लखीमपुर
22/4/1953
मेरे परम स्नेही ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।
पूज्य मास्टर साहब जी से ‘आप’ सबकी कुशलता के समाचार ज्ञात हुए ‘आपको’ दौरा करीब घंटे भर सुबह और शाम हो ही जाता है, ईश्वर शीघ्र ही इसे अच्छा कर दें।
भाई, मेरा तो अब यह हाल है कि भीतर-बाहर हर ज़रें में उसी वास्तविकता की झलक दिखलाई पड़ती है। हर ज़र्रे में ‘वही’ झलक या रोशनी निकल रही है। दशा में एक अजीब Pure (शुद्ध) मस्ती की महक रहती है, और दशा में ही क्या, बल्कि हर ज़रें - ज़र्रे में से इसी महक का एहसास पाती हूँ। मेरे ‘बाबूजी’ अब कुछ यह है कि मैं वास्तविकता कहती हूँ, परन्तु उससे दशा के लिये शायद कुछ ठीक नहीं पड़ता है। कुल नज़ारा मेरे में और सब जगह है, वह न जाने क्या है और यह दशा है कि वह नज़ारा मुझसे ही उत्पन्न है। भाई, मेरा तो यह हाल है कि मेरे तो Sense (ज्ञान) वगैरह कुछ है ही नहीं। ‘मेरा’ और अब ‘तेरा’ कहने में कोई Sense (अर्थ) नहीं है। दशा आजकल, अब तो कुछ बड़ी भीनी-भीनी मालूम पड़ती है। मैं देखती हूँ कि अब जो दशा है और आती है, उसमें कुछ लगाव लपेट नहीं होता है। कोई Weight (वज़न) किसी प्रकार का महसूस नहीं होता है। बिल्कुल खाली सी, कुछ भीनी सी, दशा होती है।
मेरे ‘बाबूजी’ मेरे तो जैसे अब Sense (ज्ञान) ही नहीं रह गया है, अजीब भूली सी, भटकी सी दशा रहती है। मुझे तो इसका भी कुछ पता नहीं है, कि ‘मालिक’ से मिली हूँ या गैर हूँ। अब तो यह न जाने क्या हो गया है कि मेरा तो मन-वन जैसे अब कुछ काबू में नहीं रह गया है। Senses (वृत्तियों) पर कुछ कन्ट्रोल नहीं है और न यह पता कि यह सब कोई चीज़ है या नहीं। भाई, कुछ ऐसा लगता है कि जैसे ‘मालिक’ ने Senses (वृत्तियों) के बन्धन को भी हटा दिया हो या स्वतंत्र कर दिया हो। अब तो ऐसा है, मेरे ‘बाबूजी’ कि किसी की तबियत खराब है, तो घबड़ाती जरूर हूँ, प्रार्थना करती हूँ, परन्तु देखती हूँ कि घबड़ाने का मुझे कोई Sense (अर्थ) नहीं, उद्देश्य नहीं होता।
अब तो भाई तबियत इतनी झुकी हुई महसूस होती है कि छोटे, बड़े मुझे जैसे सब अपने से बड़े के सदृश लगते हैं और वैसे यह भी है कि सब बड़े-छोटे समान ही प्रतीत होते हैं। अपने से छोटा तो मेरे लिये संसार में कोई रह ही नहीं गया है, चाहे कोई पूजा करे या न करे, इससे कुछ मतलब नहीं। ऐसा लगता है कि मुझे चाहे कोई कुछ कह ले, परन्तु फिर भी न जाने क्यों इसे व्यवहार में इतना घटित नहीं कर पाती हूँ। क्योंकि मेरे ‘बाबूजी’ न जाने कुछ यह हो गया है कि मेरे तो जैसे अब अपने कन्ट्रोल में कुछ नहीं रह गया है। पहले ‘मालिक’ की कृपा से हर चीज़, मन, बुद्धि, व्यवहार, सब कुछ मेरे बस में था। अब जब मैं तो भूली सी, भटकी सी हूँ, तो ‘वही’ जाने, जैसे रखता है, वैसे ही रहती हूँ। यही नहीं बल्कि भाई, यह दशा है, ऐसा लगता है कि, हर आदमी, बच्चा-बच्चा मुझे सब कुछ सिखा सकता है। चाहे दुनियाँ की बातें और आध्यात्मिकता भी।
कुछ ऐसा है कि न मुझे अब Reality (वास्तविकता) की तमीज़ है, न कुछ की, बल्कि यह Reality (वास्तविकता) कहने से दशा का मतलब ठीक नहीं निकलता। अब तो ‘मालिक’ ही जानें। भाई, कुछ यह है कि जितना मैं ‘उसे’ समेटना चाहती हूँ, उतना कर नहीं पाती। समेट ही नहीं पाती। प्रेम यदि कुदरती हो तो ‘मालिक’ जानें, परन्तु अब मेरी दशा में नहीं महसूस होता, मैं कहाँ से लाऊ, और मैं करूँगी भी क्या, ‘मालिक’ जाने, मैं ‘उसे’ ज़रूर और ज़रूर चाहूँगी।
अब तो यह दशा है कि जर्रे जर्रे में हर तरफ, एक अजीब जल्वा, अजीब - मस्ती का सा अनुभव करती हूँ। अब तो जल्वा, मेरी ही मस्ती, मेरा ही एक अदना रूप की तरह है। मैं नहीं कह सकती कि मुझमें प्रेम नहीं है, हाँ यदि अपने से भी हो तो भी गैर का नहीं हुआ। हाँ प्रेम, प्रेम के रूप में नहीं, किन्तु ‘उसके’ रूप में हर समय रमा हुआ है।
भाई, मैं क्या कहूँ, मेरा तो यह हाल है कि न स्वतंत्र हूँ, न कोई बन्दिश ही मालूम पड़ती है। अविच्छिन्न हूँ। न होश में हूँ, न बेहोश हूँ, क्योंकि यह सब एक दशायें हैं। और मेरी अब यह कोई दशा, दशा नहीं होती। यदि निर्गुण हूँ, निरजंन हूँ, तो भी ‘वही’ जाने, क्या है। मैं शायद अब यह सब कुछ नहीं, एक अदना बहुत अदना हूँ। खैर, ‘आप’ जाने, जैसी हूँ, ‘आप’ की हूँ, बस यही है। ऐसा लगता है कि मैं अविच्छिन्न एक केवल कुछ एक सी रह गई हूँ। मेरे ‘बाबूजी’ आप जाने, मेरी क्या दशा है, जो ‘आप’ कहेंगे, वही ठीक है। मेरी तो जैसी दशा समझ में आई, लिख दी।
किताबें मिल गईं। धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेंगी। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा बिट्टो, छोटे भइया प्रणाम कहते हैं। इतिः-
सदैव केवल 'आपकी' ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी