Sant Kasturi
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अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-3
शाहजहाँपुर
15/7/1948
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद ।

पत्र मिला, दिल को खुशी हुई। तुमको यह अन्दाज़ हो गया होगा, कि जिस रास्ते पर तुम हो, ठीक है। ईश्वर का कोई रूप नहीं, इसलिये सर्वव्यापी कहा गया है। अगर उसका कोई रूप होता, तो उसका क्याम एक ही जगह होता। अपनी निगाह को वसी (व्यापक) बनाना चाहिये। तंग दायरा तंग नज़री से होता है। हममें ऐसे लोग मौजूद हैं, कि जो ठोस पूजा को उमर भर नहीं छोड़ते। हालांकि चाहिये यह कि जो ठोस अवस्था ज़्यादा लिये हुए हैं, उनको ठोस पूजा में डालकर, धीरे-धीरे उससे निकाल कर, सूक्ष्म की तरफ ले जाना चाहिए। मगर चूँकि हम स्वयं ठोस हैं, इसलिए अगर ठोसता की तरफ डाल भी दिया जाये, तो फिर उससे निकलने को जी नहीं चाहता, और सही रास्ता मालूम होने पर भी दिल उससे हटता ही नहीं। अगर मैं यह बात प्रत्येक मनुष्य से कह दूँ, तो वह यही समझेंगे कि मूर्ति-पूजन के खिलाफ़ हूँ। मगर मेरी यह मन्शा नहीं है। यह उन लोगों के लिये है, जिनका ख़याल सिर्फ़ ठोसता पर काम कर सकता है। मगर हमेशा उसी चीज को लिये बैठे रहने का नतीजा यह होगा कि वही ठोस असरात उसके दिल में पैदा हो कर दिल सख्त कर देंगे, जिसको हटाने में बहुत देर लगेगी।

मूर्ति-पूजन मैंने भी की है। मगर बहुत थोड़े दिनों। मगर मुझको तस्सली न हुई और उस चीज को बेकार समझकर छोड़ दिया। अगर हम किसी से यह कहें, उस मनुष्य से, जो इस रास्ते पर जा चुका हो और वह इसको न माने, तो क्या कहा जा सकता है, कि उसको सही रास्ते पर विश्वास है। बहादुरों की पूजा हिंदुस्तान में सदा से चली आ रही है, जिसका नतीजा यह हुआ कि लोग बस उसी की पूजा के हो रहें है और मूर्तियाँ स्थापित हो गई अगर मैं मूर्ती-पूजन करता होता और सही रास्ता मुझको, जो इससे कहीं अच्छा है, मिल जाता और सिखाने वाला मुझसे इसको छोड़ने के लिए कहता तो शायद ये क्या, मैं अपने आप को भी छोड़ने के लिए तैयार हो जाता।

इस मार्ग में बुराइयाँ छूटती हैं और फिर अच्छाइयों के तरफ भी रगबत नहीं रहती, तब कर्म-बन्धन से छुटकारा होता है। चौबे जी को मैंने डर की वजह से यह बात नहीं लिखी, तुम्हे लिख रहा हूँ, इसलिये कि मुमकिन है, ईश्वर की यही मर्ज़ी हो कि तुम आला तरक्की करो। रौशनी जो तुम्हे कभी-कभी नज़र आ जाती है, यह आत्मा की झलक है और उन्नति का चिन्ह। मगर उन्नति के लिये यह आवश्यक नहीं कि हर शख्स को यह चीज नज़र आवे। अपने-अपने संस्कार व प्रकृति पर है। मैं समझता हूँ कि तुम यही पसन्द करोगी कि हम उस ईश्वर से प्रेम करें, जिस पर ज़मीनी क्या, बल्कि ख्याली आवरण भी चढ़ा हुआ नहीं है। बाकी हालतें जो तुमने लिखी हैं, वह बहुत अच्छी हैं। इनके बारे में मैं थोड़े दिनों बाद लिखूंगा।

मैं तुम्हारी माता जी से कहता हूँ और चलते समय मैंने उनसे कहा था कि चौबे जी को संभाल लेना, उनके हाथ में ही है। स्त्री पहले स्वयं करे। उसके बाद पति को उस अच्छी बात को करने में सहायता दे और बेटी! यह वक्त अब बार-बार न आयेगा। इसको मुमकिन है कि कुछ लोग समझते भी हों।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-5
शाहजहाँपुर
24/7/1948
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद ।

पत्र मिला, हाल मालूम हुआ। प्रकाश के बारे में मैं पहले लिख चुका हूँ कि किसी को दिखलाई पड़ता है, और किसी को नहीं, और इससे तरक्की में कोई हर्ज़ नहीं पड़ता। फिर लिखता हूँ कि मार्ग मिल जाने पर, बस उसी पर चलना चाहिये और उसी के उसूलों पर आरुढ़ रहना चाहिये। तुम्हारे पिता जी तुम सब लोगों की उन्नति चाहते हैं, इसमें संशय नहीं। तुम्हें भी ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिये कि वह भी इस मार्ग में अच्छी उन्नति करें और वह बाधाएँ छूट जायें जो उन्नति में बाधक हैं।

देखो किसी कवि ने कितना सुन्दर कहा है -

‘एक हि साधे सब सधै, सब साधे सब जाये।’

इस पर तुम सब को अमल करना चाहिए, यह बड़ी अच्छी बात है। दुनिया के नियम कुछ ऐसे हो रहे हैं कि अपने मतलब की गरज़ से जाने कितनी पूजाएँ ईज़ाद कर लीं। एक से अनेक में तबियत फिरने लगी। विचार की बहुत सी धाराएँ पैदा हो गई, और फिर वह अपने देवता के इर्द-गिर्द फिरने लगीं। हालत ऐसी हो गई, जैसे फव्वारे में पानी हजारों धारें बन कर निकलता है। एकाग्रता जाती रही। असल से दूर होते गये। अब समझाने से भी नहीं मानते, ऐसी हालत बन गई। इलाज सबका बस यही है कि सिर्फ़ ईश्वर प्राप्ति ही अपना उद्देश्य रहे। हजारों वर्ष हम दुनिया में रहे और लाखों वर्ष और दुनियाँ में रहना चाहते हैं। हम वह तरीका क्यों न ग्रहण करें कि जहाँ से आये हैं, वहीं समा जायें और उन आगामी लाखों वर्षों को बचा लें।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-8
शाहजहाँपुर
14/9/1948
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो ।

पत्र मिला। जवाब शीघ्र इसलिये न दे सका कि कोई लिखनेवाला मौजूद न था। बहुत से खत पड़े हुए हैं। अब सब का जवाब दे रहा हूँ।

तुम्हारी आत्मिक-दशा जान कर चित प्रसन्न हुआ। ईश्वर तुम्हे अपने उद्देश्य में सफल करे। बेचैनी ईश्वर की याद के लिये पैदा होना बड़ा अच्छा है। मैं इसका वर्षों शिकार रहा हूँ यही एक चीज है जो धुर तक पंहुचा देती है और हमारे लिये यही शान्ति है। भक्त की तारीफ यही है कि वह ‘मालिक’ की याद में बेचैन रहे। लोग शान्ति दूढ़ते हैं, जंगल में जाते हैं, मगर इस अनमोल रत्न पर कोई बिरला ही आकर्षित होता है। तुम आइन्दा खत में लिखना कि अब भारीपन किस कदर है। इस भारीपन की दो वजह हुआ करती हैं। एक वजह तो यह होती है कि जो लोग मूर्ति-पूजन करते हैं, उनके दिल में जो ठोसता पैदा हो जाती है, उसको जब यह चीज़ दूर करती है, तो यह बात महसूस होने लगती है। दूसरी वज़ह यह होती है कि आत्मिक-बल हृदय में प्रेम द्वारा ज़्यादा समा गया हो और वह हज़्म न हुआ हो। पहली वज़ह जब होती है, तो दिल में सख्ती ज्यादा मालूम होती है। दूसरी वज़ह कमतर होती है। अब तुम लिखना कि इस की वज़ह जो तुम्हारे समझ में आवे। सम्भव है कि यह बात कम हो गई हो। मैं चाहता हूँ, यह चीज स्वयं ही दूर हो जावे, ताकि तकलीफ न हो।

ता. २७.८.४८ को श्री कृष्ण जन्माष्टमी का दिन था। मेरे लिये आज्ञा यह है कि इस दिन जो लोग जहाँ-जहाँ व्रत रखते हैं, उनको आत्मिक लाभ पहुँचाऊँ इस लिये, उस रोज़ में घण्टों यही काम करता रहा। आज्ञा यह भी हुई थी कि दूसरे दिन भी व्रत रखूं, यानी दो दिन व्रत के लिये हुक्म था। मगर शरीर निर्बल होने के कारण आज्ञा मिली कि एक रोज मैं व्रत रखू और दूसरे रोज़ एक गुरुभाई, जो आत्मिक उत्रति के उच्च शिखर पर है, जिनका नाम पण्डित रामेश्वर प्रसाद मिश्र है, व्रत रखें । यह बात दो-तीन वर्ष से चली आ रही है। तुमने अपने पिता जी की आत्मिक उन्नति के लिये, जैसा कि मैंने किसी पत्र में लिखा था, प्रार्थना की होगी।

मैं तुम्हारे पिछले पत्र का उत्तर लिख चुका था। आज १६ सितम्बर को दूसरा पत्र मिला। उसमें तुमने एक बात लिखी है, वह मेरी समझ में नहीं आई, कि क्या मतलब था। वह यह है कि ‘जो पहले हालत थी, अब नहीं है’। पहले वह कौन सी हालत थी कि जिसके अब न होने से चित्त में ग्लानि है। कदम आगे ही बढ़ना चाहिये और ईश्वर से इसी की प्रार्थना करनी चाहिये। 'वह’ सब कुछ कर सकता है। केसर और तुम्हारी माता जी पूजा करती हैं, यह सुन कर खुशी हुई।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-10
शाहजहाँपुर
26/9/1948
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद ।

पत्र मिला-तबियत प्रसन्न हुई। तुमने जब अपने भारीपन का हाल लिखा था, मैंने ईश्वर से तुम्हारे लिये प्रार्थना की। ईश्वर-विषय में मैं और तुम दोनों ही भिखारी हैं। उसकी जो मर्ज़ी होती है वही होकर रहता है। वह जिसको अपनी ओर खींच लेवे, वही कामयाब है। एक फ़ारसी कवि ने कहा है:- जिसका मतलब यह है कि- ‘बिना तेरी मर्ज़ी के तेरे दर्शन नहीं होते’। अब दर्शन किसको कहते हैं वह वाकई हालत क्या है, और आम जनता इसको क्या समझ रही है? अगर मैं इसकी व्याख्या करूँ तो बहुत कुछ हो सकती है मगर वाक़ई में मैं इसकी व्याख्या उस रोज करूँगा, जब ईश्वर तुममें वह हालत पैदा कर दे। मैं उस प्रतिज्ञा से बहुत खुश हुआ। तुमको ईश्वर करे, इसमे सफलता प्राप्त हो। ईश्वर करें तुम अपने घर को उजाला करो। यही नहीं, ईश्वर वह समय लावे कि तुमसे दु:खी लोग फायदा उठावें। अगर तुम दिल से प्रार्थना चौबे जी के लिये कर दोगी, तो खाली नहीं जा सकती। ईश्वर तुमको अहंकार से बचावे। चौबे जी अब अच्छे हैं, मगर तुम्हारी माता कुछ ऐसी भंभेर में पड़ी हैं, कि उस सर्व-शक्तिमान ईश्वर की तरफ उनका झुकाव सही मानों में नहीं होता। हमें तो उससे प्रेम करना है, जिसका रंग व रुप कुछ नहीं। यह चीज़ जो तुम कर रही हो, और हम सब लोग कर रहे हैं पर उसी का झुकाव और विश्वास पूरी तौर पर हो सकता है जिसको कि ईश्वर अब इस चोला छोड़ने के बाद दुनिया में लाना नहीं चाहता।

अपनी माता जी से नमस्ते कह देना व पूज्य चौबे जी से भी। अपनी बहनों से भी मेरा आशीर्वाद कह देना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-12
शाहजहाँपुर
23/10/1948
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद ।

पत्र मिला-खुशी हुई। ईश्वर का धन्यवाद है कि तुम्हारा रुझान उसकी तरफ हो रहा है। ईश्वर तुमको खूब रुहानी तरक्की देवे । तुमने जो कैफ़ियत शान्ति की लिखी है, अच्छी है, मगर, इस शान्ति में अगर बेकरारी न हो तो ऐसा है, जैसे अच्छे भोजन में नमक न डाले। कैफ़ियत अपनी लिखती रहा करो। मुर्दे की सी दशा, जो तुमने लिखी है, इसका जवाब मैं बहुत दिनों बाद दूँगा, अगर याद रही। इस पर अभी ज़्यादा लिखना मुनासिब नहीं समझता। एक खत में किसी हालत के बारे में पहले भी यही लफ़्ज़ लिख चुका हूँ, कि फिर जबाब दूँगा। अगर इनको किसी डायरी में नोट कर लो, तो मुमकिन है कि मुझे याद दिलाने पर याद आ जावे। केसर की मुझको याद अक्सर आ जाती है। उसके भजन मुझे बहुत पसन्द आये थे, इस वजह से मुझे और भी याद आ जाती है। तन्दुरुस्ती तुम, जहाँ तक हो सके अपनी बनाने की कोशिश करो, यह बात बहुत आवश्यक है। माता जी से मेरा प्रणाम कहना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-14
शाहजहाँपुर
2/11/1948
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद ।

पत्र मिला खुशी हुई। ईश्वर तक पहुँचते-पहुँचते जाने कितनी दशायें परिवर्तित होती रहती हैं। ये हालतें प्रत्येक अभ्यासी पर गुजरती हैं। लगन अगर अच्छी है, तो अक्सर दशाएँ Feel होती हैं। तुम्हारे खत मैं रखता जाता हूँ। हर दशा पर एक-एक कर के प्रकाश डाला जा सकता है, मगर मैं उस वक्त इन दशाओं को लिखना चाहता हूँ, जब कि ये दशायें बहुत कुछ पार हो कर ऊँची उठ जाएँ। ईश्वर से कुछ दूर नहीं, वह सब कुछ कर सकता है। हमारी भूल यह है कि उसको अपने पास होते हुए भी अनुभव नहीं करते। अपनी माता जी से मेरा प्रणाम कहना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-18
शाहजहाँपुर
19/11/1948
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद ।

तुम्हारे दोनों पत्र मिले, पढ़ कर खुशी हुई। यह ईश्वर की कृपा है कि तुम्हारा रुझान उस तरफ बढ़ता जाता है। तुमने जो कुछ भी लिखा है, उससे यह मालूम होता है कि तुम्हारी लय-अवस्था बढ़ रही है, मगर अभी स्थाई रुप में नही हुई है। हो जावेगी, अगर ईश्वर ने कृपा की और तुमने अपनी मेहनत जारी रखी। उस काम के लिये तन्दुरुस्ती की भी जरुरत है, लिहाज़ा इसकी भी फ़िक्र रखनी चाहिये। तन्दुरुस्त मैं भी नहीं हूँ। हर वक्त के दर्द ने मुझको कमज़ोर कर दिया है, मगर यह हालत मेरी बहुत कुछ सीखने के बाद हुई थी। ईश्वर कमज़ोर की आवाज़ ज्यादा सुनता है, मगर उसके सुनने से पेश्तर हमको उपाय और अभ्यास करना पड़ता है, ताकि हम इस क़ाबिल बन जावें कि हमारी आवाज़ ‘मालिक’ तक पहुँचा सके और इसके लिये तंदुरुस्ती की आवश्यकता है।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-20
शाहजहाँपुर
12/10/1948
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद ।

पत्र मिला-पढ़कर खुशी हुई। तुम्हारी हालत उन्नति पर है ‘मालिक’ का धन्यवाद है। कोशिश से सब कुछ हो जाता है, और मैं समझता हूँ, ईश्वर से मिलना आसान है। सिर्फ उस तरफ दिल का रुझान करने की ज़रूरत है और यह बात मैं हर एक से कहता हूँ। लय-अवस्था तुम्हारी बढ़ रही है। ईश्वर ने कृपा की और तुम्हारी कोशिश जारी रही तो स्थायी रुप में भी हो जावेगी, इसमें उन्नति का कोई ओर-छोर नहीं। सिर्फ लय-अवस्था ही स्थाई रुप में आ जाना काफी नहीं है। इसके आगे भी बहुत कुछ है और फिर उसका भी ओर-छोर नहीं। अगर मनुष्य सबसे ऊँची दशा में आ जावे और वह ऐसी दशा हो कि जब से दुनिया पैदा हुई, तब से और किसी को यह बात नसीब न हुई हो, तो भी उसके बाद बहुत कुछ जानने को रह जावेगा। न मालूम इस ज़माने में मनुष्य अपने आप को पूर्ण कैसे समझ लेता है। पूर्णता सिर्फ ईश्वर में है। इन लोगों की मिसाल ऐसी होती है, जैसे किसी शख्स को एक हल्दी की गाँठ मिल जावे और वह अपने आप को पंसारी समझ बैठे। ‘नेति-नेति’ वेदों ने कहा है। एक बात ज़रुर ध्यान में रखना चाहिये कि किसी शख्स से ऐसे शब्द न कहे जायें, जो अगर वैसे ही हो जाय तो उससे उसको तकलीफ पहूँचे।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-24
शाहजहाँपुर
16/1/1949
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद ।

मुझे हर्ष है कि ऐसे अच्छे पत्र आध्यात्मिक उन्नति के मिले जाते हैं। ईश्वर को धन्यवाद है। मुझे कोई नहीं पूछता और न मेरी कोई खबर लेता है। और पूछे भी कौन, जब कि मेरे पास ज़ाहिरा कोई दौलत मालूम नहीं होती। लोग आते तो अवश्य हैं और मुझसे सीखते भी हैं, परन्तु बहुत कम। एक-आध इस गरीब को पत्र द्वारा पूछ लेते हैं। मेरे पास अब सिवाय गरीबपन के और कुछ नहीं है, जिससे लोग मेरी तरफ आकर्षित हों। तोशा (सफर का सामान) तो मैंने रखा ही नहीं, क्योंकि अब सफर करना ही नहीं हैं। अब अगर किसी से मैं यह कहूँ कि तुम सफर करो अपने वतन का तो क्या वह यह कहने का हकदार नहीं है कि ऐसे सफर से तो दर गुज़रा की मंजिल होते ही या उस पर पहुँचते ही अपना तोशा भी रख दूँ। सामान जब सब खो दिया, तो अपने पास रह ही क्या गया? क्या सफर का यही नतीजा है? फिर बात-चीत और सत्संग से लोग जब यह जानने लगते हैं, तो अक्सर उनकी तबियत हटने लगती है। इसकी मिसाल एक शाहजहाँपुर में मौजूद है।

तो प्यारी बेटी! अब मेरे पास क्या है जो मैं तुम सबको दूँ? अगर खोई हुई चीज़ फिर से हाँसिल करने की कोशिश करूँ, तो वह भी नहीं होता। इसलिए, क्योंकि मैंने उससे इस सफ़र की कीमत अदा की है। अब रह क्या गया मेरे पास? बस कुछ नहीं, और उसको लेने के लिये इक्का-दुक्का तैयार कठिनता से होते हैं। तो क्या तुम्हें यह चीज़ भली मालूम होती है? प्रेम और मोहब्बत, जिसको तुम चाहती हो, मेरे पास अब वह भी न रही, जो तुमको दे डालूं। हाँ, यह हो सकता है कि हम तुम दोनों हाथ पसार कर ईश्वर के सामने इसको देने की प्रार्थना करें। उसमें डर यह भी है कि कहीं 'उसने' (ईश्वर) यह कह दिया कि जिसने मुझे अपना सब कुछ दे डाला, तो अगर उसे प्रेम दिया जाये, तो क्या वह गरीब रख सकेगा। मुमकिन है कि ईश्वर अपना प्रेम तुमको दे देवे और भाई, अपने लिये तो मुझे शक है कि जाने वह देगा या नहीं। इस लिये कि मेरी कलई उस पर खुल चुकी है। तुमने अपनी जो कुछ भी हालत लिखी है, डर है कि मेरी तरह कहीं धोखे से इस सफर की कीमत अदा न कर दो और एक गरीब बेनवा (बेसरो-सामान) की तरह न बन जाओ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-26
शाहजहाँपुर
9/2/1949
प्रिय पुत्री, आशीर्वाद ।

पत्र तुम्हारा २४.१.४९ का लिखा हुआ मिला। अब उत्सव के पश्चात् उसका उत्तर दे रहा हूँ। तुमने जो मेरे खत का जवाब दिया है कि एक गरीब आदमी, अपनी गरीबी दे सकता है। यह उसका जवाब था, जिसको मैंने यह लिखा है कि मैं बहुत गरीब हूँ।

गरीबी की हालत वह है, जिसको लोग तरसते चले गये हैं, और सम्भव है इसका मज़ा बहुत से ऋषियों ने भी न चखा हो। अगर हम मालदार नहीं हैं तो इसके माने यह है कि हम गरीब हैं। मालदार आदमी के पास सब कुछ होता है, गरीब आदमी के पास कुछ नहीं होता है, अर्थात् जो गरीब है, उसके पास कुछ नहीं है। अब जिसके पास कुछ नहीं है, उसके पास क्या चीज़ हो सकती है, जो दूसरों को दे? अब यदि दे, तो उस चीज का नाम ‘कुछ नहीं’ रख लिया जाये तो यह एक ऐसी चीज़ बन जाती है जो कि देने के काबिल नहीं रहती। एक आदमी है, जो किसी समय धनी था, अपनी पूँजी दूसरों को दे सकता था। जब गरीबी बढ़ती गई, उसका देना कम होता गया। जब कुछ न रहा, तो कुछ न दे सका। अब उससे माँग कर देखो तो भला उसके पास क्या है, जो देगा? अगर मुझको ऐसा ही समझ लिया जावे, तो मेरे पास देने को कुछ नहीं रहता। हाँ, इसके अन्दर एक बात ज़रूर है कि ‘कुछ नहीं’ की तह में यानी जिसको ‘कुछ नहीं’ कहा है, कोई चीज़ ज़रूर है, जो की दी जा सकती है। इसके आगे कुछ भी नहीं रहता। वहाँ पर देना और लेना सब समाप्त हो जाता है। अब इस हालत में पहुँचने के लिये तरीका बिल्कुल साफ है कि मालदार आदमी के पास जो कुछ सामान हो, उसको छीनता चले। आखिर में जब उसके पास ‘कुछ न’ रह जायेगा, तो वह गरीबी की हालत पर आ जायेगा । तो तुम चौबे जी साहब से पूछ कर लिखना कि किसी का माल व असबाब छीनना शास्त्र के विरुद्ध तो न होगा? अगर इसका जवाब वह यह दें कि सामान रहते हुए, उससे बेखबर हो जावे तो यह सवाल पैदा होता है कि किसी न किसी शक्ल में सामान तो उसके पास रहा ही, फिर सामान रहते हुए गरीबी कैसे आ सकती है और अगर बेखबर भी हो गया, तो समय पर ज़रुरत उसको सचेत कर देगी। अब क्या होना चाहिये? बस यही तरकीब हो सकती है कि सामान को ऐसी जगह रखवा देवे कि ज़रुरत पड़ने पर उसकी खबर हो जावे, तो ख्याल पैदा होता है कि यह चीज़ दूसरे के पास धरोहर रखी हुई है। यह शुरु का तरीका है, और आगे बढ़ने पर इस सामान को, जो बतौर धरोहर दूसरे के पास रखा हुआ है, ‘उसका’ ही समझ लें और अपना कोई अधिकार उस पर बाकी न रखे, तब यह बात पैदा हो सकती है कि सब कुछ होते हुए अपने पास कुछ न महसूस हो। अब मान लो कि हमारे पास जो अन्दरुनी ताकतें व सिद्धियाँ हैं, यानी जो ताकतें हमको ईश्वर से मिली हैं, उसको अगर हम सब ईश्वर की समझ लेवें और उसको इन पर काबू और अख्तियार दे देवें, या दूसरे शब्दों में इनको ‘उसके’ हाथ बेच डालें, तो हम हर चीज़ से खाली हो जाते हैं। अब यह चीज़ पैदा होती है ऐसे अमानतदार को ढूँढ़े कैसे, कि यह चीज़ उसके हवाले कर सकें? वह तो इतनी दूर है, जैसा कि ख्याल है, कि वहाँ तक पहुँचना कठिन है और अगर वह सबसे नज़दीक भी है तो उसका यह हाल है कि जैसे अपनी आँख खुद अपनी आँख को नहीं देख सकती है। तो भला ऐसे अमानतदार को कैसे पावें? जवाब इसका यही है कि हम अगर सिर से पैर तक आँख बन जावें तो कम से कम हमको कहने को ज़रुर रह जायेगा कि हम अब कुल आँख ही आँख हो गये। अब ज़रुरत सिर्फ इस बात की रह जायेगी कि हम उसको तलाश करें। जब हम कुल आँख ही आँख बन गये, तो इसके माने यह हुए कि देखने की ताकत हमारे कुल बदन में है। अब देखना क्या रहा, जब हम कुल आँख ही आँख रह गये और अब हमारे पास सिवाय इस चीज़ के कुछ न रह गया। अब यह बात भी जाती रही कि आँख को आँख नहीं देख सकती, इसलिये कि वह ताकत जो उसके देखने की तरफ हमको मायल कर रही थी, उसका अब खात्मा हो गया और इसलिये कि उन ताकतों की जगह पर जो अनेक रुप में हैं, अब आँख ही रह गई है। अब तो बेटी! यह हो गया है, कि हर तरफ वह चीज़ है, जिससे कि रोशनी निकलती है। जो आँख - आँख को देखना चाहती थी, वह अब सिर से पैर तक एक हो गई है। उसको देखने की अब अपने आप को ज़रुरत भी नहीं रही।

इस कुल इबारत का मजमून यह है कि जैसे आँख ही आँख अपने में दिखलाई देती थी, तो वह चीज़ें जाती रहीं, जिससे आँख को आँख देख सकती थी। इसी तरह से अगर हम बजाय आँख के ईश्वर ही ईश्वर को भास करने लगें तो फिर हमको अमानतदार की तलाश नहीं रह जाती। इसलिये कि फिर वह कुल चीज़ असली रुप में हो जाती है, जिसको हम अमानतदार के हवाले करना चाहते थे। अब गरीबी आई, मगर हमको मालदारी और गरीबी, दोनों का खात्मा करना है। जो तब ही हो सकता है, कि बजाय कुल आँख सिर से पैर तक बनने में वही असली आँख जो ईश्वर है बन जावें ऐसा स्वाभाविक है कि इसका भी पता न रहे, तब मालदारी और गरीबी दोनों गायब होती है। पिछली चिट्ठी में जो मैंने अपनी गरीबी का जिक्र किया था, वह हालत बन्दे की है और इसके आगे बड़ी Personality और इससे आगे अवतारों की है। इस पत्र का उत्तर अगर बेटी! तुम लिखो तो मेरा दिल बड़ा खुश हो और लिखो ही क्या, ऐसा ही होने की प्रार्थना करो। ईश्वर से कुछ दूर नहीं, वह सब कुछ कर सकता है। तुम जब शाहजहाँपुर में थीं, तो तुमने मुझसे कहा था कि बाबूजी मुझे नौकर रख लो। मैं इन प्रेम भरे शब्दों से खुश हुआ बेटी! केवल तन्दुरुस्ती का इन्तज़ार है और इसी की वजह से धीरे-धीरे का मजमून है, वरना रुहानियत असल रुप में पैदा हो जाना एक क्षण-मात्र का काम है। इस नौकरी की तनख्वाह तुमने छ: सिटिग रोज़ माँगी हैं। ईश्वर ने चाहा तो तुम्हारी वह हालत पैदा होगी कि हर समय सिटिंग ही सिटिंग रहेगी। फिर क्या होगा, जिसका मैं नौकर हूँ, उसकी ही नौकरी तुम कर लेना।

केसर ने मुझे पत्र तुम्हारे पत्र के साथ भेजा है। उसका जवाब यह है कि वह तो हमारी लड़की या बहन है और उससे ऐसा नाता भी है। मैं तो कुल दुनिया को चाहता हूँ कि मुझ से अच्छा बने और मेरी प्रार्थना भी यही है, कि इसके बदले में मुझे जितनी सज़ायें भी मिलें, मुझे सब बर्दाश्त है। इस पत्र में मैंने वैराग्य और लय-अवस्था दिखलाई है और यह भी दिखलाया है कि ईश्वर-दर्शन क्या है। ईश्वर-दर्शन की हालत और उसका आनन्द ऐसा समझ लो जैसे संग(पत्थर) बे-नमक और आखिर पर यही कैफ़ियत हो जाती है। इसके लिये जन्म-जन्मान्तर लोग मेहनत करते हैं और इसके एवज़ में जो मिलता है, उसको अगर शुरु में दिया जावे तो लोग भागने के लिये तैयार हो जायें और ईश्वर की तरफ कोई न रागिब हो।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-34
शाहजहाँपुर
5/8/1949
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र मिला, पढ़कर खुशी हुई। मैं तुम्हारे साथ में बहन का बर्ताव रखना चाहता हूँ, इसलिये कि हम सब 'लाला जी' की औलाद हैं और उन्हीं के सेवक। मगर बेटी की निगाह से मैं देखता चला आया हूँ, इसलिये दिल में बेटी का ही भाव बनता है, मगर ज़ाहिरा मैं बहन का ही भाव रखूँगा। अन्दर अगर यह भाव बहन का बन जाये, तो अच्छा है। तुम्हारी अन्य सभी बहनों से तो बहन का भाव रहता है, मगर तुमसे यह भाव नहीं बनता। तुम किसी वक्त मुमकिन है, किसी ऋषि की लड़की हो, और मोक्ष तो तुम्हारी एक बार हो चुकी है। चाभी खत्म होने के बाद फिर वापिस आना पड़ा है। अब यह नहीं कह सकता कि कितने जन्म तक आना पड़ा। अब Liberation की बारी है, अगर ईश्वर दे दे। कुछ ख्याल ऐसा भी होता है कि ऋषि पंतजली के वक्त में तुम मौजूद थी और तुम उनको जानती थीं, और उनके वाक्य सिर्फ सुने सुनाये दिल में तैरा करते थे। उस जन्म के बाद तुमने योगाभ्यास भी किया था, मगर उसको पूरा न कर सकी और उसी में मोक्ष पा गई। मुमकिन है, इस रिश्ते की वजह से तुम पर निगाह पुत्री की पड़ती है। इस भेद को मैं इस पत्र में खोलना नहीं चाहता इस लिये कि लोग इस पत्र को पढ़ें तो न मालूम मेरे बारे में क्या ख्याल करें। अगर इसके जानने की ज्यादा curiosity हो तो मास्टर साहब से पूछ लेना। मगर चौबे जी से डर लगता है। मौजूदा जन्म से पेश्तर तुम एक किसान की भोलीभाली लड़की थीं और चौदह साल की उम्र में तुम्हारी मृत्यु हुई। Innocent बहुत थीं। यह बात मैं खत के जवाब से बाहर लिख गया।

एक बात मैं तुम्हें लिखे देता हूँ और यह स्वामी विवेकानन्दजी ने भी कही है कि सिखाने वाले से जितने भी मनुष्य सीखते हैं, वे ख्वाह उम्र में बड़े हों या छोटे, सब उसकी रुहानी औलाद होते हैं। मगर कहीं इससे यह न समझ जाना कि मैं सिखाने वाला हूँ। सिखाने वाला कोई और है, जो हम सब को सिखाता है। केसर की हालत ईश्वर की कृपा से अच्छी है और उसकी चौबेजी ने सिफारिश भी की है। मगर उससे कह देना कि अभी दिल्ली दूर है, कोशिश किये जाये।

अभ्यासी को सन्तुष्ट कभी नहीं होना चाहिये और ‘मालिक’ की याद जितनी कर सके, करे। हमारा धर्म यही है कि हमें सन्तोष उसकी याद का न आने पावे। अब यह ‘मालिक’ की देन है और उसके हाथ में है कि कब सन्तुष्ट कर दे। जो नियम कि तुमने Quote किया है, वह Beginners के लिये है, कि ऐसी हालत पैदा करें। वास्तव में प्रार्थना वही है कि जैसी तुम करती हो, शून्य-दशा पैदा हो जाये। मेरा पहले वाला खत देख लेना, जिसकी नकल मास्टर साहब के पास है। सम्भव है कि चौबे जी के पास भी हो। जब अभ्यासी का सम्बन्ध ऊपर की दुनियाँ से जुड़ जाता है और वहाँ रहन होने लगती है, तो उसको यही प्रतीत होता हे कि यह मेरा घर है। मेरी भी किसी समय ऐसी हालत रही है। तुमने यह जो लिखा है कि- ‘मैं कभी-कभी रसोई घर भी भूल जाती हूँ और भौचक्की सी रह जाती हूँ’, चौबे जी की ज़बान में तो इसका जवाब यह है कि तुम्हें भूख ही नहीं लगती, स्वास्थ्य न ठीक होने की वजह से। मेरा जवाब यह है कि भूल की अवस्था पैदा हो रही है। मगर इसकी इतनी ज्यादती इस हालत में हो जाना कुछ-कुछ कमज़ोर दिमाग की भी वजह है। भौंचक्की सी रहजाना, यह एक आध्यात्मिक हालत है, जिसकी अभी शुरुआत है, पूर्णरुप में अभी नहीं आई है। मैं यह बताना नहीं चाहता कि पूर्ण रुप में आ जाने के क्या Symptoms हैं, इसलिये कि यह ख्याल तुम हालत आने से पहले ही कहीं बाँध न बैठो। Godly Science के खुलने कि शुरुआत उसी वक्त होती है, when a man begins to wonder.

Swami Vivekanand (८.१५. सांय):- This condition is rarely found. All Abhyasis approach, but do not stay. It is bestowed, no doubt. Daughter ! Excellent letter it is. See the approach. You will not be getting such a Master. I am sorry. Nobody comes to Him for this sort of training. All are over whelmed. Such a Master will not appear in future, Masterly command he has got. People are still sleeping in deep slumber inspite of my repeated warnings. Avail daughter, tThis opportunity. May God bless you. You do not know the condition of your father and mother. They too are unaware of it. What He (Ramchandra) has achieved at Lakhimpur, others require a thousands of years. See his efficacious training; salvation is sure for your mother because she has brought forth such a good master. Stones cannot breed such a good master. It is she only and her kinsman.

लालाजी साहब तुम्हारी माताजी की इस वक्त तारीफ़ कर रहे हैं कि वास्तव में ख़्याल पुत्र का जमाने वाला हो तो ऐसा ही हो, जैसे तुम्हारी माँ, तब फायदा है। मास्टर साहब से कह देना कि मैंने इन खतों की नकलें नहीं रखी हैं। अगर रखना चाहें तो चौबे जी से करा लें।

मैं अपनी रौध में लिख गया, फिर मेरे दिल में खेद पैदा हुआ कि मैंने तुमको किसान की बेटी बतला दिया। सही बात राम जाने। मेरी समझ में आया सो ना मालूम मैं क्यों लिख गया। अगर बुरा मालूम हो, तो क्षमा करना। और इस खत की नकल किसी को न करने देना, बल्कि फाड़ देना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-36
शाहजहाँपुर
15/5/1949
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद ।

पत्र मिला, पढ़कर खुशी हुई। ईश्वर तुमको रोज़-व-रोज़ रुहानी तरक्की दे। मैं यह चाहता हूँ कि तुम अपनी जीवनी लिखना शुरु कर दो और जब से तुमने ब्रह्म-ज्ञान सीखना शुरु की है, उस तारीख तक आने पर अपनी रुहानी हालतें लिखती चलो। मेरे पास तुम्हारे सब खत मौजूद हैं, जो मैं भेज दूँगा। उनमें जो हालतें लिखी हैं, वह सब लिखती जाना। शुरु के हाल तुम्हारी माता जी को सब मालूम होंगे, उनसे सब पूछ लेना और अपने spiritual Development के लिये जो तरीके तुमने किये हैं, वह सब लिखते जाना।

अपनी माता जी से प्रणाम कहना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-39
शाहजहाँपुर
6/2/1949
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

पत्र मिला, कुछ कामों में मैं ऐसा व्यस्त रहा कि मुझे पत्रोत्तर भेजने का मौका न मिला। फैलाव जो तुम्हें मालूम होता है, वह दिल के बीच के मुकाम की कैफ़ियत है। इससे यह समझना चाहिये कि तुमने उस हिस्से से अपना सम्बन्ध जोड़ लिया है, जिसके बाद ही ठोस हालत शुरु होती है। यानी उसकी सूक्ष्म कैफ़ियत में तुम्हारी पहुँच है, उसमें तुम फैल रही हो। सम्भव है बहुत जल्द ही इससे ऊँचे जाने की खुशखबरी मिले।

अपने आपको बच्चा समझ कर जो मुझसे खेलती हो, यह ईश्वरीय ख्याल कायम रखने का एक तरीका है। ख्याल एक ही होना चाहिये, रुप बदलने में कोई हर्ज नहीं और ऐसा करने से दिमाग को आराम भी मिल जाता है।

मैं पहले पत्र का उत्तर लिख चुका था कि तुम्हारा दूसरा पत्र भी आ गया। अब उसका भी उत्तर लिख रहा हूँ। इस खत ने मुझको यह उम्मीद दिला दी कि अब उस हालत के करीब हो, जहाँ कि लय-अवस्था की सूक्ष्म गति शुरु होती है। मगर यह सब हृदय-चक्र की हालतें है; अभी कुछ सैर इसकी और बाकी है। इसके बाद दूसरी इससे बेहतर हालत की खुशखबरी मिलेगी। यह हालत पहले ही चक्र की है; अभी बहुत से चक्रों का crossing बाकी है। और इसके बाद ईश्वर जाने क्या-क्या हालतें हैं, फिर भी छोर नहीं। तुमने जो यह लिखा है कि यह याद नहीं रहतीं कि ‘मालिक’ की याद थी या नहीं थी, इस चीज़ का पैदा हो जाना इस बात की दलील है कि उसकी याद आंतरिक पहुँच चुकी है, मगर यह कार्य ईश्वर का है। हमारा काम यही है कि जिस तरह हो सके, उसकी याद रखें। हमारे यहाँ अभ्यासी को यदि थोड़ी सी भी लगन लग जाती है, तो अनजाने उसकी याद कायम ही रहती है। जब हम अपना ख्याल उसमें कायम कर देते हैं, तो तेज़ मालूम लगती है। भौंचक्के होने का जवाब मैं पिछले खत में दे चुका हूँ।

नींद के बारे में जो तुमने लिखा है, उससे यह मतलब निकल रहा है कि तुम सुषुप्ति की हालत में तेज़ जाती हो और आँख खुलने पर यह मालूम होता है कि किसी नये देश से आयी हो। इसका मतलब यह है कि यह अन्दाज़ होने लगता है कि तुम सुषुप्ति में जाती हो। वैसे दूसरे आम लोगों को जो गाढ़ निद्रा में जाते हैं, जागने पर यह एहसास नहीं होता कि हम कहीं से आये हैं। इस चीज में लय हो जाना (मगर इसमें कोशिश नहीं की जाती) और फिर उसमें बका (जिन्दगी) की हालत पैदा हो जाना तुरीय का अंदाज है। मगर इसमें अभी बहुत देर है। माता जी को Sitting देने का तरीका मास्टर साहब बतला देंगे।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-47
शाहजहाँपुर
27/7/1949
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

पत्र मिला, हाल मालूम हुआ। हमारे यहाँ कोई नहीं रुकता, अगर विश्वास ठीक हो तो ऐसे Station ज़रुर आते रहते हैं, जहाँ पर ठहराव कुछ हो जाता है। अगर ज्यादा दिनों तक ठहराव रहे तो तरक्की में उतने दिनों कमी रहती है और अगर कम रहे तो कोई हर्ज़ नहीं होता। यह ठहराव भी बड़ा मुबारक है। इससे आगे बढ़ने की ताकत पैदा हो जाती है। एक कारण रुकाव का और हो जाता है। वह यह है कि ज्यादा खा जाने से, हज़्म नहीं होने की वज़ह से यह बात पैदा होती है। महात्माओ ने इसको भी मुबारक कहा है। कहा तो यहाँ तक है कि अक्सर अभ्यसियों की बरसों यह कैफ़ियत रही है और इसको कब्ज़ (spiritual constipation) कहा है, मगर यह हमारे गुरु महाराज की बरकत है कि इस प्रकार का कब्ज़ जो रुकावट डाले, पैदा नहीं होता। तुम्हारी हालत कब्ज़ की न थी और न होगी, यदि ईश्वर ने चाहा। बल्कि एक Stage पार करने के बाद और उसके आगे आने वाली Stage के बीच की हालत थी। यह बीच की जगहें हर अभ्यासी को पड़ती हैं। मैंने अपनी आत्मिक बल की एड़ उससे तुम्हें निकालने को नहीं लगाई। तुम अपनी ताकत से स्वयं निकल आई, और मैं चाहता भी यही था। अगर अब तक उस हालत से न निकलतीं तो जरुर मैं अपनी will exercise करता। सबसे अच्छा चलना तो उसी को कहते हैं कि अपनी मेहनत से आगे बढे। तुम्हे अपने चित्त में गलानी नहीं करनी चाहिये, इसलिये कि अगर यह हालत न होती तो तुम उससे निकलने की कोशिश नहीं करती। अब चूकि इससे निकलने के लिये अपने हाथ-पैर चलाये हैं, इसलिये आगे बढ़ने की और ताकत आ गई। जिस्म में तुमने रेंगन लिखी है, वह चीज़ ज़िस्म में गुदगुदी पैदा करती है, या सिर्फ़ उसका कोई action सा पैदा होता है। दूसरी बात यह है कि यह चीज़ बढ़ रही है या उतनी ही है, और किसी वक्त मालूम होती है या नहीं?

माता जी से मेरा प्रणाम कहना, तथा बच्चों से दुआ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-51
शाहजहाँपुर
25/8/1949
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

जब आदमी उजेले की तरफ देखता है, आँख का रेटिना (Retina) glaze करने पर expand हो जाता है। नतीजा यह होता है कि उस उजेले में भी अंधेरा प्रतीत होता है। यह कैफ़ियत अधिकतर त्रिकुटी के मुकाम पर पहुँचने से होती है। वहाँ पर उजेला बहुत है, इसलिये अंधेरा प्रतीत होता है। यह बात मैं आगे के लिये लिखा चुका। तुमने जो लिखा है कि लखीमपुर परदेश मालूम होता था और घर वाले सब ऐसे मालूम होते थे, जिन्हें मैं जानती ही नहीं थी। ऊपर लिखे हुए नियम के अनुसार जब अभ्यासी ‘रुह’ में लय होना शुरू हो जाता है, यानी उसकी जड़ ‘उसमे’ गड़ जाती है तो अपनायत केवल अपनी रुह से होने लगती है। अपनायत के contrary जो outward vision है, वह dull हो जाती है। अपनी असली ताकत ही में निगाह जम कर रह जाती है। जो चीज़ सामने अधिकतर रहती है, पहले वह dull मालूम होती है। उसके बाद कुल दुनिया ऐसी ही मालूम होने लगती है। उसके बाद हालत और बदलती है, जिसका इस समय खोलना मैं मुनासिब नहीं समझता। खाली रहना अच्छा है और इसके यह माने होते हैं कि हमारे बहुत कुछ आवरण उतर चुके हैं। दिल पर निगाह अधिक अभ्यास हो जाने पर ठहरा नहीं करती इसलिये कि हमने दिल का बिन्दु किसी Plane of Region में जाने के लिये बनाया था, इसलिये जरुरी नहीं रहता कि दिल ही पर हम बार-बार जबरदस्ती निगाह को कायम करें। शुरु में ध्यान दिल पर किया, फिर वह जिस Plane में स्वयं चला जाये वहीं पर रखें। माथे और सिर के पीछे के हिस्से में, जो तुमने लिखा है, मालूम होता है, कुछ खुल गया। माथे में तो असर ज़रूर है, मगर पीछे के भाग में अभी झंकार है और अभ्यासियों को हमारे यहाँ अक्सर मालूम होती है। इसलिये कि मैं ऐसी सादा तवज्जह (sitting) देता हूँ, जिसका असर जहाँ पर भी यह चीज़ है, जल्द पड़ता है। तुम यह भी लिखना कि जब तुम पहूँची, तब घर का वायुमण्डल क्या कुछ बदला हुआ पाया? यदि पाया तो किस कदर। इति:-

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-61
शाहजहाँपुर
9/10/1949
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद ।

तुम्हारे कई पत्र आये, मगर जवाब न दे सका। अब कुछ थोड़ा सा संक्षेप में लिख रहा हूँ। तुम्हारी जो कुछ भी हालत है, यह जहाँ तक मेरा ख्याल है, हृदय चक्र की सैर (To the extent of Pind Desh) पूरी हो चुकी है, और आत्मा-चक्र की सैर अब दर पेश है। मैंने ‘जहाँ तक’ का लफ्ज़ इसलिये इस्तेमाल किया है कि मेरे सिर में इस समय भारीपन है, इसलिये अनुभव शायद ठीक न हो सका हो। यकीन है कि ठीक होगा।

‘मालिक’ का बन्दे की याद में संलग्न होने के माने यह है कि बन्दे की ज़ज्बे की आग ‘मालिक’ तक पहुँच चुकी है और उसको यह खबर हो गई है कि कोई बन्दा मेरी याद करता है, या दूसरे मानों में तुम्हारी आवाज़ ‘मालिक’ के कानों तक पहुँच चुकी है। जब आवाज़ किसी शख्स की किसी को पुकारने की आती है, तो जिसको कि पुकारते हैं, वह मुखातिब हो जाता है और मुखातिब होने के बाद यदि उस शख्स को यह प्रतीत हो जाता है कि यह प्रेम और ज़ज्बे से मुझे पुकारा गया है, तो उसमें भी पुकारने वाले की मोहब्बत पैदा हो जाती है। कबीर साहब ने लिखा है कि-

‘मेरा राम मुझे भजे जब, तब पाऊँ विश्राम।’

यह हालत बहुत काबिले तारीफ़ है और बुजुर्गों ने इसके माने यह निकाले हैं कि ऐसी हालत में ईश्वर प्रेमी होता है और बन्दा प्रीतम। भक्ति मार्ग में इसको बहुत अच्छा कहा है और हम भक्ति भाव से चलते हैं, और यदि इसकी कहीं Philosophy हम बयान करें, तो फिर यह चीज़ ज्ञान-मार्ग में आ जाती है। इसलिये मैं इसको बयान नहीं करता और इसकी Philosophy जहाँ तक मेरा ख्याल है, किसी बुजुर्ग ने बयान भी नहीं की, क्योंकि यह बात Etiquette और अदब के खिलाफ़ मालूम होती है। तुम जब उस Point पर आ जाओ जिसको मैंने आयन्दा छपने वाली किताब में Central Region कहा है, तो समझा दूँगा।

तुमने यह जो लिखा है कि ‘मेरी यह हालत कि जो पूजा आरम्भ करने से पहले थी’। इसकी कुछ-कुछ रमक तो आ जाती है, मगर पूरी तौर से आ जाने का इन्तजार है और जैसा मैं चाहता हूँ, वह अभी दूर है। यह बिल्कुल ईश्वरीय हालत है। इसके परिपक्व हो जाने पर इन्सान सन्त और ठीक आ जाने पर परम् सन्त कहलाता है। यह एक कैफ़ियत मुर्दा की सी होती है। इंसान ज़िन्दगी में ही मुक्ति का तमाशा देखता है और इसमें परिपक्व हो जाने पर जीवन-मुक्ति की दशा आ जाती है और बीज दग्ध हो जाता है। यहाँ पर इन्सान को इन्सान कह सकते हैं, इससे पहले इन्सान बसूरत हैवान है।

तुमने Hospital में जो Scene देखा था और उसे देख कर घर पर जो भीष्म पितामह की मिसाल सामने आकर ख्याल गूंजे थे, यह हिम्मत दिलाने वाले थे। इनसे कोई रुहानियत का सम्बन्ध नहीं है, और तुमने जो यह लिखा कि बाद को कमज़ोरी मालूम हुई, उसकी वज़ह यह मालूम पड़ती है कि चूँकि तुम कमज़ोर हो, जोश आने पर खून की गर्मी बढ़ी और जोश समाप्त हो जाने पर यह फिर Normal Condition पर आ गया। लिहाज़ा जो ताकत किसी जोश में खर्च हुई, ज़िस्म में कम हो गई, इसलिये कमज़ोरी मालूम हुई। जैसे जब दिल कमज़ोर होता है और इसको कोई Stimulant दिया जाता है, तो ताकत मालूम होती है और जब इसका असर खत्म हो जाता है, तो जितनी ताकत दवा ने बढ़ाई थी, वह तो जाती ही रहती है और अपनी भी कुदरती ताकत उसमें खर्च हो जाती है, इसलिये कमज़ोरी मालूम होती है। इसलिये कि दिल ने अब ज्यादा काम किया तो कमज़ोर होने की वज़ह से उसे थकान भी लाज़िमी है, जिसको कमज़ोरी कहते हैं।

अब रहा, जो तुमने अपनी बुआ के बारे में अफसोस ज़ाहिर किया है, वह तकाजाय वर्शारयत है। सबसे छोटे बच्चे पर तर्स ज़रूर मालूम होता है, मगर ईश्वर ‘मालिक’ है, उसके सब काम मसलेहत्त् के ही होते हैं। इसकी दो ही सूरतें थीं। या मैं पहले जाता या वह। मेरे पहले जाने में यह मुमकिन था कि उनकी आहट या आवाज़ मेरे कानों तक न पहुँचती और उनका काम इतना अच्छा न बनता। जो बन जरुर जाता, इसलिये की ‘लाला’ जी ने एक मर्तबा मुझ से फ़रमाया है, जिसका यह मतलब है कि उसने खूब झाड़ फटकार तुम पर की और तकलीफ़ दी, जिसकी वज़ह से तुम्हारी सहनशीलता की आदत पड़ गई, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिये ज़रुरी है, इसलिये वह आज़ाद जायेगी। आज़ाद करना तो बुजुर्गों के बाँये हाथ का काम है, कर ही देते हैं और यह उन्होंने किया भी। ‘नाम मेरा और गाँव तेरा’।

केसर, बिट्टी को दुआ। माता जी को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-62
शाहजहाँपुर
10/9/1949
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद ।

मैं पिछले पत्रों के जवाब दे चुका हूँ, जो इसी खत के साथ है। जो खत मास्टर साहब कल अपने-साथ लाये हैं, उसका जवाब दे रहा हूँ।

तुमने अपनी आत्मिक-दशा जो कुछ भी लिखी है, अच्छी है। हमारी कोशिश यही होनी चाहिये कि जिस तरह से हो सके ‘मालिक’ की याद करें। यद्यपि यह जरूर होता है कि एक वक्त वह भी ज़रूर आता है कि ‘मालिक’ की याद भूलने लगती है। मगर हमको इस पर नहीं रहना चाहिये। जब किसी तरह से याद न हो सके तो उसके रुप बदल-बदल कर याद करना चाहिये और जब किसी रुप में याद न हो सके तो Suppose कर ले कि हम उसकी याद में हैं। इसके बाद जब किसी को हालत शुरु होगी, तो आगे बतला दूँगा।

माता जी को प्रणाम तथा सब बच्चों को आशीर्वाद।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-66
शाहजहाँपुर
11/11/1949
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद ।

अब तुम ईश्वर की कृपा से अच्छी होगी। मैंने एक दिन तुम्हारा काम देखा, कचहरी में था। तबियत खुश हुई। ख्वाह वह Automatic हो, ख्वाह वह खुद कर रही हो, तरीका ठीक था। यह हिन्दुस्तान की शुद्धता के बारे में था। अच्छा हो जाने पर अपना हाल लिखना। अब की बार पहुँचने पर ईश्वर को अगर मंजूर हुआ तो तुम्हारे अनुभव करने की शक्ति भी खोल दूँगा, और वह Point तुम्हें भी बतला दूँगा, जिसके खुलने से अनुभव शक्ति में वृद्धि होती है, मगर यह शक्ति बहुत कुछ उसके बाद practice पर भी, depend करती है, अर्थात अगर कोई Faculty खुल जावे और उससे काम न लिया जावे तो उसमें अधिक वृद्धि नहीं होती। तुम्हें जो ईश्वर ने पिण्ड-देश और ब्रह्माण्ड-देश की विलायत दी है, उसके माने ये हैं कि ‘पिण्ड-देश की विलायत के अर्थ mastery over individuality यानी पिण्ड पर निपुण होना और ब्रह्माण्ड-देश की विलायत के अर्थ यह है कि Mastery overcosmic power यानी ब्रह्माण्ड-देश पर निपुण होना’। किसी वक्त अगर कुछ मेरी समझ में आ गया और ऊपर से इशारा मिल गया तो फिर लिखूँगा। अलावा इसके मैंने यह भी किया है कि तुम्हारी हर Nerve को और जिस्म के हर हिस्से को spiritual force से भर दिया है। इसको हज़्म करने के लिये वर्षों चाहिये। ईश्वर की मर्ज़ी अगर शामिल हाल है, तो मैं कोशिश करूँगा कि साल-दो-साल में यह हज़म हो जाये। हालांकि यह वक्त बहुत थोड़ा है। मुझको चूंकि तुमसे काम लेना था, इसलिये मैंने ऐसा किया और तुमने मुझे मजबूर भी कर दिया था। एक नुस्खा इसके हज़्म करने का लिखता हूँ, जो इसमें मदद देगा। वह क्या है? मालिक की याद। वैसे तो भाई एक उमर गुज़र जाती है और यह चीज़ हज़्म नहीं हो पाती है और हज़्म न होने से कोई हानि भी नहीं हैं, मगर मुमकिन है, मेरी तबियत किसी वक्त और भरने को चली आवे तो गुंजाइश मिले। अच्छी तन्दुरुस्ती और लोगों को सिखाना भी हाज़में में मदद देता है। तुम्हारी बहनें और माता जी तो पूजा के लिये तुम्हारे पास बैठती ही होंगी और स्त्रियाँ अगर आ जावें तो बड़ा अच्छा है। तुम्हें जो सिखाने में अड़चन मालूम पड़े, मास्टर साहब से पूछ लेना। ईश्वर ने तुमको सब कुछ दिया है, यह माना, मगर जैसे ‘वह’ Unlimited है, वैसे ही अपनी तरक्की की भी Limit नहीं। मैं तो भाई, अपने लिये डंके की चोट पर कहने के लिये तैयार हूँ कि ‘मैंने यही जाना, कि कुछ नहीं जाना।’ और भाई, हमारे यहाँ हमारे गुरु महाराज के तो सिखाये हुओं का यह हाल है कि – ‘जिसको मिल गई गाँठ हल्दी की, उसने जाना कि हूँ मैं पंसारी’। यह आध्यात्मिक विद्या का समुन्द्र इतना लम्बा चौड़ा है कि इन्सान ज़िन्दगी में भी तैरे और ज़िन्दगी के बाद भी, मगर छोर कभी भी नहीं मिलता। मैं यह मुनासिब समझता हूँ कि शुक्रिया का प्रसाद तुम वहीं चढ़ा दो। इस खत की नकल केसर से करवा कर यहाँ भेज देना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-69
शाहजहाँपुर
16/11/1949
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

तुम्हारा पत्र मिला और केसर का भी खत मिला। मैं स्पष्ट रुप से उत्तर देना चाहता था, परन्तु इस समय रात का एक बज गया है, इसलिये थोड़ा और जरुरी ही लिख रहा हूँ। बेचैनी मुबारक हो। तुम जो कुछ काम कर रही हो, ठीक कर रही हो और इतना करो कि दिमाग न थके। तुम इलाहाबाद जाना चाहती हो। इसको चौबेजी की राय पर छोड़ दो। इलाहाबाद मेरे जाने का इरादा है और ईश्वर ने कृपा की तो पहुँच जाऊँगा, मगर मेरे वहाँ होने से सिवाय इसके कि तुम्हें यह ख्याल रहे कि मैं वहाँ पहुँच गया और कोई फ़ायदा समझाने बुझाने का नहीं हो सकता। इसलिये कि वहाँ मेरे सामने तुम सब का निकलना मुनासिब न होगा। क्योंकि और रिश्तेदार मौजूद होंगें - पर्दे का लिहाज ज़रुर रखना चाहिये। केसर ने जो हाल लिखा है, उससे यह मालूम होता है कि अब उन्हें शौक बढ़ रहा है। इससे पेश्तर चौबेजी ने भी कहा और मास्टर साहब ने भी, मगर मेरी राय इसके खिलाफ ही रही। मगर अभी और शौक बढ़ने का इन्तज़ार है। अभी वह इस सूरत में नहीं आई कि इसके शौक पर एतबार कर लिया जावे। और मुझे तो किसी की सेवा करने में कभी आर नहीं होना चाहिये। और न है। मुझे तो जिधर तुम सब लोग घुमा दो, घूम जाता हूँ। मैं अपना अगर हूँ तो अपने काबू की बात करूँ। भाई अब समय ज़्यादा हो गया है, खत बन्द करता हूँ फिर कभी लिखूंगा। इसी में केसर के खत का भी जवाब है।

तुम्हारा शुभचिंतक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-73
शाहजहाँपुर
12/5/1949
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद ।

तुम्हारे दो पत्र मिले। एक इलाहाबाद जाने से पहले और एक कल तीसरी दिसम्बर को। इलाहाबाद में मेरी खूब तबियत लगी रही। तुम्हारी बहन शकुन्तला बेचारी मेरी वजह से इलाहाबाद आई। अपने दिल के दौरे की कुछ परवाह न की और वहाँ भी उसको कई दौरे हुए। मुझे यह देख कर बड़ा तरस आया और मुझे यह देख कर बड़ा दुख भी हुआ कि ऐसी लड़की की याद, बावजूद कितनी मर्तबा चौबे जी के कहने पर भी मुझे न आती थी। जाने से पहले बड़ी कोशिश से दो-चार दफे उसका ख्याल आया। एक रोज़ उसका दिल बहुत ज़्यादा धड़क रहा था और मुझे देख कर बड़ी तकलीफ़ हुई। बस, उसकी सिफारिशों पर ख्याल करते हुए और उसकी हालत पर तरस खाते हुए मैं उसकी आत्मिक उन्नति के लिये ख्याल करता रहा। ईश्वर ने मेरी सुन ली। उसके पिण्ड के मुकामात (चक्र) मय सैर के पूरे हो गये और उसका वास ब्रह्माण्ड-मण्डल में है। उसके कुल ज़िस्म में ईश्वरीय-प्रकाश छा गया और अनहद खुल गया अर्थात् हर रोम-रोम से अजपा जाप शुरु हो गया। चूंकि वह कमज़ोर थी और दिल की बीमारी, इस लिये इस काम को इस तरीके पर किया कि बात वही हो जाय, मगर दिल पर ज़ोर न पड़े। चलते वक्त उसने मुझसे फिर कह दिया कि मेरी याद रखना। मैंने उससे कह दिया कि अपनी बहन कस्तूरी को लिखो कि वह अब तुम्हारी याद रखे। इतना खत मैं लिख चुका था कि तुम्हारा एक पत्र आज और मिला।

याद से जहाँ तक हो सके गाफ़ील नहीं होना चाहिये। जितनी याद हल्की पड़ती जावे, उतना ही हल्का रूप, उसकी याद करने के लिये लेना चाहिये। और फिर आखिर में जो कुछ हो जावे, यह ‘मालिक’ की मर्ज़ी। तुमने यह जो लिखा कि - ‘कल शाम को तो मेरे अन्दर न मालूम क्या हो रहा था। ऐसा लगता है कि भीतर जैसे आँख सी खुल गई है’। इसका मतलब मेरी समझ में नहीं आया। आँखें खुलने से क्या जिस्म के अन्दरुनी organs मालूम होने लगे या प्रकाश, या कोई और बात महसूस हुई - लिखना।

अब पिछले खत का जवाब देता हूँ। ईश्वर की याद में पूजा कराने से दूसरे में जागृति बहुत पैदा होती है। इसलिये इन्सान सोते हुए अपने आप को जाग्रत हालत में महसूस करता है। मगर तुमने अपनी हालत तो लिखी ही नहीं कि तुम्हें नींद कैसी आती है। सोते हुए जागने का एहसास होता है या गहरी नींद में सोती हो। मैं तो भाई खूब गहरी नींद सोता हूँ, मगर फ़कीर के लिये गहरी नींद में सोना वर्जित है। मुझे शायद चौबीसो घंटे नींद न आवे, अगर ऊपर से सुलाने के लिये धार न बहे। यह तकलीफ़ मेरी वजह से मेरे गुरु महाराज को उठानी पड़ती है। न मालूम यह क्यों मेरे साथ रियायत है, यह ‘वह’ जानें।

पण्डित महादेव प्रसाद के यहाँ जब तुम गई थीं और वहाँ तुमको भारीपन महसूस हुआ। यह उनके ठोस विचार और ठोस पूजा का असर है। ठोस पूजायें जो आम तौर से हो रही हैं, इसका फल यह होता है कि आदमी जन्म-जन्मांतर के लिये ईश्वर प्राप्ति के लायक नहीं रहता। यह बात जिससे कहूँ, वह लड़ बैठे। ज़ब किसी को Liberation प्राप्त करना होगा, सिवाय इस तरीके, राजयोग जो हम सब कर रहे हैं, कोई हो ही नहीं सकता। यह स्वामी विवेकानन्द ने भी कहीं पर कहा है। सिवाय इस योग के कोई योग ही नहीं जो धुर तक पहुँचा सके। हठ योग सिर्फ़ आज्ञा चक्र तक पहुँचा सकता है। यह चक्र दोनों भौंहों के बीच में है। इसके आगे राजयोग की ही ताकत है।

तुम्हारे खत का जवाब कुछ अंग्रेजी में भी दिया है, जो स्वामी जी का Dictate है। अगर समझ में न आवे तो मास्टर साहब से समझ लेना, और किसी को बतलाने की जरुरत नहीं। किसी शख्स की जान की हिफ़ाज़त करने का तरीका यह है कि उसके चारों तरफ़ एक ख्याली circle अपनी will से यह ख्याल करते हुए बना लेवे कि यह चीज़ उसकी रक्षा करेगी और किसी-किसी वक्त ख्याल रखे। हर वक्त ख्याल रखने की जरुरत नहीं। यह वह कुण्डली (circle) है, जिसको लक्ष्मण जी ने सीता के चारों ओर बनाई थी, जब मारीच हिरण के रुप में जंगल में आया था और रामचन्द्र जी उसके शिकार को चल दिये थे और बाद में लक्ष्मण जी को भी जाना पड़ा। आज स्वामी सुखदेवा नन्द के मुमुक्ष आश्रम में जलसा है। यह ३-४ दिन रहेगा। उसके लिये Public ने पन्द्रह हजार रुपये चन्दा दिया है। महात्मा लोग Lectures देगें। सिर्फ दो घंटे के लिये एक साहब के कहने से मैं भी आज जा रहा हूँ। काम इतना करो कि दिमाग थक न जावे।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-77
शाहजहाँपुर
1/1/1950
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद ।

तुम्हारा पत्र १५ दिसम्बर का लिखा हुआ मिला। बड़े दिन में मैं गाँव चला गया था और इससे पहले जवाब देने का समय नहीं मिला। इसलिये ज़वाब में देर हुई। तुमने जो यह लिखा है कि किसी वक्त तबियत उदास हो जाती है। मैं समझता हूँ कि कोई फ़िक्र पैदा नहीं होती होगी, बल्कि यह एक हालत है जो ईश्वर की कृपा से तुममें मौजूद है। इसके जरा तेज हो जाने पर तुमको उदासी feel होती है। इस हालत को उदासीनता की हालत कहते हैं। तबियत अभ्यासी की ऐसी बन जावे कि जो काम करे वह इस तरह का हो जैसे परवाना जाने के बाद दिल में फिर उसका ख्याल भी नहीं लाता अर्थात् परवाना कर आने के बाद फिर परवाने का ख्याल भी नहीं लाता। हर काम दुनियादारी का इसी तरह से होता रहे कि उसके करने के बाद ख्याल का weight उस पर कम रहे। इसको उदासीनता की हालत कहते हैं। इस जमाने में एक उदासी फिरका भी है। मगर उसका अब नाम ही नाम रह गया है। यह हालत उनमें से शायद ही किसी में हो। तुमने लिखा है कि -’एक मन सब काम कर रहा है यह एहसास ठीक है। जब गिलास में पानी भर कर ज़ोर से फेंका जाता है, तो उसका एक मुँह फेंकने वाले की तरफ़ हो जाता है और दूसरा मुँह दूसरी तरफ़, चीज़ एक ही है। जिसका मुँह मालिक की तरफ़ है वह ‘मालिक’ की याद करता है और जिसका मुंह दुनिया की तरफ़ है, उसको दुनियादारी की याद रहती है। मैंने यह बात बहुत संक्षेप में लिख दी, उसकी Philoshpy बयान नहीं की। मन में जब जागृति पैदा होती है, तब उसका रुझान ईश्वर की तरफ़ हो जाता है और जरुरत भर दुनियाँ की तरफ़ रहता है। सर्दी का एहसास कम होने के मतलब यह है कि रुझान ऊपर की तरफ़ बहुत तेज होने की वजह से इसका एहसास कम हो गया। मगर मुझे तो बहुत सर्दी लगती है और इस वजह से देर करके उठता हूँ और कुछ काम भी नहीं कर पाता।

एक बात से मुझको बड़ी तकलीफ़ होती है और मेरा कुछ बस नहीं चलता। वह यह है कि तुम्हारे पिताजी की जब आर्थिक तकलीफ़ की तरफ जब ध्यान जाता है, तो बहुत फ़िक्र पैदा हो जाती है। मैंने ईश्वर से प्रार्थना भी की मगर नहीं मालूम वह क्यों नहीं सुनते। या तो यह हो सकता है कि यह हमारे मतलब की बात नहीं है, या कोई और वजह हो। यह ज़रुर देखा गया है कि जब ईश्वर के मतलब की बात होती है, तो ख्याल आते ही ‘वह’ कर देते हैं। प्रार्थना की नौबत ही नहीं आती। इस तकलीफ़ को दूर करने की तुम ही दुआ करो। मुमकिन है ‘वह’ तुम्हारे ही कहने से कुछ कर देवे। मुझे तो, मैं सच कहता हूँ, कुछ शर्म सी मालूम होती है कि इतना छोटा सा काम मुझ से नहीं होता।

तुम्हारी माता जी को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-80
शाहजहाँपुर
1/12/1950
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद ।

तुम्हारा खत २९.१२.४९ को लिखा हुआ आया। उसमें जो तुमने लिखा है कि ‘अपने शरीर का एहसास भी करीब-करीब खत्म हो गया है’। यह बड़ी अच्छी हालत है। इसको लय अवस्था कहते हैं। फ़ारसी में इसको फ़ना कहते हैं। अभी यह चल रही है, इसके बाद और अच्छी हालत आवेगी, ईश्वर ने चाहा। जब आवेगी। तो बता दूँगा। पहले से बताना नहीं चाहता। सोते वक्त और लोगों को चाहिये कि एकदम से न जगायें। एकदम से जगाने से ख्याल जो लगा हुआ है, एकदम से हटता है, इसलिये उसको shock होता है और तकलीफ़ भी हो जाती है। किसी अभ्यासी को एकदम से नहीं जगाना चाहिये। मेरा तो यह हाल है कि जगने की हालत में अगर कोई चारपाई हिला दे, तो मुझे तकलीफ़ हो जाती हैं।

तुम्हारा एक खत ८.१.५० का लिखा हुआ आया। उसमें यह लिखा हुआ है कि ‘एक दिन जब Working कर रही थी तो India में ॐ शब्द सा दिखलाई दिया’। यह एहसास बिलकुल ठीक है। यह ऐसा समय है कि मुद्दतों ऐसे वक्त का आना दुर्लभ है। ईश्वर की शक्ति अपने खालिस रुप में किसी बड़ी Personality के द्वारा उतरी हुई है। इसका सबूत यह है कि किसी जगह पर बैठकर देखें और यह ख्याल करें कि मैं उस Personality से आध्यात्मिक लाभ उठा रहा हूँ, जिसमें खालिस रुप में ईश्वर की शक्ति उतरी हुई है, तो उसको फ़ौरन फ़ायदा पहुँचेगा। इस ॐ की शक्ति के साथ मुमकिन है, इससे पहले कोई महात्मा न आया हो। हाँ, मेरे गुरु महाराज इसमें Exception है, इसलिये कि उनमें ऐसी शक्ति पैदा करने की ताकत है, फिर ऐसे गुरु की ताकत का क्या ठिकाना। यह शक्ति जब उतरेगी तो संहार भी होगा और उससे चिपटे हुओं को फ़ायदा भी Unlimited होगा। महाभारत में इस शक्ति का ज़हूर इतने पूर्ण रुप में न था। था ज़रुर, इस तरीके पर कि ‘उसको’ Destruction और Construction का पूरा अख्तयार था और उस वक्त उस शक्ति में से फुहार निकाल कर काम कर रही थी। इस वजह से संग्राम पूरी शक्ति से नहीं हो रहा था। उस वक्त इतनी ही ज़रुरत थी और इस वक्त उससे ज्यादा जरुरत है मामला World Destruction का पेश है। वक्त कितना ही लग जाये। मगर साथ- साथ में Construction भी है। महा प्रलय के वक्त भी कोई शक्ति कुल Universe के खत्म करने के लिये काम करेगी। उस वक्त Construction work खत्म हो जायेगा। तुलसीदास ने जो यह लिखा है कि एक दिन सब को मरना है, इसलिए पढ़ना बेकार है। उनसे यह कहना चाहिये कि जितने दिन सबको जीना है, उतने वक्त के लिये पढ़ना ज़रुरी है। इस ख्याल को उनके तुम्हीं साफ कर दो। जैसा ख्याल बाँधोगी, वैसा ही दूसरे में असर होगा।

एक बात तुम्हें और बतलाता हूँ - भगवान् कृष्ण का अवतार महामाया के स्थान से था और यह बात हमारे गुरु महाराज ने कहीं पर कही है। यह स्थान वह है, जहाँ पर माया एक घुमाव की शक्ल में बहुत ज़ोरदार होती है। उसमें वह ताकत होती है, कि चाहे सो कर गुज़रे, इसलिये श्री कृष्ण जी महाराज में इन्तहा ताकत थी। इस ताकत की बराबरी कोई नहीं कर सकता, इसलिये कि बिल्कुल परिपक्व हालत से श्री कृष्ण जी का अवतार हुआ था। इससे ऊँचा एक रुहानी मुकाम है और वह भक्तों को नसीब होता है और वहाँ पर गिने चुने लोग पहुँचते हैं। मगर उसकी complete हालत हज़ारों वर्ष बाद किसी एक को नसीब होती है। श्री कृष्ण जी को महामाया के स्थान पर पूरा कमाल हासिल था और उनका कदम इस रुहानी स्थान पर था, जिसका मैंने ज़िक्र किया था। अब शक्ल इसके खिलाफ़ है। वह बड़ी हस्ती है, जिससे कि ईश्वर काम ले रहा है। उसको ‘उस’ हालत पर ईश्वर ने कमाल दिया है। श्री कृष्ण जी महाराज को समयानुसार महामाया के स्थान पर कमाल हासिल था और अब मौजूदा हस्ती को उस पर कमाल हासिल है।

गाँधी जी की मृत्यु के बाद अरविन्द घोष से पूछा गया था कि गाँधी जी तो चल बसे, अब कहीं हिन्दुस्तान में Light मौजूद है? उन्होंने जवाब दिया था ‘There is still light in Northern India’. इससे ज़ाहिर होता है कि कोई Personality ज़रुर काम कर रही है। अरविन्द घोष एक अच्छे महात्मा कहे जाते हैं और कुल जग उनको मानता है। उनकी पहुँच ब्रह्माण्ड मण्डल तक थी और उनका कदम इस वक्त तक इससे आगे जा भी नहीं रहा था। मगर चूँकि मेहनत अच्छी की थी, इसलिये उनमें बिजली ज्यादा है। अगर कहीं हमारे यहाँ लोग मेहनत कर जायें, अर्थात् अपने आप ऊपर बढ़े, मुझ से मेहनत कम लें, तो मैं समझता हूँ, हमारी संस्था में बहुत से अरविन्द घोष थोड़े ही दिनों में नज़र आने लगें। अपने आप रगड़ करने से ताकत अपने वश में रहती है। यह स्थान बहुत ऊँचा है। श्री कृष्ण भगवान ने अर्जुन को अपना विराट रुप इसी जगह से दिखलाया था। मगर हमारे यहाँ इन मुकामत की कदर ही नहीं रही और यह बहुत सस्ती चीज़ हो गई। इस बड़ी नियामत (Blessing) की बेकदरी की जिम्मेदारी हमारे ऊपर है कि एक तो हमारी जल्दी की आदत है, दूसरे यह ख्याल कि जल्दी से जल्दी लोग आगे बढ़े। तीसरे यह कि वह ज्यादा मेहनत और Sacrifice नहीं करते हैं। मैं चाहता हूँ कि अपनी ज़िन्दगी में कुछ थोड़ा बहुत जहाँ तक हो सके बढ़ा जाऊँ कम से कम लोग इतने तो अवश्य हो जावें कि इस दुनिया में उनकी पैदाइश रुक जावे और अगर यह भी न हो सके तो आगामी जन्म में तो तरक्की कर सकें। एक चीज़ मुझे ज़रुर प्रिय है और उसका इन्तज़ार करता हूँ कि जब ईश्वर पर Faith अच्छा हो जाता है, तो मेरी तबियत उसकी तरक्की के लिये जल्दी रुजू होती है, और नहीं मालूम मैं किस चीज़ के इन्तज़ार में रहता हूँ - यह मुझे अब भी पता नहीं है। यह बात अगर पैदा हो जाती है, तब तो भाई, जब मुझे कोई रोकता है, तब रुक पाता हूँ। तुम्हीं लिखना अगर तुम्हें मालूम हो, ताकि मुझे भी मालूम हो जाये। मुझे एक मीनियाँ यह भी रहता है कि कोई शख्स ऐसा मिल जाये कि मैं अपनी हालत से जो कुछ भी मुझे मेरे गुरु की कृपा से मिली है, उससे मैं उसे Sitting दे देता। चाहता मैं अब भी हूँ, और कोई इस हद तक आ गया तो मैं चूक नहीं सकता, मगर अब इसकी ख्वाहिश जाती रही, इसलिये कि मुझे एक मौका ज़रुर मिल गया। किस वक्त? जब कि प्रकाश की माँ परलोक सिधारने की तैयारी कर रही थीं। वह भी सिर्फ पाँच या छ: सेकण्ड का। मैंने उनको ईश्वरी Region से Sitting दी थी। इससे ऊपर के हिस्से में तवज्जह देने का ख्याल ही न आया। मृत्यु के बाद ख्याल आया, तो एक बार, पर उसके लिये आज्ञा ही नहीं मिली। न मालूम क्यों मेरी तबियत चाही, जो मैंने यह सब तुमको लिख दिया। हालांकि तुम्हारे खत के जवाब से इसका कोई ताल्लुक नहीं।

Swami Viveka Nandji Maharaj - Dictate - १४.०१.५०

You are totally correct in writing that Lord krishna was bestowed with the Power of destruction, but he was not given the construction power. Atmosphere had grown poisonous during the days of Mahabharata. The responsibility of this was on the kauravs and other people. They were the main Cause, so they were annihilated. More over the power they had gained was mis-utilized and that ought to be finished. Lord Krishna did all that and finished the Power. Intensity of the force of Lord Krishna was Located to the point of India. There was no necessity of going abroad or swimming above it. Now there is the different question.

A thorough overhauling of the bones. You will not find so many people in the world, as you see today. Intensity of force was for India alone and that was the power required at that time. What else do you want to clarify? As to me jumping in toto at the spiritual point is far above than the power of Lord Krishna bestowed at that time. It is far above but it does not mean that the Power Lord Krishna had in body and mind, you have got it. He had force of arms and body.

Lord Krishna will give dictation -

ज़माने की खूबी ने वह चीज़ झलका दी, जो मुझमें मौजूद थी और उस चीज़ को दबा दिया, जिसकी अब ज़रुरत है। मैं उसी चीज़ के मातहत हूँ, जिसका नतीजा मेरा अवतार है।

Can anybody call Lord Krishna, as you call? Is there any one who has such powers? who can call greater Personalities including Lord Krishna? The reply is pregnant in the Short sentences of Lord Krishna given above. Do you want any Thing more for kasturi you have correctly written in your book that the atmosphere at the present is not so poisonous as during the days of mahabharata. There the person residing in India having great powers made the atmosphere above then coarse and bad. Here all the people of the world are contributing some thing black to there Surroundings and they are not so powerful as were here during those day.

अवतार की कल उतनी ही उमेठी जाती है, जितनी ज़रुरत होती है। उससे आगे वह काम नहीं कर सकता। Power कितनी ही हो, इससे मतलब नहीं, मगर काम का दायरा वही रहेगा।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-83
शाहजहाँपुर
2/1/1950
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

मैं लखीमपुर से चलकर यहाँ कुशल पूर्वक आ गया। ईश्वर की अपार दया है कि ‘उसने’ तुमको पार-ब्रह्म मण्डल की सैर पूरी तौर से करवा कर अब उससे आगे बढ़ा दिया। यह सिर्फ ईश्वर की ही कृपा है और ‘उसी’ का काम ! मेरी एक आदत है कि मैं जिस मुकाम या मण्डल से आगे बढ़ाता जाता हूँ, वह कह देता हूँ। इस कहने से किसी को ईश्वर न करे अहंकार हो जाये। और तुममें तो ईश्वर की कृपा से यह बात कभी पैदा न होगी। तुम अपनी हालत पर गौर करती रहा करो और इसलिये मैं बताता चलता हूँ। इससे तुम्हें एक से दूसरे का फ़र्क मालूम होगा और आगे चलकर यह फ़र्क बहुत मुश्किल से समझ में आयेगा। मेरी तबियत आज ही से यह चाह रही है कि मैं इस मण्डल की भी सैर शुरु करा दूँ। इसलिये कि वह पाँच Circles मेरी निगाह के सामने हैं और ग्यारह उसके बाद। मैं चाहता हूँ कि अपनी ज़िन्दगी में ही ऊँची से ऊँची तरक्की दूसरों की अपनी आँखों से देख लूँ। यह सही है कि ईश्वर की कृपा से इन सोलहों Circles का पार करा देना बहुत ज्यादा वक्त का काम नहीं है। अगर ‘वह’ कृपा करे तो एक सेकण्ड भी काफ़ी हो सकता है और इसका तजुर्बा भी है और इसी से हिम्मत भी होती है। प्रकाश की माता जी ने इन सोलहों Circles को पार करके दम तोड़ी थी। उस समय यह ग्यारह Circles निगाह में न थे, मगर खालिस हालत पर पहुँचाने के लिये इन सब को ईश्वर ने पार करा ही दिया। उसे कोटिशः धन्यवाद है।

मेरी हालत बिटिया! लोगों को मालूम नहीं और मुमकिन है कि आगे भी न मालूम हो पावे। गुण में कुछ नहीं रहा – रुहानियत या आध्यात्मिकता भी अगर सही पूछती हो तो अब नहीं हैं यह चीज़ भी बहुत भारी है। अब तुम्हीं बताओ किस बात पर मैं गर्व करूँ? जिसके पास कुछ हो, उसे गर्व भी हो।

Dictate by Swami Viveka Nand ji:-

A very beautiful sentence, who will understand it? This is absolute base.

बिटिया ! आज मैंने अपनी सारी हालत तुमको लिख दी। अगर लोगों को यह मालूम हो जाये, तो मेरे पास कोई फटके भी नहीं। आध्यात्मिक विद्या की तलाश में फिर वह भला ऐसे शख्स के पास जावे जिसमें यह न हो। Dictate by Swami Viveka Nand ji:-
This is too philosophical to tell you the truth, even Vedic Rishis.
That is too much. No body can have Conception of it. Here we are Powerless.
मुमकिन है लोग मेरे पास इसी वजह से न आते हों।
Dictate by Swami Viveka Nand ji:-
‘See this time. Leaving valuable aside and Searching for stones. See the mentality of the general folk. When egoism dies out, this is the result.’
मैंने तुम्हें वैसे ही लिखा दिया। तुम अपने काम में लगी रहो। ईश्वर सब कुछ कर सकता है और सब ‘उसके’ हाथ में है।

इस खत की नकल मास्टर साहब को करके देना, ताकि फाइल में लगी रहे। मैंने इस खत की नकल नहीं रखी, इसलिये वहाँ इसकी ज़रुरत है।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-87
शाहजहाँपुर
2/3/1950
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

पत्र तुम्हारा मिला। यह बड़ी अच्छी बात है कि तुम्हारे ध्यान में सिर्फ ‘मालिक’ ही है। अभ्यासी को सिर्फ ‘मालिक’ से ही गरज होना चाहिए। इसी से सब कुछ हो जाता है। मेरी कुछ आदत ऐसी हो गई है कि हर शख्स की तरक्की मैं बताता चलता हूँ। ऐसा शायद किसी सिखाने वाले ने नहीं किया। कहीं-कहीं पर Hint हमारे गुरु महाराज दे जाते थे। अब यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं यह गलती कर रहा हूँ या ठीक है। मैं चीज़ ही क्या हूँ? बड़े-बड़े उच्च महात्माओं ने यह नहीं किया है। मेरे सोचने से यह समझ में आता नहीं। अब मैं यह बात किसी से पूछूँगा, चौबे जी से भी और मास्टर साहब से भी। देखो उनकी राय क्या पड़ती है, और तुम्हारे समझ में अगर आ जाये, तो तुम भी लिखना, ताकि मैं सही बात करने लगूं।

पाँच circles या ग्यारह circles या इसके बाद भी और जो कुछ भी है या जो कुछ भी मेरी समझ में आता जाता है, मैं दूसरों को ज़बानी या तहरीरी (लिखित रुप में) बताता जाता हूँ, ताकि मेरे बाद दूसरे लोगों को इससे आगे मालूम करने का मौका मिले और मुझे जो मालूम हो जाये वह अपने सीने में छिपाकर तो न जाऊँ और भाई, एक बात यह भी है कि लोग जितना सीखते जाते हैं, उसको कहीं काफ़ी न समझ बैठे। अभी तक तो भाई, जहाँ तक मेरी निगाह पहुँचती है, यही हुआ है कि जरा सी हालत कहीं पैदा हो गई और कुछ शान्ति निखर आई, वह अपने आप को पूर्ण समझने लगे और बिल्कुल ऐसा ही हुआ है- ‘जिसको मिल गई गाँठ हल्दी की, वह यह समझा कि हूँ मैं पंसारी’। मेरा तजुरबा यह है इस वक्त कि मैंने यही जाना कि कुछ नहीं जाना। और मुझको उसका पूर्ण छोर न मिला। पूर्ण होना किसको कहते हैं? कुछ बातें मैं मास्टर साहब के खत में लिख रहा हूँ, वह अपने जानने के लिये उनसे पढ़वा कर सुन लेना। इसलिये कि तुम भी ट्रेनिंग का काम कर रही हो और करोगी।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-88
शाहजहाँपुर
2/5/1950
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद ।

पत्र तुम्हारा मिला, जो २७ फरवरी का लिखा हुआ था। उदासीनता की हालत रहना अच्छा है। हर काम करने से पहले और छोड़ने के बाद ख्याल न रहने के माने यह है कि आगामी संस्कार बनना बन्द हो चुके हैं। तुमने लिखा है कि उदासी की हालत में फैलाव मालूम होता है, यह तुम्हारा Self Expansion है, जो तुम्हारी दृष्टि से महसूस होता है। यह हालत अभी और बढ़ेगी। अभी लय अवस्था पूर्ण रुप में पैदा नहीं हुई है। इसके पैदा होने का इन्तज़ार है - उसके Symptoms मैं पहले से बताना नहीं चाहता, इसलिये कि तुम उसका, हालत पैदा होने से पहले ख्याल न बाँध दो। यह हालत जब well developed हो जाती है, और लय अवस्था अपने पूर्ण रुप में आकर अपनी अवस्था को भी उसमें लय कर देती है, उस वक्त भोग की शक्ल बदल जाती है। इसमें देर नहीं मालूम हो रही है। ईश्वर जल्द देगा। उसका नतीजा भी तुम्हें बता दूँ, मगर उससे अफसोस नहीं होना चाहिये। जो बात मैं कहना चाहता हूँ, वह तुम्हारे लिये है। इसलिये कि जिस तर्ज और तरीके से तुम इस हालत पर आ रही हो, उसका नतीजा यह होता दिखाई देता है कि पिछले संस्कार खत्म होने के लिये ‘मुझे’ भी भोगना पड़ेगा, अर्थात् कुछ तुम भोगोगी, कुछ मैं। अब यह डर है कि मैं अपने संस्कार भी भोगूं और तुम्हारे भी भोगूं, गोया Double Working हो गया, ऐसा नहीं है। मेरे संस्कार, मेरी एवज़ में, मेरे गुरु महराज ने भोगे हैं। भक्ति के लिहाज़ से इसका शुक्रिया कहाँ तक अदा किया जावे । मगर Law of Nature के लिहाज़ से ‘वह’ ऐसा करने से मजबूर थे। इसी तरह मैं भी मजबूर हूँगा। अब अपनी कैफ़ियत सुनो कि जब तुम अपने संस्कार से खाली हो गई तो, जिन्दगी कायम रखने के लिये दूसरों के संस्कार तुमको भोगने पड़ेगें। जब तक कि कोई खास Personality अपनी ऐसी हालत पैदा नहीं कर लेती कि उसके सिखाने वाले को भोगना न पड़े। सिखाने वाला बिना ताल्लुक लोगों के संस्कार भोगता है। इस जमाने में गुरु बनना बहुत आसान है जहाँ किसी के कीर्तन की लय अच्छी मालूम हुई, दूसरे ने उसको गुरु कर लिया और वह भी खुश हो गये कि – वाह ! चेला मिल गया। किसी ने अपनी इज्ज़त बढ़ाने के लिये, ईश्वर का ज्ञान सिखाने के बहाने चेला बनाना शुरु कर दिया और किसी ने अपना गोल बढ़ाने के लिये ईश्वर के नाम पर भीख माँगना शुरु कर दिया। क्या रफ्तार ज़माने की हो रही है। गुरुआई इतनी मुश्किल चीज़ है, कि ईश्वर ही जानता है। और भाई, मैं इसलिये गुरु नहीं बन सकता कि उस मुसीबत को कौन भोगेगा, जबकि बिरादराना तौर पर तालीम देने में इन दिक्कतों का सामना हो रहा है। मेरा ख्याल यह है कि गुरु बन कर अगर चेला को भवसागर पार न उतार सका तो कम से कम उसकी तरक्की का रास्ता न खोल दिया, तो ऐसे गुरु के लिये इतनी बड़ी सजा मिलती है कि मुमकिन है कि वह एक हज़ार जन्म तक कम से कम अन्धेरे में पड़ा रहे। यह बात स्वामियों को सुनाने वाली है, जो ईश्वर के जीवों को इतना धोखा दे रहे हैं। जिसका नतीजा यह हो रहा है कि वह (यानी चेले) सैकड़ों वर्ष ईश्वर की बादशाहत के किनारे नहीं पहुँचते। मैं सबसे ज्यादा दोष उन गुरुओं को देता हूँ, जिन्होंने चेलों का परलोक बिगाड़ दिया।

मैं इस इबारत का मतलब नहीं समझ सका कि – ‘अपनेपन का एहसास अब शायद ‘मालिक’ के प्रति भी खत्म सा है’। इसको अगले पत्र में Explain कर देना। तुमने जो यह लिखा है कि – ‘वह मेरी याद में मस्त रहता है’। इसके बारे में कबीर साहब ने लिखा है कि – ‘मेरा राम मुझे भजे जब, तब पाऊँ विश्राम’। तुम्हें मालूम है कि जाति-पाति किसकी नहीं होती? - सन्यासी की। वह वर्ण-व्यवस्था से परे हो जाते हैं और यह एक हालत है, जिसको वैराग्य का Essence कहना चाहिये यह चीज़ जब परिपक्व हो जावे, तब सन्यास लेने का इन्सान अधिकारी होता हैं। मगर आजकल बिना मेहनत किये हुए आसानी से सन्यासी हो जाते हैं। कहो - इस ज़माने में सन्यास कितना आसान हो गया है। यह क्यों? बाबा जी को अपने चेलों की तादाद बढ़ानी थी।

तुमने जो मास्टर साहब और चौबे जी की सिफारिश की है, तो हमें खेद है कि तुमने हमारी सिफ़ारिश क्यों नहीं की। तुम कहोगी कि आपकी सिफ़ारिश मैं किस से करती। इसका जवाब यह है कि जिससे तुमने इन दोनों की सिफ़ारिश की। कितनी अचम्भे की बात है कि जिस शख्स में रुहानियत न रही हो, उसकी उन्नति की सिफारिश न की जावे और जिनमें रुहानियत हो, उनकी सिफारिश की जावे। पण्डित रामेश्वर प्रसाद का यह कहना है कि जिनकी तुम सिफारिश करती हो, उसके लिये तुम खुद क्यों नहीं करती। तुमने जो अपनी हालत पिछले पत्र में लिखी थी, वह बहुत अच्छी थी। पण्डित जी उसके लिये तुम्हें बधाई देते हैं। तुमने यह जो शिकायत की है कि – ‘मैं उसकी याद, जितनी चाहिये, उतनी नहीं कर पाती’। मुझे भी यह शिकायत हमेशा रही है। जब मुझे अपनी शिकायत दूर करने का कोई नुस्खा न मिला तो तुम्हें क्या बताऊँ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-93
शाहजहाँपुर
27/2/1950
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

तुम्हारा खत आया था, कई हफ्ते हुए, हाल मालूम हुआ। मैंने जो जुमले जवाब देने लायक थे, उनमें सुर्ख निशान भी बनाये थे और वह खत मैंने कहीं रख दिया है, अब मिलता नहीं है। इसका मुझे अफसोस है और यहाँ communal disturbance कि वजह से कोई लिखने वाला भी नहीं मिला जवाब में देर होती रही और बहुत दिन गुज़रने की वजह से मुझे याद भी नहीं रहा कि क्या लिखा था। अभी अजीजम नारायण ने तुम्हारे दो पत्र और दिये। उनको पढ़कर तुम्हारी हालत का अन्दाजा लगा लिया। हालत तो ईश्वर की कृपा से अच्छी है। मगर बिटिया, सच अगर पूछती हो तो अभी उर्द में सफ़ेदी आई है, इसका कहीं ओर-छोर नहीं। मैं समझता हूँ कि जब से दुनिया पैदा हुई, उस वक्त से अगर कोई शख्स ब्रह्म - विद्या में बढ़ता चले और दुनिया खत्म होने से कुछ पहले तक उसका छोर नहीं मिलेगा। मुझे ताज्जुब है कि लोग अपने आपको पूर्ण समझ बैठते हैं। उर्द की सफेदी से मेरा मतलब यह है कि अब उसकी अपार दया से असलियत का छींटा लगा है और यही छींटा develop करेगा। यह हालत उदासीनता के कमाल की है। उदासीनता के कमाल पर जो कैफ़ियत शुरु होती है, वह अब है। इसके इन्तहा के पहुँचने का इन्तज़ार है। वह भी ईश्वर ने चाहा, तो जल्दी पैदा होगी। पूजा करना तुम्हारे लिये लाज़मी नहीं, चाहो करो, चाहो न करो। मैं तो यही चाहता हूँ कि मेरी जिन्दगी में मेरे सामने कुछ लोग बन जाते (मगर ज्यादा तादाद इस तरफ़ हिम्मत नहीं करती) तो इस बहार को मैं स्वयं देख लेता। मगर यह सब ईश्वर के हाथ में है। जो ‘वह’ चाहेगा, वही होगा। अपना इसमें बस नहीं है। मैं चाहता हूँ कि अपनी जिन्दगी में जितनी तरक्की मैं दे सकता हूँ, दे जाऊँ मगर मैंने तुमको इसका मोहताज नहीं रखा। हालांकि जो मेरी जगह पर हो (कौन होगा, कहा नहीं जा सकता) उसकी इज़्ज़त सब पर वाजिब होगी। तुम्हारी मोहताज़ी यों खत्म है कि मैं होऊँ या न होऊँ तुम्हारी Stages directly तय होती रहेगी, क्योंकि मैंने अपना पीछा छुड़ाकर ईश्वर से बराह रास्त तुम्हारा सम्बन्ध कर दिया है। तुम्हारे काम में उसको मंजूर है तो कोई रुकावट नहीं। हमारे पूज्य चौबेजी को गायबाना तवज़्ज़ोह दिया करो, मगर खास तौर पर उनकी सफाई का लिहाज़ रखो। वह जरा सी देर में अपने आप को खराब कर लेते हैं और मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ती है।

तुमने जो लिखा है कि हर समय एक ईश्वरीय धारा बहती रहती है। यह बिल्कुल ठीक है और यह इस बात का सबूत है कि तुम्हारा Direct सम्बन्ध ईश्वर से हो गया है।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-98
शाहजहाँपुर
5/1/1950
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो ।

पत्र मिला, पढ़ कर खुशी हुई और यह अचम्भा भी हुआ कि तुम्हें यह बेकार का ख्याल (Baseless) कैसे हुआ, कि मैं तुमसे नाराज़ हूँ। इस ख्याल को कभी मत बाँधो। इसमें हानि है। मैं अपनी सुनाता हूँ। यदि मैं ख्याल बाँधू कि गुरु महाराज मुझसे नाराज़ हैं, तो हमारे लाला जी की आँखें हमारे ऊपर फौरन बदल जायेंगी। जिस degree तक मैं उनकी नाराज़गी का ख्याल बाँधूगा, उतनी degree तक ‘वह’ मुझ से नाराज हो जावेंगें। अगर मान लो कि मुझसे कोई गलती हो जावे और मैं उस गलती को दिल से महसूस करूँ तो तुरन्त लालाजी उसकी सज़ा देने को तैयार हो जावें (और गलती हर एक से हो ही सकती है) ईश्वर कृपा करें। इसीलिये अगर मैं कहीं पर गलती कर भी जाऊँ, तो भी यह ख्याल नहीं होता कि मैं गलती कर रहा हूँ। जब कोई हालत पैदा होती हैं तो पहले उसका वहम् होता है, इसके बाद वह असली सूरत में दरसने लगती है। इस वहम् में यदि कोई सुनी सुनाई बात उस दशा में पड़ जाती है, तो उसका भी असली रूप मालूम होने लगता है। या पड़ी हुई बात यदि कहीं सामने आ जाती है, तो वह भी अपनी ही हालत मालूम होती है। मैंने मास्टर साहब को यह लिखा था कि इस हालत में जो तुमने लिखा है, कुछ वहम् भी शामिल है, अर्थात् इसमें असलियत तो है, मगर कुछ वहम् का असर भी है। इसमें तुमको ग्लानि नहीं होनी चाहिये। यह तो होता ही रहता है।

तुम रुकी हुई नहीं हो, चल रही हो। वहाँ पर जो ठहराव है, उसको रुका होना समझ लिया है। यह ज़रुर होता रहता है कि चाल कहीं पर मध्यम होती रहती है और कहीं पर तेज। तुम्हारी चाल मध्यम ज़रुर पड़ गई है। जब अभ्यासी एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना चाहता है, उस वक्त यह मध्यमपना ज़रुर पड़ जाता है। इसके यह माने नहीं समझ लेना चाहिये कि मैं रुक गया। और यह भी होता है कि जब किसी चक्र या मुकाम पर सूरत फैलती है, तो भी मध्यमपन महसूस होने लगता है। इसका पहिचानना जरा मुश्किल है। तुम्हारे बारे में मैंने कह दिया है कि तुम्हारा सम्बन्ध ईश्वर से Direct हो गया है। तुम्हारी तरक्की नहीं रुकी है। कोई तुम्हें बढ़ाये या न बढ़ाये, ईश्वर तुम्हें खुद आध्यात्मिक उन्नति देता रहेगा। और पूजा-पाठ तो अब तुमसे होने से रही। ‘मालिक’ को ‘मालिक’ समझना और ‘उसके’ हुक्म को Carry Out करना, यही तुम्हारे लिये पूजा है। Working तुम अच्छा कर रही हो, किये जाओ। तुम्हारी दशा, जो वर्तमान है, वह उससे कहीं तेज़ Working कर रही हो, जो उससे पहले थी। पूजा तो मैं भी नहीं करता हूँ और दूसरों को बताता हूँ। लोग जो सुने, वह यह कहेंगे कि दूसरों को तो उपदेश देते हैं और अपने को फ़ज़ीहत। भाई, सच तो यह है कि पूजा होती ही नहीं। इस हालत पर मैं कह सकता हूँ कि - ‘बिना भक्ति तारो, तब तारिबो तुम्हारो है’। और लोग तो शुरु से ही यह पढ़ कर कहने लगते हैं। मगर ऐसे लोगों की बातें या पद ईश्वर सुनता भी नहीं है। मैं समझता हूँ, मास्टर साहब के एहसास ने ‘उनको’ धोखा दिया। उनके एहसास ने उनको धोखा नहीं दिया, बल्कि जिसको उन्होंने काले धुएँ की तरह मैल समझा है, वह असलियत का रंग है, और ईश्वर से किसी हद तक सम्बन्ध हो जाने की दलील है। मास्टर साहब का एहसास ज़रुर काबिले तारीफ़ है और मैं इस बारीकबीनी पर खुश हुआ। मगर बेचारों को यह खबर न थी कि यह चीज़ क्या है। किसी वक्त ईश्वर को मंजूर है, मैं अनुभव करा के उनको असल कालिख और इस किस्म की तमीज़ करा दूँगा। यही रंग आखिर तक चला जाता है। मगर उसमें भी अनगिनत हालतें हैं। यह चीज़ बहुत अच्छी है और यह भी एक Direct सम्बन्ध होने की वज़ह है। मेरी जब यह दशा पैदा हुई थी तो मैंने अपने गुरु महाराज को इतिला दी थी, और ‘वह’ अवश्य बहुत खुश हुए होंगे।

‘Live long my daughter. Be complete in the run of your life; the condition is hard by under standable. It is He (Ram Chandra) who has tasted the nectar of real life and He is imparting you all. Be gracious on the tumbling block who are rolling on the dirty street.’...says Swami Vivekanand Ji

यह तो बड़ी अच्छी हालत है। इससे चित्त में ग्लानि पैदा नहीं होनी चाहिये। ईश्वर मुबारक करे और आगे और बढ़ाता ज़ाये। ...These are the words from Lalaji.

अंग्रेज़ी के इबारत के मतलब यदि समझ में न आवे तो मास्टर साहब से समझ लेना। चौबे जी भी इसको समझा देंगे। मैंने विमला के खत का जवाब लिख दिया है। एक बात मैं यह चाहता हूँ कि तुम अपनी जीवनी थोड़ी-थोड़ी लिखती चलो। तुम्हारे माता और पिता तुम्हारे बचपन की बहुत सी बातें बता देगें और जब से अभ्यास शुरु किया है और खत तुमने मुझे भेजे हैं और मैंने उनका उत्तर दिया है, वह सब उसमें आ जाना चाहिये। तुम्हारे खत सब मेरे पास मौजूद हैं जब लिखो, तब मंगा लेना। मेरे खतों के जवाब तुम्हारे पास मौजूद होगें।

शकुन्तला बेचारी दिल के मर्ज में मुब्तला है, ज्यादा अभ्यास नहीं कर सकती। मुझे उस पर बड़ा तरस आता है। तुम्हारे ताऊ जी और माता जी ने उसकी बहुत सिफारिश की है। और उसने तुम्हें भी लिखा है कि उसकी याद मुझे दिला दिया करो। मुझे याद आई या न आई, यह और सवाल है। यदि तुम्हारी राय हो और माता जी हुक्म दें और ताऊ जी भी यह बात चाहें, तो उसको Higher Region में पहुँचा दिया जावे, मगर उसका पिण्ड-देश और ब्रह्माण्ड-देश खुद साफ़ करो। मगर इसके दिल पर अपनी Will का झटका न देना और इसको जल्दी से जल्दी साफ़ करो। मगर यह ज़रूर है कि शकुन्तला को Higher Region में जल्द पहुँचा देने से कुछ मजा नहीं आवेगा और वह शिकायत करेगी कि मैंने कुछ तरक्की नहीं की। अब यह तुम सब मिलकर सोच लो। जैसी तुम्हारी सबकी राय हो, वैसा लिखना। पत्रों के जवाब, मैं इसलिये नहीं दे पाता कि जब से नारायण गये हैं, कोई लिखने वाला किस्मत से मिलता है। तुम्हारे हरि भाई साहब को अपने ही से फुर्सत नहीं। तुम्हीं उनको साफ़ करो कि आगे चल निकलें। अब तुम अपना हाल लिखना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-103
शाहजहाँपुर
25/6/1950
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

तुम्हारे कई खत आये। जवाब इसलिये नहीं दे पाता हूँ कि कोई लिखने वाला नहीं मिलता तुम्हारी बीमारी सुनकर कुछ फिक्र ज़रूर हो जाती है, मगर इसमें अपना वश नहीं। ईश्वर की यह तारीफ़ है कि ‘जो है, सो है’। हमें भी उसी दशा की ओर जाना चाहिये, जो उसकी तारीफ है। अब जितना जा सके, यह उसकी देन है। हमारी अवस्था साम्य होनी चाहिये। तराजू के दोनों पलड़े बराबर रहने चाहिये। जब तौलने का समय आ जाये तो, नीचे-ऊँचे थोड़ी देर के लिये हो जाये, तथा फिर बराबर आ जावे। दया और रहम वहीं पर होना चाहिये, जहाँ पर इसकी ज़रूरत है। मैं राजा हरिश्चन्द्र से माफ़कत नहीं करता कि सब कुछ देकर भंगी के हाथ में अपने आप को बेच डाला। यह धर्म नहीं था, बल्कि एक प्रकार की Suicide थी और यह चीज़ जो कि उन्होंने की, असल में मनुष्यता के विरुद्ध थी। मेरी समझ से सिवाय नामवरी और तकलीफ उठाने के इससे कोई लाभ नहीं निकला। क्या हुआ कि तराजू का पलड़ा एक झुका ही रहा। मशीन की कल अगर ठीक Adjust नहीं है, तो वह मशीन ठीक हालत में नहीं कही जा सकती। अगर यह खराबी कहीं मशीन में हो जाये तो फिर इंजीनियर की जरूरत पड़ती है। असल उसूल को जानने वाले हमेशा कम रहे हैं, गो अच्छे ज़माने में कुछ तादाद ज्यादा रही। ईश्वर का मिलना तो भाई यही है कि हम में भी वही झलक पैदा हो जाये और बातें भी आ जायें, जो ‘उसमें’ हैं। देखने में भी जो सिन्धु और बिन्दु का फ़र्क क्यों न मालूम हो अब अपने खत के जवाब में यह समझ लो कि जिन बातों की ज़रूरत है, वह धीरे-धीरे आ रही हैं। पूजा तुम हर वक्त करती रहती हो, तुम्हें चाहे इसका पता हो या न हो। आगे यह चीज़ भी आ सकती है कि जाहिरा पूजा होती ही नहीं, बल्कि कोशिश करने से जी घबड़ाने लगता है और फिर यह ज़रूरी ही नहीं कि तमाम उम्र कोई पूजा करता ही रहे। जिस ध्येय के लिये पूजा की जाती है, उसकी प्राप्ति के बाद उसकी आवश्यकता नहीं रहती, मगर इस बात को instructor तय करता है। अपने आप तय नहीं कर लेना चाहिये। स्वामी विवेकानन्द जी ने भी लिखा है कि ईश्वर की पूजा दो तरह के इन्सान नहीं करते। एक तो inhuman brute और दूसरे जो अपने से काफ़ी उठ चुके हैं।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-105
शाहजहाँपुर
7/7/1950
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

पत्र तुम्हारा मिला। तुम्हारे सब पत्र मेरे पास रखे हैं। मैं चाहता हूँ कि हर पत्र का उत्तर विस्तार पूर्वक लिखूँ। मगर मजबूरी यह है कि मुझे कोई लिखने वाला नहीं मिलता है और अपने आप जब लिखना चाहता हूँ तो विचार आना बन्द हो जाते हैं। पत्रों के उत्तर में इसलिये अब देर भी हो जाती है। नारायण से मुझको बड़ी मदद मिलती थी और हरि को फुर्सत कम रहती है। उसकी जब मर्ज़ी होगी तो यह भी हो जावेगा। इस पत्र का उत्तर अगर विस्तारपूर्वक दिया जावे तो कम से कम बीस-पच्चीस पन्ने हो जावेगें, इसलिये संक्षेप में लिख रहा हूँ।

मेरी तबियत अब अच्छी है। दो-तीन दिन तुमने अपनी Will Power Exercise की। मुझे इस कदर फ़ायदा हुआ कि कहा नहीं जा सकता। अपने आप को देखता था, मगर कोई बात समझ में नहीं आती थी। इतनी बात समझ में आती थी कि यह प्रार्थना का असर है। working हरगिज़ नहीं छोड़नी चाहिये। तुम्हारे लिये working करना और दूसरों को सिखाना, अब यही पूजा है। मैंने तुमको ब्रह्म मण्डल की mastery इसलिये दी है कि working तुम्हारे सुपुर्द हो और उसको ठीक तरीके से करो। यह जहाँ तक मेरा ख्याल पहुँचता है पहली ही Example है। मुमकिन है यह काम शायद ही किसी स्त्री जाति के सुपुर्द हुआ हो। तुम्हारी वर्तमान हालत renunciation in pure form (वैराग्य) है और लय-अवस्था भी अच्छी चल रही है। हमारी हालत यही होनी चाहिये, मगर इसकी नकल करने की ज़रूरत नहीं। तुममें ज़रूर उस हालत की शुरुआत ईश्वर की कृपा से, हो चुकी है, इसलिये लिखता हूँ। जब हम किसी को रंज में देखें, तो हमारी तबियत भी रंजीदा हो जानी चाहिये और जब हम किसी को खुशी में देखें तो हमारी तबियत भी खुश हो जानी चाहिये। मगर जब हम वहाँ से हटें तो न हमें रंज हो और न ही खुशी। मेरठ में आँसू निकल आने का भी यही कारण था।

माता जी को प्रणाम तथा बच्चों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-129
शाहजहाँपुर
22/12/1950
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

तुम्हारा खत नारायण के हाथ पहुँचा। तुमने जो अपना तरीका काम के लिये लिखा है, वह बहुत अच्छा है। जब तुम काम करोगी, तरीके स्वयं ही समझ में आते रहेंगे। मतलब काम से है, तरीका कोई भी कर लिया जावे। और सब अच्छी तरह है।

दुआगो,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-142
शाहजहाँपुर
14/3/1951
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

खत तुम्हारा मिला। तुमने जो उचाट वाली हालत के विषय में लिखा, वह वाकई में उचाट हालत नहीं है, बल्कि उसे Whole hearted attention कहना चाहिये और झुंझलाहट भी इसी कारण से होती है, कि जब कोई बात करता है, तो तबियत को उस हालत से हटना पड़ता है, जो नागवार होता है। यह जो ख्याल तुम्हें आते हैं, वह वाकई तुम्हारे ख्याल नहीं हैं, बल्कि वह तुम्हारे विराट् देश में फैलाव का सबूत है और यह जो आग लगना, हल्ला सुनना आदि है, यह वह वारदातें हैं, जो वाकई में सब तरफ हो रही हैं। जो हालत २ मार्च के खत में लिखी है, वह वास्तव में असल शान्ति का तलछट है। तुमने लिखा है कि – “बका की हालत खुल रही है”। बका की हालत को तुरिया की हालत कह सकते हैं, क्योंकि जब मैं बका की हालत और तुरिया की हालत पर गौर करता हूँ तो एक ही पाता हूँ।

भाई-बहनों को दुआ। अम्मा को प्रणाम।


तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-146
शाहजहाँपुर
4/3/1951
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

खत तुम्हारे सब मिल गये। हाल मालूम हुआ। तुमने जो यह लिखा है कि “मुझमें प्रेम वगैरह बिल्कुल नहीं है” इसका उत्तर यही है कि ज्यों-ज्यों फ़नाइयत बढ़ती जावेगी, त्यों-त्यों यही बात मालूम पड़ती रहेगी। मैंने लिखा था कि तुम्हारी फ़नायेफ़ना की बका की कैफ़ियत खुल रही है, और भाई, बका में भी तो फ़ना होता है।

तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ। अम्मा को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-150
शाहजहाँपुर
5/4/1951
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

ख़त तुम्हारा और केसर का आया। हाल मालूम हुआ। तुमने लिखा है कि – “जब कोई तारीफ़ करता है तो मुझे न तो शर्म का भाव मालूम होता है, और न कुछ समझ में ही आता है।” यह हालत अच्छी है। योगी की तारीफ यही है कि मान में खुश न हो और अपमान में नाखुश न हो। काम का Automatically होना, यह ईश्वरीय गुण है और ऐसी दशा में संस्कार नहीं बनते। जब यह भी अन्दाज़ खत्म हो जाये कि काम Automatically हो रहा है, तब असली हालत है। मैंने इसी दशा को “Efficacy of Raj Yoga” के Description में दिखलाया है। हमारे यहाँ अभ्यासी आगे ही बढ़ते चले जाते हैं, इसलिये कि जिस दशा पर ठहर जावें, तो उसके अर्थ यह हैं कि अब आगे बढ़ना बन्द है। दीनता और Innocence की हालत का महसूस न होना के मानी यह है कि यह चीज़े अपनी अच्छी खासी हालत में आ चुकी हैं और कदम अब इससे आगे है।

जब सिर से पैर तक अभ्यासी याद ही याद हो जाता है, तब याद कोशिश करने से क्षणमात्र के लिये है। एक बात तुमने यह लिखी है कि – “जब मैं किसी के यहाँ जाती हूँ तो जिनसे अपरिचित होती हूँ, वह भी अपने मालूम होते हैं”। इसका जवाब तुमने स्वयं दे दिया है। वह यह है कि अपना-पराया क्या होता है, यह कुछ भी मालूम नहीं रह गया है। तुमने लिखा है कि – “मुझे फैज़ इत्यादि की पहचान नहीं रह गई है।” इसकी वजह मुझे यह मालूम पड़ती है कि तुम हर समय फैज़ में डूबी रहती हो और डूबे हुए की आँख के सामने सिवाय पानी के और कुछ नहीं होता। जब कोई दूसरी चीज़ हो, तब differ कर सकती हो।

अम्मा को प्रणाम। भाई-बहनों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-154
शाहजहाँपुर
6/4/1951
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

जब तुमने मुझे स्वप्न में देखा था, उस समय मुझे दिन और रात में दो बार दौरे तेज़ हो रहे थे। अब चौथे रोज़ दौरा कल पड़ा। ज़्यादा चिन्ता नहीं करनी चाहिये। यह चीज़ जायेगी यदि ईश्वर को मंजूर है। इसलिये कि ऐसी दशा में बहुत काम पूरी तरह से करना कठिन होगा। अब १५ मई के पत्र का उत्तर दे रहा हूँ। पहले मेरा ख्याल या इरादा ‘मालिक’ के प्रति बेहद मजबूत था और अब तो यह ख्याल या इरादा ही महसूस नहीं होता। अभ्यासी का लय अवस्था पर आ जाना, यह ईश्वरीय बरक़त है। जितना ज्यादा अपने को लय कर सकें, उतनी ही ज्यादा मंजिल पर पहुँचा हुआ समझना चाहिये। ख्याल की मजबूती उसी समय तक मालूम होती है, जब तक उसके फैलाव की सूरत पैदा न हो जाये। जितनी फैलाव की शक्ल पैदा होती जाती है, उतना ही अभ्यासी हल्का-फुल्का होता जाता है। ईश्वर इतना हल्का है कि उसमें कोई बोझ नहीं। ख्याल की जो मज़बूती या ज़ोर, शोर इसकी शुरुआत में ज़रूरत है। इसका वज़न आगे चलकर कम हो जाता है। यहाँ तक कि बिल्कुल नहीं रहता। यह बुनियाद है। “खालिस असलियत” पर पहुँचने की। सब कुछ होते हुए दिल्ली अभी दूर है। लाला जी ने एक बार अपनी दशा मुझसे इज़हार की थी। क्या कहना इस हालत का, जो उन्होंने बयान किया। ईश्वर यह चीज़ सब को दे। एक छोटी सी हालत मैं अपनी भी बयान किये देता हूँ, और वह इसलिये कि तुम्हें जब ईश्वर इस हालत के करीब लाने की कोशिश करे, तो परेशानी न हो। मैं इन शब्दों में अपनी हालत बयान करता हूँ – “मुझे जिस्म और जान तथा आध्यात्मिक उन्नति यह कुछ नहीं मालूम होती। आकाश तत्व जो सबसे हल्का कहा गया है, वह अपने से भारी मालूम होता है”।

२४ मई के खत में जो इज्ज़त और अदब के बारे में लिखा है, उसका जवाब देने की ज़रूरत नहीं है। जब तुम अपनी हालत में होती हो, उसमें एकता भासती है और उसमें इज्ज़त और अदब का ख्याल नहीं रहता, क्योंकि वहाँ पर सब एक हैं। वह एकताई अभी पूरी सीमा तक ही पहुँची और किसी के कहने सुनने का असर न होना, यह सहनशीलता है, जो बहुत अच्छी चीज़ है।

शेष शुभ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-156
शाहजहाँपुर
6/6/1951
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो ।

तुम्हारा पत्र मिला। तुमने लिखा है कि ऐसी कृपा बनाये रखें कि जल्दी उन्नति हो। इसका उत्तर यह है कि मेरे पास जो कुछ भी गुरु महाराज की दी हुई वस्तु है, वह तुम्हारे ही घर भर में भरती चली जा रही है। तुमने जो अपना हाल लिखा है कि Control नहीं रहा। इसका मतलब समझ में नहीं आया। इसे फिर लिखो। बाकी अन्दरुनी कैफ़ियत तो समझ में आ गई और उसका असर यह होना चाहिए कि ‘गुमसुम’ की कैफ़ियत रहना चाहिये। अगर शुरु हो गई हो तो अभी और बढ़ेगी। प्राचीन महात्माओं ने तुरीय और तुरीयातीत तक लिखा है, अर्थात् तुरीया के बाद तुरीयातीत ही होती है। हमारे गुरु महाराज ने तीन प्रकर की तुरीय लिखी हैं। तुम्हारी दशा जो मैनें बका की लिखी है, उसको तुरीय ही कहते हैं। इसकी भी लय-अवस्था शुरु हो गई है, परन्तु बहुत खफ़ीफ है। शेष शुभ है।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-158
शाहजहाँपुर
7/10/1951
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो ।

खत तुम्हारा और केसर का आया। केसर जो बात चाहती है, उसके लिये वह कोशिश कर रही है, नतीजा - ईश्वर के हाथ में है। वह सब कुछ कर सकता है और भक्ति भाव भी यही है कि सब कुछ करते हुए, ईश्वर के ऊपर छोड़ देना चाहिए। हुआ ऐसा ही है कि “जो ईश्वर की तरफ़ दो कदम बढ़ा, ईश्वर उसके लिये चार कदम बढ़ा”। मैंने तुम्हारी हालत के बारे में कुछ पहले खत में लिखा था और आने वाली हालत का उसमें बहुत कुछ इशारा था। तुम्हारी हालत इस समय बहुत कुछ बेखबरी की है। रंज की वजह से हालत में इससे ऊपर अभी तक कदम नहीं रख पाया और हालत इसीलिये अभी अच्छी तरह खुली नहीं। अब रंज का असर बिल्कुल जाता रहेगा तो ईश्वर ने चाहा, फिर बढ़ने लगेगी। मुझे ऐसे समय पर आना ज़रूर चाहिये था, क्योंकि मेरा फ़र्ज भी है, मगर इलाज और बीमारी की हालत कुछ ऐसी थी कि मैं मजबूर था। मैं आऊँगा ज़रूर, मगर तारीख अभी मुकर्रर नहीं कर सकता।

माता जी को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-162
शाहजहाँपुर
24/8/1951
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

तुमने जो २३.७.५१ को खत लिखा था, उसका जवाब मैंने ३०.७.५१ को दिया था, मगर डाकखाने की गलती से तुमको मिला नहीं। उसमें स्वामी जी का एक छोटा सा Dictate भी था। यह याद नहीं कि क्या क्या लिखा था। थोड़ा बहुत जो कुछ याद आता है फिर लिखे देता हूँ और कोई नई बात अगर याद आ गई तो लिख दूँगा। तुमने लिखा है कि “मेरी मौजूदा हालत अभ्यास से हल्की मालूम होती है”। यह सही है। अभ्यास कितना ही सूक्ष्म क्यों न बताया जाये फिर भी वह कर्म है। जिस्मानी मेहनत से कहीं भारी है। और खाली मेहनत, मेहनत से कहीं भारी है। अर्थात उसका जो नतीजा होता है, उससे वह चीज़ बहुत भारी है। तुमने जो मुर्दा की कैफ़ियत पहले लिखी थी, शुक्र है, ‘मालिक’ का, कि यह कैफ़ियत मैं अपनी ज़िन्दगी में पहली मर्तबा अपनी आँखों से देख रहा हूँ। कितनी ही कोशिश की जाये, जब तक ईश्वर मदद न करे, अपनी ताकत से प्राप्त नहीं होती। मगर भाई, हममें ईश्वर की मदद तलब ही कौन करता है। खुशामद करने वाले तो ईश्वर के बहुत मिलते हैं, मगर अपने आप को उसके हाथ बेच डालने वाले बहुत कम। हमारे circle में मोहताज़गी इस कदर बढ़ी हुई है कि हर शख्स माँगने के लिये प्याला सामने किये हुए है। अपने आपको इस हद तक कोई भी बनाने के लिये तैयार नहीं होता कि ‘मालिक’ को इतनी दया आ जाये कि माँगने की ज़रूरत ही न पड़े। तुमने देखा होगा कि भीख माँगने वाले लोग दर-दर फिरते हैं और पूरे दिन में कहीं उनका प्याला इतना भर पाता है कि मुश्किल से शाम तक पेट भर खा सकें। और एक वह है कि जो ‘मालिक’ की याद में एक बबूल के साये में बैठा हुआ है, उन्हें खाने को इतना मिलता है कि स्वयं खाते हैं और दूसरों को भी खिलाते हैं, तिस पर भी काफी बचा रहता है। यह तो भिखारी की शान है, और पहले वालों को भिखमंगा कहना चाहिये।

जब मुर्दा वाली हालत पैदा हो जाये, तब उसे आध्यात्मिक विद्या की शुरुआत कहना चाहिये, नहीं नहीं, बल्कि यह हालत होते हुए इसका ख्याल तक बाकी न रहे। यहाँ तक कि सोचने और गौर करने से भी यह हालत एहसास में न आवे, तब असल हालत है और आध्यात्मिक विद्या की शुरुआत। इसी के आगे कुछ Dictate पहले आया था, जिसके मतलब यह थे कि “जहाँ और सब लोग खत्म करते हैं, वहाँ से रामचन्द्र शुरुआत करता है”। और यह ठीक है। इसी हालत से बन्धन से छुटकारा मिलता है। मैंने अक्सर खतों में इसी हालत की इन्तजारी के लिये लिखा है।

अब जो खत तुमने २२.८.५१ को भेजा है, उसका जवाब लिखता हूँ। अब ईश्वर की कृपा से वह कैफ़ियत भी पैदा हो रही है कि मुर्दा वाली कैफ़ियत रहते हुए भी उसका एहसास न हो। मगर अभी पूरी हालत पर नहीं आई है। इसमें अभी कुछ वक्त लगेगा। ईश्वर उसको भी परिपक्व करेगा। तुमने लिखा है कि - "अब तो ‘मालिक’ की कृपा से यह हो गया है कि हर चीज़ में से रोशनी या ज़िन्दगी निकलती हुई मालूम पड़ती है और वह रोशनी भी कैसी, जिसमें अंधियारी या उजियाला कुछ महसूस नहीं होता”। जिस जगह पर कि तुम हो, वहाँ की कैफ़ियत बाहर भी मालूम होती है और मेरा भी अभ्यास की हालत में यही हाल था कि जो अन्दर मालूम होता था, वही बाहर जाहिर होता था।

माता जी को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-164
शाहजहाँपुर
30/8/1951
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

तुम्हारे सब पत्र मिल गये। तुम ईश्वर की कृपा से जिस हालत में हो, इस हालत में अभ्यास का होना बड़ा कठिन है। यह अभ्यास का फल है। ऐसी हालत में जो अभ्यास इससे सम्बन्ध रखता है, वह बिना जाने हुए खुद-ब-खुद होता रहता है। वैसे अगर Faith ठीक है तो हमारे यहाँ हर आदमी (अभ्यासी) बिना उसके जाने हुए भी ईश्वर की तरफ लगा रहता है, इसलिये कि मन का गोता ‘ब्रह्माण्ड-मण्डल की दशा’ में दे दिया जाता है और इस वज़ह से उसमें कुछ रंग वैसा ही आ जाता है और मैं तो ऐसा भी करता हूँ कि मन का रुख बहुत कुछ ऊपर को कर दिया करता हूँ। इससे इसकी ताकत रफ़्ता-रफ़्ता नीचे जाने, अर्थात् दुनिया की तरफ़ कम होने लगती है। जिसने लय-अवस्था प्राप्त कर ली और जिस हद तक प्राप्त कर ली तो Guidance खुद-ब-खुद होती रहती है। मैंने भी जब अभ्यास शुरु किया था और जो बात शुरु की थी और शुरु ही क्या, बल्कि खुद-ब-खुद हो गई थी, उस चीज़ ने मुझे जब तक धुर तक न पहुँचा दिया, कुछ न कुछ अपने उद्देश्य तक पहुँचने को बताती ही रही। या यों कहिये कि ईश्वर की कृपा से मैं उस पर आता ही गया। अब जो चीज़ मैंने प्रारम्भ की थी, यदि मैं वही चीज़ दूसरों को बताऊँ तो नहीं मालूम वह मेरे बारे में क्या ख्याल करने लगें और बताते हुए भी मुझे शर्म आती है और यदि बताने की नौबत आ जाती है, तो उस समय तक अभ्यासी उस काबिल रहता ही नहीं कि इसको पूर्ण तरह से कर सके। तुमने जो अपनी मुर्दा की तरह की कैफ़ियत लिखी है, वाक़ई यही एक कैफ़ियत है, जिस पर आने की हर शख्स को कोशिश करनी चाहिये। असल आध्यात्मिक विद्या यहाँ से आरम्भ होती है और यह अ, आ का पढ़ना यही से प्रारम्भ होता है। नहीं, बल्कि मुर्दा की सी कैफ़ियत किसी तरीके से ख्याल में न आवे, वहाँ से आध्यात्मिक विद्या का अ, आ प्रारम्भ होता है।

Dictate By Sri Vivekanandji Maharaj :-
"This is a very high thought daughter. People end their spirituality at this Stage, and HE (Ram Chandra) begins from here. The idea is Correct. Can you find such man? People will laugh at. This is end of all activities, but really it is the beginning of spirituality".

तुम्हारा यह कहना बिल्कुल सही है कि “अभ्यास से अपने आप को बहुत हल्का पाती हूँ”। अभ्यास को तो ऐसा समझना चाहिये, जैसे एक चीज़ जो किसी दूसरी चीज़ को working Order में लाती है, इससे ज्यादा इसका कोई ताल्लुक नहीं और जब कोई चीज़ Order में आ गई तो उसका Function ठीक होने लगेगा। हांसिल करना तो लय अवस्था है। सालोक्य, सामुज्य, सामीप्य और सारुप्य सब इसी की Stages हैं। मैं तो सब कुछ चाहता हूँ मगर इस वक्त इधर आने की मुझ को खुशखबरी नहीं मिलती। ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ कि मैं यह हालत अपनी ज़िन्दगी में तुम्हारी देख रहा हूँ। इस हालत में आकर बंधन से छुटकारा मिलता है और चीज़ वाकई अपने काबू की नहीं, ईश्वर की देन है। तुमने लिखा है – “शरीर का ज़र्रा-ज़र्रा पिघल कर बहा जा रहा है” यह एहसास ठीक है। जब पानी बरसता है तो मिट्टी और धूल , जो दरख्तों पर होती है, वह सब धुल जाती है। मगर यह पानी ऐसा है कि ज़र्रा-ज़र्रा में मिटता जाता है और अपनी चमक लेने के लिए Unwanted चीज अलहदा हो जाती हैं।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-169
शाहजहाँपुर
30/9/1951
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

खत तुम्हारे सब मिल गये। तुम्हारी उरुज (चढ़ाव) व नुजूल (नीचे गिरना) की हालत है। आदमी जितना ऊँचा जाता है, उतना ही नीचे की ओर देखता है। नुजूल में दीनता और नफ़ी (शून्य) की हालत है। तुम्हारे जो ख्यालात आते हैं, वह तुम्हारे नहीं हैं, बल्कि जो विचार उतर रहे हैं, यह उनकी झंकार है। अभी तुम्हारा दूसरा खत मिला। उसका जवाब फिर विस्तार पूर्वक दूँगा। तुम्हारी हालत इन्तहाई मक़सदा नुक्ते पर पहुँचने की उम्मीद दिला रही है।

अम्मा को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।
तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-170
शाहजहाँपुर
11/1/1951
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

अब मैं पहले से अच्छा हूँ। तुम्हारे १७ सितम्बर के खत का जवाब दे रहा हूँ। तुमने लिखा है कि – “जीवन में मोक्ष का आनन्द प्राप्त हो रहा है”। यह कैफ़ियत तो बहुत ही अच्छी है। इस कैफ़ियत को आखिरी हद तक पहुँचा देने से, इस तरह कि उसका भास न हो, ‘जीवन-मोक्ष दशा’ कहलाती है। यह उसकी शुरुआत है। अब यह जहाँ तक बढ़ जावे। मगर मैं अपने ख्याल की क्या कहूँ कि मुझे किसी जगह पर तृप्ति नहीं होती। मान लिया कि अभ्यासी ‘जीवन-मोक्ष की पूर्ण दशा’ पर आ जावे, तो भी बहुत कुछ आगे मौजूद है। मुझे कुछ इशारात किसी समय हमारे पूज्य लालाजी ने दिये थे, इसको देख कर मेरे होश उड़ते थे। मगर अब न मालूम मुझे क्या हो गया है कि मुझे अपने ठिकाने का भी पता न रहा। सिर्फ लाला जी साहब से कभी-कभी इतनी रोशनी मिल जाती है कि मैं Swim कर रहा हूँ और यह खबर उस समय होती है, जब कि तुम्हारी बड़ी उम्दा-उम्दा हालतें जब मैं खतों में देखता हूँ, तो मुझे बड़ी खुशी होती है और अगर सच पूछो तो यह सब तुम्हारी ही मेहनत का नतीजा है। मैंने तुम पर मेहनत की ही नहीं। और लोगों पर जो मेहनत करता हूँ, तो उतना अच्छा नतीजा बरामद नहीं होता, तो मेरी काबिलयत तो यह है। अगर तुम कहो कि यह सब तुम्हारी काबिलयत का नतीजा है, तो उनमें यह सब बातें पैदा क्यों नहीं होती। अपनी मेहनत ही काम देती है। यह खुशी मुझे ज़रूर है कि ‘जीवन-मोक्ष दशा’ की हालत के तलछट ही ABCD ज़रूर है। तुमने लिखा है कि हल्केपन का भी एहसास नहीं रहा है। इसका जवाब ऊपर दे चुका हूँ। और यह लिखा है कि अपने होने का भी एहसास नहीं है और न अपने न होने का ही एहसास है। यह लय-अवस्था की बहुत उच्च हालत है। सब की उन्नति चाहना, यह ख्याल बहुत अच्छा है। यह एक किस्म की सेवा है। जो अभ्यासी जितना आगे बढ़ता है, यह चीज़ बढ़ती जाती है और मुझमें भी यही बात है। अपने फैलाव का महसूस होने के मानी यह होते हैं, कि विराट देश में हम विचरने लगे हैं। फैलाव की शुरुआत यहीं से होती है और जितना आगे पहुँचता जाता है, उतना ही यह फैलाव की कैफ़ियत भी बदलती है। और, खैर, मैं लिखे देता हूँ, यह समझ कर कि तुम इस दशा का ख्याल उस समय तक नहीं बाँधोगी, जब तक यह दशा खुद-व-खुद न आ जावे। जब तक अभ्यासी ईश्वरीय-दशा में रहता है, तब तक इस फैलाव की सूरत बदलती रहती है। उसके पार कर लेने के बाद फिर फैलाव महसूस नहीं होता उसकी शक्ल कुछ और ही हो जाती है, यहाँ तक बन्धन है। जिस ईश्वर को हम पुकार रहे हैं, वहाँ तक बन्धन मौजूद है। मोक्ष इससे पहले हो जाती है। यह इतनी बड़ी चीज़ नहीं है जितनी यह मालूम होती है। जिस ईश्वर की हम तमाम उम्र याद करते हैं, वही हमारे फंसाव का वायस हो जाता है। जिस समाज में यह बात कही जाये, मुमकिन वह मुझको नास्तिक समझने लगे, मगर मैं उससे एक क्षण भी अलहदा नहीं रहता, इसलिये नास्तिक कहना गलती होगी। अब इस फैलाव में भी अभी बहुत कमी है। उसमें एक चीज़ जिसको पहले से मैं नहीं लिखूँगा और पैदा होनी चाहिये।

अब मैं २६ अक्टूबर के खत का जवाब दे रहा हूँ। तुममें एकाग्रता मौजूद है और बिना जाने बूझे भी तुम्हारे ख्याल की लड़ी ‘मालिक’ की तरफ जुड़ी रहती है, इस लिये जब कोई ज़ोर से बोलता है तो उसकी आवाज़ से उसके तनाव में झटका लगता है, इसलिये तकलीफ़ हो जाती है। तुमने जो कुछ अपना अनुभव मारकाट और अकाल का देखा है, यह सब होने वाली बातें हैं। बिना इसके दुनिया का सुधार नहीं होगा। अभी तीन-चार दिन हुए मैंने तुमको अगले मुकाम पर खड़ा कर दिया है। बस, यह छोटी सी मदद तुम्हारी करता रहता हूँ। जब मैं देख लेता हूँ कि इस मुकाम में फैलाव हो चुका है और सूरत आगे को जाना चाहती है, मगर जा नहीं पाती, तो मैं कुछ धक्का दे देता हूँ।

माता जी को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-173
शाहजहाँपुर
18/11/1951
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

पत्र तुम्हारा मिला। तुमने जब अपनी हालत लिखी, तो मुझे अचम्भा हुआ कि तुम अपनी हालत लिख रही हो, या मेरी। सोचा तो मालूम हुआ कि मेरी गड़ी हुई हालत जो किसी वक्त में थी, अब तुममें उखड़ रही है। ‘मालिक’ का धन्यवाद है कि इसकी पुनरावृत्ति कहीं हो तो रही है। तुम्हारे रोम-रोम का हर मुकाम अब खुल रहा है। इस की मास्टरी हो जाना अवतारों में पाई जाती है। मगर सिर्फ यही बात अवतारों के लिये काफ़ी नहीं है। यह उसका एक छोटा सा अंग है। हर रोम-रोम पर प्रभुत्व कृष्ण जी महाराज को था, मगर अफ़सोस यह है कि हमारे रामचन्द्र जी महाराज भी अवतार थे मगर यह चीज़ उनमें न थी। अगर मैं कहीं इन दोनों अवतारों की तुलना करूँ, तो मैं समझता हूँ कि एक हजार कोस का फ़र्क पड़ेगा। रामचन्द्र जी महाराज में Thought के द्वारा Destruction करने की ताकत न थी और कृष्ण जी महाराज में यह चीज़ कूट-कूट कर भरी थी। एक बात मैं अजीब लिखता हूँ कि कृष्ण जी महाराज को अपने जिस्म का भान न था और रामचन्द्र जी महाराज की यह हालत न थी। हम लोग कृष्ण जी महाराज की पैरवी करते हैं, यही वजह है कि उसी निस्बत से हमारी लय-अवस्था आती है। मैंने पिछले खत में जीवन-मोक्ष दशा के बारे में कुछ लिखा था कि उसका तलछट तुममें कुछ आ चुका है। अब उससे और Advanced हो गया। ईश्वर ने चाहा तो उस हालत का मज़ा चखोगी। एक गाँठ मालूम होती है, उसके टूटने से यह हालत, ईश्वर ने चाहा, पैदा हो जावेगी और न जाने क्या बात है कि तुम्हारे लिये इस गाँठ को तोड़ने की अपनी ताकत से तबियत नहीं चाहती और कोई अगर होता तो मुमकिन था कि मैं यह कर बैठता। चाहता यह हूँ कि तुम अपने अभ्यास और ख्याल की ताकत से चलो और उससे यह टूट जाये। मदद मैं ज़रूर दूँगा। यह मेरा धर्म है।

माता जी को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-181
शाहजहाँपुर
15/1/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

तुम्हारे दोनों खत मिल गये। यह सब हालतें, जो तुमने लिखी है, यह सब लय-अवस्था की बरकत है। जितनी अच्छी जिसकी लय-अवस्था है, उतनी ही ज़्यादा वह कामयाब है। यह चीज़ ज़्यादा मोहब्बत और बार-बार याद से पैदा हो जाती है। इसके लिये तरकीबें भी हैं, मगर उसको बताते हुए मुझे जरा अच्छा मालूम नहीं होता और बहुत अर्से में जिन दो-एक अभ्यासियों को बताई भी उसमें से सिर्फ एक शख्स थोड़ा बहुत कर रहा है। यह चीज़ ऐसी है कि बिना बताये हुए खुद-ब-खुद उसे आ जाना चाहिये। लालाजी ने यह चीज़ किसी को गालिबन नहीं बताई मगर उसके करने वाले निकले और हमारे यहाँ यह है कि इशारे से अगर बतला भी दिया जावे तो कोई उसको grasp नहीं करता। पिछले उत्सव में मैंने एक मज़मून लिखा था, जिसका सब मतलब यही था। मगर उसके सुनने के बाद अब साल खत्म हो रहा है, किसी को फिर याद भी न आई। सच तो यह है कि जबरदस्ती हम ठूंस-ठूंस कर रहे हैं, असली शौक इक्का-दुक्का को होगा। अब इससे जो कुछ फायदा जिसको हो। ‘लालाजी’ साहब ने भी मुझसे महासमाधि लेने से कुछ दिन पहले यही कहा था कि अब तक लोगों में लय-अवस्था भी पैदा न हुई और ज़िन्दगी का रास्ता बिना लय-अवस्था पैदा किये हुए, जिसको फ़नाइयत या मर मिटना भी कहते हैं, नहीं मिलता। अब तुम्हारे यहाँ पर यह चीज क्यों भर रही है? इसका कारण यही है, हमारे साथियों में ईश्वर की कृपा से सब से अच्छी लय-अवस्था तुममें मौजूद है। उसके बाद नम्बर केसर का है, बाकी एक शख्स में और रुपये में करीब एक आना या दो आने भर मौजूद है। मुमकिन है, हालाँकि इसमें शक है, कि छदाम या दमड़ी भर किसी एक और में हो। बाकी भाई, इस वक्त तक सब खाली हैं। अब ईश्वर आगे जिसे दे दे, वह ‘मालिक’ और मुख्तियार है। ब्रह्म विद्या की तालीम बहुत कम इसी वजह से रही है, कि इसके सीखने वाले ज़माने के लिहाज़ से बहुत कम रहे और अब कुछ आँखों पर पर्दा ऐसा पड़ गया है कि लोग इस किस्म की विद्या पर जो अपने यहाँ है, एतबार ही नहीं करते। तुम्हारे घर वालों को मुझ से मोहब्बत बहुत है, इससे भी फायदा अच्छा हो रहा है और जहाँ यह चीज़ है, वहाँ भी फ़ायदा ही है।

तुम्हारी हालत के बारे में मैं क्या लिखूँ? बस ईश्वर का शुक्र है। ऐसी हालतों के लिये हमारे ‘लालाजी’ कहा करते थे कि यह चीज़ अपनी ताकत से पैदा नहीं होती, बल्कि ईश्वर जिसे दे दे। यह तुम्हारी जो कुछ हालत है, इसको मैं ईश्वरी हालत कहता हूँ, मगर जिस हालत पर पहुँचना है, वह अभी बहुत दूर है। ईश्वर वह भी देगा। अव्वल तो इस हालत पर भी जब तक ईश्वर की खास मेहरबानी न हो, पहुँचना बहुत मुश्किल है और कोई अगर पहुँच भी गया, तो बस इसको वह काफ़ी समझ लेता है। वह असल कैफ़ियत, जो वाकई कैफ़ियत है, उसकी यहाँ पर शुरुआत भी नहीं हो पाती। दूसरी चीज़ एक यह भी हालत होती है कि अगर अभ्यासी जहाँ तक पहुँचने की हिम्मत भी करे और पहुँच जावे तो आगे अपनी हिम्मत से जाना मुश्किल क्या, बल्कि नामुमकिन सा है, इसलिये कि ऊपर की ताकत जो दुनिया की तरफ Focus किये हुए है, उसमें चढ़ाई मुश्किल पड़ जाती है। किसी गुरु को उस ताकत पर बहुत कुछ command हो गया हो, तब इसके आगे वह अभ्यासी को फेंक सकता है। हमारे यहाँ यह सब बरकत इस वजह से है कि हमारे ‘लालाजी’ ने इन्तहाई दखल और पहुँच उस या इस हद तक कर लिया था, अपनी ज़िन्दगी में ही जहाँ तक कि एक इन्सान का पहुँचना मुमकिन है और अब तो वह Unlimited हो रहे हैं। अब उनकी ताकत का ठिकाना ही क्या? तुम्हारे वैराग्य की जैसा कि पिछले खत से मालूम हुआ पूर्ण अवस्था है, मगर उसमें Firmness होना बाकी है, यह भी हो जावेगा। यह हालत वैराग्य से बहुत ऊंची है, जो तुमने लिखी है। मेरा जी अब उस हालत से ऊँचा पहुँचाने को चाहता है, मगर मैं उसको अभी तय नहीं कर सका। मुमकिन है, अगर तबियत ने तय कर लिया तो आज ही निकाल दूँगा। खैर, तुमको पता चल पायेगा।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-190
शाहजहाँपुर
3/5/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

खत तुम्हारा मिला। पढ़ कर बाग़-बाग़ हो गया। तुमने जो लिखा है – “उदासी की हालत गाढ़ी होती जाती है”। इसका मतलब मेरी समझ में नहीं आया। उदासीपन से मतलब Indifferent from the Worldly things से है, या महज़ सुस्ती से। यह हालत दृढ़ वैराग्य से पहुँचती है। तबियत में उचाटपन रहना अलामत (निशानी) इस बात की है कि घर की याद आती है। घर का मेरा मतलब तुम्हारी कोठी से नहीं है, बल्कि वतन से है, जहाँ से हम सब आये हैं। तुमने लिखा है कि यदि दिन भर छाती कूटा-करूँ, तब भी आराम नहीं मिलता। वाह! वाह! क्या हालत है। हजारों सल्तनतें इस प्रेम पर कुर्बान हैं। बस, इस हालत में डूब कर अगर तुम कहीं दूसरों को तवज्ज़ो दोगी तो मज़ा आ जायेगा। मैं इस हालत में केवल तीन दिन रहा। These are the Things for Living dead. मैं यह चाहता हूँ कि तुम अपनी हालत हर दूसरे या तीसरे दिन बराबर लिखती रहा करो। अगर हालत ज़ब्त से बाहर मालूम पड़े तो अपने पूजा के कमरे में कोच के करीब बैठ जाया करो। ख्याल मैं भी रखूँगा। यद्यपि हालत इतनी ज़ब्त से बाहर नहीं हो सकेगी, क्योंकि पूज्य समर्थ श्री ‘लालाजी’ साहब मुझसे तुम्हारी निगरानी का वायदा कर चुके हैं।

तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ, अम्मा को प्रणाम।
तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-197
शाहजहाँपुर
22/3/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

तुम्हारे सब खत मिल गये। लिखने वाला न मिलने की वजह से हिन्दी में न लिख सका। मामूली बातें तो मैं खुद लिख सकता हूँ, मगर जब ज़्यादा सोचकर लिखना पड़ता है, तो लिखना और सोचना दोनों काम साथ-साथ नहीं हो पाते। हालतें आध्यात्मिक बहुत सी ऐसी हैं, जो आती ही रहती हैं। जो attentive रहता है, और ‘मालिक’ के साथ-साथ जाता है, उसको वहाँ की रंगतें और घाटियाँ अच्छी तरह मालूम हो जाती हैं। आँखे फोड़कर चलने वाले तो बहुत मिलेंगे, हमारे यहाँ इनकी अच्छी तादाद है। पूजा की और बेगार टाली, फिर कुछ मतलब नहीं - यह मेरी नादानी है कि मैंने ऐसे लोगों को अक्सर बढ़ाया है और उससे कोई फायदा नहीं हुआ। बहुतेरों को अब तक समझ में नहीं आया कि क्या चीज़ वह पा गये, इसलिये अब इसमें मैंने बहुत कमी कर दी है। लोगों को शौक और दिलचस्पी पैदा नहीं होती, वरना उनको मज़ा आ गया होता।

तुमने आज के खत में एक बहुत हंसी की बात लिखी है, कि आनन्द की पूरी कैफ़ियत पोती होने की खुशी में ही दे दो। पोती मेरे ज़रूर हुई है, और ईश्वर का शुक्र है। उसकी बड़ी उम्र हो और खुश व खुर्रम रहे, मगर हमें तो इसका एहसास ही नहीं होता कि हमारे पोती हुई है, तो फिर खुशी का एहसास कहाँ से आवे? मगर हमें यह ताज्जुब ज़रूर है कि क्या मैं चीज़ देने को तैयार नहीं, जो तुमने यह लिखा है। मौजूदा हालत तुम्हारी जो कुछ भी है, वह उस आनन्द की कैफ़ियत से बहुत बेहतर है, कि जिसको तुम चाहती हो। पहले steam वाला उभार था और अब बिजली का उभार समझ लो। और यह उससे कई गुणा अच्छा है। तुम्हारे कहने को मुझे टालना नहीं आता, इसलिये बेअख्तियार तबियत चाहती है कि फिर उस हालत में लाकर खड़ा कर दूँ। मगर इसके मानी यह होंगे कि तुमको ऊंचे से नीचे गिरायें। खैर तबियत नहीं मानती, या तो मैं प्रार्थना से इसको control करूँगा या सिर्फ एक दिन के लिये ऐसी हालत पैदा करने के लिये प्रार्थना करूँगा। अभ्यासी को चाहिये कि हर कदम ऊपर को ही जाये। इस हालत में निगरानी इसलिये की जाती है कि कोई अवधूत न हो जावे और आगे की तरक्की रुक जाये और इसीलिये लालाजी ने तुम्हारी निगरानी की।

यह तो बिटिया असल आनन्द का तलछट था और मायावी बू इसमें शामिल थी। मेरी जब यह हालत गुजरी तो मुझसे बर्दास्त नहीं होती थी और एक साहब ने अपनी समझ से अच्छा ही किया, मगर मेरी मौजूदा समझ के मुताबिक उन्होंने गलती की और वह इसको properly handle न कर सके। तुम्हारी हालत तो लालाजी की कृपा से मैंने बहुत systematically ठीक की है। यह मुमकिन है कुछ जल्दी कर गया हूँ। अब चूंकि यह हालत मुझ पर गुज़र चुकी है और तुम भी इसका काफ़ी मज़ा ले चुकी हो, मगर मुझसे अगर कोई कहे कि तुम अपनी मौजूदा हालत पर रहना चाहते हो, जिसमें कोई आनन्द नहीं नज़र पड़ता और न गैर आनन्द नज़र पड़ता है। तो मैं कभी तुम्हारी आनन्दी कैफ़ियत कायम करने के लिये तैयार न हूँगा। मैं तो अपनी मौजूदा हालत में बहुत खुश हूँ जिसका धन्यवाद गुरु महाराज को कहाँ तक दिया जावे। मैं तुमको दूसरी Stage पर पहुँचाने वाला था, जिसको [B] समझ लो। अब मेरी समझ में नहीं आता, मैं क्या करूँ। तुम्हारा कहना टालने की भी तबियत नहीं चाहती। अब तुम जैसा लिखो, वैसा करूँ। मैं सख्त मुश्किल में पड़ गया। नीचे उतारना तरक्की करने वाले को धर्म भी इज़ाज़त नहीं देता और उतारने में झटका भी लग सकता है और बेचैनी भी बढ़ सकती है। मैं आज लालाजी साहब से दर्याफ्त करूँगा कि बिना उतारे हुए कोई शक्ल ऐसी पैदा हो सकती है, गो मेरी समझ से नहीं हो सकती। बिजली की ताकत तो तेज़ की जा सकती है, मगर Steam वाली कैफ़ियत बिना उतारे पैदा नहीं हो सकती। अगर तुम अपनी पिछली दशा को थोड़ी देर को झुका दो तो मौजूदा कैफ़ियत पर अगर गौर करो तो कहीं अच्छी पाओगी। जो आगे stage आती है, उसमें सफ़ाई और सादगी कहीं ज़्यादा होती है।

अभी तो बेशुमार पर्दे तोड़ने को बाकी हैं। उनको देखते हुए अभी Spirituality की शुरुआत ही है। हर मुकाम पर इतनी देर लगाने में हजारों वर्ष चाहिए और मैं अपनी ज़िन्दगी में तुमको ‘धुर’ तक पहुँचाना चाहता हूँ। तुमने जो रोने वाली दशा अपनी लिखी है, उसमें कबीर साहब ने बड़ा अच्छा दोहा लिखा है:-

“हंसी-खेल नहिं पाइयाँ, जिन पाया तिन रोय। हाँसे-खेले पिव मिले, तो कोन दुहागिन होय।।”


तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिंतक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-205
शाहजहाँपुर
4/6/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो ।

तुम्हारे खत मिल गये - पढ़कर खुशी हुई। तुम्हें sitting देने में बहुत दिन गाफ़िल रहा, मगर अब दिन में कई मर्तबा देखना पड़ता है। जितना ज़्यादा तुमसे गाफ़िल रहा, उतना ही ज्यादा ख्याल रखना पड़ता है, इसलिये और बराबर हो गया। अब तो चाहे कोई दिन छूट जावे, नहीं तो मुझे हर रोज Sitting देनी पड़ती है। कुछ मेरी तबियत यह भी चाहती है कि दो-तीन points के बाद फिर ज्यादा तुम्हें न ठहरायें। खैर, यह अभी तय नहीं किया है, यह हालत देख-देख कर तय किया जावेगा। एक बात मैं तुम्हें और बता दूँ ताकि तुम्हें वाकफियत होती चले और यह मालूम होता चले कि जब तुम किसी को Stages तय कराओ तो तुम्हें क्या करना चाहिए। मैं नातजुरबेकारी की वजह से कुछ गलती भी कर जाता हूँ। बात यह है कि मुझमें जो कुछ भी ताकत गुरु महाराज ने दी है, उसका अन्दाज़ा नहीं हो पाता। मैंने जब [B] point पर तुम्हें खींचा और फिर वहाँ तवज्जो दी तो मैं ज़्यादा दे गया। चुनान्चे point [B] की हालत में ज्यादा concentrated force पैदा हो गया। अब इसको फैलाया जावे, तब यह सैर हो। आज यह सुबह उठते वक्त ख्याल आया। सही तो हो ही जावेगा, इसलिये कि लालाजी साहब सब कुछ कर सकते हैं।

तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिंतक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-207
शाहजहाँपुर
4/11/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत आया-उसने काफ़ी ढाढ़स दिया। मुझे फिकर बस इतनी रहती है कि लोग ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठावें। कभी यह भी ख्याल होता है कि जो कुछ थोड़ा बहुत मुझे मालूम है, यह सब सीने में रखकर कहीं ले न जाऊँ। कुछ कायरों का यह भी ख्याल है कि मैं जब चाहूँगा एक मिनट में सब कुछ कर दूंगा। ऐसा अगर गुरू महाराज की प्रार्थना की मदद से कर भी दिया जावे, तो उसका कुछ फायदा सिवाय इसके कि बहुत ऊंची पहुंच वाला संत हो जावे और कुछ दिखाई नहीं पड़ता। अगर पूरी ताकत लगा दी जावे तो ज़रूर उसका फायदा हो सकता है, मगर ऐसी दशा में मौत यकीनी है। जब तक रास्ता और घाटी-घाटी अपनी मेहनत करके नहीं देखता, तब तक हर हालत पर Command (प्रभुत्व) नहीं होता और किसी ख़ास हालत को दूसरे पर तारी करने के लिये हिम्मत पैदा नहीं होती। मुझमें कैफियत तारी करने की शक्ति गुरू महराज ने दी है। यह उनका काम था, मैंने उनकी मेहरबानी से अपना लिया, जिसका नतीजा उनकी कृपा से यह है कि मुझे हर कैफियत से वाकफियत है और इसीलिये दूसरों पर फौरन तारी हो सकती है। सच बात यह है कि इस विद्या को ग्रहण करने के लिये सच्चे जिज्ञासु नहीं मिलते। लोगों को अभी तक मज़ा आ गया होता अगर मेहनत और मोहब्बत से काम लेते। मिशन तो तरक्की करेगा ही, मगर अच्छा यह होता कि इस तरक्की को हम खुद देख लेते और लोगों में वह हालतें पैदा कर देते जो मुमकिन है आइन्दा इतनी जल्दी न हो सके।

तुम्हारे खत पढ़ने से तुम्हारी सब हालत मालूम हो गई। यह अंधेरे की हालत मुमकिन है पहले भी पैदा हुई हो, मगर मेरी जल्दी की वजह से तुम्हें भास न हुई हो। यह असल हालत की एक भद्दी तस्वीर है और पहले से यह चीज़ ज़्यादा सूक्ष्म है, इसमें अभी और तरक्की होगी। अभी असलियत बहुत दूर है। मुझ पर यह हालत गुज़र चुकी है, और मुझे याद है और खत लिखाते वक्त इस हालत का फिर भास होने लगा। जो एक चक्र पर हालत है, वही सूक्ष्म होते हुए हर चक्र पर मिलती है। यहाँ शायद षटचक्र कहे गये हैं। लय-अवस्था और लय की लय-अवस्था तुमको बड़े दरबार से पहले ही बख्शी जा चुकी है और बका भी। अब बका की हालत की लय-अवस्था हो रही है। ऐसी जाने कितनी बका और उनकी लय-अवस्था अभी और होंगी, उसका छोर नहीं और सच्चे जिज्ञासु को चैन तो उसी समय मिलता है, जब कोई हालत नहीं रहती। अगर मैं यह कहूँ कि सोलह Circles & Seven Rings (सर्किल और सात रिंग्स) पार करने के बाद चैन मिलता है और वह चैन ऐसा है कि किसी हालत में बेचैन होने ही नहीं देता तो पुराने आध्यात्मिकता के इतिहास मुबारक देंगें, क्योंकि यह इज़ाद हमारे लाला जी की है और आप ही ने ज़िन्दगी रखते हुए यह चीज़ मुमकिन कर दी। मैं तो यही चाहता हूँ कि सब लोग इनको Cross (पार) करें, मगर मेरे चाहने से क्या होता है। यह तो ईश्वर की देन है, वह जिसे चाहे दे दे।

तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-208
शाहजहाँपुर
13/4/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र-मिला, पढ़कर खुशी हुई। तुमने अपने कुल खत का जवाब खुद दे लिया है, वह यह है, “मेरी निगाह तो उस आफ़ताब में गड़कर विलीन हो गई है!” इसको तुमने सुषुप्ति कहा है। यह सुषुप्ति नहीं, बल्कि Forgetful State (भूल की दशा) है। हर मुकाम पर एक लय अवस्था होती और You gain Mastery over that region by absorbing in it. The Same is the Condition now, Sushupti is everywhere in the human approach but it gets thinner and thinner as we advance. At higher pitch it is named as Turia (तुमने उस मुकाम पर लय होकर उस स्थान पर प्रभुत्व प्राप्त कर लिया है। यही अवस्था अब है। सुषुप्ति की अवस्था मानव की पहुंच के भीतर है। जैसे-जैसे हम उन्नति करते जाते हैं वैसे ही वैसे वह सूक्ष्म से सूक्ष्म होती जाती है। इसकी उच्चतर अवस्था को ‘तुरिया’ कहते हैं।)

मैं जो High (ऊंची) चीज़ सोचता हूँ, उसको खुद लिख नहीं पाता हूँ। अम्मा को प्रणाम, छोटे भाई-बहनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-212
शाहजहाँपुर
5/4/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत 23 व 30 अप्रैल दोनों का मिल गया। तुमने अपने अप्रैल के खत में जो जवाब दिया है, वह बिल्कुल सही है। अगर मैं उस सवाल का जवाब लिखूं, जो तुमसे पूछा है, तो उसी चीज को बस दूसरे तरीके में लिख देना होगा। मैंने मास्टर साहब को एक खत लिखा था कि मैंने तुम्हें 'C point' (सी प्वाइंट) पर खींच दिया है। यह दोनों तारीखों के खत उसी जगह की हालत बता रहें हैं। अब जितना आगे बढ़ती जाओगी उतना एहसास तो रहेगा, मगर उसकी अभिव्यक्ति (expression) के लिए शब्द मिलना मुश्किल होंगे। मैं जब यह सोचता हूँ कि तुमको, बशर्ते कि तुम्हारी यह हालत रही और यही शौक और ईश्वर से प्रेम रहा, जिसकी उम्मीद भी है, तो तुमको धुर तक पहुंचाना है, तो मेरे होश उड़ते हैं। वैसे तो लाला जी के लिए धुर तक पहुंचा देना एक क्षण का काम है, मगर उसमें यह बात होती है कि हर बात पर प्रभुत्व देने (Command) की हिम्मत पैदा नहीं होती। हालांकि अब तक जिसको भी जल्दी से ऊंचा पहुंचाया गया उसमें से ज़्यादातर ऐसे लोग हैं, जिनको कि मैंने सैर भी करा दी, मगर वह ज़्यादा कारगर यों साबित न हुए कि हर एहसास पर उन्होंने लय-अवस्था कायम नहीं कर पाई। वजह उसकी यह थी कि उन्होंने अपनी आदत Constant Remembrance (सतत् स्मरण) की न डाली थी। Constant Remembrance (सतत् स्मरण) तो बड़ी सहल चीज़ है। मेरी समझ से उसको कायम करने में दस-बारह रोज़ से ज्यादा नहीं लगते। मगर यहाँ कोई करना नहीं चाहता। उन्होंने समझ लिया कि जिसको गरज़ होगी वह अपने आप देगा, हम मेहनत क्यों करें। किसी ने बातों से खुशामद करके हमें पोटना (बहकाकर) चाहा और किसी ने अपने जिस्म की Activity (वाह्य क्रिया-कलाप) ऐसी बना ली कि गोया फर्माबरदार (आज्ञाकारी) हैं। और मैं इसको खूब समझता हूँ और मेरी चाहे गरज़ समझ लो कि जब मैं यह समझता हूँ कि यह आगे नहीं बढ़ते तो मैं जल्दी से उसको खींचता चला जाता था। जल्दी मैं अब भी करूंगा, मगर उस वक्त जब कि अभ्यासी खुद जल्दी करे। मगर यह ग़लती कि कोई खुद आगे बढ़ने की कोशिश नहीं करता और मैं उसको खीचता चला जाऊं, सम्भव है कि आइन्दा न हो। चौबे जी के साथ में जो मैंने जल्दी की वह इसलिये कि उनपर मुझको बहुत तरस आता था। इसलिये कि उन्होंने असलियत के हासिल करने के लिये बड़ी खाक छानी है। मगर यह जरूर है, साथ ही साथ कि असलियत के जानने की कोशिश नहीं की वरना मेरे मिलने में पहले उनको कोई रास्ता दिखाने वाला मिल गया होता। मैंने प्रकाश की शादी में एक दरख़्त के नीचे बैठालकर उनको Sitting (सिटिंग) दी थी, उसमें उनकी रूह को यह तवज्जो दी थी कि Central Region (मुख्य केन्द्र) तक पहुंचना है। दूसरे मानों में उनके धुर तक पहुंचने का रास्ता बना दिया है। साथ ही मैंने उनकी सुरति को Constant Remembrance (सतत् स्मरण) में लगा दिया है।

मैंने जो यह कहा है कि “मैं” तुम्हें धुर तक पहुंचाना चाहता हूँ, मगर मेरे होश उड़ते हैं। इसका मतलब यह है कि अभी तुमको बहुत चलना है और मैं यह सोचता रहता हूँ कि कितना-कितना समय लगाया जावे ताकि तुम्हें जानकारी भी होती चले और पहुंच भी जाओ। अक्सर यह सोचने लगता हूँ और मैं तो हर शख़्स के लिये यह चाहता हूँ कि वह धुर तक पहुंचे और हर कोशिश करने के लिये तैयार हो, मगर कोई मुझसे काम ही नहीं लेना चाहता। मैं बीमार कितना ही रहूँ, तुम्हें फिक्र नहीं करनी चाहिये, इसलिये कि अभी मेरा वक्त नहीं है।

एक बात लिखने से भूल गया कि मैंने रात सिटिंग (Sitting) ‘C’ स्थान के सैर की दी हैं। इससे पहले मैं एक काम में लगा हुआ था और दिमाग भी कम काम देता था, इसलिये मैंने नहीं दी। बड़े-बड़े स्थान लिये लेता हूँ और अगर हर छोटा मुकाम लिया जावे, जो बड़े स्थान के अन्दर है, तब तो शायद दस हजार वर्ष की ज़िन्दगी भी काफी नहीं है, मगर साथ ही घुमा सब में देता हूँ। सैर का हाल लिखना, इसलिये कि अब तेज़ी से कराना चाहता हूँ जिसमें जल्दी हो जावे। मुमकिन है कि इस मुकाम की सैर के बाद सात-सात, आठ-आठ रोज़ के बाद दूसरे मुकाम की हालत आती रहे। अब इस जल्दी में यह काम तुम्हारा है कि इसमें लय-अवस्था प्राप्त करती रहो। मैंने पंडित रामेश्वर प्रसाद के मुकामात जब तय कराये तो ‘K’ तक तो मैंने गिने थे, उसके आगे मैंने गिनना छोड़ दिया।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-215
शाहजहाँपुर
5/7/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत 4.5.52 का बज़रिये डाक पहुंचा और 7.5.52 का खत माता जी के द्वारा मिला। तुमने ताऊजी की दशा जो लिखी है, उसमें कुछ तो सही है। उनके संस्कार बनना करीब-करीब बन्द हो चुके हैं, और साम्यावस्था जो लिखी है, उसकी बहुत सी किस्में हैं। बहुत नीचे किस्म की साम्य अवस्था उनमें अन्दर मौजूद मालूम होती है, क्योंकि मैंने इस किस्म की उनको तवज्जो भी दी है।

तुमने अपनी हालत Inactive (स्वतःचालित) होने की जो लिखी है, हमारे यहाँ Inactivity (स्वतःचालित) बिल्कुल शुरू से चलती है, पहले ही दिन से। यानी जिस हालत पर कि पहुंचना है, उसका बीज शुरू में ही बो दिया जाता है। जितना Advancement (उन्नति) होता जाता है, उतनी ही वह चीज़ ज़्यादा मालूम होती है। किसी चीज़ के याद आने में जो हालत उतरी हुई मालूम होती है, उसकी वजह यह है कि एकाग्रता कुछ Disturb (भंग) हो जाती है। तुमने यह जो लिखा है कि “मेरी तामसी हालत मालूम पड़ती है, इसलिये कि कभी-कभी नींद में रहने की तबियत चाहती है और कभी तबियत चाहती है कि हाथ-पैर कुछ न हिलाऊं।“ यह तामसी हालत नहीं है, बल्कि इन्द्रियों की बहुत कुछ लय-अवस्था हो जाने की दलील है और तुमने यह जो लिखा है कि “जो किसी के दिल में होता है, वैसी ही मैं बातें करने लगती हूँ।“ यह शुद्ध हृदय होने की पहिचान है। मेरी हालत यह किसी वक्त बहुत तेज़ थी और अब न जाने कहाँ चली गई। ताज्जुब यह है कि लाला जी में यह बात आखिर वक्त तक रही और मुझमें अब यह बात महसूस नहीं होती। तुमने सात मई को खत में जो Inactivity (स्वतःचालित) को भी गुम करना लिखा है, यह तो बहुत अच्छी चीज़ है। बाकी उस कुल खत का जवाब यह है कि मन जब तक उस जगह पर नहीं पहुंच जाता जहाँ से कि वह आया है तब तक उसकी Seriousness (गहन अवस्था में विलीन होने का) के भाव कुछ न कुछ मालूम पड़ते हैं।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-218
शाहजहाँपुर
16/5/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे खत मिल गये। जवाब की कोई ज़रूरत तो है नहीं, मगर खैर कुछ लिखे देता हूँ।

कोई दुनियाबी मामलात में परेशान, कोई कुछ और ज़रूरी बातों में अपनी तबियत लगाता है, और मुझे यह फ़िकर। जब तुम्हारी हालत, मैं Read (पढ़ता) करता हूँ, तो हो जाती है कि अगले मुकामात में कितने दिनों रोका जावे, क्योंकि जो मुकामात आगे आ रहें हैं, उनमें कुछ ज़्यादा मुफीद मालूम होता है और मेरा ख्याल यह है कि जैसे मैंने अपनी जवानी और लड़कपन में गुरू-कृपा से काम निपटा लिया; ऐसा ही मैं चाहता हूँ कि जो लोग आगे बढ़ने की हिम्मत रखते हैं, उनका काम भी जल्दी निबटा दूं। अब मास्टर साहब के काम में बहुत जल्दी की गई, उससे फायदा यह हुआ कि मुझे ज़्यादा Sitting (सिटिंग) देनी नहीं पड़ती हैं। कभी-कभी कुछ मदद दे देता हूँ या उसके निखारने की कोशिश करता हूँ।

मैं तुम्हारे ‘C’ point (सी प्वाइंट) पर अक्सर तवज्जो देता हूँ। सैर की हालत अभी शुरू नहीं हुई है, मगर अब शुरू होना चाहती है। मैंने लिखा था कि सात-सात, आठ-आठ रोज़ हालत पर रखूंगा। ‘C’ (सी) के बाद उससे अगली हालत में खींच लूंगा। मगर मैं गौर करता हूँ तो अगला मुकाम है उसमें और भी Broader Vision (व्यापक नज्ज़ारा) मौजूद है। अब मेरी समझ में नहीं आता कि क्या करना चाहिये। मैं लाला जी से इस बारे में Dictate (डिक्टेट) लूंगा कि उन्होंने मेरे मुकाम किस तरीके से तय कराये। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-224
शाहजहाँपुर
29/5/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी खुश रहो।

तुम्हारे पत्र मिल गये। 17 जून का जो खत है, उसकी सिर्फ दो बातों का जवाब दे रहा हूँ। सिर में नन्हीं-नन्हीं फुहार जो गिर रही है, उसकी वजह यह है कि जब तुम मास्टर साहब के यहाँ बैठी थी, तो तुमने बतलाया था कि सिर में कुछ गर्मी मालूम होती है। उस वक्त मैंने ज़रा ठण्डी और नन्हीं-नन्हीं फुहार गिराई, ताकि गर्मी की तकलीफ़ जाती रहे। अब चूंकि तुममें प्रेम की वजह से आकर्षण शक्ति बढ़ी हुई है, और ग्रहण करने का माद्दा भी बढ़ा है, इसलिये यह चीज़ कुछ कायम हो गई है। ख्याल में जिन्दगी होती है और अगर वह माया से सम्बन्धित नहीं रहती तो उसमें ईश्वरीय शक्ति की वृद्धि हो जाती है। इसलिये यह हो ही नहीं सकता कि उसका असर न पड़े और यह तुम्हारी काबलियत है कि तुमने उस असर को अब तक कायम रखा। तुमने उसी खत में जो लिखा है कि एक अजीब कैफियत के मैदान में निश्चिन्त तैरती चली जा रही हूँ, जिसका कहना शब्द और वाणी से परे है। यह तो बहुत ही अच्छी हालत है। लालाजी साहब ने किसी वक्त कहा था कि आध्यात्मिक-उन्नति क्या है? बस एक चटियल मैदान है, जिसमें बस चले ही जाना है - मगर अभी दिल्ली दूर है। यह चटियल मैदान जो निगाह के सामने है, इसी में बस तैरते जाना है। अब रास्ता खुल गया और रूहानियत की शुरूआत ठीक-ठीक हो गई, अब इसमें जितनी तरक्की है, वह रूहानियत से सम्बन्ध रखेगी।

Dictate from Lalaji (श्री लाला जी का डिक्टेट):

“मगर किसी हालत को काफी नहीं समझना चाहिये। “रामचन्द्र” ऊपर लिख चुका है कि अभी दिल्ली दूर है - जो सही है। अभी तुमने देखा ही क्या है, देखने वाली हालतें तो अब आ रहीं हैं, जिसके एहसास करने के लिये बड़े दिल वाले की ज़रूरत है और बड़ी समझ की और Intelligence (बुद्धिमानी) की। हमारे यहाँ यह हालतें सब पर गुजरती हैं, मगर लोग एहसास करने की काबलियत नहीं रखते, इसलिये उनका मज़ा फीका पड़ जाता है। बाकी जो 23 जून का खत है, उसके जवाब की कोई ज़रूरत नहीं। उसमें तो एक हालत का Description (वर्णन) है। अब मैं लिख चुका - खुश रहो। रामचन्द्र जो समझेगा, जवाब देगा।“

कल ता. 28 दिन शनिवार को किसी वक्त मुझे यह मालूम हुआ कि तुममें कुछ ख्याली थकान सी है, आज यह चीज नहीं है। ज़्यादा तेजी से जाने में यह हो जाता है कि कुछ थकान सी मालूम होने लगती है। उसमें फिर Energy (शक्ति) बढ़ा दी जाती है। मुझे भी यह चीज़ बड़े-बड़े मुकामात को तय करने में महसूस हुई है और इसमें कोई हर्ज नहीं। अभी मेरी समझ में यह नहीं आया कि ‘D’ के मुकाम पर कब तक रोकूँ खैर, यह दो एक रोज़ में तय कर लूंगा। फिर जैसी मुझे रोशनी मिल जावे वैसा काम करूँगा।

अब 24 जून का खत जो मिला है, वह तो बड़ी अच्छी हालत है। मैं भी इस हालत को तरसता हूँ। यह इतनी उम्दा हालत देखने में आई है कि मैं इस हालत पर सैकड़ों सल्तनतें अगर मेरे पास होतीं तो न्योछावर कर देता मगर इसकी मानी यह न समझ जाना कि अब कुछ करने को बाकी नहीं रहा, बस यही काफ़ी है।

हंसी-खेल नहि पाँइयाँ, जिन पाया तिन रोय । हाँसे खेले पिऊ मिलें, तो कौन दुहागिन होय।।

शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-230
शाहजहाँपुर
17/7/1952
परम पूज्य समर्थ श्री लालाजी साहब का Dictate (डिक्टेट) :-

"दुख्तरे नेक अख्तर नूरचश्मी कस्तूरी (भाग्यवान बेटी)
ब आफियत बाशन्द (प्रसत्र रहो)"

मेरा इरादा था कि कुछ लोग रामचन्द्र से बन जाते तो अच्छा था, मगर मेरी हिरास की हिरास है। अभी उम्मीद कर सकता हूँ कि कुछ लोग बन जावें, मगर रामचन्द्र की माद्दी (जिस्मानी) कमज़ोरी देखकर, यह ख्याल पैदा होता है कि इस कदर बार (बोझ) उसकी तन्दुरुस्ती कैसे बरदाश्त कर सकेगी। रूहानियत में तो वह जवान है और जवान ही रहेगा मेहनत ज़रूर जिस्म की तन्दुरूस्ती पर मबनी (निर्भर) है। यहाँ तो लोग यह समझते हैं कि रूहानियत मुंह का निवाला है, जब चाहेंगे मुंह में रख लेंगे। मेहनत करना कोई जानता ही नहीं। जिला देना (चमक देना) कोई पढ़ा ही नहीं। बस आला तरक्की का नाम सुन लिया है और किताब पढ़कर यह समझ लिया है कि ज़्यादा से ज़्यादा हमें यहाँ तक पहुंचना है। बजाय दुनिया की बेलौसी के ‘मालिक’ से बेलौस हो रहे हैं। इसने (रामचन्द्र ने) खतूत भी लिखे, समझाया भी, मगर जूं नहीं रेंगी - अब सिवाय इसके और क्या कहा जावे कि मर्ज़ी ईश्वर की ऐसी है। आदमी थोड़े हों या बहुत हों, इससे बदर्जहा बेहतर है कि बहुत हों और थोड़े बनें। इसके यह माने नहीं कि लोग ज़्यादा शामिल न किये जायें, तो दरवाज़ा तो सबके लिये खुला है। अब मान लो कि तुम पर उम्मीद रखी जावे तो तुम्हारी ही तन्दुरूस्ती नागुफ्ताबे है(नाकाबिल इतनी कि जिसके विषय में कुछ कहा न जावे), परन्तु तुम्हारा शौक और ‘मालिक’ की मोहब्बत यह जरूर है कि बहुत कुछ करके दिखा दोगी और हमें तुम्हारी तरक्की की उम्मीद रखनी भी चाहिये, और यह भी अगर लड़के न सही तो लड़की ही सही। लड़का और लड़की में कोई फर्क नहीं है, सिर्फ़ ज़माने ने अलग करके दिखला दिया है। एक ही अज़ो (अंग) की दो हडिड़याँ है, जो एक ही जड़ से निकलती हैं, कोई ज़्यादा फर्क नहीं। काम ऐसा होना चाहिए कि मिशन को जिला तैयार किये-कमोवेश जरूरत के लिए, तो अव्वल तो कोई इनसे काम लेने वाला नहीं मिलता और मिलता भी है तो वही डेढ़ ईट की मस्जिद बनी बनाई अपने साथ ले कर लाता है। अगर इन लोगों (तालीम देने वालों) में से भी मैं चुनूं तो सिर्फ एक मास्टर साहब रह जाते हैं, जिनसे आगे उम्मीद पाई जाती है, मगर हर शख़्स को हर काम मल्का नहीं होता, जो जिसका काम है, वही ठीक कर सकता है। एक आदमी को अगर सब काम सुपुर्द कर दिये जावें तो वह कोई भी काम ठीक न कर सकेगा। Dictate - Swami Vivekanand जी – “There should be certain blocks for certain work”, ( स्वामी विवेकानंद जी का डिक्टेट - ख़ास काम के लिये खास व्यक्ति होने चाहियें )।

यहाँ तो यह हाल है कि लिखे भी एक शख़्स, मदद करें भी तो एक ही शख्स। Function (उत्सव) का Celebration (मनाना) और उनका इन्तज़ाम भी करें तो एक ही, क्योंकि उसके दिल से लगी है और दूसरे लोग उसको कैफ़ियत नहीं देते, यह ज़रूर हैं कि चोंबे जी की भी दिलचस्पी बहत कुछ इस तरफ़ हैं, मगर रामचन्द्र को भी उनसे कुछ कम दिलचस्पी नहीं। वह तरक्की कर रहें हैं और उनका ख्याल मिशन की अच्छी तरक्की के लिये भी हैं। मेरे ख्याल से हमेशा एक दरवाजे पर रहने वाले की क़द्र ज़्यादा होती है। मैं तो ऐसे आदमी को पसन्द करता हूँ कि जैसा कि रामचन्द्र, उसकी गर्दन पर कोई छुरी भी रख दे तो भी सही बात कहने से न हटेगा - कुछ परवाह नहीं कि कोई ख़िलाफ हो या बुरा माने, नतीजा यह है कि मुमकिन है कि उसके उसूल से मुआफिकत लोग न करें, परन्तु उसके खिलाफ कोई भी नहीं होता। अब कहो, तुम्हारी तरक्की की तारीफ़ करूं ताकि तुम्हारी तबियत खुश हो जावे। मैं समझता हूँ कि तुम्हारी तारीफ़ इतनी ही बहुत है कि मैं तुमसे खुश हूँ। आज सुबह प्यास की तेज़ी रामचन्द्र में इस कदर बढ़ी; किस बात की? काम लेने की। वह इसके ढंग जाने क्या-क्या सोचने लगा। कहीं यह ख़याल था कि किसी को ख्याल की ताकत से काम लेने के लिये तैयार करूं, कहीं यह कि किसी और जरिये से मिशन की Service (सेवा) ली जावे और उसके पास तमाम उम्र यही काम रखा जावे। अब इसमें अपने आपको कौन-कौन Offer (प्रस्तुत) करते हैं। किसमें कौन सी ताकत अच्छी है, सोचकर लिखें ताकि वही काम सुपुर्द किया जाये और इसमें मेरी दोनों आँखें बराबर हैं यानी लड़के और लड़कियाँ दोनों शामिल हैं। लड़कियाँ ज़रूर कुछ Restrictions (बंधन) के साथ और लड़के किसी कदर आज़ादी के साथ। Duties (डयूटीज़) मैं लगाऊंगा।

शेर – “मन आँ मोरम कि अज़ पायम बेमालन्द। न जम्बूरम कि अज़नेशम बेनालन्द ।“

अर्थ - मैं वह चींटी हूँ कि लोग मुझे पाँव से मसल डालें - मैं वह बरैया नहीं हूँ कि लोग मेरे कारण दु:ख पावें।

शुभचितंक
समर्थ श्री रामचन्द्र जी महाराज
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-233
शाहजहाँपुर
24/7/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत मिला। मैंने आज ही तुमको Point ‘E’ ( प्वाइंट ई ) से निकाल कर ‘F’ ( एफ ) पर पहुंचा दिया है। अब जो तुम्हारा अनुभव हो लिखना। मैं सोचता तो यह हूँ कि इन मुकामात पर ज़्यादा न रोकूँ। मगर कहीं पर रोकने की ज़रूरत पड़ गई तो मजबूरी हो जावेगी। हमारे यहाँ संत्सग में इन मुकामात की कदर नहीं। यहाँ तो लोग पहले ही मुकाम से निकलना नहीं चाहते। ऐसे भी हैं जो शुरू से शान्ति का मज़ा चाहते हैं और अगर कहीं पहली या दूसरी Sitting ( सिटिंग ) में ही उन्हें शान्ति न मालूम हुई तो मैं बिल्कुल बेकार और निकम्मा उनके ख्याल में आता हूँ। मैं भी भाई कोशिश करता हूँ कि पहली ही Sitting ( सिटिंग ) में उनको कुछ शान्ति मालूम हो। मजबूरन लाला जी की बरकत उन पर उतरने लगती है। मगर इसको भी एकाध ऐसे भी मिले जो अपनी काब्लियत समझ बैठते हैं कि एक महात्मा का ख्याल ले कर आया था, इसलिये यह शान्ति मालूम हुई और यह चीज़ भाई मेरे ही साथ है। देखा है कि लोग महात्माओं के पास, जो इस वक्त मशहूर हो रहे हैं, मसलन सुखदेवानंद, नारदानंद इत्यादि जाते हैं और महीनों जाते हैं , मगर वहाँ के लिए यह शान्ति का सवाल क्यों नहीं उठता। तुम्हारी समझ में इसकी क्या वजह मालूम होती है। एक या दो Sitting ( सिटिंग ) में शान्ति पैदा होना बड़ा मुश्किल है। यह तो अभ्यास के करने की चीज है। मेरा काम सिर्फ़ यह है कि ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर दूं, कि यह चीज़ पैदा होने लगे। मैं समझता हूँ यह शान्ति जो उन लोगों में पैदा हो जाती है, सिर्फ इस बात पर कि ‘लालाजी’ मुझको उनकी नज़रों में नाकाबिल ठहराना नहीं चाहते। इसका ‘उनको’ हज़ार बार धन्यवाद है। और भाई मेरी उम्र तो पूरे 22 वर्ष अभ्यास के अशान्ति में ही कटे थे और इसमें वह मज़ा था कि शान्ति में नहीं मिलता।

एक बात तुमने किसी खत में पूछी थी, वह लिखने की याद ही न रही। अब लिख रहा हूँ। तुमने पूछा था कि अब क्लोरोफार्म का असर तो नहीं है? इसमें कमी तो ज़रूर हुई होगी मगर अभी महसूस नहीं हुई। मैं तुमको काम करने का तरीका बताता हूँ । कोई काम करो तो यह समझ लो कि तुम मेरी ही Will ( इच्छा शक्ति ) से काम ले रही हो । यह नुस्खा किसी को रूहानी तरक्की देने में या ईश्वरीय काम करने में बहुत जल्द Desired effect ( इच्छानुसार प्रभाव ) पैदा कर देता है। अगर किसी शख़्स की, ईश्वर कृपा करे जब सोलह आने भर लय अवस्था अपने गुरू में हो जाती है तब इसकी ज़रूरत नहीं रहती। इससे पहले अगर किसी को Sitting ( सिटिंग ) भी दी जावे तो यही समझा जाता है कि सिखाने वाला दे रहा है। इसका असर बहुत अच्छा होता है। यह बात हर सिखाने वाले को जानना चाहिये। इसके ख्याल रखने की ज़रूरत है और तवज्जोह देते वक्त यह समझ लिया जाता है कि मैं नहीं हूँ , बल्कि मेरा सिखाने वाला है , जो तवज्जोह दे रहा है। संक्षेप में यह कि अपने आपको उस वक्त गुरू का रूप समझ लेना चाहिये। अर्थात् मान लो कि मैं तवज्जोह दूं तो मुझे यह समझना चाहिये कि मेरा जिस्म, ख्याल, दिल व दिमाग़ जो कुछ भी है, यह सब स्वयं “लाला जी” हैं और फिर तवज्जह देना चाहिये।

तुम्हारा ता. 23.7.52 का खत भी मिला। सुस्ती की शिकायत जो तुमने लिखी है - यह Soul ( आत्मा ) का ख़ासा है। जब हम उसके निकट होते जाते हैं तो उसका खवास जो कि inactive ( अकर्मण्य) है अनुभव होता है और हमारे ज़ाहिरा तौर व तरीकों में वह असर दिखलाता है। अम्मा को प्रणाम ।

शुभचितंक रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-238
शाहजहाँपुर
31/7/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत ता. 26.7.52 का लिखा हुआ मिला- यह Point ‘E’ की हालत है। खुश्क हालत तो बहुत अच्छी है, इसको बेकैफी की हालत कहते हैं यानी कोई कैफियत न होना। इस हालत का पूरी तौर पर कायम हो जाना ही कमाल है। तुमने जो आकर्षण शक्ति ‘मालिक’ में होने के बारे में लिखा है, मुमकिन है कि हो-फिर अनुभव करके लिखना। तुमने जब लिखा तो मैंने गौर किया तो मुझे भी मालूम हुई; कृष्ण जी के वक्त में यह बात जरूर थी। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

शुभ चिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-239
शाहजहाँपुर
31/7/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

30 जुलाई का पत्र मिला। तुम्हारा ठहराव जैसा कि मैं लिख चुका हूँ Point ‘F’ पर है, मगर मेरी तवज्जो अभी Point ‘F’ की सैर के लिए काम नहीं दे रही है, और वह मुकाम अच्छी तरह से अभी नहीं खुल रहा है। वजह कुछ नहीं मालूम होती है। तुमने लिखा है कि अब तो दशा न हरी लगती है न सूखी, इसके माने यह हैं कि आत्मा के निकट पहुँच चुकी हो। मगर अभी तुम्हारे ख़्याल में हरे और सूखे की तमीज बाकी है। हालत यह है कि उसकी भी तमीज़ न रहे। ईश्वर यह चीज़ भी देगा बशर्ते कि ईश्वर करे कि तुम इसी भाँति लगी रहो। तुमने लिखा है कि “कुछ अब तो शायद चटियल मैदान भी मेरे में हजम होता सा लगता है।“ यह ऐसी दशा है कि जब किसी की बस्ती या घर चटियल मैदान ही बन जाता है, तो रहते-रहते वह चीज और जगह ऐसी मालूम होती है कि गोया यह अपनी ही है और फिर उसका एहसास नहीं होता। चरियल मैदान का हजम करना जो तुमने लिखा है यह किस एहसास से तुमने लिखा है? लिखना। अगर इसके माने यह है कि “बिन्दु में सिन्धु” समा गया है, तब तो बहुत अच्छी हालत है।

तुमने लिखा है कि मेरा ख्याल अब अकस्मात् ‘मालिक’ के ख्याल में घुस गया है, यह भी बहुत अच्छा है। जब जिस्म गायब हो जाता है, यानी अपने जिस्म का भान नहीं रहता और ख्याल भी ‘मालिक’ में बहुत कुछ चिपट जाता है तो ऐसा महसूस होता है। इसकी शुरुआत है, अभी पूरी हालत नहीं आई। यह सब ईश्वर के हाथ में है, इसमें अपना वश नहीं वह जिसे दे देवे। मैंने जो तुम्हें लिखा था कि मेरा ख्याल समझ कर किसी काम को करो, यानी यह समझ लो कि मेरा ख़्याल ही काम कर रहा है। इसके बारे में तुमने यह लिखा है कि आत्मिक उन्नति के लिये यह बढ़िया नुस्खा है - यह बात मेरी समझ में नहीं आई है -लिखो ताकि समझ जाऊं। एक चीज आत्मिक-उन्नति के लिए बहुत हानिकारक है। वह है अहंकार और इल्मी-काब्लियत का जो अहंकार होता है, वह तो बहुत ही खराब होता है। लोगों को इसका पता नहीं चलता है, मगर अपना रंग ले हो आता है। दूसरी चीज़ जो और भी ज़्यादा हानिकारक है वह है हसद या Jealousy | स्वामी विवेकानन्द जी ने Transcendental person (श्रेष्ठ व्यक्ति) की तारीफ यह लिखी है “One who is jealous to none” (जिसको किसी से ईर्ष्या न हो) जो शख्स अपनी यह दो बातें दूर नहीं करता उसका कोई एतबार नहीं कि कब ऐसा गिरे कि उठ न पावे। हम अगर यह देखें कि किसी शख्स पर ईश्वर की बड़ी मेहरबानी है, तो हमें खुश होना चाहिए। यहाँ तो यह हाल है कि अगर यह नुक्स किसी में हो और मैं इसलिए कह दूं कि वह भी इसके दूर करने की कोशिश करे तो शायद उसे इस क़दर बुरा मालूम हो कि वह मेरी शक्ल देखना पसन्द न करे। अब मुझसे इतनी मेहनत नहीं होती कि मैं अगर किसी में समझ लूं कि यह नुक्स है तो मैं तो अपने आध्यात्मिक बल से दूर करूँ ऐसे कि उसको खबर न हो और मैं इसीलिए, अगर मुझे किसी का कोई नुक्स मालूम हो जाता है, उससे कहता नहीं हूँ बल्कि अपनी कमजोरी समझ लेता हूँ। तुम्हारे भाई-बहनों को आशीर्वाद ।

शुभ चिन्तक
रामचन्द्र

उसूल यह है कि सिखाने वाले से जितने तालीम पा रहे हैं और खासकर वह लोग जो Initiated (गुरु द्वारा दीक्षित अभ्यासी) हैं, उम्र में कितने ही बड़े हों, उसकी आध्यात्मिक औलाद हैं। मैंने इस सब बातों का ख़्याल न करते हुए उम्र व बुजुर्ग का हमेशा ख्याल रखा। कोई मुझसे कुछ कह ले, मैं बिल्कुल बुरा नहीं मानता। कोई गाली दे या मारे, इसका कुछ असर हमारे ऊपर होने का नहीं- अगर यकीन न हो तो इसको कोई आजमा कर देख ले और लगेगा भी, क्योंकि मैं इन्सान हूँ, तो भी मिनट-दो मिनट के लिए और फिर जैसा का तैसा।
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-243
शाहजहाँपुर
13/8/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

खत तुम्हारे सब मिल गये। तुमने जो लिखा है कि बेख़्याली की सी दशा महसूस होती है। यह हालत बहुत अच्छी है, मगर अभी तुम में बेख्याली की तमीज बाकी है, अर्थात् ख़्याल और बेख़्याल दोनों का अन्दाज़ अभी तुममें बाकी है। यह चीज़ भी नहीं रहनी चाहिये तब Originality (वास्तविकता) की शुरूआत समझो। हिम्मत है तो यह चीज़ भी ईश्वर देगा। यह इतनी बारीक चीज है कि हर शख्स को इसका अन्दाजा भी नहीं हो सकता। इसका मज़ा चखने वाला ही समझ सकता है। ईश्वर करे यह हालत पैदा हो जावे। एक बात मेरे समझ में आ गई वह तुम्हारे खत से ताल्लुक नहीं रखती, मगर लिखे देता हूँ। तुम्हारी और श्यामपती जी की गुफ्तगू नारायण ने सुनाई थी कि श्यामपती जी को ताज्जुब हुआ कि जब तुमने उनके यहाँ का वातावरण बता दिया। एक बात का तजुर्बा करना, मेरा तजुर्बा नहीं है और मैं भी देखूंगा, यह चीज़ नई ख्याल में आई है और इसको याद भी रखना, मुमकिन है मैं भूल जाऊं। किसी चीज़ की मौजूदगी या असर वातावरण पर असर डालती है। जो मनुष्य या औरत सामने आवे तो उसके ख्याल जैसे भी हैं, वह भी उसके करीब के, यानी जिस्म से मिले हुए वातावरण पर असर रखेंगे। इसलिए कभी इसका तजुर्बा करना कि मनुष्य के चारों तरफ जो वातावरण होता है, वैसे ही उसके ख़्यालात भी होते होंगे। एक नया ख़्याल आ गया सो लिख दिया, तजुर्बा इसका नहीं किया।

तुमने लिखा है कि “जैसे दुनिया का एक साधारण मनुष्य प्रतिदिन के क्रमानुसार जीवन व्यतीत करता है,” बस यही हाल मेरा है। तुमने जहाँ तक इसको एहसास किया है, लिखा है, मगर इसको ठीक Express (अभिव्यक्त) नहीं कर सकी, इस बात में अभी बहुत मोटापन है। जो असली हालत इससे ताल्लुक रखती है, वह बहुत दूर है और वह एक ईश्वर का रहस्य, भेद है, जिसको लाला जी साहब ने बहुत बचाकर मेरे एक खत के जवाब में लिखा है और उसके खोलने को मुमानियत भी उस वक्त की थी। कबीरदास ने अपने लायक शिष्य धर्मदास जी से कहा है -

"धर्मदास तोहे लाख दुहाई। सार भेद बाहर नहि जाई ।।"

