Sant Kasturi
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अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-1
लखीमपुर
5/3/1948
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी के चरणों में मेरा सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आज पूज्य पिताजी के कहने से आप को पत्र लिखने का साहस कर सकी हूँ। कृपा कर स्वीकार हो। मेरी शारीरिक हालत काफ़ी अच्छी है। अपनी कृपा बस आप इस दीन-हीन, साधन-विहीना कस्तूरी की मानसिक उन्नति पर बराबर ध्यान रखियेगा। आप का बताया हुआ ध्यान कुछ कर लेती हूँ। पूज्य मास्टर साहब भी दूसरे दिन, और कभी-कभी तो रोज़ sitting दे कर परम् सुख तथा शान्ति प्रदान कर जाते हैं। अपनी आजकल की diary लिख रही हूँ। कृपया इसमें जो गलती हो, उसे सुधार लीजियेगा। वैसे तो मैं गलतियों से भरी हूँ, परन्तु आपके सामने पहुँचने से ही ये गलतियाँ मेरा फायदा करेंगी।

आजकल सबेरे उठने पर स्वामी विवेकानन्द जी को प्रणाम करती हूँ, फिर आपको प्रणाम कर के जैसे पूज्य मास्टर साहब ने बताया है, वैसे अपने विकारों को अपने से अलग करती हूँ। प्राण प्यारे ईश्वर को सब में रमा हुआ जान कर, आपका बताया हुआ अभ्यास करती हूँ। फिर दिन भर जहाँ तक बन पड़ता है, उस परम् प्यारे ईश्वर को याद करती हूँ। आप को कर्ता समझ कर, मैं कुछ नहीं करती हूँ, सब बाबूजी करते हैं, कर्म करती हूँ और ईश्वर के अत्यन्त पावन ॐ नाम का मन में जाप करती हुई उसी में रमने की कोशिश करती हूँ। कृपया आप ऐसी कृपा करें कि मैं उसमें बिल्कुल रम जाऊँ। आजकल sitting लेते समय या और ध्यान करने पर ॐ ऐसा परम् पवित्र नाम जोर-जोर से सुनाई पड़ता है। कभी-कभी दो-दो दिन सपने के समान बीत जाते हैं। कुछ मालुम नहीं पड़ता है कि क्या किया है, और क्या करना है? परन्तु, बाबूजी, मैं अपने परम् कृपालु ईश्वर को एक क्षण के लिए भी न भूलूं, एक पल भी बिना उसकी याद आये न जावे, अपने को बिल्कुल भूल कर मैं सदा सब जगह उसे ही देखूं, आप इस गरीबनी कस्तूरी को ऐसा ही आशीर्वाद दीजिये। आपने पूज्य पिता जी को, भिखारी कैसा होना चाहिये लिखा है, उसके बारे में आप आशीर्वाद दें और ईश्वर कृपा करके मुझे अपना वैसा ही भिखारी बनावे। अपनापन भी दिन में कभी-कभी आ जाता है। और कोई समाचार नहीं है। मुझमें विकारों की कोई गिनती नहीं है कि कितने हैं, परन्तु ईश्वर की कृपा से तथा आपके आशीर्वाद तथा सहायता से सब जल जायें।

आपकी
पुत्री–कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-2
लखीमपुर
12/7/1948
कृपा-पत्र आपका कल आया। आपने जो मेरे लिए बतलाया है, वह थोड़ा करना शुरू कर चुकी हूँ। आगे जो दशा मैंने आपसे बतलाई थी कि तीन या चार-चार दिन यह ध्यान नहीं रहता है कि क्या किया है, क्या कर रही हूँ और क्या करना है। वह दशा आपके आशीर्वाद से तथा ईश्वर की कृपा से स्थाई सी हो गई है। कभी-कभी दो एक दिन को मुझे क्रोध का दौरा सा होता है, शायद मन और शरीर की कमजोरी से, परन्तु कुछ भी करने से पहले ‘मालिक’ ने कृपा करके मुझे दिया है, ‘मालिक’ जाने वह ही सब कर रहा है, ऐसा भाव मन में उठने लगता है, और बाद में यह पता भी नहीं रहता कि कैसे और क्या हो गया है।

करीब दस दिन से चलते-फिरते, आँख बंद करने और बात करते समय, आँखों के सामने बार-बार प्रकाश आ जाता है। कभी कम और कभी ज्यादा। यह भी मेरे प्राण-प्यारे, मेरे जीवन धन ईश्वर की कृपा होगी। पूज्य बाबूजी मेरे जीवन का मुख्य ध्येय प्यारे ‘मालिक’’ की प्रसन्नता प्राप्त करना तथा ‘उन्हें’ प्राप्त करना ही रहे। आप मुझ पर ऐसी कृपा करें और यही आशीर्वाद दें। सदा सर्वत्र, सब में अपने ईश्वर का ही दर्शन करती हुई और जन्म-जन्मान्तरों से दृढ़ हुए अपने पन से मुक्त हुआ जीवन बिताऊँ। आगे ‘मालिक’ की जैसी इच्छा। आप अपनी कृपा मुझ पर बनाये रहें, पूज्य पिताजी का आशीर्वाद सदा सिर पर रहे। बस, तब यह झिंझिरी मेरी जीवन नैया भी पार हो जाएगी। पूज्य मास्टर साहब भी सत्संग देते ही हैं। वे जब आवेंगे, तब फिर प्राप्त होगा। इति

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी "
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-3
शाहजहाँपुर
15/7/1948
पत्र मिला, दिल को खुशी हुई। तुमको यह अन्दाज़ हो गया होगा, कि जिस रास्ते पर तुम हो, ठीक है। ईश्वर का कोई रूप नहीं, इसलिये सर्वव्यापी कहा गया है। अगर उसका कोई रूप होता, तो उसका क्याम एक ही जगह होता। अपनी निगाह को वसी (व्यापक) बनाना चाहिये। तंग दायरा तंग नज़री से होता है। हममें ऐसे लोग मौजूद हैं, कि जो ठोस पूजा को उमर भर नहीं छोड़ते। हालांकि चाहिये यह कि जो ठोस अवस्था ज़्यादा लिये हुए हैं, उनको ठोस पूजा में डालकर, धीरे-धीरे उससे निकाल कर, सूक्ष्म की तरफ ले जाना चाहिए। मगर चूँकि हम स्वयं ठोस हैं, इसलिए अगर ठोसता की तरफ डाल भी दिया जाये, तो फिर उससे निकलने को जी नहीं चाहता, और सही रास्ता मालूम होने पर भी दिल उससे हटता ही नहीं। अगर मैं यह बात प्रत्येक मनुष्य से कह दूँ, तो वह यही समझेंगे कि मूर्ति-पूजन के खिलाफ़ हूँ। मगर मेरी यह मन्शा नहीं है। यह उन लोगों के लिये है, जिनका ख़याल सिर्फ़ ठोसता पर काम कर सकता है। मगर हमेशा उसी चीज को लिये बैठे रहने का नतीजा यह होगा कि वही ठोस असरात उसके दिल में पैदा हो कर दिल सख्त कर देंगे, जिसको हटाने में बहुत देर लगेगी।

मूर्ति-पूजन मैंने भी की है। मगर बहुत थोड़े दिनों। मगर मुझको तस्सली न हुई और उस चीज को बेकार समझकर छोड़ दिया। अगर हम किसी से यह कहें, उस मनुष्य से, जो इस रास्ते पर जा चुका हो और वह इसको न माने, तो क्या कहा जा सकता है, कि उसको सही रास्ते पर विश्वास है। बहादुरों की पूजा हिंदुस्तान में सदा से चली आ रही है, जिसका नतीजा यह हुआ कि लोग बस उसी की पूजा के हो रहें है और मूर्तियाँ स्थापित हो गई अगर मैं मूर्ती-पूजन करता होता और सही रास्ता मुझको, जो इससे कहीं अच्छा है, मिल जाता और सिखाने वाला मुझसे इसको छोड़ने के लिए कहता तो शायद ये क्या, मैं अपने आप को भी छोड़ने के लिए तैयार हो जाता।

इस मार्ग में बुराइयाँ छूटती हैं और फिर अच्छाइयों के तरफ भी रगबत नहीं रहती, तब कर्म-बन्धन से छुटकारा होता है। चौबे जी को मैंने डर की वजह से यह बात नहीं लिखी, तुम्हे लिख रहा हूँ, इसलिये कि मुमकिन है, ईश्वर की यही मर्ज़ी हो कि तुम आला तरक्की करो। रौशनी जो तुम्हे कभी-कभी नज़र आ जाती है, यह आत्मा की झलक है और उन्नति का चिन्ह। मगर उन्नति के लिये यह आवश्यक नहीं कि हर शख्स को यह चीज नज़र आवे। अपने-अपने संस्कार व प्रकृति पर है। मैं समझता हूँ कि तुम यही पसन्द करोगी कि हम उस ईश्वर से प्रेम करें, जिस पर ज़मीनी क्या, बल्कि ख्याली आवरण भी चढ़ा हुआ नहीं है। बाकी हालतें जो तुमने लिखी हैं, वह बहुत अच्छी हैं। इनके बारे में मैं थोड़े दिनों बाद लिखूंगा।

मैं तुम्हारी माता जी से कहता हूँ और चलते समय मैंने उनसे कहा था कि चौबे जी को संभाल लेना, उनके हाथ में ही है। स्त्री पहले स्वयं करे। उसके बाद पति को उस अच्छी बात को करने में सहायता दे और बेटी! यह वक्त अब बार-बार न आयेगा। इसको मुमकिन है कि कुछ लोग समझते भी हों।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-4
लखीमपुर
18/7/1948
पत्र आपका आया- आपने लिखा कि तुमको यह अन्दाज़ हो गया होगा कि यह रास्ता ठीक है, परन्तु मुझे तो यह दूढ़ विश्वास है कि यह रास्ता सरल तथा शीघ्र उन्नति का है। यह विश्वास तथा श्रद्धा करवाई है सब पिताजी तथा मास्टर साहब की Sitting ने। पूज्य पिताजी ने जहाँ से जो बात अच्छी मालूम हुई, वह तुरन्त ही सब को बतलाई तथा उसकी तारीफ़ करके उसमें श्रद्धा उत्पन्न की है। वे अपने कल्याण के साथ हम सब के कल्याण की फ़िक्र तथा कोशिश करते हैं। वैसे करता तो सब मालिक है, उसी की प्रेरणा से सब होता है। वह कृपा कर देगा तो इस अहम् ता तथा ममता में फंसी हुई कस्तूरी का भी कल्याण तथा उद्धार हो जावेगा। यह साधन मेरे लिये तो बहुत ही अच्छा है, क्योंकि न इसमें बहुत परिश्रम है, न इसमें बहुत बुद्धि की ही आवश्यकता है, जो मुझमें बिल्कुल ही नहीं है। अब प्रकाश दिखना फिर कम हो गया है, परन्तु आनन्द काफ़ी है।

केसर आपको प्रणाम कहती है और कहती है कि आपके बतलाये अनुसार अभ्यास कर रही हूँ, परन्तु अभी हालत पहले ही जैसी है, कोई फ़र्क नहीं है।

आपकी दीन-हीन सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-5
शाहजहाँपुर
24/7/1948
पत्र मिला, हाल मालूम हुआ। प्रकाश के बारे में मैं पहले लिख चुका हूँ कि किसी को दिखलाई पड़ता है, और किसी को नहीं, और इससे तरक्की में कोई हर्ज़ नहीं पड़ता। फिर लिखता हूँ कि मार्ग मिल जाने पर, बस उसी पर चलना चाहिये और उसी के उसूलों पर आरुढ़ रहना चाहिये। तुम्हारे पिता जी तुम सब लोगों की उन्नति चाहते हैं, इसमें संशय नहीं। तुम्हें भी ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिये कि वह भी इस मार्ग में अच्छी उन्नति करें और वह बाधाएँ छूट जायें जो उन्नति में बाधक हैं।

देखो किसी कवि ने कितना सुन्दर कहा है -

‘एक हि साधे सब सधै, सब साधे सब जाये।’

इस पर तुम सब को अमल करना चाहिए, यह बड़ी अच्छी बात है। दुनिया के नियम कुछ ऐसे हो रहे हैं कि अपने मतलब की गरज़ से जाने कितनी पूजाएँ ईज़ाद कर लीं। एक से अनेक में तबियत फिरने लगी। विचार की बहुत सी धाराएँ पैदा हो गई, और फिर वह अपने देवता के इर्द-गिर्द फिरने लगीं। हालत ऐसी हो गई, जैसे फव्वारे में पानी हजारों धारें बन कर निकलता है। एकाग्रता जाती रही। असल से दूर होते गये। अब समझाने से भी नहीं मानते, ऐसी हालत बन गई। इलाज सबका बस यही है कि सिर्फ़ ईश्वर प्राप्ति ही अपना उद्देश्य रहे। हजारों वर्ष हम दुनिया में रहे और लाखों वर्ष और दुनियाँ में रहना चाहते हैं। हम वह तरीका क्यों न ग्रहण करें कि जहाँ से आये हैं, वहीं समा जायें और उन आगामी लाखों वर्षों को बचा लें।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-6
लखीमपुर
28/8/1948
आपको बहुत दिनों से पत्र नहीं डाल सकी, कृपया क्षमा कीजियेगा। बहुत दिनों से अपनी दशा को ठीक समझ नहीं सकी थी और न कुछ अब समझ में आता हैं। पहले कुछ दिन प्यारे सर्वेश्वर प्रभु को दिन भर में एक-दो घन्टे तक भूल सी जाती थी, परन्तु फिर याद आने पर बहुत अधिक बेचैनी होती थी। फिर किसी काम में तबियत नहीं लगती थी। पूज्य बाबूजी, मैं अपने ईश्वर से संसार में सबसे अधिक प्रेम करना चाहती हूँ और कोशिश भी यही करती आ रही हूँ। मुझे त्रिभुवन में कुछ नहीं चाहिए, बस केवल अपने आराध्य देव जगदीश्वर में ही सदा सर्वदा रमण करने की मेरी प्रबल इच्छा है और इसीलिये तमाम कोशिश है और यह इच्छा भी कि जिस प्रभु को अर्पण हो चुकी हूँ, उसी को अर्पित रहूँ। फिर दिन भर ‘उसी’ की याद करने से अब वह दशा जाती रही है, परन्तु जब से वह दशा गई है, तब से करीब दस-बारह रोज़ से हृदय में बहुत भारीपन लगता था और Sitting लेने पर भी तबियत कम लगती थी। परन्तु कल से तो मेरे प्यारे ईश्वर ने जैसी दशा कृपा करके मुझ सी अधम और सर्व-साधन रहित को दी है, इससे मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप के बताये हुए साधन से और मालिक की कृपा से मैं अपने अत्यन्त ही प्यारे ईश्वर को प्राप्त कर सकूंगी।

कल तो हृदय में भारीपन बहुत अधिक था, परन्तु आनन्द इतना अधिक था कि बिल्कुल मस्त सी घूमती रही। अब आज करीब तीन बजे से तो इतना प्रेम लगता है कि पैर भारी होते हैं। चलने तथा लेटने में भी एकदम बैठकर बिल्कुल बेकाबू सा मालूम होता है। पूज्य बाबूजी, यह सब मालिक की कृपा ही है। बस आपसे मेरी यही प्रार्थना है कि मैं ऐसे ही आनन्द में सराबोर रहूँ। मालिक को कभी-कभी इस भिखारिन की भी सुधि दिलाने की कृपा करियेगा। पूज्य पिताजी आनन्द में मस्त होकर प्रभु में ही रमते हैं और उस सर्वशक्तिमान प्रभु से उनकी भी याद दिलाते रहने की कृपा करियेगा और सब ठीक है। केसर कहती है, कि Sitting तो लेते हैं, परन्तु दशा बदली हुई नहीं मालूम पड़ती है।

अपना आशीर्वाद सदा मेरे मस्तक पर रखे रहियेगा। पूज्य मास्टर साहब ने कल sitting दी थी। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-7
लखीमपुर
10/9/1948
पत्र मेरा आपको मिला होगा। आपने उसका उत्तर पूज्य मास्टर साहब को दिया था, सो उन्होंने बताया था। आप मेरे पत्र का उत्तर देने की चिन्ता न किया करें, बस अपनी पवित्र कृपा दृष्टि से मेरा उद्धार ही करने की कृपा करें।

मैंने आपको जो हालत लिखी थी कि परम् कृपालु ईश्वर ने अपने प्रति मुझसी अधम को भी प्रेम दिया, वह हालत फिर इतनी बढ़ी, प्यारे ईश्वर ने इतना प्रेम दिया था कि कभी-कभी तो बस लेटकर लोटती भी थी, परन्तु फिर अपने को काबू में करना पड़ता था। परन्तु अब तीन-चार दिन से तो हृदय बिल्कुल खाली मालूम पड़ता है। अब भी पूज्य मास्टर साहब जब Sitting देते हैं, उसके एक-दो दिन तक फिर बहुत प्रेम मालूम पड़ता है। रोम-रोम प्राण प्यारे ईश्वर के प्रेम में खड़ा हो जाता है। लेकिन वह बात जो पहले थी, वह नहीं है। अब तो बिल्कुल भूली सी रहती हूँ। हृदय बिल्कुल खाली सा लगता है। मेरे पूज्य बाबूजी, मुझ से तो कोई साधना नहीं हो पाती। मेरा मन तो कितना मलिन है, यह तो आप तथा मास्टर साहब जानते ही हैं। केवल कोशिश अवश्य करती हूँ और मालिक से तथा आपसे यही विनती है कि एक पल भर को उस करुणा-सिन्धु प्रभु का विस्मरण न हो। मैं उन्हें कभी न भूलूं। पूज्य बाबूजी, मैं तो दरिद्रिनी हूँ और मेरा ईश्वर ही मेरे लिये पारस मणि है। फिर मुझे किसी की कामना न हो यह विनती प्रभु से मेरी है।

आपके आशीर्वाद से जो कुछ थोड़ी सी साधना इस शरीर से हो जाती है, उसमें दिन दूनी, रात चौगुनी मेरी उन्नति हो। केसर, माता जी वगैरह सब लोग आपके बतलाये अनुसार ध्यान करती हैं। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-8
शाहजहाँपुर
14/9/1948
पत्र मिला। जवाब शीघ्र इसलिये न दे सका कि कोई लिखनेवाला मौजूद न था। बहुत से खत पड़े हुए हैं। अब सब का जवाब दे रहा हूँ।

तुम्हारी आत्मिक-दशा जान कर चित प्रसन्न हुआ। ईश्वर तुम्हे अपने उद्देश्य में सफल करे। बेचैनी ईश्वर की याद के लिये पैदा होना बड़ा अच्छा है। मैं इसका वर्षों शिकार रहा हूँ यही एक चीज है जो धुर तक पंहुचा देती है और हमारे लिये यही शान्ति है। भक्त की तारीफ यही है कि वह ‘मालिक’ की याद में बेचैन रहे। लोग शान्ति दूढ़ते हैं, जंगल में जाते हैं, मगर इस अनमोल रत्न पर कोई बिरला ही आकर्षित होता है। तुम आइन्दा खत में लिखना कि अब भारीपन किस कदर है। इस भारीपन की दो वजह हुआ करती हैं। एक वजह तो यह होती है कि जो लोग मूर्ति-पूजन करते हैं, उनके दिल में जो ठोसता पैदा हो जाती है, उसको जब यह चीज़ दूर करती है, तो यह बात महसूस होने लगती है। दूसरी वज़ह यह होती है कि आत्मिक-बल हृदय में प्रेम द्वारा ज़्यादा समा गया हो और वह हज़्म न हुआ हो। पहली वज़ह जब होती है, तो दिल में सख्ती ज्यादा मालूम होती है। दूसरी वज़ह कमतर होती है। अब तुम लिखना कि इस की वज़ह जो तुम्हारे समझ में आवे। सम्भव है कि यह बात कम हो गई हो। मैं चाहता हूँ, यह चीज स्वयं ही दूर हो जावे, ताकि तकलीफ न हो।

ता. २७.८.४८ को श्री कृष्ण जन्माष्टमी का दिन था। मेरे लिये आज्ञा यह है कि इस दिन जो लोग जहाँ-जहाँ व्रत रखते हैं, उनको आत्मिक लाभ पहुँचाऊँ इस लिये, उस रोज़ में घण्टों यही काम करता रहा। आज्ञा यह भी हुई थी कि दूसरे दिन भी व्रत रखूं, यानी दो दिन व्रत के लिये हुक्म था। मगर शरीर निर्बल होने के कारण आज्ञा मिली कि एक रोज मैं व्रत रखू और दूसरे रोज़ एक गुरुभाई, जो आत्मिक उत्रति के उच्च शिखर पर है, जिनका नाम पण्डित रामेश्वर प्रसाद मिश्र है, व्रत रखें । यह बात दो-तीन वर्ष से चली आ रही है। तुमने अपने पिता जी की आत्मिक उन्नति के लिये, जैसा कि मैंने किसी पत्र में लिखा था, प्रार्थना की होगी।

मैं तुम्हारे पिछले पत्र का उत्तर लिख चुका था। आज १६ सितम्बर को दूसरा पत्र मिला। उसमें तुमने एक बात लिखी है, वह मेरी समझ में नहीं आई, कि क्या मतलब था। वह यह है कि ‘जो पहले हालत थी, अब नहीं है’। पहले वह कौन सी हालत थी कि जिसके अब न होने से चित्त में ग्लानि है। कदम आगे ही बढ़ना चाहिये और ईश्वर से इसी की प्रार्थना करनी चाहिये। 'वह’ सब कुछ कर सकता है। केसर और तुम्हारी माता जी पूजा करती हैं, यह सुन कर खुशी हुई।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-9
लखीमपुर
22/9/1948
पत्र आपका मिला। आप का आशीर्वाद पाकर मुझे बहुत प्रसत्रता हुई। आपने भारीपन के बारे में पूछा, वह आपने जो दूसरी वजह लिखी थी, शायद उसी से था। श्री कृष्ण-जन्माष्टमी को अपने में ईश्वर के प्रति दिन भर इतना प्रेम भरा हुआ लगता था कि शरीर में बार-बार रोमांच होता था और कभी-कभी मालूम पड़ता था कि कोई शक्ति बारम्बार हृदय में भर रही है। बस, उसी दिन से तीन दिन भारीपन रहा, उस के बाद बिल्कुल दूर हो गया। फिर तो हृदय बिल्कुल खाली हो गया था। बहुत हल्कापन मैंने दूसरे पत्र में इसी भारीपन के विषय में लिखा होगा, क्योंकि जब से यह साधना कुछ शुरु की है। हाँ, जब ज़रा सी देर को भी प्रभु की याद नहीं आती, तब बेचैनी बहुत होती है। सो आपने लिखा है कि अच्छी चीज़ है। पूज्य श्री बाबूजी, मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि किसी भी हालत में कदम जो ईश्वर को प्राप्त करने के लिए उठ चुके हैं, अब पीछे देखने का नाम भी न लेंगें। सदा ‘प्यारे’ की याद में मस्त ‘उसी’ के पास बढ़ती ही जाऊँगी। मालिक से प्रार्थना करुँगी, ‘उसके’ आगे गिडगिडाऊँगी और पीछे नहीं हटूँगी, परन्तु बाबूजी आप के आशीर्वाद की और अपने प्रभु की कृपा की मैं सदा भिखारिनी हूँ।

अब मेरी जो हालत है, वह लिख रही हूँ। ता. १४ को मैं लखनऊ गई थी, डाक्टर को दिखाने। उस दिन मेरे मालिक ने जो हालत मुझे दी और जो अब है, वह बहुत ही अच्छी मालूम पड़ती है। उस दिन सुबेरे छ: बजे की बस से गई थी, परन्तु ऐसी बेहोशी की हालत रही कि न तो दिन भर यह मालूम पड़ता था कि किसी सवारी में बैठी हूँ न यह मालूम पड़ता था कि चल रही हूँ, न आँखों से ही कुछ दीखता था। अजीब हालत थी। शरीर बिल्कुल फूल की तरह हल्का था और उसी दिन से बिल्कुल हल्की हालत अब तक है, परन्तु वैसी बेहोशी नहीं है। पूज्य बाबूजी, आपने जब से मुझे लिखा था, तब से ही पूज्य पिताजी के लिये अपने मालिक से उनकी आत्मिक उन्नति के लिए प्रार्थना करती हूँ। पूज्य श्री पण्डित रामेश्वर प्रसाद मिश्र जी के चरणों में मुझ महा अधम कस्तूरी का सादर प्रणाम। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-10
शाहजहाँपुर
26/9/1948
पत्र मिला-तबियत प्रसन्न हुई। तुमने जब अपने भारीपन का हाल लिखा था, मैंने ईश्वर से तुम्हारे लिये प्रार्थना की। ईश्वर-विषय में मैं और तुम दोनों ही भिखारी हैं। उसकी जो मर्ज़ी होती है वही होकर रहता है। वह जिसको अपनी ओर खींच लेवे, वही कामयाब है। एक फ़ारसी कवि ने कहा है:- जिसका मतलब यह है कि- ‘बिना तेरी मर्ज़ी के तेरे दर्शन नहीं होते’। अब दर्शन किसको कहते हैं वह वाकई हालत क्या है, और आम जनता इसको क्या समझ रही है? अगर मैं इसकी व्याख्या करूँ तो बहुत कुछ हो सकती है मगर वाक़ई में मैं इसकी व्याख्या उस रोज करूँगा, जब ईश्वर तुममें वह हालत पैदा कर दे। मैं उस प्रतिज्ञा से बहुत खुश हुआ। तुमको ईश्वर करे, इसमे सफलता प्राप्त हो। ईश्वर करें तुम अपने घर को उजाला करो। यही नहीं, ईश्वर वह समय लावे कि तुमसे दु:खी लोग फायदा उठावें। अगर तुम दिल से प्रार्थना चौबे जी के लिये कर दोगी, तो खाली नहीं जा सकती। ईश्वर तुमको अहंकार से बचावे। चौबे जी अब अच्छे हैं, मगर तुम्हारी माता कुछ ऐसी भंभेर में पड़ी हैं, कि उस सर्व-शक्तिमान ईश्वर की तरफ उनका झुकाव सही मानों में नहीं होता। हमें तो उससे प्रेम करना है, जिसका रंग व रुप कुछ नहीं। यह चीज़ जो तुम कर रही हो, और हम सब लोग कर रहे हैं पर उसी का झुकाव और विश्वास पूरी तौर पर हो सकता है जिसको कि ईश्वर अब इस चोला छोड़ने के बाद दुनिया में लाना नहीं चाहता।

अपनी माता जी से नमस्ते कह देना व पूज्य चौबे जी से भी। अपनी बहनों से भी मेरा आशीर्वाद कह देना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-11
लखीमपुर
17/10/1948
आशा है आप आराम से पहुँच गये होंगे। आपके यहाँ आने से हम सब लोगों का बहुत लाभ हो गया तथा शान्ति भी बहुत मिली। मैं आपको लिख चुकी हूँगी कि मेरी दशा कुछ भूली सी रहती है और जब से पूज्य मास्टर साहब ने दूसरी Sitting दी थी, तब से शान्ति भी हृदय में बहुत रही। करीब पाँच महीने से तो ईश्वर की कृपा से शायद एक क्षण को भी मेरा मन अशान्त नहीं हुआ। परन्तु अब की से आप न जाने कौन सी चीज़ हृदय में भर गये हैं, कि उसको मैं बतला नहीं सकती हूँ। केवल इतना कह सकती हूँ कि आज कल की दशा शायद एक मुर्दे की तरह है। ‘ॐ’ को आपने हृदय की धड़कन में सुनने को जो कहा था, वह कभी उंगलियों में और कभी पीठ में भी होता मालूम पड़ता है। आप के यहाँ जिस दिन मैं अन्तिम बार गई थी, उस दिन से मुझे अपनी दशा बहुत ही अच्छी मालूम पड़ती है, परन्तु क्या अच्छी है, यह नहीं मालूम और उसी दिन, रात को पूज्य ताऊजी आपके साथ दावत में चले गये थे, इसलिये उन्हें आने में देर हो गई और मैं थोड़ी देर ध्यान में बैठ गई, तो न जाने कहाँ से आवाज़ आई कि ‘इतनी मेहनत मत करो’।

पूज्य श्री बाबूजी, मैंने जो उपरोक्त हालतें लिखी हैं, वे सब केवल मेरे मालिक की अहेतु की कृपा और आपके आशीर्वाद और कृपा से ही हैं। मुझको आप जानते ही हैं कि कितनी अधम हूँ। बस प्रार्थना उस जगदीश्वर से और आप से यही है, यही थी, और यही रहेगी कि तव कृपा से जल्दी से जल्दी मेरी परम् आत्मोन्नति हो। प्यारे ईश्वर में मेरा अनन्य और निष्काम प्रेम हो। थोड़े दिन हुए, मास्टर साहब ने सिटिंग दी थी, उसके दो-तीन दिन तक केसर को दिन भर नींद सी आती रहती थी और आजकल अपने आप भी ध्यान करने से बायाँ हाथ कुछ सुन्न सा हो जाता है। पूज्यश्री बाबूजी मैं तो बस प्यारे ‘मालिक’’ की याद में बेचैन रहूँ और जल्दी से जल्दी मैं उसे प्राप्त करूँ इसलिये, जो कुछ भी बन पड़ेगा करुँगी।

केवल ईश्वर के प्रेम और आपके आशीर्वाद की भिखारनी,
आपकी पुत्री-कस्तूरी "
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-12
शाहजहाँपुर
23/10/1948
पत्र मिला-खुशी हुई। ईश्वर का धन्यवाद है कि तुम्हारा रुझान उसकी तरफ हो रहा है। ईश्वर तुमको खूब रुहानी तरक्की देवे । तुमने जो कैफ़ियत शान्ति की लिखी है, अच्छी है, मगर, इस शान्ति में अगर बेकरारी न हो तो ऐसा है, जैसे अच्छे भोजन में नमक न डाले। कैफ़ियत अपनी लिखती रहा करो। मुर्दे की सी दशा, जो तुमने लिखी है, इसका जवाब मैं बहुत दिनों बाद दूँगा, अगर याद रही। इस पर अभी ज़्यादा लिखना मुनासिब नहीं समझता। एक खत में किसी हालत के बारे में पहले भी यही लफ़्ज़ लिख चुका हूँ, कि फिर जबाब दूँगा। अगर इनको किसी डायरी में नोट कर लो, तो मुमकिन है कि मुझे याद दिलाने पर याद आ जावे। केसर की मुझको याद अक्सर आ जाती है। उसके भजन मुझे बहुत पसन्द आये थे, इस वजह से मुझे और भी याद आ जाती है। तन्दुरुस्ती तुम, जहाँ तक हो सके अपनी बनाने की कोशिश करो, यह बात बहुत आवश्यक है। माता जी से मेरा प्रणाम कहना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-13
लखीमपुर
28/10/1948
मेरा एक पत्र आपको मिला होगा। मैंने उस पत्र में जो दशा लिखी थी, उसकी जगह करीब नौ-दस दिन से जो दशा अब मेरे प्रभु ने मुझे प्रदान की है, वह मेरी बहुत ही प्रिय वस्तु है। मेरे बाबूजी, कैसे लिखूँ, लिखा नहीं जाता कि जो रोना मुझे कभी-कभी आता था, जो बेचैनी मुझे कभी-कभी होती थी और जिसकी भीख सदा ही उस अपने प्रिय ‘दाता’ से नित्य-प्रति माँगा करती थी, वही बेचैनी वही रुलाई, नौ-दस दिनों से मेरी हर समय की संगिनी हो गई है। इस रोने में कितना आनन्द आता है। कि जी ही नहीं भरता, परन्तु जब काबू करके कुछ काम करने लगती हूँ, तो भीतर सिसकियाँ उठती हैं। अब यह दशा है कि जब रोना बन्द हो जाता है, तो बेचैनी बहुत होने लगती है। परन्तु श्री बाबूजी, कल से दोनों दशायें कम हो गई हैं और हृदय में बहुत हल्कापन तथा शान्ति भी बहुत मालूम पड़ती है। वैसे तो जो दशा ‘मालिक’ देगा, वह सिर माथे मंजूर है, परन्तु जितना आनन्द उन दो दशाओ में है, उतना मुझे शान्ति में भी नहीं आता है। इसलिये मैं तो उस सर्वव्यापी जगदीश्वर के आगे सधे हृदय से उसकी याद में रोने और बेचैन होने की ही भिखारिनी हूँ। आप से भी यही विनती है, जब कभी इस दीन के लिये प्यारे ईश्वर से प्रार्थना करें, तो इसके लिये यह दो चीज़ ही मुख्यतः माँगे। मेरी प्रार्थना तो सच्चे हृदय से पूज्य पिताजी के लिये भी यही है कि ‘मालिक’ उन्हें जल्दी से जल्दी ये ही दोनों रत्न दें। इन दोनों रत्नों को अपने हृदय में छिपा कर रख लूँगी। यह दशा मैं ने ७-८ दिन हुए ‘भक्त प्रहलाद’ नामक नाटक जब से देखा था, तभी से अधिक बढ़ गई है। प्रभु के प्रति उनके अनन्य प्रेम की याद करके अब भी हृदय भर आता है। माता जी के लिये जो आपने बतलाया था, वे अभ्यास करती हैं, और उन्हें शब्द सुनाई भी काफ़ी देने लगा है।

जो दशायें उपरोक्त लिखी हैं, वे केवल प्रभु की अहेतु की कृपा और आपके आशीर्वाद और पूज्य मास्टर साहब की मेहनत का ही कुछ फल है। मेरे हृदय को तो आप जानते ही हैं कि कैसा है। पूज्य श्री बाबूजी, मेरी यह एक प्रबल इच्छा है कि मैं और मेरे की जगह केवल एक मात्र ईश्वर ही रह जाये और सब नष्ट हो जाये। आप आशीर्वाद दें तो, यह भी बहुत जल्दी हो जाये।

आपका कृपा-पत्र अभी मिला। आपका आशीर्वाद सदा मेरे सिर पर है। अब कोई शक्ति ऐसी नहीं है जो मुझे एक क्षण को भी ईश्वर की याद से अलग कर सके। पूज्य बाबूजी, मुझमें प्रेम तो बिल्कुल ही नहीं है, क्योंकि मैंने सुना है कि सच्चे प्रेम में मैं और मेरा का सदा के लिये विनाश हो जाता है। और सदा सर्वत्र एकमात्र प्यारा ईश्वर ही रह जाता है। देखें, वह परम् पिता जगदीश्वर शायद कभी इस भिखारिनी को भी अपना प्रेम प्रदान करे। मैं डायरी में दोनों बातें नोट कर लूँगी।

आपकी दीन-हीन, केवल ईश्वर के ही सच्चे प्रेम की भिखारिनी,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-14
शाहजहाँपुर
2/11/1948
पत्र मिला खुशी हुई। ईश्वर तक पहुँचते-पहुँचते जाने कितनी दशायें परिवर्तित होती रहती हैं। ये हालतें प्रत्येक अभ्यासी पर गुजरती हैं। लगन अगर अच्छी है, तो अक्सर दशाएँ Feel होती हैं। तुम्हारे खत मैं रखता जाता हूँ। हर दशा पर एक-एक कर के प्रकाश डाला जा सकता है, मगर मैं उस वक्त इन दशाओं को लिखना चाहता हूँ, जब कि ये दशायें बहुत कुछ पार हो कर ऊँची उठ जाएँ। ईश्वर से कुछ दूर नहीं, वह सब कुछ कर सकता है। हमारी भूल यह है कि उसको अपने पास होते हुए भी अनुभव नहीं करते। अपनी माता जी से मेरा प्रणाम कहना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-15
लखीमपुर
11/11/1948
मेरा एक पत्र आपको मिला होगा। ताऊजी से मालूम हुआ कि कोई लिखने वाला नहीं होने के कारण आप उत्तर न दे सके। तारीख एक से दशा में कुछ बढ़ती मालूम हुई है, इसलिये अब लिख रही हूँ। उस दिन रात को करीब आठ बजे ऐसा मालूम हुआ कि कहीं से Sitting आ रही है। उस दिन की तरह आज तक मुझे कभी भी Sitting नहीं मिली। मैंने अगले पत्र में शायद शिथिलता के बारे में लिखा था, परन्तु उस दिन तो ऐसा लगा, जैसे भीतर से किसी ने मन तथा इन्द्रियों को बिल्कुल बेकार ही कर दिया है। Sitting के बाद बड़ी कमजोरी मालूम होने लगी। फिर दस या साढ़े दस बजे सो गई, तो स्वप्न देखा कि – ‘आप तथा पूज्य मास्टर साहब बैठे हुए हैं’। मैं भी बैठी हूँ। मेरे हाथ में दाने निकले हुए हैं, तो आपने कहा कि – ‘कस्तूरी लाओ तुम्हारे दानें अच्छे कर दें’। और सच ही, ‘आप’के’ पावन करों के लगाते ही सारे दाने ठीक हो गये। ऐसे ही बहुत सत्संग होता रहा। फिर आपने कहा- ‘कस्तूरी, आओ, तुम्हें Sitting दूँ। बस मैं बैठ गई।’ आपने स्वप्न में न जानें कितनी देर Silting दी। जब आँख खुली तो, सब में जैसे कि कभी-कभी कुछ मिनट को रात में मुर्दे की सी हालत मालूम पड़ती थी। उस दिन करीब दो घन्टे तक न तो शरीर का कोई अंग हिल सकता था। बस, ऐसा मालूम पड़ता था कि बिल्कुल शरीर में प्राण ही नहीं है और तो ५-६ दिन तक दिन में लेटे या रात में ध्यान देने पर मुर्दे की तरह मालूम पड़ती थी। परम् स्नेही ‘श्री बाबूजी’, अब देखती हूँ कि प्यारे ईश्वर के बिना अब रहा नहीं जाता। अब तो किसी तरह जल्दी से जल्दी कृपा करके उस जगदीश्वर से मुझे मिला दीजिये। यह हृदय अब ‘उसके’ लिये बहुत बेचैन हो रहा है। हाय! बाबूजी, क्या मालिक तक इस दीन की खबर अभी तक नहीं पहूँची? यदि नहीं, तो आप ही कृपा करके जल्दी से इस भिखारिन को उस तक पहुँचा दें। श्री बाबूजी, अब उस जगदीश्वर के बिना मुझसे नहीं रहा जायेगा। सच कहती हूँ ‘मालिक’ तक इस दीन की सूचना दे दीजियेगा। यह हृदय उसको पाने को तड़प उठा है। ऐ ‘मालिक’ मेरा कोई अस्तित्व न रह जावे। मैं तुझमें विलीन हो जाऊँ केवल तू ही तू रह जाय। बस, तू मेरा अतिशय प्यारा हो जा। इतना प्यारा हो जा कि मैं-तू एक हो जायें। श्री बाबूजी, जैसे एक छोटा अनजान बालक शाम को सिवा अपनी माँ के और किसी के पास रहना नहीं चाहता, उसी प्रकार कस्तूरी भी इस संसार रुपी ‘शाम’ में बिना ईश्वर रुपी माँ के नहीं रह सकती। इस हृदय को चीर कर यदि वह देख ले तो शायद वह इतनी देर न लगाये। ऐ मेरे स्वामी, तू ही मेरी प्यारी माँ, पालक पिता तथा आत्म-शिक्षक गुरु है। तू अब देर न कर। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ अब की हृदय के उद्वेग को न रोक सकने के कारण जो लिख गई हूँ, उसे क्षमा करियेगा।

मैं तो यही कहूँगी कि मुझमें सच्ची लगन नहीं है, प्रेम नहीं है। नहीं तो आपने लिखा था कि सच्ची लगन वाले के लिये ईश्वर अत्यन्त समीप हैं। आप कृपा करके मुझ भिखारिन की भी ऐसी ही सच्ची लगन उत्पन्न कर दें, जिससे ‘मालिक’ शीघ्र ही कृपा करें। क्या करूँ भीतर ऐसी ही अग्नि धधकती रहती है और कभी-कभी वह उभर आती है। इसलिये अब की अपने को रोक न सकी। वैसे तो दशा यह है कि जब भी Sitting लू या न लू, ज़रा याद आ जाने पर ही मन ऐसा लग जाता है, जैसे हाथ या पैर, एक ही दशा में ज़रा देर तक रखने में सो जाते हैं। वैसे ही यह दिमाग भी सो जाता है। और जैसे पहले ध्यान करती थी कि- ‘जो सब में रमा हुआ है, उस ईश्वर की मैं याद कर रही हूँ’। परन्तु अब तो ऐसा मालूम पड़ता है कि न मैं हूँ, न ईश्वर ही है, परन्तु याद में मैं मस्त हूँ। तबियत में रमाव अधिक है। कभी-कभी दिन में खाना खाते समय या कोई काम करती होती हूँ, तो अपने आप ही सब काम बन्द हो जाता है और उस जगदीश्वर की याद में मस्त सी हो जाती हूँ। कुछ तो कसौटी की पत्ती न मिलने के कारण और कुछ हूक उठने के कारण पेट की नसों पर जोर पड़ने से वह भी खराब है और सब तबियत अच्छी है। इति:।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी ।
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-16
लखीमपुर
11/11/1948
कृपा-पत्र आपका पूज्य मास्टर साहब द्वारा प्राप्त हुआ। आशीर्वाद पाकर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। पूज्य मास्टर साहब से मालूम हुआ कि आपकी तबियत खराब हो गई थी, आशा है, अब बिल्कुल ठीक होगी। पूज्य बाबूजी, अब अपनी हालत के विषय में क्या लिखूँ? बस अब तो केवल एक ही इच्छा होती है और मन में भीतर ही भीतर इसके लिए बहुत तड़पन होती है कि कैसे जल्दी से जल्दी अपने सर्वस्व प्यारे ईश्वर को प्राप्त करूँ ध्यान तो एक तरफ रहा, वह तो अब कभी हृदय पर टिकता ही नहीं। बस केवल एक ही लगन है, कि बस, आज नहीं तो कल और कल नहीं तो परसों उस जगदीश्वर में ही रम जाऊँ। हाय! बाबूजी, वह तो घट-घट वासी है। ‘उसके’ इतना पास होते हुए भी अब तक ‘उसे’ पा न सकी। हृदय में दिन भर और रात में जैसे ही आँख खुलती है, बस ऐसी ही अग्नि धधकती रहती है। रात में आँख खुलते ही बस यही वाक्य हृदय में उठता है कि हाय, किसी प्रकार जल्दी-जल्दी अपने जीवन-धन प्यारे ईश्वर को प्राप्त करूँ। आपके आशीर्वाद से मैं और मेरापन शायद ही कभी आ पाता हो। आजकल तो केवल ईश्वर को प्राप्त करने की ही एक मात्र रट लगी है। बेचैनी बहुत बढ़ जाती है, तो एकदम यह उत्साह आता है कि वह दीनों पर कृपा करने वाला ईश्वर मुझे अवश्य और बहुत जल्दी मिलेगा। स्नेही श्री बाबूजी, अबकी से जीवन ‘उसके’ प्रति हार गई हूँ। चाहे जैसे भी हो, ‘उसे’ अवश्य प्राप्त करुँगी। मेरे रोम-रोम में मेरा प्यारा ही समाया हुआ है। वह सर्वव्यापी है तो सर्व में उसको ही निहारूँगी। एकमात्र ‘उसी’ से प्रेम करुँगी। अब आप ऐसा आशीर्वाद दें और प्यारे ‘मालिक’ से मुझ भिखारिन के लिये एकमात्र यही भिक्षा माँग दें कि जन्म-जन्मान्तरों से मन जीतता चला आता है, अब की से इस मन का इसके परिवार के साथ विनाश हो जावे। पूज्य श्री बाबूजी, बहुत बार से यह देखती ही चली आ रही हूँ कि जिस हालत की आप मेरे लिये इच्छा करते हैं, ‘आप’के’ पत्र आने के पहले ही ‘मालिक’ की कृपा से मुझे वैसी ही वह दशा प्राप्त हो जाती है। केसर व माताजी आपको प्रणाम कहती हैं और कहती हैं – ‘हम पर भी आप कृपा करें’ अब की निश्चय ही मैं तो ‘मालिक’ की कृपा से जल्दी ही उसे पाऊँगी। वह कितनी शुभ घड़ी होगी, जब मैं अपने ईश्वर को पाकर मस्त हो जाऊँगी। भिखारिन को तो भिक्षा में केवल एकमात्र अपना स्वामी ही चाहिये। मज़ा यह है कि हृदय में इतनी बेचैनी रहती है, परन्तु आँसू एक भी नहीं आता है। जो कुछ भी हालत है, सब मेरे ‘मालिक’ की अहेतु की कृपा तथा आपके आशीर्वाद का ही कुछ फल है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-17
लखीमपुर
16/11/1948
मेरा पत्र मिला होगा। उस पत्र में मैंने जो दशा लिखी थी, अब उसके बिल्कुल विपरीत हो गई है। मैंने आपको बेचैनी के बारे में लिखा था, परन्तु अब तो वह बहुत ही कम रह गई है। जबसे मैंने आपको वह पत्र लिखा था, उसके दूसरे दिन से ऐसी दशा हो गई हैं कि जब sitting लेती हूँ और वैसे भी दिन-भर में कई बार ऐसा मालूम पड़ता है कि मैं बिल्कुल ईश्वर-मय हो गई हूँ और बड़ा फैलाव सा दीखता है। ऐसा मालूम पड़ता है कि मेरे में ही नहीं, बल्कि सब जगह एक मात्र ईश्वर ही ईश्वर है। शान्ति तथा हल्कापन भी बहुत है। परम् स्नेही श्री बाबूजी, मुझे ठीक दशा तो नहीं मालूम है। पूज्य मास्टर साहब ही जानते हैं जानें। बस मेरी तो उस परम् कृपालु मालिक से केवल एक यही विनती है और आपसे भी कर-जोड़ कर यही प्रार्थना है कि अब किसी तरह पीछे न हटूं, आगे ही बढ़ती जाऊँ। वैसे मुझे आजकल की दशा भी अच्छी लगती है। परन्तु बेचैनी इससे अधिक अच्छी लगती है। खैर ‘मालिक’ की जैसी भी इच्छा हो, भिखारिनी को सदा ही सिर माथे है। मेरी तो अपने मालिक से केवल यही हार्दिक प्रार्थना है और कृपया आप भी मुझ प्रत्येक साधन-विहीन के लिये यही प्रार्थना करें कि प्रतिक्षण, प्रतिपल मैं उसके निकट होती जाऊँ। पूज्य श्री बाबूजी, मुझे तो कभी बेचैनी की याद करके बेचैनी होने लगती है। अम्मा कहती हैं कि ‘शब्द’ अब बहुत कम सुनाई देता है। मन भी बहका-बहका सा रहता है। ‘शब्द’ बहुत ध्यान देने पर सुनाई देता है। आपको प्रणाम कहती हैं।
आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-18
शाहजहाँपुर
19/11/1948
तुम्हारे दोनों पत्र मिले, पढ़ कर खुशी हुई। यह ईश्वर की कृपा है कि तुम्हारा रुझान उस तरफ बढ़ता जाता है। तुमने जो कुछ भी लिखा है, उससे यह मालूम होता है कि तुम्हारी लय-अवस्था बढ़ रही है, मगर अभी स्थाई रुप में नही हुई है। हो जावेगी, अगर ईश्वर ने कृपा की और तुमने अपनी मेहनत जारी रखी। उस काम के लिये तन्दुरुस्ती की भी जरुरत है, लिहाज़ा इसकी भी फ़िक्र रखनी चाहिये। तन्दुरुस्त मैं भी नहीं हूँ। हर वक्त के दर्द ने मुझको कमज़ोर कर दिया है, मगर यह हालत मेरी बहुत कुछ सीखने के बाद हुई थी। ईश्वर कमज़ोर की आवाज़ ज्यादा सुनता है, मगर उसके सुनने से पेश्तर हमको उपाय और अभ्यास करना पड़ता है, ताकि हम इस क़ाबिल बन जावें कि हमारी आवाज़ ‘मालिक’ तक पहुँचा सके और इसके लिये तंदुरुस्ती की आवश्यकता है

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-19
लखीमपुर
26/11/1948
कृपा-पत्र आपका मिला। आशीर्वाद प्राप्त हुआ। ‘मालिक’ ने कृपा करके अब जो दशा प्रदान की है, वह लिख रही हूँ। अब तो दिन भर बिल्कुल भूली सी रहती हूँ। कभी-कभी तो आँखे अपने आप ही बन्द होने लगती हैं और फिर ऐसा लगता है मानो बेहोश सी हो गई हूँ। भीतर ही भीतर मन तथा इन्द्रियों में बड़ी शिथिलता मालूम होती है और कभी-कभी तो भीतर की थकान के कारण लेटे रहना पड़ता है। कभी-कभी बड़ा उत्साह और आनन्द आने लगता है, परन्तु कुछ ही क्षणों के लिये। बेचैनी तो जाती रही, परन्तु कुछ कसक भीतर रह गई है। परम् स्नेही श्री बाबूजी, चौबीसों घंटे केवल एक ही बात मन में समाई रहती है कि न मैं हूँ न मेरा कुछ है, बस जो कुछ देखती हूँ सुनती हूँ। एकमात्र ईश्वर ही है और क्या लिखूँ? अधिकतर तो यह होता है कि मैं भी ईश्वर ही हूँ। उदासीनता अधिक मात्रा में बढ़ रही है। पूज्य बाबूजी, जीवन तो सच-मुच वही है कि जिसमें डार में, पात में पशु-पक्षी, मनुष्य तथा वस्त्र के धागे-धागे में एकमात्र ‘ईश्वर’ ही का दर्शन हो, परन्तु अब तो बार-बार अपनी जगह भी ‘ईश्वर’ ही मालूम पड़ता है। स्वप्न के समान दिन बीत रहे हैं। यदि आपके आशीर्वाद और प्रभु की कृपा से सदा के लिये ऐसा ही हो जाता, होगा निश्चय ही। आज ऐसा मालूम पड़ता है कि बार-बार ज़बरदस्ती जागकर आपको पत्र लिख रही हूँ। यदि आपकी और पूज्य मास्टर साहब की ऐसी ही कृपा और मेहनत बनी रही तो निश्चय ही और जल्दी ही अपने एकमात्र ध्येय ईश्वर तक पहुँच जाऊँगी। आज कल तन्दुरुस्ती भी काफी ठीक है। बीच-बीच में कुछ गड़बड़ हो जाती है, फिर ठीक हो जाती हूँ। तन्दुरुस्ती का ध्यान भी अब बहुत अधिक रखने की कोशिश करती हूँ। आपने लिखा है कि ईश्वर कमज़ोर की आवाज़ अधिक सुनता है, परन्तु बाबूजी, आपको छोड़ कर मेरी समझ में कमज़ोर मनुष्य तो धीरे से पुकार सकेगा और तन्दुरुस्त की पुकार भी ज़ोर की होगी खैर मैं तो अब ‘उसके’ अर्पण हो चुकी हूँ - देर सबेर कभी तो वह अवश्य सुनेगा और मेरा विश्वास है कि वह जल्दी ही सुनेगा, क्योंकि जब आपकी तथा पूज्य मास्टर साहब की आवाज़ भी मेरे साथ मिल जावेगी, तो बहुत ज़ोर की आवाज़ होगी, फिर तो ‘मालिक’ को जल्दी सुनना ही पड़ेगा। ऐसा आशीर्वाद आप दें कि यह लय-अवस्था स्थाई हो जावे। आप यदि इच्छा भर कर देंगे तो फिर निश्चय ही यह स्थाई हो जावेगी। इस भिखारिनी का ऐसा ही अनुभव है। किसी प्रकार इस दीन की आवाज़ ‘ईश्वर’ तक शीघ्र ही पहुँचाने की कृपा करिये।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीनी,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-20
शाहजहाँपुर
10/12/1948
पत्र मिला-पढ़कर खुशी हुई। तुम्हारी हालत उन्नति पर है ‘मालिक’ का धन्यवाद है। कोशिश से सब कुछ हो जाता है, और मैं समझता हूँ, ईश्वर से मिलना आसान है। सिर्फ उस तरफ दिल का रुझान करने की ज़रूरत है और यह बात मैं हर एक से कहता हूँ। लय-अवस्था तुम्हारी बढ़ रही है। ईश्वर ने कृपा की और तुम्हारी कोशिश जारी रही तो स्थायी रुप में भी हो जावेगी, इसमें उन्नति का कोई ओर-छोर नहीं। सिर्फ लय-अवस्था ही स्थाई रुप में आ जाना काफी नहीं है। इसके आगे भी बहुत कुछ है और फिर उसका भी ओर-छोर नहीं। अगर मनुष्य सबसे ऊँची दशा में आ जावे और वह ऐसी दशा हो कि जब से दुनिया पैदा हुई, तब से और किसी को यह बात नसीब न हुई हो, तो भी उसके बाद बहुत कुछ जानने को रह जावेगा। न मालूम इस ज़माने में मनुष्य अपने आप को पूर्ण कैसे समझ लेता है। पूर्णता सिर्फ ईश्वर में है। इन लोगों की मिसाल ऐसी होती है, जैसे किसी शख्स को एक हल्दी की गाँठ मिल जावे और वह अपने आप को पंसारी समझ बैठे। ‘नेति-नेति’ वेदों ने कहा है। एक बात ज़रुर ध्यान में रखना चाहिये कि किसी शख्स से ऐसे शब्द न कहे जायें, जो अगर वैसे ही हो जाय तो उससे उसको तकलीफ पहूँचे।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-21
लखीमपुर
13/12/1948
कृपा-पत्र आपका मिला। पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। मेरा एक पत्र आपको मिला होगा। तब से दशा में कोई अधिक परिवर्तन तो नहीं हुआ, हाँ, कभी-कभी मस्तक पर बीच में शान्ति निकलती मालूम पड़ती है। Sitting लेने पर कभी-कभी जब दृष्टी वहाँ ठहर जाती है, तो ऐसा मालूम पड़ता है कि गोल चक्र सा है और उसमें कुछ स्पन्दन सा मालूम पड़ता है। वैसे अधिकतर तो जिन्दा पन तो जा रहा है, उसकी जगह मुर्दापन अधिक बढ़ रहा है। परन्तु पूज्य श्री बाबूजी, यह देखती हूँ कि चैन की जगह बेचैनी भी अन्दर ही अन्दर बढ़ रही है। केवल अपने प्रभु से मिलने की उत्कण्ठा में मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता है। यह आप या पूज्य मास्टर साहब जानें, कि क्या अवस्था बढ़ रही है। मुझे तो केवल इतना मालूम है कि ‘आप’का’ सहारा पाकर भी यदि उस सर्व शक्तिमान ईश्वर को न पाया तो मुझे धिक्कार है। यदि इस चीज़ में उन्नति का कोई ओर छोर नहीं है तो, ‘आप’के’ आशीर्वाद से और अपने ईश्वर की कृपा से जहाँ तक हो सकेगा, उस ईश्वर को पाने की इच्छा और उसकी याद का भी ओर-छोर नहीं रहने दूँगी। आपने लिखा कि सिर्फ ईश्वर ही पूर्ण है और सब अपूर्ण हैं, तो मैं पूर्ण को प्राप्त करके पूर्ण ही न हो जाऊँ, अपूर्ण क्यों रहूँ? आपके कथनानुसार बस आज से कभी भी किसी के लिये बुरी बात अब यह दीन कस्तूरी नहीं कह सकती, चाहे जो भी हो जाये। पूज्य श्री बाबू जी, आप कितने स्नेही तथा कृपालु हो कि मानसिक उन्नति के साथ शरीर की उन्नति के लिये भी कितने परिश्रम से झाऊ की लकड़ी मंगा कर यहाँ भेजी हैं। आपका परम् उपकार है, धन्यवाद है। केसर का भी पत्र भेज रही हूँ। इति:-

आपकी दीन-हीन सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-22
लखीमपुर
24/12/1948
मेरा पत्र आपको मिला होगा। कृपा-पत्र आपका स्वयं लिखा हुआ, जो पूज्य पिताजी के लिये आया था, सुनकर बड़ी प्रसत्रता हुई। ताऊजी तो बिल्कुल मस्त ही हो गये थे, होना भी चाहिये। उनकी आत्मोन्नति मालूम होकर और भी प्रसन्नता हुई। मेरी आपसे यही विनती है कि ताऊ जी और माताजी की दिन दुनी, रात चौगुनी परम् आत्मोन्नति हो। प्रतिक्षण, प्रतिपल वे ‘मालिक’ के निकट ही होते जायें। सोते, जगते सदा सर्वदा वे प्रभु की याद ही में मस्त रहें। ऐसी ही आप कृपा करें। क्योंकि ताऊ जी ने ही पूज्य मास्टर साहब से मेरी अनिच्छा होते हुए भी पहली Sitting दिलाई थी, फिर उन्होंने ही आपका दर्शन कराया था। उनके इस ऋण से उऋण होने को तो नहीं, परन्तु उन्हें ईश्वर का प्यारा बनाने की ही आप से सदा सर्वदा इस दीन की प्रार्थना है।

मैंने जैसी दशा पहले लिखी थी, अब वह बात बिल्कुल नहीं मालूम पड़ती। हाँ, जब कोई, जैसे पूज्य ताऊजी और मास्टर साहब में ईश्वर के प्रेम की बातें होने लगती हैं तो प्रेम तो बिल्कुल नहीं मालूम पड़ता, परन्तु रुलाई बहुत आती है और रोकने से भी नहीं रुकती। अब तो हर समय बहुत सरलता और हल्कापन मालूम पड़ता है। ऐसा मालूम पड़ता है कि हृदय का सारा बोझ उतर गया। कभी-कभी जब कोई आ जाता है, या मैं ही कहीं जाती हूँ तो बात करके या बीच में मन की तरफ देखती हूँ तो ऐसा मालूम पड़ता है, मानों वह कहीं लगा हुआ है। माथे में गुदगुदी कुछ अधिक मालूम पड़ती है। जैसे दिमाग सो जाता था, वैसे ही बैठे-बैठे माथे और नाभि में शून्यता मालूम पड़ती है। और कभी-कभी नाभि में कुछ धड़कन सी भी मालूम पड़ती है। वैसे अधिकतर तो शरीर ही नहीं मालूम पड़ता है। बीच में दो दिन दिमाग में कुछ बेकार के विचार आ जाते थे, परन्तु मन देखने पर शान्त ही मालूम पड़ता था। अब हालत बहुत अच्छी सी ही है। माथे से शान्ति अब भी निकलती मालूम होती है। न जाने क्यों ८-१० दिन से जो बात होने को होती है, वह पहले से ही अपने आप ही मन में आने लगती है। असली हालत तो बस यही है कि जिन्दा से मुर्दा हो रही हूँ। पूज्य श्री बाबूजी मालिक से भिखारिन के लिये उसका प्रेम माँगना न भूलिएगा, क्योंकि इसमें प्रेम की बहुत कमी है। माता जी तथा केसर का आपको प्रणाम।

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-23
लखीमपुर
10/1/1949
मेरा एक पत्र आपको मिला होगा। अब जो दशा है, वह लिख रही हूँ। कई दिनों से मन बिल्कुल डूबा सा रहता है। चाहे कुछ पढूं, बात करूँ या कुछ काम भी करने पर ऐसा ही मालूम पड़ता है, मानों अभी पूजा करके उठी हूँ। रात में जब भी सोकर उठती हूँ, तो ऐसा ही मालूम पड़ता है कि अभी पूजा ही कर रही थी। किसी भी बात का या काम का मन पर कोई असर नहीं मालूम पड़ता है। दिमाग में चाहे कोई विचार आ भी जावे, परन्तु मन फिर भी मस्त ही रहता है। जरा सी Sitting लेना आरम्भ करते ही शरीर बिल्कुल निश्चेष्ट सा होने लगता है। जो कुछ भी दिन भर में इस शरीर मन व बुद्धि से कर्म बन पड़ते हैं, बस ऐसा ही भाव रहता है कि सब ‘मालिक’ कर रहा है और उसी की प्रेरणा से सब हो रहा है। स्वप्न में भी कभी ऐसा दिखाई देता है, मानों ‘आप’ Sitting दे रहे हैं। खैर, जो कुछ भी दशा है ‘आप’ जानें, आप का काम जानें, मुझे क्या करना। मैं तो ‘मालिक’ को अर्पण हो चुकी हूँ। मुझे तो केवल एकमात्र उसे ही प्राप्त करना है। आप तो इस दीन पर कृपा करके प्रेम से इसे सराबोर कर दें।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-24
शाहजहाँपुर
16/1/1949
मुझे हर्ष है कि ऐसे अच्छे पत्र आध्यात्मिक उन्नति के मिले जाते हैं। ईश्वर को धन्यवाद है। मुझे कोई नहीं पूछता और न मेरी कोई खबर लेता है। और पूछे भी कौन, जब कि मेरे पास ज़ाहिरा कोई दौलत मालूम नहीं होती। लोग आते तो अवश्य हैं और मुझसे सीखते भी हैं, परन्तु बहुत कम। एक-आध इस गरीब को पत्र द्वारा पूछ लेते हैं। मेरे पास अब सिवाय गरीबपन के और कुछ नहीं है, जिससे लोग मेरी तरफ आकर्षित हों। तोशा (सफर का सामान) तो मैंने रखा ही नहीं, क्योंकि अब सफर करना ही नहीं हैं। अब अगर किसी से मैं यह कहूँ कि तुम सफर करो अपने वतन का तो क्या वह यह कहने का हकदार नहीं है कि ऐसे सफर से तो दर गुज़रा की मंजिल होते ही या उस पर पहुँचते ही अपना तोशा भी रख दूँ। सामान जब सब खो दिया, तो अपने पास रह ही क्या गया? क्या सफर का यही नतीजा है? फिर बात-चीत और सत्संग से लोग जब यह जानने लगते हैं, तो अक्सर उनकी तबियत हटने लगती है। इसकी मिसाल एक शाहजहाँपुर में मौजूद है।

तो प्यारी बेटी! अब मेरे पास क्या है जो मैं तुम सबको दूँ? अगर खोई हुई चीज़ फिर से हाँसिल करने की कोशिश करूँ, तो वह भी नहीं होता। इसलिए, क्योंकि मैंने उससे इस सफ़र की कीमत अदा की है। अब रह क्या गया मेरे पास? बस कुछ नहीं, और उसको लेने के लिये इक्का-दुक्का तैयार कठिनता से होते हैं। तो क्या तुम्हें यह चीज़ भली मालूम होती है? प्रेम और मोहब्बत, जिसको तुम चाहती हो, मेरे पास अब वह भी न रही, जो तुमको दे डालूं। हाँ, यह हो सकता है कि हम तुम दोनों हाथ पसार कर ईश्वर के सामने इसको देने की प्रार्थना करें। उसमें डर यह भी है कि कहीं 'उसने' (ईश्वर) यह कह दिया कि जिसने मुझे अपना सब कुछ दे डाला, तो अगर उसे प्रेम दिया जाये, तो क्या वह गरीब रख सकेगा। मुमकिन है कि ईश्वर अपना प्रेम तुमको दे देवे और भाई, अपने लिये तो मुझे शक है कि जाने वह देगा या नहीं। इस लिये कि मेरी कलई उस पर खुल चुकी है। तुमने अपनी जो कुछ भी हालत लिखी है, डर है कि मेरी तरह कहीं धोखे से इस सफर की कीमत अदा न कर दो और एक गरीब बेनवा (बेसरो-सामान) की तरह न बन जाओ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-25
लखीमपुर
24/1/1949
आपके आशीर्वाद से भरा हुआ कृपा-पत्र मिला। पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। कल पूज्य श्री मास्टर साहब और ताऊ जी से उसका मतलब समझकर, थोड़ी देर तक तो मेरी दशा बिल्कुल अचेत सी हो गई थी। पूज्य श्री बाबूजी, आप बहुत गरीब हैं। एक गरीब सिवाय गरीबपन के और दे ही क्या सकता है। इसलिये ऐ गरीब देवता इस दीन को तो बस अपनी गरीबी ही दे दें। मैं अमीर बन कर क्या करुँगी, और फिर इस निर्बल शरीर में उस अमीरी को स्थाई रखने के लिये बल बुद्धि एवं युक्ति भी तो नहीं है। रही सफ़र की बात, सो भाई, सफ़र करते-करते तो मैं बहुत थक गई हूँ, अब तो इस ऐसे सफ़र से तो छुट्टी मिले, ऐसी ही कृपा करिये।
श्री बाबूजी मैं तो सच्ची शपथ से कहती हूँ, कि इस चीज़ को लेने के लिये तो अपना सर्वस्व ही न्योछावर कर चुकी हूँ। अब यह चीज़ अच्छी हो, न अच्छी हो, इससे इस दीन को कोई मतलब नहीं है। बस इसे तो लेना ही है। यह हठ ऐसी वैसी तो है नहीं। तीन हठ तो संसार में प्रसिद्ध है – बाल-हठ, त्रिया-हठ, राज-हठ और इसमें तो तीन के अतिरिक्त चार हठ मौजूद हैं। बाल-हठ, त्रिया-हठ, राज-हठ और रोगी-हठ। पूज्य श्री बाबूजी, सच तो यह है कि मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि ‘मालिक’ से क्या माँगू। हाँ, अब तो केवल ‘उसको’ ही अर्पण हो चुकी हूँ। रोम-रोम उसी जगदीश्वर का हो चुका है। मेरी तो, मैं स्वयं भी नहीं रह गई हूँ, इसलिये जो ‘मालिक’ की मर्ज़ी है, वह दे या न दे। जिसकी चीज़ है, वह चाहे गरीबी दे या दरिद्रता दे, सब कुछ सिर माथे मंजूर है। जिसकी चीज़ है, वह स्वयं फ़िक्र करेगा - अब तो निर्द्धन्द हूँ। जब वह प्रेम देगा, तो प्रेम में मस्त हूँ। गरीबी देगा तो उस गरीबी में ही मस्त हूँ। भाई, अब तो वतन भी ‘वही’ है, सफर भी ‘वही’ है, सामान भी ‘वही’ है और मैं भी ‘वही’ हूँ। आजकल की दशा अभी तो कुछ वैसी है, जैसी लिख चुकी हूँ। अब तो शीघ्र ही बसन्त पंचमी पर हम सब आयेंगे।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-26
शाहजहाँपुर
9/2/1949
पत्र तुम्हारा २४.१.४९ का लिखा हुआ मिला। अब उत्सव के पश्चात् उसका उत्तर दे रहा हूँ। तुमने जो मेरे खत का जवाब दिया है कि एक गरीब आदमी, अपनी गरीबी दे सकता है। यह उसका जवाब था, जिसको मैंने यह लिखा है कि मैं बहुत गरीब हूँ।

गरीबी की हालत वह है, जिसको लोग तरसते चले गये हैं, और सम्भव है इसका मज़ा बहुत से ऋषियों ने भी न चखा हो। अगर हम मालदार नहीं हैं तो इसके माने यह है कि हम गरीब हैं। मालदार आदमी के पास सब कुछ होता है, गरीब आदमी के पास कुछ नहीं होता है, अर्थात् जो गरीब है, उसके पास कुछ नहीं है। अब जिसके पास कुछ नहीं है, उसके पास क्या चीज़ हो सकती है, जो दूसरों को दे? अब यदि दे, तो उस चीज का नाम ‘कुछ नहीं’ रख लिया जाये तो यह एक ऐसी चीज़ बन जाती है जो कि देने के काबिल नहीं रहती। एक आदमी है, जो किसी समय धनी था, अपनी पूँजी दूसरों को दे सकता था। जब गरीबी बढ़ती गई, उसका देना कम होता गया। जब कुछ न रहा, तो कुछ न दे सका। अब उससे माँग कर देखो तो भला उसके पास क्या है, जो देगा? अगर मुझको ऐसा ही समझ लिया जावे, तो मेरे पास देने को कुछ नहीं रहता। हाँ, इसके अन्दर एक बात ज़रूर है कि ‘कुछ नहीं’ की तह में यानी जिसको ‘कुछ नहीं’ कहा है, कोई चीज़ ज़रूर है, जो की दी जा सकती है। इसके आगे कुछ भी नहीं रहता। वहाँ पर देना और लेना सब समाप्त हो जाता है। अब इस हालत में पहुँचने के लिये तरीका बिल्कुल साफ है कि मालदार आदमी के पास जो कुछ सामान हो, उसको छीनता चले। आखिर में जब उसके पास ‘कुछ न’ रह जायेगा, तो वह गरीबी की हालत पर आ जायेगा । तो तुम चौबे जी साहब से पूछ कर लिखना कि किसी का माल व असबाब छीनना शास्त्र के विरुद्ध तो न होगा? अगर इसका जवाब वह यह दें कि सामान रहते हुए, उससे बेखबर हो जावे तो यह सवाल पैदा होता है कि किसी न किसी शक्ल में सामान तो उसके पास रहा ही, फिर सामान रहते हुए गरीबी कैसे आ सकती है और अगर बेखबर भी हो गया, तो समय पर ज़रुरत उसको सचेत कर देगी। अब क्या होना चाहिये? बस यही तरकीब हो सकती है कि सामान को ऐसी जगह रखवा देवे कि ज़रुरत पड़ने पर उसकी खबर हो जावे, तो ख्याल पैदा होता है कि यह चीज़ दूसरे के पास धरोहर रखी हुई है। यह शुरु का तरीका है, और आगे बढ़ने पर इस सामान को, जो बतौर धरोहर दूसरे के पास रखा हुआ है, ‘उसका’ ही समझ लें और अपना कोई अधिकार उस पर बाकी न रखे, तब यह बात पैदा हो सकती है कि सब कुछ होते हुए अपने पास कुछ न महसूस हो। अब मान लो कि हमारे पास जो अन्दरुनी ताकतें व सिद्धियाँ हैं, यानी जो ताकतें हमको ईश्वर से मिली हैं, उसको अगर हम सब ईश्वर की समझ लेवें और उसको इन पर काबू और अख्तियार दे देवें, या दूसरे शब्दों में इनको ‘उसके’ हाथ बेच डालें, तो हम हर चीज़ से खाली हो जाते हैं। अब यह चीज़ पैदा होती है ऐसे अमानतदार को ढूँढ़े कैसे, कि यह चीज़ उसके हवाले कर सकें? वह तो इतनी दूर है, जैसा कि ख्याल है, कि वहाँ तक पहुँचना कठिन है और अगर वह सबसे नज़दीक भी है तो उसका यह हाल है कि जैसे अपनी आँख खुद अपनी आँख को नहीं देख सकती है। तो भला ऐसे अमानतदार को कैसे पावें? जवाब इसका यही है कि हम अगर सिर से पैर तक आँख बन जावें तो कम से कम हमको कहने को ज़रुर रह जायेगा कि हम अब कुल आँख ही आँख हो गये। अब ज़रुरत सिर्फ इस बात की रह जायेगी कि हम उसको तलाश करें। जब हम कुल आँख ही आँख बन गये, तो इसके माने यह हुए कि देखने की ताकत हमारे कुल बदन में है। अब देखना क्या रहा, जब हम कुल आँख ही आँख रह गये और अब हमारे पास सिवाय इस चीज़ के कुछ न रह गया। अब यह बात भी जाती रही कि आँख को आँख नहीं देख सकती, इसलिये कि वह ताकत जो उसके देखने की तरफ हमको मायल कर रही थी, उसका अब खात्मा हो गया और इसलिये कि उन ताकतों की जगह पर जो अनेक रुप में हैं, अब आँख ही रह गई है। अब तो बेटी! यह हो गया है, कि हर तरफ वह चीज़ है, जिससे कि रोशनी निकलती है। जो आँख - आँख को देखना चाहती थी, वह अब सिर से पैर तक एक हो गई है। उसको देखने की अब अपने आप को ज़रुरत भी नहीं रही।

इस कुल इबारत का मजमून यह है कि जैसे आँख ही आँख अपने में दिखलाई देती थी, तो वह चीज़ें जाती रहीं, जिससे आँख को आँख देख सकती थी। इसी तरह से अगर हम बजाय आँख के ईश्वर ही ईश्वर को भास करने लगें तो फिर हमको अमानतदार की तलाश नहीं रह जाती। इसलिये कि फिर वह कुल चीज़ असली रुप में हो जाती है, जिसको हम अमानतदार के हवाले करना चाहते थे। अब गरीबी आई, मगर हमको मालदारी और गरीबी, दोनों का खात्मा करना है। जो तब ही हो सकता है, कि बजाय कुल आँख सिर से पैर तक बनने में वही असली आँख जो ईश्वर है बन जावें ऐसा स्वाभाविक है कि इसका भी पता न रहे, तब मालदारी और गरीबी दोनों गायब होती है। पिछली चिट्ठी में जो मैंने अपनी गरीबी का जिक्र किया था, वह हालत बन्दे की है और इसके आगे बड़ी Personality और इससे आगे अवतारों की है। इस पत्र का उत्तर अगर बेटी! तुम लिखो तो मेरा दिल बड़ा खुश हो और लिखो ही क्या, ऐसा ही होने की प्रार्थना करो। ईश्वर से कुछ दूर नहीं, वह सब कुछ कर सकता है। तुम जब शाहजहाँपुर में थीं, तो तुमने मुझसे कहा था कि बाबूजी मुझे नौकर रख लो। मैं इन प्रेम भरे शब्दों से खुश हुआ बेटी! केवल तन्दुरुस्ती का इन्तज़ार है और इसी की वजह से धीरे-धीरे का मजमून है, वरना रुहानियत असल रुप में पैदा हो जाना एक क्षण-मात्र का काम है। इस नौकरी की तनख्वाह तुमने छ: सिटिग रोज़ माँगी हैं। ईश्वर ने चाहा तो तुम्हारी वह हालत पैदा होगी कि हर समय सिटिंग ही सिटिंग रहेगी। फिर क्या होगा, जिसका मैं नौकर हूँ, उसकी ही नौकरी तुम कर लेना।

केसर ने मुझे पत्र तुम्हारे पत्र के साथ भेजा है। उसका जवाब यह है कि वह तो हमारी लड़की या बहन है और उससे ऐसा नाता भी है। मैं तो कुल दुनिया को चाहता हूँ कि मुझ से अच्छा बने और मेरी प्रार्थना भी यही है, कि इसके बदले में मुझे जितनी सज़ायें भी मिलें, मुझे सब बर्दाश्त है। इस पत्र में मैंने वैराग्य और लय-अवस्था दिखलाई है और यह भी दिखलाया है कि ईश्वर-दर्शन क्या है। ईश्वर-दर्शन की हालत और उसका आनन्द ऐसा समझ लो जैसे संग(पत्थर) बे-नमक और आखिर पर यही कैफ़ियत हो जाती है। इसके लिये जन्म-जन्मान्तर लोग मेहनत करते हैं और इसके एवज़ में जो मिलता है, उसको अगर शुरु में दिया जावे तो लोग भागने के लिये तैयार हो जायें और ईश्वर की तरफ कोई न रागिब हो।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-27
लखीमपुर
13/2/1949
कृपा-पत्र आपका मिला। पढ़कर अत्यन्त आनन्द हुआ। ऐसा पत्र मैंने तो आज तक न कभी देखा है, न सुना है। आपको, ईश्वर ने कृपा करके मिला दिया है, इसलिये ऐसे पत्रों के भी दर्शन हो जाते हैं। मैंने अगले पत्र में लिखा था कि एक गरीब आदमी, गरीबी के सिवाय और क्या दे सकता है, परन्तु श्री बाबूजी, इस गरीबी पर तो सचराचर विश्व की सभी सम्पति न्योछावर हैं। आपने लिखा है कि गरीबी की दशा के लिये लोग तरसते चले गये हैं, परन्तु मेरी समझ से गरीबी तो इस मिशन के लोगों पर किसी न किसी दिन आक्रमण करती चलेगी। क्योंकि भाई, आपने लिखा है कि-एक आदमी है, जो किसी समय धनी था। अपनी पूँजी दूसरों को दे सकता था। जैसे-जैसे वह देता गया, गरीबी बढ़ती गई और उसका देना भी कम होता गया। अन्त में उसके पास कुछ न रहा और वह कुछ न दे सका, यानी वह गरीब हो गया। इसी प्रकार आप के कथनानुसार जब धनी लोग, अपनी पूँजी ‘मालिक’ को देते (अर्पण करते) जायें या परम् कृपालु मालिक स्वयं ही छीनता जाये, तो अन्त में जब सब कुछ दे दिया जायेगा या सब कुछ छिन जायेगा, तो आप ही गरीब हो जायेंगे और उसके पास कुछ नहीं रह जायेगा। यदि आप कृपा कर के हम धनियों के धन को छीनते जाइये तो ताऊजी का कहना है कि ऐसे धन का छीनना शास्त्र के विरुद्ध नहीं होगा, वरन् ऐसे दुखियों का उपकार होगा, जो वृथा के झूठे झंझटों में पड़े हुए स्वयं ही अपने को घोर दु:ख के सागर में डुबकियाँ लगवाते हैं। वास्तव में जहाँ पर देना-लेना, सब ही समाप्त हो जाता है, वहीं सच्चा सुख है। पूज्य बाबूजी, आपने यह पत्र ही नहीं लिखा है, वरन् इसके बहाने बहुत ही सुन्दर और प्रभावोत्पादक उपदेश इस दीन को दिया है। सचमुच कितना सुन्दर उपदेश है कि यदि सामान से बेखबर हो जावे, तो भी सामान है, गरीबी कहाँ रही? बस सार यही रहा कि अपना सर्वस्व उसी ईश्वर के हाथों बेच डालें।

भाई, किसी समय यह विचार अवश्य था कि ‘वह’ अमानतदार बहुत दूर है, कि जिसके हाथ सामान बेचा जाये। परन्तु, अब तो उस अमानतदार की कृपा से ‘वह’ स्वयं इतना निकट ही नहीं, किन्तु रोम-रोम में, नस-नस में भिद सा गया है। वह न कभी दूर था, न दूर है और न रहेगा। हाँ, जब तक अपनी आँख खुद अपनी आँख को नहीं देख सकती वाला भ्रम था, तब तक ही वह दूर था। परम् स्नेही श्री बाबूजी, पूज्य मास्टर साहब व ताऊजी के समझाने से आप का पत्र कुछ-कुछ समझ तो आ गया है, परन्तु वह हृदय में ही है। उसका उत्तर लिखना बहुत कठिन है। आप लिखते हैं कि मैंने जो अपनी गरीबी का ज़िक्र किया था, वह हालत आपकी है। इसके आगे यही Personality और इससे आगे की अवतारों की है। क्षमा करियेगा, मैंने यहाँ पूज्य मास्टर साहब के घर में एक डिक्टेट सुना था, अब आपकी छिपाने की कोशिश बिल्कुल बेकार है। आप इस दीन पर ऐसे ही खुश हो जाइये, क्योंकि पत्र का उत्तर लिखने में असमर्थ हूँ। आपके आशीर्वाद से ऐसा होने की प्रार्थना अवश्य करुँगी, परन्तु भईया, कल आपका पत्र पढ़कर, ऐसा होने के लिये जब ‘मालिक’ से प्रार्थना करने लगी, तो न जाने क्या हो गया कि उसको याद करके ही मस्त सी हो गई और कुछ भी न माँग सकी। क्या बताऊँ यह तबीयत तो मेरे पास से ऊब कर न जाने कहाँ चली गई है। आपके आशीर्वाद तथा कृपा से तथा पूज्य मास्टर साहब की मेहनत से करीब दो-ढाई महीने से सोते-जागते, चौबीसों घंटे, ऐसा लगता है, मानों Sitting लेकर उठी हूँ। जब से शाहजहाँपुर गई हूँ, तब से आज तक एक मिनट भी Sitting से खाली नहीं गया है। कोशिश करके, मन को ध्यान से हटाकर, आज आपका पत्र समझ कर, ‘मालिक’ की कृपा से कुछ टूटे-फूटे शब्दों में लिखा है। भईया, अब तो ‘मालिक’ ने मुझे मोल ले लिया है। आपने ही तो मुझे बेच दिया। अब तो अपने पन का भाव ही नहीं रहता है। न जाने कैसे अब यह दशा खुद ही आकर और स्थिर होती जा रही है, कि उससे भिन्न न आप ही और न कोई चीज़ दिखाई देती है। स्वयं अपने द्वार भी उसी को काम करते देखती हूँ। जो कुछ भी लिखा है, ईश्वर जाने। जैसी उसकी मर्जी हुई उसने लिखा दिया। यह तो अब कुछ-कुछ ‘मालिक’ की मशीन हो गई है। जब जिधर चाहता है, घुमा देता है। शायद एक पत्र आपको और डाल चुकी हूँ। याद नहीं पड़ता कि उसमें क्या लिखा है। खैर, जो भी लिखा हो। मैं गवाँरिन, वैराग्य, लय-अवस्था और ईश्वर-दर्शन को क्या समझूँ। हाँ, आप के कृपा-पत्र से थोड़ी सी झलक हृदय में अवश्य मिल गई है। जब से आप के पास से आई हूँ, दशा कुछ और अच्छी हो गई है। क्या है, यह आप जानें। जब आपका मन चाहे, तब ही यह चीजे दीजियेगा। बस यह समझ लीजियेगा, अब कस्तूरी तो आपका पल्ला छोड़ने की नहीं। श्री बाबूजी, नौकर तो मैं आपकी हो ही चुकी हूँ। क्योंकि तनख्वाह दो महीने पहले से ही थोड़ी-थोड़ी लेनी शुरु जो कर दी है। अब कभी-कभी यह शक हो जाता है कि मैं उससे प्रेम भी करती हूँ या नहीं? जीवन में बहुत सरलता सी आ गई है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-28
लखीमपुर
23/2/1949
मेरा पत्र मिला होगा। यहाँ सब कुशल पूर्वक हैं। आशा है, आप भी सकुशल होंगे। जबसे मैंने पिछला वाला पत्र भेजा है, तभी से, शायद नौ-दस दिन से आत्मिक-दशा में एक बात और हो गई है, और सब दशा तो वैसी ही हैं। वह यह है कि तबियत बहुत अधिक हल्की और सरल हो गई है। जैसा कि पहले मैंने लिखा था कि हमेशा ऐसा ही लगता है, मानों Sitting ले रही हूँ, परन्तु अब Sitting लेते समय भी यह नहीं मालूम पड़ता कि Sitting ले रही हूँ। कुछ अजीब सरलता सी आ गई है। मुझे ठीक नहीं मालूम कि क्या दशा है और कैसी दशा है? पूज्य मास्टर साहब ने कहा कि अच्छी है, परन्तु मुझे अब अच्छी नहीं मालूम पड़ती है, परन्तु तबियत इससे हटना भी नहीं चाहती। अब तो भईया, उस सर्व शक्ति मान के हाथों बिक चुकी हूँ और उसने भी मुझे खरीद लिया है। अब जो उसकी इच्छा हो वह दे या न दे। आपकी आज्ञानुसार जीवनी लिखना प्रारम्भ कर दिया है और लेख भी थोड़ा लिख गया है। अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-29
लखीमपुर
9/3/1949
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी को, लखीमपुर सादर प्रणाम । ९ मार्च १९४९ आशा है आप बहुत आराम से पहुँच गये होंगे। आपके शुभागमन से हम सब क्या, सारा लखीमपुर धन्य हो गया, कि जिनके आते ही वायुमण्डल में सुख-शान्ति और पवित्रता की धारायें बहने लगी। ऐसा भाई पाकर बहन होना सार्थक हो गया। पूज्य बाबूजी, आप इसकी कोई फ़िक्र न करें। ईश्वर की कृपा से आपकी चीज़ ‘सहज-मार्ग’ का इतना प्रचार होगा और शीघ्र होगा, जैसा कि आज तक किसी संस्था का न हुआ है, और न कभी होगा ही। अब ‘आप’ ऐसा आशीर्वाद दें कि आपकी यह बहन भी आपकी सेवा में तन-मन-धन, सब न्योछावर कर सके। दशा तो आप मेरी खूब जानते ही हैं। क्योंकि मेरी कलई तो ‘मालिक’ पर कुछ-कुछ क्या, पूरी खुल चुकी है। ‘तू’ ही मैं है, और मैं ही ‘तू’ है वाली दशा है। अब तक तो मैं ही जड़ मशीन की तरह थी और अब तो सब लोग ही मुझे ‘मालिक’ की मशीन की तरह काम करते दिखाई देते हैं। सच में तो कुछ ऐसी दशा हो गई है कि:-

दर-दीवार, दर्पण भये, जित देखूं तित ‘तोय’।
कांकर-पाथर-ठीकरी, भये आरसी मोय।।

बिल्कुल एक सी ही दशा है, न किसी काम में अधिक प्रसन्नता ही होती है और न कुछ दुख ही मालूम होता है। पहले सुना करती थी कि ईश्वर, अहेतु की कृपा वाला है, परन्तु अब तो स्वयं अपने पर आज़मा भी लिया है।

जब से ‘आप’ गये हैं, तब से Nothingness की दशा बहुत अधिक बढ़ गई है, परन्तु कल की पूज्य मास्टर साहब की Sitting के बाद से तो एक क्षण को भी इससे अलग नहीं होती। जाने कैसे सब काम मेरे द्वारा हो जाते हैं, क्योंकि मेरे तो कोई विचार ही नहीं आते। पूज्य श्री बाबूजी, यह सब आप का ही दिया हुआ है, मेरा कुछ नहीं है। सदा इस दीन पर ऐसी ही कृपा बनाये रखियेगा।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-30
लखीमपुर
14/3/1949
पवित्र भईया दोज के लिये रोरी भेज रही हूँ। नेग पा चुकी हूँ, परन्तु दोज के दिन भाई का मस्तक सुना नहीं रखा जाता है, इसलिये ‘तिलक’ अवश्य लगा लीजियेगा। भाई क्या करूँ, भाई लोग इतने धनाढ्य हैं कि लालच हो आता है। और आप लोग इतने कृपालु भाई हैं कि शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं, और फिर इतनी आनन्ददायक वस्तु प्रदान करते हैं, जिसका वर्णन इस जिह्वा से नहीं हो सकता। आत्मिक-दशा के विषय में पत्र लिख चुकी हूँ मिला होगा। केसर तथा बिट्टो प्रणाम कहती हैं तथा माता जी शुभ आशीर्वाद देती हैं।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
बहिन-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-31
लखीमपुर
20/3/1949
पत्र आपका आया। पढ़कर प्रसन्नता हुई। स्वास्थ्य खराब होने के कारण शीघ्र उत्तर न दे सकी, क्षमा कीजियेगा। प्रार्थना, मिशन की उन्नति के लिये ‘आप’ की आज्ञानुसार करनी तो पहले से ही आरम्भ कर दी है। सेवा में यह तन-मन सब कुछ उपस्थित है, जब जैसी चाहियेगा, सेवा लीजियेगा। अपने स्वास्थ्य की काफी चिन्ता रखती हूँ, परन्तु पूर्व जन्म के संस्कारों से लाचार हूँ। इसलिये कुछ न कुछ तकलीफ हो जाती है, इसकी कोई चिन्ता नहीं। श्री बाबूजी, आप इसकी कोई अधिक चिन्ता न करें। ‘आप’ के जीवन में ही यह चीज़ खूब विस्तृत होगी, जिससे इस घोर संसार-सागर में डुबकियाँ लगाने वाले हम पापियों का उद्धार होगा।

मैं हूँ, सो 'तू’ है, ‘तू’ है सो मैं हूँ के मेरे लिखने के केवल इतने ही माने थे कि ईश्वर में और स्वयं मुझमें यह भेद नहीं मालूम पड़ता था कि सब काम मैंने किये हैं या ‘उसने’ यानी बिल्कुल एकता सी लगती थी। दोहे के माने यह थे कि हर चीज़ में हर मनुष्य में केवल एकमात्र ईश्वर ही ईश्वर दिखलाई पड़ता है। मैं हूँ सो ‘तू’ है, वाली दशा तो याद की कमी के कारण ‘आप’ को फिर दोबारा लिख गई थी। उस समय की असली दशा तो वही थी जो कि मैंने बाद में लिखी थी, यानी Nothingness, जो अब तक बनी हुई है।

पूज्य श्री बाबूजी, तब मैंने संकोचवश आप को एक दशा नहीं लिखी परन्तु अब पूज्य मास्टर साहब जी की आज्ञानुसार लिख रही हूँ, क्षमा करियेगा। ‘आप’ से तथा पूज्य मास्टर साहब जी से जब Sitting लेने बैठती थी और अब भी, जब बैठती हूँ तो, बजाय Sitting लेने के, ऐसा मालूम पड़ता है कि मैं ही ‘आप’ लोगों को Sitting दे रही हूँ। यह दशा अब तक है। आपका पत्र मिलने के दूसरे या तीसरे दिन ऐसे ही बैठी थी कि इतने में एकदम ऐसा मालूम पड़ने लगा कि सब में मैं ही व्याप्त हूँ। यहाँ तक कि स्वयं ‘आप’ में तथा मास्टर साहब जी में भी मुझे ऐसा ही मालुम पड़ता था कि मैं ही हूँ और यह दशा अब तो दिन भर में अक्सर हो जाती है। मैंने कोशिश की, कि ऐसी तबीयत न हो, परन्तु मैं असफल हो गयी। इसके अतिरिक्त जब से आप का पत्र मिला है, दशा बदली है, परन्तु मैं अभी तक इसे पहिचान नहीं पाई हूँ। हाँ, तबियत हल्की और अधिक हो गई है। आप का पत्र मिलने के दो दिन बाद तक तकलीफ Tonsil तथा दाढ़ में बहुत थी, इसलिये कुछ गौर न कर सकी थी।

परम् स्नेही, भईया, मैंने सुना है ‘आप’ २८ मार्च से छुट्टी लेकर Tour पर जाने वाले हैं। ‘आप’ अपनी पावन चरण-रज से हम सबको धन्य करने तथा आत्मोन्नति करने का सौभाग्य प्रदान करने की अवश्य कृपा करें। मेरी तो ‘आप’ से करबद्ध यही प्रार्थना है कि जाने से पहले ‘आप’ चार-पाँच दिन को यहाँ अवश्य पधारें।

तबियत ठीक होने पर मैं आजकल की दशा को यदि ठीक समझ सकी, तो लिखूँगी। वैसे ‘आप’ तो जानते ही हैं। आइयेगा अवश्य। यद्यपि ‘आप’ को सफ़र में बहुत कष्ट होगा, परन्तु बहन अपने सहोदर के दर्शन को सदा उत्सुक है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-32
लखीमपुर
20/3/1949
मेरा एक पत्र आपको मिला होगा। मेरी तवियत अब ठीक है। आशा है आप भी सकुशल होंगे। पूज्य मास्टर साहब जी को, जो आपने पत्र डाला था, उससे मालूम हुआ कि आप तारीख ३ की रात को जायेंगे और यह भी लिखा था कि ‘कस्तूरी’ से कहना कि मैं अभी वहाँ नहीं आ सकूँगा, इस लिये मुझे माफ करें। भाई, आप कृपा करके कम से कम इस दीन के लिये यह शब्द न लिखें तो अच्छा हो। वैसे कोई बात नहीं है, परन्तु अपने लिये यह शब्द खटकता सा लगता है। फिर क्षमा तो उल्टी मुझे आपसे माँगनी चाहिये, क्योंकि ‘मालिक’ के काम की तड़प के आगे मुझे आप को बुलाना नहीं चाहिये था। परन्तु फिर भी भाई, अब आपसे नाता ही कुछ ऐसा हो गया है। खैर, लौटने में यदि सुविधा हो, तो अवश्य पधारने की कृपा करियेगा।

मैंने पहले लिखा था कि अपनी आजकल की आत्मिक-दशा के विषय में फिर लिखूँगी, परन्तु क्या करुं, अभी तक कुछ पहिचान नहीं पाई हूँ। परन्तु इतना जानती हूँ कि ईश्वर की कृपा से दशा बहुत अच्छी है। पूज्य बाबूजी, आप मुझे पहले क्यों न मिले, जिससे तब मैं बहुत शीघ्र उन्नति कर सकती, जिससे आपका भी परिश्रम मेरे लिये कम पड़ता। खैर, ईश्वर को कोटि-कोटि बार धन्यवाद है, जिसने अपनी अहेतु की कृपा से उचित और सरल मार्ग पर चलाने को इस दीन को ‘आप’ से मिला दिया। भईया, बस अब तो एक ही लगन है कि किसी प्रकार क्षण-प्रतिक्षण मेरी परम् आत्मोन्नति होती चली जाये। और आपके तथा मास्टर साहब जी के परिश्रम तथा आशीर्वाद से ऐसा ही लगता है कि बस, सब एक ही धार हो गया है। मैंने जो Sitting देने वाली दशा लिखी थी, वह अब बिल्कुल नहीं है और मैं ही सब में स्थित हूँ, यह भी दशा अब नहीं है। अब तो न जाने क्या दशा है, हर समय बिल्कुल खाली सी बैठी रहती हूँ। बड़ी अच्छी दशा है, परन्तु इन दिनों इच्छा-शक्ति दिनों दिन बढ़ती मालूम होती है। आज Sitting ले रही थी, तो एक दृश्य दिखलाई दिया कि मैं और ‘आप’ बैठे हुए हैं। मैंने कहा कि अब तो भाई ‘मालिक’ जो चाहें, मुझसे ले सकता है तो आपने कहा कि अच्छा मैं तुझसे तेरा हाथ माँगता हूँ। बस, आपका वाक्य पूरा भी नहीं हो पाया था कि मैंने तुरंत तलवार से हाथ काटकर आप को अर्पण कर दिया। फिर आप बहुत ही प्रसन्न हुए। और वैसे आप तो इस भिखारिणी पर सदैव ही से प्रसन्न तथा कृपालु हैं। प्रार्थना, कर जोड़कर केवल एक ही है कि आप ‘मालिक’ के काम को जा रहे हैं उसके काम के बाद, यदि थोड़ा अवसर मिले तो तमाम अवगुणों की खान इस दीन कस्तूरी पर कृपा करना न भूलियेगा और ‘मालिक’ के काम के बाद जो आपके शरीर की थकान और कष्ट हों, उन्हें कृपा करके मेरे में Transfer कर दीजियेगा। इस बात को न भूलियेगा। अम्मा आप को आशीर्वाद कहती है तथा केसर प्रणाम कहती है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
बहन-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-33
लखीमपुर
2/5/1949
आशा है आप आराम से पहुँच गये होंगे। केसर कहती है कि करीब १५ तारीख से ध्यान करते समय न दिल दिखलाई पड़ता है, न कुछ, बस ‘आप’ ही दिखलाई देते हैं। तबियत में शान्ति और आनन्द भी अधिक आ गया है और मेरे विषय में तो ‘आप’ जानते ही हैं। भाई, यहाँ तो कोरा मामला है। सच में तो, अपनी साधना से स्वयं संतुष्ट नहीं हूँ और मैं चौबीसों घंटे ‘मालिक’ की याद कर सकती, तो शायद कुछ सन्तुष्ट हो जाती। परन्तु नहीं, यह मेरी भूल है। साधना की Dictionary में संतोष शब्द तो आना ही नहीं चाहिये। मेरी अपने लिये तो यही धारणा है और रहेगी कि साधनावस्था में संतोष शब्द का ध्यान में भी आना, यह साधक की (मेरी) बड़ी कमज़ोरी है। ‘मालिक’ से यही प्रार्थना है कि ऐसे ही दिन रहें और रात रहे और यह दीन कस्तूरी तेरी याद में मस्त रहे।

आत्मिक-दशा आजकल की शायद मैंने ‘आप’ से बताई थी। दिन भर यही लगता है कि जैसे किसी दूसरे नये देश में आ गई हूँ। यहाँ तक कि कभी-कभी तो रसोई घर तक भूल जाती हूँ। बस भौचक्की सी खड़ी रहती हूँ, और याद तो यहाँ तक भूलती है कि प्रार्थना करते- करते यही भूल जाती हूँ कि किससे प्रार्थना कर रही हूँ, क्या प्रार्थना कर रही हूँ। छपे हुए, जो साधकों के दस नियम हैं, उसमें लिखा है कि - ‘प्रार्थना ऐसी करनी चाहिए, कि हृदय प्रेम से भर आवें, परन्तु यहाँ तो प्रेम से हृदय भरना तो दूर रहा, बस तबियत बिल्कुल शून्य हो जाती है। उसमें प्रेम तो मालूम नहीं पड़ता। खैर ‘मालिक’ जाने। वैसे दशा जो आजकल है, वह पहले से अच्छी ही मालूम पड़ती है। शरीर के रोग निवारणार्थ ‘आप’ ने जो उपाय बतलाया है, उसके लिए कोशिश करुँगी, यदि कुछ अपना बस चला तो। ‘आप’ को शायद याद होगा, ‘आप’ ने एक पत्र में मुझे लिखा था कि – ‘कदम सदा आगे ही बढ़ना चाहिए’ बस यह वाक्य मेरे लिये पत्थर की लकीर है और ‘आप’ से भी प्रार्थना है कि यदि आप कदम आगे बढ़ने में कुछ कमी देखें तो तुरन्त मुझे सचेत करियेगा। मेरी तो यह कोशिश है कि जिस कृपालु ने इस अधम को भी एक बार अपनी पुत्री कह कर पुकार लिया है, ‘उनके’ नाम को कोई हंसने न पाये और ‘मालिक’ से भी यही प्रार्थना है। कुछ अधिक लिख दिया हो तो क्षमा करियेगा। अम्मा का आपको शुभाशीर्वाद। केसर तथा बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इति:-

आपके मिशन के सब साधकों में,
महा तुच्छ – कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-34
शाहजहाँपुर
8/5/1949
पत्र मिला, पढ़कर खुशी हुई। मैं तुम्हारे साथ में बहन का बर्ताव रखना चाहता हूँ, इसलिये कि हम सब 'लाला जी' की औलाद हैं और उन्हीं के सेवक। मगर बेटी की निगाह से मैं देखता चला आया हूँ, इसलिये दिल में बेटी का ही भाव बनता है, मगर ज़ाहिरा मैं बहन का ही भाव रखूँगा। अन्दर अगर यह भाव बहन का बन जाये, तो अच्छा है। तुम्हारी अन्य सभी बहनों से तो बहन का भाव रहता है, मगर तुमसे यह भाव नहीं बनता। तुम किसी वक्त मुमकिन है, किसी ऋषि की लड़की हो, और मोक्ष तो तुम्हारी एक बार हो चुकी है। चाभी खत्म होने के बाद फिर वापिस आना पड़ा है। अब यह नहीं कह सकता कि कितने जन्म तक आना पड़ा। अब Liberation की बारी है, अगर ईश्वर दे दे। कुछ ख्याल ऐसा भी होता है कि ऋषि पंतजली के वक्त में तुम मौजूद थी और तुम उनको जानती थीं, और उनके वाक्य सिर्फ सुने सुनाये दिल में तैरा करते थे। उस जन्म के बाद तुमने योगाभ्यास भी किया था, मगर उसको पूरा न कर सकी और उसी में मोक्ष पा गई। मुमकिन है, इस रिश्ते की वजह से तुम पर निगाह पुत्री की पड़ती है। इस भेद को मैं इस पत्र में खोलना नहीं चाहता इस लिये कि लोग इस पत्र को पढ़ें तो न मालूम मेरे बारे में क्या ख्याल करें। अगर इसके जानने की ज्यादा curiosity हो तो मास्टर साहब से पूछ लेना। मगर चौबे जी से डर लगता है। मौजूदा जन्म से पेश्तर तुम एक किसान की भोलीभाली लड़की थीं और चौदह साल की उम्र में तुम्हारी मृत्यु हुई। Innocent बहुत थीं। यह बात मैं खत के जवाब से बाहर लिख गया।

एक बात मैं तुम्हें लिखे देता हूँ और यह स्वामी विवेकानन्दजी ने भी कही है कि सिखाने वाले से जितने भी मनुष्य सीखते हैं, वे ख्वाह उम्र में बड़े हों या छोटे, सब उसकी रुहानी औलाद होते हैं। मगर कहीं इससे यह न समझ जाना कि मैं सिखाने वाला हूँ। सिखाने वाला कोई और है, जो हम सब को सिखाता है। केसर की हालत ईश्वर की कृपा से अच्छी है और उसकी चौबेजी ने सिफारिश भी की है। मगर उससे कह देना कि अभी दिल्ली दूर है, कोशिश किये जाये।

अभ्यासी को सन्तुष्ट कभी नहीं होना चाहिये और ‘मालिक’ की याद जितनी कर सके, करे। हमारा धर्म यही है कि हमें सन्तोष उसकी याद का न आने पावे। अब यह ‘मालिक’ की देन है और उसके हाथ में है कि कब सन्तुष्ट कर दे। जो नियम कि तुमने Quote किया है, वह Beginners के लिये है, कि ऐसी हालत पैदा करें। वास्तव में प्रार्थना वही है कि जैसी तुम करती हो, शून्य-दशा पैदा हो जाये। मेरा पहले वाला खत देख लेना, जिसकी नकल मास्टर साहब के पास है। सम्भव है कि चौबे जी के पास भी हो। जब अभ्यासी का सम्बन्ध ऊपर की दुनियाँ से जुड़ जाता है और वहाँ रहन होने लगती है, तो उसको यही प्रतीत होता हे कि यह मेरा घर है। मेरी भी किसी समय ऐसी हालत रही है। तुमने यह जो लिखा है कि- ‘मैं कभी-कभी रसोई घर भी भूल जाती हूँ और भौचक्की सी रह जाती हूँ’, चौबे जी की ज़बान में तो इसका जवाब यह है कि तुम्हें भूख ही नहीं लगती, स्वास्थ्य न ठीक होने की वजह से। मेरा जवाब यह है कि भूल की अवस्था पैदा हो रही है। मगर इसकी इतनी ज्यादती इस हालत में हो जाना कुछ-कुछ कमज़ोर दिमाग की भी वजह है। भौंचक्की सी रहजाना, यह एक आध्यात्मिक हालत है, जिसकी अभी शुरुआत है, पूर्णरुप में अभी नहीं आई है। मैं यह बताना नहीं चाहता कि पूर्ण रुप में आ जाने के क्या Symptoms हैं, इसलिये कि यह ख्याल तुम हालत आने से पहले ही कहीं बाँध न बैठो। Godly Science के खुलने कि शुरुआत उसी वक्त होती है, when a man begins to wonder.

Swami Vivekanand (८.१५. सांय):- This condition is rarely found. All Abhyasis approach, but do not stay. It is bestowed, no doubt. Daughter ! Excellent letter it is. See the approach. You will not be getting such a Master. I am sorry. Nobody comes to Him for this sort of training. All are over whelmed. Such a Master will not appear in future, Masterly command he has got. People are still sleeping in deep slumber inspite of my repeated warnings. Avail daughter, tThis opportunity. May God bless you. You do not know the condition of your father and mother. They too are unaware of it. What He (Ramchandra) has achieved at Lakhimpur, others require a thousands of years. See his efficacious training; salvation is sure for your mother because she has brought forth such a good master. Stones cannot breed such a good master. It is she only and her kinsman.

लालाजी साहब तुम्हारी माताजी की इस वक्त तारीफ़ कर रहे हैं कि वास्तव में ख़्याल पुत्र का जमाने वाला हो तो ऐसा ही हो, जैसे तुम्हारी माँ, तब फायदा है। मास्टर साहब से कह देना कि मैंने इन खतों की नकलें नहीं रखी हैं। अगर रखना चाहें तो चौबे जी से करा लें।

मैं अपनी रौध में लिख गया, फिर मेरे दिल में खेद पैदा हुआ कि मैंने तुमको किसान की बेटी बतला दिया। सही बात राम जाने। मेरी समझ में आया सो ना मालूम मैं क्यों लिख गया। अगर बुरा मालूम हो, तो क्षमा करना। और इस खत की नकल किसी को न करने देना, बल्कि फाड़ देना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-35
लखीमपुर
5/12/1949
कृपा-पत्र आपका कल मिला। पढ़कर प्रसन्न होने के बजाय दशा बिल्कुल शून्य हो गई, फिर काफी देर चुपचाप लेटे रहने के बाद कुछ-कुछ ठीक होने लगी। करीब एक घंटे में बिल्कुल ठीक हो गई, परन्तु रमक आज तक आ जाती है। भाव के बारे में आप की जैसी मर्जी हो रखें, परन्तु मुझे तो आपका पहला वाला (बेटी का) भाव बहुत अच्छा लगता है। आप को भाई मानने का भाव माताजी के कहने से शुरु तो किया था और अभ्यास भी बहुत किया, परन्तु यह भाव बिल्कुल ठीक मन को कुछ गड़ा नहीं। अंत में जब आप गया गये थे, तब तो मैंने पिताजी से साफ कह दिया था कि आप से भाई का भाव करने में असमर्थ हूँ। जब आप को पहली बार देखा था, तो एकदम से ऐसा ही भाव और स्नेह आपसे हुआ था, जैसा कि एक बेटी को उसके पिता से मिलने पर होता है। ज़ाहिर में आप की जैसी इच्छा हो करें। अबकी से जब आप को पत्र डाला था, उसके दो-तीन दिन तक तबियत बिल्कुल Dull रही। खैर, कल से फिर अच्छी हो गई। आपने लिखा है कि – ‘यदि तुम्हें इस भेद को जानने को curiosity हो, तो मास्टर साहब से पूछ लेना’। इसका उत्तर तो बस यही है कि सारी curiosity तो एक (ईश्वर की) ही ओर मोड़ दी है। अब और किसी विषय के लिये curiosity ही नहीं रह गई। यदि कभी हुई, तो पूछ लूँगी। आध्यात्मिक हालत के symptoms जानने की भी मेरी अभी इच्छा नहीं है। हाँ, जब ‘मालिक’ की कृपा से इस दीन को आध्यात्मिक-दशा पूर्ण रुप में प्राप्त हो जावेगी, तब बता दीजियेगा। पिताजी (स्वामी विवेकानन्द) के डिक्टेट और उसमें दिये हुए शुभाशीर्वाद के लिये कोटिश: धन्यवाद है, परन्तु उनको किन शब्दों में धन्यवाद दूँ, यह मुझे नहीं मालूम और कोरा धन्यवाद मैं उन्हें देना भी नहीं चाहती। हाँ, यदि ‘मालिक’ की कृपा से उनकी (स्वामी जी की) आज्ञा का अक्षरश: पालन करके ईश्वरीय मार्ग में अच्छी तरह जाग जाऊँ, जैसा कि उन्होंने कहा है ‘Avail daughter, this opportunity’ और आपको किन शब्दों में धन्यवाद दूँ? आपको धन्यवाद तो मैं, जिस चीज़ को आप हम सब को देने के लिये बेचैन से हैं, उसको प्राप्त करके ही, दे सकूँगी। न जाने क्यों, जो वाक्य आपने स्वयं अपने हाथों से लिखे हैं, उनके अक्षर-अक्षर से पिता का स्नेह और blessings मुझे मिलते मालूम पड़ते हैं और प्रत्येक वाक्य से Sitting मालूम होती है। आप लिखते हैं कि ‘मैंने तुम्हें किसान की लड़की लिख दिया इसका मुझे खेद है, और तुम्हें बुरा लगे तो क्षमा करना’। कृपया इस क्षमा शब्द का प्रयोग आप इस दीन के लिये न किया करें। क्योंकि क्षमा तो मुझे स्वयं आपसे माँगनी चाहिए कि महर्षि पांतजली के समय में होने पर भी Liberate न हो सकी और अब आप सा सहायक मिलने पर भी शीघ्र उन्नति न कर सकी। किसान अगर ईश्वर से रहित होता तो मुझे अवश्य बुरा लगता।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी "
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-36
शाहजहाँपुर
15/5/1949
पत्र मिला, पढ़कर खुशी हुई। ईश्वर तुमको रोज़-व-रोज़ रुहानी तरक्की दे। मैं यह चाहता हूँ कि तुम अपनी जीवनी लिखना शुरु कर दो और जब से तुमने ब्रह्म-ज्ञान सीखना शुरु की है, उस तारीख तक आने पर अपनी रुहानी हालतें लिखती चलो। मेरे पास तुम्हारे सब खत मौजूद हैं, जो मैं भेज दूँगा। उनमें जो हालतें लिखी हैं, वह सब लिखती जाना। शुरु के हाल तुम्हारी माता जी को सब मालूम होंगे, उनसे सब पूछ लेना और अपने spiritual Development के लिये जो तरीके तुमने किये हैं, वह सब लिखते जाना।

अपनी माता जी से प्रणाम कहना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-37
लखीमपुर
20/5/1949
कृपा-पत्र आप का मिला, पढ़कर प्रसन्नता हुई। आप की आज्ञानुसार जीवनी लिखना तो पहले ही प्रारम्भ कर चुकी हूँ, परन्तु मैंने उसे बहुत छोटा कर दिया है। अब आप के पत्र से मालूम होता है कि ‘आप’ विस्तृत चाहते हैं। इसलिये पूज्य मास्टर साहब और पिताजी की सहायता से अब विस्तृत लिखना आरम्भ कर रही हूँ।

परम् स्नेही श्री बाबूजी, न जाने मुझे क्या हो गया है कि ऐसी तबीयत चाहा करती है कि छोटी बच्ची बन कर ‘आप’ की गोद में खेला करूँ और हृदय में इस बात की लहरें सी उठती हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जब मैं कभी छ: माह और कभी साल भर के बच्चे की तरह ‘आप’ की गोद में लेटी हुई होती हूँ, तो बिल्कुल Thoughtless सी हो जाती हूँ और इसके अतिरिक्त तबियत में न जाने कैसा सुहावना पन हो जाता है जो मेरी समझ से बाहर है।

वैसे भी अब हालत समझ में नहीं आती या ऐसे कहिये कि समझना ही नहीं चाहती। खैर, जो ‘मालिक’ की मर्ज़ी। एक बात यह है कि कभी-कभी थोड़ी देर के लिये ऐसा मालूम पड़ता है कि मैं सब में फैल सीं गई हूँ।

अब कुछ अपनी ढिटाई लिख रही हूँ कि ‘आप’ की गोद में बैठकर बच्चों की तरह दाढ़ी से खेलने लगती हूँ। अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-38
लखीमपुर
28/5/1949
पूज्य मास्टर साहब तथा आपके कृपा-पत्र ताऊजी के लिये आये। आपका पत्र सुनकर तबियत प्रसन्न हुई, परन्तु खेद भी हुआ, क्योंकि आपने लिखा कि - ‘आप लोगों ने मुझे गिरवी रख लिया है’। यह सुनकर प्रसन्नता हुई, परन्तु अभी खरीद नहीं पाये है, इस बात का खेद भी हुआ और अब यह फैसला ‘मालिक’ पर है कि हमने आपको गिरवी रखा है या स्वयं आपने हमको। परन्तु है अभी गिरवी का ही मामला। अभी खरीद शायद किसी ओर से नहीं हुई। क्योंकि यदि हम बिल्कुल बिक चुके होते तो अहंभाव रत्ती- रत्ती चला गया होता, जैसा कि आपने समझाया था कि ‘मैं’ कहते समय इसका भान न रहे कि यह ‘मैं’ किसने कहा? हाँ, धीरज इसमें है, कि ‘मालिक’ के हाथों बिकने की कोशिश अवश्य है, यदि वह खरीद ले और कभी-कभी कुछ दिनों को ऐसी दशा हो भी जाती है। अब आज कल की आत्मिक-दशा यह है कि ‘मालिक’ की याद आई या नहीं, इसका पता ही नहीं लगता है। कोशिश करके बार-बार याद करती हूँ, परन्तु थोड़ी देर में ऐसा लगता है कि फिर भूल गई। असली बात यह है कि यह याद नहीं रहता कि ‘मालिक’ की याद थी या नहीं थी। जब यह विश्वास होता है, कि थी, तो धीरज रहता है, परन्तु जब यह प्रश्न उठता है कि याद नहीं थी, तो कुछ बेचैनी हो जाती है। कृपया आप ही इस प्रश्न का उत्तर दें। बार-बार भौंचक्की हो जाना, यह दशा कुछ-कुछ बढ़ ही रही है। और एक बात कुछ यह हो गई है कि जब कभी रात में यह खयाल करती हूँ कि आज दिन भर में क्या किया, तो यह याद ही नहीं आता कि क्या किया अर्थात् यह मालूम नहीं पड़ता कि मैंने कुछ किया भी है। मेरी नींद कुछ दिनों से ऐसी बढ़ गई है कि रातभर बिल्कुल गहरी नींद में पड़ी रहती हूँ और कुछ मिनटों के लिये दिन में भी सोती हूँ। परन्तु दोनों बार जब सोकर उठती हूँ तो ऐसा ही लगता है कि न मालूम किस देश से आयी हूँ, जो सब कुछ भूल गई। ‘मालिक’ की कृपा से दशा कुछ अच्छी ही है। नींद की तो मेरी कुछ-कुछ यह समझ में आया कि ‘पिता’ की गोद में सोने में ही बड़ी मस्ती है। दिन में भी यह हालत, जो सोकर उठने पर होती है, अब बार-बार होती है, और अधिक देर तक रहती है, परन्तु अब अजीब नहीं लगता, जैसा कि पहले एकाएक हो जाने पर लगता था। शायद इस दशा से मेरी कुछ जान-पहिचान हो गई है। अम्मा हम सब को पूजा करायें, यह पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। अम्मा कहती हैं कि यदि आपका मतलब Sitting देने से है तो मुझे नहीं मालूम कि कैसे दी जाती है और न कुछ आता ही है और आपको और मास्टर साहब को आशीर्वाद कहती हैं। अब कुछ दिनों से ऐसा लगता है कि मन न जाने कहाँ रहता है कि कुछ पता ही नहीं लगता है। पूज्य मास्टर साहब जी से मेरा भी प्रणाम कह दीजियेगा।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-39
शाहजहाँपुर
2/6/1949
पत्र मिला, कुछ कामों में मैं ऐसा व्यस्त रहा कि मुझे पत्रोत्तर भेजने का मौका न मिला। फैलाव जो तुम्हें मालूम होता है, वह दिल के बीच के मुकाम की कैफ़ियत है। इससे यह समझना चाहिये कि तुमने उस हिस्से से अपना सम्बन्ध जोड़ लिया है, जिसके बाद ही ठोस हालत शुरु होती है। यानी उसकी सूक्ष्म कैफ़ियत में तुम्हारी पहुँच है, उसमें तुम फैल रही हो। सम्भव है बहुत जल्द ही इससे ऊँचे जाने की खुशखबरी मिले।

अपने आपको बच्चा समझ कर जो मुझसे खेलती हो, यह ईश्वरीय ख्याल कायम रखने का एक तरीका है। ख्याल एक ही होना चाहिये, रुप बदलने में कोई हर्ज नहीं और ऐसा करने से दिमाग को आराम भी मिल जाता है।

मैं पहले पत्र का उत्तर लिख चुका था कि तुम्हारा दूसरा पत्र भी आ गया। अब उसका भी उत्तर लिख रहा हूँ। इस खत ने मुझको यह उम्मीद दिला दी कि अब उस हालत के करीब हो, जहाँ कि लय-अवस्था की सूक्ष्म गति शुरु होती है। मगर यह सब हृदय-चक्र की हालतें है; अभी कुछ सैर इसकी और बाकी है। इसके बाद दूसरी इससे बेहतर हालत की खुशखबरी मिलेगी। यह हालत पहले ही चक्र की है; अभी बहुत से चक्रों का crossing बाकी है। और इसके बाद ईश्वर जाने क्या-क्या हालतें हैं, फिर भी छोर नहीं। तुमने जो यह लिखा है कि यह याद नहीं रहतीं कि ‘मालिक’ की याद थी या नहीं थी, इस चीज़ का पैदा हो जाना इस बात की दलील है कि उसकी याद आंतरिक पहुँच चुकी है, मगर यह कार्य ईश्वर का है। हमारा काम यही है कि जिस तरह हो सके, उसकी याद रखें। हमारे यहाँ अभ्यासी को यदि थोड़ी सी भी लगन लग जाती है, तो अनजाने उसकी याद कायम ही रहती है। जब हम अपना ख्याल उसमें कायम कर देते हैं, तो तेज़ मालूम लगती है। भौंचक्के होने का जवाब मैं पिछले खत में दे चुका हूँ।

नींद के बारे में जो तुमने लिखा है, उससे यह मतलब निकल रहा है कि तुम सुषुप्ति की हालत में तेज़ जाती हो और आँख खुलने पर यह मालूम होता है कि किसी नये देश से आयी हो। इसका मतलब यह है कि यह अन्दाज़ होने लगता है कि तुम सुषुप्ति में जाती हो। वैसे दूसरे आम लोगों को जो गाढ़ निद्रा में जाते हैं, जागने पर यह एहसास नहीं होता कि हम कहीं से आये हैं। इस चीज में लय हो जाना (मगर इसमें कोशिश नहीं की जाती) और फिर उसमें बका (जिन्दगी) की हालत पैदा हो जाना तुरीय का अंदाज है। मगर इसमें अभी बहुत देर है। माता जी को Sitting देने का तरीका मास्टर साहब बतला देंगे।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-40
लखीमपुर
13/6/1949
कृपा-पत्र आपका ताऊजी द्वारा प्राप्त हुआ, पढ़कर प्रसन्नता हुई। श्री बाबूजी मैं आपसे उऋण नहीं हूँ। एक गरीब के लिये इतनी मेहनत कौन करता। आठ-नौ दिन से हालत फिर बदल गई है, परन्तु अभी ठीक समझ में नहीं आई। पहले से अच्छी ही लगती है। फैलाव अब बिल्कुल नहीं लगता। भौचक्कापन भी अब मालूम नहीं पड़ता। हाँ, नींद में कुछ और गाढ़ापन है। कुछ ऐसा है कि रात को सोने में जितना मज़ा आता है, उतना Sitting में भी नहीं आता है। आपने इसका कारण तो लिख ही दिया है। ‘मालिक’ की याद के विषय में जो आपने लिखा, वह तो अब शायद छूटना कठिन है। चाहे जैसे भी करूँ, याद तो करनी ही पड़ेगी, नहीं आती तो जबरदस्ती ही सही। आपने लिखा है कि अभी बहुत चक्रों की Crossing बाकी है, परन्तु मेरी समझ से तो जब केवट मिल गया तो Cross होने में कोई कठिनता नहीं, वरन् मार्ग बड़ी आसानी और मस्ती से पार हो जायेगा। जब ‘आप’ यह लिख देते हैं कि ईश्वर जाने क्या हालते हैं, उसके बाद उसका भी छोर नहीं है, तो इससे मेरे मन में बड़ा लालच और उत्साह बढ़ जाता है। तबियत तो मैं अपनी ‘मालिक’ को अर्पित कर चुकी हूँ, अब जो उसकी मर्ज़ी हो करे। एक बात मेरे में कुछ ऐसी हो गई है, जो बात मन में जैसी आती है, वैसी ही मुह से निकल जाती है, मुझे पता ही नहीं लगता। यदि आजकल की दशा समझ सकी या और कुछ बदली, तो लिखूँगी। वैसे आज शायद कुछ और फ़र्क लगता है, किन्तु ठीक से नहीं कह सकती। केसर व बिट्टो आपको प्रणाम कहती हैं और अम्मा आशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-41
लखीमपुर
2/7/1949
यहाँ सब कुशल पूर्वक हैं। आशा है आप भी सकुशल होगें। ‘मालिक’ की अहेतु की कृपा और ‘आप’ तथा पूज्य मास्टर साहब जी के परिश्रम से मेरी आत्मिक-दशा अच्छी ही है। वैसे तो तबियत में न खुशी मालूम होती है, और न कुछ दुख ही है, अजीब सी दशा है। इधर चार-पाँच दिन बड़ी बेचैनी रही और मन भी बड़ा उचाट सा रहा और अब तो दशा फिर सम हो गई है। छ: सात दिन तो पूजा करने को किसी तरह जी ही नहीं चाहता था और यह दशा थोड़ी अब भी मौजूद है परन्तु पूजा करने की याद बराबर परेशान करती रही। खैर, अब ‘मालिक’ का धन्यवाद है कि दो-तीन दिन से पूजा में फिर तबियत लगने लगी। मैं तो बिल्कुल घबड़ा ही गई थी, परन्तु अधिक जिद्दी होने के कारण जितनी बार Sitting लेती थी उससे अधिक बार बैठी। कुछ ऐसा भी हो गया कि आप को पत्र डालने की भी तबियत ही नहीं चाहती थी। बहुत कोशिश से ता: १ को थोड़ा सा प्रारम्भ किया, फिर आध-घंटे तक कलम पकड़े बैठी रही, परन्तु दिमाग में, सोचने पर भी, कुछ बात ही नहीं आई, तो बन्द कर दिया। अब आज ‘मालिक’ की मर्ज़ी हुई तो लिख दिया। परन्तु विश्वास कुछ ऐसा बंध गया है और यह बात मालूम भी होती है कि दशा गिर नहीं रही है और न ही गिरेगी। क्योंकि ‘मालिक’ अहेतु की कृपा वाला है।

पूज्य श्री बाबूजी, प्रार्थना की आपने लिखी थी और मैं करती भी थी, परन्तु अब अच्छी तरह प्रार्थना नहीं हो पाती, क्योंकि तबियत नहीं चाहती, परन्तु मैं करती अवश्य हूँ। वैसे अब दो-तीन दिन से तबियत कुछ फिर लगने लगी है।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-42
लखीमपुर
10/7/1949
मेरा एक पत्र आपको मिला होगा। इधर कुछ दिनों से मुझे तो दिनभर सुस्ती छाई रहती है और हर समय नींद ही लगी रहती है। यह हालत जब मैंने वह पत्र लिखा था, तब भी थी, परन्तु इन दिनों अधिक बढ़ गई है। इसी बीच में ‘मालिक’ की याद में रत रहने की बेहद चाह बढ़ गई है। यहाँ तक कि रात को सोने की भी तबियत नहीं चाहती थी, इस लिये फिर मेहनत भी, जो कुछ इस टूटे-फूटे शरीर से हो सकती थी, शायद उसके बाहर तक हुई। दिन-रात की दिमागी मेहनत के कारण अब दिमाग फेल हो गया है। सिर भी घूमने लगा। जी भी घबड़ा-घबड़ा जाता है। सिर की नसें भी सब तड़क उठी और शरीर भी अधिक कमज़ोर है। बस प्रसन्नता इस गरीबनी को एक ही हुई और जिस प्रसन्नता के आगे यह सब तकलीफें बहुत हेय हो गई, वह यह है कि एक बार जी भर कर ‘मालिक’ की याद तो कर ली। परन्तु देखती हूँ कि उसकी याद में जी भरने के बजाय और उथला हो गया है।

श्री बाबूजी, ‘आप’ नाराज न होइयेगा, इसमें मेरा कोई दोष नहीं। क्योंकि इसका स्वाद तो ‘आप’ ही ने चखाया है। फिर यह शारीरिक तकलीफ़ कितने दिन की। वह हालत अब कम हो गई है। आज एक भी Sitting नहीं ली। सिर में खूब सारा तेल ठोक लूँगी। बस कल फिर अपने काम के लिये मुस्तैद हो जाऊँगी। कमजोरी की दवा डाक्टर से मंगवा कर पी ली। परन्तु असली डाक्टर साहब के पास तो अब हाल लिखकर भेज रही हूँ। मगर एक बात है कि ‘आप’ मर्ज़ दूर न करें, क्योंकि इसमें बड़ा मज़ा है। फिर ‘आप’ एक पत्र में लिख चुके हैं कि बेचैनी ही ऐसी चीज़ है, जो हमको दूर तक पहुँचा देती है। वैसे आमतौर पर न तो यह मालूम पड़ता है कि बेचैनी है। दशा एक सी हो जाती है। और एक बात कुछ यह हो गई है कि चाहे अपने आप ध्यान करूँ या पूज्य मास्टर साहब करायें, उसके बाद इतनी शिथिलता आती है कि अपने आप उठने तक में पैर लड़खड़ाते हैं और थोड़ी देर तक दिल के ऊपर बड़ा दबाव मालूम पड़ता है, परन्तु थोड़ी देर में फिर ठीक हो जाता है। अपने अन्दर कुछ एक ऐसी चीज़ हो गई है, जो हर समय मन को ‘मालिक’ की ही ओर लगाये रखना चाहती है। वह ‘मालिक’ की अहेतु की कृपा है। अब तो हालत में बड़ा गम्भीरपन सा आ गया है। चाहे कितनी हंसी की बात हो, परन्तु मुझे कुछ हंसी आती ही नहीं। न जाने, कुछ सुन नहीं पाती हूँ, न जाने क्या बात है।

अम्मा आपको आशीर्वाद तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-43
लखीमपुर
12/7/1949
कल एक पत्र डाल चुकी थी। अब आज मास्टर साहब के पत्र में जो आपने मेरे लिये लिखा कि फकीर का कदम आगे ही बढ़ना चाहिये, सुनकर परेशानी होने लगी और आगे बढ़ने के लिये शिक्षा मिली। इससे तबियत कुछ खुश हुई। परेशानी इस बात की हुई कि बाबूजी इस भिखारिन को जहाँ यह संदेह हुआ कि कदम आगे बढ़ने से कहीं रुक तो नहीं गये, बस तबियत बहुत बेचैन हो जाती है। मेरा पत्र ता. ७ को आप को मिला होगा, जिसमें मैंने लिखा था कि, न तो पूजा करने की तबियत चाहती थी, यहाँ तक कि आपको पत्र लिखने का भी जी नहीं चाहता था। हर समय आलस्य और निद्रा ही लगी रहती थी और यह अब भी है। दिमाग और मस्तिष्क बिल्कुल खाली से हो गये हैं। कल वाले पत्र में जो मैंने शारीरिक तकलीफ़ के विषय में लिखा था, आज बिल्कुल अच्छी है।

परम् स्नेही श्री बाबूजी, यह प्रतिज्ञा तो पहले कर चुकी हूँ और फिर कर रही हूँ कि शरीर में चाहे तो तकलीफ हो जाये, परन्तु कोशिश ऐसी ही रही है और रहेगी कि इस मार्ग में कदम रोज़-रोज़ आगे ही बढ़ेंगे और जब मुझे यह मालूम होगा कि अब उन्नति नहीं हो रही है, तो सम्भव है, इस बेचैनी को यह दिल बरदाश्त न करके बैठ जाये। आम तौर पर हालत यह है कि तबियत सम रहती है। जैसे मुझे कोई डाँटने लगे तो तबियत बिल्कुल गम्भीर हो जाती है। कोई काम किया, उसके बाद तबियत फिर गम्भीर हो जाती है। आप यह विश्वास रखें कि हालत बहुत अच्छी है। हाँ, एक बात लिखना भूल गई कि, आपने लिखा कि फ़क़ीर के कदम आगे ही बढ़ने चाहिये, परन्तु श्री बाबूजी, अफ़सोस है, और खुशी है कि फकीर के कदम ही न रहे और कदम क्या, जब फकीर ही न रहा तो उसके कदम कहाँ से आयें? परन्तु, श्री बाबूजी, अभी कभी-कभी एकाध बार धोखे से छिपे-छिपे यह अपनापन आ जाता है, परन्तु तबियत उस पर टिकती नहीं। असली बात यह है कि हालत अब अधिक समझ में नहीं आ पाती। इस कारण पत्र में देर हो जाती है। यह बात है मन में तो हालत कुछ-कुछ समझ जाती हूँ, परन्तु उसको प्रकट नहीं कर पाती। हालत में हल्कापन भी बहुत अधिक है।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-44
लखीमपुर
15/7/1949
आशा है, मेरे दो पत्र मिले होंगे। परसों से हालत कुछ बदल गई है। हर चीज़ से लिपट जाने की तबियत होती रहती है। कभी-कभी दीवाल तक से लिपट जाने को जी चाहता है, परन्तु न जाने कैसे काबू हो जाता है। मैंने एक बार आप को लिखा था कि मैं बच्चा बनकर अक्सर आप से खेला करती हूँ। परन्तु अब यह बात बहुत दिनों से छूट गई, क्योंकि बस, अब तो एकान्त में शान्त चित से बैठने की तबियत होती हैं।

याद का तो बहुत ही बुरा हाल हो गया है। लिखने की बात नहीं है, परन्तु सच तो यह है कि पखाने-पेशाब जाती हूँ, परन्तु यह ध्यान नहीं रहता कि कब से बैठी हूँ। खाना खाती हूँ तो यह ज्ञान नहीं रहता कि क्या खाया और किसने खाया है। बैठे-बैठे थोड़ी देर में भूल जाती हूँ कि यह कौन बैठा है. इस लिये अपने को सचेत रखना पड़ता है। यह हालत १०-१५ दिन से है, परन्तु ७-८ दिन से इस हालत की अधिकता है। सम्भव है कि अगले पत्र में मैंने इस हालत को लिखा हो। पूज्य श्री बाबूजी, इस गरीबनी को खींचे लिये चलियेगा, कहीं ठहरने मत दीजियेगा।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-45
लखीमपुर
23/7/1949
कृपा-पत्र आपका पूज्य मास्टर साहब के लिये आया। उससे समाचार मालूम हुए। पत्र में यह पढ़कर अत्यन्त खेद हुआ कि मेरी आत्मोन्नति रुक गई थी। बस, दुख तो सबसे भारी इस बात का है, कि जितने दिन उन्नति रुकी रही, उतने ही दिन ‘जिस’ पर कि यह तन-मन सब बलिहार कर चुकी हूँ, ‘जो’ इस भिखारिन का केवल खज़ाना और ध्येय है। हाय ! ‘उसके’ पास तक पहुँचने में उतनी ही अधिक देरी हो जायेगी।

पूज्य ‘बाबूजी’ आप बताइये कि इस गरीबनी से क्या त्रुटि हो गई थी? मेरी साधना में क्या कमी हो गई थी? जिससे कि मैं उसे शीघ्र सुधार लू, और ‘जिसने’ मेरा सारा चैन लूट लिया उस तक मौज और मस्ती में पहुँच सकूं। यह अवश्य है कि इस बेचैनी में ऐसा चैन है और होगा, जो सदा के लिये स्थाई है। प्रथम, जब ध्यान करने की तबियत ही नहीं होती थी और तबियत में अजीब उचाटपन था, तो मैंने यह समझा कि यह भी कोई दशा होगी, परन्तु मैंने Sitting नहीं छोड़ी। यद्यपि जब मैं ध्यान करती थी तो दिल पर बड़ा दबाव पड़ता था, परन्तु मैंने दिन-रात में छ:-सात Sitting लेना प्रारम्भ कर दिया और दिन भर, जब भी अवसर मिला, मैंने पूजा की। यह मुझे विश्वास हो गया था कि अब Sitting पचती नहीं। तो मुझे याद आया कि एक बार मास्टर साहब ने कहा था कि ‘मालिक’ की याद से सब पच जाती है, तो मैंने रात-रात भर जाग कर शुरु किया, परन्तु हृदय का बोझ बढ़ता ही गया। यहाँ तक कि दिन में चार-चार बार इतनी दशा खराब हो जाती थी कि मुंह पीला पड़ जाता था और ऐसा लगता था कि Heart Sink हुआ जा रहा है, परन्तु किसी से कुछ बताया नहीं। बताती भी क्या अपने आप ही कहीं ग्रान्डिको और कभी ग्लूकोज़ पी लेती थी, उसी में कमज़ोरी बहुत बढ़ गई। यदि मुझे तनिक भी सन्देह रुकावट की ओर होता तो मैं आप को शीघ्र लिखती। खैर, अब की ‘मालिक’ ने उबार लिया। बाबूजी, आप बीच-बीच में मुझे देखते जाया कीजिये। मैं भी अब आपको तुरंत्त ही लिख दिया करुँगी। आप की अकारण कृपा से मेरी हालत अब फिर ठीक आ गई। दिल का सारा बोझ हटकर फिर बड़ा हल्कापन आ गया है। वह दशा जो पहले लिखी थी, कि सबसे लिपट जाने को जी चाहता है, अभी है। बस नई बात यह हे कि कभी-कभी बैठे-बैठे अकस्मात बड़ी फुरफुरी सी आती है और ऐसा लगता है कि तमाम शरीर से Sitting निकल रही है। आजकल आँखे ध्यान में बन्द नहीं होतीं, बरबस खुल जाती हैं और बैठे-बैठे कभी पैर में कुछ रेंगता सा मालूम होता है। कभी उंगली में, कभी हाथों में और ऐसे ही कभी सिर में भी रेंगन मालूम पड़ती है। कभी-कभी तो किसी जानवर के चढ़ने का वहम् हो जाता है, परन्तु होता कुछ नहीं है। कभी-कभी गाते समय मालूम पड़ता है कि मुंह से बड़ी पवित्रता निकल रही है। पूज्य श्री बाबूजी, मुझे वहीं पहुँचना है कि जिसके लिये स्वयं आपने, स्वामी जी ने तथा पूज्य दादा जी (लाला जी) ने अपनी किताब में कहा है। पत्र में यह पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई कि आपने इस दीन भिखारिन के लिये यह लिख दिया कि ‘उसे मैं ठीक ले चलूँगा’। यह ‘आप’ की महानता है और यश है कि मुझ सी अधम के लिये यह वाक्य लिख दिया।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं और केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-46
लखीमपुर
26/7/1949
मेरा पत्र ‘आप’ को मिला होगा। अब अपनी आत्मिक-दशा के बारे में लिख रही हूँ। पाँच-छ: दिन से अब इसका भी पता नहीं लगता है कि Self-Surrender है या नहीं। पहले जैसे यह मालूम पड़ता था कि किसी मशीन की तरह सब काम हो रहे हैं परन्तु अब यह भी नहीं है। आज न जाने क्या है, जब मास्टर साहब जी से हाल बताती हूँ या और कुछ करती हूँ तो, मैं कौन हूँ या क्या हूँ, इसका पता ही नहीं रहता है। दूसरे अब जब Sitting लेती हूँ तो कभी-कभी समय का भी ध्यान नहीं रहता। हाँ, शरीर जल्दी थक जाता है, तब ध्यान आता है। और कभी-कभी माथे में भी बड़ा फैलाव सा लगता है। अगले पत्र में जो लिखा था कि सारे शरीर से तमाम sitting निकल रही है, यह और कोई नया हाल नहीं है।

एक हाल यह है कि ‘आप’ के इस ‘सहज-मार्ग’ में आने से मन तो बिल्कुल शायद ‘मालिक’ की याद से घायल हो गया है। परन्तु मैं तो यह कहूँगी कि इन घावों को पालने में है कोई अजीब मस्ती, परन्तु यह घाव बहुत ही छुपे और गहरे होते हैं, जिनका उभार ऊपर तक नहीं आने पाता। तभी तो ‘आप’ के मिशन में कोई जल्दी आने को तैयार नहीं होता। न जाने यह क्यों लिख गई हूँ, खैर, क्षमा करियेगा। कोई और हालत मालूम होते ही शीघ्र लिखूंगी। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-47
शाहजहाँपुर
27/7/1949
पत्र मिला, हाल मालूम हुआ। हमारे यहाँ कोई नहीं रुकता, अगर विश्वास ठीक हो तो ऐसे Station ज़रुर आते रहते हैं, जहाँ पर ठहराव कुछ हो जाता है। अगर ज्यादा दिनों तक ठहराव रहे तो तरक्की में उतने दिनों कमी रहती है और अगर कम रहे तो कोई हर्ज़ नहीं होता। यह ठहराव भी बड़ा मुबारक है। इससे आगे बढ़ने की ताकत पैदा हो जाती है। एक कारण रुकाव का और हो जाता है। वह यह है कि ज्यादा खा जाने से, हज़्म नहीं होने की वज़ह से यह बात पैदा होती है। महात्माओ ने इसको भी मुबारक कहा है। कहा तो यहाँ तक है कि अक्सर अभ्यसियों की बरसों यह कैफ़ियत रही है और इसको कब्ज़ (spiritual constipation) कहा है, मगर यह हमारे गुरु महाराज की बरकत है कि इस प्रकार का कब्ज़ जो रुकावट डाले, पैदा नहीं होता। तुम्हारी हालत कब्ज़ की न थी और न होगी, यदि ईश्वर ने चाहा। बल्कि एक Stage पार करने के बाद और उसके आगे आने वाली Stage के बीच की हालत थी। यह बीच की जगहें हर अभ्यासी को पड़ती हैं। मैंने अपनी आत्मिक बल की एड़ उससे तुम्हें निकालने को नहीं लगाई। तुम अपनी ताकत से स्वयं निकल आई, और मैं चाहता भी यही था। अगर अब तक उस हालत से न निकलतीं तो जरुर मैं अपनी will exercise करता। सबसे अच्छा चलना तो उसी को कहते हैं कि अपनी मेहनत से आगे बढे। तुम्हे अपने चित्त में गलानी नहीं करनी चाहिये, इसलिये कि अगर यह हालत न होती तो तुम उससे निकलने की कोशिश नहीं करती। अब चूकि इससे निकलने के लिये अपने हाथ-पैर चलाये हैं, इसलिये आगे बढ़ने की और ताकत आ गई। जिस्म में तुमने रेंगन लिखी है, वह चीज़ ज़िस्म में गुदगुदी पैदा करती है, या सिर्फ़ उसका कोई action सा पैदा होता है। दूसरी बात यह है कि यह चीज़ बढ़ रही है या उतनी ही है, और किसी वक्त मालूम होती है या नहीं?

माता जी से मेरा प्रणाम कहना, तथा बच्चों से दुआ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-48
शाहजहाँपुर
30/7/1949
तुम्हारा पत्र आया था, उसका जवाब मास्टर साहब के पते से भेज चुका हूँ। अब तुम्हारा दूसरा पत्र ता. २६.७.४९ का लिखा हुआ मिला। तुमने जो कुछ लिखा है कि ‘मन तो बिल्कुल ‘मालिक’ की याद से घायल हो गया है’, परन्तु मैं तो यह कहूँगी कि इन घावों को पालने में है कोई अजीब मस्ती, परन्तु यह घाव बहुत ही छुपे और गहरे होते हैं, जिसका उभार ऊपर नहीं आने पाता। तभी तो आप के मिशन में कोई जल्दी आने को तैयार नहीं होता। यह बात तुमने बड़ी सही लिखी है। अगर कोई तरकीब तुम्हारी समझ में आ जावे कि छिपा हुआ घाव ऐसा उभर आये कि अभ्यासी को प्रतीत होने लगे तो ज़रूर लिखना। सम्भव है कि चौबेजी साहब भी सोचकर कुछ बतला सकें ताकि दूसरों को लाभ हो और लोग आकर्षित हों। शौक कम होने की वजह से उन्हें यह महसूस नहीं होता। अब शौक कैसे पैदा हो? इसकी तरकीब मैं बताता हूँ। अगर कोई नहीं करता और मैं जो तवज्जह देता हूँ, वह बिल्कुल खालिस होती है। उसमें न उभार होता है और न माया का लेश -मात्र लगाव। वह ऐसी चीज़ है कि उसमें सिवाय शान्ति और हल्केपन के कोई चीज़ अनुभव नहीं होती न प्रेम, न भक्ति। जो ईश्वरीय हालत है, ठीकमठीक वही आती है और जितना काम यह बना सकती है और दूसरी तरह की तवज्जह नहीं बना सकती। और मैं इस तरह की तवज्जह देने में इसलिये मजबूर हूँ कि मेरे ‘मालिक’ ने मुझको इसी हालत में बिल्कुल लय कर दिया है। ऐसे लोग मौजूद हैं, जिनकी तवज्जह से अभ्यासी को जोर प्रतीत पड़ता है और वह उस चीज़ को अच्छा समझते हैं, इसलिये कि खालिस चीज़ जो वाकई चीज़ है उनको एहसास नहीं होती। मेरी हालत जैसी भी कुछ है, इस हालत को देखकर मुझको हर शख्स इतना Judge नहीं कर सकता, जितना कि मेरे ‘मालिक’ ने वाकई बनाया है और लोग इस वजह से अक्सर धोखा खाते हैं। अब इसका मेरे पास क्या इलाज है कि लोग हलुवा खिलाने से न खुश हों और चने चबाने से खुश हों।

तुमने जो हालत अपनी लिखी है, ईश्वर की कृपा से अच्छी है। हृदय चक्र की सैर बहुत अच्छी और काफी हो चुकी है। मैं इसको स्पष्ट रुप से और देखना चाहता हूँ और अभी इस चीज़ को और बढ़ाने का जी चाहता है ताकि कोई कैफ़ियत ऐसी न रह जाये जो पूरी तौर से न खुल जाये।

माता जी से प्रणाम कहना और सबको दुआ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र "
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-49
लखीमपुर
30/7/1949
कृपा-पत्र आप के दो मिले। एक जो पूज्य मास्टर साहब के पते से भेजा था, और एक जो उनके हाथ से भेजा था। अब हालत यह है कि यह पता नहीं रहता कि रात में सोयी थी या नहीं। सो कर उठने पर यह नहीं मालूम पड़ता कि सो कर उठी हूँ। अब तो यह भी पता नहीं रहता कि कब दिन बीत गया और कब रात आ गई। और कुछ यह हो गया है कि कभी भी हर चीज़ से बिल्कुल एक सा लगता है। Sitting लेते लेते यह भूल जाती हूँ कि Sitting ले रही हूँ। कभी-कभी सोते से एकदम हड़बड़ा कर उठ बैठती हूँ कि बहुत देर हो गई, परन्तु आँख खोलने पर देखती हूँ कि कुछ देर-बेर नहीं होती। मैंने जो शरीर में रेंगने के बारे में लिखा था, वह गुदगुदी सी पैदा करती थी और वह भी किसी किसी समय मालूम पड़ती थी, परन्तु अब तो वह चीज़ बहुत कम है, बल्कि नहीं के बराबर है। एक-आध बार दिन में कभी-कभी माथे में हो जाती है, कभी नाभि के पास मालूम पड़ती है, और नहीं भी होती है। जब मैंने आपको लिखा था, उसके दो-तीन दिन बढ़ गई थी।

‘आप’ के पत्र में यह पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई कि हमारे यहाँ कोई रुकता नहीं। अब यह आशा हो गई है कि ‘मालिक’ की अहेतु की कृपा से आगे बढ़ती ही चलूँगी। और फिर जिनको ‘आप’ सा सहायक मिल गया हो, वे कैसे गिर सकते हैं। मैं तो यह भी कहूँगी कि कोटि-कोटि बार धन्य हैं ‘आप’ के श्री गुरुदेव भगवान और हमारे श्री दादाजी , जिन्होंने हमको ऐसा ‘मालिक’ दिया कि जिसकी कृपा से हम ऐसे दीन संसारिक प्राणी भी इस अथाह भव-सागर को बिना परिश्रम के पार कर जायेंगे। हम उनके लाख-लाख बार आभारी हैं और कोटि-कोटि बार धन्य हैं। आप स्वयं, जो ऐसे बने और इतना प्राप्त किया कि संसार की धार्मिक हिस्ट्री में और यहाँ तक कि बड़े-बड़े ऋषि और महर्षि भी बड़ा परिश्रम करके भी न बन सके। और इतना क्या सम्भव है कि इसका १/४ भाग भी न प्राप्त कर सके हों। जो उपमा ‘आप’ के श्री गुरुदेव महाराज के लिये दी जाती थी, बस वही, ‘आप’ के लिये भी उचित है कि:-

‘इन सम ये उपमा उर आनी। कवि-कुल आगम करम मन बानी।।’


बस ‘आप’ का आशीर्वाद और दृष्टि सदैव साथ रहे, जिससे इस गरीबनी का भी बेड़ा पार हो जायेगा। मेरे चित्त में कोई ग्लानि वगैरह कुछ नहीं है, बल्कि उत्साह है। हाँ, एक बात यह हो गई है कि वह गरीबी अब मुझसे किनारा करने लगी है, या यों कहिये कि अब गरीबी को भी याद नहीं रहती।

दूसरे पत्र में जो मैंने लिखा था कि मन शायद ‘मालिक’ की याद में घायल हो गया है। यह केवल मैंने शरारत से लिखा था। मेरा मतलब केवल यही था कि अच्छा भला आदमी घायल क्यों होना चाहेगा। पूज्य श्री बाबूजी, मिशन तो आप का अवश्य और शीघ्र उन्नति करेगा। यह तो हमारा दोष है कि हम अपने शौक की कमी के कारण उस हलुवे की मिठास को नहीं पहिचानते, जो ‘आप’ की Sitting में हमें मिलती है। यदि गौर से देखा जाये तो उस उभार से यह धीमी आग लाख दरजे अच्छी है। यहाँ तक कि तबियत अब उभार को बिल्कुल नहीं चाहती है। यदि कोई मुझसे इस धीमी आग के बदले उभार देने को कहे, तो मैं तो साफ मना कर दूँगी और दूसरी बात यह है कि मैं तो बचपन से ही मिठाई की बहुत शौकीन हूँ। मेरी ‘आप’ से यही प्रार्थना है कि ‘आप’ सदा ऐसी तवज्जोह देने को मजबूर रहे, जैसी कि ‘आप’ देते आये हैं। यह तो हमारा अवगुण है कि, ऐसे मायामय हो गये हैं कि, ‘आप’ की Sitting जो माया के लेशमात्र लगाव से अलग है और जिसमें शान्ति और हल्कापन कूट-कूट कर भरा है, उसका अनुभव नहीं कर पाते। ‘मालिक’ से सदा यही प्रार्थना है कि हमारे मन ऐसे हों कि हम अपने master की उन्नति को देख सकें और उन्हें ठीक Judge कर सकें और उनकी दी हुई चीज़ को ठीक वैसा ही प्राप्त कर सकें कि जैसा ‘वे’ चाहते हैं। मुझे तो जैसी ‘आप’ की मर्ज़ी हो वैसे ले चलिये। जो चीज़ आप बढ़ाना चाहते हैं, सो बढ़ा दीजिये, केवल चने न चबवाइयेगा, क्योंकि दाँत बहुत कमज़ोर हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी "
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-50
लखीमपुर
7/8/1949
मेरा एक पत्र आप को मिला होगा। मेरी हालत यह है कि अब इसका तो केवल एक ख्याल रह गया है कि सब काम ‘मालिक’ ही कर रहा है और अब इस ख्याल का भी बार-बार ख्याल करना पड़ता है। तबियत में बड़ा हल्कापन और मुलायम पन रहता है। कुछ यह हो गया है कि जब कहीं जाती हूँ और कोई किसी 'बाबूजी' का नाम लेता है, तो न जाने क्या हो जाता है कि एकदम ऐसा मालूम होता है कि मेरे सारे शरीर से तमाम पवित्रता निकल कर फैल रही है। यह हालत है जबसे आपको पहला पत्र लिखा था तब से, तीन-चार दिनों तक थी, परन्तु इधर चार-पाँच दिन से तबियत में रुखापन बढ़ गया है। यद्यपि पहले यह कभी-कभी होता था, परन्तु अब तो दिन भर की यही हालत हो गई है। मैंने किसी पत्र में आप को लिखा था कि ‘यह याद नहीं रहता कि मुझे ‘मालिक’ की याद थी या नहीं’ परन्तु अब तो यह हो गया है कि ‘उसकी’ याद की भी याद नहीं रहती है। जहाँ तक हो सकता है, कोशिश ‘मालिक’ को याद करने की करती ही रहती हूँ, और जब-जब भी ‘उसकी’ याद करने की याद भूल जाती हूँ, तो कभी-कभी झुंझलाहट आ जाती है। ध्यान में भी बिल्कुल खाली बैठी रहती हूँ। दिन भर की और ध्यान में बैठने की हालत में कोई ख़ास अन्तर ही नहीं दीखता। इसलिये कभी-कभी तो तबियत यह चाहती है कि क्या करूँ ध्यान में बैठकर। परन्तु आदत के अनुसार जो और जितना भी करती आयी हूँ उतना ही, बल्कि शायद कुछ उससे अधिक कर रही हूँ और करती रहूँगी। खास हालत तो बस यही है कि तबियत बिल्कुल रुखी हो गई है। अम्मा आपको आशीर्वाद तथा केसर और बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-51
शाहजहाँपुर
25/8/1949
जब आदमी उजेले की तरफ देखता है, आँख का रेटिना (Retina) glaze करने पर expand हो जाता है। नतीजा यह होता है कि उस उजेले में भी अंधेरा प्रतीत होता है। यह कैफ़ियत अधिकतर त्रिकुटी के मुकाम पर पहुँचने से होती है। वहाँ पर उजेला बहुत है, इसलिये अंधेरा प्रतीत होता है। यह बात मैं आगे के लिये लिखा चुका। तुमने जो लिखा है कि लखीमपुर परदेश मालूम होता था और घर वाले सब ऐसे मालूम होते थे, जिन्हें मैं जानती ही नहीं थी। ऊपर लिखे हुए नियम के अनुसार जब अभ्यासी ‘रुह’ में लय होना शुरू हो जाता है, यानी उसकी जड़ ‘उसमे’ गड़ जाती है तो अपनायत केवल अपनी रुह से होने लगती है। अपनायत के contrary जो outward vision है, वह dull हो जाती है। अपनी असली ताकत ही में निगाह जम कर रह जाती है। जो चीज़ सामने अधिकतर रहती है, पहले वह dull मालूम होती है। उसके बाद कुल दुनिया ऐसी ही मालूम होने लगती है। उसके बाद हालत और बदलती है, जिसका इस समय खोलना मैं मुनासिब नहीं समझता। खाली रहना अच्छा है और इसके यह माने होते हैं कि हमारे बहुत कुछ आवरण उतर चुके हैं। दिल पर निगाह अधिक अभ्यास हो जाने पर ठहरा नहीं करती इसलिये कि हमने दिल का बिन्दु किसी Plane of Region में जाने के लिये बनाया था, इसलिये जरुरी नहीं रहता कि दिल ही पर हम बार-बार जबरदस्ती निगाह को कायम करें। शुरु में ध्यान दिल पर किया, फिर वह जिस Plane में स्वयं चला जाये वहीं पर रखें। माथे और सिर के पीछे के हिस्से में, जो तुमने लिखा है, मालूम होता है, कुछ खुल गया। माथे में तो असर ज़रूर है, मगर पीछे के भाग में अभी झंकार है और अभ्यासियों को हमारे यहाँ अक्सर मालूम होती है। इसलिये कि मैं ऐसी सादा तवज्जह (sitting) देता हूँ, जिसका असर जहाँ पर भी यह चीज़ है, जल्द पड़ता है। तुम यह भी लिखना कि जब तुम पहूँची, तब घर का वायुमण्डल क्या कुछ बदला हुआ पाया? यदि पाया तो किस कदर। इति:-

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-52
लखीमपुर
31/8/1949
पत्र आपका आया, समाचार मालूम हुए। आपने जो Retina Glaze के बारे में लिखा, सो अभी कुछ-कुछ उसके सिर्फ माने समझ में आ गये हैं, परन्तु मेरी तो कुछ ऐसी बुद्धि है कि बिना उस कैफ़ियत के आये कुछ समझना नहीं चाहती हूँ। इसलिये कुछ अधिक समझ में भी नहीं आता और जितना समय किसी चीज़ के समझने में लगाऊँ उतना यदि ‘मालिक’ की याद में लगा सकूँ, तो कितना अच्छा हो। अपने और ‘मालिक’ के प्रति वह सुदृढ़ Chain स्थापित कर सकूँ, जिसे यदि स्वयं ‘वह’ भी हिलाना चाहें तो भी न हिल सके। ‘मालिक’ की अनवरत कृपा से ऐसा होगा। और अवश्य होगा सिर के पिछले भाग के लिये आपका झंकार शब्द ही बिल्कुल ठीक है, परन्तु झंकार हुई बड़ी ज़ोर से थी। आप ने जो यहाँ के वायुमण्डल के विषय में पूछा, सो मुझे तो यहाँ का वायुमण्डल बड़ा हसता हुआ मालूम पड़ता है और शान्ति तथा हल्कापन भी बहुत लगता है। जब आपके यहाँ गई थी तो केवल शान्ति ही अधिकतर मालूम पड़ती थी। आज कल के वायुमण्डल और पहले के में काफी अन्तर है। अब अपनी आजकल की आत्मिक-दशा के बारे में लिख रही हूँ। आजकल तबीयत ऐसी है कि न तो ‘मालिक’ से जरा भी प्रेम है, और न ही भक्ति में। शायद इसीलिये काफी दिनों से उसकी याद की भी याद आनी कम होती जा रही है। कभी-कभी ऐसा मालूम पड़ता है कि ‘उसे’ बिल्कुल भूल बैठी हूँ, इस भूल की दशा में भी तबियत उधर ही मालूम होती है। परन्तु आदत के कारण जब उसकी ओर ध्यान जाता है, तो ऐसा ही मालूम पड़ता है कि तबियत ‘उसकी’ ही ओर या उसमें ही स्थित है। पहले जब ‘मालिक’ की याद की याद नहीं आती थी, तो बहुत झुँझलाहट लगती थी, परन्तु अब न तो बुरा ही लगता है, वरन् बिल्कुल हल्कापन रहता है। अब ऐसा मालूम पड़ता है Self-Surrender का तो केवल इतना ही मालूम पड़ता है, मानों बार-बार नकल उतार रही हूँ। यद्यपि यह भी नहीं मालूम पड़ता कि किसी काम को मैं स्वयं ही कर रही हूँ। यह सब होते हुए भी जैसा कि ‘आप’ ने लिखा था, अपना कर्तव्य समझ कर अभ्यास व ‘मालिक’ की याद जितना पहले करती थी, उतना किसी न किसी प्रकार किये जा रही हूँ। हाँ, पूज्य श्री बाबूजी, अब आप को एक खुशखबरी ‘मालिक’ की अपने ऊपर अहेतकी कृपा की सुनाऊँ। वह यह कि परम् कृपालु ‘मालिक’ ने कृपा करके संस्कार भोगने में भी मेरी बड़ी सहायता की है, क्योंकि अब की तकलीफ़ कुछ अधिक हुई, परन्तु ‘मलिक’ हर समय ऐसा मालूम पड़ता था कि यह तकलीफ़ नहीं, बल्कि ‘उसकी’ मेरे ऊपर कृपा बरस रही है, जिससे मेरे कुछ संस्कार साफ़ हो जायेगें और इसीलिये ‘मालिक’ को बार-बार धन्यवाद भी देती रही। वास्तविक बात तो यह है कि ध्यान दूँ या न दूँ, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से तबियत बिल्कुल एक धार से ‘उसी’ की ओर लगी मालूम होती है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-53
लखीमपुर
2/9/1949
एक पत्र डाल चुकी हूँ, मिला होगा। परसों से दशा कुछ थोड़ी सी और बदल गई है। वह जो कुछ और जितना समझ सकी हूँ, लिख रही हूँ।

परसों से कुछ ऐसा होता है कि दिन भर में कई बार ऐसा होता है कि कोई काम करते-करते तबियत एकदम न जानें कहाँ चली जाती है। फिर थोड़ी देर बाद फिर लौट आती है। यद्यपि होती थोड़ी-थोड़ी देर के लिये है, परन्तु अब यह कुछ और होने लगा है। तबियत एक ओर को कुछ ऐसी हो गई है कि उससे एक क्षण को भी हटना नहीं चाहती। वैसे तबियत मुलायम अधिक मालूम होती है। बस अभी इतनी ही दशा समझ सकी हूँ। अब फिर लिखूँगी।

सबेरे सोकर उठने पर बड़ी ही थकान मालूम होती है। यह थकान दिन में भी मालूम होती है। यद्यपि नींद गहरी आती है। इति:-

आपकी दीन हीन सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-54
लखीमपुर
4/9/1949
मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। आजकल की आत्मिक-दशा कोई विशेष अच्छी तो मालूम नहीं पड़ती। जैसी कि दशा इस पूजा में आरम्भ में थी, बस वैसी ही हो गई है। अन्तर इतना ही मालूम पड़ा है कि पहले अभ्यास के कारण दिल पर भारीपन अधिक हो जाता था, परन्तु अब कुछ अधिक अभ्यास करने पर भी हल्कापन ही विशेष रहता है। अबकी जब से आप के यहाँ से आई हूँ, न जाने क्या हो गया है कि –

“मन हठ परा न सुनहि सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा।।“


सचमुच ‘चहिय अमिय जग जुरहिन छाछी’ वाली दशा है। पूज्य बाबूजी, इसमें मेरा कुछ दोष भी नहीं है। कारण यह है कि देखती हूँ, कि ‘आप’ की इस पूजा में जब से आई हूँ, इस मन की उड़ान बहुत ऊँची होती जाती है और ‘आप’ के सामने ऐसा निडर होता जाता है, मानों इसने ‘आप’ को खरीद ही लिया है। भला देखिये तो, यह चाहता क्या है? और बिना ‘आप’ को बतलाये चैन भी नहीं पड़ता। बस, मेरी तो केवल यही इच्छा है कि जैसा और जितना अटूट प्रेम ‘आप’ के ‘मालिक’ का ‘आप’ पर है, उतना ही स्नेह ‘आप’ मुझ पर करें और जितना आप अपने श्री ‘समर्थ’ जी को करते हैं, उतना ही मैं अपने ‘बाबूजी’ को कर सकूं। क्या करूँ, आज चार-पाँच दिन से तो मन में ऐसी ही प्रबल इच्छा है।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-55
लखीमपुर
10/9/1949
मेरा एक पत्र मिला होगा। यहाँ सब कुशल है। आशा है, आप भी सकुशल होंगे। मेरी आत्मिक-दशा मामूली है, जैसी कि लिख चुकी हूँ। कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि जब sitting लेती हूँ तो ऐसा मालूम पड़ता है, मानों शरीर के ऊपरी धड़ से रोशनी निकल रही है। वह चमक कभी-कभी किरण की तरह मालूम पड़ती है। यह हालत अधिकतर जब तबियत बहुत लग जाती है, तभी मालूम पड़ती है और रोशनी भी तभी मालूम पड़ती है और कोई खास हाल नहीं है। मालूम होता है कि हालत देर में बदलती है और समझ में भी थोड़ी आती है।

अम्मा आप को आशीर्वाद तथा बिट्टो व जिज्जी (शकुन्तला) प्रणाम कहती हैं। इतिः :-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-56
लखीमपुर
16/9/1949
मेरा पत्र मिला होगा। यहाँ सब अच्छी तरह हैं, आशा है ‘आप’ भी सकुशल होंगे। ताऊ जी और मास्टर साहब से मालूम हुआ कि ‘आप’ शायद २८ तारीख को आयेंगे। ‘आप’ आइयेगा अवश्य। अपनी आत्मिक दशा के बारे में क्या लिखूँ? सब हाल बेहाल हुआ जा रहा है और हुआ क्या जा रहा है, हो ही गया है। हालत बदलती है, परन्तु इतनी हल्की होती है कि जल्दी समझ में नहीं आती और न समझने की कोशिश ही करने को जी चाहता है। चार-पाँच दिनों से हालत फिर कुछ बदल गई है। पूज्य बाबूजी, अब न जाने क्या हो गया है कि कभी-कभी ऐसा मालूम होता है कि मैं तो ठाठ से बैठी हूँ और ‘मालिक’ मेरी याद में तड़प रहा है। मामूली याद नहीं, बल्कि बिल्कुल तड़प रहा है। और न जाने ‘आप’ ने मुझे chief commander बना दिया है कि ऐसा लगता है कि संसार में मुझे किसी का भय ही नहीं रह गया है। कभी-कभी तो यहाँ तक होता है कि, ऐसा विचार होता है कि संसार की कोई ताकत नहीं जो मुझे अपने ‘ध्येय’ तक पहुँचने में बीच में विध्न डाल सके। यदि रास्ते में पर्वत भी मुझे रोकना चाहेगा, तो उसे भी फोड़ कर निकल जाऊँगी। बस आँखों के सामने केवल अपना ‘ध्येय’ ही दिखलाई पड़ता है और उस ‘ध्येय’ के सामने संसार की सारी वस्तुएँ फीकी हैं। कभी तो ऐसा हो जाता है कि केवल इतना ही ज्ञान रहता है कि मुझे पहुँचना है, परन्तु कहाँ पहुँचना है, इसका पता नहीं। अपनी दशा तो ‘मालिक’ की कृपा से अच्छी ही दीखती है। अब अधिकतर जब sitting लेने बैठती हूँ, तो तबियत उतनी अच्छी नहीं लगती, जितनी कि दिन भर लगी हुई मालूम होती है। जब कभी जोश आ जाता है, जैसा कि ऊपर लिख चुकी हूँ तो अपने अन्दर बहुत ताक़त मालूम पड़ती है, परन्तु यह जोश कभी-कभी ही आने पाता है और बहुत बढ़ने नहीं पाता है, तुरंत ढीला हो जाता है। अब न तो सुषुप्ति है, न जागृति है। अब तो कुछ और ही दशा है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-57
लखीमपुर
20/9/1949
मेरा पत्र मिला होगा। यहाँ सब कुशल पूर्वक हैं। आशा है, आप भी सकुशल होंगे। आज एक अजीब दशा हो गई थी और कुछ-कुछ असर अब भी है। इसलिए आप को इतनी जल्दी पत्र डाल रही हूँ और कुछ ऐसा अपनापन हो गया है कि बिना आप को पत्र डाले चैन भी नहीं पड़ता है। यद्यपि कई दिनों से दशा एक ही Point पर स्थित मालूम पड़ती है, परन्तु फिर भी आप को पत्र लिखे बिना चैन नहीं पड़ा। कुछ न कुछ लिखती ही रही हूँ। अब आज की दशा के बारे में लिख रही हूँ।

आज सबेरे सो कर उठी तो दशा मामूली थी, परन्तु करीब आध घंटे बाद दिल में लहरें सी उठती मालूम पड़ीं। फिर एक subject पर मन ही मन में एक बहुत ही सुन्दर और जबरदस्त पूरा मज़मून तैयार होता रहा। दिल में उन्हीं लहरों के साथ बराबर उसी subject पर शब्द पर शब्द उठते रहे और अब वह subject क्या था, वह लिख रही हूँ। कल Hospital गई थी। वहाँ डाक्टर साहब ने एक महाशय का Blood Test किया। जब उनका Blood लिया गया, तो उन्हें बड़ा बुरा लगा और वे बोले- डाक्टर बड़े cruel होते हैं। तब मेरा ध्यान उधर नहीं था। कल शाम को ताऊ जी ने बतलाया, तब भी कुछ नहीं हुआ। बस आज सबेरे थोड़ी देर लहरें सी मालूम हुई। फिर अपने में बड़ा जोश मालूम हुआ। तब समझिये मन में एक भाषण सा होता रहा। कुछ थोड़ा सा ही याद रह गया है, वह लिख रही हूँ। वह यह है - ‘आज कल हम लोगों में इतनी भी शक्ति नहीं रह गई कि जरा सी एक सूई को सहन कर सकें। एक वह समय था, जब हमारे भीष्म पितामह जी छ: महीनों तक वाणों से छिदे शरशैया पर पड़े रहे। वे भी हमारी तरह मनुष्य ही थे। उनका भी शरीर था। परन्तु इतने समय तक कभी किसी ने उनके मुख पर हाय तो कहना दूर रहा, एक विषाद की रेखा भी नहीं देखी। यह सब केवल इसी कारण है कि जो सब शक्तियों का अधिपति ‘ईश्वर’ है, उसको भुला दिया। अरे ! जब जो सारी शक्तियों का ‘ईश्वर’ है, उससे प्रेम होगा, तो उसकी शक्ति हमारे में प्रवेश करेगी। भाई, सहन करना भी तो एक शक्ति ही है। किसी ताकत से ही हम बड़ी से बड़ी पीड़ा, असहनीय विपत्तियों को सहन कर सकते हैं।’ ऐसे ही काफ़ी बड़ा मज़मून तैयार हो गया। उस समय ऐसा मालूम पड़ता था कि ‘मालिक’ का मुझमें बिल्कुल समावेश हो गया और उसकी तमाम ताकत मेरे में दौड़ रही है। बिल्कुल ऐसा मालूम पड़ता था, तमाम लहरें दिल में उठ रहीं हैं। और उस समय मुहं भी बड़ा आभायुक्त लगता था। फिर नहा कर खाना बनाया तो ऐसा ही मालूम पड़ रहा था कि ‘मालिक’ की तमाम ताकत ही मेरे में समायी हुई सब काम कर रही है। जब पूजा करने बैठी तो ध्यान करते ही करते ऐसा मालूम पड़ता था कि मानों अपने ध्यान में मस्त बैठी हूँ। उस समय सबके प्रति बिल्कुल अपना सा ही प्रेम लगता था और ऐसा मालूम पड़ता था कि सब मेरे ही हैं। शरीर का उस समय क्या कहना। जब से दिल में लहरें उठने लगी और शब्द वगैरह उठते रहे, तन थर-थर काँपता रहा था और अब तक असर कुछ शेष है। और खाना भी, ताऊजी से मालूम हुआ, कि आज बहुत अच्छा बना है और पवित्रता भी बहुत मालूम पड़ी थी। पूज्य श्री बाबूजी, मुझे नहीं मालूम यह क्या हो गया। अब फिर बिल्कुल खाली है। शरीर में थोड़ी कमज़ोरी अवश्य हो गई। मुझे जो होता है, तुरंत आपको लिख देती हूँ।

अम्मा आप को आशीर्वाद तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री–कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-58
लखीमपुर
22/9/1949
ईश्वर की कृपा से हम सब बहुत आराम से यहाँ आ गये। ‘आप’ तो हर अभ्यासी की नस-नस को भली-भाँति पहिचानते ही हैं, परन्तु फिर भी ‘मालिक’ की कृपा से जो दशा है और जितना समझ में आया है, लिख रही हूँ। अब की से यह अजीब बात हुई कि जब मैं घर पर आई तो यह हालत थी कि ऐसा लगता था कि यहाँ की प्रत्येक वस्तु भूल चुकी हूँ। न कोई जगह याद थी। लखीमपुर बिल्कुल परदेश सा लगता था। घर वालों को ऐसे देखती थी, मानों मैं उन्हें बिल्कुल पहिचानती भी नहीं हूँ और न किसी के प्रति मन में ज़रा भी प्रेम ही मालूम पड़ता था। वैसे दशा में न आनन्द है, न बेआनन्द ही है। कुछ खालीपन सा लगता है। ध्यान में भी, दिल पर ध्यान करने के बजाय खाली बैठे रहना ही अच्छा लगता है। दिल पर ध्यान करने से थोड़ी देर बाद ही भारीपन मालूम पड़ने लगता है, जो अब बिल्कुल सहन नहीं होता। यह मैंने ‘आप’ से वहाँ भी कहा था, तो आप ने शायद कहा था कि दिल पर निगाह नहीं टिकती तो, कोई हर्ज़ नहीं है, इसलिये इसकी कोई बात नहीं है। कभी-कभी सिर के पिछले भाग और कभी माथे पर कुछ होता है, फिर मालूम पड़ता है, कि कुछ खुल गया। जब शाहजहाँपुर पहूँची थी, तो स्टेशन पर सिर के पिछले भाग में यही हुआ था, परन्तु, श्री बाबूजी, यह खालीपन अच्छा लगता है, बुरा नहीं लगता। जब से आप के यहाँ से गई हूँ, हालत बहुत बदली हुई लगती है। अबकी से ‘आप’ की याद बहुत आती है। हालत में एक प्रकार का सुहावनापन है। जो भी हो, अब पूज्य पिताजी की उंगली पकड़ कर सीखना प्रारम्भ किया है। ‘मालिक’ की कृपा बनी रहे तो कुछ दूर नहीं है। जो हालत पहले सोने में होती थी कि मन न जाने कहाँ चला जाता है, अब ‘मालिक’ में बिल्कुल लय सी मालूम होती हूँ, या शायद बिना नींद के सुषुप्ती ही सुषुप्ती में दिन भर रहती हूँ। ऐसा लगता है कि किसी एक सुहावनी धार में बेसुध बही जा रही हूँ। यदि आप मुझे कुछ और पहले मिल गये होते, तो कितना अच्छा होता। मुझे याद है, छुटपन में जब मैं पूजा करती थी तो बहुधा ताऊजी से पूछती थी, कि मुझे आप कोई ध्यान करना बता दीजिये, तो ताऊ जी ने मुझे राम-सीता का ध्यान करने को बतलाया था, परन्तु उससे भी पूरा सन्तोष मुझे नहीं मिला। खैर, ‘मालिक’ ने कृपा करके दुखिया की सुन ली, जो ऐसा ध्यान बताने वाला दिया कि अब बिल्कुल निश्चिन्त हो गई।

अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं तथा बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-59
लखीमपुर
30/9/1949
कल नारायण दद्दा से पूज्य श्री बुआ जी का देहावसान सुन कर हम सब को महान् दुख हुआ। ईश्वर से प्रार्थना है कि ‘वह’ दिवंगत आत्मा को परम् शान्ति प्रदान करे। यद्यपि अब उन महान् आत्मा के लिये तो यह सूर्य को दीपक दिखाने के सदृश है, परन्तु फिर भी ‘उनके’ और अपने अलौकिक प्रेम होने के कारण हम सब का यह परम् कर्तव्य हो जाता है। दद्दा से ‘उनकी’ मरने के बाद की उच्च अवस्था जान कर परम् सन्तोष और परम् आश्चर्य हुआ। परन्तु आश्चर्य की बात क्या हो सकती है? क्योंकि ‘जिसकी’ एक तनिक सी इच्छा मात्र से या जो स्वयं नरक को भी 'आलमें बाला’ में परिणित कर सकता है, उनकी धर्मपत्नी के लिये ऐसी उच्चतम अवस्था ही उचित थी। परन्तु जो भी हो, महिला मण्डल के मध्य में से एक सदा-प्रसन्न चेहरा सदैव के लिये चला गया। अम्मा को इस बात का बड़ा दुख है कि वे दोबारा उनके दर्शन न कर सकीं।

अपनी आत्मिक-दशा के विषय में क्या लिखूँ? कोई खास बात नहीं है। जो दशा बाद वाले पत्र में लिखी थी, वह कभी-कभी फिर आ जाती है। कुछ दशा और लिखनी थी परन्तु वह याद ही नहीं आती। क्योंकि न जाने क्या हो गया है कि जब से ऐसी खबर सुनती हूँ, तो मन बिल्कुल शान्त और ऐसा स्थिर हो जाता है कि वह न किसी तरफ़ जाता है और न उसमें कोई विचार ही आते हैं। वैसे भी यही हालत ही करीब दस-बारह दिन से लगातार चल रही है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-60
लखीमपुर
8/10/1949
यहाँ सब सकुशल हैं। जिज्जी का पत्र भी आया था, सो आप को भेज रही हूँ। उन्होंने मुझे भी लिखा है कि तुम श्री बाबूजी को मेरी याद दिला दिया करो। भला जो स्वयं अपनी याद अभी तक न दिला पाया हो, वह केवल सिफ़ारिश के और कर क्या सकता है। फिर सिफ़ारिश उस पर चल सकती है, जिसके पास कुछ अपना अस्तित्व शेष हो, परन्तु जहाँ केवल ‘मालिक’ ही ‘मालिक’ है तो उसकी याद बार-बार करना ही अपनी याद आप को दिलवाने में काफ़ी सहायक हो सकती है। यही मैं जिज्जी को लिख दूँगी।

माता जी तो गई और उनके जाने से ‘आप’ तथा हम सब बच्चों को बहुत ही तकलीफ़ हो गई, परन्तु इससे अपने बाबूजी की महान् शक्ति का कुछ थोड़ा सा अन्दाज़ का आभास हम सब को मिल गया। हमें मालूम हो गया कि हम किस शक्ति की छाया में सुख से पड़े निश्चिन्तता की नींद सोते हैं। मैं तो निर्द्धन्द हूँ, ‘पिता’ के हाथों की छाया में रहने से क्या स्वतंत्रता होती है, इसका कुछ-कुछ आभास मिल गया। मुझे न जाने क्या हो गया है कि मुझे ‘मालिक’ की याद बड़ी कठिनता से आती है। जरा सी ढील दी नहीं कि दिन भर याद भूली रहती है। कभी-कभी अक्सर यह मालूम पड़ता है कि तमाम शक्ति मेरे अन्दर भर रही है। कुछ दिनों से अक्सर यह होता है कि जरा सी किसी बात की इच्छा भर होती है, तो यद्यपि मैं तुरन्त ही उस इच्छा को दबा लेती हूँ, परन्तु फिर भी वह किसी न किसी तरह पूरी हो ही जाती है। यद्यपि मैं कोई भी इच्छा को आने नहीं देती और कुछ ऐसा हो भी गया है कि केवल ‘मालिक’ की याद के और कोई इच्छा आती ही नहीं है।

अम्मा आपको आशीर्वाद तथा केसर प्रणाम कहती हैं।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-61
शाहजहाँपुर
10/9/1949
तुम्हारे कई पत्र आये, मगर जवाब न दे सका। अब कुछ थोड़ा सा संक्षेप में लिख रहा हूँ। तुम्हारी जो कुछ भी हालत है, यह जहाँ तक मेरा ख्याल है, हृदय चक्र की सैर (To the extent of Pind Desh) पूरी हो चुकी है, और आत्मा-चक्र की सैर अब दर पेश है। मैंने ‘जहाँ तक’ का लफ्ज़ इसलिये इस्तेमाल किया है कि मेरे सिर में इस समय भारीपन है, इसलिये अनुभव शायद ठीक न हो सका हो। यकीन है कि ठीक होगा।

‘मालिक’ का बन्दे की याद में संलग्न होने के माने यह है कि बन्दे की ज़ज्बे की आग ‘मालिक’ तक पहुँच चुकी है और उसको यह खबर हो गई है कि कोई बन्दा मेरी याद करता है, या दूसरे मानों में तुम्हारी आवाज़ ‘मालिक’ के कानों तक पहुँच चुकी है। जब आवाज़ किसी शख्स की किसी को पुकारने की आती है, तो जिसको कि पुकारते हैं, वह मुखातिब हो जाता है और मुखातिब होने के बाद यदि उस शख्स को यह प्रतीत हो जाता है कि यह प्रेम और ज़ज्बे से मुझे पुकारा गया है, तो उसमें भी पुकारने वाले की मोहब्बत पैदा हो जाती है। कबीर साहब ने लिखा है कि-

‘मेरा राम मुझे भजे जब, तब पाऊँ विश्राम।’

यह हालत बहुत काबिले तारीफ़ है और बुजुर्गों ने इसके माने यह निकाले हैं कि ऐसी हालत में ईश्वर प्रेमी होता है और बन्दा प्रीतम। भक्ति मार्ग में इसको बहुत अच्छा कहा है और हम भक्ति भाव से चलते हैं, और यदि इसकी कहीं Philosophy हम बयान करें, तो फिर यह चीज़ ज्ञान-मार्ग में आ जाती है। इसलिये मैं इसको बयान नहीं करता और इसकी Philosophy जहाँ तक मेरा ख्याल है, किसी बुजुर्ग ने बयान भी नहीं की, क्योंकि यह बात Etiquette और अदब के खिलाफ़ मालूम होती है। तुम जब उस Point पर आ जाओ जिसको मैंने आयन्दा छपने वाली किताब में Central Region कहा है, तो समझा दूँगा।

तुमने यह जो लिखा है कि ‘मेरी यह हालत कि जो पूजा आरम्भ करने से पहले थी’। इसकी कुछ-कुछ रमक तो आ जाती है, मगर पूरी तौर से आ जाने का इन्तजार है और जैसा मैं चाहता हूँ, वह अभी दूर है। यह बिल्कुल ईश्वरीय हालत है। इसके परिपक्व हो जाने पर इन्सान सन्त और ठीक आ जाने पर परम् सन्त कहलाता है। यह एक कैफ़ियत मुर्दा की सी होती है। इंसान ज़िन्दगी में ही मुक्ति का तमाशा देखता है और इसमें परिपक्व हो जाने पर जीवन-मुक्ति की दशा आ जाती है और बीज दग्ध हो जाता है। यहाँ पर इन्सान को इन्सान कह सकते हैं, इससे पहले इन्सान बसूरत हैवान है।

तुमने Hospital में जो Scene देखा था और उसे देख कर घर पर जो भीष्म पितामह की मिसाल सामने आकर ख्याल गूंजे थे, यह हिम्मत दिलाने वाले थे। इनसे कोई रुहानियत का सम्बन्ध नहीं है, और तुमने जो यह लिखा कि बाद को कमज़ोरी मालूम हुई, उसकी वज़ह यह मालूम पड़ती है कि चूँकि तुम कमज़ोर हो, जोश आने पर खून की गर्मी बढ़ी और जोश समाप्त हो जाने पर यह फिर Normal Condition पर आ गया। लिहाज़ा जो ताकत किसी जोश में खर्च हुई, ज़िस्म में कम हो गई, इसलिये कमज़ोरी मालूम हुई। जैसे जब दिल कमज़ोर होता है और इसको कोई Stimulant दिया जाता है, तो ताकत मालूम होती है और जब इसका असर खत्म हो जाता है, तो जितनी ताकत दवा ने बढ़ाई थी, वह तो जाती ही रहती है और अपनी भी कुदरती ताकत उसमें खर्च हो जाती है, इसलिये कमज़ोरी मालूम होती है। इसलिये कि दिल ने अब ज्यादा काम किया तो कमज़ोर होने की वज़ह से उसे थकान भी लाज़िमी है, जिसको कमज़ोरी कहते हैं।

अब रहा, जो तुमने अपनी बुआ के बारे में अफसोस ज़ाहिर किया है, वह तकाजाय वर्शारयत है। सबसे छोटे बच्चे पर तर्स ज़रूर मालूम होता है, मगर ईश्वर ‘मालिक’ है, उसके सब काम मसलेहत्त् के ही होते हैं। इसकी दो ही सूरतें थीं। या मैं पहले जाता या वह। मेरे पहले जाने में यह मुमकिन था कि उनकी आहट या आवाज़ मेरे कानों तक न पहुँचती और उनका काम इतना अच्छा न बनता। जो बन जरुर जाता, इसलिये की ‘लाला’ जी ने एक मर्तबा मुझ से फ़रमाया है, जिसका यह मतलब है कि उसने खूब झाड़ फटकार तुम पर की और तकलीफ़ दी, जिसकी वज़ह से तुम्हारी सहनशीलता की आदत पड़ गई, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिये ज़रुरी है, इसलिये वह आज़ाद जायेगी। आज़ाद करना तो बुजुर्गों के बाँये हाथ का काम है, कर ही देते हैं और यह उन्होंने किया भी। ‘नाम मेरा और गाँव तेरा’।

केसर, बिट्टी को दुआ। माता जी को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र "
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-62
शाहजहाँपुर
9/10/1949
मैं पिछले पत्रों के जवाब दे चुका हूँ, जो इसी खत के साथ है। जो खत मास्टर साहब कल अपने-साथ लाये हैं, उसका जवाब दे रहा हूँ।

तुमने अपनी आत्मिक-दशा जो कुछ भी लिखी है, अच्छी है। हमारी कोशिश यही होनी चाहिये कि जिस तरह से हो सके ‘मालिक’ की याद करें। यद्यपि यह जरूर होता है कि एक वक्त वह भी ज़रूर आता है कि ‘मालिक’ की याद भूलने लगती है। मगर हमको इस पर नहीं रहना चाहिये। जब किसी तरह से याद न हो सके तो उसके रुप बदल-बदल कर याद करना चाहिये और जब किसी रुप में याद न हो सके तो Suppose कर ले कि हम उसकी याद में हैं। इसके बाद जब किसी को हालत शुरु होगी, तो आगे बतला दूँगा।

माता जी को प्रणाम तथा सब बच्चों को आशीर्वाद।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-63
लखीमपुर
14/10/1949
कृपा-पत्र आपके जो पूज्य मास्टर साहब जी के हाथों आपने भेजे, वे मिल गये। आपने लिखा है कि मेरे ख्याल से तुम्हारी हृदय-चक्र की सैर पूरी हो चुकी और अब आत्मा-चक्र की सैर दर पेश है। परन्तु श्री बाबूजी, आप तो जानते ही हैं कि आपके पल्ले एक बावरी लड़की भी पड़ी है, जो हर चीज़ से अनभिज्ञ है। पिता की शिक्षा में अभी तक जिसने केवल दो ही words सीखे हैं, कि ‘आगे चलना’। तो उसे फुर्सत ही कहाँ है और बेचारी इतनी समझ भी कहाँ से लाये, जो इन चक्रों को और पिण्ड-देश के विषय में कुछ समझे। फिर बाबूजी, मैं तो ऐसे पथ की पथिक हूँ जिसका यह अन्दाज़ नहीं कि वह कितनी दूर है, फिर ऐसे पथ के पथिक को तो केवल चलना ही है। हाँ, जैसे एक बावरा पथिक चलता जाता है तो रास्ते में कोई पुकार कर कहता है कि – ऐ पथिक तू इतनी दूर चल चुका और अब तू इस गाँव में पहुँच गया। तो पथिक एक क्षण को खड़ा हो कर सुनभर लेता है, और फिर कुछ प्रसन्न सा होकर पुनः अपना मार्ग पकड़ता है। बस, मेरे पास कृपालु ‘मालिक’ ने मुझे महादीन और बावरी जान कर कुछ थोड़ी सी ऐसी ही दशा प्रदान की है और अंतर केवल इतना ही है कि उस पथिक को कोई दूसरा पथिक केवल बतला ही देता था और इस (आत्मिक मार्ग) पथ में स्वयं ‘मालिक’ ही बड़ी सावधानी से मार्ग के खन्दकों से बचाकर पथिक को मार्ग के उस पार तक पहुँचा देता है और केवल पहुँचा ही नहीं देता, वरन् और भी न जाने कितनी कृपा करता है, यह स्वयं हम पथिक भी नहीं जानते और जिसकी महिमा से वह लम्बा मार्ग छोटा हो जाता है। इसके लिये आप को कोटि-कोटि धन्यवाद है। आजकल मुर्दा वाली हालत फिर आ गई है। अपने भीतर बड़ी निर्जीवता लगती है। पूजा करते समय और जब लेटती हूँ, तब तो बिल्कुल एक मुर्दे की तरह मालूम होती हूँ। वैसे दिन में अधिकतर तबियत उदासीन और शान्त रहती है। आपने ‘मालिक’ की याद के बारे में जो लिखा है, सो ‘आप’ निश्चिन्त रहिये। जब तक थोड़ा भी बस है, तब तक चाहे रुप बदल कर, चाहे Suppose करके ‘उसकी’ याद से एक क्षण भी खाली न रहने की ही कोशिश करुँगी। कुछ ऐसा है कि जब केवल Suppose कर लेती हूँ तो बिना रुप के याद के चैन नहीं पड़ता और न यह विश्वास ही होता है कि मैंने ‘मालिक’ की याद की है। परन्तु अभी तो किसी न किसी प्रकार पूरी तरह न सही, तो भी थोड़ी बहुत याद जितनी कर सकती हूँ, करती हूँ। भूल की हालत भी काफ़ी तौर पर मौजूद हो गई है। माताजी के बारे में आपने बिल्कुल सत्य लिखा है कि जैसी आपके सामने गई, वैसी हालत उन्हें नहीं मिल सकती थी तबियत में खालीपन और हल्कापन अब हमेशा रहता है और बहुत दिनों से है। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-64
लखीमपुर
18/10/1949
मेरा एक पत्र मिला होगा। हम सब लोग ‘मालिक’ की कृपा से कुशल पूर्वक हैं, आशा है, आप भी सकुशल होंगे। ताऊजी को ‘मालिक’ ने कृपा करके सम्बन्ध प्रदान कर दिया है, सुनकर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। सर्व शक्तिमान मालिक से कर-जोड़ कर मेरी सदा यही प्रार्थना है कि जितना भी हो सके, उसकी कृपा से मेरे माता-पिता सदैव उठते जायें। कितनी प्रसन्नता और गर्व की बात है कि जिस मालिक की कृपा के लिये दुनियाँ तड़पती है, ‘उसी’ परम् कृपालु मालिक से पिताजी का सम्बन्ध हो गया। उस परम् कृपालु ‘मालिक’ को इस गरीबनी का कोटि-कोटि बार धन्यवाद है और प्रणाम है। रही मेरी आत्मिक-दशा, सो तो कुछ अच्छी नहीं मालूम देती है। कभी कभी तो इतनी रुखी तबियत हो जाती है, कि ‘मालिक’ के रत्ती भर प्रेम तथा जरा सा आनन्द से रहित हो जाती है। जब से आप को पत्र डाला है, तब से हालत में थोड़ा सा परिवर्तन और हो गया है। शान्ति के लिये भी शक है। न शान्ति ही मालूम होती है और न अशान्ति ही कही जा सकती है। आपने लिखा था कि हम भक्ति-मार्ग से चलते हैं, परन्तु यहाँ मैं तो भक्ति से बिल्कुल खाली हूँ, परन्तु मालिक की कृपा से मैं उसकी सच्ची भक्ति को पाने की कोशिश अवश्य करुँगी। आजकल तबियत बेरस अधिक है, यद्यपि यह हालत बीच बीच में आ जाती थी, परन्तु अब तो यह बात तबियत में कुछ-कुछ घर सी करने लगी है। यह बेरस तबियत भी बुरी नहीं लगती। ‘मालिक’ की याद के लिये कोशिश कर रही हूँ। आपने लिखा था कि जब ऐसे न याद आवे तो Suppose कर लिया करो, परन्तु Suppose करने को भी याद चाहिये यानी कभी-कभी Suppose करने की भी याद नहीं रहती है। अभी तो किसी तरह चल रहा है। जब बिल्कुल भी बस नहीं रहेगा, तो आपसे आगे के लिये कायदा पूछूंगी। जैसे प्रारम्भ में याद के लिये बार-बार लड़ना पड़ता था, वही लड़ाई अब फिर चालू है। बस तब तो मैं जीती थी, परन्तु अब देखें ‘मालिक’ किसको जितावें? अब यह भी नहीं मालूम कि मैंने जरा भी पूजा की है, या पहले कभी की थी। पहले यह मालूम होता था कि ‘मालिक’ मेरी याद में तड़प रहा है, परन्तु अब तो यह भी नहीं मालूम पड़ता कि उसे मेरी याद आ रही है। अब चूकि मुझे ‘उसकी’ याद कम आती है, तो सम्भव है ‘उसे’ भी मेरी याद कम आती हो। जो भी हो, हालत अच्छी चल रही है, क्योंकि मेरा ऐसा विश्वास है कि मेरी आत्मिक-दशा कुछ न कुछ थोड़ी बहुत उन्नति कर रही है, आगे ‘मालिक’ की कृपा पर सब निर्भर है। ‘वह’ जो भी करेगा, सब अच्छा ही करेगा। हाँ, पूज्य बाबूजी, चार-पाँच दिन से जब ‘मालिक’ का ध्यान करती थी, तो न जाने कैसे हमारे श्री समर्थ जी महाराज जी की शक्ल सामने आ जाती थी। ऐसा कई बार होता था।

अधिकतम आजकल की दशा बिल्कुल शून्य है और कभी-कभी तो ऐसा होता है कि हर चीज़ शून्य दीखती है। जड़, चेतन सब शून्य सा ही दीखता है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-65
लखीमपुर
18/10/1949
कल पूज्य मास्टर साहब से मालूम हुआ कि अब छुटिट्यों में आप बीमार हो गये थे। आपकी साँस उखड़ गई थी। आशा है, आपकी तबियत अब ठीक होगी। हमारी तो ‘मालिक’ से यही प्रार्थना है कि ‘यह’ अनमोल रत्न हमारे मध्य में बहुत वर्षों तक रहे और हम सब इनकी छाँह में उत्तरोतर पलते हुए वृद्धि को प्राप्त करें। हम बड़भागी हैं कि जिनके माता-पिता की हमारे पूज्य बाबूजी को इतनी अधिक याद आती है और अपनी बालिका जानकर कभी-कभी मेरी भी बारी आ जाती है। जब से ‘मास्टर साहब’ के दवारा ‘आप’ को पत्र भेजा है, तब से आत्मिक दशा में फिर थोड़ा सा परिवर्तन आ गया है। याद का हाल तो बुरा ही है। Suppose करके भी याद करने की अधिकतर याद भूल जाती है, परन्तु फिर भी ‘मालिक’ की कृपा से कुछ न कुछ चली ही जा रही है। नींद में भी, पहले भी कभी मैंने लिखा था कि तेज़ आती है। परन्तु तब में और अब में काफ़ी अन्तर है। अब तो ऐसी नींद आती है कि यदि दस मिनट रात में सो लू तो शरीर तथा दिमाग का इतना अधिक Refreshment हो जाता है कि इससे अधिक सोने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती है। ऐसा मालूम पड़ता है कि मानों अभी दिमाग और शरीर से कोई काम ही नहीं लिया गया है। परन्तु जागने पर करीब आठ-दस मिनट तक न यह ध्यान रहता है कि कहाँ पड़ी हूँ, दिन है या रात है। थोड़ी देर बाद धीरे-धीरे सब बातें एक-एक कर ख्याल में उतरने लगती हैं। शायद मैंने पहले कभी लिखा था कि जागने पर ऐसा मालूम पड़ता है कि विदेश में आ गई हूँ। परन्तु इधर करीब १५-२० दिनों तक तो दिन भर यही हालत रहती थी, परन्तु अब तो, न यही मालूम पड़ता है कि विदेश में हूँ और न यही मालूम पड़ता है कि घर में हूँ। और तो हालत करीब-करीब अभी वैसी ही है, जैसी कि अगले पत्र में लिख चुकी हूँ।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं। केसर बिट्टो प्रणाम कहती हैं। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-66
शाहजहाँपुर
11/11/1949
अब तुम ईश्वर की कृपा से अच्छी होगी। मैंने एक दिन तुम्हारा काम देखा, कचहरी में था। तबियत खुश हुई। ख्वाह वह Automatic हो, ख्वाह वह खुद कर रही हो, तरीका ठीक था। यह हिन्दुस्तान की शुद्धता के बारे में था। अच्छा हो जाने पर अपना हाल लिखना। अब की बार पहुँचने पर ईश्वर को अगर मंजूर हुआ तो तुम्हारे अनुभव करने की शक्ति भी खोल दूँगा, और वह Point तुम्हें भी बतला दूँगा, जिसके खुलने से अनुभव शक्ति में वृद्धि होती है, मगर यह शक्ति बहुत कुछ उसके बाद practice पर भी, depend करती है, अर्थात अगर कोई Faculty खुल जावे और उससे काम न लिया जावे तो उसमें अधिक वृद्धि नहीं होती। तुम्हें जो ईश्वर ने पिण्ड-देश और ब्रह्माण्ड-देश की विलायत दी है, उसके माने ये हैं कि ‘पिण्ड-देश की विलायत के अर्थ mastery over individuality यानी पिण्ड पर निपुण होना और ब्रह्माण्ड-देश की विलायत के अर्थ यह है कि Mastery overcosmic power यानी ब्रह्माण्ड-देश पर निपुण होना’। किसी वक्त अगर कुछ मेरी समझ में आ गया और ऊपर से इशारा मिल गया तो फिर लिखूँगा। अलावा इसके मैंने यह भी किया है कि तुम्हारी हर Nerve को और जिस्म के हर हिस्से को spiritual force से भर दिया है। इसको हज़्म करने के लिये वर्षों चाहिये। ईश्वर की मर्ज़ी अगर शामिल हाल है, तो मैं कोशिश करूँगा कि साल-दो-साल में यह हज़म हो जाये। हालांकि यह वक्त बहुत थोड़ा है। मुझको चूंकि तुमसे काम लेना था, इसलिये मैंने ऐसा किया और तुमने मुझे मजबूर भी कर दिया था। एक नुस्खा इसके हज़्म करने का लिखता हूँ, जो इसमें मदद देगा। वह क्या है? मालिक की याद। वैसे तो भाई एक उमर गुज़र जाती है और यह चीज़ हज़्म नहीं हो पाती है और हज़्म न होने से कोई हानि भी नहीं हैं, मगर मुमकिन है, मेरी तबियत किसी वक्त और भरने को चली आवे तो गुंजाइश मिले। अच्छी तन्दुरुस्ती और लोगों को सिखाना भी हाज़में में मदद देता है। तुम्हारी बहनें और माता जी तो पूजा के लिये तुम्हारे पास बैठती ही होंगी और स्त्रियाँ अगर आ जावें तो बड़ा अच्छा है। तुम्हें जो सिखाने में अड़चन मालूम पड़े, मास्टर साहब से पूछ लेना। ईश्वर ने तुमको सब कुछ दिया है, यह माना, मगर जैसे ‘वह’ Unlimited है, वैसे ही अपनी तरक्की की भी Limit नहीं। मैं तो भाई, अपने लिये डंके की चोट पर कहने के लिये तैयार हूँ कि ‘मैंने यही जाना, कि कुछ नहीं जाना।’ और भाई, हमारे यहाँ हमारे गुरु महाराज के तो सिखाये हुओं का यह हाल है कि – ‘जिसको मिल गई गाँठ हल्दी की, उसने जाना कि हूँ मैं पंसारी’। यह आध्यात्मिक विद्या का समुन्द्र इतना लम्बा चौड़ा है कि इन्सान ज़िन्दगी में भी तैरे और ज़िन्दगी के बाद भी, मगर छोर कभी भी नहीं मिलता। मैं यह मुनासिब समझता हूँ कि शुक्रिया का प्रसाद तुम वहीं चढ़ा दो। इस खत की नकल केसर से करवा कर यहाँ भेज देना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-67
लखीमपुर
11/11/1949
मालिक की कृपा से हम सब यहाँ सकुशल आ गये। आत्मिक-दशा का क्या कहना है, क्योंकि जिस ‘मालिक’ की ‘जुम्बिशे अबरु में है, क्या जाने क्या-क्या आबोताब’ यह तारीफ़ है, यह शान है, फिर उस ‘मालिक’ और उन बिना कारण ही कृपा करने वाले मेरे बुजुर्गों को दृष्टि के सामने से होकर जो भी निकल जाये, उसके भाग्य की तारीफ कैसे की जा सकती है। उसकी आत्मिक उन्नति में कुछ शेष नहीं रह जाता है। आपकी वह परम् कृपामयी वाणी ‘चौबे जी ईश्वर ने चाहा तो कस्तूरी के लिये मैं कुछ उठा नहीं रखूँगा’ मेरे हृदय में चुभ गई है। यदि ‘मालिक’ की ऐसी ही कृपा बनी रही तो विश्वास रखिये, कस्तूरी भी अपनी ओर से जितना भी बन सका कुछ उठा न रखेगी। क्षमा कीजियेगा बाबूजी, आपने चार दिन तक आराम करने के लिये कहा था, सो शरीर को तो मैंने अब तक खूब आराम दिया है, परन्तु और सब परसों से ही आरम्भ कर दिया है। काम करने के बाद तबियत खुश हो जाती है। परसों जब No.१ working कर रही थी, तो सामने ऐसा मालूम पड़ा कि कुछ पिघल-पिघल कर बहा जा रहा है। कभी-कभी ऐसा होता है कि यह ख्याल आ जाता है कि मैं कर तो रही हूँ, परन्तु न जाने काम हो रहा है या नहीं। परन्तु तुरंत आपकी ताकत का ख्याल आते ही यह विश्वास हो जाता है कि अवश्य हो रहा है। सच तो यह है कि अपने ऊपर Faith पूरा है। मेरी हालत तो ऐसी है कि मालूम पड़ता है कि तबियत कहीं डूब गई है। अब कुछ-कुछ Self Surrender लगने लगा है। कोशिश बिल्कुल Complete की करुँगी, क्योंकि न जाने क्या बात है कि जरा भी अहम् पना बेचैन कर देता है। एक बात और हो गई है कि तड़प और बढ़ गई है। तबियत बड़ी हल्की और सरल हो गई है। आपसे मिलने की इच्छा इलाहाबाद की ओर खींच रही है। न जाने क्या बात है कि मेरी इच्छा सदा यही है कि पिता जी का रुपया मेरे लिये केवल शाहजहाँपुर जाने में यानी केवल आत्मिक उन्नति में ही खर्च हो, और करना भी क्या है। आपने जो सबसे पहले पत्र में लिखा था कि ‘ऐके साधे सब सधे, सब साधे सब जाये।’ के अनुसार ‘मेरी इच्छा केवल एक ही को देखने की, एक ही से मिलने की, और केवल एक ही में एक हो जाने को चाहती है’। क्षमा करियेगा, न जाने क्या-क्या लिख गई हूँ। आपके सामने तो स्वतंत्र हूँ और कहावत भी है- ‘बच्चा माँ के सामने जितना स्वतंत्र होता है और जितनी स्वच्छन्दता से बात कर सकता है, उतना किसी के सामने नहीं’। काम में कोई त्रुटि हो तो लिखियेगा शौक इतना है कि इस पूजा में हर चीज़ को बिल्कुल जानने की इच्छा होती है। इसकी एक-एक हालत में सराबोर हो जाने को जी चाहता है। Working No.२ करने के बाद ऐसा मालूम पड़ता है कि जो जगह आपने छोड़ने को बतलाई थी, उसे छोड़कर सब वातावरण में पवित्रता की धारा बहती मालूम देती है। वैसे आप जानें। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-68
लखीमपुर
13/11/1949
एक पत्र आपको परसों लिखकर कल मास्टर साहब को दे चुकी हूँ। आज आपका कृपा-पत्र मिला, पढ़कर प्रसत्रता हुई। मेरी तबियत अब बिल्कुल अच्छी है। आशा है, आप भी सबके सहित सकुशल होंगे। आपका बहुत-बहुत हार्दिक धन्यवाद है कि इस दीन को निमित्त बनाकर ‘मालिक’ का काम स्वयं ही सब सम्भाल रहे हैं। यह ‘मालिक’ की अनन्त कृपा है, जो उसके काम जो मुझे बताये गये हैं तबियत इतनी अधिक लगती है और इतनी अधिक खुश होती है, जैसी कि कभी-कभी पूजा के समय हो जाती थी। आपने जो कृपा करके पिण्ड-देश व ब्रह्माण्ड-देश के विषय में कुछ समझाया है सो मैंने गौर से पढ़ लिया है। पूज्य श्री बाबूजी, मुझे तो केवल ‘एक’ ही को समझना है। ‘एक’ को समझने से ही सब समझ में आ जायेगा। जैसा कि आपने लिखा है, जल्दी हज़्म करने की कुछ-कुछ कोशिश मैं भी करुँगी, यदि ‘मालिक’ की ऐसी ही कृपा बनी रही।

दिमाग जल्दी थक जाने के कारण लगकर ‘मालिक’ का काम एक बार में ३५ मिनट से अधिक नहीं हो पाता। पूजा भी घर में भी सब बैठते हैं और जिया वगैरह भी, जो कि हफ्ते में एक बार आयेंगी और जहाँ तक बन पड़ा एक बार मैं भी जाऊँगी, क्योंकि वे भी पूजा करती हैं। आपने लिखा-तुमको सब कुछ मिला, परन्तु मैं तो यही कहूँगी कि मेरा सब कुछ चला गया। हाँ, मिली है केवल बेचैनी। इसके अतिरिक्त मिला है या मिलेगा वह जिसकी मिसाल नहीं है और जिसको सचमुच पाकर फिर कुछ पाना शेष नहीं रह जाता है और उसको आप जानते हैं। आपने जो शुक्रिये के प्रसाद के लिये लिखा है, वह परसों चढ़ जायेगा, परन्तु मुझे केवल इतने से ही सन्तोष नहीं। कल से रह-रहकर यही बात उठ रही है कि कृपया आप परम् कृपालु माननीय बुजुर्गों के चरणों में इस दीन गरीबनी का सादर प्रणाम करते हुए कह दीजियेगा कि विश्वास रखें, ‘उनकी’ यह मेहरबानी, यह बख्शीश बेकार नहीं जायेगी। उनकी बख्शीश को पूरी तौर से निभाने की कोशिश करने से ही उनका कुछ शुक्रिया अदा हो सकता है। और ‘आप’ के लिये क्या लिखूँ? आपके सामने आप के चरणों में तो यह सिर सदैव झुका हुआ है। इसके लिये वाणी से केवल इतना ही कह सकती हूँ कि:-

चरणों पर अर्पण है, इसको चाहो तो स्वीकार करो। यह तो वस्तु तुम्हारी ही है, ठुकरा दो या प्यार करो।।
जहाँ तक बन पड़ेगा, ‘मालिक’ के काम से जी नहीं चुराऊँगी। आप को तो कुछ लिखने की ज़रुरत नहीं थी, आप तो स्वयं ही सबके मन की बात जानते हैं। प्रार्थना भाई व भाभी वगैरह ने हिन्दी में माँगी थी, सो एक नकल भेज रही हूँ और सब उतार लेंगी।

डायरी में रोज़ का हाल लिखती जा रही हूँ। जब ‘आप’ आयेंगे, तो देख लीजियेगा। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-69
शाहजहाँपुर
16/11/1949
तुम्हारा पत्र मिला और केसर का भी खत मिला। मैं स्पष्ट रुप से उत्तर देना चाहता था, परन्तु इस समय रात का एक बज गया है, इसलिये थोड़ा और जरुरी ही लिख रहा हूँ। बेचैनी मुबारक हो। तुम जो कुछ काम कर रही हो, ठीक कर रही हो और इतना करो कि दिमाग न थके। तुम इलाहाबाद जाना चाहती हो। इसको चौबेजी की राय पर छोड़ दो। इलाहाबाद मेरे जाने का इरादा है और ईश्वर ने कृपा की तो पहुँच जाऊँगा, मगर मेरे वहाँ होने से सिवाय इसके कि तुम्हें यह ख्याल रहे कि मैं वहाँ पहुँच गया और कोई फ़ायदा समझाने बुझाने का नहीं हो सकता। इसलिये कि वहाँ मेरे सामने तुम सब का निकलना मुनासिब न होगा। क्योंकि और रिश्तेदार मौजूद होंगें - पर्दे का लिहाज ज़रुर रखना चाहिये। केसर ने जो हाल लिखा है, उससे यह मालूम होता है कि अब उन्हें शौक बढ़ रहा है। इससे पेश्तर चौबेजी ने भी कहा और मास्टर साहब ने भी, मगर मेरी राय इसके खिलाफ ही रही। मगर अभी और शौक बढ़ने का इन्तज़ार है। अभी वह इस सूरत में नहीं आई कि इसके शौक पर एतबार कर लिया जावे। और मुझे तो किसी की सेवा करने में कभी आर नहीं होना चाहिये। और न है। मुझे तो जिधर तुम सब लोग घुमा दो, घूम जाता हूँ। मैं अपना अगर हूँ तो अपने काबू की बात करूँ। भाई अब समय ज़्यादा हो गया है, खत बन्द करता हूँ फिर कभी लिखूंगा। इसी में केसर के खत का भी जवाब है।

तुम्हारा शुभचिंतक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-70
लखीमपुर
19/11/1949
पत्र आपने जो दद्दा के हाथों भेजा, सो मिला। केसर का शौक बढ़ रहा है, पढ़कर प्रसन्नता हुई। आज न जाने क्यों करीब ग्यारह बजे से अजीब उलझन सी हो रही है। इसका कुछ कुछ मतलब समझ में आ गया है। अब दिमाग की आदत ठीक आ गई है। अब तो पहले से अधिक काम करने पर भी उतना नहीं थकता है। इलाहाबाद मैं नहीं जा रही हूँ। आप ने पर्दे के लिहाज़ के लिये लिखा है, सो बिल्कुल ठीक है। ऐसा उचित भी है। बस केवल अन्तर इतना ही होगा कि ‘मालिक’ से पर्दा करने वालों से पर्दा उचित भी है और रहेगा। अब कुछ दो - एक बात Working में जो समझ में आई हैं, सो आप से पूछ रही हूँ।

1. तारीख १३ की रात में दो बजे आँख खुली तो भारत की शुद्धता वाले Work को करने की तबियत बहुत चाहने लगी। जब मैं कर रही थी, तो थोड़ी देर बाद ही एक कुछ नक्शा सा सामने आ गया और दिल में बार-बार इन्दौर, इन्दौर सा शब्द होने लगा, परन्तु मैं इसका कुछ अर्थ नहीं समझ पाई हूँ। यदि कोई आज्ञा हो तो लिखियेगा।

2. तारीख १६ को पण्डित महादेव प्रसाद के यहाँ गई थी। वहाँ थोड़ी देर बातें होती रहीं, परन्तु न जाने क्यों हृदय पर भारीपन होने लगा और जब काफी बढ़ा, तब 'मलिक’ की कृपा से तुरन्त सफ़ाई का उपाय समझ में आ गया। बस सफाई करते ही फिर हल्कापन आ गया। जब चली तो एक बार फिर सफ़ाई कर ली। बस फिर तबियत जैसी थी वैसी हो गयी।

3. तारीख १७ की रात को ९ बजे न जाने क्यों ‘आप’ को Sitting देने की तबियत चाहने लगी। करीब १५ मिनट Sitting दी।

4. तारीख १८ को जब दोपहर में Work कर रही थी, तो जब Pakistan वाला करने लगी तो कुछ हल्की लाली सी दिखाई दी।

‘मालिक’ की कृपा से आत्मिक-दशा अचछी चल रही है। आज न जाने क्या बात है कि कुछ काम करने की यहाँ तक किसी से बात करने की भी तबियत नहीं चल रही है। बस चुपचाप बैठे रहने की तबियत चाहती है। Working यदि और बढ़ाने की आज्ञा दीजिये तो मैं और बढ़ा दूँ। आज अब दिमाग ठप्प है। कोई विचार ही नहीं उठ रहा है। बिल्कुल खाली है। किसी तरफ़ तबियत ही नहीं जा रही है। ऐसी दशा कभी-कभी हो जाया करती है।

छोटे भाई बहनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी "
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-71
लखीमपुर
30/11/1949
कल मास्टर साहब जी से मालूम हुआ कि ‘आप’ भी कल ही शाहजहाँपुर पहूँचे होंगे। वहाँ के समाचार सुन कर प्रसन्नता हुई। यदि संसार के सब लोग पूजा करने लगें तो कितना अच्छा हो। ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। ‘मालिक’ की कृपा से मेरी आत्मिक-दशा अच्छी है और सदैव अच्छी ही होती चलेगी, यह भी निश्चित ही है। अब स्वयं पूजा करने की बहुत तबियत होती रहती है, नहीं तो जब शाहजहाँपुर से आई थी, तो कुछ दिनों पूजा करने की तबियत ही नहीं होती थी। कुछ ऐसा है कि कभी-कभी ऐसा मालूम होता है, अधिकतर तबियत भीतर ही भीतर रोती रहती है, क्योंकि सम्भव है ‘मालिक’ की याद मेरे जी भर कर नहीं होती और कर भी कैसे पाऊँ क्योंकि ‘उससे’ बढ़ कर अच्छी चीज़ समस्त ब्रह्माण्ड में अपने को कोई प्रतीत ही नहीं होती। परन्तु उसके लिये मुझ में प्रेम है, इसमें भी शक है। श्री बाबूजी ! क्या कभी मैं जी भर कर अपने ‘मालिक’ से प्रेम कर सकूँगी? परन्तु नहीं, मैं उससे ऐसा प्रेम करना भी नहीं चाहती कि जिसकी Limit हो, ‘उसके’ लिये तो Unlimited प्रेम ही रखने की कोशिश करूँगी। क्या करूँ श्री बाबूजी ! जब आप को पत्र लिखने लगती हूँ तो हृदय बिल्कुल खुल जाता है, कुछ छिपाने को जी नहीं चाहता है। फिर यह भी सोच लेती हूँ कि अब जैसी भी हूँ, सारी कलई तो खुल ही चुकी है। अब तो वही करना है, जो ‘उसे’ कराना है। फिर करना, कराना भी क्या? उसकी चीज़ पर उसका पूर्ण अधिकार है। अपनी तरफ से तो मैं उस पर प्रेम का भी दावा नहीं कर सकती। खैर, जो हो, सो हो। जब पूजा करने बैठती हूँ, तो कभी-कभी ऐसा मालूम होता है कि बिल्कुल निर्जीव सी हो गई हूँ। कृपया अपनी इस बेटी को जो अंट-संट बेमतलब की बातें लिख जाती है, हृदय से क्षमा करते रहियेगा। अब न जाने क्या बात है कि गरीबनी बेचारी का गरीबपन भी छिना जा रहा है। अब कुछ हाल अपनी डायरी में से पूछ रही हूँ।

१. तारीख २० - न जाने क्या बात है जब नम्बर एक (भारत की शुद्धता) वाला work करती हूँ तो तबियत बड़ी नम्र और खुश रहती है, परन्तु जब नम्बर दो – पाकिस्तान वाला करती हूँ तो तुरन्त तेजी और ज़ोश आ जाता है, परन्तु control रहता है। यद्यपि अधिकतर अब दोनों work के समय तबियत सम रहती है।

२. तारीख २२ - अपने ऊपर Full confidence है, हर बात को तबियत ऐसी होती है कि बस अब यह हो गया। देखा बाबूजी, किसकी चीज़ पर कौन कूद रहा है।

३. तारीख २३ - आज एक दो बार तबियत न लगने पर भी ज़बरदस्ती work किया। फिर जिया आई थीं, उनका मेरे ऊपर एहसान था। इसीलिये वैसे भी पूजा कराती रही, फिर दोनों जने बैठे भी। ऐसी तबियत लगी कि, ऐसा मालूम पड़ने लगा कि मैं स्वयं भी पूजा कर रही हूँ। जिया की तबियत भी काफ़ी मुलायम और हल्की मालूम पड़ी।

4 तारीख २९ - कुछ दिनों से जब नंबर एक (भारत) पर work करती हूँ, तो ऐसा मालूम होता है कि सारी पृथ्वी कुछ मुलायम हो चली है। आज तबियत कुछ उदास और सुस्त सी रही। न मालूम क्या कारण है कि मुन्नी को पूज़ा कराने में तबियत नहीं लगती। उसके Heart पर सम्भव है कुछ कड़े संस्कार जमे हुए हैं।

पूज्य श्री बाबूज़ी ! इधर कुछ दिनों ऐसा रहा कि जिसको पूजा कराऊँ उसे ही रात भर नींद नहीं आवे। जिया को जब पूजा कराऊँ तो वे जगे, और केसर को कराऊँ तो वह जगे, तो मैं अपनी गलती सोचा करूँ, परन्तु कुछ समझ में ही नहीं आता है।

अक्सर ऐसा होता है कि आजकल work के बाद जो समय मिले तो प्रथम, थोड़ी सी आदत के अनुसार हर समय पूजा करने की ही इच्छा रहती थी। जब किसी को Sitting दूँ, तो भी थोड़ी बहुत ‘मालिक’ की याद में ही। तब मैंने, जब इस चीज़ को रोक कर पूजा कराई तो सबको खूब गाढ़ी नींद आने लगी है। कल मास्टर साहब जी से पूछा तो उन्होंने कहा कि अक्सर ऐसा हो जाता है, तब, अब मुझे कोई डर नहीं रहा। एक बात लिखते हुए डर लगता है, आप क्षमा करियेगा कि अब यह भाव उठता है कि ‘मालिक’ मेरी याद करे और कभी-कभी यह मालूम भी पड़ता है कि ‘मालिक’ मेरी याद में बैचेन हो रहा है। जिया वाले पत्र की नकल मैंने कर ली है। कितना उच्च कोटि का उपदेश सबके लिये है। परन्तु आप तो जानते ही हैं कि यह उपदेश कितना है और मेरी समझ कितनी छोटी।

छोटे भाई - बहनों को प्यार तथा दादी से प्रणाम कहियेगा। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-72
लखीमपुर
2/12/1949
कल एक पत्र आपको लिखकर पूज्य मास्टर साहब जी को दे चुकी हूँ, परन्तु आज फिर, आपको पत्र लिखने की तबियत हो आई। कल से ‘मालिक’ की कुछ अपने ऊपर विशेष कृपा मालूम पड़ रही है। कल शाम को तो मेरे अन्दर न मालूम क्या हो रहा था। ऐसा लगता है कि भीतर जैसे आँखें सी खुल गई हैं कि ‘मालिक’ की याद कैसे की जाती है? बहुत सोचती हूँ, परन्तु कुछ समझ में ही नहीं आता। और यह भी ठीक याद नहीं पड़ता कि कभी मैं उसकी याद करती भी थी। एक बार ‘आप’ ने कहा था कि तुम मालिक की याद करती हो। और तब मेरी भी समझ में आ गया था, परन्तु अब जब सोचती हूँ कि पहले कैसे याद करती थी तो वह भी कुछ ख्याल में नहीं आता है। बस सारी बात यही है कि याद भूल गई है कि ‘मालिक’ की याद कैसे की जाती है? और ‘मालिक’ की याद कहते किसे हैं? work थोड़ा बहुत किये ही जा रही हूँ। तबियत ऊँची और गहरी मालूम पड़ती है यही दो-चार बेकार की बातें लिख दी हैं, परन्तु कुछ लिखे बगैर रहा भी नहीं गया। ताऊ जी व छोटे भईया परसों आ गये हैं, परन्तु अम्मा अभी नहीं आई हैं। छोटे भाई बहनों को प्यार।

work तथा पूजा कराते समय अब केवल यह ख्याल ही रहता है कि हाँ, यह हो रहा है, परन्तु काम चल खूब मज़े में रहा है। आज पहले की एक बात याद आ गई, सो लिख रही हूँ, क्षमा करियेगा। पहले जब मास्टर साहब कहते थे, कि अब बाबूजी कस्तूरी से कुछ काम लेगें तो मैं मन ही मन में सोचती थी, कि हमारे पूज्य तथा आदरणीय ‘श्री लालाज़ी’ ‘श्री बाबूजी’ को बहुत प्यार करते थे, इसलिये ‘उन्होंने’ ‘श्री बाबूजी’ से १३, १४ वर्ष बाद काम लेना प्रारम्भ किया था। तो मैं भी कुछ ऐसा करूँगी कि श्री बाबूजी मुझे खूब प्यार करने लगें, तो १४, १५ वर्ष में मुझे ठीक-ठाक करके तब काम लेंगे, मैं अभी क्यों करूँ, परन्तु अब यह कुछ नहीं है, अब तो जिसमें ‘मालिक’ खुश हो, वही खुशी से होता जायेगा। कल से हालत कुछ बदली हुई है, परन्तु अभी ठीक समझ में नहीं आई है। कृपया यदि उचित समझियेगा तो बता दीजियेगा कि ‘मालिक’ की याद कैसे की जाती है, नहीं तो जैसी मर्ज़ी। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-73
शाहजहाँपुर
5/12/1949
तुम्हारे दो पत्र मिले। एक इलाहाबाद जाने से पहले और एक कल तीसरी दिसम्बर को। इलाहाबाद में मेरी खूब तबियत लगी रही। तुम्हारी बहन शकुन्तला बेचारी मेरी वजह से इलाहाबाद आई। अपने दिल के दौरे की कुछ परवाह न की और वहाँ भी उसको कई दौरे हुए। मुझे यह देख कर बड़ा तरस आया और मुझे यह देख कर बड़ा दुख भी हुआ कि ऐसी लड़की की याद, बावजूद कितनी मर्तबा चौबे जी के कहने पर भी मुझे न आती थी। जाने से पहले बड़ी कोशिश से दो-चार दफे उसका ख्याल आया। एक रोज़ उसका दिल बहुत ज़्यादा धड़क रहा था और मुझे देख कर बड़ी तकलीफ़ हुई। बस, उसकी सिफारिशों पर ख्याल करते हुए और उसकी हालत पर तरस खाते हुए मैं उसकी आत्मिक उन्नति के लिये ख्याल करता रहा। ईश्वर ने मेरी सुन ली। उसके पिण्ड के मुकामात (चक्र) मय सैर के पूरे हो गये और उसका वास ब्रह्माण्ड-मण्डल में है। उसके कुल ज़िस्म में ईश्वरीय-प्रकाश छा गया और अनहद खुल गया अर्थात् हर रोम-रोम से अजपा जाप शुरु हो गया। चूंकि वह कमज़ोर थी और दिल की बीमारी, इस लिये इस काम को इस तरीके पर किया कि बात वही हो जाय, मगर दिल पर ज़ोर न पड़े। चलते वक्त उसने मुझसे फिर कह दिया कि मेरी याद रखना। मैंने उससे कह दिया कि अपनी बहन कस्तूरी को लिखो कि वह अब तुम्हारी याद रखे। इतना खत मैं लिख चुका था कि तुम्हारा एक पत्र आज और मिला।

याद से जहाँ तक हो सके गाफ़ील नहीं होना चाहिये। जितनी याद हल्की पड़ती जावे, उतना ही हल्का रूप, उसकी याद करने के लिये लेना चाहिये। और फिर आखिर में जो कुछ हो जावे, यह ‘मालिक’ की मर्ज़ी। तुमने यह जो लिखा कि - ‘कल शाम को तो मेरे अन्दर न मालूम क्या हो रहा था। ऐसा लगता है कि भीतर जैसे आँख सी खुल गई है’। इसका मतलब मेरी समझ में नहीं आया। आँखें खुलने से क्या जिस्म के अन्दरुनी organs मालूम होने लगे या प्रकाश, या कोई और बात महसूस हुई - लिखना।

अब पिछले खत का जवाब देता हूँ। ईश्वर की याद में पूजा कराने से दूसरे में जागृति बहुत पैदा होती है। इसलिये इन्सान सोते हुए अपने आप को जाग्रत हालत में महसूस करता है। मगर तुमने अपनी हालत तो लिखी ही नहीं कि तुम्हें नींद कैसी आती है। सोते हुए जागने का एहसास होता है या गहरी नींद में सोती हो। मैं तो भाई खूब गहरी नींद सोता हूँ, मगर फ़कीर के लिये गहरी नींद में सोना वर्जित है। मुझे शायद चौबीसो घंटे नींद न आवे, अगर ऊपर से सुलाने के लिये धार न बहे। यह तकलीफ़ मेरी वजह से मेरे गुरु महाराज को उठानी पड़ती है। न मालूम यह क्यों मेरे साथ रियायत है, यह ‘वह’ जानें।

पण्डित महादेव प्रसाद के यहाँ जब तुम गई थीं और वहाँ तुमको भारीपन महसूस हुआ। यह उनके ठोस विचार और ठोस पूजा का असर है। ठोस पूजायें जो आम तौर से हो रही हैं, इसका फल यह होता है कि आदमी जन्म-जन्मांतर के लिये ईश्वर प्राप्ति के लायक नहीं रहता। यह बात जिससे कहूँ, वह लड़ बैठे। ज़ब किसी को Liberation प्राप्त करना होगा, सिवाय इस तरीके, राजयोग जो हम सब कर रहे हैं, कोई हो ही नहीं सकता। यह स्वामी विवेकानन्द ने भी कहीं पर कहा है। सिवाय इस योग के कोई योग ही नहीं जो धुर तक पहुँचा सके। हठ योग सिर्फ़ आज्ञा चक्र तक पहुँचा सकता है। यह चक्र दोनों भौंहों के बीच में है। इसके आगे राजयोग की ही ताकत है।

तुम्हारे खत का जवाब कुछ अंग्रेजी में भी दिया है, जो स्वामी जी का Dictate है। अगर समझ में न आवे तो मास्टर साहब से समझ लेना, और किसी को बतलाने की जरुरत नहीं। किसी शख्स की जान की हिफ़ाज़त करने का तरीका यह है कि उसके चारों तरफ़ एक ख्याली circle अपनी will से यह ख्याल करते हुए बना लेवे कि यह चीज़ उसकी रक्षा करेगी और किसी-किसी वक्त ख्याल रखे। हर वक्त ख्याल रखने की जरुरत नहीं। यह वह कुण्डली (circle) है, जिसको लक्ष्मण जी ने सीता के चारों ओर बनाई थी, जब मारीच हिरण के रुप में जंगल में आया था और रामचन्द्र जी उसके शिकार को चल दिये थे और बाद में लक्ष्मण जी को भी जाना पड़ा। आज स्वामी सुखदेवा नन्द के मुमुक्ष आश्रम में जलसा है। यह ३-४ दिन रहेगा। उसके लिये Public ने पन्द्रह हजार रुपये चन्दा दिया है। महात्मा लोग Lectures देगें। सिर्फ दो घंटे के लिये एक साहब के कहने से मैं भी आज जा रहा हूँ। काम इतना करो कि दिमाग थक न जावे।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-74
लखीमपुर
9/12/1949
कृपा-पत्र आप का मिला। पढ़ कर प्रसन्नता हुई। जिज्जी के ऊपर आप की इतनी अहेतु की कृपा देखकर उस परम् कृपालु ‘मालिक’ से मेरी यही प्रार्थना है कि जैसे जिज्जी के भाग्य जगे, ऐसे ही सब पर उसकी अनुपम कृपा होती रहे। और अपने मिशन में ‘आप’ की कृपा से दिल वाले रोगी के लिये भी कितना सरल तरीका निकल आया।

‘आप’ ने लिखा कि जहाँ तक हो सके ‘मालिक’ की याद से गाफ़िल नहीं होना चाहिये। सो तो आप विश्वास रखें, जब तक जरा भी बस है ‘उसकी’ याद किसी न किसी तरह बनी ही रहेगी। उस दिन मैंने जो आपको लिखा था कि - ‘भीतर जैसे आँख सी खुल गई’, सो उसका मतलब या अनुभव मुझे भी नहीं मालूम कि क्या हुआ था। बस इतना विश्वास तो मुझे है कि उस दिन जिसने भी Sitting ली थी, उससे उनका बहुत लाभ हुआ था। आपने जो नींद के बारे में पूछा है, सो शाहजहाँपुर जाने से पहले और वहाँ से आने के बाद ६-७ दिन तो सोते में जागने का एहसास होता था, परन्तु अब तो ‘मालिक’ की कृपा से मस्त, इतनी गहरी नींद सोती हूँ कि ५-६ घंटे बाद ही नींद खुलती है। इतनी देर लगातार मैं शायद पहले कभी नहीं सोती थी। हाँ, यह तो ज़रुर है कि सोने की तबियत तो नहीं होती, नींद को जहाँ तक हो सकता है, बराती ही रहती हूँ। ऐसा क्यों करती हूँ, यह आप जानते ही हैं। जब से work कुछ प्रारम्भ किया है, तभी से नींद भी गहरी आने लगी है। कभी-कभी एकाध दिन ऐसा अब भी हो जाता है, कि ऐसा मालूम पड़ता है कि रात भर जागती रही हूँ, परन्तु बहुत कम। यह बात अक्षरश: सत्य है कि सिवाये इस तरीके के, जो ‘आप’ के ‘मिशन’ में है, Liberation इसके अतिरिक्त और किसी तरीके से नहीं हो सकता।

जो Work बतलाया गया है, वह उसी तरीके से, जैसा कि आप ने लिखा है, प्रारम्भ कर दिया है, और Plot के Destroy का भी Work कुछ आज से प्रारम्भ कर रही हूँ, परन्तु यदि उचित हो तो, उसका भी कुछ तरीका लिख दीजियेगा। और पूज्य श्री स्वामी जी ने जो यह लिखा है की - ‘But this thing is prevailing, through out India’, उस दिन जब मैंने [P] में वह चीज़ देखी थी, उसी दिन Whole India में बिल्कुल वही चीज़ बल्कि उससे अधिक लाल मालूम पड़ी थी और बार-बार, परन्तु मैंने अपना कुछ वहम् समझ कर ध्यान नहीं दिया। क्षमा कर दीजियेगा, अब से सचेत रहूँगी। श्री स्वामी जी के चरणों में मेरा सादर प्रणाम करते हुए निवेदन कर दीजियेगा कि यदि यह Heart मेरा होता तो सम्भव है बुजदिल ही होता, परन्तु अब किस ताकत का है, ‘आप’ जानते ही हैं। अब तो जब जैसा Heart Required होगा तब तैसा ही मिलेगा। कोशिश और ‘मालिक’ से सदैव प्रार्थना यही है कि कभी इस गरीबनी से ऐसी गलती न बन पड़े, जिससे मेरे ‘मालिक’ को चोट पहुँचे। वैसे अपनी सज़ा का मुझे कोई भय नहीं , परन्तु ‘मालिक’ के हृदय की चोट मुझसे सहन नहीं हो सकेगी। और मुझे पूर्ण विश्वास है कि ऐसा कभी नहीं होगा। श्री स्वामी जी कहते हैं कि ‘He has fatherly relation with you’ परन्तु मुझे अभी चैन नहीं है, अभी बहुत कुछ शेष है। मैं उनसे जैसा प्यार चाहती हूँ, और स्वयं जैसा ‘मालिक’ को करना चाहती हूँ, वह मेरा ‘मालिक’ भली भाँति जानता है। और ऐसा मैं अवश्य कभी न कभी कर लूँगी, यह दृढ़ निश्चय है। हाँ ‘मालिक’ के काम में, इससे कोई कमी नहीं आने पायेगी, ‘मालिक’ की प्रशंसा तो जितनी भी की जावे, थोड़ी है। ‘उनकी’ प्रशंसा शब्दों के परे है। पूज्य श्री बाबूजी! आपने जो Self Surrender के Stages लिखे हैं, वे अदिव्तीय हैं। और क्या कहूँ? आप ही अदिव्तीय हैं तो हर Word जो ‘आप’ के श्रीमुख से निकलते हैं, वे ऐसे क्यों न हो? परन्तु श्री बाबूजी! मैं ऐसी नासमझ हूँ कि मुझे तो केवल एक Word के दूसरा समझ में ही नहीं आता है।

मेरी आजकल की हालत तो गूंगे के गुड़ जैसी है। बहुत अच्छी है। कभी-कभी न जाने क्यों ‘आप’ को Sitting देने की तबियत हो आती है और जब देती हूँ, तो ऐसी अच्छी हालत होती है, जैसी कि जब मैं स्वयं पूज़ा करती हूँ, तब नहीं होती। अधिकतर तबियत बिलकुल शान्त हो जाती है। दिन भर कोई न विचार आते हैं और न कोई और बात ही मालूम पड़ती है।

अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं और कहती हैं ‘आप’ कभी-कभी हमें याद कर लिया करें। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-75
लखीमपुर
15/12/1949
मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। यहाँ सब कुशलपूर्वक हैं, आशा है आप भी सकुशल होंगे। केसर के फोड़ा गाल के नीचे निकला था, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से सब ठीक हो गया है केवल कुछ घाव शेष रह गया है। मेरी आत्मिक-दशा ‘मालिक’ की कृपा से अच्छी है, परन्तु एहसास इतना मन्द पड़ गया है कि अब तो सर्दी-गर्मी यानी मौसम का भी एहसास करीब-करीब खत्म ही समझिये। यही ध्यान नहीं रहता कि सर्दी पड़ रही है जब शरीर काँपने लगता है तब एक झटका सा लगता है और तब थोड़ी देर के लिए यह एहसास होता है कि सर्दी है और फिर भूल जाती हूँ। एक आदत के कारण जितने गर्म कपड़े उतारती हूँ उतने फिर पहिन लेती हूँ कभी-कभी तबियत एकदम उदासी सी न मालूम कैसे हो जाती है। कुछ दिनों से ऐसा मालूम पड़ता है, कि एक मन तो सब काम वाम कर रहा है, परन्तु दूसरा मन ‘मालिक’ में बिल्कुल डूब सा गया है। ऐसे ही रात में एक मन तो खूब गहरी नींद में खो जाता है, परन्तु एक मन तब भी जगता रहता है, इस कारण सबेरे जब उठती हूँ तो ऐसा नहीं मालूम पड़ता कि दिमाग को कोई खास आराम मिला है यही दशा दिन भर रहती है।

Working थोड़ा बहुत हो रहा है। परन्तु न जाने क्यो ३-४ दिन से [P] वाले work करने में तबियत नहीं लगती है, बार-बार उचट जाती है। आजकल यह मालूम पड़ता है, कि मैं सबकी नौकर हूँ और कुछ यह हो गया है कि मुझे किसी में कुछ बुराई ही नहीं मालूम पड़ती। क्योंकि अब तो कुछ-कुछ यह दशा हो गई है कि:-

“बुरा जो ढूंढ़न मैं गया, बुरा न मिलया कोय। जो दिल देखा आपना, मुझ सा बुरा न कोय।।”

परन्तु अपने लिये मैं अब यह भी नहीं कह सकती। क्यों? इसका उत्तर तो आपको स्वयं मालूम ही है। कल ४-५ दिन बाद [P] वाले work में खूब तबियत लगी। नींद का यह हाल बहुत दिन से है, परन्तु समझ में अब जाकर आया है। केसर, बिट्टो आपको प्रणाम कहती है, तथा अम्मा आशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-76
लखीमपुर
29/12/1949
मेरे दो पत्र मिलें होंगे। यहाँ सब कुशलपूर्वक हैं, आशा है, आप भी सकुशल होंगे। न मालूम क्यों आपको पत्र लिखने की फिर तबियत हो आई, क्षमा करियेगा। मेरी आत्मिक-दशा ‘मालिक’ की कृपा से अच्छी चल रही है और सदैव अच्छी ही चलती रहेगी, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। अब तो यह हाल हो गया है कि अपने शरीर का एहसास भी करीब-करीब खत्म हो गया है। और कुछ यह है कि जैसे पहले जब पूजा करने बैठती थी तो यही ध्यान करती थी कि सामने आप बैठे हुए मुझे पूजा करा रहे हैं, परन्तु अब ऐसा करने की कभी-कभी बिल्कुल तबियत नहीं होती। भाई, अब तो यह हाल हो गया है, कि ज़ो आँख, आँख को देखना चाहती थी, वह सिर से पैर तक एक हो गई है। नींद का तो यह हाल हो गया है कि एक तरह से देखा जाये तो रात में जब नींद खुलती है तो ऐसा मालूम पड़ता है कि कहीं बहुत ऊँचे से तबियत उतरी है। और इतनी गहरी होती है कि यदि कोई सोते से मुझे जगावे तो सम्भव है कुछ तकलीफ़ हो जावे परन्तु एक तरह से देखा जाय तो रात में भी जगती ही रहती हूँ। एक हालत बहुत अच्छी मालूम पड़ती है परन्तु मैं उस हालत को लिखूँगी नहीं जब आऊँगी तब आपसे बतला दूँगी। अब बिल्कुल खालीपन रहता है ‘मालिक’ ने तो मुझपर सदैव कृपा की है और करता ही रहेगा। यह ऊँची तबियत जो सोकर उठने पर मालूम पड़ती है, ऐसी ही तबियत दिनभर ही रहती है। ज़ब कभी फ़कभी झटका लगता है, तब ऐसा मालूम पड़ता है कि तबियत ऊँचे से उतरी है।

Working मजे में चल रही है अब कोई खास बात मालूम नहीं पड़ती। बस ‘आप’ कृपा करके कभी-कभी देखते अवश्य रहियेगा बड़ी जिज्जी (शकुन्तला) यहाँ आ गई है, वह तथा केसर बिट्टो आपको प्रणाम कहती हैं, तथा अम्मा आशीर्वाद कहती हैं। केसर कहती है कि कल से उन्हें बेचैनी बहुत मालूम पड़ती है और हल्कापन भी बहुत मालूम पड़ता है। छोटे भाई बहनों को प्यार तथा दादी को प्रणाम कहियेगा। इतिः-

आपकी दीन-हीन सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-77
शाहजहाँपुर
1/1/1950
तुम्हारा पत्र १५ दिसम्बर का लिखा हुआ मिला। बड़े दिन में मैं गाँव चला गया था और इससे पहले जवाब देने का समय नहीं मिला। इसलिये ज़वाब में देर हुई। तुमने जो यह लिखा है कि किसी वक्त तबियत उदास हो जाती है। मैं समझता हूँ कि कोई फ़िक्र पैदा नहीं होती होगी, बल्कि यह एक हालत है जो ईश्वर की कृपा से तुममें मौजूद है। इसके जरा तेज हो जाने पर तुमको उदासी feel होती है। इस हालत को उदासीनता की हालत कहते हैं। तबियत अभ्यासी की ऐसी बन जावे कि जो काम करे वह इस तरह का हो जैसे परवाना जाने के बाद दिल में फिर उसका ख्याल भी नहीं लाता अर्थात् परवाना कर आने के बाद फिर परवाने का ख्याल भी नहीं लाता। हर काम दुनियादारी का इसी तरह से होता रहे कि उसके करने के बाद ख्याल का weight उस पर कम रहे। इसको उदासीनता की हालत कहते हैं। इस जमाने में एक उदासी फिरका भी है। मगर उसका अब नाम ही नाम रह गया है। यह हालत उनमें से शायद ही किसी में हो। तुमने लिखा है कि -’एक मन सब काम कर रहा है यह एहसास ठीक है। जब गिलास में पानी भर कर ज़ोर से फेंका जाता है, तो उसका एक मुँह फेंकने वाले की तरफ़ हो जाता है और दूसरा मुँह दूसरी तरफ़, चीज़ एक ही है। जिसका मुँह मालिक की तरफ़ है वह ‘मालिक’ की याद करता है और जिसका मुंह दुनिया की तरफ़ है, उसको दुनियादारी की याद रहती है। मैंने यह बात बहुत संक्षेप में लिख दी, उसकी Philoshpy बयान नहीं की। मन में जब जागृति पैदा होती है, तब उसका रुझान ईश्वर की तरफ़ हो जाता है और जरुरत भर दुनियाँ की तरफ़ रहता है। सर्दी का एहसास कम होने के मतलब यह है कि रुझान ऊपर की तरफ़ बहुत तेज होने की वजह से इसका एहसास कम हो गया। मगर मुझे तो बहुत सर्दी लगती है और इस वजह से देर करके उठता हूँ और कुछ काम भी नहीं कर पाता।

एक बात से मुझको बड़ी तकलीफ़ होती है और मेरा कुछ बस नहीं चलता। वह यह है कि तुम्हारे पिताजी की जब आर्थिक तकलीफ़ की तरफ जब ध्यान जाता है, तो बहुत फ़िक्र पैदा हो जाती है। मैंने ईश्वर से प्रार्थना भी की मगर नहीं मालूम वह क्यों नहीं सुनते। या तो यह हो सकता है कि यह हमारे मतलब की बात नहीं है, या कोई और वजह हो। यह ज़रुर देखा गया है कि जब ईश्वर के मतलब की बात होती है, तो ख्याल आते ही ‘वह’ कर देते हैं। प्रार्थना की नौबत ही नहीं आती। इस तकलीफ़ को दूर करने की तुम ही दुआ करो। मुमकिन है ‘वह’ तुम्हारे ही कहने से कुछ कर देवे। मुझे तो, मैं सच कहता हूँ, कुछ शर्म सी मालूम होती है कि इतना छोटा सा काम मुझ से नहीं होता।

तुम्हारी माता जी को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-78
लखीमपुर
8/1/1950
पत्र आपका आज आया, पढ़कर प्रसन्नता हुई। बसंत पंचमी के निमंत्रण पत्र के लिये आप को बहुत धन्यवाद है। ‘मालिक’ की मर्ज़ी रही तो हम सब सेवा में उपस्थित होंगे और ‘मालिक’ की कृपा अभी तक है और रहेगी, इसमें सन्देह नहीं। ईश्वर की कृपा से आत्मिक-दशा अच्छी चल रही है और चलती रहेगी। उदासी की दशा में कोई फ़िक्र वगैरह नहीं होती। वह तो बस एकदम बिल्कुल उदास हो जाती है। कभी जल्दी ठीक हो जाती है और कभी-कभी पूरे दिन रहती है और होती अक्सर है। अधिकतर तो अब यही हालत है कि हर चीज़ का केवल एक ख्याल मात्र ही रह गया है। Working का भी एक ख्याल ही ख्याल बंधा रहता है। पूज्य बाबूजी इस पूजा की कहाँ तक प्रशंसा की जावे। जिन बातों को अपने में लाने का पहले वर्षों अभ्यास व प्रार्थना की, वे केवल ‘मालिक’ की कृपा मात्र से ही स्वयं पैदा हो गई हैं। स्वभाव व आदतों में कुछ परिवर्तन हो गया है और बराबर होता हुआ देख रही हूँ। जहाँ तक मुझे याद है १५ दिसम्बर के बाद मेरे दो या तीन पत्र आप के पास और पहूँचे होंगे। आखिर वाला पत्र तो पहली या दूसरी जनवरी को ही पहुँचा होगा। एक दिन जब Working कर रही थी तो India में ‘ॐ’ शब्द सा दिखाई दिया था। इसके लिये मैं यह ठीक नहीं कह सकती क्योंकि मुझे अब कुछ याद नहीं रहा कि शायद उस शब्द की ओर मेरा कुछ ध्यान चला गया हो। यह बात अभी याद आ गई, सो लिख रही हूँ, परन्तु जहाँ तक याद है, तो उस समय मेरा ध्यान उस ओर नहीं गया था।

पूज्य बाबूजी, न जाने क्या बात है कि सो कर उठने पर जैसी ‘मालिक’’ की कृपा से कुछ आदत थी कि सर्वप्रथम ‘मालिक’ का ही ध्यान ‘उसकी’ ही याद आती थी, सो अब एकदम नहीं आती। जागने के थोड़ी देर बाद ध्यान आता है। कई दिन से कोशिश और बढ़ा दी है, परन्तु अब भी नहीं आता। यद्यपि और ख्याल भी नहीं आते, परन्तु याद भी नहीं आती। ऐसा ही दिन में भी होता है। अब मुझे पहले की तरह दिन भर याद नहीं रहती। इस कारण कभी-कभी बेचैनी बहुत बढ़ जाती है। या यह कहिये कि सबेरे कुछ ख्याल नहीं रहता है और यही हाल दिन में होता है। Working मज़े का चल रहा है। छोटे भाई-बहनों को प्यार तथा दादी से प्रणाम कहियेगा। अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-79
लखीमपुर
12/1/1950
मेरा एक पत्र मिला होगा। यहाँ सब ईश्वर की कृपा से कुशल पूर्वक हैं। आशा है, आप भी सकुशल होंगे। अपनी आत्मिक-दशा के विषय में तो लिख चुकी हूँ, परन्तु इधर तीन-चार दिन से तो यह दशा चल रही है कि ऐसा मालूम पड़ता है कि न कभी पूजा की है, और न अब कुछ हो रही है। अब तो पूजा-ऊजा सबसे खाली लगती हूँ और न तो गरीबी लगती है, और न कुछ अमीर ही लगती हूँ। याद का हाल तो इतना बुरा हो गया है कि अब जल्दी-जल्दी साँस लेने की भी याद नहीं रहती है। इससे जब कभी-कभी परेशानी हो जाती है, तब याद आती है। बस फिर खूब जल्दी-जल्दी साँस लेकर शरीर की परेशानी दूर कर देती हूँ। भाई, मुझे तो तकलीफ़ आराम से कोई मतलब नहीं रह गया है। अब तो ‘मालिक’ की अपने ऊपर प्रसन्नता से बढ़कर कोई आराम नहीं है और उसकी जरा सी अप्रसन्नता से बढ़कर कोई तकलीफ़ नहीं है। आजकल बिल्कुल खाली लगती हूँ। इसलिए बेचैनी कभी-कभी उग्र रुप धारण कर लेती है। इधर दो-तीन दिन से अजीब रोनी सी दशा रहती है।

कल Working के समय तो बैठे ही बैठे एकदम [P] में India का तिरंगा फहराता सा मालूम पड़ा और Working ‘मालिक’’ की शक्ति से अच्छा

चल रहा है। अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं।

अब तो तारीख २१ को आप की सेवा में उपस्थित होऊँगी। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-80
शाहजहाँपुर
12/1/1950
तुम्हारा खत २९.१२.४९ को लिखा हुआ आया। उसमें जो तुमने लिखा है कि ‘अपने शरीर का एहसास भी करीब-करीब खत्म हो गया है’। यह बड़ी अच्छी हालत है। इसको लय अवस्था कहते हैं। फ़ारसी में इसको फ़ना कहते हैं। अभी यह चल रही है, इसके बाद और अच्छी हालत आवेगी, ईश्वर ने चाहा। जब आवेगी। तो बता दूँगा। पहले से बताना नहीं चाहता। सोते वक्त और लोगों को चाहिये कि एकदम से न जगायें। एकदम से जगाने से ख्याल जो लगा हुआ है, एकदम से हटता है, इसलिये उसको shock होता है और तकलीफ़ भी हो जाती है। किसी अभ्यासी को एकदम से नहीं जगाना चाहिये। मेरा तो यह हाल है कि जगने की हालत में अगर कोई चारपाई हिला दे, तो मुझे तकलीफ़ हो जाती हैं।

तुम्हारा एक खत ८.१.५० का लिखा हुआ आया। उसमें यह लिखा हुआ है कि ‘एक दिन जब Working कर रही थी तो India में ॐ शब्द सा दिखलाई दिया’। यह एहसास बिलकुल ठीक है। यह ऐसा समय है कि मुद्दतों ऐसे वक्त का आना दुर्लभ है। ईश्वर की शक्ति अपने खालिस रुप में किसी बड़ी Personality के द्वारा उतरी हुई है। इसका सबूत यह है कि किसी जगह पर बैठकर देखें और यह ख्याल करें कि मैं उस Personality से आध्यात्मिक लाभ उठा रहा हूँ, जिसमें खालिस रुप में ईश्वर की शक्ति उतरी हुई है, तो उसको फ़ौरन फ़ायदा पहुँचेगा। इस ॐ की शक्ति के साथ मुमकिन है, इससे पहले कोई महात्मा न आया हो। हाँ, मेरे गुरु महाराज इसमें Exception है, इसलिये कि उनमें ऐसी शक्ति पैदा करने की ताकत है, फिर ऐसे गुरु की ताकत का क्या ठिकाना। यह शक्ति जब उतरेगी तो संहार भी होगा और उससे चिपटे हुओं को फ़ायदा भी Unlimited होगा। महाभारत में इस शक्ति का ज़हूर इतने पूर्ण रुप में न था। था ज़रुर, इस तरीके पर कि ‘उसको’ Destruction और Construction का पूरा अख्तयार था और उस वक्त उस शक्ति में से फुहार निकाल कर काम कर रही थी। इस वजह से संग्राम पूरी शक्ति से नहीं हो रहा था। उस वक्त इतनी ही ज़रुरत थी और इस वक्त उससे ज्यादा जरुरत है मामला World Destruction का पेश है। वक्त कितना ही लग जाये। मगर साथ- साथ में Construction भी है। महा प्रलय के वक्त भी कोई शक्ति कुल Universe के खत्म करने के लिये काम करेगी। उस वक्त Construction work खत्म हो जायेगा। तुलसीदास ने जो यह लिखा है कि एक दिन सब को मरना है, इसलिए पढ़ना बेकार है। उनसे यह कहना चाहिये कि जितने दिन सबको जीना है, उतने वक्त के लिये पढ़ना ज़रुरी है। इस ख्याल को उनके तुम्हीं साफ कर दो। जैसा ख्याल बाँधोगी, वैसा ही दूसरे में असर होगा।

एक बात तुम्हें और बतलाता हूँ - भगवान् कृष्ण का अवतार महामाया के स्थान से था और यह बात हमारे गुरु महाराज ने कहीं पर कही है। यह स्थान वह है, जहाँ पर माया एक घुमाव की शक्ल में बहुत ज़ोरदार होती है। उसमें वह ताकत होती है, कि चाहे सो कर गुज़रे, इसलिये श्री कृष्ण जी महाराज में इन्तहा ताकत थी। इस ताकत की बराबरी कोई नहीं कर सकता, इसलिये कि बिल्कुल परिपक्व हालत से श्री कृष्ण जी का अवतार हुआ था। इससे ऊँचा एक रुहानी मुकाम है और वह भक्तों को नसीब होता है और वहाँ पर गिने चुने लोग पहुँचते हैं। मगर उसकी complete हालत हज़ारों वर्ष बाद किसी एक को नसीब होती है। श्री कृष्ण जी को महामाया के स्थान पर पूरा कमाल हासिल था और उनका कदम इस रुहानी स्थान पर था, जिसका मैंने ज़िक्र किया था। अब शक्ल इसके खिलाफ़ है। वह बड़ी हस्ती है, जिससे कि ईश्वर काम ले रहा है। उसको ‘उस’ हालत पर ईश्वर ने कमाल दिया है। श्री कृष्ण जी महाराज को समयानुसार महामाया के स्थान पर कमाल हासिल था और अब मौजूदा हस्ती को उस पर कमाल हासिल है।

गाँधी जी की मृत्यु के बाद अरविन्द घोष से पूछा गया था कि गाँधी जी तो चल बसे, अब कहीं हिन्दुस्तान में Light मौजूद है? उन्होंने जवाब दिया था ‘There is still light in Northern India’. इससे ज़ाहिर होता है कि कोई Personality ज़रुर काम कर रही है। अरविन्द घोष एक अच्छे महात्मा कहे जाते हैं और कुल जग उनको मानता है। उनकी पहुँच ब्रह्माण्ड मण्डल तक थी और उनका कदम इस वक्त तक इससे आगे जा भी नहीं रहा था। मगर चूँकि मेहनत अच्छी की थी, इसलिये उनमें बिजली ज्यादा है। अगर कहीं हमारे यहाँ लोग मेहनत कर जायें, अर्थात् अपने आप ऊपर बढ़े, मुझ से मेहनत कम लें, तो मैं समझता हूँ, हमारी संस्था में बहुत से अरविन्द घोष थोड़े ही दिनों में नज़र आने लगें। अपने आप रगड़ करने से ताकत अपने वश में रहती है। यह स्थान बहुत ऊँचा है। श्री कृष्ण भगवान ने अर्जुन को अपना विराट रुप इसी जगह से दिखलाया था। मगर हमारे यहाँ इन मुकामत की कदर ही नहीं रही और यह बहुत सस्ती चीज़ हो गई। इस बड़ी नियामत (Blessing) की बेकदरी की जिम्मेदारी हमारे ऊपर है कि एक तो हमारी जल्दी की आदत है, दूसरे यह ख्याल कि जल्दी से जल्दी लोग आगे बढ़े। तीसरे यह कि वह ज्यादा मेहनत और Sacrifice नहीं करते हैं। मैं चाहता हूँ कि अपनी ज़िन्दगी में कुछ थोड़ा बहुत जहाँ तक हो सके बढ़ा जाऊँ कम से कम लोग इतने तो अवश्य हो जावें कि इस दुनिया में उनकी पैदाइश रुक जावे और अगर यह भी न हो सके तो आगामी जन्म में तो तरक्की कर सकें। एक चीज़ मुझे ज़रुर प्रिय है और उसका इन्तज़ार करता हूँ कि जब ईश्वर पर Faith अच्छा हो जाता है, तो मेरी तबियत उसकी तरक्की के लिये जल्दी रुजू होती है, और नहीं मालूम मैं किस चीज़ के इन्तज़ार में रहता हूँ - यह मुझे अब भी पता नहीं है। यह बात अगर पैदा हो जाती है, तब तो भाई, जब मुझे कोई रोकता है, तब रुक पाता हूँ। तुम्हीं लिखना अगर तुम्हें मालूम हो, ताकि मुझे भी मालूम हो जाये। मुझे एक मीनियाँ यह भी रहता है कि कोई शख्स ऐसा मिल जाये कि मैं अपनी हालत से जो कुछ भी मुझे मेरे गुरु की कृपा से मिली है, उससे मैं उसे Sitting दे देता। चाहता मैं अब भी हूँ, और कोई इस हद तक आ गया तो मैं चूक नहीं सकता, मगर अब इसकी ख्वाहिश जाती रही, इसलिये कि मुझे एक मौका ज़रुर मिल गया। किस वक्त? जब कि प्रकाश की माँ परलोक सिधारने की तैयारी कर रही थीं। वह भी सिर्फ पाँच या छ: सेकण्ड का। मैंने उनको ईश्वरी Region से Sitting दी थी। इससे ऊपर के हिस्से में तवज्जह देने का ख्याल ही न आया। मृत्यु के बाद ख्याल आया, तो एक बार, पर उसके लिये आज्ञा ही नहीं मिली। न मालूम क्यों मेरी तबियत चाही, जो मैंने यह सब तुमको लिख दिया। हालांकि तुम्हारे खत के जवाब से इसका कोई ताल्लुक नहीं।

Swami Viveka Nandji Maharaj - Dictate - १४.०१.५०

You are totally correct in writing that Lord krishna was bestowed with the Power of destruction, but he was not given the construction power. Atmosphere had grown poisonous during the days of Mahabharata. The responsibility of this was on the kauravs and other people. They were the main Cause, so they were annihilated. More over the power they had gained was mis-utilized and that ought to be finished. Lord Krishna did all that and finished the Power. Intensity of the force of Lord Krishna was Located to the point of India. There was no necessity of going abroad or swimming above it. Now there is the different question.

A thorough overhauling of the bones. You will not find so many people in the world, as you see today. Intensity of force was for India alone and that was the power required at that time. What else do you want to clarify? As to me jumping in toto at the spiritual point is far above than the power of Lord Krishna bestowed at that time. It is far above but it does not mean that the Power Lord Krishna had in body and mind, you have got it. He had force of arms and body.

Lord Krishna will give dictation -

ज़माने की खूबी ने वह चीज़ झलका दी, जो मुझमें मौजूद थी और उस चीज़ को दबा दिया, जिसकी अब ज़रुरत है। मैं उसी चीज़ के मातहत हूँ, जिसका नतीजा मेरा अवतार है।

Can anybody call Lord Krishna, as you call? Is there any one who has such powers? who can call greater Personalities including Lord Krishna? The reply is pregnant in the Short sentences of Lord Krishna given above. Do you want any Thing more for kasturi you have correctly written in your book that the atmosphere at the present is not so poisonous as during the days of mahabharata. There the person residing in India having great powers made the atmosphere above then coarse and bad. Here all the people of the world are contributing some thing black to there Surroundings and they are not so powerful as were here during those day.

अवतार की कल उतनी ही उमेठी जाती है, जितनी ज़रुरत होती है। उससे आगे वह काम नहीं कर सकता। Power कितनी ही हो, इससे मतलब नहीं, मगर काम का दायरा वही रहेगा।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-81
लखीमपुर
16/1/1950
कृपा-पत्र ‘आप’ का पूज्य मास्टर साहब जी द्वारा, जो आप ने भेजा था, मिल गया। पढ़कर प्रसन्नता हुई तथा अफ़सोस हुआ। कृपा करके ‘आप’ क्षमा करियेगा, क्योंकि मुझे यह बिल्कुल मालूम न था कि ‘आप’ की खाट हिल जावे तो आप को तकलीफ हो जाती है। मुझे याद आया कि अक्सर मैं आप की चारपाई के सहारे बैठ जाती थी और इससे ‘आप’ की चारपाई अवश्य हिल जाती होगी।

यह बिल्कुल सत्य है कि ऐसे समय का मुद्दतों आना दुर्लभ है। ऐसी Personality कभी आने की नहीं। बस, मुझे तो केवल बेहद अफ़सोस यह है और रहेगा कि ‘आप’ मुझे दस-बारह वर्ष पहले क्यों न मिले। फिर भी ‘आप’ निश्चय मानिये कि मैं ज़रुर ‘आप’ को अपनी हालत से, जो कुछ भी श्री गुरु कृपा से आप को मिली है, उस हालत से Sitting देने को मजबूर कर देती। और ‘आप’ विश्वास रखिये, कोशिश यह गरीबनी यही कर रही है और बराबर करती रहेगी कि यदि ‘मालिक’ की कृपा ऐसी ही बनी रही तो जल्दी से जल्दी उस हालत से केवल Sitting देने को ही नहीं, बल्कि उसमें स्थिर करने को ‘आप’ को मजबूर कर देगी और मेरी इच्छा तो सदैव यही थी और है कि मेरे परिश्रम की ही खटक, जो और जितना ‘आप’ को माँगे, उतना ही मुझे मिले। हाँ, आप की तो कृपा और आशीर्वाद मेरे निश्चय को सत्य में परिणित कर देंगे। वैसे ‘मालिक’ ने जो अपनी अहेतु की कृपा से ताकत देकर कुछ सेवा का इस बेचारी गरीबनी को सुअवसर दिया, यह इसका अहोभाग्य है। पूज्य श्री बाबूजी! मैंने तो जीवन और जीवनोपरान्त का पल-पल बस, केवल अपने ‘मालिक’ की याद और उसकी सेवा में समर्पित कर दिया है। मेरे बाबूजी! आप विश्वास रखिये, मैं ‘आप’ को कभी यह कहने का अवसर न दूँगी, कि ‘बिटिया! तेरा एक पल खराब गया’ हाँ, ‘मालिक’ की कृपा से यह कोशिश करती रहूँगी कि उस योग्य बन सकूँ। बस मुझे तो यह चीज़ अच्छी लगी। अब तो यदि ‘मालिक’ की कृपा ऐसी ही बनी रही तो ओर-छोर न रखूंगी। वैसे मेरा तो अब अपना कुछ शेष रह ही नहीं गया। अब जैसी ‘मालिक’ की मर्ज़ी हो, वैसे चलावे। इस पत्र में ‘आप’ के अफ़सोस से कुछ उफान आ गया। वह फिर शान्त हो गया। उसी उफान में सब ‘आप’ को लिख दिया है। यदि कुछ गलती हो तो क्षमा कर दीजियेगा। ‘आप’ ने यह जो लिखा है कि -’मैं किसी चीज़ के इन्तज़ार में रहता हूँ। यदि वह बात पैदा हो जावे तो, जब मुझे कोई रोकता है, तब रुक जाता हूँ’। तो यदि अनुचित न हो और ‘आप’ की इच्छा हो तो मुझे भी बता दीजियेगा। वैसे जब यह बात मुझ में पैदा हो जावे, तब बता दीजियेगा।

मेरी आत्मिक-दशा अच्छी चल रही है। उधर कुछ दिनों से Self-Surrender भी बिल्कुल नहीं लगता। हाँ, यह ज़रुर है कि अपने चेहरे के बजाय एक दाढ़ी वाला चेहरा मालूम पड़ता है और सच तो यह है कि कभी कभी यह याद भी भूल जाती है कि मैं लड़की हूँ। अपने को भूल जाती हूँ कि मैं कौन हूँ। एक बात कुछ यह हो गयी है कि सब लोग चाहे किसी सती की प्रशंसा करें या और किसी की, परन्तु मुझे अब किसी के प्रति न जरा भी श्रद्धा होती है, न कुछ आदर, बनावटी में चाहे जो कहूँ। अब हालत बेरस अधिक रहती है। अब की पत्र में ‘जो’ श्री स्वामी जी ने ‘आप’ की प्रशंसा की है, उसके लिये बहुत बहुत धन्यवाद है। कृपया यह पत्र, यदि ‘आप’ की मर्ज़ी हो तो किसी को न दिखलावें। अब किसी हालत प्राप्त करने की इच्छा नहीं है। केवल जो मैंने पहले ‘आप’ से कहा था, वही चाहिये। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन बिहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-82
लखीमपुर
1/2/1950
कल पूज्य ताऊजी आ गये। उनके ऊपर की गई कृपा के लिये कोटि कोटि धन्यवाद है और ‘मालिक’ से प्रार्थना है कि लोग और पूजा तथा अभ्यासों के बजाय इस सरल सीधे और शीघ्र उन्नतिशील मार्ग की ओर आकर्षित हों। मेरी आध्यात्मिक-दशा कोई खास अच्छी नहीं मालूम पड़ती है। और क्षमा करियेगा, अब की उत्सव में भी मुझे अपनी तबियत कुछ अच्छी नहीं मालूम पड़ी थी। हाँ, वहाँ से लौटने पर हल्कापन तथा खालीपन विशेष हो गया है। बस अफ़सोस यह है कि ‘मालिक’ की याद तथा Self Surrender से भी बिल्कुल खाली हूँ। पूज्य श्री बाबूजी, मुझे न मालूम क्या हो गया है कि अब ऐसा मालूम पड़ता है कि मानों मैंने कभी पूजा की ही नहीं और अब हर चीज़ से खाली हूँ, तो कभी-कभी बहुत रोना आता है, परन्तु वह रोना भी बे आँसू का। खैर भाई, अब तो - ‘राज़ी हैं हम उसी में, जिसमें रजा है तेरी’। अब तो जो हालत इस पूजा में प्रारम्भ में थी, वही हालत है। अब न जाने क्यों नींद की तेजी इतनी अधिक हो गई है कि जब आँख मूँद कर पूजा करती हूँ, तभी नींद आ जाती है, बल्कि यदि यह कहा जाय कि हर समय नींद की ही हालत में रहती हूँ तो ठीक होगा। कभी कभी तो दिन में भी यदि खाली बैठी हूँ और कोई ज़ोर से आवाज़ दे तो मैं एकदम चौंक कर हड़बड़ा जाती हूँ। रात की क्या लिखूँ? आज सबेरे देर तक सोती रही तो नींद का यह हाल था कि कौओं की आवाज़ भी सुनाई पड़ती थी और सो इतनी गहरी नींद में रही थी कि जब आँख खुली तो एकदम उठकर जल्दी सब काम करने से शरीर काँपता था। अब तो श्री बाबूजी, सोने में ज़रुर कमाल प्राप्त हो गया है, क्योंकि अब तो दिन भर करीब करीब वैसे भी सोनी और साथ-साथ जगनी हालत रहती है। परन्तु इस आराम के साथ-साथ ही कोई आग भीतर हमेशा सुलगती रहती है। याद के लिये यदि यह कहा जावे कि बिल्कुल रुखी-सूखी आती है, तो शायद ठीक होगा, क्योंकि किसी न किसी Form में मैं याद से खाली न रहने की ही कोशिश करती हूँ। यही हाल जब परम् पूज्य श्री पापा जी ने मुझे प्रणाम किया था, तब मैं प्रेम में भरकर उन महान आत्मा के चरणों में लिपट जाती परन्तु प्रेम और उभार मुझे उस समय भी नहीं आया और विफल होकर मुझे उन्हें रुखा ही बेरस प्रणाम करना पड़ा। खैर ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। आज कल तो कुछ यह हाल भी हो गया है कि सिवाय ‘मालिक’ के अपनी शक्ल देखने पर बड़ी बेचैनी हो जाती है। छोटे भाई-बहनों को प्यार तथा दादी जी से प्रणाम कहियेगा।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-83
शाहजहाँपुर
1/2/1950
मैं लखीमपुर से चलकर यहाँ कुशल पूर्वक आ गया। ईश्वर की अपार दया है कि ‘उसने’ तुमको पार-ब्रह्म मण्डल की सैर पूरी तौर से करवा कर अब उससे आगे बढ़ा दिया। यह सिर्फ ईश्वर की ही कृपा है और ‘उसी’ का काम ! मेरी एक आदत है कि मैं जिस मुकाम या मण्डल से आगे बढ़ाता जाता हूँ, वह कह देता हूँ। इस कहने से किसी को ईश्वर न करे अहंकार हो जाये। और तुममें तो ईश्वर की कृपा से यह बात कभी पैदा न होगी। तुम अपनी हालत पर गौर करती रहा करो और इसलिये मैं बताता चलता हूँ। इससे तुम्हें एक से दूसरे का फ़र्क मालूम होगा और आगे चलकर यह फ़र्क बहुत मुश्किल से समझ में आयेगा। मेरी तबियत आज ही से यह चाह रही है कि मैं इस मण्डल की भी सैर शुरु करा दूँ। इसलिये कि वह पाँच Circles मेरी निगाह के सामने हैं और ग्यारह उसके बाद। मैं चाहता हूँ कि अपनी ज़िन्दगी में ही ऊँची से ऊँची तरक्की दूसरों की अपनी आँखों से देख लूँ। यह सही है कि ईश्वर की कृपा से इन सोलहों Circles का पार करा देना बहुत ज्यादा वक्त का काम नहीं है। अगर ‘वह’ कृपा करे तो एक सेकण्ड भी काफ़ी हो सकता है और इसका तजुर्बा भी है और इसी से हिम्मत भी होती है। प्रकाश की माता जी ने इन सोलहों Circles को पार करके दम तोड़ी थी। उस समय यह ग्यारह Circles निगाह में न थे, मगर खालिस हालत पर पहुँचाने के लिये इन सब को ईश्वर ने पार करा ही दिया। उसे कोटिशः धन्यवाद है।

मेरी हालत बिटिया! लोगों को मालूम नहीं और मुमकिन है कि आगे भी न मालूम हो पावे। गुण में कुछ नहीं रहा – रुहानियत या आध्यात्मिकता भी अगर सही पूछती हो तो अब नहीं हैं यह चीज़ भी बहुत भारी है। अब तुम्हीं बताओ किस बात पर मैं गर्व करूँ? जिसके पास कुछ हो, उसे गर्व भी हो।

Dictate by Swami Viveka Nand ji:-

A very beautiful sentence, who will understand it? This is absolute base.

बिटिया ! आज मैंने अपनी सारी हालत तुमको लिख दी। अगर लोगों को यह मालूम हो जाये, तो मेरे पास कोई फटके भी नहीं। आध्यात्मिक विद्या की तलाश में फिर वह भला ऐसे शख्स के पास जावे जिसमें यह न हो। Dictate by Swami Viveka Nand ji:-
This is too philosophical to tell you the truth, even Vedic Rishis.
That is too much. No body can have Conception of it. Here we are Powerless.
मुमकिन है लोग मेरे पास इसी वजह से न आते हों।
Dictate by Swami Viveka Nand ji:-
‘See this time. Leaving valuable aside and Searching for stones. See the mentality of the general folk. When egoism dies out, this is the result.’
मैंने तुम्हें वैसे ही लिखा दिया। तुम अपने काम में लगी रहो। ईश्वर सब कुछ कर सकता है और सब ‘उसके’ हाथ में है।

इस खत की नकल मास्टर साहब को करके देना, ताकि फाइल में लगी रहे। मैंने इस खत की नकल नहीं रखी, इसलिये वहाँ इसकी ज़रुरत है।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-84
लखीमपुर
10/2/1950
आशा है आप आराम से पहुँच गये होंगे। मेरी आत्मिक-दशा ‘मालिक’ की कृपा से उन्नति पर ही है और सदैव उन्नति पर ही रहेगी। पूजा तो अब बिल्कुल ऐसी लगती है कि अब प्रारम्भ कर रही हूँ। बल्कि अब यह भी नहीं मालूम पड़ता कि पूजा कर भी रही हूँ। अब अधिकतर किसी काम का Weight अपने ऊपर मालूम नहीं पड़ता है। केवल एक ‘मालिक’ की ही कृपा है, जो मेरे साथ सदैव रहेगी। अब किसी हालत में फैलाव और मालूम पड़ता है। एक विनती आप से यह है कि तारीफ़ हर हालत में केवल ‘मालिक’ की ही होनी चाहिये और हो। श्री बाबूजी, अन्धे को क्या चाहिये? केवल दो आँखे और उसमें ऐसी रोशनी जो केवल एक ‘मालिक’ की ही ओर टकटकी बाँध कर देखे और सब संसार उन आँखों के लिये अधेरा हो जावे । ‘मालिक’ की अहेतु की कृपा ने इन अन्धी आँखों में कुछ - कुछ ऐसी ही रोशनी भरनी प्रारम्भ कर दी है। अब कुछ ऐसा हो गया है कि रात दिन सब एक से ही लगते हैं और एक से ही गुजर जाते हैं। कोई अन्तर नहीं लगता। शरीर के आराम और तकलीफ़ का भी कुछ एहसास नहीं होता।

छोटे भाई-बहनों को प्यार तथा दादीजी को प्रणाम कहियेगा। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-85
लखीमपुर
15/2/1950
कृपा-पत्र ‘आप’ का आया। पढ़कर प्रसन्नता हुई। आपने जो यह लिखा है, सो ईश्वर को अपने ‘मालिक’ की अहेतु की कृपा का सही धन्यवाद तो कभी नहीं हो सकेगा। मैं तो उसकी कृपा के आगे अपने को बिल्कुल दीन, गरीबनी पाती हूँ। अपनी उन्नति का कारण, जो मेरी तुच्छ बुद्धि में है, वह केवल यही है कि ‘आप’ ने एक बार मुझे लिखा था कि –’ईश्वर तुम्हें रोज़-ब-रोज़ रुहानी तरक्की देवे’। मैं अपनी हालत पर ग़ौर अवश्य करती हूँ और ‘मालिक’ की कृपा से हालतों का अन्तर भी कुछ न कुछ मालूम ही पड़ता चलता है। यह ज़रुर है कि हालतें सूक्ष्म ज़रुर होती जाती हैं। आत्मिक उन्नति, जो ‘आप’ की ‘मर्ज़ी’ हो सो करिये। मेरी निगाह में तो बस केवल एक ‘मालिक’ ही है। मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि आत्मिक उन्नति होती क्या है। धन्य है ‘आप’ को, कितनी अच्छी हालत कितने सुन्दर Sentence में लिख दी है। आपने लिखा कि ‘सोलहों Circles मेरी निगाह में हैं’ और यहाँ इस गरीबनी की निगाह में तो केवल एक ही Circle है, जिसे ‘मालिक’ कहते हैं। ‘आप’ का एक वाक्य, जो ‘आप’ ने लिखा था कि ‘कदम आगे ही बढ़ना चाहिये।’, वह भी ‘मालिक’ की ही ‘मर्ज़ी’ और उसके ऊपर छोड़ दिया। वह जैसे चाहे, जहाँ चाहे, ले जावे। आप के पत्र की नकल कल पूज्य मास्टर साहब जी को अवश्य दे दूँगी। कुछ आजकल की हालत मुझे भीतर ही भीतर तो मालूम है, परन्तु लिख नहीं पाती। जब ठीक से एहसास होगा, तब फिर लिख दूँगी। अब रात-दिन की हालत में कोई अन्तर नहीं रह गया है। रात-दिन सब एक से ही हैं। मुझे तो अब यह लगता है कि वास्तविक गरीबपन की थोड़ी सी झलक की अब शुरुआत है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-86
लखीमपुर
27/2/1950
मेरा पत्र मिला होगा। मेरी हालत फिर बदली हुई लगती है। ‘मालिक’ की कृपा से सब हालतों का अन्तर कुछ न कुछ मालूम ही पड़ता चल रहा है। अब जो उदासी वाली हालत पहले कभी थोड़ी देर को आ जाती थी, अब वह हर समय रहती है। अब तो हर काम करने से पहले यह ख्याल नहीं रहता है कि यह काम करना है और न काम करने के बाद यह ख्याल ही रहता है कि क्या काम किया। काम करने के बाद फिर उदासी वाली हालत ही रहती है। हर काम उदासी की हालत में ही हो जाते हैं और न जाने क्यों उदासी वाली हालत में फैली हुई लगती हूँ। अब शरीर का तो यह हाल हो गया है कि यदि चाहूँ तो इसकी आराम- तकलीफ़ का एहसास होता है, अन्यथा नहीं।

अब न जाने क्या हो गया है कि अपनापन तो संसार में किसी से लगता ही नहीं। हाँ, केवल एक से अपनापन हो सकता है, परन्तु श्री बाबूजी ! लिखते हुए डर लगता है और फिर भी ‘आप’ तो सदा ही मेरे अवगुणों को क्षमा करते आये हैं, इसलिये लिखे देती हूँ कि सच तो यह है कि अपने पन का एहसास अब शायद ‘मालिक’ के प्रति भी समाप्त सा है, परन्तु फिर भी उसके बिना चैन न है, न होने दूँगी। हाँ, कायदा में कुछ फ़र्क आ गया है। पहले जैसे बारबार यह कहती थी कि सब काम ‘मालिक’ ही कर रहा है और मैं उसकी याद में मस्त हूँ। परन्तु अगर अब यह करूँ तो तुरन्त भारीपन आ जाता है। परम् स्नेही श्री बाबूजी ! सच तो यह है कि मैं उसकी याद में मस्त हूँ, के बजाय ‘वह मेरी याद में मस्त है’ निकलता है। यही मालूम पड़ता है कि ‘वह’ बहुत प्रेम से मेरी याद कर रहा है। यहाँ तक कि अक्सर मुझे यह मालूम पड़ता है कि मेरा मन खिंचा जा रहा है और अब कुछ यह भी हो गया है कि दुनिया में न अपनी, न किसी की कुछ जाति-पाति नहीं लगती है या यों कहिये कि जब जाति-पाति का भेद केवल नहीं के बराबर रह गया है। अब कभी-कभी सोते में भी Working होता मालूम पड़ता है। श्री बाबूजी ! कृपा करके अपनी इस बिटिया को माफ़ कर दीजियेगा। क्योंकि कोई-कोई बात इस पत्र में Etiquette के बाहर लिख गई हूँ, कुछ बदतमीज़ी सी हो गई है। अब आज से हालत कुछ बदली हुई है।

होली की बहुत-बहुत बधाई है। यद्यपि वैसे मुझे नहीं देनी चाहिये थी, परन्तु आप को बधाई देने को मैं स्वतंत्र हूँ। working भले में चल रहा है। एक शिकायत मुझे यह है कि मैं उसकी याद, जितनी चाहिये, उतनी नहीं कर पाती। सब काम उदासी की हालत में होते हैं और बिल्कुल यह नहीं मालूम पड़ता कि कौन कर रहा है। जैसे खुद हाथ उठाने पर एहसास नहीं रहता कि किसका हाथ है। ऐसे ही सब काम का हाल है। कृपया यह बतलाइये, कि मैं याद कैसे रखू? इसलिये किसी न किसी तरह से अब तक याद होती जा रही है, परन्तु बड़ी मुश्किल से। वैसे ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। हमारे पूज्य मास्टर साहब व ताऊ जी की खूब उन्नति हो, ऐसी कृपा रखियेगा क्योंकि उनका, ‘आप’ की बिटिया पर बड़ा एहसान है।

कल जब Pt. N. की Life के Safe वाला working कर रही थी तो in Kanpur शब्द बार-बार आता था। इसका क्या मतलब समझूँ, कृपया लिखियेगा।

अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-87
शाहजहाँपुर
3/2/1950
पत्र तुम्हारा मिला। यह बड़ी अच्छी बात है कि तुम्हारे ध्यान में सिर्फ ‘मालिक’ ही है। अभ्यासी को सिर्फ ‘मालिक’ से ही गरज होना चाहिए। इसी से सब कुछ हो जाता है। मेरी कुछ आदत ऐसी हो गई है कि हर शख्स की तरक्की मैं बताता चलता हूँ। ऐसा शायद किसी सिखाने वाले ने नहीं किया। कहीं-कहीं पर Hint हमारे गुरु महाराज दे जाते थे। अब यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं यह गलती कर रहा हूँ या ठीक है। मैं चीज़ ही क्या हूँ? बड़े-बड़े उच्च महात्माओं ने यह नहीं किया है। मेरे सोचने से यह समझ में आता नहीं। अब मैं यह बात किसी से पूछूँगा, चौबे जी से भी और मास्टर साहब से भी। देखो उनकी राय क्या पड़ती है, और तुम्हारे समझ में अगर आ जाये, तो तुम भी लिखना, ताकि मैं सही बात करने लगूं।

पाँच circles या ग्यारह circles या इसके बाद भी और जो कुछ भी है या जो कुछ भी मेरी समझ में आता जाता है, मैं दूसरों को ज़बानी या तहरीरी (लिखित रुप में) बताता जाता हूँ, ताकि मेरे बाद दूसरे लोगों को इससे आगे मालूम करने का मौका मिले और मुझे जो मालूम हो जाये वह अपने सीने में छिपाकर तो न जाऊँ और भाई, एक बात यह भी है कि लोग जितना सीखते जाते हैं, उसको कहीं काफ़ी न समझ बैठे। अभी तक तो भाई, जहाँ तक मेरी निगाह पहुँचती है, यही हुआ है कि जरा सी हालत कहीं पैदा हो गई और कुछ शान्ति निखर आई, वह अपने आप को पूर्ण समझने लगे और बिल्कुल ऐसा ही हुआ है- ‘जिसको मिल गई गाँठ हल्दी की, वह यह समझा कि हूँ मैं पंसारी’। मेरा तजुरबा यह है इस वक्त कि मैंने यही जाना कि कुछ नहीं जाना। और मुझको उसका पूर्ण छोर न मिला। पूर्ण होना किसको कहते हैं? कुछ बातें मैं मास्टर साहब के खत में लिख रहा हूँ, वह अपने जानने के लिये उनसे पढ़वा कर सुन लेना। इसलिये कि तुम भी ट्रेनिंग का काम कर रही हो और करोगी।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-88
शाहजहाँपुर
5/2/1950
पत्र तुम्हारा मिला, जो २७ फरवरी का लिखा हुआ था। उदासीनता की हालत रहना अच्छा है। हर काम करने से पहले और छोड़ने के बाद ख्याल न रहने के माने यह है कि आगामी संस्कार बनना बन्द हो चुके हैं। तुमने लिखा है कि उदासी की हालत में फैलाव मालूम होता है, यह तुम्हारा Self Expansion है, जो तुम्हारी दृष्टि से महसूस होता है। यह हालत अभी और बढ़ेगी। अभी लय अवस्था पूर्ण रुप में पैदा नहीं हुई है। इसके पैदा होने का इन्तज़ार है - उसके Symptoms मैं पहले से बताना नहीं चाहता, इसलिये कि तुम उसका, हालत पैदा होने से पहले ख्याल न बाँध दो। यह हालत जब well developed हो जाती है, और लय अवस्था अपने पूर्ण रुप में आकर अपनी अवस्था को भी उसमें लय कर देती है, उस वक्त भोग की शक्ल बदल जाती है। इसमें देर नहीं मालूम हो रही है। ईश्वर जल्द देगा। उसका नतीजा भी तुम्हें बता दूँ, मगर उससे अफसोस नहीं होना चाहिये। जो बात मैं कहना चाहता हूँ, वह तुम्हारे लिये है। इसलिये कि जिस तर्ज और तरीके से तुम इस हालत पर आ रही हो, उसका नतीजा यह होता दिखाई देता है कि पिछले संस्कार खत्म होने के लिये ‘मुझे’ भी भोगना पड़ेगा, अर्थात् कुछ तुम भोगोगी, कुछ मैं। अब यह डर है कि मैं अपने संस्कार भी भोगूं और तुम्हारे भी भोगूं, गोया Double Working हो गया, ऐसा नहीं है। मेरे संस्कार, मेरी एवज़ में, मेरे गुरु महराज ने भोगे हैं। भक्ति के लिहाज़ से इसका शुक्रिया कहाँ तक अदा किया जावे । मगर Law of Nature के लिहाज़ से ‘वह’ ऐसा करने से मजबूर थे। इसी तरह मैं भी मजबूर हूँगा। अब अपनी कैफ़ियत सुनो कि जब तुम अपने संस्कार से खाली हो गई तो, जिन्दगी कायम रखने के लिये दूसरों के संस्कार तुमको भोगने पड़ेगें। जब तक कि कोई खास Personality अपनी ऐसी हालत पैदा नहीं कर लेती कि उसके सिखाने वाले को भोगना न पड़े। सिखाने वाला बिना ताल्लुक लोगों के संस्कार भोगता है। इस जमाने में गुरु बनना बहुत आसान है जहाँ किसी के कीर्तन की लय अच्छी मालूम हुई, दूसरे ने उसको गुरु कर लिया और वह भी खुश हो गये कि – वाह ! चेला मिल गया। किसी ने अपनी इज्ज़त बढ़ाने के लिये, ईश्वर का ज्ञान सिखाने के बहाने चेला बनाना शुरु कर दिया और किसी ने अपना गोल बढ़ाने के लिये ईश्वर के नाम पर भीख माँगना शुरु कर दिया। क्या रफ्तार ज़माने की हो रही है। गुरुआई इतनी मुश्किल चीज़ है, कि ईश्वर ही जानता है। और भाई, मैं इसलिये गुरु नहीं बन सकता कि उस मुसीबत को कौन भोगेगा, जबकि बिरादराना तौर पर तालीम देने में इन दिक्कतों का सामना हो रहा है। मेरा ख्याल यह है कि गुरु बन कर अगर चेला को भवसागर पार न उतार सका तो कम से कम उसकी तरक्की का रास्ता न खोल दिया, तो ऐसे गुरु के लिये इतनी बड़ी सजा मिलती है कि मुमकिन है कि वह एक हज़ार जन्म तक कम से कम अन्धेरे में पड़ा रहे। यह बात स्वामियों को सुनाने वाली है, जो ईश्वर के जीवों को इतना धोखा दे रहे हैं। जिसका नतीजा यह हो रहा है कि वह (यानी चेले) सैकड़ों वर्ष ईश्वर की बादशाहत के किनारे नहीं पहुँचते। मैं सबसे ज्यादा दोष उन गुरुओं को देता हूँ, जिन्होंने चेलों का परलोक बिगाड़ दिया।

मैं इस इबारत का मतलब नहीं समझ सका कि – ‘अपनेपन का एहसास अब शायद ‘मालिक’ के प्रति भी खत्म सा है’। इसको अगले पत्र में Explain कर देना। तुमने जो यह लिखा है कि – ‘वह मेरी याद में मस्त रहता है’। इसके बारे में कबीर साहब ने लिखा है कि – ‘मेरा राम मुझे भजे जब, तब पाऊँ विश्राम’। तुम्हें मालूम है कि जाति-पाति किसकी नहीं होती? - सन्यासी की। वह वर्ण-व्यवस्था से परे हो जाते हैं और यह एक हालत है, जिसको वैराग्य का Essence कहना चाहिये यह चीज़ जब परिपक्व हो जावे, तब सन्यास लेने का इन्सान अधिकारी होता हैं। मगर आजकल बिना मेहनत किये हुए आसानी से सन्यासी हो जाते हैं। कहो - इस ज़माने में सन्यास कितना आसान हो गया है। यह क्यों? बाबा जी को अपने चेलों की तादाद बढ़ानी थी।

तुमने जो मास्टर साहब और चौबे जी की सिफारिश की है, तो हमें खेद है कि तुमने हमारी सिफ़ारिश क्यों नहीं की। तुम कहोगी कि आपकी सिफ़ारिश मैं किस से करती। इसका जवाब यह है कि जिससे तुमने इन दोनों की सिफ़ारिश की। कितनी अचम्भे की बात है कि जिस शख्स में रुहानियत न रही हो, उसकी उन्नति की सिफारिश न की जावे और जिनमें रुहानियत हो, उनकी सिफारिश की जावे। पण्डित रामेश्वर प्रसाद का यह कहना है कि जिनकी तुम सिफारिश करती हो, उसके लिये तुम खुद क्यों नहीं करती। तुमने जो अपनी हालत पिछले पत्र में लिखी थी, वह बहुत अच्छी थी। पण्डित जी उसके लिये तुम्हें बधाई देते हैं। तुमने यह जो शिकायत की है कि – ‘मैं उसकी याद, जितनी चाहिये, उतनी नहीं कर पाती’। मुझे भी यह शिकायत हमेशा रही है। जब मुझे अपनी शिकायत दूर करने का कोई नुस्खा न मिला तो तुम्हें क्या बताऊँ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-89
लखीमपुर
11/2/1950
कृपा-पत्र ‘आप’ का आया। पढ़ कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की अपने ऊपर अहेतु की कृपा का कहाँ तक धन्यवाद दिया जा सकता है। बस, 'उसकी', ऐसी ही कृपा इस गरीबनी के ऊपर बनी रहे। यही ‘उससे’ प्रार्थना है। ‘आप’ ने लिखा है कि – ‘मैं हर शख्स की तरक्की बताता चलता हूँ। समझ में नहीं आता कि मैं यह गलती कर रहा हूँ’। परन्तु शायद किसी Dictate में जो पूज्य समर्थ महात्मा श्री लाला जी का ‘आप’ के लिये था कि – ‘तुमसे कभी गलती हो ही नहीं सकती’। मेरी समझ में इससे भी ‘मालिक’ की हम सब सीखने वालों पर कोई न कोई अहेतु की कृपा छिपी होगी और फिर समर्थ महात्मा श्री लाला जी के समान तो न कोई हस्ती हुई है, न होने की आशा है। जब ‘वे’ आप में पूर्ण रुप से Merge हैं तथा आप उनमें फिर गलती का सवाल ही कहाँ रहा? खैर, ‘आप’ का ऐसी बातें कहना भी हम सबके लिये बड़ा शिक्षाप्रद है। हाँ, मेरी यह प्रार्थना है कि यदि हो सके तो, जो कड़े संस्कार हों, वे मुझे दीजियेगा। वैसे जो ‘आप’ की इच्छा। और ‘आप’ ने जो यह सब लिखा है कि – ‘मैं इसलिये गुरु नही बना’। यह सब या इस पत्र में सब सत्संगियों के लिये बड़ा उच्च उपदेश हैं। पूज्य श्री बाबूजी ! आपने दीन गरीबनी पर अब तक कितनी कृपा की है, और कितनी और करेंगे यह शब्दों के परे है। मैने जो यह लिखा था कि – ‘अपनेपन का एहसास शायद ‘मालिक’ के प्रति भी खत्म सा है’। उसके केवल यही माने है, कि बाबूजी ! मैं तो अब यह भी भूल गई हूँ कि ‘मालिक’ कौन है, कैसा है? परन्तु यह ज़रुर है कि चाहे उसे भूल गई हूँ, चाहे जो हो, परन्तु देखती हूँ कि चैन तो एक क्षण भी उसके बिना पड़ता नहीं। जब से आप को वह पत्र लिखा था, तब से उदासी वाली हालत में कुछ और हो गया है। अब तो एक तरह से मुर्दा वाली हालत रहती है और ऐसा लगता है कि अब यह मुर्दा वाली हालत मुझमें बसी जा रही है। और अब कुछ यह हो गया है कि याद ज़ो Natural हो, सो हो, परन्तु कभी कभी बार-बार कोशिश करने से तबियत भारी हो जाती है। अब मुर्दावाली हालत तो सोते में भी मालूम पड़ती है, यहाँ तक कि कभी-कभी तो लेटने और चलने फिरने में भी कोई अन्तर नहीं मालूम पड़ता। न जाने क्या बात है कि अब तक का मेरा जीवन एक स्वप्न की तरह बीत गया, बल्कि अब तो करीब-करीब भूल ही गई हूँ और अब न जाने क्या है, मुझे नहीं मालूम। अब तो जैसे मालिक के लिये यह भूल गई हूँ कि कौन है, कैसा है। यही हाल खुद अपने लिये भी हो गया है। यहाँ तक कि जब आफ़ताबे मारफ़त या हिन्दी वाली कविता गाती हूँ तो प्रेम वगैरह तो दूर रहा, यहाँ तक ध्यान नहीं रहता कि किसकी तारीफ़ गा रही हूँ। उस ‘मालिक’ का ही ध्यान नहीं रहता। खैर, कोशिश कुछ न कुछ ज़ारी है। फिर ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। अब न जाने क्यों जब मैं पूजा करती हूँ तो, यदि कोई चीज़ भीतर गिर पड़े या कोई जोरों से चिल्ला देता है, तो ऐसा लगता है कि दिल पर बड़ी ज़ोर का धक्का लगा है। पूज्य श्री बाबूजी ! आप तो खुद इतने कमज़ोर हैं। ‘आप’ के पेट में सदा तकलीफ़ रहती है और फिर ‘आप’ मेरे संस्कार भी भोगेंगे। इसके लिये आप को हार्दिक धन्यवाद के अलावा और क्या कह सकती हूँ। क्योंकि ‘आप’ ने Law of Nature कह कर मुझे लाचार कर दिया है। अब यह देखती हूँ कि सब काम जैसी ज़रुरत होती है, वैसा कुछ कुदरती अपने आप हो जाते हैं। अब मैं कभी-कभी नाराज भी हो जाती हूँ, डाँट भी देती हूँ, परन्तु मुझे कुछ खास मालूम नहीं पड़ता, न कुछ अफसोस ही लगता है। आज हालत फिर कुछ बदली हुई लगती है। अब मुर्दा वाली हालत में फैली हुई मालूम पड़ती हूँ। पूज्य महात्मा श्री पापा के चरणों में मेरा सादर प्रणाम कहते हुए बधाई के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद दे दीजियेगा और कह दीजियेगा कि भाई, बधाई की अधिकारिणी मैं नहीं, बल्कि ‘आप’ (श्री बाबूजी) हैं।

‘आप’ कहते हैं, लय-अवस्था पूर्ण रुप में आ जावे। परन्तु यहाँ तो यह हाल हो गया है कि भाई, अब तो मुझ में लय-अवस्था मालूम भी नहीं होती। यहाँ तक कि बार-बार अभ्यास करने पर भी नहीं आती । क्या करूँ, लाचारी है। ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-90
लखीमपुर
13/2/1950
आशा है आप सकुशल और आराम से पहुँच गये होंगे। मैं यह देखती हूँ कि जब आप आते हैं, और चले जाते हैं, तो भीतर की आग में कुछ दिन को थोड़ी तेजी आ जाती है। और अबकी से तो जब से आप गये हैं, तो पहले जो पाँच-दस मिनट पूजा में तबियत लग जाती थी, वह भी खतम हो गई। कुछ तो एक घंटा, जो सबेरे की पूजा के लिये अब तक मैंने रखा है, बस बेचैनी से इधर-उधर, किसी न किसी तरह ‘मालिक’ की याद की कोशिश में कट जाता है परन्तु सिवाय लढ़ी घसीटने के और कुछ नहीं मिलता। खैर, ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। आजकल तो बस यह है कि यदि दिन भर दूसरों को पूजा कराती रहूँ, तो ऐसी अच्छी और हल्की तबियत रहती है कि कहना नहीं। जैसा मैंने पहले लिखा कि अपने अन्दर हर समय एक ईश्वरीय धारा बहती हुई मालूम पड़ती है, परन्तु अब तो उस धारा में फैली हुई मालूम पड़ती हूँ। जैसा मैंने लिखा था कि मुझे यह भ्रम हो जाता है कि मेरी कोई दशा है भी, कि नहीं, का केवल ख्याल ही है, परन्तु फिर मैं Suppose कर लेती थी कि मेरी हालत है ज़रुर और अब तो इसकी भी याद नहीं रहती है। अब तो यह हालत है कि हर समय खालिस तबियत बड़ी अच्छी मालूम पड़ती है। पूजा में भी यदि ध्यान-त्यान में पड़ी रहती हूँ, जो अब तक करती आई हूँ, तो तकलीफ़ होती है। यह खालिस तबियत ही अब दिन भर या हर समय की हालत अपने आप ही रहती है। भाई, सच तो यह है कि अब नाते रिश्तेदारी का डोरा भी कटा हुआ मालूम पड़ता है, जैसा कि आपने कहा था, उस दिन यहाँ। अब तो यह खालिस हालत कभी-कभी तो अपने में से फैलती हुई लगती है।

अब तो भाई, जो कैफ़ियत है, वह ऐसी है कि अधिकतर भीतर ही भीतर तो उस हालत का कुछ अनुभव मुझे है, परन्तु न जाने क्यों उस हालत को कहना चाहूँ या लिखना चाहूँ तो नहीं पता, कैसे लिखूं। Self-Surrender का भी यही हाल है कि अब कोशिश करने से भारी लगता है, बल्कि यों कहिये कि उसका ध्यान तक अच्छा नहीं लगता। अब बताइये, इसका क्या इलाज़ हो? बस अब तो यह पूजा है, या ख्याल रहता है कि यह बिल्कुल खालिस चीज़ बैठी है, और इसी में अच्छा लगता है। और अब तो अपने अन्दर हर समय एक बहाव सा लगता है। जो उदासी की हालत दिन भर रहती थी, वह अब कुछ सूरत बदले हुए है। हालत वही है, परन्तु उसमें कुछ और हो गया है, शायद कुछ गाढ़ापन है। आप ने एक बार लिखा था कि मन में जागृति पैदा हो गई है और तब इसका मुझे भी एहसास था परन्तु अब तो मैं कहती हूँ कि मन अब तो पहले से भी गाढ़ी निद्रा में सो गया है और हर समय सोता रहता है, क्योंकि अब मैं देखती हूँ कि इसमें न तो तेजी रह गई है, न जोश है। अजीब मरा सा हो गया है। हाँ, यह बात ज़रुर है कि हर काम करने में भी यह मरा ही रहता है। अब तो यह हो गया है कि हर समय ‘जैसी’ ‘मालिक’ की मर्ज़ी यह निकलता रहता है।

श्री बाबूजी मुझे न तो कोई हालत चाहिये, न कुछ। बस केवल ‘मालिक’ से ही काम है और वही चाहिये। और विश्वास रखिये, देर सबेर भले ही हो, 'वह मुझे मिलेगा अवश्य ।

दादी जी से प्रणाम तथा छोटे भाई-बहनों को प्यार कहियेगा।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-91
लखीमपुर
18/2/1950
कल पूज्य मास्टर साहब जी से मालूम हुआ कि आपका तार आ गया है कि आप नहीं आ रहे हैं। इसलिये आज पत्र लिख रही हूँ। आशा है, वहाँ सब सकुशल होंगे। मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। मेरी ‘आत्मिक-दशा’ ‘मालिक’ की कृपा से अच्छी चल रही है। मेरी हालत से तो समझ लीजिये कि मेरे लिये केवल रात ही रात है, या दिन ही दिन है। क्योंकि मैं अब नहीं कह सकती कि मैं क्या करती रहती हूँ। यदि अपनी हालत स्वप्न की तरह कहूँ तो बिल्कुल ठीक यह भी नहीं है। यदि उचाट कहूँ तो यह भी ठीक नहीं है। न जाने कैसी हालत है। मैं तो यह तक नहीं जानती कि मैंने दिन भर में कोई काम अच्छा या बुरा, गलत या ठीक, कुछ किया है या नहीं। हाँ, यह अवश्य कह सकती हूँ, मेरे लिये अब अच्छा या बुरा, गलत या ठीक, कुछ नहीं है। जो काम Natural ही होते हैं, वे होते हैं। अब न मुझमें पूजा है न पाठ, न लय-अवस्था है न Self Surrender ही है, न ‘मालिक’ की याद ही है, न कुछ। अब मैं यह कह सकती हूँ कि भाई मेरे श्री बाबूजी मुझमें अब कोई गुण नहीं है और मुझे तो यहाँ तक नहीं मालूम कि मैं कौन हूँ, क्या हूँ। न अब उदासी वाली हालत मालूम होती है और जैसे पहले अधिकतर बड़ा हल्कापन व खालीपन मालूम पड़ता था। अब तो मुझे या अपने में कुछ नहीं मालूम पड़ता है। पूज्य श्री बाबूजी। मैं तो हाथ जोड़कर आपसे यही कहती हूँ, कि अब आप की इस बिल्कुल गरीब बिटिया में कोई गुण या कोई बात न रही। ‘मालिक’ की याद जिससे आप खुश होते हैं, उसका यह हाल हो गया है, कि जब ध्यान करती हूँ, या दिन भर जब कोशिश करती हूँ तो यही निकलता है, कि ‘मालिक’ खुद अपनी याद में मस्त है। अब आप बताइये कि ‘मालिक’ के सिवाय उसकी मर्ज़ी के अब खुश करने के लिये मेरे पास अब क्या है? हाँ, केवल कोशिश अब भी जहाँ तक वश है, जारी है। परसों सबेरे से अपने अन्दर बड़ी हल्की ईश्वरीय धारा बहती हुई मालूम पड़ती है। उसकी कैफ़ियत भी बड़ी हल्की, कुछ धीमी-धीमी शान्तियुक्त सी लगती है, परन्तु उसकी कैफ़ियत मुश्किल से समझ में आने वाली लगती है। यह धारा हर समय बहती रहती है। केवल अब एक कोशिश है, वह भी ‘मालिक’ की मर्ज़ी पर है। इसके साथ-साथ में उसकी या जी भर कर न कर पाने की शिकायत भी ज़ारी है। Working का भी हाल यह है कि ‘मालिक’ की जो मर्ज़ी होती है, जैसी मर्ज़ी होती है, सो होता है। मैं कुछ नहीं जानती हूँ।

छोटे भाई - बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-92
लखीमपुर
25/2/1950
मेरे दो पत्र पहुँचेगा होंगे। आज आप के पत्र से मालूम हुआ कि वहाँ के झगड़े के कारण ‘आप’ यहाँ नहीं आ सके। खैर, जैसी ‘मालिक’ की मर्ज़ी। अपनी आत्मिक-दशा के बारे में क्या लिखूँ। मुझे अब यह नहीं मालूम कि मेरी दशा उन्नति पर है। हाँ, मेरा बस यह दृढ़ विश्वास तो हमेशा से था और है कि आप के शुभाशीर्वादानुसार मेरी उन्नति रोज-ब-रोज बढ़ती ही जावेगी। याद का यह हाल हो गया है कि पहले जैसे यह मालूम पड़ता था कि ‘मालिक’ खुद अपनी याद में मस्त है, अब यह भी नहीं रह गया है। अब तो केवल मन बहलाने को कभी कुछ ख्याल कर लेती हूँ और अब जब पूजा खत्म करके उठती हूँ तो ऐसा लगता है कि बड़ी गहरी नींद से जगी हूँ। यद्यपि ख्यालात पूजा में आते ही रहते हैं। यह हालत तो कुछ ऐसी ही हो गई कि मैं जब चाहूँ तब ऐसी हालत हो जाती है। यहाँ तक कि यदि कोई मुझ से बात करे या गाना गावे तो यदि मैं चाहूँ तो सुन लू और यदि न चाहूँ तो पास बैठे हुए भी नहीं सुन सकती हूँ। यही दिन भर की याद का हाल है। न जाने क्यों यदि एक तरह से ख्याल करूँ तो ऐसा लगता है कि मैंने दिन भर याद नहीं की, परन्तु कभी-कभी एक तरह से शायद मैं यह कह सकूँ कि मुझे याद थी, परन्तु मैं यह भी कहने की हकदार नहीं रही। अब तो भाई, जब जैसी ‘उसकी’ मर्ज़ी होती है, सो हो जाता है। कौन करता है, और कैसे होता है, यह ‘वह’ जाने। सच तो यह है श्री बाबूजी ! कि यह ‘मैं’ शब्द निकलता किसके लिये है, मुझे यह भी नहीं मालूम। अब तो यदि ज़बरदस्ती अपना ध्यान रख कर मैं कहूँ तो भी कहते समय उस ‘मैं’ शब्द का ध्यान नहीं रहता कि ‘मैं’ है कौन? आजकल तो बड़ी लापरवाही की हालत है। यद्यपि किसी काम-वाम में तो बिल्कुल लापरवाही और आलस नहीं है, परन्तु फिर भी न जाने कैसी हालत है। एक शिकायत बढ़ती ही जाती है कि मुझे ‘मालिक’ की याद नहीं आती। मैं यह देखती हूँ कि मेरा जोश व तेजी Working में या वैसे, जैसे पहले यह जोश रहता था कि बस ‘मालिक’ तक पहुँचना है। केवल ‘मालिक’ चाहिये। अब वह सारा जोश और तेजी खत्म है। अब तो एक लाचार लाश की तरह जैसी ‘मालिक’ की मर्ज़ी हो।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-93
शाहजहाँपुर
27/2/1950
तुम्हारा खत आया था, कई हफ्ते हुए, हाल मालूम हुआ। मैंने जो जुमले जवाब देने लायक थे, उनमें सुर्ख निशान भी बनाये थे और वह खत मैंने कहीं रख दिया है, अब मिलता नहीं है। इसका मुझे अफसोस है और यहाँ communal disturbance कि वजह से कोई लिखने वाला भी नहीं मिला जवाब में देर होती रही और बहुत दिन गुज़रने की वजह से मुझे याद भी नहीं रहा कि क्या लिखा था। अभी अजीजम नारायण ने तुम्हारे दो पत्र और दिये। उनको पढ़कर तुम्हारी हालत का अन्दाजा लगा लिया। हालत तो ईश्वर की कृपा से अच्छी है। मगर बिटिया, सच अगर पूछती हो तो अभी उर्द में सफ़ेदी आई है, इसका कहीं ओर-छोर नहीं। मैं समझता हूँ कि जब से दुनिया पैदा हुई, उस वक्त से अगर कोई शख्स ब्रह्म - विद्या में बढ़ता चले और दुनिया खत्म होने से कुछ पहले तक उसका छोर नहीं मिलेगा। मुझे ताज्जुब है कि लोग अपने आपको पूर्ण समझ बैठते हैं। उर्द की सफेदी से मेरा मतलब यह है कि अब उसकी अपार दया से असलियत का छींटा लगा है और यही छींटा develop करेगा। यह हालत उदासीनता के कमाल की है। उदासीनता के कमाल पर जो कैफ़ियत शुरु होती है, वह अब है। इसके इन्तहा के पहुँचने का इन्तज़ार है। वह भी ईश्वर ने चाहा, तो जल्दी पैदा होगी। पूजा करना तुम्हारे लिये लाज़मी नहीं, चाहो करो, चाहो न करो। मैं तो यही चाहता हूँ कि मेरी जिन्दगी में मेरे सामने कुछ लोग बन जाते (मगर ज्यादा तादाद इस तरफ़ हिम्मत नहीं करती) तो इस बहार को मैं स्वयं देख लेता। मगर यह सब ईश्वर के हाथ में है। जो ‘वह’ चाहेगा, वही होगा। अपना इसमें बस नहीं है। मैं चाहता हूँ कि अपनी जिन्दगी में जितनी तरक्की मैं दे सकता हूँ, दे जाऊँ मगर मैंने तुमको इसका मोहताज नहीं रखा। हालांकि जो मेरी जगह पर हो (कौन होगा, कहा नहीं जा सकता) उसकी इज़्ज़त सब पर वाजिब होगी। तुम्हारी मोहताज़ी यों खत्म है कि मैं होऊँ या न होऊँ तुम्हारी Stages directly तय होती रहेगी, क्योंकि मैंने अपना पीछा छुड़ाकर ईश्वर से बराह रास्त तुम्हारा सम्बन्ध कर दिया है। तुम्हारे काम में उसको मंजूर है तो कोई रुकावट नहीं। हमारे पूज्य चौबेजी को गायबाना तवज़्ज़ोह दिया करो, मगर खास तौर पर उनकी सफाई का लिहाज़ रखो। वह जरा सी देर में अपने आप को खराब कर लेते हैं और मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ती है।

तुमने जो लिखा है कि हर समय एक ईश्वरीय धारा बहती रहती है। यह बिल्कुल ठीक है और यह इस बात का सबूत है कि तुम्हारा Direct सम्बन्ध ईश्वर से हो गया है।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-94
लखीमपुर
30/3/1950
कृपा-पत्र ‘आप’ का आया। समाचार मालूम हुए। ‘आप’ ने जो यह लिखा है कि ‘उसकी’ अपार दया से असलियत का एक छींटा लगा है। तो भाई, मेरा भी यही दॄढ़ विश्वास है कि जिस मालिक ने इतनी कृपा की है, वही अब इस छींटे को भी Develop करता चलेगा, क्योंकि वह खूब अच्छी तरह जानता है कि मेरी वास्तविक कलई क्या है। कृपा करके क्षमा करियेगा। आप ने यह खूब लिखा कि – ‘मैंने अपना पीछा छुड़ा लिया है’। हाँ ‘आप’ जो कहिये, परन्तु मेरा तो केवल यही कहना है कि-

बाँह छुड़ाये जात हो, निबल जानि के मोहि। हृदय ते तब जाहुगे, मर्द बदौं तब तोय।।
परन्तु नहीं, मुझे कहना कुछ नहीं है। मुझे तो जो भी करना है, सो करना है। अपने ‘मालिक’ का धन्यवाद कहाँ तक दूँ। उसकी तो मुझ पर सदैव अहेतु की ही कृपा रही है और बराबर रहेगी। ‘आप’ ने जो यह लिखा है कि ‘हिम्मत ऐसी ही रखना’, सो मैंने तो हिम्मत भी उसी ‘महाहिम्मतवर’ को सौंप दी है, या खुद उसी ने छीन ली है, जिसने मुझ सी महा अधम को भी कृपा करके अपनी ओर खींचने का साहस किया है। आजकल मेरी आत्मिक-दशा तो निराली ही चल रही है। मैं शायद यह तो लिख चुकी हूँ कि मेरी तेजी Working करते समय व वैसे भी खत्म ही है। यहाँ तक कि मैं बार-बार कोशिश करके वह जोश व तेजी लाना चाहती हूँ, तो भी नहीं आती, केवल ख्याल से ही सब होता है। एक सार हालत ही बराबर रहती है। बस, ऐसी हालत है, जो न बुरी कही जा सकती है। हाँ, अच्छी यों कही जा सकती है कि ‘मालिक’ की कृपा ही है। न उतार चढ़ाव मालूम पड़ता है, न जोश, न दीनता। यदि यह कहूँ कि यह हालत कोई हालत नहीं है, तो भी उचित न होगा, न जाने क्या हालत है। पूज्य श्री बाबूजी ! सच तो यह है कि ऐसी हालत है कि कभी कभी तो मैं बहुत डर तक जाती हूँ कि अब यह मेरी दशा है कि केवल ख्याल। मुझे तो अब अपनी कोई हालत ही नहीं लगती। हाँ, यह कहा जा सकता है कि जिसने कभी कोई पूजा न की हो, बिल्कुल सादा हो, बस शायद अब वैसी ही मैं हूँ और अब कुछ यह हो गया है कि सब दुनिया के लोग मेरे लिये ऐसे हो गये हैं, जैसे एक फ़कीर या एक छोटे बालक के लिये, जो बस अपने में मस्त हो। दुनिया के लोगों का शायद उसे एहसास ही नहीं होता या यह समझ लीजिये कि सब तरफ से एक बेपरवाह हालत है। इधर कुछ दिनों से अपने आप ही यह निकलता है कि ‘मालिक’ पूर्ण रुप से मुझमें लय है और कुछ यह हो गया है कि बेशर्म होने लगी हूँ। जब कभी डॉट-वाट पड़े तो यदि चाहूँ तो उसका असर लू और न चाहूँ तो वैसे ही बैठी रहूँ। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-95
लखीमपुर
18/4/1950
मेरा एक पत्र मिला होगा। यहाँ सब कुशल-पूर्वक हैं, आशा है आप भी सकुशल होंगे। अब जो अपनी आत्मिक-दशा ईश्वर की कृपा से समझ में आई है, सो लिख रही हूँ। मैंने शायद अगले पत्र में लिखा था कि अब नाते रिश्तेदारी की डोरी बिल्कुल कटी हुई मालूम पड़ती है, परन्तु मैं देखती हूँ कि केवल नाते रिश्तेदारी की ही नहीं, बल्कि दुनियाँ के सारे लोगों की तरफ से सम्बन्ध की डोरी बिल्कुल कटी हुई लगती है। अब तो मैं अपने को दुनिया से बिल्कुल Seperate पाती हूँ ऐसी कि किसी वस्तु या और लोगों से लेश- मात्र भी लगाव प्रतीत नहीं होता है, और किसी हद तक मैं अब यह भी कह सकती हूँ कि मेरे लिये सोने और मिट्टी का मूल्य समान प्रतीत होता है। भाई, सच तो यह है कि अब मनुष्य और जानवरों में भी एक प्रकार से समानता ही लगती है। मैं यह देखती हूँ कि मुझ में छुआ-छूत का विचार बिल्कुल रह ही नहीं गया है। मैं अपने को दुनियां से Separate भी कह सकती हूँ और बिल्कुल एक भी कह सकती हूँ क्योंकि न किसी के प्रति जरा सी भी नफ़रत है, न लगाव। हाँ, बल्कि ऊपर के व्यवहार में सब के प्रति प्रेम का भाव और बढ़ गया है। यद्यपि नियम एक शुद्ध या अशुद्धताई के जैसे अब तक होते आये हैं, वैसे ही जबरदस्ती स्वयं ही होते रहते हैं। भला बताइये श्री बाबूज़ी, मुझे हो क्या गया है? मैं तो अब अपने वश की ही नहीं रह गई हूँ। कुछ यह भी देखती हूँ कि सब भाव, जैसे भाई-बहन, माता-पिता के सब ऊपरी रह गये हैं। अब तो ऐसा लगता है कि बिल्कुल ‘मालिक’ की ही इच्छा पर रह रही हूँ। हर समय, हर काम के लिये, जो ‘मालिक’ की मर्ज़ी, जो उसकी इच्छा, बस यही होता रहता है। सब काम कौन करता है? कैसे होते हैं? इसका तो सवाल ही नहीं उठता। अब जो ‘वह’ चाहे, सो ही ठीक है। मुझे तो आप या उसकी इच्छा या ‘उसका’ नौकर समझ लीजिये। और श्री बाबूजी, क्षमा करियेगा, लिखते हुए डर लगता है कि ‘मालिक’ और ‘आप’ के बीच की पृथकता भी लोप हुई समझिये। अब वह हालत जो ईश्वरीय धारा अपने में भीतर हर समय बहती मालूम पड़ती थी, अब तो केवल वही हालत हर समय भीतर-बाहर रहती है। या यों कहिये कि अब उसी हालत में लय हो गई हूँ। उस हालत की अगर आप कैफ़ियत पूछें तो मैं उसे कहने या लिखने में अपने को असमर्थ पाऊँगी।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-96
लखीमपुर
26/4/1950
कृपा-पत्र ‘आप’ का, जो पूज्य मास्टर साहब जी के लिये आया था, उसमें ‘आप’ ने जो मेरे लिये लिखा था, कि हालत में वहम् मालूम होता है, तो पहले तो मैं बहुत घबड़ा गई कि यह कोई रुकावट तो नहीं है, परन्तु फिर पूज्य मास्टर साहब जी ने बतला दिया, तब कुछ चैन पड़ा। मेरे श्री बाबूजी ! मुझे तो बस यह विश्वास है कि ‘आप’ की कृपा से कोई रुकावट आ ही नहीं सकती। ‘आप’ से प्रार्थना है कि, ‘आप’ कृपा करके इस गरीबनी को देखते रहा करिये, क्योंकि आजकल, मुझे अपनी हालत न जाने क्यों कुछ रुकी हुई मालूम पड़ती है, इसलिये परेशानी अधिक है। और अपनी हालत आजकल बुरी भी बहुत लगती है। कभी लगता है कि, श्री बाबूजी मुझसे बहुत दूर हो गये, कभी यह सोचती हूँ कि कहीं ‘आप’ मुझसे किसी बात पर नाराज तो नहीं हो गये। कोशिश ‘मालिक’ की कृपा से जितनी कर सकती हूँ, सो थोड़ी बहुत ज़ारी है। बस, श्री बाबूजी! यह समझ लिजिये कि मैं ‘उससे’ एक क्षण भी अलग की कल्पना मात्र से घबड़ा जाती हूँ। फिर जब यह हालत होती है कि ‘उससे’ दूर हूँ, तो दिन-भर तबियत भीतर ही भीतर रोती रहती है और याद और कोशिश भी मन भर के नहीं कर पाती हूँ, जितनी कि चाहती हूँ। क्योंकि ६-७ दिन से कुछ थोड़ी सी तबियत भी खराब है। खैर, वह तो शायद कल-परसों तक ठीक हो जावे। पूज्य मास्टर साहब जी से कल Sitting ली थी, तो उन्होंने बताया है कि न जाने कहाँ से काले धुएँ की तरह तमाम मैल आ गया है। पहले जैसे मुझे हर बात में, हर काम में बस ‘मालिक’ की मर्ज़ी ही मालूम पड़ती थी, अब फिर कुछ नहीं मालूम पड़ता। परन्तु भाई, अब तो न जाने क्या हो गया है, कहीं कोई गलती तो नहीं हो गई। परन्तु ‘वह’ तो हमेशा से इस अपने दर की भिखारिन को अब तक क्षमा करके कृपा ही करता आया है और अब भी यही आशा है। हाल यह है कि एकदम यह तो बिल्कुल ही भूल जाती हूँ कि मेरी कुछ तबियत खराब भी है। बाकायदा पहले की तरह सब काम-वाम करने लगती हूँ। खैर, इसकी तो कोई बात नहीं। मुझे तो हर हालत में अपने ‘मालिक’ से काम है, यद्यपि मुझ में प्रेम-वेम कुछ नहीं है। आजकल मेरी तबियत बस परेशान है, क्योंकि अपनी हालत रुकी हुई मालूम पड़ती है और तबियत बिल्कुल चुस्त और उचाट ही रहती है। पूज्य श्री बाबूज़ी, मैं रुकूँगी नहीं, चाहे जो हो जावे। मैं तो बस चलने को आई हूँ, और इस मार्ग में चलती ही चलूँगी। Working में भी जरा सा देख लीजियेगा, क्योंकि ज़रा होश अपने में बहुत कम पाती हूँ। कृपया ‘आप’ पूज्य मास्टर साहब जी को ही लिख दीजियेगा कि मुझे क्या हो गया है। बस, यह जरुर लिख दीजियेगा कि मैं रुकी तो नहीं हूँ। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-97
लखीमपुर
29/4/1950
मेरा एक पत्र आप को मिला होगा। यहाँ सब कुशल पूर्वक है, वहाँ भी सब सकुशल होंगे। इधर करीब आठ-दस दिन से हालत बहुत खराब लगती है। तबियत हर समय बिल्कुल उचाट ही रहती है। किसी समय भी खुश नहीं होती। न किसी काम में जी लगता है, न पूजा व Working वगैरह ही में लगता है। परन्तु Working होता वैसा और उतना ही है, जैसे हमेशा से होता है। आजकल की हालत से तो जब पूजा नहीं करती थी, तभी अच्छी थी। न किसी से बात करने को जी चाहता है, न किसी को पूजा तक कराने की तबियत होती है, बस एकान्त में पूजा-ऊजा छोड़कर चुपचाप बिल्कुल बेख्याल लाचार पड़े रहने की ही तबियत रहती है। दिमाग से कुछ भी सोचने तक की ही तबियत नहीं चलती है। बस अभ्यास के बिना चैन नहीं पड़ता और करूँ कैसे? यह समझ में नहीं आता। भाई, समझ में तो तब कुछ आवे, जब कुछ सोचूँ। ऐसी ही नीरस हालत रही तो क्या करूँगी? क्योंकि ‘मालिक’ तक तो मुझे पहुँचाना ही है। क्या करूँ श्री बाबूजी! कैसे करूँ? मुझे तो एक मात्र ‘मालिक’ ही चाहिये। मुझे आप जोश पहले की ही तरह कर दीजिये, यद्यपि मैं उसकी याद के बगैर एक क्षण भी रह नहीं सकती, परन्तु जोश मुझे अच्छा लगता है। केसर आप को प्रणाम कहती है और कहती है कि मेरे दिल में कुछ खुलाव लगता - जल्दी आगे बढ़ने की परेशानी बहुत है। अम्मा आप को आशीर्वाद कहती | इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-98
शाहजहाँपुर
1/5/1950
पत्र मिला, पढ़ कर खुशी हुई और यह अचम्भा भी हुआ कि तुम्हें यह बेकार का ख्याल (Baseless) कैसे हुआ, कि मैं तुमसे नाराज़ हूँ। इस ख्याल को कभी मत बाँधो। इसमें हानि है। मैं अपनी सुनाता हूँ। यदि मैं ख्याल बाँधू कि गुरु महाराज मुझसे नाराज़ हैं, तो हमारे लाला जी की आँखें हमारे ऊपर फौरन बदल जायेंगी। जिस degree तक मैं उनकी नाराज़गी का ख्याल बाँधूगा, उतनी degree तक ‘वह’ मुझ से नाराज हो जावेंगें। अगर मान लो कि मुझसे कोई गलती हो जावे और मैं उस गलती को दिल से महसूस करूँ तो तुरन्त लालाजी उसकी सज़ा देने को तैयार हो जावें (और गलती हर एक से हो ही सकती है) ईश्वर कृपा करें। इसीलिये अगर मैं कहीं पर गलती कर भी जाऊँ, तो भी यह ख्याल नहीं होता कि मैं गलती कर रहा हूँ। जब कोई हालत पैदा होती हैं तो पहले उसका वहम् होता है, इसके बाद वह असली सूरत में दरसने लगती है। इस वहम् में यदि कोई सुनी सुनाई बात उस दशा में पड़ जाती है, तो उसका भी असली रूप मालूम होने लगता है। या पड़ी हुई बात यदि कहीं सामने आ जाती है, तो वह भी अपनी ही हालत मालूम होती है। मैंने मास्टर साहब को यह लिखा था कि इस हालत में जो तुमने लिखा है, कुछ वहम् भी शामिल है, अर्थात् इसमें असलियत तो है, मगर कुछ वहम् का असर भी है। इसमें तुमको ग्लानि नहीं होनी चाहिये। यह तो होता ही रहता है।

तुम रुकी हुई नहीं हो, चल रही हो। वहाँ पर जो ठहराव है, उसको रुका होना समझ लिया है। यह ज़रुर होता रहता है कि चाल कहीं पर मध्यम होती रहती है और कहीं पर तेज। तुम्हारी चाल मध्यम ज़रुर पड़ गई है। जब अभ्यासी एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना चाहता है, उस वक्त यह मध्यमपना ज़रुर पड़ जाता है। इसके यह माने नहीं समझ लेना चाहिये कि मैं रुक गया। और यह भी होता है कि जब किसी चक्र या मुकाम पर सूरत फैलती है, तो भी मध्यमपन महसूस होने लगता है। इसका पहिचानना जरा मुश्किल है। तुम्हारे बारे में मैंने कह दिया है कि तुम्हारा सम्बन्ध ईश्वर से Direct हो गया है। तुम्हारी तरक्की नहीं रुकी है। कोई तुम्हें बढ़ाये या न बढ़ाये, ईश्वर तुम्हें खुद आध्यात्मिक उन्नति देता रहेगा। और पूजा-पाठ तो अब तुमसे होने से रही। ‘मालिक’ को ‘मालिक’ समझना और ‘उसके’ हुक्म को Carry Out करना, यही तुम्हारे लिये पूजा है। Working तुम अच्छा कर रही हो, किये जाओ। तुम्हारी दशा, जो वर्तमान है, वह उससे कहीं तेज़ Working कर रही हो, जो उससे पहले थी। पूजा तो मैं भी नहीं करता हूँ और दूसरों को बताता हूँ। लोग जो सुने, वह यह कहेंगे कि दूसरों को तो उपदेश देते हैं और अपने को फ़ज़ीहत। भाई, सच तो यह है कि पूजा होती ही नहीं। इस हालत पर मैं कह सकता हूँ कि - ‘बिना भक्ति तारो, तब तारिबो तुम्हारो है’। और लोग तो शुरु से ही यह पढ़ कर कहने लगते हैं। मगर ऐसे लोगों की बातें या पद ईश्वर सुनता भी नहीं है। मैं समझता हूँ, मास्टर साहब के एहसास ने ‘उनको’ धोखा दिया। उनके एहसास ने उनको धोखा नहीं दिया, बल्कि जिसको उन्होंने काले धुएँ की तरह मैल समझा है, वह असलियत का रंग है, और ईश्वर से किसी हद तक सम्बन्ध हो जाने की दलील है। मास्टर साहब का एहसास ज़रुर काबिले तारीफ़ है और मैं इस बारीकबीनी पर खुश हुआ। मगर बेचारों को यह खबर न थी कि यह चीज़ क्या है। किसी वक्त ईश्वर को मंजूर है, मैं अनुभव करा के उनको असल कालिख और इस किस्म की तमीज़ करा दूँगा। यही रंग आखिर तक चला जाता है। मगर उसमें भी अनगिनत हालतें हैं। यह चीज़ बहुत अच्छी है और यह भी एक Direct सम्बन्ध होने की वज़ह है। मेरी जब यह दशा पैदा हुई थी तो मैंने अपने गुरु महाराज को इतिला दी थी, और ‘वह’ अवश्य बहुत खुश हुए होंगे।

‘Live long my daughter. Be complete in the run of your life; the condition is hard by under standable. It is He (Ram Chandra) who has tasted the nectar of real life and He is imparting you all. Be gracious on the tumbling block who are rolling on the dirty street.’...says Swami Vivekanand Ji

यह तो बड़ी अच्छी हालत है। इससे चित्त में ग्लानि पैदा नहीं होनी चाहिये। ईश्वर मुबारक करे और आगे और बढ़ाता ज़ाये। ...These are the words from Lalaji.

अंग्रेज़ी के इबारत के मतलब यदि समझ में न आवे तो मास्टर साहब से समझ लेना। चौबे जी भी इसको समझा देंगे। मैंने विमला के खत का जवाब लिख दिया है। एक बात मैं यह चाहता हूँ कि तुम अपनी जीवनी थोड़ी-थोड़ी लिखती चलो। तुम्हारे माता और पिता तुम्हारे बचपन की बहुत सी बातें बता देगें और जब से अभ्यास शुरु किया है और खत तुमने मुझे भेजे हैं और मैंने उनका उत्तर दिया है, वह सब उसमें आ जाना चाहिये। तुम्हारे खत सब मेरे पास मौजूद हैं जब लिखो, तब मंगा लेना। मेरे खतों के जवाब तुम्हारे पास मौजूद होगें।

शकुन्तला बेचारी दिल के मर्ज में मुब्तला है, ज्यादा अभ्यास नहीं कर सकती। मुझे उस पर बड़ा तरस आता है। तुम्हारे ताऊ जी और माता जी ने उसकी बहुत सिफारिश की है। और उसने तुम्हें भी लिखा है कि उसकी याद मुझे दिला दिया करो। मुझे याद आई या न आई, यह और सवाल है। यदि तुम्हारी राय हो और माता जी हुक्म दें और ताऊ जी भी यह बात चाहें, तो उसको Higher Region में पहुँचा दिया जावे, मगर उसका पिण्ड-देश और ब्रह्माण्ड-देश खुद साफ़ करो। मगर इसके दिल पर अपनी Will का झटका न देना और इसको जल्दी से जल्दी साफ़ करो। मगर यह ज़रूर है कि शकुन्तला को Higher Region में जल्द पहुँचा देने से कुछ मजा नहीं आवेगा और वह शिकायत करेगी कि मैंने कुछ तरक्की नहीं की। अब यह तुम सब मिलकर सोच लो। जैसी तुम्हारी सबकी राय हो, वैसा लिखना। पत्रों के जवाब, मैं इसलिये नहीं दे पाता कि जब से नारायण गये हैं, कोई लिखने वाला किस्मत से मिलता है। तुम्हारे हरि भाई साहब को अपने ही से फुर्सत नहीं। तुम्हीं उनको साफ़ करो कि आगे चल निकलें। अब तुम अपना हाल लिखना।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-99
लखीमपुर
4/5/1950
कृपा-पत्र ‘आप’ का मिला। पढ़ कर सारी बेचैनी तथा ‘आप’ के नाराज़ होने का बेकारी ख्याल बिल्कुल दूर हो गया। ‘मालिक’ की मुझ सी गंवार लड़की पर इतनी कृपा है, इसका बहुत-बहुत धन्यवाद है। बस ‘आप’ का कृपा पूर्ण हाथ सदैव मेरे सिर पर इसी प्रकार रहे, बल्कि जितना और हो सकता है, उतनी कृपा रहे, जिससे मैं बराबर सीधी अपने ‘मालिक’ की ही ओर को चलती चलूँ। क्षमा करियेगा, पहले तो मैं जितनी कोशिश कर सकती थी, सो करती रही, परन्तु जब किसी प्रकार रफ्तार तेज़ न हुई, तब मैं बहुत घबड़ा गई और तभी मैंने एकाध बार यह सोचा कि कहीं आप नाराज़ तो नहीं है, परन्तु ‘आप’ सच मानिये, चाहें ‘आप’ पूज्य मास्टर साहब जी से पूछ लीजिये कि यह ख़याल कभी मैं रोक न पाई और कहा मैंने हमेशा यही कि ऐसा कदापि हो नहीं सकता और न जाने क्यों जब भी कभी मुझे यह ख्याल आया, तभी तुरन्त किसी ने यह कह कर रोक दिया कि ‘नहीं’ यह ख्याल कभी मत आने दो। इससे नुकसान हो सकता है और एक अब कुछ यह जो हो गया है कि सही-गलत, अच्छा-बुरा, हो वही रहा है, जो और जैसा ‘मालिक’ चाहता है। इसलिये भी इसके खिलाफ ख्याल नहीं आ पाता है और कुछ यह भी ‘मालिक’ की कृपा हो गई है कि हालत के बारे में भी अधिकतर मन में आ जाता है। जैसी अभी, जब यह समझ में आया कि हालत रुकी हुई है, तो तुरंत्त यह भी आता था कि नहीं, यह एक Stage से दूसरी पर जाने में बीच का ठहराव है। परन्तु मैं तो कुछ ऐसी बेचैन सी थी कि मुझे जब तक ‘आप’ का कृपा-पत्र न आ गया, चैन ही न पड़ा। आप की कृपा के धन्यवाद देने को तो मैंने स्वयं अपने को ही न रखने की ही कोशिश की है और करूँगी, क्योंकि मेरी समझ का दायरा तो एक ही का होकर समाप्त हो गया है। क्योंकि जब से ‘आप’ ने दूसरे पत्र में मुझे लिखा था, कि - एक ही साधे, सब सधै, तब से दूसरे को अब तक अपनी ओर देखने का समय ही नहीं दिया। यह सब केवल और केवल मेरे ‘मालिक’ आप ही की कृपा है। Working ठीक चल रहा है। ‘मालिक’ की ही कृपा है और, 'उसी की करामात है। परम् पूज्य समर्थ श्री लालाजी साहब तथा परम् पूज्य श्री स्वामी जी का आशीर्वाद सदैव इस भिखारिन के सिर-माथे है।

आजकल हालत फिर कुछ बदली हुई है, परन्तु अभी कुछ ठीक समझ में नहीं है। अजीब बेपरवाह तबियत रहती है। हाँ, एक बात ज़रूर है कि अब मैं अपने को मालिक से बिल्कुल चिपटा हुआ अनुभव करती हूँ और अब यह लगता है कि मेरा मन बहुत ही छोटा सा हो गया है। तबियत हर समय बेख्याल सी रहती है। यह ज़रूर है कि उसे जबरदस्ती ईश्वर के ख्याल में या याद में लगाया जाता है। यद्यपि इस ज़बरदस्ती का नतीज़ा सिर्फ भारीपन के और अपने कुछ मन को बहलाने के शायद ही कुछ और होता हो। अब तो यह हाल है कि जितनी ‘उसकी’ याद की कोशिश करती हूँ, उतना ही दिल पर भारीपन या एक बोझ सा प्रतीत होता है। कभी-कभी तो दिन भर में परेशान होकर ‘मालिक’ की याद को भूलना पड़ता है, तब जाकर वह बोझ उतरता है। परन्तु मैं यह भी नहीं कह सकती हूँ कि मुझे याद भूलती है। पूज्य श्री बाबू जी ! आप मुझे कोई नुस्खा ‘उसकी’ हर समय की याद का न बतायेगें? बता दीजिये श्री बाबू जी! तब तो आप जैसा चाहते हैं, वैसा बनने में समर्थ हो सकूँगी। पूज्य मास्टर साहब जी ने परसों मुझे Sitting में देखा था, तो उन्होंने यह हाल बताया है कि वह काले धुएँ की तरह चीज़ पहले मेरे चारों ओर थी, परन्तु अब एक हो गई है। न जाने क्यों, मेरी समझ में तो कुछ मतलब वगैरह आता नहीं। यह भी कोई ‘मालिक’ की कृपा होगी। पहले जो हालत मैंने लिखी थी, वे अब बहुत हल्की मालूम होती है। मुझे महसूस भी कम होती है, क्योंकि मेरी हालत तो बड़ी बेपरवाह है।

जीवनी लिखने के लिये आप पहले भी कह चुके हैं। परन्तु मैं क्या करूँ? न तो मेरी तबियत कुछ लिखने पढ़ने को होती है, न मुझे कुछ मालूम ही है। अब हर चीज़ में अपने ‘मालिक’ को ही देखने की तबियत होती है, और होती क्या है, ‘मालिक’ की कृपा से स्वयं ही यह होने लगा है। सब दुनिया कुल एक ही दिखती है। सारी मिट्टी मिलकर एक हो गई है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-100
लखीमपुर
12/5/1950
मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। अब अपनी आध्यात्मिक-दशा के बारे में क्या लिखूँ। बीमारी में कुछ समझ में नहीं आई और वैसे भी जैसी थी, वैसी ही मालूम पड़ती है। चाल भी अभी मध्यम ही लगती है। अब हर समय अपने को एक मुदें की भाँति पाती हूँ। तबियत हर समय न जाने कहाँ उड़ी रहती है, इसलिए तबियत को सावधान रखने की कोशिश करनी पड़ती है। एक तरह से तबियत अब Innocent रहती है। श्री बाबू जी, क्षमा करियेगा, जिज्जी के बारे में जो आपने पूछा कि उन्हें Higher Region में पहुँचा दूँ, यह ‘आप’ की उनके ऊपर तथा हम सब पर बड़ी मेहरबानी है, जिसका कि धन्यवाद हमारी वाणी नहीं दे सकती। उनके विषय में तो हम सब का यही कहना है कि जो ‘आप’ की मर्ज़ी हो, सो करिये।

अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं, तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-101
लखीमपुर
6/6/1950
कल दोपहर को ताऊजी, अम्मा वगैरह सब आ गये। ‘आप’ की तबियत बहुत खराब हो गई थी, यह सुनकर तबियत परेशान हो गई। आप ने पहले लिखा था कि – “कुछ तुम भोगोगी, कुछ मैं”, परन्तु देखती यह हूँ कि मैंने तो कुछ भोगा नहीं, सब खुद ही भोग रहे हैं। परन्तु ‘आप’ की मर्ज़ी के खिलाफ़ ज़बान खोलने की इच्छा भी नहीं होती। एक पत्र भेज चुकी हूँ। कृपया अपनी तबियत का हाल जल्दी-जल्दी लिखवाइयेगा।

अब तो भाई, आत्मिक-दशा का यह हाल है कि चौबीसों घंटे, सोती-जागती सी हालत रहती है। अब हल्कापन और कुछ अजीब शान्ति की लहर तो हर समय की हालत हो गई है। और कोई खास हाल तो मालूम नहीं पड़ता है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-102
मेरठ
16/6/1950
आशा है, आप अब बिल्कुल अच्छे हो गये होंगे। आप के कृपा-पत्र आये हुए बहुत दिन हो गये हैं। कुछ आत्मिक-दशा लिख रही हूँ। अब इन बहुत दिनों से तो न जाने कितनी बुरी हालत है, जैसे सब अनपूजा करने वाले लोग हैं, वैसे ही मैं भी हूँ। मुझमें न तो जो पहले दया-माया थी, वह भी नहीं मालूम पड़ती। पहले जैसे किसी गरीब अपाहिज को देखती थी तो बड़ी दया लगती थी, परन्तु अब तो जैसे कुछ जुंआ ही नहीं रेंगता। अब ‘आप’ कृपा करके बतलाइये कि मेरी क्या हालत है, अच्छी है या बुरी। दया ही क्या हर चीज़ से बिल्कुल खाली रहती हूँ। सच तो यह है कि अब की हालत न जाने क्या है। एक तो मुझे न जाने क्या हो गया है कि ‘मालिक’ की शकल इतनी कोशिश करती हूँ तो भी अब किसी तरह याद ही नहीं रहती। लखीमपुर में तो फोटो देखकर दो-चार मिनट कुछ शकल याद रह जाती थी, परन्तु अब तो पूजा या Sitting की तरह शकल याद रखने की भी लाचारी हो गई है। अब तो हालत में कोई खास अन्तर ही नहीं मालूम पड़ता। पहले जैसे सब हालतें बिल्कुल खुलती चली आती थीं, परन्तु अब तो जाने क्या हो गया है। अब तो भाई यह हाल हो गया है कि चाहे दिन में कितना सोऊँ या रात में सोऊँ या जागूं, परन्तु अब देखती हूँ कि Working या ‘मालिक’ की याद में कोई कमी या अन्तर नहीं मालूम पड़ता, क्योंकि रात-दिन मेरे लिये तो बराबर है। बस, कृपा आपकी सदैव अपार बनी रहे, यही सदा प्रार्थना है। हाँ, हालत में कभी-कभी इतना फ़र्क तो ज़रूर आता है कि हालत पहले की तरह दो-चार मिनट को ही खुल सी जाती है। इसलिये कभी-कभी तबियत खुश हो जाती है, परन्तु केवल उन्नीस-बीस का फ़र्क हो पाता है। कभी-कभी मुझे यह सोच अवश्य हो जाती है कि यह सब पूजा या Working कर रही हूँ या यह सब मज़ाक हो रहा है। पूजा या Working करने की, बस ऐसा लगता है कि दिमाग को एक लत सी रह गई है और वह भी ऐसी लत जिसका कभी-कभी कुछ थोड़ा सा एहसास मात्र हो पाता है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-103
शाहजहाँपुर
25/6/1950
तुम्हारे कई खत आये। जवाब इसलिये नहीं दे पाता हूँ कि कोई लिखने वाला नहीं मिलता तुम्हारी बीमारी सुनकर कुछ फिक्र ज़रूर हो जाती है, मगर इसमें अपना वश नहीं। ईश्वर की यह तारीफ़ है कि ‘जो है, सो है’। हमें भी उसी दशा की ओर जाना चाहिये, जो उसकी तारीफ है। अब जितना जा सके, यह उसकी देन है। हमारी अवस्था साम्य होनी चाहिये। तराजू के दोनों पलड़े बराबर रहने चाहिये। जब तौलने का समय आ जाये तो, नीचे-ऊँचे थोड़ी देर के लिये हो जाये, तथा फिर बराबर आ जावे। दया और रहम वहीं पर होना चाहिये, जहाँ पर इसकी ज़रूरत है। मैं राजा हरिश्चन्द्र से माफ़कत नहीं करता कि सब कुछ देकर भंगी के हाथ में अपने आप को बेच डाला। यह धर्म नहीं था, बल्कि एक प्रकार की Suicide थी और यह चीज़ जो कि उन्होंने की, असल में मनुष्यता के विरुद्ध थी। मेरी समझ से सिवाय नामवरी और तकलीफ उठाने के इससे कोई लाभ नहीं निकला। क्या हुआ कि तराजू का पलड़ा एक झुका ही रहा। मशीन की कल अगर ठीक Adjust नहीं है, तो वह मशीन ठीक हालत में नहीं कही जा सकती। अगर यह खराबी कहीं मशीन में हो जाये तो फिर इंजीनियर की जरूरत पड़ती है। असल उसूल को जानने वाले हमेशा कम रहे हैं, गो अच्छे ज़माने में कुछ तादाद ज्यादा रही। ईश्वर का मिलना तो भाई यही है कि हम में भी वही झलक पैदा हो जाये और बातें भी आ जायें, जो ‘उसमें’ हैं। देखने में भी जो सिन्धु और बिन्दु का फ़र्क क्यों न मालूम हो अब अपने खत के जवाब में यह समझ लो कि जिन बातों की ज़रूरत है, वह धीरे-धीरे आ रही हैं। पूजा तुम हर वक्त करती रहती हो, तुम्हें चाहे इसका पता हो या न हो। आगे यह चीज़ भी आ सकती है कि जाहिरा पूजा होती ही नहीं, बल्कि कोशिश करने से जी घबड़ाने लगता है और फिर यह ज़रूरी ही नहीं कि तमाम उम्र कोई पूजा करता ही रहे। जिस ध्येय के लिये पूजा की जाती है, उसकी प्राप्ति के बाद उसकी आवश्यकता नहीं रहती, मगर इस बात को instructor तय करता है। अपने आप तय नहीं कर लेना चाहिये। स्वामी विवेकानन्द जी ने भी लिखा है कि ईश्वर की पूजा दो तरह के इन्सान नहीं करते। एक तो inhuman brute और दूसरे जो अपने से काफ़ी उठ चुके हैं।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-104
लखीमपुर
29/6/1950
कृपा-पत्र ‘आप’ का, जो ‘आप’ ने नारायण दद्दा के हाथ भेजा था, सो आज मिला, पढ़कर प्रसन्नता हुई। यह भी मालूम हुआ कि अभी ‘आप’ की तबियत बिल्कुल अच्छी नहीं हुई है। कृपया अब ‘आप’ जल्दी अच्छे हो जाइये। प्रार्थना के अतिरिक्त मुझे कुछ और यदि ‘आप’ के अच्छे होने के लिये बताया जाये, तो दिन-रात इसे अपना ही समझ कर कुछ और उपाय भी बतलाइये। यदि आप आज्ञा दें तो कुछ दिन आप की Will Power का प्रयोग भी करूँ, यद्यपि दो दिन कुछ थोड़ा सा प्रयोग ‘आप’ के लिये, बिना ‘आप’ की आज्ञा लिये, किया था, इसलिये क्षमा माँगती हूँ। मेरी तबियत से ‘आप’ निश्चिन्त रहिये। अब ठीक है। कुछ ऐसा हो गया है कि बीमारी वगै़रह सब में ‘मालिक’ की मर्ज़ी में ही मस्ती रहती है।

मेरी आत्मिक-दशा तो अब एक विरक्त सी हो गई है। अब देखती हूँ कि तबियत किसी तरह अधिक नहीं झुकने पाती है। मेरठ में, शादी की खुशी में, मैं यह नहीं जानती कि मैं वहाँ की चहल-पहल में जरा भी लिप्त हो सकी थी या नहीं, क्योंकि कोशिश तो ‘मालिक’ की कृपा से सदैव यही रही है कि निगाह ‘उसके’ अलावा कहीं जरा सी भी मुड़ न सके। अब तो भाई, यह हाल है कि कोई बात, कोई गुण, अवगुण या गलती तक अपनी नहीं मालूम पड़ती है। न जाने क्या हाल है कि जब हम सब मेरठ से चले तो सब लोग रोने लगे। मेरे भी कुछ आँसू बहे। परन्तु मेरी अब यह समझ में नहीं आता और न तब ही आ पाया कि क्या हुआ। यदि कहूँ कि सब से अलग होने का दुख हुआ, सो मैं यह भी नहीं कह सकती हूँ क्योंकि मुझे तो अब जैसे दुनिया के सब लोग हैं, वैसे ही अपने घर वाले लोग लगते हैं। सच पूछिये तो किसी से लेश-मात्र भी लगाव प्रतीत नहीं होता। बस, उस समय ऐसा हाल लगता था जैसे एक छोटा बालक सब को रोता देख कर बिना कारण रोने लगे। पहले जैसे मुझे जब मैं किसी पर गुस्सा हो जाती थी, तो बाद में बड़ा अफ़सोस होता था, परन्तु किसी बात का अफ़सोस तो एक तरफ़ रहा, उस तरफ ध्यान तक नहीं जाता कि कुछ हुआ भी है। अब जब मैं कहीं चली जाती हूँ या कोई मेरे सामने से चला जावे तो मुझे कभी उसका ख्याल तक नहीं आता। अब तो ‘मुहँ देखे की प्रीति सब से रह गई है’। जब से यहाँ आई हूँ तो हर एक की शक्ल याद करनी पड़ती थी। मेरे पूज्य श्री बाबूजी! मैं ‘मालिक’ का धन्यवाद किस मुँह से और कहाँ तक अदा करूँ। फिर अब हालत कुछ ऐसी हो गई है कि कौन अदा करे और किसे अदा की जावे । जैसी उसकी मर्ज़ी हो, सो करे। मैं यह कहती जो ज़रूर हूँ कि मुझमें अब कोई बात नहीं रही, परन्तु समय पर होता ज़रूरत के अनुसार सब कुछ है। परन्तु फिर किसी बात का कुछ असर नहीं रहता है। श्री बाबूजी ! यह हाल न जाने क्या है कि यदि मैं कहीं जाती हूँ तो रास्ते में कोई भी यदि दाढ़ी वाला मनुष्य दिख जाता है, तो तबियत एकदम कुछ क्षण को परेशान या बेचैन सी हो जाती है। पूजा की जो ‘आप’ ने लिखी, सो सच तो यह है कि पूजा से अब जी चुरा रहता है, क्योंकि तबियत खुश होने के बजाय परेशान हो जाती है। कुछ थोड़ी सी देर ही बैठने पर जब आँख खोलती हूँ तो बड़े जोर का झटका सा लगता है और जैसे पहले, सो कर उठने पर लगता था कि किसी दूसरे देश से आई हूँ, सोई तब लगता है। इस लिये अब पूजा से जी घबराता है। मुझे पूजा वगैरह कुछ नहीं चाहिये। मुझे तो चाहिये केवल और केवल एकमात्र ‘मालिक’। कोई हालत हो या न हो, मुझे तो किसी से कुछ काम नहीं और पूजा ही क्या बाबूजी ! बैठकर अब Working तक करने से जी घबराता है। न जाने भाई, मेरा क्या हाल है कि धीरे धीरे ‘मालिक’ को भी भूलती ही जा रही हूँ। शकल वगैरह तो हरगिज़ याद ही नहीं रहती, इसलिये कभी-कभी ‘आप’ के दर्शनों की इच्छा बढ़ जाती है। ईश्वर की तारीफ़ जो आप ने लिखी है कि ‘जो है, सो है’। सो ‘आप’ की ही कृपा से कुछ-कुछ अब यही बार-बार निकलता है, परन्तु ‘जो है, सो है’ की हालत मेरी समझ में नहीं आ पाती है। खैर, ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। ‘आप’ ने लिखा है कि हमें उसी हालत की तरफ़ जाना चाहिये, सो ‘आप’ की जैसी मर्ज़ी हो, वैसे ले चलिये। मुझे जो आज्ञा होगी, उसके लिये मैं तैयार हूँ। और ‘आप’ ने जो यह लिखा है कि – “तराजू के दोनों पलड़े बराबर रहने चाहिये। जब तौलने का वक्त आ जाये तो नीचे-ऊँचे थोड़ी देर के लिये हो जायें और फिर बराबर हो जायें”, वास्तव में बहुत अच्छा है। सच तो यह है कि ‘आप’ का पत्र कुछ अधिक समझ में नहीं आया। अब धीरे-धीरे पूजा छोड़ रही हूँ, मुझे नहीं चाहिये। बस, हाल एक विरक्त की तरह ही अब हर समय रहता है। अब मुझे ठीक याद नहीं कि कल शायद पूजा में या वैसे ही सरदार पटेल को अकस्मात पड़े हुए देखा। अब इसका क्या मतलब समझूं। उस समय मुझे किसी का ज़रा सा भी ख्याल तक नहीं था। अब आप जानें। पूजा करने से अब मेरा जी बहुत घबड़ाता है अब नहीं होती, परन्तु तबियत अब भी हर समय तड़पती रहती है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-105
शाहजहाँपुर
7/7/1950
पत्र तुम्हारा मिला। तुम्हारे सब पत्र मेरे पास रखे हैं। मैं चाहता हूँ कि हर पत्र का उत्तर विस्तार पूर्वक लिखूँ। मगर मजबूरी यह है कि मुझे कोई लिखने वाला नहीं मिलता है और अपने आप जब लिखना चाहता हूँ तो विचार आना बन्द हो जाते हैं। पत्रों के उत्तर में इसलिये अब देर भी हो जाती है। नारायण से मुझको बड़ी मदद मिलती थी और हरि को फुर्सत कम रहती है। उसकी जब मर्ज़ी होगी तो यह भी हो जावेगा। इस पत्र का उत्तर अगर विस्तारपूर्वक दिया जावे तो कम से कम बीस-पच्चीस पन्ने हो जावेगें, इसलिये संक्षेप में लिख रहा हूँ।

मेरी तबियत अब अच्छी है। दो-तीन दिन तुमने अपनी Will Power Exercise की। मुझे इस कदर फ़ायदा हुआ कि कहा नहीं जा सकता। अपने आप को देखता था, मगर कोई बात समझ में नहीं आती थी। इतनी बात समझ में आती थी कि यह प्रार्थना का असर है। working हरगिज़ नहीं छोड़नी चाहिये। तुम्हारे लिये working करना और दूसरों को सिखाना, अब यही पूजा है। मैंने तुमको ब्रह्म मण्डल की mastery इसलिये दी है कि working तुम्हारे सुपुर्द हो और उसको ठीक तरीके से करो। यह जहाँ तक मेरा ख्याल पहुँचता है पहली ही Example है। मुमकिन है यह काम शायद ही किसी स्त्री जाति के सुपुर्द हुआ हो। तुम्हारी वर्तमान हालत renunciation in pure form (वैराग्य) है और लय-अवस्था भी अच्छी चल रही है। हमारी हालत यही होनी चाहिये, मगर इसकी नकल करने की ज़रूरत नहीं। तुममें ज़रूर उस हालत की शुरुआत ईश्वर की कृपा से, हो चुकी है, इसलिये लिखता हूँ। जब हम किसी को रंज में देखें, तो हमारी तबियत भी रंजीदा हो जानी चाहिये और जब हम किसी को खुशी में देखें तो हमारी तबियत भी खुश हो जानी चाहिये। मगर जब हम वहाँ से हटें तो न हमें रंज हो और न ही खुशी। मेरठ में आँसू निकल आने का भी यही कारण था।

माता जी को प्रणाम तथा बच्चों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-106
लखीमपुर
10/7/1950
कृपा-पत्र जो आपने पूज्य मास्टर साहब जी के हाथों भेजा सो मिल गया। आपकी तबियत ठीक है, पढ़कर सब को प्रसन्नता हुई। आप को दो दिन की will power exercises से बहुत लाभ हुआ। इसके लिये ‘मालिक’ का बहुत-बहुत धन्यवाद है। मैंने शायद working छोड़ने के लिये न लिखा हो, क्योंकि वह असम्भव है। अब तो ‘मालिक’ की कृपा से जैसी पूजा वह चाहता है, वह ही होती है। आपने जो यह रंज और खुशी के बारे में लिखा है, सो बिल्कुल ठीक है। ऐसा ही होना भी चाहिये। आप, कोई लिखने वाला न होने के कारण मेरे पत्र का उत्तर विस्तार पूर्वक नहीं दे पाते, तो न सही। मुझे तो केवल ‘मालिक’ से काम है, बस कृपा सदैव बनी रहे, यही विनती है।

पूज्य मास्टर साहब जी से मालूम हुआ कि परम् पूज्य महात्मा श्री पापा को बहुत तेज़ बुखार आ गया, सो कृपया उनसे प्रणाम कहियेगा और उनकी तबियत का हाल जल्दी लिखवाने की कृपा कीजियेगा। मेरी आत्मिक-दशा तो अब यह है कि पहले ‘मालिक’ की याद ही भूलती थी, परन्तु अब देखती हूँ कि खुद ‘मालिक’ को ही भूलती जा रही हूँ। कभी तो फोटो देखकर भी मैं यह भूल जाती हूँ कि यह किसकी फ़ोटो है और अब कुछ यह न जाने क्या हो गया है कि अब ‘मालिक’ की याद ऐसे आती है, जैसे एक अजनबी जिसे कभी न देखा है, न जिसके विषय में ही कुछ मालूम है। जैसा मैंने एक बार आप को लिखा था कि जब मैं कहीं से लौटती हूँ तो घर वाले ऐसे लगते हैं, जैसे मैं किसी को जानती ही न हूँ, उन्हें पहचानने की कोशिश करनी पड़ती है, परन्तु अब वही हाल ‘मालिक’ के प्रति है। पहले जैसे ‘मालिक’ के प्रति बिल्कुल अपनापन लगता था, अब वह भी नहीं है। अब तो उसके प्रति भी तबियत में कुछ लापरवाही सी या भाई, कुछ और मालूम पड़ता है। परन्तु चैन एक क्षण को भी नहीं है। खैर वह जाने उसका काम जाने।

आपने जो पत्र जिज्जी को लिखा है, वह तो अद्वितीय है। परन्तु समझ में उतना ही आ पाया है जितना अपने ऊपर आज़माइश हो चुकी है। इस मौजूदा पत्र के पहले, जिसका कि आप ने जवाब भेजा है, मैंने नोट में कुछ पूछा है। यदि मेरे योग्य हो तो कृपया लिखियेगा। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-107
लखीमपुर
15/7/1950
आज हरिदद्दा से ‘आप’ की तथा परम् पूज्य पापा जी की तबियत का हाल मालूम हुआ। आप को फिर परसों कुछ दौरा हो गया, सुनकर यहाँ सब को बहुत फ़िक्र है। कृपया अपना तथा पापा जी का हाल शीघ्र दीजियेगा। मेरी तो भूलने की आदत इस कदर बढ़ी है कि मैं कुछ जानती ही नहीं हूँ। अब तो जब तक काम करती हूँ, तब तक काम, फिर तुरन्त सब कुछ भूल जाती हूँ। यहाँ तक कि मुझे यह एहसास तक नहीं होता कि क्या काम किया है। हालत यह है कि काम करती जाती हूँ। खाना खाती हूँ, उसके बाद कोई यदि मुझसे पूछे तो शायद मैंने क्या तरकारी खाई थी और उसका कैसा स्वाद था, यह सब मुझे भूल जाता है। भाई, जब ‘मालिक’ को ही भूल गई हूँ, तो और की क्या कहना। देखती हूँ कि तबियत हर समय एक सी सधी हुई ही अधिकतर रहती है। और अब तो भाई, और भी कमाल है। न जाने क्या है कि ‘मालिक’ में मुझे न कोई खास बात लगती है, न कुछ Attraction ही मालूम पड़ता है। परन्तु फिर भी वह मेरा ‘मालिक’ है और मैं तो जो हूँ, सो हूँ ही। सच तो यह है कि जैसे मैं हूँ और दुनिया के और हैं, वैसे ही मेरा ‘मालिक’ लगता है। मैं देखती हूँ कि यद्यपि ‘मालिक’ की भी मुझे कुछ याद नहीं रहती है कि कैसा है, कहाँ है। ‘मालिक’ के प्रति भी कुछ वैराग्य या कुछ हो गया है और पूजा भी छोड़ दी। परन्तु फिर भी मस्त सी हूँ, कोई अफ़सोस वगैरह कुछ नहीं है। यह भूलने वाली हालत हर समय रहती है, और अब ऐसी रहती है कि अधिकतर इसका एहसास तक नहीं हो पाता। क्योंकि मैं देखती हूँ कि जो काम करती हूँ, वे करते समय मैं अपने को भूला हुआ नहीं पाती हूँ, परन्तु काम से जरा सा हटते ही अपने को भूली अवस्था में पाती हूँ और देखने वाले अब मेरे शरीर में activity बहुत बतलाते हैं और इससे अब बाहर वाले मुझे बीमार मानने में धोखा खा जाते हैं। यह सब मेरे ‘मालिक’ का ही मेरे ऊपर असीम अनुग्रह है, 'उसका बहुत-बहुत धन्यवाद है। सब लोग मेरे शरीर में Activity बहुत बतलाते हैं, परन्तु मैं कुछ नहीं जानती कि कैसे सब और क्या होता रहता है। एक हालत बीच-बीच में न जाने कैसे बिल्कुल खाली सी आती है। यह मैं कई बार लिखना चाहती थी, परन्तु लिख नहीं पाई। पहले यह कभी-कभी आती थी और अब अक्सर दिन में आ जाती है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-108
लखीमपुर
25/7/1950
मेरा पत्र पहुँचा होगा। कल हरी दद्दा का पत्र जो मास्टर साहब के लिये आया था, उससे आपकी तबियत ठीक पढ़कर सबको प्रसन्नता हुई। मेरी आत्मिक-दशा का यह हाल है कि अब तो हर समय अधिकतर ऐसी रूखी सी हालत रहती है कि मेरी यह समझ में ही नहीं आता कि यह भी कोई अच्छी हालत है। अब न तो बिल्कुल कुछ Self Surrender ही जम पाता है, न ही और कुछ। सच तो यह है कि पूजा-ऊजा तो दूर रही, अब मेरे किये Self Surrender भी नहीं होता। मेरी कोई कोशिश नहीं चल पाती। पहले हर चीज जो मेरे अन्दर खाने पीने की जाती थी, सब में मुझे ईश्वरीय धारा ही मालूम पड़ती थी। परन्तु अब मेरी तो कुछ अभ्यास की तबियत ही नहीं चाहती। यदि करती हूँ तो सब बिल्कुल खेल या नकल लगती है और जरा से में, दिल पर तुरन्त भारीपन आ जाता है। पहले जब यह हालत कभी-कभी आती थी, तो मुझे बहुत बुरी लगती थी। सच तो यह है कि यदि यह हालत ‘मालिक’ पहले मुझे देता तो शायद मैं यह कहती कि भाई, मेरी हालत तो बिल्कुल गिर गई है, परन्तु अब तो जो और जैसा ‘उसने’ दिया है, सो मुझे मंजूर है। फिर भी कभी-कभी तो मैं चकरा जाती हूँ, खैर ! श्री बाबूजी ! न जाने क्या बात है कि अब भी मेरे मन में हर समय एक कुरेदन सी होती रहती है। आप मुझे कृपया यह बता दीजिये कि मैं ठीक चल रही हूँ। मुझे अपनी चाल से सन्तोष नहीं होता। पहले ‘आप’ ने लिखा था कि – ‘चाल कहीं-कहीं मध्यम ज़रूर हो जाती है’ परन्तु मैं देखती हूँ उसके दो-चार दिन तो फिर ठीक रही, परन्तु अब यह मध्यमपना तो शायद जायेगा ही नहीं, बल्कि शायद कुछ और धीमी हो गई है। भला यह भी कोई हालत है? सच पूछिये तो अब हालत देखते हुए मुझमें क्या आध्यात्मिकता रही, बस कुछ नहीं। भाई ! सच्ची और ठीक बात ‘आप’ जाने। मेरी हालत देखते हुए तो यही लगता है, खैर ! अब कभी-कभी कुछ दिमाग में ठकठक सी होती है और कुछ अजीब भौचक्कापन सा हो जाता है। मैं कुछ ठीक नहीं जान पाती हूँ।

छोटे-भाई बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-109
लखीमपुर
2/8/1950
कृपा-पत्र आपका बहुत दिनों से नहीं आया। यहाँ सब कुशल पूर्वक हैं। आशा है आप भी सकुशल होंगे। मेरा तो अब यह हाल है कि कुछ भी पढ़ने या खुद लिखने पर तबियत में न जाने क्या हो जाता है कि फिर न तो कुछ समझ में आता है, और फिर यदि पत्र लिखकर पढ़ना चाहती हूँ तो फिर चाहे पूरा पत्र पढ़ डालूं, परन्तु ऐसा लगता है कि खुली आँखों से भी कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता, पढ़ लेने पर भी यह नहीं मालूम पड़ता कि क्या लिखा है और अब कुछ यह हो गया है कि कुछ भी Self Surrender का अभ्यास व प्रार्थना वगैरह करती हूँ तो ऐसा लगता है कि यह सब ऊपर ही ऊपर रह जाते हैं, सब ऊपर ही ऊपर तैरा करते हैं। और अब तो कुछ यह भी हो गया कि कुल दुनिया तथा अपने प्रति एक सा भाव हो गया है। यद्यपि यह क्या भाव है, मैं यह भी नहीं जानती। सच तो यह है कि भाव क्या होता है, मुझे यह भी नहीं मालूम। या यों कहिये कि कुल दुनियाँ सब एक धार हो गई है। क्या अच्छा है, क्या बुरा है, मुझे यह कुछ भासता तक नहीं। फिर भी श्री बाबूजी, यह सब होते हुए भी मेरी हालत महीनों से एक सी ही चल रही है। खैर, जैसी ‘मालिक’ की मर्ज़ी। अब हालत न जाने क्यों कठिनता से एहसास में आती है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-110
लखीमपुर
3/8/1950
कृपा-पत्र ‘आप’ का बहुत दिनों से कोई नहीं आया है, न कोई कुशलता के समाचार ही मिले। इसलिये सब को बहुत फिक्र है। आज कल मेरी भी थोड़ी तबियत खराब है। खैर, ‘मालिक’ की कृपा से ठीक हो जावेगी। अपनी आत्मिक-दशा के बारे में क्या लिखूँ। मेरे में अब ज़रा सी भी आध्यात्मिकता है, मैं यह भी कहने की अधिकारिणी नहीं रही। मुझे अपने में न कोई खास बात लगती है, न कुछ ‘मालिक’' में ही। भाई, कृपया ‘आप’ मुझे देखकर लिखिये कि क्या बात हो गई। भारीपन का यह हाल है कि अकस्मात् बैठे-बैठे एकदम अपने आप ही ऐसा लगता है कि भारीपन होता चला जा रहा है। फिर अपने आप ही कभी जल्दी और कभी कुछ देर में ठीक हो जाता है। कभी-कभी अधिक बार और कभी-कभी एकाध बार ही होता है और अब कुछ यह हो गया है कि एक बार सोच लिया कि यह Working हो रही है, तो कोई बात नहीं, परन्तु यदि उसी Working का बार-बार ध्यान करके करती हूँ, तो भी भारीपन हो जाता है। अपने आप जो हो, सो हो। जरा भी ज़ोर देने से भारीपन हो जाता है। हाँ, समझ ज़रूर कुछ तेज हो गई है। खैर, मुझे अपनी हालत से और तो कुछ मतलब नहीं, परन्तु ‘मालिक’ के प्रति अनजाने ही एक कुरेदन सी लगी रहती है। कृपया ‘आप’ अपनी तबियत का हाल जल्दी लिखने की कृपा कीजियेगा।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-111
लखीमपुर
10/8/1950
‘आप’ का कोई पत्र बहुत दिनों से नहीं आया है, इसलिये सब लोगों को बहुत फ़िक्र है। कुछ नहीं तो माया से ही अपनी कुशलता की दो लाइनें लिखवा कर जल्दी से जल्दी पत्र डलवाने की कृपा करियेगा। मेरी तबियत भी अब ठीक सी है।

अपनी आत्मिक-दशा के बारे में क्या लिखूँ। बस इतना देख रही हूँ कि अब मुझमें ‘मालिक’ से प्रार्थना भी नहीं होती। तबियत जमती ही नहीं। अक्सर तो जब-जब प्रार्थना करती हूँ तो ऐसा मालूम पड़ता है कि जो कुछ भी, जैसी भी, मेरी हालत हर समय की है। उससे अलग हो जाती है। खैर, फिर भी अब मन नहीं होता और श्री बाबूजी ! ‘आप’ ने पहले एक बार लिखा था कि चाल मध्यम पड़ गई है। परन्तु अब मैं देखती हूँ कि बजाय सुधरने के चाल अब बराबर धीमी पड़ती जाती है। सो कृपया ‘आप’ देखियेगा कि क्या बात है और ऐसी है कि अपने बस के बाहर है। खैर, ‘मालिक’ की शायद यही मर्ज़ी है। अब मैं देखती हूँ कि मुझमें Activity भी धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। यद्यपि जिसे आलस कहते हैं, वह बात नहीं है। कुछ ऐसा है कि जैसे पहले कुछ ऐसा जोश रहता था कि - "अच्छा यह चीज़ है, यह तो मैं कर ही लूँगी"। जैसे यहाँ ‘आप’ ने कहा था कि - "यदि कोई ऐसा कर दे कि अपने शरीर का जर्रा-ज़र्रा मालिक में लय कर दे"। तो कुछ तुरन्त मेरे में जोश आ गया। मैंने कहा कि - "मैं ज़रूर करूँगी"। परन्तु अब तो मेरे में वह बात ही नहीं रही। कभी-कभी अब मैं सोचती हूँ कि - "मैंने श्री बाबूजी से कहा था, तो अब कुछ कोशिश करूँ” परन्तु यदि सच पूछा जाय तो दिन भर में शायद एक क्षण भी कुछ कर नहीं पाती हूँ। अजीब लापरवाह सा मन हो गया है, परन्तु लाचारी है, क्योंकि अब मेरी तो यह हालत है कि “न मैं यह कह सकती हूँ कि मुझ में कुछ है और न यह कह सकती हूँ कि मुझमें कुछ नहीं है”। अब तो जो है सो है। बस यही हालत है। यद्यपि Working के विषय में तो यह हो गया है कि पहले जब मुझे कुछ थोड़ा सा Working बताया गया तो मेरे मन में कुछ दुविधा सी होती थी, कि न जाने काम ठीक हो रहा है या नहीं। परन्तु अब देखती हूँ कि इस मामले में तो मैं खूब मज़बूत हो गई हूँ।

अपने विषय की समझ भी ‘मालिक’ ने कृपा कर के मुझे पहले से कुछ अधिक दे दी है। भाई, सच तो यह है कि प्रार्थना ही क्या, मुझसे तो अब कुछ नहीं होता। खैर, जो हो। देखती हूँ कि नींद की अवस्था और जागती हुई अवस्था में मुझे कोई अन्तर ही नहीं लगता। हाँ, इतना ज़रूर होता है कि नींद की अवस्था में शरीर को आराम मिल जाता है। बस, मेरे बाबूजी, शिकायत मेरी बस अब भी 'आप” से यही है कि ‘मालिक’ की जितनी याद, जितना प्रेम चाहिये, सो मुझमें नहीं होता। न जाने क्यों काफ़ी दिनों से बिना किसी खास तकलीफ़ के शरीर में कमज़ोरी हर समय मालूम होती है। कभी-कभी ऐसे ही कुछ थकान सी लगने लगती है। खैर, यह भी ‘मालिक’ की कोई मेहरबानी ही है। कृपया ‘आप’ इसे दूर करने की न सोचियेगा। अब मुझसे Self-Surrender बिल्कुल नहीं हो पाता है, जाने क्या बात है।

छोटे भाई-बहनों का प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-112
लखीमपुर
11/8/1950
कल ‘आप’ को एक पत्र लिख चुकी थी कि कल ‘आप’ का भी कृपा पत्र, जो ‘आप’ ने सब के लिये लिखा था, सो आ गया। पढ़कर, सब की, आप का पत्र न आने की चिन्ता मिट गई। कृपया ‘आप’ सच-सच बताइये कि अब की से करीब ३-४ महीने से ‘आप’ की तबियत क्यों नहीं सुधरने आती? क्या मेरे सारे भोग खुद ही भोगने की ठान ली है। पूज्य बाबूजी, मेरी ‘आप’ से यही प्रार्थना है, अब आप अच्छे हो जाइये और अपनी उन तकलीफ़ों को छोड़कर जो ‘आप’ के जीवन स्थाई रखने के लिये ज़रूरी है, बाकी सब मुझे दे दीजिये और जिस जिस की तकलीफ़ आप अपने में लेना चाहें, वे सब सहर्ष मैं लेने को तैयार हूँ। बस, आप अच्छे हो जाइये और इस दुनिया में रहने की इच्छा, जो अब ‘आप’ में कम हो गई है,उसे कृपया ‘आप’ फिर तेज़ कर दीजिये। अपने लिये न सही तो अपनी इस गरीब बिटिया के ही लिये। ‘आप’ ने लिखा कि –“मैं चाहता हूँ यह सैर तुम खुद पूरी करो”। सो मैं सहर्ष तैयार हूँ। मेरी यह इच्छा शुरु से रही है कि आप को मेरे लिये कम मेहनत करनी पड़े। परन्तु कहीं-कहीं लाचारी हो जाती है। खैर, वह ‘आप’ की जैसी मर्ज़ी और ‘आप’ ने लिखा कि – “कस्तूरी से कहना कि Working जो उसे सौंपा गया है, ठीक करती रहे”। सो ‘आप’ Working की तरफ से बिल्कुल निश्चिन्त रहिये। जो दिया गया है, उसे करने में अपनी तरफ़ से यदि ‘मालिक’ की ऐसी ही कृपा सदैव बनी रही तो कभी रत्ती भर भी कसर या कमी नहीं आने पावेगी। कृपया आप अब अपने स्वस्थ होने की खुशखबरी जल्द ही दीजिये। कभी-कभी ‘आप’ को तथा पापा जी को देखने की बहुत तबियत हो आती है। खैर, जब ‘मालिक’ की मर्ज़ी होगी, तब देखा जायेगा। लिखने में जो धृष्टता हो गई हो, उसे क्षमा करियेगा। छोटे भाई-बहनों को प्यार तथा पापा जी को प्रणाम कहियेगा। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-113
लखीमपुर
14/8/1950
मेरा पत्र आया है, कल पहुँच गया होगा। आशा है ‘आप’ की तबियत अब ठीक होगी। मेरी आत्मिक-दशा का तो यह हाल हो गया है कि मुझे तो अब खालीपन तक का ख्याल मात्र भी बुरा लगता है। और जो चीज़ बुरी लगती है, जैसे अब प्रार्थना को तबियत नहीं चलती, खालीपन की याद भी बुरी लगती है, परन्तु यदि अब भी करती हूँ तो Shock सा लगता है। मैं देखती हूँ कि वह नींद वाली अवस्था ही अनजाने दिन भर रहती है और उसी में भूल वाली अवस्था भी मिली हुई है। क्योंकि मैं देखती हूँ कि कुछ काम करते समय मुझे कुछ यह नहीं मालूम पड़ता कि मैं नींद की अवस्था में या भूल की अवस्था में हूँ, वरन् जब भी अपने में निगाह जाती है तो हर समय उसी अवस्था में पाती हूँ। सच पूछिये तो मेरी समझ में तबियत लाट साहबियत की ओर जा रही है। कह दिया यह नहीं होता, वह नहीं होता। खैर, जैसी ‘मालिक’ की मर्ज़ी। अब तो जो है, सो है, उसकी क्या फ़िक्र।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-114
लखीमपुर
22/8/1950
मेरा पत्र ‘आप’ को मिला होगा। आशा है, ‘आप’ की तबियत अब ठीक होगी। मेरी आत्मिक-दशा तो बस अजीब है, क्योंकि अब मैं देखती हूँ कि Sitting का तो नाम ही मुझे भारी लगता है। अपनी तो एक किनारे रही, यहाँ तक कि जब दूसरों को भी पूजा कराऊँ तो उसमें भी पहले की तरह यदि यह सोच लूँ, यद्यपि ‘मालिक’ के लिये ही सोचूँ कि ‘उसके’ हृदय से निकल कर ईश्वरीय धारा सबके हृदय में जा रही है, तो भी मुझे भारी लगता है। इसलिये भाई, मेरे लिये तो पूजा का नाम तक भारी लगता है। खैर, ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। और अब न जाने कौन सी हालत है कि दिन भर ऐसा लगता है कि सब कुछ देखते हुए भी कुछ दिखलाई नहीं देता। सब कुछ सुनते हुए भी कुछ सुनाई नहीं देता और सब कुछ करते हुए भी कुछ करने का एहसास नहीं होता है और यहाँ तक कि सब सूरतें देखते हुए भी सूरतों का एहसास नहीं होता। खैर, यह भी ‘वही’ जाने।

मुझे अपने अन्दर इधर-उधर ३-४ दिनों से बिल्कुल खुलाव मालूम होता है। यद्यपि इस खुलाव में चमक वगैरह तो कहीं कुछ मालूम नहीं पड़ती, बस केवल खुलाव ही मालूम पड़ता है। हल्कापन तो इतना है कि इसकी वज़ह से अन्दर तमाम खोखला सा मालूम पड़ता है। यह खुलाव या खोखलापन तमाम फैलाव में मालूम पड़ता है और मैं शायद पहले पत्र में भी लिख चुकी हूँ कि ‘मालिक’ में मुझे न कोई खास बात लगती है न कुछ Attraction ही मालूम पड़ता है, परन्तु फिर भी वह मेरा ‘मालिक’ है। भाई सच तो यह है कि जैसी मैं हूँ और बाकी सब हैं, वैसे ही मेरा ‘मालिक’ हैं, या यह समझ लीजिये कि ‘उसके’ प्रति भी कुछ वैराग्य सा है। खैर, मुझे तो कुछ करना नहीं है। बस फिर भी प्रार्थना सदैव ‘आप’ से यही है कि ‘मालिक’ की ओर किसी तरह जल्दी-जल्दी बढ़ चलूँ।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साघन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-115
लखीमपुर
10/9/1950
कृपा-पत्र ‘आप’ का बहुत दिनों से नहीं आया, पता नहीं क्या कारण है। जन्माष्टमी पर भी कोई वहाँ नहीं पहुँच पाया। इस लिये तब भी कोई समाचार नहीं मिल सका। खैर, अब पूज्य मास्टर साहब जी द्वारा हाल मिल जायेगा। मेरी आत्मिक-दशा तो इधर कई दिनों से एकाध दिन को अच्छी हो जाती है और फिर खराब हो जाती है। जो भूल की या नींद की हालत मुझ में महीनों से जाने या अनजाने हर समय रहती थी, परन्तु इधर कई दिनों से मुझमें वह हालत भी नहीं मालूम पड़ती। हर काम मुझसे वैसी ही अवस्था में होते रहते थे, परन्तु कई दिन से वह बात भी मुझमें मालूम नहीं पड़ती। हालत सुधारने की बहुत कोशिश की, परन्तु ‘मालिक’ की असीम कृपा से आज हालत में, जो हालत महीनों से थी, उसमें कुछ ज़रा सा Change लगता है। उस नींद या भूल वाली अवस्था में भी अब कुछ अजीब थोड़ा सा Change लगता है। उसको मैं अभी कुछ ठीक समझ भी नहीं पाई हूँ। खैर, इस अच्छी न लगने वाली हालत में भी उस परम् कृपालु ‘मालिक’ की कोई कृपा ही छिपी होगी और अब कुछ यह भी हो गया है, कि जब हालत अच्छी नहीं मालूम पड़ती, तो यदि पहले की हालत कुछ सोचने या पढ़ने की कोशिश करती हूँ, तो तबियत उसे एक पल भी सहन नहीं करती, बड़ी परेशान हो जाती है। इसलिए अब तो भाई, इसी में खुशी है और सन्तोष है कि “जो है, सो है”। परन्तु फिर भी मेरे श्री बाबूजी ! ‘आप’ इस गरीब को देख ज़रूर लीजियेगा। working में भी यदि कहीं कोई कमी-पेशी हो तो, मास्टर साहब जी से बता दीजियेगा। वे मुझे बता देंगे। यद्यपि कमी-पेशी सब मेरा ‘मालिक’ किसी न किसी तरह महसूस करा कर ठीक करा ही लेता है। इसका ‘उसे’ बहुत-बहुत धन्यवाद है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-116
लखीमपुर
16/9/1950
कल से पूज्य मास्टर साहब से, परम् पूज्य श्री पापा जी की तबियत का हाल सुनकर सबको फ़िक्र है। हमारे पूज्य पापा जी अच्छे हो जावें, यही हमारी ईश्वर से प्रार्थना है। यहाँ तो महीने भर से लय अवस्था २४ घंटे में एक मिनट को भी नहीं आती, न मालूम क्या बात हो गई है। इसलिये तबियत में कुछ परेशानी सी हो जाती है। सारी कोशिशें इस तरह बेकार होती चली जा रही है जैसे चिकने घड़े पर पानी की बूंदे। न जाने अपनापन बढ़ गया है, न जाने क्या हो गया है, कुछ समझ में नहीं आता। अब तो मुझे अपने में कोई खास अच्छी बात दिखाई ही नहीं पड़ती। न मुझमें अब वह भूली अवस्था जो दिन भर रहती थी, रह गई है। अब तो मुझमें कोई अवस्था ही नहीं रह गई। अब तो केवल मुझे गोबर-गणेश समझ लीजिये। इन्हीं कारणों से तबियत में कुछ फ़िक्र सी रहती है और मेरी समझ में अब यह तक नहीं आता कि लय अवस्था होती क्या चीज़ है। और अब कृपया यह लिखियेगा कि मैं क्या करूँ। पूज्य श्री बाबूजी, ‘आप’ से सच कहती हूँ कि केवल एक विश्वास को छोड़कर कि मेरी उन्नति हो रही है और मेरे पास कोई चिन्ह नहीं है, जिससे मैं यह आप से कह सकूँ या समझ सकूँ कि मेरी उन्नति हो रही है। आप जानें, आप का काम जाने। मैंने तो अपनी हालत लिख दी है। आप ही कहा करते थे कि बिटिया ! बड़ी अच्छी उन्नति कर रही है। अब लीजिये, अब चढ़ाइये गाड़ी ऊपर। सोचती रहती हूँ, शायद कल हालत सुधर जावे, परन्तु देखती हूँ वह कल, परसों कभी तशरीफ़ लाते ही नहीं। खैर, वह तशरीफ़ लायें या न लायें, हम तो उनकी तरफ तशरीफ़ लेते चले ही जावेगें। आगे ‘मालिक’ की मर्ज़ी। और यह ‘मालिक’ की मर्ज़ी भी कहने भर की रह गई है। सच पूछिये तो हालत भी अब कुछ मालूम नहीं पड़ती। पापा जी की तबियत का हाल लिखियेगा।

अम्मा आप को तथा पापा जी को आशीर्वाद कहती हैं। इतिः-

आपकी दीन-हीन, साधन-विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-117
लखीमपुर
20/9/1950
मेरा एक पत्र जो पूज्य मास्टर साहब जी के द्वारा भेजा था, सो मिला होगा। आप की किताब निर्विध्न छप जावे, हमारी यही प्रार्थना है। पूज्य ताऊजी से मालूम हुआ कि ‘आप’ को बहुत मेहनत करनी पड़ती है। इसलिये ‘आप’ को सिर में दर्द हो जाता है। ‘आप’ तीन-चार बार खूब तेल सिर में ठोकवाया करें तो शायद सिर की तकलीफ़ को आराम मिले। मेरी आत्मिक-दशा तो न जाने कैसी है। खैर, जो है, सो है। यद्यपि इधर करीब आठ-दस दिन से जो एक हालत महीनों से एक सी थी, सो अब बदली हुई लगती है। परन्तु मुझे तो केवल इतना अन्तर मालूम पड़ता है, कि पहले एक अवस्था थी जो हर समय एकसार से मुझमें मौजूद रहती थी, परन्तु अब मुझे अपने में कोई खास अवस्था मालूम नहीं पड़ती और अब तो इधर कुछ ऐसा लगता है कि पूजा-ऊजा कुछ चीज़ ही नहीं है। न मुझे यह मालूम है कि पूजा है क्या चीज़? अब न जाने क्या है, यह मुझे मालूम नहीं। अब तो अपने में जो धारा अन्दर बहती रहती है, सोई हर समय, हर जगह मालूम पड़ती है। अब तो भीतर और बाहर सब एक धार हो गया है। शायद इसीलिये अब अपने में कोई अवस्था नहीं मालूम पड़ती और अब तो जब कभी पहले की हालत पढ़ती हूँ तो ऐसा मालूम पड़ता है कि न मालूम किसकी हालत पढ़ रही हूँ खैर, भाई ! अब तो “जो है, सो है” ही मेरी हालत है और वही हालत सब तरफ़ है। आगे ‘आप’ जाने, और हर तरफ़ एक खुलाव सा हो गया है।

अम्मा ‘आप’ को तथा पापा जी को आशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-118
लखीमपुर
27/9/1950
कल पूज्य मास्टर साहब जी से मालूम हुआ कि परम् पूज्य पापा जी की तबियत अब कुछ-कुछ ठीक हो चली है। ईश्वर का बहुत धन्यवाद है। ‘आप’ दशहरे में आइयेगा ज़रूर। मेरी हालत तो जो दशा पहले हर समय अन्दर की मालूम पड़ती थी, सो अब हर समय बाहर की हो गई है। अब तो कुल दुनिया में हर समय, हर जगह, चाहे जानदार हो या बेजान, यहाँ तक कि पेड़-पौधे तक में सब मेरे लिये तो कुल एक ही हालत दरसती है। खुद मैं तथा कुल दुनिया सब एक सार हो गये हैं। भाई सच तो यह है कि मेरी निगाह में तो समस्त जड़-चेतन एक बहाव में हो गये हैं। यद्यपि क्या हो गया है, यह मुझे नहीं मालूम। जो ‘उसकी’ मर्ज़ी और अब कुछ यह हो गया है, कि निगाह में सब तरफ़ तमाम फैलाव ही फैलाव दिखलाई पड़ता है। कृपा कर के क्षमा करियेगा श्री बाबूजी, यह लाट साहबियत भी हो गई है कि पूजा-ऊजा अपने से अब बहुत छोटी चीज़ मालूम पड़ने लगी है। खैर, जो है सो ‘मालिक’ जाने।

छोटे भाई, बहनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-119
लखीमपुर
3/10/1950
कृपा-पत्र आप का आज जो पूज्य मास्टर साहब के लिये आया था, उससे मालूम हुआ कि परम् पूज्य पापा जी का बुखार बढ़ना अभी तक बन्द नहीं हुआ है। न जाने क्या बात है। भाई बड़े लोगों की बातें वे ही जाने। मेरी आत्मिक-दशा आजकल कुछ खास अच्छी नहीं मालूम पड़ रही है। मुझे तो अपने में शायद, जैसा मैं ‘आप’ को लिख चुकी हूँ कोई अवस्था नहीं मालूम पड़ती। मेरी एक चिट्ठी शायद तारीख ३० को आप को मिली होगी, जिसमें मैंने लिखा था कि मेरी जो हालत भीतर पहले थी, अब मुझे सब तरफ सब में, पेड़-पौधों तक में, कुल दुनिया में, बस एक ही हालत दिखाई पड़ती है और निगाह में सब तरफ तमाम फैलाव ही फैलाव दिखाई पड़ता है अब कुछ यह भी हो गया है कि खुद अपने का यह पता नहीं लगता कि मैं स्त्री हूँ, पुरुष हूँ कौन हूँ। खैर, जो हूँ सो हूँगी। जाति-पाति तो बहुत ही जा चुकी थी, अब यह न जाने क्या हो गया। यद्यपि कुछ भूल की अवस्था भी मुझमें नहीं है। पूज्य श्री बाबूजी, अब मुझे सच-सच ज़रूर लिखियेगा कि Self Surrender के बजाय मुझ में कहीं ‘मैं पना’ तो नहीं बढ़ रहा है क्योंकि मुझे इस चीज़ से बड़ा दुख होता है। वैसे ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। अपनी सफ़ाई करती हूँ फिर भी कोई लाभ नहीं होता। अब आज एक कोई हालत मुझमें और कुछ मालूम पड़ती है। पता लगाने पर लिखूँगी। पूज्य श्री बाबू जी ! ‘आप’ को तकलीफ़ तो ज़रूर होगी, उसके लिये मैं क्षमा-प्रार्थिनी भी हूँ। बस अब की से एक पत्र में आप ही कुछ मेरी हालत लिखियेगा, क्योंकि कभी-कभी मुझे अपनी हालत अच्छी नहीं मालूम पड़ती। यद्यपि मैं ईश्वर की कृपा से आगे तो अवश्य बढ़ती जाऊँगी।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-120
लखीमपुर
6/10/1950
मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। आशा है ‘आप’ की तबियत ठीक होगी। अब बहुत दिन ‘आप’ को यहाँ आये हो गये हैं, इसलिये कृपया गंगा-स्नान की छुट्टियों में ज़रूर आइयेगा। सुना है, २३-२४ तारीख की ‘आप’ की छुट्टियाँ है और २५ तारीख शनिश्चर की ‘आप’ और लेंगे। इसलिये यदि सुविधा हो, तो आप २२ तारीख की शाम को छ: बजे की Train से आ जायें तो ‘आप’ को तीन दिन पूरे मिल जायेंगे। वैसे, जैसी ‘आप’ की मर्ज़ी हो, वही ठीक है। मुझे तो कुछ यह हो गया है कि दुनिया के सब लोग, सब चीजें अजीब तस्वीरों की तरह लगती हैं और शायद वैसी ही स्वयं मैं हूँ। नाटक के पर्दे की तरह एक के बाद एक दिन बीतते चले जाते हैं। हाल यह है कि सबेरे की बातें, शाम को ऐसी लगती हैं, मानों यह वर्षों पहले की बातें कही जा रही हैं और भाई, अब तो यह हाल हो गया है कि यदि मुझे और कुत्ते को एक ही थाली में खाना दे दिया जावे तो भी हम दोनों बड़ी खुशी से खाते रहेंगे, क्योंकि कुछ ऐसा है कि शायद मुझे कुत्ते और कस्तूरी में कोई खास फ़र्क ही नहीं मालूम देता यह ‘आप’ जानें कि क्या बात है। केवल कुत्ता ही क्या, बस सबके लिये यही बात है। खैर, ‘मालिक’ जानें। और कुछ यह है कि तमाम फैलाव बढ़ता जाता है। वैसे तो श्री बाबूजी ! मुझे अपने में कुछ मालूम नहीं पड़ता, परन्तु फिर भी कुछ ज़रूर है। अब क्या है, ‘मालिक’ जानें। न जाने क्या हो गया है, मेरा एहसास मंद होता चला जाता है। अब तो १०-१२ दिन में बड़ी मुश्किल से जाकर कहीं कुछ हालत समझ में आ पाती है। अब करीब २-३ दिन से अपने में कुछ हल्का सा फ़र्क लगता है। आज पूज्य मास्टर साहब जी से मालूम हुआ कि ‘आप’ की साँस की तकलीफ़ फिर बढ़ गई है। क्या करूँ, श्री बाबूजी न जाने क्यों Will Power भी कुछ ऐसी हो गई है कि ‘आप’ के शरीर को अब कुछ आराम नहीं दे पाती। वैसे Sitting वगैरह के लिये तो जैसा चाहती हूँ, वैसा ही होता है। खैर, यह भी ‘मालिक’ की ही कोई मर्ज़ी है। ‘आप’ ने पूज्य मास्टर साहब से कहा कि यदि ऐसी ही कमज़ोरी रही तो कैसे आवेंगे, सो हम सब की यही प्रार्थना है कि आप कृपया यहाँ आने की पक्की सोच लीजिये जिससे सब कमज़ोरी वगैरह दूर हो जावे। क्योंकि अब रुका नहीं जाता। वैसे जैसे रखियेगा, रहेंगे।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-121
लखीमपुर
11/10/1950
आपके पत्र से महानुभाव श्रीमान् पापा के महाप्रयाण का बज्राघात सा समाचार पाकर हम सब को असहनीय दुख हुआ। साथ ही परम आश्चर्य भी। क्योंकि हमें उन महात्मा के महाप्रयाण की इस समय लेश मात्र भी संभावना तक न थी। हमारी बदकिस्मती से ईश्वर ने हमारी प्रार्थना मंजूर नहीं की या भाई ! हमारी आवाज़ उस तक न पहुँच सकी। बस सन्तोष मुझे केवल इस बात का है कि मैंने अपना कर्तव्य, जो उनके लिये प्रार्थना का बताया था, सो पूरा कर दिया। यहाँ तक कि दिन में तीन-तीन बार प्रार्थना की और कई-कई बार करीब दो महीने Will Power भी लगाई परन्तु क्या लाभ। Result तो वही निकला जो निकलना था। इसलिये तो अब यही कहना पड़ता है कि कुछ नहीं किया। अब हम उन परम पूज्य पापा के चरणों में पत्र-पुष्प तुल्य ‘शान्ति-पाठ’ ही अर्पण करते हैं। यद्यपि उनके लिये तो कुछ भी करना, “सूर्य को दीपक दिखाने” के सदृश्य है। कुछ भी हो, अब तो यह कहना पड़ता है कि हमारे मिशन का एक स्तम्भ भग्न हो गया। ईश्वर से हमारी यही प्रार्थना है कि उनके दुखित परिवार को शान्ति प्रदान करें। यद्यपि ऐसा हुआ भी होगा। मेरे श्री बाबूजी ! ‘वे’ प्रेम की मूर्ति थे। उनकी बोल-चाल, रहन-सहन तथा उनके दर्शन से हमें ईश्वर प्रेम का पाठ मिलता था। खैर, मैं क्या लिख सकती हूँ। वे जैसे थे, वैसे थे। जो थे, सो थे। बस इतना ही काफ़ी है, क्योंकि उनके वास्तविक मूल्य को आँकने वाले यहाँ स्वयं केवल ‘आप’ हैं। ईश्वर ने यहाँ भी सब को कुछ शान्ति व सब्र प्रदान कर दिया है।

मेरी हालत तो कुछ यह हो गई है कि मुझे चाहे कितनी भी तकलीफ़, दुख क्यों न हो, परन्तु अन्दर दृष्टि करते ही एक अविचल शान्ति व स्थिरता का सा अनुभव होता है। जब तक सब लोग उनकी बातें करते हैं, तब तक मैं भी परेशान सी हो जाती हूँ, परन्तु वहाँ से उठ जाने पर मुझे कोई खास तकलीफ़ नहीं होती। ऐसी ही हालत हर परेशानी में समझ लीजिये। इस कारण यधपि अब न तो मुझे कुछ तकलीफ़ व परेशानी अधिक महसूस होती है और न कुछ खुशी, न आनन्द ही मालूम पड़ता है। पूज्य श्री बाबूजी ! न मुझमें महीनों से वे बड़े आनन्द की कैफ़ियत ही कभी आने पाती है। अब तो मेरी हालत कुछ अजीब तरह की होती जाती है और कुछ यह हो गया है कि चाहे कुछ भी हो, अब मुझे भारीपन कभी एक क्षण को भी नहीं आता। यह बात महीनों से है।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-122
लखीमपुर
14/10/1950
मेरा एक पत्र ‘आप’ को मिला होगा। यहाँ सब लोग कुशल हैं, आशा है ‘आप’ भी सकुशल होंगे। मेरी हालत तो जैसा कि मैं शायद लिख चुकी हूँ कि न मुझे यह मालूम पड़ता है कि मैं स्त्री हूँ न जाने कौन हूँ, क्या हूँ। करीब-करीब ऐसा ही मुझे कुछ दुनिया में सब के लिये मालूम पड़ता है। इसलिये अब यह भी बात जाती रही कि न जाने कौन मेरा है, न जाने कौन दूसरा है। ऊपर वाली हालत केवल जीवधारी मनुष्यों में ही नहीं, वरन् कुल जानवर तथा पेड़-पौधों तक के लिये बस एक ही हालत रहती है। इधर कुछ दिनों से क्या, अधिक दिनों से रात में नींद बहुत बुरी आती है। इसलिये कुछ आराम नहीं मिलता, परन्तु मैं यह देखती हूँ कि दिन में चाहे मैं १५-२० मिनट ही सो जाऊँ तो बहुत आराम मिल जाता है। जैसा कि मैं पहले लिख चुकी हूँ कि जरा सी परेशानी में भी दृष्टि भीतर करते ही मुझे अविचल शान्ति तथा स्थिरता का अनुभव होता है, परन्तु मैं यह देखती हूँ कि यह हालत अधिक महसूस तो तभी होती है, जब ज़रा भी चित्त परेशान होता है, परन्तु वैसे तो बस कुछ एक ही हालत सब ओर दरसती है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-123
लखीमपुर
26/10/1950
कल पूज्य मास्टर साहब जी से वहाँ के समाचार मालूम हुए। ‘आप’ की साँस को भी ईश्वर की कृपा से लाभ है, सुनकर प्रसन्नता हुई और यह भी मालूम हुआ कि गंगा-स्नान की छुटिट्यों में आपका यहाँ पधारने का इरादा है। ईश्वर इस इरादे को सुदृढ़ बनाये रखें, हमारी यही प्रार्थना है। इधर मेरा कोई खास हाल तो नहीं मालूम पड़ता है। हाँ, कुछ ऐसा लगता है कि कोई चीज़ है, जिससे अब निकलने के लिये बस अभी उसी में ही उतरा-चढ़ाई होता है, खैर ईश्वर जाने। और कुछ यह हो गया है कि सारी ताकत जो अपने में है, वह सब बिल्कुल अपने काबू में लगती है और जब भी अपने अन्दर दृष्टि जाती है तो बस ऐसी कैफ़ियत रहती है कि भीतर गोते लगाती रहती हूँ। अब जागने का माद्दा कुछ ऐसा बढ़ गया है, रात में चुपचाप लेटे हुए भी चाहे जितनी देर जागती रहती हूँ। मैं अपनी हालत क्या लिखूँ, जबकि अब न तो मुझमें भूल वाली हालत है, न मुझमें अब जो ‘आप’ लिखते थे कि लय-अवस्था बढ़ रही है, वह कोशिश करते-करते परेशान हो जाती हूँ, तब भी किसी तरह नहीं आ पाती। हाँ, जब बिल्कुल कोशिश बन्द कर देती हूँ, तो कभी-कभी बहुत हल्की सी ‘है’ कहने भर को मालूम पड़ती है। भाई, सच तो यह है, मुझमें अब कोई खास बात नहीं है। जैसे दुनिया के सब लोग हैं, वैसे ही मैं हूँ। तिस पर भी तुर्रा यह कि मैं आगे तो ज़रूर बढ़ रही हूँ और अभी श्री बाबूजी ! मुझमें एक खासियत यह है कि पहले मुझे जैसे मालूम पड़ जाता था कि मेरे में Sitting आ रही है, सो भी अब कुछ नहीं है। मैं नहीं जानती कि मैं क्या हूँ, कैसी हूँ, पेड़ हूँ कि पौधा हूँ, ईश्वर जाने। लेकिन जो भी हूँ, जैसी भी हूँ, ‘उसकी’ तो ज़रूर हूँ और यह भी केवल अपना अन्दाज़ और विश्वास है। और स्वभाव में कुछ यह देखती हूँ कि अपना हो या कोई दूसरा, जब तक पूजा कराऊँगी या बात करूँगी, तब तक तो वे अपने हैं, वैसे उनसे जैसे कोई मतलब नहीं।

छोटे-भाई-बहनों को प्यार। अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-124
लखीमपुर
12/11/1950
मेरा एक पत्र मिला होगा। आप की तबियत अब कैसी है? आशा है डाक्टर की दवा से अब साँस को लाभ होगा। आप कृपया जल्दी से अच्छे हो जाइये। क्योंकि आने के दिन अब करीब आ रहे हैं। मेरा हाल तो यह है कि कभी-कभी फैलाव इस कदर बढ़ा हुआ लगता है कि हर चीज़ में हर तरफ़ बस मैं ही फैली हुई हूँ या यों कहिये कि सब ओर मेरा ही फैलाव लगता है। मैं देखती हूँ कि सारी चीजों का Attraction बिल्कुल खत्म सा हो गया है। यद्यपि ऊपर से तो ज़रूर लगता है। कि जैसे गाना मुझे बहुत अच्छा लगता है, परन्तु जब गाना सुनने लगती हूँ तो तबियत न जाने कहाँ चली जाती है। कुछ ऐसी हालत रहती है कि कुछ अच्छा भी लगता है, कुछ तारीफ़ भी करती हूँ, परन्तु फिर भी सब चीजें ऐसी लगता है, कि बहुत दूर से सुनाई पड़ती हैं तथा दिखाई पड़ती है और भीतर जाती हैं। भाई ! सच तो यह है कि सब तरह से देख चुकी हूँ कि दुनिया की हर चीज़ से, हर आदमी से, लगाव का डोरा कटकर बिल्कुल दूर हो गया है। यद्यपि रंज व खुशी हल्के रूप में होती ज़रूर है, परन्तु वह भी सबके बीच में बैठकर ही महसूस हो पाती है, ‘मालिक’ जाने। और देखती हूँ कि “मैं पने” का एक भाव सा रह गया है, वह भी ईश्वर जाने कहाँ रहता है। पूज्य श्री बाबूजी ! कुछ भी हो, जैसा कि मैं चाहती हूँ और जैसा कि चाहिये, उतनी याद शायद मैं ‘मालिक’ को नहीं कर पाती हूँ। इसलिये मन में एक कुरेदन सी चैन नहीं लेने देती और यह देखती हूँ कि जो हालतें मैं पहले लिख चुकी हूँ, उसका असली रूप धीरे-धीरे ‘मालिक’ की अनन्य कृपा से अब आता जाता है, वैसे ‘मालिक’ जानें। तारीख १० को सबेरे पूजा में बैठते ही अचानक बड़ा तेज़ कुछ लाल प्रकाश सामने दिखलाई पड़ा। ऐसा जैसे सूर्योदय और सूर्यास्त के समय आकाश का रंग होता है। यह चीज ४-५ बार दिखाई पड़ चुकी है। करीब ८-१० दिनो से सिर के पिछले भाग में बड़ी लपकन होती है और सारे में कुछ अजीब हाल है। न जाने कुछ कमज़ोरी है, न जाने क्या बात है। कभी-कभी दर्द तथा कभी-कभी ठंडक सी मालूम पड़ती है। आप जानें क्या बात है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-125
लखीमपुर
1/12/1950
आशा है आप सकुशल पहुँच गये होंगे। आशा है आज ताऊजी तथा मास्टर साहब जी की चिट्ठियाँ पहुँची होंगी।

‘आपके’ यहाँ आने पर ता.२५ से मुझे अपनी हालत बदली हुई सी लगती है, परन्तु अब ता.२७ से जैसी कुछ हालत समझ में आई है, सो सेवा में निवेदन करती हूँ।

अब तो यह हाल है कि शरीर का एहसास तो बिल्कुल खत्म ही समझिये। यह हाल तो इधर करीब बहुत दिनों से है। शरीर का जाड़ा-गर्मी का एहसास केवल इतना या इतनी देर को हो पाता है, जैसे कोई चीज़ छू भर जाती है। इसको ही समझ लीजिये कि शायद शरीर को एहसास हो पाता हो, परन्तु मुझे नहीं मालूम। परन्तु फिर भी Mind तो हर समय समाधि-अवस्था में ही डूबा रहता है या शायद मुर्दे की ही दशा में हर समय लीन रहता है। ऐसा लगता है कि मेरे लिये तो हर चीज़ बस केवल एक भाव मात्र है। अब तो working में सोते में तथा जागते में ऐसा भासता है, मानों एक बड़ी लड़ाई होने वाली महसूस होती है। करीब १४-१५ तारीख से सामने एक लाश सी दिखाई पड़ती थी। अन्दाज से शायद सरदार पटेल की death बहुत करीब है, वैसे ईश्वर जाने। भाई, इधर जब से आप आये, तब से तो कुछ अजीब यह हाल लगता है कि कुछ ऐसा लगता है कि जैसे स्वप्न में भोग खत्म हो रहे हैं। और कुछ यह हो गया है कि जो ताकत या हालत ‘मालिक’ ने दी है, उस पर command या Mastery की सी हालत लगती है। कुछ ऐसा लगता है कि सारे भोग बड़ी शीघ्रता से खत्म हो रहे हैं। और पहले जैसे मालूम पड़ता था कि ‘मालिक’ मेरी याद में मस्त है, वैसे अब कुछ self surrender में भीतर ही भीतर से ऐसा लगता है कि शायद ‘मालिक’ का कुछ-कुछ मुझमें लय होना आरम्भ हो गया है और शायद यह है कि लय-अवस्था में अपनी अवस्था को मुझमें लय करना शुरु कर दिया है, वैसे ‘आप’ जानें। जैसे पहले ‘आप’ ने याद के लिये लिखा था कि आंतरिक हो गई है, वही बात कुछ self surrender के लिये मालूम पड़ती है।

इधर कुछ यह हो गया है कि ‘मालिक’ कहीं अलग मुझे दिखाई ही नहीं पड़ता बल्कि ‘उसे’ एक क्षण भी अलग देखना असहय हो जाता है। जैसे अब तक सामने कोच पर ‘मालिक’ का ही ध्यान करती थी कि ‘वह’ सामने है, परन्तु अव्वल तो मुझे अब कोच-वोच पर कहीं कुछ मालूम ही नहीं पड़ता। दूसरे यदि करती भी हूँ तो समझिये लकीर पीटने की तरह मालूम पड़ता है। यहाँ तक हाल है कि अब की से ‘आप’ आये थे, तो सामने बैठे हुए भी अधिकतर ऐसी ही हालत रहती थी कि मुझे यह बिल्कुल भूल जाता था कि ‘आप’ बैठे हुए हैं। और यदि कोशिश करके यह ख्याल जमाती थी कि ‘आप’ बैठे हैं तो तबियत बरदाश्त नहीं कर पाती थी, परेशान हो जाती थी। यही हाल प्रार्थना गाते व करने में होता है। सो भला ‘आप’ बताइये, जब हाल तो अपना यह रहता है, तो प्रार्थना किसकी की जावे और उसमें क्या मज़ा आवे। खैर आप जानें। अब मेरा हाल तो कुछ ऐसा समझ लीजिये कि तबियत हमेशा बेख्याल सी रहती है। परन्तु फिर भी राजी हैं, हम उसी में, जिसमें रज़ा है तेरी और खुशी से। भाई सच तो यह है कि कुछ ऐसी हालत लगती है, कि – “खुद को पहिचान लिया है”। पूज्य श्री बाबूजी ! मेरी तो जो कुछ समझ में आता है, सो लिख ज़रूर देती हूँ, अब आप जानें। और यह तो शायद लिख चुकी हूँगी कि हर तरफ़ हर चीज तथा सब में बस एक ही हालत दरसती है या बहती हुई लगती है। शायद एक कुछ हालत और है, परन्तु मैं उसे ठीक catch नहीं कर पाई हूँ।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-126
लखीमपुर
11/12/1950
आशा है, आप आराम से पहुँच गये होंगे और मेरा वह लिफाफा भी मिल गया होगा। यदि न मिला हो तो लिख दीजियेगा, मैं वह हालतें जो उसमें लिखी थी, फिर से लिखकर भेज दूँगी। क्योंकि ‘आप’ ने कहा था कि “सारी चिट्ठियाँ, जिसमें कुछ हालतें लिखी हैं, मेरे पास मौजूद हो जायें”। अब जो हालत ईश्वर की कृपा से है, सो लिख रही हूँ।

अब कुछ यह हो गया है कि हर चीज़ का एक दायरा सा बँधता जा रहा है, कि कोई चीज़ जैसे दया-वया इत्यादि बस इससे आगे नहीं जा सकती। एक Check सा लग जाता है। और कुछ यह हाल है कि सब में बैठी हुई सब को देखती हुई, पहचानती हुई तथा बात करते करते सब को बार बार भूल सी जाती हूँ। या यों कहिये कि जैसे पहले एक बार लिख चुकी हूँ कि सब कुछ देखती हुई भी कुछ दिखाई नहीं देता, सुनते हुए भी सुनाई नहीं देता और न कुछ करते हुए महसूस होता है। उसकी असली कैफ़ियत ईश्वर की कृपा से अब कुछ कुछ महसूस हो रही है। कुल दुनियाँ में न जाने सब एक ही लगते हैं। न जाने कुछ मालूम भी पड़ता है या नहीं। पहले जैसे मैंने लिखा था कि कुल जड़-चेतन, पेड़-पौधों तक में, बस एक ही हालत दरसती है, परन्तु अब देखती हूँ कि वह हालत अब न जाने क्या हो गई, कैसी हो गई है। Sitting में यदि यह ख्याल बाँध दूँ कि हृदय से फैज जा रहा है, तो भी कुछ weight सा लगने लगता है। खैर ‘मालिक’ जाने। जैसे मर्ज़ी हो, वैसे रखे। कुछ ऐसी हालत है कि – “खुद ने खुद को पहचान लिया है”। अब मौजूदा हालत तो श्री बाबूजी ! कुछ ऐसी है कि यदि self surrender की तरफ तबियत जाती है, तो ऐसा मालूम पड़ता है कि जैसे शरीर पिघल-पिघल कर फैला या बहा जा रहा है। और कुछ ऐसा मालूम पड़ता है कि शरीर का ज़र्रा-ज़र्रा अलग-अलग या छिन्न-भिन्न होकर बिखरा सा जा रहा है। परसों यानी तारीख ९ की रात में कुछ ऐसा अन्दाज़ होता है कि स्वप्न में कुछ order सा मिला था, परन्तु जब तक उर्दू और लिखूँ, तब तक मुझे याद भूल गई और अब याद ही नहीं आती। सो आप से करबद्ध प्रार्थना है, यदि सच ही इस गरीब के लिये कोई सेवा हो तो ज़रूर लिखियेगा। वैसे ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। अब - ‘राजी हैं हम उसी में जिसमें रज़ा है तेरी’ की कुछ कुछ असली कैफ़ियत सी मालूम पड़ती है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-
आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-127
लखीमपुर
18/12/1950
मेरा एक पत्र मिला होगा। आपकी पहुँच का कोई पत्र नहीं आया। आशा है ‘आप’ की तबियत ठीक होगी। इधर ‘आप’ जब से गये हैं, तब से, ‘आप’ या तो कुछ Stage या कोई हालत बदल गये हैं, खैर, ‘आप’ की मर्ज़ी। अब मेरी हालत तो कुछ ऐसी हो गई है, यद्यपि नई नहीं है, परन्तु उन हालतों का जैसे मुर्दे वाली हालत का रूप बदलता जाता है। और जो मैं पहले आप को कभी लिख चुकी हूँ कि एक ईश्वरीय धारा सी अन्दर हर समय बहती हुई मालूम पड़ती है और अब देखती हूँ कि वही धारा ही मेरा कुल रूप हुआ जा रहा है। वह हालत या धारा ही मेरा स्वरुप हो गया है। एक मुर्दे की हालत मुझ पर अधिकार करती जा रही है। अब नाभि में खोखलापन तथा कुछ खुलाव सा होता मालूम पड़ता है। मैंने जो लिखा कि नाभि में खोखलापन मालूम पड़ता है, मैं देखती हूँ कि शायद वह ईश्वरीय धारा मेरा स्वरूप ही हो जाने के कारण सारा शरीर हर समय बिल्कुल हल्का तथा शान्तिमय मालूम पड़ता है। ऐसी हालत रहती है, कि जैसी ‘आप’ जब कहते थे कि centre से फैज आ रहा है, तब होती थी। मन तो हर समय अब डूबा ही रहता है। ऐसा मालूम पड़ता है कि सारी इन्द्रियों की वृत्तियाँ एकदम शान्त या खत्म होती चली जाती हैं। आज अभी ‘आप’ का कृपा पत्र मिला आज्ञा का पालन शुरु कर दिया है। जैसी मर्ज़ी हो, वैसा काम लिया जावे। आप ने यह बहुत ही प्रिय बात लिखी है कि – “तारीफ़ उस मालिक की ही है, जिसने मुझ ऐसी को अपनी शरण में लिया है”।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-128
लखीमपुर
20/12/1950
कल आपका कृपा पत्र मिला। उसमें आप ने जो working लिखा है, उसे जो कायदा सफ़ाई का Northern India का आप ने पूज्य मास्टर साहब को लिखा है, वैसे करूँ या ऐसे ‘ईश्वरीय धारा’ के प्रभाव से सारी अशुद्धता दूर हो रही है, ऐसे ही करूँ? वैसे तो काम हो ही रहा है। पूज्य मास्टर साहब को आपने लिखा था कि पृथ्वी की सारी अशुद्धता वायुमण्डल में मिल रही है और जात की Power से हल्की-हल्की फुहारें वायुमण्डल में मिल गई हैं। और सारी अशुद्धता को तुरन्त की तुरन्त खत्म कर रही हैं। आप का पत्र आ गया। वैसे ४-५ दिन से उसी working को तबियत बार-बार जाती थी, बल्कि कुछ-कुछ शायद शुरु भी हो गया था।

अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-129
शाहजहाँपुर
22/12/1950
तुम्हारा खत नारायण के हाथ पहुँचा। तुमने जो अपना तरीका काम के लिये लिखा है, वह बहुत अच्छा है। जब तुम काम करोगी, तरीके स्वयं ही समझ में आते रहेंगे। मतलब काम से है, तरीका कोई भी कर लिया जावे। और सब अच्छी तरह है।

दुआगो,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-130
लखीमपुर
28/12/1950
आप का एक पत्र पोस्टकार्ड मिला। अपनी आत्मिक-दशा के बारे में क्या लिखूँ। न जाने अब उदासी वाली हालत ही हर समय रहती है। कुछ यह है कि न तो ‘मालिक’ की याद रहती है, न कुछ विशेष अपना ही ख्याल रहता है। न जाने कुछ रहता भी है कि नहीं। हालत यद्यपि न कुछ विशेष अच्छी ही लगती है, न कुछ बुरी ही मालूम पड़ती है। सच पूँछिये तो कोई खास हालत भी नहीं मालूम पड़ती। शान्ति वगैरह के बारे में देखती हूँ कि जब कोई घबराहट वाली बात, जैसे जिज्जी की इस बीमारी के बारे में सुनी थी, तो तबियत तो काफ़ी परेशान हो जाती है परन्तु भीतर जब भी निगाह पहुँचती है, तब तो एक अविचल शान्ति का ही अनुभव होता है। ऐसी हालत है कि ख्याल भी आते हैं, और तबियत बेख्याल रहती है। न जाने self surrender है भी कि नहीं। परन्तु मुझे तो इससे कुछ मतलब नहीं। जैसे चाहे ‘मालिक’ मुझे रखे। परन्तु कभी-कभी तबियत बेचैन हो जाती है। पूज्य श्री बाबूजी ! न जाने क्यों एक बिल्कुल नीरस, रूखी हालत मेरे पीछे पड़ी रहती है। कभी-कभी तो मेरी तबियत उस नीरस हालत से ऊब जाती है। न जाने यह क्या हालत है और कुछ यह हाल है कि Life होते हुए भी Lifeless मालूम पड़ती हूँ। पहले जब भी ख्याल करती थी तो तबियत को ‘मालिक’ की याद में अटका हुआ पाती थी, परन्तु अब मुझे यह भी नहीं मालूम पड़ता है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-131
लखीमपुर
2/1/1951
आज ताऊजी आराम से लौट आये। वैसे तो ‘आप’ की तबियत ठीक थी, परन्तु ताऊजी से मालूम हुआ कि ‘आप’ के पेट का दर्द बढ़ गया था। आशा है अब आराम होगा। ईश्वर ने हमें ‘आप’ के समय में जन्म देकर कृतार्थ कर दिया। मेरी तो बस यही प्रार्थना है कि ‘मालिक’ के चरणों में पड़ी हुई और उनकी पावन बाँहों की छाँव में पड़ी हुई मैं पूर्ण रूप से इस समय का लाभ उठा सकूँ और यदि ‘मालिक’ की इस गरीबनी पर हमेशा ऐसी ही कृपा-दृष्टि रही तो संसार में कोई भी अटक मेरे मार्ग में एक क्षण भी टिक न सकेगी और ‘मालिक’ ज़रूर इस गरीब पर कृपा और परवरिश करता ही रहेगा, इसमें शक नहीं। क्यों? यह ‘मालिक’ जाने। अपना हाल क्या लिखूँ? सब बातें सुनकर बस ऐसा लगता है, हर चीज़ की शुरुआत है। खैर, जिसने कृपा करके यह शुरुआत बख्शी है, वही धीरे-धीरे ठीक भी कर लेगा। अब कुछ ऐसा हाल हो रहा है कि ऐसी तबियत होती जाती है कि working में भी बस करने से मतलब, बाकी क्या हो रहा है, क्या Result निकल रहा है, इस तरफ़ तबियत ही नहीं जाती। ऐसे ही करीब-करीब सब बात के लिये हो जाता है। हालत यह है कि “चाकर को केवल चाकरी से काम”। शेष ‘मालिक’ जाने। पूज्य श्री बाबूजी! न जाने क्यों मेरी चाल में पहले जैसी तेज़ी नहीं आती। यद्यपि कोशिश में जहाँ तक हो सकेगी, कभी शिकायत का मौका यदि ‘मालिक’ की मर्ज़ी रही तो न आने पावेगा। वैसे मेरी समझ से तो पहले जोश की वजह से तेज़ी अधिक मालूम पड़ती थी, परन्तु अब वह जोश कुरेदना में बदल गया है, खैर, ‘आप’ जानें। नींद का तो यह हाल है कि यदि कहीं दर्द होता है तो सोती भी रहती हूँ और दर्द भी मालूम पड़ता रहता है। ‘मालिक’ की कृपा से जो माने आप ने ब्रह्माण्ड देश की विलायत के बताये हैं, इधर कुछ दिनों से तबियत उस हद तक ही पहुँचती है। खैर, ‘मालिक’ की मर्ज़ी।

छोटे-भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-132
लखीमपुर
7/1/1951
मेरा पत्र मिला होगा। यहाँ सब कुशल पूर्वक हैं, आशा है ‘आप’ भी सकुशल होंगे। मेरी हालत तो ऐसी लगती है कि मुझ से क्या कर्म हुआ करते हैं और क्या हो चुके हैं, इससे तो मुझे कोई मतलब ही नहीं रह गया या यों कहिये कि तबियत उस तरफ से बिल्कुल फिर ही गई है। यद्यपि यह हालत कई महीनों से बराबर चल रही है। परन्तु अब ऐसा लगता है कि साफ़ रूप में अब आई है और कुछ यह हो गया है कि जैसे छोटा बच्चा जब कहीं से जाता है या उसके पास से कोई बहुत दिन रह कर जाता है तो दो-एक दिन उसे याद आती है, फिर बिल्कुल भूल जाता है। उसी तरह का कुछ मेरा हाल हो गया है। मुझे शक्ल वगैरह भी भूल जाती है। अब जब अम्मा, जिज्जी व बच्चों की बातें करने लगती हैं, तब जैसे कुछ-कुछ उनकी सूरतें याद आने लगती हैं, परन्तु बात खत्म होते ही फिर वही हाल हो जाता है। यद्यपि यह हालत कुछ है बहुत महीनों से, परन्तु इसका भी शायद साफ़ रूप आता जाता है और क्या लफ्ज लिखूँ? मालूम नहीं। और कुछ अब यह होता है कि यदि मेरे सामने कोई बहुत खुश आता है, तो तबियत अपने आप ही भीतर खुश होने लगती है। वैसे ‘मालिक’ जाने। हर समय न जाने बेख्याल पड़ी रहती हूँ। भूलने की आदत का तो यह हाल हो गया है कि यदि अम्मा के संग कहीं बुलावे में चली जाती हूँ तो लौटने पर ऐसा लगता है, मानों न जाने किसके घर में घुसी जा रही हूँ। और यह भी तारीफ़ संग में है कि जितने जने संग में जाते हैं, उनको छोड़कर वापिस लौटने पर सब को भूल सी जाती हूँ या कुछ ही को। खैर, ‘मालिक’ जाने। जैसे चाहें, वैसे रखें। इधर कुछ दिनों से सोते में, न जाने क्यों रात में ख्याल आते रहते हैं। वैसे तो यह हाल है कि यदि जाग कर तुरत चलने लगूँ तो सिर चकराने लगता है। मालूम पड़ता है न जाने कितनी गहरी नींद या न जाने कहाँ से आई हूँ।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-133
लखीमपुर
12/1/1951
आप का कृपा पत्र जो पूज्य मास्टर साहब जी के नाम आया, उससे समाचार मालूम हुए। ईश्वर की कृपा से जो कुछ भी हालत है, सो लिख रही हूँ।

उदासी की हालत बड़े ज़ोरों से अब हर समय ही रहती है। कभी-कभी तो इसकी ऐसी शक्ल होती है कि यदि उसे गहरे अफसोस का Mood बिना रंज के समझ लिया जावे तो कोई हर्ज न होगा। जब ‘आप’ को अगला पत्र डाला था तो उसके बाद ४-५ दिन चाल में कुछ तेजी आ गई थी, परन्तु अब तो फिर कुछ धीमी पड़ गई। खैर ‘मालिक’ जैसे चलावे, ‘उसकी’ मर्ज़ी। और कुछ यह हाल हो गया है कि जैसे पहले कभी मैंने लिखा था कि सब में बैठी हुई, बार-बार सब को भूल जाती हूँ, परन्तु अब तो हर समय ऐसा हाल हो गया है कि संसार में सब लोग ही क्या सब चीज कुछ परछाई मात्र ही मालूम देती हैं। यहाँ तक कि अपना शरीर तक शायद एक परछाई या एक आकार मात्र ही रह गया है। और देखती हूँ कि अहं भाव भी, कभी-कभी को छोड़ कर एक परछाई मात्र समझ लिया जावे, तो शायद ठीक होगा। कुछ ऐसी बेख्याल, रूखी उदास हालत हर समय रहती है। आजकल की हालत तो ऐसी मालूम पड़ती है कि अब तो स्वप्नावस्था ही दिन रात चौबीसों घंटे रहती है। सात-आठ दिन हुए, जब शुद्धि वाला working कर रही थी तो ऐसा मालूम पड़ा कि तमाम कुछ गाढ़े कुहरे की तरह है और सब मजे में चल रहा है। यदि ‘मालिक’ की मर्ज़ी हुई तो उत्सव में ‘आप’ के दर्शन होंगे।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-134
लखीमपुर
24/1/1951
कृपा-पत्र ‘आप’ का, जो पूज्य ताऊजी के लिये, पूज्य मास्टर साहब के हाथों आया था, उसे सुन लिया। समझना तो मेरी सी मोटी बुद्धि वाले के लिये अत्यन्त कठिन है, खैर, मालिक जाने। ‘आप’ की तबियत ठीक सुनकर खुशी हुई। ईश्वर, बस ‘आप’ की बड़ी उम्र करे और स्वास्थ्य ठीक रखे और हमसे नादान बालक आत्मिक उन्नति में ‘आप’ के अभय हाथों की छाया में फलें फूलें तथा परवरिश पाते रहें। मुझे और कुछ नहीं चाहिये। न जाने क्यों श्री बाबूजी ! मेरी आत्मिक हालत तो आजकल कुछ अच्छी नहीं चलती मालूम होती। इधर १२-१४ दिन से दिन रात ख्याल आते रहते हैं। यद्यपि क्या ख्याल आते रहते हैं, यह मुझे नहीं मालूम है और न उनका मुझ पर कुछ असर ही रहता है। परन्तु आते ज़रूर हैं। मुझे आजकल अपनी हालत कोई खास उन्नति की नहीं मालूम पड़ती है। हाँ, विश्वास तो यह है और रहेगा कि मेरी आत्मिक उन्नति सदैव बढ़ रही है। कुछ ऐसी हालत मालूम होती है या शायद कोई गुत्थी वगैरह तो नहीं आ गई, मालूम नहीं क्या है। अब आप ही लिखेंगे तब मालूम होगा। पहले मैंने लिखा था कि स्वप्नावस्था ही चौबीसों घंटे रहती है। सोई अब है, या कुछ ऐसी हालत है कि दिन में बस कुछ-कुछ ऐसा लगता है कि जागती हुई हालत में भी सोती हुई सी हालत रहती है। उसको अब स्वप्नावस्था कह लीजिये या जो हो, यह ‘आप’ जानें। अब हालत working को छोड़कर सदैव Inactiveness सी रहती है। श्री बाबूजी ! कि सिवाय ‘मालिक’ के मुझे एक क्षण भी कुछ अच्छा नहीं लगता। और न मुझे कुछ चाहिये। परन्तु आजकल हालत न जाने कैसी है। भीतर-बाहर मुझे कहीं किसी में कुछ अन्तर नहीं मालूम पड़ता। पहले मैंने शायद लिखा था कि यदि कुत्ता और मुझे एक ही थाली में भोजन दे दिया जाये तो हम दोनों खुशी से खाते रहेंगे। परन्तु अब देखती हूँ कि यद्यपि न तो किसी से घृणा ही है, परन्तु न साथ खाने का ही शौक है। कुछ ऐसी हालत है कि जो हो सो हो। मानों किसी से कुछ मतलब ही नहीं है। ऐसी ही हालत सबके लिये है। अब तो न जाने क्या है और न जाने क्या नहीं है। शायद यह समझ लिया जावे कि सब कुछ अजीब धुंधली परछाई की तरह से हो गया है। ‘आप’ कृपया यह ज़रूर लिखियेगा कि मेरी हालत आजकल कुछ खराब तो नहीं है। और एक कुछ यह बात हो गई है कि रात में जब भी मेरी आँख खुलती थी, तभी सबसे पहले केवल मुझे ‘मालिक’ का ही ध्यान आता था, परन्तु अब तो थोड़ी देर बाद ही आता है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-135
लखीमपुर
29/1/1951
आशा है मेरा एक पत्र मिला होगा। मेरी आत्मिक हालत करीब १०-१५ दिन से खराब रही। कुछ उस तरह की मालूम पड़ती थी, जैसी कि पहले शायद एक स्टेज से दूसरी स्टेज बदले जाने पर बीच की हालत होती है। यद्यपि यह १०-१५ दिन बड़ी जबरदस्ती तथा कुछ थकान के से बीते हैं। परन्तु श्री बाबूजी ! ईश्वर ने कृपा करके कल से मेरी हालत को बदल दिया है। कल से हालत बदल गई है। ‘मालिक’ का बहुत-बहुत धन्यवाद है। मुझे तो बस केवल उसी का आसरा है, उसी का सहारा है। मेरे श्री बाबूजी ! चाहे कुछ भी हो, मुझे बस यही आशीर्वाद तथा ऐसी ही कृपा करें कि मैं अपने ‘मालिक’ को पूर्ण रुप से पाकर इस Time का पूरा-पूरा लाभ उठा सकूँ। यदि ‘मालिक’ की ऐसी ही अहेतु की कृपा बनी रही तो मेरी ओर से भी ‘आप’ को शिकायत का अवसर कभी न मिल सकेगा। बस खूब जल्दी-जल्दी बढ़े चलूँ। यही ‘आप’ की इस गरीब बिटिया की प्रार्थना है। वैसे तो अब कुछ यह हाल हो गया है, पूजा करने, या कराने पर न तो यही मालूम पड़ता है कि पूजा कर रही हूँ और न यही मालूम पड़ता है कि पूजा करा रही हूँ। हर काम का बस यही समझ लीजिये कि Automatic ही होते रहते हैं। खैर, मुझे उससे भी कोई मतलब नहीं। ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी हो, वैसे रखें।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-136
लखीमपुर
6/2/1951
हम लोग ‘मालिक’ की कृपा से आराम से पहुँच गये। अब अपनी आत्मिक हालत ईश्वर की कृपा से जो कुछ भी एहसास में आई है सो लिख रही हूँ। कुछ ऐसा हाल है कि चाहे Train पर बैठी हूँ या कहीं चली जाऊँ सब अपना ही घर मालूम पड़ता है और चाहे कोई भी पूजा करने आता है, या यों समझ लीजिये कि सब अपने ही लगते हैं। और इसी कारण शायद न किसी से कुछ संकोच होता है, न कुछ। परन्तु फिर भी यह देखती हूँ कि न जाने क्यों अपने लगते हुए भी कुछ ऐसी लापरवाही की सी हालत रहती है कि सब से अलग होने पर, फिर किसी का जरा भी ख्याल तक नहीं आता है। भाई, और क्या कहूँ? जिज्जी जब तक यहाँ रहीं, तब तक तो बड़ा ख्याल तथा उनसे बड़ा हेल-मेल लगता था, परन्तु अब उनकी शकल तक याद नहीं आती। हाँ, जब उनका पत्र आता है, या जब कभी उनकी बातें होती हैं, तो कुछ ख्याल सा भी हो आता है, परन्तु कुछ यह भी समझ में नहीं आता कि न जाने किसकी बातें हो रही हैं और मज़ा यह भी है कि उनकी बीमारी की बात सुनकर कुछ फिक्र भी हो जाती है। क्या कहूँ किसी से मिलती हूँ, जैसे जिया वगैरह से, तो कभी-कभी कुछ शर्म सी मालूम होने लगती है कि क्या “मुहँ देखे की प्रीति” वाला हाल है। खैर, इससे मुझे क्या? मुझे तो जैसे ‘मालिक’ रखेगा, वैसे रहूँगी। और कुछ यह हो गया है जैसे पहले मैंने कहीं लिखा है कि जब सो कर उठती हूँ तो ऐसा मालूम पड़ता है कि कहीं परदेश से आई हूँ। ऐसे ही दिन में जब पूजा में या ऐसे भी कभी बैठे-बैठे ज़रा सी आँख यदि मूंद लेती हूँ तो ऐसा ही कुछ झटका सा लगता है, और वैसा ही मालूम पड़ता है। वैसे भी दिन भर में कुछ उसी तरह का हाल रहता है। कुछ यह हाल है कि कहीं चली जाऊँ तो या जैसे शाहजहाँपुर से चली थी, तो मन में तो ‘आप’ से अलग होने का बुरा भी लग रहा था, परन्तु फिर भी अफसोस को अधिकतर भूल जाती थी और भीतर ही भीतर मालूम पड़ता था। क्योंकि कुछ ऐसा हाल है कि ‘मालिक’ की कृपा से ‘मालिक’ से अलहदगी एक क्षण को भी नहीं मालूम पड़ती है। तबियत अधिकतर बड़ी Innocent सी हो जाती है। नींद का कुछ यह हाल है कि जैसे जागने में ‘आप’ से बातें करती हूँ, वैसे ही रात में सोते में भी लगती है, यद्यपि सपने में ही बाते करती हूँगी। परन्तु यह नहीं मालूम पड़ता कि सपने में हो रही हैं।

छोटे भाई-बहनों का प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-137
लखीमपुर
20/2/1951
मेरा एक पत्र मिला होगा। आशा है कि ‘आप’ अच्छी तरह से होगें। पूज्य ताऊ जी तथा हम लोगों पर परम् पूज्य ‘आप’ की कितनी अहेतु की कृपा हुई है, हो रही है और होगी, इसको न तो कोई जान सकता है और इसलिये ‘आप’ को केवल धन्यवाद के और क्या कहा जावे। हाँ, कोशिश अवश्य है, आगे ‘ईश्वर’ मालिक है, परन्तु नहीं ! जो ठान लिया है, सो ‘मालिक’ की कृपा से सफल अवश्य होगा। ‘आप’ ने जो कृपा की है, वह तो केवल ‘आप’ ही की शान है, तकदीर वाले हम ज़रूर हैं। अब ‘मालिक’ की कृपा से आत्मिक-दशा जो समझ में आई है, सेवा में निवेदन कर रही हूँ।

पहले तो न जाने क्या बात है कि जब ‘आप’ की अंग्रेजी वाली पुस्तक पढ़ने लगती हूँ तो न जाने तबियत कहाँ चली जाती है और यद्यपि तबियत न जाने कहाँ चली जाती है, परन्तु फिर भी उस समय समझती भी हूँ, परन्तु जहाँ पढ़ना खत्म करती हूँ तो ऐसी Absent minded हो जाती हूँ कि एक कुछ झटके के बाद सब कुछ भूल जाती हूँ। खैर ‘मालिक’ जाने। अब तो भाई, कुछ यह हाल हो गया है कि इस दुनिया में रहती हुई भी मैं यहाँ नहीं रहती हूँ। न जाने कहाँ रहती हूँ, यह भी नहीं मालूम। यद्यपि यह हालत कुछ-कुछ तो पहले से ही है, परन्तु अब तो यह कुछ Free हालत सी है। हाँ, यह हालत कुछ उस तरह की समझ लीजिये, तो शायद ठीक हो सकती है कि जब जिस हालत पर ‘आप’ ने लिखा था कि तुम सुषुप्ती की हालत में तेज़ जाती हो। अन्तर इतना ही है कि अब यह हालत हर समय की हो गई है। वैसे ‘आप’ जानें। कुछ यह बात है कि तबियत जहाँ भी रहती है उससे हटने को नहीं चाहती। यद्यपि ‘मालिक’ की कृपा से इस गरीबनी को तो केवल ‘मालिक’ की चाह है। बस, उसी की विनती है। अधिकतर तबियत ऐसी हो जाती है कि न तो कुछ काम करने की तबियत होती है, न ही और कुछ। कुछ World से पृथक रहने की सी हालत रहती है। Absent Mindness ही आजकल की खास हालत समझिये। श्री बाबूजी ! न जाने यह क्या बात हो गई है, कि जैसे ‘मालिक’ का ध्यान अपने शरीर में हर समय रहता था, परन्तु जब नहीं टिकने लगा तो भी जबरदस्ती किसी न किसी प्रकार चालू रखे ही रही। परन्तु अब न जाने क्या हो गया है कि अपना शरीर मय आकार, एकदम से गायब हो गया है। अब कैसे ध्यान करूँ? परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से ध्यान अपने आप ही अपने भीतर ही कहीं और टिक गया है। ‘मालिक’ की कितनी कृपा है, कह नहीं सकती बस, मुझे तो ‘मालिक’ से मतलब है। जैसे भी हो, वैसे हो।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-138
लखीमपुर
2/3/1951
मेरा एक पत्र मिला होगा। आशा है ‘आप’ अच्छी तरह से होंगे। ईश्वर की कृपा से जो कुछ आत्मिक-दशा आजकल है, सो लिख रही हूँ। न जाने क्या बात है कि हर समय ख्याल से आते रहते हैं। यद्यपि उनका मुझ पर कुछ Impression तो नहीं पड़ता और कभी-कभी तो मैं यह समझ भी नहीं पाती कि यह ख्यालात हैं या क्या है। परन्तु फिर भी दिमाग कभी-कभी परेशान सा हो जाता है। कभी ख्याल आता है और ऐसा आता है कि या तो उस ख्याल के कारण या कैसे भी वही चीज़ सामने मालूम सी पड़ने लगती है कि तमाम आग लगी हुई है, कभी वायु में बैठे तमाम हल्ला-गुल्ला सा मालूम पड़ता है। कभी-कभी बेकार को कुछ अफ़सोस वगैरह मालूम होने लगता है। कभी-कभी फिर शान्तिमय सा मालूम पड़ने लगता है। न जाने क्या होने वाला है। कहाँ तो एक भी ख्यालात का मुझमें महीनों पता तक नहीं रहता था, हर समय तबियत को केवल ‘मालिक’ को छोड़कर दूसरे ख्याल का नाम तक नहीं रहता था। अब न जाने क्या बात हो गई है, कुछ समझ में नहीं आता और न जाने क्या बात हो गई है कि इधर न जाने कितने दिनों से तबियत उचाट सी रहती है। हर तरफ़ से, हर समय, हर चीज़ से उचाट रहती है । यदि कोई मुझसे कुछ बात करने लगता है तो झुंझलाहट सी आने लगती है। इस हाल को बराने के लिये उपाय करती हूँ, परन्तु कुछ मिनटों को छोड़कर तबियत संभालने में असमर्थ ही रहती हूँ। न जाने यह भी कोई हालत है या न जाने क्या बात है। अपने अन्दर जो हर समय एक आनन्द तथा शान्ति की अविचल धारा सी बहती रहती थी, या यह समझ लीजिये कि यह मामूली बात थी, परन्तु अब भीतर बाहर उसका कहीं पता नहीं रहता है। मेरे परम पूज्य महात्मन, मैं अपने ‘मालिक’ से खूब प्रेम, जितना चाहिये, उतना नहीं कर पाती, खैर अब ‘उसकी’ जैसी मर्ज़ी। अब तो केवल ‘मालिक’ की चाह के मुझे कहीं कुछ दिखता नहीं कुछ मालिक की कृपा है हालत भी ऐसी ही है कि मुझे अन्धी कहने में कोई हर्ज़ न होगा। प्रेम हो या न हो, मुझे ‘मालिक’ चाहिये। और जैसे ही होगा, एक दिन ‘वह’ ज़रूर आयेगा कि ‘मालिक’ को मैं पूर्णतया प्राप्त करूँगी और मुझे कुछ मतलब नहीं, जैसे चाहे वह रखे। परन्तु इधर यह उचाट हालत हर समय न जाने क्यों रहती है। कुछ यह देखती हूँ कि जब हालत बदलती है तो और तो कुछ मैं जानती नहीं, अहंता के रुप में परिवर्तन हो जाता है या यों कह लीजिये कि जब अहं भाव का रूप बदलता है, तभी हालत का परिवर्तन मालूम पड़ता है पूज्य श्री बाबूजी ! उचाट और उदास हालत ही मेरी हर समय की हालत हो गई है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,

पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-139
लखीमपुर
3/3/1951
तुम्हारे सब खत मिल गये। तुम्हारी हालत के विषय में केवल यही लिखना है कि तुम फ़नायेफ़ना की कैफ़ियत से पार हो चुकी हो और अब बका की हालत में दाखिल हुई हो। जितनी तेज़ हालत फ़नायेफ़ना की होती है, उसी मिक़दार में उसको बक़ा ईश्वर के दरबार से मिलती है।

भाई-बहनों को दुआ। अम्मा को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-140
लखीमपुर
4/3/1951
कृपा पत्र ‘आप’ का जो पूज्य मास्टर साहब जी के नाम आया था, सो सुनकर तबियत खुश हुई, परन्तु ‘आप’ की तकलीफ़ तथा ‘आप’ रूहानी लाभ न पहुँचा सकेंगे, सुनकर अफ़सोस तथा फ़िक्र हुई। चाहे जो हो, आप हमें रूहानी लाभ से एक क्षण को भी वंचित न रखें। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

कुछ यह हाल है कि अब ख्यालात वगैरह तो कम हो गये हैं या कुछ रूप बदल गया है, परन्तु उचाट वाली हालत गाढ़ी होती चली जाती है। मन क्या चाहता है? कुछ हाल यह है कि चुपचाप बिल्कुल शान्त या सुस्त हालत में काम करती रहती हूँ, बल्कि ऐसी ही कुछ आदत पड़ती जा रही है। कुछ यह है कि न हंसी वाली बात पर हँसी आती है, यद्यपि हँसती ज़रूर हूँ। भीतर से तबियत हर समय सुस्त सी रहती है। सुस्त कह लीजिये या कुछ अजीब तरह की हालत है। पहले मेरी निगाह करीब-करीब हर समय अपने भीतर ही टिकी रहती थी, परन्तु अब मुझे नहीं मालूम कि क्या हो गया है। अब मुझे कहीं कुछ दिखाई नहीं देता, न सामने कुछ महसूस होता है। परन्तु फिर भी, यह न समझियेगा कि कुछ काम में या व्यवहार में ‘मालिक’ जैसा चाहता है, वैसा ही बना है। कुछ दिखाई नहीं देता के माने ये है कि संसार में सामने जितनी भी चीजें हैं, या आदमी हैं, क्या घर के, क्या बाहर के, कोई भी नहीं दीखता है। खैर, ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। आज से ‘मालिक’ की कृपा से हालत फिर कुछ बदलती हुई मालूम पड़ती है, वैसे आप जानें।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-141
लखीमपुर
12/3/1951
मेरा एक पत्र मिला होगा। ‘मालिक’ की कृपा से आजकल जो आत्मिक-दशा चल रही है, सो लिख रही हूँ। जिस दिन ‘आप’ को अगला पत्र लिखा था, उस दिन से तबियत में उचाटपन बहुत कम हो गया है। ऐसा हाल रहा, कभी-कभी हो गया, कभी फिर अपने आप ही ठीक हो गया। अब उचाटपन तो नहीं है, परन्तु कभी-कभी कुछ उससे ही मिलती जुलती दशा हो जाती है। वैसे आजकल की हालत को न अच्छे ही कहते बनता है, न बुरा ही कहते बनता है। अजीब हाल है। तमाम कोशिश करने पर भी ‘मालिक’ की सूरत तथा याद किसी तरह भी उन्हीं कुछ मिनटों को छोड़कर नहीं बन पाती है और अब कुछ यह भी नहीं मालूम पड़ता है कि अपने आप ही याद हो रही है। इस कारण और भी फ़िक्र लगी रहती है, परन्तु कुछ वश नहीं चलता। इसलिये भाई ! ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। क्या हालत है मेरे बाबूजी। लय-अवस्था का कहीं पता नहीं है। यदि अशान्ति नहीं है तो शान्ति वाली दशा का भी भीतर-बाहर कहीं पता नहीं। अब यही हालत अधिकतर रहा करती है। फिर अब इसका निर्णय आप ही करिये कि इस हालत को बुरा कहा जावे या अच्छा। हाँ, बुरा यों नहीं कहते बनता कि चीज़ तो ‘मालिक’ ने ही दी है, फिर वह खुद को चाहे जैसी लगे। फिर भी ईश्वर की कृपा से हालत आज से कुछ-कुछ बदली हुई सी मालूम पड़ रही है। एक बात मैंने यह और देखी है श्री बाबूजी, कि न जाने क्यों इधर दो-तीन दिन को अपनेपन का एकदम उभार सा आ गया। यद्यपि उसका असर वसर तो मुझ पर कुछ मालूम नहीं पड़ता। खैर, चाह तो बस एक अपने ‘मालिक’ की ही है, यदि वह कभी सुन ले और आशा भी यही लगा रखी है कि सारे खाई-खंदकों से निकाल कर, कृपा करके ‘वह’ मुझे पूर्णतयः मिलेगा अवश्य।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-142
शाहजहाँपुर
14/3/1951
खत तुम्हारा मिला। तुमने जो उचाट वाली हालत के विषय में लिखा, वह वाकई में उचाट हालत नहीं है, बल्कि उसे Whole hearted attention कहना चाहिये और झुंझलाहट भी इसी कारण से होती है, कि जब कोई बात करता है, तो तबियत को उस हालत से हटना पड़ता है, जो नागवार होता है। यह जो ख्याल तुम्हें आते हैं, वह वाकई तुम्हारे ख्याल नहीं हैं, बल्कि वह तुम्हारे विराट् देश में फैलाव का सबूत है और यह जो आग लगना, हल्ला सुनना आदि है, यह वह वारदातें हैं, जो वाकई में सब तरफ हो रही हैं। जो हालत २ मार्च के खत में लिखी है, वह वास्तव में असल शान्ति का तलछट है। तुमने लिखा है कि – “बका की हालत खुल रही है”। बका की हालत को तुरिया की हालत कह सकते हैं, क्योंकि जब मैं बका की हालत और तुरिया की हालत पर गौर करता हूँ तो एक ही पाता हूँ।

भाई-बहनों को दुआ। अम्मा को प्रणाम।


तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-143
लखीमपुर
16/3/1951
कृपा-पत्र आप का आया, सुनकर प्रसन्नता हुई। हम सब वास्तव में बड़भागी हैं और ईश्वर की हम पर असीम कृपा है, जिसने हमें या जिन्हें भी ‘आप’ पर विश्वास एवं प्रेम है, इस Golden Age of spirituality में जन्म देकर कृतार्थ कर दिया। अब यह हमारी बात है कि हम इस समय से लाभ उठायें और भरपूर लाभ उठायें। हम अपने परम पूज्य महात्मन् श्री लाला जी के परम आभारी हैं, जिन्होंने हमारी उन्नति के लिये हमें ऐसी महान् हस्ती प्रदान की है। बस मेरी प्रार्थना सदैव उनसे व ‘आप’ से यही रही है और यही है कि बस अपने ‘मालिक’ की इस गरीब भिखारिनी पर सदैव ऐसी ही कृपा बनी रहे। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ। इधर कुछ दिनों तो यह हाल रहा कि दो दिन तो हालत बदली हुई मालूम पड़ती है और फिर वही हाल हो जाता है। वह झुंझलाहट वगैरह तो कब की खत्म हो चुकी है। वैसे न जाने क्या बात है इधर दो-तीन दिन से कभी-कभी अपने अन्दर ही अन्दर खुशी मालूम होने लगती है। परन्तु अब कल से तो वह बात काफी बढ़ चुकी है। हालत बदलने का जो मैंने ‘आप’ को लिखा था, यह माने मालूम पड़ते है कि जब हालत थोड़ी देर को कुछ साफ़ निखरी हुई सी मालूम पड़ती है, तभी शायद मालूम पड़ता है कि हालत बदलने लगी, परन्तु देखती हूँ कि अभी जो भी हालत है, वह साफ रुप में नहीं आई है। और कुछ यह देखती हूँ कि मेरी जो भी, जैसी भी हालत है, तबियत को भीतर ही भीतर अच्छी मालूम पड़ती है। या यों कह लीजिये कि अच्छी लगे या न लगे, परन्तु तबियत उसे छोड़ना नहीं चाहती। यह ‘मालिक’ जानें, ‘उसका’ काम जाने। और कुछ यह है कि उचाटपन की हालत, जो मैंने लिखी थी, वह शायद धीरे-धीरे मुझे पचने लगी है, या यह कह लीजिये कि तबियत को उसकी आदत पड़ गई है। हाँ, कभी-कभी भीतर ही भीतर खुशी इतनी बढ़ी हुई मालूम पड़ती है कि ऐसा लगता है कि दिल से बाहर निकली जा रही है। यह हाल तो ता.१४ तक का रहा। अब कल से जो हाल है, लिख रही हूँ। अब तो ऐसी दशा हो जाती है कि जी चाहता है कि कलेजा पकड़े हर समय मन ही मन में, अकेले में खुश ही होती रहूँ। कलेजे भर में तमाम गुदगुदी ही गुदगुदी मची रहती है। खुशी के माने यह नहीं है कि मैं हर समय हँसती ही रहती हूँ या हसूँ, वरन् ऐसा होता है या लगता है कि भीतर आत्मा को शायद न जाने क्यों खुशी हो रही है। हाँ, जैसा मैंने ता.१४ तक के हाल में लिखा है कि जो भी हालत हो वह अभी साफ़ रुप में नहीं आई है। परन्तु ‘मालिक’ की असीम दया से अब यह बातें तो नहीं मालूम पड़ती, वैसे ‘मालिक’ जानें। ‘आपने’ जो लिखा है कि ग्लानि नहीं होनी चाहिए, बल्कि ईश्वर का धन्यवाद देना चाहिए। सो तो जब से ‘आपने’ पहले एक बार कभी लिखा था, तब से ग्लानि वगैरह तो मेरे पास फटकती भी नहीं, परन्तु यह अवश्य है कि जब याद ठीक नहीं बन पड़ती तो तबियत फड़फड़ाती रहती है। उस खुशीवाली हालत की भी यदि तह में देखा जावे तो बेचैनी ही निकलेगी। कभी-कभी तो इस बेचैनी के लिये भी बेचैन होना पड़ता। इतिः-

आपका दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-144
लखीमपुर
21/3/1951
आशा है मेरा एक पत्र मिला होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ। कल से हालत खुली हुई मालूम पड़ती है। न जाने अब यह क्या बात है कि कभी-कभी जैसे माथे में पहले खोखलापन और बड़ी गुदगुदी सी मालूम पड़ती थी, वैसे ही अब कभी-कभी ठीक बीचों बीच पीठ में करीब आठ अंगुल के बीच में बड़ी गुदगुदी और बिल्कुल खोखलापन मालूम पड़ता है। कुछ यह बात है कि जैसे पहले, चाहे जितनी भी किसी से बात करूँ या कुछ फिर भी तबियत को हर समय कहीं ऊंचे पर ही अटका पाती थी, परन्तु अब तो यह बात भी बिल्कुल नहीं लगती और यही हाल ‘मालिक’ की याद का हो गया है कि अब मुझे यह भी नहीं मालूम पड़ता कि अपने आप ही याद हो रही है। कुछ यह हाल हो गया है कि जैसे पहले अपने घर के हों या बाहर वाले, मुझे सब अपने ही लगते थे और जो कोई ‘मालिक’ की बात करता था, सो तो बिल्कुल अपना ही लगता था, परन्तु अब देखती हूँ कि चाहे कोई कुछ कहे और चाहे कोई हो, अब किसी के प्रति न तो अपनापन ही लगता है, न कुछ पराया ही। बस मन में बिल्कुल बुत बनी बैठी रहती हूँ या यों कह लीजिये कि मुझमें किसी के प्रति कोई भाव वगैरह एक क्षण को भी नहीं लगता है, या नहीं आता है। कुछ यहाँ तक है कि जैसे मैं जानती भी होऊँ कि यह बुरे लोग हैं, परन्तु फिर भी ‘मालिक’ की कृपा से उनके प्रति भी भीतर से मन में न तो कोई घृणा या बुरा भाव ही होता है, इसलिये व्यवहार भी सब के साथ वैसा ही होता है, कोई अन्तर नहीं पड़ता है। भाई, सच बात तो यह है कि अच्छा-बुरा कुछ मालूम ही नहीं पड़ता है। और वास्तव में होता भी शायद नहीं होगा। और अच्छाई-बुराई का सवाल ही कहाँ है। जब कि ‘मालिक’ की कृपा से हाल यह है कि मुझे कहीं कुछ दिखाई ही नहीं देता। कोई चीज़ या मनुष्य बिल्कुल महसूस तक नहीं होता। कोई शक्ल मुझे नहीं दीखती। यदि आप मुझसे यह प्रश्न करें कि तुमने मास्टर साहब को देखा था, तो चाहे वे मुझे Sitting भी दे गये हों, परन्तु मेरा अन्तर तो नहीं ही में मिलेगा। कोई भाव वगैरह भी मुझमें नहीं रह गये हैं। वह भी कृपा करके ‘मालिक’ ने ले लिया है। खैर, ‘उसकी’ जैसी मर्ज़ी। मुझे कुछ चाहिये भी तो नहीं। बस एक ही केवल एक ‘मालिक’ ही चाहिये। यह जो कुछ भी है, केवल मेरे ‘मालिक’ की ही, मुझ सी जाहिल पर भी, अहेतु की कृपा का फल है। इधर दो-तीन दिन से हालत शुद्ध या Innocent सी मालूम पड़ती है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-145
लखीमपुर
26/3/1951
आशा है मेरा एक पत्र ‘आप’ को मिला होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक-दशा है, सो निवेदन कर रही हूँ। मैंने अगले पत्र में खुशी के बारे में लिखा था, सो तो कब की गायब हो गई है। पूज्य महात्मन् न जाने क्यों मैं इधर कई दिनों से अपने में ‘मैं पना’ बढ़ा पाती हूँ और ऐसा कि अपने बस का नहीं मालूम पड़ता। शायद यह भी कोई हालत होती होगी। मैंने कभी ‘आप’ को लिखा था कि मुझे ‘मालिक’ में और अपने में बिल्कुल एकता लगती है। और सच में श्री बाबूजी ! वह हालत मुझे बड़ी अच्छी लगती थी, परन्तु वह कम पड़ती गई और इधर तो करीब महीने डेढ़ महीने से वह हालत बिल्कुल गायब हो गई। एक क्षण को भी नहीं आती है। अब न जाने क्या हो गया है कि मुझे ‘मालिक’ में न तो बिल्कुल एकता ही लगती है और न जरा भी प्रेम लगता है और न वह Link ही मालूम पड़ती है, जो मुझे हर समय मालूम पड़ती थी। और शायद इसी कारण से मुझे अपने में ‘मैं पना’ बढ़ा हुआ लगता है। परन्तु फिर भी हालत ‘मालिक’ की कृपा से अच्छी ही होगी। या यों कह लीजिए कि मन को ऐसी ही आदत सी पड़ गई है। और न जाने यह क्यों हो गया है कि जब से मैंने वह हालत लिखी थी कि शरीर मय आकार के एकदम गायब हो गया है, तब से ‘मालिक’ का ध्यान जैसे हर समय अपनी जगह ‘वहीं’ दिखलाई पड़ता था, सो बिल्कुल एक क्षण को भी नहीं हो पाता, परन्तु फिर भी ‘मालिक’ ही ‘मालिक’ की रटना है। पूज्य श्री महात्मन् ! अब भी ‘वह’ जैसे भी हैं, जहाँ भी है, है वह ज़रूर। अब यह ‘उसकी’ मर्ज़ी, जैसे भी वह रहे और जिस हालत में मुझे रखे। और अब कुछ यह हो गया है कि sitting लेने व देने में एक सी ही दशा रहती है। न मालूम पड़ता है कि दे रही हूँ, न यह मालूम पड़ता है कि ले रही हूँ। यद्यपि यह हालत शुरु तो पहले से है, परन्तु अब तो बिल्कुल खत्म है। और जो भी पूजा करता है, न जाने क्यों अब उसकी तबियत उतनी अच्छी नहीं लगती, जितनी पहले लगती थी और ‘मालिक’ की कृपा से उन्हें अब नींद की शिकायत भी अधिकतर नहीं होती। कृपया ‘आप’ यह ज़रूर लिखियेगा कि तबियत अच्छी न लगने की वज़ह मेरी कुछ गलती तो नहीं है, यद्यपि है नहीं। नींद का वही हाल हो गया है, जो पूजा शुरु करने से पहले था। बेकार के स्वप्न दीखते हैं। अर्थात उनसे मेरा कोई मतलब नहीं होता। फिर भी ‘मालिक’ की कृपा से ही उन्नति हो रही है, इसमें शक नहीं है। और ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी, कह भर लेती हूँ, वरना हालत तो अब वह भी नहीं मालूम पड़ती।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। केसर, बिट्टो ‘आप’ को प्रणाम कहती हैं तथा अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती हैं।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-146
शाहजहाँपुर
3/4/1951
खत तुम्हारे सब मिल गये। हाल मालूम हुआ। तुमने जो यह लिखा है कि “मुझमें प्रेम वगैरह बिल्कुल नहीं है” इसका उत्तर यही है कि ज्यों-ज्यों फ़नाइयत बढ़ती जावेगी, त्यों-त्यों यही बात मालूम पड़ती रहेगी। मैंने लिखा था कि तुम्हारी फ़नायेफ़ना की बका की कैफ़ियत खुल रही है, और भाई, बका में भी तो फ़ना होता है।

तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ। अम्मा को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-147
लखीमपुर
3/4/1951
मेरा पत्र मिला होगा। ‘आप’ का कोई समाचार बहुत दिनों से नहीं मिला है, इसलिये सब को फिक्र है। आशा है ‘आप’ अच्छी तरह से होंगे। ताऊजी से मालूम हुआ कि आप जगन्नाथपुरी को भी पवित्र करने के लिये वहाँ भी पधारेंगें, फिर भी आशा है ‘आप’ २६-२७ अप्रैल तक अवश्य लौट आयेंगे। यदि असुविधा न हो तो लौटते समय एकाध दिन यहाँ आराम करते हुए फिर शाहजहाँपुर जायें। यह यहाँ पर सबकी हार्दिक इच्छा है। वैसे जिस तरह ‘आप’ को सुविधा तथा आराम मिले, वही हमारी इच्छा तथा प्रार्थना है।

अब तारीख २८ मार्च से जो हाल है, वह निवेदन कर रही हूँ। न जाने यह क्या बात है कि भूल की अवस्था जो महीनों से मुझमें नहीं मालूम पड़ती है, तथा यही हाल लय-अवस्था का भी हो गया है, कि अब तक बराबर कोशिश करने पर, उतनी देर को दोनों अवस्था महसूस होती थी, परन्तु अब तो यह हाल है कि यद्यपि है मुझमें एक भी नहीं, पहले से भी साफ़ हूँ, परन्तु अब यदि कोशिश जितनी देर को करती हूँ तो ऐसा लगता है, मानों उस हालत से उतनी देर को अलग हो रही हूँ और बुरा लगता है। अब बताइये, “ज्यों दवा की त्यों मर्ज बढ़ा” का क्या इलाज हो। खैर, श्री बाबूजी ! जिस हाल में हूँ खुश हूँ। न मुझे किसी हालत की चाह है, न कुछ, बस चाह केवल एक ही है, वैसे ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी।

तारीख ३० मार्च से न जाने क्या बात है, सारी पीठ में, रीढ़ में तथा उसके इधर-उधर की हड्डीयों के नीचे तमाम सुरसुराहट, गुदगुदी तथा रेंगन सी होती रहती है। सारी पीठ में ऊपर नीचे, अधिकतर ऊपर यह बात अधिक मालूम पड़ती है। तथा बड़ा हल्कापन और खोखलापन मालूम होता है, गर्दन में पीछे, जहाँ से रीढ़ शुरु होती है, परन्तु खास कर यह दशा Heart के ठीक पीछे वाली पीठ में अधिक मालूम पड़ती है। परन्तु अब यह बात, जैसे Heart आगे है, उसी जगह पीठ में तथा बाँयें कंधे के नीचे यह गुदगुदी तथा सुरसुराहट करीब-करीब हर समय मालूम पड़ती है, वैसे पीठ में और जगह भी होती है। इस दशा के अलावा भी उस दिन से कुछ और हालत बदली हुई है। अब तो भाई, न जाने क्या बात है कि शरीर तो बिल्कुल Free मालूम पड़ता है। हर काम तथा हर बात में बिल्कुल Free लगता है। जो मन आया, सो किया और यहाँ तक कि ऐसा मालूम पड़ता है कि साधना, पूजा आदि तो कभी इससे हुई ही नहीं। खैर, ‘मालिक’ की मर्ज़ी।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-148
लखीमपुर
7/4/1951
हरिदद्दा से तथा ‘आप’ के पोस्टकार्ड से सब समाचार मालूम हुए। मेरी आत्मिक-दशा तो ‘मालिक’ की असीम दया से अच्छी ही है। फिर आज ‘आप’ ने भी लिख दिया है। इस गरीबनी पर तो जन्म से ही ‘मालिक’ की कृपा रही है और विश्वास है कि सदैव ऐसी ही कृपा रहेगी। मुझे जैसे पहले फैलाव वगैरह मालूम पड़ता था, परन्तु अब वह भी खत्म है। जैसा मैंने अगले पत्र में लिखा था, पीठ में गुदगुदी, खोखलापन तथा कुछ सुरसुराहट सी, वह अब भी मौजूद है, परन्तु अब अधिकतर पीठ में बाई ओर कंधे से नीचे तक तथा बीच रीढ़ में यह चीज़ करीब-करीब हर समय मालूम पड़ती है। और अभी कोई खास हाल नहीं मालूम पड़ा। अब आप के लौटने पर लिखूँगी। शरीर की Freeness का तो अब यह हाल है कि हर काम, हर बात Free निकलती है और फिर उस तरफ कोई ख्याल भी नहीं रहता। ‘आपने’ शरीर को तो भाई, खूब Free किया है। इससे तो ऐसा मालूम पड़ता है कि न तो कभी कुछ पूजा, साधना हुई है, बस उससे भी Free है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-149
लखीमपुर
27/4/1951
आशा है लम्बे Tour के बाद सबको अपने दर्शन व अपनी उपस्थिति से कृतार्थ करते हुए आप अब शाहजहाँपुर पहुँच गये होंगे। वास्तव में वे ही दिन, वे ही क्षण मनुष्य का वास्तविक जीवन है, कि जो दिन, जो क्षण उसके ‘आप’ पर विश्वास के सहित आप के साथ तथा ‘आप’ के दर्शन करते हुए बीतें हैं अथवा बीतेंगे। और उनका तो कहना ही क्या होगा जो केवल ‘मालिक’ की खातिर सर्वस्व न्योछावर कर चुका हो अथवा करने की कोशिश करता हो। यदि ‘मालिक’ की ऐसी ही कृपा रही तो एक वह भी दिन अवश्य आयेगा, जब इस गरीब भिखारिन की भी कोशिश सफल होगी। खैर, आशा है इतने सफर के बाद भी ईश्वर की कृपा से ‘आप’ की तबियत ठीक ही होगी। यद्यपि थकान तो बहुत आ गई होगी और शायद इसी कारण आप यहाँ नहीं पधार सके, फिर भी यहाँ सबको ‘आप’ के आज आने की बहुत आशा लगी हुई थी, परन्तु कल बड़े भईया आ गये। उनसे मालूम हो गया कि ‘आप’ अभी यहाँ नहीं पधार सकेंगे। कल ‘मालिक’ की कृपा से ‘आप’ का जन्मोत्सव भी सानन्द सम्पन्न हो गया। अब ‘मालिक’ की कृपा से, ‘आप’ शाहजहाँपुर से बाहर गये हैं, तब से अब तक जो भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ यह हाल हो गया है कि जैसे पहले यदि मैं किसी काम में या बात वगैरह में लग जाऊं तो पीछे मुझे बड़ा अफ़सोस तथा कुछ थोड़ा सा असर या कुछ और कहिये मालूम पड़ता था, परन्तु देखती हूँ कि अब यह बात नहीं है। अब घर से आठ दिन बाहर रही, परन्तु कुछ नहीं। मुझे जब कोई पुजारिन कहता है, तो मेरी समझ में ही नहीं आता कि यह सही कह रहा है। लोग तो पहले की तरह समझ कर कहते हैं। खैर, ‘मालिक’ जाने, वे ठीक कहते हैं या गलत। ऐसे ही कभी जब किसी काम की या बात की कुछ तारीफ़ सुनती हूँ तो, यद्यपि न तो मुझे मन में कुछ शर्म का सा ही भाव मालूम पड़ता है और न कुछ समझ में ही आता है। यही हाल तब भी रहता है, यदि कुछ गलती हो जावे तो मुझे कोई बुरा-भला कहने लगे। श्री बाबूजी ! तारीफ़ सुनने पर शर्म आनी चाहिये परन्तु न जाने यह क्या हाल है। खैर, मुझे इसकी भी कुछ परवाह नहीं। ‘वह’ जैसा चाहे रखे। ‘वह’ जैसा कि मैं पहले हालत शायद लिख चुकी हूँ कि हालत बिल्कुल Free है। यदि Free रखना चाहता है तो Free रखे, मुझे क्या करना। और एक बात कुछ यह भी हो गई है कि न तो तबियत इस ओर ही जाती है कि सब काम कौन कर रहा है? किसके द्वारा हो रहे हैं? बस, सब काम Automatically होता मालूम पड़ता है। परन्तु इधर महीनों से यह Automatically का ख्याल भी खत्म हो गया है। अब तो किसी ओर ध्यान ही नहीं जाता और खुद ही न इस तरह के कोई विचार ही उठते हैं। अब तो भाई ! जो है, सो है। ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी अब तो मुझमें से दीनता महीनों से गायब है। यद्यपि यह भी नहीं है कि दीनता के बजाय कुछ अमीरपना हो या कुछ और सो भी कुछ नहीं है। सच तो यह है कि कुछ तो चिकना घड़ा थी ही, परन्तु जब से बका की हालत चली है, तब से तो इसने बिल्कुल ही साफ़ कर दिया। अब जैसे मैं कानपुर और इटावा गई तो वहाँ ‘मालिक’ की याद की शायद कोशिश भी कम हो गई, परन्तु हाल वहाँ भी यही रहा और यहाँ भी यही है कि जैसे कुछ बात ही नहीं हुई हो, मैं कहीं गई ही नहीं। पहले मैं देखती थी कि यदि मैं जरा भी देर को याद भूल जाती थी तो बड़ा दुख होता था, परन्तु अब यदि भूल जाती हूँ तो जैसे कोई बात नहीं। इसलिये भाई ! आजकल की हालत का सार तो है चिकना घड़ा। और कुछ यह हाल हो गया है कि मैं चाहे कहीं चली जाऊँ, तो वहीं मुझे अपने घर की तरह मालूम पड़ने लगता है। यद्यपि वहाँ मैंने किसी को कभी देखा भी नहीं होगा, परन्तु फिर भी मुझे कुछ ऐसा नहीं मालूम पड़ता कि मैं इनसे अपरिचित हूँ। और यह होता है कि जितनी देर या दिन वहाँ रहूँ तो खुद ही सबसे परिचित सी लगती हूँ। और लौटने पर खुद ही फिर सब को भूल जाती हूँ। असली बात यह है कि अपना-पराया किसे कहते हैं, क्या होता है, यह मुझे कुछ भी मालूम नहीं रह गया है। अब तो कुछ दशा ऐसी है, यदि थोड़ी सी देर को मैं यह सोचना चाहूँ या मुझसे कोई यह पूछे कि तुम्हें इस पूजा से क्या मिला, तो मेरी कुछ समझ में ही नहीं आता कि क्या मिला? और भाई ! मालूम भी कैसे पड़े जबकि हाल अपना यह भी तो है कि यह भी नहीं मालूम कि ज़िन्दगी में कभी पूजा की भी थी, परन्तु फिर भी कुछ फ़िक्र नहीं। फ़िक्र करें ‘मालिक’ और सब वही जानें। और अब तो भाई ! और भी कमाल हो गया है कि मुझे फैज़ वगैरह तक की भी पहचान नहीं रह गई है। कल ‘आप’ के जन्मोत्सव में जब कि सारे सत्संगी फैज़ के आनन्द में मस्त थे, परन्तु मेरी हालत यह थी कि मुझ से न रहा गया तो मैंने पूज्य मास्टर साहब जी से पूछा कि ‘आप’ बताइये क्या फैज़ बरस रहा है तो उन्होंने भी कहा तथा सबने कि सचमुच फैज़ की बारिश हो रही है। अब मेरी सच्ची हालत यह है। खैर मुझे अपने ‘मालिक’ की चाह है। अब बताइये, यह मेरी क्या हालत हो गई है और ‘आप’ के इस जन्मोत्सव में मैंने भरसक काम किया, परन्तु श्री बाबूजी ! जैसा कि हमेशा होता था, अबकी से भीतर से मुझे अपने में उमंग, खुशी व जोश बिल्कुल नहीं आया तो नहीं आया। सच पूछिये तो आज मुझे यह भी नहीं मालूम कि कल घर में उत्सव वगैरह हुआ भी था। यह न जाने सब क्या हाल हो गया है, कुछ समझ में नहीं आता। यदि हो सके तो विष्णु से ही चार लाइनें लिखवा दीजियेगा, क्योंकि कभी अपना हाल देखकर कुछ फ़िक्र सी हो जाती है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-
आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-150
शाहजहाँपुर
4/5/1951
ख़त तुम्हारा और केसर का आया। हाल मालूम हुआ। तुमने लिखा है कि – “जब कोई तारीफ़ करता है तो मुझे न तो शर्म का भाव मालूम होता है, और न कुछ समझ में ही आता है।” यह हालत अच्छी है। योगी की तारीफ यही है कि मान में खुश न हो और अपमान में नाखुश न हो। काम का Automatically होना, यह ईश्वरीय गुण है और ऐसी दशा में संस्कार नहीं बनते। जब यह भी अन्दाज़ खत्म हो जाये कि काम Automatically हो रहा है, तब असली हालत है। मैंने इसी दशा को “Efficacy of Raj Yoga” के Description में दिखलाया है। हमारे यहाँ अभ्यासी आगे ही बढ़ते चले जाते हैं, इसलिये कि जिस दशा पर ठहर जावें, तो उसके अर्थ यह हैं कि अब आगे बढ़ना बन्द है। दीनता और Innocence की हालत का महसूस न होना के मानी यह है कि यह चीज़े अपनी अच्छी खासी हालत में आ चुकी हैं और कदम अब इससे आगे है।

जब सिर से पैर तक अभ्यासी याद ही याद हो जाता है, तब याद कोशिश करने से क्षणमात्र के लिये है। एक बात तुमने यह लिखी है कि – “जब मैं किसी के यहाँ जाती हूँ तो जिनसे अपरिचित होती हूँ, वह भी अपने मालूम होते हैं”। इसका जवाब तुमने स्वयं दे दिया है। वह यह है कि अपना-पराया क्या होता है, यह कुछ भी मालूम नहीं रह गया है। तुमने लिखा है कि – “मुझे फैज़ इत्यादि की पहचान नहीं रह गई है।” इसकी वजह मुझे यह मालूम पड़ती है कि तुम हर समय फैज़ में डूबी रहती हो और डूबे हुए की आँख के सामने सिवाय पानी के और कुछ नहीं होता। जब कोई दूसरी चीज़ हो, तब differ कर सकती हो।

अम्मा को प्रणाम। भाई-बहनों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-151
लखीमपुर
12/5/1951
आशा है आप आराम से पहुँच गये होंगे। ‘आप’ को खाँसी बहुत आती थी, सो कुछ लाभ हुआ या वैसी ही है। मेरी आत्मिक-दशा ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी थोड़ी बहुत मालूम पड़ी है, सो लिख रही हूँ। मैंने शायद अगले पत्र में लिखा था कि करीब महीने या डेढ़ महीने से किसी भी काम में अब Automatically का भाव या अन्दाज़ भी खत्म हो गया है, यानी अब किसी भी काम के लिये ऐसे कोई विचार एक क्षण को भी नहीं आते कि कैसे हो रहे हैं। कुछ हाल यह है कि बेचैनी ‘मालिक’ के प्रति बढ़ाने की कोशिश करती हूँ तो भी मन पर इसका ज़रा सा भी प्रभाव पड़ता नहीं मालूम होता। अब तो working ही मेरा आधार है। यही मेरी पूजा है और जब से शायद वह हालत हुई थी कि 'अपना शरीर मय आकार के गायब हो गया” तब से निगाह केवल मेरा शक ही है कि सूक्ष्म शरीर पर रहती है, सो भी सूक्ष्म तौर से। अब तो अपना तमाम फैलाव जो दिखाई पड़ता था, सो सब खत्म हो चुका है। पूज्य श्री बाबूजी न मुझे किसी हालत से मतलब है, और न चाह। परन्तु फिर भी यदि ग़ौर से देखती हूँ तो अनजाने ही मन में एक बहुत धीमी सी तड़प या बेचैनी अवश्य पाती हूँ। यद्यपि हाल अब यह भी हो गया है कि कारण से भी मैं बरी हूँ। ‘मालिक’ ही सर्वस्व है, जैसा रखेगा, वैसे ही रहूँगी, और खुशी से। जिज्जी के लिये यहाँ और वैसे भी जो आप ने किया है, वह केवल बहुत-बहुत धन्यवाद के, अवर्णनीय है। दुनिया के काम बनाने को आप एक क्षण में कितनी सरल और कितना लाभकारी उपाय तुरन्त सोच लेते हैं और सोचते ही क्या, उसी क्षण पूर्ण भी कर देते हैं। फिर भी ‘आप’ पर जिन्हें विश्वास नहीं, वे सच में अभागे हैं। ईश्वर वह दिन शीघ्र लावे, जिससे आध्यात्मिकता के इस स्वर्णयुग में कोई भी आध्यात्मिक लाभ से वंचित न रह सके। मैं सोचती थी कि ‘आप’ जब यहाँ पधारेंगे तो शायद हालत कुछ सुधरे, परन्तु अबकी से ‘आप’ गये हैं तो ऐसा लगता है मानों गये बहुत वर्ष बीत गये हैं। हालत जैसी ‘आप’ के आने से पूर्व थी, सो ही है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-152
लखीमपुर
15/5/1951
आशा है, मेरा पत्र मिला गया होगा। यह पत्र इसलिये और भी जल्दी भेज रही हूँ कि मैंने तारीख १३ की रात को, उसे स्वप्न कह लीजिये, परन्तु उस अवस्था को बिल्कुल स्वप्न भी नहीं कह सकती हूँ। तीन साढ़े तीन बजे आप मुझे बिल्कुल अपने सामने दिखलाई दिये और ‘आप’ से पूछा तो ‘आप’ को देखकर मालूम पड़ता था कि ‘आप’ की साँस की तकलीफ़ बढ़ गई है, और मैंने ‘आप’ से पूछा तो ‘आपने’ भी बतलाया कि साँस की तकलीफ़ बढ़ गई है और एक किसी काम का शायद ‘आप’ ने कुछ तरीका भी बतलाया था और मेरी समझ में भी आ गया था, परन्तु क्या बताऊँ लिखना नहीं मिला और फिर ‘आप’ की तकलीफ़ के आगे अब तो कुछ याद ही नहीं आता है। आशा है, ‘आप’ को अब आराम हो गया होगा। वैसे भी मैं देखती हूँ कि रात में अधिकतर ऐसी ही अवस्था रहती है कि सपने वगैरह में भी बात करती हूँ तो अधिकतर मुझे बिल्कुल मालूम रहता है कि मैं बात कर रही हूँ। यद्यपि मैं यह नहीं जानती कि मेरा मुहँ खुलता है या नहीं। खैर, यह सब ‘आप’ जानें। कृपया अपनी तबियत का हाल जल्दी से जल्दी भेजियेगा। ईश्वर करे ‘आप’ बिल्कुल अच्छे हो जायें। और जो कुछ भी हालत ‘मालिक’ ने मुझे दी है, सो लिख रही हूँ।

न जाने क्या बात है कि पहले मेरा ख्याल या इरादा ‘मालिक’ के प्रति बेहद मज़बूत था और अब तो वह ख्याल या इरादा ही महसूस नहीं होता तो उसकी मज़बूती का पता का तो कुछ सवाल ही नहीं। लगन-वगन भी अब मुझमें रत्ती भर भी नहीं रह गई है। मुझे यह तक भूल जाता है कि मेरा ध्येय क्या है। शायद इसी लिये सारा जोश भी ठंडा हो गया है। अब तो यह ख्याल भी खत्म हो चुका कि मेरी आत्मिक उन्नति हो रही है, या हो चुकी है अथवा होती रहेगी या कुछ हो रही है। पूज्य श्री बाबूजी ! मैंने जो कुछ भी अपनी हालत ऊपर लिखी है, सब मेरे वश के बिल्कुल बाहर है। इसलिये कोई खास चिन्ता नहीं है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-153
लखीमपुर
3/6/1951
कल पूज्य मास्टर साहब जी के पत्र से मालूम हुआ कि ‘आप’ की तबियत कुछ अच्छी है, पढ़कर खुशी हुई। मेरी आत्मिक-दशा जो, कुछ ‘मालिक’ की कृपा से मालूम हुई है, सो लिख रही हूँ। भाई, मेरा तो अब कुछ यह हाल हो गया है कि मैं तो अब बिल्कुल बेकन्ट्रोल सी हो गई हूँ। मुझे तो किसी बात में, किसी चीज़ में अपने ऊपर अपना कुछ Control ही नहीं मालूम पड़ता है। बिल्कुल बेअख्तियार हाल हो रहा है। परन्तु वैसे मैं देखती हूँ कि ‘मालिक’ की कृपा से Control की जगह या समय हो, सब कुछ हो जाता है। वैसे कुछ ऐसी हालत हो गई है कि मुझे अब अपने में Sure नहीं है कि मुझमें अब कुछ यह सब बातें हैं या नहीं और यह बात इस हद तक हो गई है कि खैर, ‘मालिक’ में प्रेम का दावा तो मैं पहले ही छोड़ चुकी हूँ पर अब तो मुझे यह भी Sure नहीं है या यह भी मैं नहीं कह सकती कि मुझे ‘उसमें’ (‘मालिक’ में) कुछ विश्वास वगैरह भी रह गया है या नहीं। खैर, मेरा तो यही है कि ‘वह’ जिस तरह रखेगा वैसे ही खुशी से रहूँगी। पूज्य श्री बाबू जी ! मुझ पर ऐसी ही कृपा दृष्टि बनाये रखें, जिससे प्रतिक्षण मेरी उन्नति बढ़ती ही चली जावे। पूज्य मास्टर साहब से प्रणाम कहियेगा।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-154
शाहजहाँपुर
4/6/1951
जब तुमने मुझे स्वप्न में देखा था, उस समय मुझे दिन और रात में दो बार दौरे तेज़ हो रहे थे। अब चौथे रोज़ दौरा कल पड़ा। ज़्यादा चिन्ता नहीं करनी चाहिये। यह चीज़ जायेगी यदि ईश्वर को मंजूर है। इसलिये कि ऐसी दशा में बहुत काम पूरी तरह से करना कठिन होगा। अब १५ मई के पत्र का उत्तर दे रहा हूँ। पहले मेरा ख्याल या इरादा ‘मालिक’ के प्रति बेहद मजबूत था और अब तो यह ख्याल या इरादा ही महसूस नहीं होता। अभ्यासी का लय अवस्था पर आ जाना, यह ईश्वरीय बरक़त है। जितना ज्यादा अपने को लय कर सकें, उतनी ही ज्यादा मंजिल पर पहुँचा हुआ समझना चाहिये। ख्याल की मजबूती उसी समय तक मालूम होती है, जब तक उसके फैलाव की सूरत पैदा न हो जाये। जितनी फैलाव की शक्ल पैदा होती जाती है, उतना ही अभ्यासी हल्का-फुल्का होता जाता है। ईश्वर इतना हल्का है कि उसमें कोई बोझ नहीं। ख्याल की जो मज़बूती या ज़ोर, शोर इसकी शुरुआत में ज़रूरत है। इसका वज़न आगे चलकर कम हो जाता है। यहाँ तक कि बिल्कुल नहीं रहता। यह बुनियाद है। “खालिस असलियत” पर पहुँचने की। सब कुछ होते हुए दिल्ली अभी दूर है। लाला जी ने एक बार अपनी दशा मुझसे इज़हार की थी। क्या कहना इस हालत का, जो उन्होंने बयान किया। ईश्वर यह चीज़ सब को दे। एक छोटी सी हालत मैं अपनी भी बयान किये देता हूँ, और वह इसलिये कि तुम्हें जब ईश्वर इस हालत के करीब लाने की कोशिश करे, तो परेशानी न हो। मैं इन शब्दों में अपनी हालत बयान करता हूँ – “मुझे जिस्म और जान तथा आध्यात्मिक उन्नति यह कुछ नहीं मालूम होती। आकाश तत्व जो सबसे हल्का कहा गया है, वह अपने से भारी मालूम होता है”।

२४ मई के खत में जो इज्ज़त और अदब के बारे में लिखा है, उसका जवाब देने की ज़रूरत नहीं है। जब तुम अपनी हालत में होती हो, उसमें एकता भासती है और उसमें इज्ज़त और अदब का ख्याल नहीं रहता, क्योंकि वहाँ पर सब एक हैं। वह एकताई अभी पूरी सीमा तक ही पहुँची और किसी के कहने सुनने का असर न होना, यह सहनशीलता है, जो बहुत अच्छी चीज़ है।

शेष शुभ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-155
लखीमपुर
5/6/1951
कल ‘आप’ का तथा पूज्य मास्टर साहब जी का पत्र आया। ‘आप’ की तबियत खराब पढ़कर हम सब को बहुत चिन्ता है। न जाने ईश्वर को क्या मंजूर है। कृपया अपनी तबियत का हाल जल्दी-जल्दी लिखवा दिया करिये। मैं भी करीब २०-२१ दिन से बीमार ही हूँ। कल-परसों से अब उठ कर थोड़ा बहुत चलने फिरने भी लगी हूँ। अब तो केवल कमजोरी ही है। वैसे बिल्कुल ठीक हूँ। कोई फ़िक्र की बात नहीं। इसी कारण बहुत दिन से पत्र न डाल सकी। यद्यपि डायरी में हाल बहुत दिन के लिखे पड़े हैं। कृपया क्षमा करियेगा। यद्यपि पत्र वगैरह लिखने में चक्कर तथा हफंनी सी आने लगती है। मेरे लिये बिल्कुल फ़िक्र न कीजियेगा। दो-एक दिन में पूर्ण स्वस्थ हो जाऊँगी। अब जो कुछ अब तक का हाल है, सो लिख रही हूँ।

कुछ ऐसी हालत है कि पहले मैं लिख चुकी हूँ कि – “अपनी दशा का एहसास या दशा के एहसास का एहसास भी खत्म हो गया है”, क्योंकि अब देखती हूँ कि वैसे मुझे अपनी हालत कम या देर में एहसास हो पाती है। परन्तु कभी-कभी जब बातें छिड़ जाती हैं, और ताऊ जी कुछ बताने लगते हैं तो मुझे मालूम पड़ता है कि यह मेरी दशा है, वह भी मेरी दशा है, परन्तु सुनने के बाद कुछ ही मिनटों में फिर सब ख्याल से उतर जाती है और कुछ ऐसा हाल है कि मुझे यह भी नहीं मालूम कि न जाने मैं आस्तिक हूँ, न जाने मैं नास्तिक हूँ। हालत को Judge करके अधिकतर मैं नास्तिक कही जा सकती हूँ। पहले जैसे मैं लिखा करती थी और ‘आप’ ने भी लिखा था कि समता की दशा बढ़ रही है परन्तु अब तो ऐसा लगता है कि वह भी मुझमें न तो है, न थी और शायद अब आने भी न पावे। यही हाल हल्केपन का है कि यदि एक क्षण अपने में ढूँढने की कोशिश करूँ तो तबियत तुरन्त घबड़ाने पर आमादा हो जाती है, इसलिये मैंने तो इन सब बातों के आने पर गौर करना भी छोड़ दिया है, न कुछ तबियत ही चाहती है। पूज्य श्री बाबूजी ! अब कुछ यह भी हो गया है कि पहले जैसे सामने बैठे हुए लोग मुझे परछाई की तरह मालूम पड़ते थे परन्तु अब तो परछाई वगैरह भी सब गायब हो गई है। अब तो यह हाल है कि मुझे उनका शरीर तथा जान तक कुछ भी महसूस नहीं होती है और अब यही हाल कुछ-कुछ अपने लिये भी होता जा रहा है। आज कल तो कुछ यह हाल है, हर समय बिल्कुल चुपचाप पड़े रहने की तबियत चाहती है और अधिकतर पड़ी भी रहती हूँ। न कुछ लिखने की, न किसी को पूजा कराने की ही तबियत चाहती है।

पूज्य मेरे श्री बाबू जी ! अम्मा की दशा देखी नहीं जाती। उनके अधिकतर बहते हुए आसू देखकर तबियत जाने कैसी हो जाती है, बरबस अपने आँसू रोकना कठिन हो जाता है। फिर भी बेचारी बहुत धैर्य धारण करती हैं। वे अधिकतर यही कहती हैं कि दुनिया में हमारे जैसा पापी मिलना कठिन है कि वे मेरी ज़िन्दगी में खत्म भी नहीं हो सकते हैं। इसी कारण कभी-कभी तबियत मेरी भी कुछ पेरशान हो जाती है। पूज्य श्री बाबूजी ! ‘आप’ अच्छे हो जाइये, यह हमारी सब की प्रार्थना है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-156
शाहजहाँपुर
6/6/1951
तुम्हारा पत्र मिला। तुमने लिखा है कि ऐसी कृपा बनाये रखें कि जल्दी उन्नति हो। इसका उत्तर यह है कि मेरे पास जो कुछ भी गुरु महाराज की दी हुई वस्तु है, वह तुम्हारे ही घर भर में भरती चली जा रही है। तुमने जो अपना हाल लिखा है कि Control नहीं रहा। इसका मतलब समझ में नहीं आया। इसे फिर लिखो। बाकी अन्दरुनी कैफ़ियत तो समझ में आ गई और उसका असर यह होना चाहिए कि ‘गुमसुम’ की कैफ़ियत रहना चाहिये। अगर शुरु हो गई हो तो अभी और बढ़ेगी। प्राचीन महात्माओं ने तुरीय और तुरीयातीत तक लिखा है, अर्थात् तुरीया के बाद तुरीयातीत ही होती है। हमारे गुरु महाराज ने तीन प्रकर की तुरीय लिखी हैं। तुम्हारी दशा जो मैनें बका की लिखी है, उसको तुरीय ही कहते हैं। इसकी भी लय-अवस्था शुरु हो गई है, परन्तु बहुत खफ़ीफ है। शेष शुभ है।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-157
लखीमपुर
10/6/1951
कृपा-पत्र ‘आप’ का तथा पूज्य मास्टर साहब जी का मिला। ‘आप’ को एक दौरा फिर पड़ गया, पढ़कर चिन्ता हुई। यद्यपि चिन्ता के बजाय मैं कोशिश ही अधिक करती हूँ कि जैसे भी हो, ‘आप’ की कुछ यही सेवा हो जाये कि ‘आप’ की तकलीफ़ कम हो जावे और इस बात की कोशिश करते आज दस महीने हो गये, परन्तु ‘आप’ को न जाने क्यों कोई आराम न पहुँचा सकी। मैं सदैव से यहाँ तक तैयार थी और हूँ कि ‘आप’ के दौरे वगैरह की यह सब सारी तकलीफ़ यदि ‘मालिक’ मुझे देने की कृपा कर दे और फिर यह देखे कि ‘मालिक’ के आराम की खुशी में वे तकलीफें चाहे बेइन्ताही तौर पर मुझ पर गुजरें, परन्तु उसकी ‘कस्तूरी’ के मन में एक क्षण को भी जो मैल या कुछ तकलीफ़ महसूस होने पावे। Dictate में जो पूज्य चरण 'स्वामी' जी ने कहा है – “master Sahib and Kasturi may exercise themselves will fully, the desease can not remain इसे सचेत करने के लिये उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद है, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से अपने जीवन का मुख्य कर्तव्य मानती हुई उनकी आज्ञा के पहले ही कुछ न कुछ अवश्य करती आ रही हूँ। कभी-कभी जब मुझे काफ़ी खाँसी उठती है, तो मुझे उसमें ‘आप’ की खाँसी का आभास पाकर तबियत में यह आ जाता है कि ‘आप’ के बजाय मुझे आ जाती है। खैर ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। प्रार्थना तो यहाँ सब लोग कर ही रहे हैं। मास्टर साहब जी से यह भी कह दीजियेगा। कि मैं बराबर कर रही हूँ और जोर से करूँगी। ‘आप’ ने जो लिखा है कि – “सब कुछ होते हुए भी दिल्ली बहुत दूर है”, परन्तु मैं तो यही कहूँगी कि यद्यपि सच ही बहुत दूर है, परन्तु ‘आप’ की कृपा दृष्टि से और आप के अभय हाथों की छाया के नीचे आ जाने से दिल्ली अब खुद ही हमारे नज़दीक आ जायेगी। मेरी आत्मिक-दशा में और तो कोई खास बात अभी नहीं मालूम हुई। हाँ, अब हालत ऐसी मालूम पड़ती है, जैसे शरीर के ऊपर हो या इस शरीर के परे हो।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-158
शाहजहाँपुर
10/7/1951
खत तुम्हारा और केसर का आया। केसर जो बात चाहती है, उसके लिये वह कोशिश कर रही है, नतीजा - ईश्वर के हाथ में है। वह सब कुछ कर सकता है और भक्ति भाव भी यही है कि सब कुछ करते हुए, ईश्वर के ऊपर छोड़ देना चाहिए। हुआ ऐसा ही है कि “जो ईश्वर की तरफ़ दो कदम बढ़ा, ईश्वर उसके लिये चार कदम बढ़ा”। मैंने तुम्हारी हालत के बारे में कुछ पहले खत में लिखा था और आने वाली हालत का उसमें बहुत कुछ इशारा था। तुम्हारी हालत इस समय बहुत कुछ बेखबरी की है। रंज की वजह से हालत में इससे ऊपर अभी तक कदम नहीं रख पाया और हालत इसीलिये अभी अच्छी तरह खुली नहीं। अब रंज का असर बिल्कुल जाता रहेगा तो ईश्वर ने चाहा, फिर बढ़ने लगेगी। मुझे ऐसे समय पर आना ज़रूर चाहिये था, क्योंकि मेरा फ़र्ज भी है, मगर इलाज और बीमारी की हालत कुछ ऐसी थी कि मैं मजबूर था। मैं आऊँगा ज़रूर, मगर तारीख अभी मुकर्रर नहीं कर सकता।

माता जी को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-159
लखीमपुर
23/7/1951
मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। आशा है ‘आप’ की तबियत अब बिल्कुल ठीक होगी। कमज़ोरी को भी लाभ ही होगा। मैं तो आप के कहे अनुसार इस हफ्ते के अन्दर ही ठीक हो गई। यह सब हुआ ‘आप’ की कृपा तथा पत्र के कारण, क्योंकि उससे पहले मेरे अन्दर की ताकत बिल्कुल सोई हुई थी, ‘आप’ की कृपा ने फिर सजीव कर दिया। बहुत-बहुत धन्यवाद है।

आत्मिक-दशा भी फिर उसी प्रकार चालू हो गई है। पूज्य श्री बाबूजी ! बीच में एक परेशानी यह हो गई है, कि मेरी समझ में नहीं आता कि मैं अभ्यास क्या करूँ। Sitting वगैरह अभ्यास के बजाय अब तक जो-जो अभ्यास करती आई हूँ या ईश्वर की कृपा से जो ‘उसकी’ कृपा से स्वतः ही होते आये हैं, अब मेरे लिये सब निरर्थक ठहरता है। बिल्कुल बेकार सा लगता है। समझ में नहीं आता, अब क्या करूँ? ‘मालिक’ के हाथ में है। देखूँ, अब वह क्या करता है, जो अब तक ठीक करता आया है, वही अब भी करेगा। अब तक कुछ न कुछ अभ्यास मेरे जाने में अथवा अनजाने में होता बराबर रहता था परन्तु अब मैं Sure हूँ कि मुझ से कोई अभ्यास नहीं होता। कुछ ऐसा ख्याल होता है कि ईश्वर की कृपा से अपने को अब मैं अभ्यास से अधिक हल्की पाती हूँ। खैर, फिर भी ‘मालिक’ का धन्यवाद है कि कृपा करके ‘वह’ कोई न कोई तरकीब निकाल ही देता है। यद्यपि अबकी तरकीब भीतर ही भीतर है और इतनी हल्की है कि यदि मुझसे कोई पूछे तो मैं बतला नहीं सकती। शायद वह अभ्यास से पतली है।

अब तो श्री बाबूजी ! मेरी समझ से जाने तथा अनजाने में भी हर समय मेरी मुर्दा अवस्था ही रहती है और अब मुझे अपने अन्दर की कुछ ऐसी हालत मालूम पड़ती है, जैसी पहले कभी मैं लिख चुकी हूँ कि – “शरीर का ज़र्रा-ज़र्रा पिघल-पिघल कर बहा जा रहा है”। वही हाल मुझे अब अपने अन्दर प्रतीत होता है।

‘आप’ के पत्र से मालूम हुआ कि ‘आप’ की तबियत खराब है, फ़िक्र लगी है। ईश्वर से प्रार्थना है, मैं चाहे कितनी भी बीमार क्यों न हो जाऊँ परन्तु आप अच्छे रहें, इसमें ही मेरी खुशी है। राज के बारे में जो ‘आप’ ने पूछा, सो ‘आप’ के पत्र रुपी दीपक से उसी दम कब का खत्म हो चुका है। और किसी के बारे में मैं कह नहीं सकती। ‘आप’ की कृपा से सब ठीक ही होगा।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन-विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-160
लखीमपुर
10/8/1951
आशा है ‘आप’ सकुशल आराम से पहुँच गये होंगे। मेरी आत्मिक-दशा तो आप देख ही गये हैं। जो कुछ भी है, जैसी भी है परन्तु मुझे कुछ ऐसा लगता है कि अब शुरुआत है। ‘आप’ ने मास्टर साहब जी के यहाँ पूछा था कि- “क्या तुम्हारे लिये जल्दी करूँ”? सो पूज्य श्री बाबूजी ! आप की इस अकारण मेहरबानी का धन्यवाद इस जीभ से बाहर की बात है। परन्तु ‘आप’ की कृपा से हर हालत से पार होते हुए पूर्णत: ‘मालिक’ को प्राप्त कर लूँ। बस, ‘आप’ के अभय और वरद कर की सदैव छाया में रहूँ, यही प्रार्थना है। आप को कम परिश्रम करना पड़े। बस ध्येय तो हर हालत में ‘आप’ की कृपा से प्राप्त कर ही लूँगी। निगाह वास्तविक चीज़ में गड़ गई हो तो फिर दूरी ही कितनी रह जाती है। वास्तव में ‘आप’ का यह वाक्य सत्य है। न मालूम अब की यह क्या बात रही कि ‘आप’ यहाँ आये, तो चाहे मेरे घर में थे, तब चाहे मास्टर साहब जी के यहाँ थे, तब भी, जहाँ मैं ‘आप’ के सामने से चली जाती थी, तो मुझे बिल्कुल नहीं लगता था कि ‘आप’ आये हैं। इतना Uncommon कि क्या लिखूँ? पूज्य श्री बाबूजी ! आप ने बताया था कि गीता वाली कैफ़ियत चल रही है, परन्तु मैं देखती हूँ कि कुछ समय पहले तो मुझे यह हालत हर समय बहुत साफ़ महसूस होती थी, परन्तु इधर तो गौर करने पर भी नहीं मालूम पड़ती थी और न अब मालूम ही पड़ती है। और पहले की तरह न ऐसा ही लगता है कि मेरे बेजाने में ही अन्दर यह हालत हो। परन्तु ‘आप’ ने कहा था, इसलिये है तो अवश्य। एक तो कुछ यह भी बात मुझमें कुछ Naturally ही हो गई समझिये कि मेरा ख्याल इन सब आत्मिक हालतों में तो सिर्फ़ महसूस करने भर को होता है, परन्तु देखती हूँ कि भीतर कोई चाह है, सो केवल ‘मालिक’ की ही ओर लगी रहती है। जो कुछ भी हुआ है, हो रहा है और होगा, वह केवल मेरे ‘मालिक’ की ही कृपा और मर्ज़ी पर ही आश्रित है। बल्कि हालत तो यह है कि चाह होती क्या चीज़ है और अब वह मुझमें है भी या नहीं, इसमें भी मुझे शक लगता है, क्योंकि वह चाह अब मेरे सामने नहीं पड़ती।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,

पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-161
लखीमपुर
22/8/1951
मेरा एक पत्र मिला होगा। आशा है ‘आप’ की तबियत ठीक होगी। अपनी आत्मिक-दशा जो ‘मालिक’ की कृपा से अब है, सो लिख रही हूँ। इधर ४-५ दिन तबियत किसी में नहीं लगती थी और इसीलिये जब मुझ से कोई बात करने लगता था, तो मुझे झुँझलाहट सी आने लगती थी, परन्तु इधर अब झुँझलाहट वगैरह तो बिल्कुल नहीं रह गई है। पहले उलझी हुई हालत थी परन्तु अब ‘मालिक’ की कृपा से हालत जो भी हो, वह साफ़ हो गयी है। मुझे अब अपनी आध्यात्मिक उन्नति वगैरह कुछ नहीं मालूम पड़ती है और कुछ यह हो गया है कि अपने शरीर की तो खैर जाने दीजिये, मुझे कभी-कभी क्या अब अक्सर यह शक हो जाता है कि न जाने इस शरीर में जान वगैरह कुछ है या नहीं और महसूस तो अब सचमुच नहीं होता न इस तरफ़ कुछ ध्यान ही आता है। पहले मुझे सारे संबंधों की डोर सब तरफ़ से कटी हुई मालूम पड़ती थी और अब तो न कटी हुई न लगी हुई ही मालूम पड़ती है। अब तो किसी प्रकार का कुछ महसूस भी नहीं होता। यहाँ तक कि मुझे अपने में कोई हालत, स्थायी तो दूर रही मुझमें एक क्षण को आती नहीं मालूम देती है। अब तो न जाने मेरी क्या हालत है। अब अपने लिए न तो यह कह सकती हूँ कि मुझ में कुछ वैराग्य है, न मैं यह कह सकती हूँ कि मैं ‘मालिक’ प्रेमिन हूँ। मैं किसी इन सब के बारे में कुछ जानती भी नहीं। न मुझे यह मालूम है कि कभी मुझ में आई भी थी और कैसी होती है, यह सब मुझे कुछ नहीं मालूम रह गया। मैं तो जो थी, सो रह गई। जैसी थी, वैसी रह गई। अब तो भाई, उदासी वाली हालत तथा मुर्दा वाली हालत सब खत्म हो गई लगती है। तारीख १८ से हालत बदल गई। उलझन तथा झुँझलाहट वगैरह से निकल कर किसी साफ हालत से आ गई हूँ। अब तो ‘मालिक’ की असीम कृपा से कुछ यह हाल हो गया है कि हर चीज़ में ज़िन्दगी या हर चीज़ में से रोशनी निकलती हुई महसूस होती है। और श्री बाबूजी ! वह रोशनी भी कैसी, कि जिसमें उजियाला या अंधियारा, कुछ नहीं होता है। न जाने यह क्या हाल है। मेरी तो जो समझ में आया, लिख दिया। अब ‘आप’ जानें, ‘आप’ का काम जाने।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-162
शाहजहाँपुर
24/8/1951
तुमने जो २३.७.५१ को खत लिखा था, उसका जवाब मैंने ३०.७.५१ को दिया था, मगर डाकखाने की गलती से तुमको मिला नहीं। उसमें स्वामी जी का एक छोटा सा Dictate भी था। यह याद नहीं कि क्या क्या लिखा था। थोड़ा बहुत जो कुछ याद आता है फिर लिखे देता हूँ और कोई नई बात अगर याद आ गई तो लिख दूँगा। तुमने लिखा है कि “मेरी मौजूदा हालत अभ्यास से हल्की मालूम होती है”। यह सही है। अभ्यास कितना ही सूक्ष्म क्यों न बताया जाये फिर भी वह कर्म है। जिस्मानी मेहनत से कहीं भारी है। और खाली मेहनत, मेहनत से कहीं भारी है। अर्थात उसका जो नतीजा होता है, उससे वह चीज़ बहुत भारी है। तुमने जो मुर्दा की कैफ़ियत पहले लिखी थी, शुक्र है, ‘मालिक’ का, कि यह कैफ़ियत मैं अपनी ज़िन्दगी में पहली मर्तबा अपनी आँखों से देख रहा हूँ। कितनी ही कोशिश की जाये, जब तक ईश्वर मदद न करे, अपनी ताकत से प्राप्त नहीं होती। मगर भाई, हममें ईश्वर की मदद तलब ही कौन करता है। खुशामद करने वाले तो ईश्वर के बहुत मिलते हैं, मगर अपने आप को उसके हाथ बेच डालने वाले बहुत कम। हमारे circle में मोहताज़गी इस कदर बढ़ी हुई है कि हर शख्स माँगने के लिये प्याला सामने किये हुए है। अपने आपको इस हद तक कोई भी बनाने के लिये तैयार नहीं होता कि ‘मालिक’ को इतनी दया आ जाये कि माँगने की ज़रूरत ही न पड़े। तुमने देखा होगा कि भीख माँगने वाले लोग दर-दर फिरते हैं और पूरे दिन में कहीं उनका प्याला इतना भर पाता है कि मुश्किल से शाम तक पेट भर खा सकें। और एक वह है कि जो ‘मालिक’ की याद में एक बबूल के साये में बैठा हुआ है, उन्हें खाने को इतना मिलता है कि स्वयं खाते हैं और दूसरों को भी खिलाते हैं, तिस पर भी काफी बचा रहता है। यह तो भिखारी की शान है, और पहले वालों को भिखमंगा कहना चाहिये।

जब मुर्दा वाली हालत पैदा हो जाये, तब उसे आध्यात्मिक विद्या की शुरुआत कहना चाहिये, नहीं नहीं, बल्कि यह हालत होते हुए इसका ख्याल तक बाकी न रहे। यहाँ तक कि सोचने और गौर करने से भी यह हालत एहसास में न आवे, तब असल हालत है और आध्यात्मिक विद्या की शुरुआत। इसी के आगे कुछ Dictate पहले आया था, जिसके मतलब यह थे कि “जहाँ और सब लोग खत्म करते हैं, वहाँ से रामचन्द्र शुरुआत करता है”। और यह ठीक है। इसी हालत से बन्धन से छुटकारा मिलता है। मैंने अक्सर खतों में इसी हालत की इन्तजारी के लिये लिखा है।

अब जो खत तुमने २२.८.५१ को भेजा है, उसका जवाब लिखता हूँ। अब ईश्वर की कृपा से वह कैफ़ियत भी पैदा हो रही है कि मुर्दा वाली कैफ़ियत रहते हुए भी उसका एहसास न हो। मगर अभी पूरी हालत पर नहीं आई है। इसमें अभी कुछ वक्त लगेगा। ईश्वर उसको भी परिपक्व करेगा। तुमने लिखा है कि - "अब तो ‘मालिक’ की कृपा से यह हो गया है कि हर चीज़ में से रोशनी या ज़िन्दगी निकलती हुई मालूम पड़ती है और वह रोशनी भी कैसी, जिसमें अंधियारी या उजियाला कुछ महसूस नहीं होता”। जिस जगह पर कि तुम हो, वहाँ की कैफ़ियत बाहर भी मालूम होती है और मेरा भी अभ्यास की हालत में यही हाल था कि जो अन्दर मालूम होता था, वही बाहर जाहिर होता था।

माता जी को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-163
लखीमपुर
29/8/1951
कृपा-पत्र ‘आप’ का आया। समाचार मालूम हुए। हालत के बारे में जो आप ने लिखा, सो मैं तो यही कहूँगी कि – “शुक्र है ईश्वर का कि कैसा ‘मालिक’ दिया, कि लाजवाब और अद्वितीय”। बस ऐसी कृपा बनी रहे, यही गरीबनी की प्रार्थना है। मुझे आप की यह चीज़ तो बहुत पसन्द आई कि जब भिखारी ही बनने को निकले, तो बनें फर्स्ट क्लास, वरना भिखमंगा बनना व्यर्थ है। परन्तु हालत तो श्री बाबूजी ! कुछ ऐसी है कि यद्यपि हूँ तो उसकी सदैव भिखारिनी परन्तु, अब उस कैफ़ियत का ज्ञान ही नहीं। अब यह भी उसकी ही मर्ज़ी है। हालत तो मैं भी लिख चुकी हूँ कि अब शुरुआत लगती है। पूज्य श्री बाबूजी! बन्धन से छुटकारा तो मनुष्य का तभी हो जाता है, जब वह सच्चे हृदय से केवल ‘मालिक’ की चाहत लिये आपके दर पर पहुँचता है। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा मालूम होती है, सो लिख रही हूँ।

अब तो अधिकतर अपने में भूल की सी अवस्था मालूम पड़ती है। अक्सर मालूम भी पड़ती है और फिर नहीं भी मालूम पड़ती है। ऐसा मालूम पड़ता है कि इस भूल की अवस्था को भी भूली रहती हूँ। आजकल जो भी हालत है, शुद्ध है। आप ने एक बार लिखा था कि – “तड़प हर जगह रास्ता बना देती है”। और भाई, मेरा यह हाल है कि न जाने कब से मुझ में तड़प आती ही नहीं और यदि कोशिश करना चाहूँ तो जी घबराने लगता है और फिर भी एक बूँद नहीं आती। इसलिये अब तो जिस हालत में हूँ, उसी में ही चैन मानती हूँ क्योंकि भाई, जब अपना हाथ ही खत्म हो चुका, फिर उसकी मर्ज़ी पर हूँ। देखती हूँ एक प्रकार का आनन्द भीतर ही भीतर हर समय मेरे अन्दर रहता था, परन्तु अब यह हाल है कि ढूँढने पर भी उस आनन्द तथा किसी में ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा न देखने आदि की स्मृति या झलक तक मुझमें नहीं रह गई है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-164
शाहजहाँपुर
30/8/1951
तुम्हारे सब पत्र मिल गये। तुम ईश्वर की कृपा से जिस हालत में हो, इस हालत में अभ्यास का होना बड़ा कठिन है। यह अभ्यास का फल है। ऐसी हालत में जो अभ्यास इससे सम्बन्ध रखता है, वह बिना जाने हुए खुद-ब-खुद होता रहता है। वैसे अगर Faith ठीक है तो हमारे यहाँ हर आदमी (अभ्यासी) बिना उसके जाने हुए भी ईश्वर की तरफ लगा रहता है, इसलिये कि मन का गोता ‘ब्रह्माण्ड-मण्डल की दशा’ में दे दिया जाता है और इस वज़ह से उसमें कुछ रंग वैसा ही आ जाता है और मैं तो ऐसा भी करता हूँ कि मन का रुख बहुत कुछ ऊपर को कर दिया करता हूँ। इससे इसकी ताकत रफ़्ता-रफ़्ता नीचे जाने, अर्थात् दुनिया की तरफ़ कम होने लगती है। जिसने लय-अवस्था प्राप्त कर ली और जिस हद तक प्राप्त कर ली तो Guidance खुद-ब-खुद होती रहती है। मैंने भी जब अभ्यास शुरु किया था और जो बात शुरु की थी और शुरु ही क्या, बल्कि खुद-ब-खुद हो गई थी, उस चीज़ ने मुझे जब तक धुर तक न पहुँचा दिया, कुछ न कुछ अपने उद्देश्य तक पहुँचने को बताती ही रही। या यों कहिये कि ईश्वर की कृपा से मैं उस पर आता ही गया। अब जो चीज़ मैंने प्रारम्भ की थी, यदि मैं वही चीज़ दूसरों को बताऊँ तो नहीं मालूम वह मेरे बारे में क्या ख्याल करने लगें और बताते हुए भी मुझे शर्म आती है और यदि बताने की नौबत आ जाती है, तो उस समय तक अभ्यासी उस काबिल रहता ही नहीं कि इसको पूर्ण तरह से कर सके। तुमने जो अपनी मुर्दा की तरह की कैफ़ियत लिखी है, वाक़ई यही एक कैफ़ियत है, जिस पर आने की हर शख्स को कोशिश करनी चाहिये। असल आध्यात्मिक विद्या यहाँ से आरम्भ होती है और यह अ, आ का पढ़ना यही से प्रारम्भ होता है। नहीं, बल्कि मुर्दा की सी कैफ़ियत किसी तरीके से ख्याल में न आवे, वहाँ से आध्यात्मिक विद्या का अ, आ प्रारम्भ होता है।

Dictate By Sri Vivekanandji Maharaj :-
"This is a very high thought daughter. People end their spirituality at this Stage, and HE (Ram Chandra) begins from here. The idea is Correct. Can you find such man? People will laugh at. This is end of all activities, but really it is the beginning of spirituality".

