाग पर) पर मुझे अपनी Will (इच्छा-शक्ति) की तेजी अब भी काफी तेज़ रखी हुई मालूम पड़ती है - मुमकिन है कुछ और उभरे। मुझमें एक नुक्स यह है कि जल्दबाज़ी की आदत है, इस वजह से अन्दाज़ नहीं रहता। तुम जितनी जल्द लिख सको यकुम (एक) सितम्बर की सुबह से या अब जो कुछ एहसास हो लिखो। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-249
शाहजहाँपुर
6/9/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे दो खत मिले। तुम्हारे एहसास से मैं बहुत खुश हुआ - ईश्वर मुबारक करे। तुम्हारा तन्दुरुस्त रहना लाज़िमी है, इसलिए कि मुझे तुमसे काम लेना है। अगर तुम 15 मिनट रोज़ अपनी तन्दुरूस्ती के लिए दे दो तो तुम तन्दुरूस्त हो जाओ। तरीके तुम्हें मैंने बतला दिये हैं। अगर वह न कर सको तो इतना ही करो कि पन्द्रह मिनट तक यह ख़्याल करो कि ब्रह्माण्ड से तन्दुरुस्ती बढ़ाने वाली ताकत आ रही है, जिससे सब मर्ज दूर हो रहे हैं और तन्दुरूस्ती बढ़ रही है। मुझे उम्मीद है कि इतना कहना तुम मेरा मान लोगी। केसर में फ़नाइयत-लय अवस्था बढ़ रही है और यह बहुत अच्छी बात है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-256
शाहजहाँपुर
11/11/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे सब खत मिल गये। तुम्हारे हालात पर गौर कर लिया। ईश्वर के रास्ते में जो बातें भी आती हैं वह सब हमारे भले के लिये आती हैं। अगर रुकावटें भी हैं, तो इसके मानी यह हैं कि ‘मालिक’ को उनको दूर करने के लिये हमारे ख्याल में रहना पड़ेगा तो फिर इससे ज्यादा और हमें क्या चाहिये कि ‘मालिक’ का ख़्याल हमारी तरफ रूजू हो। सब पूजा और ध्यान का यही मतलब होता है कि ‘मालिक’ का ध्यान किसी तरीके से हम पर फिरने लगे। मगर ‘मालिक’ की निगाह तभी फिरती है, जब उसकी खोज में गड्ढा या ऊंची नीची जगह आ जाती है। सूरदास जी चूंकि अन्धे थे, बेचारे कृष्ण के प्रेम में लकड़ी से कुंआ न टटोल सके और उसमें गिर गये। अन्त में श्री कृष्ण जी ने अपने हाथों उन्हें निकाला। कितनी खुश नसीबी थी कि कृष्ण जी के हाथ उनके जिस्म पर पड़े, गोया कि कुए में गिरने से उनकी पवित्रता और बढ़ गई। खत पहुँचते-पहुँचते ईश्वर ने चाहा तो तुम्हारी हालत बदलने लगेगी और कुछ फर्क तो अभी 10.55 p.m. पर पड़ गया होगा। तुम अपनी सैरगाह मुकाम ‘H’ पर पाओगी। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-259
शाहजहाँपुर
23/11/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे सब पत्र मिल गये। मैं इन दिनों एक दो कामों में बहुत अधिक फंसा रहा। इस कारणवश मैं तुमको अधिक समय न दे सका। अभी आठ दिन और काम में लगा रहूँगा। ईश्वर ने चाहा तो पत्र पहुँचते-पहुँचते तुम्हारी सैर Point ‘H’ (पॉइंट एच) की प्रारम्भ हो जावेगी। तुमने लिखा है, “अब न मैदान है, न बिन्दु, न सिन्धु,” यह तो बहुत अच्छी हालत है। इसका अर्थ यह है कि बिन्दु न सिन्धु, सिन्धु व मैदान लय-अवस्था के असर से अपना-अपना Limitation (सीमा) तुम्हारे ख़्याल पर अन्दाज़ होने नहीं देते, अर्थात् तुम्हारे ख़्याल से यह बातें सब निकल चुकी हैं यानी तुम्हारे ख्याल में उनका बन्धन नहीं रहा और उससे छुटकारा पा लिया या ऐसा कहो कि तुम्हारा ख़्याल इन चीजों के अब न होने के कारण से और भी हल्का हो गया है। विशेष पत्रोत्तर यह है कि अभ्यासी की हालत यह होनी चाहिये कि “सावन सूखा न भादों हरा”। यह बबूल के वृक्ष की तारीफ़ है जो सदैव एक समान रहता है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र

अम्मा ने जो अच्छा आहार करने के लिये लिखा है, यह ठीक है, परन्तु इस समय हालत यह हो रही है “तेते पाँव पसारिये, जेती लम्बी बाँवि”। परन्तु खैर, जब ईश्वर देगा, तब मैं ख़्याल रखूंगा। मैं खुश तो इस बात पर होऊं कि सबको अच्छा भोजन प्राप्त हो। न मालूम यह समय कब आये। आना तो चाहिये, और दूध, घी की नहरें बहनी चाहिये, कुछ देर है।
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-262
शाहजहाँपुर
30/11/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा 23 नवम्बर का पत्र मिला। जब तक अहमियत मौजूद है, इन्सान अपनी तारीफ़ से प्रसन्न भी होता है और जब कोई उसको भला-बुरा कहता है, तब बुरा मालूम होता है। अहमियत का कोई ठिकाना नहीं न मालूम यह कहाँ तक जाती है और शुद्ध अहमियत से तो बहुत दिनों में पीछा छूटता है और यही तारीफ़ शुद्ध माया और शुद्ध अहंकार की है। यह दोनों वस्तुएँ बहुत शक्ति रखती हैं और योगी यहीं से अधिकतर गिरता है। सर्व शक्तिमान ईश्वर अपनी दया करें।

एक बात मैं तुम्हें और बतलाता हूँ कि मान और अपमान इन दोनों से हमें कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। अपमान तो बहुत शीघ्र छूट जाता है मगर भाई मान का तोड़ना सच में ईश्वराधीन ही है। जब ईश्वर की हमारे ऊपर पूर्ण कृपा होती है, तभी पीछा छूटता है, फिर भी जब तक शरीर उपस्थित है यह कुछ न कुछ अवश्य शेष रह जाता है। अब मैं अपनी कमज़ोरी भी लिखता हूँ - जब कोई मेरी प्रशंसा करता है, तब चित्त मेरा भी प्रसन्न हो जाता है, परन्तु यह बात अवश्य होती है कि प्रथम तो चित्त बहुत कम प्रसन्न होता है और होता भी है तो मुझे यह अनुभव नहीं होता कि किसकी प्रशंसा हो रही है, कौन प्रसन्न हो रहा है। तुमने जो पत्र में यह लिखा है कि “जितना मैं” ‘मालिक’ पर मर मिटना चाहती हूँ, उतना में मर-मिट नहीं पाती। इसके अर्थ यह है कि जैसे कोई व्यक्ति अपने तीर का निशान उस स्थान पर बना ले जहाँ पर कि तीर लगना है जब मर-मिटने का ख़्याल पूर्णरूप से उत्पन्न हो गया तो समझ लो कि मर-मिटना भी शुरू हो गया और तीर निशाने पर अवश्य पहुँचेगा।

तुमने जो लिखा है कि “Self-Surrender (आत्म समर्पण) मुझे भूल गया है,” यही हालत ठीक Self-Surrender (आत्म समर्पण) की है। Self-Surrender (आत्म समर्पण) और कुछ नहीं है, केवल यही है कि अपने आपको ‘मालिक’ के हाथ में दे देना है और ‘उसकी’ इच्छा में राजी हो जाना। जो तुमने ज़ेहालत की हालत के विषय में लिखा है यह बहुत ऊंची हालत है और इसका अभी प्रारम्भ भी नहीं हुआ है। यह चीज़ अभी कोसों दूर है, परन्तु ‘मालिक’ की पूर्ण दया सबसे नज़दीक है और वह सब कुछ कर सकता है और भाई ज़ेहालत को पूछता ही कौन है। उसे तो सब लोग दूर-दूर रखना चाहते हैं। मेरी मिसाल सामने है कि पढ़े-लिखे मनुष्य, सम्भव है बात करना भी अपने समय को व्यय करना है। एक बात तुम्हारे पत्र में यह अच्छी नहीं मालूम हुई कि हालत खराब चल रही है। हमारे यहाँ सब हालतें अच्छी ही हुआ करती है। अगर कोई खराब हालत अन्दाज में आती है तो वह अच्छी हालत खोलने के लिये कुंजी होती है। यह ख़्याल अच्छा है कि जब तुम किसी में ‘मालिक’ का प्रेम देखती हो उसे अपने ही सा प्रेम में पाती हो। मैं मिसाल हूँ। अव्वल तो मैं अपने आप में नहीं रहता हूँ, परन्तु खैर, जब उससे पृथक होकर निगाह जाती है तो मुझे यह मालूम होता है कि मुझसे कहीं अधिक आध्यात्मिक-विद्या में तरक्की किये हुए हैं। और इससे कहीं अधिक बढ़ जाऊं तो मुझे यह ज्ञात होता है कि इसी ने मुझे आध्यात्मिक-विद्या सिखाई है और मौजूदा हालत मेरी जो भी कुछ है। सब इसी की दी हुई है। इसके माने यह निकलते हैं कि हर वस्तु का ‘असल’ एक ही है और सब वहीं से आये हैं। किसी ने लगाव अधिक रखा और कोई गाफिल हो गया।

प्रिय बेटी, मैं तुम्हारे प्रथम पत्र का उत्तर दे चुका था कि 26 नवम्बर का पत्र मिला, तुमने जो स्वप्न देखा है, उसकी मैं तुमको बधाई देता हूँ। तुमने जो जल देखा है, वह Realization (साक्षात्कार) का दरिया था। अब तुम उसमें समा चुकी हो अर्थात् Reality (असलियत) प्रारम्भ हो गई है और सच पूछो तो मेरा काम ख़त्म हो गया। अब आगे बढ़ो और देखो क्या है। और मुझे विश्वास हो गया और मेरा कर्तव्य जो इतना ज़रूरी है जो ईश्वर ने पूरा कर दिया यह दशायें सब Point ‘H’ (पॉइंट-एच) की हैं। तुमने यह जो लिखा है कि “मेरे ही दिल में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाया हुआ है,” यह ब्रह्म गति है। इससे ऊपर हिरण्य-गर्भ की हालत है, उसके ऊपर खालिस ब्रह्म प्रारम्भ हो जाता है। तुमने सच लिखा है कि “दिल का बाँध टूट गया”, मगर अभी मैंने दिल को खोला नहीं है और यह ख़्याल मुझे अभी स्मरण हुआ। अब यह ‘मालिक’ की इच्छा पर है, कि कब मेरी तबियत बना दे कि मैं उसे खोल सकूँ। तुमने जो लिखा है कि “हर समय, हर जगह, मुझे अपने बजाय एक छाया सी, हल्की सी, सूक्ष्म सो ज्ञात होती है और जब उसे गौर से देखती हूँ, तो स्वरूप आपका पाती हूँ ”इस जुमले की इबारत कुछ ऐसी लिखी है कि ख़्याल को काटती है। इसको साफ़-साफ़ लिखो ताकि मैं उत्तर लिख सकूँ। तुमने यह लिखा है कि तुम्हारे ही दिल में पृथ्वी और जल, सब समाया हुआ है, परन्तु स्वयं मैं कहीं चली गई हूँ” इसके अर्थ यह हैं कि तुमने अपने आपको काफी गुम कर दिया है। ईश्वर करे यह दशा सबको प्राप्त हो, बल्कि हर्ष तो मुझे तब हो, जब कि मैं किसी न किसी को अपने से ऊंचा उन्नति में देखूं। समुद्र में उफान नहीं आता, तालाब अवश्य थोड़े पानी में उफान आते हैं। अभ्यासी को चाहिये कि हजारों दरिया मारफत (Realization) के गट-गट पी जावें, परन्तु वाणी से यही निकले कि “और लाओ”। ईश्वर की पूर्ण कृपा से तुम्हारी दशा बहुत अधिक अच्छी है। ईश्वर इससे भी आगे बढ़ावे। ऐसा ही है, ऐसा ही हो। यहाँ तो लोगों को इस दशा तक पहुँचने की इच्छा ही नहीं होती। ईश्वर का कहीं छोर नहीं। मुझे तो गुरु महाराज ने ठिकाने पर पहुँचा दिया। ‘उनका’ हज़ार-हज़ार धन्यवाद। परन्तु भाई, अब भी नहीं मालूम ठिकाना कहाँ होगा। कारण यह है कि Swimming अब भी शुरू है। मालूम नहीं लोग थोड़ी वस्तु को अधिक कैसे समझ बैठते हैं। अम्मा को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-265
शाहजहाँपुर
20/12/1952
प्रिय बेटी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारा आया-बड़ी खुशी हुई। जैसे तुम मेरे पत्र का इन्तज़ार करती हो, वैसे ही मैं तुम्हारे पत्र का इन्तज़ार करता हूँ। अर्थात् ईश्वर की कृपा से तुम्हारी हालत ऐसी हो गई है कि जैसे तुम ईश्वर से मिलने के लिये बेकरार हो, वैसे ईश्वर भी। अगर मैं लफ़्ज़ ईश्वर इस्तेमाल करता हूँ, तो जरा गलती रहती है, इसलिये कि उसने तुमको जहाँ तक उसकी पहुँच थी, पहुँचा दिया और आगे रास्ता बता दिया कि कि अब जाना जहाँ है। ‘उसका’ (ईश्वर) Realization (साक्षात्कार) तो हो गया, अब ‘भूमा’ का शुरू होता है, जिसको कि मैंने पिछले खत में लिखा है कि Reality (वास्तविकता) अब शुरू होती है। इसको समझाने के लिये ‘भूमा’ का अक्स समझ लो या अक्स-दर-अक्स समझ लो। जब Reality (वास्तविकता) ख़त्म हो जावे, तब उसकी हद में दाखिल होना कहा जा सकता है, सो घबराना नहीं चाहिये। यह कोई इतनी बड़ी बात नहीं है, जैसा कि कहने से लगती है। जिसने यह हालत दी है, वह वहाँ तक पहुँचाने में मदद करेगा। हमें अपने ‘लालाजी’ की जात पर हमेशा उम्मीद रखना चाहिये, वह जो चाहें कर सकते हैं और हमारे मिशन में सब उन्हीं की बरकत है और ‘उन्हीं’ की ताकत काम कर रही है। यह पढ़कर मुझे बड़ी खुशी हुई कि तुमने मान-अपमान बेकार सम्बन्धों से सम्बन्ध ही न रखा। मेरे पूछने पर जो लिखा है कि ‘अपने’ बजाय एक हल्की सी छाया दिखाई पड़ती है, ध्यान से देखने पर स्वरूप आपका ही पाती हूँ यह चीज बड़ी अच्छी है, मगर इससे अगले वाला Stage (दशा) जिसको कि मैं लिखूंगा नहीं, लय-अवस्था की अच्छी हालत होगी और मुमकिन है उसके बाद भी कोई Stage (दशा) हो। प्यास के बढ़ने का मतलब बस यही हो सकता है कि असल तत्व हमको अपनी तरफ घसीटना चाहता है और यह प्यास उस वक्त तक कायम रहनी चाहिये जब तक कि वह खुद बुझ न जाये। बाकी आगे जो कुछ तुमने लिखा है, वह लय-अवस्था व प्रेम की हालत है। इस हालत से कम पहुँचा हुआ कि जिस पर तुम हो वाक़ई Platform (मंच) पर सिखाने के लिये अगर कोई आता है तो उसकी गलती है और भाई गुरू का दर्जा यहाँ तक पहुँचा देना है, परन्तु लोगों को यहाँ पर पहुँच कर तृप्ति हो जाती है।

चन्द रोज बाद, यानी दो-चार रोज में मैं तुमको इसके अगले मुकाम पर खींच दूंगा। उसका नाम ‘I’ रख छोड़ा है। अभी Point ‘H’ (पॉइट-एच.) की दशा है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-268
शाहजहाँपुर
1/1/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे सब खत मिल गये। ता. 24 दिसम्बर का जो खत है, उसका जवाब यह है कि हम जब शुरू करते हैं तो हमारी निगाह ‘मालिक’ पर रहती है और अपना रिश्ता फिर बन्दे का हो जाता है। अब जो बन्दगी की डोर ‘मालिक’ तक हमने इस हद तक पहुँचा दी है, तो उसको खबर होने लगी कि कोई ‘उसकी’ याद कर रहा है, गोया अब वह तुमसे मुख़ातिब होने लगा और जब वह मुखातिब होने लगा तो उसके पास जो कुछ भी है, हम तक पहुँचने लगा। ‘उसके’ पास क्या था? बेपरवाही खास तौर पर और वह असल चीज़ जिसकी वजह से ‘वह’ मालिक बना है, गोया वही चीज़ अब तुममें भी उतरने लगी, अर्थात् तुम्हारी भी हैसियत कुछ न कुछ वैसी ही बनने लगी, गोया थोड़ी बहुत निस्बत तुममें भी आने लगी या यूं कहो कि 'उसकी झलक बहुत कुछ अब तुममें भी पैदा हो गई। अब चूंकि तुमने बन्दा होने का रिश्ता लेकर ‘उसकी’ याद की है, इसलिये तुम्हारी चीज़ भी अब उस तक पहुँचने लगी और जब तुम्हारी चीज़ ‘उस’ तक पहुँची तो क्या पहुँची? वही बन्दगी और भक्ति का ख़्याल और यह चीज़ पहुँचती ही रही; यहाँ तक कि तुम अपने आपको भूलने लगी। जब यह हाल हो गया तो वह चीज़ जो ‘उस’ तक पहुँच चुकी थी और वह बन्दगी और भक्ति का ख़्याल था, इसलिए तुम्हें यह मालूम होने लगा कि ‘वह’ खुद अब तुम्हारे ख़्याल में है। इसी तरह से बहुत सी दशायें यही समझ में आती हैं, मसलन अन्तरमुखी वगैरह। वह सब ‘उसी’ की तरफ से मालूम होती हैं। इस तरह भक्ति का एक नया अंक खुल जाता है।

31 दिसम्बर सन् 52 को मैंने तुमको ‘J’ स्थान पर खींच दिया है। ईश्वर ने चाहा तो खत पहुँचते-पहुँचते सैर भी शुरू हो जावेगी। मैं जल्दी करना चाहता हूँ, मगर यह भी चाहता हूँ कि सैर का एहसास भी तुमको होता चले।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-275
शाहजहाँपुर
4/2/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे पत्र 27 जनवरी सन् 53 व 30 जनवरी और दूसरी फरवरी के मौसूल हुए। जब तुम उत्सव में आई थीं, तो मैंने 18 जनवरी की सुबह को ‘K’ स्थान पर खींच दिया था, यह सब हालत उसी मुकाम की हैं। तुमने जो कुछ हाल लिखा है, यह सब लय-अवस्था की उन्नति बता रहे हैं। मुझे खुशी है कि तुम्हें आगे बढ़ने की फिक्र रहती है और इस सब उन्नति की तुम्हीं ज़िम्मेदार हो। कहने के लिये मेरी वजह से कहा जा सकता है यह वाक़ई तुम्हारी जाती काब्लियत है कि तुम्हारा पाँव आगे ही को जाता है और हिम्मत बढ़ती जाती है। अगर मेरी काब्लियत होती तो अब तक सब भाई लोग तरक्की के ऊंचे शिखर पर पहुँच चुके होते। मैं थोड़ी सी एड़ ज़रूर आगे पहुँचाने में लगा देता हूँ। अगर इसको मेरी काल्लियत कहा जाये, तो ठीक नहीं होगा, इसलिये कि तुम्हारी काब्लियत मुझे आगे ले जाने के लिये मजबूर कर देती है। अगर तुम यह कहो कि यह भी आपकी काब्लियत है कि आप ऊपर पहुँचा तो देते हैं, तो यह भी ठीक इसलिये नहीं हो सकता कि मैं तो अपना रहा ही नहीं अब तो जो है, वह, तुमको आगे बढ़ाता है।

तुमने यह अक्सर लिखा है कि “शरीर पिघल-पिघल कर बहता है”। एक बात लिखता हूँ, जो मुमकिन है, इसके जवाब को भी काफ़ी हो। वह यह है कि जब हम तबियत से और प्रेम से अभ्यास करते हैं तो पिछले विचारों का जो असर है, वह सब दूर होता जाता है और परमाणु भी पुराने गिरते जाते है और अच्छे परमाणु उसकी जगह पर बनते जाते हैं। परमाणु तो वैसे हर देहधारी के उसके विचार के अनुसार तबदील होते रहते हैं और जो ईश्वर की तरफ प्रेम-पूर्वक बढ़ता है, उसके उसी तरीके में परमाणु बनते हैं।

असल प्रेम वही है कि प्रेम करते-करते प्रेम की खबर न रहे। जब यह हालत पैदा हो जाती है तो फिर असल में भिदाव शुरू हो जाता है और तबियत नम्र बनती चली जाती है। इसी हालत में या इससे और आगे बढ़कर भक्तों ने कहा है किः-

“बिना भक्ति तारो, तब तारिबो तिहारो है।“

तुमने एक जगह यह भी लिखा है कि “सब कुछ ‘मालिक’ की सेविका से उत्पन्न होता है और प्रलय होता है।“ इसके मानी यह हैं कि तुम्हारा क़दम ऐसे मैदान में है, जहाँ से यह चीजें शुरू होती हैं। मैंने किसी समय लिखा था कि तुम्हारी हालत हिरण्य गर्भ की है या यह लिखा है कि आने वाली है, ठीक याद नहीं। अब अन्दाज़ यह होता है कि वह हालत शुरू हो गई, मगर अभी पूरी तौर पर मालूम नहीं होती या यूं कहना चाहिये कि एक क़दम ज़रूर हिरण्य गर्भ की हालत में है। या तो यह हो सकता है कि मैं इस हालत में तुमको लय कर दूं, या यह कि ‘K’ से आगे ‘L’ मुकाम पर ले लूं, यह तुम्हारी हालत गौर से देखने के बाद तय करना है। इन दोनों बातों को अभी सोचा नहीं है। मुमकिन है कि मैं Point ‘L’ (पाईट-एल) ही लूं। वह कब? जब मौजूदा मुकाम की मैं सैर ख़त्म देखूं। सैर मैं जल्दी-जल्दी ज़रूर करा रहा हूँ।

गुरु-सन्देश को सही करते वक्त यह ख़्याल ज़रूर रखना कि कोई गलती न रह जावे। मेरा काम जल्दी की वजह से खराब होता है और तबियत से ‘जल्दी’ नहीं जाती। सही होने के बाद एक कॉपी श्यामपती जी को भिजवा देना। अम्मा को प्रणाम।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-278
शाहजहाँपुर
22/2/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे 8 व 14 फरवरी के खत मिल गये। जवाब देना इन बारीक हालतों का बड़ा मुश्किल है। बस सिवाय इसके और क्या लिखा जाय कि तुम्हारी हालत काबिल शुक्र है। प्रसाद चढ़ाना कुछ लाज़िमी बात नहीं है और कोई चढ़ाना ही चाहे तो कुछ हर्ज़ भी नहीं। बात तो यह है कि सच्चे जिज्ञासु नहीं मिलते वरना मज़ा आ गया होता और लोग रगड़-रगड़ कर ऐसी हालत भी पैदा करना नहीं चाहते कि कुछ न कुछ बन कर ही रहें। हमें तो ऐसा लगता है कि बहुत सी बातें हमारे साथ ही जायेंगी। फिर भी बहुत कुछ ठूंस-ठाँस करता रहता हूँ। जब आदमी में कोई हालत पैदा होती है, एहसास होता है तब उसको दूसरों का काम बनाने के लिये इस्तेमाल कर सकता है। इस क़दर हालतें मेरे एहसास में हैं और इतने points ( पाइंट्स) मेरे ख़्याल में हैं और आगे Research (शोध) भी होती जाती है। उसमें से एक-आध point (पाइंट) भी लेने की कोई शक्ति नहीं रखता और तबियत यह चाहती रहती है कि हर आदमी हर point (पाइंट) का मज़ा चखे। दूसरे मानों में मैं इतना बेक़रार रहता हूँ आला से आला ब्रह्म-विद्या देने के लिये कि इसका अगर थोड़ा सा भी हिस्सा अभ्यासी अपने ज़िम्मे ले ले तो जाने क्या से क्या हो जावे। ‘लालाजी’ ने भी मुझसे कहा है कि “इस हद तक सीखने वाला मुश्किल से मिलेगा।“ मगर ख़ैर, जितना भी जैसा मिल जाय। लोग कहते हैं कि एहसास नहीं होता, उनसे कोई यह तो पूछे कि तुमने कभी एहसास करने की कोशिश भी की, जो हालत पैदा हुई, उसमें कभी घुसे भी? अगर वह यह कहें कि इतना मादा नहीं, जो एहसास कर सके, तो वह बिल्कुल गलत है। मादा हर एक में है और ब्रह्मविद्या में अक्ल खुलने लगती है, मगर जब उस ताकत को कोई दूसरी तरफ लगा दे तो फिर क्या किया जाये। देखने में तो ऐसा आता है कि सोचने और अनुभव करने की जो सामर्थ्य पैदा होती है, उसे लोग दुनिया की तरफ़ लगा देते हैं। नतीजा यह होता है कि जिस चीज से वैराग्य पैदा होना चाहिये, उसमें और राग पैदा हो जाता है। यह नुक्स अभी लिखाते- लिखाते मेरी समझ में आया और यह ठीक है। वाकई महात्माओं की यह राय ठीक थी कि जब जिज्ञासु अपने में वैराग्य पैदा कर लेता था तब असल जौहर उसको दिया जाता था। लोग कुछ दिल से छोड़ना नहीं चाहते और कहने सुनने में आकर सिर्फ़ मेरे यहाँ सीखना शुरू कर देते हैं। मैं भी यह समझ लेता हूँ कि भाई फायदा कुछ न कुछ जरूर हो जायेगा और अपने लिए उन पर मेहनत करना भी फर्ज समझ लेता हूँ, और मेरे लिये हुक्म भी ऐसा ही है।

वैराग्य अभ्यासियों में खुद व खुद पैदा हो गया होता और बड़ी आसानी से, अगर वह अपनी तवज्जोह की डोर ईश्वर की ओर पूरी तौर से लगा देते। मैं यह ज़रूर करता हूँ कि मन का रुख़ ईश्वर की तरफ़ कर देता हूँ ताकि वह उस तरफ़ लगा रहे और वह लग भी जाता है। लोग क्या करते हैं कि उसको दुनियाँदारी की तरफ़ घसीटते हैं और यह हो नहीं सकता; इतना मुझको गुरु महाराज की कृपा से Confidence (विश्वास) है कि जिस मन को ऊपर की तरफ़ लगा दिया फिर वह नीचे की तरफ नहीं उतर सकता। नतीज़ा मुमकिन है यह होता हो कि उन लोगों को जो दुनियाँ के मामले में ज्यादा दौड़ लगाते हैं परेशानी का एहसास ज्यादा होता हो। इसलिये कि मन ऊपर रहना चाहता है और उसको वह नीचे घसीटते हैं। Swami Vivekanand Ji (स्वामी विवेकानन्द जी) :-

“This is the most original letter, what you have written is entirely correct. People should have mind to think of it. I think vairagya should come first and that must be the duty of the taught."

स्वामी विवेकानन्द जी :-

“यह अत्यधिक विशिष्ट पत्र है जो कुछ तुमने लिखा है बिल्कुल ठीक है। मनुष्यों को इस पर विचार करना चाहिए। मैं सोचता हूँ कि ‘वैराग्य’ की स्थिति पहले आनी चाहिए। वास्तव में यह प्राप्त करना अभ्यासी का कर्तव्य है।“

मैं Negation (न होने का भाव) की हालत का इस क़दर दिल-दादा (चाहने वाला) हूँ कि इसकी ख़ूबी और बड़ाई मैं सिवाय इसके और क्या लिखूं कि ‘नहीं’ को हैं मान लिया है। इसका मजा चखने वाला अभी तक जहाँ तक मेरी निगाह जाती है कोई मालूम नहीं होता। अगर मैं कहूँ तो लोग न मानेंगे, इसलिये कि जब मैं अपने आप को खुद ही नहीं जानता, तो दूसरा क्या जान सकेगा। मगर खैर, यह कहता हूँ कि इस हालत का मजा चखाना सिर्फ हमारे ‘लालाजी’ ही का काम था। इससे पहले कोई ऐसी हस्ती मालूम नहीं होती कि जिसमें यह मलका हो। समझने के लिये कहो, तो मैं कह दूं, मगर छोटे मुंह बड़ी बात होगी। पिछले लोगों को जाने देता हूँ, हाल में कबीर ही हुये, इसका मज़ा उन्होंने भी नहीं चखा, सिद्धि-शक्तियाँ हों यह हम मानेंगे और यह भी ठीक है कि वह अपने वक्त में एक थे। इस हालत का मजा चखने के लिये चाहता हूँ कि लोग बनें, मगर लोग शुरू से कहना शुरू कर देते हैं कि बाबूजी ख़्याल बहुत आते हैं और जब हम अकेले बैठते हैं तो तबियत नहीं लगती। अब उनसे कोई पूछे तो सही कि यह ख़ता किसकी है। अभी तो आप उन्हीं की ख़ता देंगी और अगर कहीं System (पद्धति) में जहर बाकी रह गया तो मेरी ख़ता होगी और मैं भाई क्या करूँ उनका जहर वैसे भी मैं खींचता रहता हूँ ताकि ख़्याल ज्यादा परेशान न करें, परन्तु भाई, उन लोगों का मैं क्या करूँ और ख़्याल का ज़हर मैं कैसे खींच पाऊं, जिनकी मुझे याद नहीं आती। इस ख़ता को जरूर मैं अपनी खता कहूंगा, इसलिये कि जब वह मेरे सत्संग में हैं तो बहुत कुछ यह मेरा फर्ज़ है।

तुम्हारी will (इच्छा शक्ति) ईश्वर की कृपा से बहुत Strong (सुदृढ़) है। ऐसी कि लड़कों में नहीं होती। अगर जरूरत समझी तो अपने काम के खातिर और बढ़ाऊंगा। तो तुम्हारी तरक्की के साथ वह Automatic (अपने आप) बढ़ रही है। Point ‘L’ (पाइंट - एल) की हालत में बढ़ाऊंगा और जब तुम्हें पूरी तरीके से एहसास हो जायेगा तो आगे बढ़ा दूंगा। तुम जल्दी एहसास करती चलो और मैं जल्दी-जल्दी बढ़ाता चलूं। मुझे अब तुम्हें जल्दी आगे न बढ़ाने में बेचैनी मालूम होती है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-280
शाहजहाँपुर
24/2/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा 22 फरवरी सन् 53 का पत्र मिल गया। पहले मैं पत्र के उस भाग का उत्तर देना चाहता हूँ जिसका उत्तर देते हुए मुझे हर्ष होता है। तुमने लिखा है कि ऐसा लगता है कि नम्रता ही मेरी दशा या रूप हो गया है और ऐसा लगता है कि इसी में मैं भिदती चली जा रही हूँ। ईश्वर इसमें तरक्की दे। यह मेरी खुश किस्मती है कि एक हाल ऐसा मिला कि जिससे मेरे दिल को तकवियत हुई। यह वह हालत है कि जिसका कमाल Negation (न होने का भाव) की शुरूआत है। मगर Negation (निगेशन) अभी बहुत दूर है। यह चीज़ खुशखबरी ज़रूर दे रही है कि अपने कमाल पर पहुँच कर कुछ झलक Negation (निगेशन) को जरूर मिलेगी। मगर इसके कमाल की भी इन्तिहा नहीं। रास्ता चलकर अगर कोई ठीक जा रहा है तो यह जरूर है कि ईश्वर वह दिन भी दिखा देगा। अगर यह चीज मुझे अपनी जिन्दगी में देखने को मिल गई किसी में, तो मैं नहीं कह सकता कि मेरी तबियत ऐसे अभ्यासी को न मालूम किस ठिकाने पर पहुँचा दे और सच तो यह है कि Negation (न होने का भाव) भी अगर नसीब हो गया तो भी अभी इतना बढ़ाना रह जाता है कि लाखों वर्ष भी कम हैं। और फिर भी भाई, न जाने क्या-क्या है, कहाँ तक लिखूं। मैं तो समझता हूँ कि यह मेरा कहना धुरंधर महात्मा समझेंगे कि कुछ नहीं है, तब तो न होनी को होनी बतला रहा है और यह सही भी है। अगर मैं होता तो न होने का ख़्याल पैदा न होता, इसलिये कि न होने की याद इस कहने से ताज़ा करता हूँ। बात यही है कि न होते हुए न होने का ख़्याल, न आवे और यह हालत Negation (निगेशन) के कमाल की है। जब इस हालत पर अभ्यासी जाय तो सच पूछो मुझे आनन्द इसके बाद की तालीम में इतना आवेगा कि मेरे पास वह शब्द नहीं है कि मैं बयान कर सकूं और आनंद क्या बस यही आनंद कि एक व्यक्ति ऐसा मिला तो कि गुरु महाराज की रखी हुई अमानत बंटाने वाला हुआ।

Swami Vivekanand Jee:-

“रामचन्द्र! लोग कैसे कह देते हैं कि तुम्हें कुछ आता जाता नहीं। I would have torn to pieces all my writings. So far, I have written before these two sentences. A doctor really you are. Nobody can doubt. Such a high thought nobody can guess even, but you are depicting before the dumb millions, I got a man, I require. My whole life of penance is over now. He is the Master, a big Master. Go on writing. The time will come when people will understand these things, but publication must be made after you and whoever comes forward for the publication of these writings, his liberation is sealed. Think him to be liberated. That is the reward rarely found. I give him.”

स्वामी विवेकानन्द जी:-

"रामचन्द्र! लोग कैसे कह देते हैं कि तुम्हें कुछ आता नहीं। तुम्हारे इन दो वाक्यों के सामने मैं अपनी समस्त पुस्तकें फाड़ कर फेंक सकता हूँ। तुम निश्चय ही ‘दर्शन’ के विशेषज्ञ हो। किसी को इसमें सन्देह नहीं। इतने उच्च विचार आज तक कोई सोच भी नहीं सकता परन्तु तुम इन्हें इन लाखों गूंगे-प्रायः मनुष्यों के सामने रख रहे हो; मैंने ऐसा व्यक्ति पा लिया है जिसकी मुझे इच्छा थी। मेरे जीवन की समस्त तपस्या अब पूर्ण हो गई है। ‘वह’ मास्टर है, एक महान् मास्टर। लिखते रहो। समय आयेगा जब लोग तुम्हारे लेखन को समझेंगे परन्तु इसकी छपाई तुम्हारे बाद ही होनी चाहिए। जो भी व्यक्ति इरा कार्य के लिए आगे आयेगा, उसको मुक्त हुआ समझो। इस प्रकार का इनाम कभी ही प्राप्त होता है। मैं उसे दूंगा।“

मैं यही कहूँगा कि उनके पास समझ नहीं जो इसको समझे। हाँ यह जरूर है कि तफ़सीर कोई करके दिखा दे। यह मैं उन लोगों से कहता हूँ जो इसके Writings (लिखी हुई पुस्तकों पर) एतराज़ करते हैं या defects (बुराइयाँ) समझते हैं। ज़माना चाहिये इसके समझने के लिये। तुमने जो वैराग्य के बारे में लिखा है, वह सही है। अगर ईश्वर की तरफ़ इन्सान पूरी तौर से लग जाता है तो फिर वैराग्य ही वैराग्य है और कहीं किसी रूढ़ी सूरत पर कोई लग गया तो दुनियाँ से नहीं बल्कि अपने से भी वैराग्य हो जा है। Consciousness of Body (शरीर का भान) तो जाती ही रहती है और यह इसका एक अदना करिश्मा है। Consciousness of Soul (आत्मा का मान) भी जाने का नम्बर आ जाता है। फिर क्या है, मुर्दा के नहलाने वाला जिधर चाहे उसे फेर दे। हालतें आगे ऐसी आती हैं कि उसको शब्द ज़ाहिर नहीं कर सकते, मगर फिर भी तुम बहुत कुछ Express (अभिव्यक्त) कर लेती हो सोलहों आने भर ‘मालिक’ को हासिल कर लेना इतनी मुश्किल चीज़ नहीं है जैसी कि दिखलाई देती है। मगर भाई सत्रह आने भर जैसा कि तुमने लिखा है, मैं न कर सका, मुमकिन है कि तुम कर ले जाओ।

