शाहजहाँपुर
31/10/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।
तुम्हारा पत्र २० अक्टूबर सन् ५३ का अभी मिल गया। तुम्हारा पत्र देखकर तबियत उछल पड़ी, इसलिये कि मेरी जिन्दगी में ऐसी हालतें मेरे सामने आ रही हैं। यहाँ तो मिशन के मेम्बर्स का यह हाल है कि उन्हें अपने से ही फुर्सत नहीं। कुछ ऐसे भी हैं कि यह उम्मीद लगाये बैठे हैं कि में एकदम से उन्हें सब कुछ कर दूंगा। लाखों जन्म गुजर गये, अब तक अपने वतन को वापसी नहीं हुई और अब भी इसका ख़्याल पैदा नहीं होता। मैं भला क्या कर सकता हूँ, जब कोई चलना ही नहीं चाहता। यह सब ईश्वर के हाथ में है, जब ‘वह’ चाहेंगे, यह भी हो जावेगा। मैं तो यही चाहता हूं कि मुझ को कुछ थोड़ा बहुत आता है, उतना ही लोग सीखें और इतना सीखने के बाद भी अगर उनकी तडप बुझ न चुके, जैसा कि होना चाहिये, तो मैं आजादी से कहने के लिये तैयार हूँ, कि मुझसे ज्यादा जानने वाले को तलाश कर लें, इसलिये कि मेरी खुशी इसी में है कि लोग मुझसे बेहतर निकलें। मेरा क्या और मेरी हालत क्या? ठीक तो गुरू महाराज को ही खबर है। इतना जरूर मैं जानता हूँ कि Infinite (अनन्त) में Swimming (पैराव) ज़रूर कर रहा हूँ और इसका छोर नहीं, इसलिये मैं आत्मिक उन्नति के बारे में क्या राय कायम कर सकता हूँ, जब कि न मालूम कि अभी कितनी Swimming (पैरना) बाकी है। एक बात में ज़रूर लिखे देता हूँ कि मुमकिन है मेरी थोड़ी बहुत हालत जो कुछ भी है, अगर कहीं कोई किसी समय में इसका समझने वाला मिल गया किसी तरीके से और लोग भी इसको मालूम कर सकें और ख़ास कर मिशन के Member (सदस्य) तो फिर उनको मुमकिन है, तमाम उम्र अफ़सोस से हाथ मलना पड़े।
बिटिया ! जाने क्या बात है कि मैं बराबर कहता भी रहता हूँ और लिखता भी रहता हूँ, मगर ज्यादातर उनके जूं नहीं रेंगती, और मैं तो भाई, इसको अपनी ही कमज़ोरी कहूंगा, और वाकई कसूर भी मेरा है। यह हो सकता है कि मुझमें कुछ कच्चापन हो, जिसकी वजह से मेरे कहने सुनने का और तवज्जह का उन पर असर न पड़ता हो। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनकी जाति का अभिमान ज्यों का त्यों है, और इसी हैसियत से वह मुझको देखते हैं जिससे ऊंच को, नीच को देखना चाहिये। मैं तो भाई ऐसे तबके में पैदा हुआ हूँ, जिसको ऊंच कुल वाले को नीच समझना ही चाहिये। उनकी निगाह मेरे जिस्म और जाति पर रहती है; उस हालत पर नहीं रहती, जिससे उनको मदद लेना है। मुझे इसका कुछ खेद नहीं है। मैं तो वह च्यूंटी हूँ, कि लोग मुझे अपने पैर से मलें, वह बर्र में नहीं हूँ, कि जिसके पकड़ने से या अपनाने से काट खाऊं और उनको तकलीफ पैदा हो। जाति का अभिमान एक बहुत बड़ी रुकावट है और यह पहली चीज है, जो दूर होना चाहिए। ईश्वर का हजार-हजार बार धन्यवाद है कि मैं सबसे ऊंचे कुल में पैदा नहीं हुआ, जो यह कमजोरी मुझमें रहती। कबीर साहब ने क्या अच्छा लिखा है:-