तुम्हारा यह कहना बिल्कुल सही है कि “अभ्यास से अपने आप को बहुत हल्का पाती हूँ”। अभ्यास को तो ऐसा समझना चाहिये, जैसे एक चीज़ जो किसी दूसरी चीज़ को working Order में लाती है, इससे ज्यादा इसका कोई ताल्लुक नहीं और जब कोई चीज़ Order में आ गई तो उसका Function ठीक होने लगेगा। हांसिल करना तो लय अवस्था है। सालोक्य, सामुज्य, सामीप्य और सारुप्य सब इसी की Stages हैं। मैं तो सब कुछ चाहता हूँ मगर इस वक्त इधर आने की मुझ को खुशखबरी नहीं मिलती। ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ कि मैं यह हालत अपनी ज़िन्दगी में तुम्हारी देख रहा हूँ। इस हालत में आकर बंधन से छुटकारा मिलता है और चीज़ वाकई अपने काबू की नहीं, ईश्वर की देन है। तुमने लिखा है – “शरीर का ज़र्रा-ज़र्रा पिघल कर बहा जा रहा है” यह एहसास ठीक है। जब पानी बरसता है तो मिट्टी और धूल , जो दरख्तों पर होती है, वह सब धुल जाती है। मगर यह पानी ऐसा है कि ज़र्रा-ज़र्रा में मिटता जाता है और अपनी चमक लेने के लिए Unwanted चीज अलहदा हो जाती हैं।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-165
लखीमपुर
5/9/1951
आप का वह खोया हुआ पत्र मिला, समाचार मालूम हुए। अभ्यास की अब मुझे कोई चिन्ता भी नहीं है, क्योंकि मेरा सम्बन्ध तो केवल ‘एक’ से है। इसलिये मेरा तो अभ्यास वगैरह भी केवल ‘वही’ है। आप ने अपने अभ्यास के विषय में जो लिखा है, वह तो अद्वितीय चीज़ होगी। ‘आप’ का यह कहना तो बिल्कुल ठीक है कि इस हालत के परिपक्व होने पर आध्यात्मिक विद्या का ‘अ’, ‘आ’ पढ़ना शुरु होगा। मेरी आध्यात्मिक हालत जो अब मालूम पड़ती है, सो लिख रही हूँ।

पूज्य श्री बाबूजी ! न जाने यह क्या बात है कि मुर्दा वाली दशा मुझे अपने में तो मालूम नहीं पड़ती, परन्तु दूसरों में अपने सामने सब तरफ वही अवस्था मालूम पड़ती है और अब तो अक्सर यह भी गायब हो जाती है। महीनों बाद अब कभी-कभी मुझे अपने में भूल वाली अवस्था तथा कुछ भौचक्की वाली अवस्था सी मालूम पड़ती है। अब अपनेपन का यह हाल है कि यद्यपि पहले तो मैं इससे बिल्कुल बरी मालूम पड़ती थी, परन्तु अब यह हाल है कि अपनापन होते हुए भी इसके भाव से अपने को कहीं दूर तथा कहीं हल्का पाती हूँ। अपनापन कहते समय मैं इसके भाव को तो अवश्य भूली रहती हूँ और इसके भाव से अपने को इतना हल्का पाती हूँ और इस कदर लापरवाह सी रहती हूँ कि मुझे अक्सर इसका एहसास तक नहीं हो पाता कि यह मुझ में आया भी था कि नहीं। अब तो श्री बाबूजी ! कभी-कभी तो मैं खुद धोखा खा सकती हूँ कि कहीं आ तो नहीं गया, परन्तु नहीं, क्योंकि जब उस ‘मैं’ का ही यह पता न रहा कि न जाने वह क्या चीज़ है, फिर यह नहीं हो सकता। फिर भी ‘मालिक’ की कृपा का भरोसा है। वैसे ठीक हालत ‘आप’ ही जान सकते हैं। पहले मेरा यह हाल था कि ‘मैं’ कहते समय, मुझे यह बिल्कुल मालूम नहीं रहता है कि यह ‘मैं’ शब्द किसके लिये कहा जा रहा है। मेरे लिये अथवा ‘मालिक’ के लिये, परन्तु देखती हूँ कि दो-ढाई महीने से यह बात बिल्कुल जाती रही। मैं इससे बिल्कुल बरी हो गई। अब न जाने क्या हाल है, यह ‘आप’ जानें। क्योंकि मेरी तो अब इन सब की तरफ कभी बिल्कुल तबियत ही क्या, बिल्कुल ख्याल ही नहीं जाता। लय-अवस्था तो मेरी श्री बाबूजी ! कब की खत्म हो चुकी। शारीरिक तथा भीतरी लय-अवस्था बिल्कुल नहीं मालूम पड़ती। और यहाँ तक कि यदि गौर करती हूँ और कोशिश करती हूँ तो तबियत परेशान हो जाती है। इसलिये अब इसका ख्याल भी छोड़ना पड़ा। अब ‘आप’ जानें, ‘आप’ का काम जाने। छोटे भाई-बहनों को प्यार। अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-166
लखीमपुर
14/9/1951
आत्मिक-दशा के बारे में मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। इधर ३-४ दिन से कुछ ठहराव की सी हालत मालूम पड़ती है, वैसे ठीक तो आप जानें। इधर कई दिनों से हालत कुछ भूल की तरह की और अधिक भौचक्केपन की मिली हुई है। मुर्दावाली अवस्था तो पता नहीं लगती, कि क्या हुई या कुछ मैं समझ शायद ठीक न पाती हूँ। नींद का यह हाल है कि रात भर सपने ही दीखते रहते हैं। यद्यपि याद कुछ नहीं रहते। वैसे करीब छ:-सात महीने में शायद ही कभी एक देख लेती हूँ, तो मालूम नहीं, परन्तु आज कल न जाने क्या हो गया है। एक बार पहले ऐसी ही हालत हुई थी, कि रात भर सपने दीखते थे और दिन भर ख्याल आते रहते थे। सोई अब दिन में उन्हें ख्यालात तो नहीं, हाँ, सपने की भाँति एक आया, एक गया सा कुछ बना रहता है, हटाने से हटते नहीं, इसलिये ‘मालिक’ पर छोड़ दिया है। और क्या आता रहता है, याद नहीं। शायद दिमाग भी न जाने क्यों आजकल कुछ कमज़ोर सा है। पूज्य श्री बाबूजी ! जरा मेहरबानी करके हालत पर एक निगाह अवश्य डाल लीजियेगा, क्योंकि हालत आजकल कोई खास अच्छी नहीं मालूम पड़ती है, परन्तु ये सपने या कुछ ख्यालात वगैरह मुझे परेशान नहीं कर पाते, क्योंकि मैं देखती हूँ कि तबियत को यह छू तक नहीं पाते। कुछ यह है कि जब चाहूँ और अपने को देखूँ तो सब तरफ़ जो कुदरत की धार है, उसमें अपने को बिल्कुल मिला पाती हूँ, परन्तु वैसे कुछ नहीं मालूम पड़ता। यह चीज़ करीब-करीब हर समय ही रहती है, यदि हर समय देखूँ तो।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-167
लखीमपुर
21/9/1951
कृपा-पत्र ‘आप’ का कल पूज्य ताऊजी तथा पूज्य मास्टर साहब जी के लिये आया - सुनकर प्रसन्नता हुई और जो कुछ ताऊजी के लिये आप ने कुकरा में कहा यानि Next World में अपने साथ रखने को कहा, यह पढ़कर तो ‘मालिक’ का धन्यवाद सौ-सौ मुख से भी नहीं दिया जा सकता है। हम सब पर ‘मालिक’ की कितनी अहेतु की कृपा है, इसे देखकर तो हृदय गद्गद् हो जाता है। आप ने मेरे कुछ संस्कार खींच लिये हैं, इसका कुछ आभास ‘मालिक’ की कृपा से मुझे मिल गया था। इसलिये मैंने ‘आप’ से कहा भी था कि श्री बाबूजी, यदि मैं ईश्वर होती तो कम से कम बहुत तकलीफ देह संस्कार परम कृपालु सद्गुरु के पास भोगने को कभी न जाने देती। खैर, ‘आप’ की जैसी मर्ज़ी। परन्तु एक प्रार्थना फिर भी अवश्य है कि जो और जितने संस्कार “Law of Nature” के हिसाब से आप के हिस्से में जायें, वहाँ तक तो लाचारी है, परन्तु उससे एक कण भी अधिक की मेहरबानी न फरमाइयेगा। वैसे ‘आप’ की मेहरबानी का धन्यवाद तो करोड़ जिह्वायें भी करने में असमर्थ हैं। बस केवल ‘मालिक’ की होकर रहूँगी। ‘आप’ को जहाँ तक हो सकेगा अपने में ‘मालिक’ की याद की कमी का कभी मौका न दूँगी। ‘आप’ इस नाचीज़ पर सदैव खुश रहें। इसकी प्रार्थना करती रहूँगी। बस वही मेरा धन्यवाद होगा। परन्तु कृपालु श्री लालाजी ने वास्तव में हमें वह ‘मालिक’ प्रदान किया जो बिल्कुल असम्भव था। वह अनमोल रत्न प्रदान किया, जैसा न हुआ है और न होगा। उनके चरणों में इस गरीबनी का सादर प्रणाम कह दीजियेगा और कह दीजियेगा कि ‘मालिक’ को पूर्णतः प्राप्त करके रहूँगी। चाहे इधर की पृथ्वी उधर हो जाये। परन्तु यह निश्चय अडिग है। वैसे मेरे श्री बाबूजी ! अब तड़प का न जाने क्या हाल हो गया है कि कुछ खास महसूस नहीं हो पाता या यों कह लीजिये कि मुझे अब उसकी पहिचान ही नहीं रह गई है कि यह तड़प है। या भाई, यों कह लीजिये कि वह थोड़ी सी है, जो कम महसूस हो पाती है। अब जो जोश आता है, वह ठंडा होता है, उबाल या उफान भरा नहीं होता है। मुझे भाई, ‘मालिक’ चाहिये, फिर ‘वह’ जैसी मर्ज़ी हो रखे। अब कुछ यह हाल है कि शान्ति की भी शान्ति मालूम पड़ती है। इधर करीब १५-२० दिनों से यही हाल चल रहा है कि २-१ दिन हालत अच्छी बिल्कुल शुद्ध मालूम होती है और २-१ दिन को खराब हो जाती है। अच्छी-बुरी या ऊंची-नीची, यही हालत चल रही है। परन्तु खराब के बाद फिर जो शुद्ध हालत आती है, वह पहले से भी अधिक better या शुद्ध मालूम होती है! अब तो यह हाल है कि जितनी खाली रहूँ, उतनी ही आत्मिक उन्नति मालूम पड़ती है। बस अब यही पहिचान रह गई है।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-168
लखीमपुर
24/9/1951
आप का कोई पत्र बहुत दिनों से नहीं आया। इस कारण ‘आप’ सब की कुशलता के भी कोई समाचार नहीं मिल सके। मेरा पत्र पहुँचा होगा। अब तो आप के आने के दिन भी नज़दीक आ गये। मेरी तबियत बस कुछ थोड़ी सी खराब है। अब ‘मालिक’ की कृपा से इधर की जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, वह लिख रही हूँ।

इधर तारीख २२ से २६ तक अजीब गुमसुम सी रही, परन्तु फिर ठीक हो गई। अक्सर देखती हूँ कि इस गुमसुम के बाद जो कैफ़ियत आती है, वह बड़ी शुद्ध हालत होती है। भाई, अब तो यह हाल हो गया है कि भीतर की दशा और बाहर की दशा में इतनी समानता हो गई है कि अपने को बिल्कुल भूल कर अजीब हल्की विशुद्ध धारा की तरह बहती हुई शक्ल सी महसूस करती हूँ। परन्तु कोई बाह्य शक्ल की तरह नहीं भासती हूँ। एक अजीब कैफ़ियत रहती है, जिसे कैफ़ियत कहना भी बेकार है। क्योंकि यह ‘हालत’ शब्द उससे कहीं भारी लगता है। ऐसा समझ लीजिये कि जैसे बिना अनुभव हुए भी सूक्ष्म वायु हर समय बहती है, इतनी ही हल्की या इससे भी कहीं हल्की है। या यों कह लीजिये कि जैसे भारी नदियाँ, समुन्द्र में जाकर अपना अलग नाम तथा अवयव या रूप को छोड़कर समुन्द्र की लहरों में मिल कर एक हो जाती हैं या इससे भी हल्का समझ लीजिये। ऐसा मालूम पड़ता है कि शरीर के सारे तत्व बह कर बाहर के तत्वों से मिलकर समान रुप से बहने लगे हैं।

मेरे श्री बाबूजी ! न जाने क्या ‘मालिक’ की कृपा है कि ईश्वरीय गूढ़ बातें भी खुद-ब-खुद साफ होने लगी हैं और अधिकतर ठीक होती हैं, क्योंकि पूज्य मास्टर साहब जी से कभी-कभी जब पूछती हूँ तो अक्सर वही निकलती हैं, जो ‘आप’ ने उनके पत्रों में कभी-कभी लिखी हैं। वैसे ‘आप’ जानें। इस दशा के अतिरिक्त जो ऊपर की दशा है, वह अधिकतर जब भीतर देखती हूँ तो वही हालत बहती हुई लगती है। और देखती क्या हूँ, महसूस करते हुए भी महसूस नहीं करती। अब तो बस अथाह समुन्द्र की तरह अपने को अपने भीतर देखने पर मालूम पड़ता है, वह भी गम्भीर शान्त और कुछ अजीब कैफ़ियत लिये हुए। मैंने भाई, अपना हाल जो कुछ भी मालूम हुआ, सो लिख दिया। अब आप जानें, ‘आप’ का काम जाने। अब तो लगाव की chain वगैरह सब भी धार में बहकर एक हो गई है। पूज्य श्री बाबूजी ! अब तो कुछ ऐसी हालत लगती है कि वास्तविक ‘शरणागति’ की प्राप्ति की शुरुआत है और यह भी लगता है कि “सिन्धु में बिन्दु समाय गयो” वाली हालत की शुरुआत है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-169
शाहजहाँपुर
30/9/1951
खत तुम्हारे सब मिल गये। तुम्हारी उरुज (चढ़ाव) व नुजूल (नीचे गिरना) की हालत है। आदमी जितना ऊँचा जाता है, उतना ही नीचे की ओर देखता है। नुजूल में दीनता और नफ़ी (शून्य) की हालत है। तुम्हारे जो ख्यालात आते हैं, वह तुम्हारे नहीं हैं, बल्कि जो विचार उतर रहे हैं, यह उनकी झंकार है। अभी तुम्हारा दूसरा खत मिला। उसका जवाब फिर विस्तार पूर्वक दूँगा। तुम्हारी हालत इन्तहाई मक़सदा नुक्ते पर पहुँचने की उम्मीद दिला रही है।

अम्मा को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।
तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-170
शाहजहाँपुर
1/11/1951
अब मैं पहले से अच्छा हूँ। तुम्हारे १७ सितम्बर के खत का जवाब दे रहा हूँ। तुमने लिखा है कि – “जीवन में मोक्ष का आनन्द प्राप्त हो रहा है”। यह कैफ़ियत तो बहुत ही अच्छी है। इस कैफ़ियत को आखिरी हद तक पहुँचा देने से, इस तरह कि उसका भास न हो, ‘जीवन-मोक्ष दशा’ कहलाती है। यह उसकी शुरुआत है। अब यह जहाँ तक बढ़ जावे। मगर मैं अपने ख्याल की क्या कहूँ कि मुझे किसी जगह पर तृप्ति नहीं होती। मान लिया कि अभ्यासी ‘जीवन-मोक्ष की पूर्ण दशा’ पर आ जावे, तो भी बहुत कुछ आगे मौजूद है। मुझे कुछ इशारात किसी समय हमारे पूज्य लालाजी ने दिये थे, इसको देख कर मेरे होश उड़ते थे। मगर अब न मालूम मुझे क्या हो गया है कि मुझे अपने ठिकाने का भी पता न रहा। सिर्फ लाला जी साहब से कभी-कभी इतनी रोशनी मिल जाती है कि मैं Swim कर रहा हूँ और यह खबर उस समय होती है, जब कि तुम्हारी बड़ी उम्दा-उम्दा हालतें जब मैं खतों में देखता हूँ, तो मुझे बड़ी खुशी होती है और अगर सच पूछो तो यह सब तुम्हारी ही मेहनत का नतीजा है। मैंने तुम पर मेहनत की ही नहीं। और लोगों पर जो मेहनत करता हूँ, तो उतना अच्छा नतीजा बरामद नहीं होता, तो मेरी काबिलयत तो यह है। अगर तुम कहो कि यह सब तुम्हारी काबिलयत का नतीजा है, तो उनमें यह सब बातें पैदा क्यों नहीं होती। अपनी मेहनत ही काम देती है। यह खुशी मुझे ज़रूर है कि ‘जीवन-मोक्ष दशा’ की हालत के तलछट ही ABCD ज़रूर है। तुमने लिखा है कि हल्केपन का भी एहसास नहीं रहा है। इसका जवाब ऊपर दे चुका हूँ। और यह लिखा है कि अपने होने का भी एहसास नहीं है और न अपने न होने का ही एहसास है। यह लय-अवस्था की बहुत उच्च हालत है। सब की उन्नति चाहना, यह ख्याल बहुत अच्छा है। यह एक किस्म की सेवा है। जो अभ्यासी जितना आगे बढ़ता है, यह चीज़ बढ़ती जाती है और मुझमें भी यही बात है। अपने फैलाव का महसूस होने के मानी यह होते हैं, कि विराट देश में हम विचरने लगे हैं। फैलाव की शुरुआत यहीं से होती है और जितना आगे पहुँचता जाता है, उतना ही यह फैलाव की कैफ़ियत भी बदलती है। और, खैर, मैं लिखे देता हूँ, यह समझ कर कि तुम इस दशा का ख्याल उस समय तक नहीं बाँधोगी, जब तक यह दशा खुद-व-खुद न आ जावे। जब तक अभ्यासी ईश्वरीय-दशा में रहता है, तब तक इस फैलाव की सूरत बदलती रहती है। उसके पार कर लेने के बाद फिर फैलाव महसूस नहीं होता उसकी शक्ल कुछ और ही हो जाती है, यहाँ तक बन्धन है। जिस ईश्वर को हम पुकार रहे हैं, वहाँ तक बन्धन मौजूद है। मोक्ष इससे पहले हो जाती है। यह इतनी बड़ी चीज़ नहीं है जितनी यह मालूम होती है। जिस ईश्वर की हम तमाम उम्र याद करते हैं, वही हमारे फंसाव का वायस हो जाता है। जिस समाज में यह बात कही जाये, मुमकिन वह मुझको नास्तिक समझने लगे, मगर मैं उससे एक क्षण भी अलहदा नहीं रहता, इसलिये नास्तिक कहना गलती होगी। अब इस फैलाव में भी अभी बहुत कमी है। उसमें एक चीज़ जिसको पहले से मैं नहीं लिखूँगा और पैदा होनी चाहिये।

अब मैं २६ अक्टूबर के खत का जवाब दे रहा हूँ। तुममें एकाग्रता मौजूद है और बिना जाने बूझे भी तुम्हारे ख्याल की लड़ी ‘मालिक’ की तरफ जुड़ी रहती है, इस लिये जब कोई ज़ोर से बोलता है तो उसकी आवाज़ से उसके तनाव में झटका लगता है, इसलिये तकलीफ़ हो जाती है। तुमने जो कुछ अपना अनुभव मारकाट और अकाल का देखा है, यह सब होने वाली बातें हैं। बिना इसके दुनिया का सुधार नहीं होगा। अभी तीन-चार दिन हुए मैंने तुमको अगले मुकाम पर खड़ा कर दिया है। बस, यह छोटी सी मदद तुम्हारी करता रहता हूँ। जब मैं देख लेता हूँ कि इस मुकाम में फैलाव हो चुका है और सूरत आगे को जाना चाहती है, मगर जा नहीं पाती, तो मैं कुछ धक्का दे देता हूँ।

माता जी को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-171
लखीमपुर
4/11/1951
पूज्य मास्टर साहब जी द्वारा ‘आप’ का कृपा-पत्र मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘आप’ को लाभ है, साँस की तकलीफ़ कम है, ईश्वर को बहुत-बहुत धन्यवाद है। सिर में बहुत तकलीफ़ हो जाने के कारण ‘आप’ को शीघ्र पत्र न डाल सकी। अब कभी चक्कर व सिर में बिल्कुल खालीपने की परेशानी सी रह गई है। पुरानी आदत के अनुसार दो-तीन दिन में चली जायेगी। हाँ, इसके कारण ‘मालिक’ की कृपा से आगे बढ़ने का कुछ थोड़ा सा भास पाकर भी ठीक एहसास न कर सकी। खैर, कुछ परवाह नहीं। उसने रहम करके आगे को धक्का दे दिया। ‘उसकी’ इस कृपा के लिये यद्यपि धन्यवाद के लिये कोई शब्द नहीं है, फिर भी बहुत-बहुत धन्यवाद है। आप ने जो यह लिखा कि – “मगर मैं अपने ख्याल को क्या कहूँ कि मुझे किसी जगह पर तृप्ति नहीं होती”। इसके लिये बहुत-बहुत धन्यवाद है और इस गरीबनी की यह प्रार्थना है कि ‘आप’ इस तृप्ति को तब तक पास न फटकने दीजियेगा, जब तक जैसा और जितना ‘आप’ चाहते हैं, उतना न बन जाऊँ। फिर अभी आध्यात्मिक उन्नति की केवल ‘मालिक’ की अहेतु की कृपा से शुरुआत ही प्रारम्भ हुई है। बस अभी तो यही आशीर्वाद तथा मेहरबानी करिये कि उसे पूर्णतया से प्राप्त करने की तड़प की अग्नि बराबर सुलगती रहे और दिन दूनी रात चौगुनी आत्मिक उन्नति बढ़ती ही चली जावे । काबिलयत की जो ‘आप’ ने लिखी, सो भाई, सच तो यह है कि काबिलयत और नालायकी दोनों को तो उसी दिन छोड़ दिया था, जब से यह पूजा प्रारम्भ की थी और आप पहले पहल जब यहाँ आये थे। दूसरे, ‘आप’ मेरी मेहनत के लिये नाहक लिखते हैं, क्योंकि ‘आप’ ही ने तो मुझे सिखाया था कि –“ऐ मेरे ‘मालिक’ बिना तेरी मर्जी के तेरे दर्शन नहीं होते”। और ‘आप’ ही ने यह सिखाया था कि – “एक ही साधे सब सधे, सब साधे सब जाय”। इसीलिये भाई, मैं काबिलयत या मेहनत क्या जानूँ। मुझे तो बस हुजूर ने जो सबक सिखाया था, वही याद रखने की कोशिश रखती हूँ। मेहरबानी सदैव गरीब पर ऐसी ही बनी रही तो इसमें भी सफल हो जाऊँगी। फिर जरा सी यह ‘जीवन-मोक्ष दशा’, अरे ! यदि ‘मालिक’ की कृपा व मर्ज़ी हुई तो ऐसी-ऐसी करोड़ों मोक्ष दशाओं से भी अधिक अपने ‘मालिक’ पर न्योछावर कर दूँगी। क्योंकि भाई, मुझे तो एकमात्र ‘उससे’ ही काम है और उसे ही जानती हूँ। इधर अब आत्मिक-दशा का यह हाल है कि भाई, अब वह हालत जो बहुत पहले मैंने लिखी थी कि – “जीवन में ही मोक्ष का आनन्द मिल रहा है”, वह हालत अब महसूस नहीं हो पाती, बल्कि उस हालत को तो करीब-करीब भूल सी गई हूँ। उसका कैसा क्या अनुभव था इसका भी एहसास मुझे नहीं हो पाता। फैलाव दिखाई पड़ता है, परन्तु न तो यह मालूम पड़ता है कि अपना है, न कुछ ‘मालिक’ ही का। अब मेरा कुछ अजीब हाल चल रहा है। दूसरी दुनिया या ऊपर की दुनिया में तमाम फैलाव हो चुका लगता है, परन्तु इस फैलाव और उस फैलाव की सूरतों में फ़र्क है। कल अपनी हालत कुछ ऐसी दिखाई पड़ी, मानों जैसे मोक्ष आत्माएं Swim करती हैं। शायद उसमें दाखिला सा हुआ है। अब इधर जो हालतें आती हैं, वे पहले की हालतों से बिल्कुल भिन्न होती हैं। अब जो हालतें होती हैं, वह ऊपरी दुनिया की मालूम पड़ती हैं। जो हालतें अब तक जैसी होती थीं, जान-पहिचान अब उससे आगे की दुनिया में होती महसूस होती है। जहाँ पर थी अब तक वहाँ तक अपनी स्थिति हो गई मालूम पड़ती है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-172
लखीमपुर
10/11/1951
एक पत्र 'आप को लिख चुकी हूँ - उसमें ‘आप’ के पत्र का उत्तर था। आशा है मिला होगा। आशा है, ‘आप’ की तबियत अब ठीक होगी। ‘मालिक’ की कृपा से अब जो कुछ भी अपनी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

यह तो शायद मैं अगले पत्र में लिख चुकी हूँ कि कुछ ऐसा लगता है कि ऊपर की दुनिया में तमाम फैलाव हो गया है और जान-पहचान अब उससे आगे को मालूम पड़ती है। अब न जाने यह क्या है कि अपने को करीब-करीब हर समय कहीं ऊपरी दुनिया में स्थित पाती हूँ। मुझे तो बस ऐसा लगता है कि यहाँ सब काम वगैरह करती हुई भी मैं अब कहीं और ही रहती हूँ, क्योंकि हर समय अपनी स्थिति या मौज़ूदगी हमेशा ऊपरी दुनिया में ही पाती हूँ और वहाँ अपनी स्थिति का जो ख्याल है, बस उसे ही मैं या मेरापन कहा जा सकता है, यद्यपि फिर भी एक प्रकार से अपने को उस मैं या मेरापन से आज़ाद पाती हूँ और कुछ यह भी बात है कि जहाँ पर अपनी स्थिति पाती हूँ, वहाँ से अब जितनी दृष्टि जाती है, सब तरफ तमाम vast और unlimited मैदान पाती हूँ। अब जो हालत आती है, वह स्वछन्द या आज़ाद मालूम पड़ती है। फिर भी इधर दो तीन दिन से या तो सिर की वजह से या कुछ हाल ही है, कि हालत कुछ गुमसुम सी है। शेष आप जानें।

पूज्य श्री बाबूजी ! एक प्रार्थना है, केवल अपना जानकर, जहाँ तक हो सके, इस प्रार्थना को याद रखने की कृपा कीजियेगा। ‘आप’ को याद होगा कि ‘आप’ ने पार साल अम्मा से कहा था कि “अभी छ: वर्ष का तो मैं जुम्मा लेता हूँ कि कहीं जाने का नहीं और आगे ईश्वर जानें”। बस कर जोड़कर ‘आप’ से यही प्रार्थना है कि इसको कृपया भूल न जाइयेगा याद रखियेगा।

छोटे-भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-173
शाहजहाँपुर
18/11/1951
पत्र तुम्हारा मिला। तुमने जब अपनी हालत लिखी, तो मुझे अचम्भा हुआ कि तुम अपनी हालत लिख रही हो, या मेरी। सोचा तो मालूम हुआ कि मेरी गड़ी हुई हालत जो किसी वक्त में थी, अब तुममें उखड़ रही है। ‘मालिक’ का धन्यवाद है कि इसकी पुनरावृत्ति कहीं हो तो रही है। तुम्हारे रोम-रोम का हर मुकाम अब खुल रहा है। इस की मास्टरी हो जाना अवतारों में पाई जाती है। मगर सिर्फ यही बात अवतारों के लिये काफ़ी नहीं है। यह उसका एक छोटा सा अंग है। हर रोम-रोम पर प्रभुत्व कृष्ण जी महाराज को था, मगर अफ़सोस यह है कि हमारे रामचन्द्र जी महाराज भी अवतार थे मगर यह चीज़ उनमें न थी। अगर मैं कहीं इन दोनों अवतारों की तुलना करूँ, तो मैं समझता हूँ कि एक हजार कोस का फ़र्क पड़ेगा। रामचन्द्र जी महाराज में Thought के द्वारा Destruction करने की ताकत न थी और कृष्ण जी महाराज में यह चीज़ कूट-कूट कर भरी थी। एक बात मैं अजीब लिखता हूँ कि कृष्ण जी महाराज को अपने जिस्म का भान न था और रामचन्द्र जी महाराज की यह हालत न थी। हम लोग कृष्ण जी महाराज की पैरवी करते हैं, यही वजह है कि उसी निस्बत से हमारी लय-अवस्था आती है। मैंने पिछले खत में जीवन-मोक्ष दशा के बारे में कुछ लिखा था कि उसका तलछट तुममें कुछ आ चुका है। अब उससे और Advanced हो गया। ईश्वर ने चाहा तो उस हालत का मज़ा चखोगी। एक गाँठ मालूम होती है, उसके टूटने से यह हालत, ईश्वर ने चाहा, पैदा हो जावेगी और न जाने क्या बात है कि तुम्हारे लिये इस गाँठ को तोड़ने की अपनी ताकत से तबियत नहीं चाहती और कोई अगर होता तो मुमकिन था कि मैं यह कर बैठता। चाहता यह हूँ कि तुम अपने अभ्यास और ख्याल की ताकत से चलो और उससे यह टूट जाये। मदद मैं ज़रूर दूँगा। यह मेरा धर्म है।

माता जी को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-174
लखीमपुर
21/11/1951
कृपा-पत्र जो आप ने पूज्य मास्टर साहब जी के हाथ भेजा सो मिल गया। पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘आप’ की तबियत का समाचार पाकर सन्तोष हुआ। ‘आपने’ जो कुछ भी लिखा, सो केवल ‘आप’ की ही कृपा है। फिर भी भाई, मुझे तो ‘मालिक’ चाहिये। मैं तो केवल ‘मालिक’ से इतना ही सीखी हूँ। मेरी जो कुछ भी हालत है और ‘मालिक’ की कृपा से जो भी होगी, अब मुझे तो कुछ ऐसा लगता है, कुछ यह भ्रम तो नहीं। परन्तु कुछ ऐसा ही रहता है कि न जाने यह मेरी हालत है, न जाने ‘मालिक’ की। हाँ, यों कह सकते हैं कि पता नहीं किसकी है। सारांश यह है कि हालत तो महसूस होती है, हालत वाला महसूस नहीं होता। भाई, अब तो कुछ ऐसी हालत अपने में आती हुई अनुभव करती हूँ। ऐसा लगता है कि न तो मैं ही रह गई हूँ, और अब तक जो ‘मालिक-मालिक’, ईश्वर-ईश्वर पुकारती आई हूँ, अब वह भी नहीं हो पाता है। अपनी लाचारी भी हो गई है, क्यों कि अब अपना हाथ कुछ काम नहीं देता और यह हालत तो स्वयं ही आती चली जाती है या यों कह लीजिये कि एकाग्रता भी खत्म होती सी जान पड़ती है। कुछ ऐसी हालत लगती है कि या कुछ ऐसा मालूम पड़ता है कि आत्मा आज़ाद रहना चाहती है, क्योंकि जो ख्याल का ख्याल या ध्यान भीतर बाँधे रहती थी, उसमें अब ऐसा लगता है कि आत्मा को शायद बन्धन लगता है या यों कह लीजिये कि आत्मा उस ख्याल या ध्यान के बन्धन से मुक्त कहीं और अपने वास्तविक घर में रहना चाहती है या रहती है। आत्मा भी न जाने मेरी है, ‘मालिक’ की है, न जाने किसकी है। यह केवल अपने ही लिये नहीं, बल्कि सबके लिये यही हाल हो गया है। कुछ यह भी है कि रंच मात्र भी भेद भाव रहित सर्वत्र सब में केवल एक आत्मा ही समान रूप से महसूस होती है।

एक गाँठ के विषय में जो ‘आप’ ने लिखा, सो जिस ‘मालिक’ की कृपा से जन्म जन्मातंरों के हजारों गुंजलकों से बराबर मुक्त होती चली आ रही हूँ फिर उसकी कृपा के आगे बेचारी गाँठ साफ़ होते कितनी देर लगेगी। क्योंकि पूज्य श्री बाबूजी ! मेहनत व अभ्यास से तो जहाँ तक सम्बन्ध है ‘आप’ को कभी कसर है, कहने का अवसर न मिलेगा।

यह दावा भी ‘मालिक’ की अपने ऊपर भी अहेतु की कृपा देखकर ही रखने की हिम्मत है।

इस पत्र के साथ मेरा दूसरा पर्चा है, वह यदि हो सके तो अकेले में सुनियेगा।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-175
लखीमपुर
9/12/1951
मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। ‘आप’ का कोई पत्र न आने के कारण ‘आप’ की तबियत का कोई भी समाचार नहीं मिल सका। कृपया अपनी सबकी कुशलता का समाचार शीघ्र दीजियेगा। ईश्वर की कृपा से जो कुछ भी अपनी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

‘मालिक’ की तमाम अहेतु की कृपा से गाँठ वगैरह जो ‘आपने’ लिखी थी, अब बिल्कुल साफ़ हो गई है और हालत खुली हुई तथा शुद्धताई पर है। उसकी कृपा से कदम फिर बढ़ता हुआ मालूम पड़ता है। ‘उसका’ बहुत-बहुत धन्यवाद है। करीब आठ-नौ दिन से पीठ भरे में करीब-करीब हर समय रेंगन सी मची रहती है। तमाम गुदगुदी एवं फड़कन सी मची रहती है और अक्सर पीठ में तमाम खुला हुआ तथा खोखला सा लगता है। वैसे तो कभी सामने सीने भर में, कभी माथे व सिर में तथा शरीर के कभी किसी भाग में तथा कभी किसी भाग में यही बात मालूम पड़ती है। पूज्य श्री बाबूजी ! न जाने क्यों मुझ में जो अटल एकाग्रता थी, वह भी खत्म होकर या पिघल कर बाँध तोड़कर समान रुप से बहने लगी है। कोशिश कुछ काम नहीं देती और जाने क्यों अब होती भी नहीं। अब तो भाई, जो है, जैसा है, सो है। ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। और एक न जाने क्या बात है कि मृतात्मा कभी-कभी बहुत मालूम पड़ती हैं और बिल्कुल शान्त दिखती हैं। सोते में जो चैतन्य अवस्था रहती है, उसमें भी अक्सर मालूम पड़ती हैं। परन्तु होती उच्च आत्मायें ही हैं। मेरा तो न जाने क्या हाल है कि अपने लिये मुझे न दिन की आवश्यकता रह गई है और न रात की ही। और मेरी हालत को देखते हुए वे मेरे लिये अब नहीं होते। यही हाल मौसमों का हो गया है या यों कहिये कि ‘मालिक’ की कृपा ने मुझे रात-दिन तथा सब ऋतुओं के एहसास से भी बिल्कुल Free कर दिया है। परन्तु यह सब होते हुए भी जरा कृपा करके ‘आप’ देख लीजियेगा कि कहीं अपने पन का आभास तो नहीं बढ़ गया है या शायद और कुछ हो। भाई अब तो हालत का कुछ अजीब नक्शा है। ठीक एहसास होने पर फिर लिखूँगी। हाँ, एक बात यह हो गई है कि कभी-कभी अजीब तरह-तरह की ताकतों का अपने में अनुभव होता है, परन्तु मेरा ख्याल उस तरफ नहीं जाता।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-176
लखीमपुर
11/12/1951
मैं एक पत्र लिख चुकी हूँ। आज दूसरा लिख रही हूँ। इत्तफ़ाक से वह पत्र भी अभी यहीं है। अब दोनों पत्र ‘आप’ के पास एक साथ ही पहूँचेगें। ता: ८ से इधर तक जो कुछ भी हाल मालूम हुआ है, सो लिख रही हूँ। आशा है, ‘आप’ की तबियत अब शायद ठीक हो गई हो। अब तो पूज्य श्री बाबूजी ! कृपया मेरी देखभाल करिये। वैसे तो ‘मालिक’ सदैव मेरा ‘मालिक’ ही है। ‘वह’ तो सदैव देख-भाल करता ही है, कर रहा है और करेगा। अब तो भाई, कुछ यह हाल है कि जैसे पहले बाह्य नेत्र सदैव मालिक के ध्यान में हृदय पर टिके रहते थे, फिर अब तक आन्तरिक दृष्टि मालिक के ध्यान में टिकी रहती थी, परन्तु अब यह हालत है कि आन्तरिक दृष्टि भी खत्म हो गई है। यदि कोशिश करूँ तो जी बहुत घबड़ाने लगता है। इसलिये अब उससे भी राम-राम हो गई है और एक न जाने यह क्या बात हो गई है कि ज्यों-ज्यों दिन जाते हैं, त्यों-त्यों यह मालूम पड़ता है कि ‘मालिक’ से शायद दूर, बिल्कुल दूर हो गई हूँ। भाई, अब तो यह हाल हो गया है कि अब तो अपने पास या दूर ‘मालिक’ का कहीं कभी रत्ती भर पता तक नहीं पाती हूँ। अब तो बिल्कुल साफ़ मैदान हो गया है और मज़ा यह है कि फिर भी कोई फ़िक्र नहीं होती, खैर ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। यह कमाल भी है कि यदि उसे पास या दूर, कहीं अनुभव करने की कोशिश करती हूँ तो जाने क्या हो जाता है कि तुरन्त मेरा दम घुटने लगता है। इसलिये कोशिश वगैरह भी सब छोड़ दी है। अब तो भाई, वह सपाट मैदान ही ‘मालिक’ है, इसलिये फ़िक्र है कि कहीं अपनापन तो नहीं बढ़ रहा है, क्योंकि अब लय-अवस्था तो ख्याल में भी नहीं आती, क्या करूँ। ‘आप’ जानें ‘आप’ का काम जाने। आप ही देखियेगा कि क्या बात हो गई है। पीठ वाला action अभी बिल्कुल जारी है। कभी-कभी एक हालत ज़रूर अनुभव में आती है। वह तो पूजा आदि से बिल्कुल रहित, आनन्द और बे-आनन्द से रहित, एक कुछ बुरी सी कैफ़ियत आती है। ठीक तरह से मैं अभी उस हालत को नहीं कह सकती हूँ। पूज्य श्री बाबूजी ! मुझे अब अपनी कोई खास उन्नति नहीं मालूम पड़ती है। यद्यपि अवनति तो मेरे पास फटक ही नहीं सकती। कृपया यह लिखियेगा कि मैं क्या करूँ, कुछ समझमें नहीं आता तो रोना आता रहता है। कोई भी अभ्यास नज़र में नहीं गड़ता। अब ‘आप’ ही जानें। जैसी ‘मालिक’ की मर्ज़ी होगी, वैसे रहूँगी।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-177
लखीमपुर
18/12/1951
मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। बहुत दिनों से ‘आप’ की तबियत का कोई समाचार नहीं मिला था, परन्तु कल पूज्य ताऊ जी से यह सुनकर कि ‘आप’ कुकरा जा रहे हैं। इससे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि आप अच्छे हैं। अब ‘मालिक’ की कृपा से इधर जो कुछ भी अपनी आध्यात्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

न जाने अब क्या हाल है कि ‘लय-अवस्था की दशा’ का तो मुझे इतना भी ज्ञान नहीं रह गया है कि होती कैसी है। याद करने से भी याद नहीं आती है। ‘मालिक’ की याद तो ऐसी मालूम पड़ती है कि उसके ख्याल के ख्याल से भी परे हो चुकी है। या यों कहिये कि उसकी याद और अपनायत ख्याल के भी बंधन से मुक्त होकर स्वतंत्र हो गई हैं। कुछ यह हाल है, पहले हर काम Automatically हुआ करते थे, मुझे उनसे कोई मतलब नहीं था, परन्तु अब तो ऐसा है कि उस Automatically से भी मालिक ने मुझे मुक्त कर दिया है। उस हालत को इतना भूल चुकी हूँ कि ख्याल करने से भी ख्याल में नहीं आ पाती। या यों कहिये कि वह दशा भी ख्याल के बंधन से पूर्णतय: स्वतंत्र हो गई है। भाई, अब तो ऐसी हालत है या इतनी स्वतंत्र हालत है कि कभी-कभी मैं यह समझने लगती हूँ कि कहीं मुझमें अपनापन तो नहीं बढ़ने लगा है। कभी यह भ्रम होने लगता है कि कहीं मेरा ध्यान मालिक के ध्यान के बजाय दुनिया में तो अधिक नहीं आ गया। यद्यपि ऐसा कभी नहीं हो सकता है, क्योंकि “राखनहार है साईयाँ, मारि न सकह कोय”। सच तो यह है कि ऐसा लगता है कि कोई भी दशा मेरे वश की नहीं रह गई है। इसलिये ‘मालिक’ ने शायद उनसे मुझे स्वतंत्रता दे दी है और सच भी है जो अब तक सुना करती थी कि –“आत्मा स्वतंत्र है, न उसे तलवार काट सकती है, न वायु सुखा सकती है, न पानी गीला कर सकता है”। मालिक की कृपा से शायद उसी हालत का आनन्द उठा रही हूँ, वैसे आप जानिये। पीठ का हाल बिल्कुल वही है। बस अब ऐसा अनुभव होता है कि भीतर-भीतर सब खुलाव हो चुका है, बस कुछ ऊपरी शेष है, सो भी सब साफ हो जावेगा। अब मालूम पड़ता है, कुल शरीर में सब कुछ खुल-खुला कर ही दम लेगा।

अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-178
लखीमपुर
27/12/1951
मेरा पत्र मिला होगा। आशा है, ‘आप’ स्वस्थ होंगे। आज दिनभर तो कान ‘पण्डितजी’ ऐसी आवाज़ सुनने को सत्याग्रह कर-कर बैठते थे। पैर पुनः पुनः दफ्तर तक दौड़ जाने को मचल उठते थे। हाथ स्वतः ही आपस में जुड़कर मानों अपनी एकता की दुहाई दे रहे थे। परम सौम्य तथा सुमधुर चेहरे के दर्शन को आँखे लालायित थीं। पलक-पाँवड़े बिछाकर अपने इष्ट के स्वागत में विलीन थी। परन्तु अब रात हो चुकी है। ‘आप’ के आने का समय निकल चुका। इसलिये पत्र लिख रही हूँ। खैर, मुझे लगता है कि Proof और कमज़ोरी के कारण शायद आप नहीं आ सके। सम्भव है हमारी आह की थोड़ी सी गर्मी ‘आपकी’ साँस को अधिक आराम न पहुँचा सकी। खैर, मुझे यह विश्वास है कि ‘आप’ जहाँ भी हैं, मेरे हैं, और रहेंगे। अब तो बसन्त पास ही आ गया है। तब तो अवश्य ही ‘आप’ के दर्शन होंगे।

मेरे श्री बाबूजी ! अब तो यह हाल है कि मुर्दा अवस्था का ही सब ओर निवास है। कुछ यह बात हो गई है कि दशा में से सुहानेपन की बू निकल गई है। न उदासी है, न कुछ ऐसा लगता है कि दशा सूनेपन में खोती सी चली गई है। होशी-बेहोशी कैसी। दशा आती जाती रहती है। और होशी-बेहोशी क्या, कुछ तबियत कहीं गोते लगाते रहती है, परन्तु पाती कुछ नहीं। अब तो कुछ ऐसी दशा है कि हृदय में कुछ लिखा ही नहीं, तो पढूं क्या? मेरे श्री बाबूजी ! कहीं लगाव की डोरी में कमी तो, ढीलापन तो नहीं आ रहा है। यद्यपि इस मन से ऐसी रंच मात्र भी आशा नहीं है और फिर मन का तो यह स्वयं ही न जाने क्या हाल हो गया है, कि देखती हूँ कि मन सब जगह है और कहीं नहीं है, इसलिये कहीं नहीं है। परन्तु सम्भव है कहीं आह दबी रह गई है और यह वही (मन) हो। कुछ ऐसी दशा है कि रुप है नहीं और रंग भी धुल चुका है। भाई, अब तो ऐसी दशा है कि जैसे बुझते हुए दीपक की लौ कभी स्वतः ही तेज़ और फिर मध्यम पड़ जाती है। सम्भालना ‘आप’ ही। मैं तो जैसी हूँ, सामने हाज़िर हूँ। मेरी तो यह दशा है कि जैसे न बिगड़ी हूँ न बनी हूँ। तबियत का हाल इसलिये नहीं दिया कि ठीक ही है और फिर ताऊ जी बता ही देंगे। अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इति:-

सदैव केवल ‘आप’ की ही स्नेह सिक्त सेविका’
कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-179
लखीमपुर
29/12/1951
मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। पूज्य मास्टर साहब जी से वहाँ का समाचार मालूम हुआ। ‘आप’ की तबियत कुछ ठीक पढ़कर प्रसन्नता हुई। पूज्य श्री बाबूजी ! मेरी हार्दिक इच्छा है कि आप के दमे की तकलीफ़ आपको हरगिज तकलीफ़ न पहुँचा सके। Dictate का भी पूर्णतया पालन करने में एक क्षण भी नहीं चूकती हूँ, परन्तु फिर भी बिना ‘मालिक’ के सहारे के मैं देखती हूँ कि काम हो ही नहीं सकता। ईश्वर ऐसी कृपा करें कि आप दीर्घ जीवी हों और पेट का हल्का दर्द छोड़कर कोई भी तकलीफ़ (दमा वगैरह) ‘आप’ को तकलीफ़ न पहुँचा सके। वैसे सब ‘मालिक’ की मर्ज़ी पर निर्भर है। अब तारीख २३ से अपना हाल लिख रही हूँ। कुछ यह हाल है कि अपनी तरह जहाँ तक भी अपनी निगाह जाती है, संसार के सब मनुष्य ही क्या, बल्कि जो कुछ भी सामने दिखाई देता है material नष्ट हो गया है। बजाय material के केवल वास्तविकता की एक हालत ही महसूस होती है। वह हालत भी कैसी, जो ‘हालत’ शब्द से परे है, परन्तु फिर भी कहीं वह हालत हो जावेगी, जैसा कि शायद एक बार आप ने लिखा था कि “कुछ नहीं की तह में कुछ ज़रूर है”। और कुछ यह हाल है कि सोते तथा जागते में हर समय चैतन्यता मालूम पड़ती है। जैसा लिख चुकी हूँ कि अपने को हर समय ऊपर की दुनिया में स्थित पाती हूँ और वहाँ की ही हालत में रहती हूँ। वहाँ भी ‘चैतन्य-दशा’ में अपने को स्थित पाती हूँ। यही हाल सोते में का है यानी सोते में भी चैतन्य-अवस्था में ही अपने को वही महसूस करती हूँ। इसी कारण रात या दिन और सोने या जागने का मेरे दैनिक जीवन में कोई विशेष महत्व नहीं रह गया है यानी सब समान रुप से आते जाते हैं और न जाने क्यों अब अपने को इसकी कोई विशेष ज़रूरत भी नहीं मालूम पड़ती है। भाई, एक अजीब हाल है। उस हालत में ख्याल की भी गुजर नहीं।

तारीख २६ की शाम को साढ़े छः बजे केसर की पूजा कराते समय सामने तीन सफेद पर्त, तकिया के गिलाफ के सदृश्य दिखाई पड़े, जो अलग-अलग होकर उड़ से गये और तभी ऐसा मालूम हुआ कि उन्नति आगे बढ़ती जा रही है। पहले मेरा ख्याल हुआ कि केसर आज आगे बढ़ती जा रही है और शायद लाभ उसे काफ़ी हुआ भी, परन्तु बाद को वह कुछ अपनी हालत मालूम पड़ने लगी। भीतर कुछ change भी लगता था। हल्केपन के साथ-साथ आन्तरिक आनन्द बहुत मालूम पड़ता था। अब आप जानें यह क्या था। परन्तु फिर भी श्री बाबूजी ! करीब ४-५ दिन से हालत अच्छी (शुद्ध) नहीं चल रही है। ख्यालात भी सोते में अधिक आते हैं। कोशिश कर रही हूँ, परन्तु कुछ समझ में नहीं आता।

भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-180
लखीमपुर
2/1/1952
ताऊजी के आने की राह देखते-देखते अब पत्र लिखे बिना रहा नहीं जाता, इसलिये लिख रही हूँ। आशा है ‘आप’ की तबियत अब ठीक होगी। कल तो न जाने क्यों ‘उससे’ मिलने की बेचैनी अधिक बढ़ गई थी, परन्तु शाम को जिज्जी के आ जाने से काम के कारण कुछ बेचैनी फिर दब गई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो यह हाल है कि ‘मालिक’ के रोम-रोम में, रग-रग में मैं अपना पता या ठिकाना पाती हूँ।

पूज्य श्री बाबूजी ! अब तो यह दशा है कि पहले तो जब उसकी याद आती थी, तो एकदम कलेजा थाम लेने से कुछ ठीक या कुछ आराम सा हो जाता था, परन्तु अब तो शायद याद कलेजे को चीर कर उसे भी पार कर गई है, क्योंकि अब तो कलेजा-वलेजा थामने से कुछ नहीं होता। वह तो भीतर ही भीतर न जाने कैसा क्या होता रहता है। परन्तु उफान नहीं आने पाता। इसलिये जो कुछ भीतर होता है, उससे जी नहीं घबड़ाता, बल्कि वह मेरा आगे बढ़ने का सहारा हो गया है। मेरे श्री बाबूजी ! अब तो न यह महसूस होता है कि ‘वह’ मुझमें है और पता नहीं मैं ‘उसमें’ हूँ या नहीं हूँ। न मालूम ‘वह’ मुझमें है और न मालूम मैं 'उसमें हूँ। अब तो न जाने क्यों मुझे उसकी याद नहीं आती है, परन्तु जिस हालत में हूँ खुश हूँ। मुझे तो अब दरिया-वरिया वगैरह भी कुछ महसूस नहीं होता है। मैं तो यह महसूस करती हूँ कि ‘मालिक’ में श्रद्धा विश्वास तथा प्रेम के शुद्ध रुप की शुरुआत सम्भव है, अब शुरु हो गई हो। और भाई, यद्यपि मैं तो इन चीज़ों को कुछ नहीं जानती। पूज्य श्री बाबूजी ! मैं तो अब हर चीज से इतनी खाली हो गई हूँ कि मुझे अपने में कुछ महसूस नहीं होता, सिवाय इसके कि जैसे दुनिया के और लोग साधारणतया रहते हैं। अन्तर शायद इतना हो कि यहाँ अब किसी बोझ के लिये स्थान ही न रहा। भाई, पता नहीं मैं क्या चाहती हूँ। मैं क्या करती हूँ, मैं कहाँ रहती हूँ, मालिक जाने।

अब तो वहाँ आने के दिन कम रह गये हैं। अब तो श्री बाबूजी ! मेरा यह हाल है कि दुनियादारी के लोगों के बीच अपने को दुनियादार पाती हूँ, सत्संगियों, में अपने को सत्संगी पाती हूँ और अकेले में कुछ नहीं। तब न जाने मैं क्या रहती हूँ, शायद कोई नहीं।

अम्मा आप को शुभाशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-181
शाहजहाँपुर
15/1/1952
तुम्हारे दोनों खत मिल गये। यह सब हालतें, जो तुमने लिखी है, यह सब लय-अवस्था की बरकत है। जितनी अच्छी जिसकी लय-अवस्था है, उतनी ही ज़्यादा वह कामयाब है। यह चीज़ ज़्यादा मोहब्बत और बार-बार याद से पैदा हो जाती है। इसके लिये तरकीबें भी हैं, मगर उसको बताते हुए मुझे जरा अच्छा मालूम नहीं होता और बहुत अर्से में जिन दो-एक अभ्यासियों को बताई भी उसमें से सिर्फ एक शख्स थोड़ा बहुत कर रहा है। यह चीज़ ऐसी है कि बिना बताये हुए खुद-ब-खुद उसे आ जाना चाहिये। लालाजी ने यह चीज़ किसी को गालिबन नहीं बताई मगर उसके करने वाले निकले और हमारे यहाँ यह है कि इशारे से अगर बतला भी दिया जावे तो कोई उसको grasp नहीं करता। पिछले उत्सव में मैंने एक मज़मून लिखा था, जिसका सब मतलब यही था। मगर उसके सुनने के बाद अब साल खत्म हो रहा है, किसी को फिर याद भी न आई। सच तो यह है कि जबरदस्ती हम ठूंस-ठूंस कर रहे हैं, असली शौक इक्का-दुक्का को होगा। अब इससे जो कुछ फायदा जिसको हो। ‘लालाजी’ साहब ने भी मुझसे महासमाधि लेने से कुछ दिन पहले यही कहा था कि अब तक लोगों में लय-अवस्था भी पैदा न हुई और ज़िन्दगी का रास्ता बिना लय-अवस्था पैदा किये हुए, जिसको फ़नाइयत या मर मिटना भी कहते हैं, नहीं मिलता। अब तुम्हारे यहाँ पर यह चीज क्यों भर रही है? इसका कारण यही है, हमारे साथियों में ईश्वर की कृपा से सब से अच्छी लय-अवस्था तुममें मौजूद है। उसके बाद नम्बर केसर का है, बाकी एक शख्स में और रुपये में करीब एक आना या दो आने भर मौजूद है। मुमकिन है, हालाँकि इसमें शक है, कि छदाम या दमड़ी भर किसी एक और में हो। बाकी भाई, इस वक्त तक सब खाली हैं। अब ईश्वर आगे जिसे दे दे, वह ‘मालिक’ और मुख्तियार है। ब्रह्म विद्या की तालीम बहुत कम इसी वजह से रही है, कि इसके सीखने वाले ज़माने के लिहाज़ से बहुत कम रहे और अब कुछ आँखों पर पर्दा ऐसा पड़ गया है कि लोग इस किस्म की विद्या पर जो अपने यहाँ है, एतबार ही नहीं करते। तुम्हारे घर वालों को मुझ से मोहब्बत बहुत है, इससे भी फायदा अच्छा हो रहा है और जहाँ यह चीज़ है, वहाँ भी फ़ायदा ही है।

तुम्हारी हालत के बारे में मैं क्या लिखूँ? बस ईश्वर का शुक्र है। ऐसी हालतों के लिये हमारे ‘लालाजी’ कहा करते थे कि यह चीज़ अपनी ताकत से पैदा नहीं होती, बल्कि ईश्वर जिसे दे दे। यह तुम्हारी जो कुछ हालत है, इसको मैं ईश्वरी हालत कहता हूँ, मगर जिस हालत पर पहुँचना है, वह अभी बहुत दूर है। ईश्वर वह भी देगा। अव्वल तो इस हालत पर भी जब तक ईश्वर की खास मेहरबानी न हो, पहुँचना बहुत मुश्किल है और कोई अगर पहुँच भी गया, तो बस इसको वह काफ़ी समझ लेता है। वह असल कैफ़ियत, जो वाकई कैफ़ियत है, उसकी यहाँ पर शुरुआत भी नहीं हो पाती। दूसरी चीज़ एक यह भी हालत होती है कि अगर अभ्यासी जहाँ तक पहुँचने की हिम्मत भी करे और पहुँच जावे तो आगे अपनी हिम्मत से जाना मुश्किल क्या, बल्कि नामुमकिन सा है, इसलिये कि ऊपर की ताकत जो दुनिया की तरफ Focus किये हुए है, उसमें चढ़ाई मुश्किल पड़ जाती है। किसी गुरु को उस ताकत पर बहुत कुछ command हो गया हो, तब इसके आगे वह अभ्यासी को फेंक सकता है। हमारे यहाँ यह सब बरकत इस वजह से है कि हमारे ‘लालाजी’ ने इन्तहाई दखल और पहुँच उस या इस हद तक कर लिया था, अपनी ज़िन्दगी में ही जहाँ तक कि एक इन्सान का पहुँचना मुमकिन है और अब तो वह Unlimited हो रहे हैं। अब उनकी ताकत का ठिकाना ही क्या? तुम्हारे वैराग्य की जैसा कि पिछले खत से मालूम हुआ पूर्ण अवस्था है, मगर उसमें Firmness होना बाकी है, यह भी हो जावेगा। यह हालत वैराग्य से बहुत ऊंची है, जो तुमने लिखी है। मेरा जी अब उस हालत से ऊँचा पहुँचाने को चाहता है, मगर मैं उसको अभी तय नहीं कर सका। मुमकिन है, अगर तबियत ने तय कर लिया तो आज ही निकाल दूँगा। खैर, तुमको पता चल पायेगा।

तुम्हारा शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-182
लखीमपुर
18/1/1952
कृपा-पत्र आपका, जो नारायण दद्दा के हाथ भेजा सो मिल गया। समाचार मालूम हुए। मेरी तो जो कुछ भी हालत है, केवल एकमात्र मालिक की ही कृपा का फल है। उसका धन्यवाद जहाँ तक और जितना भी दिया जावे थोड़ा है। मुझ में लय-अवस्था या मोहब्बत है, यह मुझे नहीं मालूम मालिक ही जाने। मुझे किसी से मतलब भी क्या। मुझे तो बस ‘उसकी’ चाह है, ‘वही’ चाहिये। और सब ‘आप’ जानें, ‘आप’ की मर्ज़ी जाने। मुझे तो यह सब इतना थोड़ा मालूम पड़ता है और वास्तव में है भी कि अब ब्रह्म- विद्या की शुरुआत ही लगती है, बल्कि उस शुरुआत की याद भी भूल सी गई हूँ। मैं तो इतना जानती हूँ कि बड़े दिन की छुट्टियों में आप ने एक दिन पूजा में बैठाल कर कहा था कि हालत में कमजोरी आ गई थी, सो उसे फिर पूरा कर दिया। उससे मुझे लाभ यह हुआ कि तड़प में जो कमजोरी आ गई थी, और जो मेरी कोशिश से भी पूर्ण नहीं हो पाती थी, वह ‘आप’ की केवल एक निगाह फैंक देने से वह कमज़ोरी बिल्कुल दूर हो गई। इधर वहाँ से लौटने पर फिर मेरा सिर और तबियत १२-१३ दिन काफी खराब हो गई थी। जी बहुत घबड़ाता था, सिर में बड़ी परेशानी थी, इसलिये मन कहीं नहीं लगता था। अब बिल्कुल ठीक हूँ। कोई परेशानी नहीं है। तिस पर ‘आप’ ने ऊपर उठाने की खुश खबरी दे दी, बहुत-बहुत धन्यवाद है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा समझ में आई, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई, कुछ ऐसा मालूम पड़ता है कि बजाय अपने अन्दर के जो कुछ भी पूजा या ध्यान होता है, सब ‘मालिक’ के अन्दर ही होता है और करने वाला और पूजा क्या है, यह ‘मालिक’ ही जाने, क्योंकि सब एक ख्याल के सदृश्य होता है। या यह कहूँ कि जो कुछ भी पूजा ध्यान होता है, सब ‘मालिक’ के ख्याल के भीतर होता है। भाई, अब तो ईश्वर अंश जीव अविनाशी वाली हालत का नज़ारा दिखलाई देता है। यद्यपि यह सब है वास्तविक ईश्वर-प्राप्ति की हालत के सम्बन्ध में, कुछ यही समझ में आता है। न जाने यह क्या बात है श्री बाबूजी ! कि ऐसी हालत है कि कभी-कभी यहाँ की श्वाँस भी अपने को बहुत भारी और कुछ बुरी प्रतीत होती है। और कुछ यह हाल है कि जैसा मैंने ऊपर लिखा है कि जो भी पूजा-ऊजा होती है, सब ‘मालिक’ के ख्याल के भीतर ही होती है, परन्तु अब तो ऐसा मालूम पड़ता है, वह ख्याल भी कहीं लय हुआ जा रहा है। पूज्य बाबूजी, मुझे तीन दिन से यानी ता: १६ के सबेरे से बस ऐसा लगता है कि अपने ‘मालिक’ के संग में कहीं उड़ी चली जा रही हूं, परन्तु कुछ ऐसा है कि शक्ल महसूस नहीं होती, बल्कि उसे सुस्त या ख्याल कहूँ तो ठीक होगा। पूज्य श्री बाबूजी ! हम सब तो उत्सव के लिये वैसे ही दौड़े आते। ‘आप’ के खास बुलाने की आवश्यकता न थी। खैर, ‘आप’ की मेहरबानी तो अनुपम और अद्वितीय है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-183
लखीमपुर
7/2/1952
‘मालिक’ की कृपा से हम लोग बड़े आराम से यहाँ पहुँच गये। ‘आप’ के थके हुए शरीर तथा दिमाग को आराम मिल गया होगा। हम लोगों के ये आठ दिन कितने अच्छे जाते हैं। यहाँ आकर तीन-चार दिन बहुत Feel होता है। सबकी तबियत हरी हो जाती है। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ। भाई,

अब तो ऐसा लगता है कि दूसरी हवा में आ गई हूँ। न जाने क्या बात है कि शक्ल ‘मालिक’ की कतई ख्याल में आती ही नहीं। परन्तु यह ज़रूर हो गया है कि उसकी शक्ल धुंधली परछांई के समान ही रह गई है। मेरा तो अब कुछ यह हाल हो गया है कि ध्यान को ध्यान से खाली कहूँ तो ठीक होगा। बड़ी भीनी-भीनी दशा लगती है। और कुछ यह है कि जैसे पहले आप ने एक बार लिखा था कि अब Spirituality का ‘अ’, ‘आ’ शुरु हुआ है। परन्तु अब तो यह लगता है, आध्यात्मिकता भी खत्म हुई लगती है, क्योंकि मैं देखती हूँ कि मैं उसको इतना भूल चुकी हूँ कि वह मेरे दिमाग में ही नहीं आती। उसकी मुझे बिल्कुल तमीज़ ही नहीं रह गई है। आध्यात्मिकता होती क्या चीज़ है, उसके क्या अर्थ हैं। इसका उत्तर बस मेरे पास इतना ही रह गया है कि भाई, ‘मालिक’ जानें, क्यों कि कृपा करके उसने मुझे इस आध्यात्मिकता की तमीज़ के बन्धन से भी Free कर दिया है। अब तो कुछ यह हाल होता जा रहा है कि आनन्द, आनन्द के रस से खाली होता जान पड़ता है और यही हाल शान्ति का भी हो गया लगता है। शान्ति की भी शान्ति होती प्रतीत होती है।

पूज्य श्री बाबूजी ! न जाने क्यों मैं जी भर कर ‘मालिक’ की भक्ति नहीं कर पाती। जितना चाहिये, उतना प्रेम ‘उससे’ नहीं कर पाती। कोशिश तो अवश्य चालू किये रहूँगी और ‘मालिक’ कभी न कभी मुझे कामयाब भी अवश्य करेगा, इसमें कोई शक नहीं। परन्तु मेरी यह शिकायत है, अवश्य है कि ‘आपने’ जो पाँच रुपये दिये थे, सो मेरे पास रखे हैं। जब उसे ज़रूरत होगी, तो दे दूँगी। मेरी तो ‘मालिक’ से यही प्रार्थना है कि रोज़ व रोज़ उन्नति बढ़ती ही जावे। पूर्णतया से ‘वह’ मुझे मिल जावे, बस यही इच्छा है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-184
लखीमपुर
10/2/1952
अभी हरि दद्दा से वहाँ के समाचार मालूम हुए। आपकी तबियत ठीक जान कर बहुत खुशी हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा समझ में आई सो लिख रही हूँ। न जाने क्या बात है कि अब अपना फैलाव खत्म हो गया लगता है। मेरी निगाह तो जहाँ तक भी जाती है, सब एक सा लगता है। अब तो हालत जो पूजा के शुरु में थी, उसी हालत की फिर शुरुआत लगती है। ऐसा लगता है कि अभ्यास शुरु से आरम्भ किया है। अन्तर केवल इतना लगता है कि अब झाड़-झंखाड़ से रहित केवल स्वाभाविक ही हालत हो गई लगती है और अभ्यास वगैरह भी एक स्वाभाविक ही हो गया लगता है। मैं देखती हूँ कि हालत में, हर बात में, हर चीज़ में स्वभावतः ही स्वाभाविकपन आ गया है। शायद यही या ऐसा ही हाल फैलाव का हो गया लगता है। और यही नहीं, बल्कि हर चीज़ में एक स्वाभाविक झलक दिखाई पड़ती है। यद्यपि इस झलक में कोई खास रोशनी वगैरह से मेरा मतलब नहीं है, परन्तु कहीं यह स्वाभाविक नूर या रोशनी हो जावेगी। पूज्य मेरे श्री बाबूजी ! न जाने क्यों कुछ ऐसा मालूम पड़ता है, सब तरफ़ कुछ वास्तविकता की ही झलक महसूस होती है, या यह है कि चारों ओर वास्तविकता की ही महक महसूस होती है। पूज्य श्री बाबूजी ! मुझे तो ‘मालिक’ चाहिये। जैसे भी हो, केवल एक ही चाह है और ‘मालिक’ की मेहरबानी से मुझे पूर्ण विश्वास है कि एक दिन वह आवेगा ज़रूर, जब मेरी चाह पूरी होगी। अब एक हालत ‘आपको’ लिखे दे रही हूँ, क्षमा करियेगा। इधर एक अर्से से मुझे न जाने क्या हो गया है कि मेरा ध्येय क्या है, मैं क्या चाहती हूँ, इसकी तमीज़ मुझमें बिल्कुल रह ही नहीं गई है। मुझे यह सब कुछ बिल्कुल भूल गया है। मेरी यह सब कुछ समझ में ही नहीं आता। ‘मालिक’ से निस्बत या सम्बन्ध वगैरह तक की तमीज़ नहीं रह गई है। बस इतना ही ज़रूर शेष है कि तबियत को न जाने क्यों ‘उसके’ सिवाय अच्छा तो कुछ लगता ही नहीं है, वरना मैं हाथ जोड़कर कहती हूँ कि मैं बिल्कुल बेतमीज़ हो गई हूँ और तारीफ़ यह है कि इन सब की तरफ़ कोई ख्याल ही नहीं जा रहा है और न इसमें मेरा कोई खास मतलब ही है। भाई, यह सब आप ही जानें। मैं तो बिल्कुल ना समझ हूँ। ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी हो रखें। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-185
लखीमपुर
14/2/1952
कृपा-पत्र आपके दो आये, समाचार मालूम हुए। ‘आप’ की तबियत ठीक रहे, आप स्वस्थ रहें, ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है। ‘आप’ ने लिखा है कि –“वाकई में कस्तूरी के लिये मेरा काम अब शुरु हुआ है”। परन्तु पूज्य श्री बाबूजी ! मैं तो यही कहती हूँ कि जो कुछ भी मुझे मिला है, बस ‘मालिक’ ने ही दिया है, उसी की मेहरबानी से मिला है, और ‘वही’ दे रहा है, और आगे भी वही देगा। आपने जो सुखदेवानन्द, शिवानन्द तथा नारदानन्द के विषय में लिखा है, तो यद्यपि यह सन्यासी हैं, परन्तु न जाने क्यों इन्होंने अपना अपमान स्वयं कर लिया है, क्यों कि यह परमहंस, पारिव्राजकाचार्य के Titles इन्होंने अपने नाम के आगे लगा लिये हैं, या यदि किसी ने लगाये हैं तो इन्होंने स्वीकार कर लिये हैं क्योंकि शायद छोटे को बड़ा Title देना या बड़ों को छोटा Title देना यह दोनों अपमाजनक हैं। खैर, मुझे क्या, ‘मालिक’ जानें। बस ‘आपकी’ कृपा गरीबनी पर सदैव बढ़ती ही बनी रहे, यही प्रार्थना है। Initiated members के लिये ईश्वर से हमारी प्रार्थना है और उसकी कृपा से ज़रूर कोई न कोई Solution अवश्य निकलेगा, जिससे सब का भला होगा। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

न जाने क्यों तमाम अर्से के बाद इधर उदासी की हालत कुछ थोड़ी सी ही बदले रूप में फिर आने लगी है। कभी कभी सब तरफ़ शायद समाधि अवस्था ही फैली हुई लगती है। कुछ ऐसा लगता है कि जिसको समासम की अवस्था कहते हैं। उस वास्तविक समासम अवस्था की शुरुआत हो गई महसूस होती है या यह कहिये कि इसमें भी स्वाभाविकपना आ गया महसूस होता है। भाई एक तो यह न जाने क्या बात है कि जैसा मैं एक बार लिख चुकी हूँ कि “मालिक से क्या निस्बत है, मुझे इसका भी पता नहीं रहा”, परन्तु इधर तो यह हालत देखती हूँ कि सच पूछा जावे तो मुझे अपने शरीर की निस्बत तक का पता नहीं और भाई, जब हाल यह है कि शरीर ही न रहा, खत्म हो चुका तो उसका सम्बन्ध कहाँ रहे। शिवानन्द, सुखदेवानन्द, आदि के विषय में मैंने कुछ निन्दा के ख्याल से नहीं लिखा है। वैसे अपना एक छोटा सा ख्याल मात्र ही कहा है। वैसे वे सन्यासी हैं, हम गृहस्थों के आदर-पात्र हैं। पूज्य श्री बाबूजी, कभी-कभी ऐसी हालत आती है, ‘मालिक’ से कुछ ऐसी Light मिलने लगती है कि बिल्कुल कुदरती तौर पर चाहे कुछ भी बात हो, उस समय सब सुलझती चली जाती है। यद्यपि उस समय न कोई ख्याल का ही भार अपने ऊपर लगता है, न कुछ। बस Heart बिल्कुल खाली होता है। फिर उसमें न जानें क्या रोशनी सी मिलने लगती है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-186
लखीमपुर
19/2/1952
आपके दो पत्र और आये। एक तो जो रोहन भाई साहब के हाथ आपने ताऊजी के लिये भेजा और उससे पहले डाक द्वारा आया। उसमें हुजूर ने लिखा है कि मेरी कुण्डलिनी साफ़ होने लगी है। यह केवल ‘मालिक’ की ही मेहरबानी हो रही है। जहाँ-जहाँ भी Spirituality के पारस की झलक या निगाह पड़ती है, वह जगह फिर कंचन होकर ही मानेगी। यह पारस तो मैंने उदाहरणार्थ ऐसे ही लिख दिया, वरना ‘आप’ तो जो हैं, सो हैं। जैसे भी हैं, ला-जवाब हैं। आपने अपने नुक्स पूछे हैं, परन्तु मैं तो यह कहूँगी कि यदि अभ्यासी में केवल विश्वास ही दृढ़ हो जावे तो वह यह देखेगा कि उसके नुक्स स्वत: ही डर कर भागने लगेंगे कि कहीं आपकी निगाह न पड़ जावे, जो तुरन्त ही भस्म हो जावे। फिर मोहब्बत की तो बात ही निराली होगी। पूज्य श्री बाबूजी ! ‘मालिक’ की कृपा से एक छोटा सा अपना अनुभव मात्र लिख रही हूँ, वरना मैं तो थोड़ी सी बुद्धि वाली जैसी हूँ, ‘आपके’ सामने हूँ। कुछ ऐसा देखती हूँ कि ज्यों-ज्यों मनुष्य ईश्वर से दूर होता जाता है, उसकी बुद्धि वैसे ही वैसे संकुचित होती जाती है। मामूली सी मोटी बात उसकी समझ में नहीं आती और बेकार बहस करके वह समझता है कि मैंने उस पर विजय प्राप्त कर ली है। परन्तु वास्तविक बात तो यही है कि, खैर, ‘आप’ तो मिसाल को भी मिसाल देने वाले हैं। मैं मास्टर साहब जी को देखती हूँ, बाजी बात वह ऐसी कहते हैं, और समझते हैं जो एक Philosopher की समझ से परे होती है। यदि अभ्यासी ‘मालिक’ के प्रेम की Philosophy अच्छी पढ़ ले और उसमें भी कमाल कर दे तो वह जो करेगा, जो कहेगा और जो समझेगा, वह लाजवाब होगा। मामूली ज़रा सी बात है, ‘आप’ श्री कबीर का पद तुरन्त ही कितनी अच्छी तरह समझ जाते हैं और बड़े-बड़े प्रोफेसरों की समझ में वे पद नहीं आते। इसके माने यही है कि उनकी विद्या Limited है, उनके दिमाग की पहुँच Limited है और आपकी चीज़ अथाह है, Unlimited ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब कुछ ऐसी हालत हो गई है कि लिखते हुए कुछ संकोच होता है, शायद यह Etiquette के विरुद्ध पड़ती है, परन्तु ‘मालिक’ के आगे मैं उतनी ही स्वतन्त्र हूँ क्योंकि बच्चा माँ के सन्मुख बिल्कुल स्वतंत्र होता है। कुछ यह है कि ईश्वर वगैरह कुछ मेरी निगाह में नहीं ठहरता है। यह सब पीछे छूट गया लगता है। मुझे तो बस ऐसा लगता है कि ‘मालिक’ मुझे बराबर ऊँचा खींचे लिये जा रहा है। भाई, यह सब उसकी ही शान है और उसकी ही मेहरबानी है। न जाने क्यों उदासीपन कभी-कभी गाढ़े रुप में आने लगती है। कभी-कभी ऐसा मालूम पड़ता है कि कुछ बादल की तरह मेरे पास उमड़ता चला आता है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-187
लखीमपुर
24/2/1952
कृपा-पत्र आपका पूज्य मास्टर साहब के लिये आया। समाचार ज्ञात हुआ। दद्दा से यह भी मालूम हुआ कि ६-७ दिन हुए आपकी साँस कुछ-कुछ खराब होने लगी थी और ईश्वर की कृपा से दब गई। उसका बहुत-बहुत धन्यवाद है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी थोड़ी बहुत आत्मिक-दशा मालूम हुई, सो लिख रही हूँ।

इधर न जाने क्यों उदासीपन की दशा गाढ़ी आती है। कभी-कभी न जाने क्यों तबियत में उचाटपन बहुत बढ़ जाता है। तबियत बड़ी बेचैन रहती है। न जाने क्यों दिन भर ऐसी तबियत चलती रहती है कि दिन भर छाती कूटा करूँ। परन्तु कूटने से भी आराम नहीं मिलता है। तबियत ‘मालिक’ के प्रेम में डूबना चाहती है, परन्तु मुझसे उतनी हो नहीं पाती। कैसे करूँ, क्या करूँ, न जाने ‘मालिक’ पर मैंने अपना सर्वस्व न्योछावर किया है या नहीं। न जाने वह कैसा है, कहाँ है, कुछ समझ में नहीं आता। न मैं ईश्वर को जानू, न मैं परमेश्वर को जानूँ और भाई, न मैं यह जानूँ कि किसे जानती हूँ। कभी-कभी यह हालत बहुत बढ़ जाती है। परन्तु न जाने कैसे फिर जहाँ की तहाँ आ जाती हूँ। अब यदि आप कहें तो Congress वाला Working फिर शुरु किया जाये। कुछ तो शुरु कर दिया है। आज कल तो अजीब भूली-भटकी सी हालत रहती है।

अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-188
लखीमपुर
2/3/1952
यहाँ सब अच्छी तरह हैं। आशा है ‘आप’ भी अच्छी तरह से होंगे। मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। आजकल कुछ ऐसी हालत रहती है कि मैं बिल्कुल खोई-खोई सी रहती हूँ। परन्तु फिर भी कुछ चैन नहीं, यह क्यों? नहीं मालूम, शायद कुछ खफ्त या पागलपन सवार है। कुछ खीझ भी शायद बढ़ गई है, परन्तु बन्दगी साथ में है। यह ‘मालिक’ की शायद इच्छा है कि यह बेचैनी हद तक नहीं पहुँचने पाती है। न जाने कैसा ब्रेक लग जाता है। और बीच-बीच में दो एक दिन तो कुछ-कुछ ही रहती है, परन्तु फिर बढ़ जाती है। लगातार नहीं रहती है। कुछ समझ में नहीं आता कि यह क्या हाल है। मैं शायद ‘मालिक’ से प्रेम नहीं बढ़ा पाती हूँ , इसलिये हो सकता है। शायद इसी कारण कभी-कभी Heart के स्थान पर बार-बार दर्द सा उठता है, लेकिन धीमा सा। कुछ चिन्ता न करियेगा। पूज्य श्री बाबूजी! न जाने क्यों इस खफ्त में हाय-हाय थोड़ी सी ही देर करने में कुछ मज़ा अवश्य है, परन्तु मैं तो उस मज़े को भी नहीं जानती हूँ। हाँ, यह ज़रूर है कि इस हाय-हाय के बाद उचाटपन शान्त सा हो जाता है, और उदासी हालत (यानी एब आरे से बेखबर) भी नहीं महसूस होती है। परन्तु यह बेचैनी वाली दशा न जाने क्यों लगातार नहीं रहने पाती है। इधर अब कभी-कभी तो पूजा करने के बाद न जाने क्यों उस कमरे या जगह का पूरा वायुमंडल ही बदल जाता है। कुछ अजीब, गंभीर (अविचल शान्ति) सी कैफ़ियत हो जाती है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। पत्रोत्तर दीजियेगा। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-189
लखीमपुर
4/3/1952
यहाँ सब कुशल पूर्वक हैं। मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा मालूम हुई है, सो लिख रही हूँ। न जाने क्या बात है कि ‘मालिक’ से मुझे कोई प्रेम, निस्बत वगैरह कुछ नहीं मालूम पड़ती है। शायद इसीलिये न जाने क्यों अधिकतर मेरी तबियत उचाट रहती है। यदि यह कहूँ कि पूजा तक से तबियत ऊबी या उखड़ी सी रहती है। यदि यह कहूँ कि उसकी याद से भी तबियत उकताई सी रहती है या भरी रहती है, परन्तु चैन फिर भी नहीं। अब न जाने उदासीपन बढ़ता जाता है, तबियत हर समय शान्त तथा स्थाई एक सी रहने लगी है कि वैसे चाहे जो कुछ भी हो, चाहे किसी बात पर गुस्सा कभी आ जाये, कभी यदि कहीं दर्द के कारण या चाहे तबियत वैसे ही परेशान हो, परन्तु भीतर ज़रा भी ख्याल करने से वहाँ तो हर समय समुन्द्र की भाँति गम्भीर हालत ही पाती हूँ और अब कुछ यह देखती हूँ कि जो कुछ भी ‘मालिक’ का ध्यान, ख्याल या याद वगैरह है, वह सब ‘मालिक’ के सूक्ष्म रुप में ही होता है या सब सूक्ष्म रुप ही रह गया है। अब फैलाव तो बिल्कुल फ़र्क ढंग से मालूम पड़ता है। वायु के सदृश्य सर्वत्र फैले हुए, सर्वव्यापी, ईश्वर ‘मालिक’ में उसी (वायु) के ढंग से अपना फैलाव दिखाई देता है। अब पहले की तरह अपना अलग फैलाव कहीं नहीं रह गया है। अब तो ऐसा गुप्त व भीतरी फैलाव है, जिसे फैलाव कहना भी बेकार है। ‘मालिक’ की असीम कृपा से सर्वव्यापकता की वास्तविक दशा का दृश्य दिखाई देता है। सुना है, ईश्वर सर्वव्यापी है, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से वही हालत अब अपने अनुभव में अपनी आँखों से देख ली। यही हाल लय-अवस्था का होता दिखाई पड़ रहा है। फैलाव भी कैसा है कि जिसमें न कोई रुप है, न रंग है, बस असीमित, अरुप वायु के सदृश्य सब हो गया लगता है। फैलाव को अब यदि लय-अवस्था का रुप दे दिया जावे या लय-अवस्था को फैलाव कह दिया जावे या अब दोनों अवस्थायें Combined हो गई, कह दिया जावे, तो ठीक होगा, परन्तु फिर भी मैं अभी अगले पत्र की तरह कुछ कुछ पागलपन के वन में ही विचर रही हूँ। पूज्य श्री बाबूजी ! अब तो अजीब हालत है। अब तो यह हाल है कि जैसे आत्मा, परमात्मा का साक्षात्कार हो गया लगता है। बल्कि शायद इससे भी कुछ अधिक हो (यानी एकता हो गई सी समझिये) “ईश्वर अंश जीव अविनाशी” की दशा में मुझे तो ऐसा लगता है कि जीव ने ईश्वर की पहिचान कर अब अपना अलहदापन छोड़ कर अपनी वास्तविक दशा को प्राप्त हो गया लगता है। परन्तु फिर भी देखती हूँ कि अहंता अभी किसी न किसी रुप में, किसी न किसी कोने में शेष है। यद्यपि स्थूलता से उसका भी कोई मतलब नहीं रह गया है। अब न जाने क्या बात है कि ज्यों-ज्यों दिन बीतते हैं, बन्दगी बढ़ती जाती है। ऐसे चाहे मालूम पड़े या न पड़े परन्तु अपने पर अधिक ही पाती हूँ। कल से Heart की तरफ़ जाने पसली में, न जाने पीठ में या जाने कहाँ दर्द उठा है, परन्तु आज काफ़ी ठीक है। आशा है, कल तक ठीक हो जायेगा। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-190
शाहजहाँपुर
5/3/1952
खत तुम्हारा मिला। पढ़ कर बाग़-बाग़ हो गया। तुमने जो लिखा है – “उदासी की हालत गाढ़ी होती जाती है”। इसका मतलब मेरी समझ में नहीं आया। उदासीपन से मतलब Indifferent from the Worldly things से है, या महज़ सुस्ती से। यह हालत दृढ़ वैराग्य से पहुँचती है। तबियत में उचाटपन रहना अलामत (निशानी) इस बात की है कि घर की याद आती है। घर का मेरा मतलब तुम्हारी कोठी से नहीं है, बल्कि वतन से है, जहाँ से हम सब आये हैं। तुमने लिखा है कि यदि दिन भर छाती कूटा-करूँ, तब भी आराम नहीं मिलता। वाह! वाह! क्या हालत है। हजारों सल्तनतें इस प्रेम पर कुर्बान हैं। बस, इस हालत में डूब कर अगर तुम कहीं दूसरों को तवज्ज़ो दोगी तो मज़ा आ जायेगा। मैं इस हालत में केवल तीन दिन रहा। These are the Things for Living dead. मैं यह चाहता हूँ कि तुम अपनी हालत हर दूसरे या तीसरे दिन बराबर लिखती रहा करो। अगर हालत ज़ब्त से बाहर मालूम पड़े तो अपने पूजा के कमरे में कोच के करीब बैठ जाया करो। ख्याल मैं भी रखूँगा। यद्यपि हालत इतनी ज़ब्त से बाहर नहीं हो सकेगी, क्योंकि पूज्य समर्थ श्री ‘लालाजी’ साहब मुझसे तुम्हारी निगरानी का वायदा कर चुके हैं।

तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ, अम्मा को प्रणाम।
तुम्हारा शुभचिन्तक, रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-191
लखीमपुर
6/3/1952
कृपा-पत्र आप का कल आया। समाचार मालूम हुए। मालिक की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ। भाई, मेरे लिये तो Outer World Vision तो खत्म हो गया है। मेरा तो यह हाल है कि मुझे अब कहीं कुछ दिखाई तक नहीं देता है, कुछ महसूस ही नहीं होता है। मेरा तो Outer तथा Inner Vision दोनों ही खत्म हो गये हैं। मैं नहीं जानती कि मैं कौन हूँ, कहाँ हूँ और किस जगह पड़ी हूँ। अपना-पराया क्या, मुझे तो शायद आँखों से कुछ दीखता ही नहीं है। पूज्य श्री बाबूजी ! न जाने क्या बात है कि आँखों में रोशनी है, मगर देखने की तमीज़ ही नहीं रह गई है। कुछ बुद्धि है, मगर समझने की तमीज़ ही शेष नहीं रह गई है। दुनिया है, मगर मुझे उसकी भी तमीज़ नहीं रह गई है। कान सुनते हैं, मुँह कुछ बोलता है, शरीर काम करता हुआ भागा-भागा फिरता है, परन्तु सब कुछ अनजाने में होता है। मैं तो न जाने किस Vision में खो गई हूँ। न जाने मेरी तो कुछ ऐसी हालत है, कि मैं तो हर दम हाय-हाय करती हुई कलपती रहूँ, परन्तु वाह रे निगरानी करने वाले ‘मालिक’ की रस्सी एकदम ढीली नहीं होती। रस्सी जरा धीरे-धीरे ढ़ीली होती है, परन्तु फिर तनी रहती है, जिससे हालत ज़ब्त के बाहर नहीं होने पाती। यदि कहीं पूरी तौर से रस्सी ढीली कर दी जावे तो मज़ा आ जावे, परन्तु ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। न जाने कैसे और क्या खा आती हूँ , मुझे कुछ नहीं मालूम। फिर न जाने कब सो जाती हूँ, परन्तु इस सोने में मुझे कुछ चैन नहीं, यद्यपि नींद भी कम हो गई है। जी चाहता है कि दिन भर पूजा के कमरे में बैठी रहूँ। परन्तु लिहाज़ ऐसा नहीं करने देता है। खाली होते ही थोड़ी-थोड़ी देर को कमरे में बैठ आती हूँ। वहाँ जो कुछ करना होता है, सो कर आती हूँ। मैं दूसरे-तीसरे दिन पत्र अवश्य डालती रहूँगी। जैसा ‘आपने’ लिखा है, उसी के अनुसार सब करूँगी। हालत क्या है, कुछ पागलपन सवार है, परन्तु फिर भी ‘मालिक’ का अनेकों बार धन्यवाद है कि आपस के रीति-व्यवहार में कोई अन्तर नहीं पड़ता। न जाने कैसे काम उसी तरह ठीक-ठाक होते रहते हैं। न किसी पर हालत प्रगट होती है। यह बड़ा अच्छा है। आपने उदासी की हालत के बारे में पूछा, सो सुस्ती से मतलब बिल्कुल नहीं है। बस तबियत सब तरफ से उचाट हो गई है। काम सब ठीक होते हैं, मगर दिलचस्पी किसी में नहीं रह गई है। फ़र्ज पूरी तौर से होते हैं, मगर रिश्ता कोई नहीं रह गया है और जब खुद अपनी तमीज़ ही खत्म हो चुकी है। जैसा कि ऊपर लिख चुकी हूँ कि “मैं कौन हूँ, कहाँ हूँ” इसकी ही खबर न रही तो यह सब कहाँ से आये। दर्द Heart की ओर धीमा-धीमा बराबर रहता है। हाँ, रात में कुछ बढ़ जाता है, क्योंकि उसकी याद नहीं हो पाती। कोई फ़िक्र न कीजियेगा। सब ठीक हो जायेगा। कृपया इस दर्द को ठीक होने की दुआ न करने लगियेगा। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-192
लखीमपुर
9/3/1952
आशा है मेरा पत्र पहुँचा होगा। अम्मा और बड़े भईया कल आ गये। बड़े भईया को ‘आपके’ पत्रों से काफी सहारा हो गया है। पूज्य ताऊजी भी काफ़ी अच्छे हैं, परन्तु अभी कुछ जुकाम, खाँसी है। मेरा दर्द भी काफ़ी ठीक है, आज तो बहुत ही कम है, कल तक बिल्कुल ठीक हो जावेगा। ‘आप’ बिल्कुल फ़िक्र न कीजियेगा, बिल्कुल ठीक हूँ। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मैं तो अपने को तथा सब कुछ भूल गई हूँ। पूजा के कमरे में जाती हूँ , वहाँ क्या करती हूँ यह नहीं मालूम। किसके लिये, क्यों हाय-हाय करती हूँ, इसका भी पता नहीं, और कौन करता है, इसका भी पता नहीं। भाई मेरा तो यह हाल है कि न अपने को जानूँ न ‘मालिक’ को ही जानूँ, दोनों ही गायब हैं, न कुछ पूजा या प्रेम भी जानूँ। अब तो यह हाल है कि खुद और खुदा दोनों ही न रहे। यह सब न जाने क्या हो गया है। यद्यपि न मैं हूँ न तू ही रहा, वाली दशा है, परन्तु मैं तो इस हालत से भी बेखबर रहती हूँ। पूज्य ‘बाबूजी’ न जाने क्यों कभी-कभी क्या अब तो अक्सर तबियत इतनी उचाट हो जाती है कि घर से कहीं भाग जाने को जी तड़फड़ाने लगता है। परन्तु जब किसी तरह जी नहीं बहलता, तो फिर बस एक क्षण पूजा घर में ही जाकर कुछ देर बैठ आती हूँ। फिर कुछ देर कितना ही पुकारूँ, परन्तु सच तो यह है कि मुझे अब ‘उसकी’ (मालिक) भी तमीज़ शेष नहीं रह गई है। अब तो न ध्येय रहा और न ध्येयक ही, दोनों समाप्त हो गये, परन्तु निगाह न जाने कहाँ खो गई है। पूज्य “श्री बाबूजी” सच तो यह है कि मैं “उसे” खोजने निकली थी, परन्तु हाल यह हुआ कि “उसे” खोजते-खोजते मैं खुद ही खो गई हूँ। अब तो सब ‘उसके’ ही हाथ में है, जब चाहेगा, सो मुझे ढूँढ़ लेगा। ‘वह’ भी मुझे शायद खोज रहा होगा क्योंकि मेरी लाचारी ‘उसे’ पता लग गई होगी। आज से कभी-कभी भीतर ही भीतर बड़ी खुशी सी मालूम पड़ती है। अब तो सब ‘उसके’ हाथ में है, जैसे चाहे रखे। मैं खो गई हूँ, धीरे-धीरे यह भी भूलती जा रही हूँ। परन्तु मेरा मन कहीं नहीं लगता, घर से निकल जाने को तबियत चाहती रहती है। बस न जाने कहाँ भागी-भागी फिरूँ, ऐसा ही जी होता है, परन्तु ‘मालिक’ की लगाम ऐसा करने नहीं देती। न जाने क्यों मेरी तो नींद और भूख सब हर गई है, परन्तु यह न समझियेगा कि बिल्कुल छूट गयी है। मेरा तो अब यह हाल हो गया है कि काम सब होते हैं, मगर दिलचस्पी किसी में नहीं रह गई है। संसार वही है, मगर मेरे लिये तो केवल फ़र्ज अदायगी रह गई है। फिर भी ‘मालिक’ की कृपा से, न जाने कैसे, कमी या गलती मुझसे किसी काम में नहीं होने पाती है। अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं, तथा केसर, बिट्टो ‘आपको’ प्रणाम कहती हैं। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-193
लखीमपुर
11/3/1952
आशा है मेरा पत्र पहुँचा होगा। यहाँ सब अच्छी तरह से हैं, आशा है वहाँ भी सब अच्छी तरह से होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से आजकल जो कुछ भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई पूजा के कमरे में से घंटो निकलने की तबियत ही नहीं चाहती है, मगर ऐसा हो नहीं पाता है। कुछ यह हाल हो गया है कि अपना शरीर, प्राण तथा अन्तरात्मा सब कुछ ‘मालिक’ ही हो गया है। जिस्म भी ‘वही’ है, जान भी ‘वही’ है तथा आत्मा भी ‘वही’ है। जब उचाटपन में तबियत कहीं नहीं लगती है, तो पूजा के कमरे में पड़े-पड़े अक्सर मेरी बेहोशी की सी हालत हो जाती है। अब तो केवल पुकार करने के लिये ‘मालिक’ अलग कह लिया जावे वह भी बिना ‘उसके’ ध्यान (शक्ल का) के, वरना सब कुछ ‘वही’ हो गया है। पूज्य “श्री बाबूजी” मेरी तो वह हालत हो गई है जो एक बदहवाश, बेहोश आदमी की होती है। अन्तर इतना है कि, इस बेहोशी में भी अन्तरात्मा के मन से ‘मालिक-मालिक’ की ही आवाज उठा करती है। वह बेचैनी वाली दशा शायद पहले से बढ़ी हुई ही है। अब तो यह है कि ‘मालिक’ ही मेरा होश है, ‘वही’ शरीर है, तथा आत्मा, दिल है। पूज्य “श्री बाबूजी” मैंने जो पहले वास्तविकता (Reality) की दशा के बारे में लिखा था, वह दशा भी तथा उसकी याद तक भी खत्म हो चुकी है। मैं तो भाई निराकार और निर्गुण सी रह गई हूँ। बीच-बीच में कभी-कभी खुशी की हालत भी चालू रहती है।

‘ईश्वर’ से यही प्रार्थना है कि ‘वह’ कृपा करके क्लोरोफार्म के प्रभाव को खत्म कर दें और ‘आपकी’ Rememberance पुन: तीव्र हो जावे। बेचैनी वाली दशा में बेहोशी की हालत बढ़ी हुई लगती है। छोटे भाई-बहनों को प्यार। अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। होली आप सबको बहुत-बहुत मुबारक हो। आज यानी तारीख १३ से कुछ दशा बदली हुई सी लग रही है, परन्तु अभी-अभी बदली और कभी फिर वैसी ही लगती है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-194
लखीमपुर
18/3/1952
बहुत दिनों से ‘आपका’ कोई पत्र नहीं आया, इसलिये वहाँ का कोई समाचार नहीं मिला। कृपया अपनी कुशलता के समाचार दीजियेगा। अम्मा और बड़े भईया आज गये हैं। केसर, दो दिन को फूलो जिज्जी वगैरह आई थीं, उनके साथ कल चली गई। वह भी यहाँ ‘आपके’ पत्र का बहुत रास्ता देख रही थी। ताऊजी की तबियत अभी बिल्कुल ठीक तो नहीं हुई है। भाई ठीक तो ‘आप’ जानें, परन्तु मुझे उनमें ‘मालिक’ की कृपा से कुछ ‘तरी’ के लिये जो लिखा था, सो कुछ पैदा हुई लगती है।

मेरी आत्मिक उन्नति तो इधर ४-५ दिन से न जाने क्यों कुछ ठप सी या मन्द पड़ गई लगती है, इसी कारण उचाटपन फिर बढ़ गया है। उधर दो दिन तो स्वप्न में करीब ३ घंटे या ४ घण्टे रोते ही बीतते थे परन्तु इधर तो वह स्वप्न वगैरह भी खत्म हो गये हैं। और यही नहीं बल्कि कभी-कभी तो अब अक्सर याद करने की भी तबियत नहीं चाहती है। क्या करूँ, कुछ समझ में नहीं आता है। ‘आप’ ही कृपया कुछ बतलाइये। क्योंकि बेकार करने के लिये ‘मालिक’ ने मुझे एक क्षण भी नहीं दिया है, इसलिये जहाँ तक हो उत्तर शीघ्र दीजियेगा। हालत आज कल कुछ ऐसी ही चल रही है, कोई खास अच्छी तबियत नहीं मालूम पड़ती है। बेहोशी वाली हालत भी अनजाने में ही अधिकतर रहती है, बस यही एक हालत मेरे पास रह गई है, जो अब अनजाने में हुई जा रही है। या मुझे अब उससे भी बदहवासी हुई जा रही है। खैर, ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। पूज्य श्री बाबूजी, उचाटपन तबियत में काफ़ी है। केसर आपसे नमस्ते कहती है। चलते-चलते आपसे नमस्ते लिखने को कह गई है। अम्मा आपको आशीर्वाद कह गई हैं। पत्रोत्तर शीघ्र दीजियेगा। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-195
लखीमपुर
19/3/1952
कृपा-पत्र ‘आपका’ कल पूज्य मास्टर साहब जी के लिये आया था, सुनकर प्रसन्नता हुई। भतीजी होने की ‘आप’ सबको बहुत बधाई है। जैसा कि कहा जाता है, नव वर्ष में लक्ष्मी मुबारक हो। ‘मालिक' की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

पूज्य “श्री बाबूजी” मुझे तो हर समय अधीरता ही घेरे रहती है। कल जो मैंने "आपको" पत्र डाला था, उसमें हालत ठप होने के बारे में लिखा था। परन्तु मेरी समझ से इधर फूलो जिज्जी वगैरह आई और फिर जाने की हलचल में मुझे बहुत कम अवकाश एकान्त बैठने को मिल सका, शायद इसी कारण वैसा मालूम पड़ता होगा। मेरे “श्री बाबूजी” ऐसी हालत चल रही है कि जिसे शायद मैं प्रेम नहीं कह सकती हूँ क्योंकि यदि प्रेम कहा जावे तो दुई आती है और मेरा हाल तो यह हो गया है, मेरी तो सारी सुधि-बुधि खो गई है। न मुझे अपनी सुधि है, न ‘उसकी’ ही, फिर समझ में नहीं आता कि क्या हालत है। न मालूम क्यों मुझे एकान्त में जाने की तड़प हर समय रहती है, परन्तु किस्मत ऐसी है कि कम से कम समय एकान्त के लिये मिल पाता है। क्योंकि घर में न अम्मा हैं, न केसर है, पूज्य ताऊजी की तबियत अभी कुछ खराब होने के कारण अधिकतर घर में ही रहते हैं, इसलिए लिहाज और काम कभी-कभी अब मुझे नागवार से मालूम होते हैं, खैर, ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। यदि मैं लड़का होती तो ‘आप’ निश्चय ही मुझे वहीं पाते। तबियत वहाँ आने को कभी इतनी तड़पने लगती है, परन्तु मजबूरी है। दिल हर समय तड़पता और रोता रहता है। पूज्य “श्री बाबूजी” आपसे मेरी प्रार्थना है कि ‘आप’ हालत का खूब पूरी तौर से मुझे आनन्द बस लें लेने दें, मेरी तबियत बहुत तड़पती है। ‘आप’ अन्दाज से न डरें, अधिक हो जावे तो हो जाने दीजिये, क्योंकि तबियत को रास (दशा काबू में रहना) कभी काफी बुरी मालूम होती है। बस कृपया पूरी तौर से छोड़ दीजिये, तब मुझे बहुत अच्छा लगेगा। समझ लीजियेगा, पोती होने की खुशी में ‘मैंने’ एक भिखारिन को यह दान दिया है। ‘उसका’ प्रेम तो शायद मुझमें न हो, कह नहीं सकती या यह भी कहा जा सकता है कि मुझे उसकी (यानी प्रेम की) तमीज़ ही शेष नहीं रह गई है, और भाई प्रेम की क्या कहूँ जब मुझे खुद ‘उसकी’ ही तमीज नहीं रह गई है। शरीर का सम्बन्ध तो कब का खत्म हो चुका, क्योंकि अब तो यह हाल शायद कहा जा सकता है या हो गया है कि शरीर को छोड़कर, क्योंकि लाचारी है, दिल और आत्मा ‘उसके’ ही नज़र होकर, अलहदगी खत्म करके वहीं जम के रह गई है। यद्यपि शरीर भी इससे बरी नहीं है। भाई क्या करूँ, कैसे करूँ, कहाँ जाऊँ, कुछ समझ में नहीं आता है। बेहोशी से भी बेहोशी हो गई है। पूज्य ‘बाबूजी’ मुझे न तो अब त्याग की परवाह है, न वैराग्य से मतलब है। मैं तो त्याग को भी त्याग चुकी हूँ, वैराग्य से भी वैराग्य प्राप्त कर चुकी हूँ। मुझे तो सब ओर से बेहोशी हो गई है। यद्यपि ‘मालिक’ की कृपा से सब कुछ खत्म हो चुका है, परन्तु फिर भी कुछ शेष है, परन्तु मैं तो उस कुछ को भी नहीं जानती हूँ। मैं तो बस इतना जानती हूँ कि मेरा ‘मालिक’ सब कुछ जानता है, क्योंकि मेरी कलई ‘उस’ पर खुल चुकी है। परन्तु फिर भी हालत पहले से तो कुछ कम ही है। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-196
लखीमपुर
22/3/1952
कृपा-पत्र ‘आपका’ परसों आया। समाचार मालूम हुए। मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ। जो ‘आपने’ दशा में थोड़ा परिवर्तन किया है और लिखा है, वह मैं डायरी में लिख चुकी थी कि ‘आपका’ पत्र आ गया – ‘आपका’ बहुत-बहुत धन्यवाद है।

भाई, मुझे तो अब न जाने क्या हो गया है कि मीराबाई के पद तथा और कुछ भी जिसमें कुछ ईश्वर का प्रेम टपकता है वे पद न गा ही सकती हूँ और न पढ़ ही सकती हूँ। बातें तक नहीं सुन सकती। पूज्य ताऊजी जब सत्संग में सबको कुछ बताने लगते हैं, तो मुझे एक मिनट भी सुनना दुश्वार हो जाता है। जी में कुछ घबड़ाहट सी पैदा हो जाती है। यहाँ तक कि वहाँ का वायुमण्डल भी बाद में कुछ भारी सा प्रतीत होता है। यद्यपि और सबको वह बहुत अच्छा लगता है। फिर बताइये मैं किसी को क्या बता सकती हूँ। खैर, हाँ इतना अवश्य है, मैं यदि अपने काम में लगी रहूँ, तो कोई हर्ज नहीं होता है। न जाने क्यों अब हालत में खुशी बेढब मालूम पड़ती है। आन्तरिक खुशी इतनी कि जैसे बेचैनी होती है। कभी-कभी अपने में से तमाम किरणें फूटती हुई लगती हैं। इधर ३-४ दिन से नाभि में और उसके आस-पास कुछ गड़बड़ सी होती है। सफाई के कारण हल्कापन भी लगता है और कभी-कभी कुछ धीमा सा दर्द हो जाता है। खुशी की भी हालत ऐसी है कि जी चाहता है दिन भर हृदय पकड़े खुश होती रहूँ। कभी-कभी बेहोशी कैसी जो हर समय मेरी हालत चल रही है, उसमें भी भौंचक्केपन में तमाम फैलाव ही फैलाव सा लगता है, परन्तु यह भौचक्कापन कुछ अजीब कैफ़ियत लिये हुए मालूम पड़ता है। भाई, आजकल तो कुछ ऐसी हालत है कि समझ में नहीं आता कि खुश होती रहूँ या रोती और तड़पती रहूँ। अब तो यह हाल है कि दुनिया की परवाह तो कब की छूट चुकी है, परन्तु अब तो न ‘दीन’ की परवाह है, न दुनिया की चाह है। ‘दीन’ और दुनिया दोनों को ही खो बैठी हूँ और मज़ा यह है कि यह सब क्या हो गया इसकी भी परवाह नहीं। अब तो यह हाल हो गया है कि चाह भी चाहना में जलकर झुलस चुकी है। जहाँ से आई थी, ‘जिसने’ दी थी, वहीं और ‘उसके’ पास ही चली गयी है। भाई, ‘उसकी’ चीज़ ‘उसके’ ही सुपुर्द हो गई, अब ‘वह’ जाने, "उसका” काम जाने। जो कुछ भी लय-अवस्था, त्याग, वैराग्य और जो कुछ भी ‘उसकी’ कृपा से था, सबका यही हाल हो गया है। ‘उसकी’ चीजें ‘उसकी’ ही नज़र हो गई, यह बहुत अच्छा हुआ। मेरे पास तो बस एक आग ही शेष है, जो अन्तर में लगी हुई है। सब झुलसाती चली जावेगी। पूज्य “श्री बाबूजी” ‘मालिक’ की अपार मेहरबानी से ‘उसके’ प्रति जो मनुष्य का कर्तव्य है, बस वही कुछ-कुछ पूरा हो सकता है। अब ‘उसकी’ चीज़ में मेरी बेईमानी की नियत (यानी अपना पन) साफ हो गई। अब ‘उसकी’ चीज़ें ‘उसके’ सुपुर्द हो गई। अब ‘उसकी’ जो मौज हो, वह करे। ‘मालिक’ का हजार-हजार धन्यवाद है। भाई, अब तो हालत में एक निराला आनन्द है। अबकी से “आपने हालत क्या बदली है, आनन्द का कोष” ही खोलकर रख दिया है। भाई, सारा शरीर हर समय आनन्द से भरा रहता है। कभी-कभी तो इतना हो जाता है, कि लगता है कि दिल और शरीर वगैरह को तोड़कर बाहर निकल जायेगा। और ‘मलिक’ की कृपा से घर भर में भी यह बात मालूम पड़ती है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ आजकल की बड़ी अलमस्त, बड़ी आनन्दमय दशा है कि कुछ कह नहीं सकती हूँ। अभी तक मेरी ऐसी दशा कभी नहीं आ पायी। भाई, अब तो मैं एक “अलमस्त फकीर” की तरह हो गई हूँ। कभी-कभी आनन्द के कारण थोड़ी देर को शरीर थरथराने सा लगता है, मगर भाई, ‘मालिक’ की कृपा से कोई भी दशा control के बाहर नहीं जाने पाती। यदि चली जावे तो मज़ा आ जावे। छोटे भाई-बहनों को प्यार। छोटी बच्ची के छोटे चाचा जी (सर्वेश) तो बहुत ही खुश होंगे। इति:- कभी-कभी ऐसा लगता है कि मैं वायु के सदृश्य होकर बराबर उड़ी चली जा रही हूँ।

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-197
शाहजहाँपुर
22/3/1952
तुम्हारे सब खत मिल गये। लिखने वाला न मिलने की वजह से हिन्दी में न लिख सका। मामूली बातें तो मैं खुद लिख सकता हूँ, मगर जब ज़्यादा सोचकर लिखना पड़ता है, तो लिखना और सोचना दोनों काम साथ-साथ नहीं हो पाते। हालतें आध्यात्मिक बहुत सी ऐसी हैं, जो आती ही रहती हैं। जो attentive रहता है, और ‘मालिक’ के साथ-साथ जाता है, उसको वहाँ की रंगतें और घाटियाँ अच्छी तरह मालूम हो जाती हैं। आँखे फोड़कर चलने वाले तो बहुत मिलेंगे, हमारे यहाँ इनकी अच्छी तादाद है। पूजा की और बेगार टाली, फिर कुछ मतलब नहीं - यह मेरी नादानी है कि मैंने ऐसे लोगों को अक्सर बढ़ाया है और उससे कोई फायदा नहीं हुआ। बहुतेरों को अब तक समझ में नहीं आया कि क्या चीज़ वह पा गये, इसलिये अब इसमें मैंने बहुत कमी कर दी है। लोगों को शौक और दिलचस्पी पैदा नहीं होती, वरना उनको मज़ा आ गया होता।