सीता ने एक तोता पाला और वह उससे बहुत मोहब्बत करती थी और राजा जनक सीता से मोहब्बत करते थे। नतीजा क्या हुआ कि राजा जनक तोते से मोहब्बत करने लगे। तोता दुखी होता था तो सीता को दुख होता था और जब सीता को दुःख होता था, तो राजा जनक को भी दुःख होता था। अब तुम बताओ कि इतना बड़ा ऋषि दूसरे मानों में तोते से लगाव रखता था। हमसे अगर पूछो तो हम यही कहेंगे कि वह इन्सान ही नहीं, जो दूसरे के दुःख-दर्द को देख कर दुःखी न हो। महात्माओं को भाई जाने दो। उसमें तो ऐसे अव्वल दर्जे के वैरागी मिलते हैं कि कहते हैं कि माँ-बाप, पुत्र-परिवार, सब शत्रु के समान हैं। तो भाई, मुझे तो कोई ऐसी महात्मागीरी दे तो सौ बार ‘लाहौल’ पढ़ने के लिये तैयार हूँ। अब उन महात्माओं की तालीम पर गौर करो कि कितने बड़े राग की तालीम देते हैं, जिसका नतीजा सिवाय तबाही के और Moral-Stamina (नैतिक आन्तरिक बल) खराब कर देने के और कुछ नहीं होता। हम शत्रु समझने की आदत डाल रहे हैं। हम जब यह आदत डाल रहे हैं तो मुमकिन है हमारे ख़्यालात खुद ऐसे औज़ार बन जायें कि हमारे ख़ून से अपने आपको रंग लें। ख़ैर, अब इसको ज़्यादा बढ़ाऊंगा नहीं - मतलब पर आता हूँ।

बच्चों ने एक कुत्ता पाला और वे उससे मोहब्बत करते थे। मुझे भी उसका लिहाज़ हो गया और वह 27 जनवरी को गुज़र भी गया। उसकी ज़िन्दगी में एक ऐसा वाक्या गुजरा कि उसकी किस्मत से स्वामी नारदानन्द, शाहजहाँपुर आये। उन्होंने लेक्चर दिये और लोगों को अच्छी-अच्छी बातें समझाई। मेरे घर के क़रीब जलसा था और माइक्रोफोन लगा हुआ था और कुछ आवाज़ भी उनके लेक्चर की आ रही थी। उनके सामने Public (जनता) थी और मेरे सामने वह कुत्ता। सोचा कि भाई वह इतनी Public (जनता) को होशियार किये जा रहे हैं, यानी वह हक़ महन्तगीरी जो इन्सान ही तक मुहीत समझा जाता है, अदाकर रहे थे। चूंकि वह इन्सान हैं, उनको हमदर्दी इन्सान से होना चाहिये और भाई यह तो अपने यहाँ कहा ही गया है कि जो इन्सान ईश्वर की इबादत नहीं करता वह जानवर के समान है, तो भाई इस लिहाज़ से तो मैं भी जानवर की तारीफ़ में आता हूँ, इसलिये कि मुझसे ‘उसकी’ इबादत नहीं होती। जब इन्सान अपने हमजिन्स के फायदे के लिये खड़ा होता है तो मेरी भी तबियत चाही कि मैं अपने हमजिन्स को फायदा पहुँचाऊं। स्वामी जी जब अपने फर्ज़ से नहीं चूकते, तो मैं अपने फर्ज़ से क्यों चुन्कुं। एक महात्मा के आने पर मुझे इतना फर्ज़ तो सीखना ही चाहिये था। चुनांचे मैंने भी अपने हमजिन्स को फायदा पहुँचाया और फ़ायदा क्या पहुँचा? जो एक जानवर को जानवर से पहुँचता है। जानवर में Intellect (बुद्धि) नहीं होती और भाई Intellect (बुद्धि) मुझमें भी अब नहीं रही। लिहाज़ा इन मानों में मुझमें और कुत्ते में कोई फर्क नहीं। चुनाचे उसको Beyond Intellect (बुद्धि से परे) फ़ायदा पहुँच ही गया।

Swami Vivekanand Jee:-

"Is it the writing of a common man? It is full of Philosophy".

स्वामी विवेकानन्द जी -

“क्या यह एक साधारण व्यक्ति का लेखन है? यह दर्शन से भरपूर है।“

अब चूंकि मास्टर साहब को मैंने यह लिखा था कि वह Brighter World की तरफ जा रहा है और अपने संस्कार के गिलाफ़ उतार रहा है। लिहाजा उसके नतीजे को भी इत्तला देना वाजिब था, चुनांचे कल तारीख 26.3.53 को 8.40 PM, पर वह Brighter World में पहुंच गया और उसने जो संस्कारों का गिलाफ उतारा, उन संस्कारों ने मेरी तरफ रुख कर दिया, कुछ झलक आ गई और भाई मैं भूल गया कि ‘लालाजी’ ने फौरन संस्कार जला देने का हुक्म दिया। अब जो दो-एक आ गये सो आ गये मजबूरी है, वह मेरे दिल पर जमा है और उसमें फिक्र की जरूरत ही क्या। फायदा तो उसे हो गया। अब चूंकि मैंने ‘लालाजी’ साहब से इसके लिये पूछा नहीं था। आगे वाला टुकड़ा मैं यह लिखना चाहता था कि मेरी जुर्रत फिर कब पड़ सकती है कि मैं ‘लाला जी’ से प्रार्थना करूँ कि इसको साफ कर दीजिये। इतने में एक मिनट के लिये ‘लालाजी’ साहब ने मुझे बुला लिया- अब कहो कि मोहब्बत ‘लालाजी’ करते हैं या मैं उनकी।

तुम्हारे ख़त में बहुत सी बातें जवाब देने लायक थीं- मैंने मुख्तसर लिख दी। 26.2.53 को मैंने तुम्हें ‘M’ (एम) के मुकाम पर खींच दिया।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-282
शाहजहाँपुर
2/3/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत 27 फरवरी सन् 53 का मिल गया। तुम्हारी Will (इच्छा शक्ति) बहुत Strong (प्रबल) है, मैं लिख चुका हूँ, मगर फिर भी शायद एक हफ्ता कम या ज़्यादा गुज़रा होगा, मैंने कोई 5 या 6 सेकण्ड Will (इच्छा शक्ति) बढ़ने की तवज्जोह दी थी। मैंने तुम्हें बतलाया भी था और तुम्हारे पास नोट भी है कि Efficacy of Rajyog (राजयोग का दिव्य दर्शन) में जो पहले Diagram (चित्र) में दिल का Lower Region (निचला भाग) जाहिर किया है, उसमें तवज्जोह देने से Will (इच्छा शक्ति) बढ़ जाती है, मगर बहुत थोड़ी देर तवज्जोह देना चाहिये, कुछ Seconds (सेकेन्ड्स) काफी होंगे। यह चीज़ मैंने Efficacy of Rajyog में ज़ाहिर नहीं की, इसलिये कि लोग उस पर Meditation (ध्यान) करके Hypnotic Power (सम्मोहन शक्ति) न बढ़ा लें जो आध्यात्मिक-विद्या के बहुत कुछ खिलाफ है और उल्टी चीज़ है। मुझे बड़ी खुशी हुई तुम्हें Worldly Feeling (दुनियाबी एहसासों) से छुटकारा मिल गया और इच्छायें ख़त्म हो गईं। यह बड़ी अच्छी हालत है कि जितना ज़रूरत हो उतना ही होश रहे। मगर तुमने गौर नहीं किया कि बेखबरी रहते-रहते, बेखबरी में बाखबरी शुरू हो जाती है और यह हालत बेहोशी से कहीं अच्छी है। आगे चलकर इसका बोझ भी नहीं रहता।

तुमने यह जो लिखा है कि “वृत्तियों का कुछ पता भी नहीं रह गया” यह ठीक है। मगर भाई जब ईश्वर कहीं किसी की Negation (न होने का भाव) की हालत पैदा कर दे, फिर तो यह भी नहीं रहता। शब्द नहीं कि इसका वर्णन कर सकूँ। न फिर मिठास रहती है और न तुर्शी, समझने के लिए Vacuumise (खाली) कह लो कि इन्सान Vacuumise (खाली) हो जाता है। मगर Scientists (वैज्ञानिक) यह बता रहें हैं कि पूरी तौर से जब हवा आले के ज़रिये से निकाली जाती है तो फिर भी हवा कुछ बाकी रह जाती है। मेरा कहना यह है कि अगर कहीं कोई आला ऐसा ईजाद हो जाये कि किसी कमरे या गोले में से हवा अगर बिल्कुल कहीं निकाल ली जाये तो वह जान ही जान रह जायेगा और इतना बड़ा Destructive Weapon (विनाशकारी हथियार) बन सकता है कि उससे ज़्यादा Destructive Weapon (डिस्ट्रक्टिव हथियार) आज तक ईजाद ही नहीं हुआ। अब हमें इन्सान को ऐसा Vacuum (खाली) बनाना है। अगर कहीं ऐसा बन गया तो वह एक Gigantic Battery (विशाल बैटरी) हो जाता है और जिस तरफ़ Will (इच्छा-शक्ति) बन जाती है, ताकत उसी तरफ काम करने लगती है। मगर भाई, ईश्वर बड़ा होशियार है। ऐसे आदमी की इस हद तक Will (इच्छा-शक्ति) बंधने ही नहीं देता। अगर कहीं Accidentally (अकस्मात्) बंध जाये तो ऐसी हज़ारों दुनियाँ एक Second में छिन्न-भिन्न कर सकता है। यह तो Negation (निगेशन) का हाल मैंने बताया है, मगर Negation रहते हुए भी उसको अगर भूल जाये, यानी उसका एहसास न रहे, तब तो मैं यहीं कहूँगा कि उसमें एक छिन में Spiritual Giant (आध्यात्मिक-हस्ती) बनाने की ताकत पैदा होती है और भाई कहीं, ईश्वर इससे आगे चलने वाला अभ्यासी पैदा कर दे। अफ़सोस है कि मैं यह चीजें किसको दिखाऊं मुझे इस हद तक कोई हिम्मत नहीं दिलाता। ईश्वर करे अगर इससे ज्यादा न सही तो इतनी ही चीज़ मुझसे ले, ताकि मैं बहुत न सही, गुरु-ऋण कुछ थोड़ा ही उतार सकूँ। वाकया यह है कि मैं हाथ मल के रह जाता हूँ और फिकर यह है कि कहीं यह चीज़ मेरे साथ ही न चली जाये। इससे ज़्यादा न सही, कम से कम इतनी ही चीज पैदा कर लें, ताकि दूसरों को इसी हद तक ले आवें। मैं तो इस चीज़ के देने के लिये यहाँ तक Over Flooded (सीमा से अधिक उत्सहित) रहता हूँ कि कोई मुझसे अपने घर का कुल काम जो नौकर करते हैं ले ले और इसी के एवज में मुझसे यह चीजें ले ले। मगर भाई एक मज़मून के तरीके से यह चीजें कह जाता हूँ मुमकिन है इसीलिये दूसरों पर इसका कुछ असर न रहता हो।

जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है, कि अगर ईश्वर इससे आगे चलने वाला पैदा कर दे, तब तो मैं अपनी किस्मत की सराहना करूँ और ऐसी उजड़ी हुई बस्ती की सैर कराऊं जहाँ जनून की भी गुज़र नहीं। मगर भाई क्या करूँ, इन्तिहा मुझको कहीं ‘मालूम नहीं पड़ती।’ इससे आगे कोई मुझसे सीख जाये और मैं सिखाये जाऊं। भाई, Negation (निगेशन) भी हमारा Goal (लक्ष्य) नहीं है। हमारा जो Goal (लक्ष्य) है, वहाँ के लिये हम इतना ही कह सकते हैं कि सिर्फ भूमा की ही गुज़र है, यानी यहाँ पर जात ही जात है। लोग Liberation (मुक्ति) के पीछे पड़ते हैं और अच्छा है कि इससे वाकई छुटकारा आवागमन से मिल जाता है और लोग इसी को Preach (उपदेश देना) करते रहे। ज़रा कोई निगाह उठा कर तो देखे तो पता चलेगा कि Liberation (मुक्ति) महज़ उसका तलछट है। कभी कुछ Hint (इशारा) मेरी जुबान से उस हालत का निकल भी गया, इत्तिफाक से किसी Polished Spiritual (बनावटी) के सामने, तो नतीजा यही हुआ कि उसने मुझे नावाकिफ ही समझा। यही वजह होगी कि ऐसे राज बतलाये नहीं जाते और मैं तो भाई बतला देता हूँ, उनकी राय मेरे बारे में बहुत कुछ सही है। अगर मुझमें वाकफियत ही होती तो मुमकिन था कि इस हालत तक न पहुँच सकता, क्योंकि यहाँ पर नावाकिफ़ों की ही गुज़र। ज़रा सोचो तो सही, मुमकिन है यह कुफ्र हो कि यह लफ़्ज़ क्या ईश्वर की असल तारीफ़ में नहीं आता। लोग इसको सोचने ही क्यों लगे। उनके ख़्याल में क्षीर-सागर और विष्णु भगवान और लक्ष्मी घूम रही हैं। हालांकि वह यह नहीं समझे कि यह चीज़ कैसे आ गई। भाई, यह सब दिल की हालतें हैं और इसी में विष्णु भगवान बेचारे मजबूरन रहते हैं। उनको कोई ऐसा नहीं मिलता कि उनको इस हालत से निकाले। बंधन की चीज़ का ख़्याल करने से भी बंधन में एक कड़ी लगा देता है। मजमून तूल ज़रूर हो जायेगा वरना यह चीज़ इस वक्त, निगाह में आ गई।

मुख्तरान कहे देता हूँ:-

दिल हमारा क्षीर-सागर है। मगर उसमें वासना का साँप मौजूद है, जो हमारे असल को फन से छुपाये हुए है। लक्ष्मी भी मौजूद है, गोया यह दूसरी कड़ी है, और हमको निजात इसलिये नहीं मिलती कि एक तरफ हममें केंचली-वृत्ति भी मौजूद है। पाँव दबाना विष्णु भगवान के माने यह रखता है कि वह असर जिस पर साँप का फन है, उसकी दासी बाकई यह कंचन है। अब उसमें जो लहरें या तरंगे हैं, जो समुद्र में पैदा होती हैं, हम अगर उनको दूर कर दें तो सतह बराबर हो जायेगी। फिर हमको मौका मिलेगा कि इन बंदिशों को काट सकें क्योंकि हममें ताकत भी आ जावेगी। असलियत जो दिल में छिपी हुई है, इसी को Mythologically (पौराणिक) विष्णु करार दे दिया है। हम जब वासनाओं का साँप दूर कर देते हैं, तो विष्णु भगवान के दर्शन प्राप्त होते हैं। यानी हममें भी यह ताकत आ जाती है कि हम दूसरे की रूहानी परवरिश कर सकें। अब चूंकि विष्णु का काम पालन-पोषण है, लिहाजा उसके लिए लक्ष्मी या कंचन की भी ज़रूरत है। अब विष्णु भगवान की Strength (शक्ति) भी आप पर रौशन हो गई कि बेचारे पालन-पोषण में दुःखी हैं। मैंने बहुत संक्षेप में लिखा है, क्योंकि दिमाग ज्यादा काम नहीं देता। कभी जुबानी समझ लेना यदि चाहो। जो शख्स विष्णु भगवान की पूजा करना चाहते हैं, वह अपने दिल की तरफ रूजू हों, बस यही उनकी पूजा होगी। जब उस चीज़ को तय कर लिया, तो और चीज़ शुरू होने लगती है।

तुम्हारे खतों को देखकर मेरी यही तबियत चाहती है कि मैं लिखता ही रहूँ। तुम्हारे हाल और कैफियत का तो मैं जवाब दे चुका, मगर इन्तहाई हालत के पहुंचे हुए की मैं तारीफ़ भी कर दूं ताकि पढ़ने वालों को सम्भव है ख़्याल की रंग में हरकत पैदा हो जाये और इस हद तक पहुँचने की कोशिश करें। वैसे तो सब ईश्वर ही के हाथ में है कि ‘वह’ जिसे चाहे अपनी तरफ खींच ले और जो चाहे वह उसे दे दे। मगर कोशिश करना हमारा फर्ज जरूर है ताकि ‘उसको’ भी खबर हो जाये कि कोई बंदा ‘उस’ तक पहुँचना चाहता है। Negation (निगेशन) की मैंने इन्तिहा बतला दी। जब इन्सान इन्तिहा की भी इन्तिहा को पहुँच जाता है, चलना फिर भी बाकी रहता है। जो शख्स इन्तिहा की इन्तिहा को पहुँच गया और हर परमाणु जिस्म का इन्तिहाई ताकत पर आ गया। हर Joint (जोड़) और हर गुत्थी ने इन्तिहाई कमाल को हासिल कर लिया। फिर क्या होता है? कुदरत का ख़ास औज़ार तो वह बन ही जाता है (गो यह बात ईश्वर के हाथ में है कि वह ऐसा आदमी बना दे) उसको सब कुछ अख्तयारात होते हुए भी उसे बेखबरी ही रहती है। मगर ईश्वरीय काम के लिये जो चीज ज़रूरी है, उससे बेखबर नहीं रहता। यह और बात है कि अपनी इन्तहाई हालत का बोध सिवाय खास सूरत में उसके अन्दाज़ में आवे। उसके हाथ में कुल Universe (विश्व) का इन्तजाम होता है और सब ईश्वरीय ताकतें उसके मातहत होती हैं जैसा कि मौजूदा Personality (दैवी व्यक्तित्व) का हाल है जो कोई भी हो। Efficacy of Rajyog (राजयोग का दिव्य दर्शन) में मैंने जिकर कर दिया है कि ऐसी Personality (दैवी व्यक्तित्व) मौजूद है। अवतारों को सिर्फ़ Destructive Programme (विनाश करने का कार्यक्रम) दिया जाता है, जैसा कि पुरानी किताबों से भी पता चलता है। Constructive Programme (रचनात्मक कार्यक्रम) उनके हाथ में नहीं होता। अब मौजूदा Personality (दैवी व्यक्तित्व) जो है, उसके हाथ में यह दोनों Programme (कार्यक्रम) है और वह अपनी मदद के लिये आदमी भी बना लेता है। अवतार के हाथ में तलवार भी होती है और उसके (Personality) हाथ में तलवार नहीं होती, बल्कि Circumstances (स्थितियाँ) ऐसी पैदा कर देता है कि नतीजा यही हो। अगर मौजूदा Personality (दैवी व्यक्तित्व) यह ज़रूरत समझे कि खून बहाने वाले अवतार की भी ज़रूरत है तो यह उसके बिल्कुल हाथ में है कि वह आयंदा अवतार आने का इन्तजाम कर जाये, अर्थात् उसके हाथ में है कि वह उसका इन्तज़ाम अभी से कर दे, यानी अपनी ज़िन्दगी में। अब सोचो तो सही लोग इस ज़माने में कुंडलिनी जगाने की फिक्र में ज़्यादा रहते हैं, मगर इस चीज पर निगाह किसी की नहीं जाती। बकौल 'कबीर' के “सब जग अन्धा, मैं किसे समझाऊं”। अवतार बुलाने की मैं तरकीब भी लिखे देता हूँ। बहुत छोटी सी है, इसलिये कि लोगों को यह तरकीब भी मालूम हो जाये।