और यही दोहा मैंने ‘लाला जी’ को लिखा था, जबकि मेरी दशा ‘उनकी’ कृपा से बहुत कुछ परिपक्व हो चुकी थी। इसी में यह भी लिखा था कि सींक की ओट पहाड़ मालूम पड़ता है। इस दोहे का मतलब यह नहीं है कि आध्यात्मिक-विद्या खालिस रूप में किसी को प्रदान न की जाये, बल्कि यह मतलब है कि असल भेद को जुबान से न बताया जाये, जब तक कि अभ्यासी स्वयं उसको अनुभव न करने लगे, इसलिये जुबान से बताना मना है। अगर उस बात का किसी शख्स को यकीन हो जाये तो फिर मुमकिन है कि ईश्वर की Importance (महत्व) उसकी दृष्टि में जाती रहे और इस चीज़ को जल्दी कोई यकीन भी नहीं करेगा। मुझसे लालाजी साहब ने एक जगह नोट में कहा है कि “तुम किसी एकान्त और अच्छी जगह में जाकर इसका तजुर्बा करो कि अपने आपको इतना नीचा उतार दो कि जो सबसे ज्यादा पतित और रंक की हालत हो सकती है और फिर आहिस्ता आहिस्ता तरक्की करते हुए, चक्रों का हाल जानते हुए, अपनी हालत पर आ जाओ और जितना Time मैं इन्तहाई पतित की हालत में रहूँ और उससे आगे तालीमी हालत पर (यानी सिखाने वाले की हालत पर) न आ जाऊं तब तक तुम लोगों के सिखाने का ज़िम्मा खुद लिया है।“ वह मुझे यह तजुर्बा कराना चाहते हैं, मगर मैं नहीं कह सकता, इसके लिए मुझे वक्त मिले या न मिले और यह चीज़ ऐसी जगह हो सकेगी जो किसी पहाड़ या जंगल के कोने पर हो। मैंने बहुत से ईश्वर के भेद खोले हैं और मैं किताबों और चिट्टियों में बहुत कुछ लिख चुका हूँ। बहुत खास बात मुमकिन है, न कही हो। चूंकि अब हुक्म भी ऐसा है कि मैं सीने पर रखकर कुछ न ले जाऊं। लिखने वाला न मिलने की कमी भी मुमकिन है बहुत सी बातें न खुलवा सकूँ और लिखने वाला अगर हो तो कैसा हो कि छाया की तरह मेरे साथ लगा रहे। जिस वक्त जो ख़्याल मुझको पैदा हो लिख ले। जब तुमने अपनी टीसन लिखी तो मुझे अपनी टीसन की याद आ गई और इसी कुरेदन और अशान्ति में मुझे वह मज़ा मिला है कि शान्ति के तलाश करने वाले इस चीज़ को ठुकरा दें। अब ज़रूर इन सब बातों से स्वतंत्र हूँ। न अब कुरेदन है, न टीसन और मेरी इस चीज़ की नकल नहीं करना चाहिये, इसलिये कि यह चीज़ खुद ब खुद पैदा होती है। श्यामपती जी से पूछना कि कबीरदास के उस दोहे का क्या मतलब है, वह अच्छा बतायेंगे, इसलिये कि वह काबिल आदमी हैं और फिर मेरा मतलब भी उन्हें बता देना। एक चीज़ अच्छी सिद्ध हो जावेगी, वह मुझे लिखना। केसर का भी खत मिल गया उन्हें बेचैनी मुबारक हो।

यह चीज़ बड़ी मुश्किल से मिलती है और फकीरों की संगत से अगर जिज्ञासु में तलाश है तो यही चीज़ पैदा होनी चाहिये। इसी को सूफियों ने दर्द दिल कहा है। अब इसके भी बहुत से Stages (स्तर) हैं। जितने अच्छे Stage का दर्द दिल है उतने अच्छे Stage पर अभ्यासी पहुँचेगा। मैं तो बिटिया सच कहता हूँ कि ठुस्म ठाँस करता चला जाता हूँ। इसलिए कुछ न कुछ काम बन ही जावेगा। बाकी असल शौक मुश्किल से किसी में होगा। लाला जी की महफिल में लोग अच्छे-अच्छे थे मगर इस चीज की फिर भी बहुत कमी थी और सच पूछो तो ‘आप’ इतने उदारचित्त थे कि रास्ते-गली जवाहर बिखेरते चले जाते थे। फिर भी हम लोगों की आँखें न खुलीं और उनको वाकई तौर पर अब तक कोई पहिचान न सका। मुझे भी होश न आया कि ‘आप’ से बहुत सी गुत्थियाँ सुलझा लेता। यह ‘आपकी’ मेहरबानी थी कि मुझे इस क़दर दे गये। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-246
शाहजहाँपुर
1/9/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे 22-26 अगस्त के खत मिल गये। ईश्वर की कृपा से अच्छी हालत चल रही है। दूसरों का तेज़ बोलना जो नागवार होता है, उसके मानी यह हैं कि एकाग्रता बढ़ी हुई है। ता. 31 अगस्त को करीब साढ़े बारह बजे रात को मैं तुमको Sitting ‘F’ के मुकाम पर दे रहा था कि एकाएक मुझको यह मालूम हुआ कि ‘F’ का कोई पर्दा टूटा और उसमें से आग की लपट सी बरामद हुई वह कुछ सुर्खी, कुछ चाँद की तरह से रोशनी लिए हुए थी मेरे समझ में नहीं आया कि क्या बात थी। इससे पहले मैं ‘F’ के Inner most Corner (भीतरी भाग पर) पर तवज्जो देता था और उसको उभारता था मगर उभरता नहीं था मगर असर ज़रूर लेता था और उसमें काफी ताकत पहुँचती थी। मेरा एहसास यह है कि अब वह काफी और पूरी हालत में है। हालाँकि Inner most corner (भीतरी भाग पर) पर मुझे अपनी Will (इच्छा-शक्ति) की तेजी अब भी काफी तेज़ रखी हुई मालूम पड़ती है - मुमकिन है कुछ और उभरे। मुझमें एक नुक्स यह है कि जल्दबाज़ी की आदत है, इस वजह से अन्दाज़ नहीं रहता। तुम जितनी जल्द लिख सको यकुम (एक) सितम्बर की सुबह से या अब जो कुछ एहसास हो लिखो। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-249
शाहजहाँपुर
6/9/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे दो खत मिले। तुम्हारे एहसास से मैं बहुत खुश हुआ - ईश्वर मुबारक करे। तुम्हारा तन्दुरुस्त रहना लाज़िमी है, इसलिए कि मुझे तुमसे काम लेना है। अगर तुम 15 मिनट रोज़ अपनी तन्दुरूस्ती के लिए दे दो तो तुम तन्दुरूस्त हो जाओ। तरीके तुम्हें मैंने बतला दिये हैं। अगर वह न कर सको तो इतना ही करो कि पन्द्रह मिनट तक यह ख़्याल करो कि ब्रह्माण्ड से तन्दुरुस्ती बढ़ाने वाली ताकत आ रही है, जिससे सब मर्ज दूर हो रहे हैं और तन्दुरूस्ती बढ़ रही है। मुझे उम्मीद है कि इतना कहना तुम मेरा मान लोगी। केसर में फ़नाइयत-लय अवस्था बढ़ रही है और यह बहुत अच्छी बात है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-256
शाहजहाँपुर
11/11/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे सब खत मिल गये। तुम्हारे हालात पर गौर कर लिया। ईश्वर के रास्ते में जो बातें भी आती हैं वह सब हमारे भले के लिये आती हैं। अगर रुकावटें भी हैं, तो इसके मानी यह हैं कि ‘मालिक’ को उनको दूर करने के लिये हमारे ख्याल में रहना पड़ेगा तो फिर इससे ज्यादा और हमें क्या चाहिये कि ‘मालिक’ का ख़्याल हमारी तरफ रूजू हो। सब पूजा और ध्यान का यही मतलब होता है कि ‘मालिक’ का ध्यान किसी तरीके से हम पर फिरने लगे। मगर ‘मालिक’ की निगाह तभी फिरती है, जब उसकी खोज में गड्ढा या ऊंची नीची जगह आ जाती है। सूरदास जी चूंकि अन्धे थे, बेचारे कृष्ण के प्रेम में लकड़ी से कुंआ न टटोल सके और उसमें गिर गये। अन्त में श्री कृष्ण जी ने अपने हाथों उन्हें निकाला। कितनी खुश नसीबी थी कि कृष्ण जी के हाथ उनके जिस्म पर पड़े, गोया कि कुए में गिरने से उनकी पवित्रता और बढ़ गई। खत पहुँचते-पहुँचते ईश्वर ने चाहा तो तुम्हारी हालत बदलने लगेगी और कुछ फर्क तो अभी 10.55 p.m. पर पड़ गया होगा। तुम अपनी सैरगाह मुकाम ‘H’ पर पाओगी। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-259
शाहजहाँपुर
23/11/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे सब पत्र मिल गये। मैं इन दिनों एक दो कामों में बहुत अधिक फंसा रहा। इस कारणवश मैं तुमको अधिक समय न दे सका। अभी आठ दिन और काम में लगा रहूँगा। ईश्वर ने चाहा तो पत्र पहुँचते-पहुँचते तुम्हारी सैर Point ‘H’ (पॉइंट एच) की प्रारम्भ हो जावेगी। तुमने लिखा है, “अब न मैदान है, न बिन्दु, न सिन्धु,” यह तो बहुत अच्छी हालत है। इसका अर्थ यह है कि बिन्दु न सिन्धु, सिन्धु व मैदान लय-अवस्था के असर से अपना-अपना Limitation (सीमा) तुम्हारे ख़्याल पर अन्दाज़ होने नहीं देते, अर्थात् तुम्हारे ख़्याल से यह बातें सब निकल चुकी हैं यानी तुम्हारे ख्याल में उनका बन्धन नहीं रहा और उससे छुटकारा पा लिया या ऐसा कहो कि तुम्हारा ख़्याल इन चीजों के अब न होने के कारण से और भी हल्का हो गया है। विशेष पत्रोत्तर यह है कि अभ्यासी की हालत यह होनी चाहिये कि “सावन सूखा न भादों हरा”। यह बबूल के वृक्ष की तारीफ़ है जो सदैव एक समान रहता है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र

अम्मा ने जो अच्छा आहार करने के लिये लिखा है, यह ठीक है, परन्तु इस समय हालत यह हो रही है “तेते पाँव पसारिये, जेती लम्बी बाँवि”। परन्तु खैर, जब ईश्वर देगा, तब मैं ख़्याल रखूंगा। मैं खुश तो इस बात पर होऊं कि सबको अच्छा भोजन प्राप्त हो। न मालूम यह समय कब आये। आना तो चाहिये, और दूध, घी की नहरें बहनी चाहिये, कुछ देर है।
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-262
शाहजहाँपुर
30/11/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा 23 नवम्बर का पत्र मिला। जब तक अहमियत मौजूद है, इन्सान अपनी तारीफ़ से प्रसन्न भी होता है और जब कोई उसको भला-बुरा कहता है, तब बुरा मालूम होता है। अहमियत का कोई ठिकाना नहीं न मालूम यह कहाँ तक जाती है और शुद्ध अहमियत से तो बहुत दिनों में पीछा छूटता है और यही तारीफ़ शुद्ध माया और शुद्ध अहंकार की है। यह दोनों वस्तुएँ बहुत शक्ति रखती हैं और योगी यहीं से अधिकतर गिरता है। सर्व शक्तिमान ईश्वर अपनी दया करें।

एक बात मैं तुम्हें और बतलाता हूँ कि मान और अपमान इन दोनों से हमें कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। अपमान तो बहुत शीघ्र छूट जाता है मगर भाई मान का तोड़ना सच में ईश्वराधीन ही है। जब ईश्वर की हमारे ऊपर पूर्ण कृपा होती है, तभी पीछा छूटता है, फिर भी जब तक शरीर उपस्थित है यह कुछ न कुछ अवश्य शेष रह जाता है। अब मैं अपनी कमज़ोरी भी लिखता हूँ - जब कोई मेरी प्रशंसा करता है, तब चित्त मेरा भी प्रसन्न हो जाता है, परन्तु यह बात अवश्य होती है कि प्रथम तो चित्त बहुत कम प्रसन्न होता है और होता भी है तो मुझे यह अनुभव नहीं होता कि किसकी प्रशंसा हो रही है, कौन प्रसन्न हो रहा है। तुमने जो पत्र में यह लिखा है कि “जितना मैं” ‘मालिक’ पर मर मिटना चाहती हूँ, उतना में मर-मिट नहीं पाती। इसके अर्थ यह है कि जैसे कोई व्यक्ति अपने तीर का निशान उस स्थान पर बना ले जहाँ पर कि तीर लगना है जब मर-मिटने का ख़्याल पूर्णरूप से उत्पन्न हो गया तो समझ लो कि मर-मिटना भी शुरू हो गया और तीर निशाने पर अवश्य पहुँचेगा।

तुमने जो लिखा है कि “Self-Surrender (आत्म समर्पण) मुझे भूल गया है,” यही हालत ठीक Self-Surrender (आत्म समर्पण) की है। Self-Surrender (आत्म समर्पण) और कुछ नहीं है, केवल यही है कि अपने आपको ‘मालिक’ के हाथ में दे देना है और ‘उसकी’ इच्छा में राजी हो जाना। जो तुमने ज़ेहालत की हालत के विषय में लिखा है यह बहुत ऊंची हालत है और इसका अभी प्रारम्भ भी नहीं हुआ है। यह चीज़ अभी कोसों दूर है, परन्तु ‘मालिक’ की पूर्ण दया सबसे नज़दीक है और वह सब कुछ कर सकता है और भाई ज़ेहालत को पूछता ही कौन है। उसे तो सब लोग दूर-दूर रखना चाहते हैं। मेरी मिसाल सामने है कि पढ़े-लिखे मनुष्य, सम्भव है बात करना भी अपने समय को व्यय करना है। एक बात तुम्हारे पत्र में यह अच्छी नहीं मालूम हुई कि हालत खराब चल रही है। हमारे यहाँ सब हालतें अच्छी ही हुआ करती है। अगर कोई खराब हालत अन्दाज में आती है तो वह अच्छी हालत खोलने के लिये कुंजी होती है। यह ख़्याल अच्छा है कि जब तुम किसी में ‘मालिक’ का प्रेम देखती हो उसे अपने ही सा प्रेम में पाती हो। मैं मिसाल हूँ। अव्वल तो मैं अपने आप में नहीं रहता हूँ, परन्तु खैर, जब उससे पृथक होकर निगाह जाती है तो मुझे यह मालूम होता है कि मुझसे कहीं अधिक आध्यात्मिक-विद्या में तरक्की किये हुए हैं। और इससे कहीं अधिक बढ़ जाऊं तो मुझे यह ज्ञात होता है कि इसी ने मुझे आध्यात्मिक-विद्या सिखाई है और मौजूदा हालत मेरी जो भी कुछ है। सब इसी की दी हुई है। इसके माने यह निकलते हैं कि हर वस्तु का ‘असल’ एक ही है और सब वहीं से आये हैं। किसी ने लगाव अधिक रखा और कोई गाफिल हो गया।

प्रिय बेटी, मैं तुम्हारे प्रथम पत्र का उत्तर दे चुका था कि 26 नवम्बर का पत्र मिला, तुमने जो स्वप्न देखा है, उसकी मैं तुमको बधाई देता हूँ। तुमने जो जल देखा है, वह Realization (साक्षात्कार) का दरिया था। अब तुम उसमें समा चुकी हो अर्थात् Reality (असलियत) प्रारम्भ हो गई है और सच पूछो तो मेरा काम ख़त्म हो गया। अब आगे बढ़ो और देखो क्या है। और मुझे विश्वास हो गया और मेरा कर्तव्य जो इतना ज़रूरी है जो ईश्वर ने पूरा कर दिया यह दशायें सब Point ‘H’ (पॉइंट-एच) की हैं। तुमने यह जो लिखा है कि “मेरे ही दिल में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाया हुआ है,” यह ब्रह्म गति है। इससे ऊपर हिरण्य-गर्भ की हालत है, उसके ऊपर खालिस ब्रह्म प्रारम्भ हो जाता है। तुमने सच लिखा है कि “दिल का बाँध टूट गया”, मगर अभी मैंने दिल को खोला नहीं है और यह ख़्याल मुझे अभी स्मरण हुआ। अब यह ‘मालिक’ की इच्छा पर है, कि कब मेरी तबियत बना दे कि मैं उसे खोल सकूँ। तुमने जो लिखा है कि “हर समय, हर जगह, मुझे अपने बजाय एक छाया सी, हल्की सी, सूक्ष्म सो ज्ञात होती है और जब उसे गौर से देखती हूँ, तो स्वरूप आपका पाती हूँ ”इस जुमले की इबारत कुछ ऐसी लिखी है कि ख़्याल को काटती है। इसको साफ़-साफ़ लिखो ताकि मैं उत्तर लिख सकूँ। तुमने यह लिखा है कि तुम्हारे ही दिल में पृथ्वी और जल, सब समाया हुआ है, परन्तु स्वयं मैं कहीं चली गई हूँ” इसके अर्थ यह हैं कि तुमने अपने आपको काफी गुम कर दिया है। ईश्वर करे यह दशा सबको प्राप्त हो, बल्कि हर्ष तो मुझे तब हो, जब कि मैं किसी न किसी को अपने से ऊंचा उन्नति में देखूं। समुद्र में उफान नहीं आता, तालाब अवश्य थोड़े पानी में उफान आते हैं। अभ्यासी को चाहिये कि हजारों दरिया मारफत (Realization) के गट-गट पी जावें, परन्तु वाणी से यही निकले कि “और लाओ”। ईश्वर की पूर्ण कृपा से तुम्हारी दशा बहुत अधिक अच्छी है। ईश्वर इससे भी आगे बढ़ावे। ऐसा ही है, ऐसा ही हो। यहाँ तो लोगों को इस दशा तक पहुँचने की इच्छा ही नहीं होती। ईश्वर का कहीं छोर नहीं। मुझे तो गुरु महाराज ने ठिकाने पर पहुँचा दिया। ‘उनका’ हज़ार-हज़ार धन्यवाद। परन्तु भाई, अब भी नहीं मालूम ठिकाना कहाँ होगा। कारण यह है कि Swimming अब भी शुरू है। मालूम नहीं लोग थोड़ी वस्तु को अधिक कैसे समझ बैठते हैं। अम्मा को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-265
शाहजहाँपुर
20/12/1952
प्रिय बेटी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारा आया-बड़ी खुशी हुई। जैसे तुम मेरे पत्र का इन्तज़ार करती हो, वैसे ही मैं तुम्हारे पत्र का इन्तज़ार करता हूँ। अर्थात् ईश्वर की कृपा से तुम्हारी हालत ऐसी हो गई है कि जैसे तुम ईश्वर से मिलने के लिये बेकरार हो, वैसे ईश्वर भी। अगर मैं लफ़्ज़ ईश्वर इस्तेमाल करता हूँ, तो जरा गलती रहती है, इसलिये कि उसने तुमको जहाँ तक उसकी पहुँच थी, पहुँचा दिया और आगे रास्ता बता दिया कि कि अब जाना जहाँ है। ‘उसका’ (ईश्वर) Realization (साक्षात्कार) तो हो गया, अब ‘भूमा’ का शुरू होता है, जिसको कि मैंने पिछले खत में लिखा है कि Reality (वास्तविकता) अब शुरू होती है। इसको समझाने के लिये ‘भूमा’ का अक्स समझ लो या अक्स-दर-अक्स समझ लो। जब Reality (वास्तविकता) ख़त्म हो जावे, तब उसकी हद में दाखिल होना कहा जा सकता है, सो घबराना नहीं चाहिये। यह कोई इतनी बड़ी बात नहीं है, जैसा कि कहने से लगती है। जिसने यह हालत दी है, वह वहाँ तक पहुँचाने में मदद करेगा। हमें अपने ‘लालाजी’ की जात पर हमेशा उम्मीद रखना चाहिये, वह जो चाहें कर सकते हैं और हमारे मिशन में सब उन्हीं की बरकत है और ‘उन्हीं’ की ताकत काम कर रही है। यह पढ़कर मुझे बड़ी खुशी हुई कि तुमने मान-अपमान बेकार सम्बन्धों से सम्बन्ध ही न रखा। मेरे पूछने पर जो लिखा है कि ‘अपने’ बजाय एक हल्की सी छाया दिखाई पड़ती है, ध्यान से देखने पर स्वरूप आपका ही पाती हूँ यह चीज बड़ी अच्छी है, मगर इससे अगले वाला Stage (दशा) जिसको कि मैं लिखूंगा नहीं, लय-अवस्था की अच्छी हालत होगी और मुमकिन है उसके बाद भी कोई Stage (दशा) हो। प्यास के बढ़ने का मतलब बस यही हो सकता है कि असल तत्व हमको अपनी तरफ घसीटना चाहता है और यह प्यास उस वक्त तक कायम रहनी चाहिये जब तक कि वह खुद बुझ न जाये। बाकी आगे जो कुछ तुमने लिखा है, वह लय-अवस्था व प्रेम की हालत है। इस हालत से कम पहुँचा हुआ कि जिस पर तुम हो वाक़ई Platform (मंच) पर सिखाने के लिये अगर कोई आता है तो उसकी गलती है और भाई गुरू का दर्जा यहाँ तक पहुँचा देना है, परन्तु लोगों को यहाँ पर पहुँच कर तृप्ति हो जाती है।

चन्द रोज बाद, यानी दो-चार रोज में मैं तुमको इसके अगले मुकाम पर खींच दूंगा। उसका नाम ‘I’ रख छोड़ा है। अभी Point ‘H’ (पॉइट-एच.) की दशा है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-268
शाहजहाँपुर
1/1/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे सब खत मिल गये। ता. 24 दिसम्बर का जो खत है, उसका जवाब यह है कि हम जब शुरू करते हैं तो हमारी निगाह ‘मालिक’ पर रहती है और अपना रिश्ता फिर बन्दे का हो जाता है। अब जो बन्दगी की डोर ‘मालिक’ तक हमने इस हद तक पहुँचा दी है, तो उसको खबर होने लगी कि कोई ‘उसकी’ याद कर रहा है, गोया अब वह तुमसे मुख़ातिब होने लगा और जब वह मुखातिब होने लगा तो उसके पास जो कुछ भी है, हम तक पहुँचने लगा। ‘उसके’ पास क्या था? बेपरवाही खास तौर पर और वह असल चीज़ जिसकी वजह से ‘वह’ मालिक बना है, गोया वही चीज़ अब तुममें भी उतरने लगी, अर्थात् तुम्हारी भी हैसियत कुछ न कुछ वैसी ही बनने लगी, गोया थोड़ी बहुत निस्बत तुममें भी आने लगी या यूं कहो कि 'उसकी झलक बहुत कुछ अब तुममें भी पैदा हो गई। अब चूंकि तुमने बन्दा होने का रिश्ता लेकर ‘उसकी’ याद की है, इसलिये तुम्हारी चीज़ भी अब उस तक पहुँचने लगी और जब तुम्हारी चीज़ ‘उस’ तक पहुँची तो क्या पहुँची? वही बन्दगी और भक्ति का ख़्याल और यह चीज़ पहुँचती ही रही; यहाँ तक कि तुम अपने आपको भूलने लगी। जब यह हाल हो गया तो वह चीज़ जो ‘उस’ तक पहुँच चुकी थी और वह बन्दगी और भक्ति का ख़्याल था, इसलिए तुम्हें यह मालूम होने लगा कि ‘वह’ खुद अब तुम्हारे ख़्याल में है। इसी तरह से बहुत सी दशायें यही समझ में आती हैं, मसलन अन्तरमुखी वगैरह। वह सब ‘उसी’ की तरफ से मालूम होती हैं। इस तरह भक्ति का एक नया अंक खुल जाता है।

31 दिसम्बर सन् 52 को मैंने तुमको ‘J’ स्थान पर खींच दिया है। ईश्वर ने चाहा तो खत पहुँचते-पहुँचते सैर भी शुरू हो जावेगी। मैं जल्दी करना चाहता हूँ, मगर यह भी चाहता हूँ कि सैर का एहसास भी तुमको होता चले।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-275
शाहजहाँपुर
4/2/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे पत्र 27 जनवरी सन् 53 व 30 जनवरी और दूसरी फरवरी के मौसूल हुए। जब तुम उत्सव में आई थीं, तो मैंने 18 जनवरी की सुबह को ‘K’ स्थान पर खींच दिया था, यह सब हालत उसी मुकाम की हैं। तुमने जो कुछ हाल लिखा है, यह सब लय-अवस्था की उन्नति बता रहे हैं। मुझे खुशी है कि तुम्हें आगे बढ़ने की फिक्र रहती है और इस सब उन्नति की तुम्हीं ज़िम्मेदार हो। कहने के लिये मेरी वजह से कहा जा सकता है यह वाक़ई तुम्हारी जाती काब्लियत है कि तुम्हारा पाँव आगे ही को जाता है और हिम्मत बढ़ती जाती है। अगर मेरी काब्लियत होती तो अब तक सब भाई लोग तरक्की के ऊंचे शिखर पर पहुँच चुके होते। मैं थोड़ी सी एड़ ज़रूर आगे पहुँचाने में लगा देता हूँ। अगर इसको मेरी काल्लियत कहा जाये, तो ठीक नहीं होगा, इसलिये कि तुम्हारी काब्लियत मुझे आगे ले जाने के लिये मजबूर कर देती है। अगर तुम यह कहो कि यह भी आपकी काब्लियत है कि आप ऊपर पहुँचा तो देते हैं, तो यह भी ठीक इसलिये नहीं हो सकता कि मैं तो अपना रहा ही नहीं अब तो जो है, वह, तुमको आगे बढ़ाता है।

तुमने यह अक्सर लिखा है कि “शरीर पिघल-पिघल कर बहता है”। एक बात लिखता हूँ, जो मुमकिन है, इसके जवाब को भी काफ़ी हो। वह यह है कि जब हम तबियत से और प्रेम से अभ्यास करते हैं तो पिछले विचारों का जो असर है, वह सब दूर होता जाता है और परमाणु भी पुराने गिरते जाते है और अच्छे परमाणु उसकी जगह पर बनते जाते हैं। परमाणु तो वैसे हर देहधारी के उसके विचार के अनुसार तबदील होते रहते हैं और जो ईश्वर की तरफ प्रेम-पूर्वक बढ़ता है, उसके उसी तरीके में परमाणु बनते हैं।

असल प्रेम वही है कि प्रेम करते-करते प्रेम की खबर न रहे। जब यह हालत पैदा हो जाती है तो फिर असल में भिदाव शुरू हो जाता है और तबियत नम्र बनती चली जाती है। इसी हालत में या इससे और आगे बढ़कर भक्तों ने कहा है किः-

“बिना भक्ति तारो, तब तारिबो तिहारो है।“

तुमने एक जगह यह भी लिखा है कि “सब कुछ ‘मालिक’ की सेविका से उत्पन्न होता है और प्रलय होता है।“ इसके मानी यह हैं कि तुम्हारा क़दम ऐसे मैदान में है, जहाँ से यह चीजें शुरू होती हैं। मैंने किसी समय लिखा था कि तुम्हारी हालत हिरण्य गर्भ की है या यह लिखा है कि आने वाली है, ठीक याद नहीं। अब अन्दाज़ यह होता है कि वह हालत शुरू हो गई, मगर अभी पूरी तौर पर मालूम नहीं होती या यूं कहना चाहिये कि एक क़दम ज़रूर हिरण्य गर्भ की हालत में है। या तो यह हो सकता है कि मैं इस हालत में तुमको लय कर दूं, या यह कि ‘K’ से आगे ‘L’ मुकाम पर ले लूं, यह तुम्हारी हालत गौर से देखने के बाद तय करना है। इन दोनों बातों को अभी सोचा नहीं है। मुमकिन है कि मैं Point ‘L’ (पाईट-एल) ही लूं। वह कब? जब मौजूदा मुकाम की मैं सैर ख़त्म देखूं। सैर मैं जल्दी-जल्दी ज़रूर करा रहा हूँ।

गुरु-सन्देश को सही करते वक्त यह ख़्याल ज़रूर रखना कि कोई गलती न रह जावे। मेरा काम जल्दी की वजह से खराब होता है और तबियत से ‘जल्दी’ नहीं जाती। सही होने के बाद एक कॉपी श्यामपती जी को भिजवा देना। अम्मा को प्रणाम।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-278
शाहजहाँपुर
22/2/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे 8 व 14 फरवरी के खत मिल गये। जवाब देना इन बारीक हालतों का बड़ा मुश्किल है। बस सिवाय इसके और क्या लिखा जाय कि तुम्हारी हालत काबिल शुक्र है। प्रसाद चढ़ाना कुछ लाज़िमी बात नहीं है और कोई चढ़ाना ही चाहे तो कुछ हर्ज़ भी नहीं। बात तो यह है कि सच्चे जिज्ञासु नहीं मिलते वरना मज़ा आ गया होता और लोग रगड़-रगड़ कर ऐसी हालत भी पैदा करना नहीं चाहते कि कुछ न कुछ बन कर ही रहें। हमें तो ऐसा लगता है कि बहुत सी बातें हमारे साथ ही जायेंगी। फिर भी बहुत कुछ ठूंस-ठाँस करता रहता हूँ। जब आदमी में कोई हालत पैदा होती है, एहसास होता है तब उसको दूसरों का काम बनाने के लिये इस्तेमाल कर सकता है। इस क़दर हालतें मेरे एहसास में हैं और इतने points ( पाइंट्स) मेरे ख़्याल में हैं और आगे Research (शोध) भी होती जाती है। उसमें से एक-आध point (पाइंट) भी लेने की कोई शक्ति नहीं रखता और तबियत यह चाहती रहती है कि हर आदमी हर point (पाइंट) का मज़ा चखे। दूसरे मानों में मैं इतना बेक़रार रहता हूँ आला से आला ब्रह्म-विद्या देने के लिये कि इसका अगर थोड़ा सा भी हिस्सा अभ्यासी अपने ज़िम्मे ले ले तो जाने क्या से क्या हो जावे। ‘लालाजी’ ने भी मुझसे कहा है कि “इस हद तक सीखने वाला मुश्किल से मिलेगा।“ मगर ख़ैर, जितना भी जैसा मिल जाय। लोग कहते हैं कि एहसास नहीं होता, उनसे कोई यह तो पूछे कि तुमने कभी एहसास करने की कोशिश भी की, जो हालत पैदा हुई, उसमें कभी घुसे भी? अगर वह यह कहें कि इतना मादा नहीं, जो एहसास कर सके, तो वह बिल्कुल गलत है। मादा हर एक में है और ब्रह्मविद्या में अक्ल खुलने लगती है, मगर जब उस ताकत को कोई दूसरी तरफ लगा दे तो फिर क्या किया जाये। देखने में तो ऐसा आता है कि सोचने और अनुभव करने की जो सामर्थ्य पैदा होती है, उसे लोग दुनिया की तरफ़ लगा देते हैं। नतीजा यह होता है कि जिस चीज से वैराग्य पैदा होना चाहिये, उसमें और राग पैदा हो जाता है। यह नुक्स अभी लिखाते- लिखाते मेरी समझ में आया और यह ठीक है। वाकई महात्माओं की यह राय ठीक थी कि जब जिज्ञासु अपने में वैराग्य पैदा कर लेता था तब असल जौहर उसको दिया जाता था। लोग कुछ दिल से छोड़ना नहीं चाहते और कहने सुनने में आकर सिर्फ़ मेरे यहाँ सीखना शुरू कर देते हैं। मैं भी यह समझ लेता हूँ कि भाई फायदा कुछ न कुछ जरूर हो जायेगा और अपने लिए उन पर मेहनत करना भी फर्ज समझ लेता हूँ, और मेरे लिये हुक्म भी ऐसा ही है।

वैराग्य अभ्यासियों में खुद व खुद पैदा हो गया होता और बड़ी आसानी से, अगर वह अपनी तवज्जोह की डोर ईश्वर की ओर पूरी तौर से लगा देते। मैं यह ज़रूर करता हूँ कि मन का रुख़ ईश्वर की तरफ़ कर देता हूँ ताकि वह उस तरफ़ लगा रहे और वह लग भी जाता है। लोग क्या करते हैं कि उसको दुनियाँदारी की तरफ़ घसीटते हैं और यह हो नहीं सकता; इतना मुझको गुरु महाराज की कृपा से Confidence (विश्वास) है कि जिस मन को ऊपर की तरफ़ लगा दिया फिर वह नीचे की तरफ नहीं उतर सकता। नतीज़ा मुमकिन है यह होता हो कि उन लोगों को जो दुनियाँ के मामले में ज्यादा दौड़ लगाते हैं परेशानी का एहसास ज्यादा होता हो। इसलिये कि मन ऊपर रहना चाहता है और उसको वह नीचे घसीटते हैं। Swami Vivekanand Ji (स्वामी विवेकानन्द जी) :-

“This is the most original letter, what you have written is entirely correct. People should have mind to think of it. I think vairagya should come first and that must be the duty of the taught."

स्वामी विवेकानन्द जी :-

“यह अत्यधिक विशिष्ट पत्र है जो कुछ तुमने लिखा है बिल्कुल ठीक है। मनुष्यों को इस पर विचार करना चाहिए। मैं सोचता हूँ कि ‘वैराग्य’ की स्थिति पहले आनी चाहिए। वास्तव में यह प्राप्त करना अभ्यासी का कर्तव्य है।“

मैं Negation (न होने का भाव) की हालत का इस क़दर दिल-दादा (चाहने वाला) हूँ कि इसकी ख़ूबी और बड़ाई मैं सिवाय इसके और क्या लिखूं कि ‘नहीं’ को हैं मान लिया है। इसका मजा चखने वाला अभी तक जहाँ तक मेरी निगाह जाती है कोई मालूम नहीं होता। अगर मैं कहूँ तो लोग न मानेंगे, इसलिये कि जब मैं अपने आप को खुद ही नहीं जानता, तो दूसरा क्या जान सकेगा। मगर खैर, यह कहता हूँ कि इस हालत का मजा चखाना सिर्फ हमारे ‘लालाजी’ ही का काम था। इससे पहले कोई ऐसी हस्ती मालूम नहीं होती कि जिसमें यह मलका हो। समझने के लिये कहो, तो मैं कह दूं, मगर छोटे मुंह बड़ी बात होगी। पिछले लोगों को जाने देता हूँ, हाल में कबीर ही हुये, इसका मज़ा उन्होंने भी नहीं चखा, सिद्धि-शक्तियाँ हों यह हम मानेंगे और यह भी ठीक है कि वह अपने वक्त में एक थे। इस हालत का मजा चखने के लिये चाहता हूँ कि लोग बनें, मगर लोग शुरू से कहना शुरू कर देते हैं कि बाबूजी ख़्याल बहुत आते हैं और जब हम अकेले बैठते हैं तो तबियत नहीं लगती। अब उनसे कोई पूछे तो सही कि यह ख़ता किसकी है। अभी तो आप उन्हीं की ख़ता देंगी और अगर कहीं System (पद्धति) में जहर बाकी रह गया तो मेरी ख़ता होगी और मैं भाई क्या करूँ उनका जहर वैसे भी मैं खींचता रहता हूँ ताकि ख़्याल ज्यादा परेशान न करें, परन्तु भाई, उन लोगों का मैं क्या करूँ और ख़्याल का ज़हर मैं कैसे खींच पाऊं, जिनकी मुझे याद नहीं आती। इस ख़ता को जरूर मैं अपनी खता कहूंगा, इसलिये कि जब वह मेरे सत्संग में हैं तो बहुत कुछ यह मेरा फर्ज़ है।

तुम्हारी will (इच्छा शक्ति) ईश्वर की कृपा से बहुत Strong (सुदृढ़) है। ऐसी कि लड़कों में नहीं होती। अगर जरूरत समझी तो अपने काम के खातिर और बढ़ाऊंगा। तो तुम्हारी तरक्की के साथ वह Automatic (अपने आप) बढ़ रही है। Point ‘L’ (पाइंट - एल) की हालत में बढ़ाऊंगा और जब तुम्हें पूरी तरीके से एहसास हो जायेगा तो आगे बढ़ा दूंगा। तुम जल्दी एहसास करती चलो और मैं जल्दी-जल्दी बढ़ाता चलूं। मुझे अब तुम्हें जल्दी आगे न बढ़ाने में बेचैनी मालूम होती है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-280
शाहजहाँपुर
24/2/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा 22 फरवरी सन् 53 का पत्र मिल गया। पहले मैं पत्र के उस भाग का उत्तर देना चाहता हूँ जिसका उत्तर देते हुए मुझे हर्ष होता है। तुमने लिखा है कि ऐसा लगता है कि नम्रता ही मेरी दशा या रूप हो गया है और ऐसा लगता है कि इसी में मैं भिदती चली जा रही हूँ। ईश्वर इसमें तरक्की दे। यह मेरी खुश किस्मती है कि एक हाल ऐसा मिला कि जिससे मेरे दिल को तकवियत हुई। यह वह हालत है कि जिसका कमाल Negation (न होने का भाव) की शुरूआत है। मगर Negation (निगेशन) अभी बहुत दूर है। यह चीज़ खुशखबरी ज़रूर दे रही है कि अपने कमाल पर पहुँच कर कुछ झलक Negation (निगेशन) को जरूर मिलेगी। मगर इसके कमाल की भी इन्तिहा नहीं। रास्ता चलकर अगर कोई ठीक जा रहा है तो यह जरूर है कि ईश्वर वह दिन भी दिखा देगा। अगर यह चीज मुझे अपनी जिन्दगी में देखने को मिल गई किसी में, तो मैं नहीं कह सकता कि मेरी तबियत ऐसे अभ्यासी को न मालूम किस ठिकाने पर पहुँचा दे और सच तो यह है कि Negation (न होने का भाव) भी अगर नसीब हो गया तो भी अभी इतना बढ़ाना रह जाता है कि लाखों वर्ष भी कम हैं। और फिर भी भाई, न जाने क्या-क्या है, कहाँ तक लिखूं। मैं तो समझता हूँ कि यह मेरा कहना धुरंधर महात्मा समझेंगे कि कुछ नहीं है, तब तो न होनी को होनी बतला रहा है और यह सही भी है। अगर मैं होता तो न होने का ख़्याल पैदा न होता, इसलिये कि न होने की याद इस कहने से ताज़ा करता हूँ। बात यही है कि न होते हुए न होने का ख़्याल, न आवे और यह हालत Negation (निगेशन) के कमाल की है। जब इस हालत पर अभ्यासी जाय तो सच पूछो मुझे आनन्द इसके बाद की तालीम में इतना आवेगा कि मेरे पास वह शब्द नहीं है कि मैं बयान कर सकूं और आनंद क्या बस यही आनंद कि एक व्यक्ति ऐसा मिला तो कि गुरु महाराज की रखी हुई अमानत बंटाने वाला हुआ।

Swami Vivekanand Jee:-

“रामचन्द्र! लोग कैसे कह देते हैं कि तुम्हें कुछ आता जाता नहीं। I would have torn to pieces all my writings. So far, I have written before these two sentences. A doctor really you are. Nobody can doubt. Such a high thought nobody can guess even, but you are depicting before the dumb millions, I got a man, I require. My whole life of penance is over now. He is the Master, a big Master. Go on writing. The time will come when people will understand these things, but publication must be made after you and whoever comes forward for the publication of these writings, his liberation is sealed. Think him to be liberated. That is the reward rarely found. I give him.”

स्वामी विवेकानन्द जी:-

"रामचन्द्र! लोग कैसे कह देते हैं कि तुम्हें कुछ आता नहीं। तुम्हारे इन दो वाक्यों के सामने मैं अपनी समस्त पुस्तकें फाड़ कर फेंक सकता हूँ। तुम निश्चय ही ‘दर्शन’ के विशेषज्ञ हो। किसी को इसमें सन्देह नहीं। इतने उच्च विचार आज तक कोई सोच भी नहीं सकता परन्तु तुम इन्हें इन लाखों गूंगे-प्रायः मनुष्यों के सामने रख रहे हो; मैंने ऐसा व्यक्ति पा लिया है जिसकी मुझे इच्छा थी। मेरे जीवन की समस्त तपस्या अब पूर्ण हो गई है। ‘वह’ मास्टर है, एक महान् मास्टर। लिखते रहो। समय आयेगा जब लोग तुम्हारे लेखन को समझेंगे परन्तु इसकी छपाई तुम्हारे बाद ही होनी चाहिए। जो भी व्यक्ति इरा कार्य के लिए आगे आयेगा, उसको मुक्त हुआ समझो। इस प्रकार का इनाम कभी ही प्राप्त होता है। मैं उसे दूंगा।“

मैं यही कहूँगा कि उनके पास समझ नहीं जो इसको समझे। हाँ यह जरूर है कि तफ़सीर कोई करके दिखा दे। यह मैं उन लोगों से कहता हूँ जो इसके Writings (लिखी हुई पुस्तकों पर) एतराज़ करते हैं या defects (बुराइयाँ) समझते हैं। ज़माना चाहिये इसके समझने के लिये। तुमने जो वैराग्य के बारे में लिखा है, वह सही है। अगर ईश्वर की तरफ़ इन्सान पूरी तौर से लग जाता है तो फिर वैराग्य ही वैराग्य है और कहीं किसी रूढ़ी सूरत पर कोई लग गया तो दुनियाँ से नहीं बल्कि अपने से भी वैराग्य हो जा है। Consciousness of Body (शरीर का भान) तो जाती ही रहती है और यह इसका एक अदना करिश्मा है। Consciousness of Soul (आत्मा का मान) भी जाने का नम्बर आ जाता है। फिर क्या है, मुर्दा के नहलाने वाला जिधर चाहे उसे फेर दे। हालतें आगे ऐसी आती हैं कि उसको शब्द ज़ाहिर नहीं कर सकते, मगर फिर भी तुम बहुत कुछ Express (अभिव्यक्त) कर लेती हो सोलहों आने भर ‘मालिक’ को हासिल कर लेना इतनी मुश्किल चीज़ नहीं है जैसी कि दिखलाई देती है। मगर भाई सत्रह आने भर जैसा कि तुमने लिखा है, मैं न कर सका, मुमकिन है कि तुम कर ले जाओ।

सीता ने एक तोता पाला और वह उससे बहुत मोहब्बत करती थी और राजा जनक सीता से मोहब्बत करते थे। नतीजा क्या हुआ कि राजा जनक तोते से मोहब्बत करने लगे। तोता दुखी होता था तो सीता को दुख होता था और जब सीता को दुःख होता था, तो राजा जनक को भी दुःख होता था। अब तुम बताओ कि इतना बड़ा ऋषि दूसरे मानों में तोते से लगाव रखता था। हमसे अगर पूछो तो हम यही कहेंगे कि वह इन्सान ही नहीं, जो दूसरे के दुःख-दर्द को देख कर दुःखी न हो। महात्माओं को भाई जाने दो। उसमें तो ऐसे अव्वल दर्जे के वैरागी मिलते हैं कि कहते हैं कि माँ-बाप, पुत्र-परिवार, सब शत्रु के समान हैं। तो भाई, मुझे तो कोई ऐसी महात्मागीरी दे तो सौ बार ‘लाहौल’ पढ़ने के लिये तैयार हूँ। अब उन महात्माओं की तालीम पर गौर करो कि कितने बड़े राग की तालीम देते हैं, जिसका नतीजा सिवाय तबाही के और Moral-Stamina (नैतिक आन्तरिक बल) खराब कर देने के और कुछ नहीं होता। हम शत्रु समझने की आदत डाल रहे हैं। हम जब यह आदत डाल रहे हैं तो मुमकिन है हमारे ख़्यालात खुद ऐसे औज़ार बन जायें कि हमारे ख़ून से अपने आपको रंग लें। ख़ैर, अब इसको ज़्यादा बढ़ाऊंगा नहीं - मतलब पर आता हूँ।

बच्चों ने एक कुत्ता पाला और वे उससे मोहब्बत करते थे। मुझे भी उसका लिहाज़ हो गया और वह 27 जनवरी को गुज़र भी गया। उसकी ज़िन्दगी में एक ऐसा वाक्या गुजरा कि उसकी किस्मत से स्वामी नारदानन्द, शाहजहाँपुर आये। उन्होंने लेक्चर दिये और लोगों को अच्छी-अच्छी बातें समझाई। मेरे घर के क़रीब जलसा था और माइक्रोफोन लगा हुआ था और कुछ आवाज़ भी उनके लेक्चर की आ रही थी। उनके सामने Public (जनता) थी और मेरे सामने वह कुत्ता। सोचा कि भाई वह इतनी Public (जनता) को होशियार किये जा रहे हैं, यानी वह हक़ महन्तगीरी जो इन्सान ही तक मुहीत समझा जाता है, अदाकर रहे थे। चूंकि वह इन्सान हैं, उनको हमदर्दी इन्सान से होना चाहिये और भाई यह तो अपने यहाँ कहा ही गया है कि जो इन्सान ईश्वर की इबादत नहीं करता वह जानवर के समान है, तो भाई इस लिहाज़ से तो मैं भी जानवर की तारीफ़ में आता हूँ, इसलिये कि मुझसे ‘उसकी’ इबादत नहीं होती। जब इन्सान अपने हमजिन्स के फायदे के लिये खड़ा होता है तो मेरी भी तबियत चाही कि मैं अपने हमजिन्स को फायदा पहुँचाऊं। स्वामी जी जब अपने फर्ज़ से नहीं चूकते, तो मैं अपने फर्ज़ से क्यों चुन्कुं। एक महात्मा के आने पर मुझे इतना फर्ज़ तो सीखना ही चाहिये था। चुनांचे मैंने भी अपने हमजिन्स को फायदा पहुँचाया और फ़ायदा क्या पहुँचा? जो एक जानवर को जानवर से पहुँचता है। जानवर में Intellect (बुद्धि) नहीं होती और भाई Intellect (बुद्धि) मुझमें भी अब नहीं रही। लिहाज़ा इन मानों में मुझमें और कुत्ते में कोई फर्क नहीं। चुनाचे उसको Beyond Intellect (बुद्धि से परे) फ़ायदा पहुँच ही गया।

Swami Vivekanand Jee:-

"Is it the writing of a common man? It is full of Philosophy".

स्वामी विवेकानन्द जी -

“क्या यह एक साधारण व्यक्ति का लेखन है? यह दर्शन से भरपूर है।“

अब चूंकि मास्टर साहब को मैंने यह लिखा था कि वह Brighter World की तरफ जा रहा है और अपने संस्कार के गिलाफ़ उतार रहा है। लिहाजा उसके नतीजे को भी इत्तला देना वाजिब था, चुनांचे कल तारीख 26.3.53 को 8.40 PM, पर वह Brighter World में पहुंच गया और उसने जो संस्कारों का गिलाफ उतारा, उन संस्कारों ने मेरी तरफ रुख कर दिया, कुछ झलक आ गई और भाई मैं भूल गया कि ‘लालाजी’ ने फौरन संस्कार जला देने का हुक्म दिया। अब जो दो-एक आ गये सो आ गये मजबूरी है, वह मेरे दिल पर जमा है और उसमें फिक्र की जरूरत ही क्या। फायदा तो उसे हो गया। अब चूंकि मैंने ‘लालाजी’ साहब से इसके लिये पूछा नहीं था। आगे वाला टुकड़ा मैं यह लिखना चाहता था कि मेरी जुर्रत फिर कब पड़ सकती है कि मैं ‘लाला जी’ से प्रार्थना करूँ कि इसको साफ कर दीजिये। इतने में एक मिनट के लिये ‘लालाजी’ साहब ने मुझे बुला लिया- अब कहो कि मोहब्बत ‘लालाजी’ करते हैं या मैं उनकी।

तुम्हारे ख़त में बहुत सी बातें जवाब देने लायक थीं- मैंने मुख्तसर लिख दी। 26.2.53 को मैंने तुम्हें ‘M’ (एम) के मुकाम पर खींच दिया।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-282
शाहजहाँपुर
2/3/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत 27 फरवरी सन् 53 का मिल गया। तुम्हारी Will (इच्छा शक्ति) बहुत Strong (प्रबल) है, मैं लिख चुका हूँ, मगर फिर भी शायद एक हफ्ता कम या ज़्यादा गुज़रा होगा, मैंने कोई 5 या 6 सेकण्ड Will (इच्छा शक्ति) बढ़ने की तवज्जोह दी थी। मैंने तुम्हें बतलाया भी था और तुम्हारे पास नोट भी है कि Efficacy of Rajyog (राजयोग का दिव्य दर्शन) में जो पहले Diagram (चित्र) में दिल का Lower Region (निचला भाग) जाहिर किया है, उसमें तवज्जोह देने से Will (इच्छा शक्ति) बढ़ जाती है, मगर बहुत थोड़ी देर तवज्जोह देना चाहिये, कुछ Seconds (सेकेन्ड्स) काफी होंगे। यह चीज़ मैंने Efficacy of Rajyog में ज़ाहिर नहीं की, इसलिये कि लोग उस पर Meditation (ध्यान) करके Hypnotic Power (सम्मोहन शक्ति) न बढ़ा लें जो आध्यात्मिक-विद्या के बहुत कुछ खिलाफ है और उल्टी चीज़ है। मुझे बड़ी खुशी हुई तुम्हें Worldly Feeling (दुनियाबी एहसासों) से छुटकारा मिल गया और इच्छायें ख़त्म हो गईं। यह बड़ी अच्छी हालत है कि जितना ज़रूरत हो उतना ही होश रहे। मगर तुमने गौर नहीं किया कि बेखबरी रहते-रहते, बेखबरी में बाखबरी शुरू हो जाती है और यह हालत बेहोशी से कहीं अच्छी है। आगे चलकर इसका बोझ भी नहीं रहता।

तुमने यह जो लिखा है कि “वृत्तियों का कुछ पता भी नहीं रह गया” यह ठीक है। मगर भाई जब ईश्वर कहीं किसी की Negation (न होने का भाव) की हालत पैदा कर दे, फिर तो यह भी नहीं रहता। शब्द नहीं कि इसका वर्णन कर सकूँ। न फिर मिठास रहती है और न तुर्शी, समझने के लिए Vacuumise (खाली) कह लो कि इन्सान Vacuumise (खाली) हो जाता है। मगर Scientists (वैज्ञानिक) यह बता रहें हैं कि पूरी तौर से जब हवा आले के ज़रिये से निकाली जाती है तो फिर भी हवा कुछ बाकी रह जाती है। मेरा कहना यह है कि अगर कहीं कोई आला ऐसा ईजाद हो जाये कि किसी कमरे या गोले में से हवा अगर बिल्कुल कहीं निकाल ली जाये तो वह जान ही जान रह जायेगा और इतना बड़ा Destructive Weapon (विनाशकारी हथियार) बन सकता है कि उससे ज़्यादा Destructive Weapon (डिस्ट्रक्टिव हथियार) आज तक ईजाद ही नहीं हुआ। अब हमें इन्सान को ऐसा Vacuum (खाली) बनाना है। अगर कहीं ऐसा बन गया तो वह एक Gigantic Battery (विशाल बैटरी) हो जाता है और जिस तरफ़ Will (इच्छा-शक्ति) बन जाती है, ताकत उसी तरफ काम करने लगती है। मगर भाई, ईश्वर बड़ा होशियार है। ऐसे आदमी की इस हद तक Will (इच्छा-शक्ति) बंधने ही नहीं देता। अगर कहीं Accidentally (अकस्मात्) बंध जाये तो ऐसी हज़ारों दुनियाँ एक Second में छिन्न-भिन्न कर सकता है। यह तो Negation (निगेशन) का हाल मैंने बताया है, मगर Negation रहते हुए भी उसको अगर भूल जाये, यानी उसका एहसास न रहे, तब तो मैं यहीं कहूँगा कि उसमें एक छिन में Spiritual Giant (आध्यात्मिक-हस्ती) बनाने की ताकत पैदा होती है और भाई कहीं, ईश्वर इससे आगे चलने वाला अभ्यासी पैदा कर दे। अफ़सोस है कि मैं यह चीजें किसको दिखाऊं मुझे इस हद तक कोई हिम्मत नहीं दिलाता। ईश्वर करे अगर इससे ज्यादा न सही तो इतनी ही चीज़ मुझसे ले, ताकि मैं बहुत न सही, गुरु-ऋण कुछ थोड़ा ही उतार सकूँ। वाकया यह है कि मैं हाथ मल के रह जाता हूँ और फिकर यह है कि कहीं यह चीज़ मेरे साथ ही न चली जाये। इससे ज़्यादा न सही, कम से कम इतनी ही चीज पैदा कर लें, ताकि दूसरों को इसी हद तक ले आवें। मैं तो इस चीज़ के देने के लिये यहाँ तक Over Flooded (सीमा से अधिक उत्सहित) रहता हूँ कि कोई मुझसे अपने घर का कुल काम जो नौकर करते हैं ले ले और इसी के एवज में मुझसे यह चीजें ले ले। मगर भाई एक मज़मून के तरीके से यह चीजें कह जाता हूँ मुमकिन है इसीलिये दूसरों पर इसका कुछ असर न रहता हो।

जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है, कि अगर ईश्वर इससे आगे चलने वाला पैदा कर दे, तब तो मैं अपनी किस्मत की सराहना करूँ और ऐसी उजड़ी हुई बस्ती की सैर कराऊं जहाँ जनून की भी गुज़र नहीं। मगर भाई क्या करूँ, इन्तिहा मुझको कहीं ‘मालूम नहीं पड़ती।’ इससे आगे कोई मुझसे सीख जाये और मैं सिखाये जाऊं। भाई, Negation (निगेशन) भी हमारा Goal (लक्ष्य) नहीं है। हमारा जो Goal (लक्ष्य) है, वहाँ के लिये हम इतना ही कह सकते हैं कि सिर्फ भूमा की ही गुज़र है, यानी यहाँ पर जात ही जात है। लोग Liberation (मुक्ति) के पीछे पड़ते हैं और अच्छा है कि इससे वाकई छुटकारा आवागमन से मिल जाता है और लोग इसी को Preach (उपदेश देना) करते रहे। ज़रा कोई निगाह उठा कर तो देखे तो पता चलेगा कि Liberation (मुक्ति) महज़ उसका तलछट है। कभी कुछ Hint (इशारा) मेरी जुबान से उस हालत का निकल भी गया, इत्तिफाक से किसी Polished Spiritual (बनावटी) के सामने, तो नतीजा यही हुआ कि उसने मुझे नावाकिफ ही समझा। यही वजह होगी कि ऐसे राज बतलाये नहीं जाते और मैं तो भाई बतला देता हूँ, उनकी राय मेरे बारे में बहुत कुछ सही है। अगर मुझमें वाकफियत ही होती तो मुमकिन था कि इस हालत तक न पहुँच सकता, क्योंकि यहाँ पर नावाकिफ़ों की ही गुज़र। ज़रा सोचो तो सही, मुमकिन है यह कुफ्र हो कि यह लफ़्ज़ क्या ईश्वर की असल तारीफ़ में नहीं आता। लोग इसको सोचने ही क्यों लगे। उनके ख़्याल में क्षीर-सागर और विष्णु भगवान और लक्ष्मी घूम रही हैं। हालांकि वह यह नहीं समझे कि यह चीज़ कैसे आ गई। भाई, यह सब दिल की हालतें हैं और इसी में विष्णु भगवान बेचारे मजबूरन रहते हैं। उनको कोई ऐसा नहीं मिलता कि उनको इस हालत से निकाले। बंधन की चीज़ का ख़्याल करने से भी बंधन में एक कड़ी लगा देता है। मजमून तूल ज़रूर हो जायेगा वरना यह चीज़ इस वक्त, निगाह में आ गई।

मुख्तरान कहे देता हूँ:-

दिल हमारा क्षीर-सागर है। मगर उसमें वासना का साँप मौजूद है, जो हमारे असल को फन से छुपाये हुए है। लक्ष्मी भी मौजूद है, गोया यह दूसरी कड़ी है, और हमको निजात इसलिये नहीं मिलती कि एक तरफ हममें केंचली-वृत्ति भी मौजूद है। पाँव दबाना विष्णु भगवान के माने यह रखता है कि वह असर जिस पर साँप का फन है, उसकी दासी बाकई यह कंचन है। अब उसमें जो लहरें या तरंगे हैं, जो समुद्र में पैदा होती हैं, हम अगर उनको दूर कर दें तो सतह बराबर हो जायेगी। फिर हमको मौका मिलेगा कि इन बंदिशों को काट सकें क्योंकि हममें ताकत भी आ जावेगी। असलियत जो दिल में छिपी हुई है, इसी को Mythologically (पौराणिक) विष्णु करार दे दिया है। हम जब वासनाओं का साँप दूर कर देते हैं, तो विष्णु भगवान के दर्शन प्राप्त होते हैं। यानी हममें भी यह ताकत आ जाती है कि हम दूसरे की रूहानी परवरिश कर सकें। अब चूंकि विष्णु का काम पालन-पोषण है, लिहाजा उसके लिए लक्ष्मी या कंचन की भी ज़रूरत है। अब विष्णु भगवान की Strength (शक्ति) भी आप पर रौशन हो गई कि बेचारे पालन-पोषण में दुःखी हैं। मैंने बहुत संक्षेप में लिखा है, क्योंकि दिमाग ज्यादा काम नहीं देता। कभी जुबानी समझ लेना यदि चाहो। जो शख्स विष्णु भगवान की पूजा करना चाहते हैं, वह अपने दिल की तरफ रूजू हों, बस यही उनकी पूजा होगी। जब उस चीज़ को तय कर लिया, तो और चीज़ शुरू होने लगती है।

तुम्हारे खतों को देखकर मेरी यही तबियत चाहती है कि मैं लिखता ही रहूँ। तुम्हारे हाल और कैफियत का तो मैं जवाब दे चुका, मगर इन्तहाई हालत के पहुंचे हुए की मैं तारीफ़ भी कर दूं ताकि पढ़ने वालों को सम्भव है ख़्याल की रंग में हरकत पैदा हो जाये और इस हद तक पहुँचने की कोशिश करें। वैसे तो सब ईश्वर ही के हाथ में है कि ‘वह’ जिसे चाहे अपनी तरफ खींच ले और जो चाहे वह उसे दे दे। मगर कोशिश करना हमारा फर्ज जरूर है ताकि ‘उसको’ भी खबर हो जाये कि कोई बंदा ‘उस’ तक पहुँचना चाहता है। Negation (निगेशन) की मैंने इन्तिहा बतला दी। जब इन्सान इन्तिहा की भी इन्तिहा को पहुँच जाता है, चलना फिर भी बाकी रहता है। जो शख्स इन्तिहा की इन्तिहा को पहुँच गया और हर परमाणु जिस्म का इन्तिहाई ताकत पर आ गया। हर Joint (जोड़) और हर गुत्थी ने इन्तिहाई कमाल को हासिल कर लिया। फिर क्या होता है? कुदरत का ख़ास औज़ार तो वह बन ही जाता है (गो यह बात ईश्वर के हाथ में है कि वह ऐसा आदमी बना दे) उसको सब कुछ अख्तयारात होते हुए भी उसे बेखबरी ही रहती है। मगर ईश्वरीय काम के लिये जो चीज ज़रूरी है, उससे बेखबर नहीं रहता। यह और बात है कि अपनी इन्तहाई हालत का बोध सिवाय खास सूरत में उसके अन्दाज़ में आवे। उसके हाथ में कुल Universe (विश्व) का इन्तजाम होता है और सब ईश्वरीय ताकतें उसके मातहत होती हैं जैसा कि मौजूदा Personality (दैवी व्यक्तित्व) का हाल है जो कोई भी हो। Efficacy of Rajyog (राजयोग का दिव्य दर्शन) में मैंने जिकर कर दिया है कि ऐसी Personality (दैवी व्यक्तित्व) मौजूद है। अवतारों को सिर्फ़ Destructive Programme (विनाश करने का कार्यक्रम) दिया जाता है, जैसा कि पुरानी किताबों से भी पता चलता है। Constructive Programme (रचनात्मक कार्यक्रम) उनके हाथ में नहीं होता। अब मौजूदा Personality (दैवी व्यक्तित्व) जो है, उसके हाथ में यह दोनों Programme (कार्यक्रम) है और वह अपनी मदद के लिये आदमी भी बना लेता है। अवतार के हाथ में तलवार भी होती है और उसके (Personality) हाथ में तलवार नहीं होती, बल्कि Circumstances (स्थितियाँ) ऐसी पैदा कर देता है कि नतीजा यही हो। अगर मौजूदा Personality (दैवी व्यक्तित्व) यह ज़रूरत समझे कि खून बहाने वाले अवतार की भी ज़रूरत है तो यह उसके बिल्कुल हाथ में है कि वह आयंदा अवतार आने का इन्तजाम कर जाये, अर्थात् उसके हाथ में है कि वह उसका इन्तज़ाम अभी से कर दे, यानी अपनी ज़िन्दगी में। अब सोचो तो सही लोग इस ज़माने में कुंडलिनी जगाने की फिक्र में ज़्यादा रहते हैं, मगर इस चीज पर निगाह किसी की नहीं जाती। बकौल 'कबीर' के “सब जग अन्धा, मैं किसे समझाऊं”। अवतार बुलाने की मैं तरकीब भी लिखे देता हूँ। बहुत छोटी सी है, इसलिये कि लोगों को यह तरकीब भी मालूम हो जाये।

हमारे यहाँ अवतार पर लोग अभ्यास से दिलचस्पी नहीं रखते। मुमकिन है कि इस करिश्में में ही दिलचस्पी पैदा हो जाये और वह हर रोज़ एक अवतार बुला लिया करें, क्योंकि तरकीब बहुत मामूली है, मगर अपनी ताकत और Will (इच्छा शक्ति) की मातहत जरूर है। तरकीब बस यह है कि ऐसी Personality (दैवी व्यक्तित्व) जब मुनासिब समझती है कि अवतार आना लाज़मी मालूम होता है तो वह यह करेगी कि ‘भूमा’ के करीब, Circle (सर्किल) जो कि उसको मुहीत किये हैं और जहाँ से कि Power (शक्ति) पहले मरतवे नीचे को उतरी, वहाँ पर वह ऐसा Vacuum (ख़ालीपन) पैदा कर देगा कि जो Time (मरतवे) मुकर्रर किया है, उस Time (समय) के अन्दर उसका नीचे उतरना शुरू हो जायेगा। आते-आते जिस वक्त वह महामाया के दायरे में आवेगा एकदम से उसमें उस मुकाम की ताकत जितनी जरूरत है, भर जावेगी। मगर उसका दायरा कायम रहेगा, उस वक्त तक, जब तक कि महामाया का मुकाम वह छोड़ न दे। अब जब महामाया का मुकाम छोड़ दिया, गोया उसका आना शुरू हो गया। नीचे उतर कर उसमें Godly Mind (ईश्वर-मन) का भी असर भरपूर हो गया, इसलिए कि ऐसा Vacuum (ख़ालीपन) जिसकी जरूरत थी ‘धुर’ पर बनाया। अब उसको छोड़ के ही पारब्रह्म-मंडल और ब्रह्ममंडल में गुजरता हुआ और ताकत लेता हुआ अब दुनियाँ में अवतीर्ण हो जायेगा और यह सब Vacuum (वैक्यूम) बनाने का असर है। उसको ज़िन्दगी महामाया के मुकाम पर मिलती है और जब वह Vacuum महामाया मुकाम पर पहुँच जाता है तो वही ताकतें उसमें पैदा होती है जिसकी ज़रूरत है। मैं इस चीज़ को बड़ी मुश्किल से Express (अभिव्यक्त) कर पाया हूँ। इससे उम्दा मुझे शब्द नहीं मिले, क्योंकि बेपढ़ा आदमी हूँ। आप लोग भी मुमकिन है इसके Expression (अभिव्यक्ति) के लिये अच्छे लफ़्ज़ ढूंढ सकें। मुमकिन है कि चौबे जी भी इसमें मदद दे सकें, इसलिये कि उन्होंने धार्मिक Literature (साहित्य) बहुत पढ़ा है और मुमकिन है इसका इशारा कहीं उन्हें मिल भी जावे। अगर मिल जाये तो मुझे भी लिखें। हालांकि यह कोई कायदा नहीं कि पिछले महात्मा जो कुछ कह आये हैं, उसके आगे कोई और बता न सके। है वही, जो मैं कहता हूँ। तरकीब मुमकिन है कि इससे बेहतर किसी को और मिल जावे, क्योंकि बड़े-बड़े स्वामी यहाँ पर मौजूद हैं और भाई मैं तो उनके सामने एक नाचीज़ और अदना और गुमशुदा हस्ती हूँ। ख़ैर, इससे ज़्यादा जो जानना चाहे इसके बारे में, तो उसे चाहिये कि वह खुद कोशिश करे। इन्सानी ताक़त और पहुँच का अन्दाजा लगाइये कि ईश्वर ने अवतारों का बुलाना भी इन्सान ही के हाथ में रखा है। सच तो यह है कि जहाँ तक इन्सान की पहुँच है, अवतार की भी नहीं हो सकती। हमें ऐसा इन्सान बनना चाहिये और भाई अगर ऐसी Personality (दैवी व्यक्तित्व) कहीं ईश्वर किसी के सामने खड़ी कर दे तो फिर उस शख्स का कहना ही क्या। अगर मोहब्बत है, तो नहीं मालूम क्या से क्या वह दे देवे। मैं आप लोगों से यही प्रार्थना करूँगा की ऐसी Personality (दैवी व्यक्तित्व) की खोज में रहिये कि अगर कहीं मिल गई तो ‘उसकी’ एक निगाह में कीमियाँ बन सकती है। मुझे तो भाई, फ़िक्र यों नहीं रही, मुझे जैसी शख्सियत की ज़रूरत थी और जैसी तालीम मुझको होना बदी थी, मुझे मिल गई। अब अपनी-अपनी आप जाने।

हज़रत किब्ला (लालाजी साहब):-

"भाई, मैं इस लिये कहे देता हूँ कि यह मौका बार-बार नहीं मिलेगा। चाहिये कि इस वक्त में इन्तिहाई पहुँच अपनी हासिल करो। क्या यह ख़्यालात आपने कहीं और देखे? क्या यह ज़ज्बा आपने कहीं और पाया? भाई बड़ी किस्मत से ऐसा आदमी मिलता है और फिर ऐसे वक्त में अगर ऐसा आदमी मिल जाये और उसकी तालीम नसीब हो तो बड़ी खुशकिस्मती की बात है। मैंने तो कुछ नहीं रखा जो इसको Ramchandra (रामचन्द्र) को दे न दिया हो और अब भी मेरा यही हाल है, जो मिलता है, बराबर दे देता हूँ। तुम लोग भी ऐसी ही कोशिश करो कि मेरा-सा जज्बा ‘इसके’ दिल में पैदा हो जाये और यह सब तुम्हारे हाथ में है। यह बड़ा Important (महत्वपूर्ण) खत है। इसकी दो-एक नकलें Preserve (रखना) करना चाहिये।"

प्रार्थना लाज़मी चीज़ है, जो मैंने उर्दू किताब में दे दी है और यह सोते वक्त ज़रूर हर भाई को करना चाहिए और कहीं इसको दिल से, प्रेम से कर गये तो फिर तरंग का खटका, ईश्वर ने चाहा, न रहेगा। यह भाई अवतार लाने की ताकत, जो मैंने लिखी है, अब तक, जहाँ तक मेरा Vision (दृष्टि) पहुँचता है, जिसकी किस्मत में थी उसी को मिली।

Swami Vivekanand Ji (स्वामी विवेकानन्द जी)

“As far as my inward vision goes and the experience of the Brighter world as well, I have not found Such person since the beginning of the world. Bluffing should be neglected in future. Be plain in your words. Who is that person? Say that you are. Whatever has been written in this letter is correct in toto. This is the common letter for all. It must be copied and published when time comes.”

“जहाँ तक मेरी दृष्टि जाती है यहाँ तक कि दिव्य-लोक में भी तुम्हारे जैसा दिव्य-व्यक्तित्व मैंने कहीं नहीं पाया है, सृष्टि के आरंभ से लेकर अब तक। भविष्य में दूसरों को धोखे में मत रखो। अपने वचनों में सच्चाई रखो। ‘वह’ कौन व्यक्ति है? कहो, कि वह दिव्य-पुरुष तुम हो। इस पत्र में जो कुछ भी तुमने लिखा है, पूर्णतः सत्य है। यह पत्र जन-सामान्य (सभी के) के लिए है। इसको उतार कर (नकल करके) जब समय आये तो छपवाना भी चाहिए।“

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-284
शाहजहाँपुर
6/3/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा पत्र मिला इसका जवाब मैं आगे इसी पत्र में दूंगा। इस समय रात के 10 बज चुके हैं और सिर भी भन्ना रहा है, मगर ख़ैर, जो कुछ समझ में आता है, लिखाये देता हूँ और यह पत्र तुम्हारे और शुक्ला जी के लिये होगा। मैंने पिछले पत्र में लिखा है पत्र याद तो नहीं रहा, अटकल से लिख रहा हूँ। Complete Negation (पूर्ण निगेशन) हो जाने से इन्सान Vacuumize (रिक्त) हो जाता है। इस तरह पर कि इस समय तक कोई आला ईजाद नहीं हुआ कि जो किसी चीज़ को Complete Vacuum (पूर्णतः रिक्त) कर सके। मगर इतनी बात और है कि Complete Negation (अपने न होने का पूर्ण भाव) की जब Forgetful State (भूल की अवस्था) आती है, तब कहीं पूरी तौर पर Vacuum (वैक्यूम) बनता है। उसकी ताकत का कहीं ठिकाना नहीं और यह चीज़ अवतारों में भी पाई नहीं जाती। ‘उसके’ हाथ में है कि इससे चाहे Constructive Work (रचनात्मक कार्य) ले, ख़्वाह Destructive Work (विनाश का कार्य) ले ले।

मेरा तरीका यही है कि शुरू से इन्सान Vacuum (रिक्त) बनता चले और ज़ाहिर भी है कि गुरू महाराज ने (कहाँ तक अनेकों धन्यवाद दिया जावे) जब मुझे बिल्कुल ऐसा ही बना दिया, तो फिर वही बीज जाना भी चाहिए। इसलिए अच्छे Guide (मार्गदर्शक) की तलाश की जाती है, और मेरा भाग्य था कि मुझे ऐसे Guide (गाइड) मिल गये। इसमें यह ताकत पैदा हो जाती है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी उसके हुक्म को टाल नहीं सकते। मगर यह बात ज़रूर है कि ईश्वर जब इस Approach (पहुँच) के लिये कोई आदमी ढूंढ़ता है, तो वह ऐसा ही ढूंढ़ता है, कि जो ईश्वर की मर्जी है, वही काम खुद व खुद करे। और मैं तो यह कहूँगा कि वह ऐसे आदमी को उसके गुरू के हाथ में दे देता है और मिलता भी उसी को है, जिसने अपने आपको अपने गुरू के हाथ में दे दिया है। इस Negation (निगेशन) की मैं कहाँ तक तारीफ़ करूँ। असल में यह चीज़ किसी बेहद की beginning (आरम्भ) है। न मालूम अभी और कितना जाना है। हंसी उन लोगों पर आती है कि जो रूहानियत से कोसों दूर होकर रूहानियत का प्रचार Platform (मंच) पर करते हैं।

मैं तुमको आज Perfection (पूर्णता) के मानी बतलाता हूँ। वैसे तो Perfect (पूर्ण) वाक़ई परमात्मा है जिसको दूसरे मानों में जात ही जात कह सकते हैं और इसी मानों में यह शब्द यहाँ पर इस्तेमाल किया है। मगर ख़ैर, जहाँ तक पूरे तौर पर बन्दे का Perfection (पूर्णता) कहा जाता है, वह यह है कि Nature (प्रकृति) से जितनी बातें पैदा हुई या उसमें मौजूद हैं, वह Ignorant (अज्ञानी) रहते हुए सबसे वाक़िफ़ हो। कोई इल्म या Science उससे न बचे। जरा कोई आँच दे दे और उससे वही बातें कुदरती तौर पर निकलने लगे जो वह जानना चाहता हो। यह कसौटी है पूर्ण आदमी की जाँच की।

मैंने अवतार लाने का पिछले ख़त में नुस्ख़ा लिख दिया है, ताकि लोग जब चाहें इस नुस्खे को इस्तेमाल कर लें। इससे सहज नुस्खा भी मुमकिन है धार्मिक पुस्तकों में तलाश करने से मिल जाये। हालांकि जो नुस्खा मैंने बताया है ‘भूमा’ के बाहरी हद के करीब Vacuum (खालीपन) पैदा करने का, मेरे ख्याल से एक सेकण्ड का काम है। Time Limit (समय की सीमा) का इतने अर्से में, अवतार आवे, मुमकिन है, दो-तीन सेकण्ड और ले ले। अब एक चीज़ इसके मुतल्लिक और बतलाता हूँ, कि जब मुसीबत इस हद तक मिलती है कि महात्माओं को भी इस हद तक दिल में ग्लानि पैदा होती है, कि जैसे किसी का दिल बैठा जाता हो, तो भी Automatically Vacuum (अपने आप ख़ालीपन होना) बन जाता है और उनके बगैर जाने बूझे हुये।

यह बात सिर्फ रामावतार के कुछ पहले हुई थी, मगर ज़्यादा Strong (सबल) नहीं थी, जिसका नतीजा रामचन्द्र जी का अवतार था। अब कृष्ण अवतार कैसे हुआ? जो भभूका कि रामावतार के समय फूट चुका था, उसका असर यह था कि वह खुद अपनी असली शक्ल में जो ज्यादा तेज़ था, कृष्णावतार के रूप में सरजद हुआ। इसी लिये वह ज्यादा ताकतवर था। इस ख़्याल को मैं ज्यादा अच्छी तरह Express (अभिव्यक्त) नहीं कर सका, अनुभव से ज़रूर दिखाया जा सकता है। दुबारा अवतार क्यों हुआ? मेरे ख्याल से उस वक्त जरूरत थी।

(डिक्टेट) Dictate:-लाला जी साहब-

“यह ख्याल ठीक है। ऋषियों ने रामावतार से पहले जो कुछ किया था, वह उस वक्त के लिये काफी था, मगर उनका ख़्याल जो कुछ कि असल में शोलाज़न (भभूका फूटना) कृष्णावतार के वक्त हुआ। तभी वह पूर्णावतार थे। अब यह मलका जो इस वक्त है, किसी में पैदा नहीं हुआ। कुदरत भी जब अपने किसी बन्दे को इख़त्यारात दे बैठती है, तो फिर उसमें वह अपना दखल नहीं देती।“

Swami Vivekanand Ji:-

“He becomes part and Parcel of Nature, Nay, he governs it. I am not using the word for God-Almighty. Nature is after God. You can call the present Personality above Nature or nearest God. “

स्वामी विवेकानन्द जी :-

“वह प्रकृति का अभिन्न अंग बन जाता है। नहीं, वह उस पर (प्रकृति पर) शासन करता है। मैं यह शब्द सर्वशक्तिमान ईश्वर के लिए प्रयोग नहीं कर रहा हूँ। प्रकृति, ईश्वर के बाद है। तुम वर्तमान दिव्य-पुरुष को प्रकृति से ऊपर या ईश्वर के निकटतर कह सकते हो।“

एक बात अवतार के बारे में मुझे और याद आ गई। वह यह है कि जो ईश्वर के हुक्म की पाबन्दी नहीं करते और भक्तों को तकलीफ देते हैं, या अच्छे मनुष्यों को दुःखी करते हैं, तो उसको ख़त्म कर देते हैं। Special Personality (विशिष्ट व्यक्तित्व) का भी यही काम होता है, मगर वह कोई ज़ाहिरा तौर पर मार-धाड़ नहीं करता, इस कारण ज्यादातर लोग उसके काबू में नहीं आते। अब एक बात मैं और लिखता हूँ कि अवतारों में Concentrated will (अटल या एकाग्र इच्छा-शक्ति) सिर्फ इसी पर होती है कि जो काम उनके सुपुर्द होता है और उनके सिर्फ एक ही काम सुपुर्द होता है। और भाई रही Special Personality (विशिष्ट-व्यक्तित्व) की ताकत उसकी Concentrated will (कन्सेन्ट्रेटेड-विल) अवतारों की तरह कैसे हो सकती है? इसलिये कि उसकी निगाह कुल Universe (विश्व) में रहती है, जैसे बड़े बादशाह की निगाह अपनी कुल सल्तनत पर। मुमकिन है कि इस ख़त में (विचार) पिछले ख़त के Repeat (दोहरा गए हों) हो गये हों, इसलिये कि पिछला कुछ Thoughts ख़त ज़्यादातर याद नहीं है और यह ख़त कोई मज़मून नहीं है, बल्कि जैसे विचार आते गये, लिखाता गया।

अब अभ्यासी Negation (निगेशन) और उसके बाद वाली हालत के काबिल कब बनता है? और कैसे उस हालत को पहुँचता है? एक तो जवाब इसका यह है, कि अगर Guide (मार्गदर्शक) इस हालत को पहुँचा हुआ है, तो उसकी मेहरबानी से वह पहुँच सकता है। अभ्यासी को यह चाहिये कि ‘उसे’ यह हालत देने पर मजबूर कर दे। अब यह कैसे हो सकता है? यह सब लोग जानते है; जिसके पास अक्ल है। वैसे भाई मेरा तो यह हाल है कि मैंने बहुत कुछ approach (पहुँच) एक साहब को डाट-डपट से दी थी और वह इसलिये कि मैं उनको खुश रखना चाहता था और वह उम्र में मुझसे बहुत बड़े भी थे, इसलिये और भी। मगर ईश्वर का धन्यवाद है कि मैंने उनको सिर्फ A, B, C, D, (ए, बी, सी, डी,) ही बता पाया था कि उनका रंग बदलने लगा। नतीजा उसका यह हुआ कि उन्होंने खुद ब खुद ऐसी बातें पैदा कर लीं और वह मुझसे ख़िलाफ़ हो गये। वह अपने आप इस कदर नीचे आये कि किसी दीन के न रहे और मैं उनकी अब भी इज्जत करता हूँ और बड़ा समझता हूँ। मेरे दिल में उनसे इतनी मोहब्बत भी है जितनी कि इन्सान को इन्सान से हो सकती है और अब दूसरी कमज़ोरी यह है कि अभ्यासी को मैं ठहरा हुआ नहीं देख सकता। इसका फायदा भी लोग उठा जाते हैं और जल्दी तो मेरे मिज़ाज़ में है ही। दूसरी चीज़ जो Negation (निगेशन) और उसके ऊपर तक पहुँचा सकती है वह तड़प और बेक़रारी है और भक्ति और प्रेम तो होना ही चाहिये। अगर प्रेम पैदा हो जाता है तो बेचैनी होना ज़रूरी है। अब तुम अपने सत्संग में टटोल लो कि कौन वाकई तौर पर ईश्वर का प्रेमी है।

किसी को एक मोहब्बत है, किसी को 1/2, किसी को 1/4 और इतने गिरे हुए भी निकलेंगे कि अगर उनको समझाने के लिये कोई सख़्त मजमून लिख दिया जाय तो सत्संग छोड़ने पर तैयार हो जायेंगे और किसी की तबियत में मलाल और गुस्सा पैदा हो जायेगा। इसके मानी यह है कि अपना आपा छोड़ने के बजाय उसको और मज़बूत करते हैं। भाई, मुझे तो लोग मुमकिन है, यह समझते हों कि यह मेरी Duty (कर्तव्य) है जो मैं कर रहा हूँ और यह सही भी है, मगर उन्हें इतना और सोचना चाहिये कि जितना वह Deserve (योग्य होंगे) करेंगे, उतनी ही मेरी Duty (ड्यूटी) होगी। मुझे सबसे मोहब्बत है, मगर उतनी, जितनी कि मेरा फर्ज़ है। मैं सबको मर मिटने के लिये कहता हूँ, मगर अफसोस यह है कि जो मर मिटने की Elementary (प्रारंभिक) बातें हैं, उस पर लोगों की निगाह नहीं जाती। मैं भी भाई, मजबूरन खुशामद-बरामद से काम निकालता हूँ। मुझे अक्सर पत्रों में शब्द बहुत तौल नाप कर रखने पड़ते हैं, इसलिये कि कोई बुरा न मान जावे।

Negation (निगेशन) का ख़ास तौर पर और सब आध्यात्मिक बातों का देने वाला तो ईश्वर ही है, इससे सबको इकरार है, मगर भाई, मुझे तो जो कुछ मिला, वह अपने गुरू महाराज से ही मिला। यह जरूर है कि ईश्वर का मुझे बहुत ज़्यादा शुक्रिया अदा करना चाहिये। इस बात का कि मेरी तबियत उसने ऐसी बना दी कि ऐसे बड़े महात्मा से मैं रूजू हुआ। ईश्वर से काम निकालने का तरीका यही है, जो हम अपने गुरू के साथ करते हैं और उससे Direct (सीधे) प्रेम भी पैदा हो सकता है और यह बहुत अच्छी चीज़ है। मगर इस चीज़ के करने वाले बहुत कम हुए हैं। हालांकि इससे अच्छा तरीका कोई भी नहीं हो सकता। अभ्यासी को चाहिए कि अपनी लगन बढ़ाता जाय और अगर ज्यादा न सही तो अपने Guide से इतना ही Submission (लगाव)) रखे जितना मख़तब में लड़के अपने उस्ताद से रखते हैं और भाई इतनी Duty (ड्यूटी) भी है। इस चीज़ से Guide को कुछ नहीं मिल जाता, बल्कि अभ्यासी को यह फायदा होता है कि वह चीज़ आने के लिये पात्र बन जाता है। जो वाकई Guide (गाइड) है, उसको अपनी इज्जत या शोहरत की आशा नहीं होती, बल्कि मिसालें ऐसी भी मिलती हैं, कुछ फ़कीरों की, कि जिन्होंने जाहिरा बातें ऐसी भी की हैं, जिससे Public (जन-सामान्य) उनकी इज्जत न करे और शिष्य भी छंट-छंटाकर ख़ास ख़ास रह जावें। ऐसी एक मिसाल कबीर की भी मिलती है कि उन्होंने एक समय पर ऐसा ही किया था।

भाई, शुक्ला जी ऐसे बनो कि मैं उस हालत को आप में दाखिल कर सकू कि जो मुझको सबसे प्रिय है। अगर यह न सही तो कम-अज-कम मेरी ज़िन्दगी में Complete Negation (पूर्ण निगेशन) की ही हालत पैदा कर लो और यह मैं सबसे कहता हूँ। मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि हमारे गुरू महाराज की संस्था गो सबसे छोटी है, मगर इस प्रकार की Masterly (आधिपत्यपूर्ण) तालीम संसार में किसी संस्था में नहीं मिलेगी और यह सही भी है कि हर युग में इस चीज़ के जानने वाले और सीखने वाले कम ही हुए हैं।

जिसको मोक्ष प्राप्त करना हुई, वह सच्ची लगन से इस तरफ लगा। इस जमाने में लोग बहुत से मोक्ष चाहते ही नहीं, इसलिये कि वह मोक्ष के मानी और हालत न समझते हैं और न समझने की कोशिश करते हैं। उन्होंने मोटर और कोठी का होना और रुपया ज़रूरत के लिहाज़ से काफ़ी होना ही मोक्ष से अच्छा समझ लिया है। यह उनके समझ में नहीं है कि अगर कहीं यह चीजें उनसे छिन जावें तो फिर उनकी खुशी का क्या हाल होगा और देखा तो यह गया है कि बहुत ज़्यादा रुपये वाले इस क़दर फ़िक्रमन्द रहते हैं कि किसी को नींद न आने का मर्ज़ और किसी को और कोई मर्ज हो जाते हैं। उनको तमाम जीवन भर मूंग की दाल और रोटी-तुरई और लौकी से ही साबका रहता है।

हमारे भारतवर्ष में स्वामी लोगों ने और खासकर सन्यासियों ने हम पर वह अत्याचार किये हैं और कर रहे हैं और ऐसा नुकसान पहुँचा रहे हैं कि मुसलमानों की तलवार भी नहीं पहुँचा सकी और हमारी अक्ल पर भी पर्दे पड़ गये। हमको Right और Wrong (सही और गलत) की तमीज़ जाती रही और रंगीन कपड़ों पर हम इस हद तक गिरे कि अपनी समझ Exercise (क्रियान्वित) करने को हमने कुफ्र समझा। काबिल सन्यासियों पर भी मुझे यह एतराज़ है कि उन्होंने नाकारा आदमियों को क्यों सन्यास दे दिया? जिसकी वजह से वह अपने आप को गुरू और काबिल समझने लगे। उसमें से जो पढ़े लिखे थे, वह सब Stage (मंच) पर उगलने लगे। अपना Experience (अनुभव) उनका कुछ भी नहीं। अब कुछ काबिल भी उनमें हैं। उन्होंने क्या काम किया कि दिक़ के मर्ज़ को उन्होंने और अच्छा करके बतला दिया।

अगर कोई शख्स ठोस पूजा में रमण करता है, फिर उसकी बड़ी तारीफ़ होती है और जब वह खुद बतलाते हैं तो ठोस किस्म की पूजा ही। वजह क्या है? मैं यही कहूँगा कि वह गिरोहबन्दी कायम करना चाहते हैं। मैं अपने तुच्छ विचार के अनुसार यही कहूँगा कि जिस संस्था में असली आध्यात्मिक शिक्षा नहीं है, वह गिरोहबन्दी ही है। जितने तरीके उनको बतलाये जाते हैं, उससे वह परमात्मा के निकट होने के बजाय और दूर हो जाते हैं। गोया लकड़ी से वह फ़र्नीचर बन जाते हैं। इससे तो यही अच्छा था कि वह कुछ न करते और हरी लकड़ी रहते कि जिस तरफ़ ज़रूरत होती, झुका दिये जाते। अब तो सन्यासी का मुख्य कर्म यही रह गया है कि Revival of Stone age (पत्थर-युग की पुनरावृत्ति) और जनता को यह चीज़ खूब पसन्द आती है और ऐसे ही आदमी को लोग महात्मा समझते हैं और उनको Submit (शरण जाना) भी करते हैं।

यह ऐसी बवा फैली है कि इसको ताउन और हैजे की बीमारी कहना चाहिये। कबीर साहब ने कितना सुन्दर कहा है- “ब्रह्म छाँड़ि पूजन लागे पथरा।“ मूर्ति पूजन तो सबसे ज़्यादा ठोस पूजा है, बल्कि जाप वगैरह जो बतलाते हैं, वह भी ठीक नहीं बतलाते, जिससे लोग और ख़राब हो जाते हैं। गर्जे मैं कहाँ तक कहूँ; संक्षेप के साथ अभ्यासियों के लाभ के लिये बयान कर दिया। मुझे तो भाई कहना ही है, वह भी चन्द आपस के लोगों से इन सन्यासी और उनके Followers (शिष्यों) से मैं कहूं, तो वह मुझसे नाराज हो जायें, इसलिये खामोश हूँ और सोच कर रह जाता हूँ। इतनी Warning (चेतावनी) मैं ज़रूर दे सकता हूँ, कि कुदरत इस चीज़ को बड़ी तेज निगाह से देख रही है और नहीं मालूम क्या होता है। यह जरूर है कि कुदरत ने जो भी इख़त्यारात मुझको दे दिये हैं, उसमें उसको इतनी मेहरबानी है कि वह दखल नहीं देती। मगर मैंने अपने आपको और कुदरत ने भी मुझको गुरू महाराज के हाथ में दे दिया है, इसलिये बन्दे को हुक्म का इन्तज़ार रहता है।

एक मुश्किल यह भी है कि आप लोग मेरा ज्यादा समय लेते रहते हैं, इसलिये मुझको ईश्वरीय काम करने के लिये ज्यादा समय नहीं मिलता। समय ज्यादातर कौन लोग लिया करते हैं, जिनको ब्रह्म विद्या की असली मानों में प्यास नहीं है। अगर वह Submission (शरणागत) भी कर लें तो भी मेरा बहुत समय बच जावे चाहते लोग यह हैं कि चीज़ मुफ्त मिल जावे और मेहनत न करना पड़े। मुझे इसमें कुछ आर नहीं, क्यों कि मैं तो इसलिये बनाया ही गया हूँ। मगर इस सेवा के ही एवज़ में मुझ पर लोग तरस खायें ताकि मुझको और कामों का भी अवसर मिल जावे। अगर अभ्यासी वाक़ई तौर पर ऐसे बन जायें जैसा उनको होना चाहिये तो मेरे पास से चीज़ खुद व खुद उनमें जाती रहे। इस पत्र का और इससे पिछले पत्र का मतलब यही है कि लोग सब फेर को छोड़कर सिर्फ एक ही फेर में पड़ जायें और इन चीज़ो को देखकर उनमें, ब्रह्मविद्या को सीखने की तड़प और शौक़ पैदा हो जावे। ईश्वर करे ऐसा ही हो।

बिटिया व शुक्लाजी, मैंने यह लम्बे-चौड़े पत्र लिखकर आपका बड़ा समय नष्ट किया है। कहीं आप लोगों के दिल में यह ख्याल तो पैदा नहीं होगा कि इतनी देर अगर अभ्यास करते या मैं इतनी देर आप लोगों को तवज्जोह देता, जितना समय मैंने खत लिखने में लगाया है तो ज़्यादा फायदा होता। सो आप लोग पत्र को ज़रा पढ़कर तो देखें तो मालूम हो जायेगा कि आप लोगों का समय नष्ट नहीं हुआ और ‘मालिक’ की कृपा से यह चीज़ मेरे हर ख़त में मिलेगी।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-286
शाहजहाँपुर
6/3/1953
प्रिय बेटी, शुभाशीर्वाद।

इतनी आल्हा लिखने के बाद अब तुम्हारा चौथी मार्च सन् 53 के पत्र के उत्तर लिखाने का अवकाश मिला। इसको आल्हा मैंने यूं कहा है कि जब लोग आल्हा सुनने जाते हैं, तो उतनी देर के लिये तबियत में हिम्मत आ जाती है। ऐसे ही मेरे पत्रों को सुनकर थोड़ी देर के लिये अपनी तबियत ताज़ा कर लेते हैं, इसलिये उसको आल्हा ही कहना चाहिये। राम कहानी तो यह उस समय बन सकती है, जब कि अभ्यासी इतनी तड़प पैदाकर लें कि बिला उसके हासिल किये हुये उनको चैन ही न आवे।

मैं तुम्हारे साहस और Faith (विश्वास) पर बहुत खुश हुआ। मगर Faith (फ़ेथ) की इससे ऊंची भी अवस्था है, जो मुझ पर एक बार गुजरी है। जब वह आवेगी, तो मैं लिख दूंगा। वह चीज़ भी अभी बहुत दूर है, मगर पैदा इसी तरह से होती है, जो तुम्हारी हालत है और मैं तुम्हारी हालत देख-देखकर बड़ा खुश होता हूँ और सबसे प्रशंसा भी करता हूँ, यानी उन लोगों से, जो इस रास्ते पर चल रहे हैं, मगर मैं अपनी निगाह को क्या करूँ। मुझे तो उन्नति के सागर में अभी बुलबुला ही दिखाई देती हो। बिटिया! कहीं यह न कह बैठना कि मेरा सब प्रेम और परिश्रम केवल बुलबुले भर ही उन्नति बताई है, सो बिटिया! इसके लिये मैं क्या करूँ कि इतनी तरक्की करने पर भी तुम बुलबुले मात्र दिखाई देती हो। कहीं यह मेरी निगाह का कसूर तो नहीं है।

चिन्ह ऐसे ज़रूर हैं कि अगर यही शौक बना रहा जैसी कि उम्मीद है, तो आला दर्जे की तरक्की का आनन्द ईश्वर ने चाहा चक्खोगी। तुम्हारा पत्र बता रहा है कि मेरे जुनून की आँच तुम पर कुछ ज़रूर असर कर गई है। अगर इतनी ही बात अभ्यासियों में पैदा हो जाये तो भी बहुत कुछ सुधर जायें। तुमने शुरू में प्रेमी का भाव लिया था, जिसका नतीजा यही होता है कि अभ्यासी प्रीतम बन जाता है, मगर अभी पूरी तौर पर तुम प्रीतम नहीं बन सकी। हो सकता है कि यह चीज़ बहुत कुछ किसी वक्त पैदा हो जावे। मगर मैं यह जरूर कहूँगा कि अभी तक पूरे तौर पर अपना आपा मिट नहीं सका। यह चीज बहुत कुछ आगे बढ़ कर ईश्वर देता है, तो कुछ न कुछ नसीब हो जाती है।

असल में तो अपना आपा Complete negation (पूर्ण निगेशन) में जाता है और दर्जे मेरी समझ से जिसको असल महत्वगीरी कहते हैं, उसके बाद शुरू होते हैं। यह किसको ख़बर है? मुझे तो अब किसी किसी समय यही तड़प रहती है कि लोग इस हालत को पहुँचे। तुमने लिखा है कि “नम्रता की हालत में भिदती चली जा रही हूँ” और फिर लिखा है कि “वही मेरा रूप हो गया है और उस दशा के होते हुए भी मैं उसे भूली सी रहती हूँ” और यह भी लिखा है कि “उसमें भिदाव होता चला जा रहा है।“ यह तो बड़ी अच्छी हालत है और इसके मानी यह हैं कि तुम उसकी लय-अवस्था के किनारे पर आ गई। मैं अभी देखता हूँ कि तुम किस क़दर अपने आप भिद रही हो और अपनी कोशिश से कितनी हो सकती हो? ऊपर तो मैं तुम्हें ले ही जा रहा हूँ, उसका असर भी इसमें लय-अवस्था हो सकता है और कहीं मुझे उचंग आ गई तो मुझसे यह भी कुछ दूर नहीं कि मैं इसमें तुमको लय कर दूं या लय करने की शक्ति पैदा कर दूं। यह सब ‘मालिक’ की मौज पर है, तुमको मैं नीचे छोड़ना नहीं चाहता। मैंने तुमको इस समय पत्र लिखाते-लिखाते ‘N’ (एन) स्थान पर खींच दिया है। ईश्वर ने चाहा तो दो-चार रोज़ में, ही उसकी सैर भी शुरू हो जावेगी। वक्त 9.50 P.M. (पी.एम.) है, जब ‘N’ (रात्रि 9 बजकर 50 मिनट पर) पर खींचा है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-289
शाहजहाँपुर
14/3/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत 9 मार्च सन् 53 का भी मिल गया। तुम्हें मालूम है कि जो मुकाम तुम तय कर रही हो, उसके नाम मैंने A,B,C,D रख दिये हैं। जहाँ तक कि हमारा ख़्याल है, A से Z (ए से ज़ेड) तक जाने कितनी गिन्तियाँ ख़त्म हो जायेंगी। मुकामात के गिनने का तजुर्बा कर रहा हूँ। तबियत ज़रूर घबराती है कि कब तक गिनता रहूँगा। तुम बताओ मुझे क्या करना चाहिये? वैसे इससे अच्छा और हो ही क्या सकता है कि हर मुकाम की सैर होती चले। जब हम ऊपर को खींचते हैं, तो एक निगाह सैर कराने की ज़रूर डाल देते हैं, मगर तुम्हें सैर कराने की तबियत यूं चाहती है कि तुम्हारा एहसास ईश्वर की कृपा से बहुत अच्छा है। चीज़ उतनी ही सब में पैदा हो जाती है, मगर अभ्यासी जान नहीं पाता। मुझे अपने बारे में पता नहीं है किन्तु ‘लाला जी’ साहब ने फ़रमाया है कि महासमाधि लेने से पहले जब मैं आपके यहाँ चन्द दिनों के लिये गया था, कमाल दे चुके थे। मगर उसके बाद बारह साल और लिये और इस दौरान में जाने क्या-क्या मुकामात और क्या-क्या सैर कराई और फिर जब हालत मौजूदा खुलना शुरू हुई तो फिर तीन महीने रात-दिन मुझ पर रूजू रहे। रात में मैंने यह अनुभव किया है कि बराबर मुझको आध्यात्मिक Force (शक्ति) से भरते रहते थे। मेरी अक्ल काम नहीं करती क्योंकि मिज़ाज़ में जल्दी है और चाहता यह हूँ कि जिन लोगों को शौक है, और मोहब्बत है, उनको कम से कम पाँचवे Circle (सर्किल) तक पहुँचा ही दूं, ताकि मैं उनसे फारिग होता चलूं। उसके बाद वह हिम्मत करें तो मैं और आगे बढ़ाऊं। अब मास्टर साहब से मैं बेफिक्र हूँ। निगाह ज़रूर कभी-कभी डाल लेता हूँ, यह तो मेरा फर्ज़ ही है। उन्हें मिशन की मोहब्बत और काम अब आगे बढ़ा रहा है।

कभी-कभी ख़्याल तुम्हारे बारे में भी आ जाता है, कि पाँचवे Circle (सर्किल) तक खींच दूं ताकि तुमसे भी इत्मिनान हो जाये। मगर यह न समझ लेना कि इससे आगे मैं किसी को बढ़ाना नहीं चाहता। मुझे तो खुशी उस वक्त हो, जब मुझसे भी ज्यादा लोग तरक्की करें। हमारी तरक्की ही क्या - एक सोये हुये से हैं और सोने का एहसास नहीं। मगर ख़ैर, जो कुछ भी है, उसका शुक्र अदा करता हूँ और चाहता यह हूँ कि लोग इससे ज़्यादा हिम्मत करें। अगर कहीं दस-बारह भी मुझसे बन गये और बोलने के लिये उनकी जबान भी पैदा हो गई तो ईश्वर ने चाहा मिशन का नक्शा ही बदल जायेगा। अब तुम्हारे ख़त का जवाब देता हूँ। तुमने लिखा है कि “दशा और भीतरी व गम्भीर हो गई है।“ इसके माने यह है कि लय-अवस्था और बढ़ गई और यह उस मुकाम की लय-अवस्था है जहाँ पर कि तुम हो। हर मुकाम पर लय-अवस्था और सारूप्यता की हालत होती है। तुम्हें ‘N’ Point (एन पॉइंट) पर मैंने खींच दिया था और यह एहसास सही है।

हम ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते जाते हैं, सूक्ष्म होते जाते हैं। यहाँ तक कि हम कुछ नहीं रहते। हमें कुछ न रहना ही चाहिये। अब थोड़ा सा और बताता हूँ। हम जब सूक्ष्म होते हैं तो, हमारे चित्त में सूक्ष्म लहरें उठा करती हैं और हम जब कुछ नहीं रहते तो चित्त में लहरें उठ जाना बन्द हो जाती हैं। लहरें चाहे जितनी सूक्ष्म क्यों न हो, कुछ न कुछ हमारी शान्ति में बाधा ज़रूर डालती हैं और Senses (वृत्तियाँ) भी कुछ मज़े का एहसास करते रहते हैं। अब उनसे छुटकारा तभी हो, जब हमें सूक्ष्मपने से छुटकारा मिले। संक्षेप में लिख दिया, इतनी ही इसकी ज़रूरत थी।

आज इस समय 9.20 A.M. (प्रातः) पर ता. 15.3.53 पर तुम्हें ‘O’ (ओ) स्थान पर खींच दिया। अम्मा को प्रणाम।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-291
शाहजहाँपुर
20/3/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा पत्र 12 मार्च और 16 मार्च का मिल गया। 12 मार्च के ख़त का जवाब देता हूँ। तुमने लिखा है कि “निगाह में ‘मालिक’ रहता था, कि मैं उससे भी ओझल हो गई हूँ।“ इस ख़्याल को तुम ठीक Express (अभिव्यक्त) नहीं कर सकीं। जहाँ तक मैं इनको समझा हूँ, जवाब दे रहा हूँ। यह एक लय-अवस्था की हालत है। जब तुम ‘मालिक’ के ध्यान में जाना चाहती होगी तो ख़्याल उलटता होगा और तुम्हारे जिस्म पर बधंता होगा। क्या यह बात ठीक है? अगर ठीक है तो तुम्हारा कुल शरीर यही एहसास दिलाता होगा कि तुम खुद ‘मालिक’ हो। लिहाजा अब यही ध्यान बाँधना चाहिये और ख़्याल में रहना चाहिये कि यह शरीर वगैरह जो कुछ है, यह सब ‘मालिक’ ही का शरीर है। फर्ज़ कर लो तुम ‘A’ (ए) का ध्यान करती थी तो अगर मेरा अनुभव ठीक है और तुम्हारी वही हालत है जो मैंने ऊपर लिखी है तो तुम ‘A’ का मय उसके जिस्म के अब अपने आप को मान कर ध्यान करना शुरू करो और मानना क्या, अगर वाकई तुम्हारी यही हालत है, तो आज खुद ऊपर के तरीके में तुम्हें अपना ही ध्यान शुरू हो गया होगा। तुम लिखना कि मेरा एहसास कहाँ तक ठीक है। तुमने जो शुद्धपन लिखा हैं, तो जितना आगे बढ़ती जाओगी शुद्धता ही शुद्धता मिलती जायेगी।

अब 16 मार्च के ख़त का जवाब देता हूँ। तुमने लिखा है, मेरे लिखने पर कि तुम्हारा जो कुछ भी अनुभव है, वह मेरी बदौलत है। वास्तव में ऐसा नहीं है। अगर मुझमें काब्लियत होती तो जितने मेरे पास आते सबका ऐसा ही एहसास हो गया होता। यह सब तुम्हारी जाती मेहनत, प्रेम और लगाव का असर है। Innocence (मासूमियत) की जो हालत लिखी है, यह तुममें कुदरती हालत मौजूद है जिसके मानी यह हैं कि तुम पैदाइश ही से बहुत कुछ शुद्ध आई हो। तुमने जो नम्रता लिखी है, यही ठीक है। इस नम्रता को तुम इतना अपना रही हो कि उसमें भी लय-अवस्था की शुरूआत है। अभ्यासी को हर हालत में लय होना चाहिये, तब कहीं Master Minded (स्वामी) आदमी बनता है। हमारे यहाँ तो लोग पूजा और ध्यान के बाद जो कुछ भी थोड़ा बहुत करते हों, उससे ताल्लुक़ ही नहीं रखते। कहकर और लिखकर हार गया मगर उनके जूं ही नहीं रेंगती। यह हो सकता है कि उनको एकदम से खींचता ही चला जाऊं। कुछ कर भी जाता हूँ। मगर इससे न मुझको आनन्द आता है और न उनको। मेरा दिल तो सबके लिये यही चाहता है। जितनी लालसा अभ्यासी को होगी, उतनी ही जल्दी ईश्वर को आकर्षित करेगा। मसल मशहूर है कि जब तक बच्चा रोता नहीं, माँ दूध नहीं पिलाती। बाकी अबकी जवाब आने पर लिखूंगा। अम्मा को प्रणाम।

ईश्वर की मर्ज़ी उस समय तक नहीं होती, जब तक कि बन्दे को ‘मालिक’ के पाने की लालसा नहीं होती।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-293
शाहजहाँपुर
23/3/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

कल बतारीख 22.3.53 अन्दाज़न 2.30 pm पर मुझे ‘O’ point (ओ पॉइंट) पर कुछ कमजोरी मालूम हुई। कमज़ोरी मैंने उसी वक्त रफा कर दी थी। आज ता. 23.3.53 को 10.15 P.M. पर तुम्हें मैंने Point ‘P’ (पॉइंट पी) पर डाल दिया। सैर के परमाणु मैंने इसी वक्त भर दिये हैं, मुमकिन है 2 या 3 बजे से आज ही सैर शुरू हो जाये। अब तुम हाल लिखना। जब तुम्हें पूरा एहसास हो जावेगा, जो शायद दो-चार दिन में हो जावेगा, तब ईश्वर की कृपा से अगले स्थान पर खींच दूंगा। मेरी समझ से मैं इनको गिन न सकूंगा, क्योंकि बहुत अधिक मुकामात हैं। ‘Z’ (जेड) तक ख़तम करने के बाद मुमकिन हो सका तो हर तीसरे रोज़ या जैसा मौका हुआ, एक Point (पॉइंट) ले लिया करूंगा। आज तुम्हारा ख़त 20.3.53 का मिल गया। जवाब की कुछ ज़रूरत नहीं थी। इसलिये नहीं लिखाया।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-296
शाहजहाँपुर
2/4/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे खत 24.3.53 और 29.3.53 के मिल गये। 24.3.53 के ख़त का जवाब दे रहा हूँ। जब लय-अवस्था बढ़ जाती है तो इस ख़्याल करने की ज़रूरत कम रहती है, कि यह काम ‘मालिक’ कर रहा है। ‘मालिक’ में जितनी पैवस्तगी ज़्यादा होगी, उतनी दुई कम होगी। पूजा में दुई आ जाती है, इसलिये दिल पर भारीपन महसूस होता है। ऐसी हालत में हल्का-हल्का Natural way (स्वाभाविक रूप में) में ध्यान करना चाहिये। जितनी दशा हल्की होती जाती है, उतना Expression (अभिव्यक्ति) के लिये शब्द नहीं मिलते। आगे हालत में सूनापन ही बढ़ता है और फिर वह भी नहीं रहता।

29.3.53 का जवाब यह है, मैं इस हालत को पढ़कर उछल पड़ा कि “अपना ही ध्यान और अपनी ही अर्चना और वन्दना करती हूँ।“ यह अच्छी लय-अवस्था की खुशख़बरी है। किसी ने कहा है :-

“अपने सजदे के सिवा गैर का सजदा है हराम।”

मैं 29.3.53 के खत का बहुत जवाब लिखाना चाहता था, मगर मुझे लिखने वाला न मिला। ख़ैर, ईश्वर की मर्जी। अपने आप जो लिखा है, बहुत टूटा-फूटा लिखा है और उसका भी Expression (अभिव्यक्ति) ठीक नहीं। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-301
शाहजहाँपुर
12/4/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

तुम्हारे ख़त सब मिल गये। हिन्दी मुझे नहीं आती। लिखने में भी हाथ काँपता है और जो सोचता हूँ उसको, जब लिखने बैठता हूँ तो, विचारों की लड़ी ठीक नहीं बन पाती। कहाँ तक मैं अपने नुक्स लिखूं। दूसरे का मोहताज ही रहना पड़ता है। एक चना भाड़ फोड़ नहीं सकता। चाहता यह हूँ कि सब मिलकर जो काम जिसके लायक है, उसको करें, मगर लोगों में दिलचस्पी पैदा नहीं होती। जिसकी ईश्वर-विषय में दिलचस्पी पैदा नहीं होती, तो वह मिशन के ही काम में दिलचस्पी पैदा करे, तो भी हो सकता है, क्योंकि अगर Sincerity (निष्कपटता) साथ है तो ईश्वर-विषय में भी दिलचस्पी पैदा हो जाय। मगर पित्तामारी कोई करने ही क्यों लगा, गरज़ तो मेरी रह गई है और है भी ऐसा ही। इसलिये वास्तव में मैं खुशामद ही सबकी करता हूँ। इसलिये कि इस चापलूसी से ही कोई फायदा उठा ले। लोग इस इबारत को देखें तो वाकई हंसेंगे, मगर मैं अपनी तबियत को क्या करूँ कि मैं सबकी सब, सब में उड़ेलना चाहता हूँ। मुमकिन है कि यही वज़ह हो कि लोग ग्रहण करने के लिये तैयार न होते हों। उड़ेल तो मैं जाऊंगा ही, ख़्वा वह फिर छलक क्यों न पड़े और जिसमें उड़िल गई, तो फिर दूसरे छलकी हुई चीज़ पा सकेंगे। इसीलिये मैं चाहता हूँ कि सब में उड़ेल दूं। और इस वक्त में तो ऐसा है कि सबमें या जो चाहें उनमें, असल हालत उड़ेली जा सकती है।

अब यह तो और लोगों के बारे में कहा, अब मैं अपनी कहता हूँ। इतना सुस्त हो गया हूँ और नाकारा कि ऐसी मिसाल तो शायद कहीं न मिले। सुस्ती की यह हालत है कि जैसे किसी में जान न रही हो। चारपाई पर अगर लेटा हुआ हूँ, तो छः महीने उठने की तबियत नहीं चाहती। खाना तैयार है और सुस्ती इस क़दर कि कौन खाये इस वक्त; फिर देखा जायेगा। प्यास लगी हुई है, और इस इतंजार में है कि आराम से कौन उठे; जब उठेंगे, पानी पी लेंगे। काम पड़े रहते हैं और करने का जी नहीं चाहता। ठीक है, ईश्वर के यहाँ इंसाफ़ होता है। ऐसे सुस्त और काहिल आदमियों को काहिल और सुस्त आदमी मिलते हैं। मैं जानता हूँ, हमारी संस्था में काहिली और सुस्ती का ज़िम्मेदार मैं ही हूँ, और यही वजह मालूम होती है कि लोग मेरा कहना ज़्यादातर नहीं सुनते। मुर्दे से भला किसको जिन्दगी मिली है और सुस्ती से भी चैतन्यता कब हो सकी है? दोनों एक दूसरे के खिलाफ (Opposite) हैं।

अच्छा, अब मतलब पर आता हूँ। मैं ‘P’ (पी) स्थान पर ज़्यादा तवज्जोह दे गया था, और वह यह थी कि मुझे कुछ अन्दाज़ नहीं लग सका और यह गलती हमेशा जल्दी की आदत से होती है। कुछ ऐसी आदत पड़ गई है कि जल्दी से इस चीज़ को ख़त्म कर दूं, ताकि बार-बार रूजू न होना पड़े। मैं अक्सर काम को ख़त्म करने में Special will (विशेष इच्छा शक्ति) इस्तेमाल कर जाता हूँ और उसमें जल्दी की वज़ह से यह अन्दाज़ नहीं होने पाता कि कितनी Intensity (गहराई) होनी चाहिये। मैं बड़ी कोशिश करता हूँ, मगर यह चीज़ अब तक ठीक नहीं आई है। ‘P’ (पी) स्थान पर ज्यादा तवज्जोह देने की वजह से उसमें इतनी शक्ति पैदा हो गई कि तुम उसको हज़म ही नहीं कर पा रहीं थीं। जब देखा कि चीज़ हजम नहीं हो रही है, तो फिर उसे हज़म कराना पड़ा और साथ ही उसके यह भी ख़्याल रक्खा कि उसमें Mind कहो या चैतन्यता कहो, ऐसा पैदा कर दिया तुम खुद अगले मुकाम पर पहुँचो। चुंनाचे आज 11.45 A.M. पर तुम आगे बढ़ने लगीं। जरा सा सहारा मेरी लगाने की ज़रूरत थी, वह लगा दिया और तुम 'Q' (क्यू) स्थान पर पहुँच गई।

यह ख्याल तुम्हारा ठीक है कि सुगन्ध - आध्यात्मिक तुमसे हर समय निकलती है। तुमने लिखा है कि पैदा होती रहती है पैदा नहीं होती, बल्कि सबमें मौजूद है। आवरण पड़े होने के ख़ातिर, जो इंसान के खुद डाले हुए हैं, महसूस नहीं होती। तुमने लिखा है, कि सब शुद्ध ही शुद्ध दीखने लगा है - यह एहसास तुम्हारा सही है। जब इंसान बहिर्मुखी नहीं रहता, बल्कि अन्तर्मुखी हो जाता है, तो वही अन्दर वाली हालत बाहर मालूम होने लगती है। वैराग्य इसीलिये जरूरी है कि जब राग उस चीज़ से हो जाता है, तो उसका Weight (वज़न) ख़्याल में पूर्ण वैराग्य हो जाने पर नहीं रहता और चीज़ निगाह और ख़्याल से हट जाती हैं। जब यह हालत हो जाती है, तो फिर ईश्वर ही ईश्वर रह जाता है और जंगल में बैठने और तपस्या करने की ज़रूरत नहीं रहती। तुमने यह भी लिखा है कि “जिससे मैं खुद अपने दर्शन करने लगी हूँ और जिससे मैं अपने को पहचानने लगी हूँ।“ इसमें से मैं इसका मतलब नहीं समझा कि “मैं अपने को पहचानने लगी हूँ।“ तुम लिखो कि तुमने क्या पहचाना। जब ‘मालिक’ में ज़्यादा प्रवेश हो जाता है तो फिर अपनापन जाता रहता है और अपने से मतलब ‘मालिक’ का हो जाता है, यानी यह काम सब ‘मालिक’ कर रहा है। मगर यह कच्ची लय-अवस्था है। जब यह भी ख्याल जाता रहे यानी इसका Weight (वजन) भी न रहे कि काम कौन कर रहा है, तब अच्छी लय-अवस्था कही जा सकती है। मगर इसके बाद अभी कुछ और है। यह ज़रूर है कि तुम अब अपना ध्यान करने लगी हो। जहाँ तक कि मेरा ख़्याल है और मुमकिन है उसी को तुमने अपना पहचानना लिखा हो। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-304
शाहजहाँपुर
22/4/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारा 16 अप्रैल का मिल गया। योग-मार्ग में अपना भिदाव अतंरिक्ष होता है। तुमने लिखा है कि “रग-रग में समा चुकी हूँ।“

“अभी और समाना बाकी है और रास्ता अभी बहुत चलना है। अभी तो शायद रुपये में एक पैसा या दो पैसा भर चल पाई होगी। यह अनुभव तुम्हारा ठीक है कि अपने ज़रें ज़रें में अपना ही जल्वा देखती हो, यह जल्वा अभी पूरी तरह से नहीं देख पाया है, इसमें भी अभी बहुत कमी है। हमें तो शुरू से आखिर तक ऐसी आँख बना देना है कि रोशनी ही रोशनी रह जाये और आँख आँख को न देख सके।“

यह तुम्हारा ठीक अनुभव है, इसको मैंने पहले लिखा भी था कि तुम्हारा दिल नहीं खुला है। दिल हमारे यहाँ खोला जाता है, जिससे हदबन्दी एक तरह की ख़त्म हो जाती है। तुमने अच्छी याद दिलाई, दिल को मुझे अभी ठीक करना है। ऊंचा तो तुमको मैंने पहुँचा दिया, मगर दिल से बेखबर रहा। तुमने लिखा है कि “‘मालिक’ स्वतंत्र होते हुए बन्धन में आ गया है,” इसके यह माने है कि ‘उसकी’ ताकत तुममें समा रही है और उसमें ‘उसका’ अनुभव हो रहा है। क्योंकि तुममें खुद बन्धन मौजूद है, इसलिये ‘वह’ भी बन्धन में महसूस होता है। बन्धन वाले आदमी में ईश्वर भी सीमाबद्ध दिखाई पड़ता है। यह भी वजह है कि ईश्वर का जब कभी ख़्याल किया, वह अपना जैसा समझ में आया और ठोस पूजाओं की शुरूआत हो गई। तुमने जो बराबरी वाली बात लिखी है, वह ब्रह्म की झलक है और यह हालत बताती है कि अब तुम सीधी उसी में जा रही हो।

तुमने लिखा है कि “मेरे शरीर का अंग-अंग शीशा हो रहा है।“ इस हालत को या तो तुम घुमा गईं या समझ नहीं पाई। मुझे यह ऐसी हालत मालूम होती है कि तुम्हारे जिस्म के हर जर्रे में ‘मालिक’ की शक्ल मालूम होती होगी और यह बड़ी अच्छी हालत है, ईश्वर मुबारिक करे।

तुमने लिखा है कि “मैं कहने में न मैं का बोध होता है, और न तू कहने में, तेरे का बोध होता है।“ यह लय-अवस्था की अच्छी गति है। अभी Body Consciousness (शरीर की चेतना) बाकी है और इसके समाप्त होने में ज़रा देर लगेगी। इसकी पहिचान यह है कि तुम अपने जिस्म को ‘मालिक’ का जिस्म मान कर ध्यान कर रही होगी और यह लय-अवस्था की दूसरी हालत है। मगर इसको ऐसा ही करती जाओ, जब तक कि यह अपना ठिकाना खुद न बता दे। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-306
शाहजहाँपुर
25/4/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 22 अप्रैल का लिखा हुआ मिला, पढ़कर गदगद् हो गया। यह कुछ जमाने की खूबी है कि शीशा और हीरा एक ही भाव बिक रहें हैं और ज़माने की भी ख़ता नहीं, ख़ता उनकी है, जिन्होंने ज़माने को बिगाड़ा। यहाँ तो मामूली पढ़े-लिखे और कुछ धार्मिक विचार वाले ‘गुरु’ बन जाते हैं और उनको सिखाने वाले भी अधिकतर वैसे ही मिल जाते हैं। कहीं वेश फकीरी बदल लिया, तो फिर जगत गुरु बन बैठे और लोगों को बढ़िया-बढ़िया पूजायें सिखाने लगे। वेश के कारण लोगों को भी विश्वास जमने लगा और उन्होंने उन पूजाओं को करना आरम्भ कर दिया। यहाँ मुझको कौन पूछे कि जहाँ वेश तो क्या रंग तक नहीं रहा। अगर हम किसी से कुछ कहते भी हैं तो कोई माने क्यों। इसलिये जो अदायें साधुओं में होती है, उनका तो पता भी मुझमें नहीं है। स्वामी विवेकानन्द जी ने अपने एक लेक्चर में कहा है कि अगर कहीं हम बीस आदमी ऐसे बना सकें, जिसकी नज़र अन्तरिक्ष हो गई हो और अपने को अपने में देखने लगे तो मेरा काम ख़त्म हो गया। मैं समझता हूँ कि उनको एक ही दो आदमी मुश्किल से मिले होंगे और मैं सैकड़ों चाहता हूँ तो यह चीज़ बिना ‘ईश्वर’ की मदद के नहीं हो सकती और यह सब ‘उसकी’ मर्ज़ी पर है। हम बस काम किये जाते हैं, जो इसके लायक मिलता है।

तुमने हमारे Pamphlet (पेम्फ्लेट) गुरु-सन्देश में पढ़ा होगा कि ईश्वर-दर्शन की हालत क्या है, हमें तो वही हालत चाहिये। शंख-चक्र-गदा-पद्म वाला तो उन्हीं को मुबारक रहे, जो इसी को असल चीज समझते हैं और जिन्होंने ईश्वर को अपने जैसा शरीर वाला समझ लिया है। उनके यह समझ में नहीं आता कि ईश्वर को Material (भौतिक) समझ लेने से उनका आध्यात्मिक लाभ कुछ नहीं होता है और यह ईश्वर की तौहीन है। इससे अपना नुकसान यह है कि अपनी निगाह Matter (भौतिक पदार्थ पर) ही कायम हो जाती है और मैं यह समझता हूँ कि वह ईश्वर को नाराज़गी का भी मौका देते हैं। किसी साफ-पाक आदमी को अगर गन्दा कह दिया जावे तो, वह जरूर नाराज़ हो जावेगा। तुम्हारी हालत ईश्वर-दर्शन की इससे पहले भी आ चुकी है, मगर इतनी निखरी हुई नहीं थी। मगर तुम्हें अभी इससे आगे जाना है। इसको ऐसा समझो, जैसे बच्चों के लिये खिलौना। हमें यही चाहिये कि हम अपने अन्दर भिदते जायें और अपना जल्वा अपने आप देखें; अन्तर्मुखी होने का यही फायदा है। मगर यह हालत भी ऐसी नहीं है कि उस पर हम ठहर जावें और काफ़ी समझ बैठें। यह तो असल ब्रह्म-विद्या की शुरूआत ही है, अभी तुम्हें और आगे जाना है। जब यह दृश्य देखने का भी एहसास बाक़ी न रहे, तो उसकी दूसरी सीढ़ी होगी और जितना आगे बढ़ती जाओगी, उसकी शक्ल भी तबदील होती जावेगी। अभी अथाह समुद्र, जिसमें हमें मिल जाना है, कोसों दूर है।

तुमने लिखा है कि “अब जो दशा आती है, उसमें कोई लगाव-लपेट नहीं होता है। और न किसी प्रकार का वज़न” इसका मतलब यह है कि अपना आपापन जो ठोस था, जा चुका है और अब तुम किसी काम की कर्ता नहीं रहीं और न संस्कार बन रहे हैं। तुमने लिखा है कि “हमारे Senses (वृत्तियाँ) ही नहीं रह गये हैं” यह बहुत कुछ ठीक है। मगर अभी Senses (वृत्तियों) में भद्दापन बाकी है, अभी Refined (शुद्ध) नहीं हुए हैं और उस वक्त यह सही आते चलें जायेंगे, जितनी कि लय-अवस्था बढ़ती जावेगी और Negation (निगेशन) की पूरी हालत आ जाने पर Senses (वृत्तियाँ) भी पूरी हालत में आ जाते हैं। मैं अपनी निगाह को क्या करूँ कि तुम जहाँ उन्नति कर के पहुँचती हो, हमें शुरूआत ही मालूम पड़ती है।

मेरा Realization (साक्षात्कार) का ख़्याल बहुत ऊंचा है। जब तक कि अभ्यासी अपने आप को ईश्वर में बिल्कुल लय न कर ले, तब तक मैं उसको Perfectly Realized Soul (पूर्णरीत्या साक्षात्कार प्राप्त करने वाली आत्मा) नहीं कह सकता हूँ।

मेरी राय में मुझे ऐसा आदमी इस वक्त कोई नज़र नहीं पड़ता। यह और बात है कि हमारे गुरु महाराज ने किसी को ऐसा बना दिया हो, यह वह जानें। बिटिया! कहीं मेरी निगाह खराब तो नहीं हो गई है। एक किस्सा सुनाता हूँ; एक मर्तबा दुर्योधन ने कृष्ण जी से पूछा कि आप अर्जुन को क्यों ज़्यादा मुहब्बत करते हैं और रिश्तेदार मैं भी हूँ, मुझसे मुहब्बत नहीं करते। कृष्ण जी ने कुछ समय व्यतीत होने पर इसका जवाब दिया। वह यह था कि अर्जुन से कहा कि तुम्हारे राज्य में जितने बुरे आदमी हों, उनकी फेहरिस्त बना लाओ और दुर्योधन से कहा कि तुम्हारे राज्य में जितने अच्छे आदमी हों उनकी फेहरिस्त बना लाओ। दोनों चल दिये। अर्जुन जब लौटा तो उसने कहा- “मुझे कोई बुरा आदमी ही नहीं मिला, जिसका नाम फेहरिस्त पर लिखता” और दुर्योधन ने यह खबर दी कि मुझे कोई अच्छा आदमी ही नहीं मिला, जिसको फेहरिस्त पर दर्ज करता। तब कृष्ण जी ने कहा कि यही कारण है कि मैं अर्जुन से इतनी मोहब्बत करता हूँ। वह इतना अच्छा है कि उसको सब अच्छे ही दिखलाई देते हैं और तुम इतने बुरे हो कि तुम्हें कोई आदमी अच्छा मालूम ही नहीं दिया। तो कहीं मुझमें दुर्योधन वाली आँख तो पैदा नहीं हो गई। अपने से छोटा तुमने लिखा है कि संसार में कोई नहीं रह गया है, यह एक गति है, जो ब्रह्म-गति से बहुत कुछ निस्बत रखती है। इसमें भी इससे ऊंची हालत पैदा होगी, मगर वह हालत भी आख़िरी हालत नहीं होगी। इसके बाद जो हालत पैदा होती है, मैं उसको बता देता, मगर इसलिये बताना नहीं चाहता कि पहले से कहीं उसका ख़्याल न बाँध लो। ईश्वर ने चाहा तो वह हालत भी आ जावेगी। तुमने लिखा है कि “पहले मन, बुद्धि, व्यवहार, सब कुछ मेरे वश में था और अब भूली भटकी सी हूँ।“ इसके माने यह है कि सब रंग मिलना शुरू हो गये हैं, मगर अभी सब रंग मिलाकर सफेद रंग नहीं बना। यह भी हो जावेगा ईश्वर की कृपा से। तुमने लिखा है कि “अपना ही जल्वा, अपनी ही मस्ती, मेरा ही एक अदना करिश्मा है” इसका मतलब यह है कि Non-Duality (अद्धैत) की हालत शुरू है। इसकी पूर्ण गति हो जाने पर, इसका रूख कुछ और बदलेगा, जिसको मैं पहले से बताना नहीं चाहता और वह ईश्वर-दर्शन की हालत से बहुत ऊंची हालत होगी। Quotations (उद्धरण) के आगे जो तुमने ख़त में लिखा है, वह सब Non-Duality (अद्धैत) पर आने की खुशख़बरी दे रही है। अभी तुम्हारा अहंभाव अच्छी तरह से नहीं गया है। तुम्हारी यही हालत रही तो ईश्वर-कृपा से यह चीज़ भी पैदा हो जावेगी।

यह हालतें बिना योग-मार्ग पर चलने से पैदा नहीं हो सकती और उसके साथ शर्त यह भी है कि हमारे गुरु महाराज सा Guide (मार्ग दर्शक) भी हो और हम सब के वही Guide (गाइड) हैं और खुद अपनी मिसाल हैं। अगर यह सब हालतें सबके सामने रख दी जावें तो भी बहुत कम ऐसे मिलेंगे कि उनका जी इस चीज़ को हासिल करने के लिये ललचा आवे। मुझसे एक-आध शख़्सों ने इस विषय में बातचीत भी की, मगर उन्होंने यह यकीन नहीं किया कि यह हालतें मेरे जरिये से प्राप्त भी हो सकती हैं, कारण यह था कि मैं उनकी ‘महात्मा’ की तारीफ़ के अनुसार कोई महात्मा नहीं था और यह है भी सही मैं तो एक इन्सान हूँ और गुरु महाराज ने मुझको बनाया भी ऐसा ही है। मगर भाई, तुम महात्मा हो और हमारी राय में महात्मा होना अच्छा होगा, क्योंकि यह बड़ी बात है।

तुम्हारा शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-311
शाहजहाँपुर
12/5/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे पत्र सब मिल गये। 5 मई के पत्र का सिर्फ इतना जवाब है कि तुम्हारी लय-अवस्था, जिसको फ़नाइयत भी कहते हैं, बढ़ रही है और अभ्यासी की, जिसके भाग्य होते हैं, उसमें यह चीज़ पैदा होती है और बढ़ती रहती है। इसका छोर अभी दूर है और उसी की कैफियत अन्दर और बाहर महसूस होती है। अपने में ही घुल-मिल कर अपने आप को छोड़ देना ही Spirituality (आध्यात्मिकता) है।

एक बात मैं तुमको लिखना भूल गया। तुम धार्मिक किताबों की Study (अध्ययन) किया करो। हर किताब, उपनिषद वगैरह, सब देख सकती हो और ईश्वर ने चाहा, तुम्हारी समझ में भी बहुत से शेखीबाजों से अच्छी आवेगी। मैं भी पढ़ने लगा हूँ, परन्तु भूल जाता हूँ। पढ़े-लिखे आदमी के सामने मुझे एक तरह की खिफ्फ़त होती है। तुम अपने में यह कमी न रहने दो।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-314
शाहजहाँपुर
25/5/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारे सब मिल गये। 19 मई का पत्र मिला गया, जिसका जवाब लिख रहा हूँ। कल 11 बजे दिन के तुमको ‘R’ (आर) के मुक़ाम से निकाल कर ‘S’ (एस) पर डाल दिया है। तुम्हें पढ़ना ज़रूर चाहिये, अपने लिये नहीं, बल्कि दूसरों की ख़ातिर। किताबें कुछ चौबे जी के पास जरूर होंगी। मैं खुद अपने में इस कमी को महसूस करता हूँ। मैंने कल रात कुछ बन्दिशें (Limitations) हल्के कर दिये हैं। तोड़े ज़रूर नहीं, मगर इससे भी किताबें समझने में मदद ज़रूर मिलेगी और समझ तेज़ ज़रूर होगी। जो हालत तुमने लिखी है, अच्छी है। तुमने लिखा है कि “हर जगह, हर चीज़, जैसे कुछ नहीं है।“ इसके मतलब यह है कि असल में चिमटना शुरू हो गया है। यह हालत अभी और बढ़ेगी। मन का सिकुड़ना, जो लिखा है, वह यूं महसूस होता है कि उसका रुख ऊपर को काफी खिंच चुका है और उसमें जो बातें नहीं होनी चाहिये थीं, वे बहुत कुछ हट चुकी हैं।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-320
शाहजहाँपुर
6/6/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे सब ख़त मिल गये। मैं इसलिये चाहता हूँ कि तुम कुछ पढ़ों, क्योंकि तुम्हारी अनुभव-शक्ति अच्छी है। मैंने कुछ Limitations (सीमा) बहुत मध्यम व धीमे कर दिये हैं। इस तरह, पर कि सम्भव है कि वह अपने आप जल्दी ख़त्म हो जावें। हल्के तो होना शुरू हो गये हैं, और इसकी पहिचान यह है कि तुम में इल्म खुद-ब-खुद बढ़ना शुरू हो गया होगा। आज मुझे बहुत हल्के नजर आ रहे हैं। मुमकिन है श्री रामचन्द्र मिशन के स्तम्भ में से तुम भी एक हो। मैं लिखता तो यही कि तुम बोलने की भी आदत डालो, मगर लिहाज़ यह है कि तुम कमज़ोर हो, बोलने में तुम्हें तकलीफ होगी।

तुम्हारी किताब ‘सहज-समाधि’ छप गई है। पचास कॉपी में भेज रहा हूँ। तुम्हारे हर ख़त का मैं जवाब देना चाहता हूँ। यदि कोई लिखने वाला मिल जाता है, तो लिखाता रहता हूँ। इसलिये कि मैं यह चाहता हूँ कि तुम ख़त एक रजिस्टर में नकल करो और उसके जवाब जो कुछ हैं, वह भी नकल करो। किसी वक्त में छपने की ज़रूरत होगी।

27 मई को जो ख़त आया है, जिसमें Zero (जीरो) करीब-करीब छः जुमलों में तहरीर है, तो Zero (जीरो) तो अभी बहुत दूर है। जब अभ्यासी सब कुछ पा लेता है, तो लाजिमी तौर पर कुछ नहीं रहता, जिसको Zero कह सकते हैं। अभी तो सेर भर में छटाँक भर भी नहीं बढ़ पाई हो, मगर बढ़ोगी, अगर ईश्वर को मंजूर है।

वैराग्य की पूर्ण अवस्था पर पहुँचने की, तुम्हारा खत कुछ खुशखबरी दे रहा है। वैराग्य की पूर्ण हालत यह होती है, कि कोई चीज़, सिवाय ईश्वर के अन्दाज़ नहीं होती। अब तुम में यह हालत आती है और कभी इससे ऊंची हालत भी आ जाती है। इसकी वजह यह है कि कभी-कभी मेरी हालत की तलछट उसमें शामिल होती है।

29 मई के ख़त में जो तुमने शून्य गति लिखी है, ठीक है। यह ऐसी गति है, जिसमें से होकर असल में जाना होता है और यह अब बड़ी हालत की तहरीर की तख़्ती समझो और यह गति दूर तक चली जाती है। यह भी किसी वक्त में गायब होती सी दिखाई देगी, मगर साथ यह नहीं छोड़ेगी। जब तक कि असली ठिकाना न मिल जाये।

‘S’ (एस) की सैर पूरी नहीं हुई है। उत्तरकाशी पहुँचने तक मैं कोशिश करूँगा कि सैर पूरी हो जावे। उसके बाद फिर ‘T’ (टी) मुकाम पर डाल दूंगा।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-322
उत्तरकाशी
13/6/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

मैं 12 जून को यहाँ आ गया। सर्दी यहाँ नहीं है। अभी यहाँ 4-6 रोज़ रहने का इरादा है। यहाँ पर वेदान्ती और हठयोगी हैं। Transmission (प्राणाहुति) का चाहनेवाला कोई नहीं मालूम होता। अभी मैं लोगों से मिल भी नहीं पाया हूँ। तुम किताब जो पढ़ती हो, उसका नोट लेती जाना, यह अच्छा रहेगा। आज मैंने तुमको ‘T’ (टी) स्थान पर खींच दिया है। मैंने यह सोचा कि जब और लोग यहाँ के फ़ायदा नहीं उठाना चाहते तो हमारे आपस के लोग फायदा उठा लें। मास्टर साहब को तीर्थ का फल मिल गया और जो मेरे साथ हैं, कुछ न कुछ रोशनी उन्हें भी पहुँची।

यहाँ के बारे में मैंने यह तय नहीं किया है, कि इस जगह को कैसा कर के छोडूं। ऐसा कि जैसा यह है, या ऐसा कि इस जगह पर कोई महात्मा अपनी योग सिद्धि न कर सकें। मेरी तबियत ठीक है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-326
शाहजहाँपुर
11/7/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे ख़त तीसरी और पाँचवी जुलाई के मिल गये। पढ़कर खुशी हुई। तुमने अपने पत्र में लिखा है कि अन्तर के पर्दे न जाने क्यों ढीले और धुंधले पड़ते जाते हैं। दुनियाँ पुकार-पुकार कर रोशनी देखने के फेर में पड़ी है। कोई सूर्य की भाँति रोशनी देखना चाहता है और कोई चन्द्रमा जैसी। कोई-कोई इस रोशनी को यहाँ तक बढ़ाना चाहते हैं और कहते भी हैं कि वहाँ हजारों सूरज से ज़्यादा रोशनी है और इसी की कोशिश करते हैं। यह ज़रूर है कि योग की शुरूआत उस वक्त होती है, जब कि एक दफा भी रोशनी दिखाई पड़ जाये, मगर इसके यह माने नहीं कि बस असल रोशनी Matter (पदार्थ) है। जो चीज़ असल है, वह न रोशनी है और न अंधेरा और इसको धुंधलापन ही कह सकते हैं। Originality (मूल वस्तु) बस यही है कि हमारी कुल इन्द्रियाँ यही धुंधली शक्ल अख्तियार कर लें।

तुम्हारे ख़त की अगर हर लाइन का जवाब दिया जावे तो बहुत लम्बा-चौड़ा ख़त हो जावेगा, लिहाज़ा संक्षेप के साथ इतना कहता हूँ कि तुम्हारा Body Consciousness (भौतिक चेतना) अब खत्म हो चुका है, Soul Consciousness (आत्मिक चेतना) शुरू है। इसके खत्म होने में वक्त लगेगा। ईश्वर ने चाहा तो यह भी इसी तरीके से हो जावेगा।

आज इसी वक्त 3.25 PM. (रात्रि) पर तुमको ‘T’ स्थान से निकाल कर ‘U’ (यू) स्थान पर डाल दिया है। इससे एक घंटा पहले ‘T’ (टी) स्थान पर तुम्हारे रोकने की ज़रूरत मालूम होती थी। मगर अब ऐसी बात महसूस नहीं होती।

तुम्हारा शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-334
शाहजहाँपुर
7/8/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे सब पत्र मिल गये। मैं बिल्कुल ठीक हूँ। हालत तो तुम्हारी ईश्वर की कृपा से अच्छी है ही। तुम ‘U’ (यू) स्थान पर हो और वह मुझे इतना अच्छा मालूम देता है कि नहीं मालूम क्यों मुझे इससे ऊपर स्थान पर ले जाने को तबियत नहीं चाहती। मेरी निगाह जब तुम्हारे ‘U’ (यू) स्थान पर जाती है, तो मुझे बड़ी Peace (शान्ति) महसूस होती है और कैफियत बड़ी उम्दा हो जाती है।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-337
शाहजहाँपुर
31/8/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

मैंने एक पत्र ता. 17.8.53 को कानपुर के पते से भेजा था, मालूम होता है कि तुमको नहीं मिला। तुम्हारे ख़त सब मिल गये। आज जन्माष्टमी है। मैंने तुम्हें लिखा था कि मेरा जी तुम्हें ‘U’ (यू) स्थान से अभी ऊपर ले जाने को नहीं चाहता है, और अब भी वही बात है और यह इतना अच्छा स्थान है कि मैं देख-देख कर खुश हो लेता हूँ।

आज जो पोस्टकार्ड तुम्हारा मिला है, उससे यह मालूम होता है कि अभी तुम्हें हटाना भी नहीं चाहिये, जब तक कि कुल बातें उस स्थान की तुम पर न खुल जावें और खुलना ईश्वर की कृपा से शुरू भी हो गई हैं और उसी की Sitting (सिटिंग) मैंने तुमको दो-एक दी हैं और दूंगा भी।

तुमने लिखा है कि अन्तर तक नहीं दीखता। इसके मानी यह हैं कि अंतर बाह एक होने की शुरूआत हो चुकी है, गो अभी बहुत कुछ बाकी है। भगवान की तारीफ तुकाराम ने खूब की है:-

“गुड़ से मीठे हैं भगवान, बाहर-भीतर एक समान।“

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-339
शाहजहाँपुर
16/9/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारी चिट्टी मिली। मेरी तबियत अब ठीक है। तुम्हारी हालत ईश्वर की कृपा बहुत अच्छी है, मगर ‘U’ (यू) स्थान से ऊपर ले जाने की अभी तक मेरी तबियत नहीं सी चाहती है। इसमें भी ‘मालिक’ की मौज मालूम होती है और यह स्थान मुझे इतना अच्छा मालूम होता है कि उसे देख-देख कर जी खुश होता है। अभी यह खुलेगा और बड़ी शान्ति और साम्य अवस्था तथा सादगी महसूस होगी। खैर, तुम मुझे लिखना।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-343
शाहजहाँपुर
28/9/1953
प्रिय बेटी, खुश रहो।

पत्र मिले। ता. 24.9.53 की सुबह को 8.30 बजे मैंने तुमको ‘V’ (वी) स्थान पर डाल दिया है। अब तुम्हारी तबियत ठीक होगी। तुम इलाहाबाद, जहाँ तक हो सके, चली जाना। वहाँ सबको लाभ होगा और जज साहब को भी Sittings (सिटिंग्स) देना। मुझे उनके दिल पर मकड़े के जाले की भाँति कुछ मालूम होता है। इसकी वजह उनके पहले का गलत अभ्यास है। वह पार्वती जी की शक्ल का ध्यान करते थे।

अच्छा तो यह है कि तुम थोड़े दिनों बीमारी जाने का Meditation (ध्यान) खुद करो। मैंने तुम्हें एक बार बतलाया भी था। वह यह है कि धुंयें (Smoke) की शक्ल पीछे से सब बीमारियाँ निकल रही हैं और ब्रह्माण्ड से Energy (शक्ति) आ रही है जो बीमारियों को दूर कर रही है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-350
शाहजहाँपुर
31/10/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र २० अक्टूबर सन् ५३ का अभी मिल गया। तुम्हारा पत्र देखकर तबियत उछल पड़ी, इसलिये कि मेरी जिन्दगी में ऐसी हालतें मेरे सामने आ रही हैं। यहाँ तो मिशन के मेम्बर्स का यह हाल है कि उन्हें अपने से ही फुर्सत नहीं। कुछ ऐसे भी हैं कि यह उम्मीद लगाये बैठे हैं कि में एकदम से उन्हें सब कुछ कर दूंगा। लाखों जन्म गुजर गये, अब तक अपने वतन को वापसी नहीं हुई और अब भी इसका ख़्याल पैदा नहीं होता। मैं भला क्या कर सकता हूँ, जब कोई चलना ही नहीं चाहता। यह सब ईश्वर के हाथ में है, जब ‘वह’ चाहेंगे, यह भी हो जावेगा। मैं तो यही चाहता हूं कि मुझ को कुछ थोड़ा बहुत आता है, उतना ही लोग सीखें और इतना सीखने के बाद भी अगर उनकी तडप बुझ न चुके, जैसा कि होना चाहिये, तो मैं आजादी से कहने के लिये तैयार हूँ, कि मुझसे ज्यादा जानने वाले को तलाश कर लें, इसलिये कि मेरी खुशी इसी में है कि लोग मुझसे बेहतर निकलें। मेरा क्या और मेरी हालत क्या? ठीक तो गुरू महाराज को ही खबर है। इतना जरूर मैं जानता हूँ कि Infinite (अनन्त) में Swimming (पैराव) ज़रूर कर रहा हूँ और इसका छोर नहीं, इसलिये मैं आत्मिक उन्नति के बारे में क्या राय कायम कर सकता हूँ, जब कि न मालूम कि अभी कितनी Swimming (पैरना) बाकी है। एक बात में ज़रूर लिखे देता हूँ कि मुमकिन है मेरी थोड़ी बहुत हालत जो कुछ भी है, अगर कहीं कोई किसी समय में इसका समझने वाला मिल गया किसी तरीके से और लोग भी इसको मालूम कर सकें और ख़ास कर मिशन के Member (सदस्य) तो फिर उनको मुमकिन है, तमाम उम्र अफ़सोस से हाथ मलना पड़े।

बिटिया ! जाने क्या बात है कि मैं बराबर कहता भी रहता हूँ और लिखता भी रहता हूँ, मगर ज्यादातर उनके जूं नहीं रेंगती, और मैं तो भाई, इसको अपनी ही कमज़ोरी कहूंगा, और वाकई कसूर भी मेरा है। यह हो सकता है कि मुझमें कुछ कच्चापन हो, जिसकी वजह से मेरे कहने सुनने का और तवज्जह का उन पर असर न पड़ता हो। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनकी जाति का अभिमान ज्यों का त्यों है, और इसी हैसियत से वह मुझको देखते हैं जिससे ऊंच को, नीच को देखना चाहिये। मैं तो भाई ऐसे तबके में पैदा हुआ हूँ, जिसको ऊंच कुल वाले को नीच समझना ही चाहिये। उनकी निगाह मेरे जिस्म और जाति पर रहती है; उस हालत पर नहीं रहती, जिससे उनको मदद लेना है। मुझे इसका कुछ खेद नहीं है। मैं तो वह च्यूंटी हूँ, कि लोग मुझे अपने पैर से मलें, वह बर्र में नहीं हूँ, कि जिसके पकड़ने से या अपनाने से काट खाऊं और उनको तकलीफ पैदा हो। जाति का अभिमान एक बहुत बड़ी रुकावट है और यह पहली चीज है, जो दूर होना चाहिए। ईश्वर का हजार-हजार बार धन्यवाद है कि मैं सबसे ऊंचे कुल में पैदा नहीं हुआ, जो यह कमजोरी मुझमें रहती। कबीर साहब ने क्या अच्छा लिखा है:-

नीच-नीच सब तर गये, सन्त चरन लवलीन।
जाति के अभिमान से, बूड़े राकल कुलीन।।

तुम्हारे पत्र के उत्तर देने से पहले मैं संक्षेप में कुछ जीव व ब्रह्म के बारे में लिखना चाहता हूँ। किताबों में नहीं मालूम क्या लिखा हो। मेरी समझ में जो है, वह मैं लिख रहा हूँ। किताबों से जो कोई Tally (मिलान) करना चाहे, कर लेवें।

जीव को अपना जीवपन कब महसूस हुआ, जब उसने अपने बैठने का ठिकाना बना लिया; यह ब्रह्म था और है। उसमें इसलिये जीवपन पैदा हुआ, इसलिये कि उसकी बैठक ऐसी जगह थी, जहाँ कि उसको उसी की बू आ रही थी। इस बात ने और इस एहसास ने उसकी रंगवत और भी ज्यादा कर दी। इसलिए कि जब एक रंग का एहसास हुआ, दूसरा रंग वह खुद-ब-खुद ढूंढने लगा और उसमें अनेकता पैदा हो गई। फिर क्या था, लालच, मोह, हर चीज की ख्वाहिश उसमे पैदा होने लगी; गोया सोने का कौवा एक लोहे के पिंजरे में बन्द हो गया और इसका मोहताज कि उसकी सैरी के लिये, उसको दाना-पानी की जरूरत हुई।

कहाँ तक कहा जावे, यह सब जीवपने की बातें हैं। अगर उसको कोई ऐसा मिल गया कि जिसने उसको यह ख़्याल दिला दिया कि तुम असल हो तो उसके बाहरी पर्दे फिर टूटने लगे। अब हम चूंकि जीव हैं, इसलिये इसी ने अपनी ऊंची हालत की ख़बर दी, यानी ब्रह्म की। असल में यह दोनों एक हैं। अब मैं थोड़ी सी रोशनी बेपढ़ों की भाषा में फेंकता हूँ। जीव में चूंकि हरकत (Movement) मौजूद है, उसको ख़बर हरकत वाले की ही हो सकती है और वह किसकी? ब्रह्म की। ‘ब्रह्म’ शब्द ‘ब्र’ और मनन निकला है, जिसके मानें हरकत और सांचने के हैं। जो Function (क्रियायें) कि जीव के अपने छोटे शरीर में होते हैं, वह Function (फन्कशन) ब्रह्म के अपने बड़े शरीर में होते हैं। बंधन जीव में भी हैं, और ब्रह्म में भी। अन्तर केवल इतना है, कि जीव में बंधन ज्यादा और ठोसता लिये हुए है और ब्रह्म में सूक्ष्मता लिये हुए। मगर अपने-अपने लिहाज़ से Limitations (सीमायें) दोनों में हैं। वेद में 24 प्रकार के ब्रह्म लिखे हैं, या 26 हों इसको एक विद्वान सन्यासी ने मुझे बतलाया था और आखिरी ब्रह्म को भूमा कहते हैं। महात्माओं ने इससे ऊंची हालत को पार-ब्रह्म कहा है, मगर भाई, इस असल की न मालूम कितनी हालते होती चली गई हैं। जैसी संगत मिलती गई, वैसा ही असर उस पर आता गया।

हमारी उन्नति में जहाँ तक सिलमिलावट और तरकत मौजूद है वहाँ तक हम उसी तरह के ब्रह्म के बंधन में हैं और में तो भाई, इन सब हालतों को फंसाव ही कहूँगा। जहाँ हमारा ठिकाना है, वहाँ हवा क्या, रोशनी की भी गुजर नहीं। एक बुझे हुए दीपक की महफिल है, जहाँ न कोई चमत्कार है और न चंचलता, सब Light-Light (प्रकाश) पुकार रहे हैं और मैं भी यही कहता हूँ, क्योंकि रास्ते में यह सब चीजे आती हैं, मगर ठिकाने पर पहुँच कर यह सब खत्म हो जाती हैं। मैं समझता हूँ कि अगर हम Light (प्रकाश) ही को चाहते हैं, तो एक जुगनू, जो अपनी Light (लाइट) दूसरों को भी दिखा देता है और Proof (प्रमाण) देता है कि उसके पास Light (लाइट) मौजूद है, तो उसके महात्मा होने में कोई शक नहीं रहता। किसी ने खूब कहा है:-

“हम जहाँ हैं, वहाँ से हमको भी कुछ हमारी ख़बर नहीं आती।“

अब मैं तुम्हारी हालत के बारे मे लिखता हूँ। तुमने लिखा है कि “ब्रह्म भी खालिस नहीं है, उसमें कुछ न कुछ अवश्य है।“ इसका उत्तर मैं बहुत कुछ ऊपर दे चुका हूँ। फिर उसमें लिखा है कि “उसमें सुहानेपन की बू मौजूद है।“ जहाँ तक सुहानापन है, वहाँ तक असल ब्रह्म नहीं कह सकते, इसलिये कि बहुत कुछ माया का लेस-पोत सूक्ष्म हालत में मौजूद है। मुझे तो ऐसी सूनी महफिल में तुम सबको ले जाना है, जहाँ कि सूनापन भी हजारों गुना भारी है और वाक़ई Perfection (पूर्णता) जो कि मनुष्य के लिये सम्भव है, वही है। हमारे यहाँ इतनी खूबी जरूर है कि Perfection (परफेक्शन) सब चाहते हैं, मगर मेहनत और Devotion (भक्ति) के लिये उनको उनकी सुस्ती इजाजत नहीं देती। मान लो कि ईश्वर इतनी कृपा करे कि बिना मेहनत उनको यह हालत कहीं मिल जावे, तो नतीजा क्या होगा? कि मेरी शकल से बेजार हो जावेंगे, इसलिये कि इस हालत में मज़ा क्या बल्कि शुबह और गुमान तक नहीं। भाई, मज़े की हालत में अपने ऊपर अक्सर तारी कर लेता था, अब मौजूदा हालत जो कुछ है, बेमजे की है। उससे एक Second (सेकेण्ड) भी हटने को जी नहीं चाहता। सो लोग मज़े की हालत लेते हुए जब बेमज़े की हालत में पहुँचेंगे, तब उनका यह हाल हो सकता है, जैसा कि मेरा कि बेमजे की हालत से हटने को जी नहीं चाहता। अगर कोई मुझसे यह कहे कि तुम अपनी जान दे दो या मौजूदा हालत से अलग हो जाओ तो, जान की Sacrifice (बलि), मुझे दिल से कबूल होगी। अब यह नहीं कहा जा सकता कि वह हालत क्या है? शब्द नहीं, जुबान नहीं कि उसको बयान कर सकूं।

तुमने अपनी वर्तमान हालत को ब्रह्म-दर्शन की हालत लिखा है, वह इस लिहाज़ से तो सही है कि ब्रह्म की हालत सूक्ष्म से सूक्ष्म हर जगह होती चली गई है, मगर जो ब्रह्म का एहसास इस वक्त है, अर्थात ‘V’ (वी) स्थान पर उसमें अभी लय अवस्था पैदा नहीं हुई। हल्का-हल्का इशारा तो मैं करता जाता हूँ, ताकि हालत आहिस्ता खुले, इसलिये कि तुम बीमार हो और इस समय तन्दुरुस्त हो जाना ही तुम्हारा धर्म है। तुमने यह भी लिखा है कि “मेरा तो रूप ही ब्रह्म हो गया है” तो ब्रह्म रूप तो हो ही और यह सब कह सकते हैं, मगर तुम्हारे लिये मैं यह लिखता हूँ कि हिरण्यगर्भ की हालत से तुम बहुत ऊंची निकल चुकी हो। Purity (शुद्धता) तो जिस जगह पर तुम हो, अधिक है। मैं इस हालत को भी बंधन की हालत कहता हूँ। जब Purity (शुद्धता) और Impurity (अशुद्धता) दोनों का एहसास ख़त्म हो जावे, तब Reality (वास्तविकता) की शुरूआत समझना चाहिये और उसके आगे अनगिनत Stages (दशायें) हैं, जो गिनने में नहीं आती। मगर यह याद रहे कि Purity (प्योरिटी) और Impurity (इम्प्योरिटी) मिटने का ख्याल मत बाँधना, कुदरती तौर पर जो हालत आती जावे, उसको एहसास करती चलो; रफ्ता रफ्ता वह हालत भी ईश्वर देंगे। तुमने यह भी लिखा है कि “अहं ब्रह्मास्मि की दशा है।“ यह सही हो सकता है, मगर बिटिया, यह हालत हर पर्दे पर और हर स्थान पर महसूस होती है। जितनी ऊंची हालत होती जाती है, उतने अच्छे रूप में यह दिखलाई देती है। इसको मैं क्या लिखूं? मेरी मानेगा कौन? वेदान्ती तो यही कहेंगे, अगर मैं जुबान खोलूं कि यह गलत कहता है, और वेद-वाक्य के सम्भव है कि यह खिलाफ पड़े। जब हमको अहं ब्रह्मास्मि का भास होता है, तो यह आवश्यक है कि किसी चीज़ से हम उसको Differentiate (भेद करना) कर लेते हैं, गोया कोई चीज़ अभी ज़रूर ऐसी है जो Difference (भेद) का एहसास दिला रही है। यह तो रही Philosophy (दर्शन) और समझाने की बात। असलियत वहाँ है, जहाँ यह Difference (भेद) ख़त्म हो जाये और फिर न अहं ब्रह्मास्मि का एहसास रहे और न इसके विरूद्ध ! अब भी भाई, कहने को तो perfection (पूर्ण) हो गया, मगर नहीं मालूम, अभी क्या-क्या बाकी है। मैं तो यही कहूँगा कि यहाँ पहुँचने पर भी दिल्ली दूर रह जाती है। अब बिटिया, बताओ मैं क्या लिखूं? इसके आगे भी कुछ न कुछ ज़रूर लिखा जा सकता है मगर कौन समझेगा और कौन मानेगा। ख़ैर, एक बात मैं इससे आगे की भी लिखे देता हूँ। वह यह है कि वहाँ पहुँचने पर सूक्ष्मता बिल्कुल ख़त्म हो जाती है, मगर बहुत बढ़ने के बाद। बस इससे आगे Expression (अभिव्यक्ति) के लिये शब्द नहीं मिलते। इतना मैं और कहे देता हूं कि इस हालत पर पहुँचने के बाद भूमा के करीब पहुँचने के लिये हजारों वर्ष भी कम हैं। बल्कि उस दशा पर (जहाँ की सूक्ष्मता ख़त्म होती है) जाने के लिये हजारों वर्ष चाहिये और फिर नहीं मालूम कितनी हज़ार सीढ़ियाँ भूमा के निकट पहुँचने में लगेंगी। मैं तो यही समझता हूँ कि इन हालतों को पार कराने की शक्ति सिवाय हमारे गुरू महाराज के किसी में पाई नहीं जाती और यह ईज़ाद ‘आप’ ही की है कि जिस्म रखते हुए यह Stages (दशायें) पार कराई जा सकती हैं।

कहाँ तक धन्यवाद ऐसी बुजुर्ग हस्ती को दिया जाये कि जिसने बज़रिये Transmission (प्राणाहुति) एक Second (सेकेन्ड) में उस आखिरी हालत पर पहुँचाना मुमकिन बना दिया। हम लोग वाकई अंधे हैं जो ऐसी बुजुर्ग हस्ती की तरफ नहीं देखते, जिसने वह काम कर दिखाया, जिसके लिये Spiritual History (आध्यात्मिक-इतिहास) ख़ामोश है। ईश्वर करे हम सबको यह हालत नसीब हो। यह important (महत्वपूर्ण) पत्र है। जब लखीमपुर जाओ, तब इसको लेती जाना, ताकि मास्टर साहब की File (फाइल) में लग जाये।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-354
शाहजहाँपुर
22/11/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारा व केसर का मिल गया। मैं दीवाली में कुकरा रहा, लखीमपुर न जा सका। चौबेजी, मास्टर साहब और कई लोग वहीं आ गये थे। अंग्रेज़ी किताब का proof इलाहाबाद से आ रहा है, इसलिये बिल्कुल फुर्सत नहीं है। खत पहुंचने की इत्तिला दे दी। वैसे उस खत का जवाब यदि लिखाया जाय, तो बहुत लम्बा-चौड़ा हो जावेगा। तुम्हें भी इस वक्त सब काम छोड़कर सिर्फ तन्दुरुस्ती बढ़ाने की फ़िक्र करनी चाहिये। चौबे जी ने भी मुझसे कहा था कि वह लखीमपुर तुम्हें साथ लेकर शाहजहाँपुर ठहरते हुए जावेंगे। बड़ा अच्छा है, तुम आ जाओ। मैं अपना इलाज एक हकीम का कर रहा हूँ, और उससे कुछ फ़ायदा भी है। तुमने अपनी उन्नति, सच पूछो तो खुद ही की है। थोड़ी बहुत मदद मैं ज़रूर देता गया और देता रहूँगा। इसलिये कि अगर मुझमें काब्लियत होती तो जितने सत्संगी है, सब तरक्की खूब कर गये होते। ईश्वर तुम्हें जल्द तन्दुरुस्त कर दे। केसर, फूलो व उनके बच्चों को दुआ।

  शुभचिंतक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-357
शाहजहाँपुर
7/12/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारा मिला। तुमने अपने खत में मर-मिटने का अक्सर ज़िक्र किया है। मर-मिटने के यह मानी नहीं हैं कि जिस्म छोड़ने की कोशिश की जाय, जिसका तन्दुरुस्त रखना भी अपना धर्म है, बल्कि इसके मतलब यह है कि अपना आपा या शुद्ध और भद्दे अहंकार को दूर कर दे और जब आपा जाता रहे, तो इन्सान वही रह जाता है, जो वाकई है और इसी की कोशिश में तमाम महात्मा लगे रहते हैं। अब मर-मिटने के मानी तुम समझ गई होगी। इस वक्त तुम्हें तन्दुरुस्त बनने की ही कोशिश करना चाहिये। एक मर्तबा तन्दुरुस्ती बन गई तो सोचो तो सही कि यह अभ्यास और मिशन के काम में कितना काम देगी। तुम ख्याल बाँधो कि तुम्हारी सब बीमारियाँ जा रहीं हैं और तुम तन्दुरुस्त हो रही हो। इससे सेहत बहुत जल्द होगी।

शुभचिंतक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-359
शाहजहाँपुर
14/12/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा ता 5.12.53 का खत मिल गया। जिस्म का तन्दुरुस्त रखना भी हर एक का धर्म है। जब जिस्म तन्दुरुस्त होता है तो उसी लिहाज से सूक्ष्म शरीर भी तन्दुरुस्त बनता है और दिमाग़ सोच-विचार के लिये बहुत अच्छा काम करता है। पिछले खत में मैंने यह लिखा था कि मर मिटने के मानी यह है कि अपना आपा या अहंकार न रहे। इसके यह मानी नहीं कि जिस्म की परवाह छोड़ दी जाय और वह कमज़ोर होकर जल्द खत्म हो जाये। इसी आपा को मेटने के लिये लोग बड़ी मेहनत करते हैं और हमारे यहाँ बहुत सहज में मिट सकता है और उसकी तरकीब वही है जो तुमने की है। वैसे और भी तरकीबें हैं, मगर वह ज़रा मुश्किल हैं। चूंकि लोगों को इसका शौक नहीं, इसलिये कौन करे और हर एक को यह चीज़ बताई भी नहीं जा सकती, जब तक कि पूरा Faith (विश्वास) न हो जाये और बतायें भी तो करता कौन है। सिखाने वाले को इसमें बहुत कुछ अहंकार रहित ज़रूर होना चाहिये, वरना तरकीब अच्छा काम नहीं देगी। मेरी फ़िक्र न करो, मेरी मौत अभी नहीं है। किताब का Proof आ रहा है।

  शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-368
शाहजहाँपुर
2/2/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत मिला। यह तुमने खूब लिखा कि “मेरे पास जो कुछ भी है, सब आपका ही दिया हुआ है”। अगर देने-लेने का सवाल है तो, जब मैं सोचता हूँ तो मुझे यह मालूम होता है कि मेरे पास जो कुछ है, वह सब तुम्हारा दिया हुआ है। तुम्हारी हालत पढ़कर मुझे ऐसा प्रतीत होता है, वैसे सही बात ईश्वर जाने कि तुम बन्धन से छुटकारा पा चुकी हो। इसमें भी अभी जाने कितना पैराव बाकी है। मतलब तो तुमने अपना बना लिया और इन्सान अगर बहुत उपज चाहता है तो यहीं पर उसकी दौड़-धूप समाप्त हो जाती है, मगर मेरी आँखें तो आँख ही नहीं रहीं। अब देखूं तो किससे देखूं। न मालूम मेरी क्या हालत है। शुक्र हर हाल में है।

  शुभचिंतक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-373
शाहजहाँपुर
27/2/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुलसी दास आये थे और कोई चालीस मिनट तक मेरे पास रहे। उन्होंने 16 फरवरी सन् 54 का खत दिया। इस खत में तो मैं समझता हूँ कि सब हमारे लालाजी की तारीफ़ थी और वह वाकई सराहने के लायक हैं। उत्सव में उन्हीं का चमत्कार है। तुम्हारी Reading जो कुछ भी है बहुत ठीक है। असल में मेरे ज़रिये से जो कुछ हो जाता है उसका पता मुझको भी नहीं हो पाता। यहाँ तो खैर कोई बात नहीं है, मगर Tour (यात्रा) की दशा में मुझ पर अक्सर डाट भी पड़ी है, इसलिए कि मुझे अन्दाज़ा अक्सर ठीक नहीं हो पाता और बेजान चीज़ को जब मैं Charge (चार्ज) करता हूँ तो अक्सर मैं उससे बहुत ज्यादा कर देता हूँ। गो घर पर यह ख्याल रखा था कि बच्चे भी मौजूद हैं। एक गलती मुझसे पहली मर्तबा गोवर्धन पहाड़ पर हुई थी, उस वक्त मुझे यह अन्दाज़ न था कि मुझसे ऐसी चीजें भी हो सकती थीं, क्योंकि मेरा पहला मौका था। इसका लिखना बेकार हैं, हमारे नोट में सब कुछ मौजूद हैं।

  मेरे पास लोग आते हैं। सत्संग तो उन्हें मैं कराता हूँ, मगर जब कोई कुछ दिनों ठहरता है तो अक्सर मुझे सही हिट (Hit) हो जाता है कि क्या करना चाहिए और उसे समझ कर जब मैं करता हूँ तो नतीजा बहुत अच्छा होता है। बस तुम्हारा यही हुआ है, जिसका नतीजा यह हुआ कि Soul (आत्मा) के bondage (बंधन) बहुत कुछ मध्यम पड़ गये हैं। यहाँ तक कि मुश्किल से अनुभूति होती है।

    जिसका हाल तुमने 18 व 22 फरवरी में लिखा है। उसका भी मैं संक्षेप के साथ जवाब देता हूँ। शुद्धताई तो तुममें ऐसी है, मेरा भी जी इस शुद्धताई के लिये ललचाता है। मुझमें अगर कोई शुद्ध चीज़ है तो वही है, जो लालाजी ने प्रदान की है, बाकी भाई मुझे ऐसा समझो, मिसाल की तौर पर कि जैसे कुल Universe (सृष्टि) मेरे पेट में हो, जितनी खटक कि होती रहती है, वह सब मुझमें टकराती रहती है। शुद्धता और अशुद्धता सब उसमें शामिल रहती है इसलिये और भी जब मैं तुम में शुद्धता देखता हूँ तो उसी को देखकर खुश हो लेता हूँ। क्या कहूँ, ईश्वर के धन्यवाद के लिये मेरे पास कोई शब्द नहीं है। बहुत Higher Approach (ऊंची पहुंच) यानी वह आध्यात्मिक उन्नति जो अपने आखिर दर्जे तक पहुंची हुई हो, में जो बात है, वह कुछ ऐसी है कि कहते नहीं बनता और यह भेद भी है। जी मेरा छुपाने को भी नहीं चाहता और पूरे तौर से यों नहीं खोलता कि कोई शख्स इसको मानने के लिये तैयार नहीं होगा और अगर होगा भी तो ऐसी तरक्की को कोई पसन्द नहीं करेगा और वह तरक्की भी ऐसी कि जिसको ईश्वर पहुंचा दे तो उससे हटने को जी नहीं चाहता। बहुत कोशिश करता हूँ, आगे ज़बान खोलने को जी नहीं चाहता, दिल रोकता है। खैर रहने दो, यह तो इतना बड़ा राज है कि शायद इसका इशारा ही मैं किसी एक को कर जाऊं और जो पहुंच गया, वह तो जान ही लेगा। मगर खुश तो तब हूँ कि जब मेरी ज़िन्दगी में ही एक काना और बने। तुमने लिखा है कि जिधर देखती हूँ अपनी ही शक्ल दिखाई देती है। यह तो बड़ी अच्छी हालत है। इसी को महात्माओं ने Realization (साक्षात्कार) कहा है और इस हद तक पहुंचे हुए लोग Natural Course (स्वाभाविक रूप ) में शायद ही कोई मिले और मिलेगा तो शायद कोई इससे एक Step (कदम) आगे मिले और यह Perfection (पूर्णत्व) है। सब की दौड़ धूप यहाँ पर ख़त्म हो जाती है और मेरी राय में यह Realization की पहली सीढ़ी है। अगर मैं Realization को नापूं तो तबियत मेरी यही कहेगी कि तुमने A, B, C, D, (ए. बी. सी.डी.) अब शुरू की है। यह बातें किसी से अगर कहूँ तो, मुझे बावला समझेगा और उसे यह मालूम हो कि यह भी कुछ रूहानियत में कदम रखे हुए हैं तो वह यह कहेगा कि अपनी बड़ाई जता रहा है। यह शख्स कुछ नहीं जानता, मगर मैंने अपनी किताबों में किसी न किसी तरीके पर कह सब कुछ दिया है। मौजूदा हालत को तुम निखरी हुई तुरीयावस्था कह सकती हो।

  21 फरवरी सन् 1954 के पत्र में जो बन्दगी करना लिखा है, यह बड़ी बात है। बन्दा फिर भी बन्दा रहेगा। इस लिहाज से जो उसको मालिक मानते हैं, इसीलिये हममें बन्दगी का ख्याल रहना बड़ा अच्छा है। आज मुझे दिन भर यह ख्याल रहा और बड़ी कोशिश की मुझसे भी बात निभ जाये, क्यों कि यह अच्छी है। मुझे इस बात का कभी पता न चला और चला हो तो याद नहीं। बन्दगी जहाँ तक हो, छोड़ना कभी न चाहिये, अब यही चीज़ आगे पहुंचायेगी। तुम सोचकर लिखना, चाहे मास्टर साहब से भी मश्विरा ले लेना कि मैं अब इस बात को अपने में कैसे लाऊं अथवा बन्दगी, कैसे करूँ ? चीज़ बड़ी अच्छी है।

    अम्मा को प्रणाम

  शुभ चिंतक
  रामचन्द्र  ऊपर का खत खत्म कर चुका तो 23.2.54 का लिखा हुआ खत भी मिल गया। तुमने जो यह लिखा है कि तबियत चाहती है कि कपड़े नोच डालूं, वगैरह। मैं समझता हूँ कि यह सब बातें बेचैनी हटाने के लिये मजबूर करती होंगी। यह भी दर्द की एक हालत है। तुमने लिखा है कि यह मालूम होता है कि दिल कोई थामे रहता है ताकि ऊपर की बातें न हो सकें। यह सब हमारे लाला जी का करिश्मा है। वरना ऐसी हालत पर और खास तौर पर जो चन्द महिने पहले आ चुकी है, अवधूत हो जाने का अन्देशा रहता है। हमारे यहाँ कोई अवधूत नहीं होता।

  तुमने डर और खौफ़ के बारे में जो लिखा है, यह बड़ी अच्छी हालत है। इसके बारे में शायद 6 या 7 महीने हुए हों या ज़्यादा मैंने या तो किसी खत में लिखा है या जुबानी पूछा है कि तुम्हें खौफ़ तो मालूम नहीं होता। तुमने शायद कहा था कि हाँ, कुछ मालूम होता है। उस वक्त यह हालत उभार पर न थी अब पूरे उभार पर है। इस हालत को “खुदा-तरसी” हालत कहते हैं। तरस के माने डर के हैं, अर्थात् ईश्वर से खौफ़ पैदा हो जाना। जब यह हालत पैदा हो जाती है, तो शास्त्र विरुद्ध काम अगर मन कराना चाहे तो इस भय की वजह से नहीं हो पाते और इस हालत की फ़कीरों ने बड़ी तारीफ़ की है। तुम्हें यह हालत ईश्वर मुबारक करे। मैं इसको कम नहीं करूंगा। अपने आप जैसी सूरत उसकी होगी ठीकमठीक आ जायेगी। हमने जो काम चलते समय सुपुर्द किया है और जिसकी याद मास्टर साहब ने भी की होगी, उसका ध्यान रखना।

  शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-376
शाहजहाँपुर
6/3/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत 27.2.54 का भी मिल गया। पिछला खत जो मैंने भेजा था उसमें एक बात तुम्हारी जानकारी और तजुर्बे के लिये लिखने को रह गई थी, वह यह है कि जब ईश्वरीय भय की हालत शुरू होती है, तो भय एहसास होता है, मगर उसमें यह पता नहीं चलता कि किससे भय है। बस यही और भय में और इस भय में फ़र्क है।

  तुम्हारे कुल खत से और इस हालत से यह अन्दाज़ होता है कि तुम्हारी हालत Realization की है और जिसकी तलाश थी, वही अब चीज़ है। मुझे बड़ी खुशी है कि किसी को Realization हुआ तो मैं बिटिया क्या करूँ? मेरी कोई सुनता ही नहीं। नहीं तो अब तक जितने लोग भी मेरे पास आ रहे हैं पहिले के, उनमें से कुछ और लोग Realized हो चुके होते। मोती मैं बिखेरना चाहता हूँ, मगर दामन कोई अपना फैलाता नहीं। यह मेरी किस्मत है। उन लोगों की खता भी क्या हो सकती है। मगर तुम्हारे लिये इतना और कहूँगा कि हालत तुम्हारी ज़रूर Realization की है, मगर इसको काफ़ी न समझ बैठना। अभी जाने कितना और चलना बाकी है। मुझे तो भाई अभी तक उसका छोर न मिला, न मालूम कैसे लोग परम सन्त और परम हंस अपने को ख़्याल करने लगते हैं। यहाँ तो मैंने यह हाल देखा है कि सन्यासियों में और दूसरे सम्प्रदायों में भी यह बात होगी, कि पढ़-पढ़ाकर और कीर्तन वगैरह करके और जप और पूजा करके अपने आपको ब्रह्म समझने लगते हैं। मैंने ‘W’ स्थान से आगे नहीं बढ़ाया, इस लिये कि कुछ तन्दुरुस्ती का भी ख्याल है कि कुछ ज़रा और अच्छी हो लो। यह ज़रूर है कि इस स्थान की सैर अब जल्द खत्म होना चाहती है और यह सब हाल जो कुछ तुमने लिखा है, सब इसी स्थान का खेल है। तुम्हारी तन्दुरुस्ती का हाल मुझे मिल गया।

  आध्यात्मिकता की मुझे ज्यादा ज़रूरत नहीं, इस लिये कि यह तो लालाजी के बाँयें हाथ का खेल है।

  तुम्हारा खत 2.3.54 का लिखा हुआ आज अभी मिला। जब लय- अवस्था हो जाती है, तो उसकी कोशिश में बंधन महसूस होता है। Realization के बाद उसकी याद में कोशिश करने में दिल घबरा जाता है। तुम्हारे खत से मालूम हुआ कि तुम अब Realization के दूसरे Chapter में क़दम रख रही हो।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-378
शाहजहाँपुर
13/3/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो।

अम्मा की तबियत के बारे में अक्सर फ़िक्र रहती है। ईश्वर जल्द आराम करें। X, Y स्थान पर अर्थात् इन दोनों के दरमियान कुछ गुजंलक थी, अब वह साफ़ हो गई। Left corner पर कुछ थोड़ी सी अब भी है, वह भी एक दो रोज़ में साफ़ हो जावेगी। तुमने जो हालत 9 मार्च सन् 54 के खत में लिखी है, वह उसी स्थान की हालत है। सैर शुरू हो गई है, मगर X Y दोनों स्थानों की मिली-जुली हालत की सैर है। तुमने जो यह लिखा है कि अगर कोई व्रत का ख्याल दिलाये तो मुझे यह मालूम होता है कि व्रती हूँ। यह तो बड़ी उम्दा हालत है। इससे यह मालूम होता है कि ईश्वर या Reality कहना अच्छा होगा की हालत से सम्बन्धित हो चुकी हो। इसलिये कि इसका एक गुण यह भी है कि वह कभी नहीं खाता। अगर कोई खाने को कहे तो यह मालूम होता है कि मैं खाती ही रही हूँ। इसके मानी यह है कि तुममें उस गुण वाले से निस्बत हो गई है, जैसा कि ऊपर लिखा है कि जो बिना खाये हुए अपने आपको खाया हुआ समझता है यानी दोनों हालतें उसके लिये एक सी हैं।

    आगे जो लिखा है बन्दगी के बारे में कि वह बन्दगी समाती चली जा रही है, इस चीज़ का कुल समा जाना Reality की ही अच्छी हालत है। एक बात मैं और लिखे देता हूँ बतौर इशारे के। सम्भव है कि इस Writings को किसी समय लोग सोंचे। जब तक कि बन्दगी है, हम बन्दे हैं। और जब इस चीज़ में हम समा गये तो फिर बन्दे नहीं रहे, मगर इन्सानी शराफ़त यही है कि हम मालिक को मालिक समझते रहें। इसके यह मानी भी नहीं कि लोग बन्दगी करना छोड़ दें, यह समझकर कि बन्दगी करने से हम बन्दा ही रहेंगे। यह तो एक हालत है कि जो बन्दगी करने से ही मिलती है, इसके बाद मुमकिन कि ‘Z’ स्थान पर इससे भी अच्छी हालत मिलेगी, ईश्वर ने चाहा। यह तुम्हारा ख्याल सही है कि Spirituality से आगे तुम्हारा क़दम है, जैसा मैंने Reality At Dawn में कहा है “शुद्धता की अनुभूति न रहना ही असल शुद्धता है और जब सब कुछ गायब हो जाये तो फिर असलियत ही असलियत है।“

  यह तो सब तुम्हारी तारीफ़ थी। अब आगे मैं क्या लिखूं। चाहता तो यही हूँ कि तुम्हारी तरह हर अभ्यासी सब नुक़्ते समझता चले। इस इल्म का कहीं छोर नही और सच पूछो तो मुझे भी पता नहीं। जब कोई इन हालतों में पहुंचता है तो पता हो जाता है। Self-Thinking से ही Intelligence बढ़ती है, तो यहाँ तो लोगों को इतनी फुर्सत ही कहाँ? और फुर्सत भी हो जाती, अगर शौक़ पैदा हो जाता मैं चाहता तो यही हूँ कि मुझे जो कुछ थोड़ा बहुत आता है, अपनी ज़िन्दगी में ही सबको सिखा जाऊं, उसके बाद फिर वह उससे आगे तरक्की करते रहें। मगर एक दो के सिवा कोई हिम्मत करके सामने आता हुआ दिखाई नहीं देता। कितनी सहज चीज़ और कितने सहज तरीके से बताई जाती है, फिर भी लोग अपने आप को उस हद तक तैयार नहीं करते। यह ज़रूर है कि ज्यादातर ऐसा ही देखा गया है, अभी तक ऐसी तरक्की करने वाले इक्का-दुक्का ही मिलते हैं।

  अम्मा को प्रणाम।

  शुभ चिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-381
शाहजहाँपुर
26/3/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

आज करीब दो बजे दिन के मुझे तुम्हारी बराबर याद आ रही है और विचार भी अक्सर काम करता है। चार बजे दिन के करीब तो मेरी यह हालत थी कि इलाहाबाद जाने के लिये जी बहुत चाहता था, तुम वापसी डाक जवाब दो, क्या बात है? मुझे स्वतः फ़िक्र हो रही है। अम्मा का भी हाल लिखना।

अम्मा और तुम्हारे चाचा जी को प्रणाम।

  शुभचिंतक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-383
शाहजहाँपुर
31/3/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो।

तुम्हारा पत्र 24 मार्च सन् 54 का मिला। तुमने जो कुछ होने वाली बातें जल्दी होने को लिखी हैं, वह ठीक ही होगा। आज 29 मार्च 54 का भी पत्र मिल गया। मुझे स्वयं आश्चर्य है कि मुझे इतनी बेचैनी क्यों पैदा हुई, कि इलाहाबाद आने की तबियत चाहती थी। अब वजह जब तुम पूछती हो तो यही मालूम होता है कि यह आकर्षण तुम्हारी ओर से था। सम्भव है कि तुम्हें मेरी याद किसी कारण से कुछ तीव्र हो गई हो। याद जब Sub-Conscious mind में पहुंच जाती है, तब उसमें बहुत तीव्रता और आकर्षण बढ़ जाता है। Sub-Conscious mind की खोज (Research) का मुझे इसी समय विचार पैदा हुआ। Research कहाँ तक की जावे अब इसको तुम्हीं सब सोचो। इतना इशारा किये देता हूँ कि Sub-Conscious mind ऐसी जगह है, जहाँ पर कि एक प्रकार की बिजली सी बनती है। जिसका ख्याल किया जाय उस ओर तीव्रता बहुत बढ़ जाती है। मंत्रों का जाप खामोशी से करने को यों ही बताया जाता है कि उस कैफियत में यह चीज़ आ जावे कि उसका प्रभाव उसके नतीजे पर ज़्यादा पड़े और यहाँ पर ख्याल बाँधने से इच्छा-शक्ति बहुत तेज़ काम करती है। Special Will इसी Sub-Conscious mind से होती है, गो इससे भी Higher एक Region है, वहाँ को बनी हुई Special-Will चन्द मिनट या सेकण्ड ही में दुनियाँ का नक्शा पलट सकती है। Special Personality जब कहीं ईश्वर के हुक्म से आ जाती है, तो इसी स्थान पर शक्ति अधिक होती है और कहीं ईश्वर की अनुकम्पा कहीं किसी पर अधिक हो गई और बड़े खास कार्य करने को हुए तो इससे आगे Special Will के तीन स्थान और हैं, जहाँ पर इन्तहाई Power है। यहाँ तक तो बन्दा पहुंच जाता है, इसके आगे वह एक ही स्थान है, वह बिल्कुल ईश्वर के Will की जगह है और यह उसी के पास रहती है। इस वस्तु का हक़दार मुमकिन है कि अभी तक कोई न हुआ हो, मगर उसका हक़दार बनने की तरकीब बस यही हो सकती है कि अपनी हालत ऐसी बना लें, जैसी कि होनी चाहिये, अर्थात् अपने आपको वास्तव में बिल्कुल लय कर दे। इस क़दर जितना बन्दे कि लिये सम्भव है। और एक साधारण बात मैं तुम्हें लिखता हूँ, जिसको समझ लेने से ईश्वर और जीव के फ़र्क जो लोग पूछते हैं, समाप्त होते हैं और इच्छा शक्ति की बहुत सी बातें हल हो जाती हैं। हमें दर हक़ीकत Higher Pressure से Lower Pressure में जाना है। हवा सब जगह एक ही है, मगर उसका Pressure पृथ्वी की ओर Higher है, और ज्यों हम ऊपर जाते हैं, हवा का Pressure Low हो जाता है, अर्थात् हवा भारी से हल्की हो जाती है। यहाँ तक कि आगे चलकर Pressure रहता ही नहीं बल्कि Vacuum हो जाता है। मैंने तुम्हें ब्रह्म और जीव का एक मज़मून लिखकर कर भेजा था, अब यह दो वाक्य और लिख दिये। Higher Pressure जब है वह तो जीव-गति है और Lower Pressure जो है, वह ब्रह्म-गति है। वस्तु एक ही है। चौबीस प्रकार के ब्रह्म जो वेद में लिखे हैं, उन सबको इसी में घटित कर लो। जितनी हल्की हवा है, उतनी ही ब्रह्म-दशा समझनी चाहिये। बस इशारे के तौर पर लिख दिया, इस लिये पढ़े-लिखे लोग संभव है, कि जीव और ब्रह्म के प्रश्न करें।

  तुमसे कोई ग़लती नहीं हुई, इस विचार को दूर करो। पूजा अब तुमसे होना बड़ा कठिन है, इसीलिये मैंने बहुत पहिले से पूजा की पाबन्दी के लिये मना कर दिया था। तरकीबें नई निकालती रहो, मगर वह थोड़े ही थोड़े दिनों काम देगी और अंत में परिणाम यही होगा। आंख से यह कहो कि वह अपने आपको देखे, तो यह कैसे हो सकता है या आईना मुंह खुद देखे, तो यह कैसे सम्भव है। तुमने लिखा है कि दीनता, ग़रीबी और नम्रता भी महसूस नहीं होती, यह सब रास्ते की बातें हैं। बस ऐसे समझ लेना चाहिये कि मनुष्य संसार में रहता हुआ हर वस्तु से प्रेम रखता है और जब मृत्यु होती है तो कोई वस्तु साथ नहीं जाती। इसी प्रकार से लय- अवस्था समझनी चाहिये कि उस दशा में मनुष्य कुछ अपने पास नही रखता और महा-प्रलय की भी तारीफ़ यही है कि कुछ न रहे। तुमने लिखा है कि ‘इधर चाल मन्द सी प्रतीत होती हैं’। गति मन्द नहीं है, बल्कि वहाँ का भान इस कदर मन्द है कि ठहराव सा दृष्टिगोचर होता है। दशा में तुम्हारे ईश्वर की कृपा से कमी नहीं, प्रत्युत्तर बढ़ती ही है। 

  ईश्वर को धन्यवाद है कि अम्मा को सेहत हो रही है। पण्डित लक्ष्मी चन्द्र, पण्डित रामेश्वर प्रसाद का जन्म दिन अपने मौज़ा लखनौर में 15 अप्रैल को मनावेगे, सब सत्संगियों को निमंत्रित किया है।

  अब हिन्दी के लिखने वाले दो मिल गये हैं, उसमें एक बहुत काबिल हैं। अब हिन्दी के पत्रों के उत्तर बहुत सुगमता से पहुंच सकेंगे। तुम अपना खत अपने चाचा को पढ़कर सुना देना, शायद कोई बात उनके काम की इसमें निकल आवे।

शुभचिंतक 
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-384
शाहजहाँपुर
6/4/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो।

तुम्हारा खत 4.4.54 का लिखा हुआ आज मिला। पूजा अब तुमसे होना मुश्किल है। इसलिये मैंने पाबन्दी हटा ली है। अब तो तुम्हारी वह हालत है कि दूसरे लोग तुम्हारी पूजा करें। मगर इससे अहंकार नहीं होना चाहिये, इसलिये कि ऐसा तो होना सबका धर्म है। अहंकार का तो तुममें गुज़र भी नहीं हो सकती। पूजा में जब हम किसी की पूजा करते है तो दुई बढ़ती है और हालत तुम्हारी Non-Duality की है और ऐसी हालत में पूजा करती हो तो Duality की तरफ़ जाना पड़ता है, इसलिये घबराहट पैदा होती है, क्योंकि जब दूसरा माना जायेगा, तब तो हम पूजा करेंगे। जब दूसरों को सत्संग कराती हो, तो तुम दुई का ख़्याल ले लेती होगी। इसी वजह से उस वक्त घबराहट पैदा होती है। यही वजह है, जैसा कि तुमने लिखा है कि जब याद करती हूँ तो उससे Touch नहीं हो पाती। यहाँ Touching का सवाल ही नहीं, जिसकी तुम याद करती हो वह तुम ही खुद हो। इसलिये तुम्हारा यह ख्याल पैदा होता है कि तुम Touch नहीं कर पातीं कोई दूसरी चीज़ होती तो याद Touch करते हुए दिखाई पड़ती। तुमने यह लिखा है कि कहीं ठहराव तो नहीं हो गया है। यद्यपि यह है तो असम्भव बात पर यह दोनों बातें सही हैं। ठहराव हो भी गया है, और नहीं भी हो गया है। मेरा मतलब यह है कि X, Y के मैदान में एक साफ़ चटियल हालत है, जिससे कि तुम In-Touch हो। और इसकी चौड़ाई इस क़दर है और इस क़दर खुला हुआ है और तुम्हारा गुज़र भी उस मैदान में है और निगाह तुम्हारी अंदरूनी जाती है, तो सिवाय मैदान के और कुछ नज़र नहीं आता, उसको तुम ठहरी हुई हालत कह सकती हो, मगर इसको ठहरा हुआ कहना भी गलती होगी इसलिये कि इससे आगे जाने की हिम्मत और ताक़त इस मैदान में रहते हुए पैदा हो रही है और इसीलिये जब तक तुम में आगे उड़ान की ताकत पैदा न हो जावेगी, आगे मुकाम पर नहीं बढ़ाऊंगा और ईश्वर ने चाहा तो पैदा हो जावेगी और मैं भी जो कुछ थोड़ी बहुत मदद दे सका, दूंगा। इस मुकाम पर बेइंतिहा ताकत है और थोड़े दिन रुकना और अच्छा होगा।

  तुम जो लखनौर के उत्सव में लिखकर भेजोगी वह पढ़वा दूंगा।

  शुभचिंतक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-386
शाहजहाँपुर
25/4/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

इलाहाबाद से भेजा हुआ खत मिला और 19.4.54 को लखीमपुर से भेजा हुआ पत्र भी मिला और उसी का मैं जवाब दे रहा हूँ। प्रोफेसर राना डे को तुम Efficacy of Raj Yoga भी भेज देना। अब मैं तुम्हारी हालत का जवाब देता हूँ। लिखने से पहले सन्त तुकाराम का एक पद आया “गुड़ से मीठे हैं भगवान्, बाहर-भीतर एक समान”। बस, अब मुझे तुम्हारी यही हालत मालूम होती है। जब जिस्म का भान नहीं रहता और रूह का भान भी थोड़ा-बहुत समाप्त हो जाता है, तो ऐसी हालत प्रतीत होने लगती है। दुई का अब तुम में पता कहाँ और यह हमारे लालाजी की Teaching की बरकत है कि जो एक Step ऊंची ही रहती है। Non-duality है, मगर भान उसका कम है और यह Stage बढ़ना चाहिये और यह Stage एक Limitless समुन्दर है और इसमें जाने कितना पैराव होता है। बेदों में अद्वैत (Non-Duality) कहा है, सम्भव है, इससे आगे भी कोई कह गया हो, मगर यक़ीन कम है, इसलिये कि बहुत सी बातें खुद अनुभव के लिये भी छोड़ दी जाती मैं बग़ैर कहे नहीं रह सकता, सम्भव है लोग इससे सहमत न हों। जब हम ऐसी हालत में पहुंच जाते हैं, कि जहाँ न Duality महसूस होती है, न Non-Duality इस तरह पर, अर्थात् इसकी पहिचान यह है कि चाहे सौ वर्ष या हज़ार वर्ष तक द्वैत-अद्वैत पर Meditate करें, तो भी यह ख्याल में न आवे कि हम Duality में हैं या Non-Duality में, तब यह हालत सिद्ध हुई। अव्वल तो, जो वाकई इस हालत में है, उसमें इतनी शक्ति ही नहीं रहती कि वह इस पर Meditate कर सकें। एक ही मिनट में Meditate करने से दिल घबरा उठेगा। जब इन्सान इस हालत पर आ जावे, तो फिर असलियत पर आ गया, मगर पैराव अभी बहुत बाक़ी है, इसकी हद नहीं। बिटिया ! मैं वाचक ज्ञानियों की भाँति कह भी जाता हूँ, मगर सच पूछो तो, मुझे खबर नहीं। जब कोई अभ्यासी ऐसी हालतों में आ जाता है तो, मुझे खबर होती जाती है। मुझे आता तो खैर कुछ नहीं, मगर जो कुछ भी आता है, मैं चाहता हूँ कि लोग सीख लें, ताकि वह खुद ही ऐसे हो जायें, अगर उस हालत तक औरों को न पहुंचा सकें। मैं इस बात को कल सोच रहा था कि हो सकता है कि इक्का-दुक्का अगर मेरी तक़दीर मदद करे, तो ऐसे लोग बन जावें, मगर फिर इन हालतों में दूसरों को पहुंचाना बड़ी कठिन चीज़ हो जावेगी, जब तक जिस्म का ज़र्रा ज़र्रा (परमाणु) भूमा की असल कैफ़ियत न ले आवे और यह हो सकता है। कहूँगा यही, इसलिये कि जब हमारे गुरु- महाराज में कोई कमज़ोरी नहीं, तो मुझमें भी नहीं हो सकती, ख्वा लोग इसे अहंकार समझें, इसकी परवाह नहीं। जिस्म से कमज़ोर ज़रूर हूँ, मगर हिम्मत और ताकत में कमी नहीं कि यह एक Second का काम है। बिटिया ! मेरा तो यह ख्याल है कि अगर रुहानी सम्बन्ध में किसी Stage पैदा करने में एक Second से दूसरा Second लग गया, ( बशर्ते कि उस एक Second में काम करना भी चाहूँ) तो मैं पतित हो गया और इस काबिल नहीं रहा कि दूसरों को तालीम दे सकूँ। लोग इसको अहंकार समझेंगे, समझा करें। अब सवाल यह है कि एक Second में सब कुछ कर देने का धक्का बर्दाश्त कर सकेगा और मुझे इसका अक्सर खेद रहता है कि कोई शख्स अगर इतना ज़्यादा नहीं तो इतना ही सिखाने वाला इस मिशन में पैदा हो जाये। यह सब ‘मालिक’ के हाथ में है, जो ‘वह’ चाहेगा, वही होगा। अन्त में कहना यही पड़ता है, क्योंकि हम फिर भी बन्दे हैं और इसलिये एटीकेट कायम रखना जरूरी है। हमारे यहाँ तो यह हाल है, कि अगर हम चाहें भी Special Will से तालीम करना, तो लोग मेरे ख्याल में जंजीर डाल देते हैं। अब यह उनकी किस्मत है या मेरी।

  पूजा के वक्त जो तुम्हें दुई समझ पड़ने पर घबराहट मालूम होती है, इसके बारे में मैंने जो खत इलाहाबाद भेजा था, उसमें मैं लिख चुका हूँ। तुम्हें पूजा कराने का ख़्याल तो नहीं हो जाता, इसलिये यह चीज़ महसूस हो जाती हो? आगे बढ़ने पर मुमकिन है, यह बात खुद-ब-खुद न रहे। मैंने X, Y स्थान से अभी आगे नहीं बढ़ाया है। ताकत अच्छी पैदा हो गई है, मगर अभी और ताकत पैदा होने का इन्तज़ार है। इसका असर अभी कुल जिस्म में नहीं भिदा है। ईश्वर ने चाहा, यह भी हो जायेगा ठहराव नहीं है, ताकत बढ़ रही है। भाई-बहनों को आशीर्वाद।

  शुभचिंतक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-389
शाहजहाँपुर
29/4/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे 25 अप्रैल व 28 अप्रैल के खत मिल गये। मैं पहले खत का जवाब दे रहा हूँ। तुम्हारा यह ख्याल बिल्कुल सही है कि ऐसा कभी न था, जब तुम नहीं थीं और ऐसा कभी नहीं होगा जब तुम नहीं होगी। मैं इसको पढ़कर गद्गद् हो गया। मगर बिटिया ! Perfection होते हुए यह असलियत की A, B, C, D हैं। तुम कहीं यह न कहने लगो कि बाबूजी तुम्हारी हर अच्छी हालत को A, B, C, D बता देते हैं। मैं अपनी निगाह को क्या करूँ? कि मुझे ऐसा ही मालूम होता है। ईश्वर वह समय लावे कि जिस असलियत की मैंने यह A, B, C, D बतलाई है, उस पर भी पहुंचो, तब तुमको मालूम होगा, कि मेरी निगाह ठीक थी। इस दायरे के आगे एक ऐसा दायरा आता है कि जहाँ पर ईश्वरी बातें आती हैं। ईश्वरी बातों से मेरा मतलब यह है कि जहाँ पर वैदिक ऋषियों के निकट ईश्वर के भेद खुले हैं, और उससे ऊपर वाले दायरे में श्रुति आना शुरू हो जाती है। अब मैं यह नहीं कह सकता कि कौन-कौन इस हालत में पहुंचे हुए थे। Brighter World में अगर मैं टटोलता हूँ तो गुरू महाराज (अपने) को छोड़कर एक शख्स निहायत ऊंचा -ऊंचा हुआ मिलता है, और मुमकिन है कि नारदीय सूत्र का लिखने वाला वही हो ओर दो उससे कम मिलते हैं। मगर बिटिया ! मैं अपने Writings छोड़ता चला जाता हूँ। अगर यह छप गये तो मुमकिन है किसी समय में कोई समझे कि जिस ऋषि ने नारदीय सूत्र लिखा हो, वह सम्भवतः Seven Rings के थपेड़ों को न पार कर सका, इसलिये उसके Expressions में गड़बड़ी रही। यह हमारे गुरू महाराज ही थे, जो Centre तक पहुंचे और दूसरों का पहुंचाने का रास्ता खोल गये। ऐसी Personality अब आना कठिन है। मैं तुम्हें खतों में अक्सर बेकार बातें लिख देता हूँ, वह इस लिये कि पढ़कर लोगों का शौक बढ़े।

  उससे आगे जो हाल लिखा है, कि जिस हालत में तुम हो, उसमें स्पन्दन नहीं है, वह ठीक है। X, Y स्थान की यही हालत है। तुमने यह लिखा है कि Special Personality के कारण जीवन मृत्यु की हालत का मज़ा ले रही हूँ, मैं कहूँगा कि तुम अपने ही कारण आनन्द ले रही हो।

  अब एक बात खुशखबरी की लिखता हूँ। चौबे जी ने तुम्हारे Realisation की मिठाई तो मुझे खिलाई नहीं, अब तुम्हारी जीवन-मोक्ष की दशा है। अब यह दूसरी वाजिब हो गई, तो यह मिठाई हमारी अम्मा हमें ज़रूर खिला देगीं, जब मैं वहाँ आऊंगा। तुमने यह जो लिखा है कि बाँये पैर के तलवे के बीच से कुछ हटकर सरसराहट मालूम होती है, यह वह स्थान है कि यहाँ पर Meditation करने से ब्रह्मरन्ध्र का स्थान खुल सकता है और इसमें सरसराहट पैदा होने का मतलब यह है कि उसके क़रीब का स्थान खुलना चाहता है। ब्रह्मरन्ध्र का स्थान ऐसा है कि जब ईश्वर को कोई बात बतलानी होती है तो इसी स्थान से आती है गोया यह Receiver है और जब बन्दे को कोई खबर भेजनी पड़ती है, तो वह सहस्त्रदल कमल के बीच की पंखुड़ी से भेजता है। गोया एक चीज़ ईश्वर के काम के लिये, और एक चीज़ बन्दे के काम के लिये गोया सहस्त्रदल कमल Transmitter है। एक बात और है, ईश्वर ब्रह्मरन्ध्र से देता है, मगर उसका एहसास सहस्त्रदल कमल में होता है। यह हमारी Research है, जो किसी अवसर पर किसी सवाल के जवाब में मैने बतलाई थी। अब दूसरे खत का थोड़ा सा जवाब देता हूँ।

    तुमने लिखा है कि X, Y स्थान का भिदाव अब शुरू हो गया है, मगर अभी पूरी तरह से भिदाव शुरू नहीं हुआ है। जब हो जायेगा, आगे बढ़ा दूंगा। मैं तो यह चाहता हूँ कि इसका भिदाव ज़र्रा-ज़र्रा और नस-नस में हो जाये, ताकि जीवन मोक्ष की दशा परिपक्व हो जाये। नींद इस कारण से भी हो सकती है कि मैंने कुछ Sittings तन्दुरुस्ती बढ़ाने के लिये दी है। और खीझ शरीर की कमज़ोरी की वजह से हो सकती है, इसका कोई आध्यात्मिक कारण नहीं हैं। तुमने जो मुझसे यह पूछा है कि X, Y Point पर ताकत आ जाने से मेरा क्या मतलब है, इससे मेरा मतलब यह था कि X, Y पर जो Conditions हैं, वे पूरी तौर पर उतर जायें और उन पर Command हो जाये अब इसकी ताकत मैं बताता हूँ। इस स्थान की ताकत अगर किसी सितारे पर झोंक दी जाये तो, टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा, मगर हम इस हद तक ताकत का एहसास नहीं होने देते। इसको अगर कोई शख्स इस्तेमाल करना चाहे तो, सबसे पहले इसके लिये यह लाज़मी होगा कि Limitations तोड़ दे, यह इसका खराब इस्तेमाल इसका यह है और इस हद तक हमारे यहाँ हो भी जाता है कि इसके ज़रिये से दूसरे की हालत भी ऐसी ही पैदा कर दे। बिना कानों के सुनना, बिना हाथ-पैर के चलना, इत्यादि जो तुमने लिखा है, यह ब्रह्म की दशा है। रास्ते पर तुम अब भी जा रही हो, मगर जैसा कि तुमने लिखा है, तुम्हें मालूम यों नहीं होता कि तुम्हें अपना होश ही नहीं है। तुमने यह जो लिखा है कि माथे के बीच में बड़ा गड्ढा सा हर समय महसूस होता है, यह मेरी समझ में नहीं आया। ज़रा इसके ऊपर Meditation करने के बाद समझ में आ जावेगा। तुम इसकी वजह सोचो ओर लिखो। मई के महीने में मिशन का Foundation day जो मुरादाबाद में होने को था, कुछ कारणवश मुलतबी कर दिया है।

  शुभचिंतक
  रामचंन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-394
शाहजहाँपुर
21/5/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

सब खत मिल गये। 10 मई व 17 मई के जो खत मिले हैं, उन सबका जवाब एक साथ लिखे देता हूँ। X, Y पर जो तुम हो, उस हालत का भिदाव अच्छा हो गया है, मगर अभी पिण्ड में होना बाकी है। तुमने यह लिखा है कि Z स्थान की हालत तक तुमको नहीं पहुंचाया गया है। कुछ जीवन-मोक्ष की दशा के भिद जाने का इन्तज़ार है। यह तुम्हारा एहसास सही है कि तुम में Non-Duality Reign कर रही है। तुमने यह लिखा है कि कण-कण सहज रूप को प्राप्त हो चुका है, इससे मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझा। बाहर वृत्तियों का अस्तित्व मिट जाना लिखा है, यह सही है। वृत्तियाँ तुम्हारी सब Suspended हालत में आ चुकी हैं और यह फिर लय अवस्था की शुरुआत है, मगर अभी वृत्तियाँ पूरी शुद्ध हालत में नहीं आई हैं। इनकी सफ़ाई मुझे करनी होगी। इस समय तो मुझे तुम्हारी तन्दुरुस्ती की चिन्ता है। अभी बहुत कुछ बाकी है, इसलिये तन्दुरुस्ती की और भी ज़रूरत है।

  17 मई के खत में तुमने यह जो लिखा है कि “पहले मैं अपने आप को दूर पाती थी, मगर अब दूर और नज़दीकी का ख्याल नहीं है।“ इसके मानी यह हैं कि ईश्वर से कुछ नज़दीकी ज़्यादा और बढ़ गई है। तुमने त्रिकुटी में जो गड्ढा एहसास किया था और उसकी वजह मैंने तुम्हीं से पूछी थी। तुमने उसके बारे में जो कुछ लिखा है, वह सही है। अब तुम एक बात और एहसास करना कि जहाँ पर चोटी रक्खी जाती है, वहाँ पर कुछ चौड़ाई तो महसूस नहीं होने लगी है? या कुछ गड्ढा सा तो नहीं मालूम होता है? अभी मैं अपने आने की तारीख मुकर्रर नहीं कर सकता, दो-तीन दिन में यह बात मालूम होगी।

  शुभचितंक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-398
शाहजहाँपुर
24/5/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

मैंने एक पत्र भेजा है, जो पहुँच गया होगा। चाहता मैं यही हूँ, कि तुम निरोग हो जाओ। बात यह है कि दुनियाँदारी में मोहब्बत गरज़ से होती है, और मेरी गरज़ यह है कि तुमसे लोगों को फायदा अब पहुंचता है, मगर ढोलक की डोरी जब तक कसी नहीं होती, आवाज़ में सम पैदा नहीं होता।

  अब मतलब पर आता हूँ। तुमने 22 मई सन् 54 के पत्र में लिखा है कि “शायद Brighter World में ही मेरी रहन होने लगी है।“ बस इतना ही अन्तर है कि तुमने उसको ‘शायद’ लिखा है। अगर वाकई यह हालत हो जाती तो यह शब्द ‘शायद’ जी से कभी नहीं निकलता। अब मैं तुम्हें बताता हूँ कि Brighter World अभी इतनी दूर है कि अगर उस तरफ निगाह दौड़ाई जावे तो भी वह (निगाह) थकने लगेगी। मगर हाँ, जो कुछ तुम्हारी मौजूदा हालत है, वह Brighter World का Grossest (स्थूल) form है।

  वह दुनियाँ तो भाई केवल कहने के लिये ही है, इसलिये कि और क्या शब्द हो सकता है, जिससे उसको ज़ाहिर किया जावे। शब्द Bright यों कह लेते हैं कि वह चीज़ उन्नति किये हुए लोगों के लिये है और जहाँ बड़े लोग रहते हैं, उस जगह का नाम भी बड़ा ही करके इज़हार करते हैं। वैसे अगर कोई मुझसे पूछे कि आप उसका नाम क्या रखेंगे, तो मैं उसको No World कहूँगा। मगर खैर, क्यों कि तुम्हारे ख्याल में Brighter World मौजूद है और यह शब्द भी तुमने मेरे मुंह से सुने हैं, इसलिये अच्छा है कि तुम्हारी रुचि उस तरफ़ है। मगर क्या कोई अक्लमन्द आदमी आजतक वहाँ पहुंच सका है? और बेवकूफ तो उससे कोसों दूर है। इस बात को कि क्या कोई अक्लमन्द आदमी आजतक वहाँ पहुँचा है, मुमकिन है कि चौबेजी अच्छा समझा सकें। बताते वक्त यह ख्याल ज़रूर रहना चाहिये कि उनका अक्लमन्द से मतलब ज्ञानी से तो नहीं होगा, अगर इससे मतलब है तो मैं यही कहूँगा कि ज्ञानियों की वहाँ गुज़र नहीं। हाथी से अगर कहा जाये कि कुलिया में बन्द हो जाये, तो वह कभी नहीं हो सकता। बेवकूफ़ आदमी यों नहीं पहुँच सकता कि उसके पास भी कुछ है, और है क्या, कुछ सामान और असबाब और वह जाना चाहता है, मगर उसके और वहाँ उसके रखने की जगह नहीं। अब ज्ञानियों की सुनो वह त्याग-त्याग कर के अपने को खाली समझते हैं। मगर उनको अभी इतनी समझ मौजूद है, बस यह एक ऐसी चीज़ है, कि अगर कहीं वहाँ पहुँच जायें तो World और Brighter World में कोई फ़र्क नही रहेगा। अब पहुँचता कौन है, जिनमें यह दोनो चीज़ ऐसी लय हो गई हैं, कि उनकी ताकत (जो कुछ कि Creative Power थी) खत्म होकर अपने असल में फिर चुकी है। अब यह चीज़ कैसे हो सकती है, जब कि अपनी निगाह अपनी समझ पर न रहे, बल्कि वहीं रहे, जहाँ पर रहने से, अपने ठीये का पता मिलता है। अब यह चीज़ कैसे नसीब हो? जब इन्सान अपने ठीये को छोड़ दे। अब तुम मुझसे पूछो कि ऐसी जगह भला कोई क्यों पहुंचने का इरादा करे, जहाँ बे- ठीये का होना पड़े। मैं समझता हूँ कि इसीलिये लोग वहाँ पहुँचने की कोशिश नहीं करते।

  तुमने 21 मई के खत में जो खुशी के बारे में लिखा है, तो जो खुश होता है, उसे तो खुशी महसूस ही होती है, जहाँ शादी विवाह का मौक़ा होता है, हर आदमी खुश नज़र आता है। Environment भी असर डालता है। इन्द्रियाँ जब External Object से Intact होती है तो, वही असर मानस ले लेता है। अगर इन्द्रियों में शुद्धता (originality तो खैर मैं अभी नहीं कहूँगा) पैदा हो चुकी है और मानस उसकी लज्जत (Taste) ले चुका है तो जिस चीज़ की उसमें लज्ज़त है, उसी चीज़ को वह बाहर देखती हैं और वही अब उसके देखने की चीज़ है। यही हालत सब Conditions की है, कि अगर उसमें हम अपने आपको बिल्कुल रुजू कर देते हैं, तो मानस की Depth में उसका छींटा लग जाता है, और वही चीज़ सामने दिखाई पड़ती है। मिसाल के तौर पर एक चोर अपने माल की बहुत हिफ़ाजत कर सकता है, इसलिये कि खुद चोर होने की वजह से वह सबको चोर समझता है। इसी तरीके से जो अच्छा आदमी है, वह सब को अच्छा समझता है। मगर जब इन्द्रियों में Originality शुरू हो जाती है, तो मन्ज़र (Scene) ही बदल जाता है और इस खुशी को, जो इस वक्त है, इसको समझने के लिए Happiness कह लो, Bliss में तबदील हो जाती है। Brighter World के जो लोग हक़दार बन जाते हैं, उनकी कैफ़ियत यह हो जाती है कि Bliss भी नहीं रहती। यह तो तुम्हारी खुशी की कहानी है। अब Bliss की कहानी मुमकिन है, कि मेरे लखीमपुर पहुँचने पर शुरू हो, बशर्ते कि मैंने तन्दुरूस्ती अच्छी पाई। कहो तो इसके बाद वाली भी कहानी लिख दूं। मान लो Originality पैदा हो गई, तो हम में क्या विशेषता हुई। यह चीज़ तो जिस वक्त हम पहली ही बार आये थे, हम में मौजूद थी। बात बुरी ज़रूर है, मगर कहूँगा ज़रूर कि इसमें ईश्वर का कुछ एहसान न था। अब अगर इससे आगे हम बढ़ते हैं, तो हम यह ज़रूर कहेंगे कि अब हम उस शक्ल में आये हैं कि जो शक्ल हमारी Originality बनने से पहले थी। एक बात मैं लिखता हूँ, मुमकिन है, सोचने वाले मेरे बाद किसी वक्त में गौर करें कि हम तो इस तरीके से Brighter World के हक़दार बनते हैं, मगर हम तो इस तलाश में हैं कि कहीं ऐसा नुस्खा हाथ लग जाये कि उसको इस्तेमाल करने से कहीं यह बात हो जाये कि Brighter World हमको लेने का हक़दार बन जाये। आगे कहने की मुमानियत हो गई।

  तुमने जो कसक लिखी है, यह तो रहनी ही चाहिये। यह वह ओस है कि इच्छा -शक्ति की गर्मी से ऊपर को उड़ती है। यही एक ज़रिया है, जो धुर तक पहुंचा देता। यह वह औज़ार है कि खता नहीं करता। इसकी शुरूआत बेचैनी है और इसकी तरक्की की हुई चीज़ कसक हैं। तुमने एक जगह पर यह लिखा है कि “मैं अपनी consciousness को भी भूल चुकी हूँ।“ यह सही है। Reality के शुरू होने पर यह चीज़ पैदा हो जाती है। एक जगह पर तुमने यह भी लिखा है कि “मुझे तो अपनी आत्मा की भी खबर नहीं।“ चूंकि तुम्हारा Attention दूसरी तरफ Divert है, इसी से इसका पता नहीं चलता। उस हालत के सिद्ध होने का तरीका भी यही है। मगर यह चीज़ अभी बिल्कुल बाकी है। यह जो तुमने लिखा कि “ब्रह्म और अहं ब्रह्मास्मि” सब स्वप्तवत् हो चुके हैं, यह बहुत कुछ ठीक है, मगर इसका अंकुर अभी बाकी है। चीज़ बदल गई है और वह रास्ते की बातें थीं। मैं तो “अहं ब्रह्मास्मि” वालों को बस ऐसा समझता हूँ, जैसे मनुष्यों में पहलवान और इतनी ही उसकी तारीफ़ कर देता हूँ कि वाकई सैण्डो में बड़ी ताक़त थी और राम- मूर्ति भी बढ़ा-चढ़ा था। बस तुम्हारे खतों का इतना ही जवाब है। हाँ, एक चीज़ और नज़र पड़ गई। तुमने लिखा है कि “मेरे पास तो वही है, जो आपने दिया है” तो मैं भी कहता हूँ कि “मेरे पास भी वही है, जो तुमने दिया है।“ तो अब किसी का एहसान नहीं रहा और न शुक्रिया की ज़रूरत रही।

शुभचिंतक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-403
शाहजहाँपुर
27/6/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारा मिला। तुम्हें जो Injection जनित पीड़ा नहीं होती, यह सब तुम्हारी ख़ूबी है। जब मेरे कहने का तुम्हें यकीन हो गया तो तुम्हारी ही शक्ति ने काम किया और यह तो तुम्हें कई दफे लिख चुका हूँ कि तुम्हारी आत्मिक उन्नति तुम्हारी ही वजह से है और तुम्हारी भक्ति तथा अभ्यास का यह फल है। अगर मुझमें कुछ विशेषता या ऐसी शक्ति होती तो सब सत्संगी अभी तक आध्यात्मिकता की उच्च श्रेणी को प्राप्त कर चुके होते। तुमने लिखा है कि न मुझे मुक्ति की आकांक्षा है न Realization की चाह। यह तो बड़ी अच्छी अवस्था है। तुम्हें Realization हो चुका और अब जीवन-मोक्ष गति है। जब चीज़ हासिल हो गई, फिर तमन्ना काहे की। जब तक मानव अपनी इष्ट वस्तु नहीं पाता, तब तक उसको चाह रहती है और जब पा गया तो चाह किसकी। तुमने लिखा है कि “हर कण और नस-नस बस सोई सी रहती हैं” इसके यह अर्थ हैं कि जो आडम्बर कि लाखों जन्म से संचित किया था, सो समाप्त हो चुका है और सत्यावस्था उत्पन्न हो चुकी है अर्थात् अब वह हालत है जो इस आडम्बर से प्रथम थी, मगर इसमें भी अभी बहुत कुछ होना बाकी है।

  तुमने लिखा है कि भीतर के Senses मानों लुप्त हो गये हैं, यह अनुभव तुम्हारा सही है और सोई हुई अवस्था, जो तुम्हें मालूम होती है, वह इसी वजह से है। इन्द्रियों को Original हालत पर लाने के लिये मैंने Research करके तुमको तीन Points बताये और उनका तजुर्बा भी मुझे हो चुका है, कि ये सही हैं और तुम भी इसे देख चुकी हो। अब इसके बाद भी उसी सीध में तीन सूक्ष्म Points और हैं, जो खत लिखाते -लिखाते मेरे ध्यान में आये। फिर उसके बाद Points तो नहीं और कुछ समझ में आता है। जब तुम स्वस्थ हो जाओगी तो मैं इन सूक्ष्म Points पर और उसके बाद जो कुछ मालूम हुआ है उस पर रूजू होऊँगा। तुमने जो रोने के बारे में लिखा है, ये प्रेम की वजह से है। मैं तो इस प्रेम का प्यासा ही रहा और अगर कोई मुझे प्रेम दे सके तो सैकड़ों विलायत अर्थात् समझने के लिये Godly Sub-State सम्भव है देने के लिये तैयार हो जाऊं। मेरा जब कोई बस नहीं चलता तो गाना गाकर थोड़ी देर के लिये दुई ले लेता हूँ ताकि कुछ नहीं तो एक-आध ही लहर प्रेम की आ जावे। तुमने यह लिखा है कि “सूक्ष्मता की भी मृत्यु होने लगी है।“ यह चीज़े लय अवस्था होने की वजह से मालूम होती है। वास्तव में अभी मुझे ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा है। सूक्ष्मता की जब मौत हो जाती है, उस वक्त Soul का एहसास कतई जाता रहता है और वह ऐसा कि हज़ारों वर्ष तक इस हालत का पहुंचा हुआ मनुष्य इस पर ध्यान लगाये तब भी Soul का एहसास नहीं हो सकता। जब यह अवस्था पहुंच जाये तो अभ्यासी को Negation की तैयारी समझना चाहिये। इसमें भी न जाने कितनी Stages हैं। नहीं मालूम मुझे क्या हो गया है कि अगणित Stages का ख्याल मुझमें कायम ही रहता है। नहीं मालूम मेरे इन लेखों को देखकर क्या समझेंगे लोग। मुझे तो छोर नहीं मिला। यहाँ तो लोग ऐसे भी हैं कि बड़ी जल्दी अपने आपको परमहंस और जीवनमुक्त गति को प्राप्त हुए समझने लगते हैं और कोई बिरला ही इस गति को यदि पा जावे तो अपनी दौड़ वहीं पर समाप्त कर देता है और ठीक भी है, इसके आगे बढ़ना तभी सम्भव है, जब कोई मिटा हुआ मिल जावे। मुझे तो भाई एक ही गति पसन्द है-Complete Ignorance की दशा और Negation की दशा। 

  तुमने लिखा है कि “कभी-कभी कुल बदन पर, पलकों तक पर पिपरमेन्ट की तरह बूंदों की बीछार सी पड़ने लगती हैं।“ इसकी वजह यह है कि इस्नोफेलिया का मर्ज़ जाने के लिये मैं ऐसी तवज्जोह दे देता हूँ। तुमने यह लिखा है कि “मेरा Heart ‘मालिक’ के Heart से चिपका रहता है।“ यह बहुत कुछ सही है। अभी तक तुम मैदान ही में चल रही हो। समुद्रान्वेषण में यह अत्यन्त आवश्यक है कि तबियत “और लाओ” करती रहे। तृप्ति अभ्यासी की वहीं पर होती है, जहाँ पर व्यष्टि और समष्टि की तमीज़ नहीं रहती है।

  अम्मा की इच्छा-शक्ति बहुत बलवती है और इससे मैं भयभीत रहता हूँ। उनसे कह देना कि जुबान यथा सम्भव काबू में रखें। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-404
शाहजहाँपुर
29/6/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा पत्र ता. 25.6.54 का लिखा हुआ प्राप्त हुआ। तुमने जो अपनी आध्यात्मिक दशा लिखी है, कि ‘वाइब्रेशन’ अन्दर और बाहर नहीं मालूम पड़ता इसका कारण यह है कि जब हम Lower Pressure पर पहुंचते जाते हैं, सफाई बढ़ती जाती है और Pressure घटता जाता है। जैसा मैंने जीव और ब्रह्म के बारे में किसी पत्र में लिखा है। ज्यों-ज्यों हम आगे बढ़ते जाते हैं, Pressure कम होता जाता है और इसी प्रकार से हम शनैः शनैः ब्रह्म गति प्राप्त कर लेते हैं। बहुत आगे चलकर Pressure स्वल्प रह जाता है, इतना कम कि एहसास में नहीं आता; आगे फिर यह भी नहीं रहता। इतना मैंने लिख दिया जो तुम्हें अपनी हालत समझने के लिये समुचित है।

शुभचितंक 
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-406
शाहजहाँपुर
5/7/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

29 जून सनू 54 का खत मिला, जिसका जवाब दे रहा हूँ। तुमने लिखा है कि “ऐसा लगता है कि मेरा रूप आनन्दमय हो रहा है”, यह एहसास तुम्हारा सही है। मगर मैं तुम्हारी हालत को सर्वानन्दमयी हालत पर लाना चाहता हूँ। निरोग हो जाने का इन्तज़ार है, और इसलिये आगे नहीं बढ़ा रहा हूँ। चाहता यह हूँ कि जीवन-मोक्ष दशा जो तुम्हारी है, उसके पूरे आनन्द की हालत का एहसास करा दूं। उस हालत में मुझे तुम्हारी पूरी निगरानी रखनी होगी और यह ईश्वर की कृपा से हो जायेगी, क्योंकि वाकई सब के निगराँ पूज्य लाला जी हैं। इस जीवन-मोक्ष दशा पर जाने कितने लोग आये होंगे और ऐसा भी है कि आने से पहले बल्कि यों कहो कि शुरुआत होने से पहले अपने आप को जीवन-मुक्त समझ बैठे होंगे। गरज रहे तो यहीं तक रहे होंगे और कोई पहुंच गया हो तो ज़्यादा पता नहीं। यह मोक्ष की सबसे ऊंची गति ज़रूर है, और फिर इसके बाद दूसरी चीज़ शुरू होती है। Vibration के बारे में मैं पहले लिख चुका हूँ और कुछ Pressure के बारे में भी लिख चुका हूँ। इस मैदान में बाकई Vibration नहीं है। मगर कुछ तो है ही, जो कुछ तो खामोश हो रहा है और यह भी ब्रह्म की अच्छी गति है। इसी चीज़ को मैं उभारुँगा।

  तुम लय-अवस्था की तीन Stages पार कर चुकी हो, चौथी अभी शुरू नहीं हुई जहाँ तक मुझे याद है, इसकी चार ही Stages है। चौथी Stage में बड़ी देर लगती है और उसके पार हो जाने के बाद फिर मैं क्या कहूँ कि क्या हो जाता है। मैंने जब यह चारों stages पार कर लीं-यह चौथी Stage, हमारे पूज्य लाला जी ने बतलाई थी-इत्तिफ़ाक से मैं उनकी प्रेरणा से पहले ही पार कर रहा था, मगर वह तरीका ख़्वाब में तसदीक कर दिया गया। जब इसकी लालाजी की कृपा से पूर्ति हो गई तो इसकी पाँचवी stage मेरी समझ में आ गई और वह समझने के लिये Negation के भी Negation की तरकीब थी। मगर इसको आपने मुझे करने नहीं दिया ओर मौजूदा हालत पर खड़ा कर दिया और उस तरफ़ से ख्याल ही हटा दिया और कहा कि जब तुम इस हालत (पाँचवे Stage) पर जाने लगे तो मैं ने तुम्हारी हालत खोल दी, इसलिये कि फिर तुम मेरे काम के लिये बेकार हो जाते और यह भी कहा कि अगर तुम पाँचवी Stage तलाश करके शुरू न करते तो मैं अभी कुछ समय और लेता। अम्मा को प्रणाम।

  शुभचितंक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-410
शाहजहाँपुर
20/7/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

एक बजे रात के बाद तुम्हारा खत लिखना शुरू कर रहा हूँ, क्यों कि लिखने वाला आज रात भर के लिये मिल गया है। तुम्हारे पत्र दिनांक 1.7.54 व 16.7.54 के मिल गये। दोनों खतों का साथ ही साथ जवाब दे रहा हूँ।

    जन्माष्टमी पर आने का मेरा अभी कुछ ठीक नहीं है। अगर आऊँगा तो खबर 4-5 रोज़ पहले हो जायेगी। मैं तुम्हारी मौजूदा गति की पूरी तौर से सैर करा कर यहाँ का आनन्द एहसास कराना चाहता हूँ और यह मेरे चाहने का अवसर है कि थोड़ी-थोड़ी हालत तुम पर खुलती जाती है तुमने एक जुलाई के खत में ठीक लिखा है कि बागडोर मैं अपने ही हाथ में रखता हूँ, ताकि कहीं बेतहाशा न भाग निकलो और हाथ से बेहाथ हो जाओ। किसी ने ठीक कहा है-

  “जिनके रुतबे हैं सवा, उनको सिवा मुश्किल है।“

  तुमने ‘कसक’ के बारे में जो कुछ लिखा है, वह तो अभी चलती ही रहेगी। उस समय तक, जब तक कि कसक, कसक में न मिल जाये। तुम्हारी जो मौजूदा दशा है, उसका आनन्द खुल रहा है और जो पसीजना लिखा है, वह वहाँ के कण-कण पिघल रहें हैं, इसलिये कि आनन्द जहाँ तक कि अभ्यासी बर्दाश्त कर सकता है, खुल जावें। तुम्हारी, निगाह जो अंतरिक्ष रहती है और हालत में मिली-जुली रहती है और उन्नति का ध्यान रहता है, और साथ ही कसक भी मौजूद है, ये सब आगे उन्नति करने के लिये बहुत काफ़ी हैं। आध्यात्मिक उन्नति तो बिल्कुल ही तुम्हारे घर की चीज़ है, जब चाहो और जितनी चाहो, तरक्की करो।

  एक बात मैं तुम्हारे तजुर्बे के लिये लिखता हूँ कि बरसात गड़बड़ थी और पानी बरसने में बहुत देर मालूम होती थी; परेशान था। नेचर को जब टटोलता था तो पानी बरसाने के काम पर रूजू होने के लिये तबियत न होती थी। कुछ Reason करके और कुछ अपने हुकूक़ का ख्याल दिला कर ज़बरदस्ती इज़ाज़त हासिल ही कर ली। परन्तु पानी बरसने का सामान न था। मैंने अपनी मेहनत बचाने के लिये अत्रि ऋषि को इस काम के लिये कह दिया। चुनांचे वह समुंद्र पर मानसून उठाने को रूजू हो गये। तीसरे दिन पानी आ गया-उनकी तर्ज- तवज्जोह का भी अंदाज़ लग गया। अत्रि ऋषि ज़िन्दा हैं और मुझे गंगा और यमुना के दरमियान मालूम होते हैं-उत्तर की तरफ। तर्ज-तवज्जोह बताऊंगा, जुबानी पूछ लेना जिस कारण यह बात लिखी।

शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-414
शाहजहाँपुर
31/7/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे दो पत्र मिले। 22 ताः के ख़त का जवाब दे रहा हूँ। तुमने Greatness का जो हाल लिखा है, कि जब ‘मालिक’ के ख्याल में होती हो तो वह Greatness खुद तुम में मालूम होती है। बात तो यह बड़ी अच्छी है, मगर इसका सिर्फ़ एक ही जवाब है, कि लय अवस्था जितनी ज्यादा ईश्वर में होती जाती है, उतनी ही उसकी बातें अभ्यासी में उतरती जाती हैं। जिसका ध्यान करोगी, उसी की बातें आवेगीं इसलिये Incomplete गुरू का ध्यान कभी नहीं करना चाहिए।

    तुमने लिखा है कि “निगाह ही मानों आत्मा है, वही लक्ष्य है, या निगाह में ही आत्मा या लक्ष्य समा चुका है।“ जब आदमी अपने से ऊंचा उठ जाता है, तो निगाह का भी सीन बदल जाता है। वही निगाह ठोस से सूक्ष्म होती चली जाती है और सुरत भी इसी का नाम है। मगर जब तक कि निगाह रहती है, तब तक उसको अधूरा ही कहना चाहिये। हमें तो अपनी हर चीज़ Divine हालत में ले जाना है और फिर जब हम उस हालत पर आ जावें तो उससे भी अपना पीछा छुड़ा लेना है। यह बात बहुत ऊंची है, यह एक भेद है।

  वेदों का Further Development अभी तक नहीं हुआ, इसलिये कि ऋषियों ने Non-Duality पर चीज़ खत्म कर दी, वहाँ तक आखिरी दौड़ कही जाती है। क्या यह नहीं हो सकता कि इसके आगे कुछ और भी हो? यह ज़रूर है वह Non-Duality की ही हालत में होगा। मैंने जो हालत अभी ऊपर लिखी है, उससे बल्लियों ऊपर जाना पड़ता है। वेद में पुकार -पुकार कर कहा है- “नेति नेति” गोया यह इशारा है कि इससे आगे कुछ और भी है। फिर समझ में नहीं आता कि लोगों ने वेद की आखिरी बात को हद क्यों मान रखा है। बिटिया ! मेरा दावा यही है और मुमकिन है इसको लोग अहंकार समझें या ना मालूम क्या कहें, मगर जो बात सच है, उसको कहने की हिम्मत मुझमें आ ही जाती है। वह यह है कि मैं एक छोटे से छोटे Point पर यदि मेरी और सीखने वाले की उम्र इस क़दर हो कम- अज़- कम दस हजार वर्ष तक तालीम दे सकता हूँ। मैंने जो छोटे से छोटा Point लिया है, जैसे Point इन्सान में अरबों से ज़्यादा मिलेंगें और फिर कोई तमाशा देखे कि इस छोटे से छोटे Point में वह बातें मिलेगी कि लोग चकित रह जायेंगे। यह चीज़ है दूसरों के सोचने के लिये और यह हिदायत है सबके लिये कि सिर्फ़ उस चीज़ के जानने की कोशिश करें, जिसके जानने से सब कुछ जाना जा सकता है। किताबी खुदा तो सब लोग देखते हैं, और ज़िन्दा खुदा कोई ज़िरबिल्ला और ऐसा शायद ही कोई हो कि उसको देखने की कोशिश करे, जो वाकई है या समझने के लिये इन दोनों खुदा की जान है और इस खुदा को वही देख सकता है, जिसने अपने आपको बिल्कुल रूखसत कर दिया हो। फिर उससे जितना कोई चिमट सके, उतना ही कामयाब है और चिमटना क्या है, बस घुल-मिल जाना, ऐसा कि अपनी सत्ता का भी पता न रहे। यह शब्द ‘सत्ता’ मैंने इस अर्थ में लिखा है कि Being और Non-Being किसी पर अपना ख्याल न ठहरे, बल्कि इन दोनों को भूल जावे।

  यह बलुहा मैदान के बारे में जो तुमने लिखा है, यह तो बड़ी अच्छी हालत सामने आई। यह चटियल मैदान, जिसको मैंने अक्सर कहा है, उसकी भी सूक्ष्म गति है। गोया उजाड़ के भी उजाड़ का नक्शा है और यह बड़ी उम्दा हालत है। इसके बाद ईश्वर ने चाहा, कुछ इससे भी ज्यादा मिटा हुआ मैदान मिलेगा और फिर और भी, जो तुम हालत आने पर खुद लिखोगी। 

तुमने 25 जुलाई का खत भेजा है, उसमें Faith और Devotion का सबूत है और इसके सिवाय कोई ऐसी बात नहीं है, जो जवाब देने कबिल हो।

  31 जुलाई को रात के 12 बज कर 10 मिनट पर मुझे ऐसा मालूम हुआ कि तुम्हारी चाल एकदम से रुक गई और कुछ ऐसा मालूम हुआ कि हालत में कुछ मुर्दनी सी छा गई। मगर पाँच मिनट के बाद यह देखा कि यह सब होते हुए भी तुमने उसी मैदान में फिर घूमना शुरू कर दिया। वह मैदान Right side के एक corner पर है। चूकि रात का समय है, दिमाग़ काफी मेहनत कर चुका है, इसलिये ज़्यादा ठीक तौर पर समझ में नहीं आया। इसको फिर सोच कर लिखूंगा और तुम भी सोचकर लिखना। मुर्दनी तो अब नहीं रहेगी। अम्मा को प्रणाम।

  शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-418
शाहजहाँपुर
18/8/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

मैं 25 जुलाई के खत का जवाब दे रहा हूँ। तुमने खत के दूसरे पैरा में बहुत सी बातें लिखी हैं। एक जगह पर यह लिखा है कि ‘मालिक’ का ख्याल हर समय महसूस होता है, और ‘मालिक’ का ख्याल मुझमें स्पन्दन पैदा करता है। जब लय अवस्था बढ़ जाती है, ‘मालिक’ और बन्दे में सम्बन्ध गहरा हो जाता है, और याद में अभ्यासी जब Vacuum बनने लगता है तो ‘मालिक’ के पास जो चीज़ है, वह उसमें आने लगती है और आते-आते यहाँ तक हाल हो जाता है कि दोनों की निस्बत करीब-करीब बराबर हो जाती है, और इसको लय-अवस्था की अच्छी हालत कहते हैं। ईश्वर का शुक्र है कि तुम्हारी इस लय-अवस्था की शुरुआत हो चली है। मुझे भी अपने अभ्यास के ज़माने में ऐसा मालूम हुआ है और वाकई Devotion या भक्ति इसी को कहते है कि ‘मालिक’ की याद करते-करते अपनी सुध-बुध भूल जाये। अपनी सुध-बुध भूलने के अर्थ ये हैं कि हमारे पास जो कुछ है, सब विदा हो जाये, फिर तो भाई अपनी जगह पर मालिक ही रह जाता है। और यह कब ? जब हमारे होश के भी होश उड़ जाते है मगर एक बड़ी उम्दा चीज़ पैदा होती है। उस वक्त होश गुम होते हुए भी होश पैदा हो जाता है। इसके अर्थ ये हैं कि बेहोशी में जो होश होता है (बेहोशी में होश खास किस्म का होता है जिसकी शुरुआत पहले से हो जाती है, मगर आखिरी हद बहुत बाद को आती है) बस, वही एक किस्म की याद समझना चाहिए और याद क्या? जिन्दगी की असली हालत होती है। फिर होता क्या है-न अपनी याद न ‘मालिक’ की याद। मैं खतों में बहुत आगे की बातें भी लिख जाता हूँ। तुमने लिखा है “जो कुछ वह समझाये वही समझती हूँ।“ इसके अर्थ ये है कि तुमने Self-Surrender पूरी तौर पर कर दिया है। यह भी लिखा है कि जो कुछ मनन शक्ति है, वह सब ‘मालिक’ ने अपनी ओर खींच ली हैं। इसके अर्थ यह है कि ईश्वर ने चाहा तो यह हालत भी आ जावेगी, जैसा कि कबीर ने कहा है:-

  “मन थिर, चित्त थिर, सुरत थिर, थिर भया सकल शरीर।
ताके पीछे हरि फिरें, कहैं कबीर- कबीर।।“

  आगे लिखा है कि मेरी मौज ‘मालिक’ की मौज है। यह तो बड़ी उम्दा हालत है। इसको सूफ़ोइज्म में ‘तस्लीम बरजा’ की हालत कहते हैं।

  अब 5 अगस्त के पोस्टकार्ड का, जो मुझे 14 अगस्त को मिला है, जवाब देता हूँ। यह उस खत का जवाब है, जिसको मैंने लिखा था कि बारह बजकर दस मिनट पर रात को तुममें मुर्दनी सी मालूम हुई और एक शक्ति सिर के बाईं तरफ अपनी जगह से उतरती हुई, मालूम हुई। यह कोई खराब बात नहीं है। हल्के-हल्के तुम्हारी सैर हो रही है। आगे बढ़ने की ताकत किसी अभ्यासी में मुझे नहीं मालूम होती और यहीं पर मैं शब्द ‘गुरु’ का इस्तेमाल करता हूँ। गो मेरा ख्याल कभी इसका पैदा नहीं हुआ कि गुरू की ही शक्ति आगे बढ़ा सकती है। अब गुरू कौन? वही लालाजी और उनकी शक्ति। बस जब एड़ लगाई जायेगी तब इस मुकाम से तुम पार होगी। अब बाईं तरफ क्यों शक्ति उतरती मालूम हुई? उसे ऐसा समझ लो कि नदी में जब फैलाव बहुत आ जाता है, तो नदी, नाले, जहाँ गुजांइश होती है, पानी भरने लगता है। सैर तो तुमने रफ़्ता-रफ़्ता जीवन-मोक्ष दशा की खत्म कर दी थी, मगर उसमें अभी लय होना बाकी है। स्वास्थ्य ठीक हो जाने पर मैं यहाँ के आनन्द का मज़ा एक बार फिर तुमको दिखलाना चाहता हूँ। भाई यह चीज़ वेद के गुलामों को मिल ही नहीं सकती उस वक्त तक, जब तक कि गुलामी का तौक उस पर पड़ा हुआ है। यह तो उसी के नसीब में है, जो बिना ज़र (धन) किसी के हाथ बिक गया हो और वह भी कैसा हो, जिसके हाथ वह बिके, वह खुद ही बिक चुका हो।

4 अगस्त के खत का जवाब ज्यादा लम्बा-चौड़ा तो न दूंगा, दो जुमलों का जबाव दे रहा हूँ। तुमने लिखा है कि ‘ईश्वर का नाम भी अब ऊबन और घबराहट पैदा करता हैं’। उसका ख्याल या ध्यान भी घबराहट पैदा करता होगा। बात यह है कि ख्याल करने में दुई पैदा होती है और तुम्हारी कुछ न कुछ Harmonious Condition है। किसी शायर ने कहा है:-

  “शिर्क (दुई) से खाली नहीं, ऐ शेख जी ताअत (पूजा) कोई।
ख्वाह बुत (मूर्ति) को पूजिये या लीजिये नामे अल्लाह।।“

  तुमने यह लिखा है कि “हर आदमी की दशा अपनी ही तरह मालूम होती हो” इससे यह मतलब है कि कि तुम बहुत कुछ ‘आत्ममयी’ हो चुकी हो और वही चीज़ तुम्हें हर शख्स में दिखाई पड़ती है।

  अब 10 अगस्त के खत का मैं जवाब देता हूँ। दूसरे पैरे का जवाब मैं इसी खत में दे चुका जो 5 अगस्त के खत के जवाब में है। तुमने एक शब्द उसमें यह लिखा है-‘क्या मैं सचमुच अपने’ ‘मालिक’ को प्राप्त कर लूंगी। इससे मुझे बड़ी हंसी आई और एक शायर का कथन याद आया- “राहें तलब में ऐसे खुद रफ्ता हो रहें हैं, मंजिल पर हम पहुंचकर, मंजिल को ढूंढते हैं।“ मतलब यह है कि ईश्वर-प्राप्ति में हम इतने बेसुध हो रहे हैं, कि हम ठिकाने पर पहुंचकर ठिकाना तलाश कर रहे हैं। यह तो ऐसी बात है कि जैसे किसी को शक्कर का बनाया हुआ खिलौना खिलाया जाय फिर उसे शक्कर के ज़ायके की तलाश रहे। अब फ़र्क क्या है? कि वह शक्स वही शक्कर खिलौने की शक्ल में खा रहा है, मगर उसे शक्कर खाने की लालसा लगी हुई है। बात क़रीब-क़रीब एक ही है, फर्क स्वाद में है कि खिलौने का मज़ा और है, और शक्कर का और गो चीज़ एक ही है। एक बात मैं मतलब से अलहदा लिखता हूँ कि शक्कर खिलौना नहीं हो सकती और खिलौने में शक्कर मौजूद होती है, अर्थात् ब्रह्म और जीव में यही फर्क है। खिलौना जीव है और शक्कर ब्रह्म। तुमने हृदय में कचोटपन लिखा है और यह कि जो बेचैनी को दाद देती है। यह चीज़ तो किसी न किसी शक्ल में कायम ही रहेगी और उस वक्त तक, जब तक ‘मालिक’ और ‘बन्दा’ शीरा-शक्कर नहीं हो जाते, जैसे दूध में शक्कर। मुझे तो बारह वर्ष के बाद चैन मिला था, जब मेरी हालत खुली। मैं कोशिश करता हूँ कि तुम्हारे हर खत का जवाब दूं। इसलिए मैं तुम्हारे खत और अपने जवाब छपवाना चाहता हूँ, इससे आम जनता को बड़ा फ़ायदा होगा।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-421
शाहजहाँपुर
1/9/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा 23/24 अगस्त का पत्र प्राप्त हुआ, पढ़कर हर्ष हुआ। अच्छा है कि उजड़ी हुई बस्ती का अन्दाज़ तुम्हें प्रतीत होने लगा। ‘बहार’ और बाग की सैर तो सब को पसन्द आती है। जो खामोश तबियत है, वह तो चल-फिर कर सैर करते हैं, और जो चंचल-मन हैं, वह मजीरा और करतालों से अपनी तृप्ति कर लेते हैं और समझ लेते हैं कि बस सैर हो गई। मगर जो अपने प्रियतम (ईश्वर) की याद में है, उनकी सैर तो बिल्कुल इनके विरुद्ध है। प्रेम करने वालों को झनकार और गड़बड़ी से मतलब ही क्या? उसे तो वही चीज़ पसन्द आवेगी जो ‘मालिक’ के ठिकाने की खबर दे। उसका ठिकाना तभी मिलता है, जब हमारे सब मनोरंजन समाप्त हो जाते हैं और हम उनके चमत्कार से ऊंचे उठ जाते हैं। तुम्हारी हालत यह ज़रूर बताती है कि उस बस्ती की सैर जो कि चमत्कार से परे है, करने को जी चाहने लगा है और जब यह हाल है तो वजह नहीं मालूम होती कि सैर नसीब न हो। तुम्हारे कुल पत्र से यह मालूम होता है कि तुम्हारी तबियत का रुझान उस ओर हो चुका है, मगर अभी दिल्ली दूर है और अभी सच कहता हूँ कि बिटिया। कि सेर में पौनी भी नहीं कटी है। मगर आशा ज़रूर है कि तुम वहां तक पहुंचोगी और यह सब लक्षण उसी के हैं, जो पत्र में तहरीर किये हैं। तुमने खुद लिखा है कि “देखते हुए भी अनदेखी सी दशा हैं”। यह इस बात की खबर देती है कि Negation भी शुरू होगा और यही उसके चिह्न हैं। हाँलाकि अभी यह चीज़ कोसों दूर है, मगर इस लिखने से तुम घबरा मत जाना। इसलिये कि जब आदमी सफ़र कर लेना ठान लेता है और चल पड़ता है तो कोसों दूर की जगह पर भी पहुंच ही जाता है। 

  तुमने यह जो लिखा है कि “आप आने वाले थे, तो जल्दी आने की बेचैनी और जब चले गये तो जाने से हैरान” यह सब प्रेम की दलील हैं। मेरी हालत किसी वक्त में इस क़दर बढ़ गई थी और तुम समझ लो कि वह क्या हालत होगी। उसके लिये एक फ़ारसी मिसरा है, जिसका तर्जुमा यह है कि न तो दर्शन की योग्यता अर्थात् अगर दर्शन मिले तो वह चीज सहन नहीं होती थी और अगर हम ‘उससे’ अलहदा रहे, तो भी बर्दाश्त नहीं होता और इस हालत में न जाने कितने दिनों रहा हूँ और इस तकलीफ़ को सहन किया है। जब इस तकलीफ़ का अन्त हुआ, तो तकलीफ़ की दूसरी शक्ल सामने आई कि यदि कोई ईश्वर का नाम ले देता तो कलेजा पकड़कर रह जाता और मुंह से ‘हाय’ निकल जाती। अब यह कैसी अजीब बात है कि जिससे प्रेम करो, उसी के नाम लेने से तकलीफ़ हो। बिटिया ! और तो नहीं, ‘उसे’ रहसदार कहूँ या ‘उसकी’ निर्दयता कि उसने जब मुझे मार लिया तब अपने में बैठने दिया। यह ज़रूर है कि यह सब चीजें सस्ती में ही मिल जाती हैं। हाँ, मास्टर साहब ( ईश्वर सहाय ) ज़रूर खुश किस्मत है कि उनको निहायत ऊंची-ऊंची हालतें बिना तकलीफ़ के मिल चुकी हैं। यह तो ज़रूर है कि उन बेचारों को यह खबर नहीं कि यह चीजें उनमें मौजूद हैं। मुमकिन है कि रफ़्ता- रफ़्ता खुले। पहुंच तो वह बल्लियों आगे गये हैं और ऊंचे कि यदि चिराग़ लेकर ढूंढा जाय तो मुमकिन है इतनी आध्यात्मिक पहुंच का आदमी न मिले। हाँ, तुम ही हमारे मिशन में एक मिसाल हो, जिसके अनुभव और एहसास आध्यात्मिक दशा का नमूना है।

  तुमने “यह लिखा है कि हर आदमी, बच्चे तक की दशा अब अपनी तरह नहीं, बल्कि अपने से ऊंची ही लगती है।“ यह ऐसी दशा है कि ईश्वर का बहुत बड़ा भेद है। हमारे ‘लालाजी साहब’ ने इशारे से कुछ समझा दिया था। मैं भी इशारे के तौर पर इतना लिखता हूँ कि... Transmission करते वक्त कुल ईश्वरीय शक्ति तालीम पाने वाले में दाखिल हो जाये और उसका Nervous System Shattered हो जाये और सीखने वाला दम तोड़ दे। मेरी यह हालत पैदा हुई थी, जिसकी वजह से तालीम पाने वाला आधे मिनट को भी तवज्जो सहन न कर सकता था। गुरू महाराज ने मुरव्वत की वजह से Limitations नहीं डाले। जब मैंने देखा कि ऐसी हालत में मैं किसी को सिखा न सकता था, तो मजबूरन गुरू महाराज से प्रार्थना की। उन्होंने ज़रूरी बन्धन डाल दिये और यह वादा भी किया कि जब तुम कहोगे, मैं यह बन्धन तोड़ दूंगा, मगर इसकी ज़रूरत मुझे कभी न हुई।

  अब चोला छोड़ने के बाद सत्संगियों को यह फायदा पहुंचता है कि सिखाने वाले की कुल कमाई (हिस्सा रसदी) दीक्षित अभ्यासियों में पहुंचती है। इसके अलावा एक चीज़ यह भी है, कि जिसमें प्रेम और लय-अवस्था जितनी ज्यादा है, उतना ही हिस्सा उसको ज़्यादा मिलता है और ऐसे ही लोग सिखाने वाले के दुनियाँ से कूच कर जाने के बाद भी फ़ायदा उठाते रहते हैं और उन्ही के ख्याल के तार की झन्कार वहाँ पहुंच सकती है। लय-अवस्था से बहुत फ़ायदे हैं, क्योंकि जब अपना आपा मिटा दिया जाये तो ‘वह’ ही रह जाता है, जिसकी तुमको तलाश है। जिस हद तक अभ्यासी अपनी लय- अवस्था कर लेता है, उसी हद तक वह कामयाब है। तभी मैं पुकार-पुकार कर कहता हूँ कि लय- अवस्था हासिल करो, मगर लोगों को अपने से फुरसत ही नहीं, उस तरफ कौन घुमे हर शख्स यह चाहता है कि मैं ही अपनी ताकत से सब कुछ कर दूं। मुरव्वत की वजह से थोड़ा-बहुत (लय-अवस्था न सही, यह तो अभ्यासी की Duty है) किया भी, मगर जब घूम कर देखा तो फिर दुनिया भर का उसके विचार के अनुसार मलगोवा से भरा ही पाया। अब भाई, मैं उसको साफ़ करता चलूं और वह उसको भरते चलें, तो मेरी मेहनत से फ़ायदा क्या। अगर अभ्यासी भी ठीक तरीके से करते चलें तो भी मेरी डाली हुई रोशनी में अंधेरा शामिल न हो। लय-अवस्था का पैदा कर लेना बिल्कुल अभ्यासी की ड्यूटी है। तरीका तो मैं बताता ही रहता हूँ। दूसरा फ़ायदा जो Teacher के चोला छोड़ने के बाद Taught को होता है, वह यह है कि बिल्कुल खालिस फ़ैज अभ्यासी को मिलता है और इस किस्म की तालीम भी उनको मिलती है, जिसकी जानकारी ज़्यादातर Teacher को चोला छोड़ने के बाद होती है और भी दो एक बातें ऐसी हैं जिनके करने के लिये शब्द नहीं मिलते। मैं अपना किस्सा सुनाता हूँ। गुरू महाराज ने चोला छोड़ने के बाद भी मुझे मौजूदा ( Present) हालत में लाने के लिये बारह साल और लिये यह कहा कि अभी मैं वक्त और लेता, मगर जब मैंने यह देखा कि तुम थोड़े दिनों के बाद किसी के सिखाने के योग्य न रहोगे तो मैं मजबूर था। बात यह थी कि मैंने Negation का भी Negation जहाँ तक मुझे याद है करना शुरू कर दिया था, जिसका नतीजा यह होता कि मैं Practically NIL हो जाता और अगर उसके बाद वाली हालत जो Negation की Negation है, उसकी भी भूल की अवस्था कही जा सकती है, उस पर आ जाता तो मुमकिन था जिस्म छूट जाता।

  अब मैं तुम्हारे खतों का जवाब देता हूँ। एक नवम्बर सन् 54 के खत में तुमने लिखा है कि “दिमाग़ पर एक नशे की खुमारी सी छाई रहती हैं” नशा तो Matter में होता है, और जब उसकी तेज़ी कम हो जाती है तो खुमार रहता है। मगर तुम अगर और करके देखो तो, खुमार नहीं होगा, बल्कि ऐसी हालत होगी कि जैसे नदी के निकट बैठने से कुछ तरावट मालूम होती है। इतना ज़रूर है कि तुम्हारी मौजूदा हालत तरावट से भिन्न ज़रूर होगी, वह इसलिये कि एकाग्रता भी है। आगे इसको समझाने के लिये शब्द नहीं मिलते अब खुमार क्यों हैं? इसकी वजह यह है कि ‘Z’ स्थान के असर में तुम शामिल हो रही हो और इसकी सैर अब शुरू होना चाहती है, जो मैं जल्दी शुरू करा दूंगा। अभी किनारे-किनारे थोड़ा साफ़ होने को रह गया है। तुम्हारी तबियत जैसा कि तुमने लिखा है कि “न जाने कहाँ भाग कर जाने को बेचैन रहती है”- ठिकाने पर जाने को बेचैन रहती है और यह चीज़ हर अभ्यासी में होना चाहिये। तुमने जो हाल लिखा है वह ‘Z’ स्थान का दृश्य है। अपनी हस्ती सबसे कमतर समझना बड़ी सभ्यता की बात है। तुम्हें जो ठंडक मालूम हुई है, उसका कारण यह है कि Matter की गर्मी बहुत कुछ समाप्त हो रही है। इसको मैने “सहज-मार्ग के दस नियमों की शरह” में समझाया है। इस ठंड के अनुभव ने तुम्हें यह खबर दी है कि तुम Matter से अलग हो रही हो। पीठ की हड्डी में फड़कन और गुदगुदाहट की अनुभूति होना यह माने रखती है कि वह स्थान धीरे-धीरे खुल रहे हैं। मुर्दे की सी कैफियत क्षण मात्र के लिये भी हो जाना अच्छा है। इसके मानी यह हैं कि इस कैफियत का भी अन्दाज़ तुममें आने लगा। मैं चूंकि ज्यादातर ऊंची हालत की तवज्जो दिया करता हूँ, इसलिये अभ्यासियों में अक्सर ऊंची हालत दर्श जाती है। मुर्दे का एहसास होना यह एक बहुत ऊंची हालत है, मगर हालत तुममें अभी पैदा नहीं हुई।

  तुम्हारा 7.11.54 का खत भी मिला। अपने में ईश्वर का Heart समाया हुआ पाना, यह मानी रखता है कि Heart Region के Cross करने की तैयारियाँ हैं। चाहता तो मैं यह हूँ कि मैं इसी वक्त Cross करा दूं, मगर कराता यूं नहीं कि हर Point की सैर मैं करा रहा हूँ। शुरू में मैंने वाकई बहुत जल्दी कर दी थी, कि तुमको पिण्ड और ब्रह्मांड दोनों की विलायत (Mastery) दो ही दिन में दे दी थी और इससे तुम्हारा वक्त बच गया और ईश्वर की रचना में बहुत कुछ दखल हो गया। मगर अब मैं हर Point को सैर करा के ले जा रहा हूँ, ताकि तुम्हें वाक्फ़ियत हो। यह ठीक पता नहीं चलता कि Point कितने और हैं। मुमकिन है, हज़ारों न सही, सैकड़ों निकलें। जब बेशुमार Points ख्याल में आने लग जायें, तब तो फिर जल्दी करनी ही पड़ेगी और पूरी सैर मिनटों और सेकण्डों में करानी पड़ेगी। इसलिए कि मुझे अपनी इसी उम्र के अन्दर यह सब Points तय कराना है। तुम्हारा यह ख्याल सही है कि वाकई जिस चीज़ पर तुम Attempt कर रही हो, वह Heart Region से बहुत ही ऊंची है और वही चीज़ हासिल करना है जिसके लिए तुमने अपने आप को इस्तेमाल किया है।

  सच पूछो तो Heart Region बच्चों के खेल-कूद की जगह है मुझे यह चीज़ ऐसी ही मालूम होती है। मगर अफ़सोस यह है कि लोग इसको भी Cross नहीं कर पाते। कीर्तन और भजन में स्वामी लोग तमाम उम्र अपने शिष्यों को बहलाते रहते हैं। मैं समझता हूँ कि स्वामी लोगों को खुद इसकी खबर नहीं है। और हो कैसे ? बजाय बेरंग होने के रंग उनका गाउन बन जाता है। जो रंग उनके गाउन का होता है, वह रंग सन्यास का नहीं है। सन्यास का रंग दर हकीकत बेरंग है और यह बेरंग क्या होता है? जिसमें किसी रंग की झलक न हो। अब जिसमें कोई रंग नहीं होगा, उसको सफ़ेद कहते हैं। जब सब रंग मिला दिये जाते हैं, तो सफ़ेद बन जाता है। अब अगर वह सफ़ेद पहने तो, गृहस्थ और स्वामी में कोई फ़र्क प्रतीत न हो, लिहाज़ा आम लोगों के पहिचानने के लिये कुछ रंग जो हमारे Vision में मटीला आ रहा है, कपड़ों में दे दिया जाता था, जिसका मतलब भी यह कि हम अपने आपको मिटा कर खाक कर चुके है। और इस चिन्ह से लोग उनको पहिचानते थे। अब तो एक चीज रिवाज़ी हो गई है कि हर शख्स कपड़े पहिन कर सन्यासी बताया जा सकता है। मगर Public में मैं समझता हूँ कि अभी ज़्यादा Awakening पैदा नहीं हुई और न अक़ीद और विश्वास बढ़ा। वरना इस रंग के बैल ओर कुत्तों को भी उन्हें सन्यासी समझना चाहिये। इनमें एक फौकियत (विशेषता) है कि वह रंग के ऐतबार से सन्यासी पैदा ही होते हैं। मेरा इस इबारत से स्वामी लोगों पर Attack करने का मंशा नहीं है बल्कि यह है कि वह अपनी विवेक शक्ति (Discriminative Faculty) इस्तेमाल करें ताकि उन पर खुद-ब-खुद मामला खुल जाये और वह वैसे ही बनें कि जो सन्यस्त से मकसद (अभिप्राय) है। सोचने से ही भद्दापन लगने के माने ये हैं कि तुमसे दुई सहन नहीं होती। अभी वह हालत पैदा नहीं हुई कि एकता ओर दुई दोनों एक सी हालत मालूम हो। जैसे स्वप्न में आदमी बर्रा जाता है, मगर उसको अक्सर खबर नहीं होती। अगर बर्राने की खबर हो जाये तो बर्राये ही नहीं। ऐसे ही अगर तुम्हें एकता की खबर रहे तो दुई की तकलीफ़ न हो। असल में हमें एकता और दुई, दोनों से अलहदा रहना चाहिये तब “जो है सो है” की हालत आने की खुशखबरी होती है। लिखते-लिखते एक ख्याल आ गया। अल्लाह मियां के पास जो कुछ था, वह सब दुनियां बनाने के वक्त दे बैठे और आप दीवालिया हो गये। अब हम अगर जो कुछ अपने पास रखते हैं, वह दे बैठे तो उन्हीं की तरह हमारा भी शुमार दीवालिया में ही जायेगा। मैं समझता हूँ कि आजकल लोग इसीलिये जो कुछ उनके पास है, नहीं दे बैठते कि दीवालिया की फेहरिश्त में उनका नाम न आ जाये, बल्कि कोशिश लेने की करते हैं, ताकि पूंजी उनकी बढ़ती रहे। तुमने लिखा है कि “नम्रता का एहसास भी कुछ भद्देपन का ही एहसास दिलाता है।“ इसकी वजह यह मालूम होती है कि तुमने नम्रता को असलियत से अलहदा समझ लिया है और इसीलिए उसका एहसास बाकी है। असल नम्रता वह है कि कुछ न रहना और वह चीज़ Zero को याद दिलाता है। यह बात जो तुमने आखिर में लिखी है कि “पास जाने को भी तबियत नहीं चाहती थी और न अलहदा होने की।“ पास न जाने की तबियत चाहना उस वक्त अभ्यासी में पैदा होती है, जबकि ईश्वरीय हालत उसको सिखाने वाला ज़्यादा दे जाता है और अलहदा होने पर तकलीफ़ यों होती है कि यह प्रेम का तकाज़ा है तो यह कोई शर्म की बात नहीं है। ऐसा होता रहता है और इसमें कोई हर्ज़ या नुकसान भी नहीं।

  शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-438
शाहजहाँपुर
21/11/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो।

तुम्हारे दो पत्र 13 नवम्बर व 16 नवम्बर को मिले। तुम्हारा हाल डॉ. बी. एन. सिन्हा ने मय दवा के भेज दिया। दवा, वह तुम्हें भी लिख गये होंगे, इस्तेमाल करना चाहिये। एक बात जो तुम्हारे मर्ज़ को बिल्कुल अच्छा कर सकती है, वह है कि तुम्हारा इरादा बन जाये कि तुम अच्छी हो रही हो और सब मर्ज दूर हो रहे हैं। तुम इसका ध्यान (Meditation) एक-आध घण्टे रोज़ाना किया करो। ऐसा अगर तुम लगातार कर गई तो कोई मर्ज़ नहीं जो आराम न हो जाये। मुझे उम्मीद है कि तुम ऐसा करना आरम्भ कर दोगी और इसे लगातार करती रहो, इससे महीने डेढ़ महीने में सब शिकायतें दूर हो जायेंगी।

  मैंने पिछले दो खतों में अपनी बीमारी से जो फ़ायदा सत्संगियों को लिखा है और दुनियाँ छोड़ने के बाद जो लाभ सत्संगियों को होता है, वह भी लिख दिया। अब एक बात पिछले खतों में लिख तो चुका हूँ, संक्षेप के साथ इसमें भी लिखे देता हूँ ताकि बात पूरी हो जाये। Teacher अगर High Caliber का है तो उसको Representative कायम ही करना पड़ता है। अगर उसके शिष्यों में से उसके जिस्म छोड़ते वक्त कोई तैयार नहीं है तो उसे इन्तज़ार करना पड़ता है। यहाँ तक कि मैंने एक लेख देखा है कि एक महात्मा ने अपने दुनियाँ से जाने के बाद डेढ़ सौ वर्ष बाद अपना Representative कायम किया था। स्वामी विवेकानन्द जी के बारे में तुम्हें मालूम ही है कि महासमाधि लेन के कितने दिनों बाद अपना प्रतिनिधि स्थापित किया और जब उनको अपने Mission में उनकी तबियत के मुताबिक आदमी न मिला तो अपना Connection दूसरी संस्था से जोड़कर कायम कर दिया। बात क्या है कि कुल ताकत को Absorb कर सके, क्योंकि गुरु की कमाई (जो वास्तव में गुरू है) सब यहीं रह जाती है, और जब कोई इस योग्य नहीं मिलता, तो कहीं Store कर देते हैं। अब इसके माने यह हुए कि गुरू की ज़िन्दगी ही में शिष्यों को इस योग्य बनना चाहिए कि उसमें से किसी एक को अपना प्रतिनिधि Select कर सकें। मैंने तो अपना हाल ही अपनी Diary में लिखा है कि समर्थ गुरू महात्मा रामचन्द्र जी महाराज फतेहगढ़ निवासी ने जब महासमाधि ली तो मुझे ऐसा भान समाधि लेने के बाद ही हुआ कि कुल ताकत एकदम से अन्दर व बाहर अनुभूति होने लगी और मैं यह समझ गया कि यह हालत Transfer की हुई है, उसके बाद ही महासमाधि लेने की खबर हुई। इसको Absorb करने में मेरी सब Nerves गड़बड़ हो गई और सख़्त बीमारी के बाद जो नसों की गड़बड़ होने की वजह से थी, इसको अपने अन्दर रख सका। अब उनकी कमाई तो मेरे पास है और मेरी जो कुछ भी कमाई है, वह भी है, गोया गुरू की दी हुई चीज़ को मैने बढ़ाया ही है, घटाया नहीं। अब मेरे बाद यह भी कहीं Transfer होगी और इसकी मुझे फ़िक्र भी रहती है कि इस वक्त तक कोई अभ्यासी मालूम नहीं होता है कि कुल ताकत को बर्दाश्त कर सके, इसलिये कि लोग ऐसा बनने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, ऐसा न हो कि मुझे भी वर्षों इन्तज़ार करना पड़े। अब मतलब पर आता हूँ।

  Representative में कुल कमाई दाखिल हो जाती है और फिर उसके ज़रिये से Initiated Members को हिस्सा रसदी पहुंचती है। ताकत का केन्द्र Representative ही रहता है और उससे Inter-communion अपने गुरू से रहना लाज़मी है, ताकि वह उनके आज्ञानुसार उनका काम चला सके और उनके हुक्म की पाबन्दी दूसरे लोग भी कर सकें और Disciples को भी, अगर काफ़ी तरक्की कर चुके हैं, कि सिर्फ़ उनके मुतल्लिक इशारे मिलते रहते हैं। और जिस हालत पर Representative पहुंचा हुआ है, दूसरे सत्संगी भी पहुंच सकते हैं, फ़र्क सिर्फ़ इतना रहता है कि वह अपने गुरू की शक्ति का केन्द्र होता है और गुरू उसमें खुद लय होता है। यह गुरु के जाने के बाद का फ़ायदा है।

  चौबे जी की हालत जानकर खुशी हुई और भाई, मैं तो दो-तीन वर्ष से सिर पटक रहा हूँ, मगर मेरे बूते कुछ न हो सका। जब ‘मालिक’ की मर्ज़ी हुई और उनका संस्कार उदय हुआ तो वह एक अच्छी हालत पर खड़े हो गये। मगर सत्संग और मेहनत उन्हें बराबर करते जाना चाहिये और ईश्वरीय प्रेम से सरोकार रखें, जो बार-बार याद करने से हो सकता है। तुमने अपने 13 नवम्बर के पत्र में जिस चीज़ के लिये लिखा है कि एक तरह का सेंक सा रहता है, यह एक किस्म की हालत है, जो प्रेम से पैदा होती है और प्रेम जब निखरता है, तब इस वस्तु का भान होता है। मुर्दापन जो आता रहता है, इसके माने यह है कि जो हालत आने वाली है, ख्वाह कितने ही दिनों में आवे, उसी कैफ़ियत का अन्दाज़ है और यह मुर्दापन की कैफ़ियत लय- अवस्था का, अगर स्थाई हो जाये, तो अच्छी Stage है। साधारण हालत रहना एक अच्छी हालत है और यह आत्मा से निस्बत रखती है। स्थिरता का न समझ में आना, यह उससे भी ऊंची हालत है। चुप रहना इसलिये अच्छा लगता है कि खामोशी में आनन्द का भान होता है और इस कारण बोलने की फुरसत नहीं होती है। तुमने एक बड़ी अच्छी हालत लिखी है कि “सब रंग मिल मिलाकर एक सफेद रंग बन जाता है, मगर उसमें एक ऐसा रंग है कि जिसका पता नहीं चलता।“ यह रंग जिसका तुम्हें पता नहीं चलता, यह असलियत का तलछट है और समझने के लिए Dawn Colour कहा जा सकता है। अब 16 नवम्बर का जो पत्र है, उसमें कोई बात जवाब देने लायक मालूम नहीं होती। बस यह कि “मालिक अगर रमा हुआ हो, तो कुछ अनुभूति नहीं” इसके माने यह है कि वह चीज़ मौजूद है, जो इन दोनों के ख्याल बाँधने से एहसास होती है। मेहमान जब घर में आ जाता है, तो उसका इन्तज़ार नहीं रहता। तुम्हारे ‘Z’ Point की सैर मुझे अब खत्म मालूम होती है, मगर बहुत हल्के-हल्के और Dim तरीके पर हुई है, इसलिये तुम्हें उसका अन्दाज़ नहीं मिला और ऊंचे स्थानों की सैर ऐसे ही हुआ करती है। अभ्यासी को चाहिये कि जब ऊंचे स्थानों की सैर शुरू हो जाये तो अपने ख्याल को उस तरफ़ चिपकाये रखे ताकि उसमें Absorbency हो जाये और उसका मास्टर बन जाये। अब मैं इस स्थान के बारे में सोच लूं कि इसमें कोई कमी तो नहीं रह गई है, तब मैं आगे बढ़ाऊँगा। कमी नहीं रही होगी, मगर फिर भी सोच-विचार कर तय कर लेना है।

  मैंने जौनपुर जाने का 6 Dec. की शाम को इरादा कर दिया। पेट की तकलीफ़ पहले से कम है, फिर भी ज़्यादा है। साँस की तकलीफ़ करीब-करीब ठीक है। जौनपुर जाने से तीन-चार रोज़ पहले मैं इसकी दवा डाक्टर से लेकर खा लूंगा कि जो थोड़ा बहुत फायदा कर जाती है। खर्च का लिहाज़ करते हुए दर्द बर्दाश्त कर रहा हूँ और डाक्टर के पास नहीं जा रहा हूँ। मैंने 18 November 1954 को 12.30 बजे दिन के, तुम में कुछ थकान होना महसूस किया, मैंने उसी वक्त दुरुस्त कर दिया। शायद तुमने भी इसका एहसास किया हो। यह सैर करने में पैदा हो जाती है और यह उन अभ्यासियों को पैदा होती है, जो तेज़ी से रास्ता तय करते हैं। यह थकान भी मुबारिक चीज़ है। क्यों ? यह उसके तेज़ चलने की खुशखबरी देता है। मगर यह ज़रूर है कि जब तक थकान रहती है, तब तक अभ्यासी को सैर और सफ़र नहीं कर मिलता। इसलिये यह काम Teacher का है कि जहाँ थकान मालूम हो, उसको फ़ौरन दूर कर दे, ताकि उसका वक्त बेकार न जावे।

    27 नवम्बर को तुम्हारे चाचा Allahabad से हमारी Provincial Association में आ रहे हैं और 28 नवम्बर को चले जायेंगे। चौबे जी को प्रणाम।

  शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-442
शाहजहाँपुर
29/11/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो।

तुम्हारे तीन पत्र मिले, 19 नवम्बर, 22 नवम्बर और 26 नवम्बर के। मैंने डॉक्टरी इलाज शुरू कर दी है और दर्द Normal आ गया है। सांस की तकलीफ़ तो पहिले ही बहुत मामूली थी। तुम्हें तन्दुरुस्त बनना है और ख्याल से और इच्छा-शक्ति से ऐसा हो जाना चाहिये और यही अपनी पूजा समझो। दो तरह के ध्यान में इसी तन्दुरुस्ती के लिये लिखता हूँ, जो तुम्हें करना चाहिये। इसे ख्वाह मेरा कहना समझो या प्रार्थना समझो।

  नम्बर एक-पन्द्रह मिनट तक कम से कम यह ध्यान करो कि तुम्हारे जिस्म में जो कुछ बीमारी है, जिस्म से निकल कर पीछे सब धुएँ की शक्ल में उड़ती चली जा रही है। एक वक्त तो इसके लिये रखो। नम्बर दो-यह ध्यान करो कि तुम बिल्कुल तन्दुरुस्त हो रही हो और बीमारी सब निकल गई है। यह भी हो सकता है कि पहले नम्बर एक किया जावे और उसके बाद नम्बर दो किया जावे। सुबह, शाम या रात में किसी वक्त कर सकती हो।

  अब मैं 19 नवम्बर के पत्र का संक्षेप में उत्तर दे रहा हूँ। मन का बन्धन बिल्कुल हल्का पड़ गया है, इसलिए तुम्हारे एहसास में नहीं आता। अभी कुछ है, इसलिये कि मैने मन्मई- कोष अभी नहीं तोड़ा है। Heart Region अभी Cross नहीं कर चुकी हो, अभी कुछ बाकी है, मगर उसके आखिरी सिरे तक तुम पहुंच चुकी हो करीब-करीब। 

  तुमने जो यह लिखा है कि ईश्वरीय Heart निगल लिया है, इसके माने यह है कि तुम उसमें ओत-प्रोत हो चुकी हो। रम जाने का माद्दा तुम्हें नहीं मालूम होता कि तुम रम चुकी हो और रमती जा रही हो। दूसरी बात यह भी है कि दुई अन्दर से बहुत कुछ दूर हो चुकी है और यह लय- अवस्था होने के कारण है। मैं तुम्हारे इस Expression से बहुत खुश हुआ कि Heart ऊसर हो चुका है। जब किसी का Heart ईश्वरीय Heart हो चुका हो तो, उसमें फिर तरी कहाँ ? तरी तो हम खुद अपने ख्याल से पैदा कर लेते हैं, जिससे तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूल उगते हैं और मनुष्य अपने लगाये हुए बाग में मस्त रहता है, तो इसका तुममें अब ज़िक्र ही क्या ? ख्याल जब बहुत बारीक पड़ जाता है, तब उसका एहसास नहीं होता।

  अब 22 नवम्बर के खत का जवाब देता हूँ। तुमने लिखा है कि “दशा में ‘मालिक’ का दबाव व लिहाज़ की गुंजाइश नहीं रहीं”। इसके मतलब मैं ज्यादा नहीं समझा, मगर अन्दाज़ तुम्हारा समझ गया और यह लय- अवस्था के कारण है। बड़बड़ाना कुछ बेजा नहीं है। जब ख्याल In-touch रहता है, ‘मालिक’ से, तो वह अपने रंग की बात ‘मालिक’ से निस्बत रखते हुए खुद कह लेता है। तुम्हारे विचार की तासीर का यह कुल खत पता दे रहा है और चप्पा-चप्पा ‘मालिक’ के ही होने का पता देता एहसास हो रहा है। वह चीज भी तुममें खुल चुकी हैं कि जिसको मैंने गुरू-सन्देश के Pamplet में दर्शन की हालत में कहा है। भगवान के दर्शन ऐसे ही होते हैं।

    तुम्हारा एक खत 23 नवम्बर का भी मिल गया, उसका जवाब देकर फिर 26 नवम्बर का जवाब दूंगा। इसमें क्या अच्छी हालत लिखी है; ईश्वर मुबारक करे। इस हालत में मैं भी रह चुका हूँ और हमारे गुरू महाराज बहुत ज्यादा। जिसमें यह चीज़ पैदा हो गई, उसके लिये यह कहा जा सकता है कि वह अन्त तक पहुंचने की खुशखबरी ज़रूर देगा। भाई, तुम्हें एहसास लाजवाब है, वैसे लोग इसी रास्ते से गुजरते हैं मगर इन चीजों का एहसास नहीं होता। वह हालत क्या है कि जिसकी मैंने तारीफ की है कि “ईश्वर के नाम आने पर दिल पकड़ कर रह जाना”। दिल पकड़कर अभ्यासी यों रह जाता है कि जब कोई ‘उसका’ नाम लेता है तो विरह की हालत महसूस होती है और प्रेम की वजह से विरह सहन नहीं होता। यह तो इतनी उम्दा हालत है कि शब्द समझाने को नहीं मिलते। 

    अब 26 नवम्बर का जवाब बहुत छोटा सा देता हूँ। यह खत और भी विचित्र है और कुल खत का मतलब सिर्फ़ एक शब्द अदा हो सकता है। वह यह कि सब कुछ मिलाकर एक हो जाने की खबर मिल रही है। अभी ऐसी जाने कितनी दशायें आयेंगी कि जो आ आकर इतनी हल्की होती जायेंगी कि लापता मालूम होंगी। Unchanging हालत पैदा होने के यही चिन्ह हैं। तुम्हारी लय-दर-लय की चल रही है, बस सिर्फ़ इतना ही इस तारीख़ के खत का उत्तर है। 

    काशीराम आसाम से तुम्हारे खत पढ़ने के लिये और दिखाने के लिये मांग रहे हैं। मैं वहाँ भेजना नहीं चाहता, तुम्हारा पता पूछा है, मुमकिन है, तुमसे भी माँगे। तुम उन्हें लिख देना कि कुछ तो रामचन्द्र ने मेरे पास नकल करने के लिये भेजे हैं; जो जब मौका होता है, नकल करती हूँ और कुछ रामचन्द्र के पास हैं और वह उनको छपवाना चाहते हैं। फिर हर शख्स देख सकेगा; और उसके बारे में जो कुछ कहना है, रामचन्द्र से कहना।

    तारीख 29.11.54 रात को करीब 10.30 PM. 'Z' स्थान से आगे निकाल दिया। अब इन स्थानों के नाम A1 B2 रखे हैं; इसलिये अब तुम्हारी सैरगाह ‘A1‘ पर है। ऊपर जब तुमको खींचा, तो तीन दफ़ा नीचे उतर आयीं याने ‘Z’ स्थान पर, फिर ‘लालाजी’ साहब ने कहा कि झटका दो। जब ऐसा किया, तब ‘A1‘ पर ठहरी। बात यह थी कि ऊपर का Force नीचें फेंक देता था। जितना ऊपर अभ्यासी बढ़ता जाता है, Nature का Force बढ़ता जाता है, इसीलिये दूसरे की मदद की ज़रूरत पड़ती है। 

    शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-445
जौनपुर
8/12/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो।

पत्र 2 दिसम्बर सन 1954 का मिल गया और यह 6.12.54 को चलते वक्त मिला था। नारायण शाहजहाँपुर स्टेशन पर मुझे मिल गये, जो हमारे साथ मौजूद हैं। ता. 11.12.54 को दोपहर को गाड़ी से रात को ग्यारह बजे शाहजहाँपुर पहुंचने का इरादा है। मेरी यहाँ, जौनपुर आने की ज़रूरत भी थी, इसलिये कि शुक्ला जी की गड़बड़ी बहुत कुछ इलाहाबाद में दूर कर चुका था और शाहजहाँपुर में भी दर्द और तकलीफ़ ने जितनी इज़ाजत दी, रुजू रहा, फिर भी दो-चार रोज रह कर ईश्वर ने चाहा तो फिर उस हालत से बेहतर ले आऊँगा। तुम्हारे तजुर्बे के लिये मैं लिखता हूँ और यह ज़िन्दगी में पहला ही अनुभव है, वह यह दिल की हालत ऐसी थी जैसे उसकी Life जाती रही हो। अब Life काफ़ी पैदा हो गई, मगर जल्दी में मुझसे गल्ती हो जाती है और Special will इसी वज़ह से इस्तेमाल कर जाता हूँ। Life जितनी देना चाहिए थी, उससे ज़्यादा दे गया और इसका एहसास फ़ौरन हुआ। बोझ तो हटा दिया, अब यह देखना है कि कितनी कमी और कर दी जाय ताकि Moderation पैदा हो जाये। एक नस से दिल के पीछे रीढ़ से Connect है, उसमें कालिमा तो दूर कर दी, मगर भारीपन अभी दूर न कर सका। इसका तरीका सोचना है, कि कैसे दूर की जाय। मैंने इस गुरिया पर जब शुक्लाजी लखीमपुर से शाहजहाँपुर आये थे तो इस पर कुछ थपथपा दिया था; हाथ की उगंली से; ताकि उनको अपने आप को भूलने में मदद मिले और यह मेरी Research थी। उन्होंने न मालूम कैसे भारी कर लिया। वह ठीक करना बाकी है। बाकी सब ठीक हो गये हैं। Special Traning के लिये मैं समझता हूँ वह आदमी Fit है, जिसे ईश्वर बना बनाया भेजे। मैं चाहता तो यह हूँ कि Super Conscious State तुम सब लोगों की इतनी Develop हो जाये कि जिस चीज़ पर निगाह जाये, नुस्खा बिल्कुल सही मालूम हो जाये। अब जो मुझे मालूम होता है, मैं कह तो देता हूँ, मगर उसको करने के लिये भी इतना एहसास और अंदाज अभी तक किसी का नज़र नहीं आता और भाई मसल मशहूर है कि ”सिखाये पूत दरबार नहीं जाते” और बहुत सी ऐसी बातें हैं जो अब तक मेरे ख्याल में नहीं है; ज़रूरत पर ज़रूर ईश्वर बता देता है। मैं इस क़दर सुस्त पड़ गया हूँ कि अपनी मेहनत बचाने के लिये जल्दी कर जाता हूँ और उसका नतीजा यह होता है कि ज़रूरत से ज़्यादा force पड़ जाता है। इसमें दोनों शख्सों का लिहाज़ है कि अभ्यासी का वक्त बचा रहे और मेरा भी। System of Training इतना है कि मैं उसके मुकाबले में अभी भी नहीं जानता। मैने काशीराम को लिख दिया है कि मैं कस्तूरी के पत्रों को यों भी नहीं भेजना चाहता कि उसमें बहुत सी घरेलू बातें हैं; जो मैं यह नहीं चाहता कि हर शख्स जाने। 

  तुम्हारी सैर को जगह 'A' One (A) है। तुमने अपने खत में 'A' लिखा है। मैंने उसको सही कर दिया है। 'A' से 'Z' तक स्थान तुम पार कर चुकी हो, चूंकि Alphabet इससे ज़्यादा नहीं हैं, इसलिए A, B और C इत्यादि चलेंगे। तुम अब 'A1' पर हो और जब मेरी निगाह 'A1' पर जाती है, तो मैं गद्गद् हो जाता हूँ। उसकी सुगन्ध कुछ मुझे भी आ जाती है और जी खुश हो जाता है। इस मुकाम पर ऐसी महक है, जिसमें खुशबू कहना इस स्थान को भारी बना देना है। मगर भाई, कुछ अजीब मज़ा है। मेरी तबियत तो भाई, यह चाहती है कि तुम्हारे इस स्थान को देखता ही रहूँ; देखने से निगाह थकती ही नहीं। इस क़दर सफाई है कि आईना भी उसकी मिसाल गलत होगी। अगर रोशनी कही जावे तो वह भी उससे भारी पड़ेगी। मुझे तो अपने स्थान अब ढूंढे नहीं मिलते। Negation के चक्कर में इस हद तक पड़ गया हूँ और उससे एक Moment के लिये भी अलहदा होने का जी भी नहीं चाहता। इसलिये इस हालत के पहुंचे हुए अभ्यासी की गति देख-देखकर खुश हो लेता हूँ। मेरी हालत तो यह है कि “संग (पत्थर) बे नमक है।” अब ज़ायका बदलने के लिये अगर मसाला नहीं खाता तो उसकी झरप से ही जी खुश कर लेता हूँ। यहाँ की हालत इतनी Soothing है कि उनको देख-देखकर मेरे दिल में तस्कीन सी हो जाती है। तुमने जो Unchanging Condition को लिखा है कि “अंतर में धुंधला सा एहसास होता है” इसका ताल्लुक कुछ इस स्थान से नहीं है, मगर अन्दाज़ ज़रूर बता रहा है कि यह भी कोई हालत है। जहाँ पर Change खत्म हो जाता है, फिर Unchanging की शुरुआत होती है। यह तो बिल्कुल Divine Condition है और बड़े-बड़े महात्मा और योगी इसके लिये तरसते चले गये हैं। कबीर साहब इतने बढ़े हुए थे, मगर उनको भी इस चीज की हवा भी नहीं लगी। यह हमारे गुरू महाराज (समर्थ गुरू महात्मा श्री रामचन्द्र की महाराज) ही का गुर्दा था कि खुद इस हालत पर पहुंचे और दूसरों के लिये दरवाज़ा खोल दिया। तुम्हारी चाल और अन्दाज़ यह ज़रूर बता रहा है कि तुम्हें ईश्वर ने चाहा किसी वक्त यह हालत नसीब हो उम्मीद श्री ईश्वर सहाय मास्टर लखीमपुर से भी हैं और वह बहुत कुछ उस हालत की तरफ़ पहुंच चुके हैं। ईश्वर का धन्यवाद ज़रूर है अगर संस्था में एक भी ऐसा निकल जाये। मगर मुझे पूरी तौर से तो उस वक्त मिले, जब सब के सब उस हालत पर पहुंचे। अगर सब के सब न सही हो तो कम से कम चार-छः ही पहुंच जायें; मगर अफसोस यह है कि इस हद तक तरक्की की किसी को लालसा पैदा नहीं होती। हाँलाकि मैं कहे जाता हूँ कि Unchanging Condition सच्ची गति है और इसके लिये कोशिश करें। बिटिया ! मैं सच कहता हूँ कि इसका हासिल करना (ईश्वर मदद करे) मुश्किल नहीं है और खासकर ऐसे जमाने में जबकि कुदरत दोनों हाथों से अपनी दौलत लुटा रही हो। मुश्किल शब्द तो रूहानी सम्बन्ध में निकाल ही देना चाहिये, इसलिये कि हम में जो चीज़ है, उसी को तो हम Realize करना चाहते हैं। तो ताज्जुब है कि अपनी चीज़ को देखना और समझना इन्सान मुश्किल समझे। हमारी जौनपुर आने की ख्वाहिश थी, हम आ ही गये और कहीं अगर सफ़र की तकलीफ़ का ख्याल हमें रहता तो आने का इरादा भी न बनता और फिर भला हम कैसे आ पाते।

   तुमने यह जो लिखा है कि “Ignorance के लिये, कि इसको मुर्दापन की अवस्था कही जा सकती है, परन्तु मुर्दापन की कैफियत एहसास में नहीं आती” मुर्दापन से मतलब यह होता है कि Lifeless अर्थात् अपने को दूसरे के हाथ में ऐसा दे देना कि वह जिधर चाहे हिलाए-डुलाए। यह उस वक्त होता है जब कि दुनिया की धड़क-भड़क और उसके अन्दाज़ तबियत से ऐसे जाते रहते हैं, जैसे जागे हुए आदमी के सामने सपना। यह चीज़ Ignorance से सम्बन्धित की जा सकती है, मगर Complete Negation उसी को कहेंगे जब उसमें (ईश्वर में ) हम ऐसे घुल मिल जाते हैं कि हमें अपना और ईश्वर दोनों का पता नहीं रहता। या, यों कहो कि दोनों लापता से हो जाते हैं। इसको सूफियों ने ‘फ़नाफ़िल्लाह’ हो जाना कहा है और इसी की उमरभर कोशिश करते रहे। और मुमकिन है कि जितना कि बंदा हो सकता है, न हो सके हों। इसलिए कि Upward Current में जब तक कोई ले जाने वाला न हुआ तो जाना कठिन क्या, बल्कि असम्भव है। उसमें सिर्फ वही Stages रहते हैं कि जितना ज़्यादा अपने आपको कोई उसमें मिटा या मिला सका। वहाँ तो यह बात है जैसे अंधों में से किसी ने हाथी की दुम पकड़ ली और किसी ने सूंढ और किसी ने पैर और वह सब लोग उसी एक चीज़ को हाथी समझने लगे। ज़रा वहाँ की हवा आई और अपने आपको पूरी तौर से ईश्वर में लय समझने लगे। यहाँ पर हमने कठिन लफ्ज ज़रूर इस्तेमाल किया है, वह सिर्फ इसलिये कि ऐसा अभ्यासी मिलना बड़ा मुश्किल है कि अभ्यास शुरू करते ही उसके ख्याल की Current असल भण्डार पर गिर पड़े और वही उसके जाने का रास्ता बन जाये। हिम्मत अगर है तो यह भी हो सकता है; मगर यह चीज़ आसान हो जाती है जबकि, उस हद तक पहुंचे हुए को हम अपना Guide मान लेते हैं। यह चीज़ भी ऐसी है कि अगर जिन्दगी में न हो पाये तो Liberation पर कोई असर नहीं पड़ता और ज़्यादातर लोगों का उद्देश्य यहीं तक होता है, वैसे Nature पर Control कर लेना असल में योगी का मक़सद है और पूरा Control उसी वक्त कहना चाहिए जबकि खास तौर पर उसमें (ईश्वर में ) कोई लय हो जावे।

     तुमने जो अपने आपको Refreshing महसूस होना लिखा है, वह सही है। गर्मी और ठंडक के बारे में पिछले खत में लिख चुका हूँ। अब Pressure ज़रूर कम होता चला जा रहा है, बल्कि बहुत कम है। यह एहसास सही है। बाकी और हाल सब ठीक है, उसका कहाँ तक जवाब दिया जाये। शुक्लाजी व नारायण सबसे नमस्ते कहते हैं।

    एक बात जो मैं लिखना चाहता था, उसको भूल गया, अब लिख रहा हूँ। चाहता यह हूँ कि अभ्यासी Nature के Force को Cross करते हुए बिना मेरी मदद के ऊपर बढ़ते चले जायें; इसीलिये कि यह मामला हमेशा के लिये आसान हो जावे। यह तो मैं पहले ही कहीं लिख चुका हूँ कि अभ्यासी अपने आप अपने को कैसे तवज्जो दे ताकि वह मेरे ज़्यादा मोहताज न रहे। मगर ऊपर की लिखी हुई बात सोचना है। तुम भी कोशिश करो, मास्टर साहब भी जिसके समझ में आ जावे। यह लाज़मी नहीं कि हर बात मेरी ही समझ में आवे और हर काम मैं ही अच्छा कर सकूँ। एक मिसाल विमला की तुम्हारे सामने है कि मैं महीनों मेहनत करता और मुमकिन था कि इतना अच्छा नतीजा बरामद न होता, जितना तुमसे हो गया। असल में तुमने उसको बिल्कुल बदल दिया। विमला अबकी उत्सव में जज साहब के साथ आ भी रही है। यह जज साहब ने मुझसे कहा था।

    अब मतलब पर आता हूँ। यह तो हो सकता है कि ऐसी Special will बाँधी जाय कि शुरू से ही वह शक्ति पैदा कर दी जाय कि वह कुदरत की Upward Current में बहता चला जाय। मगर यह शक्ति मुमकिन है कि सहन न हो सके, इसलिये इस तरीके से कोई फायदा भी नहीं। कोई Point ऐसा होना चाहिए कि अभ्यासी उस पर Meditate करे और बेड़ा पार होता ही चला जावे। वैसी उस्तादी तरकीबें तो हो सकती हैं। एक इस वक्त लिखते-लिखाते ख्याल में आ गई; गो अभी इसको ज्यादा सोचा नहीं है सही कि Human brain का Centre जिसको Efficacy of Raj Yoga में मैंने Occipital bone कहा है, वहाँ पर इतनी कशिश (आकर्षण शक्ति) पैदा कर दी जावे और कुछ Duration कायम कर दिया जावे कि वह अभ्यासी को घसीट कर अपने पास तक ले आवे और यह ईश्वर की कृपा से मुमकिन भी है। मगर यह तो मेरे करने का काम रहा और Special will ईश्वर जिसको देवे, उससे सब कुछ काम बन सकते हैं। मगर सोचना यह है कि अभ्यासी क्या करे, जिससे यह मुश्किल आसान हो जाये। लिखाते-लिखाते यह तरकीब भी समझ में आ गई कि जिस स्थान पर अभ्यासी हो और समझ ले कि अब उसकी सैर पूरी हो गई है, तो उससे अगले मुकाम पर Meditate करे। यह तरकीब अभी मुझे “लालाजी साहब” ने बताई है। “लालाजी” की इज़ाज़त से मैंने उसमें इतनी तरमीम (संशोधन) कर दी है कि Master cell पर Meditate करे। Master cell इस स्थान का Centre होता है और उसमें Concentrated Energy होती है। यह चीज़ आसान हो गई, मगर उसमें एक डर भी है कि कहीं ब्रह्माण्ड में हो और पारब्रह्माण्ड में जाने के लिये Meditate न करने लगे। ऐसे वक्त में जब कि ब्रह्माण्ड मण्डल की सैर पूरी न हुई हो। यह दूसरा खत मास्टर साहब को देना।

    शुभचिन्तक 
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-446
जौनपुर
10/12/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो।

मैं एक पत्र यहाँ से भेज चुका हूँ, मिल गया होगा। कल आज़मगढ़ से नन्ही आ गई और सुबह डाक्टर साहब आ गये, इस वजह से हम भी रुक गये। अब 12.12.54 की रात को शाहजहाँपुर पहुंच जायेंगे। तुम्हारे पत्रों में जो कुछ भी तुमने लिखा है, ज़ाहिर होता है कि तुमने अच्छी लय अवस्था हासिल की है और यह चीज़ तो अभी बराबर ही चलती रहेगी।

   जब प्रकृति से बहुत कुछ सम्बन्ध टूट जाता है, तो उसका असर, जो गर्मी के मानिन्द है, एहसास में नहीं आता, बल्कि प्रकृति से जो ऊंची चीज़ है, उसका एहसास होता है, और वह असर गर्मी से विरुद्ध होता है। माँग जहाँ पर खत्म होती है और उसके नीचे जो फड़कन होना तुमने लिखा है, 'A1' स्थान करीब-करीब वही पर है। उसमें जो Actions जाग्रत के लिये शुरू हैं, वह फड़कन के रूप में मालूम होते हैं। रीढ़ में होकर जो खोखलापन बतलाया है, फिर साँप का एहसास, यह कुण्डलिनी का एहसास मालूम होता है। भाई याद तो वही ठीक है, जो कभी न आवे। अब यह है कि सुन-सुनाये अगर कहीं आ जाती है, तो वह भी समझना चाहिये कि ऊपर लिखी हुई हालत पर ले आना चाहती है।

    मास्टर साहब के दो खत मिले और चौबेजी की डायरी भी। मास्टर साहब से कह देना कि आपने जो राय दी है, मेरे पूछने पर वह सही है और मैंने उसी पर अमल किया। मास्टर साहब ने कुछ अपनी हालत भी लिखी है, वह खत पहुंचते-पहुंचते बहुत कुछ साफ़ हो जावेगी, अगर ईश्वर ने चाहा। मुझे बड़ी खुशी है कि चौबेजी व मास्टर साहब बड़े दिन की तातील में आवेंगे। मैंने एक खत पिछले लिफाफे में मास्टर साहब के लिये भेजा था, तुमने दे दिया होगा।

    चौबेजी व अम्मा को प्रणाम। नारायण सबसे नमस्ते कहते हैं।

   शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-452
शाहजहाँपुर
1/1/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, सदा सुखी रहो।

तुम्हारे कई खत पहुंचे। अब मैं ताः 16.12.54 के खत का जवाब दे रहा हूँ। अब मैं तुम्हारे तजुर्बे के लिये शुक्ला जी का Reference देते हुए कुछ लिखता हूँ, ताकि हर बात साफ़ हो जावे। शुक्ला जी प्रेमी जीव हैं, और बहुत शुद्ध-चित्त। लखीमपुर में रहे, दिल और System साफ़ ही रहा और यह चीज़ देखकर मैं उनको नये ढंग की तालीम देने को सोचने लगा और आरम्भ भी कर दी। मगर तजुर्बे ने बतलाया कि मेरी गलती थी। कानून कुदरत है कि हर चीज़ का Anti-dote उसके पास ही मिलेगा। Atom-Bomb का Anti-dote लोग तलाश कर रहें हैं, मगर अभी तक उनकी समझ में न आया। यह Scientist Atom कि जिसको समझने के लिये मैं Master-Piece कहूँगा, उसको फाड़ देते हैं, जिससे तबाही नतीजा होता है। उसका Anti-dote उसके क़रीब है, और उसकी शक्ल छोटे Bracelet की तरह है। अगर उस ताकत का इस्तेमाल किया जाये तो Atom का असर खत्म हो जायेगा। मैं इस Research में बिल्कुल Definite हूँ। कोई Scientist Research करके देखे। जिसने अपने आप को Study कर लिया है, उसके लिये कोई चीज़ ऐसी नहीं रह जाती, जो Study न हो गई हो। Socretes ने लिखा है कि ‘Know Thy Self’ और अपने यहाँ भी यही कहते हैं। योग-मार्ग में हम जहाँ तक हो सकता है, वही चीजें ले लेते हैं, जिस पर कि आखिर में हमको पहुंचना है। और भक्ति मार्ग जिसको आज कल कहते हैं, उसमें वहीं चीज़े लेते हैं कि जिससे हमको हटना और बचना है, इसीलिये वह हटते और दूर ही होते चले जाते। बस यह तो ऐसी बात रही कि जैसे अखाड़े में दो घंटे लड़ आये और कसरत पूरी हो गई। कोई दो घंटे पूजा करता है, कोई इससे ज़्यादा और वह समझ लेते हैं कि हमारी Mental Drill पूरी हो गई और पूजा का इत्मिनान हो गया।

    अब मतलब पर आता हूँ। शुक्ला जी के जिस गुरिया पर मैंने Push दिया था, वह बड़ा अच्छा असर पैदा कर रहा था। मगर ज़माने की गर्दिश और विचारों की परेशानी की वज़ह से उन्होंने उस हिस्से से अपना सम्बन्ध जोड़ दिया, जहाँ कि रोशनी के विरुद्ध अंधेरा था। चुनांचे जैसे Atom का असर उसकी करीब की चीज़ से कायल हो जाता है और अपना रंग ले आता है, उसी तरह से शुक्ला जी बजाय रोशनी के अंधेरा दाखिल करने लगे और दिल एक अंधेरी कोठरी बन गया, जिसने कुल System को Dark कर दिया। यह Darkness मैंने कुछ इलाहाबाद में दूर की और बाकी यहाँ। System की Darkness तो जौनपुर जाने तक मैंने साफ़ कर ली, मगर दिल का अंधेरा जौनपुर में कोशिश करने से न गया। यहाँ भी कोशिश की, मगर बेकार हुई। आखिर कार ईश्वर ने मुझे परेशान देख कर मेरी मदद की और मास्टर साहब को खत लिखते-लिखते मेरा ध्यान उस तरफ़ पहुंच गया। फिर जब मैंने उस चीज़ को रोका है, तब उनको अंधेरे से छुटकारा मिला। अब भी कुछ मकड़ी के जाल की तरह कुछ बाकी है। अब भाई, उसको दूर करना होगा। अंधेरा तो अब नहीं है, मगर पूरी रोशनी अभी नहीं पैदा हुई, यह मेरी बेवकूफी की कहानी है और देखो, इस मकड़ी के जाल को कब तक दूर कर पाऊं। ईश्वर मेरी मदद करे, तुम भी ज़रा दिल की हालत देख लिया करना और जो समझ में आवे, लिख देना।

     यह चीज़ ज्यादातर Faith और मोहब्बत में कमी हो जाने से पैदा हो जाती है। एक बात जो तुमने पूछी है, वह यह थी कि “दिल की हालत क्यों ऐसी हो गई है, जैसे उसकी Life निकल गई हो”। इसका जबाब मैं ऊपर दे चुका हूँ। रोशनी-आध्यात्मिक ज़िन्दगी है, जो सत्य का भान कराती है और अंधेरा रूहानी ज़िन्दगी की मौत। इसके पैदा हो जाने से तमोगुण वृत्ति के जुज़ पैदा हो जाते हैं, फिर ज़िन्दगी कैसी ?