तुमने आज के खत में एक बहुत हंसी की बात लिखी है, कि आनन्द की पूरी कैफ़ियत पोती होने की खुशी में ही दे दो। पोती मेरे ज़रूर हुई है, और ईश्वर का शुक्र है। उसकी बड़ी उम्र हो और खुश व खुर्रम रहे, मगर हमें तो इसका एहसास ही नहीं होता कि हमारे पोती हुई है, तो फिर खुशी का एहसास कहाँ से आवे? मगर हमें यह ताज्जुब ज़रूर है कि क्या मैं चीज़ देने को तैयार नहीं, जो तुमने यह लिखा है। मौजूदा हालत तुम्हारी जो कुछ भी है, वह उस आनन्द की कैफ़ियत से बहुत बेहतर है, कि जिसको तुम चाहती हो। पहले steam वाला उभार था और अब बिजली का उभार समझ लो। और यह उससे कई गुणा अच्छा है। तुम्हारे कहने को मुझे टालना नहीं आता, इसलिये बेअख्तियार तबियत चाहती है कि फिर उस हालत में लाकर खड़ा कर दूँ। मगर इसके मानी यह होंगे कि तुमको ऊंचे से नीचे गिरायें। खैर तबियत नहीं मानती, या तो मैं प्रार्थना से इसको control करूँगा या सिर्फ एक दिन के लिये ऐसी हालत पैदा करने के लिये प्रार्थना करूँगा। अभ्यासी को चाहिये कि हर कदम ऊपर को ही जाये। इस हालत में निगरानी इसलिये की जाती है कि कोई अवधूत न हो जावे और आगे की तरक्की रुक जाये और इसीलिये लालाजी ने तुम्हारी निगरानी की।

यह तो बिटिया असल आनन्द का तलछट था और मायावी बू इसमें शामिल थी। मेरी जब यह हालत गुजरी तो मुझसे बर्दास्त नहीं होती थी और एक साहब ने अपनी समझ से अच्छा ही किया, मगर मेरी मौजूदा समझ के मुताबिक उन्होंने गलती की और वह इसको properly handle न कर सके। तुम्हारी हालत तो लालाजी की कृपा से मैंने बहुत systematically ठीक की है। यह मुमकिन है कुछ जल्दी कर गया हूँ। अब चूंकि यह हालत मुझ पर गुज़र चुकी है और तुम भी इसका काफ़ी मज़ा ले चुकी हो, मगर मुझसे अगर कोई कहे कि तुम अपनी मौजूदा हालत पर रहना चाहते हो, जिसमें कोई आनन्द नहीं नज़र पड़ता और न गैर आनन्द नज़र पड़ता है। तो मैं कभी तुम्हारी आनन्दी कैफ़ियत कायम करने के लिये तैयार न हूँगा। मैं तो अपनी मौजूदा हालत में बहुत खुश हूँ जिसका धन्यवाद गुरु महाराज को कहाँ तक दिया जावे। मैं तुमको दूसरी Stage पर पहुँचाने वाला था, जिसको [B] समझ लो। अब मेरी समझ में नहीं आता, मैं क्या करूँ। तुम्हारा कहना टालने की भी तबियत नहीं चाहती। अब तुम जैसा लिखो, वैसा करूँ। मैं सख्त मुश्किल में पड़ गया। नीचे उतारना तरक्की करने वाले को धर्म भी इज़ाज़त नहीं देता और उतारने में झटका भी लग सकता है और बेचैनी भी बढ़ सकती है। मैं आज लालाजी साहब से दर्याफ्त करूँगा कि बिना उतारे हुए कोई शक्ल ऐसी पैदा हो सकती है, गो मेरी समझ से नहीं हो सकती। बिजली की ताकत तो तेज़ की जा सकती है, मगर Steam वाली कैफ़ियत बिना उतारे पैदा नहीं हो सकती। अगर तुम अपनी पिछली दशा को थोड़ी देर को झुका दो तो मौजूदा कैफ़ियत पर अगर गौर करो तो कहीं अच्छी पाओगी। जो आगे stage आती है, उसमें सफ़ाई और सादगी कहीं ज़्यादा होती है।

अभी तो बेशुमार पर्दे तोड़ने को बाकी हैं। उनको देखते हुए अभी Spirituality की शुरुआत ही है। हर मुकाम पर इतनी देर लगाने में हजारों वर्ष चाहिए और मैं अपनी ज़िन्दगी में तुमको ‘धुर’ तक पहुँचाना चाहता हूँ। तुमने जो रोने वाली दशा अपनी लिखी है, उसमें कबीर साहब ने बड़ा अच्छा दोहा लिखा है:-

“हंसी-खेल नहिं पाइयाँ, जिन पाया तिन रोय। हाँसे-खेले पिव मिले, तो कोन दुहागिन होय।।”


तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिंतक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-198
लखीमपुर
24/3/1952
कृपा-पत्र ‘आपका’ दद्दा के हाथों अभी-अभी मिला। ‘आपकी’ इस गरीबनी पर इतनी - अपार कृपा का बहुत-बहुत धन्यवाद है। जो कुछ भी मिला है, सब ‘मालिक’ की कृपा से ही मिला है और कोई चीज़ ऐसी नहीं जो ‘वह’ मुझे देने को तैयार नहीं। पूज्य "श्री बाबूजी” ! मेरी ज़रा समझ कम है, इसलिये ‘आपने’ जो लिखा था कि यदि ‘सिखाने वाला’ और सीखने वाला पास-पास हो तो पूरा सरुर इस हालत का देने में आसानी रहती है, क्योंकि दूर से अन्दाज़ नहीं पड़ता, यद्यपि मुझे पूर्ण विश्वास था, और रहेगा कि सचमुच ‘देनेवाला’ लाजवाब है। ‘आप’ कृपया नीचे को हरगिज़ न लावें। जैसा कि ‘आपने’ लिखा है, आजकल की हालत, उस हालत से कई गुणा अच्छी है। पूज्य “श्री बाबूजी” वास्तव में तो हालत मुझे कोई भी ‘मालिक’ से अधिक प्यारी नहीं है। मैं कुछ नहीं बस जैसा कि ‘आपने’ एक बार लिखा था और अब भी लिखा है, बस वही मैं हूँ और उस की जी, जान से कोशिश करूँगी कि कदम सदैव ऊपर को ही बढ़ता जावे। पूज्य समर्थ “श्री लालाजी” को धन्यवाद कौन दे सकता है, उनकी मेहरबानी तो अपार है। ‘उन्होंने’ हम लोगों पर अपार कृपा करके ‘आपको दिया है’। बस पूर्ण रुप से ‘मालिक’ को प्राप्त करने की कोशिश ही ‘उनका’ कुछ थोड़ा सा धन्यवाद दे सकता है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मुझे आनन्द-वानन्द कुछ नहीं चाहिये, मुझे तो बस ‘मालिक’ ही चाहिये। मुझे यह नुकसान ज़रूर रहा कि ‘आप’ [B] मुकाम पर पहुँचाना चाहते थे, अब कुछ देरी हो गई। परन्तु ‘मालिक’ की मेहरबानी ज़रूर सब कुछ ठीक कर लेगी। ‘आपकी’ जो मर्ज़ी हो, ‘आप’ वैसा ही किया करें। क्योंकि मेरी भी खुशी हमेशा ‘आपकी’ खुशी में ही है। ‘आप’ की मर्ज़ी के खिलाफ करोड़ों आनन्दों का भी सुख मुझे कदापि सुखी नहीं कर सकता, बस "आपकी” जब मर्ज़ी हो मुझे बढ़ाते चलिये। मेरे लिखने पर कुछ ध्यान न दीजियेगा। सचमुच मैं लिख भी चुकी हूँ कि जब आगे का stage आता है, तो सफ़ाई और सादगी बढ़ी हुई हमेशा मालूम पड़ती है। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो ऐसा लगता है कि ‘उस’ ओर देखते-देखते नज़र ही खत्म होने लगी है, रोशनी ही खत्म होने लगी है। ‘उसी’ को सोचते-सोचते देखती हूँ कि ख्याल भी खत्म हो जाता है। या यों कह लीजिये कि और कुछ सोचने की आवश्यकता ही नहीं रह गई है। होश उस तरफ़ रखते-रखते अब होश भी जाता रहा, सब ओर से बेहोशी हो गई है। अब तो भाई, बिल्कुल ‘उसके’ हवाले हो गई हूँ जैसे रखेगा, वैसे ही रहूँगी। अब तो कुछ यह हालत है, कि

“जहाँ बैठारे तित ही बैठूँ, जो देवे सोई खाऊँ, तथा जो पहिरावे, सोई पहिरूँ, बेचे तो बिक जाउँ, मैं तो गिरधर के घर जाऊँ”।
क्योंकि भाई, सिवाय ‘मालिक’ के अब ऐसे अपाहिज को रखेगा भी कौन? यह तो बस एक ‘वही’, ‘उसी’ का घर है, जो सबकी सम्भाल करता है और जिसका घर सदैव सबके लिये खुला है। भाई, अब तो हालत विदेह-हो गई है। न जाने क्या बात है कि ऐसा लगता है कि मुझमें तरी कम होती जा रही है, परन्तु हालत बहुत अच्छी है। शेष फिर लिखूँगी, क्योंकि किसी तरह जल्दी से जल्दी यह पत्र ‘आपके’ पास पहुँच जावे, यही फ़िक्र है। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-199
लखीमपुर
25/3/1952
कृपा-पत्र ‘आपका’ आज मिला। उत्तर तुरन्त ही लिखकर ड़लवा दिया है। अब पता लगा दद्दा से कि वे सबेरे की Train से ही शाहजहाँपुर जा रहें हैं, इसलिये जल्दी में यह छोटा सा पत्र ‘आपको’ लिख रही हूँ।

कृपया ‘आप’ सदैव वही करें जो ‘आप’ चाहें, मैं उस समय उभार में वैसा लिख गई थी। मेरी हमेशा वही मनशा है, जो ‘आपकी’ है। ‘आप’ पशोपेश में पड़ गये, मेरी ज़रा सी नासमझी के कारण, इसके लिये ‘मालिक’ से मेरी प्रार्थना है कि फिर ऐसी गलती मुझसे न हो। पूज्य “श्री बाबूजी” आपकी कृपा और मुहब्बत ने ही मुझे खरीद लिया है। ‘आपका’ तथा पूज्य समर्थ “श्री लालाजी” को कोई कैसे धन्यवाद दे सकता है, बस इसका ज़र्रा-ज़र्रा ‘मालिक’ का ही हो जावे, तभी कुछ धन्यवाद अदा हो सकता है। पूज्य “श्री बाबूजी” मुझे न तो किसी हालत से प्रेम है न किसी की चाह है, मुझे तो बस जो है वो केवल ‘एक’ से ही है। आप हरगिज़ नीचे न लावें, क्योंकि मेरा तो जैसा ‘आपने’ लिखा था और फिर लिखा है, कदम बस आगे ही बढ़ेगा, इसमें सन्देह नहीं, बस ‘आपकी’ तो मुझ गरीब भिखारिनी पर जो कृपा है वह तो कही ही नहीं जा सकती। हालत में सादगी और सफ़ाई उभार के बाद हमेशा आती है, वही हाल ‘मालिक’ की कृपा से अब है।

भाभी का बुखार अब कम है, सुनकर कुछ सन्तोष हुआ। आशा है मेरा पत्र परसों ‘आपको’ मिल ही जावेगा। छोटे भाई बहनों को प्यार। ‘आपने’ तो मुझे हर चीज़ बराबर देने की कृपा की है और देने को तैयार हैं, बहुत-बहुत धन्यवाद है और इसमें सन्देह भी नहीं है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-200
लखीमपुर
26/3/1952
आशा है, मेरे दो पत्र मिल गये होंगे। पूज्य ताऊजी के पत्र से यह पढ़कर बहुत फ़िक्र हो गई कि होली में ‘आपकी’ साँस फिर उखड़ आई थी और खाँसी अब भी है। दिल का दर्द भी कई बार उठा, न जाने क्या बात है कि ‘आपको’ साँस की तकलीफ़ क्यों अब भी उखड़ ही आती है। क्या किया जावे, कुछ समझ में नहीं आता, जिससे कम से कम ‘आपकी’ यह तकलीफ़ चली जाती। यद्यपि यदि ‘मालिक’ की कृपा शामिल रही, तो जल्दी attack नहीं हो सकते और आगे भी कोशिश बराबर होती ही रहेगी, परन्तु ‘उसकी’ ही कृपा का आसरा है, करने वाला भी ‘वही’ है, इसमें सन्देह नहीं।

पूज्य “श्री बाबूजी” आपका कृपा-पत्र पढ़कर तो आँख ही खुल गई कि सिवाय ‘उसके’ और ऐसी और इतनी कृपा कौन कर सकता है। सीखने वाला तो बस मस्त रहता है, परन्तु सिखाना काम वाकई बड़ा कठिन होता है। यद्यपि यह अवश्य है कि समर्थ सद्गुरु की शरण के सहारे तो मुश्किल चीज़ कोई रह ही नहीं जाती। कितनी systematic तरीके से ‘आप’ मुझ गरीब पर मेहरबान हो रहे हैं देखकर कभी-कभी तबियत अवाक हो जाती है। बस मेरे “श्री बाबूजी” मेरी एक प्रार्थना यह ज़रूर है कि यद्यपि ऐसा अब होगा नहीं (यानी ऐसा ‘आपको’ पत्र नहीं लिखूँगी) कि ‘आप’ मेरे लिखे की ओर विशेष ध्यान न देकर, जैसा ठीक समझा करें, वैसा ही किया करें और मैं भी इसी में ही हमेशा बहुत खुश रही हूँ और हमेशा रहूँगी। कृपया अब ‘अपनी’ तबियत का हाल अवश्य दीजियेगा। ‘ईश्वर’ ‘आपको’ अच्छा रखे, यही सदैव ‘उससे’ हमारी प्रार्थना है। निगरानी की कितनी विशेष महानता है, यह मैं नहीं समझती थी, बस इतना जानती थी कि यह भी ‘मालिक’ की कोई महान कृपा है। पूज्य “श्री बाबूजी” धर्म-धर्म तो सब चिल्लाते हैं, धर्म का इतना मर्मज्ञ कि “सीखने वाले को ऊपर से नीचे उतारना धर्म आज्ञा नहीं देता”, और कोई नहीं है। ‘आपने’ लिखा है कि मैं हिन्दी लिखने का कुछ अभ्यास करूँगा, यह बड़ी कृपा है। परन्तु ‘आप’ उर्दू में तो लिख ही देते हैं, उससे ज़रूरी बातें मैं लिख ही लेती हूँ। उर्दू में ‘आपको’ लिखना फिर भी आसान है, परन्तु हिन्दी में आपको कठिनता भी होगी। मेरा काम भी निकल ही आता है, इसीलिये यदि ‘आप’ चाहें तो यह परेशानी न उठावें। वैसे कुछ भी लिखना ‘आपके’ लिये कितना कठिन होता है, परन्तु क्या करूँ लाचारी है। यदि मैं लड़का होती तो चाहे कितनी भी मुश्किल होती, उर्दू ज़रूर सीखकर ‘आपकी’ वह तकलीफ़ बचा ही लेती। चाहती मैं अब भी हूँ कि कुछ पढ़ ही लिया करूँ, खैर जो उसकी मर्ज़ी होगी। वैसे अब भी यदि ‘आपके’ पास रहती होती तो English और हिन्दी तो लिख ही लेती, खैर देखा जायेगा। ‘मालिक’ का धन्यवाद है कि पूज्य ताऊजी में तरी पैदा हो गई, इसलिये मज़ा भी उनको आने लगा।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-201
लखीमपुर
27/3/1952
मेरे पत्र आपको मिले होंगे। ‘आपको’ एक पत्र लिख चुकी थी, परन्तु उसमें हालत नहीं लिखी, इसलिये अभी यह दूसरा पत्र लिख रही हूँ।

अब तो भाई, यह हाल हो गया है कि यदि चुपचाप शान्त बैठ जाऊँ और आँखें तो खुली ही रहती हैं, तो पलकों को यह याद ही भूल जाती है, कि उनका काम खुलना-मुंदना है, बस जड़बत से हो जाते हैं। और भाई, मुझे तो यह मालूम ही नहीं होता है कि क्या होता है, क्या नहीं, कुछ ख्याल ही नहीं रह गया है। जैसा मैंने लिखा था कि ख्याल भी जाता रहा, वही हालत हो गई है। न जाने क्या बात है कि मुझे तो अब कुछ होश ही नहीं रह गया है, क्या होता है, क्या नहीं, मैं कुछ नहीं जानती हूँ। यहाँ तक कि न मुझे पूजा का होश है, न शायद ‘मालिक’ का ही है, परन्तु फिर भी देखती हूँ कि भीतर मुझे शायद ‘उसके’ बगैर चैन भी नहीं है। वाकई में यह अब समझ में आया कि चैन जो कभी कभी मुझे बुरा लगता था, वह कितना मुबारक है, नहीं तो अब तक मेरी सारी चेतना लुप्त हो गई होती, फिर आगे, उन्नति का सवाल ही कहाँ रह जाता है? ‘मालिक’' का बहुत-बहुत धन्यवाद है, परन्तु अनुभव इस हालत का ‘उसकी’ कृपा से मुझे पूरा है, क्योंकि वैसे तो जैसे बिना होश के सब हो जाता है, परन्तु २-३ मिनट को कभी इतना ज्ञान तक जाता रहता है कि उस समय यदि कौर मुँह में हो तो, यह समझ में नहीं आता कि इसका क्या करूँ, चबाऊँ थूक दूँ या ऐसे ही रखा रहने दूँ, इसका ज्ञान ही नहीं रहता है। ऐसी हालत में कोई लाख ईश्वर-ईश्वर पुकारा करे, ‘मालिक’ की रट लगाया करे, परन्तु मुझे यह कुछ नहीं मालूम पड़ता कि यह न जाने क्या कह रहा है? परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से २-३ मिनट से अधिक चेतना बिल्कुल लुप्त नहीं होने पाती है। नहीं तो भाई, यह सूरत होती कि जब कोई नहलाता तब नहा लेती, कपड़ा पहिनाता तो पहिन लेती, खिलाता तब जाने खाती या क्या करती, मैं नहीं जानती। बिल्कुल दूसरे पर आश्रित हो जाती, खैर, मैं तो भाई, ‘उस’ पर आश्रित हूँ, जैसी उसकी मर्ज़ी हो करे। ‘उसका’ बहुत-बहुत धन्यवाद है। मेरे पूज्य “श्री बाबूजी” कल से बहुत शुद्ध हालत लगती है। कुछ यह हाल है कि हर समय ‘भौंचक्केपने की गाढ़ी सी दशा’ रहती महसूस होती है। और एक अब ऐसी हालत आती है कि जैसे पानी में से तरी और ठंडक निकाल दी जावे तो फिर जो शेष रहता है या यों कह लीजिये कि किसी चीज़ में से सार निकाल कर फिर जो शेष रहता है कुछ वैसी ही हालत आती है।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’, एक working को बहुत तबियत चाहती है, कि जमीनदारी हरगिज़ abolish न होने पावे, सो कुछ तो शुरु कर ही दिया, परन्तु आपकी आज्ञा का इन्तज़ार है। दूसरे संसार की पृथ्वी में यदि भंडार से ईश्वरीय धार की धारें गिरती हुई ख्याल बाधूँ तो शायद जल्दी हो जावे, जैसा आप लिखेंगे, वही होगा।

बड़े भईया का पत्र आया था। chemistry practical लिखा है कि मेरी समझ से अच्छा हुआ है, वैसे कोई कुछ कह नहीं सकता है। फिज़िक्स Practical ता.३१ को है। केसर ने आप को प्रणाम लिखा है। पढ़ाई में खूब जुटी हुई है, क्योंकि ता.१ से उनके Papers हैं।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-202
लखीमपुर
30/3/1952
कृपा-पत्र आपका आया, समाचार मालूम हुए। सुनकर खुशी हुई और ‘मालिक’ का बहुत बहुत धन्यवाद है। भाभी की तबियत भी ठीक सुनकर बहुत खुशी हुई। मेरा पत्र पहुँचा होगा। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

अब बेहोशी वाली हालत का कुछ यह हाल है कि जब अपनी हालत से होश आता है, तब यह बेहोशी की हालत महसूस होती है, वरना नहीं होती है। अब मेरी कुछ और दशा हो गई है, क्योंकि जब उस हालत से होश आता है, तभी बेहोशी की हालत और उसी में ही भौंचक्केपन की गाढ़ी दशा महसूस होती है। दुनिया से तो मैं बिल्कुल अपने को सोता हुआ ही पाती हूँ बल्कि यों कहिये कि यह तो स्वाभाविक हो गई है, या यह तो मेरी अब प्रकृति ही बन गई है। यहाँ की हर बात, हर काम मुझसे ऐसे होते समझ लिये जायें, जैसे स्वपन में मनुष्य तमाम काम करता है, सबसे बातचीत करता है, बस इससे अधिक और कुछ नहीं। अन्तर इतना है कि उस स्वप्न में अपना (यानी मैं का) ख्याल ज़रूर रहता है, और इस स्वप्न में इसका कहीं पता नहीं रहता है। इधर तीन-चार दिन से पीठ में रीढ़ की गुरियों में फिर फड़कन और गुदगुदापन सा रहता है। पूज्य “श्री बाबूजी” न जाने अब यह क्या बात है कि सारे शरीर में गुदगुदापन भरा मालूम पड़ता है। हालत भी पहले से बिल्कुल भिन्न महसूस होती है। पहले दशा आँखों के सामने महसूस होती थी और अब तो शायद सोती हुई अवस्था (या मुर्देपन की अवस्था) में भी जो कुछ चैतन्य अवस्था रहती है, उसमें महसूस होती है। और ऐसा लगता है कि बहुत दूर से, बहुत हल्के तौर पर या यों कह लीजिये कि स्वभावतयः ही महसूस होती है। यही नहीं, अब यदि गौर करूँ तो, भाई, न जाने क्यों सारे शरीर के प्रत्येक रोम-रोम में वही कुछ सिरसिराहट और गुदगुदापन महसूस होता है। कुछ ऐसा लगता है कि वह बेहोशी वाली दशा तो मेरी प्रकृति ही बन गई है। तबियत अब इससे परे कहीं रहती है, और न जाने क्यों कुछ ऐसा हो गया है कि अपनी आदत के अनुसार अब जब इस बात का ख्याल आता है कि सब कुछ (यानी शरीर का ज़र्रा-ज़र्रा और जो कुछ भी है) केवल ‘वही’ है, ‘उसी’ का है, तो अब यह समझ में ही नहीं आता या इसका कुछ ध्यान ही नहीं रहता कि यह सब कुछ चीज़ क्या है? अब तो भाई यही है कि ‘उसी’ को सोचते-सोचते ख्याल ही जाता रहा। अब जो ‘उसकी’ मर्ज़ी हो करे। अब वह बेचैनी तो जाती रही, परन्तु न जाने क्यों अक्सर बैठे- बैठे बहुत रोने की तबियत चाहती है। मेरी हालत अब कुछ अजीब सी ही चल रही है।

पूज्य “श्री बाबूजी” ता.१५ अप्रैल को उत्सव आ रहा है, यदि मर्ज़ी हो तो ‘आप’ जब मन हो तब पधारने की कृपा करें। माया, छाया, उमेश व भईया को भी लेते आने की कृपा कीजियेगा। ‘आपको’ सफ़र में तकलीफ़ होती है इसलिए बुलाने की हिम्मत नहीं पड़ती है। ‘आप’ जैसा चाहें, वैसा करियेगा। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-203
लखीमपुर
2/4/1952
मेरा पत्र पहुँचा होगा। आशा है ‘आपकी’ तबियत अब ठीक होगी। अब उत्सव आ रहा है, परन्तु मैं देखती हूँ कि मेरे लिये तो सदैव उत्सव ही उत्सव है। जहाँ चन्द्रमा है, चाँदनी भी वहीं है, जहाँ सूरज है, प्रकाश भी वहीं है, इसलिये जहाँ ‘मालिक’ है, उत्सव भी वहीं है। अभ्यासी का तो बस ‘मालिक’ ही उत्सव है, उसे उसी से काम है। यद्यपि दिन तो अवश्य ही महत्वपूर्ण है और रहेगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

भाई, आजकल तो आत्मा और परमात्मा के संयोग की सी दशा है। परन्तु मुझे तो न आत्मा से मतलब है, न परमात्मा से काम है, मुझे तो बस ऐसी दशा लगती है कि “आली प्रभु के मिलन में अंग-अंग अनुराग”। परन्तु यहाँ अनुराग वगैरह तो मैं कुछ जानती नहीं, क्योंकि जब अपनी ही खबर न रही, फिर अनुराग को कौन पहिचाने? पूज्य श्री बाबू जी फिर मुझे ऐसा लगता है कि मेरा तो बिछोह कभी हुआ ही नहीं। मुझे यह याद ही नहीं पड़ता कि मैं ‘उससे’ कभी खाली और अलग रही हूँ, यह असम्भव है। इधर तो अब यह हाल है कि दिन रोते ही बीतते हैं। कभी-कभी ज़ोर से रोने को तबियत चाहती है, सिसकी बंध जाती है, परन्तु कारण कुछ नहीं मालूम। खैर, मुझे बस ‘उससे’ ही काम है। भाई, ऐसा लगता है कि अंग-अंग में कुछ भर गया है, रोम-रोम में कुछ समा गया है। परन्तु अनुभव में इतना ही आता है या ऐसा लगता है कि वह तमाम खुशी तो जो होती थी, सो खत्म हो गई। अब शरीर के भीतर बाहर रोम-रोम में सिहरन तथा मीठी सी गुदगुदी सी मालूम पड़ती है। तमाम रोने के बाद या ज्यों-ज्यों रोती हूँ, उसके बाद यह दशा अधिक और शुद्ध तथा स्वाभाविक रुप में मालूम पड़ती है।

और पूज्य श्री बाबूजी, न जाने कब से मेरी यह हालत तो अब बिल्कुल स्वाभाविक ही हो गई है, कि जैसे कोई हाथ कहे, तो हाथ स्वाभाविक तौर पर खुद उठ जायेगा वरना मुझे यह कुछ महसूस नहीं होता कि यह हाथ ही उठा है। पेट में या शरीर में कहीं भी दर्द हो तो यदि धीमे-धीमे हो तो बहुत हल्के तौर पर यह होता है कि इस जगह दर्द होता है, परन्तु जब ज़ोर से उठता है, तब ठीक ठिकाने का (कि पेट में है या हाथ में है) पता लगता है। यही नहीं, यदि मैं यह ख्याल बाँध कर कहूँ कि यह हाथ है तो भी कहते-कहते हाथ का ख्याल तो भूल ही जाता है और यह बात अब कोई नई नहीं मालूम पड़ती, बल्कि ऐसा लगता है कि यह तो कुदरतन थी ही। कभी-कभी दिन में तबियत उचाट बहुत होती है। परन्तु पहले से कम है। हालत अक्सर बड़ी नीरस सी आती है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। केसर ने आपको प्रणाम लिखा है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-204
लखीमपुर
6/4/1952
कल मनीआर्डर के फार्म में वहाँ के समाचार मालूम हुए। सुनकर अफ़सोस हुआ। कृपया ‘आप’ अपनी तबियत को न बुझनें दें, क्योंकि ‘आप’ से तो हम लोगों को जिला मिलती है। फिर यदि दो-तीन ही आदमी काम करने वाले हैं, उनमें पूरी Activity है, तो फिर तो कोई चिन्ता नहीं, क्योंकि कहा जाता है कि काम करने वाले का एक-एक रोयाँ एक-एक मनुष्य के बराबर की शक्ति का होता है। मिशन को तो ‘मालिक’ की कृपा ने ही सदैव जिला दी है और सदैव देता रहेगा। फिर ‘आपने’ मुझे बताया था कि तबियत को निराश कभी नहीं होने देना चाहिये। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

कुछ ऐसा लगता है कि मुझे यह भी याद नहीं रहता कि मेरी बेहोशी की हालत रहती है और कुछ यह है कि एकाध सेकण्ड को जैसे ही याद आती है, बस फिर गड़प सी हो जाती है। जब याद आती है, उस सेकण्ड बस इतना भास होता है कि कहीं से आई हूँ, जैसे डूबा हुआ मनुष्य या यों कहिये कि मुर्दे में एक क्षण को कुछ चैतन्यता सी आती है, परन्तु उस चैतन्यता को चैतन्यता कहना बेकार है। जैसे कोई गहरी नींद से जागकर ऊँघते से में ही “हूं, हाँ” कर देता है, उस सेकण्ड बस ऐसी ही मेरी हालत हो जाती है। कुछ बुरा सा भी लगता है। यदि १०-१५ मिनट उस हालत में लग जायें, बस सोई तबियत बड़ी उचाट होने लगती है। भाई, न जाने क्या बात है, मुझे तो अब ऐसा लगता है कि किसी भी समय अपने आपे में नहीं रहती हूँ, सदैव आपे से बाहर कहीं दूर रहती हूँ। बस वही मुझे अच्छा लगता है, बल्कि अच्छा क्या यदि मैं यह कहूँ कि वहाँ न अच्छा लगता है, न बुरा, परन्तु फिर भी तबियत वहीं लगी रहती है, इसलिये यह कहा जा सकता है कि वहाँ अच्छा लगता है। जो कुछ भी करती हूँ, जो कुछ भी बोलती हूँ, सब आपे से बाहर ही काम होता है। ‘मालिक’ ने मुझे सही और गलत यानी यह ठीक है, यह ठीक नहीं है, सोचने से भी छुटकारा दे दिया है। अब ‘वह’ जाने, ‘उसका’ काम जाने। भाई, ऐसी हालत लगती है कि जहाँ से Soul आई है, वहीं लय सी होने लगी है। जहाँ से सब रुह रवाँ हैं, वहीं स्थित होकर लय सी होने लगी है। वहाँ हालत में ऐसी रंगीनी लगती है जिसमें से रंगीलापन निकल गया है। हर समय तबियत बिल्कुल सरल Innocent सी बनी रहती है। भाई, पहले कभी मैंने लिखा था कि हर चीज़ से रोशनी निकलती महसूस होती है, परन्तु अब तो भाई सूरत कुछ और हो गई है। अब तो सब में ऐसा अंधेरा लगता है कि, जिसमें उजेला तो है ही नहीं, परन्तु अंधेरा भी नहीं कहा जा सकता है। सब चीज में यहाँ तक कि सूरज और चन्द्रमा तक में भी मुझे उजेला नहीं महसूस होता है। बस आज कल कुछ यही हाल मेरा चल रहा है। प्रणाम करती हूँ, परन्तु यह सुधि नहीं रहती कि किसे कर रही हूँ, यहाँ तक कि यह भी सुधि नहीं रहती कि प्रणाम कह रही हूँ, या क्या कर रही हूँ। छोटे भाई-बहनों को प्यार ! इतिः-

आपकी दीन-हीन सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-205
शाहजहाँपुर
6/4/1952
तुम्हारे खत मिल गये - पढ़कर खुशी हुई। तुम्हें sitting देने में बहुत दिन गाफ़िल रहा, मगर अब दिन में कई मर्तबा देखना पड़ता है। जितना ज़्यादा तुमसे गाफ़िल रहा, उतना ही ज्यादा ख्याल रखना पड़ता है, इसलिये और बराबर हो गया। अब तो चाहे कोई दिन छूट जावे, नहीं तो मुझे हर रोज Sitting देनी पड़ती है। कुछ मेरी तबियत यह भी चाहती है कि दो-तीन points के बाद फिर ज्यादा तुम्हें न ठहरायें। खैर, यह अभी तय नहीं किया है, यह हालत देख-देख कर तय किया जावेगा। एक बात मैं तुम्हें और बता दूँ ताकि तुम्हें वाकफियत होती चले और यह मालूम होता चले कि जब तुम किसी को Stages तय कराओ तो तुम्हें क्या करना चाहिए। मैं नातजुरबेकारी की वजह से कुछ गलती भी कर जाता हूँ। बात यह है कि मुझमें जो कुछ भी ताकत गुरु महाराज ने दी है, उसका अन्दाज़ा नहीं हो पाता। मैंने जब [B] point पर तुम्हें खींचा और फिर वहाँ तवज्जो दी तो मैं ज़्यादा दे गया। चुनान्चे point [B] की हालत में ज्यादा concentrated force पैदा हो गया। अब इसको फैलाया जावे, तब यह सैर हो। आज यह सुबह उठते वक्त ख्याल आया। सही तो हो ही जावेगा, इसलिये कि लालाजी साहब सब कुछ कर सकते हैं।

तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिंतक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-206
लखीमपुर
4/1/1952
आशा है, मेरा पत्र पहुंचा होगा। यहाँ सब अच्छी तरह से हैं। आशा है ‘आप’ भी अच्छी तरह से होंगे। इधर बहुत दिनों से ‘आपका’ कोई पत्र नहीं आया-सो कभी-कभी कुछ फिक्र सी हो जाती है। पूज्य मास्टर साहब जी के यहाँ हमारे मिशन का उत्सव ता. 13 को है, सबको आशा है कि शायद ‘आप’ आ जावें, सुनकर प्रसन्नता हुई। यदि ‘आप’ कृपा करके आवें तो माया, छाया के इम्तहान यदि न होते हों, तो उन्हें भी साथ लेते आइयेगा। भइया तथा उमेश को भी लेते आइयेगा। बड़े दद्दा संग होंगे, ‘आपको’ कोई तकलीफ नहीं होने पावेगी। माता जी तथा बिब्बो और प्रतिभा को भी लेते आइयेगा। यहाँ नुमायश लगी हुई है, सबके संग ही मैं भी जाऊंगी। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ जैसी ‘आपको’ सुविधा हो, तकलीफ़ न हो, वैसे ही ‘आप’ करियेगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिकदशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मुझे तो ऐसा लगता है कि सुषुप्ति अवस्था में मन हर समय सोया रहता है, और ऐसा लगता है कि तम में घुसकर खो गया है। या यह कह लीजिये कि मैं सदैव आपे से बाहर ही कहीं, न जाने कहाँ खोई रहती हूँ। परन्तु ऐसा है कि इस सुषुप्ति या तम में चैतन्यता की कुछ रोशनी जरूर पड़ती रहती है, जिससे शरीर निश्चेष्ट नहीं होने पाता है, नहीं तो भाई शरीर कब का निश्चेष्ट हो गया होता। मैं तमावस्था में ही हर समय सोयी रहती। अब कुछ ऐसा है कि सुषुप्ति की उस चैतन्यता में ही दशा अनुभव में आती है। परन्तु अब तो यह ऐसी स्वाभाविक हो गई है, कि जैसे रोज़मर्रा की आदत पड़ जाती है। अब तो मुझे इस दशा से भी बेखबरी हो गई है। जब इस चैतन्यता के प्रभाव से याद आती है, तो यह दशा मालूम पड़ती है। परन्तु अब तो इसकी याद भी बहुत कम कभी-कभी ही आती है। वरना यह भी भूल गई हूँ।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ आपका एक पत्र अभी-अभी आया-पढ़कर खुशी हुई। ‘आप’ कहते हैं कि “मैं गाफिल रहा।“ परन्तु मेरा कहना यही है, कि पग-पग पर ‘आप’ की कृपा ही ने रोशनी दी है और सदैव देगी, इसमें सन्देह नहीं, जिसके कारण ही जो कुछ भी थोड़ी सी भी आत्मिक दशा का आरम्भ है, वह केवल ‘आपकी’ उस महान् कृपा का ही फल है। कहा जाता है कि ‘आफताब’ की किरणें पड़ने से रेते का ज़र्रा-ज़र्रा भी सच्चे मोती की चमक की तरह मालूम पड़ने लगता है। बस यही बात है, और कुछ नहीं। परन्तु भाई, मेरी निगाह तो उस ‘आफ़ताब’ में ही गड़कर विलीन हो गई। मुझे तो ‘उसी’ से काम हैं, और रहेगा। इधर कुछ दिनों से मुझे महसूस होता था कि ‘आपकी’ तबियत ठीक नहीं है और इसीलिये पत्र का बड़ी बेचैनी से इन्तज़ार था कि कहीं से कोई खबर मिल जाती। न जाने क्या कारण है कि मेरी प्रार्थना तथा कुछ सेवा आपको ‘आराम’ नहीं पहुंचा पाती है। मुझे कोई कुछ बता दे, मैं सब करने को तैयार हूँ। अब ‘आप’ सफ़र न करें। जब अच्छे हो जावें, तो जून में अवश्य आवें। ‘आपने’ एक बारे कहा था कि अण्डे से लाभ होता है, सोई कृपया खावें और खुश्की दूर करने को अधिक घी खाना लाभ करेगा। तब अंडे का बढ़िया शोरबा बनाना सीखने की मैं भी कोशिश करूंगी। ‘ईश्वर’ आप को जल्दी से अच्छा कर दे। पूज्य ताऊ जी के लिये भी जो ‘आपने’ लिखा है, पूरी कोशिश करूंगी। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-207
शाहजहाँपुर
11/4/1952
तुम्हारा खत आया-उसने काफ़ी ढाढ़स दिया। मुझे फिकर बस इतनी रहती है कि लोग ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठावें। कभी यह भी ख्याल होता है कि जो कुछ थोड़ा बहुत मुझे मालूम है, यह सब सीने में रखकर कहीं ले न जाऊँ। कुछ कायरों का यह भी ख्याल है कि मैं जब चाहूँगा एक मिनट में सब कुछ कर दूंगा। ऐसा अगर गुरू महाराज की प्रार्थना की मदद से कर भी दिया जावे, तो उसका कुछ फायदा सिवाय इसके कि बहुत ऊंची पहुंच वाला संत हो जावे और कुछ दिखाई नहीं पड़ता। अगर पूरी ताकत लगा दी जावे तो ज़रूर उसका फायदा हो सकता है, मगर ऐसी दशा में मौत यकीनी है। जब तक रास्ता और घाटी-घाटी अपनी मेहनत करके नहीं देखता, तब तक हर हालत पर Command (प्रभुत्व) नहीं होता और किसी ख़ास हालत को दूसरे पर तारी करने के लिये हिम्मत पैदा नहीं होती। मुझमें कैफियत तारी करने की शक्ति गुरू महराज ने दी है। यह उनका काम था, मैंने उनकी मेहरबानी से अपना लिया, जिसका नतीजा उनकी कृपा से यह है कि मुझे हर कैफियत से वाकफियत है और इसीलिये दूसरों पर फौरन तारी हो सकती है। सच बात यह है कि इस विद्या को ग्रहण करने के लिये सच्चे जिज्ञासु नहीं मिलते। लोगों को अभी तक मज़ा आ गया होता अगर मेहनत और मोहब्बत से काम लेते। मिशन तो तरक्की करेगा ही, मगर अच्छा यह होता कि इस तरक्की को हम खुद देख लेते और लोगों में वह हालतें पैदा कर देते जो मुमकिन है आइन्दा इतनी जल्दी न हो सके।

तुम्हारे खत पढ़ने से तुम्हारी सब हालत मालूम हो गई। यह अंधेरे की हालत मुमकिन है पहले भी पैदा हुई हो, मगर मेरी जल्दी की वजह से तुम्हें भास न हुई हो। यह असल हालत की एक भद्दी तस्वीर है और पहले से यह चीज़ ज़्यादा सूक्ष्म है, इसमें अभी और तरक्की होगी। अभी असलियत बहुत दूर है। मुझ पर यह हालत गुज़र चुकी है, और मुझे याद है और खत लिखाते वक्त इस हालत का फिर भास होने लगा। जो एक चक्र पर हालत है, वही सूक्ष्म होते हुए हर चक्र पर मिलती है। यहाँ शायद षटचक्र कहे गये हैं। लय-अवस्था और लय की लय-अवस्था तुमको बड़े दरबार से पहले ही बख्शी जा चुकी है और बका भी। अब बका की हालत की लय-अवस्था हो रही है। ऐसी जाने कितनी बका और उनकी लय-अवस्था अभी और होंगी, उसका छोर नहीं और सच्चे जिज्ञासु को चैन तो उसी समय मिलता है, जब कोई हालत नहीं रहती। अगर मैं यह कहूँ कि सोलह Circles & Seven Rings (सर्किल और सात रिंग्स) पार करने के बाद चैन मिलता है और वह चैन ऐसा है कि किसी हालत में बेचैन होने ही नहीं देता तो पुराने आध्यात्मिकता के इतिहास मुबारक देंगें, क्योंकि यह इज़ाद हमारे लाला जी की है और आप ही ने ज़िन्दगी रखते हुए यह चीज़ मुमकिन कर दी। मैं तो यही चाहता हूँ कि सब लोग इनको Cross (पार) करें, मगर मेरे चाहने से क्या होता है। यह तो ईश्वर की देन है, वह जिसे चाहे दे दे।

तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-208
शाहजहाँपुर
13/4/1952
पत्र-मिला, पढ़कर खुशी हुई। तुमने अपने कुल खत का जवाब खुद दे लिया है, वह यह है, “मेरी निगाह तो उस आफ़ताब में गड़कर विलीन हो गई है!” इसको तुमने सुषुप्ति कहा है। यह सुषुप्ति नहीं, बल्कि Forgetful State (भूल की दशा) है। हर मुकाम पर एक लय अवस्था होती और You gain Mastery over that region by absorbing in it. The Same is the Condition now, Sushupti is everywhere in the human approach but it gets thinner and thinner as we advance. At higher pitch it is named as Turia (तुमने उस मुकाम पर लय होकर उस स्थान पर प्रभुत्व प्राप्त कर लिया है। यही अवस्था अब है। सुषुप्ति की अवस्था मानव की पहुंच के भीतर है। जैसे-जैसे हम उन्नति करते जाते हैं वैसे ही वैसे वह सूक्ष्म से सूक्ष्म होती जाती है। इसकी उच्चतर अवस्था को ‘तुरिया’ कहते हैं।)

मैं जो High (ऊंची) चीज़ सोचता हूँ, उसको खुद लिख नहीं पाता हूँ। अम्मा को प्रणाम, छोटे भाई-बहनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-209
लखीमपुर
16/4/1952
कृपा पत्र ‘आपका’ एक कल आया तथा एक आज आया, पढकर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। ‘आपकी’ मेहरबानी का धन्यवाद कैसे दिया जा सकता है, वास्तव में धन्यवाद पूर्ण रीत से शायद ही कोई दे सकता हो, हाँ जिस पर अपने ‘मालिक’ की कृपा हो, उसके लिये तो कुछ कठिनाई रह ही नहीं जाती। सच तो यह है ‘श्री बाबूजी’ कि “सीखने वाले” और “सिखाने वाले” का जोड़ा तो बस ‘आपका’ ही देखा, भाई, लाजबाब है। अब आत्मिक-विद्या सीखने की इच्छा वालों को ऐसा समय हाथ नहीं आ सकता। भाई करोड़ों ‘ईश्वर’ ऐसे ‘मालिक’ पर न्योछावर हैं।

कल के "उत्सव" का क्या कहना है तथा पूज्य मास्टर साहब के यहाँ के मिशन के Foundation day (स्थापना दिवस) के ‘उत्सव’ का भी क्या कहना है। सब ‘मालिक’ की कृपा थी। आज “आपके” हाथ का लिखा हुआ हिन्दी का पत्र पढ़कर बहुत प्रसन्नता हुई। हिन्दी भी ‘आप’ काफी लिख लेते हैं, यह है कि मैं नहीं जानती थी। ‘आपने’ यह खूब लिखा है कि माँस, मछली खाना पाप तो नहीं है, हाँ हो सकता है, परन्तु कब? जब हम ‘मालिक’ के सिवाय पाप को पाप मानकर करेंगे। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ लेक्चरों में ज्ञान के मतलब अपने को पहिचानना बतलाया जाता है, परन्तु ऐसा ज्ञान तो यदि देखा जावे तो हर आदमी को शायद रहता हो, परन्तु मैं तो यही कहूँगी कि अज्ञानी होना, यह सबसे यथार्थ ज्ञान है। केवल ‘मालिक’ को ही जानना ज्ञान है। मुझे ऊपर वाला ज्ञान हरगिज़ ठीक नहीं लगता। अज्ञानी हुए बिना वास्तविक ज्ञान हो ही नहीं सकता और मुझे तो अब यही पसन्द है। वैसे आप जानें। यदि कोई करने वाला हो तो आपके यहाँ ब्रह्म-विद्या प्रारम्भ करते ही अपना भार उतरना प्रारम्भ हो जाता है। हाँ, आपने यह भी पूछा कि “तुम मुझे बतला रही हो तो कहीं तुम तो पाप की भागी नहीं हो रही हो”। परन्तु मुझे अब इसकी परवाह नहीं है। पाप-पूण्य, शुभ-अशुभ, अच्छा-बुरा तो उसी दिन छोड़ दिया था जिस दिन से मन को ‘मालिक’ अच्छा लगा था। मुझे तो भाई सच पूछिये तो यह तक नहीं याद पड़ता कि तभी से अब तक मैं कभी पखाने या पेशाब को भी गई हूँ या नहीं या सोई और जागी भी हूँ। श्वाँस आती है या नहीं, जिन्दा हूँ या मर गई हूँ। फिर पाप-पुण्य का प्रश्न उठने की तो नौबत ही कहाँ से आती। हाँ, फिर भी यदि पाप होगा भी तो करोड़ों नर्क भी यदि मेरे लिये और तैयार किये जावें दण्ड देने को तो भी यदि ‘मालिक’ की कृपा से ‘मालिक’ की तस्वीर आँखों में बसी होगी, और ज़रूर होगी, इसमें सन्देह नहीं, तो समस्त यातनायें सहने में भी यदि उफ़ तक मुंह से निकल जावे, इसकी गारन्टी है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ नर्क से तो वह डरेगा, जिसे स्वर्ग की चाह होगी। पाप का भागी तो वह बनेगा, जो पुण्य को जानता होगा। ‘मालिक’ की कृपा से ‘आप’ मुझे इतना कच्चा न समझें । ‘मालिक’ के काम में यदि शरीर की बोटियों की आवश्यकता हो, तो एक इशारे मात्र से अपने हाथों से एक-एक बोटी काट कर चढ़ा दूंगी। मैं तो इतना ही जानती हूँ कि वास्तव में पाप, पुण्य, सुख, दु:ख, शुभ, अशुभ यह सब केवल कहने मात्र है, यथार्थ में कुछ नहीं है। केवल ‘मालिक’ ही है और “वहीं” रहेगा। सेवक की निगाह में यदि “स्वामी” के अतिरिक्त कुछ भी आ जावे तो वह वास्तव में सेवक नहीं रहा। पूज्य “श्री बाबू जी” मैं जाने क्या-क्या लिख गई हूँ, यह पता नहीं। मुझमें कुछ एक भी बात इसमें है या नहीं, यह मुझे मालूम नहीं, और आवश्यकता भी कुछ नहीं दीखती है। ‘मालिक’ जाने, “उसका” काम जाने। मुझे तो बस जिससे मतलब है “उससे” है। हाँ, यह ज़रूर है, कि यदि ईश्वर कहे कि तेरे ‘मालिक’ में यह गुण नहीं था, परन्तु मैं तुझे देता हूँ, तो यह मुझे कतई नामंजूर होगा। भाई, कुछ नहीं, “उसकी” अहेतुकी कृपा ने मुझे खरीद लिया है। अपने पहले पत्र में जो “एकई साधै, सब सधै” वाला दोहा लिखा, वही मदद दे रहा है।

इधर 5-6 दिन से हालत में शुद्धता नहीं आई, इसलिये शायद हालत कोई महसूस नहीं होती है! अब कुछ यह है कि तबियत में एक तरह की मुर्दनी या बेहोशी हालत कायम हो गई है। पीठ में लगातार कभी-कभी तो ऐसा लगता है, हजारों कीड़े से रेंग रहें हैं। वरना गुदगुदी सी और फड़कन तो हर समय ही रहती है। अब रीढ़ में ही नहीं, बल्कि इधर-उधर की हड्डियों में भी यह बात पैदा हो गई है। कभी-कभी बेशुमार ताकतें सामने आती हैं, अपने में मालूम पड़ती हैं, परन्तु खैर, मुझे उनसे क्या मतलब, सिनेमा की फोटो की तरह से आती रहतीं हैं। यदि ‘आप’ उचित समझे, तो यह पत्र किसी को न दिखायें, वैसे जैसी “आपकी“ मर्ज़ी। पूज्य “श्री बाबू जी” मेरी यह प्रार्थना है, कि आजकल आप कृपया Working (कार्य) तो देखते रहें तो अच्छा हो, क्योंकि मेरी तो अब बड़ी तामसी अवस्था सी हो गई है। कर्तव्य, अकर्तव्य का भी विशेष ध्यान नहीं रहता है। संज्ञाहीन की तरह सारे काम होते चले जाते हैं। मेरी तो वृत्तियाँ तथा चेष्टायें सोई हुई सी महसूस होती हैं। अभी हालत बिल्कुल शुद्ध नहीं मालूम पड़ती है। पूज्य ताऊजी वाले पत्र में समर्थ महात्मा “श्री लाला जी” साहब के dictate (डिक्टेट) से यदि ‘वे’ हमारी न सुनेंगे, तो कौन सुनेगा। उनका लाख-लाख धन्यवाद है। परन्तु एक अर्ज़ गरीब की “उनसे” ज़रूर है कि फिर ऐसी मेहरबानी भी रहे कि आपकी तबियत बहाल ही रहे। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-210
लखीमपुर
23/4/1952
कृपा-पत्र ‘आपका’ कल आया, सुनकर प्रसन्नता हुई। ‘आपकी’ तबियत को कुछ आराम सुनकर प्रसन्नता हुई। मेरी तबियत भी धीरे-धीरे बराबर ठीक हो रही है, चिन्ता की कोई बात नहीं है। वैद्य ने तो साँस उखड़ी बताई थी, परन्तु डॉक्टर ने ज़ोर की ब्रांकाइटिस बताई और फिर उससे साँस को 2-3 घन्टे में ही आराम आया था। अब साँस तो करीब-करीब बिल्कुल ठीक है, फिक्र की कोई बात नहीं है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

भाई, न जाने क्या बात है कि ऐसा मालूम पड़ता है कि जिस हालत में हूँ या रहती हूँ निगाह को सदैव उससे ऊंचा ही पाती हूँ। दो-तीन दिन से हालत बहुत शुद्ध मालूम पड़ती है। ऐसा मालूम पड़ता है कि शरीर के सारे अवयव तथा सारी इन्द्रियाँ तक शान्त हो कर कहीं विलीन हो गई। भाई, ऐसा लगता है, मुझ में कुछ है ही नहीं। इतनी Innocent या सरल हालत है, कि कुछ कहना नहीं। तो ऐसा लगता है कि मैं कुछ जानती ही नहीं, मेरे कुछ समझ ही नहीं रह गई है, और मुझे उसका बोझ लेकर करना भी क्या है, समय पर काम ‘मालिक’ की कृपा से चलता ही जाता है। पूज्य ‘श्री बाबू जी’ ऐसा लगता है कि हर चीज़ का, यहाँ तक कि हर हालत का भी जैसे End (अंत) कहूँ या यह कहूँ कि सब कहीं विलीन सा होता जाता है, बस एक निगाह ही केवल न जाने किस ओर अपलक देखती हुई रह गई है, यद्यपि अब हाल तो यह है कि उस निगाह में भी रोशनी ख़त्म हो चुकी है तथा उसकी (यानी निगाह की) भी सुधि नहीं रह गई है| उससे भी बेखबरी हो गई है। अब तो भाई बेहोशी वाली हालत भी कहीं लय होती महसूस होती है। कल के पत्र में पूज्य “समर्थ महात्मा जी” ने फैलाव के बारे में तथा और कुछ भी समझाया था, वह सब का सब लाजबाव था, उसमें जो भी हालत जहाँ तक ‘मालिक’ की कृपा से मेरी हो चुकी थी, सामने आ जाती थी, इसलिये मेरी समझ में भी कुछ आ गया। परन्तु पूज्य ‘श्री बाबूजी’ कल “उन्होंने” (यानी समर्थ महाराज ने) एक ज़रा बेढ़ब प्रश्न इस छोटी सी लड़की को भी हल करने को दे दिया है, खैर, अपने ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी, जैसा भी समझ में आयेगा, अर्ज़ करूंगी, शेष ‘आप’ जानें। इसके पहले “उनके” पावन चरणों में अपने ‘मालिक’ की कृपा से प्रार्थना है कि जैसा कि “उन्होंने” लिखा है यदि बतलाने की इन्तिहा नहीं तो कम से कम अपनी ओर से तो सीखने की भी इन्तिहा ही न होने दूंगी। मेरा तो बस यही जीवन है। मेरी तो यह समझ में नहीं आता कि ‘मालिक’ के बिना जीवन में ही क्या बल्कि संसार में कोई भी आनन्द, आनन्द कहलाने के काबिल हो सकता है। अब उस बात पर आती हूँ। भाई, मैं तो न शास्त्र जानती हूँ न कभी वेद सुना है, मैंने तो जिसे जाना है बस “उसे” ही जाना है। मेरा तो वेद भी “वही” है, और शास्त्र भी “वहीं” है। और हालत मेरी यह चल रही है कि मुझे यह याद ही नहीं पड़ता कि मैं कभी “उससे” ज़रा सी भी अलग थी। परन्तु फिर भी दीवानगी जो लिखी है, वह तो मैं चाहे जैसे सीखूं, सीखूंगी अवश्य। खैर! अब मतलब पर आती हूं।

परम पूज्य “समर्थ जी साहब” को सादर प्रणाम करते हुए यह अर्ज़ है कि प्रथम तो जैसा कि ‘आपने’ लिखा है कि आपने ‘श्री बाबूजी’ से यह कहा कि "चौबे" जी को “तुम” जो भी दोगे “वह मेरे ऊपर एहसान होगा”। इसके माने तो भाई यह हुए कि ‘आपने’, “उनको” कोई विशेष Order (आदेश) नहीं दिया, कि यह दो। इसके माने इसमें कुछ अधिकार ‘आपने’, ‘श्री बाबूजी’ की इच्छा पर रख जरूर छोड़ा था। दूसरे फिर ‘आपने’ लिखा है कि “इसका” जी इस मिकदार में देने को नहीं चाहता। इसके माने भी यहीं हुए कि दिया तो ज़रूर उस मिकदार में न सहीं। तीसरे ‘आपकी’ मर्जी उस समय ऐसी थी ज़रूर, परन्तु तेज़ी पर न आई होगी, उस मिकदार तक न पहुंची होगी जो Order (आदेश) की शकल में बदल जाती जिससे “श्री बाबू जी” को मजबूर होना पड़ता। ‘आपकी’ तेज़ी “उनको” हरगिज़ ठण्डा रहने नहीं दे सकती है। क्योंकि एक पत्र में ‘श्री बाबूजी’ ने लिखा था कि “बिटिया अगर मैं अपने काबू का हूँ तो “अपनी” बात करूं।“ फिर ‘आपने’ सज़ा के बारे में जो पूछा है सो पूज्य समर्थ जी महाराज जी सज़ा का हकदार तो वास्तव में वाही हो सकता है, जो अपनी गलती को महसूस करे, दण्ड का भागी वह हो सकता है जो अपने जुर्म को महसूस करे। परन्तु जहाँ पर सही, गलत का कोई सवाल ही नहीं है, जो अपने काबू का ही न रहा उसके लिए क्या कहा जाये। जो सज़ा और इनाम को बराबर ही मूल्य वाला महसूस करे ‘उसे’ यदि सज़ा दे भी दी जावे तो शायद वह उतना ही मूल्य रखेगी जैसे हमारे लिये शक्कर खायें या मिठाई। पूज्य महात्मन् यह सब चीजें तो उसके लिये हैं और अब तक हैं जब तक कि जैसा ‘आपने’ लिखा है कि हम किसी के दीवाने नहीं बन जाते। यद्यपि लौ पतिंगे को भस्म ही कर देता है, परन्तु क्या पतिंगे लौ को छोड़ सकते हैं। हम सब पतिंगे तो नहीं बन पाते, इसलिए हमारे लिये रोक हो जाती है, सम्भव है यह चीज़ भी ताऊजी को इनाम मिलने में उस समय रूकावट बन गई हो। सच तो यह है कि यदि पूज्य “श्री बाबू जी” ‘आपकी’ सज़ा के काबिल होते तो यह प्रश्न अब तक हम लोगों के हल करने को रखा न रहता। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी मन में आया, लिख दिया, अब ठीक तो ‘आप’ ही बहुत अच्छा हल कर सकते हैं। मेरी तो यह हालत है कि जैसे बच्चा माँ के साये में मस्त बेफ़िक्र रहता है। बस अपने "मालिक" को पूर्णतय: से प्राप्त कर लू मेरी आँखें ‘उसी’ की ओर लगी रहें, यही इस गरीब की प्रार्थना है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ को साँस की तकलीफ हरगिज़ न होने पावे, “उनका” शरीर बराबर कमज़ोर न होता जावे, केवल यही मेरी माँग है।

“पूज्य श्री बाबूजी” मेरी तो कुछ यह हालत है या ऐसा लगता है कि जैसा ‘आपने’ अंग्रेज़ी की किताब में identity (अस्तित्व) के बारे में लिखा है। मुझे तो ऐसा लगता है कि मेरा तो सब कुछ Forgetful State (भूल की दशा) में या भाई, न जाने कहाँ लय हो गया है। फैलाव तक का भी यही हाल हो गया है। खुद Forgetful State (भूल की दशा) तक भी यदि मैं कहूँ कि लय हो गई है, तो गलत न होगा। Innocent (सरलता) वाली हालत तक का भी अब यही हाल होता लगता है। ऐसा लगता है कि जैसे प्रशान्त समुद्र में एक ख्याल तैर रहा है, वही शायद Identity (अस्तित्व) कही जा सकती है। केसर का पत्र आया है, उनके भी सब Papсгs (पर्चे) तो अच्छे हुए हैं English Literature (अंग्रेज़ी साहित्य) के Papers (परीक्षा पत्र) मामूली हुए हैं तथा ‘आपको’ प्रणाम लिखा है। छोटे भइया तथा बिट्टो के भी Papers (परीक्षा पत्र) अच्छे हो रहे हैं। माया, छाया के Papers (परीक्षा पत्र) कैसे हुए हैं?

छोटे-भाई-बहनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-211
लखीमपुर
30/4/2026
आशा है मेरा एक पत्र मिला होगा। ‘आपको’’ शायद अब injections (इन्जेक्शन्स) से काफ़ी लाभ हुआ होगा। मुझे बस अब कुछ कमज़ोरी भर है, वरन् ठीक हूँ। कमज़ोरी भी कम हो रही है। अम्मा व बड़े भइया तथा केसर ता. 4 तक यहाँ आ जायेंगे। Papers (परीक्षा पत्र) दोनों के अच्छे हुए हैं, आशा है ‘ईश्वर’ की कृपा से दोनों पास हो जायेंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ यह हाल है कि शरीर से तो मेरा सम्बन्ध बिल्कुल खत्म हो चुका, यह मैं शायद पहले भी कभी लिख चुकी हूँ और इसके (यानी शरीर) के सम्बन्धों का भी यथोचित रूप से खात्मा हो चुका है, शायद यह भी मैं लिख चुकी हूँ। अब तो यह हाल है कि सोते, जागते, आराम, तकलीफ किसी भी हालत में यह भासता तक नहीं, परन्तु अब तो भाई यह हाल हो गया है कि मैं जहाँ भी हूँ, जिस हालत में भी हूँ, वहाँ भी अब उस मैं की याद भूली ही रहती हूँ, या यह कह लीजिये कि उससे गाफिल की सी दशा हो गई है। परन्तु न जाने क्यों कभी-कभी अब कोई ख़ास बात या भाई न जाने कैसे उस भूली याद (यानी मैं पने की) में भी कुछ लहर, कुछ क्षण को ही सही, आ जाती है, परन्तु अक्सर इतनी हल्की कि यदि गौर न करूं (जैसा कि अक्सर होता है) तो मैं इस थोड़ी देर की चैतन्यता (यानी मैं पने का भास) को पहिचान न पाऊँ। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ इधर दो-तीन दिन से न जाने क्या बात है कि वह भूल की अवस्था भी खत्म हो गई है। कुछ अच्छा हाल नहीं लगता। कभी ख्याल होता है कि कहीं कुछ ठहराव तो नहीं हो गया। यद्यपि ऐसा हो नहीं सकता है। क्योंकि मुझे तो ऐसा लगता है कि ‘मालिक’ की कृपा से मैं तो बराबर चलती ही जा रही हूँ। कुछ ऐसा लगता है कि अब तो हालत बदलती हुई मालूम पड़ती है। बस अब तो बस ध्यान जाता है, तो मन में एक धीमी-धीमी रटना लगी हुई मालूम पड़ती है। वरना अधिकतर तो इससे भी गाफिल ही सी हालत लगती है। अब तो भाई, यह हाल हो गया है कि न मुझे अपने अच्छे होने का ही भास रह गया है, न बुरे का ही। अपना ही क्या, मुझे तो दुनिया में ही अच्छाई, बुराई का भास ही न रहा और चिकना घड़ा या बज्र बहरी भी इतनी हो गई हूँ कि किसी के कहने पर भी जूं नहीं रेंगती, तबियत में कोई Action (प्रतिक्रिया) पैदा ही नहीं होता है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ न जाने क्या बात है ‘मालिक’ की जितनी याद मैं चाहती हूँ, उतनी नहीं हो पाती है। इसलिए तृषा सदैव बढ़ी हुई पाती हूँ। मुझे तो ऐसा लगता है कि “मालिक“ की कृपा से मेरे अन्दर एक ऐसा सोखता लगा हुआ है, जो सब चीज़े यहाँ तक कि सब हालतें भी सोखता चला जाता है, सब कुछ जैसे भीतर पचता ही चला जाता है, मगर बस केवल एक तृषा ही ऐसी रह गई है जिसे आन्तरिक तीव्रता मिलती जाती है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। कृपया और पत्र भी ‘आप’ देख लीजियेगा। एक माता जी के लिये है तथा एक इन्द्रा को भिजवा दीजियेगा ।। इति:

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-212
शाहजहाँपुर
4/5/1952
तुम्हारा खत 23 व 30 अप्रैल दोनों का मिल गया। तुमने अपने अप्रैल के खत में जो जवाब दिया है, वह बिल्कुल सही है। अगर मैं उस सवाल का जवाब लिखूं, जो तुमसे पूछा है, तो उसी चीज को बस दूसरे तरीके में लिख देना होगा। मैंने मास्टर साहब को एक खत लिखा था कि मैंने तुम्हें 'C point' (सी प्वाइंट) पर खींच दिया है। यह दोनों तारीखों के खत उसी जगह की हालत बता रहें हैं। अब जितना आगे बढ़ती जाओगी उतना एहसास तो रहेगा, मगर उसकी अभिव्यक्ति (expression) के लिए शब्द मिलना मुश्किल होंगे। मैं जब यह सोचता हूँ कि तुमको, बशर्ते कि तुम्हारी यह हालत रही और यही शौक और ईश्वर से प्रेम रहा, जिसकी उम्मीद भी है, तो तुमको धुर तक पहुंचाना है, तो मेरे होश उड़ते हैं। वैसे तो लाला जी के लिए धुर तक पहुंचा देना एक क्षण का काम है, मगर उसमें यह बात होती है कि हर बात पर प्रभुत्व देने (Command) की हिम्मत पैदा नहीं होती। हालांकि अब तक जिसको भी जल्दी से ऊंचा पहुंचाया गया उसमें से ज़्यादातर ऐसे लोग हैं, जिनको कि मैंने सैर भी करा दी, मगर वह ज़्यादा कारगर यों साबित न हुए कि हर एहसास पर उन्होंने लय-अवस्था कायम नहीं कर पाई। वजह उसकी यह थी कि उन्होंने अपनी आदत Constant Remembrance (सतत् स्मरण) की न डाली थी। Constant Remembrance (सतत् स्मरण) तो बड़ी सहल चीज़ है। मेरी समझ से उसको कायम करने में दस-बारह रोज़ से ज्यादा नहीं लगते। मगर यहाँ कोई करना नहीं चाहता। उन्होंने समझ लिया कि जिसको गरज़ होगी वह अपने आप देगा, हम मेहनत क्यों करें। किसी ने बातों से खुशामद करके हमें पोटना (बहकाकर) चाहा और किसी ने अपने जिस्म की Activity (वाह्य क्रिया-कलाप) ऐसी बना ली कि गोया फर्माबरदार (आज्ञाकारी) हैं। और मैं इसको खूब समझता हूँ और मेरी चाहे गरज़ समझ लो कि जब मैं यह समझता हूँ कि यह आगे नहीं बढ़ते तो मैं जल्दी से उसको खींचता चला जाता था। जल्दी मैं अब भी करूंगा, मगर उस वक्त जब कि अभ्यासी खुद जल्दी करे। मगर यह ग़लती कि कोई खुद आगे बढ़ने की कोशिश नहीं करता और मैं उसको खीचता चला जाऊं, सम्भव है कि आइन्दा न हो। चौबे जी के साथ में जो मैंने जल्दी की वह इसलिये कि उनपर मुझको बहुत तरस आता था। इसलिये कि उन्होंने असलियत के हासिल करने के लिये बड़ी खाक छानी है। मगर यह जरूर है, साथ ही साथ कि असलियत के जानने की कोशिश नहीं की वरना मेरे मिलने में पहले उनको कोई रास्ता दिखाने वाला मिल गया होता। मैंने प्रकाश की शादी में एक दरख़्त के नीचे बैठालकर उनको Sitting (सिटिंग) दी थी, उसमें उनकी रूह को यह तवज्जो दी थी कि Central Region (मुख्य केन्द्र) तक पहुंचना है। दूसरे मानों में उनके धुर तक पहुंचने का रास्ता बना दिया है। साथ ही मैंने उनकी सुरति को Constant Remembrance (सतत् स्मरण) में लगा दिया है।

मैंने जो यह कहा है कि “मैं” तुम्हें धुर तक पहुंचाना चाहता हूँ, मगर मेरे होश उड़ते हैं। इसका मतलब यह है कि अभी तुमको बहुत चलना है और मैं यह सोचता रहता हूँ कि कितना-कितना समय लगाया जावे ताकि तुम्हें जानकारी भी होती चले और पहुंच भी जाओ। अक्सर यह सोचने लगता हूँ और मैं तो हर शख़्स के लिये यह चाहता हूँ कि वह धुर तक पहुंचे और हर कोशिश करने के लिये तैयार हो, मगर कोई मुझसे काम ही नहीं लेना चाहता। मैं बीमार कितना ही रहूँ, तुम्हें फिक्र नहीं करनी चाहिये, इसलिये कि अभी मेरा वक्त नहीं है।

एक बात लिखने से भूल गया कि मैंने रात सिटिंग (Sitting) ‘C’ स्थान के सैर की दी हैं। इससे पहले मैं एक काम में लगा हुआ था और दिमाग भी कम काम देता था, इसलिये मैंने नहीं दी। बड़े-बड़े स्थान लिये लेता हूँ और अगर हर छोटा मुकाम लिया जावे, जो बड़े स्थान के अन्दर है, तब तो शायद दस हजार वर्ष की ज़िन्दगी भी काफी नहीं है, मगर साथ ही घुमा सब में देता हूँ। सैर का हाल लिखना, इसलिये कि अब तेज़ी से कराना चाहता हूँ जिसमें जल्दी हो जावे। मुमकिन है कि इस मुकाम की सैर के बाद सात-सात, आठ-आठ रोज़ के बाद दूसरे मुकाम की हालत आती रहे। अब इस जल्दी में यह काम तुम्हारा है कि इसमें लय-अवस्था प्राप्त करती रहो। मैंने पंडित रामेश्वर प्रसाद के मुकामात जब तय कराये तो ‘K’ तक तो मैंने गिने थे, उसके आगे मैंने गिनना छोड़ दिया।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-213
लखीमपुर
4/5/1952
‘आपका’ पोस्टकार्ड जो पूज्य मास्टर साहब के लिये आया था, सुनकर प्रसन्नता हुई। ‘आपने’ मुझे ‘C’ Point (प्वाइंट) पर खींच दिया है, बहुत-बहुत धन्यवाद है, ‘आपकी’ मेहरबानी के लिये। कल पूजा में मैं और पूज्य ताऊजी जब बैठे थे, तो ताऊजी की कुछ बहुत अच्छी हालत एहसास में आई सो लिख रही हूँ, सही-गलत ‘आप’ जानें। मुझे उनके अन्दर साम्यावस्था की कैफियत दिखाई दी। उनके अन्दर तो तमाम गीता की कैफियत भरी हुई मालूम पड़ती है। कभी-कभी जैसी बीजदग्ध बाली कैफियत जो ‘आपने’ मेरी एक बार लिखी थी, वैसी मालूम पड़ी यानी ऐसा लगता था कि उनका अन्तर कुछ पिगला सा जा रहा है। शेष ‘आप’ जाने। मुझे तो जैसा ‘आपने’ लिखा था, उनकी हालत का भद्दापन तथा भारीपन साफ करने को सो इधर 3-4 दिन से मैं और ताऊजी करीब-करीब सवेरे शाम बैठ लेते हैं। ‘मालिक’ की कृपा से अब हालत भी उनकी शुद्ध हो गई लगती है, और ‘मालिक’ की ऐसी ही कृपा रही तो यह चीजें शायद अब न आयें। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

न जाने क्या बात है कि अब ज्यों दिन बीतते है Inactive (अकर्तापन) पना अपने में बढ़ा हुआ पाती हूँ। कभी-कभी कुछ दिनों तो बहुत बढ़ जाता है। तबियत कभी-कभी बड़ी उचाट हो जाती है। कहीं भी किसी काम में भी जी नहीं लगता है। कभी-कभी घर छोड़कर भाग जाने को तबियत बेचैन हो उठती है। यद्यपि मैं जानती हूँ कि चली कहीं भी जाऊं, परन्तु कोई लाभ नहीं होगा। बिल्कुल Inactive (अकर्तापन) पने की सी, हर समय तबियत रहती है। याद का उल्टा हिसाब है कि जब कभी एक मिनट को ख्याल आता है, तो ऐसा मालूम होता है कि मानों ‘उसकी’ याद से उस क्षण कुछ नीचे उत्तर आई थी, और बुरा भी महसूस होता है। यह हालत जब तबियत उचाट होती है, तो कभी-कभी महसूस होती है या भाई इसी से उचाटपन होता है। नहीं तो हालत में अधिकतर सुन्नपन छाया रहता है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मेरी तो कुछ अजीब तामसी सी हालत हो गई है। तामसी प्रकृति सी हो गई है। कभी-कभी तो हरदम नींद की हालत में हमेशा पड़े रहने को तबियत चाहती है। मन चाहता है कि कुछ न करूँ, हाथ-पैर तक न हिलाऊँ। ऐसा लगता है कि मन तथा सब कुछ, सारी फुर्ती, भीतरी तथा बाहरी न जाने कहाँ डूब गई है, न जाने कहाँ समा गई है। अब तो भाई हालत में आलसपना भर गया है, बस मन की न जाने कौन सी एक रटना जो लगी हुई है, बस उसी का आसरा तथा ‘मालिक’ की कृपा का भरोसा रह गया है जो पार लगा ही देगा। यद्यपि हालत तो ऐसी हो गई है, कि मेरा तो अब विश्वास, प्रेम तथा भरोसा वगैरह भी न जाने कहाँ लय हो कर खत्म हो गये। पता नहीं भाई कि मेरा क्या हो गया। अब एक यह न जाने क्या बात हो गई कि अक्सर मेरे सामने जो लोग बैठे होते हैं, उनके मन में जो विचार होते हैं, वह मैं अक्सर उनके बिना बताये ही वही बातें कर देती हूँ कि जैसा वे सोचते हैं, खैर मेरा तो ध्यान न जाने कहाँ खो गया, मुझे खुद पता नहीं सब ‘मालिक’ जानें।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। इतिः

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री- कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-214
लखीमपुर
7/5/1952
मेरा एक पत्र मिला होगा। आशा है ‘आपकी’ तबियत ठीक होगी। ईश्वर की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक -दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब कुछ यह हाल हुआ जा रहा है कि Inactive पने (अकर्त्तापन) को भी भूली रहती हूँ। ऐसा लगता है कि Inactive पने (अकर्त्तापन) की हालत भी कहीं लय हुई जा रही है। कभी महसूस होती है और फिर भूल जाती हूँ, और कुछ यह भी हो गया है कि भूलने की भी खबर नहीं रहती है। न जाने भूलती हूँ, न जाने यह भूल क्या बला है, इसकी भी पहिचान नहीं रह गई है। भूलने की भी दशा का खात्मा हुआ जा रहा है। भाई मेरा तो यह हाल है कि मन तो इतना Serious (गहन अवस्था में विलीन) हो गया है कि मेरे लिये तो क्रोध तथा हंसी, खुशी सब ऊपरी रह गये हैं, वह भी खुद सब हो जाता है। उसकी (यानी मन की) हालत में कोई परिवर्तन ही नहीं होने पाता है, वह तो जैसा लगाया गया होगा, वैसा ही धरा है। न उसे ईश्वर से ही मतलब रह गया है, तो फिर प्रेम कहाँ से आवे, न उसे पूजा से ही काम रह गया है, क्योंकि वह व उसका भी कुछ असर नहीं लेता है, वैसा ही वह दुनिया की तरफ से हो गया है और मज़ा यह कि उसके Serious पने (गहन अवस्था में विलीन) की भी मुझे खबर नहीं, हाँ कभी-कभी जब ध्यान देती हूँ कि इसे (यानी मन को) तो वहाँ यही हालत पाती हूँ, जैसा ऊपर लिख चुकी हूँ। न तो उदास ही मालूम पड़ता है, न कुछ, बस वह तो जैसा ठीक दिया गया है, वैसा ही शायद जमक गया है। या यह कह लीजिये कि जहाँ सब कुछ तथा सब हालतों का End (अन्त) होता जाता है, वहीं उसके भी End (अन्त) की बारी आ गई है। यदि साम्यावस्था कहूँ तो उसकी भी पहिचान नहीं रह गई है, वह भी तो करीब-करीब न जाने कहाँ डूब गई, या भाई मेरे अन्दर के सोखते में वह भी सूख गई है। अब तो एक शुद्ध हालत सी दरसती है। जिसमें न कोई रंग ही दीखता है, न कुछ, बस शुद्ध हालत कह सकते हैं। परन्तु फिर भी ‘श्री बाबूजी’ यह क्या बात है कि मन पर असर न मालूम होते हुए भी मुंह पर तकलीफ, खुशी, दुख, आनन्द, या कभी-कभी Seriousness (गहन अवस्था में विलीन) के भाव क्यों मालूम पड़ते हैं? इससे भाई, पता चलता है कि अनजान में ही कुछ असर शायद पड़ता जरूर होगा, वैसे ‘आप’ जानें। परन्तु यह भी बात है कि मन की दशा में तो कोई परिवर्तन मालूम नहीं पड़ता, शायद वातावरण का Reflection (प्रतिच्छाया) मन पर पड़ता होगा, खैर, यह सब ‘आप’ जानें। छोटे भाई, बहनों को प्यार। केसर आखिरी मई में आवेंगी। उसके मसूढ़ों का इलाज हो रहा है। इतिः

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री - कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-215
शाहजहाँपुर
7/5/1952
तुम्हारा खत 4.5.52 का बज़रिये डाक पहुंचा और 7.5.52 का खत माता जी के द्वारा मिला। तुमने ताऊजी की दशा जो लिखी है, उसमें कुछ तो सही है। उनके संस्कार बनना करीब-करीब बन्द हो चुके हैं, और साम्यावस्था जो लिखी है, उसकी बहुत सी किस्में हैं। बहुत नीचे किस्म की साम्य अवस्था उनमें अन्दर मौजूद मालूम होती है, क्योंकि मैंने इस किस्म की उनको तवज्जो भी दी है।

तुमने अपनी हालत Inactive (स्वतःचालित) होने की जो लिखी है, हमारे यहाँ Inactivity (स्वतःचालित) बिल्कुल शुरू से चलती है, पहले ही दिन से। यानी जिस हालत पर कि पहुंचना है, उसका बीज शुरू में ही बो दिया जाता है। जितना Advancement (उन्नति) होता जाता है, उतनी ही वह चीज़ ज़्यादा मालूम होती है। किसी चीज़ के याद आने में जो हालत उतरी हुई मालूम होती है, उसकी वजह यह है कि एकाग्रता कुछ Disturb (भंग) हो जाती है। तुमने यह जो लिखा है कि “मेरी तामसी हालत मालूम पड़ती है, इसलिये कि कभी-कभी नींद में रहने की तबियत चाहती है और कभी तबियत चाहती है कि हाथ-पैर कुछ न हिलाऊं।“ यह तामसी हालत नहीं है, बल्कि इन्द्रियों की बहुत कुछ लय-अवस्था हो जाने की दलील है और तुमने यह जो लिखा है कि “जो किसी के दिल में होता है, वैसी ही मैं बातें करने लगती हूँ।“ यह शुद्ध हृदय होने की पहिचान है। मेरी हालत यह किसी वक्त बहुत तेज़ थी और अब न जाने कहाँ चली गई। ताज्जुब यह है कि लाला जी में यह बात आखिर वक्त तक रही और मुझमें अब यह बात महसूस नहीं होती। तुमने सात मई को खत में जो Inactivity (स्वतःचालित) को भी गुम करना लिखा है, यह तो बहुत अच्छी चीज़ है। बाकी उस कुल खत का जवाब यह है कि मन जब तक उस जगह पर नहीं पहुंच जाता जहाँ से कि वह आया है तब तक उसकी Seriousness (गहन अवस्था में विलीन होने का) के भाव कुछ न कुछ मालूम पड़ते हैं।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-216
लखीमपुर
9/5/1952
मेरा एक पत्र अम्मा ने ‘आपको’ दिया होगा। यहाँ सब कुशल पूर्वक हैं। आशा है ‘आप’ सब भी सकुशल होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

न जाने क्या बात है कि तबियत में इतनी सुस्ती है कि बेहद। बस दिन भर सोने को तो नहीं, परन्तु नींद की दशा में पड़े रहने को तबियत रहती है, और अक्सर पड़ी ही रहती हूँ। हाथ-पैर हिलाना बुरा लगता है, इसलिये जहाँ उठना पड़ता है या कोई भी बोलता है मुझसे, तो बड़ी खीझ आती है। ऐसी हालत है कि जैसे मन इस सुस्तीपने में लय हो गया लगता है। कुछ समझ में नहीं आता कि क्या हो? कैसे हो? यहाँ तक है कि यदि कोई कह दे कि 'आप' आये हैं, तो भी शायद मन को कोई परवाह नहीं होगी, वह उठने की गवाही न देगा। इतना आलस्यपना तो मैंने आज तक सुना नहीं कि जितना मुझमें भरा हुआ है। इसीलिये बरबस मन को बेकार बातों में बहकाने की कोशिश करती हूँ कि कहीं बेहद की हद को ज़रा पार न कर जावे। फिर भी यहाँ तो यह है कि “सूरदास की काली कमरी चढ़े न दूजो रंग”। कभी-कभी अन्दाजा उस बेहद की हद को पार करने की दशा का लगा लेती हूँ। पूजा तथा Working (कार्य) जो अपने आप हो, सो हो जावे, वरना लाचारी दिखाई देती है। Constant Remembrance (सतत् स्मरण) अब मेरे बस की नहीं रही। पहले यह हालत कभी-कभी एकाध दिन को हो जाती थी, परन्तु अब तो रहती हर समय है और अधिक रहती है, परन्तु बीच-बीच में दो-तीन दिन को तो बेहद हो जाती है। Control (काबू) में नहीं आती है, इसलिये दिन भर मैं चुपचाप पड़ी रहती हूँ। इसलिये देखने वाले कहते हैं कि अब तबियत अधिक खराब है, इलाज फिर शुरू कर दो। कभी-कभी मैं भी सोचने लगती हूँ, परन्तु कोई ख़ास नहीं। परन्तु अब 4-5 दिन से हाल कुछ और है। ऐसा मालूम पड़ता है कि मन तो मुर्दापने में लय होकर अब विलीन हुआ जा रहा है। पत्र लिखने तथा हालत तक लिखने को तबियत नहीं चाहती है। बरकाते- बरकाते कभी बैठ जाती हूँ तो लिख जाती है। भाई, कुछ यह हाल है कि मुझे तो होश न रहा, इसलिये ऐसा लगता है कि धोखे से फ़ना या फ़नाइयत भी कही फ़ना हो गई। अब तो समझ लीजिये कि मुर्दा भी मर गया, ऐसी दशा है। पहले Inactive पना (अकर्मण्य सी) था, अब तो उसकी जगह यह कुछ और हो गया है। वह तो अब खत्म हो गया लगता है। अब तो ऐसा लगता है कि बाह्य तथा आंतरिक ज्ञान कहीं लय हुआ जा रहा है, परन्तु न जाने कैसे "मालिक" की कृपा-दृष्टि को वे दो आँखें फिर भी कुछ ज्ञान रखाये हुये हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार।

आपकी दीन-हीन पुत्री
पुत्री - कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-217
लखीमपुर
11/5/1952
कृपा-पत्र ‘आपके’ दो अम्मा के हाथों मिल गये। समाचार मालूम हुए। पूज्य ताऊ जी ने इधर काफ़ी मेहनत तथा याद रखने की कोशिश शुरू कर दी है, अब ईश्वर मालिक है, उनकी इतनी ही कोशिश बनी रहे। जैसा कि पहले पत्र में ‘आपने’ लिखा था, मैं और वे दोनों समय करीब-करीब बैठ ही जाते हैं।

‘आपने’ लिखा है कि “अगर तुम्हारा शौक और हालत ऐसी ही रही तो तुम्हें धुर तक पहुंचाना हैं” परन्तु मैं देखती हूँ कि भाई शौक और प्रेम तो मुझे मालूम नहीं कि मैं कर पाती हूँ या नहीं, परन्तु न जाने यह बात कुछ हो गई है कि ज्यों दिन बीत रहें हैं, न जाने कैसी बेकली भी वैसे ही वैसे बढ़ती जाती है। शायद ‘आप’ तेजी से सैर कराना चाहते हैं, इसलिये ही यह भी बराबर तेज़ ही हो रही है। ‘आपने’ यह लिखा है कि ‘इस जल्दी में यह काम तुम्हारा है कि इसमें लय-अवस्था प्राप्त करती चलो’ सो ‘श्री बाबूजी’ मुझसे तो जैसा ‘आप’ चाहेंगे, बराबर वैसा होता ही रहेगा।

भाई, मेरा तो अब कुछ यह हाल है कि मेरी निगाह तो खत्म हो चुकी, रोशनी जाती रही, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा-दृष्टि ‘उसकी’ निगाह की रोशनी ही मुझे पग-पग पर रोशनी देती हुई आगे बढ़ाये लिये जा रही है। अंधे की लाठी की तरह बस ‘उसका’ ही सहारा रह गया है। मुझे तो ऐसा महसूस होता है कि ‘वह’ बराबर मुझे लिये बढ़ाता ही जा रहा है। इधर दो दिन से हालत कुछ बदली हुई सी है। पहले जैसे मैंने लिखा था कि ऐसा मालूम पड़ता है कि सब चीज़ कहीं लय हुई जा रही है। अब इधर तो वह हालत भी गुम हो गई लगती है। मुर्दे में मरकर कुछ नई जान सी आ गई है। दो तीन दिन से नाभि में कुछ खुरभुर सी हुआ करती है, अक्सर कुछ दर्द भी होता रहता है। छोटे भाई-बहनों को प्यार। अम्मा आपको आशीर्वाद कहती है। इतिः

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री - कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-218
शाहजहाँपुर
16/5/1952
तुम्हारे खत मिल गये। जवाब की कोई ज़रूरत तो है नहीं, मगर खैर कुछ लिखे देता हूँ।

कोई दुनियाबी मामलात में परेशान, कोई कुछ और ज़रूरी बातों में अपनी तबियत लगाता है, और मुझे यह फ़िकर। जब तुम्हारी हालत, मैं Read (पढ़ता) करता हूँ, तो हो जाती है कि अगले मुकामात में कितने दिनों रोका जावे, क्योंकि जो मुकामात आगे आ रहें हैं, उनमें कुछ ज़्यादा मुफीद मालूम होता है और मेरा ख्याल यह है कि जैसे मैंने अपनी जवानी और लड़कपन में गुरू-कृपा से काम निपटा लिया; ऐसा ही मैं चाहता हूँ कि जो लोग आगे बढ़ने की हिम्मत रखते हैं, उनका काम भी जल्दी निबटा दूं। अब मास्टर साहब के काम में बहुत जल्दी की गई, उससे फायदा यह हुआ कि मुझे ज़्यादा Sitting (सिटिंग) देनी नहीं पड़ती हैं। कभी-कभी कुछ मदद दे देता हूँ या उसके निखारने की कोशिश करता हूँ।

मैं तुम्हारे ‘C’ point (सी प्वाइंट) पर अक्सर तवज्जो देता हूँ। सैर की हालत अभी शुरू नहीं हुई है, मगर अब शुरू होना चाहती है। मैंने लिखा था कि सात-सात, आठ-आठ रोज़ हालत पर रखूंगा। ‘C’ (सी) के बाद उससे अगली हालत में खींच लूंगा। मगर मैं गौर करता हूँ तो अगला मुकाम है उसमें और भी Broader Vision (व्यापक नज्ज़ारा) मौजूद है। अब मेरी समझ में नहीं आता कि क्या करना चाहिये। मैं लाला जी से इस बारे में Dictate (डिक्टेट) लूंगा कि उन्होंने मेरे मुकाम किस तरीके से तय कराये। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

शुभचिन्तक
राम चन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-219
लखीमपुर
16/5/1952
मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। यहाँ सब कुशलपूर्वक हैं, आशा है ‘आप’ सब भी सकुशल होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई हालत बिल्कुल उथली हो गई है। हालत बदल गई है। अब तो ऐसा लगता है कि हालत में जो रंगीनी थी, वह धीरे-धीरे खत्म हो रही है धुल रही है। आजकल तो 2-3 दिन से ऐसा हाल है कि न जाने क्यों दिनभर छाती कूटा करूँ, परन्तु फिर भी चैन नहीं है। दिन-रात मन में हाय-हाय हुआ करती है। अब तो पहले जैसे हरदम ‘मालिक’ में ही रमी रहती थी, वह भी खत्म हो गया है, शायद इस लिये ही तबियत तड़पती रहती है। शायद मछली को पानी में से निकाल लेने पर, थोड़ी देर तड़प कर फिर तो शान्त हो (यानी मर) जाती है, परन्तु यहाँ तो वह भी नहीं हो पाता है। मेरी हालत तो पहले से बिल्कुल फ़र्क है। इधर तो यह भी हाल है कि मुझे तो एक क्षण को भी यह एहसास ही नहीं होता कि मुझमें प्राण है कि नहीं। मैं तो भाई, यह भी नहीं जानती कि मैं ज़िन्दा हूँ, या मर गई हूँ, या कोई चीज़ भी। बल्कि यह जानने की तबियत भी नहीं होती है। आजकल तो कहीं भाग जाने को तबियत बार-बार फड़कती है। कभी-कभी वहाँ (यानी ‘आपके’ पास) आने को तबियत बेताब हो जाती है, परन्तु किसी से कहूँ तो क्या कहूँ? कैसे कहूँ? खैर, जैसे 'वह' रखेगा, वैसे ही रहना है। इधर तो यही हाल चल रहा है कि कभी तो बेताबी बढ़ जाती है, उस समय तो मुझे कुछ सूझता ही नहीं, न कुछ समझ में आता है। और कभी घट जाती है। इधर तो यह हाल है कि 'मालिक' का मुझे कहीं एहसास ही नहीं होता है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ कहीं मैं ‘मालिक’ से दूर या अलग तो नहीं हो गई हूँ या भाई, यह क्या हालत है। तबियत मे रंगीनी का नाम नहीं है। उदासी की सी हालत ने चारों ओर घेरा डाल रखा है।

विब्बो का हाल जब से अम्मा आई हैं, कुछ मालूम नहीं हुआ। कृपया उसका हाल लिख दीजियेगा। अम्मा कहती है कि माता जी उसे सेब खाने को हरगिज़ न दें। छोटे भाई-बहनों को प्यार। अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं।

ता. १७.०५.५२

‘आपका’ पत्र दद्दा के हाथ जो भेजा, सो अभी मिल गया। ‘आपको’ इतनी फिक्र मेरी है, बहुत-बहुत धन्यवाद है। मैं तो यह कहती हूँ कि विद्यार्थी जो Teacher (शिक्षक) को खुश न रख सका और यदि शिष्य हुआ और सिखाने वाले को खुश न रख सका तो बेकार है और सबसे अधिक तो मनुष्य जीवन में अपने ‘मालिक’ पर यदि कुरबान न हो सका तो व्यर्थ ही हुआ। खैर, मुझे तो भाई, जिससे काम है, बस है। मुझे My Master (मेरे मालिक) ने दूसरा लफ्ज़ और कोई पढ़ाया ही नहीं। तबियत इधर 10-12 दिन से खराब चल रही है। कमज़ोरी अधिक मालूम पड़ती है। फ़िक्र की कोई बात नहीं है। धीरे-धीरे ठीक हो जायेगी।
आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री - कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-220
लखीमपुर
22/5/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र जो पूज्य मास्टर साहब जी के हाथों भेजा था, सो मिला होगा। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई हालत बावजूद कोशिश के भी ठीक नहीं हो पाती है। अब तो भाई बजाय डूबने के उतराती चली आती हूँ। बहुत कोशिश करती हूँ याद करने की, परन्तु अब हालत ऐसी बुरी हो गई है, कि ‘मालिक’ में भी अपनायत में जो एक मीठी सी छुपी हुई खुशी थी, वह नहीं आ पाती तो उस याद से क्या लाभ। खैर, यह भी ‘उसी’ की कुछ मर्ज़ी है, परन्तु न उस याद से संतोष ही हो पाता है न कुछ, मन मर सा जाता है। यद्यपि मुझे चैन नहीं पड़ता है, परन्तु फिर भी देखती हूँ कि वह आग जो भीतर मालूम पड़ती थी, अब याद कन्झाने लगी है। एक खाली, रूखी याद या कोशिश से भला क्या लाभ। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ जरा कृपया देख लीजियेगा कि हालत में कमज़ोरी तो नहीं आ गई है। कृपया ‘आप’ बताइये, मेरी हालत बाढ़ पर है या ठप और मैं क्या करूँ लिखियेगा। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इतिः

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री- कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-221
लखीमपुर
27/5/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र मिला होगा। D.F.O. के यहाँ से ताऊजी से पूज्य मास्टर साहब जी के पत्र द्वारा ‘आपकी’ तबियत अब अच्छी जानकर प्रसन्नता हुई। मेरी तबियत में अभी कोई ख़ास लाभ नहीं हुआ है। कमज़ोरी अभी अधिक चल रही है, इसलिए पत्र में एक दिन की देरी हो ही जाती है, खैर, ईश्वर की कृपा सब ठीक हो ही जावेगा। 'मालिक' की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो निवेदन कर रही हूँ।

अब इधर हालत बदल गई है। शुद्ध व सरल हो गई है। भाई अब तो यह हाल है कि पहले की, अब तक की सारी हालतें तो ऐसी साफ़ हो गई हैं मानों यह मुझमें आई ही नहीं। मैं ही क्या, यदि ‘आप’ भी देखेंगे तो भी ऐसी ही दशा पायेंगे। अब तो मुझे यह भी नहीं मालूम पड़ता कि मैं Absent-Minded (भूली हुई सी) रहती हूँ। अब तो यह हाल है कि गौर करने पर भी इसका शक भी नहीं पाती हूँ कि मैं Absent-Minded (भूली हुई सी) रहती हूँ या थी। मुझे तो अब यह तक नहीं मालूम कि “उसकी” (यानी ईश्वर की) याद करने को तबियत चाहती है या नहीं और फिर यदि कोशिश करूँ भी तो यह नहीं महसूस होता है कि “उसकी” याद से खुशी होती है या नहीं। हाँ, इतना अवश्य है कि एक हालत कुछ ऐसी है जो मन को अच्छी लगती है। अब तो भाई यह हाल है कि न जिन्दगी ही रही न मौत ही न अच्छी ही हालत रही न बुरी ही। न जाने यह सब क्या हो गया है। न हालत में ठंडक ही रही न गर्मी ही अब तो भाई न वतन में ही रही, न बेवतन की ही रही। अब कुछ यह हाल है कि थोड़े-थोड़े दिन में मन फिर सो जाता है, फिर जागता है, फिर सो जाता है, फिर जगाया जाता है। सुस्ती बिल्कुल नहीं है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ अब तो यह मन ऐसा हो गया है कि अब तो इसे पूजा तक, “उसकी” याद तक में रोचकता रंचमात्र को भी नहीं आने पाती है। मन सो जाता है या शायद इतना घिस गया है, इसलिये शायद शरीर की स्फूर्ति भी सो गई है। एक यह भी बात है कि सोने की दशा महसूस नहीं होती है, बल्कि अन्दाज़ से कह दिया है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ अब तो एक अजीब सहज-अवस्था सी हो गई मालूम होती है। जिसमें अब कोई भी दशा, कुछ भी अपने में मालूम नहीं पड़ती है, बल्कि सब कुछ शायद उसी अवस्था में गुम हो गया है।

बड़े भइया का Result (परीक्षाफल) दो-एक दिन में आने वाला है, इसलिये कुछ परेशान से हैं। ‘आप’ कुकरा से यहाँ किस तारीख को आइयेगा, यह नहीं मालूम हुआ। विब्बो की तबियत का हाल कृपया लिखियेगा कि कैसी है। पूज्य मास्टर साहब जी से मेरा प्रणाम कहियेगा। कभी मुझे ऐसा लगता है कि सबकी अन्तरात्मा मैं ही हूँ या मेरी आत्मा ही सबकी अन्तरात्मा है। और भाई मैं क्या कहूँ, यह मैं जानती नहीं हूँ। दूसरे क्या हैं, यह भी नहीं जानती।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री - कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-222
लखीमपुर
27/5/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी सादर प्रणाम।

आशा है आप आराम से पहुंच गये होंगे। यहाँ सब अच्छी तरह से हैं। आशा है वहाँ भी सब आराम से होंगे। “मालिक" की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई सादगी से भी सरल तथा शुद्धता से भी कहीं शुद्ध दशा है। आध्यात्मिकता से तो मैं इतनी अनजान सी हो गई हूँ कि यह क्या चीज़ होती है, यह मैं जानती ही नहीं हूँ या ऐसा समझ लीजिये कि आध्यात्मिकता वगैरह की तमीज़ के बन्धन से भी ‘मालिक’ ने मुझे मुक्त कर दिया है या यों कहिये कि हल्केपन, सरलता तथा आध्यात्मिकता के परिणाम (Result) की दशा हो गई है। या "मालिक" जाने।

ज्यों दिन जाते हैं त्यों ऐसा लगता है कि बिल्कुल खाली, बिल्कुल गरीब हो गई हूँ। अब तो भाई यह मन तथा निगाह कहीं समा गई है। “उसके” अतिरिक्त इनको कुछ सुहाता ही नहीं है। अब तो ‘उसके’ मद में छकी पड़ी हूँ, मुझे अब कुछ नहीं चाहिये। यह समझ में नहीं आता है कि छकी हुई कहूँ या यह कहूँ कि वह छकापन भी मुझमें समा गया है। मैं तो फिर जैसी की तैसी हो गई हूँ, बस एक तृष्णा ही मेरे साथ है। कभी-कभी सिर में अजीब ठंडी-ठंडी बूंदे सी पड़ती महसूस होती हैं। रीढ़ में अजीब गुदगुदापन सा महसूस होता है। न जाने क्या बात है ‘श्री बाबूजी’, निस्बत एक अजीब हालत से जुड़ी रहती है और जब तक ‘आप’ यहाँ रहते हैं, तब तक तो कहना ही क्या है, परन्तु मैं तो अलहदापन को शायद भूल ही गई हूँ और शायद एकाकीपन रहते-रहते एकतापन का भी यही हाल हो गया हो।

भाई, मुझे तो ऐसा दिखाई देता है, ऐसा महसूस होता है कि ‘मालिक’ के तमाम हल्केपन तथा शुद्धताई के समासम या एक सा विराट् ह्रदय (broader heart) में मैं तैरती चली जा रही हूँ। एक अजीब कैफियत के मैदान में निश्चिन्त तैरती चली जा रही हूँ और ज्यों दिन बीतते हैं, ‘उससे’ अपने को या उस हालत में अपने को चिमटा हुआ पाती हूँ। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ यह क्या दृश्य मुझे दिखाई पड़ रहा है, क्या दशा है, यह वाणी के बाहर की बात है। शब्दों से परे, अति परे की बात है, भाई क्या कहना है, गूंगे का गुड़ समझ लीजिये। मुझे तो ऐसा लगता है कि कहीं यह ‘आपकी’ महत्ता का दृश्य तो नहीं है, जो ‘मालिक’ की असीम कृपा से, “उनकी” ही दी हुई दिव्य दृष्टि से मुझे एक झलक दिखलाई पड़ी है। कृपया ‘आप’ अवश्य लिखियेगा कि यह क्या चीज़ है। वह दृश्य मेरी आँखों के सामने है। इतनी कृपा ‘मालिक’ की और है कि जो मुझे ऐसा महसूस होता है कि बस उसी विराट् ह्रदय (broader heart) या एक अलौकिक दशा में मैं तैरती चली जाती हूँ या मेरा, केवल एक ख्याल उसमें तैरता चला जाता है। भाई, अब तो ऐसा लगता है कि सब पीछे की हालतों से मेरी तृप्ति हो गई है और वे सब तो कोसों पीछे छूट गई हैं। बस अब तो इसी में चलना है, चल रही हूँ, तैरती जा रही हूँ और तैरती जाऊंगी, छोर नहीं है।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मुझे न तो रत्ती भर भी Liberation (मुक्ति) की चाह है, न ध्येय की याद है, बस “उसका” ध्यान ‘उसी’ की कृपा से है, ‘वह’ चाहे जहाँ ले जावे। कहाँ और कैसे लिये जा रहा है, मैं यह भी नहीं जानती। परन्तु अब ऊपरवाली दशा ही मेरे अभ्यास का केन्द्र है। मैं तो इतनी गरीब, इतनी खाली हूँ कि अपने में कुछ भी होने का शक या गुमान तक भी नहीं आता। इतनी निश्चिन्तता है कि जैसे 4-5 वर्ष का बालक पेट के बल, माँ की छाती पर निश्चिन्तता से तैरता फिरता है और फिर भी माँ के स्नेहरस से सराबोर रहता है। बस शायद बिल्कुल वही अबोध दशा मेरी है। मुझे तो भाई अब अपने प्रेम की तो खबर ही नहीं है, बल्कि ‘मालिक’ के अपने ऊपर असीम स्नेह के रस से बराबर सिंच रही हूँ। अब तो यह बच्चा (यानी मैं) तो कुछ जानती ही नहीं हूँ, अब तो भार माँ (यानी मालिक) के ऊपर है, चाहे स्नेह करे या, जैसी उसकी मर्जी है। Activity (स्फूर्ति) फिर कुछ घटना शुरू हो गई।

‘ईश्वर’ की कृपा से केसर Second Division (सेकेंड डिवीज़न) पास हो गई तथा नारायण दद्दा भी IIIrd Division (थर्ड डिवीज़न) पास हो गये। हम सब की ओर से ‘आप’ सब को बहुत-बहुत बधाई है। अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं तथा कहती हैं कि बिब्बो की तबियत का हाल लिख दीजियेगा। छोटे भाई-बहनों को प्यार। अभी तो दो एक दिन सूना सा मालूम पड़ता है। पूज्य मास्टर साहब के यहाँ खाना खाकर जाने की याद आने लगती है। खैर, इतिः

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री - कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-223
लखीमपुर
26/6/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। यहाँ सब कुशल पूर्वक हैं। आशा है ‘आप’ भी सकुशल होंगे। ईश्वर की कृपा से शायद ‘आपकी’ साँस को तथा दिमाग़ में क्लोरोफॉर्म के असर को अब काफी लाभ होगा। मुझे कभी-कभी ‘आपकी’ बहुत याद आती है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा चल रही है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो यह हाल है कि सब लोग जिन्दा, मुर्दा सब एक समान ही दिखाई देते हैं। या यों कहिये कि कोई ज़िन्दा, मुर्दा कुछ कैसा भी मालूम ही नहीं पड़ता है। कुछ यह दशा है कि कहीं दूसरे का या द्वैत का तो आभास तक महसूस नहीं होता है। न कोई जन्मता, मरता या ज़िन्दा, मुर्दा एहसास होता है। न जाने क्या है अपनी और सर्वत्र एक सहजदशा सी फैली हुई लगती है, जिसे दशा केवल मान लिया है। अब तो ऐसा हो गया है कि एक ही शीशा सब तरफ फैला हुआ है और उसमें एक ही दशा का प्रतिबिम्ब पड़ रहा है, बस और कुछ रह ही नहीं गया है। नहीं, नहीं, प्रतिबिम्ब तो शायद कोई है ही नहीं, फिर न जाने क्या है, मैं ठीक लिख नहीं पाई हूँ।

अब तो ऐसी हालत है कि जैसे मिठाई खाकर मिठाई तो खत्म हो जाती है, परन्तु मिठास यदि हम ध्यान दें तो कुछ शेष रहती है, परन्तु मैं तो मिठास वगैरह कुछ नहीं जानती हूँ। मैं तो भाई जिसकी संटी के इशारे से नाच रही हूँ, सो नाच रही हूँ। अब तो भाई Natural (सहजता) ही मेरी Nature (स्वभाव) या Condition (दशा) हो गई है। सब में बिल्कुल सहजता आ गई है। क्योंकि सब की Importance (महत्ता) ही जाती रही। अब तो दशा शायद हर समय प्रकृति से जुड़ी हुई रहती है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ कुछ यह बात है कि यदि कोई मुझसे किसी दशा के विषय में पूछे तो जैसे मैं कहती हूँ, परन्तु न जाने क्यों अक्सर कहने के साथ ही साथ वही हालत बाहर फैलती दरसने लगती है।

भाई अब तो जो हालत सामने आती है, तो अक्सर यह मेरी हालत है, यह नहीं होता, बल्कि हालत है और हालत भी क्या कहूँ, कुछ समझ में नही आता है। अब भीतर ऐसी हालत या आनन्द है कि जो है उसे कह नहीं सकती हूँ। कभी-कभी बरबस अपने आप मन में उस हालत या आनन्द को देखकर वाह-वाह होने लगती है। परन्तु वह आनन्द, आनन्द से परे है। या आनन्द से कहीं बेतौल है। परन्तु मेरी निगाह के सामने तो कुछ नहीं ठहरता है, मेरी तो निगाह न जाने कहाँ विलीन हो गई है। मुझे तो जब तक ‘आप’ यहाँ रहते हैं, तब तक तो हालत कुछ थमी रहती है, परन्तु मैं तो थमी भी नहीं रहना चाहती हूँ। कल से हालत में कुछ और परिवर्तन मालूम पड़ रहा है। अभी तो इतना महसूस होता कि जो दशा अब तक थी, वह भीतर धसक गई है या समा गई है। खैर, भाई आप जानें मेरी तो सारी कलई ‘मालिक’ पर खुल चुकी है। कुछ यह है कि अब तो यदि मुझे जरा सा भी गुस्सा आ जाता है तो अपने में बर्दाश्त नहीं होता है। मुझे अच्छा नहीं लगता है। ‘मालिक’ की कृपा से सब ठीक हो जायेगा, कोई ख़ास बात नहीं है। छोटे भाई-बहनों को प्यार। परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से गुस्सा आती ही बहुत कम है। अब शायद यह भी न आये । इतिः

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री - कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-224
शाहजहाँपुर
29/5/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी खुश रहो।

तुम्हारे पत्र मिल गये। 17 जून का जो खत है, उसकी सिर्फ दो बातों का जवाब दे रहा हूँ। सिर में नन्हीं-नन्हीं फुहार जो गिर रही है, उसकी वजह यह है कि जब तुम मास्टर साहब के यहाँ बैठी थी, तो तुमने बतलाया था कि सिर में कुछ गर्मी मालूम होती है। उस वक्त मैंने ज़रा ठण्डी और नन्हीं-नन्हीं फुहार गिराई, ताकि गर्मी की तकलीफ़ जाती रहे। अब चूंकि तुममें प्रेम की वजह से आकर्षण शक्ति बढ़ी हुई है, और ग्रहण करने का माद्दा भी बढ़ा है, इसलिये यह चीज़ कुछ कायम हो गई है। ख्याल में जिन्दगी होती है और अगर वह माया से सम्बन्धित नहीं रहती तो उसमें ईश्वरीय शक्ति की वृद्धि हो जाती है। इसलिये यह हो ही नहीं सकता कि उसका असर न पड़े और यह तुम्हारी काबलियत है कि तुमने उस असर को अब तक कायम रखा। तुमने उसी खत में जो लिखा है कि एक अजीब कैफियत के मैदान में निश्चिन्त तैरती चली जा रही हूँ, जिसका कहना शब्द और वाणी से परे है। यह तो बहुत ही अच्छी हालत है। लालाजी साहब ने किसी वक्त कहा था कि आध्यात्मिक-उन्नति क्या है? बस एक चटियल मैदान है, जिसमें बस चले ही जाना है - मगर अभी दिल्ली दूर है। यह चटियल मैदान जो निगाह के सामने है, इसी में बस तैरते जाना है। अब रास्ता खुल गया और रूहानियत की शुरूआत ठीक-ठीक हो गई, अब इसमें जितनी तरक्की है, वह रूहानियत से सम्बन्ध रखेगी।

Dictate from Lalaji (श्री लाला जी का डिक्टेट):

“मगर किसी हालत को काफी नहीं समझना चाहिये। “रामचन्द्र” ऊपर लिख चुका है कि अभी दिल्ली दूर है - जो सही है। अभी तुमने देखा ही क्या है, देखने वाली हालतें तो अब आ रहीं हैं, जिसके एहसास करने के लिये बड़े दिल वाले की ज़रूरत है और बड़ी समझ की और Intelligence (बुद्धिमानी) की। हमारे यहाँ यह हालतें सब पर गुजरती हैं, मगर लोग एहसास करने की काबलियत नहीं रखते, इसलिये उनका मज़ा फीका पड़ जाता है। बाकी जो 23 जून का खत है, उसके जवाब की कोई ज़रूरत नहीं। उसमें तो एक हालत का Description (वर्णन) है। अब मैं लिख चुका - खुश रहो। रामचन्द्र जो समझेगा, जवाब देगा।“

कल ता. 28 दिन शनिवार को किसी वक्त मुझे यह मालूम हुआ कि तुममें कुछ ख्याली थकान सी है, आज यह चीज नहीं है। ज़्यादा तेजी से जाने में यह हो जाता है कि कुछ थकान सी मालूम होने लगती है। उसमें फिर Energy (शक्ति) बढ़ा दी जाती है। मुझे भी यह चीज़ बड़े-बड़े मुकामात को तय करने में महसूस हुई है और इसमें कोई हर्ज नहीं। अभी मेरी समझ में यह नहीं आया कि ‘D’ के मुकाम पर कब तक रोकूँ खैर, यह दो एक रोज़ में तय कर लूंगा। फिर जैसी मुझे रोशनी मिल जावे वैसा काम करूँगा।

अब 24 जून का खत जो मिला है, वह तो बड़ी अच्छी हालत है। मैं भी इस हालत को तरसता हूँ। यह इतनी उम्दा हालत देखने में आई है कि मैं इस हालत पर सैकड़ों सल्तनतें अगर मेरे पास होतीं तो न्योछावर कर देता मगर इसकी मानी यह न समझ जाना कि अब कुछ करने को बाकी नहीं रहा, बस यही काफ़ी है।

हंसी-खेल नहि पाँइयाँ, जिन पाया तिन रोय । हाँसे खेले पिऊ मिलें, तो कौन दुहागिन होय।।

शुभचिन्तक,
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-225
लखीमपुर
21/6/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा पत्र जो दद्दा के हाथ भेजा था, मिल गया होगा। यहाँ सब कुशलपूर्वक हैं, आशा है ‘आप’ भी अच्छी तरह होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक -दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब कुछ यह हाल है कि भीतर की जो दशा या जो आनन्द था, वह भी सब बिल्कुल पिघल कर समान रूप से बहता जा रहा है। रीढ़ की हड्डी में फिर वही रेंगन तथा सरसराहट या गुदगुदापन सा रहता है। अब हालत इधर कुछ अच्छी नहीं मालूम पड़ती है। जब हालत बदलती है, तो एक बार ऐसा मालूम पड़ता है है कि कुछ थोड़ा-बहुत कूड़ा-करकट उभर आया, यद्यपि इसके दो-एक दिनों बाद ही फिर वही निर्मल विशुद्ध दशा हो जाती है। अब पहले की दशा जो मैंने बहुत बढ़िया वाली लिखी थी, वह तो ऐसी लापता हो गई है कि नामोनिशान तक शेष नहीं रह गया है।

कल सवेरे से दशा कुछ बदल गई है। अब तो भाई भीतर ऐसी ठंडक रहती है, जो कितनी भी, कैसी भी गर्मी से गर्म होने ही नहीं पाती है। मेरा तो यह हाल है कि मुझे जीवन में बिना ‘मालिक’ के कोई भी क्षण याद ही नहीं पड़ता है। दिन आता है, निकल जाता है, रात्रि आती है, चली जाती है, मौसम आता है और बदल जाता है, परन्तु मेरे ऊपर ‘मालिक’ की कृपा से किसी का कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता है। मैं देखती हूँ कि मेरा तो किसी से कुछ सम्बन्ध ही नहीं रह गया है। मैं तो सबसे Free (आजाद) हो गई हूँ। मुझे तो ऐसा दिखाई पड़ता है कि मेरा तो भीतर-बाहर, रोम-रोम, ‘मालिक’ ही ‘मालिक’ हो गया है। बल्कि “मेरा मुझमें राम रहा” वाली दशा है, सो भी इतनी सहज कि वैसे तो कुछ नहीं मानों मुझमें “उसकी” याद वगैरह कुछ हो ही नहीं, परन्तु यदि जब ध्यान जाये तो बाहर-भीतर, रोम-रोम कण-कण उसमें ही व्याप्त मिलेगा या भाई, यह कह लीजिये कि यह दशा है कि “मैं रमि रह्यो मोर निरजंन नाऊं"। और अब तो मेरी और ‘मालिक’ की विभिन्नता रहित एक अजीब ठंडी दशा सर्वत्र फैली दिखाई देती है। और मैं जब पीछे निगाह फेरती हूँ तो उसी ठंडक वाली दशा में अपने को बराबर ओत-प्रोत पाती हूँ। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मैं तो अपने ‘मालिक’ के साथ-साथ सब कुछ पीछे छोड़ती, न जाने कहाँ चलती ही चली जा रही हूँ, यद्यपि कितना चलना है, इसका छोर नहीं, परन्तु “चलाने वाला” मुझे इतना अच्छा लगता है कि “उसके” साथ चलने में बजाय थकान के चाल में गति ही आती जाती है। और यह भी है कि अब तो बिना चले एक क्षण का भी ठहरना सह्य नहीं होता है। हर रास्ते का, या रास्ते की हर चीज का मज़ा चखाता हुआ प्रेम के साथ अपने निजी बच्चे की तरह देखभाल करता हुआ “वह” मुझे लिये जा रहा है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ संसार में ऐसा आज कौन है, मैं तो फिर अपने “श्री समर्थ जी महाराज” का कोटिशः धन्यवाद देती हूँ कि जिन्होंने संसार को ऐसी अमोघ “विभूति” ऐसी “परमनिधि” देकर कृतार्थ कर दिया है। मुझे तो ‘मालिक’ की कृपा उपरोक्त दशा सब दीखती है, इसलिये हृदय से बारम्बार से “उनके” लिये साधु-साधु (वाह, वाह) ही निकलता है। भाई, मुझे तो ऐसा लगता है कि मेरा ही Heart (हृदय) सर्वत्र फैला हुआ है, समस्त ब्रह्माण्ड में फैला हुआ है, या यह कह लीजिये कि मेरा Heart (ह्रदय) उसके Heart (हृदय) में समाता चला जा रहा है। कुछ यह हो गया है कि अब तक की सारी दशाओं की तो मानों प्रलय हो चुकी है। अब तो एक अजीब ढंग हैं, एक अजीब रंग है। बात यह है कि न जाने क्यों “वह” मुझे मुझसे अधिक चाहने लगा है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ इधर 2-3 दिन केसर पूजा करने बैठी तो, उसे ऐसा लगता कि दिमाग कहीं ऊपर खिंचा जा रहा है, उसके सिर में दर्द भी हो गया, परन्तु अब ठीक है। इसमें कहीं मुझसे तो कोई गलती नहीं हो गई, क्योंकि ताऊजी के तो ऐसा नहीं होता है। यद्यपि केसर का मन तो बेढब लगता था। छोटे भाई-बहनों को प्यार । अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। इतिः

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री - कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-226
लखीमपुर
2/7/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र 'आपका' आया- पढ़कर प्रसन्नता हुई। केसर की दशा पढ़कर अपार हर्ष हुआ, सो इसलिये नहीं कि वह अपनी है, बल्कि इसलिये कि वह भी ‘मालिक’ की होने जा रही है। और ‘मालिक’ की होना चाहती है, बस ‘उसी’ की निस्बत से मेरा सम्बन्ध है। ‘आपने’ जो ताऊजी के पत्र में लिखा है कि ईश्वरीय धार की भी वर्षा तो हो ही रही है, कितना अच्छा है, कोई ज़रा देखे तो उस वर्षा को और केवल देखे ही क्या, मैं तो यही कहूँगी जैसा कि कबीर दास जी ने लिखा है कि –

"वा दिसवा बादर न उभरें, रिमझिम बरसत मेह रे"। "चौबारे ना बैठ रहौ, जा भीजौ निर्देह रे"।।

तब तो जीवन सार्थक हो जाये।

पूज्य ‘समर्थजी महाराज जी’ को सादर प्रणाम है। उन्होंने जो यह लिखा है कि “अभी तुमने देखा ही क्या है, देखने वाली हालतें तो अब आ रही हैं, जिसके एहसास करने के लिए बड़े दिल वाले की ज़रूरत है, और बड़ी समझ की और, Intelligence (बुद्धिमानी) की”। सो पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मुझे तो खुद ऐसा ही लगता है कि अभी हुआ ही क्या है, अभी तक तो सफाई ही हुई है और अब भी कुछ न कुछ होती ही चलती है। सो फिर मैं किसी हालत को काफी कैसे समझ सकती हूँ। प्रथम तो वह समझ ही न रही, फिर यदि अपने में कुछ महसूस होता हो उसकी मिकदार का भी अन्दाजा किया जाता। यहाँ तो जो कुछ भी थोड़ा या ज़्यादा है, बस 'मालिक' ही निधि है। अब 'उसका' अन्दाजा भला कौन लगावे सिवाय ‘उसके’ कि ‘जिसने’ ‘उसे’ बनाया हो। अब भाई रही बड़े दिल की तथा बड़ी समझ और Intelligence (बुद्धिमानी) की, इसका हाल भला मैं क्या जानूं; ‘जिसकी’ चीज़ होगी, ‘वह’ खुद जानेगा। मैं तो सच कहती हूँ कि मैं तो ‘उसे’ ही जानूं, ‘जिसे’ आजतक जाना है और बराबर कोशिश भी करती ही रहूँगी। अब यह ‘उसके’ हाथ में हैं, चाहे जितना जना दें। ख्याली थकान ‘आपने’ ठीक कर दी. बहुत-बहुत धन्यवाद है। ‘आप’ अम्मा से अम्मा कहेंगे यह सुनकर अम्मा बहुत खुश हैं।

अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आध्यात्मिक दशा है सो लिख रही हूँ पीठ में, बीच में, बाईं ओर रीढ़ के बिल्कुल लगे-लगे तो हर समय कुछ हुआ करता है। अक्सर तो जैसे पसीने के बाद फिर हवा लगती है वैसे ही पीठ में फुरफुरी सी होती है। सिर भी खुला हुआ सब साफ़ लगता है। अब तो भाई यह दशा है कि जो दशा ‘आपको’ एक बार लिख चुकी हूँ उसे फिर चाहे कोई अच्छा कहे परन्तु उसे दुबारा पढ़ने तक को मेरा मन नहीं चाहता है, फिर उसे फिर ख्याल में लाने की तो बात ही अलग रही। उसे पढ़ना तो ऐसा लगता है मानों पीछे फिरकर देखना है और निगाह भी बेचारी जिसके लिये अब बेअखत्यार हो चुकी है। अब जो दशा समझ में आती है और फिर जब थोड़ी देर में उसे लिखने बैठती हूँ और फिर सोचती हूँ तो ऐसा लगता है मानों वह स्वप्न की बात की तरह सोचकर और उसी तरह महसूस करके लिख रही हूँ। अब तो ऐसा लगता है मानों समस्त ब्रह्माण्ड वगैरह मेरी निगाह के सामने से हट चुका है बस केवल एक शुद्ध, सरल मैदान ही सामने रह गया है। जिसके बारे में पहले लिख चुकी हूँ और ‘आपने’ उसका उत्तर भी दे दिया है। न जाने क्यों मेरे भीतर की बेचैनी या कुरेदन भी दिनोंदिन तेज़ी ही पकड़ती जा रही है और होना भी चाहिये, क्योंकि मेरे लिये तो अब यही शान्ति है।

अम्मा "आपको" आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहनों को प्यार। विट्टी तथा छोटे भइया 'आपसे' प्रणाम कहते हैं। इतिः

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री - कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-227
लखीमपुर
4/7/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। दद्दा से मालूम हुआ कि अभी कुछ साँस ‘आपको’ हो ही जाती है। बिब्बो का भी हाल सुनकर सबको चिन्ता है, बुखार 102° तक अभी जाता है। ‘ईश्वर’ से प्रार्थना है कि बेचारी अब अच्छी हो जावे। ‘मालिक’ की कृपा से जो आध्यात्मिक दशा है सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई सच्ची दशा तो सहज गरीबी हो गई है। यद्यपि 'मालिक' ने अमीरी-गरीबी दोनों से ही मुझे स्वतंत्र कर दिया है और अब कुछ यह भी है कि दीनता का भी नाम नहीं रह गया है। अब तो भाई दशा कैसे कहूँ, फूल की सुगन्ध से भी हल्की तथा सहज दशा कह लीजिये। न द्वैत है, न अद्वैत है, दोनों से फर्क या परे कुछ और दशा है। अब तो जैसा है, तैसा है। अब तो सब तरफ वही दशा दरसती है और अब तो न उसकी सुधि है न उसके होने का बोझ, क्योंकि मैं तो ‘मालिक’ के साथ बराबर आगे को ही बढ़ती दिखाई पड़ती हूँ कुछ ऐसी दशा हो गई है कि मानो वतन से तो मैं बिल्कुल परिचित ही हो गई हूँ बल्कि अब तो ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे उसकी दशा भी मुझमें बराबर बिल्कुल सोखती चली जा रही है। वतन की वायु से वहाँ की रहन ही मेरी रहन हो गई है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मेरे पास तो बस केवल एक यही दशा शेष रह जाती है जैसा कि कबीर दास जी ने लिखा है कि :

सुखिया सब संसार है, खावैं और सोवैं। दुखिया दास कबीर है, जागे और रोवें। और यही मेरा चैन भी है।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। अम्मा ‘आपको’ अशीर्वाद कहती हैं। इतिः

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री - कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-228
लखीमपुर
7/7/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरे पत्र मिले होंगे। यहाँ सब अच्छी तरह है, आशा है ‘आप’ भी अच्छी तरह से होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई यह हाल हो गया है कि देखती हूँ कि अधिकतर मन इतना अविचल हो जाता है कि मानों मन नाम की कोई चीज़ ही मुझमें नहीं रह गई हो। ऐसा लगता है कि मानों बिल्कुल एक जगह पर गड़ गया हो बिल्कुल स्थिर हो गया हो। किसी भी तरह चलाने से भी नहीं चलता, किसी भी तरह की कोई इच्छा ही नहीं उठती है। ऐसी दशा है कि शक्ति भी उसमें मानों शान्त हो गई हो। या यों समझ लीजिये कि मन में पहले शान्ति आते-आते उसे शान्ति की आवश्यकता ही नहीं रह गई हो, बल्कि शान्ति और आनन्द तो अब उसका (यानी मन का) स्वतः ही निज रूप ही बन गया। अब उसमें शान्ति या आनन्द के लिये ठौर ही नहीं रह गई है। शान्ति वगैरह सबका अब कोई भिन्न रूप नहीं रह गया है। या यों कह लीजिये, मुझे अब इन सबकी कुछ पहचान ही नहीं रह गई है, परन्तु फिर भी मुझे यह तो दिखाई ही पड़ता है कि मैं बराबर तेज़ी से आगे चलती ही चली जा रही हूँ और ‘उसकी’ (यानी ‘मालिक’ से मिलने की) कुरेदना भी बराबर मेरे साथ है। परन्तु मन से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं, वह तो ऐसा लगता है, कि निज रूप को प्राप्त हो गया हो। वह भी शायद पीछे ही छूट गया है। क्योंकि मैं देखती हूँ कि आगे शायद उसकी भी गम्य नहीं है। कुरेदना तो मेरे साथ चिपटी हुई है या मेरा रूप ही हो, इसलिए वह आगे बढ़ रही है, परन्तु मैं देखती हूँ कि सिवाय ‘मालिक’ के या उन्नति के उसकी भी खबर मुझे नहीं रहती है।

पूज्य 'श्री बाबूजी' अब तो यह हो गया है कि मन को स्वाभाविक पूजा, स्वाभाविक रहन ही पसन्द है, बल्कि यों कहिये कि वह अब एक स्वाभाविक दशा में ही लीन रहता है, और भाई इससे ज़रा बाहर जाते ही जी घबड़ाने लगता है, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से उसे वही चीज़ प्राप्त भी हो गई है। अब वह उससे बाहर हटता ही नहीं। अब वह स्वाभाविक दशा क्या है? वह तो भाई जो दशा ऊपर लिखी है (यानी वह जो शान्ति रूप हो गया है) वही हो सकती है। न किसी तरह का कोई जोश या उफ़ान, न तरंग न इच्छा न वैराग्य, न राग न शान्ति न अशान्ति, न समता न असमता, बस सब ओर से सिमिट सिमटाकर एक जगह गड़कर स्थाई रह जाना, न उछल, न फाँद, न action (क्रिया) न Reaction (प्रतिक्रिया), बस शायद यही हालत है। सब कुछ शान्त हो गया, उसकी महाप्रलय हो गई, बस अन्तर इतना ज़रूर है कि उस प्रलय के समय कमल के पत्ते पर “श्रीकृष्ण चन्द्र जी” अकेले लेटे थे और यहाँ कुरेदना के ऊपर उन्नति की चाह या ‘मालिक’ से मिलने की चाह अभी किसी न किसी रूप में अवश्य लेटी रह गई है। मेरा तो ‘श्री बाबूजी’ अब यह हाल है कि हर चीज़ में हर जगह में मुझे सन्तोष का अनुभव होता है। मुझे तो सबसे तृप्ति या निवृत्ति हो गई है। केवल एक भीतरी कुरेदना के, जो किस लिये है, कैसे है, इसका पता नहीं और उसकी (यानी उस संतोष) की भी मुझे खबर नहीं। तृप्ति की तृप्ति हो गई और मुझे पता ही न रहा। मैं तो एक गरीब बेनवा की तरह रह गई हूँ जिसे पूजा तक की भी खबर न रही। अब उसकी जैसी मर्जी हो वैसे रखे।

छोटे भाई-बहनों को प्यार। अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। अम्मा आज रात को कानपुर जा रही हैं। कमज़ोरी बेहद है। अम्मा उनकी तबियत कुछ सम्भलने पर लौट आयेंगी। पूज्य मास्टर साहब से मेरा तथा केसर का प्रणाम कहियेगा तथा अम्मा का आशीर्वाद। इतिः

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री - कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-229
लखीमपुर
14/7/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ आया, समाचार मालूम हुए। ‘आपने’ मुझे Point 'E' (प्वाइंट ई) पर खींच दिया, इसका अंदाज़ मुझे 'मालिक' की कृपा से 4 जुलाई को पत्र लिखते समय हो गया था, परन्तु लिखते समय ‘आपको’ लिखना भूल गई थी, खैर ‘आपकों’ बहुत-बहुत धन्यवाद है। इधर 7-8 दिन से खाँसी तेजी पकड़ गई है इसलिये साँस भी खराब हो गईं, परन्तु परसों से दोनों ठण्डी पड़ गईं। अब बिल्कुल ठीक हूँ।, फिक्र की कोई बात नहीं है। क्योंकि कोई ख़ास तकलीफ नहीं हुई।

अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है सो लिख रही हूँ। भाई, पहले जो मैं कई बार मन की स्वाभाविकता की दशा के बारे में लिख चुकी हूँ, मन को प्रलय तथा स्वाभाविकपना और ऐसी ही पूजा पसन्द है, परन्तु अब तो यह हाल हो गया है कि मुझे वह स्वाभाविकपना याद ही नहीं आता है और इससे इतनी बेखबर हो गई हूँ कि पढ़ने से भी याद नहीं आती है। आजकल तो मैं कुरेदना तक से भी बेखबर हो गई।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मेरे अन्दर तो वह सोखता लगा है कि जो अब उस सहजता तथा स्वाभाविकता की दशा को भी सोख गया है। यह हाल है कि जो दशा, जो कैफियत आती है, वह तो सूख जाती है और मैं फिर जैसी की तैसी रह जाती हूँ। फिर भी आजकल हालत कुछ अच्छी नहीं चल रही है। इसलिये कोशिश करती रहती हूँ खैर मालिक की कृपा से दशा आज कुछ ठीक आई है।

अम्मा शायद 4-5 दिन में आवेंगी। छोटे भाई-बहनों को प्यार। पूज्य मास्टर साहब से मेरा प्रणाम कहियेगा। मेरी पीठ में तो ऐसा मालूम पड़ता है कि रीढ़ के बिल्कुल लगे-लगे। बायीं ओर कीड़े से हर समय रेंगा करते हैं। इतिः

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री - कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-230
शाहजहाँपुर
17/7/1952
परम पूज्य समर्थ श्री लालाजी साहब का Dictate (डिक्टेट) :-

"दुख्तरे नेक अख्तर नूरचश्मी कस्तूरी (भाग्यवान बेटी)
ब आफियत बाशन्द (प्रसत्र रहो)"

मेरा इरादा था कि कुछ लोग रामचन्द्र से बन जाते तो अच्छा था, मगर मेरी हिरास की हिरास है। अभी उम्मीद कर सकता हूँ कि कुछ लोग बन जावें, मगर रामचन्द्र की माद्दी (जिस्मानी) कमज़ोरी देखकर, यह ख्याल पैदा होता है कि इस कदर बार (बोझ) उसकी तन्दुरुस्ती कैसे बरदाश्त कर सकेगी। रूहानियत में तो वह जवान है और जवान ही रहेगा मेहनत ज़रूर जिस्म की तन्दुरूस्ती पर मबनी (निर्भर) है। यहाँ तो लोग यह समझते हैं कि रूहानियत मुंह का निवाला है, जब चाहेंगे मुंह में रख लेंगे। मेहनत करना कोई जानता ही नहीं। जिला देना (चमक देना) कोई पढ़ा ही नहीं। बस आला तरक्की का नाम सुन लिया है और किताब पढ़कर यह समझ लिया है कि ज़्यादा से ज़्यादा हमें यहाँ तक पहुंचना है। बजाय दुनिया की बेलौसी के ‘मालिक’ से बेलौस हो रहे हैं। इसने (रामचन्द्र ने) खतूत भी लिखे, समझाया भी, मगर जूं नहीं रेंगी - अब सिवाय इसके और क्या कहा जावे कि मर्ज़ी ईश्वर की ऐसी है। आदमी थोड़े हों या बहुत हों, इससे बदर्जहा बेहतर है कि बहुत हों और थोड़े बनें। इसके यह माने नहीं कि लोग ज़्यादा शामिल न किये जायें, तो दरवाज़ा तो सबके लिये खुला है। अब मान लो कि तुम पर उम्मीद रखी जावे तो तुम्हारी ही तन्दुरूस्ती नागुफ्ताबे है(नाकाबिल इतनी कि जिसके विषय में कुछ कहा न जावे), परन्तु तुम्हारा शौक और ‘मालिक’ की मोहब्बत यह जरूर है कि बहुत कुछ करके दिखा दोगी और हमें तुम्हारी तरक्की की उम्मीद रखनी भी चाहिये, और यह भी अगर लड़के न सही तो लड़की ही सही। लड़का और लड़की में कोई फर्क नहीं है, सिर्फ़ ज़माने ने अलग करके दिखला दिया है। एक ही अज़ो (अंग) की दो हडिड़याँ है, जो एक ही जड़ से निकलती हैं, कोई ज़्यादा फर्क नहीं। काम ऐसा होना चाहिए कि मिशन को जिला तैयार किये-कमोवेश जरूरत के लिए, तो अव्वल तो कोई इनसे काम लेने वाला नहीं मिलता और मिलता भी है तो वही डेढ़ ईट की मस्जिद बनी बनाई अपने साथ ले कर लाता है। अगर इन लोगों (तालीम देने वालों) में से भी मैं चुनूं तो सिर्फ एक मास्टर साहब रह जाते हैं, जिनसे आगे उम्मीद पाई जाती है, मगर हर शख़्स को हर काम मल्का नहीं होता, जो जिसका काम है, वही ठीक कर सकता है। एक आदमी को अगर सब काम सुपुर्द कर दिये जावें तो वह कोई भी काम ठीक न कर सकेगा। Dictate - Swami Vivekanand जी – “There should be certain blocks for certain work”, ( स्वामी विवेकानंद जी का डिक्टेट - ख़ास काम के लिये खास व्यक्ति होने चाहियें )।

यहाँ तो यह हाल है कि लिखे भी एक शख़्स, मदद करें भी तो एक ही शख्स। Function (उत्सव) का Celebration (मनाना) और उनका इन्तज़ाम भी करें तो एक ही, क्योंकि उसके दिल से लगी है और दूसरे लोग उसको कैफ़ियत नहीं देते, यह ज़रूर हैं कि चोंबे जी की भी दिलचस्पी बहत कुछ इस तरफ़ हैं, मगर रामचन्द्र को भी उनसे कुछ कम दिलचस्पी नहीं। वह तरक्की कर रहें हैं और उनका ख्याल मिशन की अच्छी तरक्की के लिये भी हैं। मेरे ख्याल से हमेशा एक दरवाजे पर रहने वाले की क़द्र ज़्यादा होती है। मैं तो ऐसे आदमी को पसन्द करता हूँ कि जैसा कि रामचन्द्र, उसकी गर्दन पर कोई छुरी भी रख दे तो भी सही बात कहने से न हटेगा - कुछ परवाह नहीं कि कोई ख़िलाफ हो या बुरा माने, नतीजा यह है कि मुमकिन है कि उसके उसूल से मुआफिकत लोग न करें, परन्तु उसके खिलाफ कोई भी नहीं होता। अब कहो, तुम्हारी तरक्की की तारीफ़ करूं ताकि तुम्हारी तबियत खुश हो जावे। मैं समझता हूँ कि तुम्हारी तारीफ़ इतनी ही बहुत है कि मैं तुमसे खुश हूँ। आज सुबह प्यास की तेज़ी रामचन्द्र में इस कदर बढ़ी; किस बात की? काम लेने की। वह इसके ढंग जाने क्या-क्या सोचने लगा। कहीं यह ख़याल था कि किसी को ख्याल की ताकत से काम लेने के लिये तैयार करूं, कहीं यह कि किसी और जरिये से मिशन की Service (सेवा) ली जावे और उसके पास तमाम उम्र यही काम रखा जावे। अब इसमें अपने आपको कौन-कौन Offer (प्रस्तुत) करते हैं। किसमें कौन सी ताकत अच्छी है, सोचकर लिखें ताकि वही काम सुपुर्द किया जाये और इसमें मेरी दोनों आँखें बराबर हैं यानी लड़के और लड़कियाँ दोनों शामिल हैं। लड़कियाँ ज़रूर कुछ Restrictions (बंधन) के साथ और लड़के किसी कदर आज़ादी के साथ। Duties (डयूटीज़) मैं लगाऊंगा।

शेर – “मन आँ मोरम कि अज़ पायम बेमालन्द। न जम्बूरम कि अज़नेशम बेनालन्द ।“

अर्थ - मैं वह चींटी हूँ कि लोग मुझे पाँव से मसल डालें - मैं वह बरैया नहीं हूँ कि लोग मेरे कारण दु:ख पावें।

शुभचितंक
समर्थ श्री रामचन्द्र जी महाराज
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-231
लखीमपुर
16/7/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘समर्थ श्री लाला जी साहब’ का आज मिला - सुनकर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। ‘उनका’ शुभाशीर्वाद सदैव मेरे साथ है। बुजुर्गों की खुशी तथा उनके आशीर्वाद बच्चों की राह में फूल बन जाते हैं। ‘उनको’ मेरा प्रणाम है तथा अनेकानेक धन्यवाद है। उन्होंने जो Working (कार्य) तथा Service (सेवा) के लिये सब से पूछा है, सो मेरा अपने लिये तो यही कहना है कि भाई, मुझमें किस बात की कितनी योग्यता है, इसका जवाब तो बेचारा वह क्या दे सकता है, जिसका ख्याल तक छिन गया हो, हाँ जिस केवल ‘मालिक’ पर मेरी कलई बहुत खुल चुकी है, वह भली प्रकार जानता है। मेरे हिस्से में तो केवल एक यह चीज़ रह गई है कि

“ज़िन्दगी है ‘राम’ से, तू ‘राम’ में बिताये जा।
‘राम’ के हुजूर में तू अपना सिर झुकाये जा।“

इसमें भी भाई देखती हूँ कि मेरी तो वह दशा हो गई है कि “लाली देखन मैं गई, मैं ही हो गई लाल”। और एक बात और है कि स्त्री, पुरुष, लड़के, लड़की का बन्धन तो कब का टूट चुका है अब तो यह एक स्वतंत्र Soul (आत्मा) है, हाँ यह बात अवश्य है कि ‘मालिक’ जैसा मुझे पुकार ले। अब तो जो ‘वह’ लड़का कहे तो मैं लड़का हूँ, लड़की कहे तो लड़की हूँ, मनुष्य कहे तो मनुष्य और हैवान कहे तो हैवान हूँ और वही नहीं, वैसी ही spirit (भावना) मुझमें काम करने लगेगी और यह सब केवल मेरे ‘मालिक’ की ही महत्ता है। आपकी Gift (उपहार) जो संसार के लिये है (यानी ‘श्री बाबूजी’), उनकी कृपा की निगाह की ही यह अभी छोटी सी बरकत है। हाँ, एक प्रार्थना यह अवश्य है कि ‘श्री बाबूजी’ के स्वास्थ्य के लिये हमें क्या करना चाहिये। यानी सेवा, कोशिश तो जहाँ तक है, जितनी बन पड़ती है, सो बराबर किये जा रही हूँ।

अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ इधर कुछ दिनों से सुस्ती हरदम बहुत छाई रहती है। किसी चीज़ में किसी बात को तबियत ही बिल्कुल नहीं चाहती है। किसी को पूजा तक कराने को तबियत नहीं चाहती है। कभी-कभी यह अधिक तेज़ी पकड़ जाती है। परसों तो इतना तक हाल था कि उठकर जबरदस्ती चलने फिरने में पैरों को घसीटना पड़ता था। हाथ उठाने से स्वयं वह बेजान सा गिर पड़ता था। आँखें अपने आप मुंदी ही रहती थीं, सो भाई, अक्सर यह दशा हो जाती है, हाँ तेज़ी और कम का अन्तर ज़रूर रहता है। परन्तु यदि कोई और बातों में मन लगा दूँ ज़बरदस्ती, तो लाभ अवश्य होता है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ अब कुछ यह देखती हूँ कि जब दशा बदलती है, तो ऐसा लगता है कि बेखबरी की दशा में परिवर्तन हो गया है और पहले वाली और अब जो दशा होती है, वह सब मेरे भीतर खप गई है और बराबर खपती-जाती हैं। बेखबरी वाली दशा का भी करीब-करीब यही हाल हो गया है। अब कुछ यह भी हो गया है कि उस चटियल मैदान की आदत पड़ जाने के कारण या न जाने क्यों या वहाँ की अब वासिनी हो जाने के कारण अब निगाह को या उस ख़याल की निगाह या रूख (जो उस मैदान में केवल चलता जा रहा है) ऊपर या आगे होने के कारण देखती हूँ कि धीरे-धीरे वह मैदान भी ओझल सा होता चला जा रहा है। कुछ यह दीखता है कि वह खयाल भी पतला पड़ता जाता है या उसकी खबर से भी बेखबर होती जाती हूँ। भाई, अब तो मेरा यह हाल है कि न मुझे यह मालूम है कि मैं बेखबर रहती हूँ और न यही मालूम पड़ता है कि बाखबर रहती हूँ, अब तो जैसी रहती हूँ, वैसी रहती हूँ। अब ‘मालिक’ जाने कैसी रहती हूँ, क्योंकि मैं तो यही जानती हूँ कि ‘मालिक’ की रहनी में रहती हूँ। अब तो यह दशा है कि तन, मन में कोई अन्तर ही नहीं रह गया है। सब कुछ न जाने क्या, कहाँ हो गये कि मुझे कुछ पता नहीं।

केसर, बिट्टो आपको प्रणाम कहती हैं। पूज्य मास्टर साहब जी से मेरा प्रणाम कहियेगा। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-232
लखीमपुर
23/7/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

पत्र जो पूज्य ताऊजी के हाथ भेजा था सो मिला होगा। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

इधर 2 दिन से सुस्ती फिर बढ़ी है और कभी दशा थोड़ी देर को शुद्ध लगती है, परन्तु अक्सर ऐसा नहीं लगता, तो यह खयाल होता है कि न जाने क्यों दशा शुद्ध नहीं महसूस होती। मैं इस चक्कर में भी पड़ जाती हूँ कि यह सुस्ती न जाने शरीर की कमज़ोरी के कारण तो नहीं है, परन्तु यह भी देखती हूँ कि यह अपने आप फिर ठीक भी हो जाती है। तब ऐसा लगता है कि मन अपनी डूब में से उछर आया हैं या जाग सा गया है।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि मेरी लगन या शौक कम हो गया है। जो घाव पहले लगते थे, वे अब पुर से गये हैं, बस इतना ज़रूर है कि जैसे घाव पुर जाने पर नरम खाल दबाने से कुछ कसक शेष रह जाती हैं। क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि जैसे पहले मुझे दिखाई देता था कि मैदान में मैं तेज़ी से तैरती चली जा रही हूँ, परन्तु अब मुझे यह सब कुछ दिखाई नहीं देता है। जोश आना है तो इतना मद्धिम कि तबियत बजाय उछलने के हल्की होती चली जाती है। छोटे भाई-बहनों को प्यार तथा पूज्य मास्टर साहब से मेरा प्रणाम कहियेगा। अम्मा परसों आ गई । फूलो जिज्जी की तबियत अब ठीक हैं। अम्मा आपको आशीवद कहती हैं। इतिः

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-233
शाहजहाँपुर
24/7/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत मिला। मैंने आज ही तुमको Point ‘E’ ( प्वाइंट ई ) से निकाल कर ‘F’ ( एफ ) पर पहुंचा दिया है। अब जो तुम्हारा अनुभव हो लिखना। मैं सोचता तो यह हूँ कि इन मुकामात पर ज़्यादा न रोकूँ। मगर कहीं पर रोकने की ज़रूरत पड़ गई तो मजबूरी हो जावेगी। हमारे यहाँ संत्सग में इन मुकामात की कदर नहीं। यहाँ तो लोग पहले ही मुकाम से निकलना नहीं चाहते। ऐसे भी हैं जो शुरू से शान्ति का मज़ा चाहते हैं और अगर कहीं पहली या दूसरी Sitting ( सिटिंग ) में ही उन्हें शान्ति न मालूम हुई तो मैं बिल्कुल बेकार और निकम्मा उनके ख्याल में आता हूँ। मैं भी भाई कोशिश करता हूँ कि पहली ही Sitting ( सिटिंग ) में उनको कुछ शान्ति मालूम हो। मजबूरन लाला जी की बरकत उन पर उतरने लगती है। मगर इसको भी एकाध ऐसे भी मिले जो अपनी काब्लियत समझ बैठते हैं कि एक महात्मा का ख्याल ले कर आया था, इसलिये यह शान्ति मालूम हुई और यह चीज़ भाई मेरे ही साथ है। देखा है कि लोग महात्माओं के पास, जो इस वक्त मशहूर हो रहे हैं, मसलन सुखदेवानंद, नारदानंद इत्यादि जाते हैं और महीनों जाते हैं , मगर वहाँ के लिए यह शान्ति का सवाल क्यों नहीं उठता। तुम्हारी समझ में इसकी क्या वजह मालूम होती है। एक या दो Sitting ( सिटिंग ) में शान्ति पैदा होना बड़ा मुश्किल है। यह तो अभ्यास के करने की चीज है। मेरा काम सिर्फ़ यह है कि ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर दूं, कि यह चीज़ पैदा होने लगे। मैं समझता हूँ यह शान्ति जो उन लोगों में पैदा हो जाती है, सिर्फ इस बात पर कि ‘लालाजी’ मुझको उनकी नज़रों में नाकाबिल ठहराना नहीं चाहते। इसका ‘उनको’ हज़ार बार धन्यवाद है। और भाई मेरी उम्र तो पूरे 22 वर्ष अभ्यास के अशान्ति में ही कटे थे और इसमें वह मज़ा था कि शान्ति में नहीं मिलता।

एक बात तुमने किसी खत में पूछी थी, वह लिखने की याद ही न रही। अब लिख रहा हूँ। तुमने पूछा था कि अब क्लोरोफार्म का असर तो नहीं है? इसमें कमी तो ज़रूर हुई होगी मगर अभी महसूस नहीं हुई। मैं तुमको काम करने का तरीका बताता हूँ । कोई काम करो तो यह समझ लो कि तुम मेरी ही Will ( इच्छा शक्ति ) से काम ले रही हो । यह नुस्खा किसी को रूहानी तरक्की देने में या ईश्वरीय काम करने में बहुत जल्द Desired effect ( इच्छानुसार प्रभाव ) पैदा कर देता है। अगर किसी शख़्स की, ईश्वर कृपा करे जब सोलह आने भर लय अवस्था अपने गुरू में हो जाती है तब इसकी ज़रूरत नहीं रहती। इससे पहले अगर किसी को Sitting ( सिटिंग ) भी दी जावे तो यही समझा जाता है कि सिखाने वाला दे रहा है। इसका असर बहुत अच्छा होता है। यह बात हर सिखाने वाले को जानना चाहिये। इसके ख्याल रखने की ज़रूरत है और तवज्जोह देते वक्त यह समझ लिया जाता है कि मैं नहीं हूँ , बल्कि मेरा सिखाने वाला है , जो तवज्जोह दे रहा है। संक्षेप में यह कि अपने आपको उस वक्त गुरू का रूप समझ लेना चाहिये। अर्थात् मान लो कि मैं तवज्जोह दूं तो मुझे यह समझना चाहिये कि मेरा जिस्म, ख्याल, दिल व दिमाग़ जो कुछ भी है, यह सब स्वयं “लाला जी” हैं और फिर तवज्जह देना चाहिये।

तुम्हारा ता. 23.7.52 का खत भी मिला। सुस्ती की शिकायत जो तुमने लिखी है - यह Soul ( आत्मा ) का ख़ासा है। जब हम उसके निकट होते जाते हैं तो उसका खवास जो कि inactive ( अकर्मण्य) है अनुभव होता है और हमारे ज़ाहिरा तौर व तरीकों में वह असर दिखलाता है। अम्मा को प्रणाम ।

शुभचितंक रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-234
लखीमपुर
26/7/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। यहाँ सब कुशल पूर्वक है, आशा है ‘आप’ सब भी सकुशल होंगे। पूज्य मास्टर साहब जी तो शायद कल आवें। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

कल से दशा बदल गई है। दशा में शुद्धता आ गई है या समझ लीजिये उसे शुद्धता मान ली है। इधर भाई अब तो यह हाल हो गया है कि ऐसा लगता है कि हरी-भरी दशा में सूखा पड़ने लगा है। सब तरफ़ की सब रंगीन दशा जैसे खत्म हो गई है। अब यह न जाने क्या मेरी दशा को हो गया है। एकाएक सूखा कहाँ से आ गया है, समझ में नहीं आता है। अब न सुस्ती है, न तेज़ी ही है, न उमंग, न जोश, न राग विरक्ति, एक अजीब एक सी हालत है। कुछ यह जरूर है कि दशा हरे उपवन में से सूखे उपवन में बदल गई है। जिससे हर तरफ हर पौधा शुष्क है, परन्तु न जाने किसके सहारे जी रहा है।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ इधर मुझे कुछ ऐसा कभी-कभी दिखाई देता है कि ‘मालिक’ में इतनी आकर्षण शक्ति है कि कुछ ठिकाना नहीं। सारी दुनिया को अपनी ओर खींच रही है, परन्तु इतना गाफिलपना फैला हुआ है कि इसी कारण कम लोग इधर आते हैं, और जो आते हैं, वे जागने की कोशिश नहीं करते, जागना चाहते नहीं। नहीं तो कितना मज़ा आ जावे। परन्तु मैं इतना अवश्य कहूँगी कि इसी आकर्षण-शक्ति के कारण जिन्हें कुछ भी विश्वास हो गया है, वे चाहे कुछ करें या न करें, परन्तु उनकी आत्मा मिशन को छोड़ कदापि नहीं जा सकती। छोटे भाई-बहनों को प्यार। केसर 'आपकों प्रणाम कहती है तथा अम्मा शुभाशीर्वाद कहती हैं।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-235
लखीमपुर
27/7/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र 'आपका' आज मिला, पढ़कर प्रसन्नता हुई। पूज्य मास्टर साहब जी से मालूम हुआ कि ‘आपको’ कुछ जुकाम, खाँसी है, ‘आप’ दवा बराबर खाते रहिये। मेरी भी इन दिनों कुछ तबियत खराब है, खैर सब ठीक हो जायेगी। अपनी बदली हुई दशा लिखकर तो पत्र डाल चुकी हूँ, शायद कल मिल जायेगा। आपने Point ‘E’ (प्वाइंट ई) से मुझे Point ‘F’ (प्वाइंट एफ) पर खींच दिया, बहुत-बहुत धन्यवाद है। ‘आपकी’ कृपा वास्तव में अद्भुत है।

‘आपने’ जो यह पूछा है कि “लोग महात्माओं के यहाँ महीनों जाते हैं, परन्तु वहाँ के लिये यह शान्ति का सवाल क्यों नहीं उठता”। इसकी वजह केवल मुझे यही मालूम पड़ती है कि वास्तव में लोगों को शान्ति की तलाश ही नहीं होती है, वे महात्माओं के पास शान्ति के लिये नहीं वरन् उनके पास जो महात्मागीरी का पुरस्कार बढ़िया-बढ़िया Buildings, (मकानात), सरोवर हैं, आश्रम हैं, उन्हें देखने के लिये जाते हैं और कोई एकाध यदि शान्ति के लिये ही जावें तो भला आश्रम में उन लोगों (महात्माओं) के पास नसीब ही कहाँ है। मैं तो फिर यही कहती हूँ, जो वास्तव में शान्ति के प्रेमी हैं, वे ज़रा ‘आपके’ मकान के पास से केवल निकल भर कर तो देखें। ‘आपके’ पास बैठने का अहोभाग्य प्राप्त हो जाये, फिर तो वास्तव में धन्य हैं। मेरी तो समझ में नहीं आता कि ‘आपकों’ क्या लिखूं। ‘आप’ तो बस ‘जो’ हैं, सो हैं।

‘आपने’ जो काम करने का तरीका लिखा है, लाजवाब है। अब ऐसे ही पूर्णतयः कोशिश करूँगी। बिब्बो के लिये प्रार्थना कर रही हूँ। ईश्वर करे, जल्द अच्छी हो जावे। आजकल सुस्ती वगैरह सब ठीक है। ‘आपने’ जो जामुन का रस भेजा, सो मिल गया। कल मैंने और ताऊजी ने पी भी लिया।

अब देखिये, यदि ईश्वर की कृपा हुई तो जन्माष्टमी करीब आ रही है। सब लोग न सही तो कोई न कोई तो अवश्य पहुंचेगा। छोटे भाई-बहनों को प्यार। अम्मा आ गई, फूलो जिज्जी की तबियत ठीक है । इतिः

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-236
लखीमपुर
27/7/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

पूज्य मास्टर साहब जी के हाथों आपके उत्तर तथा ताऊजी के पत्र की नकल मिले। ताऊजी का पत्र पढ़कर अत्यन्त दु:ख हुआ, उसमें तो उनकी अश्रद्धा का नमूना ही भरा है। इधर मेरे ‘मालिक’ मुझे भी न जाने क्या हो गया है कि उनकी ओर से तबियत स्वत: हटी मालूम होती थी, परन्तु कारण न समझ में आया। खैर, अब पता लगा। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मेरा तो यह हाल है कि जिस दिन से अम्मा ने आपसे पुत्र की निस्बत लगाई, उसी दिन से मेरी निगाह उनके लिये न जाने कितनी ऊंची या क्या हो गई, यह मैं खुद नहीं जान पाई।

जिस दिन ‘श्री समर्थ जी महाराज जी’ का कृपा-पत्र आया था, उसे सुनाकर ताऊजी का Mood (मूड) बदल गया, तो मैंने तुरन्त केसर से कहा था कि देखो कोई बात इसमें बुरा मानने की नहीं थी, परन्तु ताऊजी को न जाने क्यों बुरा लग गया। ‘बुजुर्ग’ जो कहते हैं, हमारे सुधार के लिये हम पर मेहरबानी करने के लिये ही कहते हैं, इसमें बुरा मानना अपनी कमज़ोरी ज़ाहिर करना है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मैं तो यही कहती हूँ कि हमारा जर्रा-जर्रा ‘उसका’ ही है और रहेगा। रही सेवा की बात सो तो ‘आप’ स्वयं ही एक निगाह में राई को पर्वत तथा पर्वत को राई बनाने में समर्थ हैं। केवल हमें बड़ाई तथा ‘अपनी’ लीला में सहयोग का सुअवसर देकर कृतार्थ बना देते हैं। फिर इस गरीबनी का जर्रा-जर्रा ‘आपका’ ही है, चाहे जो सेवा ले लें। मिशन तो बनेगा और फिर बनेगा और हम सदैव सत्यता पर डटे रहेंगे। क्योंकि मैं तो ‘आपसे’ सत्यता तथा निश्छलता का ही पाठ पढ़ती हूँ।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ ताऊजी ने इतना सख्त लिख दिया कि उसके लिये क्या कहा जाय। ‘आपको’ कितनी तकलीफ हुई कि जो कही नहीं जा सकती है। परन्तु ‘आपने’ तथा ‘श्री लाला जी साहब’ ने सदैव ही उनके अपराधों को क्षमा ही किया है। ‘आपको’ जो उनके इस अपराध से तकलीफ पहुंची है, उसे उनसे यथाशक्ति समझा कर प्रेम तथा मुहब्बत से दूर करने को कहूँगी।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ अम्मा तथा हम सब लोग उनके इस अपराध के लिये ‘आप तथा श्री समर्थ जी’ के क़दमों में कोटिशः बार क्षमा माँग रहे हैं। उनके इस अपराध के लिये उनकी तथा हम सब की शारीरिक खुराक (भोजन) चाहे न मिले, परन्तु कृपा करके उनकी रूहानी खुराक पर रहम खाइये, बक्श दीजिये। अम्मा कहती हैं कि इनके अपराध से ‘आपको’ बहुत कष्ट पहुंचा, इसके लिये हम सब पुनः बारम्बार अपने ‘श्री लालाजी’ के दरबार में आंचल पसार कर क्षमा प्रार्थी है। अम्मा कहती है कि क्या हमको इनके लिये क्षमा न मिलेगी, अवश्य मिलेगी, केवल इस बल पर कि हमारा दरबार बड़ा रहमदिल एवं कृपालु है। अम्मा कहती है कि यह गुस्से में लिख देते हैं, चाहे वह बात फिर मन में न रहे। ‘आप’ फिर रहम करें, उनकी रूहानी खुराक उन्हें फिर मिलने लगे। नहीं तो इनका कहीं ठिकाना नहीं रहेगा, यह कहीं के न रहेंगे। हम सब मिलकर इन्हें समझायेंगे। क्षमा करने वालों में अग्रगण्य ‘श्री लाला जी साहब’ तथा ‘श्री बाबूजी’, आप इनके अपराध को अवश्य क्षमा करें। अम्मा कहती हैं, ‘श्री समर्थजी महाराज’ से भी मैं इनके अपराध के लिये क्षमा माँगती हूँ। ‘आपको’ तकलीफ पहुंचाने का कारण बनना ही और फिर फ़ैज़ से इतने दिनों वंचित रहना ही इनकी बड़ी सजा हो गई। अब क्षमा तथा फ़ैज़ मिले, यही प्रार्थना है और अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं तथा केसर प्रणाम कहती है। इतिः

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-237
लखीमपुर
30/7/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरे तथा ताऊजी के पत्र पहुंचे होंगे। यहाँ सब कुशल पूर्वक हैं, आशा है 'आप' भी अच्छी तरह से होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो यह दशा है कि अच्छाई-बुराई सब हजम हो गई। यानी अच्छी हालतें है तथा वह रुखी हालत भी शायद हजम हो गई। अब तो दशा न हरी लगती है, न रुखी ही, कुछ एक सार सी दशा है। अब तो शायद चटियल मैदान भी मेरे में हजम होता सा लगता है। अब तो यह हाल है कि मैं ही चटियल मैदान हो गई हूँ। या यह समझ लीजिए कि वह निगाह ही खत्म हो गई, जिससे मैदान वगैरह दीखता था।

अब तो घड़े की चिकनाहट ऐसी हो गई है कि न किसी के रोने का असर, न गाने का असर और यही नहीं, बल्कि न अब उस चिकनाहटपने का ही एहसास होता है, बल्कि ऐसा लगता है कि मानो जैसी हमेशा से थी, वैसी साफ हो गई हूँ। तबियत में बिल्कुल ठहरा पना आ गया है। न ठोसता की बू है, और न हल्केपन के अहसास की झलक और न बोझ। बस अब कोई दशा नहीं लगती, बस केवल ऐसा ही, इतना ही महसूस होता है कि मेरा ख्याल अब अक्समात् 'मालिक' के ख्याल में घुस गया है और अब उसी से परवरिश पाते-पाते, धीरे-धीरे लोप सा ही होता जाता है। यानी ‘मालिक’ का ख्याल या तवज्जो या कृपा-दृष्टि जो मेरी ओर थी, उसी में समा गया और अब उसी से परवरिश पा रहा है। और धीरे-धीरे प्रायः खत्म होता जा रहा है। और भाई, वहाँ यह है कि ‘उसके’ ख्याल में बेख्याली हालत होती चली जाती है। पूज्य श्री बाबूजी अब कुछ यह हो गया है कि 'मालिक' के ख्याल में परवरिश पाते रहने से अब वह इतना नाजुक बन गया है कि अब उसे किसी ख्याल की भस ही नहीं रह गयी है। यहाँ तक कि जो दशा अनुभव में आती है, उसे लिखने तक, मैं यदि याद रखने की कोशिश करती हूँ तो अच्छा नहीं लगता है, बोझ सा प्रतीत होता है। और जहाँ लिख चुकी, बस वह फिर बिल्कुल free (आजाद) हो जाता है। वह तो ऐसा स्वतंत्र है, या उसे ‘उसके’ ख्याल की परवरिश में इतनी मग्नता है कि वह और के बन्धन में आना तो दूर, सोचना या याद रखने तक का बन्धन नहीं सहन कर सकता है। बस इसीलिये जल्दी लिख लेती हूँ। नहीं तो तुरन्त याद करते-करते भूलने लगती हूँ। क्योंकि हाल तो यह हो गया है, कि ‘मालिक’ ने सब कुछ तो स्वतंत्र कर दिया है। खैर, यह सब ‘मालिक’ की कृपा और उसकी (यानी मेरे ख्याल की) तकदीर है।

‘आपने’ काम करने का जो तरीका लिखा है, उसे पूर्णातयः से करने की कोशिश करती हूँ, कोई कठिन भी नहीं लगता, बल्कि यदि हो सके तो आत्मिक उन्नति का भी बढ़िया नुस्खा और हो सकने में कोई खासियत भी नहीं। अगर कोई माने तो।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहनों को प्यार। बिब्बो के लिये भी बस लोग प्रार्थना कर रहे हैं। ‘ईश्वर’ की कृपा से बेचारी का बुखार उतर जाये। इतिः

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-238
शाहजहाँपुर
31/7/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत ता. 26.7.52 का लिखा हुआ मिला- यह Point ‘E’ की हालत है। खुश्क हालत तो बहुत अच्छी है, इसको बेकैफी की हालत कहते हैं यानी कोई कैफियत न होना। इस हालत का पूरी तौर पर कायम हो जाना ही कमाल है। तुमने जो आकर्षण शक्ति ‘मालिक’ में होने के बारे में लिखा है, मुमकिन है कि हो-फिर अनुभव करके लिखना। तुमने जब लिखा तो मैंने गौर किया तो मुझे भी मालूम हुई; कृष्ण जी के वक्त में यह बात जरूर थी। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

शुभ चिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-239
शाहजहाँपुर
31/7/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

30 जुलाई का पत्र मिला। तुम्हारा ठहराव जैसा कि मैं लिख चुका हूँ Point ‘F’ पर है, मगर मेरी तवज्जो अभी Point ‘F’ की सैर के लिए काम नहीं दे रही है, और वह मुकाम अच्छी तरह से अभी नहीं खुल रहा है। वजह कुछ नहीं मालूम होती है। तुमने लिखा है कि अब तो दशा न हरी लगती है न सूखी, इसके माने यह हैं कि आत्मा के निकट पहुँच चुकी हो। मगर अभी तुम्हारे ख़्याल में हरे और सूखे की तमीज बाकी है। हालत यह है कि उसकी भी तमीज़ न रहे। ईश्वर यह चीज़ भी देगा बशर्ते कि ईश्वर करे कि तुम इसी भाँति लगी रहो। तुमने लिखा है कि “कुछ अब तो शायद चटियल मैदान भी मेरे में हजम होता सा लगता है।“ यह ऐसी दशा है कि जब किसी की बस्ती या घर चटियल मैदान ही बन जाता है, तो रहते-रहते वह चीज और जगह ऐसी मालूम होती है कि गोया यह अपनी ही है और फिर उसका एहसास नहीं होता। चरियल मैदान का हजम करना जो तुमने लिखा है यह किस एहसास से तुमने लिखा है? लिखना। अगर इसके माने यह है कि “बिन्दु में सिन्धु” समा गया है, तब तो बहुत अच्छी हालत है।

तुमने लिखा है कि मेरा ख्याल अब अकस्मात् ‘मालिक’ के ख्याल में घुस गया है, यह भी बहुत अच्छा है। जब जिस्म गायब हो जाता है, यानी अपने जिस्म का भान नहीं रहता और ख्याल भी ‘मालिक’ में बहुत कुछ चिपट जाता है तो ऐसा महसूस होता है। इसकी शुरुआत है, अभी पूरी हालत नहीं आई। यह सब ईश्वर के हाथ में है, इसमें अपना वश नहीं वह जिसे दे देवे। मैंने जो तुम्हें लिखा था कि मेरा ख्याल समझ कर किसी काम को करो, यानी यह समझ लो कि मेरा ख़्याल ही काम कर रहा है। इसके बारे में तुमने यह लिखा है कि आत्मिक उन्नति के लिये यह बढ़िया नुस्खा है - यह बात मेरी समझ में नहीं आई है -लिखो ताकि समझ जाऊं। एक चीज आत्मिक-उन्नति के लिए बहुत हानिकारक है। वह है अहंकार और इल्मी-काब्लियत का जो अहंकार होता है, वह तो बहुत ही खराब होता है। लोगों को इसका पता नहीं चलता है, मगर अपना रंग ले हो आता है। दूसरी चीज़ जो और भी ज़्यादा हानिकारक है वह है हसद या Jealousy | स्वामी विवेकानन्द जी ने Transcendental person (श्रेष्ठ व्यक्ति) की तारीफ यह लिखी है “One who is jealous to none” (जिसको किसी से ईर्ष्या न हो) जो शख्स अपनी यह दो बातें दूर नहीं करता उसका कोई एतबार नहीं कि कब ऐसा गिरे कि उठ न पावे। हम अगर यह देखें कि किसी शख्स पर ईश्वर की बड़ी मेहरबानी है, तो हमें खुश होना चाहिए। यहाँ तो यह हाल है कि अगर यह नुक्स किसी में हो और मैं इसलिए कह दूं कि वह भी इसके दूर करने की कोशिश करे तो शायद उसे इस क़दर बुरा मालूम हो कि वह मेरी शक्ल देखना पसन्द न करे। अब मुझसे इतनी मेहनत नहीं होती कि मैं अगर किसी में समझ लूं कि यह नुक्स है तो मैं तो अपने आध्यात्मिक बल से दूर करूँ ऐसे कि उसको खबर न हो और मैं इसीलिए, अगर मुझे किसी का कोई नुक्स मालूम हो जाता है, उससे कहता नहीं हूँ बल्कि अपनी कमजोरी समझ लेता हूँ। तुम्हारे भाई-बहनों को आशीर्वाद ।

शुभ चिन्तक
रामचन्द्र

उसूल यह है कि सिखाने वाले से जितने तालीम पा रहे हैं और खासकर वह लोग जो Initiated (गुरु द्वारा दीक्षित अभ्यासी) हैं, उम्र में कितने ही बड़े हों, उसकी आध्यात्मिक औलाद हैं। मैंने इस सब बातों का ख़्याल न करते हुए उम्र व बुजुर्ग का हमेशा ख्याल रखा। कोई मुझसे कुछ कह ले, मैं बिल्कुल बुरा नहीं मानता। कोई गाली दे या मारे, इसका कुछ असर हमारे ऊपर होने का नहीं- अगर यकीन न हो तो इसको कोई आजमा कर देख ले और लगेगा भी, क्योंकि मैं इन्सान हूँ, तो भी मिनट-दो मिनट के लिए और फिर जैसा का तैसा।
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-240
लखीमपुर
5/8/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ आया- समाचार मालूम हुए। कल बड़े चाचा को भी सोमवार या कल बुध को Judge (जज) की Chair (कुर्सी) पर बैठने को लिखा था, इसलिए ताऊजी को भी बुलाया था। ताऊजी आज इलाहाबाद गये-शायद इतवार को आयेंगे। वास्तव में पूज्य ‘श्री बाबूजी’, ‘आपकी’ मेहरबानी की इन्तिहा नहीं-किसी चीज़ की इन्तिहा नहीं, बल्कि मैं तो पुकार-पुकार कर यही कहूँगी कि ‘आपकी’ मिसाल के लिये ‘आप’ ही नज़र आते हैं। ‘श्री समर्थ जी महराज’ जी ने संसार को वह 'रत्न' प्रदान किया है, जिसकी दमक मात्र से ही संसार जगमगा रहा है। जिसका सानी न कभी हुआ है, न कभी आगे होने की सम्भावना है- अरे, कोई आँखें खोलकर देखे भी तो। भाई, ‘श्री समर्थ जी’ के विषय में कह ही कौन सकता है कि जिसने आपको बनाया है। ‘उनकी’ तारीफ़ में तो बस इतना ही कहा जा सकता है कि -

“आज है फज़लो करम से तेरे, वह रौशन चिराग।
रोशनी पाते हैं जिससे, आशिकाने मारफत।“

पूज्य ‘श्री बाबूजी’, ‘आप’ ने पूछा है, कि “अनुभव कर के लिखना” इसलिये यह थोड़ा सा लिखने की हिम्मत की है। अब जहाँ तक मेरा अनुभव ‘मालिक’ में आकर्षण-शक्ति के बारे में है, सो भी लिख रही हूँ। सत्य बात लिखूंगी - मेरे मन में किसी बुजुर्ग के प्रति छोटाई का ख़्याल आ ही नहीं सकता है। ‘आपने’ पूछा अनुभव, इसलिए सत्य लिख रही हूँ। यदि लिखने में शब्द ठीक न बने हों, कुछ गलती हो, तो क्षमा करियेगा।

‘आपने’ श्री कृष्ण जी महाराज में आकर्षण शक्ति लिखी है, यह तो सत्य है ही, परन्तु मैं ‘मालिक’ की कृपा से यह कहती हूँ और सत्य है, इसमें सन्देह नहीं, कि ‘मालिक’ की आकर्षण शक्ति को उसकी (यानी श्री कृष्ण जी की) आकर्षण शक्ति से किसी हद तक अधिक ही देखती हूँ। ऊंचे पाये की देखती हूँ और शायद यही कारण है कि ‘आपकी’ विलक्षणता को कोई ठीक Judge (आँक) नहीं कर पाता है। ‘उनकी’ आकर्षण शक्ति से लोग अधिक प्रभावित हुए, क्योंकि आजकल की यानी ‘मालिक’ की आकर्षण शक्ति की हद नहीं, परन्तु शायद लताफ़त (सूक्ष्मता) लिए हुए है। या यह कहिये कि कोई अपने को नीचे करके फिर कोशिश करे। मैं तो फिर यही कहूंगी - दीखे तो सब, परन्तु दुनिया को अन्धापन ही अच्छा लगता है। भाई दीखे तो सब परन्तु हम अपनी निगाह से देखने के बजाय यदि निगाह को ‘उसका’ मान लें तो कठिनता सरल हो जावे। परन्तु होता सब ‘मालिक’ की कृपा से है। किसी की मजाल कहाँ, जो इतनी काबिलयत लाये। जो कुछ अब तक का थोड़ा सा अनुभव ‘मालिक’ की कृपा से है, सो लिख दिया, अब ‘आप’ जानें। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरा तो ‘मालिक’ में कुछ यह हाल हो गया है कि जैसे ‘मालिक’ और ‘उसकी’ परछाई' और वह भी इस तरह पर कि, अब तो भाई कुछ ऐसा हाल हो गया है कि न कुछ भीतर न्यारा है, न बाहर। सब एक ही मामला हो गया है। 'जो है, सो है, और भीतर बाहर सब कुछ यही है, ऐसा ही है और न जाने क्या है, मुझे कुछ नहीं मालूम। अब तो मुझे अपने से अलग शुद्धता की दशा भी महसूस नहीं होती है। या भाई यों कह लीजिये कि वह शुद्धता की दशा भी मुझमें घुस गई है, लय होती जा रही है। अब तो हर समय कैफियत की दशा रहती है यदि देखती हूँ तो, नहीं तो कुछ हर समय बेख्याली सी ही रहती है। अम्मा कहती हैं कि इनकी Self-Importance (अपने महत्व की भावना) नहीं जाती, क्या करें? जन्माष्टमी में हम लोगों का शाहजहाँपुर आना नामुमकिन सा हो गया है, क्योंकि ता. 20 को ताऊजी लौटने को कह गये हैं, परन्तु ठीक नहीं कब तक आयेंगे।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ इस अनुभव को हरी दद्दा ही, सब सत्संगी भाई-बहनों में इस तरह बतावें कि जिससे शायद उनका कुछ उपकार हो सके। अपना नाम हटाकर मैं भी अपने यहाँ के सत्संग में रखूंगी शायद नतीजा अच्छा हो। साँच को आँच क्या। खैर, ‘आप’ जैसा उचित समझें करें। छोटे भाई-बहनों को प्यार। बिब्बो की तबियत अब कैसी है। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं । इति -

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी।
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-241
लखीमपुर
10/8/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। ‘आपने’ अपनी तबियत के बारे में नहीं लिखा जुकाम और कुछ खाँसी थी, सो ठीक हुआ या नहीं। यदि हम लोग आते शाहजहाँपुर तो कल शाम को पहुँच जाते। परन्तु भाई हमारा चलना ही तो मुश्किल होता है, नहीं तो ‘मालिक’ की कृपा से पहुँच ही जावें, खैर, ‘उसकी’ मर्जी। ताऊजी अभी इलाहाबाद से नहीं आये हैं। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा हैं, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई, बेख्याली की भी दशा महसूस नहीं होती है। मैं तो अब कैफियत तक नहीं जानती हूँ कि क्या चीज़ है, कैसी होती हैं। मुझे तो बस ऐसा लगता है कि जैसे एक दुनिया का साधारण मनुष्य प्रतिदिन के क्रमानुसार जीवन व्यतीत करता है, बस वही हाल मेरा है। वैसे मैं अब अपना हाल खुद नहीं जानती हूँ, ‘मालिक’ जाने जैसे वह रख रहा होगा, वैसे हूँ। अन्तर इतना है कि मन में एक टीसन है, कुरेदन सी है, और वास्तव में यही मेरी शान्ति की दशा है, वरना कोई दशा, कोई कैफियत मुझमें हैं या नहीं, मुझे कुछ पता नहीं। मेरी नज़र भी न जाने क्या हुई। अब 'आप' ही संभालिये।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ अब तो ऐसा लगता है कि ‘मालिक’ की कृपा से हालत एहसास में आती है परन्तु वह पूरी तौर पर कही नहीं जा पाती। अब तो भाई, सब नजारे वगैरह ख़त्म हो गये। नज्जारा, नज्जारे में समा गया अब जो शेष है, वही मेरी हालत समझ लीजिये। न जाने क्यों इधर तबियत में कुछ ऊबापन, कुछ भारीपन सा रहता है, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से मन में इसके विपरीत कुछ तड़प, कुछ कुरेदन सी रहती है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मुझमें तो अब न कुछ ताकत रह गई है और न ख़्याल वगैरह ही कुछ रह गया है जिसके ज़रिये से सब काम होते थे, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से Working वगैरह तो न जाने कैसे पूर्ववत् ही चल रहे हैं। परन्तु यह सब कैसे है, क्या है, मुझे कुछ नहीं मालूम है। एक बात बहुत बुरी मुझमें हो गई है और काबू के बाहर कि भाई, ‘मालिक’ की इतनी कृपा मुझपर है, परन्तु मैं ऐसी हूँ कि मुझे तो कभी ‘उसकी’ याद तक नहीं आती है। भाई, अब ‘आप’ ही जानिये। मैं तो जैसी कुछ हूँ, ‘आपके’ सामने हूँ। जो कुछ यह हो रहा है, ‘आप’ ही जानिये, क्योंकि मैं तो अपने बस की ही नहीं रह गई। मुझे, मैं कुछ अच्छी नहीं मालूम पड़ती हूँ, क्योंकि अब न तो याद आती है और न प्रेम की एक छींट तक मुझमें हैं। इति-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी।
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-242
लखीमपुर
12/8/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र कल शाम को आठ बजे पूज्य मास्टर साहब ने सुनाया - सुनकर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। वास्तव में ‘आपके’ पत्र क्या हैं, उनके एक-एक शब्द स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य हैं। एक-एक लाइन सीखने योग्य है। ‘मालिक’ पर मर मिटूँ, यही इच्छा तथा कोशिश है और सब कुछ ‘मालिक’ के हाथ में है, ‘उसकी’ कृपा का ही आसरा है।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ अम्मा तथा हम सब ‘आपको’ बहुत-बहुत धन्यवाद देते हैं। क्षमा की तथा कृपा की हद है। पूज्य “समर्थ श्री लालाजी” तथा पूज्य “श्री स्वामी जी” को अम्मा तथा हम सब शत-शत बार धन्यवाद देते हैं, तथा अत्यन्त कृतज्ञ हैं। यह ‘आपकी’ ही शान है।

एक बात मैं यह लिखना भूल गई थी कि मुझे कुछ ऐसा अनुभव है कि अपना ख्याल यदि ‘आपका’ ख्याल मान लिया जावे तो अभ्यासी का सम्बन्ध बड़ी ऊंची दुनिया से जुड़ जाता है।

आज मेरी दशा कुछ बदली हुई सी है ‘आपकी’ मेहरबानी से बदली हुई क्या है, कुछ हल्की समझ लीजिये।

ताऊ जी अभी नहीं आये हैं। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं, तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इति-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी।
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-243
शाहजहाँपुर
13/8/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

खत तुम्हारे सब मिल गये। तुमने जो लिखा है कि बेख़्याली की सी दशा महसूस होती है। यह हालत बहुत अच्छी है, मगर अभी तुम में बेख्याली की तमीज बाकी है, अर्थात् ख़्याल और बेख़्याल दोनों का अन्दाज़ अभी तुममें बाकी है। यह चीज़ भी नहीं रहनी चाहिये तब Originality (वास्तविकता) की शुरूआत समझो। हिम्मत है तो यह चीज़ भी ईश्वर देगा। यह इतनी बारीक चीज है कि हर शख्स को इसका अन्दाजा भी नहीं हो सकता। इसका मज़ा चखने वाला ही समझ सकता है। ईश्वर करे यह हालत पैदा हो जावे। एक बात मेरे समझ में आ गई वह तुम्हारे खत से ताल्लुक नहीं रखती, मगर लिखे देता हूँ। तुम्हारी और श्यामपती जी की गुफ्तगू नारायण ने सुनाई थी कि श्यामपती जी को ताज्जुब हुआ कि जब तुमने उनके यहाँ का वातावरण बता दिया। एक बात का तजुर्बा करना, मेरा तजुर्बा नहीं है और मैं भी देखूंगा, यह चीज़ नई ख्याल में आई है और इसको याद भी रखना, मुमकिन है मैं भूल जाऊं। किसी चीज़ की मौजूदगी या असर वातावरण पर असर डालती है। जो मनुष्य या औरत सामने आवे तो उसके ख्याल जैसे भी हैं, वह भी उसके करीब के, यानी जिस्म से मिले हुए वातावरण पर असर रखेंगे। इसलिए कभी इसका तजुर्बा करना कि मनुष्य के चारों तरफ जो वातावरण होता है, वैसे ही उसके ख़्यालात भी होते होंगे। एक नया ख़्याल आ गया सो लिख दिया, तजुर्बा इसका नहीं किया।

तुमने लिखा है कि “जैसे दुनिया का एक साधारण मनुष्य प्रतिदिन के क्रमानुसार जीवन व्यतीत करता है,” बस यही हाल मेरा है। तुमने जहाँ तक इसको एहसास किया है, लिखा है, मगर इसको ठीक Express (अभिव्यक्त) नहीं कर सकी, इस बात में अभी बहुत मोटापन है। जो असली हालत इससे ताल्लुक रखती है, वह बहुत दूर है और वह एक ईश्वर का रहस्य, भेद है, जिसको लाला जी साहब ने बहुत बचाकर मेरे एक खत के जवाब में लिखा है और उसके खोलने को मुमानियत भी उस वक्त की थी। कबीरदास ने अपने लायक शिष्य धर्मदास जी से कहा है -

"धर्मदास तोहे लाख दुहाई। सार भेद बाहर नहि जाई ।।"

और यही दोहा मैंने ‘लाला जी’ को लिखा था, जबकि मेरी दशा ‘उनकी’ कृपा से बहुत कुछ परिपक्व हो चुकी थी। इसी में यह भी लिखा था कि सींक की ओट पहाड़ मालूम पड़ता है। इस दोहे का मतलब यह नहीं है कि आध्यात्मिक-विद्या खालिस रूप में किसी को प्रदान न की जाये, बल्कि यह मतलब है कि असल भेद को जुबान से न बताया जाये, जब तक कि अभ्यासी स्वयं उसको अनुभव न करने लगे, इसलिये जुबान से बताना मना है। अगर उस बात का किसी शख्स को यकीन हो जाये तो फिर मुमकिन है कि ईश्वर की Importance (महत्व) उसकी दृष्टि में जाती रहे और इस चीज़ को जल्दी कोई यकीन भी नहीं करेगा। मुझसे लालाजी साहब ने एक जगह नोट में कहा है कि “तुम किसी एकान्त और अच्छी जगह में जाकर इसका तजुर्बा करो कि अपने आपको इतना नीचा उतार दो कि जो सबसे ज्यादा पतित और रंक की हालत हो सकती है और फिर आहिस्ता आहिस्ता तरक्की करते हुए, चक्रों का हाल जानते हुए, अपनी हालत पर आ जाओ और जितना Time मैं इन्तहाई पतित की हालत में रहूँ और उससे आगे तालीमी हालत पर (यानी सिखाने वाले की हालत पर) न आ जाऊं तब तक तुम लोगों के सिखाने का ज़िम्मा खुद लिया है।“ वह मुझे यह तजुर्बा कराना चाहते हैं, मगर मैं नहीं कह सकता, इसके लिए मुझे वक्त मिले या न मिले और यह चीज़ ऐसी जगह हो सकेगी जो किसी पहाड़ या जंगल के कोने पर हो। मैंने बहुत से ईश्वर के भेद खोले हैं और मैं किताबों और चिट्टियों में बहुत कुछ लिख चुका हूँ। बहुत खास बात मुमकिन है, न कही हो। चूंकि अब हुक्म भी ऐसा है कि मैं सीने पर रखकर कुछ न ले जाऊं। लिखने वाला न मिलने की कमी भी मुमकिन है बहुत सी बातें न खुलवा सकूँ और लिखने वाला अगर हो तो कैसा हो कि छाया की तरह मेरे साथ लगा रहे। जिस वक्त जो ख़्याल मुझको पैदा हो लिख ले। जब तुमने अपनी टीसन लिखी तो मुझे अपनी टीसन की याद आ गई और इसी कुरेदन और अशान्ति में मुझे वह मज़ा मिला है कि शान्ति के तलाश करने वाले इस चीज़ को ठुकरा दें। अब ज़रूर इन सब बातों से स्वतंत्र हूँ। न अब कुरेदन है, न टीसन और मेरी इस चीज़ की नकल नहीं करना चाहिये, इसलिये कि यह चीज़ खुद ब खुद पैदा होती है। श्यामपती जी से पूछना कि कबीरदास के उस दोहे का क्या मतलब है, वह अच्छा बतायेंगे, इसलिये कि वह काबिल आदमी हैं और फिर मेरा मतलब भी उन्हें बता देना। एक चीज़ अच्छी सिद्ध हो जावेगी, वह मुझे लिखना। केसर का भी खत मिल गया उन्हें बेचैनी मुबारक हो।

यह चीज़ बड़ी मुश्किल से मिलती है और फकीरों की संगत से अगर जिज्ञासु में तलाश है तो यही चीज़ पैदा होनी चाहिये। इसी को सूफियों ने दर्द दिल कहा है। अब इसके भी बहुत से Stages (स्तर) हैं। जितने अच्छे Stage का दर्द दिल है उतने अच्छे Stage पर अभ्यासी पहुँचेगा। मैं तो बिटिया सच कहता हूँ कि ठुस्म ठाँस करता चला जाता हूँ। इसलिए कुछ न कुछ काम बन ही जावेगा। बाकी असल शौक मुश्किल से किसी में होगा। लाला जी की महफिल में लोग अच्छे-अच्छे थे मगर इस चीज की फिर भी बहुत कमी थी और सच पूछो तो ‘आप’ इतने उदारचित्त थे कि रास्ते-गली जवाहर बिखेरते चले जाते थे। फिर भी हम लोगों की आँखें न खुलीं और उनको वाकई तौर पर अब तक कोई पहिचान न सका। मुझे भी होश न आया कि ‘आप’ से बहुत सी गुत्थियाँ सुलझा लेता। यह ‘आपकी’ मेहरबानी थी कि मुझे इस क़दर दे गये। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-244
लखीमपुर
22/8/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है ‘आप’ आराम से पहुँच गये होंगे। ‘आपका’ पत्र जो ‘आपके’ आने से शायद दो-एक दिन पहले आया था, मिल गया था। ‘आपने’ जो यह पूछा था कि इसका तजुर्बा करना कि “मनुष्य के चारों तरफ जो वातावरण होता है, वैसे ही उसके ख़्यालात होते होंगे।“ ‘आपका’ यह ख़्याल बिल्कुल ठीक है। ‘मालिक’ की कृपा से तजुर्बा भी कर लिया। दोहे का मतलब जो श्यामपति जी से पूछने को लिखा है, वह दो-एक दिन में जब जाऊंगी तब पूछूंगी। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो दशा है, सो लिख रही हूँ।

यह तो शायद मैंने ‘आपसे’ कहा था कि ‘मालिक’ ने मुझे ख़्याल और बेख्याल दोनों की तमीज से बरी कर दिया है। अब तो मुझे कुछ ऐसा लगता है कि सब खुलता चला जा रहा है, यानी जिस दशा में भी हूँ, वह खुलती चली जा रही है, पूज्य ‘श्री बाबूजी’ यहाँ ‘आपने’ एक दिन परम पूज्य पापा जी के प्रेम की तथा कुछ अपनी डायरी की बातें बताई थीं, तब से मुझे एक दो दिन न जाने क्या हो गया है कि ऐसा लगता था कि दिल हाय-हाय करके फटा जा रहा है, परन्तु मेरा तो यह हाल है कि मुझसे न तो कुछ कहा जाता है, न बिल्कुल बोलने की तबियत चाहती है। बस हृदय को दाबे औंधे पड़े रहने को जी चाहता था, परन्तु फिर भी मुझे वह हालत पसन्द है, यद्यपि कभी-कभी गवारा नही हो पाती। परन्तु आज से वह दशा कम होती जा रही है – ‘मालिक’ की जैसी मज़ी। अब तो कुछ यह हाल समझ लीजिये कि -

“सुरत सुहागिन है पनिहारिन, ठाढ़ी भरे बिन डोर रे”

छोटे भाई-बहनों को प्यार। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। तथा केसर, बिट्टो ‘आपको’ प्रणाम कहती हैं। इति -

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री- कस्तूरी।
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-245
लखीमपुर
26/8/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। पूज्य मास्टर साहब जी की तबियत आजकल कुछ ठीक नहीं है, उन्हें कमज़ोरी है तथा कुछ खाँसी और जुकाम है, परन्तु चिन्ता की कोई बात नहीं है। धीरे-धीरे ठीक हो रहे हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई यह हाल है कि कभी-कभी इतनी ठंड-दिली हालत हो जाती है कि कुछ कहना नहीं। अक्सर इतनी ठंडी हालत हो जाती है कि भीतर सब कुछ चित्रलिखित सा जम्बक सा चिपका हुआ सा जान पड़ता है। ऐसा लगता है कि भीतर सब बिल्कुल ठण्डी दशा हो गई है। कभी-कभी सब तरफ यह ठंडक वाली हालत ही नज़र आती है। इसलिये मुझे अब इसके आगे ध्यान, व्यान कुछ पसन्द नहीं आता है - सन्मुख कुछ नहीं ठहरता है। और पूज्य ‘श्री बाबूजी’ अब कुछ यह हाल हो गया है कि मामूलन भी ज़रा सा भी तेज़ बोलना या तेजी लाना अब कदापि अच्छा नहीं लगता, क्योंकि शायद उस ठंडी हालत में यह सब कुछ गवारा नहीं होता - कुछ disturb (बाधा सी लगती है) होता है। या भाई शायद मेरे दिमाग या मन को इतनी सी भी गर्मी या गड़बड़ी बर्दाश्त करने का माद्दा नहीं रहा हो। क्रोध तो दूर रहा, जरा सा मामूलन भी तेजी चाहे तेज़ बोलना ही इस खामोश हालत में कुछ गड़बड़ी सी मचा देता है। या भाई मन को अब यह अच्छा नहीं लगता है, और लोग चाहे तेज़ बोलें या कुछ करें, परन्तु तब ऐसा नहीं लगता है। कुछ ऐसा लगता है कि ‘मालिक’ के Mind (माइण्ड) में रहती हूँ।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ न जाने क्यों आज मन मुर्झाया हुआ सा, उदास सा है – उत्साह नहीं आ पाता है। न जाने क्या कमजोरी आ गई है। अब कृपया ‘आप’ ही सुधारें। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी।
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-246
शाहजहाँपुर
1/9/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे 22-26 अगस्त के खत मिल गये। ईश्वर की कृपा से अच्छी हालत चल रही है। दूसरों का तेज़ बोलना जो नागवार होता है, उसके मानी यह हैं कि एकाग्रता बढ़ी हुई है। ता. 31 अगस्त को करीब साढ़े बारह बजे रात को मैं तुमको Sitting ‘F’ के मुकाम पर दे रहा था कि एकाएक मुझको यह मालूम हुआ कि ‘F’ का कोई पर्दा टूटा और उसमें से आग की लपट सी बरामद हुई वह कुछ सुर्खी, कुछ चाँद की तरह से रोशनी लिए हुए थी मेरे समझ में नहीं आया कि क्या बात थी। इससे पहले मैं ‘F’ के Inner most Corner (भीतरी भाग पर) पर तवज्जो देता था और उसको उभारता था मगर उभरता नहीं था मगर असर ज़रूर लेता था और उसमें काफी ताकत पहुँचती थी। मेरा एहसास यह है कि अब वह काफी और पूरी हालत में है। हालाँकि Inner most corner (भीतरी भाग पर) पर मुझे अपनी Will (इच्छा-शक्ति) की तेजी अब भी काफी तेज़ रखी हुई मालूम पड़ती है - मुमकिन है कुछ और उभरे। मुझमें एक नुक्स यह है कि जल्दबाज़ी की आदत है, इस वजह से अन्दाज़ नहीं रहता। तुम जितनी जल्द लिख सको यकुम (एक) सितम्बर की सुबह से या अब जो कुछ एहसास हो लिखो। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-247
लखीमपुर
2/9/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

पत्र डाल चुकी हूँ- आशा है पहुँचा होगा। मेरी तबियत इधर 7-8 दिन से अधिक खराब चल रही है, इसलिए पत्र डालने में विलम्ब हो जाता है, कोई चिन्ता की बात नहीं है - जहाँ तक मेरा ख़्याल है, ‘मालिक’ की कृपा से यह भी किसी भलाई के ही लिये होगी, धीरे-धीरे ठीक हो जाऊंगी। इधर ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो ‘मालिक’ ने इस ज्ञान से भी बिल्कुल Free (स्वतंत्र) कर दिया है कि आज क्या, मैंने कभी भी साधना की हो - न अभी कुछ साधना कर रही हूँ। यही नहीं बल्कि न यह पता है कि साधना से क्या लाभ हुआ है, या हो रहा है, या होगा। भाई क्या बताऊं, यह हाल हो गया है कि न तो यह पता है कि साधना से क्या मिला और तिस पर से न चैन ही है। वैसे तो चाहे इधर ख़्याल न जावे, परन्तु सत्संग में जब देखती हूँ तो ऐसा ही लगता है कि क्या कहूँ, मुझे कुछ मालूम नहीं, न मेरे पास कुछ है। हाँ चैन नहीं है, यह किससे कहूँ, खैर मुझे, ‘मालिक’ से मतलब है, जब यही चीज़ ‘उसकी’ है, ‘वही’ जाने। कुछ ऐसा हाल है कि कहाँ तो हरदम ‘मालिक’ एकता रहती थी और कहाँ अब उसका ख़्याल तक नहीं आता। मुझे तो ऐसा लगता है, ‘मालिक’ की कृपा से मेरी हालत सत, रज, तम से भी दूर न जाने कहाँ चली गई है, कुछ पता नहीं और परवाह नहीं। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ न जाने यह क्या हो गया है कि Initiation का आभास तक नहीं पा पाती हूँ, परन्तु “ठाढ़ि भरे बिन डोर रे” वाला हाल है। किसी को पूजा कराती हूँ तो मैं नहीं जानती हूँ कि मैं Sitting (सिटिंग) दे पाती हूँ या नहीं, जाती है या नहीं और यही हाल Working (कार्य) का है। मैं Duty (ड्यूटी) बजाती हूँ, परन्तु इससे बिल्कुल अनभिज्ञ रहती हूँ कि ठीक होता है या कुछ कमी है, परन्तु यह हर बात में ज़रूर है कि ‘मालिक’ ने जो कुछ दिया है, वह ‘उसी’ की मर्ज़ी माफिक होता ज़रूर है। वैसे भाई ‘आप’ सर्वज्ञ हैं।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ पहले मुझे हमेशा दिखाई देता था कि मैं बस तेज़ी से चलती ही चली जा रही हूँ, परन्तु अब यद्यपि दशा तो बदलती है, परन्तु न जाने क्यों वैसा नहीं मालूम पड़ता है। कृपया ‘आप’ ही बताइये, कुछ कमी, कुछ धीमापन तो मुझमें नहीं आ रहा है। कुछ ऐसा लगता है कि यद्यपि मेरे पास अब कोई हालत नहीं रही, परन्तु यदि सत्संग में कभी किसी दशा के बारे में बात छिड़ जाती है और फिर यदि में ख़ुद कहने लगती हूँ तो ऐसा लगता है कि जैसे-जैसे कहती हूँ वैसे ही वैसे वह दशा ‘मालिक’ की कृपा से वातावरण में कुछ ऐसी फैल जाती है कि उस समय करीब-करीब हर सत्संगी को शायद उस दशा का आभास या आनन्द रहता है, परन्तु मेरी दशा उस समय बिल्कुल शायद जैसी थी वैसी रहती है, सिवाय कुछ थोड़े से आनन्द या भाई जाने क्या। कमर के बीच में रीढ़ के नीचे भाग में कुछ फड़कन सी रहती है, कभी-कभी तो बड़ी रेंगन सी मालूम पड़ती है, जैसे कोई कीड़े रेंग रहे हों। छोटे भाई-बहनों को प्यार। अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। इति -

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी।
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-248
लखीमपुर
3/9/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ आज मिला- पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘आपने’ जो 31 अगस्त की रात में पर्दा टूट जाने और उसमें से आग की लपट, कुछ सुर्खी, कुछ चाँद की तरह से रोशनी लिए हुए लिखा है, सो ‘मालिक’ की कृपा से मुझे इतना याद है कि, कै बजे तो नहीं याद है, उस रात को स्वप्न में मुझे ज़रूर कुछ इसी प्रकार की रोशनी दिखाई पड़ी थी। परन्तु मुझे और कुछ नहीं मालूम, कृपया ‘आप’ ही लिखियेगा तो मुझे भी पता लग जायेगा। अब कल से फिर कुछ हालत बदली हुई लगती है। अभी क्या बदली है, यह मैं ठीक एहसास नहीं कर पाई हूँ। कल से तबियत भी काफी ठीक लगती है, ताकत भी अधिक लगती है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ कुछ यह है कि ‘मालिक’ का ख़्याल आते ही बीमारी तथा सारी कमज़ोरी जाती रहती है। एक बात और है कि उस आग की लपट से ‘आप’ को कुछ तकलीफ तो नहीं पहुँची थी।

हाँ, मैं यह देखती हूँ कि "बूंद में सिन्धु समाय गयो" वाली दशा बिल्कुल स्पष्ट रूप में अब दिखलाई पड़ती है, या एहसास में आ रही है। ऐसा मालूम पड़ता है कि खुद ब खुद एक निर्झर श्रोत सा जारी हो गया है वह निर्झर श्रोत यहाँ से परे, अति परे न जाने कहाँ अविचल तथा अविरल गति से जारी है जिसमें किसी का कोई अस्तित्व नहीं है, सब समान है। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इति –

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी।
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-249
शाहजहाँपुर
6/9/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे दो खत मिले। तुम्हारे एहसास से मैं बहुत खुश हुआ - ईश्वर मुबारक करे। तुम्हारा तन्दुरुस्त रहना लाज़िमी है, इसलिए कि मुझे तुमसे काम लेना है। अगर तुम 15 मिनट रोज़ अपनी तन्दुरूस्ती के लिए दे दो तो तुम तन्दुरूस्त हो जाओ। तरीके तुम्हें मैंने बतला दिये हैं। अगर वह न कर सको तो इतना ही करो कि पन्द्रह मिनट तक यह ख़्याल करो कि ब्रह्माण्ड से तन्दुरुस्ती बढ़ाने वाली ताकत आ रही है, जिससे सब मर्ज दूर हो रहे हैं और तन्दुरूस्ती बढ़ रही है। मुझे उम्मीद है कि इतना कहना तुम मेरा मान लोगी। केसर में फ़नाइयत-लय अवस्था बढ़ रही है और यह बहुत अच्छी बात है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-250
लखीमपुर
9/6/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ आया था - उत्तर भी दे दिया था - आशा है मिला होगा। उत्सव में, छुट्टियों में हम सब ‘आपको’ बहुत-बहुत बुला रहे हैं, कृपया यदि स्वास्थ्य कुछ ठीक हो तो पधारने का कष्ट करियेगा। क्या करें, बिना बुलाये रहा नहीं जाता है। मेरी तबियत अब पहले से ठीक है, फिक्र की बिल्कुल कोई बात नहीं है। अम्मा को करीब 6-7 दिन से जुकाम, खाँसी तथा 100° तक बुखार भी हो जाता था, परन्तु परसों से बुखार 101° तक हो जाता है, खैर ईश्वर की कृपा से धीरे-धीरे ठीक हो जायेंगी। आज कल ताऊजी का भी Nervous system (नर्वस सिस्टम) खराब है। अब देखिये मैं कब तक वहाँ आ सकूं। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई मुझे तो ऐसा लगता है कि जैसा मैं लिख चुकी हूँ वह निर्झर श्रोत ऐसा है कि जहाँ सब समान हैं। मुझे तो ऐसा मालूम पड़ता है कि यह वह जगह है जहाँ इज्जत और अदब इन सबका भी अन्त हो जाता है। यहाँ तो सब जैसे के तैसे हैं। हाँ, यह भी ज़रूर है कि इज्ज़त व अदब वगैरह में ‘मालिक’ की कृपा से कमी नहीं हो सकती है, मगर ख़्याल कुछ नहीं रहता। इधर 4-5 दिन तो रातभर स्वप्न में बराबर ‘मालिक’ के ही साथ रहती थी। कुछ ऐसा लगता है कि ‘मालिक’ के बिल्कुल पास आ गई हूँ या ‘उससे’ अधिक चिपट गई हूँ। शायद इसी कारण भीतर ही भीतर कुछ खुशी सी छाई हुई लगती है। हालत बिल्कुल शुद्ध सी चल रही है। कभी-कभी दिमाग़ बिल्कुल खुला सा लगता है, परन्तु न जाने क्यों बीच खोपड़ी में अक्सर कुछ ठक-ठक सी होती रहती है, शायद कोई चीज़ लड़ती हो, मुझे ठीक नहीं मालूम। शायद उपरोक्त खुशी के ही कारण जब निगाह जाती है तो कुल शरीर भीतर से छका हुआ सा मालूम पड़ता है। आजकल Intelligence (समझ) भी जैसे बिल्कुल शुद्ध सी खुली हुई सी लगती है। मन का तथा Intelligence (समझ) का कुछ हल्का आवरण सा हट गया या साफ हो गया लगता है। भाई ऐसी दशा है कि :- “भाई म्हाने (मुझे) गोविन्द लीन्हो मोल” मेरा तो भाई अब यह हाल है कि न कोई भक्त न कोई अभक्त लगता है। न कोई सुस्त न कोई फुर्तीला महसूस होता है। यहाँ तक कि न कोई चोर न डाकू तक मालूम पड़ता है। मुझे तो सब जैसे के तैसे यानी जैसे आये थे वैसे ही दिखलाई पड़ते हैं। जहाँ से आये थे, वहीं मालूम पड़ते हैं, बिल्कुल सहज सी दशा है। किसी में कुछ खासियत नहीं है। ऐसा मालूम पड़ता है कि कुदरत में बिल्कुल सहज पना सा आ गया है, इसमें कोई खासियत ही नहीं रही। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ कभी कुछ ऐसा दिखाई या महसूस होता है कि एक Force (शक्ति) है, जो कुदरत से सब करा रही है। भाई मुझे तो ऐसा दिखाई पड़ता है कि ‘मालिक’ का Command (आधिपत्य) ही सब कुछ सब ओर रवाँ है। या कुछ ऐसा है कि एक ही जगह से रूह रवाँ है। छोटे भाई-बहनों को प्यार। ‘आप’ छुट्टियों में शायद आयेंगे ज़रूर। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं । इति-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-251
लखीमपुर
4/10/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है ‘आप’ आराम से पहुँच गये होंगे। ‘आपकी’ साँस की तकलीफ आशा है ‘ईश्वर’ की कृपा से कुछ ठीक होगी। आज ‘आपको’ पत्र डाल रही थी कि दद्दा आ गये। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक -दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई यह हाल है कि ऐसी मन्द-मन्द बेहोशी सी रहती है कि जैसे फूल की महक धीमी-धीमी उड़ती है। जब कोई बेहोशी कहता है, तो इसकी बड़ी धीमी-धीमी कैफियत दिखलाई पड़ती है और तो बेहोशी से भी बेहोश हो चुकी हूँ। अब तो कुछ यह हाल है कि पहले जैसे मुझे मालूम पड़ता था कि फैज़ आ रहा है और ‘मालिक’ से मेरा हर समय सम्बन्ध सा जुड़ा रहता था, परन्तु अब यह सब कुछ नहीं महसूस होता है, परन्तु अब कुछ यह है कि भीतर ही भीतर न जाने कैसे स्वयं ही कुछ चीज़ पैदा हो रही है या भीतर न जाने कैसे आती रहती है। “पूज्य श्री बाबूजी” अब कुछ यह हाल है कि जब मुझे ‘मालिक’ की याद आती है, तो न जाने क्या होता है कि अक्सर कलेजा पकड़ कर हाय करके रह जाती हूँ। अब अक्सर यही हाल रहता है। कुछ यह हो गया है कि जब ‘आप’ आते हैं तो ‘आपके’ आने की लगन सी रहती है, परन्तु जब ‘आप’ चले जाते हैं तब भी मेरा कलेजा हर समय खींचता रहता है और तबियत और भी दीन हो जाती है। कभी-कभी उस हाय वाली चीज़ को शान्ति से फुसलाने की कोशिश करती हूँ तो आनन्द नहीं आता, बल्कि बेचैनी बढ़ती है। अब तो यह हाल है कि जब शान्ति काबू की हुई तो तबियत शान्ति को लाँघ कर हाय में घुस गई है और ऐसी कि फिरकर शान्ति को देखना भी नहीं चाहती है।

मेरे पूज्य ‘श्री बाबू जी’ कुछ ऐसा है कि भीतर जहाँ भी देखती हूँ, सब कुछ बिल्कुल स्थिर सा लगता है। हर चीज़ अपनी जगह पर स्थिर पाती हूँ, बस तबियत ही एक ऐसी है कि जिसे काबू से रात दिन हर समय बाहर पाती हूँ और यही चीज़ मेरे आनन्द की है।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-252
लखीमपुर
9/10/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। ताऊजी आज कानपुर गये हैं, जीजा जी कारखाने के मामले में सलाह लेने को बुला गये थे । इतवार को लौट आयेंगे। ‘मालिक’ की कृपा से कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब मेरा तो कुछ यह हाल है कि अपने जी की दशा, चाहे वह रोता है, चाहे हाय -हाय करता है, किसी से एक शब्द भी कहने की तबियत नहीं चाहती और कहूँ भी तो क्या, बस जो कुछ है, जी की जी में ही घुलने की तबियत रहती है। मैं तो जैसी कुछ भी हूँ, अपने ‘मालिक’ के सामने रहती हूँ। बीच रीढ़ के बाई ओर बिल्कुल लगे-लगे हर समय अधिक गुदगुदी तथा फड़कन रहती है। कभी मालूम पड़ता है कि कुछ रेंग रहा है। भाई मेरा तो यह हाल है कि शरीर का तो जर्रा-जर्रा में जैसे भूल चुकी हूँ। यह शरीर क्या है, कैसा है, मैं बिल्कुल भूल चुकी हूँ। एक क्षण को भी महसूस नहीं हो पाता। ऐसा लगता है कि अब तो अन्तर ही मेरा शरीर है, वहीं से मेरी उन्नति होती है, और मेरा ख़्याल भी अन्तर में ही घुस कर खोया सा रहता है, और यही दशा हर समय सामने रहती है, और साथ ही साथ कुछ यह भी है कि ‘मालिक’ भी ध्यान में कतई नहीं आ पाता, लेकिन ‘उसके’ ध्यान के ख्याल से भी एक क्षण को मैं अलग नहीं पाती हूँ। पीठ में रीढ़ के बिल्कुल लगे में नीचे से सिर के पिछले भाग तक फड़कन तथा रेंगन या गुदगुदी तो हर समय रहती ही है, अब तो अक्सर ऐसा लगता है कि पूरी नस या नाड़ी सीधी खड़ी सी या तनी हुई सी लगती है।

आज पूज्य मास्टर साहब जी से ‘आपका’ ज्ञान वाला मजमून सुना। ‘आपने’ गलती पूछी है, परन्तु मैं तो यह कहती हूँ कि एक-एक लफ्ज ऐसा चुना हुआ है और Matter (विषय-वस्तु) तो इतना सिलसिलेवार है और कहीं रत्ती भर भी ग़लती की गुंजाइश भी नहीं है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ लोगों को, हंसी उड़ाना तो किनारे है, यह चीज़ ऐसी है जो ज्ञानियों की आँखों से पर्दा हटायेगी और उन्हें निर्मल सही मार्ग दिखलावेगी। मास्टर साहब जी ने भी कहा है और मेरी भी यही प्रार्थना है, उसका अलग Pamphlet (पैम्फ्लेट) बना दिया जावे। मैंने एक-एक लफ्ज़ गौर से सुनकर ही ‘आपको’ कुछ लिखा है। जब मास्टर साहब दीवाली में वहाँ पहुँचेंगे, तब ‘आप’ मजमून पूरा करवायेगें और तब मैं इसे हिन्दी में कर लूंगी।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ आजकल तो मैं ऐसे मैदान में हूँ, जो पहले से कहीं Simple है और ऐसा लगता है कि सपाट दशा चल रही है। दशा को शुद्ध तो नहीं कह सकती, क्योंकि शुद्धता तो मुझे कहीं भारी चीज़ दिखलाई पड़ती है। हाँ, सादगी कह सकती हूँ। मुझे तो ऐसा लगता है कि ‘बूंद में सिन्धु सोखता चला जाता है।’ अब तो यह हाल है कि ‘मालिक’ की याद आते ही कलेजा पकड़कर बैठी रहती हूँ। अब तो यह दशा है कि :-

"काह करूँ, कछु बस नहि मेरो, पंख नहीं उड़ जाऊं।
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर,

बार-बार बलि जाऊं।।" बस बार-बार ‘मालिक’ पर बलि-बलि जाती हूँ और मेरे बस का कुछ नहीं रह गया है। मेरी नज़र, मेरा हृदय, तो बावला हो गया है। जब नशा जरा उतरता है, तो बावलापन ही नज़र आता है। नशे में क्या हाल रहता है, यह नशा जाने, मुझे जो मालूम होता है सो लिख दिया। ‘मालिक’ किसी को कुछ देता हो, मुझे तो एक आह, एक दर्द और बावलापन ही दिया है। यही ‘उसकी’ Gift (उपहार) है और इस Gift (उपहार) के आधार पर मेरा जीवन ही चल रहा है, और मुझे कुछ महसूस नहीं होता। खैर, ‘मालिक’ की कृपा से जो हाल है, सो लिख दिया। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इति-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-253
लखीमपुर
16/10/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ पूज्य मास्टर साहब जी के लिए आया था। उसमें ‘आपकी’ कमज़ोरी का हाल पढ़कर कुछ चिन्ता बढ़ गई। खैर, ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ। ‘आपकी’ तन्दुरूस्ती ठीक रहे। इतनी कमजोरी देखकर कभी-कभी बड़ी परेशानी सी हो जाती है, परन्तु इसमें क्या हो, यह कुछ समझ में नहीं आता है। अक्सर इसीलिये ‘आपको’ किसी भी छुट्टी में बुलाने में संकोच हो जाता है। ताऊजी को ज़ुकाम हो गया है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ यह हाल है कि भीतर तथा बाहर जो एक सी हालत रहती थी, तो अब यह है कि एक सी दशा में यदि कोई चीज मान लीजिये कि यदि गुस्सा ही अधिक देर रहे तो बरदाश्त नहीं हो सकती, जब तक कि उसी दशा पर हालत नहीं आ जाती, इसीलिए ‘मालिक’ की कृपा से कुछ आ भी जावे तो वह रह नहीं सकती, उसके लिए कहीं जगह ही नहीं रह गई, परन्तु भाई, तबियत तो बेकाबू इससे भी जाने कितनी दूर न जाने कहाँ रहती है। वह तो मैदान ही और है, जहाँ पर कि इस दशा की भी खबर नहीं है, और खबर कहाँ से हो जब वहाँ इसकी गुजर ही नहीं है। मेरा यह तो हाल है कि मैं चाहे अच्छी खासी बैठी हूँ, चाहे तमाम औरतों के बीच में बैठी हूँ, तो यदि सिनेमा के गाने में भी कोई दीवाना, फकीर या ख़्याल ऐसे लफ्ज आ जाते हैं, तो मेरा मन बरबस यही चाहता है कि भीतर भाग कर कलेजा पकड़कर तड़फड़ाने लगूं, परन्तु आँसू मेरे पास भी कभी नहीं फटकते। मेरा मन वहाँ से बिल्कुल उचाट हो जाता है। मेरा मन यही चाहता है कि मैं उसी दुनिया में उड़ जाऊं जहाँ पर यह मन हैरान व परेशान फिरता है। मुझे अब कुछ नहीं सुहाता है। कोई दशा तक मुझे अच्छी नहीं लगती है। भाई, मेरा तो यह हाल है कि दुनिया मुझे दिखलाई नहीं पड़ती, महसूस नहीं होती। यदि मेरे लिए दुनिया का भी कहीं यही हाल हो जाता। खैर, यह ‘उसको’ मर्जी। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ कुछ यह हाल है कि शरीर भी मुझे अपना या किसी का महसूस तक नहीं होता। मेरा जन्म तो दूसरी अनोखी दुनिया में ही हो चुका है, जहाँ पर कि अपने ‘मालिक’ की कृपा की लाइट (प्रकाश) से मैं पल रही हूँ और आगे जाने का मार्ग पाती हूँ। मुझे तो ऐसा लगता है कि मैं तो अपने ‘मालिक’ के Mind (ध्यान) में ही रहती हूँ। जहाँ पर नितान्त ‘उसकी’ ही कृपा, ‘उसका’ ही प्रकाश है। अब कुछ यह हो गया है, चाहे बिल्कुल अन्धेरी रात हो, चाहे कुछ हो, मुझे डर नहीं लगता, क्यों कि मैं तो अब एक क्षण को भी अकेली नहीं हूँ, एक वही दीखता है, फिर डर कैसे लगे।

परन्तु कल से न जाने क्या हो गया है कि नशे की औंध में ही अधिक रहती हूँ, नशे की ही पिनक अधिक रहती है। उपरोक्त दशा कम महसूस होती है। परन्तु जब चाहती हूँ, उभर आती है। कुछ यह हाल हो गया है, कि मुझे न यह ध्यान रहता है कि मैं नहायी हूँ या नहीं, खाना खाया है या नहीं, मैं तो न जाने किस धुन में, न जाने कौन से नशे में रहती हूँ। यहाँ तक ऊंघ रहती है कि यदि पाखाने उसी समय हो आऊं तो कुछ नहीं, परन्तु यदि देर हो जावे तो मुझे फिर सुधि आती है, फिर भूल जाती हूँ। जब सुधि आती है तो, ऐसा लगता है कि शायद जैसे स्वप्न में पाखाने की सुधि आवे। कृपया माताजी का लखनऊ का पता लिख दीजियेगा। अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। पूज्य ‘श्री बाबू जी’ मेरा जी इसीलिए तड़फड़ाता है कि मैं सच में ‘मालिक’ से अपने जी भर के प्रेम नहीं कर पाती हूँ, क्या करूँ? यदि मैं हर समय चिल्लाती फिरूँ, तो भी सब नहीं होगा, क्या करूँ? इति-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-254
लखीमपुर
1/11/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है आज ‘आप’ शाहजहाँपुर पहुँच गये होंगे। हम सब की तकदीर ज़रूर ही बहुत अच्छी है कि ‘आप’ इतनी मेहरबानी करते हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरा तो अब यह हाल है कि मुझे तो ‘उसकी’ याद से कुछ सरोकार नहीं रह गया है। Constant Remembrance (सतत-स्मरण) तक की इतनी फिक्र नहीं रह गई है। अब तो याद आये या न आये, मुझे तो बस ‘मालिक’ से काम और और कुछ परवाह नहीं रह गई है। पूजा हो या न हो, ‘उसकी’ मर्जी हो सो हो। कुछ यह भी महसूस होता है कि दशा याद में घुलकर न जाने क्या हो गयी है। पूज्य श्री बाबूजी इधर दो दिन से न जाने क्या हो गया, न जाने क्यों हालत बिखरी-बिखरी सी मालूम पड़ती है। तितर बितर सी हो गई है। परन्तु आज से ‘मालिक’ की कृपा से कुछ साफ हो गई सी लगती है या भाई आज से हालत कुछ बदल सी गई लगती है। कभी तो याद इस तरह की मालूम पड़ती है, जैसे तीर सा हृदय में चुभ गया हो। भाई, ऐसी हालत लगती है कि -

"सतगुरु साँचा सूरमा, नख सिख मारा पूरि ।
बाहर घाव न दीसई, भीतर चकनाचूर ।। "

इधर दो-तीन दिन से हालत बड़ी निर्जन सी मालूम पड़ती है, यानी जैसे सूखा सा पड़ गया हो या पाला सा मार गया हो। कृपया देख लीजियेगा कि अहंता तो नहीं बढ़ गई (यद्यपि ऐसा हो नहीं सकता) न जाने क्यों बहुत समय से नींद बहुत उचटी सी हो गई है। अब तो यह हाल है कि एक मिनट भी उठकर बैठूं तो आँखें ही क्या कुल शरीर बिल्कुल ऐसा हो जाता है जैसे न तो सोई होऊं और न नींद का नाम निशान तक रह जाता है। चाहे पूजा भी न करूँ तो भी। कभी-कभी तो पेशाब करने गई कि तब तक ही नींद बिल्कुल चैतन्य हो जाती है। खैर, मुझे इसकी कुछ परेशानी नहीं होती। नींद बहुत कम ही है, जैसे ही नींद से आँख खुली नहीं कि नींद गायब हो जाती है, परन्तु ‘उसकी’ कृपा से परेशानी कुछ नहीं है। कृपया देख लीजियेगा कि कहीं हालत में बहुत मद्धिमपना तो नहीं आ गया है। अम्मा कहती हैं कि अपनी तन्दुरूस्ती का कुछ ख़्याल तो अवश्य करियेगा तथा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। आज या कल जब पूज्य मास्टर साहब जी वगैरह लौटेंगे तो जंगल में के समाचार मालूम होंगे। इति-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-255
लखीमपुर
1/11/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है ‘आप’ अच्छी तरह से होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से मेरी जो कुछ भी आत्मिक-दशा है सो लिख रही हूँ।

अब तो ऐसा लगता है कि ठहरी हुई दशा ख़त्म सी हो गई। भाई, अब तो कुछ ऐसी हालत लगती है, या कुछ ऐसा दिखलाई पड़ता है कि ‘मालिक’ के एक बन्दे का ग़म ‘ईश्वर’ के गम से कहीं परे तक पहुँच जाता है, वह ‘ईश्वर’ से भी परे तक हो जाता है, जहाँ ‘ईश्वर’ के बस के बाहर बात हो जाती है। कुछ ऐसा लगता है कि जो चाहे, उससे ( ईश्वर से) चाहे जो काम ले ले। पूज्य श्री बाबूजी वह Force (शक्ति) तो स्वयं जैसा चाहिये Work (कार्य) करती रहती है। यह सब तो ‘आप’ जाने कि क्या है, ‘मालिक’ की कृपा से कुछ हालत ऐसी ही हो गई है कि वास्तव में तो किसी की भी कुछ कीमत नहीं है, बस मेरा तो ‘मालिक’ ही है।

अब तो भाई, कुछ यह हाल है कि ‘मालिक’ मेरे अन्दर खो गया है, हिरा गया है। और मैं केवल ‘उसी’ की खोज में लौ लगाये डुबकी पर डुबकी लेती जाती हूँ। ‘उससे’ बिल्कुल पास और कभी न जाने क्यों कुछ दूरी महसूस करती हूँ। इसीलिये भाई, मुझे अब बिल्कुल फुर्सत ही नहीं रह गई है। अन्तर में ही गोते लगाती रहती हूँ, मुझे बाहर के लिये न तो समय ही रह गया है और न उसका ख़्याल ही आता है। बाहर क्या बला है। सच तो यह है कि मेरे लिये तो अन्तर ही अन्तर रह गया है। नहीं-नहीं, बल्कि अब तो अन्तर भी समाप्त हो गया है या वह मैदान बन गया है और यह देखती हूँ कि चाहे मैं ‘उसके’ लिये दौड़ रही हूँ, परन्तु निगाह मेरी ‘उससे’ एक क्षण को भी लौटना तो दूर रहा, कभी पलक भी नहीं मारती। कुछ यह भी हाल है कि ‘उसे’ खोजते-खोजते मैं खुद भी हिरा जाती हूँ, फिर न जाने क्या हो जाता है। परन्तु बाज़ी लग चुकी है और जुटकर फिर हार मानना या कमजोरी मैंने स्वप्न में भी नहीं देखी है और केवल ‘मालिक’ की ही कृपा से यह सब कुछ है। मेरी समझ से हार कोई चीज़ ही नहीं होती, वरन् अपनी कमज़ोरी को इस नाम से पुकार लिया गया है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ अब तो ऐसा नरम, ऐसा विशुद्ध मैदान है, कि कुछ कह नहीं सकती हूँ।

आज पूज्य मास्टर साहब जी से ‘आपका’ कृपा-पत्र सुना। उसमें ‘आपने’ बाद में जो थोड़ी सी अपनी हालत लिखी, उसे सुनकर तो वास्तव में जी बहुत ही खुश हुआ। वास्तव में ‘मालिक’ की कृपा से अपने ‘मालिक’ के लिये यही बात मुझे दिखलाई पड़ती है, महसूस होती है या भाई यह भी है कि मुझे तो ‘वही’ दिखलाई पड़ता है।

अम्मा कहती हैं कि ताऊजी कल से व्रत तो कर रहे हैं, अब ‘मालिक’ जाने, जो मर्जी हो सब वही जानें।

‘आपने’ जो मेरी दशा ठहरी हुई लिखी, सो मैं महसूस कर रही थी, परन्तु मेरे वश के बाहर की मालूम पड़ती थी, परन्तु मैं तो फिर ‘श्री समर्थ जी’ की आभारी हूँ कि ‘जिन्होंने’ हमें ऐसी ‘निधि’ दी, अब मैं भी, ‘मालिक’ की सदैव ऐसी ही कृपा रहे और बुजुर्ग का आशीर्वाद तो ‘इनकी’ (यानी ‘उनकी’ निधि की) होकर ही रहूंगी। पूज्य श्री ‘बाबूजी’ परिश्रम सिखाने वाले को ही होता है और बिल्कुल तो वही जान सकता है, मगर ‘उसके’ कारण सीखने वाले को वास्तविक जीवन का मज़ा मिल जाता है। ‘आपकी’ कृपा का बहुत-बहुत धन्यवाद है, और क्या कहूँ। गीता वाला मजमून बहुत ही उच्च है, परन्तु वह ‘आप’ सी हस्ती के कहने योग्य है। मुझे अब न जाने क्यों कभी-कभी कुछ अपने में भारीपन सा लगता है, परन्तु तकलीफ़दे नहीं मालूम पड़ता, न जाने यह क्या बात है और यह पहले सा भारीपन भी नहीं लगता है। अम्मा आपको शुभाशीर्वाद तथा केसर प्रणाम कहती हैं। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-256
शाहजहाँपुर
11/11/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे सब खत मिल गये। तुम्हारे हालात पर गौर कर लिया। ईश्वर के रास्ते में जो बातें भी आती हैं वह सब हमारे भले के लिये आती हैं। अगर रुकावटें भी हैं, तो इसके मानी यह हैं कि ‘मालिक’ को उनको दूर करने के लिये हमारे ख्याल में रहना पड़ेगा तो फिर इससे ज्यादा और हमें क्या चाहिये कि ‘मालिक’ का ख़्याल हमारी तरफ रूजू हो। सब पूजा और ध्यान का यही मतलब होता है कि ‘मालिक’ का ध्यान किसी तरीके से हम पर फिरने लगे। मगर ‘मालिक’ की निगाह तभी फिरती है, जब उसकी खोज में गड्ढा या ऊंची नीची जगह आ जाती है। सूरदास जी चूंकि अन्धे थे, बेचारे कृष्ण के प्रेम में लकड़ी से कुंआ न टटोल सके और उसमें गिर गये। अन्त में श्री कृष्ण जी ने अपने हाथों उन्हें निकाला। कितनी खुश नसीबी थी कि कृष्ण जी के हाथ उनके जिस्म पर पड़े, गोया कि कुए में गिरने से उनकी पवित्रता और बढ़ गई। खत पहुँचते-पहुँचते ईश्वर ने चाहा तो तुम्हारी हालत बदलने लगेगी और कुछ फर्क तो अभी 10.55 p.m. पर पड़ गया होगा। तुम अपनी सैरगाह मुकाम ‘H’ पर पाओगी। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-257
लखीमपुर
14/11/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ कल मिला पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। मैं तो कृपा की बाट ही जोह रही थी और कोशिश करती हुई ‘मालिक’ की ही होने में बाबरी सी होने की कोशिश कर रही हूँ आगे सब ‘मालिक’ जाने। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा हैं, सो लिख रही हूँ इधर दो दिन से दशा बदली हुई लगती है। कुछ ऐसी दशा है कि सब दिल, दिमाग तथा इन्द्रियों वगैरह में कुछ inactive (प्रकर्मण्यता) पना सा लगता है या सब गुमसुम से हो गये हैं, परन्तु उदासी वाली दशा की तरह नहीं है। कुछ ऐसा है कि सब तरफ की, हर प्रकार की रुचि, दिल, दिमाग से निकल गई है। परन्तु अब उदासी वाली दशा भी feel (अनुभव) नहीं होती है। न जाने क्यों कसक भी इधर तेजी नहीं पकड़ पाती है और वह चीज़ भी महसूस नहीं होती कि जो मैंने पहले लिखा था कि ‘मालिक’ मुझमें खो गया है और मैं ‘उसकी’ खोज में दौड़ी-दौड़ी फिर रही हूँ। इधर कुछ दौड़ भी शायद कम पड़ गयी है, परन्तु यह हो गया है कि ‘वह’ मेरा अपना और अधिक हो गया या मैं ‘उसमें’ और घुल गई हूँ। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ कुछ यह भी है कि मैं ‘उसके’ दर्शन के बिना एक क्षण भी रह नहीं सकती। अब तो भाई यह हाल हो गया है। कि हर जगह हर समय मैं दर्शन में ही रहती हूँ, क्योंकि एकमात्र ‘वही’ दर्शनीय है, ‘वही’ वंदनीय है, इसलिये अब यह हाल है कि पग-पग तीर्थ है, हर काम सेवा है। मगर अब न तीर्थ का होश है और न सेवा का होश है और न जाने क्यों अब न वंदना का ही होश है। और न कोई आवश्यकता ही महसूस होती है। अब तो ‘वह’ मेरे जिगर से चिपटा रहता है या मैं ‘उसके’, नहीं-नहीं बस ऐसा लगता है कि मैं ‘उसमें’ घुसती या समाती चली जा रही हूँ। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ अब तो कसक के उफान में शुद्धता नहीं मालूम पड़ती, अब तो घुलने में ही मजा है। भाई यह सब ‘मालिक’ जाने, मुझे तो यह हाल न कहने को तबियत चाहती है, न लिखने को अक्सर न जाने क्यों ख़्याल दिन-रात दिमाग़ में इतने अधिक आते हैं कि दिमाग भी थक सा जाता है, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से मन इससे बहुत दूर रहता है। दशा मेरी न जाने कैसी है, अब ‘आप’ ही जानें।

अम्मा ‘आप’ को शुभाशीर्वाद कहती हैं। इति-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री- कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-258
लखीमपुर
20/11/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा पत्र पहुँचा होगा। ‘आपकी’ तबियत कैसी रहती है। अम्मा कहती हैं कि हो सके तो कुछ खाने-पीने में ताकत की चीज़ कोई न कोई जरूर रखियेगा। ‘मालिक’ की कृपा से मेरी जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

जैसे पहले मैंने लिखा था कि “हर जगह, हर समय मैं दर्शन में ही रहती हूँ,” वह यह नहीं कि मैं ‘उसे’ ही देखती रहती हूँ, वरन् एक ऐसी ही अत्यन्त हल्की-फुल्की सी दशा मुझमें तथा सब जगह सब ओर फैली दीखती है। अब तो मुझे न जाने क्या हो गया है कि अब तो न बुन्द है, न सिन्धु है। यह सब कुछ न जाने क्या हो गया। अब तो न मैदान है, न बिन्दु और न सिन्धु ही है। अब तो कुछ धुंधला सा कोहरा सा छाये हुए के सदृश ही सब ओर है। अब ‘मालिक’ जाने क्या है। मेरा तो ‘मालिक’ ही है और वह बड़ा ही अच्छा है, क्योंकि भाई, वह भी तो ‘वही’ है, जो :-

"द्रुपद-सुता निर्बल भई ता दिन आये तजि निज धाम।
दुःशासन की भुजा थकित भई, वसन रूप भये श्याम ।।"

बल्कि आध्यात्मिकता के लिये, मेरे लिये तो उससे भी अच्छा समय है, परन्तु पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मुझमें वह पुकार पैदा नहीं होती। यह दिल (प्रेम में) फटकर टुकड़े-टुकड़े नहीं हो जाता है। इधर कुछ यह हो गया है कि अपनी रुचि से खुद मैं कभी-कभी बिल्कुल धोखा खा जाती हूँ कि इस ओर (मालिक में) है या नहीं। मैं कहीं दुनिया की ओर तो अधिक नहीं रहती, मुझे आश्चर्य होता है। परन्तु बस जब सत्संग होता है, तब ज़रूर कुछ यह मालूम होता है कि ‘मालिक’ की कृपा से कुछ थोड़ी सी रुचि ‘उसकी’ ओर मालूम पड़ती है, फिर वैसी ही हो जाती हूँ। भाई, आजकल न जाने क्यों हालत को देखते हुए ऐसा लगता है कि ‘मालिक’ से मैं दूर सी हूँ परन्तु कोई कारण समझ में नहीं आता है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मेरी सच्ची हालत आजकल यही है कि मुझमें श्रृद्धा, विश्वास, भक्ति, प्रेम कुछ भी नहीं रह गया है। मैं शायद दुनिया की ओर होऊं, मैं सच कहती हूँ कि मुझमें यह बस कुछ नहीं है, परन्तु निगाह ऐसी बावरी है कि फिर भी मैं तो निर्बल, अनजान हूँ, परन्तु वह ‘उसी’ ओर जमी हुई है। अब ‘मालिक’ ही ग़रीब को सम्भालेगा। मालूम पड़ता है कि अभी Point (पॉइंट) की सैर शुरू नहीं हुई है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ जब हालत रुकी हुई थी तो ज़ोर मारने पर भी कुछ देर को निगाह ऊपर पहुँचती थी, परन्तु फिर जहाँ की तहाँ जैसी की तैसी हो जाती थी, परन्तु 'मालिक' ने कृपा करके एक निगाह में उठा दिया। अब ‘मालिक’ ही जाने। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-259
शाहजहाँपुर
23/11/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे सब पत्र मिल गये। मैं इन दिनों एक दो कामों में बहुत अधिक फंसा रहा। इस कारणवश मैं तुमको अधिक समय न दे सका। अभी आठ दिन और काम में लगा रहूँगा। ईश्वर ने चाहा तो पत्र पहुँचते-पहुँचते तुम्हारी सैर Point ‘H’ (पॉइंट एच) की प्रारम्भ हो जावेगी। तुमने लिखा है, “अब न मैदान है, न बिन्दु, न सिन्धु,” यह तो बहुत अच्छी हालत है। इसका अर्थ यह है कि बिन्दु न सिन्धु, सिन्धु व मैदान लय-अवस्था के असर से अपना-अपना Limitation (सीमा) तुम्हारे ख़्याल पर अन्दाज़ होने नहीं देते, अर्थात् तुम्हारे ख़्याल से यह बातें सब निकल चुकी हैं यानी तुम्हारे ख्याल में उनका बन्धन नहीं रहा और उससे छुटकारा पा लिया या ऐसा कहो कि तुम्हारा ख़्याल इन चीजों के अब न होने के कारण से और भी हल्का हो गया है। विशेष पत्रोत्तर यह है कि अभ्यासी की हालत यह होनी चाहिये कि “सावन सूखा न भादों हरा”। यह बबूल के वृक्ष की तारीफ़ है जो सदैव एक समान रहता है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र

अम्मा ने जो अच्छा आहार करने के लिये लिखा है, यह ठीक है, परन्तु इस समय हालत यह हो रही है “तेते पाँव पसारिये, जेती लम्बी बाँवि”। परन्तु खैर, जब ईश्वर देगा, तब मैं ख़्याल रखूंगा। मैं खुश तो इस बात पर होऊं कि सबको अच्छा भोजन प्राप्त हो। न मालूम यह समय कब आये। आना तो चाहिये, और दूध, घी की नहरें बहनी चाहिये, कुछ देर है।
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-260
लखीमपुर
23/11/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ आज सुना, सुनकर तबियत ‘मालिक’ का प्रेम पाने को तड़फड़ा उठी, परन्तु ‘श्री बाबूजी’, क्या मैं कभी ‘उसमें’ (मालिक में) सराबोर हो सकूंगी। क्या मैं जितना चाहिये या जितना मुमकिन हो सकता है उतना उस पर मर मिठुंगी। सच तो यह है कि प्रेम से अधिक मैं तो बस ‘उस’ पर मर मिटना चाहती हूँ। और ‘मालिक’ की कृपा से इस गरीब को दृढ़ विश्वास है कि मैं अवश्य सफल होऊंगी। ‘आपने’ जो यह लिखा है कि अभ्यासी मुझसे चाहे जैसे करिश्में करवा सकता है। मैं भी कहती हूँ कि प्रतिक्षण हो सकता है और हो रहा है। ‘आपने’ जो मेरे व पूज्य मास्टर साहब जी के लिये लिखा है, वह बहुत ठीक नुस्खा है, परन्तु मैं कहूँ चाहे कुछ, कि भाई मेरी तारीफ़ न होवे, परन्तु पूज्य श्री बाबूजी जब दशा तो यह है कि हाथ को हाथ नहीं सूझता हैं, यानी, जब तारीफ, तारीफ मालूम पड़ती है, नहीं भाई, जब चिकने घड़े पर ठहराव की जगह ही न हो तो चाहे कोई कुछ कहे और फिर "करूँ तारीफ़ बंसी की, या बंसीधर (यानी कृष्ण जी) बजइया की”। खैर, ‘मालिक’ की कृपा से अब जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

न जाने क्यों Self-Surrender (आत्म समर्पण) मुझे भूल गया है। कैसे करूँ याद न आती। मुझे तो ‘उसके’ अतिरिक्त कुछ अच्छा नहीं लगता है। मेरा तो कुछ यह हाल है कि यदि अपनी कुछ कमी या दोष महसूस भी हो तो उन्हें दूर करने की कोशिश करना तो दूर रहा, उनका सोचना तक दूभर मालूम पड़ने लगता है। तबियत छटपटाने लगती है, क्योंकि उसे तो केवल ‘मालिक’ से ही काम है। यही नहीं बल्कि कोई किताब या अखबार हाथ में लेती हूँ, परन्तु नतीजा यही होता है कि अक्षर के बजाय न जाने कहाँ देखती रहती हूँ, न जाने क्या सोचती रहती हूँ। मेरा तो यह हाल है कि न मुझे किसी में तारीफ़ और न किसी में बुराई ही मालूम पड़ती है। परन्तु फिर भी अभी ऐसा लगता है कि दशा पूरी तौर से खुली नहीं है। क्योंकि चाल में तेजी नहीं आई है। मेरी तो यह दशा मालूम पड़ती है कि ऐसी जाहिल, कि जिसने कभी न आत्मा को जाना, न परमात्मा को, न इखलाक, न ईश्वर को न कुछ पूजा या श्रद्धा, विश्वास तथा प्रेम, जिसके पास तक से भी होकर कभी न फटका हो। अब तो पूज्य ‘श्री बाबूजी’ यह जाहिली, यह लट्ठमारी मेरी हालत है, परन्तु तिस पर भी तुर्रा यह कि मैं ‘मालिक’ को पूर्णरीत्या से अवश्य ही प्राप्त करूँगी। कुछ यह है कि मैं अधिकतर अपने को एक बालक की ही तरह महसूस करती हूँ। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ तबियत यह न जाने कैसी है कि यदि किसी को ‘मालिक’ से मुहब्बत अधिक देखती हूँ तो चाहे वह कोई हो, ऐसा पर्दा उठता है कि, फिर तो यहाँ मालूम पड़ता है कि जो मैं हूँ, जैसी मैं हूँ, बिल्कुल वही वह है। न जाने क्यों ‘उसकी’ याद अक्सर अपनी तरह आती है। सचमुच मुझे तो ऐसा मालूम पड़ता है कि कहीं कुछ पर्दा-वर्दा है ही नहीं, सब एक से हैं, एक ही तरह के हैं। अब तो यह हाल है कि -

“दिल के आईने में है तस्वीरे यार, जब जरा गर्दन झुकाई, देख ली"

अब गर्दन झुकाने की भी आवश्यकता नहीं रह जाती। फिर भी मेरी दशा खराब चल रही है कि जैसा मैं ऊपर लिख चुकी हूँ कि जाहिली की दशा रह गई है, अब आप ही कृपया सम्भालिये। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। ‘आपने’ तो मेरी दशा देखी ही होगी, कृपया बतलाइये मैं क्या करूँ? इतिः-

आपकी सदैव ही कृपा- भिखारिणी
कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-261
लखीमपुर
26/11/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा तथा केसर का पत्र पहुँचा होगा। यहाँ सब सकुशल हैं, आशा है ‘आप’ भी स्वस्थ होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी मेरी आत्मिक दशा है सो लिख रही हूँ।

पहले तो कल रात में एक स्वप्न देखा था सो लिख रही हूँ, कि :- मोटर पर बड़ी तेज़ी से घोर जंगलों में होती हुई गई हूँ। वहाँ शायद मास्टर साहब जी का घर है, वहाँ से ‘आप’ मास्टर साहब तथा मैं कहीं मोटर पर फिर गये हैं, परन्तु मास्टर साहब जी न जाने कहाँ गये। हाँ उस घोर जंगल में भी प्रकाश सूर्य के सदृश ही है। फिर मैंने देखा, मैं अकेली हूँ सामने कपड़े से लिपटा एक छोटा सा आकार है, मैंने उसे उठा लिया तो शक्ल उसकी ‘आपकी’ तरह हो गई और वह सचेत होने लगा, उसमें जीवन आने लगा और होते-होते एक-दो सैकेण्ड में वह ‘आपका’ छोटा सा रूप हो गया और फिर प्रेम से मेरे सिर पर हाथ फेरने लगे, फिर हृदय पर फिर देखा कि सब ओर जल ही जल भरा हुआ है, और ‘आपके’ पास में खड़ी हूँ। ‘आपने’ कहा कि तुम कहती थी कि शरीर कुछ ठीक हो जाये तो मैं बड़ी जल्दी उन्नति करने लगू, अब इस पानी में बिल्कुल मिल जाओ? मैंने कहा बहुत अच्छा और ‘मालिक’ की कृपा से न जाने कैसे पानी के पास खड़े होकर मैं चारों ओर के उस विस्तृत जल में बिल्कुल घुल गई। फिर मुझे खूब याद है कि मैंने यह जानने के लिए कि पूरी तौर से समस्त में घुली या नहीं, तो देखा कि सचमुच समस्त जल के कण-कण में मैं मौजूद थी। भाई अब तो यह हाल है कि ऐसा लगता है कि ‘उसके’ ख़्याल में सदैव मेरा ख़्याल समाया रहता है, क्योंकि जब मुझे ख़्याल आता है, तो उसके (यानी मालिक के) ख़्याल में अपने को हरदम पाती, हूँ, यानी ‘उसकी’ निगाह, ‘उसका’ ख़्याल अपनी ओर पाती हूँ। यानी वही या उसका ख्याल ही मेरा घर हो गया है। और अब तो यह हाल है कि ‘आपका’ ख़्याल (या आप तो) हरदम, हर समय, हर जगह तथा समस्त ब्रह्माण्ड में फैला हुआ है, मौजूद है और ऐसा लगता है कि उसी में घुली हुई यदि दृष्टि जाती है तो सब ओर अपने को मौजूद पाती हूँ, अपनी यही दशा पाती हूँ। अब तो यह हाल है कि ‘मालिक’ का ख़्याल करती हूँ तो, उसमें अपने को मौजूद पाती हूँ।

न जाने क्या बात है कि हर समय, हर जगह मुझे अपने बजाय एक छाया सी, हल्की सी, सूक्ष्म सी महसूस होती है और जब उसे गौर से देखती हूँ, तो शक्ल ‘आपकी’ ही पाती हूँ। मेरे ‘श्री बाबूजी’ मुझे तो ऐसा लगता है कि दिल का बाँध टूट गया है। सब तरफ़ मेरा ही दिल फैला हुआ है, कितना हल्का है कि कुछ कहना नहीं। सब जो कुछ होता है, उसी में होता है, नहीं तो कुल ब्रह्माण्ड उसी के अन्दर समाया हुआ है। स्वर्ग, नरक तथा तीनों लोक वगैरह इसी दिल के पसारे में समाया हुआ है। इतना ही नहीं, सब उसके अधीन हो गये हैं। ऐसा लगता है कि सारी अग्नि, पृथ्वी तथा पानी वगैरह सब इसी दिल के पसारे में समाये हुए हैं। सारी वायु, सब कुछ इसी दिल में देखती हूँ और इसी के अधीन हो गये हैं, परन्तु खुद में न जाने कहाँ चली गई हूँ, मेरा कहीं पता ही नहीं रह गया है, हाँ मेरा पता ‘मालिक’ के ख़्याल में जो मेरी ओर रहता है, उसमें लगता है। मेरा यह हाल है कि समस्त ब्रह्माण्ड, सारा विश्व, मेरे Heart (दिल) में है या सचराचर विश्व मेरा Heart (हृदय) है। सब मुझमें है और मैं सब में हूँ। परन्तु भाई इसके ऊपर या इससे परे मेरे ‘मालिक’ का विश्व और ही है, जहाँ हर समय वह मेरे साथ है और मैं ‘उसके’ ख़्याल में हूँ। मुझे कुछ यह दिखाई पड़ता है कि मेरे श्री बाबूजी ‘आप’ दीन और दुनिया के ‘मालिक’ सबके लिए एक से हैं। यह सब कुछ ‘उसका’ ही बनाया हुआ है और ऐसा लगता है कि जड़, चेतन, सबसे ‘आपको’ अपने की ही तरह मुहब्बत है। परन्तु फिर भी न जाने क्यों मुझे कुछ ऐसा महसूस होता है कि फिर भी अपने को वह ‘मालिक’ नहीं ..... सबसे छोटा समझता है। यह ‘मालिक’ की कृपा से अजीब दृश्य देख रही हूँ। अब कुछ यह होता है कि स्वप्न में भी अपनी कुछ सचेतन अवस्था सी ही पाती हूँ।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ ‘आपका’ कृपा-पत्र अभी मिला- पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘आप’ काम में फंसे होने के कारण मुझे अधिक समय न दे सके, यह ‘आपने’ लिखा है, परन्तु मैं तो यही कहूँगी कि ‘आपका’ समय मेरा है, मैं जहाँ तक हो सकेगा लेती ही रहूँगी, इस लिए ‘आप’ भले ही कहें, परन्तु मैं यह न कह सकूंगी, क्योंकि ‘मालिक’ की कृपा ने मुझें यह कहने का अवसर ही न दिया। ‘आपने’ जो अभ्यासी की दशा को बबूल के वृक्ष की तरह न सावन हरा, न भादों सूखा होने की लिखी है, ‘मालिक’ की कृपा से यह भी हो जावेगी। इसमें संशय नहीं। मैं देखती हूँ कि दुनिया के लिए ‘मालिक’ की कृपा से अधिकतर समय-समय पर यह दशा अवश्य महसूस करती हूँ, क्योंकि और अधिक महसूस करने को उतना ही समय चाहिए और आध्यात्मिकता के विषय में क्या लिखूं क्योंकि मुझे तो उसकी गरज़ नहीं है। भाई जिससे गरज़ है, बस है। ‘मालिक’ ने चाहा तो उपरोक्त दशा भी आ जायेगी, मैं क्या जानूं। हालत तो ‘आपकी’ कृपा से दो-तीन दिन हुए फिर ठीक आ गई है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ एक बात कभी-कभी दो-एक दिन को यह दशा हो जाती है कि मन अपने आप मुझे मालूम नहीं कि कुछ बातें सा करता है, परन्तु मैं तो यह सोच लेती हूँ कि यह आपसे बात कर रहा है, “अम्मा” आपको शुभाशीर्वाद कहती हैं और कहती है कि हमें यह मालूम होता तो फूलों जिज्जी का पता ‘आपकों’ लिख देती।

अब तो कुछ ऐसी दशा है कि ऐसा लगता है कि आत्मिक दशाओं से भी मेरा सम्बन्ध टूट गया है, और गुण-अवगुणों से भी सम्बन्ध टूट गया है। बिल्कुल स्वतंत्र प्रतीत होती हूँ । इति -

आपकी सदैव ही कृपाकांक्षिणी,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-262
शाहजहाँपुर
30/11/1952
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा 23 नवम्बर का पत्र मिला। जब तक अहमियत मौजूद है, इन्सान अपनी तारीफ़ से प्रसन्न भी होता है और जब कोई उसको भला-बुरा कहता है, तब बुरा मालूम होता है। अहमियत का कोई ठिकाना नहीं न मालूम यह कहाँ तक जाती है और शुद्ध अहमियत से तो बहुत दिनों में पीछा छूटता है और यही तारीफ़ शुद्ध माया और शुद्ध अहंकार की है। यह दोनों वस्तुएँ बहुत शक्ति रखती हैं और योगी यहीं से अधिकतर गिरता है। सर्व शक्तिमान ईश्वर अपनी दया करें।

एक बात मैं तुम्हें और बतलाता हूँ कि मान और अपमान इन दोनों से हमें कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। अपमान तो बहुत शीघ्र छूट जाता है मगर भाई मान का तोड़ना सच में ईश्वराधीन ही है। जब ईश्वर की हमारे ऊपर पूर्ण कृपा होती है, तभी पीछा छूटता है, फिर भी जब तक शरीर उपस्थित है यह कुछ न कुछ अवश्य शेष रह जाता है। अब मैं अपनी कमज़ोरी भी लिखता हूँ - जब कोई मेरी प्रशंसा करता है, तब चित्त मेरा भी प्रसन्न हो जाता है, परन्तु यह बात अवश्य होती है कि प्रथम तो चित्त बहुत कम प्रसन्न होता है और होता भी है तो मुझे यह अनुभव नहीं होता कि किसकी प्रशंसा हो रही है, कौन प्रसन्न हो रहा है। तुमने जो पत्र में यह लिखा है कि “जितना मैं” ‘मालिक’ पर मर मिटना चाहती हूँ, उतना में मर-मिट नहीं पाती। इसके अर्थ यह है कि जैसे कोई व्यक्ति अपने तीर का निशान उस स्थान पर बना ले जहाँ पर कि तीर लगना है जब मर-मिटने का ख़्याल पूर्णरूप से उत्पन्न हो गया तो समझ लो कि मर-मिटना भी शुरू हो गया और तीर निशाने पर अवश्य पहुँचेगा।