नीच-नीच सब तर गये, सन्त चरन लवलीन।
जाति के अभिमान से, बूड़े राकल कुलीन।।
तुम्हारे पत्र के उत्तर देने से पहले मैं संक्षेप में कुछ जीव व ब्रह्म के बारे में लिखना चाहता हूँ। किताबों में नहीं मालूम क्या लिखा हो। मेरी समझ में जो है, वह मैं लिख रहा हूँ। किताबों से जो कोई Tally (मिलान) करना चाहे, कर लेवें।
जीव को अपना जीवपन कब महसूस हुआ, जब उसने अपने बैठने का ठिकाना बना लिया; यह ब्रह्म था और है। उसमें इसलिये जीवपन पैदा हुआ, इसलिये कि उसकी बैठक ऐसी जगह थी, जहाँ कि उसको उसी की बू आ रही थी। इस बात ने और इस एहसास ने उसकी रंगवत और भी ज्यादा कर दी। इसलिए कि जब एक रंग का एहसास हुआ, दूसरा रंग वह खुद-ब-खुद ढूंढने लगा और उसमें अनेकता पैदा हो गई। फिर क्या था, लालच, मोह, हर चीज की ख्वाहिश उसमे पैदा होने लगी; गोया सोने का कौवा एक लोहे के पिंजरे में बन्द हो गया और इसका मोहताज कि उसकी सैरी के लिये, उसको दाना-पानी की जरूरत हुई।
कहाँ तक कहा जावे, यह सब जीवपने की बातें हैं। अगर उसको कोई ऐसा मिल गया कि जिसने उसको यह ख़्याल दिला दिया कि तुम असल हो तो उसके बाहरी पर्दे फिर टूटने लगे। अब हम चूंकि जीव हैं, इसलिये इसी ने अपनी ऊंची हालत की ख़बर दी, यानी ब्रह्म की। असल में यह दोनों एक हैं। अब मैं थोड़ी सी रोशनी बेपढ़ों की भाषा में फेंकता हूँ। जीव में चूंकि हरकत (Movement) मौजूद है, उसको ख़बर हरकत वाले की ही हो सकती है और वह किसकी? ब्रह्म की। ‘ब्रह्म’ शब्द ‘ब्र’ और मनन निकला है, जिसके मानें हरकत और सांचने के हैं। जो Function (क्रियायें) कि जीव के अपने छोटे शरीर में होते हैं, वह Function (फन्कशन) ब्रह्म के अपने बड़े शरीर में होते हैं। बंधन जीव में भी हैं, और ब्रह्म में भी। अन्तर केवल इतना है, कि जीव में बंधन ज्यादा और ठोसता लिये हुए है और ब्रह्म में सूक्ष्मता लिये हुए। मगर अपने-अपने लिहाज़ से Limitations (सीमायें) दोनों में हैं। वेद में 24 प्रकार के ब्रह्म लिखे हैं, या 26 हों इसको एक विद्वान सन्यासी ने मुझे बतलाया था और आखिरी ब्रह्म को भूमा कहते हैं। महात्माओं ने इससे ऊंची हालत को पार-ब्रह्म कहा है, मगर भाई, इस असल की न मालूम कितनी हालते होती चली गई हैं। जैसी संगत मिलती गई, वैसा ही असर उस पर आता गया।
हमारी उन्नति में जहाँ तक सिलमिलावट और तरकत मौजूद है वहाँ तक हम उसी तरह के ब्रह्म के बंधन में हैं और में तो भाई, इन सब हालतों को फंसाव ही कहूँगा। जहाँ हमारा ठिकाना है, वहाँ हवा क्या, रोशनी की भी गुजर नहीं। एक बुझे हुए दीपक की महफिल है, जहाँ न कोई चमत्कार है और न चंचलता, सब Light-Light (प्रकाश) पुकार रहे हैं और मैं भी यही कहता हूँ, क्योंकि रास्ते में यह सब चीजे आती हैं, मगर ठिकाने पर पहुँच कर यह सब खत्म हो जाती हैं। मैं समझता हूँ कि अगर हम Light (प्रकाश) ही को चाहते हैं, तो एक जुगनू, जो अपनी Light (लाइट) दूसरों को भी दिखा देता है और Proof (प्रमाण) देता है कि उसके पास Light (लाइट) मौजूद है, तो उसके महात्मा होने में कोई शक नहीं रहता। किसी ने खूब कहा है:-