    Super Conscious State के बारे में जो तुमने लिखा है, वह ठीक है और यही है जो Develop नहीं होती। मिसाल के लिये तुम्हारे ताऊजी हैं। इनकी Super Conscious State दिमाग तक की जगी हुई है, मगर उससे काम नहीं लेते। वज़ह यह है कि लगन व चाव, शौक़ नहीं है। जो चीज़ बिना मेहनत के मिल जाती है, उसका यही हाल होता है। बड़े-बड़े लोगों की उम्र गुज़र जाती हैं, और दिल की Super Conscious State भी पूरी तरह से जाग नहीं पाती। मैं चाहूँ तो कुण्डलिनी भी इनकी जग सकती है, मगर वह महज़ उनके खुश करने के लिये होगी कि यह चीज़ उनमें है। जिसका नतीजा यह होगा कि अहंकार बढ़ेगा, मगर उससे फ़ायदा न उठा सकेंगे। यह उसूल पुराना है कि जब गुरू लोग अभ्यासी से खूब मत्था रगड़वा लेते थे, तब कहीं शुरुआत कराते थे। वह सिर्फ़ इसीलिये था कि ताकि पता चल जाय कि कितनी तलब है। ज़माना गिरने पर गुरू लोगों ने इसका Misuse शुरू कर दिया और अपने आराम की खातिर शिष्य को तकलीफ़ देने लगे। सेवा कराना फर्ज समझा और सेवा करना कुफ्र। इसलिये इस चीज़ को रायज रखना किसी तरीके से मुनासिब नहीं, बल्कि गुरू को शिष्य की सेवा करनी चाहिये। यह हमारे लालाजी ने अमली (Practically) तौर पर दिखा दिया। 

    तुमने याद की जो शिकायत लिखी है, यह शिकायत नहीं है, बल्कि बड़ी अच्छी बात है। कबीर ने लिखा है-

    “एक एक का करइ विचार, जहाँ मिलौनी, तहाँ विचार"

    फिर भी तुममें अभी कुछ दुई बाकी है, इसलिये याद की टटोल बाकी है। याद जब अपनी न रहीं, तब दूसरे की याद बढ़ती है और जब दूसरा सामने न रहा तो फिर उसकी याद ही नहीं आती। मैंने “सहज मार्ग के दस उसूलों की शरह” में एक जुमला (Sentence) लिखा है, बिल्कुल ठीक तो इस वक्त याद नहीं, मतलब लिख रहा हूँ कि याद तो ऐसी होनी चाहिये, जो कभी न आवे या दूसरे मानों में याद की भी याद जाती रहे। सूनापन जिस तरह से भी तुम्हें एहसास होता हो, वह उजड़ी बस्ती का एक नमूना और वहीं हमें पहुंचना भी है।

    22 दिसम्बर का खत जो तुमने भेजा है, उसमें कुछ हालतें हैं। उसमें पहली चीज़ सन्तोष है, जो तुममें नहीं आया है और उस वक्त यह आना चाहिये कि जिसके कोई हालतें ही न पैदा हों। तुमने लिखा है कि “पहले भूली हुई सी हालत रहती थी, अब ऐसा प्रतीत नहीं होता” इसके माने ये हैं कि तुम भूली हुई हालत को भी भूल गई हो और यह लय-अवस्था की एक अच्छी हालत है। तुमने इस खत में बड़ी उम्दा बात लिखी है कि बंधन और मुक्ति यह दोनों शायद तुम्हें अपने लिये अर्थ-रहित मालूम होते हैं। यह बड़ा ऊंचा ख्याल है, अगर कोई सोचे तो मुक्ति खुद बन्धन है, इस लिहाज़ से भी कि हम उसमें ख्याली बन्धन डाल देते हैं, और उसमें एक हद पैदा कर लेते हैं, बेहद की गति उसमें नहीं रहती और जिससे यह नुख्स पड़ता है कि हमारे ख्याल से हद नहीं होती और इस वजह से भी हम बेहद की तरफ़ नही बढ़ पाते। दुनियाँ तो मुक्ति के ऊपर मर रही है, बन्धन से छुटकारा मुक्ति है और मुक्ति से छुटकारा असलियत। हमको तो इन दोनों को ही छोड़ना पड़ेगा, तब हम Infinite की तरफ जा सकते हैं और फिर यह भी नहीं। अगर तबियत Infinite का ख्याल मौजूद है तो हममें महदूदियत है और ‘बेहद’ की तरफ़ हम नही बढ़ पाते। अगर कोई हमारे गुरू महाराज की तालीम पर ग़ौर करे तो यह पता लगेगा, किसको? सच्चे जिज्ञासुओं को कि हम शुरू से ही Finite और Infinite को ख्याल में आने ही नहीं देते। कहने को तो भाई हम भी कह देते हैं कि भाई Infinite की तरफ़ जाना है, इसलिये कि और कोई शब्द वहाँ के लिये नहीं मिलता, जहाँ कि हमको जाना है। बाकी इस तारीख के खत में अच्छी लय- अवस्था का ही ज़िक्र है।

     27.12.54 का जो तुमने खत भेजा है, उसके हर ख्याल की व्याख्या हो सकती है या उसकी ज़रूरत नहीं मालूम होती, क्योकि समय का बचाना भी मतलब है। एक बात ज़रूर उसमें बहुत पसंद आई कि जीवन और मरण एक ही सा महसूस होता है। और यह चीज़ कुछ Originality का सबूत दे रही है, उसकी व्याख्या ज़्यादाकर नहीं मिलती है। 29.12.54 का जो खत तुमने भेजा है, उसकी कोई जवाब की ज़रूरत मालूम नहीं होती। यह गिलास का पानी जो चोटी पर गिरा हुआ मालूम हो रहा है और जिसकी वजह से एक सूराख मालूम होता है, इसके माने मुझे यह मालूम होते हैं कि ‘मालिक’ ने अपने खबर भेजने के लिये स्थान कायम कर लिया है। यह चीज़ वहाँ तक पहुंचने पर मुमकिन है कि अपना हाल खोल देवे। अब जो तुम्हारा 'A1' स्थान है, उसकी सैर तो कुछ शुरू है, मगर बहुत रफ़्ता-रफ़्ता। मास्टर साहब के ज़रिये से तुम्हारी तन्दुरुस्ती का हाल तो मिल गया, जो काबिल शुक्र है। अब मैं सैर की तरफ रुजू हूँगा। मेरी भी तन्दुरुस्ती अब अच्छी है, और अच्छे के माने ये है, कि खराब नहीं है। 

  चौबे जी वादा करते हैं कि मेरा प्रणाम अम्मा तक पहुंचा देगें, इसलिये इसमें नहीं लिखा केसर, विमला व उमा के खत आते रहते हैं। जवाब मुश्किल से पहुंच पाता है। तुलसी दास इलाहाबाद पहुंच कर 30.12.54 को देहली चले गये होंगे। कुछ मास्टर साहब कहते हैं, कुछ मेरी तबियत भी चाहती है कि कुछ और किताबी शक्ल में लिख डालूं। मगर सोचता हूँ तो यह मालूम होता है कि जितना मुझे मालूम था, सब लिख दिया। अब विचार उस तरफ दौड़ता ही नहीं और ऐसा लगता है कि Matter Exhaust हो चुका है। अब तुम बताओ, हम क्या लिखें।

    ट्यूब जब तक मिलते जायें, इस्तेमाल करती रहो। दामों की फ़िक्र मत करो। एक किताब जो श्री रामचन्द्र मिशन के ज़रिये से तुम्हारे लिये आई थी, वह भेज रहा हूँ। उसमें मनीआर्डर भी रखा था कि यथा शक्ति जो कुछ हो, भेज दिया जावे। मैंने तुम्हारी तरफ़ से एक रुपया भेज दिया। मैंने चौबेजी को दो रोज़ के लिये रोक लिया है, अब वे मंगलवार को आवेंगे और वे अच्छी तरह से हैं। नारायण सबसे नमस्ते कहते हैं। इति :- 

  शुभचिन्तक 
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-456
शाहजहाँपुर
15/1/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारे दो पत्र दिनांक 4.1.55 और दूसरा 9.1.55 का मिला। काशी राम मय अपनी धर्मपत्नी के 9.1.55 को उत्सव में सम्मिलित होने के लिये आ गये। काशीराम की हालत बहुत अच्छी पाई, देखकर जी खुश हो गया। उनकी धर्मपत्नी भी ब्रह्म-विद्या सीखने की इच्छुक हैं। मैंने एक अभ्यास आसाम में उनको करने के लिये लिख दिया था, जिसको वह बराबर कर रहीं हैं। अब वह बाकायदा सीखना चाहती हैं। मैंने उनसे कहला दिया कि 26.1.55 को कस्तूरी यहीं होंगी, वह तुमको बतलायेगीं। काशीराम ने इस मिशन का प्रचार आसाम में बहुत अच्छा किया है। चीनीज़ और बर्मीज़ भी सीखना चाहते हैं. मगर उनका यहाँ आना कठिन है।

     बागडोर तुम्हारी, वाकई मेरे हाथ में है, जो बहुत ज़्यादा तरक्की कर चुके हैं, उनकी बागडोर हाथ में रखना ही होता है। वजह यह है कि कहीं किसी चमत्कार में ऐसे मस्त न हो जायें कि बस उसी में जमे रहें। हमारे गुरू महाराज की कुछ ऐसी तालीम है कि अगर हज़ारों आदमी भी ऊंची तरक्की करने वाले हों, तो भी Automatically उनकी बागडोर मेरे हाथ में रहेगी। इससे बड़े फ़ायदे हैं, एक तो यह कि मुझे उनके हालत की जब ज़रूरत होती है, तो मिनट मिनट पर खबर रहती है। दूसरे, चलने की रफ़्तार सहज तरीके में, जितनी ज़रूरत है, उतनी ही रहती है और इस बागडोर से उनको अपने आप चलने की ताकत भी मिलती रहती है। यह भी तुम्हारा लिखना किसी हद तक ठीक है, कि थकान भी आ सकती है। मगर एक बात पर तुमने ग़ौर नहीं किया, जो इस बागडोर का नतीजा है और उससे हमारे गुरू महाराज की बड़ाई व महानता टपकती है। वह यह कि चलते हुए अभ्यासी को कितना Soothing प्रतीत होता है और जी नहीं घबराता। इसकी अनुभूति उन अभ्यासियों को हो सकती है, जो अपनी उस हालत में चिपके रहते हैं, जो ईश्वर उन्हें देता है। 

    तुमने इस पत्र में बेहोशी का रहना लिखा है। मैं बहुत पहले किसी पत्र में लिख चुका हूँ कि तुममें बेहोशी रहती है, मगर तुम उस वक्त एहसास न कर सकीं, मगर अब कर रही हो। असल में बेहोशी क्या है ? यह आत्मा की एक रंगत है, जिसका एहसास उस वक्त होता है जब दुनिया हमारे ध्यान से विदा हो जाती है। यह रंगत बढ़ती ही जाती है उस वक्त तक, जब तक कि हम ईश्वर में अपने आपको बिल्कुल लय नहीं कर देते। ऐसा हो जाने पर फिर तो हमारे पास वही हवा रहती है, जिसमें हमने अब ठिकाना लिया है, अर्थात् बेहोशी के भी होश जाते रहते हैं। मैं अपनी कहानी सुनाता हूँ और यह एक अजीब कहानी है। कहने के लिये मैं अपनी हालत भी बिल्कुल बेहोशी की कह सकता हूँ और है कुछ ऐसा ही, मगर उसका एहसास मुझे उस वक्त हुआ, जब कि मैं किसी से बातें कर रहा हूँ और बातों में यह ख्याल आ जावे कि हम दूसरे से कुछ कह रहे हैं। यह भी हुआ है कि Super Conscious State मुझे समझाने के लिये, या किसी के जवाब देने के लिये उस हद को लेना पड़ा हो, जहाँ कि बेहोशी की हालत है। असल में बिटिया ! यह बात हो जाती है कि बेहोश होते हुए भी हमको होश बाकी रहता है। बात यही है, सम्भव है, आमतौर पर लोग इसको न समझ सकें, इसलिये कि उन बेचारों की पहुंच इस हद तक नहीं है।

   जब अभ्यासी अपनी हालत में लीन रहता है, और शौक़ और दिलचस्पी उन्नति करती रहती है, तो जो उसकी हालत होती है, वही दुनियाँ में छाई हुई मालूम होती है। कारण यह है कि निगाह बदल जाती है। बस यही तुम्हारा हाल है कि हर जगह मुर्दनी छाई हुई देखती हो और मुर्दा के लिये तो एक मुर्दा ही है, इसलिये कि उसका अब किसी से लगाव ही नहीं और भाई, लगाव छूट जाने पर ही यह हालत नसीब होती है।

    अब मैं 9.1.55 के खत का जवाब दे रहा हूँ। जवाब देने से पहले 13.1.55 को जो मैंने ख्वाब देखा है, उसको लिख रहा हूँ। देखा यह है कि तुम मय अपनी बहनों और अम्मा के अपने घर मौजूद हो और मैं तुम्हारे स्थान 'A1' पर तवज्जोह दे रहा हूँ। उस दिन मैं कई बार इस स्थान पर तवज्जोह दे चुका था। अब मतलब पर आता हूँ। तुमने एक हालत इतनी अच्छी लिखी है, कि मुझे इतनी खुशी होती है कि शायद जब मैं इस हालत पर था तो मुझे इतनी खुशी नहीं हुई होगी। वह यह कि मुर्दा हालत की भी मौत हो गई। यह मेरी क़िस्मत है कि मुझे एक अभ्यासी से ऐसी हालत की खबर मिली। यह तो बड़ी ही अच्छी हालत है और इस हालत को लय-अवस्था का भी लय-अवस्था होना कहते हैं। इसके बाद शुरुआत बक़ा की हो चुकी है, अर्थात् जिसकी कि हालत शुरू हो गई है, इस बक़ा का नाम ‘लालाजी’ ने तुरिया दिया है। तुरिया-अवस्था लोग बहुत चाहते हैं, मगर भाई, तुरिया की भी कई क़िस्में हैं। तुममें तुरिया-अवस्था पहले से मौजूद है। मगर अब यह तुरिया जो आवेगी, वह इससे ज़्यादा निखरी हुई होगी। जब अभ्यासी में लय- अवस्था ज़्यादा बढ़ जाती है तो ईश्वर के ख्याल करने से घबराहट मालूम होती है, इसलिये कि उतनी देर के लिये उनसे अलग हो जाते हैं, जो तबियत को बर्दाश्त नहीं होता। इसी वज़ह से मैंने तुमको कहा था कि अब तुम्हें पूजा व ध्यान करने की ज़रूरत नहीं। यह भी वजह है कि उत्सव में आने का जब ख्याल पैदा होता है, तो भी तबियत घबराने लगती है, क्योंकि ऐसे ख्याल से दुई पैदा होती है और तुम एक में रमी हुई हो। इस खत में बहुत सी बातें जवाब देने योग्य हैं, परन्तु जो भी कुछ लिख दिया है, यह भी काफ़ी है। तुमने यह भी लिखा है कि “मुझे स्वयं अपने से डर लगता है” यह इतनी अच्छी हालत है कि समझाने के लिये शब्द नहीं मिलते। यह एक ऐसा भेद है कि जिसको खोलने का जी भी नहीं चाहता और वास्तव में यह ईश्वर का भेद है।

    अब तो तुम सब लोग आ ही रही हो, बड़ी प्रसन्नता की बात है। केसर, विमला एवं उमा के दो दिन हुए खत आये। अगर हो सका तो कुछ उनको भी लिख दूंगा। अम्मा और चौबेजी को प्रणाम और अब की चौबेजी ज़्यादा अच्छे मिले होंगे। 

  शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-457
शाहजहाँपुर
2/2/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम सब दूसरी तारीख को अपने घर के लिये रवाना हुए। मुझे हरी से 12.30 बजे दिन को पता मिल गया था कि तुम सब बस-स्टेशन पर पहुंच गये हो और 2.30 बजे की गाड़ी से जा रहे हो। मैंने चाहा कि स्टेशन पहुंचूं और तबियत ने भी मजबूर किया, मगर कुछ यह हाल था कि घंटे भर के लिये इज़ाज़त लेनी पड़ेगी और कुछ यह भी कि जब हम स्टेशन से वापिस आयेंगे तो, तुम्हें विदाई की फिर तकलीफ़ होगी। यह बातें सोच-समझ कर मैं स्टेशन नहीं पहुंचा। हालांकि बस स्टेशन कचहरी से करीब है, मगर इतना ज़रूर किया कि तुम्हें घर तक पहुंचा दिया और तीसरी फरवरी को करीब एक बजे दिन को वापिस हो आया। रास्ते में तुम्हें सफ़र की तकलीफ़, कम मालूम हुई होगी। यह यूं कि मरीज़ को तीमारदार की ज़रूरत पड़ती है और चौबे जी कुछ तुम्हारे पेट में सूजन का आना बता चुके थे। मोम की रोटी तुम बाँधती रहना, यह मुफ़ीद मालूम होती है। मुझे भी फ़ायदा किया और तुमने भी फ़ायदा एक ही रात में इसका अच्छा बताया अच्छी तो तुम हो। इसके बाद सूजन की तकलीफ़ ईश्वर करे फिर न पैदा हो। डाक्टरनी ने तुम्हें कुछ दवा बतलाई है, उसे खाना और तन्दुरुस्ती के बारे में जो ध्यान बतायें हैं, उनको तो तुम कर ही रही हो। उनसे बड़ा फ़ायदा होगा।

     तुम ईश्वर की कृपा से B1 स्थान पर आ ही गई, मगर B1 पर मुझे कुछ तेजी मालूम हो रही है। उसकी वजह यह है, मैं तुम्हें बताये देता हूँ, इसलिये कि तुम खुद दूसरों को सिखाती हो। जब A1 स्थान पर से तुम्हारे हटने का जी नहीं चाहता था, तो मैंने A1 पर Vibration पैदा किया था और मय उस Vibration को अगर मुनासिब समझा और उससे ज़्यादा फ़ायदे की उम्मीद पाई तो B1 पर Absorb कर दूंगा और फिर सैर की हालत ले आऊंगा। अब मैंने सोच लिया, मैं Vibration को उसमें Absorb करूँगा और फिर सैर की हालत पैदा करूँगा और इतना मैं ज़रूर रखूंगा B1 पर कि उसके आगे मुकाम तक भी वह चीज़ जाये। ऐसा करने से फिर यह चीज़ पैदा नहीं होगी कि तुम्हारा किसी मुकाम से निकलने का जी न चाहे। इसलिए कि जब वह चीज़ साथ होगी तो ठहराव का सवाल पैदा नहीं होगा। इसलिये कि जहाँ पर सूक्ष्म-रूप में हरकत मौजूद है तो ठहराव की शक्ल पैदा नहीं हो सकती, इसलिये कि हरकत और ठहराव यह दोनों opposite चीजें हैं। जहाँ हरकत होगी, वहाँ ठहराव नहीं हो सकता; और वह हरकत भी इतनी सूक्ष्म मैं कर दूंगा कि सिर्फ़ उसका असर ही असर रह जाये। फिर आगे चलकर अगर ज़रूरत हुई तो फिर जो कुछ समझूंगा वह करूँगा। खैर, यह बात तो वहाँ की है, जहाँ पर कि उसकी जरूरत होगी। थोड़ा इन्तज़ार में यह ज़रूर करूंगा कि तुम्हारा पेट ठीक हो जाय और वह ज़रूर ठीक होगा और एक हफ़्ते में ही तुम्हारी तन्दुरुस्ती की हालत ठीक आ ही जानी चाहिये।

   मैंने लखनौर की बाबत तुमसे, मास्टर साहब और चौबेजी से बहुत सी बातें कहीं, उसमें से एक बात बहुत ऊंची की है, जिसका मुझे कल ख्याल आया। वह यह है कि एक शख्स को अब यह ठीक याद नहीं आता कि किसको, मगर शायद पण्डित हरी सरन जो उनके सत्संगी हैं, उनको यह बतलाया है कि तुमको इसी जन्म में मोक्ष मिल जावेगी और यह बात मुझसे कल उस शख्स ने कही, हालांकि जिस शख्स के बारे में इस जन्म में मोक्ष हो जाना कहा है, उसके character की उन्होंने मुझसे बहुत बुराई की है।

     शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-460
शाहजहाँपुर
5/2/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे दो पत्र एक 4 फरवरी 55 का और एक 8 फरवरी 55 के मिले। हालतें इतनी बारीक हैं, कि इनका जवाब देना मुश्किल है। फिर भी कुछ न कुछ लिखता हूँ। असल हालत यों तुम्हारी है, उसका अगर ठीक तौर से कोई लिखना चाहे तो शब्द नहीं मिलेंगे। जो change की हालत असल हालत की वजह से होती है, उसको तुम बहुत अच्छा लिखती हो। तुम्हारी असल हालत जो है, वह जहाँ तक मेरी reading है, वह यह है कि जैसे कोई मनुष्य न सोता हो, न जागता हो, यानी सोने और जागने के बीच की हालत जो होती है, वह है। Point B1 जो मुझे इस वक्त एहसास हो रहा है, उसमें काफ़ी ज़ोर हैं और वह इस वजह से है कि मैंने A1 काफी Vibrate किया था और मैंने B1 में डाल दिया था। इसकी वजह है कि ऐसा मैंने क्यों किया पिछले खत में लिख दी है। इस ज़ोर को काफ़ी सोच समझकर और देखभाल कर...। अब चौथी फरवरी में जो लिखा कि सहज-चेतना सो अन्दर रहती है, हमारे यहाँ दो हालतें साथ-साथ चलती हैं। एक तो वह हालत, जो बिल्कुल असल है और दूसरी वह जो असल की वज़ह से हो। असल की वज़ह से जो हालत होती है, वह यह बताती रहती है कि यह change है मन की हालत का। यानी मन उसकी वजह से तरक्की करता है, उन्नति के माने ही यही है कि नीचे से ऊंची हालत पर जावे और जब मन उन्नति करते-करते अपने असल में लय हो जाता है फिर changeless हालत पैदा हो जाती है, जो ईश्वर को भी नसीब नहीं। यह हक सिर्फ भूमा का है, यह तो तत्व की बात रही, अब अपनी सुनो। तुमने यह जो लिखा है कि सहज-चेतना हालत का एहसास कराती है, वह मन की गति है और यह चीज़ मनुष्य जब तक जीवित है, कितनी ही उन्नति क्यों न कर जावे, कुछ न कुछ बाकी रहती ही है। यह ज़रूर है कि मन असल हालत से इतना रंग जाता है कि उसे अपनी असली हालत का होश नहीं रहता। तुमने यह भी लिखा है कि मुझे यह याद तक नहीं कि मैं कहीं गई थी और जिन्हें वहाँ देखा था, वह एक स्वप्न सा मालूम देता है। इसके माने यह है कि मन का चिपकाव बहुत कुछ असल से हो चुका है। यह मन ही है कि ज्यों-ज्यों असल में कायम होता जाता है, एक भाव भासने लगता है और द्वैत कम होने लगता है और लय यही चीज़ होती है। यह ज़ाहिर है कि मौत के बाद दूसरी ज़िन्दगी शुरू होती है। जो मरेगा, ज़रूर पैदा होगा। इसी तरह से जब हम जीवित रहते हुए मर जाते हैं, तो उसमें उस ढंग की ज़िन्दगी शुरू होती है और जब उस ढंग की ज़िन्दगी आती है, जो उस ढंग की मौत की वजह से है, तो फिर हमारे आने का कोई सवाल नहीं रहता। इसलिए कि वह ज़िन्दगी, जो जीवित रहते हुए मौत की वजह से आई थी, उसकी भी मौत होती रहती है। उसका ढंग ज़रूर और होता है, और आखिर में वह जिन्दगी आ जाती है कि जिसे हमेशा की ज़िन्दगी कहते हैं, और उसमें सुबह-शाम नहीं होती।

    आठ फरवरी के खत में जो हाल लिखा है कि सब कहीं रोशनी ही रोशनी मालूम होती है। रोशनी ज़रूर मालूम होती होगी, अगर उसमें तेज़ी है (जो उम्मीद है कि नहीं होगी), तो अभी B1 स्थान की हालत अपनी असली हालत में नहीं आई है। तुम यह भी लिखना कि दिमाग़ पर तुम्हें कुछ ज़ोर तो नहीं मालूम होता, जो Vibrated condition होने की वजह से हो सकता है। आज रात में तुम्हारी हालत को देखकर ठीक हालत में ले आऊंगा। रोशनी जो जगत में निकलती मालूम होती है, वह रोशनी नहीं है, बल्कि B1 पर जो ज़ोर और कंपन Vibration की तेज़ी है, उसका पसारा का इन्साफ़ है। जहाँ असलियत है, वहाँ न रोशनी है, न अंधेरा, एक अजीब चीज़ है। चौबे जी की Diary मुझे मिल गई और उनकी हालत का जहाँ तक मुझे एहसास है, मुझे ज़्यादा साफ़ मालूम देती है, मगर कुछ खफ़ीफ़ स्याही सीने की दाहिने तरफ़ मालूम देती है और soul Bondages मैंने कुछ साफ़ किये हैं, मगर फिर भी उसके साफ़ करने की ज़रूरत है। अब उन्हें ख्याल भी कुछ रहने लगा है। तुम भी देख लेना ताकि यह मेरा एहसास सही है और जो समझ में आ जावे. लिखना।

     मास्टर साहब को मैंने यह लिखा है कि गुस्से को दूर करो और वह बेचारे चेष्टा कर रहे हैं। इस चीज़ को हर मनुष्य को बचाना चाहिए। मेरा तो भाई यह हाल है कि मैं ‘लाला जी’ से क़दम क़दम पर डरता हूँ और अपनी गुस्सा से मुझे डर यह लगता कि फिर उन्हें भी गुस्सा आ जाती है। मैं प्रार्थना के ज़रिये से अपनी गुस्सा दूर करूंगा और तुम भी इसके लिए दुआ करो और मास्टर साहब को सत्संग कराके इस कालिमा को दूर करो। नतीजा इसका ज़रूर अच्छा होगा। यहाँ पर छोटे-बड़े का सवाल नहीं, एक दूसरे को मदद देनी चाहिए। 

  शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-464
शाहजहाँपुर
2/3/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे कई खत आये। मेरा आना और न आना-एकसा मालूम होना, इस बात की दलील है कि तुम्हारे ख्याल से अहं का वजन बहुत कुछ दूर हो चुका है। अहं के माने “मैं हूँ” के लगाये जाते हैं और यह चीज़ अहंकार के दायरे में आती है। यह इसका अंधेरा पहलू है और इसका उजेला पहलू यह है कि दूसरे के एहसास का वज़न अपने दिल पर आवेI गोया यह अहंपने की सूक्ष्म-दशा है। यह दोनों हानिकारक हैं। शुक्र है मालिक का कि पहले का वज़न तो बिल्कुल ही नहीं है और दूसरे का वज़न निहायत ही कम, मगर अभी है ज़रूर। तुम्हें जो Inactivity की दशा से चिमटना एहसास होता है, वाकई यह उससे चिमटना नहीं है बल्कि एक.. के बजाय आगे के धुएँ में अभी चिमटना है या यों समझ लो कि गरम पानी के भाप से चिमटी हो, न कि खुद गरम पानी बन गई हो। तुमने यह जो लिखा है कि दुनिया इधर से उधर हो जाये मगर मेरी condition changeless रहती है। इसको changeless condition नहीं कहते, बल्कि दृढ़ वैराग्य इसको कहना चाहिए या वैराग्य की बहुत ऊंची हालत कहना चाहिए। यो changeless होने में भी यह बात पैदा हो जाती है। मगर इस condition और असल changeless condition में अन्तर है। इस बैराग्य की हालत में तो दुनिया के अच्छा-बुरा हो जाने पर निगाह नहीं जाती और उस changeless condition में इस तरफ़ निगाह रहती है। वह तो नशेबाजी की बात है, जो मैंने पहले लिखी और इसमें नशे का लेशमात्र भी गुमान नहीं। 

    Swami Viveka Nand-what a nice expression and quite correct. can a Swami give this Kind of expression? Has any body dare to say so? This is the Divine wisdom. I would have given you a thousand words as a reward for this Sentence, but as you have a word of your own on these things have no value.

     हज़रत किबला-भाई यह चीज़ आब-ए-ज़र से लिखने लायक है। इतना अच्छा Expressions मैंने देखा ही नहीं।

    Swami Viveka Nand-This is a very Important letter.

    तुमने बाईं ओर जो गोलाई सा कम्पन लिखा है, उसे ज़रा observe करके लिखो कि इस कम्पन के साथ ज़रा दिल तो नहीं हिलता, फिर मैं इसका जवाब दूंगा। अच्छा, मैं जवाब दिये देता हूँ। अगर दिल हिलता है तो इसके माने यह होंगे कि Vibration असल भण्डार से तेज़ आ रहा है, और उसका असर हो रहा है। अगर सिर्फ़ कुछ चिनचिनाहट सी मालूम होती है, तो इसके माने यह होंगे कि दिल उसका पूरी तौर से असर नहीं ले रहा है। बाकी होश और बेहोश के बारे में जो लिखा है, यह सब C1 की सैर है, जहाँ की हालत एक छाया की तरह से है, यानी इसमें कोई वज़न नहीं।

    दूसरे खत में जो विचारों का ताँता लिखा है, तुम बता सकती हो कि वे क्या विचार हैं। वैसे तो असल चीज़ का असर जब भद्दी पर्दों पर पड़ता है, तो कुछ तार की तरह झनझनाहट दे जाते हैं और वह झनझनाहट चूंकि हममें जिन्दगी है, विचारों से तस्वीह (उपमा) दे देते हैं। अब जैसा हाल हो, वैसा ही समझ लो।

   चौबे जी और अम्मा को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

     शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-467
शाहजहाँपुर
13/3/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारा 8.3.55 का प्राप्त हुआ। अपने स्वास्थ्य के विषय में भी लिखना। एक पत्र मैंने छोटा सा डा. सिन्हा को भी लिखा है, उसकी नकल तुमको मास्टर साहब द्वारा भेज दी थी। लिख तो मैंने दिया है, मगर इसका असर उन पर शायद ही पड़े और वह ‘मालिक’ हैं अपने, इस लिये उनके जो समझ में आवेगा करेंगे। हमें तो ऐसा व्यक्ति चाहिए कि जो ‘मालिक’ उसको समझे, जिसकी मिल्कियत छाई हुई है और अपने आप को मोहताज समझे। मोहताज ही को तो ‘मालिक’ देता भी है और जिसे खुद ही आवश्यकता नहीं और अपनी ही मिल्कियत के झंझटों में जकड़ा हुआ है, उसके पास वह पात्र कहाँ से आ सकता है. जिसको ‘मालिक’ भर दे।

   तुमने अपने पत्र में एक बात बहुत अच्छी लिखी है कि जब तुम सो कर उठती हो तो तुम्हें यह लगता है कि तुम अपने से निकल आई। हमारे यहाँ की Training में एक बात यह है कि मन का सम्बन्ध कुछ न कुछ उसकी असल गति से कर देते हैं। तो सोते समय जब मन के लिये यह कहा गया है कि अभ्यासी को एकदम से जगाना नहीं चाहिये। इसलिये कि उसको धक्का लगता है। अब तुममें यह हालत बहुत उन्नति कर गई है और सोते समय तुम्हारा फैलाव अधिक हो जाता है, जो जागने पर तुम्हें ऐसा मालूम होता है कि तुम अपने आप में से निकली और उस समय अगर तुम गौर करो तो तुम्हें यह भी अनुभूति होगी कि कोई न कोई सोते समय आनन्द ज़रूर रहा है। हालांकि वह आनन्द अब कुछ इस ढंग का है कि सोने और जागने की हालत को अगर compare करो तो कुछ भेद समझ में आ जावेगा, यों गो उसकी अनुभूति करना भी कठिन पड़ेगी। तुम्हारे इस लिखने ने मुझे अपनी हालत के याद करने की याद दिला दी। मगर भाई कोई यह न समझ जाये कि मैं अपनी बड़ाई कर रहा हूँ। मगर क्यों कि मेरी जुवान में लगाम नहीं और आदत भी ऐसी डाल ली है, वह भी इस वजह से कि मेरे कहने सुनने से ही लोगों को इस हालत पर पहुंचने का शौक़ पैदा हो, खैर लिखे देता हूँ। जब आदमी सोता है तो, जो उसके सैर करने का स्थान होता है, ज़्यादातर उसी में विचरता है, मगर जब Limitations और Bondages टूट जाते हैं, तो फिर उसका पसारा बहुत बड़ा हो जाता है और मैं तो यह कहूँगा कि ईश्वर से मिलने का वही वक्त होता है। एक बात तुम्हें और बताता हूँ कि इन सब Bondages के टूट जाने पर ऐसा क्यों होता है, और क्यों लाज़मी है ? वजह यह है कि Centre के नीचे जो Energy है, उसको वह अपने फैलाव के द्वारा सब में Distribute करता है, यों वैसे भी Energy असल भण्डार से सबको मिलती रहती है, मगर यह रूहानी Energy जिस वक्त कि कम होने लगती है, उस वक्त ऐसी Personality ईश्वर भेज देता है। अब हाल तो मैंने लिख ही दिया, अब तुम किसी का हाल समझो और मुझे तो भाई सोने में बड़ा मजा आता है और कुम्भकरण की नींद मुझे पसन्द है। इसलिये कि मैं उस हालत में अपने घर में विचर लेता हूँ और Brighter World में घूमता रहता हूँ और वहाँ से जो कुछ भी मुझे मिल जाता है, अपने पास कुछ नहीं रखता। यही वजह है ख्वाह यह गति मेरी हो, या और किसी की। कण-कण आध्यात्मिक Energy से बहुत कुछ भर चुका है। जो लोग या महात्मा इसको grasp करते हैं, वह ज़्यादा फ़ायदा उठा जाते हैं। तो अब कहो बिटिया ! सुख की नींद कौन सोता है। पता नहीं कि वेद में इसको तुरिया या तुरियातीत या कुछ और कहेंगे। तुम बिटिया ! चौबे जी से पूछ कर लिखना कि वेदों में इसके लिये क्या शब्द इस्तेमाल किया है, यह कौन सी नींद कहलाती है। तुम पूछना जरूर, मुमकिन है, वह बतला सकें। मैंने तुम्हारी एक बात का तो जवाब दे दिया, अब बाकी बातें जो हैं, वह C1 की हैं और जो वाकई हालत है, उसका तरजुमा तुमने अच्छा किया मगर फिर भी अनिवर्चनीय है। अब C1 की हालत जो है, वहाँ पर अब मैं एक बात देख रहा हूँ कि तुम्हारी तो ठहरने की उस जगह पर फिर तबियत चाहती है। मगर यह कम्पन (Vibration) का बीज जो B1 पर मैंने डाला है, वह अब C1 पर फिर पैदा हो गया इसलिये कि तुम्हारा उठान आगे जाने को पैदा रहे। इस कम्पन (Vibration) को मैंने जब लखीमपुर में था, खामोश करीब-करीब कर दिया था, मगर उसका बीज नष्ट नहीं किया। अब तुम्हारी जहाँ पर ठहरने की तबियत चाहेगी, यह Vibration ठहरने नहीं देगा। अब सच पूछो तो मेरी मदद की अब बहुत ज्यादा ज़रूरत नहीं रही और तुम्हारी चाल में Vibration ने खुद-ब-खुद तेज़ी बढ़ा दी। तुम्हारा निकलने का जी न चाहे और कम्पन (Vibration) तुम्हें ऊपर को घसीट ही ले। मगर निगरानी मेरी थोड़ी ज़्यादा बढ़ गई, बस छोटा सा काम इतना ज़रूर बाकी है। या यूं कहो कि कम्पन का Control करना मेरा काम रह गया। मैं जब ज़रूरत समझुंगा, शान्त कर दूंगा। इसलिये कि इस चौकीदारी की चौबे जी तनख्वाह बहुत थोड़ी दे रहे हैं। यह ज़रूर है कि कुछ दे रहे हैं। मगर मंहगाई का ज़माना है, पेट नहीं भरता। उनसे कह  दो कि मेरी तनख्वाह कुछ और बढ़ा देवें। South India में एक दो साहब और शुरू कर रहे हैं, मगर उनका आना मुश्किल है। वहीं से Training चाहते हैं। अभ्यास मैं उन्हें लिख दूंगा। ईश्वर हर जगह मौजूद है, वह उनकी खुद फ़िक्र कर लेगा। अब तो कुछ ऐसे चिन्ह जरूर ईश्वर की कृपा से मिल रहे हैं कि यह चीज़ जल्दी उन्नति करे। अम्मा से यह कह देना कि वह मेरा जन्मदिन तो मनाती ही हैं, खर्चा 4 या 5 रुपये से अधिक नहीं होना चाहिए।

     “सहज-समाधि” किताब जो लिखी है, मैं चाहता हूँ कम से कम 40 या 50 सफ़े हो जावें और यह मेरी दुआ है कि जिस दिन तुम लिखने का इरादा करोगी, तुम उसको इतना अच्छा लिखोगी कि तुम्हें खुद ताज्जुब होगा, ईश्वर करे, ऐसा ही हो। अगर हो सके तो मेरी किताबों या खतों में से जैसा मुनासिब समझो कुछ Quotations दे देना। मैं बद-दुआ दूर करने की बहुत संक्षेप के साथ तरकीब बताता हूँ। ‘लाला जी’ ने मुझे यह सब बातें बताई हैं। महात्मा जिस हालत में होगा, उसी हालत से दुआ या बद-दुआ देगा ज़्यादातर। इसलिये जब उसका असर दूर करना चाहे, तो उससे अगले मुकाम पर बद-दुआ दूर करने का ख्याल बाँधे या अगर किसी की ब्रह्म-गति पूरी तौर पर है, इतनी कि जितनी हो सकती है, तो फिर वह एक झटके में उसे खत्म कर सकता है। कोई Point तलाश करने की ज़रूरत नहीं।

     शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-470
शाहजहाँपुर
28/3/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारे सब के सब मिल गये। काम कुछ ज़रूर इन दिनों ज़्यादा है। मद्रासियों के पत्र अक्सर चले आते हैं और उनके जवाब देने पड़ते हैं। हमारे यहाँ ऐसे दो चार ही आदमी हैं, जो mission की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर भी समझते हैं। मुमुक्षु आश्रम में जलसा अच्छा रहा। हम और काशीराम वहाँ दो दफ़ा गये और दो रुपया खर्च हो गया। बहुत काबिल लोग आये थे। अब अगर अपने mission की तरक्की की फ़िक्र पैदा करें, तो वह ऐसी है कि सुबह हज़ार तारों का खून करके पैदा होती है और यही आसार दुनिया में पैदा हो रहे हैं और ईश्वर की मन्शा भी यही है कि हम लोग सुबह का मुख देखें। इसलिए हर जगह गड़बड़ी की उम्मीदें हैं। क्या मालूम किसी को कि ब्रह्मपुत्र नदी भी अपना मुंह बंगाल की तरफ़ फेर दे। न मालूम कितनी बातें ऐसी हो सकती हैं। पाकिस्तान का एक बड़ा हिस्सा Barren हो जावे, दरिया खुश्क होने लगे, गरीबी फैलने लगे, गरचे कि यह जो कुछ भी हो रहा है, यह सब उन महात्माओं की ज़िम्मेदारी है, जो जौ बेचते हैं, मगर ग्राहक को गेहूँ दिखाते हैं और इसी से अंधेरी बढ़ती जाती है। मैं अभी इन बातों पर रुजू नहीं हुआ हूँ, इसलिए कि मुझे फुरसत बिल्कुल नहीं मिल रही है। काम का Pressure बहुत है, दिमाग पचपा रहता है। अगर यहाँ मास्टर साहब, ऐसा एक भी आदमी मेरे पास होता तो मैं इन कामों पर रुजू हो जाता, जो मुख्य हैं। आदमी तो मैं ऐसा बना ही लेता, मगर कोई ऐसा मिलता ही नहीं और जो है, उसे इस बात की तमन्ना नहीं। जहाँ इतनी बातें लिखीं, वहाँ पर एक खुशखबरी भी है कि हिन्दुस्तान में सोना (Gold) भी बनना शुरू हो गया है और अभी वहाँ उम्मीद है कि जहाँ काशीराम रहते है (आसाम में) इसलिये कि हिन्दुस्तान के लिये ज़माना अच्छा आ रहा है और भी कई जगह इसकी शुरुआत है और दक्षिण में विशेष करके और कोई धातु पैदा हो रही है। अब तुम्हारे खत में जो कुछ लिखा है, अब दुबारा कौन पढ़े; कि Reality की झलक तो अच्छी आने लगी है। D1 पर कल रात 11 बजे तुमको घसीट दिया। यहाँ पर inactivity की शक्ल कुछ बदली हुई मिलेगी। तुमने यह जो लिखा है कि ज़िन्दगी, मौत के नशे उतर चुके हैं। यह जब वाकई नशा उतर जावे तो Reality की अच्छी हालत कही जावेगी।

    ईश्वरीय काम कुछ सुपुर्द किये थे, उनके करने की ज़रूरत नहीं। वह अब हो गये। mission की तरक्की के लिये जो कुछ कर रही हो, ठीक है, वह किये जाओ।

   शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-472
शाहजहाँपुर
1/4/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

28 मार्च सन् 55 का पत्र प्राप्त हुआ। आज राम नवमी का दिन है। बड़ा शुभ दिन है। मगर भाई राम की जाप हमने गिनती से की है। नतीजा यह हुआ कि गिनती से हमने पूरा हिसाब बना दिया, और हम उलझन में फंस गये। उलझन तो रह गई और राम गायब हो गये। अब अगर हम राम को पाना चाहें तो, हमको यही चाहिए कि गिनती की उलझनों को हम दूर करके उस चीज़ पर आ जावें, जिस पर हिसाब और Geometry की बुनियाद है। वह चीज़ क्या हो सकती है ? वह नुक्ता ही हो सकता है, जो हर अदद हर लेख में सम्मिलित है, और जब तक वह अदद या गिनती में सम्मिलित नहीं होता, तब तक उसकी हैसियत ज़ाहिर नहीं होती, अर्थात् हमको हर अदद और हर तरफ़ की पहिचान कराने में यही नुक्ता काम देता है। अब हम नुक्ता तो भूल गये, जो सम्मिलित है, सिर्फ़ वह चीजें बस सामने हैं और याद हैं। यह तो भाई वही मसल हुई कि हमने अपने घर के अन्दर घर के मालिक को गुम कर दिया। हम मण्डलेश्वर हो जावें या महा मण्डलेश्वर हो जावें, हैसियत हमारी अगर न बदली, तो हमने अपने पसारा में भी इजाफा (बढ़ा) कर लिया। नुक्ते को और छिपा लिया और कहीं हमारा मण्डलेश्वर और महा मण्डलेश्वर होने का ख्याल पैदा हो गया, तो भाई हमारे हर हिसाबी पसारे में Square लग गया। अब तो और भी मुश्किल पड़ गई कि इस हैसियत को मिटाने में Square Root के Formula की भी याद आने लगी और घिसे पड़ते पड़ते यहाँ तक पढ़ना पड़ेगा कि जब तक हम खुद न अचेत पड़ जायें, हमारा फन्दा नहीं छूटता। अचेत पड़ना कठिन है, इसलिये कि हमारे ख्वाब में तो हमारी हैसियत घूम रही है और चक्कर पर चक्कर पड़ते चले जा रहे हैं। अब कौन हो सकता है कि इससे छुटकारा दिलाये, सिवाय इसके कि ईश्वर खुद जैसे बनाने में मुब्तला या उसी ताकत से बिगाड़ने में मुब्तला हो तो भाई ईश्वर को गर्ज़ ही क्या, इसलिए कि आप अपनी गर्ज़ उसकी गर्ज़ समझ लेते तो मुमकिन था कि उसके ख्याल के रंग में तुम्हारी आह का झटका पहुंच जाता। 

  अब मैं तुम्हारे पत्र का उत्तर देते-देते तुम्हारी तबियत को, ऊपर जो मैं लिख रहा हूँ रुजू करता हूँ। हिसाबी दौड़-धूप तो तुम में थी ही कहाँ और अगर हो भी तो बस मण्डलेश्वर और महामण्डलेश्वर और आजकल के महात्मा लोगों की गर्मी का असर आम लोगों पर जो पड़ रहा है, वह कुछ हो सकता है या उनके व्याख्यान का थोड़ा बहुत धुआँ जो कुछ भी विचार के तह पर आ गया हो वह अब नहीं है। गिनती तो खत्म ही है, नुक्ते की तरफ नज़र है, और वह नज़र अभी ऐसी है कि तुमने अभी उसको (मालिक) अपनी नज़र में भरा है, इसीलिये मनुष्य और जानवर के क़दमों पर सिर रहता है। अभी ऊंचा उठना है, तब फिर निगाह जब तक कि तुम खुद न चाहोगी, कदमों पर न रहेगी। यह एक हालत है, जबकि ‘मालिक’ का आभास सबमें होता है और यह तत्वमसि अर्थात् Thou art that, इसको “हमाओस्त” फ़ारसी में कहते हैं और यह अहं ब्रह्मास्मि से बहुत ही ऊंची हालत है। अहं ब्रह्म को चुपके-चुपके खटखटाता ज़रूर रहता है, इसलिए कि आखीर पर इसी की बदली हुई हालत पर आना है और लोगों के लिये तो अहं ब्रह्मास्मि सच्ची न सही, झूठी ही हालत पर आ जाना बहुत कुछ है। ईश्वर जाने क्या है ? जान वही सकता है, जिसमें जानकारी नहीं रहती और यह बड़ी ऊंची हालत है और फिर उसके बाद जाने क्या-क्या है? यह वही जान सकता है जो न कभी पैदा हुआ हो, न मरा हो। तुमने लिखा है कि कण-कण में झाँकती हूँ परन्तु कस्तूरी मिलती ही नहीं, इस टुकड़े का जवाब यह है कि कस्तूरी तो सचमुच खो चुकी, मगर उसकी महक अब भी मौजूद है, इसलिये तुम आगे खुद लिखती हो कि ऐसा लगता है मानों ‘मालिक’ ही होकर मैं ‘मालिक’ को चाहती हूँ। यह बात और यह महक यह बतला रही है कि अभी Soul की Forgetful State नहीं आई है। यह भी लिखा है कि बेहोशी कभी होती ही नहीं और होश कभी आता ही नहीं, यह आत्मा की असल हालत है। बाकी बातें जो खत में है, वह सब इसी हालत से भिड़ी हुई हैं। उसका एक-एक कर कहाँ तक जवाब दिया जावे।

   काशी राम अब आसाम जल्दी जाने वाले हैं और वहाँ खूब रुपया पैदा करेंगे और ईश्वरीय कमाई भी करेंगे। अम्मा और चौबेजी को प्रणाम, तुम्हारे भाई-बहनों को प्रणाम।

    शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-474
शाहजहाँपुर
7/4/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

मैंने एक पत्र मास्टर साहब के पते से भेजा था, मिल गया होगा। उस पत्र में इस पहली अप्रैल के खत का भी जवाब था, वही हालत अब भी है। D1 की हालत अभी खुली नहीं है, मगर खुलना चाहती है। इस पत्र में तुमने लिखा है कि खुशी का भण्डार पिघल कर भीतर-बाहर कुल कण-कण में व्यापक हो गया है। यह बिल्कुल आत्मा की हालत है, जिसमें न खुशी है, न रंज, न अपना है, न ग़ैर तुम इस मैदान में आ गई हो, मगर उसमें अभी लय- अवस्था नहीं हुई है और इसी हालत को तुमने तरह-तरह से लिखा है। 

    तुमने लिखा है कि ‘मालिक’ की Greatness दिल में नहीं रह गई है, यह हालत और भी अच्छी है। जब तक हमारी तबियत में Greatness है, बंधन से छुटकारा नहीं मिला और बिना इसके शुरुआत में काम भी नहीं चलता। बाकी जो भी खत में है, आत्मा की ही हालत बता रही है।

    अब एक बात नई, खत से अलग लिखता हूँ। गीता प्रेस से एक पुस्तक छपी है- “मन से वार्तालाप” और इस बात पर स्वामी शुकदेवा नन्द जी ने भी काफ़ी ज़ोर दिया है। इसका तजुर्बा तो तुम्हारे घर ही में हो चुका है, जिससे साबित है कि किस मुसीबत में लोग पड़ जाते हैं। इसमें शुकदेवा नन्द जी की बड़ी तारीफ (वाह, वाह) हुई है। अब तुम तसफ़िया करो कि स्वामी लोग किस कदर जनता को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ईश्वर चाहता है, आध्यात्मिकता पैदा हो, और स्वामी लोग ईश्वर का मतलब पूरा नहीं होने देते। नहीं मालूम क्या होना है। अगर ऐसे स्वामी लोगों को सजा दी जावे तो, इसकी अनुभूति अपनी ज़िन्दगी बाद होगी। और वैसे वे अपने आपको खुद सज़ा दे रहे हैं। यह भी अच्छा है कि स्वामी लोगों की इच्छा-शक्ति ज्यादा तरक्की किये हुए नहीं होती, वरना ज़हर और तरक्की कर जाता है। 

  अम्मा को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ। 

  शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-477
शाहजहाँपुर
17/4/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा पत्र 13.4.55 का मिला। तुम्हारा D1 का स्थान है। इसमें तुम आधे के करीब, बल्कि उससे कुछ ज़्यादा फैल चुकी हो। यह तुम्हारी हालत को मैं खबर देता हूँ। असल में चेतनता और अचेतनता दोनों में से कुछ नहीं है। अगर चेतनता का भास रहा तो, वह भी एक तरह का फंसाव है और अचेतनता का भास रहा तो उसके माने यह होते हैं कि चेतनता की दूसरी शक्ल में तबियत ठहरी हुई है और इसलिए चेतनता का ख्याल बाकी है। इन दोनों से रहित रहना ही अच्छा है, ताकि उसका Impression हम पर न पड़े इसके बाद भी एक और हालत आती है, जिसको Potentiality कहते हैं। जब हम इसको भी लाँघ जायें तब समझना चाहिये कि अब किनारा करीब है। वक्त को बचाने के लिये संक्षेप के साथ थोड़ा और लिखे देता हूँ। ब्रह्म-दशा तो तुम्हारी है, इसमें शक नहीं, मगर समझाने के लिये यों कहना पड़ता है कि जैसे कोई ब्रह्म के गुबार का एहसास कर रहा हो या उसकी हवा का चक्कर या मंडल में अभी हो। हैं यह सब ब्रह्म की ही चीजें। मगर इसका एहसास कि ब्रह्म-गति जब तुम कहती हो, तो कहने भर को रह जाती है। यह चीज़ यह ज़रूर बतलाती है कि उसकी शुद्धताई का कुछ न कुछ अन्दाज़ हो चला है, जिससे यह उम्मीद है कि ब्रह्म के गुबार वाली हालत से ऊंची जाओगी। पंथाई को यह बातें सब आती ही हैं।  बाकी और खत में लय- अवस्था इत्यादि का जो कुछ लिखा है, इन सबका जवाब यही है, जो ऊपर लिखा है। इस ख्याल से बाज़ आओ कि “मालिक से कहीं नाता तो नहीं छूट गया है”। मैं यह समझता हूँ कि ‘मालिक’ की ज़ात से तो नाता छूट गया है, मगर ‘मालिक’ से बहुत तेज़ जुड़ गया है। Saint तो West में कहलाये जाते हैं और अपने यहाँ सन्त कहते हैं। मगर अभी तुममें सन्त-गति पैदा नहीं हुई है। उम्मीद ज़रूर है, इसलिये तुमको Saint लिखना शुरू किया है, गोया सन्त से Saint लिखना शुरू किया है। बस उससे इतना ही अन्तर है, इसलिये Saint लिखता हूँ। पीठ और सिर का दीमक से चुनना, जो तुमने लिखा है, इसके मतलब मेरे ठीक समझ में नहीं आये। क्या इससे तकलीफ़ है? और जो कुछ भी है, तुम्हारे एहसास के अनुसार रीढ़ की हड्डी में मालूम होती है या कुल पीठ पर ? और सिर में मालूम होती है तो कहाँ पर ? क्या गुदगुदाहट और सरसराहट को तुमने दीमक का चुनना तो नहीं कहा है? अम्मा व चौबेजी को प्रणाम। भाई-बहनों को दुआ।

   शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-480
शाहजहाँपुर
23/4/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे दो पत्र 16 और 19 अप्रैल के मिले। दोनों का साथ ही साथ जवाब दे रहा हूँ। मेरे एक जुम्ले के माने तुम ग़लत समझ गई हो; जो 19 अप्रैल के खत में दर्ज है, वह यह है कि “इस ख्याल से बाज़ आओ कि कहीं ‘मालिक’ से नाता तो नहीं छूट गया”। इसका मतलब यह है कि नाता बिल्कुल नहीं छूटा है और यह ख्याल नहीं करना चाहिए कि नाता छूट गया। एक तो Initiation है, यह बिल्कुल पक्का नाता है और जिनका हो गया है, उनका नाता तो कायम ही है। दूसरी चीज़ इससे बढ़ कर है और वह प्रेम और आध्यात्मिकता का रास्ता।

    अब मैं तुम्हें समझाता हूँ। प्रेम करते-करते जिस्म से अभ्यासी ऐसी हालत पर पहुंच जाता है कि प्रियतम की अंतरिक्ष हालत से नाता जुड़ना शुरू हो जाता है और अभ्यासी की निगाह उसी पर जम जाती है अर्थात् प्रियतम की अंतरिक्ष हालत में वह घुस ही नहीं पड़ता, बल्कि मिलकर एक हो जाता है। अब जब अपने आपको उसमें लय कर दिया, तो ताल्लुक जिस्म को छोड़कर उसी से जुड़ता रहता है। गुरू जिस्म नहीं है, और अगर उसको जिस्म समझा जावे तो कबीर साहब की कहावत के अनुसार वह अभ्यासी गुरू-पशु है पर याज्ञवल्क्य ने अपनी स्त्री मैत्रेई से बहुत सख्त कहा है, जिसका मतलब यह है कि गुरू को गुरू की हैसियत से समझना और पूजना चाहिये। पहले मोहब्बत जिस्म से की जाती है, फिर अभ्यासी आत्मा में सम्मिलित होने लगता है। मैंने पिछले खत में यह लिखा है कि जात से नाता छूट चुका है मगर मुझसे बहुत तेज़ जुड़ गया है, जिसका मतलब यही था, जो ऊपर लिखा है। कुछ न कुछ नाता जिस्म से अभ्यासी का ज़रूर रहता है, मगर उसका एहसास उस वक्त होता है, जब कि वह हालत ले लेता है। ऊपर उठने के माने यही हैं कि गुरू की Innermost condition में लय हो जावे और अगर यह बात नहीं होती तो जीवन का उद्देश्य प्राप्त ही नहीं हो सकता। तुम तो कहीं ऊपर जा रही हो, तुम हमारी इबारत को गलत कैसे समझ गई, जबकि तुम्हें हर बात का खुद एहसास है मुझे उम्मीद है कि तुम अब समझ गई होगी। अगर न समझी हो तो हम फिर समझाने की कोशिश करें। मैं 13 अप्रैल के खत का जवाब पहले दे चुका था, अब आगे जबाब 19 अप्रैल का समझो। तुमने इस खत में लिखा है कि जीवित रहने का मन कुछ नहीं होता, यानी जीवन की ओर से तबियत बेपरवाह सी रहती है आगे यह भी लिखा है कि कोई मुझे मरा कह दे तो मरी हूँ और ज़िन्दगी की बात चले तो परवाह नहीं। इसका मतलब तो यह है कि तुम जैसी हो, वैसी ही रहो और यह इस बात को साबित कर रहा है, कि ईश्वर ने चाहा तो आगे बढ़कर यह हालत भी आवेगी कि यह एहसास होने लगे कि न कभी तुम पैदा हुईं, न मरी; यह बड़ी उम्दा हालत की शुरूआत है। मैंने किसी वक्त इस हालत के बारे में चौबे जी को लिखा है। मगर हालत तो तब है कि जब कोई भी एहसास न रहे और अभ्यासी को यह अख्तियार पैदा हो जावे कि जिस हालत में जब चाहे आ जावे। यह हालतें उसी वक्त पैदा हो सकती हैं, जब कि सिखाने वाले की अंतरिक्ष हालत में पहुंचना शुरू करें और फिर पहुंच जावे। गुरु का जिस्म अगर ख्याल किया जावे तो जिससे कि जानवर बने हैं उसी से वह भी बना है; चीज़ तो वह चेतनता है, जो इसके पीछे है। तुमने अपना उद्देश्य पूछा है; जीवन का उद्देश्य हर शख्स का यही है कि अपने आपको अपने असल में लय कर दे। अब यह उद्देश्य जिस तरह से प्राप्त हो, प्राप्त करें और यह अपनी तबियत पर है कि इस मतलब के सिद्ध होने के लिये अपनी रुचि के लिहाज़ से तरीका इख्तयार करे। अगर जंगल में रहने से यह चीज़ प्राप्त हो सकती है और उसका ख्याल इसके लिये मजबूर करता है तो वही करना चाहिए। और अगर तबियत में इतना ठहराव है कि घर में रहकर उसकी तबियत असल की तरफ भागती है तो वह घर ही में रहे और अगर घर में रहकर उसकी वृत्ति सन्यस्त की तरफ जाती है तो इसी हैसियत से उसको घर में रहना चाहिए। लोग ऐसे भी हैं कि घर में रहते हुए शादी वगैरह नहीं करते, इसलिये कि उनकी तबियत इसी क्रिया से उनको फलीभूत कर सकती है, तो वह भी ठीक है। इसलिए तुम कह सकती हो कि जीवन का उद्देश्य हासिल करने के लिये तुम्हारी, संस्कार द्वारा ऐसी ही वृत्ति बन गई कि यही हालत जिसमें तुम हो प्राप्ति के लिये मुनासिब थी, क्योंकि मुख्य चीज़ यही है कि जीवन का उद्देश्य जैसा कि ऊपर लिखा है हासिल करे और उसमें जो भी Sacrifice जरूरत है, करे सो तुमने तो Sacrifice अपने उद्देश्य प्राप्त करने के लिये की है। तो इससे तो हर conscious मनुष्य को खुश होना चाहिये और तुम्हारी कद्र करनी चाहिए।

     तुमने कहीं पर लिखा है कि D1 पर कुछ सख्ती है, यह एहसास तुम्हारा सही है। ईश्वर ने चाहा, यह चीज़ भी ठीक हो जावेगी। Dr.K.C.Vardhachari का खत आया है, जिसकी नकल भेज रहा हूँ। तुम भी इसको पढ़ कर समझ लेना और इसके मुताबिक जैसा मुनासिब हो, इनको फ़ायदा पहुंचाना। वह रोशनी देखना चाहते हैं। उन्होंने खत में यह भी लिखा है कि मैं उनको पैदाइश का दिन और वक्त लिखूं और जिन्दगी में खास बातों की तारीखें। मेरी जन्मपत्री चौबेजी के पास है उसमें पैदाइश का दिन यानी Date of birth देखकर मुझे लिख दो, क्योंकि मेरी माँ यहाँ नहीं हैं, वरना मैं उनसे पूछ लेता। चौबेजी को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

     शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-482
शाहजहाँपुर
4/5/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारा 1 मई का पत्र मिल गया। डा. वर्धाचारी का खत आया, उसकी नक़ल मैं तुम्हारे पास भेज रहा हूँ। इसको पढ़ लेना, जहाँ पर समझ में न आवे, चौबेजी से समझ लेना। इसकी नकल मैं तुम्हारे पास इसलिये भेज रहा हूँ कि तुम भी उन्हें Training दे रही हो तुम्हें उनका हाल मालूम होना चाहिए, ताकि तुम उनकी कमियों को समझ लो और उनको दूर करने की कोशिश करो। मैंने तुम्हें जो सत्संगियों की फेहरिस्त दी थी, उसमें कुछ नाम और बढ़ा लो, अगर मैं उसमें भूल गया हूँ- 1. S.K. Raja Gopalan, Engineer at Delhi. 2. Kumara Swami और उनकी बीबी।

    तुम्हारे खतों का जवाब देना अब यों मुश्किल पड़ रहा है कि दो ही हालते गहरी होती चली जाती हैं कि इधर से तोड़ना और उधर को जोड़ना अर्थात् बिल्कुल यही हालत हो रही है कि तुम ऐसी लय होती चली जाती हो कि अपने आपको खोती चली जाती हो। तुमने अपने पत्र में लिखा है- “कस्तूरी को यदि चिट्ठी लिखवा दें, तो मैं दे दूंगी।” इसमें वह हालत छिपी हुई है कि इसकी जहाँ तक तारीफ़ की जाये थोड़ी है और यह तुम्हारे खो जाने का पूरा सबूत है।

    अभ्यासी जब अपने आप को बिल्कुल लय कर डालता है, तब असली ज़िन्दगी शुरू होती है और उसी हालत में ठीक तौर से यह तीन बातें होना शुरू हो जाती हैं-1. Divine thought, 2. Divine action और 3. Divine wisdom. इस खत में जो कुछ भी लिखा है, सब लय अवस्था की अच्छी कैफ़ियत है। अभी अन्त दूर है और फिर इसके बाद जो ज़िन्दगी आती है, वह भी लय होना शुरू होती है। अंत-गति मुझे तो यह मालूम होती है कि oneness में पहुंच कर इस चीज़ की खबर न रहे। मैं समझता हूँ, इतना जवाब के लिए काफ़ी है। तुम तो ईश्वर की कृपा से बहुत काबिल लड़की हो। तुम से mission को बहुत काफ़ी फायदा पहुंचेगा।

    शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-485
शाहजहाँपुर
20/5/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारे 12 व 14 मई के पत्र मिल गये। मैंने पढ़ाई की वजह से केसर के ख्याल का रुख कुछ आध्यात्मिकता से हटा कर पढ़ाई की तरफ़ कर दिया, मगर उससे उसका कुछ नुक़सान हुआ। अब मैं नतीजा आने पर उसे ठीक कर दूंगा।

    तुम्हारे खतों के जवाब देना अब बड़ा मुश्किल है क्यों कि अब लय-अवस्था और फिर उसकी ज़िन्दगी ही चली जावेगी। जिन्दगी के माने बक़ा के हैं, और बक़ा को तुरिया कहते हैं। मेरी समझ से हर लय-अवस्था के बाद एक तुरिया आती है और यही दौर चला जाता है। Fine और Super Fine का हिसाब रहता है। तुमने जो कुछ भी हालत लिखी है, यह सब लय की लय अवस्था बता रही है। जिन-जिन पर तुम Working कर रही हो, उन सब की आध्यात्मिक दशा अच्छी है। माता जी को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

     शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-488
शाहजहाँपुर
3/6/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे दो खत 23 मई और 27 मई के पहुंचे। केसर का भी खत आया। उसके System में वह डोरे तो अब नहीं हैं, मगर अभी यह ज़रूर मालूम होता है कि यहाँ पर डोरे थे। इसके माने ये हुए कि कुछ सूक्ष्म और हवाई रूप में कहने मात्र कुछ है। बाकी हाल जो कुछ उसने अपने खत में लिखा है वह सब यह बता रहा है कि धीरे-धीरे अच्छी उन्नति हो रही है। उसको विस्तार करने में क्यों समय नष्ट किया जाये, इसीलिये कि आपकी हालत खुद प्रशंसा कर रही हैं।

   तुम्हारा यह ख्याल सही है कि तुम्हारी E1 की सैर समाप्त हो चुकी है। मैं इसको देख चुका था, मगर न जाने क्यों हमें यह स्थान देख-देखकर और खास कर उसी पवित्रता को देख-देखकर यही जी चाहता है कि अभी कुछ दिन और रखा जावे और इसीलिए मैंने अभी ऊपर नहीं चढ़ाया है। मगर, खैर अब ज़्यादा नहीं रोकूंगा। तुमने अपने खत में लिखा है कि “मालिक शब्द के कुछ माने ही नहीं रह गये”, यह ठीक है। जिस चीज़ की तलाश थी या जिस ‘मालिक’ की ज़रूरत थी वह तो तुम खुद होती जा रही हो। यह ‘मालिक’ या गुरू का दिल में Conception रहना खुद एक बन्धन है। यह तुमने लिखा है, जिसको तुम ठीक तरह से Express नहीं कर सकीं, कि “ईश्वर इत्यादि सब भ्रम था”। यह एहसास बहुत अच्छा है और यह बात बता रहा है कि महा-प्रलय, जहाँ कि सब चीज नाश हो जाती है, उस हालत से तुम सम्बन्धित रहने लगी हो। मगर इस असली चीज़ के आने में अभी बहुत समय लगेगा। इसलिये कि इसमें भी बहुत सी हालतें बदलती रहती हैं। इतना तो ज़रूर हो गया है कि Unity का एहसास रखते हुए बहुत कुछ खत्म हो चुका है। तुमने यह जो लिखा है कि ‘मालिक’ को कब पाऊंगी, और कैसे पाऊंगी, इत्यादि, जब प्रेम ज़्यादा होता है तो यह चीज पैदा हो जाती है और फिर करते-करते आदत भी ऐसी बन जाती है कि मंजिल पर पहुंचने पर भी हम मंज़िल को ढूंढ़ने लगते हैं। तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

   मुरीद खाल खाल होते हैं, और फ़िदाई हज़ारों में एक।

   शुभ चिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-490
शाहजहाँपुर
11/6/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 6 जून का मिला- पढ़ कर हर्ष हुआ। ‘मालिक’ का धन्यवाद है कि हममें से कोई पथराई आँखों से देखने वाला बन तो रहा है। असल में ब्रह्म-विद्या का दृश्य देखने के लिये पथराई हुई आँखों की ही ज़रूरत है। जब दुनिया को देखने वाली आँख फूट जाती है, तब कहीं इसके ऊपर का दृश्य सामने होता है। आँख फूटने से मेरा मतलब यह नहीं है कि सूरदास की तरह अपनी आँखें फोड़कर भक्ति में मसरुक हों। यह ज़रूर है कि उनके लिये उस वक्त सम्भव है कि यही मुनासिब हो। यों बात यह ज़रूर है कि अगर यह चीज़ कहीं और जगह मिले तो यह कहना ही पड़ेगा कि यह बड़ी कायरता है और पाप भी। तुम्हारे कुल खत में राम-कहानी लिखी है जो इस बात का सबूत है कि innocence की गति है। वह ज़्यादा प्रेम होने में हो जाती है। एक बात मैं और बताता हूँ कि अगर इस प्रेम में किसी के बावलापन पैदा हो जाये तो वह रूह (आत्मा) सम्बन्धी प्रेम नहीं। प्रेम तो वही है कि उसका पता न चले और अन्दर ही अन्दर सुलगता रहे। तुमने जो शून्य की अवस्था लिखी है, और यह भी लिखा है कि इस शून्यता का एहसास नहीं होता। इस हालत के लिये अगर खालीपन कहा जावे तो ज़्यादा स्पष्ट होगा। 

  तुम्हारा ख्याल यह ठीक था कि तुमने F1 पर कदम रख दिया और यह कदम तुमने अपने आप रखा। मगर हालत यह थी कि एक पैर तुम्हारा E1 और एक F1 पर। अब कल 10 जून की रात को 11 बजकर 53 मिनट पर मैंने तुम्हारा दूसरा कदम भी F1 पर रख दिया। अब तुम्हारा स्थान F1 है। केसर का भी पत्र मिला। उसकी हालत भी बहुत अच्छी होती जा रही है। तुमने अपने पत्र में राम कहानी लिखी है और उसने प्रेम-कहानी। आजकल मेरी तन्दुरुस्ती बहुत अच्छी है। कोई शिकायत ज़्यादा तकलीफ़देय नहीं है। रोटी दोनों वक्त खा रहा हूँ। Dr. Sen दवा के ज़ोर से खिला देते हैं। A. Ganeshan त्रिचनापल्ली चले गये। ख्याल ऐसा है कि वे सन्तुष्ट हो गये।

   अम्मा को प्रणाम, तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

   शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-493
शाहजहाँपुर
19/6/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे 12 व 15 जून के पत्र मिले। मैं दोनों खतों का एक साथ जवाब दे रहा हूँ। तुम्हारे खतों को देखकर एक टुकड़ा याद आया। यह याद नहीं कि किसका कहा हुआ है। मगर ख्याल यह है कि कबीर ने कहा है- “हाँ, नहीं के बीच जो है सो है”। दुनिया में दो ही सूरतें पाई जाती हैं, ठंडी और गर्म। जो चीज़ इसमें प्रधान है, समझ लो कि हम उसी शक्ल में हैं और जब इनकी प्रधानता जाती रहती है तो वही चीज़ रह जाती है, जो असलियत है। अब इसमें तो तुम्हारा पैराव शुरू है ही, मगर असल चीज़ से फिर भी भारी है। तुम्हारे खत में यह चीज़ मुझे बहुत पसन्द आई कि मेरे लिए रात कभी होती नहीं और दिन कभी आता नहीं, इसके मानी यह हैं कि एकसार हालत चल रही है। हालत तो एकसार ही कही जायेगी या समासम, मगर अपनी राख में गर्मी कुछ मौजूद है जिसका एहसास होना बहुत मुश्किल है। तुमने एक बात यह जो लिखी है कि हृदय पर किसी Vibration का shock सा लगा रहता है; हो सकता है कि मेरे दिल का Vibration तुम्हारे दिल में पहुंचता हो और मैं यह इसलिये कहता हूँ कि मुझे कुछ अच्छी उन्नति करने के बाद यह कम्पन इस शक्ल में बराबर महसूस होता रहा है जो हमारे गुरू महाराज की तरफ़ से आता था। तुमने यह जो लिखा है कि आत्मा भी गल कर समाप्त हो गई, ऐसा लगता है, सो आत्मा अभी गल कर समाप्त नहीं हुई। यह तो आखिरी मंजिल है, मगर उसके बहुत ख़फ़ीफ ज़रूर आगे होने की उम्मीद मालूम होती है, अभी वह भी पैदा नहीं हुआ। यह भी लिखा है कि Realization शब्द के कोई अर्थ ही नहीं रह गये, और न महत्व, यह ठीक है, इसलिये कि प्रेम में डूबे हुए को यह पता नहीं रहता कि हमारे प्रेम की गरज़ क्या थी।

   15 जून का जो खत है, उसका जवाब तो हो ही गया। तुम्हारी लय-अवस्था चल रही है, जो बहुत अच्छी है और बढ़ती चली जा रही है।

    अम्मा व चौबे जी की प्रणाम। सब भाई-बहनों को आशीर्वाद।

     शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-496
शाहजहाँपुर
3/7/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे 21 जून और 29 जून के पत्र प्राप्त हुए। मैं F1 की सैर अभी पूरी तौर से न करा सका। कुछ-कुछ ख्याल ज़रूर किया है, जिसका फल यह हुआ कि वहाँ पर शक्ति फैलने लगी है; अब सैर भी जल्दी शुरू हो जावेगी। तुम्हारे पत्रों का जवाब देना बड़ा मुश्किल हो गया है, इसलिये कि अब अच्छी लय-अवस्था और फिर उसकी तुरिया ही आती रहती है, और वह कुछ ऐसी चीज़ है कि जिसकी व्याख्या करना शब्दों में बड़ा मुश्किल है। सिर के अन्दर बहुत से स्थान हैं, और लपकन और सरसराहट यह बताती है कि वह जागृति हालत में आ रहे हैं। सिर के बाईं ओर जो पाँच उंगली मालूम होती है, अब समझ में आ गया कि वह क्या चीज़ है। यहाँ पर एक ताकत है, जिसमें क्रौंधे की सी लपक है। वह जब तक कि काबू में नहीं आ जाती, तब तक गुरू महाराज का हाथ उस पर रहता है। इसलिये कि उसमें काबू में आने से पहले ढील दे देना अपने आपको भी नुकसान कर जाती है। भनभनाहट का रहना यह बताता है कि वहाँ की सोई हुई चीज़ अब जग पड़ी। तुमने गड्ढे के बारे में जो लिखा है, उसका जवाब किसी खत में मैं दे चुका हूँ। सिर के पीछे जो कम्पन मालूम होता है, वह ही centre Region है। हमारे यहाँ कुछ Reflection करीब-करीब हर जगह पड़ जाता है। सबको एक हस्ती हो जाना, या Reality में ज़्यादा पैर जाना है। तुमने एक अजीब बात पूछी है कि जाने ‘मालिक’ की कभी याद आई है या नहीं। गुमे हुए की याद भी याद करने वाले को गुम कर देती है। लापता का पता चलाते-चलाते भी इन्सान खुद लापता हो जाता है और यह खुशखबरी इस बात की है कि Infinite के अंदाज़ की तैयारियाँ हो रही हैं और फिर यह सवाल तुमने मुझसे पूछा, यह तो ऐसी बात हुई कि जैसे कोई जन्म के अन्धे से रोशनी की व्याख्या पूछे। तुमने लिखा है कि “मैं हूँ” इसका न कोई cause है, न प्रमाण, यह ठीक है, मगर अभी तुम हो ज़रूर, cause और प्रमाण चाहे समझ में आवे या न आवे। यह और बात है कि होने का भाव बहुत कुछ मिट चुका है। यह मिटने की हालत है। दर्शन तो वही करेगा, जो जीवन-दशा में है और जो मिटी हुई दशा में है, यानी मुर्दा, ऐसी हालत में है, उसे तो रंग घुला ही मालूम पड़ेगा और फिर खुद मिट गये तो फिर सब कुछ मिटा ही हुआ मालूम होता है। “आप डूबें, तो जग डूबा”।

  श्री विश्वनाथन महायोग महर्षि रमण का कर रहे हैं, साथ-साथ अपने यहाँ का भी अभ्यास कर रहे हैं। उनके लिये भी कुछ न कुछ किये जाता हूँ, किन्तु उनमें co-operation की बहुत कमी है। बाकी सब तरक्की कर रहे हैं। 5 जुलाई को डा. वर्धाचारी का खत आ गया, जिसकी नकल उनकी हालत समझने के लिये तुम्हें भेजी जा रही है। खत में Commitment नहीं होता और बड़ा Guarded होता है। इति:-

    शुभचिन्तक
   रामचन्द्र  कस्तूरी का नोट : श्री बाबूजी ने बताया कि जिस समय F1 पर पैर रखा, उसी समय Fourth circle में पैर शुरू हुआ।
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-499
शाहजहाँपुर
14/7/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत 9.7.55 का मिल गया, जिसमें केसर ने भी अपना हाल लिखा है। Logic और Psychology की जो किताबें प्रह्लाद के पास हैं, उसमें से Psychology की किताब मैं पढूंगा। केसर का हाल बहुत अच्छा चल रहा है, मगर System में थोड़ी सी गड़बड़ी अभी ज़रूर है, वह रफ़्ता-रफ़्ता ठीक हो जायेगी। केसर के खत से मालूम हुआ कि तुम्हारी तबियत खराब है। तुमने क्या Energy ब्रह्माण्ड मण्डल से खींचना बन्द कर दी है। अगर बन्द कर दी हो तो यह दोनों तरीके फिर शुरू कर दो। एक हफ़्ते बाद अपनी तन्दुरुस्ती का हाल लिखना। ईश्वर ने चाहा तुम हफ़्ते भर में काफ़ी अच्छी हो जाओगी।

तुम्हें मेरे काम की इतनी फ़िक्र है कि दिल से दुआ निकलती है। तुम तनख्वाह के लिये रुपये की फ़िक्र मत करो। ईश्वर को देना होगा तो अपने आप देगा और मैं समझता हूँ कि इसके लिये किसी से कहने की ज़रूरत नहीं। इसलिये कि जब उसकी तरफ़ से प्रेरणा होगी तो लोगों के दिलों में खुद-ब-खुद ख्याल पैदा होगा।

“मंगबो भलो न बाप से, जो बिधना राखे लाज”।

मैं तो भाई तुम लोगों के लिए ईश्वर से अभी तक सिर्फ आध्यात्मिकता ही माँगता हूँ और उसकी कीमत सिर्फ यही हो सकती है कि वह असल मालिक को मालिक समझे और उसकी मौज में राज़ी रहे। तुमने अपने सत्संग में एक बात ग़ौर नहीं की होगी वह यह कि खुदगर्जों की तादाद ज़्यादा है यही वजह है कि वे कुछ sacrifice करना नहीं चाहते। यह भी ईश्वर ने चाहा दूर हो जायेगी।

तुमने यह जो लिखा है कि फैलाव कभी होता ही नहीं। इसकी वजह यह है कि फैलाव हो चुका है और वह इस कदर स्वाभाविक हो गया कि उसका पता नहीं चलता। ज़मीन और आसमान की तरह तुमने जो जड़वत् होना लिखा है, इसके अर्थ यह हैं कि कुल विचार और ख्याल उस तरफ खिंच चुके हैं, इसीलिये जिस्म का भान भी अब नहीं है। तुम्हें जब ख्याल आ जाया करे तो कुछ गहरी साँस ले लिया करो, ताकि जिस्म में ऑक्सीजन काफ़ी पहुंचता रहे। मेरा तो यहाँ तक हाल है कि जाने कितने अर्से तक मैं साँस लेता ही नहीं हूँ। जब महीने दो महीने में ख्याल आ जाता है तो कुछ गहरी साँस ले लिया करता हूँ। अब मैं भी इसका ख्याल रखूंगा।

तुमने जो Central Region के करीब नस का टूटना लिखा है, मुझे भी कहीं पर यह तड़खन अभ्यास के वक्त महसूस हुआ था। इसके मानी यह है कि वहाँ की शक्ति जाग गई। दाहिने पैर के अंगूठे की नोंक पर जो जलन लिखी है, वह जलन नहीं है, बल्कि उभार की गर्मी है। वहाँ का Foreign Matter साफ़ हो जाने से यह बात जाती रहेगी। इसका ताल्लुक Central Region से बहुत दूर से है। अंगूठे की जो बीचो-बीच की नस है, यह बिल्कुल central Region से ताल्लुक रखती है। मैंने Training की कुछ बातें जो कहीं पर लिखी हैं, उसमें यह भी लिखा है कि अंगूठे के बीचोबीच में ध्यान करने से Central Region खुलता है और इसके बारे में बहुत सी बातें लिखी हैं। बड़ी खुशी की बात है Third World Religion की conference जो जापान में हुई थी, उसमें तुम्हारे Mission का लेख निकल गया।

एक बात तुम्हारे समझने और सोचने के लिये और लिखता हूँ, जिससे यह भी तुम्हारे खत के साथ-साथ छापी जानी चाहिए और यह उन लोगों के लिये है, जो जाति का अभिमान (कि जिससे कोई फ़ायदा नहीं, हानि ही हानि है) लिये बैठे हैं। अगर ब्रह्म को अपने ब्रह्म होने का एहसास हो जाये तो वह अपनी हैसियत से गिर जावे और यहाँ तो लोग ब्रह्म-गति में भी नहीं होते और दूसरों को लट्ट के ज़ोर से अपने आपको ब्रह्म मनवाना चाहते हैं। ऐसे लोग ब्रह्म से दूर ही होते चले जाते हैं और यह चीज़ मनुष्य-सभ्यता के विरुद्ध भी है। मेरा कोई हर्ज नहीं, ब्रह्म कोई बना करें, मगर जब वह अपने गिराव की सूरत पैदा कर लेता है तो अफ़सोस ज़रूर होता है, मगर मजबूरी है। जिसकी किस्मत में ब्रह्म-विद्या न बदी हो और ईश्वर अपनी तरफ़ न खींचना चाहता हो, उसकी यही दशा होती है। जिसके Group में यह बात पैदा हो गई वह पत्थर बन गया, इन्सान नहीं रहा और उसने एक हवा फैला दी, जिससे दूसरों को भी नुकसान हुआ।

अम्मा को प्रणाम व सब भाई-बहिनों को आशीर्वाद। 

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-503
शाहजहाँपुर
3/8/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 30 जुलाई का लिखा हुआ मिल गया। अबकी तो इस पत्र में कुछ अजीब विचार और अजीब दशा और अजीब ढंग से लिखी पाई तो इससे यह मालूम होता है कि लिखने वाला भी अजीब और अद्भुत होगा। क्या तुमने तो नहीं लिखा है? तुम यह कहोगी कि लिख ही गई। कैसे? तो पता नहीं। पता यों नहीं होगा कि उसका पता नहीं रहा होगा। यानी पता, पता देकर न जाने कहाँ चला गया होगा। बस यही है Reality में अच्छी तौर पर प्रवेश हो जाना, होना इसको भी खत्म है, इसलिये कि पते का पता तो नहीं रहा मगर लापते का भी पता है। मैं इन दो चार Sentences जो तुमने लिखे हैं, पढ़कर गद्गद् हो गया और इन्होंने तुम्हारी कुल हालत का मुझे अन्दाज़ बता दिया। सच तो यही है कि अगर हममें आखिर पर भक्ति भी रह गई अर्थात् उसका अन्दाज़ रह गया, तो हमें पूरी तौर से छुटकारा नहीं मिला।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-505
शाहजहाँपुर
14/8/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 8 अगस्त का मिल गया। तुमने किसी पत्र में लिखा है कि पाइन्ट F1  की सैर पूरी हो चुकी है, ऐसा नहीं है। बल्कि उस स्थान पर जो शक्ति है, वह फैली हुई है, मगर ज्यों की त्यों है, अभी उसने सैर की शक्ल अख्तयार नहीं की है। कुछ थोड़ी सी जरूर हुई है, जिसकी वजह से तुम आजकल रुकी हुई हो, अर्थात् बढ़ नहीं रही हो। मगर इसकी परवाह मत करो, यह मेरा काम है और इसे मैं दुरूस्त कर लूंगा। बाकी हालत, जो तुमने लिखी है, वह Reality में सम्मिलित होना जाहिर कर रही है। दीवानगी के बारे में जो कुछ तुमने पूछा है, उसका उत्तर दीवाना ही दे सकता है, और जहाँ दीवानगी है वहाँ द्वैत मौजूद है। बातों के बारे में जो लिखा है, यही बात मालूम होती है कि सोते-सोते ‘विचार के बहाव’ का मुख मेरी तरफ हो जाता होगा। वैसे तो मुझे अभ्यास में इधर-उधर जो लोग बोला करते हैं, वह मेरे पास आवाज़ अक्सर आ जाती थी। कभी इत्तफाक़ से अब भी हो जाता है। मसलन काश्मीर में जिस वक्त गोली चली थी, उस गोली की आवाजें उसी वक्त कान में आने लगीं। मैंने जब नक्शे को देखकर निगाह जमाई तो मालूम हुआ कि उसी तरफ गोली चल रही है। कहीं रेल लड़ गई तो उसके लड़ने की आवाज़ और चोट खाने वालों की हाय-हाय भी आ गई है। मगर यह चीज़ हर वक्त नहीं होती, न मालूम कब और किस वजह से कभी ऐसा हो जाता है।

काशीरामजी Assam में काम अच्छा कर रहें हैं और Mission की आवाज़ उस हिस्से में खूब पहुँच चुकी है और 6-7 सत्संगी बन भी चुके हैं, जो स्थाई रुप में हैं।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-508
शाहजहाँपुर
17/8/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

मैंने एक चिट्ठी मास्टर साहब के पते से 4 अगस्त को डाली थी, उसमें तुम्हारी चिट्टी का जवाब भी था, जो मिल गया होगा। इस साल जन्माष्टमी का व्रत 10 अगस्त दिन बुधवार को रहेगा। मैं यह चाहता हूँ कि तुम व्रत अगर रखना ही चाहो तो दोपहर को दूध या फल या कोई और हल्की चीज़ ख़ाओ और सूरज अस्त होने के बाद पेट भरकर कोई हल्की चीज़ ख़ा लो। चूँकि तुम आजकल कुछ कमजोर हो, इसलिये ज्यादा सख्त कायदे की पाबन्दी करने की ज़रूरत नहीं। केसर से कह देना कि ईश्वर की कृपा से हालत उसकी भी अच्छी है और वह तुम्हारे क़दम -ब-क़दम चलने की कोशिश कर रही है मगर कुछ Limitations ऐसा पड़ा हुआ है कि जिसकी वजह से पूरी तौर पर अपनी लालसा के मुताबिक चल नहीं पाती और यह सबमें होता है। इसमें कोई हर्ज नहीं। धीरे-धीरे अभ्यास और सत्संग से दूर हो जाता है मैंने उसकी हालत जो कुछ भी है, एक खत में उसे लिख दी थी। लय-अवस्था अगर किसी में है तो तुम्हारी लय- अवस्था के बाद उसी का नम्बर आता है और लोगों में से कुछ अच्छे भी हैं और कुछ रश्मी तौर पर लगे हुए हैं।

चौबेजी को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को आशीर्वाद।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-509
शाहजहाँपुर
23/8/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र मिल गये। चाहा था कि उत्तर दें, इतने में एक खत इलाहाबाद से आ गया। उससे पता चला कि तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक नहीं है। इसलिए मैंने इरादा कर लिया कि शनिवार की शाम को Bus से गोला होकर लखीमपुर आऊँगा। बसन्त पंचमी 16.2.56 को पड़ रही है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-512
शाहजहाँपुर
25/8/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे 16 अगस्त और 18 अगस्त के खत मिल गये। डा. वरदाचारी का ख़त जो आया, उसकी नकल तुम्हें भी देखने को मिल गई होगी। तुमने उनके बारे में जो लिखा वह ठीक ही निकला और मुझे तो अब तुम्हारी मदद की पग-पग पर ज़रूरत पड़ती है। इसलिये कि तुम्हारी हर बात अनुभव ही होती है और मैं यह चाहता हूँ कि कोई ऐसा मेरे करीब ही रहे कि इन चीज़ों की मदद मिलती रहे। मेरा अनुभव मुझे बता तो ठीक-ठीक देता है, मगर जब उसे कोई दूसरा ठीक-ठीक बताता है, तो मैं समझ लेता हूँ कि अब मेरा ख्याल ठीक है। मेरा अनुभव तेज़ ज़रूर था किसी वक्त और सम्भव है अब भी हो, मगर कुछ पता नहीं चलता।

मैं समझता हूँ कि तुम चाहती हो कि मैं वहाँ आ जाऊँ, तो देखो तो सही कि मैं आ तो नहीं गया। अच्छा मैं आ गया, तो यह बताओ, मैं गया कब था? तुमने अपने खत में जो लिखा था, यह प्रेम की बड़ी ऊँची अवस्था है और अपने आपको भूल जाने की एक उम्दा दलील। न होश का पता लगना और न बेहोशी का, यह बात बता रही है कि तुम्हारा रिश्ता गहरा उससे जुड़ गया है, जो इन तमाम बातों से अलहदा है। मगर कहीं जिससे कि रिश्ता जुड़ चुका है, वह भी भूल जाओ, तो फिर असलियत ही असलियत है। मगर फिर भी छोर नहीं। F1 के बारे में जो लिखा है, वह ठीक है कि रुक जाने पर चिड़चिड़ापन पैदा होने लगता हैं। मैं Training ( सिखलाने) में गलती भी कर जाता हूँ। वह यह कि ताकत बाज़दफे जरूरत से ज़्यादा पहुँचा देता हूँ, जो हज़्म नहीं हो पाती। मैं अब इसका ख्याल रखूँगा। अब मैंने उस स्थान को ज़रा मुलायम किया है जिसका नतीजा यह हुआ होगा कि तुममें लोच और नर्मी की अनुभूति हुई होगी। अब मैं, ईश्वर ने चाहा, इसी गति में सैर की हालत ले आऊँगा और इस वक्त तो तुम्हारी हालत इतनी मुलायम और सूक्ष्म होगी कि तुम अपने आपको बहुत हल्का-फुल्का महसूस करती होगी न मालूम क्या बात है कि मैं गलती कर ही जाता हूँ। इच्छा-शक्ति का Moulding बाज दफ़े अभ्यासी को तौल कर नहीं करता। न उस स्थान को तौलकर कि वहाँ पर कितनी ज़रूरत है, यही वज़ह ग़लती को मालूम होती है और मुझे इसका अफ़सोस भी है। ईश्वर और बन्दे की पहचान भी यही है, कि ईश्वर से कभी गलती नहीं होती और बन्दे से हर वक्त हर समय सम्भव है।

आदमी अगर एक भी अच्छा मिल जावे, तो वह Mission को ज्यादा बढ़ा सकता है, वनिस्बत पचास आदमियों के जो नाकारा हों। अब काशीराम की आवाज़ आसाम भर में गूँज पैदा कर देगी इसलिये कि उनमें प्रेम बहुत है। इसीलिये मैंने उनको सिखाने के लिये एक दम से तैयार कर दिया है। हालांकि मैं यह डरता जाता था दिल में कि कहीं मास्टर साहब यह न कह बैठें कि आपने जल्दी की।