हमारे यहाँ अवतार पर लोग अभ्यास से दिलचस्पी नहीं रखते। मुमकिन है कि इस करिश्में में ही दिलचस्पी पैदा हो जाये और वह हर रोज़ एक अवतार बुला लिया करें, क्योंकि तरकीब बहुत मामूली है, मगर अपनी ताकत और Will (इच्छा शक्ति) की मातहत जरूर है। तरकीब बस यह है कि ऐसी Personality (दैवी व्यक्तित्व) जब मुनासिब समझती है कि अवतार आना लाज़मी मालूम होता है तो वह यह करेगी कि ‘भूमा’ के करीब, Circle (सर्किल) जो कि उसको मुहीत किये हैं और जहाँ से कि Power (शक्ति) पहले मरतवे नीचे को उतरी, वहाँ पर वह ऐसा Vacuum (ख़ालीपन) पैदा कर देगा कि जो Time (मरतवे) मुकर्रर किया है, उस Time (समय) के अन्दर उसका नीचे उतरना शुरू हो जायेगा। आते-आते जिस वक्त वह महामाया के दायरे में आवेगा एकदम से उसमें उस मुकाम की ताकत जितनी जरूरत है, भर जावेगी। मगर उसका दायरा कायम रहेगा, उस वक्त तक, जब तक कि महामाया का मुकाम वह छोड़ न दे। अब जब महामाया का मुकाम छोड़ दिया, गोया उसका आना शुरू हो गया। नीचे उतर कर उसमें Godly Mind (ईश्वर-मन) का भी असर भरपूर हो गया, इसलिए कि ऐसा Vacuum (ख़ालीपन) जिसकी जरूरत थी ‘धुर’ पर बनाया। अब उसको छोड़ के ही पारब्रह्म-मंडल और ब्रह्ममंडल में गुजरता हुआ और ताकत लेता हुआ अब दुनियाँ में अवतीर्ण हो जायेगा और यह सब Vacuum (वैक्यूम) बनाने का असर है। उसको ज़िन्दगी महामाया के मुकाम पर मिलती है और जब वह Vacuum महामाया मुकाम पर पहुँच जाता है तो वही ताकतें उसमें पैदा होती है जिसकी ज़रूरत है। मैं इस चीज़ को बड़ी मुश्किल से Express (अभिव्यक्त) कर पाया हूँ। इससे उम्दा मुझे शब्द नहीं मिले, क्योंकि बेपढ़ा आदमी हूँ। आप लोग भी मुमकिन है इसके Expression (अभिव्यक्ति) के लिये अच्छे लफ़्ज़ ढूंढ सकें। मुमकिन है कि चौबे जी भी इसमें मदद दे सकें, इसलिये कि उन्होंने धार्मिक Literature (साहित्य) बहुत पढ़ा है और मुमकिन है इसका इशारा कहीं उन्हें मिल भी जावे। अगर मिल जाये तो मुझे भी लिखें। हालांकि यह कोई कायदा नहीं कि पिछले महात्मा जो कुछ कह आये हैं, उसके आगे कोई और बता न सके। है वही, जो मैं कहता हूँ। तरकीब मुमकिन है कि इससे बेहतर किसी को और मिल जावे, क्योंकि बड़े-बड़े स्वामी यहाँ पर मौजूद हैं और भाई मैं तो उनके सामने एक नाचीज़ और अदना और गुमशुदा हस्ती हूँ। ख़ैर, इससे ज़्यादा जो जानना चाहे इसके बारे में, तो उसे चाहिये कि वह खुद कोशिश करे। इन्सानी ताक़त और पहुँच का अन्दाजा लगाइये कि ईश्वर ने अवतारों का बुलाना भी इन्सान ही के हाथ में रखा है। सच तो यह है कि जहाँ तक इन्सान की पहुँच है, अवतार की भी नहीं हो सकती। हमें ऐसा इन्सान बनना चाहिये और भाई अगर ऐसी Personality (दैवी व्यक्तित्व) कहीं ईश्वर किसी के सामने खड़ी कर दे तो फिर उस शख्स का कहना ही क्या। अगर मोहब्बत है, तो नहीं मालूम क्या से क्या वह दे देवे। मैं आप लोगों से यही प्रार्थना करूँगा की ऐसी Personality (दैवी व्यक्तित्व) की खोज में रहिये कि अगर कहीं मिल गई तो ‘उसकी’ एक निगाह में कीमियाँ बन सकती है। मुझे तो भाई, फ़िक्र यों नहीं रही, मुझे जैसी शख्सियत की ज़रूरत थी और जैसी तालीम मुझको होना बदी थी, मुझे मिल गई। अब अपनी-अपनी आप जाने।

हज़रत किब्ला (लालाजी साहब):-

"भाई, मैं इस लिये कहे देता हूँ कि यह मौका बार-बार नहीं मिलेगा। चाहिये कि इस वक्त में इन्तिहाई पहुँच अपनी हासिल करो। क्या यह ख़्यालात आपने कहीं और देखे? क्या यह ज़ज्बा आपने कहीं और पाया? भाई बड़ी किस्मत से ऐसा आदमी मिलता है और फिर ऐसे वक्त में अगर ऐसा आदमी मिल जाये और उसकी तालीम नसीब हो तो बड़ी खुशकिस्मती की बात है। मैंने तो कुछ नहीं रखा जो इसको Ramchandra (रामचन्द्र) को दे न दिया हो और अब भी मेरा यही हाल है, जो मिलता है, बराबर दे देता हूँ। तुम लोग भी ऐसी ही कोशिश करो कि मेरा-सा जज्बा ‘इसके’ दिल में पैदा हो जाये और यह सब तुम्हारे हाथ में है। यह बड़ा Important (महत्वपूर्ण) खत है। इसकी दो-एक नकलें Preserve (रखना) करना चाहिये।"

प्रार्थना लाज़मी चीज़ है, जो मैंने उर्दू किताब में दे दी है और यह सोते वक्त ज़रूर हर भाई को करना चाहिए और कहीं इसको दिल से, प्रेम से कर गये तो फिर तरंग का खटका, ईश्वर ने चाहा, न रहेगा। यह भाई अवतार लाने की ताकत, जो मैंने लिखी है, अब तक, जहाँ तक मेरा Vision (दृष्टि) पहुँचता है, जिसकी किस्मत में थी उसी को मिली।

Swami Vivekanand Ji (स्वामी विवेकानन्द जी)

“As far as my inward vision goes and the experience of the Brighter world as well, I have not found Such person since the beginning of the world. Bluffing should be neglected in future. Be plain in your words. Who is that person? Say that you are. Whatever has been written in this letter is correct in toto. This is the common letter for all. It must be copied and published when time comes.”

“जहाँ तक मेरी दृष्टि जाती है यहाँ तक कि दिव्य-लोक में भी तुम्हारे जैसा दिव्य-व्यक्तित्व मैंने कहीं नहीं पाया है, सृष्टि के आरंभ से लेकर अब तक। भविष्य में दूसरों को धोखे में मत रखो। अपने वचनों में सच्चाई रखो। ‘वह’ कौन व्यक्ति है? कहो, कि वह दिव्य-पुरुष तुम हो। इस पत्र में जो कुछ भी तुमने लिखा है, पूर्णतः सत्य है। यह पत्र जन-सामान्य (सभी के) के लिए है। इसको उतार कर (नकल करके) जब समय आये तो छपवाना भी चाहिए।“

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-284
शाहजहाँपुर
6/3/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा पत्र मिला इसका जवाब मैं आगे इसी पत्र में दूंगा। इस समय रात के 10 बज चुके हैं और सिर भी भन्ना रहा है, मगर ख़ैर, जो कुछ समझ में आता है, लिखाये देता हूँ और यह पत्र तुम्हारे और शुक्ला जी के लिये होगा। मैंने पिछले पत्र में लिखा है पत्र याद तो नहीं रहा, अटकल से लिख रहा हूँ। Complete Negation (पूर्ण निगेशन) हो जाने से इन्सान Vacuumize (रिक्त) हो जाता है। इस तरह पर कि इस समय तक कोई आला ईजाद नहीं हुआ कि जो किसी चीज़ को Complete Vacuum (पूर्णतः रिक्त) कर सके। मगर इतनी बात और है कि Complete Negation (अपने न होने का पूर्ण भाव) की जब Forgetful State (भूल की अवस्था) आती है, तब कहीं पूरी तौर पर Vacuum (वैक्यूम) बनता है। उसकी ताकत का कहीं ठिकाना नहीं और यह चीज़ अवतारों में भी पाई नहीं जाती। ‘उसके’ हाथ में है कि इससे चाहे Constructive Work (रचनात्मक कार्य) ले, ख़्वाह Destructive Work (विनाश का कार्य) ले ले।

मेरा तरीका यही है कि शुरू से इन्सान Vacuum (रिक्त) बनता चले और ज़ाहिर भी है कि गुरू महाराज ने (कहाँ तक अनेकों धन्यवाद दिया जावे) जब मुझे बिल्कुल ऐसा ही बना दिया, तो फिर वही बीज जाना भी चाहिए। इसलिए अच्छे Guide (मार्गदर्शक) की तलाश की जाती है, और मेरा भाग्य था कि मुझे ऐसे Guide (गाइड) मिल गये। इसमें यह ताकत पैदा हो जाती है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी उसके हुक्म को टाल नहीं सकते। मगर यह बात ज़रूर है कि ईश्वर जब इस Approach (पहुँच) के लिये कोई आदमी ढूंढ़ता है, तो वह ऐसा ही ढूंढ़ता है, कि जो ईश्वर की मर्जी है, वही काम खुद व खुद करे। और मैं तो यह कहूँगा कि वह ऐसे आदमी को उसके गुरू के हाथ में दे देता है और मिलता भी उसी को है, जिसने अपने आपको अपने गुरू के हाथ में दे दिया है। इस Negation (निगेशन) की मैं कहाँ तक तारीफ़ करूँ। असल में यह चीज़ किसी बेहद की beginning (आरम्भ) है। न मालूम अभी और कितना जाना है। हंसी उन लोगों पर आती है कि जो रूहानियत से कोसों दूर होकर रूहानियत का प्रचार Platform (मंच) पर करते हैं।

मैं तुमको आज Perfection (पूर्णता) के मानी बतलाता हूँ। वैसे तो Perfect (पूर्ण) वाक़ई परमात्मा है जिसको दूसरे मानों में जात ही जात कह सकते हैं और इसी मानों में यह शब्द यहाँ पर इस्तेमाल किया है। मगर ख़ैर, जहाँ तक पूरे तौर पर बन्दे का Perfection (पूर्णता) कहा जाता है, वह यह है कि Nature (प्रकृति) से जितनी बातें पैदा हुई या उसमें मौजूद हैं, वह Ignorant (अज्ञानी) रहते हुए सबसे वाक़िफ़ हो। कोई इल्म या Science उससे न बचे। जरा कोई आँच दे दे और उससे वही बातें कुदरती तौर पर निकलने लगे जो वह जानना चाहता हो। यह कसौटी है पूर्ण आदमी की जाँच की।

मैंने अवतार लाने का पिछले ख़त में नुस्ख़ा लिख दिया है, ताकि लोग जब चाहें इस नुस्खे को इस्तेमाल कर लें। इससे सहज नुस्खा भी मुमकिन है धार्मिक पुस्तकों में तलाश करने से मिल जाये। हालांकि जो नुस्खा मैंने बताया है ‘भूमा’ के बाहरी हद के करीब Vacuum (खालीपन) पैदा करने का, मेरे ख्याल से एक सेकण्ड का काम है। Time Limit (समय की सीमा) का इतने अर्से में, अवतार आवे, मुमकिन है, दो-तीन सेकण्ड और ले ले। अब एक चीज़ इसके मुतल्लिक और बतलाता हूँ, कि जब मुसीबत इस हद तक मिलती है कि महात्माओं को भी इस हद तक दिल में ग्लानि पैदा होती है, कि जैसे किसी का दिल बैठा जाता हो, तो भी Automatically Vacuum (अपने आप ख़ालीपन होना) बन जाता है और उनके बगैर जाने बूझे हुये।

यह बात सिर्फ रामावतार के कुछ पहले हुई थी, मगर ज़्यादा Strong (सबल) नहीं थी, जिसका नतीजा रामचन्द्र जी का अवतार था। अब कृष्ण अवतार कैसे हुआ? जो भभूका कि रामावतार के समय फूट चुका था, उसका असर यह था कि वह खुद अपनी असली शक्ल में जो ज्यादा तेज़ था, कृष्णावतार के रूप में सरजद हुआ। इसी लिये वह ज्यादा ताकतवर था। इस ख़्याल को मैं ज्यादा अच्छी तरह Express (अभिव्यक्त) नहीं कर सका, अनुभव से ज़रूर दिखाया जा सकता है। दुबारा अवतार क्यों हुआ? मेरे ख्याल से उस वक्त जरूरत थी।

(डिक्टेट) Dictate:-लाला जी साहब-

“यह ख्याल ठीक है। ऋषियों ने रामावतार से पहले जो कुछ किया था, वह उस वक्त के लिये काफी था, मगर उनका ख़्याल जो कुछ कि असल में शोलाज़न (भभूका फूटना) कृष्णावतार के वक्त हुआ। तभी वह पूर्णावतार थे। अब यह मलका जो इस वक्त है, किसी में पैदा नहीं हुआ। कुदरत भी जब अपने किसी बन्दे को इख़त्यारात दे बैठती है, तो फिर उसमें वह अपना दखल नहीं देती।“

Swami Vivekanand Ji:-

“He becomes part and Parcel of Nature, Nay, he governs it. I am not using the word for God-Almighty. Nature is after God. You can call the present Personality above Nature or nearest God. “

स्वामी विवेकानन्द जी :-

“वह प्रकृति का अभिन्न अंग बन जाता है। नहीं, वह उस पर (प्रकृति पर) शासन करता है। मैं यह शब्द सर्वशक्तिमान ईश्वर के लिए प्रयोग नहीं कर रहा हूँ। प्रकृति, ईश्वर के बाद है। तुम वर्तमान दिव्य-पुरुष को प्रकृति से ऊपर या ईश्वर के निकटतर कह सकते हो।“

एक बात अवतार के बारे में मुझे और याद आ गई। वह यह है कि जो ईश्वर के हुक्म की पाबन्दी नहीं करते और भक्तों को तकलीफ देते हैं, या अच्छे मनुष्यों को दुःखी करते हैं, तो उसको ख़त्म कर देते हैं। Special Personality (विशिष्ट व्यक्तित्व) का भी यही काम होता है, मगर वह कोई ज़ाहिरा तौर पर मार-धाड़ नहीं करता, इस कारण ज्यादातर लोग उसके काबू में नहीं आते। अब एक बात मैं और लिखता हूँ कि अवतारों में Concentrated will (अटल या एकाग्र इच्छा-शक्ति) सिर्फ इसी पर होती है कि जो काम उनके सुपुर्द होता है और उनके सिर्फ एक ही काम सुपुर्द होता है। और भाई रही Special Personality (विशिष्ट-व्यक्तित्व) की ताकत उसकी Concentrated will (कन्सेन्ट्रेटेड-विल) अवतारों की तरह कैसे हो सकती है? इसलिये कि उसकी निगाह कुल Universe (विश्व) में रहती है, जैसे बड़े बादशाह की निगाह अपनी कुल सल्तनत पर। मुमकिन है कि इस ख़त में (विचार) पिछले ख़त के Repeat (दोहरा गए हों) हो गये हों, इसलिये कि पिछला कुछ Thoughts ख़त ज़्यादातर याद नहीं है और यह ख़त कोई मज़मून नहीं है, बल्कि जैसे विचार आते गये, लिखाता गया।

अब अभ्यासी Negation (निगेशन) और उसके बाद वाली हालत के काबिल कब बनता है? और कैसे उस हालत को पहुँचता है? एक तो जवाब इसका यह है, कि अगर Guide (मार्गदर्शक) इस हालत को पहुँचा हुआ है, तो उसकी मेहरबानी से वह पहुँच सकता है। अभ्यासी को यह चाहिये कि ‘उसे’ यह हालत देने पर मजबूर कर दे। अब यह कैसे हो सकता है? यह सब लोग जानते है; जिसके पास अक्ल है। वैसे भाई मेरा तो यह हाल है कि मैंने बहुत कुछ approach (पहुँच) एक साहब को डाट-डपट से दी थी और वह इसलिये कि मैं उनको खुश रखना चाहता था और वह उम्र में मुझसे बहुत बड़े भी थे, इसलिये और भी। मगर ईश्वर का धन्यवाद है कि मैंने उनको सिर्फ A, B, C, D, (ए, बी, सी, डी,) ही बता पाया था कि उनका रंग बदलने लगा। नतीजा उसका यह हुआ कि उन्होंने खुद ब खुद ऐसी बातें पैदा कर लीं और वह मुझसे ख़िलाफ़ हो गये। वह अपने आप इस कदर नीचे आये कि किसी दीन के न रहे और मैं उनकी अब भी इज्जत करता हूँ और बड़ा समझता हूँ। मेरे दिल में उनसे इतनी मोहब्बत भी है जितनी कि इन्सान को इन्सान से हो सकती है और अब दूसरी कमज़ोरी यह है कि अभ्यासी को मैं ठहरा हुआ नहीं देख सकता। इसका फायदा भी लोग उठा जाते हैं और जल्दी तो मेरे मिज़ाज़ में है ही। दूसरी चीज़ जो Negation (निगेशन) और उसके ऊपर तक पहुँचा सकती है वह तड़प और बेक़रारी है और भक्ति और प्रेम तो होना ही चाहिये। अगर प्रेम पैदा हो जाता है तो बेचैनी होना ज़रूरी है। अब तुम अपने सत्संग में टटोल लो कि कौन वाकई तौर पर ईश्वर का प्रेमी है।

किसी को एक मोहब्बत है, किसी को 1/2, किसी को 1/4 और इतने गिरे हुए भी निकलेंगे कि अगर उनको समझाने के लिये कोई सख़्त मजमून लिख दिया जाय तो सत्संग छोड़ने पर तैयार हो जायेंगे और किसी की तबियत में मलाल और गुस्सा पैदा हो जायेगा। इसके मानी यह है कि अपना आपा छोड़ने के बजाय उसको और मज़बूत करते हैं। भाई, मुझे तो लोग मुमकिन है, यह समझते हों कि यह मेरी Duty (कर्तव्य) है जो मैं कर रहा हूँ और यह सही भी है, मगर उन्हें इतना और सोचना चाहिये कि जितना वह Deserve (योग्य होंगे) करेंगे, उतनी ही मेरी Duty (ड्यूटी) होगी। मुझे सबसे मोहब्बत है, मगर उतनी, जितनी कि मेरा फर्ज़ है। मैं सबको मर मिटने के लिये कहता हूँ, मगर अफसोस यह है कि जो मर मिटने की Elementary (प्रारंभिक) बातें हैं, उस पर लोगों की निगाह नहीं जाती। मैं भी भाई, मजबूरन खुशामद-बरामद से काम निकालता हूँ। मुझे अक्सर पत्रों में शब्द बहुत तौल नाप कर रखने पड़ते हैं, इसलिये कि कोई बुरा न मान जावे।