“हम जहाँ हैं, वहाँ से हमको भी कुछ हमारी ख़बर नहीं आती।“
अब मैं तुम्हारी हालत के बारे मे लिखता हूँ। तुमने लिखा है कि “ब्रह्म भी खालिस नहीं है, उसमें कुछ न कुछ अवश्य है।“ इसका उत्तर मैं बहुत कुछ ऊपर दे चुका हूँ। फिर उसमें लिखा है कि “उसमें सुहानेपन की बू मौजूद है।“ जहाँ तक सुहानापन है, वहाँ तक असल ब्रह्म नहीं कह सकते, इसलिये कि बहुत कुछ माया का लेस-पोत सूक्ष्म हालत में मौजूद है। मुझे तो ऐसी सूनी महफिल में तुम सबको ले जाना है, जहाँ कि सूनापन भी हजारों गुना भारी है और वाक़ई Perfection (पूर्णता) जो कि मनुष्य के लिये सम्भव है, वही है। हमारे यहाँ इतनी खूबी जरूर है कि Perfection (परफेक्शन) सब चाहते हैं, मगर मेहनत और Devotion (भक्ति) के लिये उनको उनकी सुस्ती इजाजत नहीं देती। मान लो कि ईश्वर इतनी कृपा करे कि बिना मेहनत उनको यह हालत कहीं मिल जावे, तो नतीजा क्या होगा? कि मेरी शकल से बेजार हो जावेंगे, इसलिये कि इस हालत में मज़ा क्या बल्कि शुबह और गुमान तक नहीं। भाई, मज़े की हालत में अपने ऊपर अक्सर तारी कर लेता था, अब मौजूदा हालत जो कुछ है, बेमजे की है। उससे एक Second (सेकेण्ड) भी हटने को जी नहीं चाहता। सो लोग मज़े की हालत लेते हुए जब बेमज़े की हालत में पहुँचेंगे, तब उनका यह हाल हो सकता है, जैसा कि मेरा कि बेमजे की हालत से हटने को जी नहीं चाहता। अगर कोई मुझसे यह कहे कि तुम अपनी जान दे दो या मौजूदा हालत से अलग हो जाओ तो, जान की Sacrifice (बलि), मुझे दिल से कबूल होगी। अब यह नहीं कहा जा सकता कि वह हालत क्या है? शब्द नहीं, जुबान नहीं कि उसको बयान कर सकूं।
तुमने अपनी वर्तमान हालत को ब्रह्म-दर्शन की हालत लिखा है, वह इस लिहाज़ से तो सही है कि ब्रह्म की हालत सूक्ष्म से सूक्ष्म हर जगह होती चली गई है, मगर जो ब्रह्म का एहसास इस वक्त है, अर्थात ‘V’ (वी) स्थान पर उसमें अभी लय अवस्था पैदा नहीं हुई। हल्का-हल्का इशारा तो मैं करता जाता हूँ, ताकि हालत आहिस्ता खुले, इसलिये कि तुम बीमार हो और इस समय तन्दुरुस्त हो जाना ही तुम्हारा धर्म है। तुमने यह भी लिखा है कि “मेरा तो रूप ही ब्रह्म हो गया है” तो ब्रह्म रूप तो हो ही और यह सब कह सकते हैं, मगर तुम्हारे लिये मैं यह लिखता हूँ कि हिरण्यगर्भ की हालत से तुम बहुत ऊंची निकल चुकी हो। Purity (शुद्धता) तो जिस जगह पर तुम हो, अधिक है। मैं इस हालत को भी बंधन की हालत कहता हूँ। जब Purity (शुद्धता) और Impurity (अशुद्धता) दोनों का एहसास ख़त्म हो जावे, तब Reality (वास्तविकता) की शुरूआत समझना चाहिये और उसके आगे अनगिनत Stages (दशायें) हैं, जो गिनने में नहीं आती। मगर यह याद रहे कि Purity (प्योरिटी) और Impurity (इम्प्योरिटी) मिटने का ख्याल मत बाँधना, कुदरती तौर पर जो हालत आती जावे, उसको एहसास करती चलो; रफ्ता रफ्ता वह हालत भी ईश्वर देंगे। तुमने यह भी लिखा है कि “अहं ब्रह्मास्मि की दशा है।