चौबेजी को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-516
शाहजहाँपुर
29/8/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे तीन पत्र 23.8.55, 26.8.55 व 27.8.55 के मिल गये। 23 अगस्त के पत्र में जो तुमने लिखा है कि समुद्र में जाना और फिर मेरे हाथों में समा जाना बड़ा अच्छा मतलब रखता है। इसके बारे में मैंने मास्टर साहब के खत में बहुत पहले लिखा था, वह चीज अब Vision या वारदात या घटना की शक्ल में उतरी है। अर्थात् तुम मुझमें लय हो चुकी हो। अब तुम कस्तूरी, जैसा तुम्हारे माता-पिता ने पैदा किया, वह नहीं रही। जब यह बात है तो मैं यह समझता हूँ कि मेरी हालत और तुम्हारी हालत में बस इतना फर्क मालूम होता है कि जो Stages मेरे गुरू महाराज ने अपनी महासमाधि के बाद दिये थे; अब वह जो कुछ भी हो, बस इतना ही फर्क है। वह सब जो कुछ महा-समाधि के बाद मुझे दिया है, वह कुछ Speciality रखता है। मैंने किसी खत में लिखा था कि सिखाने वाले के महासमाधि लेने के बाद सीखने वाले को क्या फायदा पहुँचता है वह ख़त, जो बात मैं कहना चाहता हूँ बता देगा। Simplicity और सादगी का एहसास या अनुभूति न होना, कब? उसमें रंगने के बाद, यह बात बता रही है कि तुम्हारी Ignorance की हालत शुरू हो गई है। नहीं, नहीं, बल्कि उसमें और उन्नति कर चुकी हो। अब Ignorance के खात्मे के बाद आध्यात्मिक तालीम खत्म हो जाती है मगर मेरी निगाह कहीं पर ठहरती ही नहीं है। इसके आगे कुछ और भी है, परन्तु अब लिखकर मैं क्या करूँ? इसलिये कि Ignorance के बाद की दशा पर जो मैं जुबान खोलता हूँ तो मुमकिन है आजकल के वेदान्ती मेरी आलोचना करेंगे, हालांकि कर वे नहीं पायेंगे। फिर क्या है? बेवकूफी का खिताब जरूर दे सकेंगे, क्योंकि यह चीज उनके हाथ में है। इसलिये मैं यह चाहता हूँ कि वहाँ पर पहुँचने पर तुम खुद Ignorance के आगे का हाल दो ताकि मैं खुद इस खिताब से बच जाऊँ। वेदान्ती की कदर हमारे चौबेजी ने खूब की है। उन्होंने जिसके दाँत न हो, उसको हँसी में वेदान्ती कहा है और ठीक भी है, जिसके दाँत नहीं रहते, वह गिजा चबा नहीं सकता और जब चबा नहीं सकता तो उसको मैंदा भी हजम नहीं कर सकता, और जब बिना चवाई हुई गिजा मैंदे में जाती है तो मैंदे का Function बिगड़ जाता है। बस वेदान्तियों का यही हाल है कि रूहानी गिजा और शक्ति को ग्रहण करने की शक्ति नहीं रहती। कथनी से कोई फायदा नहीं, रहनी होनी चाहिए।

Swami Viveka Nand- “This is an Excellent Thought of expression, To abide by the Real State is really a spiritualism”

23 अगस्त के पत्र में सिर्फ एक बात का जबाब देना है। वह इस चीज का कि तुमने लिखा है कि विचार बहुत आ रहे हैं। इस पर तुम कभी गौर करना, तो पता चलेगा कि तुम विचारों से अपने आप को अलग पाती होगी। ईश्वर की कितनी अपार दया है कि इस दशा में विचारों का ताँता लगाये रखता है। वजह यह है कि इस हालत Ignorance में अगर विचार न उठें तो जिस्म छिन्न भिन्न हो जावे, इसलिये कि फिर Perfect Balance State हो जावेगा, जो संसार के उत्पन्न होने के पहले थी।

26 अगस्त का जो खत है, कुछ उत्तर उसका दिये देता हूँ। लिखा है कि कण-कण चिर-समाधि ले चुका है और महा-शान्ति को प्राप्त हो चुका है। बस इतनी ही कमी है कि तुम्हें किसी न किसी तरह पर महा-शान्ति होने का एहसास अगर लिखा नहीं, तो क्या तबियत में है? जब इसकी अनुभूति ऐसी चली जावे कि शान्ति को विचार भी न पकड़ सके, तब हालत असली है। और तब ही Ignorance की पूर्णता है। मैं तो भाई शान्ति से बहुत घबराता हूँ। यह चीज स्वामी लोगों को ही मुबारक हो जो शान्ति आने से पहले अपने आप को शान्त समझ लेते हैं। तुमने लिखा है कि होश में अपना हाथ पकड़ने से हाथ का एहसास नहीं होता, यह लय-अवस्था है, अव्वल दर्जे की। लिखा है कि दशा को न नशा छिपाता है, न खुमारी, तो नशा तो जिस्म से ताल्लुक रखता है। और खुमार सूक्ष्म शरीर से तुम इससे ऊँची उठ चुकी हो तो अब नशा व खुमार कैसा? नशे का मजा तो तब आता और रहता भी कि जब कहीं तुम कायस्थ होती और जो कुछ नशा पैदा भी हुआ, यह कायस्थों की मुँह की क्या, दिल की भभक थी और भाई मुसलमान सूफियों ने तो नशे-मारफत लिखा है जो ठीक नहीं होता। अब तुम खुद समझ लो कि तुम किस हालत में हो।

27 अगस्त का खत जो तुमने लिखा है, उसमें यह लिखा है कि मेरा अपना स्वयं का प्रतिबिम्ब ही मानों Reality है किन्तु न जाने क्यों मैं स्वयं प्रतिबिम्ब नहीं हो सकती इसलिये मुझमें से तो मानो Reality भी निचोड़ ली गई हो। इस इबारत का मतलब मेरी समझ में नहीं आया। तुमने यह लिखा है कि आर जाना है, न पार जाना है, न समुद्र है, न किश्ती, इत्यादि-इत्यादि। जब असल में अभ्यासी लय होने लगता है, तब ऐसी अनुभूति शुरू हो जाती है और ठीक भी यही है कि न कोई चीज़ आती है, न जाती है। हम जहाँ के तहाँ ही रहते हैं, जहाँ कि हम हमेंशा से थे और हमेंशा रहेंगे और यह बात भी सही है कि आत्मा इतनी निर्मल और शुद्ध है कि उस पर किसी का रंग नहीं चढ़ता, मगर उसका होना ही, अर्थात् उसके होने का भाव अक्ल समझ लेती है तो यही सबसे बड़ा पर्दा बन जाती है और चूंकि वह आत्मा से बहुत नजदीक है, इसलिए वह जो आत्मा की वज़ह से है, अपने को सब कुछ समझ कर अहम् के चक्कर में पड़ जाती है। इसको चाहे Intelligence कह लीजिए ख्वाह समझने के लिए कोई और चीज़। चाहे इसको मन कह लीजिए / गरज़ कि आत्मा की पहिचान भी यही कराती है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-520
शाहजहाँपुर
19/9/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र सब के सब मिल गये। हालत तो तुम्हारी अच्छी है ही। ईश्वर का धन्यवाद आज 7.30 बजे शाम को मैंने तुमको G1 पर डाल दिया। ईश्वर ने चाहा तुम Central Region की सैर ज़रूर करोगी। तन्दुरूस्ती, कहीं ईश्वर ऐसा करता कि ठीक हो जाती, ताकि Misson का काम बिना थके हुए कर सकती।

केसर हमारे यहाँ आई थी। हमने उनकी Pind Desh की सैर खत्म करा दी। वैसे ब्रह्माण्ड- मण्डल में उसकी सुरत अक्सी प्रतिबिम्ब तौर पर पहुँच चुकी थी। एक दिन तो मैंने उसे थोड़ा सा सत्संग दिया, जिसमें वह यह न कहे कि हमारा आना निरर्थक हुआ। दूसरे दिन बहुत मरी हुई हालत से उसे सत्संग दिया अर्थात् कुछ तबियत नहीं चाही, मगर कुछ बिना इच्छा के सत्संग कराया। मेरा इरादा पिण्ड- देश की Mastery देने का था और उसी की मैं तैयारी कर रहा था, मगर एक दम से देने की उसमें Capacity नहीं पाई इसलिए मजबूरी रही। काम तो मैंने उसके सुपुर्द कर दिया है और वह ठीक कर रही होगी।

तुमने जो “सहज-समाधि” बढ़ा दी है, मैं जब आऊंगा, तो उसको सुनूँगा फिर छपने का इन्तज़ाम हो ही जावेगा।

चौबेजी को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-522
शाहजहाँपुर
29/9/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 23 सितम्बर को मिला। तुमने श्री वी. विश्वनाथन के बारे में जो कुछ लिखा ठीक है। वह महायोग में मस्त हैं, जो अहंकार ख़त्म करने का तरीका है, मगर अचम्भा यह है कि अहंकार उनमें बढ़ रहा है। डा. वर्धाचारी का पत्र फिर आया है, जिसकी नकल मैं भेज रहा हूँ। आदमी बहुत अच्छा है, मगर नहीं मालूम, कभी कुछ लिख देते हैं, कभी कुछ लिख देते हैं। उनके हृदय में कालिमा ठोस हालत में तो नहीं है, मगर अभी है और यह चीज़ कुल System में तुम उनके पाओगी।

अब अगर तुम्हें अपनी हालत को लिखने के लिए शब्द नहीं मिलते, तो मुझे भी तुम्हारी हालत समझने के लिए शब्द नहीं मिलते हैं। जो चीज़ कि तुम्हें अपनी हालत का पता देती थी, वह द्वैत थी, जो अब अपना आपा छोड़ता जाता है, या मुरझाता चला जाता है, इसलिये पता नहीं चलता। मगर फिर भी कोई चीज़ होती ही है, जो कुछ न कुछ अपनी हालत का पता दे रही हो, तो फिर भला वह पता क्या दे। कबीर ने कहीं पर लिखा है:-

“जहाँ मिलौनी, तहाँ विचार, एक एक में कहाँ विचार॥”

  ‘मालिक’ अगर विचार में नहीं आता तो यह तो बड़ी अच्छी चीज़ है। इसलिए कि जिसकी तलाश थी, वह स्वयं मौजूद है। मगर अभी यह हालत पूरे तौर से पैदा नहीं हुई है। तुमने लिखा है, कि अपनी दशा में कोई विशेषता नहीं लगती, बल्कि और सब मनुष्यों के समान मालूम होती है, यह खुद बड़ी अच्छी हालत है। मगर पूरे तौर से यह हालत भी अभी नहीं आई है, आरम्भ जरूर है। असली हालत, जो इन्तहाई पहुँच के बाद पैदा होती है, वह इतना बड़ा भेद है कि उसको मैंने अभी तक जुबान से भी नहीं कहा है। इसलिए कि नहीं मालूम कि लोग मेरे बारे में क्या ख़्याल करें। कम से कम यह तो फ़तवा दे ही देंगे कि इसने आध्यात्मिकता में अभी क़दम भी नहीं रखा और लोगों को बहका रहा है। दूसरे यह बात भी है कि इस आखिरी हद के पहुँचने का नतीजा अगर किसी को बता भी दिया जाये तो फिर कोई ऐसी बात नहीं रह जाती कि जो मनुष्य के लिए ऐसी हो कि ब्रह्म-विद्या की ओर उसको ले जाते। तबियत बहुत चाहती है कि उसे कहीं पर कह ही डालूँ। मगर इसका न बताना ही अच्छा है जो पहुँचेगा, खुद जान लेगा। सम्भव है कि वेदों और ऋषियों की किताबों में इसीलिये इसका छींटा भी न दिया गया हो या यह भी हो सकता है कि यह बात मुझ ऐसे अकिंचन के लिये ईश्वर ने Reserve रखी हो क्योंकि बड़ी बातें तो बड़े लोगों के लिये रखी गई हैं और छोटी बातें मुझ जैसे मामूली आदमी के लिये ही हों। ठीक है कि एक भिखारी जब माँगता है तो उसको पैसा या रोटी का टुकड़ा दे दिया जाता है और जब कोई बड़ा आदमी माँगता है तो हज़ारों का चैक उसे लोग देते हैं। तुमने लिखा है कि ऐसा लगता है कि हाथ से मानों सब कुछ निकल गया। इसके माने या तो यह समझ लो कि हाथ में सब कुछ आ गया या यह समझ लो कि जिस चीज़ को तुम पकड़े बैठी थी, उस बोझ से हाथ खाली हो गया। तुमने यह लिखा है कि एक ऐसी कसक मौजूद है, जिसको न तो कह सकती हूँ या नहीं ही कह सकती हूँ। यही चीज़ बस आगे बढ़ा रही है, और यह उस वक्त विदा होगी जबकि अपना काम पूरा कर लेगी। आखिर पर रहना इसको भी नहीं है।

केसर का भी ख़त आया। उसे तबियत में इस बात की ग्लानि नहीं होनी चाहिये कि जिस हद तक मैं उसे देना चाहता था, उस हद तक उसमें Capacity न थी। रफ्ता रफ्ता पैदा हो जायेगी, ईश्वर ने चाहा। जापान भेजने के लिए मैंने फोटो खिंचवा लिये हैं। मैं सब के सब भेज रहा हूँ मास्टर साहब ने तो वाकई दुनिया के हर हिस्से में ज़्यादा न सही तो दो-दो, एक- एक आदमी में ही सही, Mission का नाम तो पहुँचा ही दिया। बस इतना अपने हाथ में था, आगे अब ईश्वर के हाथ में है।

चौबेजी को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-525
शाहजहाँपुर
2/11/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र 22 अक्टूबर और 29 अक्टूबर के लिखे हुए मिल गये। डा. के. सी. वर्धाचारी में अब अंधकार और कालिमा बहुत ही कम है। तुमने उन पर मेंहनत बहुत अच्छी की और मैं भी सोचता रहा कि कौन सी तरकीब की जावे कि जिससे वे साफ हो जावें। मेंहनत मैं भी उनके साथ कई महीने से इसको दूर करने की कर रहा था। उनके दिल की हालत ऐसी थी कि जैसा अंधा कुँआँ। अब ‘मालिक’ की कृपा से यह बातें बहुत ही कम हैं। मेरे बहुत हाल ही में तरकीब समझ में आई कि जो अंधकार का कारण है उस पर Concentrate करके दूर किया जावे। चुनांचे ऐसा ही किया और उन्हें फ़ायदा भी हुआ, मगर मुझे बड़ा ताज्जुब है कि मेरे किसी वक्त में ऐसी चीजें फौरन समझ में आती थी और अब महीनों बाद यह चीज़ समझ में आई। कमजोरी की वज़ह से दिमाग उतना अच्छा काम नहीं करता।

तुम्हारे ख़तों का जबाब देना बड़ा मुश्किल पड़ रहा है, इसलिये कि आगे लय-अवस्था और उसकी तुरिया, जिसको फ़ारसी में बका कहते हैं, शुद्ध रूप में घूम फिर कर आती रहती है और इनका छोर नहीं, कब तक आवे। आखिरी बका बस यही होती है कि Changeless (अपरिवर्तन) दशा पैदा हो जावे। फिर न तड़प रहती है न कोई दशा और यह इतनी ऊँची हालत है कि इसके बाद फिर और कुछ नहीं है। ईश्वर करे यह हालत सबको नसीब हो। मगर कठिनाई यह है कि मैं अपने साथियों से इसके लिये बकता ही रहता हूँ मगर कोई तवज्जोह नहीं करता। मैं इस पर भी तैयार हूँ कि क्षण मात्र के लिये उनको यह दशा दिखला भी दूँ। जो यह निहायत मुश्किल काम है, इसलिये कि जो बंधन है, उसको पकड़े रहना पड़ेगा, ताकि रूह (आत्मा) कहीं अपनी असल में न मिल जावे। क्योंकि एक मुसाफिर कितना ही दूर क्यों न हो मगर जब घर सामने पड़ जावे तो फिर अन्दर जाने की तबियत ही चाहेगी। फिर यह सब कुछ किया भी जावे तो भी कोई इसके लिये तैयार नहीं मालूम होता। मैंने अक्सर छोटी-छोटी हालतें लोगों को दिखलाई है, ताकि उनको ब्रह्म विद्या से शौक बढ़े; मगर उससे कोई लाभ न हुआ। तुमने अपने खत में लिखा है कि “मैं हालत से चिमट नहीं पाती” यह एक मरतबे पहले भी हो चुका है। मगर इस मरतबे तुम्हारी ख़ता नहीं है। मैं अब तक यह तय नहीं कर पाया कि किस तरह से तुम्हें चलाया जावे। जिस तरह से अब तक तुम्हें चलाता रहा उस तरह से चलाने में सब बातें वहीं पैदा होगी जो मुझे मिली हैं। खैर उसमें भी मैं हर्ज नहीं समझता। मगर फिर यह सवाल उठ सकता है कि दो एक सी Personality एक वक्त में नहीं रह सकती। अगर दूसरी Personality ऐसी तैयार हो जावे इत्तफ़ाक से तो पहली की ज़रूरत नहीं रहती और उसको फिर दुनिया छोड़ना ही पड़ती है। गुरू महाराज ने यह भी कहा है कि जो Personality इस वक्त काम कर रही है, हजारों वर्ष तक आगे नहीं आवेगी। खैर, यह भी कोई बात नहीं। खास तौर पर प्रार्थना करने पर यह हो सकता है कि एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, कुछ समय तक आती रहे अगर तबियत मेरी यही मजबूर करती है कि जैसा अब तक तुम्हें चलाता रहा हूँ, वैसा ही चलाऊँ, जितना मैं तुम्हें अभी तक ले आया हूँ, उसका परिणाम यह है कि तुम्हारी अवतारी हालत (Prophetic Condition) शुरू है और तुम अगर गौर करके देखो तो तुम्हें यह पता सम्भव ही चल सके कि ईश्वरीय शक्ति तुमसे आदेश लेने के लिये और काम करने के लिये इन्तज़ार में रहती है। अभी तक मैंने यह चीज़ नहीं लिखी, अब लिखता हूँ। यह ज़रूर है कि मैंने वह Instinct अभी तुममें Develop नहीं की, कि जिससे ईश्वरीय शक्तियों से काम ले सको और न मैंने अभी तुम्हारा रूख उस तरफ़ घुमाया है।

तुमने लिखा है कि कम्पन होता है तो ऐसा लगता है मानों मैं मालिक के Sub-Conscious Mind में समा चुकी हूँ। यह ख्याल ठीक मालूम होता है और जो तुमने जो लिखा है कि अपनी शक्ति ही याद नहीं आती और Photo को देखकर अपने आपको न पहिचानना, यह सब इस बात को ज़ाहिर करती है कि कस्तूरी जैसी इस दुनिया में बनकर आई थी, अब बिगड़कर वैसी ही रह गई, अर्थात् जो आने से पहले थी और इसी को अपने आपको पहिचानना कहते हैं। विचारों का तांता आना जो लिखा है, यह विचार तुम्हारे नहीं है, बल्कि उस सूक्ष्म रूप के विचार हैं, जो मनुष्यों ने बनाये हैं और वह टकराते रहते हैं। मेरी भी यह हालत बहुत दिनों रही है।

ज्यादा ऊँचा चढ़ जाने पर फिर इनका टकराना बन्द हो जाता है। मगर फिर भी जैसे Environment सामने आ जाते हैं, उसी के मुताबिक ख्याल पैदा हो जाते हैं, मगर वह विचार ज़्यादातर उसके नहीं होते।   अम्मा को प्रणाम और भाई बहिनों को आशीर्वाद। असम संदेश तुम्हारे पास भी श्री काशीराम ने भेजा होगा। उसमें तुम्हारा भजन छप चुका है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-530
शाहजहाँपुर
4/12/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभ-आशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र 26 नवम्बर और 29 नवम्बर के लिखे हुए पहुँचे। मैं मथुरा से 30 नवम्बर की शाम को आ गया था। नारायण के यहाँ उनके कहने पर छः घंटे ठहरे। एक मुख्तार साहब, जिन्होंने नारायन से शुरु किया था, भी मेरे पास बैठे थे और बहुत खुश हुए। इससे जाहिर होता है कि वह स्थाई रूप से करते रहेंगे। वह डा. चतुर्भुज साहब के पास भी बैठ चुके हैं और उनको यह यक़ीन हो गया है कि वहां पर आडम्बर ही आडम्बर है। डा.चतुर्भुज साहब की किताबें उन्होंने सब पढ़ी हैं और वह कहते थे कि जो किताबें इस Mission की निकल रही हैं, और जो उनमें बात है, उसकी पासंग भी वह नहीं है और उसमें विचार भी पूर्ण रूप से दर्शाये नहीं गये हैं। मेरा विचार तो यह है कि सम्भव है कि किसी समय में लोगों के समझ में यह आ जावे कि इतना अच्छा विषय और Original कहीं और नहीं है यह सब हमारे गुरू महाराज की आशीष और बरकत है और मुझे पूरा यकीन है कि उनका Mission उन्नति करके ही रहेगा। यह जरूर है कि अभी तक लोग मुझे सेवा का मौक़ा नहीं दे रहे हैं और न ज्यादातर ऐसे लोग मिल रहे हैं, जिनमें Burning Desire (उत्कंठा) असलियत हासिल करने के लिये मौजूद हो, या तो यह मेरी तकदीर का करिश्मा है या अभी समय पूर्ण रूप से ऐसा नहीं आया।  अब मैं कुछ गोद- गाद तुम्हारी हालतों के विषय में कर रहा हूँ। ऐसी सूक्ष्म गति का जवाब देना बड़ा कठिन है। इसलिये कि लय अवस्था की ही गति जो तुम्हारे पत्र में मौजूद है वही बढ़ती चली जा रही है और वही हालतें भाँति भाँति से तुमने दर्शायी है। तुमने लिखा है कि ऐसी सुस्त हालत रहती है कि पत्र लिखने को भी तबियत नहीं चाहती है। यह शुक्लाजी वाली हालत नहीं है, बल्कि Soul का यह Characteristic है कि हम Inactivity की तरफ रहने लगे हैं, और जिस्म से सम्बन्ध बहुत कम हो गया है। इसमें दो बातें होती हैं, जब हम ज़िस्म से काम लेना चाहते हमारी गति ऐसी हो जाती है, जैसे जब ईश्वर ने दुनिया पैदा की तो Soul हमारे पैदाइश का कारण बन गई और वह ऐसा Base बन गई कि विचार आते ही उसमें हरकत काम करने के लिये शुरू हो जाती है। विचार आत्मा से बहुत निकट है, इसलिये हम कहेंगे तो यही कि वह खुद आत्मा से ताकत घसीट कर जिस्म से काम लेना शुरू कर देता है और आत्मा में कुछ ऐसी गति है कि उसकी ताकत से विचार जो चाहे सो काम ले ले। जैसे बिजली की ताकत कि उससे चाहे रोशनी का काम ले लो, चाहे पंखे का और चाहे अंगीठी का। इसलिये हम कोशिश यह करते हैं कि विचार भी आत्मा का रंग ले ले और इसी के लिये अभ्यास है। जब हमारा विचार इतना शुद्ध हो जाता है और उसमें सब रंग उतर जाते हैं तो मनुष्य से वही काम होते हैं, जो धर्म-शास्त्र के अन्दर हैं और वह जो कुछ करता है, उसमें शास्त्र का विरोध नहीं होता। शास्त्र में बहुत सी पाबन्दियाँ ज़ाहिरी भी रख दी है ताकि विचार शुद्ध और पवित्र बनते रहें। कुछ कवियों ने अपनी तबियत इन विषयों पर ज्यादा आजमायी है और ठोसता से भी काम लिया है, जिसका नतीजा यह हुआ कि हमारा आधार ठोसता ही रह गया और इसी को लेकर, चूँकि यह चीज़ आसान थी, हमारे यहाँ के रंगे हुए महात्मा लेकर चल दिये। विवेक-शक्ति तो तीव्र हो नहीं पाई थी कि Right और Wrong में फ़र्क समझ में आता और काम करना शुरु कर दिया और प्रमाण के लिये उन्हीं कवियों को पेश कर दिया, जिनके बारे में ऐसे विचार लिखने पर लोगों की राय यह हो गई कि आध्यात्मिकता में भी यह पूर्ण थे। इतनी हालत तो महात्माओं में पैदा हुई नहीं कि उनकी शक्ति का अन्दाज़ा लगा सकते। मैंने उर्दू, फ़ारसी Literature देखा है, उसमें भी बड़े अच्छे-अच्छे विचार मिलते हैं, मगर उनको आध्यात्मिकता में निपुण बनाकर कोई सामने नहीं रखता। विचार की तारीफ़ जरूर है, और उसके Quotations भी दिये जाते हैं। यह सिर्फ हिन्दी कवियों की ही किताबें महात्मा लोग प्रमाण समझते हैं और मैं तो यही नतीजा निकालता हूँ कि सिर्फ संस्कृत पढ़े हुए लोग जो हैं, उनका Vision बहुत Broad नहीं रहता। उसकी वजह यह मालूम होती है कि संस्कृत में अभी तक सिर्फ Set Literature ही रहा है उससे आगे Nature को देखते हुए और मुख्तलिफ़ विचारों को तौलते हुए अभी तक लिखा नहीं गया है। मनुजी ने लिखा है कि अगर वेद की बातें अक्ल और Reasoning के खिलाफ़ हों तो उनको भी नहीं मानना चाहिए। तुम बिटिया, चूँकि ब्राम्हण हो जाति से भी, हालांकि लखनौर वालों के तरीके की नहीं, इसलिये मुझे क्षमा करना। मैं तुलसी दास की एक चौपाई लिखता हूँ :-

“पूजिये विप्र सकल गुन हीना, शूद्र न गुनगन ज्ञान प्रवीना”

इस चौपाई को मैंने ब्राह्मणों को प्रमाण देते हुए सुना है कि वह यह चौपाई इस लिये पेश करते हैं कि लोग उनकी कद्र करें। इससे मतलब यह है कि वह समझते हैं कि हम इस कदर गिर चुके हैं कि लोग हमारी कद्र नहीं कर रहे हैं। इसलिये तुलसीदास का Injunction पेश कर देते हैं। ऐसी बहुत सी बातें और जगह भी मिलेंगी। इन बातों को मनुजी का वाक्य जो ऊपर लिखा हुआ है उससे तौलना चाहिये। जाति का अभिमान वहाँ पर टूटा समझना चाहिये। जहाँ पर कि अन्दर से सोचने से भी यह आवाज़ न आवे कि मैं ब्राह्मण हूँ या वैश्य या शूद्र या कोई और जाति।

तुमने लिखा है कि तुम मुझको हर कण कण में देखती थीं, मगर अब यह हो गया है कि ‘आप’ मुझे कहीं नहीं दीखते। यह तो खुली हुई चीज़ है कि आँख-आँख को नहीं देख सकती। जिसको तुम देखती थी, अब बहुत कुछ जब तुम वही हो गई तो फिर देखोगी किसको? तुमने यह भी लिखा है कि फैज़ तो मानो मुझमें पहुँचता ही नहीं। इसका मतलब यह है कि जो चीज़ कि तुम तक पहुँचती थी, अब तुम उसी में डूब चुकी हो। दरिया में घड़े दो घड़े पानी के पड़ जाने से उसके Volume में क्या वेशी महसूस हो सकती है। तुमने लिखा है कि ऐसा मालूम होता है कि आजीवन कभी ‘आपकी’ याद ही नहीं आई। एक मिसाल मैं लिखता हूँ कि जब लड़कियाँ अपनी ससुराल में पहली, दूसरी बार जाती हैं तो उन्हें अपने घर की याद बहुत आती है। रहते-रहते उनकी ससुराल ही मैंका बन जाती है। फिर उन्हें मैंके की याद ऐसी नहीं आती है और ससुराल ही को मैंका समझ में आने लगता है और वही घर बन जाता है। बस यही हालत तुम अपनी समझो कि याद करते-करते तुम याद ही बन गई। बाकी हाल जो 26 नवम्बर के खत में लिखे हैं, मसलन मेरे ज़िस्म का एक छाया-मात्र मालूम होना, यह सब बातें यही बताती हैं कि जो चीज़ मुझमें है, उसमें तुम अच्छी लय हो चुकी हो। मगर इतनी कमी अभी है कि मैं तुम्हें छाया मात्र नज़र आ जाता हूँ। मैंने जो अक्सर कहा है कि अभ्यासियों को सिखाने वाले की रूचि का अन्दाज़ होना चाहिए; इसका मतलब यह है कि उनको इस मामले में अपने आप को हर वक्त होशियार और Alert रखना चाहिये और यह तभी हो सकता है जब कि अपने विचार का रिश्ता सिखाने वाले से जुड़ा रहे। इसकी बहुत सी तरकीबें भी हैं। मसलन एक बफादार नौकर जो यह चाहता है कि मालिक को मुझसे आराम ही मिले। वह कहीं भी बैठा हो, उसकी तबियत मालिक की तरफ इस टटोल में रहती है कि उसको इस वक्त क्या जरूरत होगी। यह तो मिसाल है जो मिसाल ही तक है। अब आध्यात्मिक सम्बन्ध में अगर सिखाने वाले से कोई रिश्ता सच्चे रूप में पैदा कर लिया जाता है तो यह चीज़ पैदा हो जाती है कि किस वक्त हमें सिखाने वाले से मुखातिब होना चाहिए और किस वक्त हमें क्या बात करनी चाहिये। अब ये बातें तुम्हारे लिये नहीं हैं।

27 नवम्बर के पत्र में तुमने लिखा है कि पूजा करते समय यह मालूम हुआ कि जीभ का पर्त उचल गया है। यह एक अजीब चीज़ है, जो सामने आई। शब्द आकाश में है और हमारे पास जीभ, इसलिये कि जो बात हम कहना चाहते हैं, उसमें वह असल चीज़ जो ख्याल के द्वारा शब्दों में आती है, उसको जीभ घुमा-घुमाकर और लौट-पौट कर ऐसी सूरत में ले आती है कि दूसरे लोग उसको समझ सकें। मतलब यह है कि असल चीज़ को किस कदर घुमा-घुमाकर जीभ उसके लिए एक औजार बन जाती है अब जीभ के पर्त का उचलना यह साबित करता है कि आवाज़ की तोड़-मोड़ खत्म हो गई है और जो शब्द है, वह वैसा ही Natural तरीके में निकलना चाहिए। आध्यात्मिकता में इसके माने यह हुये कि शब्द जो तुम्हारे मुँह से निकलेंगे, उसमें बिल्कुल असलियत और खालिस-पन (Pure) होगा, बनावट नहीं होगी इसके माने यह हुए कि जो कुछ कहोगी, उसमें फ़ैज और असर होगा और वह बातें दूसरों के दिल पर असर ज्यादा करेगी और आध्यात्मिक लाभ आवाज़ की Vibration से उनको ज्यादा पहुँचेगा। रीढ़ में रेंगन महसूस होना, इसके माने है कि यह स्थान जाग्रत हालत में आ रहे हैं। कोशिश करके अपने बोलने के लिये श्याम प्रकाशजी से जरूर तय कर लेना। चौबेजी के कहने से वह ऐसा जरूर कर देंगे और खुद भी उन्हें तुम्हारा ख्याल है।  तुम्हारी सैर H1 Point की अभी शुरू नहीं हुई, मगर ख़त पहुँचने के बाद देखना कि उसकी शुरुआत हो चली है।

तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ। अम्मा व चौबेजी को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-533
शाहजहाँपुर
22/12/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र 8 दिसम्बर और 19 दिसम्बर 55 के मिल गये। तुम्हारे स्थान H1 पर नहीं मालूम अँधेरी क्यों आ जाती है। मैं हटा देता हूँ और फिर वह चीज़ पैदा हो जाती है, इसको सोचना है। गुरू महाराज की कृपा से उम्मीद तो यही है कि वज़ह समझ में आ जावेगी और दूर करने की कोशिश करूँगा। परेशानी की कोई बात नहीं और तुम्हारे समझ में आ जावे तो तुम खुद लिखकर भेज देना। आठ दिसम्बर के खत में तुमने लिखा है कि न कुछ पता है, न बेपता। यह तो ब्रह्मगति की हालत है, मगर इसको बहुत कुछ अभी निखरना बाकी है। अभ्यासी जितना ऊँचा जाता है, उतना ही नीचे की चीजें उसे धुँधली मालूम होती हैं। जैसे बहुत ऊँचे पहाड़ पर चढ़ जावें तो वृक्ष और मनुष्य एक छाया मात्र ही नज़र आवेंगे। बस यही जबाब इस बात का है कि तुम मुझे छाया मात्र ही दीखती हो और अगर गौर करो तो यही हालत सबके साथ मिलेगी। तुमने जो कुल शरीर में Vibration होना लिखा है, इसके माने यह है कि तुम मेरी हालत से बहुत कुछ चिमट चुकी हो और यही असर तुम्हारी हड्डियों में प्रवेश होता चला जाता है। तुमने लिखा है कि हड्डी-हड्डी से रोशनी निकलती हुई मालूम होती है तो जो चीज़ कि अन्दर है, वही बाहर निकल रही है और यह ईश्वर का धन्यवाद है कि अच्छी हालत है। अब 19 दिसम्बर के ख़त पर आता हूँ। तुमने लिखा है कि जी में आता है कि मैं रौ में आकर कुछ बोलने लगूँ या किसी को कुछ बताने लगूँ, मगर फिर यह विचार होता है कि मैंने कहीं गलत बताकर उन्हें धोखा तो नहीं दे दिया। बस इतनी ही कमी है कि तुममें अपने अस्तित्व का ख्याल अभी बाकी है। इसको उर्दू के शब्दों में कुछ अहमियत का होना कहा जावेगा। ( अहमियत यानी अहं भाव) अब मैं कुछ अपना हाल भी लिखता हूँ। मैं जब बोलता हूँ तो न मुझे यह समझ में आता है कि कौन बोल रहा है, बल्कि अपनी बकवास में मैं definite होता हूँ और यही हाल लिखने में है। इसलिये हर जगह Commanding Tone ही मिलेगी। अब लोग इसे अहंकार समझ लें तो मजबूरी है। यह मैंने इसलिये लिख दिया कि यह हालत अगर ठीक है, तो हर अभ्यासी को इस पर आना चाहिए। तुमने यह लिखा है कि बराबर सतह सी है, जिसमें दिल डूबकर स्वयं बराबर सतह सा हो गया है। इसके माने यह है कि साम्य अवस्था का प्रकाश शुरू हो गया है। साम्य- अवस्था की ऋषियों में बड़ी तारीफ़ है और यह वाकई बड़ी ऊंची हालत है। अगर यह किसी में ईश्वर दे देते हैं तो यह समझ ही लेना चाहिए कि जीवन का मसला Problem तो हल ही हो गया और इस हिसाब से तुमने ठीक लिखा है। 8 दिसम्बर सन् 55 के खत में कि Problem Solve हो गई है। बड़े-बड़े ऋषि इसको काफी समझकर आगे बढ़ने की कोशिश नहीं करते और ठीक भी है यह बहुत बड़ी और ऊँची हालत है जो तुममें अभी पूरी तौर से नहीं आई है, मगर उम्मीद आ जाने की जरूर है। मगर इस हालत का पहुँचा हुआ अभ्यासी दूसरों को सेकण्ड में छुटकारे का हक़दार नहीं बना सकता। अभ्यास कराते हुए तो वर्षों में वह सब कुछ करा सकता है, मगर मेरी चाल तो कहीं पर खत्म नहीं होती। लोगों की निगाह में यह Perfection ( पूर्णता ) है और ऐसा कहना गलत भी नहीं है। मैं तो उस राह का राही हूँ कि जहाँ से गुज़र कर यह पता भी नहीं रहता कि कभी इस रास्ते पर चला था और यह भी नहीं कि किसी=किसी की अनुभूति बाकी रह जावे। साम्य अवस्था के लिये मैं भी कोशिश करता हूँ कि अभ्यासियों में यह चीज़ पैदा हो जावे क्योंकि यह चीज़ भी पैदा हो गई तो उनकी जिन्दगी का मसला तो हल हो ही गया। मेरी तृप्ति अगर यहां तक पहुँचाने पर भी नहीं होती तो न सही। जुबान पूरी तौर से यदि खोल देता हूँ तो वह ईश्वरीय भेद निकल जाने का शुबह होता है। इसलिये बस इतना ही लिखे देता हूँ, समझने वालों के लिये, कि जब हम किसी राग के न रहे, तब असल में संलग्न होना कहना चाहिये और फिर उसमें जो बात पैदा होती है, उसके लिये शब्द नहीं।

तुमने इस पत्र में यह भी लिखा है कि अन्दाज़ ठहरता नहीं, इसलिये मन की भी मनन शक्ति उससे बरी रहती है। इस विचार का तुम ठीक वर्णन नहीं कर सकी। मगर खैर अगर ठीक तरह से वर्णन कर सकती तो उसका जवाब यह है कि ब्रह्म के तलछट में एक अच्छी लीनता प्राप्त है। तुमने बाँये कंधे के नीचे की हड्डी में जो Sensation होना लिखा है, उसके Point को अभी सोचना है, मगर इसका कारण बताये देता हूँ। तुम जब शाहजहाँपुर आई थीं, मैंने तुम्हारी पीठ की नसें और हड्डियाँ साफ़ की थी। इसलिये कि साम्य अवस्था में कहीं भी भारीपन न रह जावे, उसको अभी और भी साफ़ करना होगा। इन हड्डियों और नसों को साफ़ करने से साम्य अवस्था असली रूप में दरसना शुरू हो जाती है। सोच मैं यह रहा हूँ कि मामूली अभ्यासी भी जो हमारे पास आते हैं, उनकी भी यह हड्डियाँ और नसें भी साफ क्यों न की जावें, मगर ऐसा करने में कठिनाई यह होती है कि इतना समय वह मुझे नहीं देते कि उसकी यह चीजें साफ़ होने की नौबत आ जावे। इसलिये कि सिर्फ सूक्ष्म शरीर और पिण्ड और ब्रह्माण्ड के स्थान की सफ़ाई में वह बहुत ज्यादा वक्त ले लेते हैं। अगर कहीं उनमें भक्ति (Devotion) और ईश्वर-प्राप्ति की प्यास की वृद्धि हो जावे तो मुझे इतना वक्त न देना पड़े। चाहता तो मैं यह हूँ कि सब काम अपने ही जिम्मे ले लूँ, मगर भाई, क़ायदा यह है कि अपने ही धर्म और फ़र्ज का पालन करने से ईश्वर-शक्ति को वह अपना सकते हैं।

केसर का भी खत मिल गया। मैं उसे पढ़कर प्रसन्न हुआ। केसर भी अच्छी उन्नति कर रही है। मैंने उसके ख़त का विस्तारपूर्वक जवाब यों नहीं दिया कि तुम तो उसे खुद समझा सकती हो और इसलिये अपना वक्त बचा लिया। खैर उसको जानने के लिये मैं यह लिखे देता हूँ कि रोशनी का चारों तरफ उससे निकल कर फैलना यह बतलाता है कि उसके पिंड-देश की विलायत (Mastery) पर पग रख दिया है। मैं एकदम से उसको देना चाहता था, मगर उसकी अन्दर की हालत (Transparent) पारदर्शक नहीं थी बल्कि Opaque (अपारदर्शक ) थी, इसलिए मैं रुक गया, कि ऐसा न हो कि किसी नस में कोई नुक़सान पहुँच जावे, मगर खैर, वह इरादा जो मैंने बाँधा है, ईश्वर उसे धीरे-धीरे पूरा कर रहा है। उसको जो काम बता दिया है, वह करती ही होगी। अब उसकी Sitting लेने की तबियत यों नहीं चाहती कि उसमें ताज़गी (Freshness) प्रेम की वजह से मौजूद रहती है, मगर उसको Sitting से जी नहीं चुराना चाहिये, ताकि वह ताज़गी बढ़ती जावे।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-535
शाहजहाँपुर
26/12/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 24 दिसम्बर का लिखा हुआ प्राप्त हुआ। मैंने सुन लिया कि तुम गीता-जयन्ती में बहुत अच्छा बोली और मुझे इसकी खुशी है। अब तुम Speaker हो गई और झिझक जाती रही। तुमने खत में लिखा है कि बात करने में यह मालूम होता है कि जीभ से कोई सम्बन्ध ही नहीं रह गया है। यह लय- अवस्था का अच्छा Expression है। महा-प्रलय की भाँति नीरवता का एहसास होना यह ज़ाहिर करता है कि चित्त की वृत्तियों का निरोध हो चुका। मगर इस हालत में अभी फिर भी भारीपन है। तुमने यह लिखा है कि चारों ओर एक Dim Vibration मालूम होता है। यह उस स्थान की झलक है, यानि H1 जिस पर तुम हो। तुमने यह लिखा है कि रोम-रोम खुला हुआ सा लगता है, इसका मतलब मैं यह समझ रहा हूँ कि सब एक ही सी हालत छाई हुई है, जैसे पेड़ की छाया। Vibration इसमें जरूर नज़र आ रहे हैं। अब इसके आगे जब लिख़ोगी तो और साफ़ तौर से मैं वर्णन कर सकूँगा। जब तक समझ में आवे, लिखती रहो, आगे तो वाकई शब्द Expression के लिये किसी को नहीं मिलते।

केसर ने लिखा है कि ऐसा मालूम होता है कि मेरी मृत्यु हो गई है, और इस संसार से मेरा नाता बिल्कुल छूट गया है, यह अनुभूति बहुत कुछ सही है। मगर अभी संसार से नाता जुड़ा हुआ है।

चौबेजी व अम्मा को प्रणाम व तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-537
शाहजहाँपुर
1/1/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 29 दिसम्बर 55 का मिल गया। H1 Point पर अँधेरी आ जाने का मतलब अभी तक ठीक समझ में नहीं आया। कुछ-कुछ अन्दाज होने लगा है। जब ठीक समझ में आ गया तो, तुम्हें बता दूँगा। South India में कुछ लोगों ने और शुरु किया है और एक शख्स का ख़त कलकत्ते से आया है उसको Practices भेज दी गई है।

दृढ़ता तबियत में रहनी ही चाहिये और जिस किसी ने इसके ख़िलाफ कहा है, उसकी गलती थी। अगर कोई सोने को पीतल बता दे तो जानने और परखने वाले की निगाह में सोना ही रहेगा। तुमने लिखा है कि हड्डियाँ पिघल पिघल कर, गल गलाकर बराबर हुई जा रही हैं। तो ईश्वर की कृपा से हड्डियाँ नहीं पिघल रही हैं, और न गायब हो रही हैं बल्कि Negation की तैयारी है। यह तुम्हारी अनुभूति कि भीतर बाहर एक ही सी सतह रहती है, इसके बारे में पिछले ख़त में लिख चुका हूँ। सिर के पिछले भाग जिसकों Occipital Prominence कहते हैं, और यही ब्रह्म का भण्डार है उसमें लपकन का महसूस होना यह बताता है कि वहाँ पर असर शुरु हो गया है। यह देखा भी गया है और यह हमारे लालाजी की काबलियत का सबूत है कि अभ्यासी जिस स्थान पर होता है, उससे आगे उसका खेमा गड़ चुका होता है बल्कि तजुर्बे में यह बात भी आई है कि थोड़े ही दिनों के अभ्यास के बाद अभ्यासी के Occipital Bone पर कुछ लहरें पैदा होने लगती हैं। बात यह है कि उनमें असल तत्त्व अर्थात् जैसा कि उनको बनना है वह शुरू में ही डाल दिया जाता है और इससे बहुत जल्दी हो जाती है। बात करने में यह तमीज़ न होना कि तुम अपनी माता से बात कर रही हो या पिता से यह हालत अच्छी है और यह चीज़ बताती है कि रिश्तेदारी का नाता टूट चुका है मगर इसमें समता भी हो जायेगी। कुछ वज़ह उसके ज्यादा बढ़ जाने की यह भी है कि जिस्म के लिहाज़ से दिमाग में थोड़ी सी कमजोरी है और उस पर Pressure ज्यादा होने की वजह से अपने Function में कुछ कमी ही रखता है। इस इबारत से मेरा यह मतलब नहीं है कि तुम्हारा दिमाग बहुत कमजोर है, बल्कि यह मतलब है कि जितनी उसमें ताक़त है उससे ज्यादा उससे काम लिया जा रहा है। वैसे तुम्हारी बुद्धि ईश्वर-कृपा से तीव्र है और दिमाग अच्छा। दूसरों की बोली जल्दी न सुन पाना एकाग्रता और उसके फलस्वरूप ध्यान उस ओर न जाने की वज़ह से है। तुम ईश्वर की याद में बेख़बर तो पहिले ही हो चुकी, मगर यह बात जब थी जब दूसरा सामने था। अब एक ही है तो बेख़बर किससे होगी?

केसर का ख़त पढ़ा। उसकी हालत ईश्वर की कृपा से अच्छी चल रही है। अम्मा और ताऊजी को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-540
शाहजहाँपुर
11/1/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे दो पत्र मिले। तुमने यह लिखा है कि जब साधक शाहजहाँपुर आते हैं और लौटकर वापस आ जाते हैं, तो उनका मन मेरे पास ही छूट जाता है। यह अनुभूति तुम्हारी ठीक है कि उनका ध्यान मेरी ओर रहता है, मगर इसे अगर इस तरह से देखो कि मेरा मन भी कुछ दिनों उनके साथ रहता है, तो ज्यादा सही मिलेगा। यह ज़रूर है कि जब उनका आकर्षण मेरी ओर होता है तो मेरा चित्त भी उनकी तरफ़ हो जाता है, मगर यह चीज़ सबके साथ नहीं मिलेगी। अगर कहीं उनका मन हमेंशा के लिये मेरे पास छूट जावे तो फिर उनके लिये किसी चीज़ की तलाश की ज़रूरत न रहे। तुम्हारी अनुभूति यह सही है कि Nature की तरफ से Point पर जो अँधेरी थी वह उसकी रोक थी, इसलिये कि कहीं Special Personality तुम न बन जाओ, जो मुझे यहाँ से जाना पड़े, और यह स्वामी विवेकानन्दजी ने जब कि मेरी तबियत किसी तरह से न मानती थी रोककर दी है। इसमें तुमको कोई हानि न पहुँची। मेरा जहाँ तक ख़्याल है कि यह बिल्कुल Prophetic स्थान है, और तुम्हारी यह हालत पहले से शुरू हो चुकी थी, उसको न उभरने के लिये भी एक तरक़ीब कर दी गई है, इससे भी कोई हानि नहीं है। कल साढ़े नौ बजे रात को मैंने तुम्हारा झुकाव I1 पर कर दिया है। पूरी तौर से उस तरफ इसलिये नहीं खींचा है कि H1 पर की अँधेरी जाती रहे जो सतह सी जगह भीतर-बाहर मालूम होती थी, वह उस वक्त तक दूसरी चीज़ थी। अब तुम और वह मिलकर एक हो रही हो। पीर या दर्द जब अपने हद से गुज़र जाता है तो वह ख़ुद दवा हो जाता है और तुम्हारे खत में जो कुछ लिखा है, उसके जवाब में कुछ पंक्तियां लिखता हूँ।

सब लोग कहते हैं कि अपने आपको पहिचानो, अर्थात् यह देखो कि तुम कौन हो ? वह लोग सही ज़रूर होंगे, मगर कोई मुझसे पूछे तो अपने आप को भुला देना ही और अपनी Body Consciousness और Soul Consciousness को ख़त्म कर देना ही सब कुछ है। जब हममें पहिचानने की शक्ति रही या जानने की शक्ति रही तो एक हम और दूसरे वह चीज़ जिसको हम पहिचानने की कोशिश करते रहे, कभी पहिचान नहीं सकता। अत: सरल नुस्खा यही है कि अपने आपको भुलाने की कोशिश करता रहे और इसी की मैं कोशिश कराता हूँ और लोगों को ऐसे ही अभ्यास बताता हूँ। मैं समझता हूँ Know Thyself का मसला Socretes ने तो लिखा ही है, और उसी की नकल होती रही और सम्भव है कि भारतवर्ष के ज्ञानी महात्माओं ने इस पर और ज़ोर दिया हो। हमें तो अपने आपको इतना मथना है जो ध्यान की मथनी से हो जाता है कि हीर का हीर ( मक्खन ही मक्खन) रह जावे। तुमने अपने पत्र में सही लिखा है कि अबकी बार- मैं लखीमपुर ही रह गया और ऐसा रहा कि आना मुश्किल।

केसर का भी ख़त मिल गया। उसके संस्कार बनना बन्द हैं। फ़िक्र पैदा न होने के माने ये है कि अन्दर वह मग्न रहती है और बाहर के ऊपर जो अँधेरा सा लगता है उसमें यह मालूम होता है कि त्रिकुटी की सैर शुरू है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-543
शाहजहाँपुर
31/1/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे दो पत्र तारीख 11 जनवरी एवं 14 जनवरी सन् 56 के मिले। पत्र का उत्तर देने से पहले मैं यह खुशखबरी देना चाहता हूँ कि कल काशीराम तथा गजानन्दजी आसाम से आ गये। अब मैं तुम्हारी आध्यात्मिक दशा पर कुछ लिख रहा हूँ।

तुम्हारी दशाओं को समझना भी अब हर का काम नहीं रहा और मुझे भी उसको समझने में दिक्कत पड़ती है और शब्द उसके लिये नहीं मिलते। वाह ! क्या अच्छा लिखा है कि आँख बन्द करने पर अँधेरा प्रतीत नहीं होता और आँख खोलने पर उजियाला मालूम नहीं होता। यह उस असल चीज़ का तलछट समझना चाहिये, जहाँ न अँधेरा है न उजाला। लोग उसको रोशनी कहते हैं और मैं भी विचार के प्रगट करने के लिये यही शब्द इस्तेमाल करता हूँ। अगर भूमा की तरफ कोई उचक कर देखे तो जो तुम्हें अनुभूति है उसी की निखरी हुई हालत (Refined) मिलेगी। मगर उचक वही सकता है, जिसके पास दिल न रहा हो। इसके बारे में मैंने किताब ‘अनन्त की ओर’ में भी लिखा है। तुमने यह लिखा है, भीतर-बाहर एक सन्नाटा सा छा गया है, इसके लिए अच्छा Expression अंग्रेजी में Wilderness हो सकता है या सूनापन कह लिया जावे, मगर यह इसके बाद वाली हालत है। मगर अभी असली हालत बहुत दूर है। अभी तुम्हारी हालत में कुछ परमाणु (Matter) के बहुत हल्के कण शामिल हैं और यह I1 की हालत है। कुछ हल्की तिलमिलाहट भी है, जो बहुत गौर करने से मालूम होती है। यह तिलमिलाहट और कुछ नहीं है, बल्कि कम्पन की सूक्ष्म गति है। Negation में यह कुछ चीज़ नहीं रहती। एक सूखी हुई हालत Changeless रहती है और इसकी भी अनुभूति नहीं रहती। उससे आगे बढ़कर जहाँ पर कम्पन माध्यम हो जाता है, उसमें बेशुमार शक्ति होती है और Negation को तो मरी हुई हालत कहना चाहिए। मगर तमाम ज़िन्दगी की जड़ वही है। हम असल में मरकर ही जिन्दा होते हैं। जब एकाग्रता एक अच्छा रूप धर लेती है, फिर इसकी अनुभूति नहीं हो पाती। ईश्वर और आत्मा तुम्हें उड़ती-उड़ती बातें लग रही हैं। इसे तो ऐसा समझो कि जैसे लाल (Ruby) के सामने कोई रंग की दूकान खोले असल में ब्रह्म विद्या की प्राप्ति के लिये लोग रंग की दूकानें ही ख़ोलते हैं और तमाम उम्र इसी को बेचते-खोंचते रहते हैं। जिन लोगों की निगाह इन रंगों पर पड़ती है, उनकी तबियत में भी वही रंगीनी बढ़ जाती है, जिसको वास्तव में हममें जो भी (रंगीनी) थी, उसको उतारना ही चाहिये था।

हर कण-कण में ईश्वरीय प्रकाश का उठते हुए पाना, यह बात बता रही है कि घटियापने के ब्रह्म में तुम्हारी लय-अवस्था हो चुकी है। पहले किसी ख़त में मैंने लिखा है और ऋगवेद भी यही कहता है कि ब्रह्म कई प्रकार के होते हैं। यह हालत जो तुम्हारी है, अच्छे-अच्छों को नसीब होना मुश्किल है। अफ़सोस यह है कि इस मिशन की शिक्षा इतनी आसान है कि उसको कोई अपनी निगाह में नहीं लाता और इसीलिये उसका मूल्य भी कम हो गया है। मूल्य से मेरा मतलब यही है कि इसकी कोई क़दर नहीं रही है। तुमने जो दक्षिण में रक्त देखा है वह तो बहना ही है। मैंने किसी वक्त बातों बातों में किसी से कहा था कि यह बातें दक्षिण भारत से शुरू होंगी, सम्भव है यह ठीक हो। तुमने अच्छा किया कि सत्संगियों के लिये रक्षा कर दी और उनकी रक्षा तो वैसे ही रहेगी, ईश्वर ने चाहा। आत्मा कण-कण में तो व्याप्त है ही, मगर तुम्हारी अनुभूति इस विषय में जो है, उसके माने यह हैं कि तुम्हारा वही रूप बन गया है, जिसकी लोग तलाश में है, मगर अफ़सोस यह है कि हाथी को कुलिया में ढूँढते हैं।

तुमने I1 का हाल तो ठीक ही लिखा है। यह सही समझो कि मुझमें अगर गुरू महाराज का ज्ञान व अक्ल काम न करे तो ऊँचे दर्जे की शिक्षा देना दूभर हो जावे। H1 की स्याही हटाने के लिए I1 पर और उसका पूरा जोर I1 पर रुज़ू कर दिया था, जिसका परिणाम यह हुआ कि H1 भी ठीक आ गया और I1 पर अपने आप दूसरा पैर उठ रहा है। H1 पर जो स्याही मुझे अनुभूति होती थी, वह कोई कालिमा या नुक्स नहीं था, बल्कि मेरी गल्ती से उस पर Force या शक्ति अंदाज़ से ज़्यादा पहुंच गई थी, जिसकी वज़ह से शक्ति की एक तह जम गई थी और वह जोर मेरे हटाये नहीं हटता था। मालिक की कृपा से यही तरकीब समझ में आई, जो मुझे करनी ही पड़ी। इससे मेरी गल्ती का भी असर दूर हो गया और इस गल्ती की वज़ह से तुम्हें अगले Point पर बहुत ज़्यादा मदद मिल गई।

तुम्हारे माता पिता को प्रणाम तथा भाई-बहिनों को आशीर्वाद।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-547
शाहजहाँपुर
29/2/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तारीख 23.2.56 का लिखा हुआ पत्र प्राप्त हुआ। Sri M.K.Gaurshan बहुत अच्छे तरीके से लगा हुआ है। ता. 25.2.56 को 7.15 PM. पर वह आत्मा के स्थान पर खुद-ब-खुद आ गया और उसने दिल की सैर, जहाँ तक पिण्ड का सम्बन्ध है पार कर ली। कुछ सफाई, जो कुछ अँधेरा लिये हुए दिल में करने को अभी रह गई है, सो यह मेरा और तुम्हारा काम है।

मैं भूल गया हूँ जरा लिखना कि तुम्हारे सैर का स्थान क्या I1 है? मेरा ख्याल यही है। पिछले खत से पता चल जावेगा तुममें ईश्वर की कृपा से साम्य अवस्था पैदा हो चुकी हैं, मगर उसमें सफ़ाई और शुद्धता पैदा नहीं हुई है। कुछ उस हालत के सामने अलहदा कहने को भारीपन छाया की तरह स्याही लिये हुए मालूम होता है, यह भी ईश्वर की कृपा से दुख दूर ही हो जावेगा। उत्सव के रंग की अनुभूति न होना यह माने रखता है, कि तुमने बहुत कुछ अपने में चिमट कर लय- अवस्था हासिल कर ली है और यह बहुत ही अच्छी बात है। तुमने Thoughtless की हालत जो बताई है, यह साम्य अवस्था का तर्जुमा है और सूनापन भी इसीलिये प्रतीत होता है। यह तुमने ठीक लिखा है, जहाँ पर कि तुम हो, वहाँ पर हवासों की भी गम नहीं है। किसी उर्दू कवि ने लिखा है :- “न वहाँ ख्याल पहुँचे, न जेहन की है रसाई” अर्थात् न वहाँ ख्याल की गुजर है और न Intelligence की पहुँच। तुमने लिखा है कि जितना प्रेम तुम करना चाहती हो, नहीं कर पाती मैं भी यही कहता रहा और कहते-कहते उसी में झुलस गया।

केसर का भी खत आया। उसके स्वप्न की ताबीर (Interpretation) मैंने यह बताई है कि Soul अपनी Naked Form में आ गई है। इसकी व्याख्या बड़ी मुश्किल है, सिर्फ इतना लिख देना काफी है कि उसमें लग लिपटान, जो कुछ भी था, वह अलहदा सा है और इसी को Naked Form कहा जा सकता है। उसने लिखा है पूजा करने और न करने में कोई अन्तर नहीं मालूम पड़ता है, इसको वह ठीक तौर से प्रगट नहीं कर सकी। उसका मतलब यह मालूम होता है कि पूजा करने में जो हालत रहती है, वही न करने पर भी जो अगर स्थाई रूप में आ जावे तो बड़ा अच्छा है मगर इस हालत के लिये कोशिश नहीं करनी चाहिये, इस चीज को खुद-ब-खुद आने देना चाहिये। प्रार्थना के समय जो युद्ध का दृश्य आ जाता है, वह हो सकता है, सही निकले। मुझे गोण्डा से एक अभ्यासी ने लिखा था, जिसने थोड़े दिनों अभ्यास के बाद छोड़ दिया कि “मैंने ध्यान के समय यह देखा है कि हिन्दुस्तान पर एक पर्दा पड़ा हुआ है, और उसमें शब्द Danger लिखा हुआ है” उसको हटाकर मैं खुद दाखिल हो गया और स्वप्न भी उसने देखा था। अब ईश्वर जाने क्या होने वाला है। उत्सव में मेरे पास से इस साल कुछ भी नहीं लगा, बल्कि 30-40 रूपये अंदाजन बच रहेगा, जो Bank में जमा हो जावेगा। चौबेजी व अम्मा को प्रणाम व तुम्हारे भाई- बहिनों को आशीर्वाद।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-549
शाहजहाँपुर
15/3/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

असल जिन्दगी क्या है? कि जिन्दगी की जिन्दगी जाती रहे। वह जिन्दगी क्या है, जिसको जाना चाहिये? वह, वह है जिसमें पता लगा हो, जैसे ‘जीव-पना’। अब कहीं जिन्दगी जाने के बाद वह जिन्दगी आ गई कि जो तलाश की दौड़-धूप खत्म कर दें, तो फिर उसको दुनिया से मुर्दा होना ही कहा जावेगा और ईश्वर से जिन्दा रहना शब्द ही ठीक हो सकेगा। अब तुमने जो लिखा है कि मैं आया और गया, मगर तुम्हें इसकी अनुभूति नहीं, उसके माने यह है कि उस असल जिन्दगी की शुरुआत हो चुकी है। मगर यह भी लिखा है कि तबियत बाबूजी, बाबूजी कहकर पुकारती है, यह चीज बता रही है कि अभी वह टीसन बाकी है, जिससे कि अभी असल जिन्दगी में जिन्दा होना है। असल ज़िन्दगी को निगाह में रखते हुए “बाबूजी-बाबूजी” तबियत का पुकारना कमजोरी ही कही जावेगी, मगर उस ज़िन्दगी को जिसमें तुम्हें जिन्दा रहना है उसके लिये यही जज्बा हथियार भी है।

बाकी कुल पत्र का जवाब यह है कि तुम बबूल का दरख्त बन रही हो कि जो न सावन हरा न भादो सूखा। बाकी और बातें इस वक्त बहुत ऊँची लय- अवस्था बता रहे हैं और फिर यह तो होता ही रहता है कि कभी लय तो कभी उसकी तुरिया।

अब मैं तुम्हारी कहानी पर आता हूँ और या समझ लो कि मैं अपनी ही कहानी बयान करता हूँ। मैं जब लखीमपुर में अभी आया था तो मैंने तुम्हें J1 स्थान पर खींच दिया था, उसकी सैर अभी अच्छी तरह से तो आरम्भ नहीं हुई, मगर चिन्ह पैदा हो रहे हैं, और उसमें सूक्ष्मता बढ़ रही है। असल पूछो तो मैं तुम्हारी हालतों को देखता हुआ चलता हूँ और बाज हालत मुझे इतनी भा जाती है कि मुझे उसके देखने में मजा आता है, इसलिये तुम्हें देर लग जाती है। अब जो हालत उस स्थान पर छाई हुई हैं, अब तक उसे देख-देखकर खुश हो रहा हूँ, मगर अब सैर की हालत पैदा करूँगा, हलाँकि जी देखने का ही चाहता है।

मैंने, चौबेजी ने जो ऋग्वेद दिया था, उसको पढ़वा कर सुना और सुन रहा हूँ। उसमें सोम रस का वर्णन किया गया है और उसमें टीकाकारों ने अपनी राय भी दी है, जिनसे मैं सहमत नहीं हूँ। अबकी इरादा ये किया है कि जब मैं लखीमपुर आऊँ और बहुत से सत्संगी मौजूद हों, तो सब लोगों को मैं सोमरस पिलाऊँ। इससे मुझे भी तजुर्बा होगा और ख्याल तो यह है कि जो असर सोमरस पीने से होता था, वही असर सब पर दौड़ेगा, ईश्वर ने चाहा। और फिर अगर कहीं यह नुस्खा वन जावे तो उससे इसकी जाँच हो जावेगी। सोम के मानी केसर से कहना और ठा. हरदत्त सिंह से भी, कि पुराने किसी कोष में बबूल के तो नहीं हैं, मेरा ऐसा ख्याल हो रहा है।

ऋग्वेद में सरस्वती के मंत्र आये हैं और अग्रि और वायु और इन्द्र के भी और इनका Force इन्हीं स्थानों पर है, जो इसकी जगहें हैं। सरस्वती के स्थान की मैंने बहुत पहले Research की है, चुनांचे उसमें जितने मंत्र आये हैं, उनमें सब में, उसी स्थान पर जोर पड़ता है और उनकी लय ऐसी है कि वह स्थान जाग उठता है और अगर वह सब मंत्र उसी धुन से बार-बार पढ़े जावें, तो उस स्थान की कुल सैर हो जाती है। इसी तरह से मैंने किसी Speech में कहा है कि दीपक राग कंठ चक्र के करीब से अलापा जाता था, चुनांचे अग्रि के मंत्र जितने आये है, उनकी ध्वनि (धुन) कण्ठ-चक्र से ही निकलती है और उसमें सैर के वही तरीके हैं, जो मैं अपनी इच्छा-शक्ति से करवाता हूँ। अभी थोड़े ही से मंत्र मैंने सुने हैं, उसका नतीजा तुम्हें लिख दिया, इसीलिये स्वाध्याय सिर्फ वेद का ही मुफीद हो सकता है। आर्य लोग शब्द से चले हैं, जो धुर तक पहुँचता है। अब अगर मैंने कुल वेद सुन लिया तो मैं यह भी बता सकूँगा कि वैदिक जमाने के ऋषियों की कहाँ तक पहुँच हुई है।

हम चौबेजी के इस मद में बहुत एहसानमन्द हैं कि उन्होंने यह किताब देकर मुझे सोचने का मौका दिया।

तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ और अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-551
शाहजहाँपुर
4/4/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पोस्टकार्ड मिल गया। ख़ैर, उसका उत्तर फिर दूँगा। एक बात जो इस वक्त सामने है, उसके बारे में मैं कुछ लिखना चाहता हूँ। मैं जो कुछ कहता हूँ, उसमें यह सोचना चाहिये कि इसकी वजह क्या है और मेरी राय जो कुछ भी है, वह मोहब्बत से भरी हुई है, या उसके विपरीत। मोहब्बत से भरी हुई उस समय समझना चाहिये, जबकि उसमें कुछ लाभ प्रतीत हो। मैंने चौबेजी से बहुत पहले कहा था कि मेरे जन्म दिन में पाँच रूपये से ज्यादा न व्यय करें। और इसके लिये चौबेजी ने भी कहा था कि ऐसा ही होगा। चुनांचे मुझसे कहा भी यही गया कि इसकी पाबन्दी की गई मगर अम्मा के और तुम्हारे कहने सुनने से यह मालूम हुआ कि खाना वगैरह और तो और आदमियों का किया जाता है, जिसमें 50 या 60 रूपये से कम न ख़र्च होते होंगे। तुम जरा सोचो तो सही कि तुम्हें रूपये की कितनी तंगी रहती है और उस पर यह Taxing कितना ज्यादा होगा जो काम 4 या 5 रूपये में हो सकता हो उस पर इतना रूपया बेकार सर्फ करना कहाँ तक अक्लमंदी होगी। मैं तो खर्च के मामले में इतना सख्त हूँ कि मैं बराबर कहता रहता हूँ कि प्रसाद चढ़ाना जरूरी नहीं है। अब जरा सोचो तो सही कि मेरी राय कहाँ तक सही है ? सिर्फ इस वजह से इतनी सख्ती का ख़त लिखा था। एक बात लिखता हूँ, अपनी प्रशंसा में नहीं कि मुझे जब यह मालूम हुआ कि हमारे लालाजी को पैर छुआना पसन्द नहीं है, तो मैंने उनके पैर छूना छोड़ दिया। इसलिये कि हमें तो वही चीज़ करना चाहिये, जिसमें वह राज़ी रहें। अगर कहीं हम लोगों में मेरा नहीं बल्कि किसी उनके शिष्य का मामला होता, जो तुम लोगों के साथ इस समय है, तो ‘लालाजी’ की मनसा देखते ही, वह चीज़ खत्म कर दी जाती और इसका बोझ दिल पर न आता। वैसे अगर तुम लोग खर्च ही करना चाहते हो तो मेरा कुछ हर्ज नहीं, जितना चाहो, करो। इसकी तकलीफ़ तुम्हीं लोगों को होगी।

इस बात को तुम फिर जरा सोच लेना कि आध्यात्मिक गंगा में डूबने से ज्यादा लाभ होता है या माया की नदी बहाने से। मुझे खेद ज्यादा होगा अगर गुरू- पशु होने का तुम लोगों ने सबूत दिया। तुम लोगों को यह बात नागवार हुई हो तो मैं अपने शब्द वापिस लेता हूँ और यह गुरू महाराज की आज्ञा है, इसलिये मजबूरी है, मगर जो मेरे कहने और लिखने में असर हो गया हो, उसको हटाने का मुझमें इस वक्त काबू नहीं। वैसे तबियत तो मेरी यह चाही कि इस चीज़ को खत्म ही कर दिया जावे, इसलिये कि गैर जरूरी झंझटों से जितना ही बचाव हो सके अच्छा है। क्या तुमको तो अफसोस नहीं हुआ, उस खत पर जो मैंने लिखा था ? चौबेजी को तो अफसोस हुआ होगा और अम्मा को भी। तो चौबेजी से तो मुझे यह कहना है कि वह जन्मदिन पर कितनी ही दौलत लुटा दें, मुझे अफसोस नहीं होगा, इसलिये कि जो मेरे मना करने का भेद था, उस मोहब्बत का उन्हें पता न चला और यह तो हर समझदार आदमी का काम था कि अगर उसका दिल इस हद तक नहीं बना है कि मेरे कहने को माने और बर्दाश्त करे तो उसकी वजह पर पहले ख्याल जाना चाहिये था। यह तो मैं समझता हूँ कि तुम्हारे यहाँ जन्मदिन क्या मनाया गया, एक नई उलझन सी पैदा हो गई, जिसने तुम लोगों को अफसोस में डाल दिया। मेरे गुरू महाराज में यह आदत थी कि अगर कोई सत्संगी उनके लिये कुछ ज़रूरत से ज्यादा खर्च करता था, तो उन्हें अच्छा न मालूम होता था और वे उसे टोक देते थे। यह आदत मुझमें भी आ गई। इतना मुझे अफसोस जरूर रहेगा कि मेरी अच्छी बात ने तह तक न पहुँचने की वजह से ख़राब असर पैदा किया और मैं अपनी इस आदत से मजबूर हूँ कि बाज औकात मैं कड़ा Step ले लेता हूँ हलाँकि मैंने इस मामले में बड़ा Strong Step लिया है और मुझे तो वैसे ही शर्म आती है यह सुनते हुए कि मेरा जन्म दिन कहीं मनाया गया। इसलिये कि लोग कहीं यह न ख्याल करने लगे कि ‘रामचन्द्र’ अपने आपको पुजवाना चाहते हैं। एक बात मेरे समझ में यह और आई कि मैं इस जन्मदिन के मामले को तुम्हारे ही ऊपर छोड़ता हूँ। तुम जैसा चाहो इसमें इन्तज़ाम रखो, इसलिये कि तुम्हारा दिल दुखी न हो। मैंने सब बातें और इसकी वजह भी ऊपर लिख ही दी है, जिससे मेरा असल मतलब रोशन हो जावे और यह चौबेजी और अम्मा को भी सब बता देना। चौबेजी अब भी सन्तुष्ट न हों तो मैं यही बातें क्षमा मांगते हुए उनको भी अलहदा से लिख सकता हूँ। मेरे कहे हुए का असर तो कुछ कुछ ऊपरी तौर पर तो हटा है, मगर पूरी तौर पर तो उस वक्त हटेगा जबकि तुम और चौबेजी और अम्मा लालाजी से इसके हटने की प्रार्थना करें। इससे मेरी तबियत भी वैसी ही बन सकेगी। अगर कोई कमी मेरे रह गई हो तो चौबेजी मुझे लिखें, ताकि मैं उसको भी साफ कर दूं।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-554
शाहजहाँपुर
12/4/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र मिला। उससे यह इतमिनान कर लिया कि तुम लोगों को वजह समझ में आ गई होगी, कि मैंने इतना खर्चा जन्मदिन पर करने के लिये क्यों मना किया है। वैसे अगर कोई दौलत लुटा दे तो मेरा कोई हर्ज नहीं मगर चूँकि तुम लोगों की तकलीफ़ रूपये की मुझको ख़ल जाती है और एक तरह से फ़िक्र पैदा करती है, इसलिये सख्ती के साथ रोका गया। यह मिसाल तो यहाँ पर ठीक नहीं होगी, मगर मैं लिखे देता हूँ कि अगर कोई लड़का इस कदर ख़ैरात (दान) करने पर लग जावे कि माँ बाप को और दूसरे लोगों को उसकी वजह से तंगी हो जावे तो सोचो तो सही कि यह ख़ैरात कितना बड़ा पाप होगा। इसलिये कि इतने लोग जिसकी जिम्मेदारी उस लड़के पर है, इस ख़ैरात की वजह से तकलीफ उठावें। जिस रूपये पर दूसरों का हक़ हो, उसको दान-पुण्य में लगा देना बिल्कुल पाप है जबकि उतना खर्च कर देने से सबको तकलीफ़ होती है।

मेरे गुरू महाराज ने मुझे एक बहुत उम्दा बात बताई थी कि बुतपरस्ती या मूर्ति पूजन यही नहीं है कि पत्थर पूजा जावे, बल्कि किसी आदत का गुलाम हो जाना यह भी बुत-परस्ती है। दूसरे, एक बात और है कि अगर हम अपने ही विचार की पूर्ति में रहते हैं और अगर उसके ख़िलाफ कोई बात पैदा होती है, तो धक्का लगता है। ऐसे लोगों को मनमत कहते हैं। उसके लिये यह नहीं कहा जाता कि वह ‘मालिक’ की मौज में खुश हैं, अर्थात् उसको गुरू-मत नहीं कह सकते। अब इसमें कोई जितनी ही तरक्की कर ले, उतनी ही in-confirmity with the Lord कहा जाता है। हमें तो वह बात करनी चाहिये जिससे ‘मालिक’ खुश रहे और इसी में हमारा काम बनता है और सम्बन्ध घना होता जाता है।

मुझमें भी बहुत सी बुरी आदतें होंगी। एक तो सुबह देर करके उठने की, दूसरे हुक्का पीने की और यह सब जानते हैं। और न मालूम क्या-क्या होंगी, इसकी मुझे ख़बर नहीं। यह तो दूसरे ही लोग मुझे बतावें तो पता चल सकता है। एक नुक्स जो मैं कहे ही देता हूँ, यह है कि मैं Extremist जरूर हूँ। अगर रूहानी (आध्यात्मिक) Approach का ख्याल एकाग्रता में पड़ गया तो जब तक मैं वह चीज़ दे न लूँ, मुझे चैन नहीं आता। साथ ही उसके अगर कोई और बात मैंने Seriously ले ली और वह विचार की गहराई में पड़ गयी तो फिर उस वक्त सिवाय उस बात को करने के और किसी तरफ ख्याल नहीं जाता। इसलिये हर चीज़ मैं Lightly लेता हूँ, मगर कभी ऐसा भी हो जाता है कि वह विचार की गहराई में पड़ जाती है। चुनांचे इस case में जो तुम्हारे सामने है, ऐसा ही हुआ और उसका Explanation तुम्हारे ख़त में उस वक्त आया जबकि तीर कमान से निकल चुका था। अब तुम निराशा मत हो। मैंने यह कुल मामला तुम्हारे ही ऊपर छोड़ दिया है, इसलिए तुम चाहे खर्च करो 5 रूपया या उससे ज्यादा, मुझे एतराज नहीं, मगर यह मजबूरी जरूर पड़ गई है कि मेरा ख्याल कुछ इस तौर पर अटक गया है कि जिससे यह हो सकता है कि जन्म-दिन पर फ़ैज कुछ बँधा रहे और इसी के लिये मैंने तुमको लिखा था कि तुम लोग इसके लिये ‘लालाजी’ से प्रार्थना करो कि वह बँधाव हट जावे। मैंने भी प्रार्थना की है और करूँगा भी मगर अभी तक पूरी तौर से नहीं हटा है। हुकुम यही है कि जन्मदिन मनाया जावे, इसलिए मजबूरी पड़ गई, वरना मैं तुम सबको इसके लिये मना कर देता।

मेरे दिल में एक विचार और पैदा हुआ कि समय वह अब नहीं रहा कि जब शिष्य गुरू को Submit करते थे, इसलिये जमाने की रफ्तार देखकर इस बात को यूं होना चाहिये कि गुरू खुद शिष्य को Submit करे और यह विचार मेरा अभी तक बंधा हुआ है। अब लालाजी साहब से इसकी रोशनी लेकर इस तरीके को बदलना चाहता हूँ, इसीलिये मैंने चौबेजी से और अम्मा से क्षमा मांगी है। मेरी समझ से यह चीजें अच्छी है, अगर लालाजी पसन्द करें। चौबेजी से पूछना कि इस मामले में उनकी क्या राय है और मास्टर साहब से भी। मैं तुम्हें यह भी इत्मिनान दिलाता हूँ कि मैं किसी से भी नाख़ुश नहीं हूँ। एक बात थी जो भन्नाटे में पड़कर जोर पकड़ गई और मैं कर गुज़रा जिसका मुझे ख़्याल भी है।

चौबेजी और अम्मा को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-558
शाहजहाँपुर
13/4/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

इससे पहले मैं एक लिफाफा डाल चुका हूँ। उसके बाद तुम्हारा खत 11.4.56 का प्राप्त हुआ। इसका जवाब मैं इससे पहले ख़त में लिख चुका हूँ कि मैं चौबेजी से या अम्मा से नाखुश नहीं हूँ और नाख़ुश होने का सवाल ही क्या? मैं तो सिर्फ एक रिवाज़ और खर्च को कम करना चाहता था। मास्टर साहब ख़ुद भी नहीं समझे, इसलिये तुमसे ऐसा कह दिया। इसको कि मैं इसके पहले ख़त में मैं लिख चुका हूँ, मतलब यह है कि कहने का असर कि रहमत बरसेगी, जो कुछ थोड़ा बहुत हो गया हो, उसकी दुआ की जरूरत है अर्थात् यह असर साफ़ आ जावे, अगर 5 रूपया से ज़्यादा खर्च हो तो। इसलिये लालाजी से यह प्रार्थना करनी चाहिये कि मेरा दिल इस विचार से साफ़ हो जावे। यह सब बातें इससे पहले ख़त में मैं साफ़ कर चुका हूँ और तुम बिल्कुल परेशान मत हो। पिछले ख़त को गौर से पढ़ना, चित्त तुम्हारा साफ़ हो जायेगा फिर भी कोई बात रह जावे तो मुझसे पूछ लेना। मैं भी आखिर इन्सान हूँ, तो यही समझ लो कि इसी हैसियत से मैं इतना तेज कह भागा।

चौबेजी और अम्मा को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-563
शाहजहाँपुर
7/5/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र मिला। जबाब देना अब खतों का मुश्किल पड़ रहा है। इसलिये कि बड़ी Deep Thinking की जरूरत पड़ती है। मगर आजकल कई दिन से तवज्जोह मैं तुम्हें अक्सर दे रहा हूँ। कुछ ठहरने के बाद जब अपना काम पूरा कर लूँगा तब लिखने की कोशिश करूँगा।

अम्मा को प्रणाम और सब छोटों को प्यार।
शुभचिन्तक रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-570
शाहजहाँपुर
26/6/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 25.6.56 का मिल गया। तुम्हारी सैरगाह का स्थान अब K1 है और उसकी सैर भी भीनी-भीनी शुरू हो गई है। इस वक्त इस स्थान पर मेरा ख्याल जो पहुँचा, उसे देखकर इतनी ताज़गी (Soothing) मिली कि चित्त प्रसन्न हो गया और अपने सूखे-साखे स्थान की ख़बर न रही। इस जगह का अगर वर्णन किया जाये तो बहुत कुछ Dawn से समानता मिलेगी। इसमें परमाणु बहुत सूक्ष्म हालत में है और माया की चमक और दमक बहुत ही कम है। वह कुछ ऐसा स्थान है, जहां सब कुछ सोया हुआ मालूम होता है। जैसे दुनिया छिन्न-भिन्न करके या अपना घर बिगाड़ के उसका मालिक आराम से सो रहा हो और उसे इस फ़िक्र से छुटकारा मिल गया हो। बस ऐसी ही हालतें तुम अपने पत्र में बयान कर रही हो। पूजा के वक्त यह ख्याल न बाँधना कि मैं प्राणाहुति दे रही हूँ यह लय-अवस्था की अच्छी दलील है। कण-कण सुन्न और सोता हुआ, जो तुम्हारी अनुभूति में आ रहा है, यह सब उस स्थान की सैर का परिणाम है। केसर का भी पत्र आया। वह भी एक अच्छी हालत की खबर दे रही है और मुझे उम्मीद है कि जो काम मैंने उसे Mission के बारे में दिया है, वह कर रही होगी।

तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ और अम्मा को प्रणाम।

तुम्हारे खत और मेरे जवाब जहाँ तक हो सकें, केसर उसकी नकल करती रहे, ताकि छप सकें।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-573
शाहजहाँपुर
6/7/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा 30.6.56 का पत्र मिल गया। तुम्हारे सैर करने की जगह जैसा पहले मैंने लिखा है, K1 है और वहीं की हालत बता रही है। यह स्थान ऐसा है कि जिसकी मिसाल एक जंगल या उजड़ी हुई बस्ती हो सकती है। इस स्थान में प्रकृति अपना बहुत कुछ आवरण उतार चुकती है और उसमें बोझ, वज़न, सब ख़त्म हो जाता है, मगर फिर भी सूक्ष्म रूप में वह मौजूद रहती है। जब यह भी जाती रहे, तब महाप्रलय की गति या Original हालत कही जा सकती है। अब इससे आगे इसी का रूप बिगड़ता चला जायेगा और उसके आवरण उतरते चलेंगे। यही वजह है कि सारी प्रकृति तुम्हें सोई हुई सी प्रतीत होती है। अब इन स्थानों को पार करना अभ्यासी के वश का रोग नहीं रहा। सिर्फ उसकी यात्रा का और असल में पहुँचने का चाव ही रास्ते में आगे क़दम रखने में मददगार होता है, और इसी चीज़ को देख कर Transmitter आगे बढ़ाता चला जाता है।

मैं कह सकता हूँ कि हजारों वर्ष ध्यान में रहे, मगर यह हो ही नहीं सकता कि बिना अच्छे पथ-प्रदर्शक की मदद के अभ्यासी आगे बढ़ सके। अपनी ही मेंहनत से काम अगर लिया जावे तो इस बात में Pressure बढ़ता चला जायेगा और एक गुत्थी सी बन जावेगी, जो आगे बढ़ने से रोकेगी। यह हमारे ‘लालाजी’ की ही दया और कृपा है और उन्हीं की शक्ति कि जो आगे बढ़ाती चली जा रही है, और किसी का बस नहीं।

तुम्हारी चाल में थकान नहीं आई है, बल्कि वह स्थान ही ऐसा है, जहाँ कि इतनी मन्द-मन्द सैर हो रही है, और धीरे-धीरे भी। अब अगर इसमें तेजी बढ़ा दी जावे तो, वह आवरण, जो प्रकृति ने उतार दिया है, फिर चढ़ने लगेगा। इसलिये जैसी गति उसकी, सूक्ष्म होती चली जाती है वैसे ही सूक्ष्म सैर उसकी कराई जाती है। फिर लिखता हूँ कि इन बातों की पूर्ति कराने वाले सिवाय हमारे ‘लालाजी’ के और कोई हो ही नहीं सकता है। यहीं पर Divine Intelligence का काम है।

अम्मा और चौबेजी को प्रणाम और तुम्हारे भाई बहिनों को आशीर्वाद !