Negation (निगेशन) का ख़ास तौर पर और सब आध्यात्मिक बातों का देने वाला तो ईश्वर ही है, इससे सबको इकरार है, मगर भाई, मुझे तो जो कुछ मिला, वह अपने गुरू महाराज से ही मिला। यह जरूर है कि ईश्वर का मुझे बहुत ज़्यादा शुक्रिया अदा करना चाहिये। इस बात का कि मेरी तबियत उसने ऐसी बना दी कि ऐसे बड़े महात्मा से मैं रूजू हुआ। ईश्वर से काम निकालने का तरीका यही है, जो हम अपने गुरू के साथ करते हैं और उससे Direct (सीधे) प्रेम भी पैदा हो सकता है और यह बहुत अच्छी चीज़ है। मगर इस चीज़ के करने वाले बहुत कम हुए हैं। हालांकि इससे अच्छा तरीका कोई भी नहीं हो सकता। अभ्यासी को चाहिए कि अपनी लगन बढ़ाता जाय और अगर ज्यादा न सही तो अपने Guide से इतना ही Submission (लगाव)) रखे जितना मख़तब में लड़के अपने उस्ताद से रखते हैं और भाई इतनी Duty (ड्यूटी) भी है। इस चीज़ से Guide को कुछ नहीं मिल जाता, बल्कि अभ्यासी को यह फायदा होता है कि वह चीज़ आने के लिये पात्र बन जाता है। जो वाकई Guide (गाइड) है, उसको अपनी इज्जत या शोहरत की आशा नहीं होती, बल्कि मिसालें ऐसी भी मिलती हैं, कुछ फ़कीरों की, कि जिन्होंने जाहिरा बातें ऐसी भी की हैं, जिससे Public (जन-सामान्य) उनकी इज्जत न करे और शिष्य भी छंट-छंटाकर ख़ास ख़ास रह जावें। ऐसी एक मिसाल कबीर की भी मिलती है कि उन्होंने एक समय पर ऐसा ही किया था।

भाई, शुक्ला जी ऐसे बनो कि मैं उस हालत को आप में दाखिल कर सकू कि जो मुझको सबसे प्रिय है। अगर यह न सही तो कम-अज-कम मेरी ज़िन्दगी में Complete Negation (पूर्ण निगेशन) की ही हालत पैदा कर लो और यह मैं सबसे कहता हूँ। मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि हमारे गुरू महाराज की संस्था गो सबसे छोटी है, मगर इस प्रकार की Masterly (आधिपत्यपूर्ण) तालीम संसार में किसी संस्था में नहीं मिलेगी और यह सही भी है कि हर युग में इस चीज़ के जानने वाले और सीखने वाले कम ही हुए हैं।

जिसको मोक्ष प्राप्त करना हुई, वह सच्ची लगन से इस तरफ लगा। इस जमाने में लोग बहुत से मोक्ष चाहते ही नहीं, इसलिये कि वह मोक्ष के मानी और हालत न समझते हैं और न समझने की कोशिश करते हैं। उन्होंने मोटर और कोठी का होना और रुपया ज़रूरत के लिहाज़ से काफ़ी होना ही मोक्ष से अच्छा समझ लिया है। यह उनके समझ में नहीं है कि अगर कहीं यह चीजें उनसे छिन जावें तो फिर उनकी खुशी का क्या हाल होगा और देखा तो यह गया है कि बहुत ज़्यादा रुपये वाले इस क़दर फ़िक्रमन्द रहते हैं कि किसी को नींद न आने का मर्ज़ और किसी को और कोई मर्ज हो जाते हैं। उनको तमाम जीवन भर मूंग की दाल और रोटी-तुरई और लौकी से ही साबका रहता है।

हमारे भारतवर्ष में स्वामी लोगों ने और खासकर सन्यासियों ने हम पर वह अत्याचार किये हैं और कर रहे हैं और ऐसा नुकसान पहुँचा रहे हैं कि मुसलमानों की तलवार भी नहीं पहुँचा सकी और हमारी अक्ल पर भी पर्दे पड़ गये। हमको Right और Wrong (सही और गलत) की तमीज़ जाती रही और रंगीन कपड़ों पर हम इस हद तक गिरे कि अपनी समझ Exercise (क्रियान्वित) करने को हमने कुफ्र समझा। काबिल सन्यासियों पर भी मुझे यह एतराज़ है कि उन्होंने नाकारा आदमियों को क्यों सन्यास दे दिया? जिसकी वजह से वह अपने आप को गुरू और काबिल समझने लगे। उसमें से जो पढ़े लिखे थे, वह सब Stage (मंच) पर उगलने लगे। अपना Experience (अनुभव) उनका कुछ भी नहीं। अब कुछ काबिल भी उनमें हैं। उन्होंने क्या काम किया कि दिक़ के मर्ज़ को उन्होंने और अच्छा करके बतला दिया।

अगर कोई शख्स ठोस पूजा में रमण करता है, फिर उसकी बड़ी तारीफ़ होती है और जब वह खुद बतलाते हैं तो ठोस किस्म की पूजा ही। वजह क्या है? मैं यही कहूँगा कि वह गिरोहबन्दी कायम करना चाहते हैं। मैं अपने तुच्छ विचार के अनुसार यही कहूँगा कि जिस संस्था में असली आध्यात्मिक शिक्षा नहीं है, वह गिरोहबन्दी ही है। जितने तरीके उनको बतलाये जाते हैं, उससे वह परमात्मा के निकट होने के बजाय और दूर हो जाते हैं। गोया लकड़ी से वह फ़र्नीचर बन जाते हैं। इससे तो यही अच्छा था कि वह कुछ न करते और हरी लकड़ी रहते कि जिस तरफ़ ज़रूरत होती, झुका दिये जाते। अब तो सन्यासी का मुख्य कर्म यही रह गया है कि Revival of Stone age (पत्थर-युग की पुनरावृत्ति) और जनता को यह चीज़ खूब पसन्द आती है और ऐसे ही आदमी को लोग महात्मा समझते हैं और उनको Submit (शरण जाना) भी करते हैं।

यह ऐसी बवा फैली है कि इसको ताउन और हैजे की बीमारी कहना चाहिये। कबीर साहब ने कितना सुन्दर कहा है- “ब्रह्म छाँड़ि पूजन लागे पथरा।“ मूर्ति पूजन तो सबसे ज़्यादा ठोस पूजा है, बल्कि जाप वगैरह जो बतलाते हैं, वह भी ठीक नहीं बतलाते, जिससे लोग और ख़राब हो जाते हैं। गर्जे मैं कहाँ तक कहूँ; संक्षेप के साथ अभ्यासियों के लाभ के लिये बयान कर दिया। मुझे तो भाई कहना ही है, वह भी चन्द आपस के लोगों से इन सन्यासी और उनके Followers (शिष्यों) से मैं कहूं, तो वह मुझसे नाराज हो जायें, इसलिये खामोश हूँ और सोच कर रह जाता हूँ। इतनी Warning (चेतावनी) मैं ज़रूर दे सकता हूँ, कि कुदरत इस चीज़ को बड़ी तेज निगाह से देख रही है और नहीं मालूम क्या होता है। यह जरूर है कि कुदरत ने जो भी इख़त्यारात मुझको दे दिये हैं, उसमें उसको इतनी मेहरबानी है कि वह दखल नहीं देती। मगर मैंने अपने आपको और कुदरत ने भी मुझको गुरू महाराज के हाथ में दे दिया है, इसलिये बन्दे को हुक्म का इन्तज़ार रहता है।

एक मुश्किल यह भी है कि आप लोग मेरा ज्यादा समय लेते रहते हैं, इसलिये मुझको ईश्वरीय काम करने के लिये ज्यादा समय नहीं मिलता। समय ज्यादातर कौन लोग लिया करते हैं, जिनको ब्रह्म विद्या की असली मानों में प्यास नहीं है। अगर वह Submission (शरणागत) भी कर लें तो भी मेरा बहुत समय बच जावे चाहते लोग यह हैं कि चीज़ मुफ्त मिल जावे और मेहनत न करना पड़े। मुझे इसमें कुछ आर नहीं, क्यों कि मैं तो इसलिये बनाया ही गया हूँ। मगर इस सेवा के ही एवज़ में मुझ पर लोग तरस खायें ताकि मुझको और कामों का भी अवसर मिल जावे। अगर अभ्यासी वाक़ई तौर पर ऐसे बन जायें जैसा उनको होना चाहिये तो मेरे पास से चीज़ खुद व खुद उनमें जाती रहे। इस पत्र का और इससे पिछले पत्र का मतलब यही है कि लोग सब फेर को छोड़कर सिर्फ एक ही फेर में पड़ जायें और इन चीज़ो को देखकर उनमें, ब्रह्मविद्या को सीखने की तड़प और शौक़ पैदा हो जावे। ईश्वर करे ऐसा ही हो।

बिटिया व शुक्लाजी, मैंने यह लम्बे-चौड़े पत्र लिखकर आपका बड़ा समय नष्ट किया है। कहीं आप लोगों के दिल में यह ख्याल तो पैदा नहीं होगा कि इतनी देर अगर अभ्यास करते या मैं इतनी देर आप लोगों को तवज्जोह देता, जितना समय मैंने खत लिखने में लगाया है तो ज़्यादा फायदा होता। सो आप लोग पत्र को ज़रा पढ़कर तो देखें तो मालूम हो जायेगा कि आप लोगों का समय नष्ट नहीं हुआ और ‘मालिक’ की कृपा से यह चीज़ मेरे हर ख़त में मिलेगी।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-286
शाहजहाँपुर
6/3/1953
प्रिय बेटी, शुभाशीर्वाद।

इतनी आल्हा लिखने के बाद अब तुम्हारा चौथी मार्च सन् 53 के पत्र के उत्तर लिखाने का अवकाश मिला। इसको आल्हा मैंने यूं कहा है कि जब लोग आल्हा सुनने जाते हैं, तो उतनी देर के लिये तबियत में हिम्मत आ जाती है। ऐसे ही मेरे पत्रों को सुनकर थोड़ी देर के लिये अपनी तबियत ताज़ा कर लेते हैं, इसलिये उसको आल्हा ही कहना चाहिये। राम कहानी तो यह उस समय बन सकती है, जब कि अभ्यासी इतनी तड़प पैदाकर लें कि बिला उसके हासिल किये हुये उनको चैन ही न आवे।

मैं तुम्हारे साहस और Faith (विश्वास) पर बहुत खुश हुआ। मगर Faith (फ़ेथ) की इससे ऊंची भी अवस्था है, जो मुझ पर एक बार गुजरी है। जब वह आवेगी, तो मैं लिख दूंगा। वह चीज़ भी अभी बहुत दूर है, मगर पैदा इसी तरह से होती है, जो तुम्हारी हालत है और मैं तुम्हारी हालत देख-देखकर बड़ा खुश होता हूँ और सबसे प्रशंसा भी करता हूँ, यानी उन लोगों से, जो इस रास्ते पर चल रहे हैं, मगर मैं अपनी निगाह को क्या करूँ। मुझे तो उन्नति के सागर में अभी बुलबुला ही दिखाई देती हो। बिटिया! कहीं यह न कह बैठना कि मेरा सब प्रेम और परिश्रम केवल बुलबुले भर ही उन्नति बताई है, सो बिटिया! इसके लिये मैं क्या करूँ कि इतनी तरक्की करने पर भी तुम बुलबुले मात्र दिखाई देती हो। कहीं यह मेरी निगाह का कसूर तो नहीं है।

चिन्ह ऐसे ज़रूर हैं कि अगर यही शौक बना रहा जैसी कि उम्मीद है, तो आला दर्जे की तरक्की का आनन्द ईश्वर ने चाहा चक्खोगी। तुम्हारा पत्र बता रहा है कि मेरे जुनून की आँच तुम पर कुछ ज़रूर असर कर गई है। अगर इतनी ही बात अभ्यासियों में पैदा हो जाये तो भी बहुत कुछ सुधर जायें। तुमने शुरू में प्रेमी का भाव लिया था, जिसका नतीजा यही होता है कि अभ्यासी प्रीतम बन जाता है, मगर अभी पूरी तौर पर तुम प्रीतम नहीं बन सकी। हो सकता है कि यह चीज़ बहुत कुछ किसी वक्त पैदा हो जावे। मगर मैं यह जरूर कहूँगा कि अभी तक पूरे तौर पर अपना आपा मिट नहीं सका। यह चीज बहुत कुछ आगे बढ़ कर ईश्वर देता है, तो कुछ न कुछ नसीब हो जाती है।

असल में तो अपना आपा Complete negation (पूर्ण निगेशन) में जाता है और दर्जे मेरी समझ से जिसको असल महत्वगीरी कहते हैं, उसके बाद शुरू होते हैं। यह किसको ख़बर है? मुझे तो अब किसी किसी समय यही तड़प रहती है कि लोग इस हालत को पहुँचे। तुमने लिखा है कि “नम्रता की हालत में भिदती चली जा रही हूँ” और फिर लिखा है कि “वही मेरा रूप हो गया है और उस दशा के होते हुए भी मैं उसे भूली सी रहती हूँ” और यह भी लिखा है कि “उसमें भिदाव होता चला जा रहा है।“ यह तो बड़ी अच्छी हालत है और इसके मानी यह हैं कि तुम उसकी लय-अवस्था के किनारे पर आ गई। मैं अभी देखता हूँ कि तुम किस क़दर अपने आप भिद रही हो और अपनी कोशिश से कितनी हो सकती हो? ऊपर तो मैं तुम्हें ले ही जा रहा हूँ, उसका असर भी इसमें लय-अवस्था हो सकता है और कहीं मुझे उचंग आ गई तो मुझसे यह भी कुछ दूर नहीं कि मैं इसमें तुमको लय कर दूं या लय करने की शक्ति पैदा कर दूं। यह सब ‘मालिक’ की मौज पर है, तुमको मैं नीचे छोड़ना नहीं चाहता। मैंने तुमको इस समय पत्र लिखाते-लिखाते ‘N’ (एन) स्थान पर खींच दिया है। ईश्वर ने चाहा तो दो-चार रोज़ में, ही उसकी सैर भी शुरू हो जावेगी। वक्त 9.50 P.M. (पी.एम.) है, जब ‘N’ (रात्रि 9 बजकर 50 मिनट पर) पर खींचा है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-289
शाहजहाँपुर
14/3/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत 9 मार्च सन् 53 का भी मिल गया। तुम्हें मालूम है कि जो मुकाम तुम तय कर रही हो, उसके नाम मैंने A,B,C,D रख दिये हैं। जहाँ तक कि हमारा ख़्याल है, A से Z (ए से ज़ेड) तक जाने कितनी गिन्तियाँ ख़त्म हो जायेंगी। मुकामात के गिनने का तजुर्बा कर रहा हूँ। तबियत ज़रूर घबराती है कि कब तक गिनता रहूँगा। तुम बताओ मुझे क्या करना चाहिये? वैसे इससे अच्छा और हो ही क्या सकता है कि हर मुकाम की सैर होती चले। जब हम ऊपर को खींचते हैं, तो एक निगाह सैर कराने की ज़रूर डाल देते हैं, मगर तुम्हें सैर कराने की तबियत यूं चाहती है कि तुम्हारा एहसास ईश्वर की कृपा से बहुत अच्छा है। चीज़ उतनी ही सब में पैदा हो जाती है, मगर अभ्यासी जान नहीं पाता। मुझे अपने बारे में पता नहीं है किन्तु ‘लाला जी’ साहब ने फ़रमाया है कि महासमाधि लेने से पहले जब मैं आपके यहाँ चन्द दिनों के लिये गया था, कमाल दे चुके थे। मगर उसके बाद बारह साल और लिये और इस दौरान में जाने क्या-क्या मुकामात और क्या-क्या सैर कराई और फिर जब हालत मौजूदा खुलना शुरू हुई तो फिर तीन महीने रात-दिन मुझ पर रूजू रहे। रात में मैंने यह अनुभव किया है कि बराबर मुझको आध्यात्मिक Force (शक्ति) से भरते रहते थे। मेरी अक्ल काम नहीं करती क्योंकि मिज़ाज़ में जल्दी है और चाहता यह हूँ कि जिन लोगों को शौक है, और मोहब्बत है, उनको कम से कम पाँचवे Circle (सर्किल) तक पहुँचा ही दूं, ताकि मैं उनसे फारिग होता चलूं। उसके बाद वह हिम्मत करें तो मैं और आगे बढ़ाऊं। अब मास्टर साहब से मैं बेफिक्र हूँ। निगाह ज़रूर कभी-कभी डाल लेता हूँ, यह तो मेरा फर्ज़ ही है। उन्हें मिशन की मोहब्बत और काम अब आगे बढ़ा रहा है।

कभी-कभी ख़्याल तुम्हारे बारे में भी आ जाता है, कि पाँचवे Circle (सर्किल) तक खींच दूं ताकि तुमसे भी इत्मिनान हो जाये। मगर यह न समझ लेना कि इससे आगे मैं किसी को बढ़ाना नहीं चाहता। मुझे तो खुशी उस वक्त हो, जब मुझसे भी ज्यादा लोग तरक्की करें। हमारी तरक्की ही क्या - एक सोये हुये से हैं और सोने का एहसास नहीं। मगर ख़ैर, जो कुछ भी है, उसका शुक्र अदा करता हूँ और चाहता यह हूँ कि लोग इससे ज़्यादा हिम्मत करें। अगर कहीं दस-बारह भी मुझसे बन गये और बोलने के लिये उनकी जबान भी पैदा हो गई तो ईश्वर ने चाहा मिशन का नक्शा ही बदल जायेगा। अब तुम्हारे ख़त का जवाब देता हूँ। तुमने लिखा है कि “दशा और भीतरी व गम्भीर हो गई है।“ इसके माने यह है कि लय-अवस्था और बढ़ गई और यह उस मुकाम की लय-अवस्था है जहाँ पर कि तुम हो। हर मुकाम पर लय-अवस्था और सारूप्यता की हालत होती है। तुम्हें ‘N’ Point (एन पॉइंट) पर मैंने खींच दिया था और यह एहसास सही है।