“ यह सही हो सकता है, मगर बिटिया, यह हालत हर पर्दे पर और हर स्थान पर महसूस होती है। जितनी ऊंची हालत होती जाती है, उतने अच्छे रूप में यह दिखलाई देती है। इसको मैं क्या लिखूं? मेरी मानेगा कौन? वेदान्ती तो यही कहेंगे, अगर मैं जुबान खोलूं कि यह गलत कहता है, और वेद-वाक्य के सम्भव है कि यह खिलाफ पड़े। जब हमको अहं ब्रह्मास्मि का भास होता है, तो यह आवश्यक है कि किसी चीज़ से हम उसको Differentiate (भेद करना) कर लेते हैं, गोया कोई चीज़ अभी ज़रूर ऐसी है जो Difference (भेद) का एहसास दिला रही है। यह तो रही Philosophy (दर्शन) और समझाने की बात। असलियत वहाँ है, जहाँ यह Difference (भेद) ख़त्म हो जाये और फिर न अहं ब्रह्मास्मि का एहसास रहे और न इसके विरूद्ध ! अब भी भाई, कहने को तो perfection (पूर्ण) हो गया, मगर नहीं मालूम, अभी क्या-क्या बाकी है। मैं तो यही कहूँगा कि यहाँ पहुँचने पर भी दिल्ली दूर रह जाती है। अब बिटिया, बताओ मैं क्या लिखूं? इसके आगे भी कुछ न कुछ ज़रूर लिखा जा सकता है मगर कौन समझेगा और कौन मानेगा। ख़ैर, एक बात मैं इससे आगे की भी लिखे देता हूँ। वह यह है कि वहाँ पहुँचने पर सूक्ष्मता बिल्कुल ख़त्म हो जाती है, मगर बहुत बढ़ने के बाद। बस इससे आगे Expression (अभिव्यक्ति) के लिये शब्द नहीं मिलते। इतना मैं और कहे देता हूं कि इस हालत पर पहुँचने के बाद भूमा के करीब पहुँचने के लिये हजारों वर्ष भी कम हैं। बल्कि उस दशा पर (जहाँ की सूक्ष्मता ख़त्म होती है) जाने के लिये हजारों वर्ष चाहिये और फिर नहीं मालूम कितनी हज़ार सीढ़ियाँ भूमा के निकट पहुँचने में लगेंगी। मैं तो यही समझता हूँ कि इन हालतों को पार कराने की शक्ति सिवाय हमारे गुरू महाराज के किसी में पाई नहीं जाती और यह ईज़ाद ‘आप’ ही की है कि जिस्म रखते हुए यह Stages (दशायें) पार कराई जा सकती हैं।
कहाँ तक धन्यवाद ऐसी बुजुर्ग हस्ती को दिया जाये कि जिसने बज़रिये Transmission (प्राणाहुति) एक Second (सेकेन्ड) में उस आखिरी हालत पर पहुँचाना मुमकिन बना दिया। हम लोग वाकई अंधे हैं जो ऐसी बुजुर्ग हस्ती की तरफ नहीं देखते, जिसने वह काम कर दिखाया, जिसके लिये Spiritual History (आध्यात्मिक-इतिहास) ख़ामोश है। ईश्वर करे हम सबको यह हालत नसीब हो। यह important (महत्वपूर्ण) पत्र है। जब लखीमपुर जाओ, तब इसको लेती जाना, ताकि मास्टर साहब की File (फाइल) में लग जाये।
शुभचितंक
रामचन्द्र