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-575
शाहजहाँपुर
12/7/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारा बाबू श्यामबिहारी द्वारा मिला। तुमने जो हाल तीसरी जुलाई के खत में लिखी है, उसका जवाब मैं इससे पहले के ख़त में लिख चुका हूँ; जिसका जबाब तुमने अपने ख़त दिनांक 6th जुलाई सन् 56 में दिया है। तुमने जो Expression अपनी हालत का रात्रि की उपमा देते हुए लिखा है, वह K1 के स्थान का है। ईश्वर लोगों को क्यों नहीं मिलता? इसलिये कि लोग उसको चमक में ढूँढ़ते हैं। वह तो अँधेरे में ही टटोलने से मिल सकता है। दिन में कोई रात्रि को ढूँढ़े, तो उसको नहीं मिलेगी और इस हिसाब से यह भी सही हैं कि रात्रि में कोई दिन को ढूँढे, तो वह भी उसको नहीं मिलेगा अर्थात् ईश्वर को जिसने पा लिया, फिर चमक के सहारे का ध्यान उसके दिमाग़ में भी नहीं आ सकता। इसीलिये मैं तो तुम्हें अब अँधेरे में लिये जा रहा हूँ, जहाँ तुम खुद अपने आप को सुझाई नहीं देती और भाई, इससे आगे अँधेरा ही अँधेरा मिलेगा। यह जरूर होगा कि आगे बढ़कर उसको अँधेरा भी नहीं कह सकते और यहाँ पहुँच कर हम उजाले को भी अलविदा (Good-Bye) कह चुकते हैं। फिर आगे हमको अँधेरे को भी Good Bye कहना पड़ेगा। तब हम असल भण्डार में दाखिल हो सकेंगे। अब वहाँ क्या है ? न अँधेरा है, न उजाला, न रात और न दिन, मगर चल-चलाव अभी मौजूद है।

केसर का भी खत मिल गया। उसकी भी हालत ईश्वर की कृपा से अच्छी है। अम्मा व चौबे जी को प्रणाम और तम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक

रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-578
शाहजहाँपुर
28/7/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे दो पत्र दिनांक 16.7.56 व 23.7.56 के मिल गये। Existence of God तो साबित करने की चीज़ नहीं है, बल्कि अनुभव करने की चीज़ है और शब्दों से अभी तक साबित नहीं हो सकी। जो चीज़ उसके देखने की है, उसी से वह अनुभव में आ सकता है और देखा जा सकता है।

यह तो ठीक है कि तुम्हारे सैर और यात्रा का स्थान K1 है और उसके करीब करीब 1/3 सैर समाप्त हो चुकी है और वहां पर तुम रुक गई हो। इसलिए कि तुम्हारे चलने का अब बस नहीं रहा। क़दम-क़दम पर अब एड़ लगाने की जरूरत है। मैं कुछ इन दिनों दूसरी ओर Attentive रहा हूँ। कुछ उलझनें भी ऐसी आ गई हैं, जो अगर ईश्वर ने सुलझा दी तो नवम्बर में South India जा सकूँगा। इसलिये तुम्हारी ओर मैं ध्यान नहीं दे सका। अब सैर फिर शुरू होगी, ईश्वर ने चाहा और ख़त पहुँचते-पहुँचते इस चीज़ की तुम्हें अनुभूति होने लगेगी। तुमने जो दो पत्र भेजे हैं, उसमें इसीलिये कोई बात ऐसी न मिली कि जिसका जबाब दिया जा सके। दूसरे एक बात यह भी है कि ऐसी सूक्ष्म गतियों का जबाब देना भी अब बड़ा मुश्किल है। इसलिये कि शब्द मुश्किल से मिलते हैं और अब उन बातों के कारण लिखना उससे भी ज़्यादा कठिन है। फिर भी मैं कोशिश कर कराकर चाहता तो यही हूँ कि कुछ न कुछ जवाब हो जावे।

काशीराम जी का ख़त आया था। वह पत्रिका निकालने की जल्दी कर रहे हैं। अब उन्होंने 24 सफ़े हिन्दी के लिये और 8 सफ़े अँग्रेजी के लिये रखे हैं। तुम अपने लेख भेजती चलो। सालाना चन्दा इसका तीन रूपया है। मैं चाहता हूँ कि कुछ मैं भी लिखूँ, मगर मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। नहीं मालूम कि मेरा दिमाग़ बूढ़ा तो नहीं हो गया? वैसे तो जब ईश्वर की कृपा होती है, तो मज़मून खुद-ब-खुद उतरता है, और मेरी कोशिश से कुछ नहीं होता।

तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ। चौबेजी व अम्मा को प्रणाम। केसर का खत मिल गया। उसकी हालत अच्छी चल रही है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-580
शाहजहाँपुर
30/7/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

इससे पहले जो पत्र आये, उनका जबाब इसी लिफाफे में रख दिया है। अब 25 जुलाई का जो पत्र आ गया, उसका उत्तर भी इस पत्र में दे रहा हूँ। मैंने पिछले पत्र में लिखा है कि तुम्हारी चाल ठहरी हुई थी और K1 की 1/3 सैर करने के बाद रूकी है। अब आज से फिर उसमें जागृति पैदा होने लगी है। खत पहुँचने तक जैसा कि मैंने लिखा है, ईश्वर ने चाहा, सैर शुरू हो जावेगी। जितनी चाभी भर देता हूँ, उतनी ही तुम चल लेती हो और इसमें तुम्हारी ख़ता नहीं। बहुत ऊँचे स्थानों में बिना Push दिये कोई नहीं चल पाता। इस मेरे कहने का विश्वास उसी को हो सकता है, जिसको ऐसी सूक्ष्म गतियां प्राप्त हो रही हैं। इक्का-दुक्का Saint ऐसे भी हुए हैं कि जिन्होंने अपनी हालत ईश्वर से Direct प्रेम पैदा करके कर ली है और यह प्रेम भी बहुत अच्छा है, अगर कोई ऐसा कर सके। किन्तु ये Circles जो Egoism के हैं, उनको पार अपनी ज़िन्दगी में सिवाय “लालाजी” के कोई न कर सका। मैंने जहाँ तक इसकी खोज की है, इतनी ऊँची उड़ान अगले-पिछले महात्माओं में कहीं नहीं मिली। मेरा ख्याल भी है कि इसमें अपनी मेंहनत से सफ़ल होना भी कठिन है, इसलिये कि जब अहंकार रहित होने की, जितना सम्भव है, अगर बिना गुरू के कोशिश की जावेगी, तो जिस्म नहीं रह सकता। इसलिये तरकीब यह है कि उसको थोड़ा सा अन्दर दबा देना चाहिये। इस तरह पर, कि न उसकी अभ्यासी को कभी ख़बर हो सके और न आँखों वाला भी जान सके। इस तरह पर, कि जैसे कुर्सी की गद्दी के नीचे धूल पड़ी होती है तो बैठने वालों को कभी पता नहीं चलता। जिस्म के क़ायम रखने के लिये कुछ न कुछ यह हालत रखना ज़रूरी है और सच तो यह है कि Egoism का बिल्कुल ख़ात्मा, जैसा कि मैंने Efficacy of Rajyog में लिखा है, महाप्रलय के वक्त ही होता है, जो सब मिल-मिलाकर एक Identity की शक्ल में हो जाता है, जिसमें संसार की उत्पत्ति फिर शुरू होती है। बस समझ लो कि अभ्यासी के शरीर में जब वह Egoism के Circles पार करता है, अहंकार की शक्ल Identity की कर दी जाती है।

अब मैं तुम्हारे ख़त पर आता हूँ। तुम्हें अस्तित्त्व ग़ायब मालूम होता है। यह लय-अवस्था की एक बहुत ऊँची हालत है। मगर यह हालत ऐसी स्थायी होनी चाहिये कि अभ्यासी कितना ही ख्याल करे, तो भी इसका Impression दिल में न बने। तुम्हारी यह अनुभूति का समाप्त होना कि प्रकृति को कोई चीज़ मानों ताक़त देती है, व्यक्त करती है कि Consciousness समाप्त होना चाहती है, मगर अभी उसकी झीनी हालत मौजूद है या यों कहो कि Consciousness की सूक्ष्म गति अभी मौजूद हैं। यह भी ईश्वर ने चाहा, अपने से आगे बढ़ने की खुशखबरी देगी। संसार की दौड़-धूप सिर्फ Pure Consciousness तक है, और इसी को वह ईश्वर-प्राप्ति समझ रहे हैं, मगर कोई मुझसे पूछें तो वास्तव में यहाँ तक पहुँचे हुए को अभी असल मैदान ही नहीं मिला। अगर मैं किसी से कहूँ तो यही कहेगा कि अपनी बड़ाई दिखाने के लिये एक नई चीज़ गढ़ ली है, और वह अपने विचार में जैसा कि उन्हें वातावरण मिला है, सही भी, अपनी जगह पर हो सकते हैं और फिर यह भी बात है कि बड़े-बड़े महात्माओं के सामने जो बड़ी-बड़ी पूजायें बताते हैं, मुझ ज़ाहिल को सुनने भी कौन लगा।

तुमने लिखा है कि तुम्हारे सिर के स्थान पर अगर कोई पर्दा फाड़ दे तो मैं कहीं पहुँच जाऊं। यह एहसास तुम्हारा सही है। मगर जहाँ चोटी रखी जाती है, उसको ब्रम्ह रन्ध्र का स्थान कहते हैं। यहाँ पर Direct Revelation होता है। यह स्थान अभी दूर है। सम्भव है कि इसके बीच में बहुत से Points हों। हालाँकि जिस स्थान पर हो, वहाँ पर नापने से फासला निहायत ही थोड़ा मिलेगा, मगर फासले पर नहीं जाना चाहिये। हर स्थान खुद एक ईश्वर का बड़ा Sphere है और इन स्थानों को अगर नापा जावे तो ऐसे संसार जिसमें कि हम रहते हैं, हज़ारों समा जावेंगे।

केसर का जो 16 जुलाई का खत आया है, उसमें उसने लिखा है कि रोशनी होते हुए भी अँधेरा प्रतीत होता है। इसके मतलब यह है कि उसकी त्रिकुटी की सैर हो रही है, जिसको सूफ़ी लोग सैर नफ़स कहते हैं।

तुम जो आसाम में छपने के लिये मज़मून भेजो, उसमें हमारी तारीफ़ नहीं होनी चाहिये, वरना यह Advertisement समझा जावेगा। बल्कि तत्त्व की बात होनी चाहिये। हमारी किताबों का Reference आने में कोई हर्ज नहीं और ‘लाला’ जी का नाम आ जाना तो बहुत अच्छा है, मगर Advertisement उसमें ज़ाहिर न हो, बल्कि वह असल बात जो उन्होंने कही या लिखी है, या उन्होंने Philosophy बयान की है, वह भी आ सकता है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-587
शाहजहाँपुर
6/9/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र 22.8.56, 30.8.56 तथा 2.9.56 के प्राप्त हुए। तुम्हारे जितने पत्र हैं, सब के सब उच्च-लय-अवस्था को बतला रहे हैं। अपने आखिर पहुँच तक नहीं मालूम, कितनी लय-अवस्था और पड़ेगी और लय होना ही उस हालत का कमाल है और फिर उससे उछलना उस कमाल का असर है। मेरे तो होश उड़ते हैं, जब ये हालतें देखता हूँ कि ऐसी-ऐसी लय अवस्थायें भिन्न-भिन्न तरीके की पैदा होती हैं। नहीं मालूम हमने अपनी खोज में कितनी जीवनी गँवा दी है और अब तक बराबर खुलते चले जा रहे हैं। भारत वर्ष के महात्मा तो इतने ज्यादा गिर चुके हैं कि यहाँ तक इक्का-दुक्का कहने लगे कि रामायण सिर्फ घर में रखी रहे और उसकी आरती होती रहे, तो उसकी मुक्ति हो जाती है। एक मसल मज़ाक में लोग कहते हैं, जो ऐसे लोगों के लिये ठीक है कि-“इस हुस्न पर ये नखरे” अगर इसका कोई मिसरा बना दिया जावे-“इस हुस्न पर यह नखरे, चेलों का खुदा हाफ़िज”। मैंने यह लफ्ज नखरा, जो इस्तेमाल किया है, वह बहुत माने रखता है। शब्द मसखरापन का जरूर है, मगर इसके लिख़ने से मैं यों मजबूर हूँ कि इससे ऐसे महात्माओं की अदा प्रकट होती है। जब यह तालीम गुरू की और उस पर अपनी कद्र चाहते हैं और यदि कोई न करे तो उनके थर्मामीटर का पारा बहुत ऊँचा उठ जाता है। वक्त ऐसा ज़रूर आवेगा कि बरसाती धरती की धूल Mushrooms की तरह यह बैठ ही जावेंगे। मेरी तबियत तो चाहती है कि इन बातों पर बहुत कुछ लिखूँ, मगर कुछ फ़ायदा दिखाई नहीं देता, इसलिये बेकार है। ईश्वरीय लहर जब आवेगी, तब असलियत रौशन होकर फिर रहेगी।

5 सितम्बर सन् 56 को साढ़े ग्यारह बजे रात्रि को मैंने तुमको L1 पर डाल दिया है। यह ऐसा मैदान मालूम होता है कि इसको अँधेरा मिला हुआ उजेला कह सकते हैं। इन मैंदानों को, सच तो यही है कि वही पार करता है, जो पपीहा की तरह “पिऊ कहाँ” की खोज में रहता है। तुम्हारा ख्याल सही है कि मैंने अपनी माता के पिण्ड के कुल स्थान पार कराके ब्रह्माण्ड मण्डल में डाल दिया है और कुल जिस्म में अजपा पैदा हो गया है। ब्रह्माण्ड की सैर इस वक्त हो रही है, इस तरह कि इनको इसकी ख़बर तक नहीं हो पाती और यह सिर्फ उनकी कमज़ोरी की वज़ह से ऐसा किया है, ताकि उनके दिमाग पर जोर न पड़े। कमजोर वह इस क़दर हैं कि पखाने-पेशाब के लिए उनको उठाना पड़ता है। आगे फिर देखा जायेगा। दमा बदस्तूर है। मुझे दमा का बहुत मामूली दौरा हुआ था, जो या तो अपने आप ठीक हो गया हो, या एक दो बार शीतोपलाद की चटनी खा ली थी, उससे कुछ फ़ायदा हो गया हो।

श्री काशीराम जी का ख़त आया है, उन्होंने पत्रिका छपने के लिये कलकत्ता भेज दी है और अगली पत्रिका के लिये मज़मून माँगे हैं और यह भी लिखा है कि मज़मून मिलते रहें तो पत्रिका छपती ही रहेगी।

केसर का भी ख़त आया था। उसकी हालत अच्छी चल रही हैं।

एक पर्चा मेरे पास अभी आया है, जिस पर Heading है-

“कछला के श्री श्री 108 स्वामी दयानन्द महाराज सरस्वती की करतूतें” यह महात्मा कछला के हैं जिन्होंने स्कूल खोला है और पर्चा यह बता रहा है कि Govt. ने तीन सौ बीघा काश्त दी है। उसकी कमाई भी सब खा जाते हैं। फर्जी नाम मास्टरों और लड़कों के लिखे हुए हैं, और तनख्वाह सब ले लेते हैं। यह पर्चा Govt. के सभी Ministers के पास भेजा गया है और मेरे पास बहैसियत President Sri Ramchandra Mission के आया है। कमेंटी को किसी तरह Mission का पता लग गया और उसने भेज दिया। यह महात्माओं का हाल है और उस पर ये चाहते हैं, मेरी कद्र करें।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-591
शाहजहाँपुर
19/9/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र 11 सितम्बर और 17 सितम्बर के मिल गये। मुझे अनुभव किसी बात का ऐसा नहीं होता कि जैसे दुनियादारी की बातों का शुरू अभ्यास में, जाना था। हाँ Nature की बातें जरूर अनुभव में आ जाती हैं इसलिये मैंने माताजी के सिवाय अन्नमयी कोष के और सब कोष भी तोड़ दिये। अन्नमयी कोष के तोड़ने की जरूरत भी नहीं थी, इसलिये कि इसके टूटने पर कुछ शक्तियाँ खालिस और ज़ोरदार पैदा हो जाती हैं और यह हो सकता है कि मुँह से अच्छा और बुरा निकलने पर वैसा ही हो सकता है।

पंडित लक्ष्मीचन्द्र जो अब ‘स्वामी रामेंन्द्र देव’ हैं, अपना सिलसिला अलहदा करके उसके नियम बना दिये और उसका नाम “दिव्य-पथ-प्रदर्शक मण्डल” रखा है। मुझे इसका खेद बिल्कुल नहीं है। मसल जरूर ठीक होती है कि “मेरे घर सों आगी लाई, नाम धरो वैसन्धर”। मुझे इस शख्स पर अब भी तरस आता है। उनके काबिल शिष्य हरिशरण ने एक किताब बड़े फ़क्र के साथ “योग वेदान्ती मुक्तावली" लिखी है। किताब और नियम भेज रहा हूँ, पढ़ लेना। मास्टर साहब को जब फुर्सत होगी, उन्हें भी देना, वह भी देख लें।

तुम्हारे पत्र अब जो मिलते हैं, उनके जबाब के लिये शायद लफ़्ज नहीं मिलते तुम किसी न किसी तरह से उसे व्यक्त कर ही लेती हो, कि धुँआ का पता होने से यह मालूम हो जाता है कि वहाँ आग जरूर है। सरसराहट रीढ़ पर या उसके करीब होना यह बतलाता है कि कम्पन या Vibration होते हैं, जिससे जागृति पैदा होती है। इसको वह हिलोर समझना चाहिये कि एक जगह पैदा होने से अपना Expansion दरिया में फैला देती है। ताकतें सब रीढ़ की गुरियों में छिपी हुई हैं। इनको आध्यात्मिकता की अगर Back Bone कहा जाय तो गलत न होगा। एक तालीम का तरीका यह भी है कि रीढ़ की गुरियों पर ही Transmission किया जावे। जिस-जिस चक्र पर चाहे, उसी की सैर शुरू हो सकती है। मगर इस तरीके को जहाँ तक मुझे मालूम है, महात्माओं ने रायज़ नहीं किया और उसके चिन्ह भी कहीं नहीं मिलते। सम्भव है कहीं पर इसकी Research किसी ने की हो, मगर मुझे नहीं मालूम। मैं तो इतना सा इशारा जानता हूँ कि जिस चक्र पर असर पहुँचाना हो या उसकी यात्रा करानी हो तो उसके पीछे की (यानी दूसरे तरफ़ की ) गुरिया ले ले। इस क़िस्म की तालीम देने की ज़्यादा ज़रूरत भी नहीं। इसलिये उसकी Research भी बेकार है। मैंने कहीं कहीं पर ज़रूर काम लिया है।

तुमने जो लेटे-लेटे झटका लगना लिखा है, मुझे अभ्यास के साल दो साल बाद ऐसे झटके मालूम होते रहे हैं और इसकी वज़ह जब तुमने ख़त में लिखा है, तब समझ में आई। जब तबियत में यक्षुई होती है, तो यह हो जाता है कि ब्रह्माण्ड में, जो विचार कि लोगों ने बनाये हैं, वहाँ तैरते रहते हैं। उनके Touch होने से झटका लग जाता है, और यह भी होता है कि अपना ही ख्याल जो किसी वज़ह से उठ भागा हो, वह भी छूने से झटका लग जाता है। ऐसी हालत में यह भी मालूम होता है कि जैसे हम चौंक पड़े और यह भी वज़ह होती है कि एक सुई में ईश्वरीय-धार का बाज वक्त रेला आ जाता है। चुनांचे यह तुम्हारी हालत जो थी, वह ईश्वरीय-प्रकाश की वजह से और तुम्हें यह मालूम होना कि तुम्हारे बजाय वही प्रकाश है, इसके माने साफ़ ज़ाहिर है कि तुम्हारी हस्ती अब बिल्कुल मिट चुकी है और अब Originality की शुरुआत है। मगर यह हालत असली चीज़ से अभी हजारों गुणा भारी है।

17 सितम्बर के ख़त में जो लिखा है, उसका जबाब यही है कि लय-दर-लय की हालत है। तुमने लिखा है कि अब यह एहसास होता है कि हृदय में ऐसी पीर है कि जिसमें न दर्द है, न व्यथा। इससे यह पता जरूर चलता है कि कोई चीज़ ज़रूर थी, जिसके लिये दर्द और व्यथा थी। अब इसका गुमान ही रहना कि है पीर जरूर-इसके मानें यह होते हैं कि उसका अन्दाज़ आ चुका है, जिसको हासिल करना है। यह जो तुमने लिखा है कि हालत पर कभी अँधेरा आ जाता है और फिर साफ़ भी हो जाता है। ज़ाहिरा माने तो इसके ये हैं, कि वहाँ की कालिमा निकल जाती है। मगर इतने ऊँचे स्थान पर उस कालिमा का इतना Gross-way में एहसास नहीं हो सकता, इसलिये वहां पर यही चीज़ हैं, कि जैसी रूह, वैसे फरिश्ते। अर्थात् जैसे बढ़िया और सूक्ष्म स्थान है, वैसा ही सूक्ष्म वहां की कालिमा। इसलिये यही कहना चाहिये कि जब वहाँ की यात्रा शुरू होती है और फैलाव तो वह अन्दाज़ वहाँ पर विदा होता है जो हमारी सैर में रुकावट डाल रहा था।

एक बात लिखने से रह गई। वह पीर, जिसमें दर्द और व्यथा नहीं, इसकी हालत मुमकिन है आगे यूँ हो (मगर कुछ समय के बाद) कि जैसे कि कभी चोट लगी थी, तो सोचने पर तो उसे यह मालूम होता है कि चीज़ को भूल जाते हैं तो उसके यह माने नहीं होते कि वह चीज़ ख्याल से हट गई। उससे रिश्ता है तो उसके यह माने नहीं होते कि वह चीज़ ख्याल से हट गई। उससे रिश्ता ज़रूर कायम रहता है, मगर बहुत Internal, इसलिए पीर का मौजूद होना चिन्ह इस बात का है कि उसकी Nature अब वैसी ही हो रही है, जिसके लिये कि हमने पीर पैदा की थी।  केसर का खत मिला। उसकी हालत बहुत अच्छी चल रही है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-593
शाहजहाँपुर
28/9/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारा 22 सितम्बर का मिल गया। किताब जिसका नाम “वेदान्त मुक्तावली” है, स्वामी रामेंन्द्र देव जी ने मेरे पास भिजवा दी थी। सम्भव है कि उनकी यह मंशा हो कि वह मुझे यह ज़ाहिर करना चाहते हों, कि उनके यहाँ भी लिखैया मौजूद हैं। तो मैं तो भाई, काबिल आदमियों के सामने हमेंशा कलम टेकने के लिये तैयार हूँ। मुझमें भला क्या काबलियत है और जो कुछ कि लोग समझते भी हों, वह सब ‘उसी’ की काब्लियत है, जिसके दरवाजे पर मैं टिककर बैठ रहा। किताब देहातियों के लिये तो अवश्य अच्छी चीज़ है और कविता भी उसमें है, जो गा-गा कर उनको रिझाया जा सकता है। उसमें एक Chapter तमाखू पीने के ऊपर भी लिखा है, उस पर मैंने सुर्खी का निशान बना दिया। मैं लखनौर गया था तो हुक्का पीने पर मेरे एतराज था और है भी यह चीज़ क़ाबिल एतराज़। एक सतसंघी भाई की राय है कि इससे मुझको ही नसीहत दी गई है, ताकि मैं इसको छोड़ दूँ और इसका उनको हार्दिक धन्यवाद है कि एक बुराई उन्होंने बतला दी।

अब तो उन्होंने अपनी संस्था भी अलहदा कायम कर ली है और नियम भी बना लिये और गुरू तो उनको रंगे हुए कपड़ों ने बना दिया। तुमने देखा कि थोड़ी सी तंग-नज़री ( कहरपन और संकुचित विचार) ने कैसे-कैसे करिश्में दिखा दिये। ईश्वर इस बात से हर एक को बचाये रखे। जहाँ पर हमें अपने ‘लाला जी’ का कौल याद आता है कि कामयाब वही है कि जिसे ईश्वर अपनी तरफ़ खींच ले। जब वह नेत्रहीन हो गये तो मैंने उनकी अंतर दृष्टि खोलने की कोशिश की थी और खोल लाया था, मगर जहाँ पर कि हर हालत का Nucleus ( असल) होता है, वहाँ पर मैं खुद-ब-खुद ठहर गया था, अगर जल्दी कर जाता तो वह टूट गया होता। मैं बड़ा नातजुर्बेकार (Unexperienced) हूँ और तबियत कुछ ऐसी बन जाती है कि फिर इधर-उधर देखने की तबियत ही नहीं चाहती। ईश्वर ऐसी बुद्धि दे कि मुझसे ऐसी त्रुटियाँ न हो। वह करीब के गाँव में दौरा कर रहे हैं, सत्संगी बनाने के लिये। कुछ सत्संगी पुवांया में भी है। 30-34 आदमी तो उनके पास थे ही, सम्भव है, कुछ और हो गये हों। इसमें मेरा कोई हर्ज़ नहीं। बहरहाल वह भी ईश्वर नाम फैला रहे हैं।

अब मैं कुछ थोड़ा बहुत तुम्हारी दशा पर रोशनी फेंकता हूँ। प्रथम इसके कि मैं कुछ लिखूँ, वह चलता जुमला कह देना चाहता हूँ कि हालत लय-दर-लय होती जाती है। ठीहा और ठिकाना का मालूम न होना यह बताता है कि जिस नींव पर कि Structure (इमारत) बनी थी, वह नींव नहीं रही। मतलब यह है कि भक्ति के तेज थपेड़ों ने उसको बर्बाद कर दिया है और अब उसकी जगह विश्वास ने ली है, जिस पर कि वह चीज़ तैयार हो रही है कि कहने के लिये और समझने के लिये हवाई किला कहा जा सकता है। जब यह अटलपना, जिसको विश्वास की उन्नति की (Advanced ) हालत कहते हैं। यह भी घुल जावे, तो फिर समुद्र के किनारे पर पहुँचना कहेंगे। जिन चीज़ों से कि हम उन्नति करते, वही हमारे लिये आधार रेखा होकर sides बना देती है और वह sides यों बनाती हैं, ताकि उसके केन्द्र में ऐसी वस्तु न आ जावे कि जो उसके बने बनाये खेल को बिगाड़ देवे। फिर क्या होता है कि वह अपना काम करने के बाद खुद घुलने लगती है। इसके अर्थ यह है कि वह अच्छी बन्दिशें जो हमारी उन्नति के लिये थीं, वह अपना काम करके विदा होने लगती है।

यह बात जो तुमने लिखी है कि कोई काम कितने ही मन से किया जावे, टटोलने पर यह मालूम होता है कि मानों न कोई इच्छा है, न अनिच्छा। इसका सीधा-सादा मतलब तो यह है कि इच्छायें बहुत कम होते हुए भी अनिच्छाओं का मज़मून है। अब अपने जिले (तालुक Concern) में अगर मैं बयान करूँ तो वह यह है कि मन की हालत बदल चुकी है और उसने अपना वह Covering (पर्दा) उतार दिया है जिससे संसार का ताल्लुक ज़्यादा था और उसमें पहले तो नशा था और अब ख़ुमार की हालत है, जिसमें वह यह खोज करता है कि नशा उतरने पर यह सूक्ष्म गति, जो पैदा हो रही है, इसमें किसकी निस्बत ( ताल्लुक ) है। नहीं, नहीं, तुमने अब ख़ुमार को भी उसके ऊपर से हटा दिया है, इसलिये उसकी गति अब ऐसी मिल रही है कि जो असल वस्तु के निकट है। जब यह बात है, तो फिर उसे तो याद उसी झंझट की रहेगी, जिसमें कि वह अब पड़ा हुआ है। अब उसमें नुक्स क्या है? वह यह, कि वह जिस झंझट में है, उसमें उसको वैसा ही मज़ा आ रहा है, जो उसको उस वक्त आया था, जब दुनियादारी के झंझटों में था। पहले उसको संस्कार का होश था और अब उसे दूसरे संसार (Next World) ( उक़बा ) का होश है और होश होना यों लाज़मी है, ताकि वह हकीकत को, असलियत को ढूँढ सके। तलाश और खोज के माने यही होते हैं कि उसके जी में कोई बात लग चुकी है या कोई सुगन्ध ऐसी आ गई है, जिसके फूल की उसको खोज है।  मैंने इन्हीं चन्द अक्षरों में तुम्हारी सब हालत का जबाब दे दिया, जो कुल पत्र का जबाब है। छोटी-छोटी बातों की व्याख्या नहीं की। कुछ मनुष्य का अजीब तार हो जाता है उस वक्त, जबकि लय- अवस्था जितनी कि मनुष्य को ईश्वर में हो जाती है वह अपने ही आप अपनी दी हुई Faculties से काम करने लगता है। यह एक अजीब बात मैंने बताई है और बात भी क्या, सभी जानते हैं। बस इतनी ही इन्सानियत उसमें बाक़ी रहती है। अगर यह चीज़ भी लय हो जावे तो फिर ज़िन्दगी का उसी वक्त ख़ात्मा हो जावे। यह एक मामूली सी बात अपने बड़प्पन की बता गया। 

तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ। माताजी व चौबेजी को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-598
शाहजहाँपुर
16/11/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 10.11.56 का मिला। तुम्हारी यात्रा अब M1 पर है और तुमने वहीं की हालत लिखी है। इससे पहले स्थान L1 था, उससे आगे का स्थान यह है। तुम चिट्टी में देखकर लिखना कि पिछला स्थान L1 ही था।

तुमने यह जो लिखा है कि दृष्टि अन्तर में कभी जाती नहीं और जबरदस्ती भी मुझसे होती नहीं। एक हिन्दी मसल है कि “नंगी क्या नहायेगी और क्या निचोड़ेगी”। जिस चीज़ में तुम्हें चिपटना था, उसमें चिपक चुकी। अब उसकी तरंग और बाहर मिट मिटकर तुम्हें अनुभूति होती है। तुमने जो तेज अपने सामने होना लिखा है, यह जिस चीज़ में तुम चिपक चुकी हो, उसने यह तीसरी चीज़ पैदा कर दी है, जो शुद्ध है। हर इन्सान में यह चीज़ रहती है, मगर मनुष्य जो बुरे विचारों और दुनियादारी का असर लिये हुए हैं, उनका तेज या अक्स वैसा ही रहता है। एक बात तुम्हें नई बताता हूँ, जब मनुष्य की Changeless Condition हो जाती है, तो फिर इस अक्स का पसारा कुल Universe में हो जाता है। जी का न ऊबने के माने यह है कि अब जी, जी ही नहीं रहा।

तुम्हारा यह खत संक्षेप में जवाब दिया है। छोटों को दुआ। चौबेजी को प्रणाम। 

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-603
शाहजहाँपुर
4/12/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र सबके सब मिल गये। लिख़ैया न होने की वजह से जबाब न दे सका। अब कुल खतों का जबाब यह है-“गुड़ से मीठे हैं भगवान, बाहर-भीतर एक समान"। जब असलियत और हक़ीकत से हम सम्बन्धित हो जाते हैं और उसमें घुस पड़ते हैं, तो यह बाहर और भीतर के Vision में कोई अन्तर महसूस नहीं होता।

केसर से कह देना कि वह जो कुछ मिशन को बढ़ाने के लिये कर रही है, करती रहे, मगर जब तक मैं South India में रहूँ, उसे यह ख्याल रखना चाहिये कि वहाँ के लोग मिशन से खूब Attract हो रहे हैं और तुम तो करोगी ही। मैं 10 दिसम्बर की रात को जाकर तिरूपति 14 को पहुँचूँगा और तीन दिन बाद मद्रास। वहाँ से लिखने की कोशिश करूंगा।

तुम्हारे 17 रूपये पहुँच गये, उसमें से 15 रूपये भेजने की जरूरत नहीं थी, इसलिये कि तुम्हारे पास भी कुछ रहना चाहिये।

चौबेजी और अम्मा को प्रणाम और तुम भाई-बहिनों को दुआ। 

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-613
शाहजहाँपुर
6/3/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र दिनांक 24 व 25 फरवरी 57 के मिल गये और जज साहब का पत्र भी मिला। इसमें कोई परेशानी की बात नहीं, जरूरत इस बात की है कि लोग अच्छे बनें। अगर एक भी मुझ जैसा बन जाता है, तो फिर हमारा Mission Complete है, मगर अभी तक ऐसा कोई नहीं बना कि उस झोंक को सहन कर सके, जो 22 वर्ष की मेहनत के बाद मुझे प्राप्त हुई है। अच्छे लोग मिशन में अवश्य हैं, और सबमें रोशनी मौजूद है। यह तो बड़ा अच्छा तरीका है कि सिखाने वाले की शक्ल को देखते रहें। मैंने इसको बहुत किया है जब मैं अपने गुरू महाराज के पास जाता था और उनके सन्मुख होता था, तो उन्हीं की शक्ल देखता रहता था। यह तो मैंने कह दिया था कि तुम्हारी पहुँच Point N1 पर है, मगर अभी उस Point पर मैं अधिक ध्यान न दे सका। असर उसका अवश्य है, मगर उसका Working अभी शुरू नहीं हुआ है।

मनुष्य जब सब कुछ खो बैठता है, तब उसे वास्तविक जीवन प्राप्त होता है। असल में सब कुछ खोना ही है और तुम खोती चली जाती हो। मुझे अपना एक वाक्य याद है कि जब मैं तिरूपति से चला और रेनीगुन्टा पहुँच कर मद्रास के लिये गाड़ी बदली तो वहाँ पर Dr. K.C. Vardhachari के कुछ Disciples मिले, जिनको वह आध्यात्मिक पाठ हर 15वें दिन बतौर Lecture के देते हैं। मैंने भी चलते समय एक थोड़ा सा सबक दिया था कि :- “Liquidate Yourself”. तुम ऐसा खुद-ब-खुद करती चली जा रही हो। जैसा कि तुमने अपने पत्र में लिखा है कि जब तुम्हें यह मालूम होता है कि मैं तुम्हारी याद कर रहा हूँ तो खुशी की लहर दौड़ कर फिर ज्यों की त्यों रह जाती हूँ और यह समझ में नहीं आता कि कौन कस्तूरी है। इसके अर्थ यह है कि तुम्हें अपनी खबर क्या बल्कि याद भी भूल गई और इसे बहुत उत्तम प्रकार की लय- अवस्था कहते हैं। एक वाक्य तुमने अपने पत्र में इतना अच्छा लिखा है कि- “मैं अपने स्नेह की डोर से आपको बाँधते- बाँधते स्वयं खो गई”। इसके अर्थ ये हैं कि भक्ति की लड़ी जो जुड़ी थी, उसने अपना आवरण उतार दिया। हमें भक्ति से ही चलना चाहिये और जब उसका आवरण उतर जाता है तो फिर वही ज्ञान है और जब उसकी कुरेद समाप्त हो जाये तो वहीं Reality है। जब भक्ति का आवरण उतर जाता है और ज्ञान की अवस्था आ जाती है, फिर उसमें जो भूल आरम्भ होती है, अर्थात् जब उसका अनुमान जाता रहता है, तब Divine Wisdom का प्रारम्भ है। ज्ञान का प्रभाव जाते ही, विज्ञान का पर्दा, जिसे विज्ञानमयी कोष कह लो, टूटने लगता है। अपनी समझ और अपनी बुद्धि ईश्वरीय होने लगती है। अब विज्ञान का भी पर्दा टूट गया तो फिर क्या ? Divine Wisdom भी अपने भाग को असल भण्डार में लय करना आरम्भ कर देती है। कहीं ऐसा हो गया, तो फिर यहाँ के पहुँचे हुए अभ्यासी के कहने में Automatic Divine Wisdom ही छलकती है, मगर इस नई लड़ी को अभी समाप्त होनी नहीं कहना चाहिये। इसका गुम होना तो तब है, जब कि नस-नस में वही असर पैदा हो जाये, जो असल में है। 

कल 5 फरवरी को रात्रि में मैंने एक स्वप्न देखा कि मैं कुछ सत्संगियों को Sitting दे रहा हूँ। वहां पर क्या देखा कि जहाँ सत्संगी तवज्जोह ले रहे हैं, वहाँ पर से आसमान इतना नज़दीक है कि हाथ से छू सके और आसमान पर सितारे अपनी चमक ऐसे दे रहे हैं कि उसकी रोशनी जो कि Dim इतनी है कि अब भी दिल उसको देखना चाहता है। इस स्वप्न की तावीर (Interpretation) जाने क्या है। स्वप्न अवश्य अच्छा है।

चौबेजी और अम्मा को प्रणाम तथा तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-618
शाहजहाँपुर
3/4/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र कई प्राप्त हुए, पर उत्तर इस कारण से न दे सका कि समझ में नहीं आया कि इन बारीक हालतों के कारण बताने में शब्दों का जामा (आवरण) कैसे पहिनाया जावे। मगर फिर सोचा है कि कुछ लिख ही दो। जब लिखने बैठा तो यही आया कि लय-अवस्था और फिर उसकी लय-अवस्था इसका छोर अभी दूर तक चला जावेगा। हमने जितनी बातें अपने में पैदा कर ली है, उन सबको उन्हीं में सिमट जाना है कि जो उसके कारण हैं। किसी ने लिखा है कि संसार नहीं है, बल्कि अपने विचार उसको प्रगट किये हुए हैं। लिखने वाले की यह दिमागी पहुँच थी, मगर बात यह है कि जब हम अपने एक परिवार सहित असल में आ जाते हैं, तो वही असल एक वस्तु भासने लगती है। जब हम अनेक थे, तब हमारे सामने अनेकपन था और जब हम एक हो गये तो वह एक चीज़ सबमें भासने लगी और जब यह बात भी न रही कि एकता का भाव या अनेकता का भाव, फिर सामने अब कुछ नहीं दिखाई देता। मगर यहाँ अभी अन्त नहीं है। यही तुमने लिखा है कि पहले सब कुछ मुझे छाया मात्र ही दिखाई पड़ते थे, अब न छाया है, न कुछ। इस हालत में अगर बोलता है तो वही बोलता है, जिसको बोलना है। बस इसी हाल को तुमने अपने पत्र में तरह तरह से लिखा है।

चौबेजी तथा अम्मा को प्रणाम तथा तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-621
शाहजहाँपुर
10/4/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र 3 तथा 6 अप्रैल सन् 1957 के प्राप्त हुए। दोनों का एक साथ उत्तर दे रहा हूँ। अब तुममें तो Energy तन्दुरुस्ती बढ़ाने वाली आरम्भ हो गई होगी। तुमने अपने 3.4.57 वाले पत्र में लिखा है कि “मुझे अपने में पवित्रता का भी कुछ आभास नहीं मिलता”। उसका आभास तो तब होता है, जब अपवित्रता हो। बिना Comparison के किसी वस्तु की वास्तविकता का पता नहीं चलता। ईश्वर की थाह इसीलिए नहीं मिलती कि उसको Compare करने के लिये उसके अनुसार कोई वस्तु नहीं मिलती। दशा में तो परिवर्तन होता ही चला जाता है, परन्तु इतना सूक्ष्म है कि पता नहीं चलता। जहाँ पर कि Changeless दशा है, वह तो मनुष्य के पहुँचने का अन्त है। बिना दर्द के पीर, यह पीर का वास्तविक Nature है। जब मनुष्य पानी की खोज में रेगिस्तान में चलते-चलते दूर पहुँच जाता है और पानी की बेकली उसके विचारों को चकनाचूर कर देती है, तो फिर बेकली भी रहते-रहते एक शान्ति (चैन) की दशा मज़बूरी में कर देती है। मगर पानी की वास्तविक तृप्ति नहीं होती। उसके परिश्रम से कहीं पानी बरसने लगता है, जो कि समुद्र ही से, जिसका कि नदी एक छोटा भाग है, तो फिर जिस पानी की उसे खोज थी और जिस आवश्यकता के लिये थी, वह पूरी हो जाती है और कहीं पानी इतना बरसा कि तालाब भर गया तो नदी व समुद्र की ओर बहुत समय तक ख्याल नहीं जाता। अब ‘उसके’ लिये मिलन की इच्छा तो यूँ कम हुई, क्योंकि वस्तु मौजूद है और विछोह यूँ नहीं कि चीज़ Narrow रूप में मौजूद है। मगर Reservoir उस समय मिलेगा, जबकि इस तालाब का पानी पीकर खर्च कर दो। इसलिये कि फिर उसकी तलाश पैदा हो जावेगी। मैंने विछोह तथा मिलन की हालत जो तुम्हारे पत्र में दी हुई है, यूँ समझाया है। समुद्र अभी बहुत दूर है, इतना कि जहाँ पर तुम हो, वहाँ पर देखने से भी अभी नज़र नहीं आता, मगर यह समुद्र के निकट पहुँचने के चिन्ह अवश्य हैं।

यदि तुम अपने आप को ऋणी समझती हो तो मुझ पर तुम्हारा यह एहसान है कि तुमने वह अमानत (Security) जो तुम लोगों के लिये ही मेरे पास रखी है, उसको लेना आरम्भ कर दिया है और मैं इसलिये उत्तर देने से बच जाऊंगा कि जिन लोगों के लिये यह अमानत जमा थी, उसको बांटा क्यों नहीं।

6 अप्रैल के खत में जो तुमने लिखा है कि “जानूँ तो क्या जानूँ, और न जानूँ तो क्या न जानूँ”। इसके तात्पर्य यह है कि कामनायें (Desires) नहीं रही है। सिर में कुछ Matter पता न चलने के अर्थ यह है कि झीने Matter से भी सम्बन्ध हट गया है और सम्भव है कि अव्यक्त गति निकट हो। जब सूक्ष्मता में लय-अवस्था उत्पन्न होने लगती है तो बाहरी संसार का आवरण हट जाता है, इसलिये बाहर, भीतर एक ही सा प्रतीत होने लगता है। यह गति बहुत अच्छी है, मगर रहना किसी गति में नहीं है और सिर का ढीलापन मालूम होना यह शारीरिक दुर्बलता का कारण है।

अम्मा तथा चौबेजी को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों एवं बहू को शुभ आशीर्वाद !

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-624
शाहजहाँपुर
19/4/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा एक पत्र 14.4.57 का तथा एक 15.4.57 का प्राप्त हुआ। 19 अप्रैल को मेरे जीवन का नया वर्ष आरम्भ हो गया। तुम सब लोगों ने कुछ न कुछ खुशी मनाई और मुझे कुछ यह खेद होना चाहिये कि हमारी गिरह से एक साल निकल गया। आज के दिन के लिये, जैसा तुमने कहा था, वैसा मैंने कर दिया सब लोगों ने ‘मालिक’ के फ़ैज से फ़ायदा उठाया होगा।

पिछले पत्र में तुम्हारी हालत व्यक्त करने के लिये रूपक दशा, अर्थात् (Metopharical Language) में लिख दिया था और कोई ढंग इसको समझाने का नहीं मिला। चलना और न चलना, समान मालूम होना, इस बात का प्रमाण है कि तुम अपने आप को बिल्कुल भुला चुकी हो और उसके बाद जो चीज़ रह जाती है, वह भी लय होती चली जा रही है। यह तुमने ठीक ही लिखा है कि खेमा (तम्बू) जहाँ पर कि तुम्हें वर्तमान स्थान से जाना है, वहाँ गड़ा मिलता है। हमारे ‘लालाजी’ की शिक्षा कुछ ऐसी ही है कि जिस स्थान पर अभ्यासी को पहुँचना चाहिये, वहाँ के जौहर का बीज पहली ही Sitting में आरम्भ हो जाता है। अब जो लोग इस बीज को अपना लेते हैं, वह फिर चलते ही चले जाते हैं। समुद्र का आनन्द तो कुछ ने कुछ, अगर एहसास तेज है तो, पहले ही दिन से आना आरम्भ हो जाता है।

तुमने एक बात अपने पत्र में लिखी है कि किसी के मरने-जीने की बात एक ही सी प्रतीत होती है। इसके यह अर्थ है कि तुम्हें जीवन और मृत्यु से कुछ सम्बन्ध नहीं रह गया है। दोनों सम्बन्ध टूट गये हैं और यह जीवन-मोक्ष-अवस्था, जो कि तुममें बहुत पहले आ चुकी है, उसके प्रमाण में यह वाक्य भी है- “यदि कहीं मृत्यु की भी मृत्यु हो जावे तो, उसमें जो जीवन उत्पन्न होता है, वह जीवन उस हालत को बता देगा और पता देगा कि हम किसकी खोज में हैं”। मगर अभी चलना और रहेगा।

अब जो तुम्हारा 15 अप्रैल का पत्र है, तथा उसमें जो स्वप्न देखा है, वह बड़ा अच्छा है। उसके अर्थ ये हैं कि अब वास्तविक जीवन का प्रारम्भ हो गया है। हमने तो जब से अभ्यास आरम्भ किया, बराबर मोक्ष आत्माओं को स्वप्न में देखते रहे। चिरकाल तक ऐसा हुआ है कि कम से कम सप्ताह में दो बार ऐसे स्वप्न आते रहे और यह भी हुआ कि ऐसा फ़ैज मिला है कि जिसका सहन करना मनुष्य के लिये सम्भव नहीं है। अब यह ‘लालाजी’ की तारीफ़ है कि जो सहने से अधिक होता था, वह उस समय मालूम होता था कि ‘उन्होंने’ ले लिया। जब Initiation की बारी आई तो कई महात्माओं ने स्वप्न में मुझे Initiate किया। जब हम Initiation के लिए सहमत नहीं होते थे तो वहाँ पर हमारी तबियत ऐसी बना दी जाती थी। यह बातें उसको पेश अधिक आती हैं, जिसको ‘मालिक’ से प्रेम बहुत बढ़ जाता है। इस प्रकार की बातें अभी तक और सत्संगियों से मुझे नहीं मिली है।

तुम्हारी N1 की यात्रा पूरी हो चुकी है, अब O1 का स्थान आवेगा। मगर तुम्हारा स्वास्थ्य जरा और ठीक हो जावे। Dr.K.C.Vardhachari के बहुत प्रेम पूर्ण पत्र आते हैं और वह ईश्वर की कृपा से अच्छी उन्नति कर रहे हैं।

चौबेजी व अम्मा को प्रणाम तथा तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ। 

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-629
शाहजहाँपुर
27/5/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे कई पत्र मिले। सोचता रहा कि जवाब क्या दूँ, इसलिये कि तुम्हें भी अब हालत लिख नहीं मिलती और हमें भी अब जबाब दे नहीं मिलता। मैं चाहता तो यह हूँ कि जब तक जबाब निकल सके देता रहूँ। अब मुझे याद नहीं, तुमने ख़तों में क्या लिखा। अन्दाज़ ज़रूर है कि तुमने वीराने की हवा खाई है और वही वीरानापन पत्रों में व्यक्त किया है। अब वीराने की तह को अगर हम देखें तो कोई चीज़ ऐसी जरूर मिलेगी, जिसका असर ख्याल में मौजूद है। यह जिसको तुम ठीक नहीं लिख सकी O1 की हालत है। यहाँ की हालत ऐसी है जैसे किसी के यहाँ मौत हो गई हो और रौनक इस वज़ह से चली गई हो। मगर हमें जरूरत है कि इस वीराने की भी मौत हो जावे। अभी तो सिर्फ वह यह बता रहा है कि किसी की मृत्यु हुई है, परन्तु वीराने की स्वयं मृत्यु नहीं हुई, इसका इन्तज़ार करना चाहिये और इसमें समय लगेगा। असल में यह हमारी हालत है, जो इतने दिन चलने के बाद व्यक्त हुई है। वीराने की मौत हो जाने के यही माने है कि हम स्वयं उस हालत पर चले जायें। वैसे तो मरने के बाद भी कुछ न कुछ रह ही जाता है, इसलिये इस रह जाने वाली चीज़ की मृत्यु की जरूरत है। मगर जहाँ तक मृत्यु होगी, कोई न कोई सूरत उसकी रहेगी। जब ये सब सूरतें खत्म हो जायें तब भूमा से निस्बत ( सम्बन्ध ) होने की उम्मीद है।

तुम्हारे भाई-बहिनों को आशीर्वाद व अम्मा को प्रणाम !

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-633
शाहजहाँपुर
4/7/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभ आशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र मिला। ‘मालिक’ का धन्यवाद है कि तुम सब लोग अच्छे हो रहे हो। तुम्हारी हालत के बारे में यह लिखता हूँ कि-

“नानक शून्य समाधि में, नहीं साँझ नहीं भोर”।

तुम्हारे भाई-बहिनों को आशीर्वाद और चौबेजी और अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-635
शाहजहाँपुर
16/7/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र दिनांक 12.7.57 को हस्तगत हुआ और केसर का भी पत्र मिल गया। यहाँ से इसमें सन्देह नहीं कि चौबेजी अपनी आत्मिक उन्नति चाहते हैं, मगर कुछ स्वभाव ऐसा बन गया है कि अपने जिस्म को आराम हर प्रकार से देना चाहते हैं और अभ्यास जो करते हैं, उससे उनके दिल का लगाव बिल्कुल नहीं होता है, जिसका कारण मोहब्बत की कमी कहा जा सकती है। अलावा इसके कुछ आदत ऐसी बन गई है कि वह ईश्वर-प्राप्ति तो अवश्य चाहते हैं, मगर ईश्वर से कुछ मतलब नहीं रखते, इस कारण से बहुत से नुख्स पैदा हो गये। अभी तक उन्होंने किसी को न अपना बनाया और न किसी के हो रहे। दोनों में से एक काम भी नहीं किया है। इस बात पर अगर वह खुद विचार करें और थोड़ा सा आराम में खलल डालें और लगाव बढ़ायें, तभी जीवन अच्छा सुधर सकता है। यहाँ तक हमें आध्यात्मिक इतिहास बताता है कि लोगों ने ईश्वर प्राप्ति के लिये कितनी- कितनी Sacrifices की हैं, तब कहीं ईश्वर तक पहुँचे और वह भी एक जीवन में नहीं, जाने कितने जीवन लगे होंगे और मैं तो कोई Sacrifice भी नहीं बताता, बस इतना कहता हूँ कि अपनी तबियत उस तरफ ऐसी करें जो हटाये से भी न हटे।

अब तुम्हारी हालत बताता हूँ। यह ठीक है कि O1 की सैर तुम्हारी समाप्त हो चुकी। यह तुम्हें जो सन्नाटा छाया हुआ मालूम होता है, यह उस जगह की सफ़ाई है। यह सन्नाटा जो है, यह एक शक्ति है, जो दूसरे के लाभ के लिये प्रयोग की जा सकती है और किसी जगह को वीरान बना देने में भी प्रयोग हो सकती है। परन्तु इसका प्रयोग नहीं करते, जब तक कि ईश्वरीय-हुक्म इस कार्य के लिये न हो गया हो। यह जो तुमने लिखा है कि “बैठे-बैठे तुम झूमने लगती हो”। इसको Soul का नृत्य कहा है। अगर और गहरे जाओ और इसको प्राकृतिक तरीके में देखो तो इसमें कुछ अर्थ और निकल सकते हैं। जब आत्मा ही आत्मा थी और सृष्टि के पैदा होने का समय आया, तो वह हलचल जो हुई या क्षोभ कह लो, यह नृत्य उसी तरह का है।

केसर का पत्र आया। उसने लिखा है कि “कहीं भी देखती हूँ, परन्तु क्या देखती हूँ, कुछ समझ नहीं पाती” इसके अर्थ यह है कि हृदय बाहरी चीज़ का Impression नहीं लेता और इसलिये संस्कार नहीं बन रहे हैं। बाकी दिल का घुलना और Soul का घुलना जो उसने लिखा है, इसके यह अर्थ हैं कि जिस्म का मान हल्के-हल्के जा रहा है।

अम्मा तथा चौबेजी को प्रणाम।
शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-640
शाहजहाँपुर
31/8/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 26 अगस्त सन् 57 का लिखा हुआ प्राप्त हुआ। तुम्हारा आध्यात्मिक हाल पढ़कर मैं गद्गद् हो गया। पूजा तो होना अब असम्भव सा है और है तो यह भी बन्धन, मगर इस बन्धन के बिना बँधे हुए छुटकारा भी नहीं होता। तुमने अपने शरीर को जो कण-कण बिखरे हुए देखे हैं, इसका मतलब यह है कि परमाणु जिससे तुम बनी हुई हो और Activity पैदा कर रहे हैं, उन्होंने अपना काम छोड़ दिया है और ऐसा होने के बाद एक Natural दशा, जो बड़ी ऊँची हालत है, आ गई है। यहाँ तो लोग जीवन-मोक्ष-दशा को सब कुछ समझ बैठे हैं और इससे आगे वह और कुछ नहीं समझते। उनके कान में जोर से कहकर पूछो कि यह क्या हालत है ? अब उसमें ईश्वरीय प्रभाव का एहसास होना, यह अर्थ रखता है कि परमाणु ने अपनी Basic (मौलिक) हालत ले ली है, मगर उनमें कुछ भारीपन जरूर है। मगर उसको तौलने में बाट जवाब दे देंगे। अब मेरे जिस्म के परमाणु उस जगह प्रवेश होना यह मतलब रखता है कि यह नमक उन परमाणुओं को भी नमक बना देंगे और Weight और वज़न जो कुछ कि बाकी है, उसको हटाने में सहायक होंगे।

अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-641
शाहजहाँपुर
2/9/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

मैं एक पत्र भेज चुका हूँ- मिल गया होगा। इलाज तो तुम्हारा शुरू हो गया होगा और ईश्वर करे जल्द फ़ायदा होकर तुम्हे सेहत हो। मैं सितम्बर के दूसरे हफ्ते में देहली जाऊँगा, मगर अभी कोई ज्यादा ठीक नहीं है।  अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-642
शाहजहाँपुर
4/9/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र आया। मैं दो पत्र डाल चुका हूँ, मिल गये होंगे। तुम्हें इस वक्त अपनी बीमारी को दूर करने और तन्दुरूस्ती के बढ़ाने का ही ख्याल रखना चाहिये और इस सबको पूजा समझो, क्योंकि जिस्म को ठीक रखना भी हमारा धर्म है, ताकि ईश्वर की याद कर सको और दूसरों की सेवा।

तुमने लिखा है कि आगे जाने के लिये जी हुटहुटाता है, यह ठीक है, मगर तुमने यह गौर नहीं किया कि कुल हालतें, जो अब तक आई हैं, उनका फैलाव हो रहा है। यह भी ईश्वर का एक Boon है।

मैं देहली जाना चाहता तो जरूर हूँ और मैं कोशिश भी कर रहा हूँ, मगर घर की उलझनें जाने नहीं देती। बहुत से जरूरी काम पेट पालने के, इस समय दरपेश है।

अम्मा को प्रणाम !

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-644
शाहजहाँपुर
15/9/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारा 5 सितम्बर का मिल गया। तुमने लिखा है कि ऐसा मालूम होता है कि चलते हुए, चलने का अन्दाज़ मालूम नहीं होता, इससे यह मालूम होता है कि तुम चलते-चलते चाल भूल गई, अर्थात् कार्य के Impressions कहीं पर नहीं बनते। हमने किसी खत में लिखा भी है और फिर लिखता हूँ, ब्रह्म की परिभाषा है-

“बिन पग चलै, सुनै बिन काना ।
कर बिन कर्म, करै विधि नाना ॥”

यह जिसको तुमने होश पैदा होना लिखा है। यह मरने के बाद जो ज़िन्दगी पैदा होती है, वह वही ज़िन्दगी है। गँवारू शब्दों में:-

“चौबेजी की कस्तूरी तो मर चुकी है, अब उसकी कस्तूरी है, जिसकी सब जगह महक़ फैली हुई है।”

तुमने यह जो लिखा है कि दुनिया में जो कुछ किसी के पास है, वह सब आप का ही दिया हुआ है। यदि कहीं ऐसी अनुभूति हो तो, कि तुम्हारे पास जो कुछ है, वह सब इन्हीं लोगों का दिया हुआ है, तो बहुत ही अच्छा है।

अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-647
शाहजहाँपुर
22/9/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

पत्र तुम्हारा 11 सितम्बर का लिखा हुआ मिला और दूसरा 15 सितम्बर का, मेरा एक ख़त पिछले पत्र के जबाब में पहुँच चुका होगा।

जब अभ्यासी बहुत ऊँचे शिखर पर पहुँच जाता है, तो फिर एक किस्म की, बिला आवाज़ की गूँज पैदा हो जाती है और फिर उसका रेला नीचे की तरफ़ उतरना शुरू हो जाता है। मैं इस हालत को जानता था, मगर समझ में नहीं आता था, कि यह कैसे होता है। अब तुमसे यह बात तजुरबे में आ चुकी और मैं इसका Observation अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए कर रहा हूँ।

कबीर साहब ने लिखा है कि- “यह सब जानते हैं कि सिन्धु में बूँद समा जाता है, मगर यह कोई विरला ही जानता है कि बूँद में भी सिन्धु समा सकता है”। फलत: तुमने लिखा भी है कि कुल रूप सफ़ेद पत्थर की भाँति हो गया है। यह उस चीज़ का रेला है, जो Infinite है। नाभि में जो चीज़ तुम्हें खुलती हुई मालूम होती है, इससे यह मतलब है कि दो-तीन चक्र नीचे के हैं, और यह हमारे यहाँ बाद में लिये जाते हैं, एक-एक करके खुलना चाहते हैं। इसमें Miracles ( सिद्धि-शक्ति) भी रहते हैं। इसलिये इनको उस वक्त लिया जाता है, जबकि Miracles पर हमारा ध्यान नहीं जाता। यह तुम्हारा अनुभव सही है और इसका मुझे भी अनुभव रहा है।

जो Vibration तुम्हारे दिल में आ रहा है, यह मेरी तरफ से है। तुमने जो स्वप्न देखा है, वह बूँद में सिन्धु की हालत साबित करता है। आखिर में जो हाथ आये, वही ठीक थे, जिनसे तुम्हारा कल्याण होगा।

तुम अब किस स्थान पर हो लिख देना, मैं भूल गया। मैंने धर्म की Definition कहीं लिखी है, अगर याद हो तो लिख देना।

अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-650
शाहजहाँपुर
1/10/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र 27 व 28 सितम्बर के मिल गये। स्वामीजी से तुम्हारी भेंट हुई, अच्छा हुआ। मगर भाई, मेरे पास उनका आना बड़ा मुश्किल है और अगर आ भी कहीं इत्तफ़ाक से गये तो, मेरे बारे में जानें क्या राय कायम करेंगे। इसलिये कि यहाँ कोई हालत ही नहीं रही। तवज्जोह (Transmission) से हर आदमी ख़ुश नहीं होता, इसलिये कि उसमें भी तरी नहीं है। जब Surrender अच्छा हो जाता है, ऐसा कि उसको पता नहीं चलता, तो गति कठपुतली की ही हो जाती है। Surrender क्या है? ‘मालिक’ की हालत की नकल, जो असल हो जाती है और फिर Density से ताल्लुक ही नहीं रहता अर्थात् हम अपनी अंतिम दशा में आ जाते हैं। इसलिये गीता में कृष्णजी ने इसकी बड़ी महिमा कही है। रेला उतरना, यह चीज़ मैंने तुमसे ऐसी सीखी कि मुझे अब इस हालत का पैदा कराना मालूम हो गया। मैं इसको सोचता रहता था, मगर समझ में नहीं आता था। अब, जब कि सामने हुआ, तब सब पता चल गया। इसके लिये अगर बिन्दु में सिन्धु का समाना कह लिया जाय तो यह मतलब अच्छा समझा सकेगा। मगर इस हालत को बिन्दु में सिन्धु का समाना तो कह ही दिया गया है, मगर जब वह Limitation टूट जाये कि बिन्दु हमारे समझ में न आवे कि हम थे और रेला आते-आते ऐसी हालत पैदा हो जावे कि सब एक ही धरातल Surface बन जावे और फिर उसमें भी शर्त यह है कि रेला, जो चीज़ अपने साथ लाई हैं, उसका भी पता न रहे, फिर क्या हो जाये, उसके लिये शब्द नहीं मिलते। शायद इस तरह से व्यक्त हो सके, कि न रेला रहा, न समुद्र, न बूँद, यानी इन शब्दों से वह चीज़ जो Express होती थी, वह न रह जाये। अब उसको क्या कहें? Negation कह लो। अब तो यहाँ पर कुछ कह नहीं मिलता। नहीं-नहीं करते चले जाओ, फिर भी यह ‘नहीं’ ख़त्म नहीं होती और ‘है’ और ‘है’ पीछा भी नहीं छोड़ता।

अम्मा को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-652
शाहजहाँपुर
27/10/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र दिनांक 14.10.57 का मिल गया। खत के जबाब में अब की बहुत देर हो गई। ता. 5.12.57 को दक्षिण भारत जाना तय हुआ है। तुमने कोई ख़त इधर नहीं भेजा, इसलिये हर रोज़ तुम्हारी तन्दुरूस्ती की फ़िक्र रहती है, जल्दी जवाब देना।

मैंने किसी ख़त में लिखा था, जिसका मतलब यह था कि ऊपर से जो चीज़ उतर रही है, उसका फैलाव नीचे तक हो रहा है। अब एकसार हालत पैदा हो चुकी है और बहुत धीमापन है, जिसके माने यह है कि जिस स्थान की जो हालत कि तुममें है, यानि O1 की, वह करीब-करीब सब एकसार हो गई है। तुम्हें अपना घर और दूसरों के घर एक समान प्रतीत होते है, इसका मतलब है कि ग़ैरियत का भाव तुम्हारे दिल से जा चुका है और सब अपने प्रतीत होते हैं। अब इसके बाद ईश्वर ने चाहा कि कोई भी भाव मन में न रहे, यह Reality की दशा है।

तुमने जो न होश, न बेहोश वाली दशा लिखी है, यह तुम्हारी हालत है। मेरी भी यह हालत है कि जब पैर कहीं नीची-ऊंची ज़मीन पर पड़ जाता है और गिरते-गिरते बचता हूँ तो मुझे यह ख़्याल होता है कि मैं बेहोश था। जब मन की वृत्ति अपने असल में, जितना होना चाहिये, लय हो जाती है, तो यह हालत पैदा होने लगती है। पूरी तौर से अगर मन अपने असल में लय हो जावे तो ज़िन्दगी ख़त्म हो जावे, इसलिये मैं समझता हूँ कि इतना होश ज़रूरी है।

अम्मा को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-654
शाहजहाँपुर
5/11/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारा 28 अक्टूबर का लिखा हुआ मिल गया। अबकी श्री राघवेन्द्र राव गुलबर्गा में Annual Day of Branch बड़े Scale पर मना रहे हैं। दक्षिण भारत में आग सुलगना तो शुरू हो गया है। लोग कम ज़रूर आ रहे हैं। वहाँ पर मुझे कम से कम हर साल तीन महीने रहने की जरूरत है। ता. 5 दिसम्बर को मैं South India चला जाऊँगा। मुझको त्रिचनापल्ली का Center जिसमें M.K.Ganesan काम कर रहा था, बन्द कर देना पड़ा।

अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-657
शाहजहाँपुर
9/11/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र आया। अब इस समय लिखना यही है कि जियो और तन्दुरूस्त रहो। मैंने अम्मा से प्रार्थना की है कि वे तुमको वहीं छोड़ देवें और जब तक डाक्टर साहब न कहें, वहीं रहने दें। अगर उत्सव में भी वह वहाँ रखना इलाज के लिये जरूरी समझें तो मैं यही कहूँगा कि तुम्हें उत्सव में भी नहीं आना चाहिये।

अम्मा को प्रणाम !

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-668
शाहजहाँपुर
12/3/1958
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारी आध्यात्मिक हालत तो अच्छी ही है, फिक्र तन्दुरूस्ती की है। ईश्वर करे तुम तन्दुरूस्त हो जाओ, जो मिशन का काम कर सको। जब अभ्यासी उन्नति करते-करते ऐसे स्थान पर पहुँच जाता है, जहाँ पर कि ईश्वरीय दिमाग जिसको Super Mind कहते हैं, का असर आने लगता है, तो फिर शून्य की अनुभूति होती है। जब उसमें घुल-मिलकर एक हो जाता है, तब उसको उससे सूक्ष्म गति की खबर मिलती है। यहाँ तक कि इतनी हल्की हालत हो जाती है कि जिसको अगर शब्दों में वर्णन किया जाये तो यही कहा जा सकता है कि यहाँ पर Lamp या चिराग़ कभी जला था और उसकी रोशनी थी, अर्थात् बस यह गुमान (ख्याल) ही होता है कि रोशनी का कुछ असर बेअसर हो आने के बाद जो होता है, उसकी अनुभूति होती है, और साफ़ अगर किया जाये तो उसकी सूरत ऐसी मालूम होती है, जैसे टिमटिमाते हुए प्रात:काल का दीपक यानी इन्सान के मन पर जो शक (Doubt) का असर होता है, बस वही असर मालूम होता है। चक्र तो अपना करिश्मा दिखाकर और उन्नति देकर अपना काम खतम कर देते हैं फिर Centre रह जाते हैं, जो Nature का भेद बताते हैं।

दराज सहस्त्र-दल कमल पर पाँच उँगलियों का न मालूम होना यह बताता है कि हमारी सहायता सूक्ष्म मात्र ही रह गई है। यह काम Nature ने बहुत कुछ ले लिया है। जब अभ्यासी में लय- अवस्था सूक्ष्म गति में हो जाती है, तब भीतर-बाहर खामोशी ( Silence) सी छाई रहती है।

जब हर चीज़ की अनुभूति चली जावे, जब भाव अभाव हो जावे, तब यह समझना चाहिये कि असलियत या Reality में पैराव आरम्भ हुआ है। फिर और कुछ भी है, वह यह कि वहाँ के सब परमाणु भी घुल जाये और अपनी असलियत खो बैठे। तुम्हें अपनी इच्छा-शक्ति बैठे- बैठे न सही, लेटे ही लेटे सही, इस बात पर लगाना चाहिये कि तुम्हारी सब बीमारियाँ दूर हो रही हैं और तुम तन्दुरुस्त हो रही हो। तुमने कभी अपनी शक्ति का अनुभव नहीं किया। तुममे वह शक्ति है कि अगर पूरी शक्ति से पत्थर पर जमा दिया जावे तो टुकड़े-टुकड़े हो जायें। पहाड़ और ज़मीन हिलने लगेगी, बीमारी क्या चीज़ है।

अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-671
शाहजहाँपुर
17/3/1958
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारे सब मिल गये। तुमने अपनी तन्दुरुस्ती अच्छी लिखी, इसलिये खुशी में तुमको P1 के स्थान पर रात डाल दिया। अब वहाँ की सैर शुरू होगी। ब्रह्म-विद्या की दशा को अगर मनहूसियत कह दिया जाये, तो जैसे जिन्दा को मुर्दा कह लेते हैं, सबसे अच्छा Description है और आगे चलकर यही दशा रहकर फिर विदा हो जाती है। कण-कण का निचोड़ देना, जो तुमने लिखा है, वह ठीक है और इसके अर्थ यह हैं कि दुनिया की तरी अब तुमसे विदा हो गई है और हो रही है। तुमने जो दीपक बुझा हुआ की मिसाल दी है, तो दीपक बुझा हुआ नहीं है, बल्कि उसमें असल रोशनी पैदा हो गई है अर्थात् वह रोशनी या शक्ति जिसमें तमाम दीपक जल सकते हैं। एक बात यह है कि तुम्हारे घर में भी तुमसे रोशनी फैली है।

तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ। चौबेजी को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-674
शाहजहाँपुर
7/4/1958
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभ आशीर्वाद।

तुम्हारा एक पत्र दिनांक 31 मार्च सन् 1958 और एक पोस्टकार्ड दिनांक 3 अप्रैल 1958 का मिला। मैंने तुम्हारा पोस्टकार्ड मिलते ही तुम्हें तवज्जोह दी और तुम्हें अच्छा भी लगा होगा। एक अचम्भे की बात यह भी है कि लोग ईश्वर से प्रेम नहीं करते और अगर करना भी चाहते हैं तो कर नहीं पाते। तुमने इस बात को सोचा कि क्या वजह है? हमने सोचा तो नहीं, मगर इस वक्त का विचार लिख रहा हूँ। वह रिश्ता या नाता जो दुनियादारी की तरफ उनको लपेटे हुए है, ईश्वर की तरफ़ उसको कायम करके मजबूत नहीं बनाते। अक्सर यह नाता मुझे जोड़ना पड़ा है और इसकी कोशिश भी की है, मगर अब नहीं मालूम कि मेरा क्या हाल हो गया है कि मैं उस तरफ़ तवज्जोह नहीं लेता, इसलिये कि मेरे नाता जोड़ने से बस यही असर रहा कि जब तक शराब पिलाई गई, नशा रहा और जब पिलाना बन्द कर दी, नशा गायब। अपने में यह चीज़ पैदा नहीं की, कि उस नशे को देख करके नशे की हालत ही पैदा कर लेते।

दक्षिण भारत में ‘मालिक’ की कृपा से जैसा तुम्हारा विचार था, मिशन की आग भड़कना शुरू हो गई है और Dr.K C.Vardhachari के पास अच्छे-अच्छे लोग आना शुरू हो गये हैं। आश्रम के लिये Govt. जल्दी कर रही है और वह लोग इन्तजाम कर रहे हैं, ईश्वर ‘मालिक’ है। एक शख्स ने अकेले आश्रम बनाने का वादा किया है, बशर्ते कि उसको China Clay का पट्टा मिल जाये। एक Retired Deputy Collector ने जाकर उसका काम बनवा दिया। ‘हिन्दू’ अखबार का Asst. Editor जो सत्संग में शामिल हुआ है, उसको 3-4 Sittings लेने के बाद 7 अप्रैल को अमेरिका जाना पड़ रहा है। कुछ दिनों के बाद अगर उसको अमेरिका जाना पड़ता तो कुछ प्रचार का काम हो जाता। फिर भी छ: किताबें Reality at Dawn की मैंने भेज दी है।

अब मैं तुम्हारी हालत पर आता हूँ। तुम्हारी यात्रा का स्थान P1 है, मगर अभी सैर शुरू नहीं हुई है। यह भी हो जायेगी। तन्दुरूस्ती का ख्याल है, इसलिये Natural Way में थोड़ा-थोड़ा करता हूँ। अब तो तुम भी इच्छा बाँध ही दो कि तुम्हें आराम हो रहा है और तुम खूब तन्दुरुस्त हो रही हो। तुमने जो 31 मार्च के खत में यह लिखा है कि जब तुम कोई चीज़ खाना चाहती हो तो बजाय अपने आप खाने के दूसरों को जब खिला देती हो तो तुम्हें वही सन्तोष मिलता है, जो अपने आप खाने से मिलता है। मेरा हाल भी यही वर्षों से चल रहा है और जब तुमने लिखा तो मुझे भी याद आ गया। इसका मतलब यह है कि एक भाव पैदा हो गया है और तुम्हारी कोई इच्छा बाकी नहीं रही। मिशन के फैलाने की जो तीव्र इच्छा तुममें पैदा है, इसकी वजह बहुत मामूली है कि मुझमें तुमने लय- अवस्था बहुत अच्छी पैदा कर दी। इसलिये मेरा यह जज्बा तुम्हारे में पैदा हो रहा है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-676
शाहजहाँपुर
16/4/1958
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभ आशीर्वाद।

तुम्हारे दो पत्र डाक से और एक दस्ती मिला। बड़ी खुशी हुई, जो तुमने यह लिखा कि अब तुमको आराम होकर ही रहेगा और बात भी ठीक है।

तुम्हारा यह ठीक ख्याल है कि तुममें Atmosphere में Condition पैदा करने की क्षमता मौजूद है, इसलिये कि ब्रह्माण्ड-मण्डल की Mastery तुमको दी गई है। तुम्हारी शुद्ध दशा तो चल ही रही है, मगर अभी तुम शुद्ध और अशुद्ध का ख्याल बाँधे हो। वहाँ न शुद्धता है, न अशुद्धता। तुम्हारा यह ठीक ख्याल है कि तुम लय-अवस्था की नवीन दशा में खड़ी हो। तुम्हारे Soul Consciousness में लय हो जाने का पता जल्द ही मिलेगा- अभी उसके दरवाजे पर हो। शुरुआत नहीं हुई है, मगर कुछ उभार की दशा ऐसी पैदा हो गई है कि लय अवस्था के Circumtances बन रहे हैं। यह तुम्हारे 10 अप्रैल के पोस्टकार्ड का जबाब है।

अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-679
शाहजहाँपुर
27/4/1958
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम कुशल पूर्वक दिल्ली पहुँच गई होगी और Ward में दाखिला तो स्टेशन से उतरते ही हो गया होगा। मैंने तुम्हें वनवास भेजा है। इसलिये कि तुम रही सही बीमारी को वहाँ मार सको। तुम्हें हिम्मत रखनी चाहिये और सबको हर हाल में खुश रहना चाहिये।

तुम्हारी आध्यात्मिकता की Stages ईश्वर ने चाहा तो वैसी ही चलती रहेंगी और हृदय में तुम्हारे तसल्ली रहेगी। अगर कुछ भी तकलीफ़ मालूम हो तो प्रार्थना का औज़ार तुम्हारे पास है- उससे सब हालत ठीक हो जायेगी।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-703
बिलारी
20/5/1959
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारा गुलबर्गा में मिल गया था। मैं 4-5 जगहें घूमता-घामता बिलारी पहुँच गया और बिलारी से 22 मई को तिरूपति जाऊंगा। तारीख 31 को मद्रास 2 दिन और त्रिचनापल्ली 4 दिन फिर लौटते में 2 दिन मद्रास रहकर 5 दिन विजयवाड़ा रहूँगा, फिर शाहजहाँपुर के लिये चल दूंगा। श्री राघवेन्द्र राव के ब्रांच में करीब-करीब 70 आदमी हो चुके हैं और आगे बढ़ने की उम्मीद है।

दूसरी मई को मैंने तुम्हें S1 के स्थान पर डाल दिया और वहीं की हालत को तुमने सादगी के रूप में पत्र में लिखा है। सादगी का भी अन्त होना है। अब तुम्हें थकान नहीं मालूम होती होगी। यह सुनकर खुशी हुई कि चौबेजी की तबियत अच्छी है।

अम्मा को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-712
मद्रास
8/8/1959
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारा दिनांक 1 अगस्त का मिला, पढ़कर हर्ष हुआ। तुमने अपनी हालत लिखी है कि कण-कण ईश्वर की याद में मालूम होता है। यह हृदय की चौथी हालत है। यह सब हालत दिल की हर जगह घूम फिर कर आती रहती है। फिर यह हालत रहते हुए भी आगे चलकर अनुभूति में नहीं आती। मैं तुम्हारे पत्रों का जवाब इसलिये नहीं देता कि अब तुम्हारी हालत का बयान करना बड़ा कठिन है। तुम लखनऊ चली गई तो वहां से शाहजहाँपुर आना बड़ा सहज है।

तुम्हारे चाचा जज साहब जब से रिटायर हुए, खूब मेहनत कर रहे हैं और प्रेम बढ़ रहा है। अगर इलाहाबाद में कुछ सत्संगी उन्हें मिल जायें तो मैं उनसे Training का काम लेना शुरू कर दूँ। मगर वे बेचारे इतने सीधे हैं कि सत्संगी बना नहीं सकते और Higher Circle में जहाँ उनकी पहुँच है, वहाँ सीखने वाले कम मिलेंगे।

चौबेजी व अम्मा को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।
शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-714
शाहजहाँपुर
28/9/1959
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारे दो पत्र आये-हालत ईश्वर की कृपा से अच्छी ही है। Point by Point तुम्हें चला रहा हूँ। एकदम से यूँ नहीं ले रहा हूँ कि Pressure कहीं ज्यादा Mind पर न पड़ जाये। जितना आगे बढ़ती जाती हो, हर समय पूजा में होती हुई, पूजा से अलग ही रहती हो। जहाँ दुई है, वहाँ पूजा है, और जहाँ एक भाव है, तो पूजा किसकी ? वह तो अपनी ही पूजा हो जाती है।

अम्मा व चौबेजी को प्रणाम !

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-721
बेलारी
3/12/1959
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा खत गुलबर्गा में मिला, यहाँ हर स्टेशन पर कुछ न कुछ सत्संगी बढ़े और गुलबर्गा और सेड़म में 100 आदमियों से अधिक हो चुके हैं। तुम्हारी आध्यात्मिक दशा बहुत निखरी हुई मालूम होती है।

मेरा प्रोग्राम दो महीने का था। अब मुकदमें के कारण कम करके एक महीने में पूरा करना है। कई जगह मैं जाना चाहता था, अब नहीं जाऊंगा।

अम्मा और चौबेजी को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-730
शाहजहाँपुर
27/2/1960
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र मिला। ईश्वर का शुक्र है कि दक्षिण में चीज़ फैलना शुरू हो गई है। परन्तु मद्रास और Far South में अभी तक अच्छी कामयाबी नहीं हुई। मद्रास में मुझे जानते भी लोग 30-40 ही होंगे और यह देश भी बड़ा कट्टर हैं। मैं चाहता था कि कोई Editor अपना सत्संगी बने। चुनांचे एक Canarese पत्रिका के Editor, अपनी धर्मपत्नी समेत सत्संगी बन गये। दोनों के खत आ रहे हैं और बड़े प्रेम के पत्र हैं। सारनाड जी का एक मज़मून ‘प्राणाहुति’ उसी की पत्रिका में निकला है, जिससे Editor पर अच्छा असर पड़ा और वह अक्सर Canarese जबान में, इसी पत्रिका में Articles देते रहते हैं। यह अखबार Dharwar से निकलता है।

एक बात यह है कि जितनी जल्दी South India तरक्की कर रहा है, उतना ही कम North India के सत्संगी तरक्की कर रहे हैं। यह बात “लालाजी” साहब ने भी मुझसे कही थी। वहाँ तीन आदमी Central Region में पहुँच चुके हैं। दो अपने आप और एक को मैंने खुद भेजा है और यहाँ पर अभी तक सिर्फ एक, जिसको मैंने भेजा है। दक्षिण में अब चौथा आदमी Central Region से तो बहुत दूर है, मगर तैयारी जल्दी बढ़ने की कर रहा है। वहाँ के इतने उम्दा हाल मिल रहे हैं, कि यहाँ नहीं मिलते। चौबेजी अक्लमंद आदमी हैं। मेरी तरफ़ से उनसे कह देना कि इसकी वज़ह मुझे बतावें। तुमसे मैं यूँ पूछना नहीं चाहता (हलाँकि बताने में कुछ हर्ज़ नहीं) कि तुम वही जवाब दोगी, जो मैं जानता हूँ।

Point U1 पर तो तुम पहुँच ही गई और तुम्हारे हाल बयान करने पर मैं इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि यह शून्य-समाधि का स्थान है। गुरूनानक ने लिखा है-”नानक शून्य समाधि में, नहीं साँझ नहीं भोर”। आगे जाना क्या है ? हर चीज़ सिमट-सिमट कर लय हो जाना है। लय-अवस्था यहाँ तक बढ़ती है, मगर बहुत ऊँची हालत में कि Wisdom, Intelligence and Emotions, सब लय हो जाते हैं, यहाँ तक कि अनुभव भी। फिर उसमें से कोई चीज़ निकलती है, जो इन सब चीज़ों को फिर ताजा कर देती है। मगर इन सबका एक शुद्ध रूप हो जाता है।

अब मैं अपनी हालत पर गौर करता हूँ, तो नहीं मालूम यह सब चीज़े लय हुई या नहीं, क्योंकि मैं तो अपने आपको दुनिया में लटका हुआ पाता हूँ। आकबत की खबर नहीं, आध्यात्मिकता से पता नहीं कि कुछ चिमटाव भी है। मैं समझता हूँ, सब बातों का लिहाज़ करते हुए सही दुनियादार मुझसे बहुत अच्छे होंगे।

अम्मा व चौबेजी को प्रणाम। कोठी के बारे में क्या हुआ?

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-733
शाहजहाँपुर
10/3/1960
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र मिला ख़ुशी हुई। जितना आगे बढ़ते चले जाते हैं, सब रंग मिलते चले जाते हैं और फिर कोई रंग नहीं रहता। फिर रहा, सहा वह भी अपनी हालत खो बैठता है। बस यही हालत तुम्हारी हो रही है। जब चमक-दमक भी नहीं रहती, तो फिर अँधेरा कहा जाता है। मगर अँधेरा तो पहले से ही हट चुकता है। अब वहाँ क्या रहता है ?

Dr.Vardhachari के खत आते हैं। वह बहुत ऊँचा जा चुका है, मगर विचारों के हमले और दुनियादारी की बातें उसे तकलीफ़ दे रही हैं। मेरी समझ में नहीं आता कि इस हालत पर यह बातें कैसे मौजूद हैं और मैं उसे क्या लिखूँ, कैसे लिखूँ। यह समझ में नहीं आता है। उसने गीता के एक श्लोक के बारे में पूछा है, जिसका एक हिस्सा उसने लिखा है। वह इसलिये कि वह अपनी हालत को उससे अन्दाज़ा लगा सके। वह श्लोक अध्याय आठ का नवम् है जो हिस्से के माने पूछे हैं, वह यह है :-

" आदित्य वर्णम् तमसः परस्तात्" यह एक पण्डित से दरयाफ़्त करने पर मालूम हुआ कि गीता का श्लोक है। मेरी समझ में नहीं आता कि मैं क्या लिखूँ? क़ाबिल लोग तो लखीमपुर में है। खैर, सूरज प्रसाद से यह कह देना कि कुछ मुझको जल्दी से जल्दी इस पर लिखें और मास्टर साहब भी इस पर गौर कर लें, ताकि हमारी भद्द न हो जावे।

अम्मा व चौबेजी को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-735
शाहजहाँपुर
18/3/1960
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र मिला-हर्ष हुआ। बाबू सूरज प्रसाद के पत्र से जो जवाब तुम सब लोगों का सोच समझकर लिखा गया है, वह बहुत अच्छा है। मास्टर साहब का खत आ जाने पर वही लिखकर भेज दूँगा।

डा. वार्धाचारी के लिये जो तुम दुआ करती हो, वह ठीक है। उसने मुझसे बहुत मेहनत ली और अब भी ले रहा है और मुरब्बत में मैं करता चला जा रहा हूँ। मगर विचार वगैरह आते रहते हैं और दुनियादारी की बातों से परेशान अब भी हो जाता है। मेरी समझ में नहीं आता कि क्या किया जावे, जिससे इसको इत्मिनान हो जावे। कहीं ऐसा न हो, गो इसकी आशा उससे नहीं है कि आखिर को वह यह समझ बैठे कि इस मार्ग में ज्यादा तत्त्व नहीं है। तुमने यह उदाहरण बड़ा अच्छा दिया है कि-“स्वर्ग में अगर हम नरक का विचार लिये रहें तो स्वर्ग भी दुखदायी हो जावेगा” और मैं यह Quotation तुम्हारे ही नाम से इबारत में गढ़कर भेज दूँगा।

तुमने जो लिखा है कि उनके उन्नति के Point से विचारों की ओर एक दृष्टि से देखें तो भी ठीक हो जावेंगे। यह बात मेरी समझ में नहीं आई कि इसका क्या मतलब है और मैं किस दृष्टि से देखूँ।

तुम U1 स्थान पर हो, जहाँ तक मुझको याद है। इसको साफ़ करके V1 स्थान पर जल्दी पहुँचा दूंगा। क्या विचार तुम्हारे भी आते हैं? अगर आते हैं तो कम या ज्यादा या एकाधा ? केसर अच्छी उन्नति कर रही है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-741
शाहजहाँपुर
16/4/1960
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम 13 अप्रैल को एक बजे दोपहर V1 के स्थान पर पहुँच गई। हालत में कुछ परिवर्तन जरूर होगा।

अम्मा व चौबेजी को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-747
शाहजहाँपुर
12/5/1960
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा तथा केसर का पत्र आज ही प्राप्त हुआ। तुम्हारे पत्र का उत्तर क्या दूँ? जो कुछ हाल है, सब अच्छा है। उसके लिये ‘मालिक’ का धन्यवाद। मैंने लिखा था तुम्हारी पहुँच U1 या V1 पर है। ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती जाओगी, दशायें सब ख़त्म होती चली गई-आखिरी में जो रह जाता है, वह तो वही जान सकेगा, जिसमें वह हालत पैदा होगी। कहने से उसकी वह वक़त नहीं रहेगी।

अम्मा व चौबेजी को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-759
शाहजहाँपुर
10/10/1960
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हारी चाल मद्धिम यूँ दिखाई देती है कि सूनसान जगह में फैलाव हो रहा है, जिसकी वजह से हाल बेहाल हो रहा है।

यहाँ सैलाव दो आ चुके हैं। एक अभी 1 अक्टूबर, 2 अक्टूबर को आया। मकान के चारों ओर दो फीट से तीन फीट तक पानी था और फाटक के अन्दर 10-12 फीट लम्बाई में पानी आ गया था, उससे आगे नहीं बढ़ा। न कमरे में गया और न बैठक के सामने आँगन में। खेत में जरूर सब फसल चली गई। अब पानी मकान को छोड़ गया है और दरिया भी धीरे-धीरे घट रहा है और कोई अन्देशा नहीं है।

यहाँ सब कुशल है। अम्मा व चौबेजी को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-763
शाहजहाँपुर
2/11/1960
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र सब के सब मिल गये। हालत तो तुम्हारी अच्छी चल रही है। मैं देखभाल सत्संगियों की यहाँ करता रहता हूँ, मगर नहीं मालूम क्यों मेरा दिल Sub-Consciously दक्षिण-भारत के लोगों पर रूज़ू रहता है। मैं 15 नवम्बर को साढ़े चार बजे शाम की गाड़ी से देहली जा रहा हूँ और वहां से 17 नवम्बर की शाम को दक्षिण-भारत रवाना हो जाऊँगा और वापसी 15-16 जनवरी को होगी। ता. 20 जनवरी सन् 1961 से मिशन का वार्षिक उत्सव शुरू होगा, 21 तारीख़ को बसन्त है।

तुम केसर को लिख देना कि वह कुछ समय रात्रि में ऐसा कर ले कि ईश्वर से प्रार्थना भी करे और ख़्याल भी बाँधे कि दक्षिण-भारत के लोग सब मिशन में आ रहे हैं और कुछ समय जब तबियत ठीक हो, तुम भी इसी के लिये दे देना। मैं प्रोग्राम तुम्हारे लिये भेज रहा हूँ।

अम्मा और चौबेजी को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-777
शाहजहाँपुर
20/6/1962
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

पत्र तुम्हारा आया। Dr. Vardhachari ने मुझको लिखा था कि मैं जल्द ही कस्तूरी के लिये दवा भेजूँगा, वह शायद आ गई हो।

तुम्हें अपनी हालत लिखने में नहीं आ रही है और मुझे भी तुम्हारी हालत लिखने के लिये शब्द नहीं मिलते। इसके माने यह है कि तुम उस शुद्ध अवस्था में हो, जिसके बाद से शब्दावली शुरू होती है।

बच्चों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-782
शाहजहाँपुर
5/12/1962
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हें जो दुआ करने के लिये बताया है, उसे करती रहना। अभी बहुत थोड़ा असर हुआ है। मेरा ख्याल है कि मैंने तुम्हें बरेली स्टेशन पर अगले Point पर जो X1 हो या Y1 यह तुम्हें मालूम होगा, घसीट दिया था। ज़रा इसे जाँच कर लिखना। कहीं मैं भूल तो नहीं गया हूँ।

तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ और अम्मा व चौबेजी को प्रणाम। इति:-

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-784
शाहजहाँपुर
7/3/1963
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारी सैर अब A2 पर है और सैर शुरू हो गई है। अनुभव तुम्हारा ठीक ही है। तुम्हारे माता-पिता को प्रणाम। भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-801
शाहजहाँपुर
15/9/1964
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद !

पत्र आया। ईश्वर का धन्यवाद है कि तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर ली। ज्यों-ज्यों ईश्वर प्राप्ति पर आगे बढ़ते चला जाता है, बल्कि निकट होता जाता है, तो शुद्धताई, साधना, अनुभव, सब उसमें लय होते जाते हैं, क्योंकि ईश्वर में इनमें से कोई चीज़ नहीं है। तुम्हारी दशा ईश्वरीय दशा है।

तुम सबको दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-805
बिदर
14/12/1964
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद !

तुम्हारा ख़त हैदराबाद में मिल गया था। मेरी तबियत ठीक है। यहाँ पर मिशन ने फैलने के लिये लम्बे डग लेना शुरू कर दिया है और हर सत्संगी भाई इसके लिये कोशिश कर रहा है। दिन-ब-दिन यहाँ आगे ही बढ़ने की उम्मीद है।

तुम सबको दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-807
तिरूपति
27/12/1964
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद !

तुम्हारा पत्र मिल गया और केसर का भी। केसर ने अपनी हालत अच्छी लिखी है। तुमने जो स्वप्न देखा है, वह लय अवस्था की अच्छी दशा है और पानी पिलाना उस हालत की सायुज्य गति है।

South India में मेरा अन्दाज़ है, काम Full Swing में आने में अभी दो साल और लगेंगे। अगर हम लोग अपनी पूरी ताक़त से जुट जावें तो समय जरूर कम हो सकेगा।

तुम सबको दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-809
तिरूवन्नामलाई
1/1/1965
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद !

तुम्हारे ख़त का जवाब मैंने दे दिया था, मिल गया होगा। यहां Tiruvannamalai में ईश्वर का शुक्र है, कि बहुत काम मिला और आगे बढ़ने की उम्मीद है। उम्मीद है कि चलते समय तक 70-80 आदमी हो जायेंगे। यहां पर सत्संगियों ने बड़ा आराम दिया ईश्वर तुम्हें खूब तरक्की दे।

तुम लोगों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-839
शाहजहाँपुर
8/5/1967
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद !

मैं 21 मई की शाम को चलकर 22 को सुबह दिल्ली पहुँच रहा हूँ और 23 मई की शाम को दक्षिण भारत के लिये रवाना हो रहा हूँ।

6 मई को आश्रम बनने के लिये 10,000 (दस हजार रूपये) की ज़मीन खरीद ली गई है। जिन लोगों ने रूपये का वादा किया है, उसमें से बहुतों का अभी नहीं आया है। रूपया सिर्फ 5,500 था और 5,500 रूपया और मदों का, जो हमारे पास जमा था, उसमें से देना पड़ा। तुम्हारे में कंपन, शक्ति का भराव है।

बच्चों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-842
शाहजहाँपुर
2/10/1967
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद !

तुम्हारा पत्र मिल गया। तुमने अपनी हालत का हाल ठीक ही लिखा है। मैं देख रहा हूँ कि क्या करना चाहिये, समझ में कुछ है, कुछ आ जायेगा। टन्डन आजकल बहुत परेशान हैं। तुम्हारे कुछ करने से उन्हें फ़ायदा तो हुआ है और संस्कार की गुत्थी साफ़ हो गई। मुझे आज ऐसा प्रतीत होता है कि इसका फ़ायदा और बढ़ेगा और कष्ट में ईश्वर ने चाहा कमी होगी।

हैदराबाद के कुछ लोग 9-10 को आ रहे हैं। आ सकती हो तो तुम भी आ जाना।

तुम सबको दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-843
शाहजहाँपुर
25/10/1967
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद !

तुम्हारा पत्र मिल गया-बहुत खुशी है कि लालाजी साहब ने तुम्हें आध्यात्मिक Research के लिये छाँटा है। जहाँ तक हो सकता है तुम हर हालत को बहुत अच्छी तरह लिखती हो-यद्यपि ऊँची हालत पर जाने पर हालत का लिखना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि शब्द नहीं मिलते हैं। मैंने तुम्हें पहले पत्र में लिखा था कि मुझे क्या करना चाहिये, समझ में कुछ है और कुछ आ जायेगा तो मैंने तुम्हें J2 Point पर खींच दिया है ईश्वर ने चाहा तो इस हालत की खुशखबरी भी तुम दोगी। न जाने क्यों तुम्हारी हालत देखकर मैं बाग=बाग हो जाता हूँ। लालाजी तुम्हें बरक़त दें-तुम्हारी तन्द्रुस्ती भी ठीक रहना चाहिये।

तुम सबको दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-847
चन्नापटना
1/1/1968
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद !

आज मैं चन्नापटना आ गया। सेलम में कुछ आदमी बढ़े। मदुरई में करीब बीस आदमी ने शुरू किया। मेरी तबियत ठीक है। मुझे काम के लिये Energy लालाजी से मिलती रहती है और तुम भी देती हो। इसलिये तुम्हारे देने की जरूरत नहीं। इसलिये कि Centre Region आदमी की आखिरी पहुंच है। वहाँ पर आदमी की Power बहुत बढ़ जाती है और वहाँ थोड़ी सी चीज़ भी बहुत हो जाती है। तुम्हें अन्दाज़ नहीं लग सकेगा। दिल पर आज ही भारीपन मालूम हुआ। इसलिये कमज़ोर होने की वज़ह से असर ज्यादा हो जाता है।

चि० पारसारथी ने इधर बहुत अच्छा काम किया है। ईश्वर उन्हें खुश रखें।  सब बच्चों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-857
शाहजहाँपुर
28/6/1968
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद !

तुम्हारा पत्र मिला-सुनते ही ऐसा लगा कि मानों हालते Bliss मेरे सामने आ गई। लालाजी साहब के करम का शुक्रिया कैसे अदा करूँ कि उन्होंने तुम्हें हालते-Bliss की निहायत ऊँची हालत को बख़्श दिया है। वाह-वाह क्या लिखा है तुमने “कि कोई कशिश या आकर्षण मुझे जितनी तेज़ी से अपनी ओर खींच रहा है और मैं उतनी ही तेज़ी से उसमें मिलना चाहती हूँ तो मानों प्राण निकलने लगते हैं।” जब हालत काबू से बाहर होने लगे तो पूजा की कोच के सामने बैठ जाना। इस हालत पर सीखने वाले को सिखाने वाले को पास ही रहना चाहिये। यह तो लालाजी साहब की कृपा है कि हालत के बेतहाशा होने से पहले उनकी शक्ति तुम्हें सँभाल लेती है। क्या तारीफ करूँ तुम्हारी हालत की, तुमने लिखा है कि बूँद में समुद्र सोख गया है और बूँद बेचैन है कि कहाँ है प्रियतम। अब तो हर समय तुम्हारी हालत पर निगाह रखनी पड़ती है। सच तो यह है कि Current ने तुम्हें नहीं पकड़ा है बल्कि Divine Power तुम्हारे अंदर प्रवेश पाती जा रही है। ईश्वर ने चाहा तो Centre Region में Swimming की भी शुरुआत पाओगी।

तुम सबको दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-868
शाहजहाँपुर
26/4/1969
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद !

तुम्हारा पत्र आया। हम 6 जून को आसाम जा रहे हैं और 21 जून को लौटेंगे। कई दिन हुए, मैंने तुम्हें First Ring पर खींच दिया था, मगर उस Ring पर और Ring से पहले, दोनों तरफ सुरत थी। इस वक्त और खींचा है, ताकि पहली Ring पर ही आ जाओ। यह भी हो जायेगा।

तुम्हें चोट लग गई-तुमने लिखा भी नहीं। अब क्या हाल है? और हमें चोट तो ऐसी लगी है, कभी निकलती ही नहीं। जब हम परहेज़ कर लेते हैं, तो ज़रा फ़ायदा होता है और परहेज छोड़ देने पर बढ़ने लगता है और यह मैं यूँ कर लेता हूँ, कि तुमने कहा था थोड़ी बदपरहेज़ी कर लिया करो।

तुम सबको दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-869
शाहजहाँपुर
4/5/1969
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद !

मैंने पीछे लिखा था कि पहली Ring पर तुम हो और कुछ जोर, इससे पीछे मैंदान है, उस पर भी है। मैं यह चाहता हूँ कि अब दूसरी Ring पर ले आऊँ। तुम आ जाओगी, सम्भव है कुछ समय लगे। यह तो होता ही रहता है। ताकत जब घर बना लेती है, तब आगे बढ़ती है। मैंने तुमसे कई बार कहा और अब भी कहता हूँ कि तुम करीब-करीब 10 मिनट तक यह करके देखो कि लेट जाओ और यह ख्याल करो कि तुम्हारे सब मर्ज़ अच्छे हो रहे हैं और तुम स्वस्थ हो रही हो। तुम अब इसे करके देखो, ख्वाह तुम इसमें शुरू में समय कम कर दो।

तुम सबको दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र 
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-885
शाहजहाँपुर
24/8/1970
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद !

तुम्हारे पत्र मिलते रहते हैं। जवाब देना अब कठिन ही नहीं नामुमकिन सा होता जा रहा है। कोई लिखने वाला भी ऐसा नहीं पास में है जो कि ठीक से इबारत लिख सके। बारीक हालतों के बारे में लिखाते समय मुझे बिल्कुल Silence चाहिये और लिखने वाला मुस्तैद चाहिये। खैर जो कुछ भी हालत तुम्हारी है उससे पता चलता है कि तुम दूसरे Ring से आगे जाना चाहती हो। लालाजी साहब का शुक्रिया कहाँ तक अदा किया जाये उन्होंने मुझे इशारा किया और तुम Third Ring पर आ गई। बिटिया, मैं अपने को धन्य कहूँ या तुम्हें जो आज Highest Region की दशाओं की अनुभूति तुम्हारे पत्रों से मिल रही है। मैं अपने को भूल चुका हूँ मगर तुम्हारी हालत कुछ मेरे बारे में भी मुझे बता जाती है। तुम्हारी Divine Will Power ने मुझे साँस के कष्ट से हमेशा के लिये मुक्त कर दिया है।

तुम सबको दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-888
शाहजहाँपुर
28/12/1970
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद !

उत्सव की तारीखें 30 व 31 जनवरी तथा 1 फरवरी है। मैं 15 फरवरी को दिल्ली से मद्रास By Air जाऊँगा। Poray का Programme बदलना अब मुश्किल है। सेठजी ने मेरे Transmission में कुछ एहसास नहीं किया, इसलिये कुदरती तौर पर हर एक का यह ख्याल हो सकता है कि मेरे Transmission में असर नहीं है। मेरे Transmission में Awakening और सायुज्यता है। उसकी कदर वही कर सकता है, जिसकी आँखें पूरी तौर से खुल चुकी है। मैंने सेठजी और बापू भाई के मामले में बहुत जल्दी की। मगर जब उन लोगों को इसका एहसास नहीं हुआ तो उनकी नज़र में जैसे और गड़बड़ साधू होते हैं, वैसा ही मैं भी हूँ।

तुम सबको दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-890
शाहजहाँपुर
13/1/1971
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद !

तुम्हारा खत मिल गया। डा० वर्धाचारी को बुखार 101° से 103° तक हर समय रहता है, इसलिये और भी कमज़ोर हो गये हैं। शक्कर में कमी होने के लिये मैं भी दुआ कर रहा हूँ और तुम भी कर रही हो, मगर उसमें कमी नहीं हो रही है, इससे हमें बड़ी फिक्र हो रही है। दुआ तो करते ही रहेंगे और तुम भी करती रहोगी।

Mr. Poray और Mr & Mrs Davies 19.1.71 को आ रहे हैं और 24.1.71 तक रहेंगे। पार्थ सारथी भी 19 या 20 को सुबह आ रहे हैं। तुमने हीरजी भाई और बम्बई वाले सेठजी को जो Transmission दिया था, उससे कुछ समाधी की दशा हो गई थी। हीरजी भाई तो इतना खुश हुए कि उन्होंने सेठजी से कहा कि अगर यह लड़की दो महीने तक मिशन के प्रचार के लिये उधर आकर करे तो मैं कुल खर्चा दूँगा। बाकी और बातें, जब तुम यहाँ आओगी, तब बताऊँगा।

हमें तो South अब हर हाल में जाना है।

तुम सबको दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-892
शाहजहाँपुर
14/4/1971
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो !

तुम्हारा पत्र मिल गया। हमारा इरादा लगभग 6-7 जून तक आसाम जाने का है। खर्चा तुम्हारा और हमारा हवाई जहाज का जमा हो चुका है। हवाई जहाज का रास्ता 4 घंटे का है। तुम लिखो कि तुम्हें यह तारीखें सूट करेगी, ताकि हम तारीखें निश्चित करके आसाम को सूचित कर दें।

केसर को दिल्ली में या वहाँ से आने के बाद पारब्रह्म मण्डल में पूरी तौर से खींच दिया। तुम भी देख लेना कि मैं सही हूँ। मैंने तुमसे कहा था कि मैंने West का काम Raghvendra Rao को दिया है। तुम भूल गई होगी। तुम्हारा अनुभव सही है। मैं तुम्हें भी काम देना चाहता था, मगर तुम्हारी कमज़ोरी और बीमारी के डर से मैंने नहीं दिया। तुमने अच्छा किया कि काम ले लिया। अब जितना हो सके, करती चलो। इसमें अमरीका और अफ्रीका भी शामिल कर लो। राजगोपालाचारी अमरीका भी जा रहे हैं। आध्यात्मिकता में अगर वहाँ के लोग भी उन्नति कर जायें तो लड़ाई-झगड़े सब समाप्त हो जायें।

पाकिस्तान ने बंगला देश में बहुत जुल्म किया है, जो इतिहास में नहीं सुना गया। सभी Intellectuals को खत्म कर रहा है और यह बातें अब देखी नहीं जातीं। नहीं मालूम ईश्वर की क्या मन्शा है और क्या होना है।

तुम सबको दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-893
शाहजहाँपुर
23/6/1971
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद !

मद्रास से 20.6.71 को वापिस आया। मुझे तुमसे कुछ सलाह लेनी है और आगे मिशन के काम के लिये Policy Chalk Out करना है। इसलिये जब तुम लखनऊ से मोदीनगर जाओ तो 2-3 दिन शाहजहाँपुर ठहर कर जाना। काम कुछ जरूरी है, मगर परेशानी की कोई बात नहीं। खुशख़बरी यह है कि आज ही तुम्हें 3rd Ring से उठाकर 4th Ring में डाल दिया है।

तुम सबको दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-896
शाहजहाँपुर
3/5/1972
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद !

तुम्हारे पत्र मिलते रहते हैं। तुम्हारे पत्र लोग मुझे तोड़-मरोड़ कर सुनाते हैं इसलिये मुझे लगता है कि तुम्हें पत्र लिखना अब कम होता जा रहा है। चाहता तो यही हूँ कि तुम्हारे हर पत्र का उत्तर विस्तार से दूँ जिससे लोगों को हर आध्यात्मिक-दशा के साथ Divine Power का अंदाज़ भी देता जाऊँ कि आगे चलकर हर हालत Power बन जाती है। तुम्हारा हर अनुभव अब Divine Power में ही लय हो जाता है फिर मात्र शक्ति ही रह जाती है। तुम्हें ख़ुशखबरी दे रहा हूँ कि South के जो लोग आये थे उन्हें लालाजी साहब ने ख़ुश करके भेजा है। तुम्हारे अनुभव की क्या तारीफ़ करूँ कि न जाने कब मैंने तुम्हें पाँचवें Ring पर डाल दिया था और वही हालत तुमने अपने पत्र में लिखी है। यह भी Divine Power में बदल जायेगी और लो बदलना शुरू भी हो गया है। तुम्हारे साथ में एक खासियत यह भी है कि हर हालत का अखलाक भी साथ में आ जाता है। सच तो यह है कि हालत कितनी ही श्रेष्ठ क्यों न हो अगर उस स्तर का अखलाक अभ्यासी में न उतरे तो यह बड़ी कमी ही मानी जायेगी और लालाजी साहब यह कमी तुम्हारे में कभी नहीं रहने देंगे। अब तुलसीदास की तबियत ठीक हो गई होगी।

तुम सबको दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
बाबूजी के पत्र
पत्र-संख्या-900
शाहजहाँपुर
16/7/1973
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद !

तुम्हारे सब पत्र मिल गये-जवाब देने के लिये किसी लिखने वाले का इंतजार करना पड़ता है। आज इत्तफ़ाक से लिखने वाला मिल गया है इसलिये तुम्हें उत्तर दे रहा हूँ।

ख़ुदा का करिश्मा है कि किसी को जब यहाँ उतारता है तो कोई न कोई ‘उसकी’ मुराद पूरी करने वाले को भी यहाँ ले ही आता है। मेरी ख़ुशी, समर्थ की निगाह और स्वामीजी का आशीर्वाद आज ख़ुशी से झूम उठा है-तुमने हालत को लिखने की हद पार कर दी है। शायद किसी भी आध्यात्मिक-लिटरेचर में इन हालतों का ज़िक्र तो क्या कहीं हवा भी नहीं लगी। मैं तो बस लालाजी साहब का शुक्रगुज़ार हूँ कि जिनकी निगाह के नीचे मैंने तुम्हें श्रेष्ठतम हालतों से गुजार कर अन्तिम सत्य की सत्यता को उजागर किया है। एक बात लिखता हूँ कि अब जिन हालतों से गुज़ार कर तुम्हें लिये जा रहा हूँ वहाँ शक्ति की भी गुज़र नहीं है। सातवें Ring पर तो तुम आ ही गई हो-लालाजी साहब ने तुम्हारा Charge खुद ले लिया है क्योंकि सातवें Ring के बाद तुरंत ही, बल्कि सातवें Ring में ही अंतिम-सत्य (भूमा) की आदि झलक का मिलना शुरू हो जाता है। कहीं मेरी निगाह उधर न फिर जाये इसलिये उनकी निगरानी और मेरी निगाह ही तुम पर रहेगी। वाह, वाह क्या कहा जाये लालाजी साहब की निगरानी का कमाल कि मेरी आदि Unfailing-Will तुम्हारी मौजूदा हालत को Touch न कर दे इसलिये ही अपनी निगरानी के प्यार का Cover उन्होंने तुम्हें दिया है। वैसे तो कोई हर्ज़ नहीं किन्तु तुम्हारा हर Thought, Power न बन जाये इसलिये ही शायद उनके प्यार ने तुम्हारी हालत को छुपा लिया है। हर हालत का Centre उसकी Power का केन्द्र होता है। Ring की खासियत यह है कि इसमें कदम रखते ही केन्द्र की कशिश अपनी ओर खींचने लगती है। मैंने कशिश लिखा है लेकिन यहाँ कशिश की गुज़र ही नहीं है। यूँ कह लो कि सिखाने वाले की निगाह ही कशिश का काम करती है। अलख तो तुमने लख ही लिया है और मैं तो यही कहूँगा कि परम-गति ने ही तुम्हें पा लिया है। अब लिखाने को विचार ही नहीं है-सच तो यह है कि तुम्हारे हालत लिखने की गर्मी ही विचार को ले आती है। अब मैं खुश हूँ कि तुम्हारे लिये आशीर्वादों की बारिश हो रही है।

तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र