हम ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते जाते हैं, सूक्ष्म होते जाते हैं। यहाँ तक कि हम कुछ नहीं रहते। हमें कुछ न रहना ही चाहिये। अब थोड़ा सा और बताता हूँ। हम जब सूक्ष्म होते हैं तो, हमारे चित्त में सूक्ष्म लहरें उठा करती हैं और हम जब कुछ नहीं रहते तो चित्त में लहरें उठ जाना बन्द हो जाती हैं। लहरें चाहे जितनी सूक्ष्म क्यों न हो, कुछ न कुछ हमारी शान्ति में बाधा ज़रूर डालती हैं और Senses (वृत्तियाँ) भी कुछ मज़े का एहसास करते रहते हैं। अब उनसे छुटकारा तभी हो, जब हमें सूक्ष्मपने से छुटकारा मिले। संक्षेप में लिख दिया, इतनी ही इसकी ज़रूरत थी।

आज इस समय 9.20 A.M. (प्रातः) पर ता. 15.3.53 पर तुम्हें ‘O’ (ओ) स्थान पर खींच दिया। अम्मा को प्रणाम।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-291
शाहजहाँपुर
20/3/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा पत्र 12 मार्च और 16 मार्च का मिल गया। 12 मार्च के ख़त का जवाब देता हूँ। तुमने लिखा है कि “निगाह में ‘मालिक’ रहता था, कि मैं उससे भी ओझल हो गई हूँ।“ इस ख़्याल को तुम ठीक Express (अभिव्यक्त) नहीं कर सकीं। जहाँ तक मैं इनको समझा हूँ, जवाब दे रहा हूँ। यह एक लय-अवस्था की हालत है। जब तुम ‘मालिक’ के ध्यान में जाना चाहती होगी तो ख़्याल उलटता होगा और तुम्हारे जिस्म पर बधंता होगा। क्या यह बात ठीक है? अगर ठीक है तो तुम्हारा कुल शरीर यही एहसास दिलाता होगा कि तुम खुद ‘मालिक’ हो। लिहाजा अब यही ध्यान बाँधना चाहिये और ख़्याल में रहना चाहिये कि यह शरीर वगैरह जो कुछ है, यह सब ‘मालिक’ ही का शरीर है। फर्ज़ कर लो तुम ‘A’ (ए) का ध्यान करती थी तो अगर मेरा अनुभव ठीक है और तुम्हारी वही हालत है जो मैंने ऊपर लिखी है तो तुम ‘A’ का मय उसके जिस्म के अब अपने आप को मान कर ध्यान करना शुरू करो और मानना क्या, अगर वाकई तुम्हारी यही हालत है, तो आज खुद ऊपर के तरीके में तुम्हें अपना ही ध्यान शुरू हो गया होगा। तुम लिखना कि मेरा एहसास कहाँ तक ठीक है। तुमने जो शुद्धपन लिखा हैं, तो जितना आगे बढ़ती जाओगी शुद्धता ही शुद्धता मिलती जायेगी।

अब 16 मार्च के ख़त का जवाब देता हूँ। तुमने लिखा है, मेरे लिखने पर कि तुम्हारा जो कुछ भी अनुभव है, वह मेरी बदौलत है। वास्तव में ऐसा नहीं है। अगर मुझमें काब्लियत होती तो जितने मेरे पास आते सबका ऐसा ही एहसास हो गया होता। यह सब तुम्हारी जाती मेहनत, प्रेम और लगाव का असर है। Innocence (मासूमियत) की जो हालत लिखी है, यह तुममें कुदरती हालत मौजूद है जिसके मानी यह हैं कि तुम पैदाइश ही से बहुत कुछ शुद्ध आई हो। तुमने जो नम्रता लिखी है, यही ठीक है। इस नम्रता को तुम इतना अपना रही हो कि उसमें भी लय-अवस्था की शुरूआत है। अभ्यासी को हर हालत में लय होना चाहिये, तब कहीं Master Minded (स्वामी) आदमी बनता है। हमारे यहाँ तो लोग पूजा और ध्यान के बाद जो कुछ भी थोड़ा बहुत करते हों, उससे ताल्लुक़ ही नहीं रखते। कहकर और लिखकर हार गया मगर उनके जूं ही नहीं रेंगती। यह हो सकता है कि उनको एकदम से खींचता ही चला जाऊं। कुछ कर भी जाता हूँ। मगर इससे न मुझको आनन्द आता है और न उनको। मेरा दिल तो सबके लिये यही चाहता है। जितनी लालसा अभ्यासी को होगी, उतनी ही जल्दी ईश्वर को आकर्षित करेगा। मसल मशहूर है कि जब तक बच्चा रोता नहीं, माँ दूध नहीं पिलाती। बाकी अबकी जवाब आने पर लिखूंगा। अम्मा को प्रणाम।

ईश्वर की मर्ज़ी उस समय तक नहीं होती, जब तक कि बन्दे को ‘मालिक’ के पाने की लालसा नहीं होती।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-293
शाहजहाँपुर
23/3/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

कल बतारीख 22.3.53 अन्दाज़न 2.30 pm पर मुझे ‘O’ point (ओ पॉइंट) पर कुछ कमजोरी मालूम हुई। कमज़ोरी मैंने उसी वक्त रफा कर दी थी। आज ता. 23.3.53 को 10.15 P.M. पर तुम्हें मैंने Point ‘P’ (पॉइंट पी) पर डाल दिया। सैर के परमाणु मैंने इसी वक्त भर दिये हैं, मुमकिन है 2 या 3 बजे से आज ही सैर शुरू हो जाये। अब तुम हाल लिखना। जब तुम्हें पूरा एहसास हो जावेगा, जो शायद दो-चार दिन में हो जावेगा, तब ईश्वर की कृपा से अगले स्थान पर खींच दूंगा। मेरी समझ से मैं इनको गिन न सकूंगा, क्योंकि बहुत अधिक मुकामात हैं। ‘Z’ (जेड) तक ख़तम करने के बाद मुमकिन हो सका तो हर तीसरे रोज़ या जैसा मौका हुआ, एक Point (पॉइंट) ले लिया करूंगा। आज तुम्हारा ख़त 20.3.53 का मिल गया। जवाब की कुछ ज़रूरत नहीं थी। इसलिये नहीं लिखाया।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-296
शाहजहाँपुर
2/4/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे खत 24.3.53 और 29.3.53 के मिल गये। 24.3.53 के ख़त का जवाब दे रहा हूँ। जब लय-अवस्था बढ़ जाती है तो इस ख़्याल करने की ज़रूरत कम रहती है, कि यह काम ‘मालिक’ कर रहा है। ‘मालिक’ में जितनी पैवस्तगी ज़्यादा होगी, उतनी दुई कम होगी। पूजा में दुई आ जाती है, इसलिये दिल पर भारीपन महसूस होता है। ऐसी हालत में हल्का-हल्का Natural way (स्वाभाविक रूप में) में ध्यान करना चाहिये। जितनी दशा हल्की होती जाती है, उतना Expression (अभिव्यक्ति) के लिये शब्द नहीं मिलते। आगे हालत में सूनापन ही बढ़ता है और फिर वह भी नहीं रहता।

29.3.53 का जवाब यह है, मैं इस हालत को पढ़कर उछल पड़ा कि “अपना ही ध्यान और अपनी ही अर्चना और वन्दना करती हूँ।“ यह अच्छी लय-अवस्था की खुशख़बरी है। किसी ने कहा है :-

“अपने सजदे के सिवा गैर का सजदा है हराम।”

मैं 29.3.53 के खत का बहुत जवाब लिखाना चाहता था, मगर मुझे लिखने वाला न मिला। ख़ैर, ईश्वर की मर्जी। अपने आप जो लिखा है, बहुत टूटा-फूटा लिखा है और उसका भी Expression (अभिव्यक्ति) ठीक नहीं। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-301
शाहजहाँपुर
12/4/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

तुम्हारे ख़त सब मिल गये। हिन्दी मुझे नहीं आती। लिखने में भी हाथ काँपता है और जो सोचता हूँ उसको, जब लिखने बैठता हूँ तो, विचारों की लड़ी ठीक नहीं बन पाती। कहाँ तक मैं अपने नुक्स लिखूं। दूसरे का मोहताज ही रहना पड़ता है। एक चना भाड़ फोड़ नहीं सकता। चाहता यह हूँ कि सब मिलकर जो काम जिसके लायक है, उसको करें, मगर लोगों में दिलचस्पी पैदा नहीं होती। जिसकी ईश्वर-विषय में दिलचस्पी पैदा नहीं होती, तो वह मिशन के ही काम में दिलचस्पी पैदा करे, तो भी हो सकता है, क्योंकि अगर Sincerity (निष्कपटता) साथ है तो ईश्वर-विषय में भी दिलचस्पी पैदा हो जाय। मगर पित्तामारी कोई करने ही क्यों लगा, गरज़ तो मेरी रह गई है और है भी ऐसा ही। इसलिये वास्तव में मैं खुशामद ही सबकी करता हूँ। इसलिये कि इस चापलूसी से ही कोई फायदा उठा ले। लोग इस इबारत को देखें तो वाकई हंसेंगे, मगर मैं अपनी तबियत को क्या करूँ कि मैं सबकी सब, सब में उड़ेलना चाहता हूँ। मुमकिन है कि यही वज़ह हो कि लोग ग्रहण करने के लिये तैयार न होते हों। उड़ेल तो मैं जाऊंगा ही, ख़्वा वह फिर छलक क्यों न पड़े और जिसमें उड़िल गई, तो फिर दूसरे छलकी हुई चीज़ पा सकेंगे। इसीलिये मैं चाहता हूँ कि सब में उड़ेल दूं। और इस वक्त में तो ऐसा है कि सबमें या जो चाहें उनमें, असल हालत उड़ेली जा सकती है।

अब यह तो और लोगों के बारे में कहा, अब मैं अपनी कहता हूँ। इतना सुस्त हो गया हूँ और नाकारा कि ऐसी मिसाल तो शायद कहीं न मिले। सुस्ती की यह हालत है कि जैसे किसी में जान न रही हो। चारपाई पर अगर लेटा हुआ हूँ, तो छः महीने उठने की तबियत नहीं चाहती। खाना तैयार है और सुस्ती इस क़दर कि कौन खाये इस वक्त; फिर देखा जायेगा। प्यास लगी हुई है, और इस इतंजार में है कि आराम से कौन उठे; जब उठेंगे, पानी पी लेंगे। काम पड़े रहते हैं और करने का जी नहीं चाहता। ठीक है, ईश्वर के यहाँ इंसाफ़ होता है। ऐसे सुस्त और काहिल आदमियों को काहिल और सुस्त आदमी मिलते हैं। मैं जानता हूँ, हमारी संस्था में काहिली और सुस्ती का ज़िम्मेदार मैं ही हूँ, और यही वजह मालूम होती है कि लोग मेरा कहना ज़्यादातर नहीं सुनते। मुर्दे से भला किसको जिन्दगी मिली है और सुस्ती से भी चैतन्यता कब हो सकी है? दोनों एक दूसरे के खिलाफ (Opposite) हैं।

अच्छा, अब मतलब पर आता हूँ। मैं ‘P’ (पी) स्थान पर ज़्यादा तवज्जोह दे गया था, और वह यह थी कि मुझे कुछ अन्दाज़ नहीं लग सका और यह गलती हमेशा जल्दी की आदत से होती है। कुछ ऐसी आदत पड़ गई है कि जल्दी से इस चीज़ को ख़त्म कर दूं, ताकि बार-बार रूजू न होना पड़े। मैं अक्सर काम को ख़त्म करने में Special will (विशेष इच्छा शक्ति) इस्तेमाल कर जाता हूँ और उसमें जल्दी की वज़ह से यह अन्दाज़ नहीं होने पाता कि कितनी Intensity (गहराई) होनी चाहिये। मैं बड़ी कोशिश करता हूँ, मगर यह चीज़ अब तक ठीक नहीं आई है। ‘P’ (पी) स्थान पर ज्यादा तवज्जोह देने की वजह से उसमें इतनी शक्ति पैदा हो गई कि तुम उसको हज़म ही नहीं कर पा रहीं थीं। जब देखा कि चीज़ हजम नहीं हो रही है, तो फिर उसे हज़म कराना पड़ा और साथ ही उसके यह भी ख़्याल रक्खा कि उसमें Mind कहो या चैतन्यता कहो, ऐसा पैदा कर दिया तुम खुद अगले मुकाम पर पहुँचो। चुंनाचे आज 11.45 A.M. पर तुम आगे बढ़ने लगीं। जरा सा सहारा मेरी लगाने की ज़रूरत थी, वह लगा दिया और तुम 'Q' (क्यू) स्थान पर पहुँच गई।

यह ख्याल तुम्हारा ठीक है कि सुगन्ध - आध्यात्मिक तुमसे हर समय निकलती है। तुमने लिखा है कि पैदा होती रहती है पैदा नहीं होती, बल्कि सबमें मौजूद है। आवरण पड़े होने के ख़ातिर, जो इंसान के खुद डाले हुए हैं, महसूस नहीं होती। तुमने लिखा है, कि सब शुद्ध ही शुद्ध दीखने लगा है - यह एहसास तुम्हारा सही है। जब इंसान बहिर्मुखी नहीं रहता, बल्कि अन्तर्मुखी हो जाता है, तो वही अन्दर वाली हालत बाहर मालूम होने लगती है। वैराग्य इसीलिये जरूरी है कि जब राग उस चीज़ से हो जाता है, तो उसका Weight (वज़न) ख़्याल में पूर्ण वैराग्य हो जाने पर नहीं रहता और चीज़ निगाह और ख़्याल से हट जाती हैं। जब यह हालत हो जाती है, तो फिर ईश्वर ही ईश्वर रह जाता है और जंगल में बैठने और तपस्या करने की ज़रूरत नहीं रहती। तुमने यह भी लिखा है कि “जिससे मैं खुद अपने दर्शन करने लगी हूँ और जिससे मैं अपने को पहचानने लगी हूँ।“ इसमें से मैं इसका मतलब नहीं समझा कि “मैं अपने को पहचानने लगी हूँ।“ तुम लिखो कि तुमने क्या पहचाना। जब ‘मालिक’ में ज़्यादा प्रवेश हो जाता है तो फिर अपनापन जाता रहता है और अपने से मतलब ‘मालिक’ का हो जाता है, यानी यह काम सब ‘मालिक’ कर रहा है। मगर यह कच्ची लय-अवस्था है। जब यह भी ख्याल जाता रहे यानी इसका Weight (वजन) भी न रहे कि काम कौन कर रहा है, तब अच्छी लय-अवस्था कही जा सकती है। मगर इसके बाद अभी कुछ और है। यह ज़रूर है कि तुम अब अपना ध्यान करने लगी हो। जहाँ तक कि मेरा ख़्याल है और मुमकिन है उसी को तुमने अपना पहचानना लिखा हो। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-304
शाहजहाँपुर
22/4/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारा 16 अप्रैल का मिल गया। योग-मार्ग में अपना भिदाव अतंरिक्ष होता है। तुमने लिखा है कि “रग-रग में समा चुकी हूँ।“

“अभी और समाना बाकी है और रास्ता अभी बहुत चलना है। अभी तो शायद रुपये में एक पैसा या दो पैसा भर चल पाई होगी। यह अनुभव तुम्हारा ठीक है कि अपने ज़रें ज़रें में अपना ही जल्वा देखती हो, यह जल्वा अभी पूरी तरह से नहीं देख पाया है, इसमें भी अभी बहुत कमी है। हमें तो शुरू से आखिर तक ऐसी आँख बना देना है कि रोशनी ही रोशनी रह जाये और आँख आँख को न देख सके।“

यह तुम्हारा ठीक अनुभव है, इसको मैंने पहले लिखा भी था कि तुम्हारा दिल नहीं खुला है। दिल हमारे यहाँ खोला जाता है, जिससे हदबन्दी एक तरह की ख़त्म हो जाती है। तुमने अच्छी याद दिलाई, दिल को मुझे अभी ठीक करना है। ऊंचा तो तुमको मैंने पहुँचा दिया, मगर दिल से बेखबर रहा। तुमने लिखा है कि “‘मालिक’ स्वतंत्र होते हुए बन्धन में आ गया है,” इसके यह माने है कि ‘उसकी’ ताकत तुममें समा रही है और उसमें ‘उसका’ अनुभव हो रहा है। क्योंकि तुममें खुद बन्धन मौजूद है, इसलिये ‘वह’ भी बन्धन में महसूस होता है। बन्धन वाले आदमी में ईश्वर भी सीमाबद्ध दिखाई पड़ता है। यह भी वजह है कि ईश्वर का जब कभी ख़्याल किया, वह अपना जैसा समझ में आया और ठोस पूजाओं की शुरूआत हो गई। तुमने जो बराबरी वाली बात लिखी है, वह ब्रह्म की झलक है और यह हालत बताती है कि अब तुम सीधी उसी में जा रही हो।

तुमने लिखा है कि “मेरे शरीर का अंग-अंग शीशा हो रहा है।“ इस हालत को या तो तुम घुमा गईं या समझ नहीं पाई। मुझे यह ऐसी हालत मालूम होती है कि तुम्हारे जिस्म के हर जर्रे में ‘मालिक’ की शक्ल मालूम होती होगी और यह बड़ी अच्छी हालत है, ईश्वर मुबारिक करे।

तुमने लिखा है कि “मैं कहने में न मैं का बोध होता है, और न तू कहने में, तेरे का बोध होता है।“ यह लय-अवस्था की अच्छी गति है। अभी Body Consciousness (शरीर की चेतना) बाकी है और इसके समाप्त होने में ज़रा देर लगेगी। इसकी पहिचान यह है कि तुम अपने जिस्म को ‘मालिक’ का जिस्म मान कर ध्यान कर रही होगी और यह लय-अवस्था की दूसरी हालत है। मगर इसको ऐसा ही करती जाओ, जब तक कि यह अपना ठिकाना खुद न बता दे। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-306
शाहजहाँपुर
25/4/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 22 अप्रैल का लिखा हुआ मिला, पढ़कर गदगद् हो गया। यह कुछ जमाने की खूबी है कि शीशा और हीरा एक ही भाव बिक रहें हैं और ज़माने की भी ख़ता नहीं, ख़ता उनकी है, जिन्होंने ज़माने को बिगाड़ा। यहाँ तो मामूली पढ़े-लिखे और कुछ धार्मिक विचार वाले ‘गुरु’ बन जाते हैं और उनको सिखाने वाले भी अधिकतर वैसे ही मिल जाते हैं। कहीं वेश फकीरी बदल लिया, तो फिर जगत गुरु बन बैठे और लोगों को बढ़िया-बढ़िया पूजायें सिखाने लगे। वेश के कारण लोगों को भी विश्वास जमने लगा और उन्होंने उन पूजाओं को करना आरम्भ कर दिया। यहाँ मुझको कौन पूछे कि जहाँ वेश तो क्या रंग तक नहीं रहा। अगर हम किसी से कुछ कहते भी हैं तो कोई माने क्यों। इसलिये जो अदायें साधुओं में होती है, उनका तो पता भी मुझमें नहीं है। स्वामी विवेकानन्द जी ने अपने एक लेक्चर में कहा है कि अगर कहीं हम बीस आदमी ऐसे बना सकें, जिसकी नज़र अन्तरिक्ष हो गई हो और अपने को अपने में देखने लगे तो मेरा काम ख़त्म हो गया। मैं समझता हूँ कि उनको एक ही दो आदमी मुश्किल से मिले होंगे और मैं सैकड़ों चाहता हूँ तो यह चीज़ बिना ‘ईश्वर’ की मदद के नहीं हो सकती और यह सब ‘उसकी’ मर्ज़ी पर है। हम बस काम किये जाते हैं, जो इसके लायक मिलता है।

तुमने हमारे Pamphlet (पेम्फ्लेट) गुरु-सन्देश में पढ़ा होगा कि ईश्वर-दर्शन की हालत क्या है, हमें तो वही हालत चाहिये। शंख-चक्र-गदा-पद्म वाला तो उन्हीं को मुबारक रहे, जो इसी को असल चीज समझते हैं और जिन्होंने ईश्वर को अपने जैसा शरीर वाला समझ लिया है। उनके यह समझ में नहीं आता कि ईश्वर को Material (भौतिक) समझ लेने से उनका आध्यात्मिक लाभ कुछ नहीं होता है और यह ईश्वर की तौहीन है। इससे अपना नुकसान यह है कि अपनी निगाह Matter (भौतिक पदार्थ पर) ही कायम हो जाती है और मैं यह समझता हूँ कि वह ईश्वर को नाराज़गी का भी मौका देते हैं। किसी साफ-पाक आदमी को अगर गन्दा कह दिया जावे तो, वह जरूर नाराज़ हो जावेगा। तुम्हारी हालत ईश्वर-दर्शन की इससे पहले भी आ चुकी है, मगर इतनी निखरी हुई नहीं थी। मगर तुम्हें अभी इससे आगे जाना है। इसको ऐसा समझो, जैसे बच्चों के लिये खिलौना। हमें यही चाहिये कि हम अपने अन्दर भिदते जायें और अपना जल्वा अपने आप देखें; अन्तर्मुखी होने का यही फायदा है। मगर यह हालत भी ऐसी नहीं है कि उस पर हम ठहर जावें और काफ़ी समझ बैठें। यह तो असल ब्रह्म-विद्या की शुरूआत ही है, अभी तुम्हें और आगे जाना है। जब यह दृश्य देखने का भी एहसास बाक़ी न रहे, तो उसकी दूसरी सीढ़ी होगी और जितना आगे बढ़ती जाओगी, उसकी शक्ल भी तबदील होती जावेगी। अभी अथाह समुद्र, जिसमें हमें मिल जाना है, कोसों दूर है।

तुमने लिखा है कि “अब जो दशा आती है, उसमें कोई लगाव-लपेट नहीं होता है। और न किसी प्रकार का वज़न” इसका मतलब यह है कि अपना आपापन जो ठोस था, जा चुका है और अब तुम किसी काम की कर्ता नहीं रहीं और न संस्कार बन रहे हैं। तुमने लिखा है कि “हमारे Senses (वृत्तियाँ) ही नहीं रह गये हैं” यह बहुत कुछ ठीक है। मगर अभी Senses (वृत्तियों) में भद्दापन बाकी है, अभी Refined (शुद्ध) नहीं हुए हैं और उस वक्त यह सही आते चलें जायेंगे, जितनी कि लय-अवस्था बढ़ती जावेगी और Negation (निगेशन) की पूरी हालत आ जाने पर Senses (वृत्तियाँ) भी पूरी हालत में आ जाते हैं। मैं अपनी निगाह को क्या करूँ कि तुम जहाँ उन्नति कर के पहुँचती हो, हमें शुरूआत ही मालूम पड़ती है।

मेरा Realization (साक्षात्कार) का ख़्याल बहुत ऊंचा है। जब तक कि अभ्यासी अपने आप को ईश्वर में बिल्कुल लय न कर ले, तब तक मैं उसको Perfectly Realized Soul (पूर्णरीत्या साक्षात्कार प्राप्त करने वाली आत्मा) नहीं कह सकता हूँ।

मेरी राय में मुझे ऐसा आदमी इस वक्त कोई नज़र नहीं पड़ता। यह और बात है कि हमारे गुरु महाराज ने किसी को ऐसा बना दिया हो, यह वह जानें। बिटिया! कहीं मेरी निगाह खराब तो नहीं हो गई है। एक किस्सा सुनाता हूँ; एक मर्तबा दुर्योधन ने कृष्ण जी से पूछा कि आप अर्जुन को क्यों ज़्यादा मुहब्बत करते हैं और रिश्तेदार मैं भी हूँ, मुझसे मुहब्बत नहीं करते। कृष्ण जी ने कुछ समय व्यतीत होने पर इसका जवाब दिया। वह यह था कि अर्जुन से कहा कि तुम्हारे राज्य में जितने बुरे आदमी हों, उनकी फेहरिस्त बना लाओ और दुर्योधन से कहा कि तुम्हारे राज्य में जितने अच्छे आदमी हों उनकी फेहरिस्त बना लाओ। दोनों चल दिये। अर्जुन जब लौटा तो उसने कहा- “मुझे कोई बुरा आदमी ही नहीं मिला, जिसका नाम फेहरिस्त पर लिखता” और दुर्योधन ने यह खबर दी कि मुझे कोई अच्छा आदमी ही नहीं मिला, जिसको फेहरिस्त पर दर्ज करता। तब कृष्ण जी ने कहा कि यही कारण है कि मैं अर्जुन से इतनी मोहब्बत करता हूँ। वह इतना अच्छा है कि उसको सब अच्छे ही दिखलाई देते हैं और तुम इतने बुरे हो कि तुम्हें कोई आदमी अच्छा मालूम ही नहीं दिया। तो कहीं मुझमें दुर्योधन वाली आँख तो पैदा नहीं हो गई। अपने से छोटा तुमने लिखा है कि संसार में कोई नहीं रह गया है, यह एक गति है, जो ब्रह्म-गति से बहुत कुछ निस्बत रखती है। इसमें भी इससे ऊंची हालत पैदा होगी, मगर वह हालत भी आख़िरी हालत नहीं होगी। इसके बाद जो हालत पैदा होती है, मैं उसको बता देता, मगर इसलिये बताना नहीं चाहता कि पहले से कहीं उसका ख़्याल न बाँध लो। ईश्वर ने चाहा तो वह हालत भी आ जावेगी। तुमने लिखा है कि “पहले मन, बुद्धि, व्यवहार, सब कुछ मेरे वश में था और अब भूली भटकी सी हूँ।“ इसके माने यह है कि सब रंग मिलना शुरू हो गये हैं, मगर अभी सब रंग मिलाकर सफेद रंग नहीं बना। यह भी हो जावेगा ईश्वर की कृपा से। तुमने लिखा है कि “अपना ही जल्वा, अपनी ही मस्ती, मेरा ही एक अदना करिश्मा है” इसका मतलब यह है कि Non-Duality (अद्धैत) की हालत शुरू है। इसकी पूर्ण गति हो जाने पर, इसका रूख कुछ और बदलेगा, जिसको मैं पहले से बताना नहीं चाहता और वह ईश्वर-दर्शन की हालत से बहुत ऊंची हालत होगी। Quotations (उद्धरण) के आगे जो तुमने ख़त में लिखा है, वह सब Non-Duality (अद्धैत) पर आने की खुशख़बरी दे रही है। अभी तुम्हारा अहंभाव अच्छी तरह से नहीं गया है। तुम्हारी यही हालत रही तो ईश्वर-कृपा से यह चीज़ भी पैदा हो जावेगी।

यह हालतें बिना योग-मार्ग पर चलने से पैदा नहीं हो सकती और उसके साथ शर्त यह भी है कि हमारे गुरु महाराज सा Guide (मार्ग दर्शक) भी हो और हम सब के वही Guide (गाइड) हैं और खुद अपनी मिसाल हैं। अगर यह सब हालतें सबके सामने रख दी जावें तो भी बहुत कम ऐसे मिलेंगे कि उनका जी इस चीज़ को हासिल करने के लिये ललचा आवे। मुझसे एक-आध शख़्सों ने इस विषय में बातचीत भी की, मगर उन्होंने यह यकीन नहीं किया कि यह हालतें मेरे जरिये से प्राप्त भी हो सकती हैं, कारण यह था कि मैं उनकी ‘महात्मा’ की तारीफ़ के अनुसार कोई महात्मा नहीं था और यह है भी सही मैं तो एक इन्सान हूँ और गुरु महाराज ने मुझको बनाया भी ऐसा ही है। मगर भाई, तुम महात्मा हो और हमारी राय में महात्मा होना अच्छा होगा, क्योंकि यह बड़ी बात है।

तुम्हारा शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-311
शाहजहाँपुर
12/5/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे पत्र सब मिल गये। 5 मई के पत्र का सिर्फ इतना जवाब है कि तुम्हारी लय-अवस्था, जिसको फ़नाइयत भी कहते हैं, बढ़ रही है और अभ्यासी की, जिसके भाग्य होते हैं, उसमें यह चीज़ पैदा होती है और बढ़ती रहती है। इसका छोर अभी दूर है और उसी की कैफियत अन्दर और बाहर महसूस होती है। अपने में ही घुल-मिल कर अपने आप को छोड़ देना ही Spirituality (आध्यात्मिकता) है।

एक बात मैं तुमको लिखना भूल गया। तुम धार्मिक किताबों की Study (अध्ययन) किया करो। हर किताब, उपनिषद वगैरह, सब देख सकती हो और ईश्वर ने चाहा, तुम्हारी समझ में भी बहुत से शेखीबाजों से अच्छी आवेगी। मैं भी पढ़ने लगा हूँ, परन्तु भूल जाता हूँ। पढ़े-लिखे आदमी के सामने मुझे एक तरह की खिफ्फ़त होती है। तुम अपने में यह कमी न रहने दो।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-314
शाहजहाँपुर
25/5/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारे सब मिल गये। 19 मई का पत्र मिला गया, जिसका जवाब लिख रहा हूँ। कल 11 बजे दिन के तुमको ‘R’ (आर) के मुक़ाम से निकाल कर ‘S’ (एस) पर डाल दिया है। तुम्हें पढ़ना ज़रूर चाहिये, अपने लिये नहीं, बल्कि दूसरों की ख़ातिर। किताबें कुछ चौबे जी के पास जरूर होंगी। मैं खुद अपने में इस कमी को महसूस करता हूँ। मैंने कल रात कुछ बन्दिशें (Limitations) हल्के कर दिये हैं। तोड़े ज़रूर नहीं, मगर इससे भी किताबें समझने में मदद ज़रूर मिलेगी और समझ तेज़ ज़रूर होगी। जो हालत तुमने लिखी है, अच्छी है। तुमने लिखा है कि “हर जगह, हर चीज़, जैसे कुछ नहीं है।“ इसके मतलब यह है कि असल में चिमटना शुरू हो गया है। यह हालत अभी और बढ़ेगी। मन का सिकुड़ना, जो लिखा है, वह यूं महसूस होता है कि उसका रुख ऊपर को काफी खिंच चुका है और उसमें जो बातें नहीं होनी चाहिये थीं, वे बहुत कुछ हट चुकी हैं।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-320
शाहजहाँपुर
6/6/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे सब ख़त मिल गये। मैं इसलिये चाहता हूँ कि तुम कुछ पढ़ों, क्योंकि तुम्हारी अनुभव-शक्ति अच्छी है। मैंने कुछ Limitations (सीमा) बहुत मध्यम व धीमे कर दिये हैं। इस तरह, पर कि सम्भव है कि वह अपने आप जल्दी ख़त्म हो जावें। हल्के तो होना शुरू हो गये हैं, और इसकी पहिचान यह है कि तुम में इल्म खुद-ब-खुद बढ़ना शुरू हो गया होगा। आज मुझे बहुत हल्के नजर आ रहे हैं। मुमकिन है श्री रामचन्द्र मिशन के स्तम्भ में से तुम भी एक हो। मैं लिखता तो यही कि तुम बोलने की भी आदत डालो, मगर लिहाज़ यह है कि तुम कमज़ोर हो, बोलने में तुम्हें तकलीफ होगी।

तुम्हारी किताब ‘सहज-समाधि’ छप गई है। पचास कॉपी में भेज रहा हूँ। तुम्हारे हर ख़त का मैं जवाब देना चाहता हूँ। यदि कोई लिखने वाला मिल जाता है, तो लिखाता रहता हूँ। इसलिये कि मैं यह चाहता हूँ कि तुम ख़त एक रजिस्टर में नकल करो और उसके जवाब जो कुछ हैं, वह भी नकल करो। किसी वक्त में छपने की ज़रूरत होगी।

27 मई को जो ख़त आया है, जिसमें Zero (जीरो) करीब-करीब छः जुमलों में तहरीर है, तो Zero (जीरो) तो अभी बहुत दूर है। जब अभ्यासी सब कुछ पा लेता है, तो लाजिमी तौर पर कुछ नहीं रहता, जिसको Zero कह सकते हैं। अभी तो सेर भर में छटाँक भर भी नहीं बढ़ पाई हो, मगर बढ़ोगी, अगर ईश्वर को मंजूर है।

वैराग्य की पूर्ण अवस्था पर पहुँचने की, तुम्हारा खत कुछ खुशखबरी दे रहा है। वैराग्य की पूर्ण हालत यह होती है, कि कोई चीज़, सिवाय ईश्वर के अन्दाज़ नहीं होती। अब तुम में यह हालत आती है और कभी इससे ऊंची हालत भी आ जाती है। इसकी वजह यह है कि कभी-कभी मेरी हालत की तलछट उसमें शामिल होती है।

29 मई के ख़त में जो तुमने शून्य गति लिखी है, ठीक है। यह ऐसी गति है, जिसमें से होकर असल में जाना होता है और यह अब बड़ी हालत की तहरीर की तख़्ती समझो और यह गति दूर तक चली जाती है। यह भी किसी वक्त में गायब होती सी दिखाई देगी, मगर साथ यह नहीं छोड़ेगी। जब तक कि असली ठिकाना न मिल जाये।

‘S’ (एस) की सैर पूरी नहीं हुई है। उत्तरकाशी पहुँचने तक मैं कोशिश करूँगा कि सैर पूरी हो जावे। उसके बाद फिर ‘T’ (टी) मुकाम पर डाल दूंगा।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-322
उत्तरकाशी
13/6/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

मैं 12 जून को यहाँ आ गया। सर्दी यहाँ नहीं है। अभी यहाँ 4-6 रोज़ रहने का इरादा है। यहाँ पर वेदान्ती और हठयोगी हैं। Transmission (प्राणाहुति) का चाहनेवाला कोई नहीं मालूम होता। अभी मैं लोगों से मिल भी नहीं पाया हूँ। तुम किताब जो पढ़ती हो, उसका नोट लेती जाना, यह अच्छा रहेगा। आज मैंने तुमको ‘T’ (टी) स्थान पर खींच दिया है। मैंने यह सोचा कि जब और लोग यहाँ के फ़ायदा नहीं उठाना चाहते तो हमारे आपस के लोग फायदा उठा लें। मास्टर साहब को तीर्थ का फल मिल गया और जो मेरे साथ हैं, कुछ न कुछ रोशनी उन्हें भी पहुँची।

यहाँ के बारे में मैंने यह तय नहीं किया है, कि इस जगह को कैसा कर के छोडूं। ऐसा कि जैसा यह है, या ऐसा कि इस जगह पर कोई महात्मा अपनी योग सिद्धि न कर सकें। मेरी तबियत ठीक है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-326
शाहजहाँपुर
11/7/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे ख़त तीसरी और पाँचवी जुलाई के मिल गये। पढ़कर खुशी हुई। तुमने अपने पत्र में लिखा है कि अन्तर के पर्दे न जाने क्यों ढीले और धुंधले पड़ते जाते हैं। दुनियाँ पुकार-पुकार कर रोशनी देखने के फेर में पड़ी है। कोई सूर्य की भाँति रोशनी देखना चाहता है और कोई चन्द्रमा जैसी। कोई-कोई इस रोशनी को यहाँ तक बढ़ाना चाहते हैं और कहते भी हैं कि वहाँ हजारों सूरज से ज़्यादा रोशनी है और इसी की कोशिश करते हैं। यह ज़रूर है कि योग की शुरूआत उस वक्त होती है, जब कि एक दफा भी रोशनी दिखाई पड़ जाये, मगर इसके यह माने नहीं कि बस असल रोशनी Matter (पदार्थ) है। जो चीज़ असल है, वह न रोशनी है और न अंधेरा और इसको धुंधलापन ही कह सकते हैं। Originality (मूल वस्तु) बस यही है कि हमारी कुल इन्द्रियाँ यही धुंधली शक्ल अख्तियार कर लें।

तुम्हारे ख़त की अगर हर लाइन का जवाब दिया जावे तो बहुत लम्बा-चौड़ा ख़त हो जावेगा, लिहाज़ा संक्षेप के साथ इतना कहता हूँ कि तुम्हारा Body Consciousness (भौतिक चेतना) अब खत्म हो चुका है, Soul Consciousness (आत्मिक चेतना) शुरू है। इसके खत्म होने में वक्त लगेगा। ईश्वर ने चाहा तो यह भी इसी तरीके से हो जावेगा।

आज इसी वक्त 3.25 PM. (रात्रि) पर तुमको ‘T’ स्थान से निकाल कर ‘U’ (यू) स्थान पर डाल दिया है। इससे एक घंटा पहले ‘T’ (टी) स्थान पर तुम्हारे रोकने की ज़रूरत मालूम होती थी। मगर अब ऐसी बात महसूस नहीं होती।

तुम्हारा शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-334
शाहजहाँपुर
7/8/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे सब पत्र मिल गये। मैं बिल्कुल ठीक हूँ। हालत तो तुम्हारी ईश्वर की कृपा से अच्छी है ही। तुम ‘U’ (यू) स्थान पर हो और वह मुझे इतना अच्छा मालूम देता है कि नहीं मालूम क्यों मुझे इससे ऊपर स्थान पर ले जाने को तबियत नहीं चाहती। मेरी निगाह जब तुम्हारे ‘U’ (यू) स्थान पर जाती है, तो मुझे बड़ी Peace (शान्ति) महसूस होती है और कैफियत बड़ी उम्दा हो जाती है।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-337
शाहजहाँपुर
31/8/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

मैंने एक पत्र ता. 17.8.53 को कानपुर के पते से भेजा था, मालूम होता है कि तुमको नहीं मिला। तुम्हारे ख़त सब मिल गये। आज जन्माष्टमी है। मैंने तुम्हें लिखा था कि मेरा जी तुम्हें ‘U’ (यू) स्थान से अभी ऊपर ले जाने को नहीं चाहता है, और अब भी वही बात है और यह इतना अच्छा स्थान है कि मैं देख-देख कर खुश हो लेता हूँ।

आज जो पोस्टकार्ड तुम्हारा मिला है, उससे यह मालूम होता है कि अभी तुम्हें हटाना भी नहीं चाहिये, जब तक कि कुल बातें उस स्थान की तुम पर न खुल जावें और खुलना ईश्वर की कृपा से शुरू भी हो गई हैं और उसी की Sitting (सिटिंग) मैंने तुमको दो-एक दी हैं और दूंगा भी।

तुमने लिखा है कि अन्तर तक नहीं दीखता। इसके मानी यह हैं कि अंतर बाह एक होने की शुरूआत हो चुकी है, गो अभी बहुत कुछ बाकी है। भगवान की तारीफ तुकाराम ने खूब की है:-

“गुड़ से मीठे हैं भगवान, बाहर-भीतर एक समान।“

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-339
शाहजहाँपुर
16/9/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारी चिट्टी मिली। मेरी तबियत अब ठीक है। तुम्हारी हालत ईश्वर की कृपा बहुत अच्छी है, मगर ‘U’ (यू) स्थान से ऊपर ले जाने की अभी तक मेरी तबियत नहीं सी चाहती है। इसमें भी ‘मालिक’ की मौज मालूम होती है और यह स्थान मुझे इतना अच्छा मालूम होता है कि उसे देख-देख कर जी खुश होता है। अभी यह खुलेगा और बड़ी शान्ति और साम्य अवस्था तथा सादगी महसूस होगी। खैर, तुम मुझे लिखना।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-343
शाहजहाँपुर
28/9/1953
प्रिय बेटी, खुश रहो।

पत्र मिले। ता. 24.9.53 की सुबह को 8.30 बजे मैंने तुमको ‘V’ (वी) स्थान पर डाल दिया है। अब तुम्हारी तबियत ठीक होगी। तुम इलाहाबाद, जहाँ तक हो सके, चली जाना। वहाँ सबको लाभ होगा और जज साहब को भी Sittings (सिटिंग्स) देना। मुझे उनके दिल पर मकड़े के जाले की भाँति कुछ मालूम होता है। इसकी वजह उनके पहले का गलत अभ्यास है। वह पार्वती जी की शक्ल का ध्यान करते थे।

अच्छा तो यह है कि तुम थोड़े दिनों बीमारी जाने का Meditation (ध्यान) खुद करो। मैंने तुम्हें एक बार बतलाया भी था। वह यह है कि धुंयें (Smoke) की शक्ल पीछे से सब बीमारियाँ निकल रही हैं और ब्रह्माण्ड से Energy (शक्ति) आ रही है जो बीमारियों को दूर कर रही है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-350
शाहजहाँपुर
31/10/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र २० अक्टूबर सन् ५३ का अभी मिल गया। तुम्हारा पत्र देखकर तबियत उछल पड़ी, इसलिये कि मेरी जिन्दगी में ऐसी हालतें मेरे सामने आ रही हैं। यहाँ तो मिशन के मेम्बर्स का यह हाल है कि उन्हें अपने से ही फुर्सत नहीं। कुछ ऐसे भी हैं कि यह उम्मीद लगाये बैठे हैं कि में एकदम से उन्हें सब कुछ कर दूंगा। लाखों जन्म गुजर गये, अब तक अपने वतन को वापसी नहीं हुई और अब भी इसका ख़्याल पैदा नहीं होता। मैं भला क्या कर सकता हूँ, जब कोई चलना ही नहीं चाहता। यह सब ईश्वर के हाथ में है, जब ‘वह’ चाहेंगे, यह भी हो जावेगा। मैं तो यही चाहता हूं कि मुझ को कुछ थोड़ा बहुत आता है, उतना ही लोग सीखें और इतना सीखने के बाद भी अगर उनकी तडप बुझ न चुके, जैसा कि होना चाहिये, तो मैं आजादी से कहने के लिये तैयार हूँ, कि मुझसे ज्यादा जानने वाले को तलाश कर लें, इसलिये कि मेरी खुशी इसी में है कि लोग मुझसे बेहतर निकलें। मेरा क्या और मेरी हालत क्या? ठीक तो गुरू महाराज को ही खबर है। इतना जरूर मैं जानता हूँ कि Infinite (अनन्त) में Swimming (पैराव) ज़रूर कर रहा हूँ और इसका छोर नहीं, इसलिये मैं आत्मिक उन्नति के बारे में क्या राय कायम कर सकता हूँ, जब कि न मालूम कि अभी कितनी Swimming (पैरना) बाकी है। एक बात में ज़रूर लिखे देता हूँ कि मुमकिन है मेरी थोड़ी बहुत हालत जो कुछ भी है, अगर कहीं कोई किसी समय में इसका समझने वाला मिल गया किसी तरीके से और लोग भी इसको मालूम कर सकें और ख़ास कर मिशन के Member (सदस्य) तो फिर उनको मुमकिन है, तमाम उम्र अफ़सोस से हाथ मलना पड़े।

बिटिया ! जाने क्या बात है कि मैं बराबर कहता भी रहता हूँ और लिखता भी रहता हूँ, मगर ज्यादातर उनके जूं नहीं रेंगती, और मैं तो भाई, इसको अपनी ही कमज़ोरी कहूंगा, और वाकई कसूर भी मेरा है। यह हो सकता है कि मुझमें कुछ कच्चापन हो, जिसकी वजह से मेरे कहने सुनने का और तवज्जह का उन पर असर न पड़ता हो। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनकी जाति का अभिमान ज्यों का त्यों है, और इसी हैसियत से वह मुझको देखते हैं जिससे ऊंच को, नीच को देखना चाहिये। मैं तो भाई ऐसे तबके में पैदा हुआ हूँ, जिसको ऊंच कुल वाले को नीच समझना ही चाहिये। उनकी निगाह मेरे जिस्म और जाति पर रहती है; उस हालत पर नहीं रहती, जिससे उनको मदद लेना है। मुझे इसका कुछ खेद नहीं है। मैं तो वह च्यूंटी हूँ, कि लोग मुझे अपने पैर से मलें, वह बर्र में नहीं हूँ, कि जिसके पकड़ने से या अपनाने से काट खाऊं और उनको तकलीफ पैदा हो। जाति का अभिमान एक बहुत बड़ी रुकावट है और यह पहली चीज है, जो दूर होना चाहिए। ईश्वर का हजार-हजार बार धन्यवाद है कि मैं सबसे ऊंचे कुल में पैदा नहीं हुआ, जो यह कमजोरी मुझमें रहती। कबीर साहब ने क्या अच्छा लिखा है:-

नीच-नीच सब तर गये, सन्त चरन लवलीन।
जाति के अभिमान से, बूड़े राकल कुलीन।।

तुम्हारे पत्र के उत्तर देने से पहले मैं संक्षेप में कुछ जीव व ब्रह्म के बारे में लिखना चाहता हूँ। किताबों में नहीं मालूम क्या लिखा हो। मेरी समझ में जो है, वह मैं लिख रहा हूँ। किताबों से जो कोई Tally (मिलान) करना चाहे, कर लेवें।

जीव को अपना जीवपन कब महसूस हुआ, जब उसने अपने बैठने का ठिकाना बना लिया; यह ब्रह्म था और है। उसमें इसलिये जीवपन पैदा हुआ, इसलिये कि उसकी बैठक ऐसी जगह थी, जहाँ कि उसको उसी की बू आ रही थी। इस बात ने और इस एहसास ने उसकी रंगवत और भी ज्यादा कर दी। इसलिए कि जब एक रंग का एहसास हुआ, दूसरा रंग वह खुद-ब-खुद ढूंढने लगा और उसमें अनेकता पैदा हो गई। फिर क्या था, लालच, मोह, हर चीज की ख्वाहिश उसमे पैदा होने लगी; गोया सोने का कौवा एक लोहे के पिंजरे में बन्द हो गया और इसका मोहताज कि उसकी सैरी के लिये, उसको दाना-पानी की जरूरत हुई।

कहाँ तक कहा जावे, यह सब जीवपने की बातें हैं। अगर उसको कोई ऐसा मिल गया कि जिसने उसको यह ख़्याल दिला दिया कि तुम असल हो तो उसके बाहरी पर्दे फिर टूटने लगे। अब हम चूंकि जीव हैं, इसलिये इसी ने अपनी ऊंची हालत की ख़बर दी, यानी ब्रह्म की। असल में यह दोनों एक हैं। अब मैं थोड़ी सी रोशनी बेपढ़ों की भाषा में फेंकता हूँ। जीव में चूंकि हरकत (Movement) मौजूद है, उसको ख़बर हरकत वाले की ही हो सकती है और वह किसकी? ब्रह्म की। ‘ब्रह्म’ शब्द ‘ब्र’ और मनन निकला है, जिसके मानें हरकत और सांचने के हैं। जो Function (क्रियायें) कि जीव के अपने छोटे शरीर में होते हैं, वह Function (फन्कशन) ब्रह्म के अपने बड़े शरीर में होते हैं। बंधन जीव में भी हैं, और ब्रह्म में भी। अन्तर केवल इतना है, कि जीव में बंधन ज्यादा और ठोसता लिये हुए है और ब्रह्म में सूक्ष्मता लिये हुए। मगर अपने-अपने लिहाज़ से Limitations (सीमायें) दोनों में हैं। वेद में 24 प्रकार के ब्रह्म लिखे हैं, या 26 हों इसको एक विद्वान सन्यासी ने मुझे बतलाया था और आखिरी ब्रह्म को भूमा कहते हैं। महात्माओं ने इससे ऊंची हालत को पार-ब्रह्म कहा है, मगर भाई, इस असल की न मालूम कितनी हालते होती चली गई हैं। जैसी संगत मिलती गई, वैसा ही असर उस पर आता गया।

हमारी उन्नति में जहाँ तक सिलमिलावट और तरकत मौजूद है वहाँ तक हम उसी तरह के ब्रह्म के बंधन में हैं और में तो भाई, इन सब हालतों को फंसाव ही कहूँगा। जहाँ हमारा ठिकाना है, वहाँ हवा क्या, रोशनी की भी गुजर नहीं। एक बुझे हुए दीपक की महफिल है, जहाँ न कोई चमत्कार है और न चंचलता, सब Light-Light (प्रकाश) पुकार रहे हैं और मैं भी यही कहता हूँ, क्योंकि रास्ते में यह सब चीजे आती हैं, मगर ठिकाने पर पहुँच कर यह सब खत्म हो जाती हैं। मैं समझता हूँ कि अगर हम Light (प्रकाश) ही को चाहते हैं, तो एक जुगनू, जो अपनी Light (लाइट) दूसरों को भी दिखा देता है और Proof (प्रमाण) देता है कि उसके पास Light (लाइट) मौजूद है, तो उसके महात्मा होने में कोई शक नहीं रहता। किसी ने खूब कहा है:-

“हम जहाँ हैं, वहाँ से हमको भी कुछ हमारी ख़बर नहीं आती।“

अब मैं तुम्हारी हालत के बारे मे लिखता हूँ। तुमने लिखा है कि “ब्रह्म भी खालिस नहीं है, उसमें कुछ न कुछ अवश्य है।“ इसका उत्तर मैं बहुत कुछ ऊपर दे चुका हूँ। फिर उसमें लिखा है कि “उसमें सुहानेपन की बू मौजूद है।“ जहाँ तक सुहानापन है, वहाँ तक असल ब्रह्म नहीं कह सकते, इसलिये कि बहुत कुछ माया का लेस-पोत सूक्ष्म हालत में मौजूद है। मुझे तो ऐसी सूनी महफिल में तुम सबको ले जाना है, जहाँ कि सूनापन भी हजारों गुना भारी है और वाक़ई Perfection (पूर्णता) जो कि मनुष्य के लिये सम्भव है, वही है। हमारे यहाँ इतनी खूबी जरूर है कि Perfection (परफेक्शन) सब चाहते हैं, मगर मेहनत और Devotion (भक्ति) के लिये उनको उनकी सुस्ती इजाजत नहीं देती। मान लो कि ईश्वर इतनी कृपा करे कि बिना मेहनत उनको यह हालत कहीं मिल जावे, तो नतीजा क्या होगा? कि मेरी शकल से बेजार हो जावेंगे, इसलिये कि इस हालत में मज़ा क्या बल्कि शुबह और गुमान तक नहीं। भाई, मज़े की हालत में अपने ऊपर अक्सर तारी कर लेता था, अब मौजूदा हालत जो कुछ है, बेमजे की है। उससे एक Second (सेकेण्ड) भी हटने को जी नहीं चाहता। सो लोग मज़े की हालत लेते हुए जब बेमज़े की हालत में पहुँचेंगे, तब उनका यह हाल हो सकता है, जैसा कि मेरा कि बेमजे की हालत से हटने को जी नहीं चाहता। अगर कोई मुझसे यह कहे कि तुम अपनी जान दे दो या मौजूदा हालत से अलग हो जाओ तो, जान की Sacrifice (बलि), मुझे दिल से कबूल होगी। अब यह नहीं कहा जा सकता कि वह हालत क्या है? शब्द नहीं, जुबान नहीं कि उसको बयान कर सकूं।

तुमने अपनी वर्तमान हालत को ब्रह्म-दर्शन की हालत लिखा है, वह इस लिहाज़ से तो सही है कि ब्रह्म की हालत सूक्ष्म से सूक्ष्म हर जगह होती चली गई है, मगर जो ब्रह्म का एहसास इस वक्त है, अर्थात ‘V’ (वी) स्थान पर उसमें अभी लय अवस्था पैदा नहीं हुई। हल्का-हल्का इशारा तो मैं करता जाता हूँ, ताकि हालत आहिस्ता खुले, इसलिये कि तुम बीमार हो और इस समय तन्दुरुस्त हो जाना ही तुम्हारा धर्म है। तुमने यह भी लिखा है कि “मेरा तो रूप ही ब्रह्म हो गया है” तो ब्रह्म रूप तो हो ही और यह सब कह सकते हैं, मगर तुम्हारे लिये मैं यह लिखता हूँ कि हिरण्यगर्भ की हालत से तुम बहुत ऊंची निकल चुकी हो। Purity (शुद्धता) तो जिस जगह पर तुम हो, अधिक है। मैं इस हालत को भी बंधन की हालत कहता हूँ। जब Purity (शुद्धता) और Impurity (अशुद्धता) दोनों का एहसास ख़त्म हो जावे, तब Reality (वास्तविकता) की शुरूआत समझना चाहिये और उसके आगे अनगिनत Stages (दशायें) हैं, जो गिनने में नहीं आती। मगर यह याद रहे कि Purity (प्योरिटी) और Impurity (इम्प्योरिटी) मिटने का ख्याल मत बाँधना, कुदरती तौर पर जो हालत आती जावे, उसको एहसास करती चलो; रफ्ता रफ्ता वह हालत भी ईश्वर देंगे। तुमने यह भी लिखा है कि “अहं ब्रह्मास्मि की दशा है।“ यह सही हो सकता है, मगर बिटिया, यह हालत हर पर्दे पर और हर स्थान पर महसूस होती है। जितनी ऊंची हालत होती जाती है, उतने अच्छे रूप में यह दिखलाई देती है। इसको मैं क्या लिखूं? मेरी मानेगा कौन? वेदान्ती तो यही कहेंगे, अगर मैं जुबान खोलूं कि यह गलत कहता है, और वेद-वाक्य के सम्भव है कि यह खिलाफ पड़े। जब हमको अहं ब्रह्मास्मि का भास होता है, तो यह आवश्यक है कि किसी चीज़ से हम उसको Differentiate (भेद करना) कर लेते हैं, गोया कोई चीज़ अभी ज़रूर ऐसी है जो Difference (भेद) का एहसास दिला रही है। यह तो रही Philosophy (दर्शन) और समझाने की बात। असलियत वहाँ है, जहाँ यह Difference (भेद) ख़त्म हो जाये और फिर न अहं ब्रह्मास्मि का एहसास रहे और न इसके विरूद्ध ! अब भी भाई, कहने को तो perfection (पूर्ण) हो गया, मगर नहीं मालूम, अभी क्या-क्या बाकी है। मैं तो यही कहूँगा कि यहाँ पहुँचने पर भी दिल्ली दूर रह जाती है। अब बिटिया, बताओ मैं क्या लिखूं? इसके आगे भी कुछ न कुछ ज़रूर लिखा जा सकता है मगर कौन समझेगा और कौन मानेगा। ख़ैर, एक बात मैं इससे आगे की भी लिखे देता हूँ। वह यह है कि वहाँ पहुँचने पर सूक्ष्मता बिल्कुल ख़त्म हो जाती है, मगर बहुत बढ़ने के बाद। बस इससे आगे Expression (अभिव्यक्ति) के लिये शब्द नहीं मिलते। इतना मैं और कहे देता हूं कि इस हालत पर पहुँचने के बाद भूमा के करीब पहुँचने के लिये हजारों वर्ष भी कम हैं। बल्कि उस दशा पर (जहाँ की सूक्ष्मता ख़त्म होती है) जाने के लिये हजारों वर्ष चाहिये और फिर नहीं मालूम कितनी हज़ार सीढ़ियाँ भूमा के निकट पहुँचने में लगेंगी। मैं तो यही समझता हूँ कि इन हालतों को पार कराने की शक्ति सिवाय हमारे गुरू महाराज के किसी में पाई नहीं जाती और यह ईज़ाद ‘आप’ ही की है कि जिस्म रखते हुए यह Stages (दशायें) पार कराई जा सकती हैं।

कहाँ तक धन्यवाद ऐसी बुजुर्ग हस्ती को दिया जाये कि जिसने बज़रिये Transmission (प्राणाहुति) एक Second (सेकेन्ड) में उस आखिरी हालत पर पहुँचाना मुमकिन बना दिया। हम लोग वाकई अंधे हैं जो ऐसी बुजुर्ग हस्ती की तरफ नहीं देखते, जिसने वह काम कर दिखाया, जिसके लिये Spiritual History (आध्यात्मिक-इतिहास) ख़ामोश है। ईश्वर करे हम सबको यह हालत नसीब हो। यह important (महत्वपूर्ण) पत्र है। जब लखीमपुर जाओ, तब इसको लेती जाना, ताकि मास्टर साहब की File (फाइल) में लग जाये।

शुभचितंक
रामचन्द्र