तुमने जो लिखा है कि “Self-Surrender (आत्म समर्पण) मुझे भूल गया है,” यही हालत ठीक Self-Surrender (आत्म समर्पण) की है। Self-Surrender (आत्म समर्पण) और कुछ नहीं है, केवल यही है कि अपने आपको ‘मालिक’ के हाथ में दे देना है और ‘उसकी’ इच्छा में राजी हो जाना। जो तुमने ज़ेहालत की हालत के विषय में लिखा है यह बहुत ऊंची हालत है और इसका अभी प्रारम्भ भी नहीं हुआ है। यह चीज़ अभी कोसों दूर है, परन्तु ‘मालिक’ की पूर्ण दया सबसे नज़दीक है और वह सब कुछ कर सकता है और भाई ज़ेहालत को पूछता ही कौन है। उसे तो सब लोग दूर-दूर रखना चाहते हैं। मेरी मिसाल सामने है कि पढ़े-लिखे मनुष्य, सम्भव है बात करना भी अपने समय को व्यय करना है। एक बात तुम्हारे पत्र में यह अच्छी नहीं मालूम हुई कि हालत खराब चल रही है। हमारे यहाँ सब हालतें अच्छी ही हुआ करती है। अगर कोई खराब हालत अन्दाज में आती है तो वह अच्छी हालत खोलने के लिये कुंजी होती है। यह ख़्याल अच्छा है कि जब तुम किसी में ‘मालिक’ का प्रेम देखती हो उसे अपने ही सा प्रेम में पाती हो। मैं मिसाल हूँ। अव्वल तो मैं अपने आप में नहीं रहता हूँ, परन्तु खैर, जब उससे पृथक होकर निगाह जाती है तो मुझे यह मालूम होता है कि मुझसे कहीं अधिक आध्यात्मिक-विद्या में तरक्की किये हुए हैं। और इससे कहीं अधिक बढ़ जाऊं तो मुझे यह ज्ञात होता है कि इसी ने मुझे आध्यात्मिक-विद्या सिखाई है और मौजूदा हालत मेरी जो भी कुछ है। सब इसी की दी हुई है। इसके माने यह निकलते हैं कि हर वस्तु का ‘असल’ एक ही है और सब वहीं से आये हैं। किसी ने लगाव अधिक रखा और कोई गाफिल हो गया।

प्रिय बेटी, मैं तुम्हारे प्रथम पत्र का उत्तर दे चुका था कि 26 नवम्बर का पत्र मिला, तुमने जो स्वप्न देखा है, उसकी मैं तुमको बधाई देता हूँ। तुमने जो जल देखा है, वह Realization (साक्षात्कार) का दरिया था। अब तुम उसमें समा चुकी हो अर्थात् Reality (असलियत) प्रारम्भ हो गई है और सच पूछो तो मेरा काम ख़त्म हो गया। अब आगे बढ़ो और देखो क्या है। और मुझे विश्वास हो गया और मेरा कर्तव्य जो इतना ज़रूरी है जो ईश्वर ने पूरा कर दिया यह दशायें सब Point ‘H’ (पॉइंट-एच) की हैं। तुमने यह जो लिखा है कि “मेरे ही दिल में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाया हुआ है,” यह ब्रह्म गति है। इससे ऊपर हिरण्य-गर्भ की हालत है, उसके ऊपर खालिस ब्रह्म प्रारम्भ हो जाता है। तुमने सच लिखा है कि “दिल का बाँध टूट गया”, मगर अभी मैंने दिल को खोला नहीं है और यह ख़्याल मुझे अभी स्मरण हुआ। अब यह ‘मालिक’ की इच्छा पर है, कि कब मेरी तबियत बना दे कि मैं उसे खोल सकूँ। तुमने जो लिखा है कि “हर समय, हर जगह, मुझे अपने बजाय एक छाया सी, हल्की सी, सूक्ष्म सो ज्ञात होती है और जब उसे गौर से देखती हूँ, तो स्वरूप आपका पाती हूँ ”इस जुमले की इबारत कुछ ऐसी लिखी है कि ख़्याल को काटती है। इसको साफ़-साफ़ लिखो ताकि मैं उत्तर लिख सकूँ। तुमने यह लिखा है कि तुम्हारे ही दिल में पृथ्वी और जल, सब समाया हुआ है, परन्तु स्वयं मैं कहीं चली गई हूँ” इसके अर्थ यह हैं कि तुमने अपने आपको काफी गुम कर दिया है। ईश्वर करे यह दशा सबको प्राप्त हो, बल्कि हर्ष तो मुझे तब हो, जब कि मैं किसी न किसी को अपने से ऊंचा उन्नति में देखूं। समुद्र में उफान नहीं आता, तालाब अवश्य थोड़े पानी में उफान आते हैं। अभ्यासी को चाहिये कि हजारों दरिया मारफत (Realization) के गट-गट पी जावें, परन्तु वाणी से यही निकले कि “और लाओ”। ईश्वर की पूर्ण कृपा से तुम्हारी दशा बहुत अधिक अच्छी है। ईश्वर इससे भी आगे बढ़ावे। ऐसा ही है, ऐसा ही हो। यहाँ तो लोगों को इस दशा तक पहुँचने की इच्छा ही नहीं होती। ईश्वर का कहीं छोर नहीं। मुझे तो गुरु महाराज ने ठिकाने पर पहुँचा दिया। ‘उनका’ हज़ार-हज़ार धन्यवाद। परन्तु भाई, अब भी नहीं मालूम ठिकाना कहाँ होगा। कारण यह है कि Swimming अब भी शुरू है। मालूम नहीं लोग थोड़ी वस्तु को अधिक कैसे समझ बैठते हैं। अम्मा को प्रणाम।

तुम्हारा शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-263
लखीमपुर
7/12/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ कल मिला - पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ का अनेकानेक धन्यवाद है। क्योंकि धन्यवाद के अतिरिक्त अपने अहेतुकी कृपा वाले ‘मालिक’ के लिये और कहूँ ही क्या और कैसे कहूँ। हाँ, मेरी एक प्रार्थना है कि जो भी पत्र लिखें वह जो ‘आप’ बोलें या जैसे लफ़्ज़ ‘आप’ बोलें, चाहे वे उर्दू के हों बस वही लफ़्ज़ लिखें, नहीं तो उसका रस कम हो जाता है। अगले पत्र में ‘आपने’ मास्टर साहब जी को मिशन की उन्नति के लिये, शायद किसी को Will Power (इच्छा-शक्ति) द्वारा करने को लिखा था, सो ‘आप’ निश्चिन्त रहिये, ‘मालिक’ की कृपा से वह मैं करने लगी हूँ। ‘आपने’ जो लिखा है कि ‘मान और अपमान’ इन दोनों से हमें कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये सो ‘आप’ विश्वास रखिये, ‘मालिक’ ने मेरी तबियत में मान-अपमान या और बेकार सम्बन्धों के लिये स्थान ही नहीं रखा है। मुझे तो लक्ष्य के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं देता। मुझे तो तीर कमान तथा हाथ तक नहीं दिखलाई पड़ते। यहाँ तक कि अब अक्सर यही हाल रहता है कि केवल अनजाने में भी, भूली हुई अवस्था में भी निगाह उधर ही रहती है, परन्तु मुझे लक्ष्य क्या है, इसकी भी याद नहीं रहती है। हाँ शायद कलेजे की धीमी-धीमी टीसन या सुलगन ‘लक्ष्य’ का ध्यान रखती है। ‘आपने’ लिखा है कि “एक बात तुम्हारे पत्र में यह अच्छी नहीं मालूम हुई कि हालत खराब चल रही है।“ पूज्य ‘श्री बाबूजी’ यह केवल उस समय की दशा को व्यक्त या स्पष्ट करने मात्र भर को ही लिखा था, वरन् मन में ऐसी कोई बात नहीं थी। न है और न होगी।

‘आपने’ जो लिखा है कि “एक पत्र मैंने मास्टर साहब को भेजा है, उसमें कुछ प्रश्न किये हैं और उनका उत्तर माँगा है।“ वह मुझे नहीं मालूम मैंने उनसे पुछवाया था तो मालूम हुआ कि ‘उनसे’ तथा ताऊजी से ‘आपने’ कुछ प्रश्न पूछे थे और उनके उत्तर भी ‘आपके’ पास पहुँच गये। मैंने जो यह लिखा था कि “अपने बजाय एक हल्की सी सूक्ष्म सी छाया दिखलाई पड़ती है, ध्यान से देखने पर स्वरूप ‘आपका’ पाती हूँ” उसका केवल यही है कि अपने शरीर और शक्ल के बजाय अब मुझे वैसा मालूम पड़ता है, जैसा मैंने लिखा है।

मेरे ‘मालिक’ ने जो मुझे अधिक उन्नति बराबर होने का शुभाशीर्वाद दिया है, वह तो बराबर मेरे सिर माथे पर है। ‘उसी’ की कृपा से ही उस वास्तविक दुनिया में (‘मालिक’ की दुनिया में) मेरा जन्म हुआ। ‘उसी’ की परम कृपा रूपी अमृत दृष्टि से पल रही हूँ, बढ़ रही हूँ और बस बढ़ती ही रहूँगी, इसमें सन्देह नहीं। मैं तो देखती हूँ कि प्यास बढ़ती ही जाती है और ‘मालिक’ की मेहरबानी से बढ़ती ही जावेगी। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरा तो कुछ यह हाल है कि यदि मुझसे कोई झूठ ही कहे कि ‘आप’ आये हैं, तो एकदम मेरे मुंह से यही निकलता है कि, ‘वे’ गये कहाँ थे। मुझे तो ऐसा लगता है कि गौर करने पर अपनी साँस तक को ‘उसकी’ साँस में ओत-प्रोत पाती हूँ कि जैसे कि अपने ख़्याल में ‘उसे’ और ‘उसके’ ख़्याल में अपने को ओत-प्रोत पाती हूँ, और चाहे मैं इस पर गौर करूँ या न करूँ परन्तु यही दशा रहती है। परन्तु न जाने क्यों यह ‘ख्याल’ लफ्ज़ इस दशा से बहुत भारी हो गया है। अन्तर का कुछ यह हाल है कि चाहे मैं कितनी हंसी-खुशी होऊं, चाहे कितनी उदास होऊं, परन्तु अन्तर इन दोनों से अछूता ही रहता है। हाँ, परन्तु फिर भी इसके पीछे कंडों सी धीमी-धीमी ऊपर राख पड़ी हुई सी ज़रूर रहती है। खैर, फिर भी न जाने क्यों ‘श्री बाबूजी’ तबियत कुछ अजीब बनी रहती है। न हर्ष ही रहता है, न बुरी ही रहती है। अक्सर बिन आँसू के सूखी हिलकियों से तबियत को सेता पाती हूँ।

अम्मा आपको शुभाशीर्वाद कहती हैं और कहती है कि हीरा बनाने की क्षमता तो केवल एक ‘आप’ ही में है। जो सबको पंक (कीचड़) में से खींचकर सीधे शुद्ध रास्ते पर ले आते हैं ‘वही’ कृपा कर हीरा भी बना सकता है।

अब तो उत्सव आ रहा है, उसमें तो हम सब ज़रूर आयेंगे ही। ‘आपकी’ तबियत तब तक ठीक हो जावे तो बहुत अच्छा हो। इधर 4-5 दिन से कुछ ऐसा है कि दिन भर जब तक सब स्कूल में रहते हैं या जब मैं अकेली रहती हूँ तो तबियत कुछ उदास सी ही समझिये रहती है और सूखी हिलकियाँ आती हैं, परन्तु फिर जब लोग होते हैं तो तबियत में पता नहीं Change (बदलाव) हो जाता है, शेष ‘आप’ जानें। केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इति :-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री–कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-264
लखीमपुर
16/12/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र ‘आपको’ मिला होगा। इधर मेरी तबियत कुछ खराब हो गई थी, परन्तु अब बिल्कुल ठीक हूँ। फ़िक्र की बिल्कुल रत्तीभर भी कोई बात नहीं है। आशा है ‘आपको’ अब फ़कीरी दवा मिल गई होगी। छोटे भइया को आजकल कुछ तकलीफ़ है, क्योंकि उनकी बगल में अब दो फोड़े हो गये हैं, एक कुछ आज फूटा है, दूसरा शायद कल तक फूट जाय। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो यह दशा महसूस होती है कि जैसे 'मालिक' के पुष्प में धीमी तथा मीठी महक बसने लगी है, परन्तु मेरा कुछ यह हाल है कि देखती ज़रूर हूँ कि आह यह ‘मालिक’ की देन है, परन्तु फिर तबियत जाने उस महक देने वाले में महब हो जाती है या महक में, परन्तु भाई, ऐसा लगता है कि महक में तो वह (तबियत) बसी ही हुई है। मेरा तो कुछ यह हाल है कि ‘मालिक’ ने महक में बसा दिया, परन्तु फिर भी मुझे तो ‘वही’ पसन्द है, इसलिये अपने को उस महक में महब पाते हुए भी तबियत को कहीं और पाती हूँ। मेरा तो यह हाल हो गया है कि “खुले नैन पहिचानौं हंसि हंसि”।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ एक बात इधर कुछ ऐसी अनुभव में आती है कि जिसका ‘मालिक’ से प्रेम बढ़ता है, उससे ऐसा लगता है कि जैसे एक ही ‘माँ’ के हम बालक हों। नहीं, नहीं बल्कि हम सब एक ही हैं, वहाँ दूसरे की गुंजाइश ही नहीं है। यह ऐसे ही लिख दिया, क्योंकि मेरे अन्दर तो एक याद ऐसी पैठ चुकी है जिसके आगे किसी की याद ठहरने नहीं पाती और यह शायद अपने यहाँ Brotherhood (भाईचारा) होने के कारण हो। अब तो हालत ऐसी है कि लहर है, परन्तु उफान नहीं आता। मुझे न जाने क्यों याद ‘मालिक’ की बहुत ही कम आती है, परन्तु फिर भी न मैं ‘उससे’ एक क्षण को अलग होती हूँ न ‘वह’ मुझसे। मैं तो ‘उसमें’ ही ओत-प्रोत रहती हूँ और ‘वह’ मुझमें। मुझे ऐसा लगता है कि ‘वह’ (मालिक) एक ऐसा आकर्षण है जो प्रतिक्षण मुझे अपनी ओर खींचता रहता है। अम्मा 'आपको शुभाशीर्वाद कहती हैं । इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी।
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-265
शाहजहाँपुर
20/12/1952
प्रिय बेटी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारा आया-बड़ी खुशी हुई। जैसे तुम मेरे पत्र का इन्तज़ार करती हो, वैसे ही मैं तुम्हारे पत्र का इन्तज़ार करता हूँ। अर्थात् ईश्वर की कृपा से तुम्हारी हालत ऐसी हो गई है कि जैसे तुम ईश्वर से मिलने के लिये बेकरार हो, वैसे ईश्वर भी। अगर मैं लफ़्ज़ ईश्वर इस्तेमाल करता हूँ, तो जरा गलती रहती है, इसलिये कि उसने तुमको जहाँ तक उसकी पहुँच थी, पहुँचा दिया और आगे रास्ता बता दिया कि कि अब जाना जहाँ है। ‘उसका’ (ईश्वर) Realization (साक्षात्कार) तो हो गया, अब ‘भूमा’ का शुरू होता है, जिसको कि मैंने पिछले खत में लिखा है कि Reality (वास्तविकता) अब शुरू होती है। इसको समझाने के लिये ‘भूमा’ का अक्स समझ लो या अक्स-दर-अक्स समझ लो। जब Reality (वास्तविकता) ख़त्म हो जावे, तब उसकी हद में दाखिल होना कहा जा सकता है, सो घबराना नहीं चाहिये। यह कोई इतनी बड़ी बात नहीं है, जैसा कि कहने से लगती है। जिसने यह हालत दी है, वह वहाँ तक पहुँचाने में मदद करेगा। हमें अपने ‘लालाजी’ की जात पर हमेशा उम्मीद रखना चाहिये, वह जो चाहें कर सकते हैं और हमारे मिशन में सब उन्हीं की बरकत है और ‘उन्हीं’ की ताकत काम कर रही है। यह पढ़कर मुझे बड़ी खुशी हुई कि तुमने मान-अपमान बेकार सम्बन्धों से सम्बन्ध ही न रखा। मेरे पूछने पर जो लिखा है कि ‘अपने’ बजाय एक हल्की सी छाया दिखाई पड़ती है, ध्यान से देखने पर स्वरूप आपका ही पाती हूँ यह चीज बड़ी अच्छी है, मगर इससे अगले वाला Stage (दशा) जिसको कि मैं लिखूंगा नहीं, लय-अवस्था की अच्छी हालत होगी और मुमकिन है उसके बाद भी कोई Stage (दशा) हो। प्यास के बढ़ने का मतलब बस यही हो सकता है कि असल तत्व हमको अपनी तरफ घसीटना चाहता है और यह प्यास उस वक्त तक कायम रहनी चाहिये जब तक कि वह खुद बुझ न जाये। बाकी आगे जो कुछ तुमने लिखा है, वह लय-अवस्था व प्रेम की हालत है। इस हालत से कम पहुँचा हुआ कि जिस पर तुम हो वाक़ई Platform (मंच) पर सिखाने के लिये अगर कोई आता है तो उसकी गलती है और भाई गुरू का दर्जा यहाँ तक पहुँचा देना है, परन्तु लोगों को यहाँ पर पहुँच कर तृप्ति हो जाती है।

चन्द रोज बाद, यानी दो-चार रोज में मैं तुमको इसके अगले मुकाम पर खींच दूंगा। उसका नाम ‘I’ रख छोड़ा है। अभी Point ‘H’ (पॉइट-एच.) की दशा है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-266
लखीमपुर
22/12/1952
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी,सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ मिला-पढ़कर हर्ष हुआ। आशा है मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। अपने ‘मालिक’ की कृपा का किस प्रकार धन्यवाद दूं, समझ में नहीं आता। परन्तु मेरे पास है ही क्या, जो दूं। हाँ, जो भी, जैसी भी मैं हूँ, मर मिटूंगी, अपने ‘मालिक’ पर, इसमें सन्देह नहीं। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मुझे न ईश्वर से काम था, न भूमा से मतलब, मेरे लिये तो जो भी हैं, ‘आप’ हैं। ‘उसमें’ जितना गलती जाऊंगी वही मेरी उन्नति है या जो भी हो, इससे आगे मेरी समझ ही नहीं रह गई। ‘आपनें’ लिखा है, हमें घबराना नहीं चाहिये, सो भाई, घबराने के लिये ‘मालिक’ ने मुझे नहीं पैदा किया है। ‘उसकी’ परम कृपा से ‘आपकी’ इस सदैव की चरण-सेविका में यह बात तो न कभी आई है, न आ सकती है। फिर, ‘श्री बाबूजी’ किसी भी चीज़ के लिये कुछ ठौर तो चाहिये, वह कहाँ से आवेगी और मैं देखती हूँ कि मेरे पास से तो ठौर तक छिन गई है। तिनके तक के लिये भी, खुद मेरे ही लिये तक ठौर का पता नहीं रह गया है। अब तो यह हाल है कि सिवाय ‘मालिक’ के मुझे तो ठौर तक कहीं महसूस नहीं होती। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो अब यह दशा है कि “सखि रस बरसे, मैं भीजूं।“ और ऐसा है कि वह अहर्निश बरसता ही रहता है, और कहाँ ? अन्तस्तल में सदैव, एक सा ही अविरल तथा अविचल रूप से। अब तो उल्टी ही दशा है, कि पहले प्यास मेरी थी, परन्तु अब ‘उसकी’ प्यास में मैं डूबी रहती हूँ। प्यास पर से भी मेरा दावा उठ चुका है और जब तक अपनी थी, तब तक कभी कुछ घटने की सम्भावना शायद हो सकती हो, परन्तु अब नहीं, अब तो यह हाल है कि रस तो समान रूप में बढ़ता ही रहेगा। अब तो मेरे ‘श्री बाबूजी’ मैं देखती हूँ कि अब तक तो शरीर पर से, परन्तु अब तो अन्तस्तल (भीतर) पर से भी मेरा कब्ज़ा उठ चुका है। अब तो अपनी चीज़ को ‘वह’ चाहे जिस रस में डुबोये रखे या यों कह लीजिये कि पहले खुद मेरे अन्दर से रस पैदा होता था, परन्तु अब तो भाई, मेरा इतना काम है कि वह बरसता है और मैं उसमें भींजी रहती हूँ या भींजती हूँ।

पूज्य मास्टर साहब जी की तबियत ठीक हो गई।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ हम लोग अभी तो ता. 14 या 15 को आने का विचार कर रहे हैं, वैसे ‘ईश्वर’ मालिक है। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री–कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-267
लखीमपुर
24/12/1952
मेरे परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा एक पत्र पहुँचा होगा, परन्तु आज फिर जी चल आया। कोई खास बात नहीं है, फिर भी जो दशा आजकल है, सो लिख रही हूँ।

भाई मेरा तो अब यह हाल हो गया है कि मैं देखती हूँ कि न मैं बाह्य-मुखी हूँ और न अन्तर्मुखी ही हूँ। मैं तो अब कोई मुखी नहीं रह गई हूँ। हाँ, यह अवश्य है कि जैसी हूँ, ठीक हूँ। अब तो यह हाल है कि खुद ‘मालिक’ मेरा मुखी (मेरी ओर मुंहवाला) हो चुका है और यही कारण है कि ‘उसके’ आकर्षण से बरबस ही मैं न जाने कहाँ निशिवासर खिंचती ही चली जाती हूँ। अब तो वह दशा भी नहीं है, जो शायद अगले पत्र में मैंने लिखा था कि “अपने बजाय एक परछाई सी दीखती है और गौर से देखने पर स्वरूप ‘आपका’ पाती हूँ।” अब तो ऐसा महसूस होता है कि इस दशा का भी बाँध या बन्द टूट चुका है, सो अब जैसी हूँ, भाई, ‘आपके’ सामने हूँ। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ अब तो यह दशा है कि ‘वह’ मुझे अपनी ओर खींचता है और ‘उसकी’ कृपा से यहाँ भी कोई रुकावट नहीं है, परन्तु फिर भी मेरे ‘मालिक’ तृष्णा बुरी बलाय है, जो मुझे घेरे रहती है। अब तो कुछ यह दशा है कि “रैन न सोऊं, दिन नहीं जागूं, नेक नहीं अलसाऊं। शान्ति-अशान्ति न मन में राखूं, क्यों पिऊ ठौर गवाँऊ।“ मेरा तो भाई, यह हाल हो गया है, मन के सम्बन्ध में कि ‘मालिक’ की कृपा से विजय की कामना न रही तो पराजय की सम्भावना भी समाप्त हो गई। शेष सब ‘आप’ जानें।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मुझे बहुत प्रसन्नता है कि अबकी से केले खूब मौके से पके हैं। शरीफ़े भी पके हैं, परन्तु अब निझर जाने के कारण छोटे-छोटे हैं, परन्तु ‘आप’ इन चीजों के भूखे नहीं, ‘आप’ कुछ और ही चाहते हैं। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। अम्मा कहती हैं कि हमारी याद रखियेगा और कहती हैं कि सब काम ‘आपने’ बनाये और बना रहे हैं, एक काम और बना दें तो, यह थोड़ी सी चिन्तायें भी छूट जायें। क्रासवर्ड भर के भेजा है, 7 जनवरी उसके पहुँचने की आखिरी तारीख है, अब इतनी प्रार्थना और मंजूर हो जावे कि इस रूपये की तकलीफ़ से किसी तरह पीछा छूट जाये । इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन, विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-268
शाहजहाँपुर
1/1/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे सब खत मिल गये। ता. 24 दिसम्बर का जो खत है, उसका जवाब यह है कि हम जब शुरू करते हैं तो हमारी निगाह ‘मालिक’ पर रहती है और अपना रिश्ता फिर बन्दे का हो जाता है। अब जो बन्दगी की डोर ‘मालिक’ तक हमने इस हद तक पहुँचा दी है, तो उसको खबर होने लगी कि कोई ‘उसकी’ याद कर रहा है, गोया अब वह तुमसे मुख़ातिब होने लगा और जब वह मुखातिब होने लगा तो उसके पास जो कुछ भी है, हम तक पहुँचने लगा। ‘उसके’ पास क्या था? बेपरवाही खास तौर पर और वह असल चीज़ जिसकी वजह से ‘वह’ मालिक बना है, गोया वही चीज़ अब तुममें भी उतरने लगी, अर्थात् तुम्हारी भी हैसियत कुछ न कुछ वैसी ही बनने लगी, गोया थोड़ी बहुत निस्बत तुममें भी आने लगी या यूं कहो कि 'उसकी झलक बहुत कुछ अब तुममें भी पैदा हो गई। अब चूंकि तुमने बन्दा होने का रिश्ता लेकर ‘उसकी’ याद की है, इसलिये तुम्हारी चीज़ भी अब उस तक पहुँचने लगी और जब तुम्हारी चीज़ ‘उस’ तक पहुँची तो क्या पहुँची? वही बन्दगी और भक्ति का ख़्याल और यह चीज़ पहुँचती ही रही; यहाँ तक कि तुम अपने आपको भूलने लगी। जब यह हाल हो गया तो वह चीज़ जो ‘उस’ तक पहुँच चुकी थी और वह बन्दगी और भक्ति का ख़्याल था, इसलिए तुम्हें यह मालूम होने लगा कि ‘वह’ खुद अब तुम्हारे ख़्याल में है। इसी तरह से बहुत सी दशायें यही समझ में आती हैं, मसलन अन्तरमुखी वगैरह। वह सब ‘उसी’ की तरफ से मालूम होती हैं। इस तरह भक्ति का एक नया अंक खुल जाता है।

31 दिसम्बर सन् 52 को मैंने तुमको ‘J’ स्थान पर खींच दिया है। ईश्वर ने चाहा तो खत पहुँचते-पहुँचते सैर भी शुरू हो जावेगी। मैं जल्दी करना चाहता हूँ, मगर यह भी चाहता हूँ कि सैर का एहसास भी तुमको होता चले।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-269
लखीमपुर
2/1/1953
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है आपकी तबियत अब ठीक होगी। कल तो न जाने क्यों ‘उससे’ मिलने की बेचैनी अधिक बढ़ गई थी। अब तो यह हाल है कि ‘मालिक’ के रोम-रोम में, रग-रग में अपना पता या ठिकाना पाती हूँ। पहले जब याद आती थी तो एक दम कलेजा थाम लेने से कुछ आराम हो जाता था, परन्तु अब तो शायद याद कलेजे को चीर कर उसे भी पार कर गई है, क्योंकि अब कलेजा थामने से भी कुछ नहीं होता। वह तो भीतर ही भीतर न जाने क्या होता रहता है, परन्तु अब उफान नहीं आने पाता, इसलिये जो कुछ भीतर होता है, उससे जी नहीं घबड़ाता, बल्कि वह मेरा आगे बढ़ने का सहारा हो गया है। मेरे बाबूजी अब तो न यह महसूस होता है कि ‘वह’ मुझमें है और पता नहीं मैं ‘उसमें’ हूँ या नहीं। न मालूम ‘वह’ मुझमें है और न मालूम मैं ‘उसमें’ हूँ। अब तो न जाने क्यों मुझे 'उसकी याद नहीं आती है, परन्तु जिस हालत में हूँ, खुश हूँ।

मैं तो यह महसूस करती हूँ कि ‘मालिक’ में श्रद्धा, विश्वास तथा प्रेम के शुद्ध रूप की शुरुआत, सम्भव है अब शुरू हो गई हो और भाई यद्यपि मैं तो इन चीजों को कुछ नहीं जानती। मैं तो अब हर चीज़ से इतनी खाली हो गई हूँ कि मुझे अपने में कुछ महसूस नहीं होता सिवाय इसके कि जैसे दुनिया के और लोग साधारणतः रहते हैं। अंतर शायद इतना हो कि उनके हृदयों पर बोझ लदा रहता है और यहाँ तो अब किसी बोझ के लिये स्थान ही नहीं रहा। पता नहीं मैं क्या चाहती हूँ; मैं क्या करती हूँ मैं कहाँ रहती हूँ। अब यह ‘मालिक’ जाने।

अब तो मेरा यह हाल है कि दुनियाँदार लोगों के बीच अपने को दुनियाँदार पाती हूँ, सत्संगियों में अपने को सत्संगी पाती हूँ और अकेले में कुछ नहीं। तब न जाने मैं क्या रहती हूँ, शायद कोई नहीं। अम्मा आपको शुभाशीर्वाद कहती हैं।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री–कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-270
लखीमपुर
4/1/1953
मेरे परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र 'आपका' भाई पुत्ती बाबू द्वारा मिला तथा किताब भी मिली। पत्र पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। आज ताऊ जी भी तीन बजे आ गये, उनसे ‘आपके’ स्वास्थ्य एवं तमाम बातें सुनकर बड़ा हर्ष हुआ। एक Tonic (टॉनिक की) शीशी जो ‘आपने’ भेजी सो मिली और पुत्ती बाबू से चुकन्दर भी मिले। मैं तो इस कोशिश में हूँ कि बसंत में आने तक इतनी तन्दुरुस्त हो जाऊं कि ‘आप’ देखकर खुश हो जावें। पूज्य मास्टर साहब जी की तबियत खराब सुनकर कुछ फिक्र हो जाती है। भाई, शुक्ला जी की हालत पढ़कर तो वाकई बड़ी चिन्ता थी, किन्तु यह केवल ‘आपकी’ ही पकड़ का नतीजा हुआ कि ‘आपने’ कोई न कोई उपाय निकाल ही लिया। यदि उन्हें भी इतनी फिक्र अपनी ही होती तो यह हाल ही न होने पाता, खैर।

अब तो मेरे ‘श्री बाबूजी’ मुझे लगता है, सैर की चाल में कुछ तेज़ी तो आई है, परन्तु बागडोर खिंची हुई है, परन्तु यह भी जहाँ तक मेरा ख़्याल है, यदि यह बागडोर न हो तो अभ्यासी को थकान बहुत जल्दी आवे। मुझे तो यही अच्छा लगता है कि “गले राम की जेंवरी, जित खींचे तित जाऊं"। मेरी दशा तो ऐसी है कि जैसे बुझते दीपक में कभी-कभी ज्योति जाग उठती है। उसी प्रकार याद अथवा प्रेम के लिये दूसरे में प्रेम देखकर लौ कुछ जाग उठती है, किन्तु तेल समाप्त दीपक कब तक चलेगा। तबियत का तो यह हाल है कि न जाने क्यों उसे एक अथवा एक्य का भी होश नहीं, और हो भी कैसे, जब कि मेरी दशा के लिये तो वह भी अर्थहीन ही प्रतीत होता है। अब तो जहाँ जाती हूँ, सब उजाड़ स्थान है, बीहड़ मैदान है, किन्तु बेहोश ऐसी हूँ कि कदम कहीं पड़ते हैं या नहीं, उठते हैं या नहीं, कुछ पता नहीं और न जाने क्या बात है। मैं बेहोश यह मुझे खबर नहीं, इसलिये पता तो यही लगता है कि बेहोशी होती तो ज़रूर पता लगता, अब ‘मालिक’ ही जाने। यों कह लीजिये कि एक लावारिस मुर्दा पड़ा है, उजाड़ निर्जन मैदान में । तबियत जब घूमती है (या लौटती है) तो यही पाती हूँ। यही नहीं बल्कि अब तो हर चीज़, जड़-चेतन सब मेरे लिये कारण-रहित मुर्दा ही हैं। जब Cause (कारण) ही नहीं है तो सब अर्थहीन, बेमतलब हैं। मेरे ‘श्री बाबूजी’ यही हाल याद का है कि इसका (यानी याद का) नाम मुझे अब नहीं आता, क्योंकि हाल तो यह है कि मुर्दे (मेरे लिये) के लिये किसी का कुछ अर्थ नहीं, बेमतलब है। जैसे पहले मैंने लिखा था कि कोई ‘मालिक’ का नाम ले देता है तो कलेजा पकड़ कर रह जाती हूँ, परन्तु अब कुछ नहीं। अब तो यह हाल है कि लाश पर चाहे ढेले फेंको या फूल चढ़ाओ, मेरे लिये किसी का कुछ अर्थ नहीं। स्वयं मेरा ही न कुछ अर्थ है, न मतलब। न जाने क्या है, बस केवल चारों ओर उजाड़ खण्ड है, सूना बसेरा है।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ आपने मुझे मज़मून लिखने के लिये पूछा है, किन्तु मैं क्या बताऊं, मुझे तो कुछ ज्ञान ही नहीं। मुझे तो जब जितना ‘आप’ बता देते हैं, उतना ही मैं जान पाती हूँ, बस और भला मैं क्या जानूं, इस लिये क्षमा कीजियेगा। ‘श्री बाबूजी’ आप तो जो कुछ भी लिखेंगे वह संसार के कल्याणार्थ ही होगा।

सच तो यह है ‘श्री बाबूजी’ कि अर्थ, मतलब रहित दशा है, इसलिये मुर्दा कह लिया, वरन न जाने क्या है, ‘मालिक’ ही जानें।

अम्मा आपको आशीर्वाद तथा मास्टर साहब जी को भी शुभाशीष कहती हैं तथा बिट्टो, छोटे भइया व लल्लू ‘आप’ तथा मास्टर साहब जी को नमस्ते कहते हैं। मास्टर साहब से मेरा भी नमस्ते कहियेगा। इतिः-

आपकी सदैव केवल आपकी ही कृपा-आकांक्षिणी सेविका
पुत्री–कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-271
लखीमपुर
7/1/1953
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ जो ताऊ जी के हाथ भेजा, सो मिल गया - पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘आपकी’ कृपा के लिये तो ‘आपके’ चौबे जी को देख कर अम्मा कहती हैं, अनेकानेक धन्यवाद है। अपनों के हित के लिये खास तौर पर, वैसे तो सबके ही समान रूप से ‘आप’, न जाने किन-किन नवीन उपायों का निर्माण करते रहते हैं। मेरा पत्र पहुँच गया होगा। मैं केसर, ताऊजी के साथ ता. 14 की रात में पहुँचेंगे तथा अम्मा व और लोग ता. 17 को आयेंगे। अब तो बस थोड़े से दिन रह गये हैं, जब आपके पास पहुंचूंगी।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मैं कुछ यह देखती हूँ कि मेरी समझ ने ‘मालिक’ से समझौता कर लिया है, इसलिए जो भी बात ‘आप’ लिखते व कहते हैं, वह मुझे बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है। ज्ञान वाली पुस्तक के लिये जो अभी कुछ और ‘आपने’ लिख कर भेजा है वह बहुत ही अच्छा है। अद्वितीय है। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा फूलों जिन्जी, केसर, 'विट्टो 'आपको' प्रणाम कहती हैं। इति:-

आपकी दीन-हीन रार्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-272
लखीमपुर
24/1/1953
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है आप विवाह से कल तक लौट आयेंगे, इसीलिए आज पत्र लिख रही हूँ। बड़े भइया का बुखार आज 99° दिन भर रहा है, गले में दर्द भी नहीं है। दो-तीन दिन में ‘ईश्वर’ की कृपा से बिल्कुल ठीक हो जायेंगे, कोई फिक्र की बात नहीं है। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरा तो यह हाल है कि हृदय इतना अधिक खाली पड़ा है मानों वह स्वयं एक चटियल मैदान हो गया है, बस जी तड़पता है कि इस बिल्कुल शून्य हृदय में ‘मालिक’ किसी तरह से समा जाये। कुछ ऐसी दशा है कि अब तक की सारी दशा मुझमें पच चुकी है, सब लय हो चुकी हैं। इसीलिए अन्तर अपने ‘मालिक’ में समा जाने के लिये बिल्कुल शून्य हो गया महसूस होता है। इतनी हल्की हो गई हूँ कि लगता है कि ‘मालिक’ में तेजी से घुसती ही चली जा रही हूँ। ‘मालिक’ मेरे अंतर में समाता ही चला जा रहा है। भाई, ‘मालिक’ ने कृपा करके अब तक की दशा के बोझ या एहसास तक से भी मुझे स्वतंत्रता दे दी है। अब तो पूज्य मेरे ‘श्री बाबूजी’ ऐसा महसूस होता है कि मेरे ‘मालिक’ की अलौकिक कृपा से अलख भी लखने लगा है। कुछ ऐसा लगता है कि भीतर की दशा एक समान ही रहती है, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से न जाने कैसे आने वाली दशा महसूस भी होती रहती है वरना तबियत एक समान ही रहती है। न झुकाव महसूस होता है, न पहले की तरह उठान, परन्तु यह जरूर है कि ‘उसके’ लिये दिल के भीतरी कोने में जलन सुलगती रहती है।

अब तो मेरे ‘मालिक’ कुछ यह हाल हो गया है कि न अंधेरा है, न उजेला। अंधेरा यदि कहा जाये तो ऐसे कहा जा सकता है कि जैसे यदि आँख मूंद लें तो जो कुछ प्रतीत या महसूस हो, बस वैसी कुछ अब मेरी दशा रहती है। कुछ ऐसा लगता है कि मेरा अंतर हर समय किसी दशा में लीन रहता है। मेरी तो ऐसी दशा रहती है, जैसे कोई मन को बेच कर खुद हैरान व जलन की दशा में रहने लगे और ‘आपके’ पास से आकर तो यह चीज़ अधिक बढ़ जाती है, बहुत-बहुत धन्यवाद इसके लिये ‘आपको’ है। बस मेरे ‘श्री बाबूजी’ आपकी रोज़ाना बढ़ती हुई कृपा का आशीर्वाद-मय हाथ मेरे सिर पर रहे, मेरी सदैव यही प्रार्थना है। मेरा कुछ यह हाल है कि ऐसा लगता है कि मेरा दिल उथला होता चला जा रहा है, यहाँ तक कि कोई चीज़, कोई बात छिपती नहीं, बाहर ही छलक पड़ती है। न जाने क्यों अब पहले की तरह मुझे यह पता या महसूस नहीं होता कि ‘मालिक’ से बिल्कुल मिली हुई हूँ, परन्तु फिर भी भाई मुझे महसूस हो या न हो, इतना तो मैं ज़रूर कहूँगी कि यदि रग-रग को कोई चीर कर देखे तो केवल ‘उसका’ ही जलवा दिखलाई देगा या यों कह लीजिये कि ‘मालिक’ ने इस दशा के एहसास के बोझ से मुझे मुक्त कर दिया है। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीष कहती हैं, फूलो जिज्जी आपको प्रणाम कहती हैं। इतिः-

सदैव आपकी ही, चरण सेविका
कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-273
लखीमपुर
27/1/1953
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। आशा है अब सब लोग विवाह से लौट आये होंगे। फूलो जिज्जी कल गई। अबकी से उत्सव में जाने से तथा यहाँ एक दिन प्रार्थना में बहुत तेज Hallow (हैलो) सहित ‘आपका’ दर्शन करके वह दंग रह गई और ‘आपको’ पत्र भी डालने को कह गई हैं और बराबर खुद इस पूजा में लगे रहने को कह गई है। अब ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी और कृपा होगी। बड़े भइया का बुखार उतर गया है, परन्तु कमज़ोर ‘काफ़ी’ हो गये हैं, कुछ खाँसी भी है, ईश्वर की कृपा से दो-चार दिन में धीरे-धीरे ठीक हो जायेंगे। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई अब तो ऐसा लगता है कि Heart (हृदय) का सब बन्धन टूट गया है। अपने ‘मालिक’ के समा जाने के लिये पूरी तौर से खुल गया है। ऐसा लगता है कि मेरा ‘मालिक’ पूरी तौर से खुले दिल में और सफाचट मैदान की तरह हुए इस दिल में समाया जाता है। मेरा तो अब यह हाल है कि ऐसा लगता है कि अपने ‘मालिक’ के दिल में ही खेलती रहती हूँ और वहीं ‘उसी’ का जलवा देखती तथा उन्हीं से पलती हुई ‘उसी’ में समा सी गई हूँ। भाई ऐसा लगता है कि चाहे भक्ति, प्रेम अथवा Surrender (समर्पण) को मैं जानूं या न जानूं, समझूँ या न समझूँ, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से यह ज़रूर है कि मैं इनमें पूरी तौर से समा चुकी हूँ। नहीं नहीं, यह खुद मुझ में पूरी तौर से समूचे के समूचे समा गये हैं, और अब तो यह दशा हो गई है कि सच तो यह है कि इनके होने और न होने का भी होश ‘मालिक’ ने खुद अपने जिम्मे ले लिया है और अब तो मैं यही कहती हूँ और सच कहती हूँ कि मैं अब इन चीजों पर नहीं बल्कि अपने ‘सर्वस्व’ पर मरती हूँ। मेरे ‘श्री बाबूजी’ अक्सर मुझे ऐसा हो जाता है कि जब मुझे ‘आपकी’ वह बात याद आती है, जो, ‘आपने’ एक बार मुझे लिखी थी कि – “बिटिया हम तो प्रेम और भक्ति से चलते हैं।“ तो कभी अपने पर अब गौर करती हूँ तो न जाने क्यों यह कुछ मुझे ऐसे दिखलाई नहीं पड़ते, बल्कि कभी-कभी ऐसा महसूस करती हूँ कि जैसे यह पानी की तरह पिघल कर कुछ ऐसे ही खुद मेरा एक-एक अंग बन चुके हैं या भिद चुके हैं, फिर भला अब मैं इन्हें कहाँ ढूँढू, कहाँ पाऊं और क्यों ढूँढू यह भी कुछ समझ में नहीं आता, परन्तु मैं चाहती ज़रूर हूँ। भाई, मैंने तो जो कुछ देखा, जो कुछ पाया, अपने ‘मालिक’ के हृदय में, केवल ‘उसी’ की स्नेहसिक्त गोद में। मुझे तो कुछ ऐसा लगता है, मेरे परम स्नेही ‘श्री बाबूजी’ कि इन सबकी उत्पत्ति अथवा प्रलय तक सब ‘मालिक’ ही में है। यहाँ तक कि यदि मैं यह कहूँ कि मैं खुद ही ‘उसी’ मय बन गई हूँ, तो शायद गलत न होगा, परन्तु फिर भी मैं यह देखती हूँ कि अभी मुझे बहुत कुछ उसमें मिलना है, समा जाना है, और ‘मालिक’ की कृपा से मैं इसमें सफल हूँगी और अवश्य सफल हूँगी और ‘मालिक’ से भी मेरी यही मुराद है कि मैं ‘उसे’ पूरी तौर से अपने में समेट लूं, अपने में रख लूं और मैं मर मिटूं। मुझे तो जो चाहिये सब केवल वहीं से, ‘उसी’ से मिलता है और केवल वहीं से मिल सकता है क्योंकि मुझे ऐसा लगता है, सब की हद पार करके मैं ‘उसी’ की हद में जा मिली हूँ, ‘उसी’ की हद में पहुँच चुकी हूँ। अब तो भाई मेरे heart (हृदय) का कुछ यह हाल हो गया है कि खुलकर, फैलकर कुछ ऐसा एक सा हो गया है कि मैं जुदा नहीं कह सकती। यह देखते बनता है, कहते नहीं; इसे केवल ‘मालिक’ ही जान सकता है। यह हृदय इतना उथला हो गया है कि गहराई लफ़्ज़ का गम नहीं रह गया। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ अब तो न जाने क्यों यह हाल है कि अपने बजाय अब एक सफाचट मैदान महसूस होता है, जिसमें प्रेम, भक्ति वगैरह कुछ नहीं, कोई चीज़ नहीं है। कभी-कभी यह महसूस होता है कि सब कुछ ‘मालिक’ की सेविका से ही उत्पन्न होता है और प्रलय होता है। अब ‘आप’ ही जानें। मुझे तो ‘मालिक’ से काम है। शेष ‘आप’ जानें, ‘आपकी’ मर्जी। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ अक्सर प्यास इतनी बढ़ जाती है कि, तब तो ऐसा लगता है कि जो कुछ मिले गट कर जाऊं, इसलिये कभी तो ऐसा लगता है कि मैदान, सफाचट मैदान को भी अपने में गट होता महसूस करती हूँ सिन्धु के सदृश। जब थकान अनुभव करती हूँ तो प्यास भी कुछ मन्द पड़ जाती है, परन्तु उसके हटते ही फिर प्यासी की प्यासी। और आजकल तो हृदय में न जाने क्या होता है कि रोने को हर समय तबियत चाहती है, चिल्ला पड़ने को जी चाहता है। अब आप ही जानें।

अम्मा 'आपको' शुभाशीर्वाद कहती हैं। इतिः-

सदैव ‘आपकी’ ही स्नेहसिका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-274
लखीमपुर
30/1/1953
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कल हरी दद्दा आ गये उनसे ‘आपके’ समाचार जानकर प्रसन्नता हुई। ‘आपने’ 5 रुपये Welcome (स्वागत) के भेजे सो भी मिल गये। ‘आपका’ गुरू-सन्देश का पैम्फलेट भी मिला उसमें थोड़ी सी त्रुटियां छपने में हो गई है, सो ठीक होकर हमारे ही लिये नहीं वरन् संसार के लिये एक अमूल्य वस्तु हो गई है। पढ़ने में और समझने दोनों में सरल, यह चीज भी बहुत अच्छी हो गई है।

परम स्नेही ‘श्री बाबूजी’ ‘आपने’ लिखा है कि ‘फकीर’ की चीज को वापिस नहीं करना चाहिये क्योंकि वह केवल चीज ही नहीं, उसमें और भी कुछ मिला होता है, सो मेरे ‘बाबूजी’ जो और कुछ उसमें मिला था सो मैंने ले लिया है। 'फ़कीर' की चीज़ (यानी बरकत) तो मेरे सिर माथे पर है और वह तो सदैव मेरे साथ है ही, क्योंकि मेरी आत्मिक उन्नति का, केवल एक ‘उसी’ की बरकत, ‘उसी’ की मुझ पर भी अकारण कृपा ही कारण है। सो मेरे ‘मालिक’ मैंने आपकी चीज तो सिर माथे ले ली है। अम्मा कहती हैं कि मोती ऐसे ही रखे हुए थे, बहुत दिनों के, सो बनाकर आपको भी दे दिए तो क्या है मेरे लिये तो ‘आप’ मेरे ही हैं, किसी दूसरे को बनाकर देती तो और बात थी, घर में चीज़ रुपये से नहीं दी जाती है, वह तो केवल प्रेम से दी जाती है। प्रेम ही देता है और प्रेम ही उसे स्वीकार कर लेता है। फिर रुपये की गुंजाइश कहाँ हो सकती है।

मेरे पत्र मिल गये होंगे। धीरे-धीरे जैसा आपने बताया है, वैसे लिखना शुरू करूँगी। अम्मा कहती हैं कि फिर इसमें लड़कियों का रुपया कुछ खर्च नहीं हुआ है, वह तो मेरा है, तो मेरा भी तो कुछ हक़ है। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरा तो अब यह हाल हो गया है, कि जैसे पहले मैंने लिखा था कि “अब तो अलख भी लखने लगा है” परन्तु अब तो ‘मालिक’ की कृपा से यह हाल हो गया है कि खुद मैं भी अलख ही हो गई हूँ, कुछ ऐसा ही महसूस होता है। अलख ही मेरी रहनी हो गई है। अब तो ऐसा लगता है कि जो मैंने लिखा था कि “अपने बजाय अब सफाचट मैदान महसूस होता है, परन्तु न जाने क्यों अब तो ऐसा लगता है कि सफाचट मैदान भी सफ़ा हो गया है। अब वह भी कहीं नहीं है, वह तो ऐसा लगता है कि कब का मुझमें समा चुका है। न जाने कुछ ऐसा हो गया है कि वह भी मेरी तरह से अलख में अदृश्य हो चूका है. बिला चुका है।“

मेरे ‘श्री बाबूजी’, अब तो न जाने क्यों कुछ ऐसी पीर, ऐसी टीसन अन्तर में है, जिसके लिये ऊपरी इलाज भी सब बेकार होते हैं। न उसका इलाज अब मुहब्बत ही कर है पाती है न कुछ। वह तो ऐसी प्यास है जिसके लिये पानी बेकार साबित होता है। अब तो भाई कुछ ऐसा हो गया है कि उस अलख में ही मेरा पसारा हो गया महसूस होता है या कुछ ऐसा लगता है कि अलख में समाकर अदृश्य हो गई हूँ।

ता. 2.2.53

मेरे परम स्नेही ‘श्री बाबूजी’ कुछ थोड़ा सा हाल आज और समझ में आया है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई, कुछ ऐसा लगता है कि सूक्ष्म शरीर भी पिघल कर सफाचट मैदान की तरह होकर न जाने क्या हो गया है। शायद रह ही नहीं गया, बिला गया है और उसका जर्रा-जर्रा पिघल कर ‘मालिक’ उनमें बस चुका है, रम चुका है। मेरी निगाह का तो यह हाल है कि वह तो अलख को भी भेद कर अब उसके भी परे देखने का प्रयत्न करने लगी है।

सदैव आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-275
शाहजहाँपुर
4/2/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे पत्र 27 जनवरी सन् 53 व 30 जनवरी और दूसरी फरवरी के मौसूल हुए। जब तुम उत्सव में आई थीं, तो मैंने 18 जनवरी की सुबह को ‘K’ स्थान पर खींच दिया था, यह सब हालत उसी मुकाम की हैं। तुमने जो कुछ हाल लिखा है, यह सब लय-अवस्था की उन्नति बता रहे हैं। मुझे खुशी है कि तुम्हें आगे बढ़ने की फिक्र रहती है और इस सब उन्नति की तुम्हीं ज़िम्मेदार हो। कहने के लिये मेरी वजह से कहा जा सकता है यह वाक़ई तुम्हारी जाती काब्लियत है कि तुम्हारा पाँव आगे ही को जाता है और हिम्मत बढ़ती जाती है। अगर मेरी काब्लियत होती तो अब तक सब भाई लोग तरक्की के ऊंचे शिखर पर पहुँच चुके होते। मैं थोड़ी सी एड़ ज़रूर आगे पहुँचाने में लगा देता हूँ। अगर इसको मेरी काल्लियत कहा जाये, तो ठीक नहीं होगा, इसलिये कि तुम्हारी काब्लियत मुझे आगे ले जाने के लिये मजबूर कर देती है। अगर तुम यह कहो कि यह भी आपकी काब्लियत है कि आप ऊपर पहुँचा तो देते हैं, तो यह भी ठीक इसलिये नहीं हो सकता कि मैं तो अपना रहा ही नहीं अब तो जो है, वह, तुमको आगे बढ़ाता है।

तुमने यह अक्सर लिखा है कि “शरीर पिघल-पिघल कर बहता है”। एक बात लिखता हूँ, जो मुमकिन है, इसके जवाब को भी काफ़ी हो। वह यह है कि जब हम तबियत से और प्रेम से अभ्यास करते हैं तो पिछले विचारों का जो असर है, वह सब दूर होता जाता है और परमाणु भी पुराने गिरते जाते है और अच्छे परमाणु उसकी जगह पर बनते जाते हैं। परमाणु तो वैसे हर देहधारी के उसके विचार के अनुसार तबदील होते रहते हैं और जो ईश्वर की तरफ प्रेम-पूर्वक बढ़ता है, उसके उसी तरीके में परमाणु बनते हैं।

असल प्रेम वही है कि प्रेम करते-करते प्रेम की खबर न रहे। जब यह हालत पैदा हो जाती है तो फिर असल में भिदाव शुरू हो जाता है और तबियत नम्र बनती चली जाती है। इसी हालत में या इससे और आगे बढ़कर भक्तों ने कहा है किः-

“बिना भक्ति तारो, तब तारिबो तिहारो है।“

तुमने एक जगह यह भी लिखा है कि “सब कुछ ‘मालिक’ की सेविका से उत्पन्न होता है और प्रलय होता है।“ इसके मानी यह हैं कि तुम्हारा क़दम ऐसे मैदान में है, जहाँ से यह चीजें शुरू होती हैं। मैंने किसी समय लिखा था कि तुम्हारी हालत हिरण्य गर्भ की है या यह लिखा है कि आने वाली है, ठीक याद नहीं। अब अन्दाज़ यह होता है कि वह हालत शुरू हो गई, मगर अभी पूरी तौर पर मालूम नहीं होती या यूं कहना चाहिये कि एक क़दम ज़रूर हिरण्य गर्भ की हालत में है। या तो यह हो सकता है कि मैं इस हालत में तुमको लय कर दूं, या यह कि ‘K’ से आगे ‘L’ मुकाम पर ले लूं, यह तुम्हारी हालत गौर से देखने के बाद तय करना है। इन दोनों बातों को अभी सोचा नहीं है। मुमकिन है कि मैं Point ‘L’ (पाईट-एल) ही लूं। वह कब? जब मौजूदा मुकाम की मैं सैर ख़त्म देखूं। सैर मैं जल्दी-जल्दी ज़रूर करा रहा हूँ।

गुरु-सन्देश को सही करते वक्त यह ख़्याल ज़रूर रखना कि कोई गलती न रह जावे। मेरा काम जल्दी की वजह से खराब होता है और तबियत से ‘जल्दी’ नहीं जाती। सही होने के बाद एक कॉपी श्यामपती जी को भिजवा देना। अम्मा को प्रणाम।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-276
लखीमपुर
8/2/1953
मेरे परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा पत्र ‘आपका’ कल पूज्य मास्टर साहब जी द्वारा प्राप्त हुआ - पढ़कर प्रसन्नता हुई। बड़े भइया को कल बुख़ार बहुत हो गया था, इसीलिए उनकी तबियत व परेशानी अधिक बढ़ी हुई थी। बाईं ओर छाती, पीठ पर फफोले भी 4-5 दिन से बहुत निकले हुए हैं, खैर आज ईश्वर की कृपा से परेशानी बिल्कुल नहीं है, तथा बुख़ार 99 आ गया है, इसीलिये ठीक हैं, कोई फिक्र की बात नहीं है। मास्टर साहब जी का पत्र सुनकर तबियत कुछ परेशान सी हो गई। वाकई में ऐसा ‘मालिक’ पाकर हम लोग ऐसी मौज में निर्द्धन्द सो गये हैं कि जागने का नाम नहीं लेते। कहने को तो सब कह लेते हैं कि “बाबूजी सब सुधार लेंगे” परन्तु यदि इस कथनी को ही हम अपनी करनी और रहनी में सचमुच डाल सके होते, तो फिर क्या था। बात वास्तव में ऐसी है, जैसी कि ‘आपने’ लिखा है कि हम सत्संगी लोग तो ‘आपको’ पूरी तौर से Co-operate (सहयोग) तक नहीं कर पाते।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ आपने लिखा है कि “सब उन्नति की तुम्हीं ज़िम्मेदार हो।“ भाई होगा यह, परन्तु इतना मैं अवश्य कहूँगी कि जितनी ‘आपकी’ मोहब्बत मेरी ओर है, यदि मैं उतनी भी कर पाती तो क्या बात थी। ‘आप’ जो भी कहें, ठीक है, परन्तु मैं इतना अवश्य कहूँगी कि यह सब केवल ‘मालिक’ की मोहब्बत और ‘उसका’ ही इतना अधिक आकर्षण है, जो मुझे बरबस अपनी ओर खींचे लिये जा रहा है। अब ‘आप’ ही जानिये कि किसकी काब्लियत है। वास्तव में ‘आप’ ऐसा लिख कर मुझे शिक्षा प्रदान किया करते हैं। कितने मोती के दाने पिरोये हुए हैं, इस वाक्य में कि “मैं तो अपना रहा ही नहीं, अब तो जो है, वह तुमको आगे बढ़ाता है।“ क्या ‘मालिक’ की कृपा से कभी इस उपदेश को मैं पूरी तौर से अपने में प्राप्त कर सकूंगी। जो भी हो, मैं तो बस ‘उसके’ लिये अपने को हार चुकी हूँ, अब जो ‘उसकी’ मर्ज़ी हो करे। मुझे तो ‘उसी’ की चाह और ‘उसी’ से काम है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ मेरा तो हृदय यही कहता है कि 'जिन्होंने' संसार को ऐसा ‘अनमोल रत्न’ प्रदान किया है, वे (यानी हमारे श्री लालाजी महाराज) अवश्य ही लोगों को ऐसी दृष्टि भी प्रदान करेंगे, जिससे हम ‘उसे’ ठीक तौर पर देख सकें और मुहब्बत कर सकें। और अब एक दिन आयेगा, और अवश्य आयेगा, जब लोगों की धुल पड़ी हुई दृष्टि शुद्ध होगी और तब ये देख सकेंगे, दूर नहीं हैं वे दिन।

‘गुरु-सन्देश’ को सही करने में तो जहाँ तक हो सका, मैंने एक-एक बिन्दु तक रखने में कसर नहीं रखी है। कृपया ‘आप’ जल्दी को तबियत से निकालने की कोशिश न करें। ‘आपकी’ यह जल्दी संसार को न जाने क्या-क्या बख्श देगी और मानव को न जाने क्या से क्या बना देगी। कल एक कॉपी या परसों श्यामपति जी के पास अवश्य भिजवा दूंगी। ‘आपने’ पहले यह लिखा था कि “यह ब्रह्म गति की दशा है, इसके बाद हिरण्य गर्भ की दशा है”। अब ‘मालिक’ की कृपा से मेरी जो कुछ भी आत्मिक -दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरा तो अब यह हाल है कि मेरी दृष्टि तो अलख को भी भेद कर उसके भी परे देखने का प्रयत्न करती है। अब तो दशा पानी की सतह के ही सदृश रहती है और कुछ यह है कि यदि तेजी किसी भी समय हो जावे तो उस दशा में भद्दापन आ जावे और बर्दाश्त के बाहर हो जावे, परन्तु जो केवल ‘मालिक’ के लिये ही है, उसको फिर किसी से क्या मतलब और क्यों हो, मैं ‘मालिक’ की कृपा से बस यही सीखने की कोशिश करूँगी, शेष ‘आप’ जानें। परन्तु आध्यात्मिक विषयों को तेजी से मतलब नहीं। अब तो मेरे ‘बाबूजी’ ‘आपकी’ मेहरबानी से सींक की ओट पहाड़ दिखलाई पड़ती है। न जाने क्यों अब अंतर में कुछ ऐसे आनन्द का अनुभव करती हूँ जिसमें आनन्द के Weight (वज़न) का लेशमात्र भी लगाव नहीं है, क्योंकि शायद वह स्वतः (कुदरतन या अपने आप) ही अन्तर में है, इसलिये ऐसा हो।

अब कुछ यह हो गया है कि यह नहीं कि अपने बजाय ‘मालिक’ दीखता है, बल्कि जब एहसास करती हूँ तो ‘मालिक’ ही दीखता है, केवल ‘वही’ एहसास में रह गया है। मेरे परम स्नेही बाबूजी, न जाने क्यों कुछ यह हो गया है कि जैसे पहले मैं लिखा करती थी कि हर काम हर चीज़ Automatically (स्वतः संचालित) होती रहती है, परन्तु वास्तव में मैं अब कुछ नहीं कह सकती। मुझे तो इसका क़तई एहसास तक न रहा। न जाने क्यों यह सब मेरी निगाह से ओझल हो चुका है। अब जो हो सो हो, ‘मालिक’ जाने। कुछ ऐसा है कि जैसे कोई चीज़ खो जावे फिर कुछ दिन बीतने पर उसका कुछ ख़्याल न रह जावे, ऐसा ही हाल मेरा हो गया है। भाई, या यों कह लीजिये कि पहले जैसे मैं लिखा करती थी कि ‘मालिक’ का ख़्याल ही मेरा घर हो गया है, यानी ‘मालिक’ का जब ख़्याल करती हूँ, तो उसमें अपने को मौजूद पाती हूँ, या यह कि मैं अब नहीं महसूस होती, बल्कि उसका एक ख़्याल अवश्य कहीं रहता है। सो अब ‘श्री बाबूजी’ इधर देख रही हूँ कि वह सब दशा तथा वह ख़्याल भी न जाने कैसे अकस्मात् गायब हो चुका। अब तो ‘मालिक’ ने कृपा करके उस ख्याल की भी बन्दिश तोड़कर ऐसा महसूस होता है कि मुझे, मुझसे कतई बरी कर दिया है। सब कुछ गल गलाकर मामला ख़त्म हो गया। न जाने क्यों तबियत इतनी नम्र बन गई है कि कुछ कहना नहीं और इसी में तबियत भिदती चली जाती हुई मालूम पड़ती है। बिल्कुल शुद्धता ही शुद्धता सी कह लीजिये। अपने ‘मालिक’ के लिये कुछ ऐसा हो गया है कि वह ऐसा हल्का होकर नज़र में समा गया है जैसे नज़र में एक कुदरतन नक्शा सा खिंचा हुआ हो। अब तो यह हाल हो गया है कि पूजा करती हूँ परन्तु पूजा करने वाला कहीं दिखलाई नहीं पड़ता जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है। अम्मा आपको शुभाशीर्वाद कहती हैं।

सदैव केवल आपकी ही स्नेहासिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-277
लखीमपुर
14/2/1953
मेरे परम स्नेही श्री बाबूजी,, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। ‘आपके’ Post Card (पोस्ट कार्ड) से मालूम हुआ कि कृपा करके ‘आपने’ मुझे ‘L’ Point (एल- पाइंट) पर खींच दिया है, बहुत-बहुत धन्यवाद है, तथा पूज्य मास्टर साहब के लिए भी ‘मालिक’ को बहुत-बहुत हार्दिक धन्यवाद है। कल उनके यहाँ शुक्रिया का प्रसाद भी चढ़ाया गया था। परन्तु ‘श्री बाबूजी’ मुझे ‘आपने’ इतने Points ( पाइंट) पार करवाये, परन्तु मुझे यह बात कभी नहीं सूझी और सृझी भी तो अम्मा, ताऊ जी पर भार न पड़ जाये, इसीलिये कहा भी नहीं। फिर एक बात कुछ यह भी है, मेरे ‘मालिक’ कि मैं तो सदैव जहाँ तक होता है, अपने मन का प्रसाद ‘मालिक’ पर चढ़ाने में लगी रहती हूँ शायद इसीलिये इस तरफ अधिक निगाह न गई हो और मैंने यह भी सुन रखा है कि प्रसाद कुछ भी चढ़ाया जावे, प्रेम की मिठास जितनी शामिल होगी उतनी ही मेरे ‘मालिक’ को पसन्द आती है और मुझे यह भी मालूम है कि हम सत्संगियों के लिये ‘मालिक’ को प्रेम की मिठास ही पसन्द भी है। अब ‘आप’ जानें, जो ठीक हो।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मैं भी अपनी झोपड़ी को तोड़ने की ही कोशिश में रहती हूँ, क्योंकि गर्मियों में धीमी-धीमी लगातार बरसती फुहार हो बहुत भली मालूम पड़ती है। फिर जैसी ‘उसकी’ मर्जी व कृपा होगी, वैसा ही होगा।

'मालिक' की कृपा से मेरी दशा में अब यह हो गया है कि मैंने जो लिखा था कि ‘वह’ हल्का होकर नज़र में इस तरह समा गया है कि जैसे निगाह में एक कुदरतन नक्शा खिंचा हुआ हो, परन्तु अब यह है कि ऐसा लगता है कि नज़र तो लुप्त हो चुकी, इसीलिये अब भाई, जो बचा है वह ‘आप’ जानते ही हैं।

अब कभी-कभी ऐसा होता रहता है कि जैसे ‘आपने’ Card (कार्ड) में लिखा है कि “मुहब्बत से मैं गिरों रख जाता हूँ” इसमें बस इतना और ज़्यादा कि फिर मैं बिक जाऊंगा, ऐसे ‘आपके’ पत्र की चन्द बातें, जैसे स्वप्न में ‘आप’ मुझे बता रहें हो रात में। ऐसा अक्सर हो जाता है। पता नहीं क्यों आज-कल सुस्ती अधिक रहती है। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इतिः-

सदैव आप की ही स्नेहासिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-278
शाहजहाँपुर
22/2/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे 8 व 14 फरवरी के खत मिल गये। जवाब देना इन बारीक हालतों का बड़ा मुश्किल है। बस सिवाय इसके और क्या लिखा जाय कि तुम्हारी हालत काबिल शुक्र है। प्रसाद चढ़ाना कुछ लाज़िमी बात नहीं है और कोई चढ़ाना ही चाहे तो कुछ हर्ज़ भी नहीं। बात तो यह है कि सच्चे जिज्ञासु नहीं मिलते वरना मज़ा आ गया होता और लोग रगड़-रगड़ कर ऐसी हालत भी पैदा करना नहीं चाहते कि कुछ न कुछ बन कर ही रहें। हमें तो ऐसा लगता है कि बहुत सी बातें हमारे साथ ही जायेंगी। फिर भी बहुत कुछ ठूंस-ठाँस करता रहता हूँ। जब आदमी में कोई हालत पैदा होती है, एहसास होता है तब उसको दूसरों का काम बनाने के लिये इस्तेमाल कर सकता है। इस क़दर हालतें मेरे एहसास में हैं और इतने points ( पाइंट्स) मेरे ख़्याल में हैं और आगे Research (शोध) भी होती जाती है। उसमें से एक-आध point (पाइंट) भी लेने की कोई शक्ति नहीं रखता और तबियत यह चाहती रहती है कि हर आदमी हर point (पाइंट) का मज़ा चखे। दूसरे मानों में मैं इतना बेक़रार रहता हूँ आला से आला ब्रह्म-विद्या देने के लिये कि इसका अगर थोड़ा सा भी हिस्सा अभ्यासी अपने ज़िम्मे ले ले तो जाने क्या से क्या हो जावे। ‘लालाजी’ ने भी मुझसे कहा है कि “इस हद तक सीखने वाला मुश्किल से मिलेगा।“ मगर ख़ैर, जितना भी जैसा मिल जाय। लोग कहते हैं कि एहसास नहीं होता, उनसे कोई यह तो पूछे कि तुमने कभी एहसास करने की कोशिश भी की, जो हालत पैदा हुई, उसमें कभी घुसे भी? अगर वह यह कहें कि इतना मादा नहीं, जो एहसास कर सके, तो वह बिल्कुल गलत है। मादा हर एक में है और ब्रह्मविद्या में अक्ल खुलने लगती है, मगर जब उस ताकत को कोई दूसरी तरफ लगा दे तो फिर क्या किया जाये। देखने में तो ऐसा आता है कि सोचने और अनुभव करने की जो सामर्थ्य पैदा होती है, उसे लोग दुनिया की तरफ़ लगा देते हैं। नतीजा यह होता है कि जिस चीज से वैराग्य पैदा होना चाहिये, उसमें और राग पैदा हो जाता है। यह नुक्स अभी लिखाते- लिखाते मेरी समझ में आया और यह ठीक है। वाकई महात्माओं की यह राय ठीक थी कि जब जिज्ञासु अपने में वैराग्य पैदा कर लेता था तब असल जौहर उसको दिया जाता था। लोग कुछ दिल से छोड़ना नहीं चाहते और कहने सुनने में आकर सिर्फ़ मेरे यहाँ सीखना शुरू कर देते हैं। मैं भी यह समझ लेता हूँ कि भाई फायदा कुछ न कुछ जरूर हो जायेगा और अपने लिए उन पर मेहनत करना भी फर्ज समझ लेता हूँ, और मेरे लिये हुक्म भी ऐसा ही है।

वैराग्य अभ्यासियों में खुद व खुद पैदा हो गया होता और बड़ी आसानी से, अगर वह अपनी तवज्जोह की डोर ईश्वर की ओर पूरी तौर से लगा देते। मैं यह ज़रूर करता हूँ कि मन का रुख़ ईश्वर की तरफ़ कर देता हूँ ताकि वह उस तरफ़ लगा रहे और वह लग भी जाता है। लोग क्या करते हैं कि उसको दुनियाँदारी की तरफ़ घसीटते हैं और यह हो नहीं सकता; इतना मुझको गुरु महाराज की कृपा से Confidence (विश्वास) है कि जिस मन को ऊपर की तरफ़ लगा दिया फिर वह नीचे की तरफ नहीं उतर सकता। नतीज़ा मुमकिन है यह होता हो कि उन लोगों को जो दुनियाँ के मामले में ज्यादा दौड़ लगाते हैं परेशानी का एहसास ज्यादा होता हो। इसलिये कि मन ऊपर रहना चाहता है और उसको वह नीचे घसीटते हैं। Swami Vivekanand Ji (स्वामी विवेकानन्द जी) :-

“This is the most original letter, what you have written is entirely correct. People should have mind to think of it. I think vairagya should come first and that must be the duty of the taught."

स्वामी विवेकानन्द जी :-

“यह अत्यधिक विशिष्ट पत्र है जो कुछ तुमने लिखा है बिल्कुल ठीक है। मनुष्यों को इस पर विचार करना चाहिए। मैं सोचता हूँ कि ‘वैराग्य’ की स्थिति पहले आनी चाहिए। वास्तव में यह प्राप्त करना अभ्यासी का कर्तव्य है।“

मैं Negation (न होने का भाव) की हालत का इस क़दर दिल-दादा (चाहने वाला) हूँ कि इसकी ख़ूबी और बड़ाई मैं सिवाय इसके और क्या लिखूं कि ‘नहीं’ को हैं मान लिया है। इसका मजा चखने वाला अभी तक जहाँ तक मेरी निगाह जाती है कोई मालूम नहीं होता। अगर मैं कहूँ तो लोग न मानेंगे, इसलिये कि जब मैं अपने आप को खुद ही नहीं जानता, तो दूसरा क्या जान सकेगा। मगर खैर, यह कहता हूँ कि इस हालत का मजा चखाना सिर्फ हमारे ‘लालाजी’ ही का काम था। इससे पहले कोई ऐसी हस्ती मालूम नहीं होती कि जिसमें यह मलका हो। समझने के लिये कहो, तो मैं कह दूं, मगर छोटे मुंह बड़ी बात होगी। पिछले लोगों को जाने देता हूँ, हाल में कबीर ही हुये, इसका मज़ा उन्होंने भी नहीं चखा, सिद्धि-शक्तियाँ हों यह हम मानेंगे और यह भी ठीक है कि वह अपने वक्त में एक थे। इस हालत का मजा चखने के लिये चाहता हूँ कि लोग बनें, मगर लोग शुरू से कहना शुरू कर देते हैं कि बाबूजी ख़्याल बहुत आते हैं और जब हम अकेले बैठते हैं तो तबियत नहीं लगती। अब उनसे कोई पूछे तो सही कि यह ख़ता किसकी है। अभी तो आप उन्हीं की ख़ता देंगी और अगर कहीं System (पद्धति) में जहर बाकी रह गया तो मेरी ख़ता होगी और मैं भाई क्या करूँ उनका जहर वैसे भी मैं खींचता रहता हूँ ताकि ख़्याल ज्यादा परेशान न करें, परन्तु भाई, उन लोगों का मैं क्या करूँ और ख़्याल का ज़हर मैं कैसे खींच पाऊं, जिनकी मुझे याद नहीं आती। इस ख़ता को जरूर मैं अपनी खता कहूंगा, इसलिये कि जब वह मेरे सत्संग में हैं तो बहुत कुछ यह मेरा फर्ज़ है।

तुम्हारी will (इच्छा शक्ति) ईश्वर की कृपा से बहुत Strong (सुदृढ़) है। ऐसी कि लड़कों में नहीं होती। अगर जरूरत समझी तो अपने काम के खातिर और बढ़ाऊंगा। तो तुम्हारी तरक्की के साथ वह Automatic (अपने आप) बढ़ रही है। Point ‘L’ (पाइंट - एल) की हालत में बढ़ाऊंगा और जब तुम्हें पूरी तरीके से एहसास हो जायेगा तो आगे बढ़ा दूंगा। तुम जल्दी एहसास करती चलो और मैं जल्दी-जल्दी बढ़ाता चलूं। मुझे अब तुम्हें जल्दी आगे न बढ़ाने में बेचैनी मालूम होती है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-279
लखीमपुर
22/2/1953
मेरे परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ आज मिला-पढ़कर तबियत अत्यन्त प्रसन्न हुई। तबियत में ‘आपके’ हर काम करने की इतनी तेज़ी आ गई कि क्या न कर डालूं। पूज्य समर्थ ‘श्री लाला जी साहब' के Dictate (डिक्टेट) से ढांढस और बहुत हिम्मत बंधी। ‘मालिक’ मैं ‘उनका’ हज़ार-हजार शुक्रिया, धन्यवाद देती हूँ। सचमुच में जैसा ‘आपने’ लिखा है कि “इस हालत का मजा चखाना सिर्फ हमारे ‘लालाजी’ ही का काम था। इससे पहले कोई ऐसी हस्ती मालूम नहीं होती कि जिसमें यह मलका हो”। परन्तु बस इतना सा मैं भी अवश्य कहूँगी कि मज़ा चखने वाली भी कोई हस्ती ऐसी नहीं हुई कि जिसमें चखने का इस हद तक मलका हो। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मैं यह शब्द केवल स्तुति (खुशामद) में नहीं बल्कि अपनी अन्तरात्मा की इसी प्रकार से कहती हूँ कि ऐसी महान हस्ती बस ‘यही’ है। सच कहती हूँ कि ‘आपके’ एक-एक शब्द मुझे एक-एक सीढ़ी चढ़ने के बल देने के समान मालूम पड़ते हैं। मैं तो जहाँ तक मेरा छोटा सा ख़्याल है, यही मालूम पड़ता है कि संसार की हर चीज में केवल वैराग्य ही वैराग्य है। परन्तु कब? जब ‘मालिक’ को माधुरी मूर्ति निगाह में समा चुकी हो या जब ‘उसकी’ मोहिनी मूर्ति ने निगाह को चुरा लिया हो। देर नहीं बल्कि तब अंधेर हो जाता है। मैं क्या करूँ ‘श्री बाबूजी’ मुझे तो एक-एक बात अक्सर महसूस मालिक की कृपा से होती रहती है।

भाई, ‘आप’ मुझे खूब जल्दी-जल्दी बढ़ावें और मैं भी जल्दी-जल्दी चलती हूँ। जैसी मर्जी हो करिये। मुझे तो ‘उसकी’ चाह है। बेकरारी और बेचैनी तक जाने मुझमें है या नहीं, इसकी पहिचान की फुर्सत ही नहीं। क्योंकि मुझे तो ऐसा मालूम पड़ता है कि बिना घाव के ही मेरा हृदय व्यथा-मय ही हो गया है, परन्तु वह व्यथा-व्यथा की तरह नहीं है, कभी ऐसा लगता है कि यह ‘मालिक’ की ही दशा मेरे एहसास में रहती है और मैं इसमें भरपूर चूर रहती हूँ। मेरे ‘श्री बाबूजी’ दशा तो हर Point (पाइंट) की इतनी साफ अनुभव में रहती है, परन्तु न जाने मैं पढ़ी कम हूँ, शायद इसी से सारी हालत निगाह में रहते हुये भी उसको ठीक तरह से Express (अभिव्यक्त) करके लिखने में भी कुछ देर हो जाती है, परन्तु मैं भी अब जल्दी कर रही हूँ, मुझसे भी अब रहा नहीं जाता। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो दशा आत्मिक हैं, सो लिख रही हूँ।

कुछ ऐसा लगता है कि नम्रता ही मेरी दशा या मेरा रूप हो गया है और ऐसा लगता है कि इसी में मैं भिदती चली जा रही हूँ या भाई, सच तो यह है कि बरबस ही यह मुझमें भिदती चली जाती है। न मालूम कैसे एक ठंड़ा जोश हर समय मुझ पर छाया रहता है, जो मुझमें नमी बनाये रखता है।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब तो ऐसा लगता है कि निगाह का पर्दा बिल्कुल हट चुका है, साफ हो चुका है। कुछ ऐसा हो गया है कि एक दशा मेरी निगाह में या अन्दाज़ में हर समय रहती है और जितना मैं उसमें पैठती है, सब कुछ साफ होता चला जाता है और तैसे ही तैसे मैं ‘मालिक’ के करीब होती चली जाती हूँ। अब तो ऐसी हालत है कि किसी बात की इच्छा कतई न जाने क्यों स्वप्न में भी मालूम ही नहीं होती। तबियत में हिलोर रहती है, शायद ‘मालिक’ के लिये, परन्तु हृदय पानी की सतह की तरह शान्त रहता है। और यह भी है कि तबियत तो इस हालत से कहीं आगे चलती जाती है, या यो कह लीजिये कि बरबस न जाने कैसे मैं उस दशा (ऊपर वाली) में पैठती ही चली जाती हूँ। भाई, मेरा तो यह हाल है कि ‘उसे’ हेरते हेरते हृदय ही हिरा गया है, खो गया है, इसलिये बेकरारी व बेचैनी कहाँ रखी जा सकती है, मुझे नहीं मालूम। बस मैं तो अब यह बात देखती हूँ कि ‘मालिक’ की बेकरारी मुझे बेकरार कर रही है और ‘उसकी’ बेचैनी मुझे बेचैन रखती है, वरना मेरे पास तो मेरे रहने तक का तिल भर स्थान ही नहीं है, यहाँ तक कि वह ख़्याल जो मैं लिखा करती थी, कि मेरे बजाय, बस केवल एक मेरा ख्याल सा तैरा करता है, सो भी अब न जाने कब एकदम गायब हो गया। अब मेरी दशा ‘आप’ ही जान सकते हैं। अब तो ऐसा लगता है कि जहाँ से आई थी वहाँ मैं समा कर लुप्त हो गई और ‘मालिक’ ने क़दम आगे चलाना शुरू कर दिया। कुछ ऐसा हुआ ‘श्री बाबूजी’ कि हुक्के की आग से झोंपड़ी झुलस गई और मुझे कुछ हुक्के का नशा सा अब हरदम रहता है। शेष 'आप' जानें।

बिट्टो को चार दिन से तेज़ बुखार है और बड़ी चेचक मालूम पड़ती है। परन्तु कोई चिन्ता की बात नहीं, क़तई नहीं है। दो-चार दिन में ठीक हो जावेगी। केसर तथा छोटे भइया को भी ज़ुकाम, खाँसी है। सब दो-एक दिन में ठीक हो जायेंगे।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ जहाँ तक होगा मैं ‘मालिक’ को प्राप्त करके ही सोलहा आने, बल्कि सत्रह आने तभी चैन होगा। मेरा ‘देने वाला’ ईश्वर हजार वर्ष बरकरार रहे। यही युग, यही समय, मैं तो यही कहूँगी कि सृष्टि रचना से अब तक आध्यात्मिकता के लिये सबसे उत्तम है। इधर कुछ ऐसा अनुभव होता है कि ‘मालिक’ की कृपा से आजकल की दशा से जो भी दशा या Stage (स्टेज) Super (ऊंची) है, उससे अक्सर touch (स्पर्श) सी हो जाती हूँ, उस पर अभी पहुँची नहीं हूँ। इच्छा-शक्ति ‘आपने’ बढ़ती लिखी है, सो मुझे तो यह अवश्य महसूस होता है कि ‘मालिक’ की ताक़त पर अपना Confidence (विश्वास) दृढ़ होता जाता है।

सदैव केवल आप की ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-280
शाहजहाँपुर
24/2/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा 22 फरवरी सन् 53 का पत्र मिल गया। पहले मैं पत्र के उस भाग का उत्तर देना चाहता हूँ जिसका उत्तर देते हुए मुझे हर्ष होता है। तुमने लिखा है कि ऐसा लगता है कि नम्रता ही मेरी दशा या रूप हो गया है और ऐसा लगता है कि इसी में मैं भिदती चली जा रही हूँ। ईश्वर इसमें तरक्की दे। यह मेरी खुश किस्मती है कि एक हाल ऐसा मिला कि जिससे मेरे दिल को तकवियत हुई। यह वह हालत है कि जिसका कमाल Negation (न होने का भाव) की शुरूआत है। मगर Negation (निगेशन) अभी बहुत दूर है। यह चीज़ खुशखबरी ज़रूर दे रही है कि अपने कमाल पर पहुँच कर कुछ झलक Negation (निगेशन) को जरूर मिलेगी। मगर इसके कमाल की भी इन्तिहा नहीं। रास्ता चलकर अगर कोई ठीक जा रहा है तो यह जरूर है कि ईश्वर वह दिन भी दिखा देगा। अगर यह चीज मुझे अपनी जिन्दगी में देखने को मिल गई किसी में, तो मैं नहीं कह सकता कि मेरी तबियत ऐसे अभ्यासी को न मालूम किस ठिकाने पर पहुँचा दे और सच तो यह है कि Negation (न होने का भाव) भी अगर नसीब हो गया तो भी अभी इतना बढ़ाना रह जाता है कि लाखों वर्ष भी कम हैं। और फिर भी भाई, न जाने क्या-क्या है, कहाँ तक लिखूं। मैं तो समझता हूँ कि यह मेरा कहना धुरंधर महात्मा समझेंगे कि कुछ नहीं है, तब तो न होनी को होनी बतला रहा है और यह सही भी है। अगर मैं होता तो न होने का ख़्याल पैदा न होता, इसलिये कि न होने की याद इस कहने से ताज़ा करता हूँ। बात यही है कि न होते हुए न होने का ख़्याल, न आवे और यह हालत Negation (निगेशन) के कमाल की है। जब इस हालत पर अभ्यासी जाय तो सच पूछो मुझे आनन्द इसके बाद की तालीम में इतना आवेगा कि मेरे पास वह शब्द नहीं है कि मैं बयान कर सकूं और आनंद क्या बस यही आनंद कि एक व्यक्ति ऐसा मिला तो कि गुरु महाराज की रखी हुई अमानत बंटाने वाला हुआ।

Swami Vivekanand Jee:-

“रामचन्द्र! लोग कैसे कह देते हैं कि तुम्हें कुछ आता जाता नहीं। I would have torn to pieces all my writings. So far, I have written before these two sentences. A doctor really you are. Nobody can doubt. Such a high thought nobody can guess even, but you are depicting before the dumb millions, I got a man, I require. My whole life of penance is over now. He is the Master, a big Master. Go on writing. The time will come when people will understand these things, but publication must be made after you and whoever comes forward for the publication of these writings, his liberation is sealed. Think him to be liberated. That is the reward rarely found. I give him.”

स्वामी विवेकानन्द जी:-

"रामचन्द्र! लोग कैसे कह देते हैं कि तुम्हें कुछ आता नहीं। तुम्हारे इन दो वाक्यों के सामने मैं अपनी समस्त पुस्तकें फाड़ कर फेंक सकता हूँ। तुम निश्चय ही ‘दर्शन’ के विशेषज्ञ हो। किसी को इसमें सन्देह नहीं। इतने उच्च विचार आज तक कोई सोच भी नहीं सकता परन्तु तुम इन्हें इन लाखों गूंगे-प्रायः मनुष्यों के सामने रख रहे हो; मैंने ऐसा व्यक्ति पा लिया है जिसकी मुझे इच्छा थी। मेरे जीवन की समस्त तपस्या अब पूर्ण हो गई है। ‘वह’ मास्टर है, एक महान् मास्टर। लिखते रहो। समय आयेगा जब लोग तुम्हारे लेखन को समझेंगे परन्तु इसकी छपाई तुम्हारे बाद ही होनी चाहिए। जो भी व्यक्ति इरा कार्य के लिए आगे आयेगा, उसको मुक्त हुआ समझो। इस प्रकार का इनाम कभी ही प्राप्त होता है। मैं उसे दूंगा।“

मैं यही कहूँगा कि उनके पास समझ नहीं जो इसको समझे। हाँ यह जरूर है कि तफ़सीर कोई करके दिखा दे। यह मैं उन लोगों से कहता हूँ जो इसके Writings (लिखी हुई पुस्तकों पर) एतराज़ करते हैं या defects (बुराइयाँ) समझते हैं। ज़माना चाहिये इसके समझने के लिये। तुमने जो वैराग्य के बारे में लिखा है, वह सही है। अगर ईश्वर की तरफ़ इन्सान पूरी तौर से लग जाता है तो फिर वैराग्य ही वैराग्य है और कहीं किसी रूढ़ी सूरत पर कोई लग गया तो दुनियाँ से नहीं बल्कि अपने से भी वैराग्य हो जा है। Consciousness of Body (शरीर का भान) तो जाती ही रहती है और यह इसका एक अदना करिश्मा है। Consciousness of Soul (आत्मा का मान) भी जाने का नम्बर आ जाता है। फिर क्या है, मुर्दा के नहलाने वाला जिधर चाहे उसे फेर दे। हालतें आगे ऐसी आती हैं कि उसको शब्द ज़ाहिर नहीं कर सकते, मगर फिर भी तुम बहुत कुछ Express (अभिव्यक्त) कर लेती हो सोलहों आने भर ‘मालिक’ को हासिल कर लेना इतनी मुश्किल चीज़ नहीं है जैसी कि दिखलाई देती है। मगर भाई सत्रह आने भर जैसा कि तुमने लिखा है, मैं न कर सका, मुमकिन है कि तुम कर ले जाओ।

सीता ने एक तोता पाला और वह उससे बहुत मोहब्बत करती थी और राजा जनक सीता से मोहब्बत करते थे। नतीजा क्या हुआ कि राजा जनक तोते से मोहब्बत करने लगे। तोता दुखी होता था तो सीता को दुख होता था और जब सीता को दुःख होता था, तो राजा जनक को भी दुःख होता था। अब तुम बताओ कि इतना बड़ा ऋषि दूसरे मानों में तोते से लगाव रखता था। हमसे अगर पूछो तो हम यही कहेंगे कि वह इन्सान ही नहीं, जो दूसरे के दुःख-दर्द को देख कर दुःखी न हो। महात्माओं को भाई जाने दो। उसमें तो ऐसे अव्वल दर्जे के वैरागी मिलते हैं कि कहते हैं कि माँ-बाप, पुत्र-परिवार, सब शत्रु के समान हैं। तो भाई, मुझे तो कोई ऐसी महात्मागीरी दे तो सौ बार ‘लाहौल’ पढ़ने के लिये तैयार हूँ। अब उन महात्माओं की तालीम पर गौर करो कि कितने बड़े राग की तालीम देते हैं, जिसका नतीजा सिवाय तबाही के और Moral-Stamina (नैतिक आन्तरिक बल) खराब कर देने के और कुछ नहीं होता। हम शत्रु समझने की आदत डाल रहे हैं। हम जब यह आदत डाल रहे हैं तो मुमकिन है हमारे ख़्यालात खुद ऐसे औज़ार बन जायें कि हमारे ख़ून से अपने आपको रंग लें। ख़ैर, अब इसको ज़्यादा बढ़ाऊंगा नहीं - मतलब पर आता हूँ।

बच्चों ने एक कुत्ता पाला और वे उससे मोहब्बत करते थे। मुझे भी उसका लिहाज़ हो गया और वह 27 जनवरी को गुज़र भी गया। उसकी ज़िन्दगी में एक ऐसा वाक्या गुजरा कि उसकी किस्मत से स्वामी नारदानन्द, शाहजहाँपुर आये। उन्होंने लेक्चर दिये और लोगों को अच्छी-अच्छी बातें समझाई। मेरे घर के क़रीब जलसा था और माइक्रोफोन लगा हुआ था और कुछ आवाज़ भी उनके लेक्चर की आ रही थी। उनके सामने Public (जनता) थी और मेरे सामने वह कुत्ता। सोचा कि भाई वह इतनी Public (जनता) को होशियार किये जा रहे हैं, यानी वह हक़ महन्तगीरी जो इन्सान ही तक मुहीत समझा जाता है, अदाकर रहे थे। चूंकि वह इन्सान हैं, उनको हमदर्दी इन्सान से होना चाहिये और भाई यह तो अपने यहाँ कहा ही गया है कि जो इन्सान ईश्वर की इबादत नहीं करता वह जानवर के समान है, तो भाई इस लिहाज़ से तो मैं भी जानवर की तारीफ़ में आता हूँ, इसलिये कि मुझसे ‘उसकी’ इबादत नहीं होती। जब इन्सान अपने हमजिन्स के फायदे के लिये खड़ा होता है तो मेरी भी तबियत चाही कि मैं अपने हमजिन्स को फायदा पहुँचाऊं। स्वामी जी जब अपने फर्ज़ से नहीं चूकते, तो मैं अपने फर्ज़ से क्यों चुन्कुं। एक महात्मा के आने पर मुझे इतना फर्ज़ तो सीखना ही चाहिये था। चुनांचे मैंने भी अपने हमजिन्स को फायदा पहुँचाया और फ़ायदा क्या पहुँचा? जो एक जानवर को जानवर से पहुँचता है। जानवर में Intellect (बुद्धि) नहीं होती और भाई Intellect (बुद्धि) मुझमें भी अब नहीं रही। लिहाज़ा इन मानों में मुझमें और कुत्ते में कोई फर्क नहीं। चुनाचे उसको Beyond Intellect (बुद्धि से परे) फ़ायदा पहुँच ही गया।

Swami Vivekanand Jee:-

"Is it the writing of a common man? It is full of Philosophy".

स्वामी विवेकानन्द जी -

“क्या यह एक साधारण व्यक्ति का लेखन है? यह दर्शन से भरपूर है।“

अब चूंकि मास्टर साहब को मैंने यह लिखा था कि वह Brighter World की तरफ जा रहा है और अपने संस्कार के गिलाफ़ उतार रहा है। लिहाजा उसके नतीजे को भी इत्तला देना वाजिब था, चुनांचे कल तारीख 26.3.53 को 8.40 PM, पर वह Brighter World में पहुंच गया और उसने जो संस्कारों का गिलाफ उतारा, उन संस्कारों ने मेरी तरफ रुख कर दिया, कुछ झलक आ गई और भाई मैं भूल गया कि ‘लालाजी’ ने फौरन संस्कार जला देने का हुक्म दिया। अब जो दो-एक आ गये सो आ गये मजबूरी है, वह मेरे दिल पर जमा है और उसमें फिक्र की जरूरत ही क्या। फायदा तो उसे हो गया। अब चूंकि मैंने ‘लालाजी’ साहब से इसके लिये पूछा नहीं था। आगे वाला टुकड़ा मैं यह लिखना चाहता था कि मेरी जुर्रत फिर कब पड़ सकती है कि मैं ‘लाला जी’ से प्रार्थना करूँ कि इसको साफ कर दीजिये। इतने में एक मिनट के लिये ‘लालाजी’ साहब ने मुझे बुला लिया- अब कहो कि मोहब्बत ‘लालाजी’ करते हैं या मैं उनकी।

तुम्हारे ख़त में बहुत सी बातें जवाब देने लायक थीं- मैंने मुख्तसर लिख दी। 26.2.53 को मैंने तुम्हें ‘M’ (एम) के मुकाम पर खींच दिया।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-281
लखीमपुर
26/2/1953
मेरे परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा पत्र पहुँचा होगा। शायद आपको जो थोड़ी सी सांस की तकलीफ़ मालूम हुई थी, वह ठीक हो गई होगी। बिट्टो का बुखार उतर गया चेचक भी ठीक हो गई, मगर अभी पपड़ी है, सो भी दो-चार दिन में ठीक हो जायेगी। बड़े भइया को दिल्ली से रोहन भाई साहब ने बुलाया है। अब 'मालिक' की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक -दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई, चलने की हिम्मत बहुत आ गई है, यह सब केवल मेरे ‘मालिक’ की कृपा और ‘उसी’ की देन है। तो न जाने क्यों थोड़ी हो तो मैं कह नहीं सकती, बरना ‘मालिक’ ऐसा लगता है कि Worldly feelings (संसारी अनुभूतियां) से करीब-करीब बिल्कुल अलग कर लिया है, अब जो है वह शायद शरीर को यहाँ (संसार में) रखने के कारण है, खैर, ‘अपनी’ बातें वही जानें। अब मैं शायद ‘उसी’ की कृपा से यह कह सकती हूँ कि ‘मालिक तूने' सब तरह की इच्छाओं को ख़त्म कर दिया है, यहाँ तक कि मैं तो अब इतनी अनभिज्ञ हूँ कि यह (यानी इच्छा) कोई बला है, मेरी समझ के बाहर की बात है। मुझमें अब कुछ नहीं है, अब तो ‘वहीं’ जाने, जो मर्ज़ी हो करें। मुझे इस तरफ यानी संसार की ओर से तो एक बस नशे की पिनक में जितना होश आदमी को रहता है शायद उससे कुछ कम ही हो, नहीं-नहीं जितना ‘वह’ चाहता है, ज़बरदस्ती बस उतना ही होश ‘वही’ इस ओर किये है। मेरा तो अब यह हाल है कि ऐसा लगता है। कि ‘मालिक’ मुझे अपने देश लिये जा रहा है, बस ऐसा लगता है कि मार्ग के और देशों की हवा खिलाते हुए जल्दी से टहलाते हुए लिये जा रहा है। अब तो यह हाल है कि “अपनी बातें तुम सब जानो, मैं तो चली ‘पिया’ के देश।“

मेरे 'श्री बाबूजी' ऐसा लगता है कि ‘मालिक’ पर मेरी सारी कलई खुल चुकी है। कुछ ऐसा लगता है कि सारी वृत्तियाँ वगैरह का तो मेरे आस-पास कहीं पता ही नहीं रह गया, सब कुछ छूट गया, सब कुछ मौन हो गया दीखता है। समस्त ब्रह्माण्ड मुझे केवल या मेरे लिये मौन ही मौन दीखता है। सब तरफ से आँख मिच चुकी। सब तरफ सब कुछ शान्त हो गया। सारी चहल पहल शान्त हो गई, मानों मुझे ‘उसके’ देश जाते देख कर अफसोस में सब चुपचाप खड़े रह गये। बहुत दूर तक मुझे देखते रहे, परन्तु मैं ओझल हो गई। अब कुछ ऐसा महसूस होता है कि मार्ग के सब देशों की हवा खाकर, टहल-टहला कर अब मैं ‘मालिक’ के देश की सरहद में या भाई सरहद पर आ गई और अब तो सचमुच यह मुझे अपना देश ही दिखाई देता है। मुझे और किसी से कुछ मतलब नहीं। भाई, अब तो ऐसा लगता है कि यहाँ पर गूंगे की गुड़ सी हालत लगती है। इसलिये सब तरफ सब कुछ मौन है, बस अब ऐसी ही मेरी दशा है।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब तो ऐसा लगता है कि अन्तर में या भाई आत्मा में अक्सर इतना हल्का, शुद्ध परन्तु तीव्र आनन्द रहता है कि जिसका कुछ ठिकाना नहीं। मैं तो ‘उसके’ और करीबतर हो गई हूँ। यदि वह आनन्द ‘मालिक’ की कृपा से फूट निकले, तो सम्भव है, मेरा हृदय फट जावे और मैं उसमें बही चली जाऊं, परन्तु मैं अपने ‘मालिक’ की कृपा की हर बात खूब जानती हूँ, कि ‘वह’ तो मुझे ‘अपने’ में बहावेगा और मैं भी ‘उसी’ में बहूँगी और अवश्य बहूँगी इसी कारण ‘वह’ बन्दिश लगाये है, फूटने नहीं देता और इसी लिये मैं भी उस बन्धन को लिये बैठी हूँ। मेरा हृदय फूटने को बेकरार रहता है, परन्तु ‘उसमें’ मिलने को। किसी तरह ऐसा हो-जी बेताब रहता है। निगाह जल गई, बुद्धि बहरी हो गई, कुछ नहीं रहा ‘श्री बाबूजी’ अब कुछ न रहा, जो है ‘वह’ ‘आपके’ सामने है और वह ‘आप’ हैं। परन्तु आनन्द मेरे लिये एक पहेली है, मैं नहीं कह सकती कि ‘उससे’ मिलने को जाने की खुशी है या शीघ्रातिशीघ्र जाऊंगी, इसका जोश है या भाई, बेकरारी, एक प्रकार का आनन्द है, वह है। वैसे ठीक तो ‘आप’ जानें। परन्तु मुझे तो तीसरी बात जंचती है, यानी बेकरारी वाली। क्योंकि आनन्द व खुशी लफ्ज़ न जाने क्यों मुझे इस दशा के लिये अच्छे नहीं मालूम पड़ते। नहीं, नहीं, भाई मेरे दिमाग पर तो एक अजीब सूक्ष्म सा नशा है। भाई, ऊपर मैंने जो बन्दिश के लिये लिखा है, वह ‘मालिक’ की कृपा से Moderation (साम्यावस्था) की बन्दिश है, वैसे ‘आप’ जानें, क्योंकि अक्सर मैंने लिखा है कि दशा भीतरी हमेशा पानी की सतह की तरह ही रहती है।

‘आपने’ पत्र में लिखा था कि “जब आदमी में किसी हालत का जज्बा पैदा होता है, तब उसको दूसरों का काम बनाने के लिये इस्तेमाल कर सकता है” सो मैं क्या करूँ, कृपया लिखियेगा या मास्टर साहब जी को बता दीजियेगा।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री–कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-282
शाहजहाँपुर
2/3/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत 27 फरवरी सन् 53 का मिल गया। तुम्हारी Will (इच्छा शक्ति) बहुत Strong (प्रबल) है, मैं लिख चुका हूँ, मगर फिर भी शायद एक हफ्ता कम या ज़्यादा गुज़रा होगा, मैंने कोई 5 या 6 सेकण्ड Will (इच्छा शक्ति) बढ़ने की तवज्जोह दी थी। मैंने तुम्हें बतलाया भी था और तुम्हारे पास नोट भी है कि Efficacy of Rajyog (राजयोग का दिव्य दर्शन) में जो पहले Diagram (चित्र) में दिल का Lower Region (निचला भाग) जाहिर किया है, उसमें तवज्जोह देने से Will (इच्छा शक्ति) बढ़ जाती है, मगर बहुत थोड़ी देर तवज्जोह देना चाहिये, कुछ Seconds (सेकेन्ड्स) काफी होंगे। यह चीज़ मैंने Efficacy of Rajyog में ज़ाहिर नहीं की, इसलिये कि लोग उस पर Meditation (ध्यान) करके Hypnotic Power (सम्मोहन शक्ति) न बढ़ा लें जो आध्यात्मिक-विद्या के बहुत कुछ खिलाफ है और उल्टी चीज़ है। मुझे बड़ी खुशी हुई तुम्हें Worldly Feeling (दुनियाबी एहसासों) से छुटकारा मिल गया और इच्छायें ख़त्म हो गईं। यह बड़ी अच्छी हालत है कि जितना ज़रूरत हो उतना ही होश रहे। मगर तुमने गौर नहीं किया कि बेखबरी रहते-रहते, बेखबरी में बाखबरी शुरू हो जाती है और यह हालत बेहोशी से कहीं अच्छी है। आगे चलकर इसका बोझ भी नहीं रहता।

तुमने यह जो लिखा है कि “वृत्तियों का कुछ पता भी नहीं रह गया” यह ठीक है। मगर भाई जब ईश्वर कहीं किसी की Negation (न होने का भाव) की हालत पैदा कर दे, फिर तो यह भी नहीं रहता। शब्द नहीं कि इसका वर्णन कर सकूँ। न फिर मिठास रहती है और न तुर्शी, समझने के लिए Vacuumise (खाली) कह लो कि इन्सान Vacuumise (खाली) हो जाता है। मगर Scientists (वैज्ञानिक) यह बता रहें हैं कि पूरी तौर से जब हवा आले के ज़रिये से निकाली जाती है तो फिर भी हवा कुछ बाकी रह जाती है। मेरा कहना यह है कि अगर कहीं कोई आला ऐसा ईजाद हो जाये कि किसी कमरे या गोले में से हवा अगर बिल्कुल कहीं निकाल ली जाये तो वह जान ही जान रह जायेगा और इतना बड़ा Destructive Weapon (विनाशकारी हथियार) बन सकता है कि उससे ज़्यादा Destructive Weapon (डिस्ट्रक्टिव हथियार) आज तक ईजाद ही नहीं हुआ। अब हमें इन्सान को ऐसा Vacuum (खाली) बनाना है। अगर कहीं ऐसा बन गया तो वह एक Gigantic Battery (विशाल बैटरी) हो जाता है और जिस तरफ़ Will (इच्छा-शक्ति) बन जाती है, ताकत उसी तरफ काम करने लगती है। मगर भाई, ईश्वर बड़ा होशियार है। ऐसे आदमी की इस हद तक Will (इच्छा-शक्ति) बंधने ही नहीं देता। अगर कहीं Accidentally (अकस्मात्) बंध जाये तो ऐसी हज़ारों दुनियाँ एक Second में छिन्न-भिन्न कर सकता है। यह तो Negation (निगेशन) का हाल मैंने बताया है, मगर Negation रहते हुए भी उसको अगर भूल जाये, यानी उसका एहसास न रहे, तब तो मैं यहीं कहूँगा कि उसमें एक छिन में Spiritual Giant (आध्यात्मिक-हस्ती) बनाने की ताकत पैदा होती है और भाई कहीं, ईश्वर इससे आगे चलने वाला अभ्यासी पैदा कर दे। अफ़सोस है कि मैं यह चीजें किसको दिखाऊं मुझे इस हद तक कोई हिम्मत नहीं दिलाता। ईश्वर करे अगर इससे ज्यादा न सही तो इतनी ही चीज़ मुझसे ले, ताकि मैं बहुत न सही, गुरु-ऋण कुछ थोड़ा ही उतार सकूँ। वाकया यह है कि मैं हाथ मल के रह जाता हूँ और फिकर यह है कि कहीं यह चीज़ मेरे साथ ही न चली जाये। इससे ज़्यादा न सही, कम से कम इतनी ही चीज पैदा कर लें, ताकि दूसरों को इसी हद तक ले आवें। मैं तो इस चीज़ के देने के लिये यहाँ तक Over Flooded (सीमा से अधिक उत्सहित) रहता हूँ कि कोई मुझसे अपने घर का कुल काम जो नौकर करते हैं ले ले और इसी के एवज में मुझसे यह चीजें ले ले। मगर भाई एक मज़मून के तरीके से यह चीजें कह जाता हूँ मुमकिन है इसीलिये दूसरों पर इसका कुछ असर न रहता हो।

जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है, कि अगर ईश्वर इससे आगे चलने वाला पैदा कर दे, तब तो मैं अपनी किस्मत की सराहना करूँ और ऐसी उजड़ी हुई बस्ती की सैर कराऊं जहाँ जनून की भी गुज़र नहीं। मगर भाई क्या करूँ, इन्तिहा मुझको कहीं ‘मालूम नहीं पड़ती।’ इससे आगे कोई मुझसे सीख जाये और मैं सिखाये जाऊं। भाई, Negation (निगेशन) भी हमारा Goal (लक्ष्य) नहीं है। हमारा जो Goal (लक्ष्य) है, वहाँ के लिये हम इतना ही कह सकते हैं कि सिर्फ भूमा की ही गुज़र है, यानी यहाँ पर जात ही जात है। लोग Liberation (मुक्ति) के पीछे पड़ते हैं और अच्छा है कि इससे वाकई छुटकारा आवागमन से मिल जाता है और लोग इसी को Preach (उपदेश देना) करते रहे। ज़रा कोई निगाह उठा कर तो देखे तो पता चलेगा कि Liberation (मुक्ति) महज़ उसका तलछट है। कभी कुछ Hint (इशारा) मेरी जुबान से उस हालत का निकल भी गया, इत्तिफाक से किसी Polished Spiritual (बनावटी) के सामने, तो नतीजा यही हुआ कि उसने मुझे नावाकिफ ही समझा। यही वजह होगी कि ऐसे राज बतलाये नहीं जाते और मैं तो भाई बतला देता हूँ, उनकी राय मेरे बारे में बहुत कुछ सही है। अगर मुझमें वाकफियत ही होती तो मुमकिन था कि इस हालत तक न पहुँच सकता, क्योंकि यहाँ पर नावाकिफ़ों की ही गुज़र। ज़रा सोचो तो सही, मुमकिन है यह कुफ्र हो कि यह लफ़्ज़ क्या ईश्वर की असल तारीफ़ में नहीं आता। लोग इसको सोचने ही क्यों लगे। उनके ख़्याल में क्षीर-सागर और विष्णु भगवान और लक्ष्मी घूम रही हैं। हालांकि वह यह नहीं समझे कि यह चीज़ कैसे आ गई। भाई, यह सब दिल की हालतें हैं और इसी में विष्णु भगवान बेचारे मजबूरन रहते हैं। उनको कोई ऐसा नहीं मिलता कि उनको इस हालत से निकाले। बंधन की चीज़ का ख़्याल करने से भी बंधन में एक कड़ी लगा देता है। मजमून तूल ज़रूर हो जायेगा वरना यह चीज़ इस वक्त, निगाह में आ गई।

मुख्तरान कहे देता हूँ:-

दिल हमारा क्षीर-सागर है। मगर उसमें वासना का साँप मौजूद है, जो हमारे असल को फन से छुपाये हुए है। लक्ष्मी भी मौजूद है, गोया यह दूसरी कड़ी है, और हमको निजात इसलिये नहीं मिलती कि एक तरफ हममें केंचली-वृत्ति भी मौजूद है। पाँव दबाना विष्णु भगवान के माने यह रखता है कि वह असर जिस पर साँप का फन है, उसकी दासी बाकई यह कंचन है। अब उसमें जो लहरें या तरंगे हैं, जो समुद्र में पैदा होती हैं, हम अगर उनको दूर कर दें तो सतह बराबर हो जायेगी। फिर हमको मौका मिलेगा कि इन बंदिशों को काट सकें क्योंकि हममें ताकत भी आ जावेगी। असलियत जो दिल में छिपी हुई है, इसी को Mythologically (पौराणिक) विष्णु करार दे दिया है। हम जब वासनाओं का साँप दूर कर देते हैं, तो विष्णु भगवान के दर्शन प्राप्त होते हैं। यानी हममें भी यह ताकत आ जाती है कि हम दूसरे की रूहानी परवरिश कर सकें। अब चूंकि विष्णु का काम पालन-पोषण है, लिहाजा उसके लिए लक्ष्मी या कंचन की भी ज़रूरत है। अब विष्णु भगवान की Strength (शक्ति) भी आप पर रौशन हो गई कि बेचारे पालन-पोषण में दुःखी हैं। मैंने बहुत संक्षेप में लिखा है, क्योंकि दिमाग ज्यादा काम नहीं देता। कभी जुबानी समझ लेना यदि चाहो। जो शख्स विष्णु भगवान की पूजा करना चाहते हैं, वह अपने दिल की तरफ रूजू हों, बस यही उनकी पूजा होगी। जब उस चीज़ को तय कर लिया, तो और चीज़ शुरू होने लगती है।

तुम्हारे खतों को देखकर मेरी यही तबियत चाहती है कि मैं लिखता ही रहूँ। तुम्हारे हाल और कैफियत का तो मैं जवाब दे चुका, मगर इन्तहाई हालत के पहुंचे हुए की मैं तारीफ़ भी कर दूं ताकि पढ़ने वालों को सम्भव है ख़्याल की रंग में हरकत पैदा हो जाये और इस हद तक पहुँचने की कोशिश करें। वैसे तो सब ईश्वर ही के हाथ में है कि ‘वह’ जिसे चाहे अपनी तरफ खींच ले और जो चाहे वह उसे दे दे। मगर कोशिश करना हमारा फर्ज जरूर है ताकि ‘उसको’ भी खबर हो जाये कि कोई बंदा ‘उस’ तक पहुँचना चाहता है। Negation (निगेशन) की मैंने इन्तिहा बतला दी। जब इन्सान इन्तिहा की भी इन्तिहा को पहुँच जाता है, चलना फिर भी बाकी रहता है। जो शख्स इन्तिहा की इन्तिहा को पहुँच गया और हर परमाणु जिस्म का इन्तिहाई ताकत पर आ गया। हर Joint (जोड़) और हर गुत्थी ने इन्तिहाई कमाल को हासिल कर लिया। फिर क्या होता है? कुदरत का ख़ास औज़ार तो वह बन ही जाता है (गो यह बात ईश्वर के हाथ में है कि वह ऐसा आदमी बना दे) उसको सब कुछ अख्तयारात होते हुए भी उसे बेखबरी ही रहती है। मगर ईश्वरीय काम के लिये जो चीज ज़रूरी है, उससे बेखबर नहीं रहता। यह और बात है कि अपनी इन्तहाई हालत का बोध सिवाय खास सूरत में उसके अन्दाज़ में आवे। उसके हाथ में कुल Universe (विश्व) का इन्तजाम होता है और सब ईश्वरीय ताकतें उसके मातहत होती हैं जैसा कि मौजूदा Personality (दैवी व्यक्तित्व) का हाल है जो कोई भी हो। Efficacy of Rajyog (राजयोग का दिव्य दर्शन) में मैंने जिकर कर दिया है कि ऐसी Personality (दैवी व्यक्तित्व) मौजूद है। अवतारों को सिर्फ़ Destructive Programme (विनाश करने का कार्यक्रम) दिया जाता है, जैसा कि पुरानी किताबों से भी पता चलता है। Constructive Programme (रचनात्मक कार्यक्रम) उनके हाथ में नहीं होता। अब मौजूदा Personality (दैवी व्यक्तित्व) जो है, उसके हाथ में यह दोनों Programme (कार्यक्रम) है और वह अपनी मदद के लिये आदमी भी बना लेता है। अवतार के हाथ में तलवार भी होती है और उसके (Personality) हाथ में तलवार नहीं होती, बल्कि Circumstances (स्थितियाँ) ऐसी पैदा कर देता है कि नतीजा यही हो। अगर मौजूदा Personality (दैवी व्यक्तित्व) यह ज़रूरत समझे कि खून बहाने वाले अवतार की भी ज़रूरत है तो यह उसके बिल्कुल हाथ में है कि वह आयंदा अवतार आने का इन्तजाम कर जाये, अर्थात् उसके हाथ में है कि वह उसका इन्तज़ाम अभी से कर दे, यानी अपनी ज़िन्दगी में। अब सोचो तो सही लोग इस ज़माने में कुंडलिनी जगाने की फिक्र में ज़्यादा रहते हैं, मगर इस चीज पर निगाह किसी की नहीं जाती। बकौल 'कबीर' के “सब जग अन्धा, मैं किसे समझाऊं”। अवतार बुलाने की मैं तरकीब भी लिखे देता हूँ। बहुत छोटी सी है, इसलिये कि लोगों को यह तरकीब भी मालूम हो जाये।

हमारे यहाँ अवतार पर लोग अभ्यास से दिलचस्पी नहीं रखते। मुमकिन है कि इस करिश्में में ही दिलचस्पी पैदा हो जाये और वह हर रोज़ एक अवतार बुला लिया करें, क्योंकि तरकीब बहुत मामूली है, मगर अपनी ताकत और Will (इच्छा शक्ति) की मातहत जरूर है। तरकीब बस यह है कि ऐसी Personality (दैवी व्यक्तित्व) जब मुनासिब समझती है कि अवतार आना लाज़मी मालूम होता है तो वह यह करेगी कि ‘भूमा’ के करीब, Circle (सर्किल) जो कि उसको मुहीत किये हैं और जहाँ से कि Power (शक्ति) पहले मरतवे नीचे को उतरी, वहाँ पर वह ऐसा Vacuum (ख़ालीपन) पैदा कर देगा कि जो Time (मरतवे) मुकर्रर किया है, उस Time (समय) के अन्दर उसका नीचे उतरना शुरू हो जायेगा। आते-आते जिस वक्त वह महामाया के दायरे में आवेगा एकदम से उसमें उस मुकाम की ताकत जितनी जरूरत है, भर जावेगी। मगर उसका दायरा कायम रहेगा, उस वक्त तक, जब तक कि महामाया का मुकाम वह छोड़ न दे। अब जब महामाया का मुकाम छोड़ दिया, गोया उसका आना शुरू हो गया। नीचे उतर कर उसमें Godly Mind (ईश्वर-मन) का भी असर भरपूर हो गया, इसलिए कि ऐसा Vacuum (ख़ालीपन) जिसकी जरूरत थी ‘धुर’ पर बनाया। अब उसको छोड़ के ही पारब्रह्म-मंडल और ब्रह्ममंडल में गुजरता हुआ और ताकत लेता हुआ अब दुनियाँ में अवतीर्ण हो जायेगा और यह सब Vacuum (वैक्यूम) बनाने का असर है। उसको ज़िन्दगी महामाया के मुकाम पर मिलती है और जब वह Vacuum महामाया मुकाम पर पहुँच जाता है तो वही ताकतें उसमें पैदा होती है जिसकी ज़रूरत है। मैं इस चीज़ को बड़ी मुश्किल से Express (अभिव्यक्त) कर पाया हूँ। इससे उम्दा मुझे शब्द नहीं मिले, क्योंकि बेपढ़ा आदमी हूँ। आप लोग भी मुमकिन है इसके Expression (अभिव्यक्ति) के लिये अच्छे लफ़्ज़ ढूंढ सकें। मुमकिन है कि चौबे जी भी इसमें मदद दे सकें, इसलिये कि उन्होंने धार्मिक Literature (साहित्य) बहुत पढ़ा है और मुमकिन है इसका इशारा कहीं उन्हें मिल भी जावे। अगर मिल जाये तो मुझे भी लिखें। हालांकि यह कोई कायदा नहीं कि पिछले महात्मा जो कुछ कह आये हैं, उसके आगे कोई और बता न सके। है वही, जो मैं कहता हूँ। तरकीब मुमकिन है कि इससे बेहतर किसी को और मिल जावे, क्योंकि बड़े-बड़े स्वामी यहाँ पर मौजूद हैं और भाई मैं तो उनके सामने एक नाचीज़ और अदना और गुमशुदा हस्ती हूँ। ख़ैर, इससे ज़्यादा जो जानना चाहे इसके बारे में, तो उसे चाहिये कि वह खुद कोशिश करे। इन्सानी ताक़त और पहुँच का अन्दाजा लगाइये कि ईश्वर ने अवतारों का बुलाना भी इन्सान ही के हाथ में रखा है। सच तो यह है कि जहाँ तक इन्सान की पहुँच है, अवतार की भी नहीं हो सकती। हमें ऐसा इन्सान बनना चाहिये और भाई अगर ऐसी Personality (दैवी व्यक्तित्व) कहीं ईश्वर किसी के सामने खड़ी कर दे तो फिर उस शख्स का कहना ही क्या। अगर मोहब्बत है, तो नहीं मालूम क्या से क्या वह दे देवे। मैं आप लोगों से यही प्रार्थना करूँगा की ऐसी Personality (दैवी व्यक्तित्व) की खोज में रहिये कि अगर कहीं मिल गई तो ‘उसकी’ एक निगाह में कीमियाँ बन सकती है। मुझे तो भाई, फ़िक्र यों नहीं रही, मुझे जैसी शख्सियत की ज़रूरत थी और जैसी तालीम मुझको होना बदी थी, मुझे मिल गई। अब अपनी-अपनी आप जाने।

हज़रत किब्ला (लालाजी साहब):-

"भाई, मैं इस लिये कहे देता हूँ कि यह मौका बार-बार नहीं मिलेगा। चाहिये कि इस वक्त में इन्तिहाई पहुँच अपनी हासिल करो। क्या यह ख़्यालात आपने कहीं और देखे? क्या यह ज़ज्बा आपने कहीं और पाया? भाई बड़ी किस्मत से ऐसा आदमी मिलता है और फिर ऐसे वक्त में अगर ऐसा आदमी मिल जाये और उसकी तालीम नसीब हो तो बड़ी खुशकिस्मती की बात है। मैंने तो कुछ नहीं रखा जो इसको Ramchandra (रामचन्द्र) को दे न दिया हो और अब भी मेरा यही हाल है, जो मिलता है, बराबर दे देता हूँ। तुम लोग भी ऐसी ही कोशिश करो कि मेरा-सा जज्बा ‘इसके’ दिल में पैदा हो जाये और यह सब तुम्हारे हाथ में है। यह बड़ा Important (महत्वपूर्ण) खत है। इसकी दो-एक नकलें Preserve (रखना) करना चाहिये।"

प्रार्थना लाज़मी चीज़ है, जो मैंने उर्दू किताब में दे दी है और यह सोते वक्त ज़रूर हर भाई को करना चाहिए और कहीं इसको दिल से, प्रेम से कर गये तो फिर तरंग का खटका, ईश्वर ने चाहा, न रहेगा। यह भाई अवतार लाने की ताकत, जो मैंने लिखी है, अब तक, जहाँ तक मेरा Vision (दृष्टि) पहुँचता है, जिसकी किस्मत में थी उसी को मिली।

Swami Vivekanand Ji (स्वामी विवेकानन्द जी)

“As far as my inward vision goes and the experience of the Brighter world as well, I have not found Such person since the beginning of the world. Bluffing should be neglected in future. Be plain in your words. Who is that person? Say that you are. Whatever has been written in this letter is correct in toto. This is the common letter for all. It must be copied and published when time comes.”

“जहाँ तक मेरी दृष्टि जाती है यहाँ तक कि दिव्य-लोक में भी तुम्हारे जैसा दिव्य-व्यक्तित्व मैंने कहीं नहीं पाया है, सृष्टि के आरंभ से लेकर अब तक। भविष्य में दूसरों को धोखे में मत रखो। अपने वचनों में सच्चाई रखो। ‘वह’ कौन व्यक्ति है? कहो, कि वह दिव्य-पुरुष तुम हो। इस पत्र में जो कुछ भी तुमने लिखा है, पूर्णतः सत्य है। यह पत्र जन-सामान्य (सभी के) के लिए है। इसको उतार कर (नकल करके) जब समय आये तो छपवाना भी चाहिए।“

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-283
लखीमपुर
4/3/1953
मेरे परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ अभी थोड़ी देर हुई, दद्दा ने दिया - पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। ‘आपके’ एक-एक शब्द मेरे लिये Current (विद्युत-शक्ति) की तरह काम देते हैं। ‘आपका’ एक-एक लफ्ज़ मुझे ताकत देता है। ‘आपने’ कृपया मुझे Point ‘M’ (पाइंट-एम) पर खींच दिया और इच्छा शक्ति को और बढ़ा दिया, बहुत-बहुत धन्यवाद है। मेरी तो ‘ईश्वर’ से रात-दिन यही प्रार्थना है कि ब्रह्म-विद्या सिखाने में ‘मालिक’ के एक-एक अरमान मुझमें उतर सकें। कुछ तो हवस मुझ गरीब में पूरी हो सके। यही मेरी कोशिश है और यही ‘उससे’ मेरी प्रार्थना है और यदि यह कर सकी तो ही मैं सार्थक हूँ -अन्यथा कुछ नहीं और यह होकर रहेगा। यदि सिखाने वाले के उन्नति देने के थोड़े से भी अरमान (Taught) प्रशिक्षार्थी से पूरे न हो सके तो वह सीखने वाला ही क्या रहा। क्या बताऊं ‘श्री बाबूजी’ ‘आप’ मुझे सन् 1944 में ही क्यों न मिले-परन्तु इसमें भी दोषी मैं हूँ-क्योंकि पिलाने वाला तो मौजूद था और जाने और अनजाने में भी पिला ही रहा था, परन्तु पीने वाले की ही प्यास तीव्र न होगी। ख़ैर, अब सही, मैं तो ‘आपके’ बिना न कभी रही और न रहूँगी। मुझे कुछ कहने के बजाय कुछ कर लेना अच्छा लगता है।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ जो ‘आप’ मेरे लिये करते हैं वह अब ‘आपकी’ ही मेहरबानी से मेरे अनुभव में आ ज़रूर जाता है। Point ‘M’ (पाइंट-एम) और इच्छा-शक्ति का बढ़ना सब डायरी में लिख लिया था। सच तो यह है कि ‘आपकी’ एक-एक Writings (पुस्तक) छपनी चाहिये, अब जब भी ईश्वर Time (समय) लायेगा अवश्य। मैं ‘आपके’ इस पत्र के विषय में तो कुछ लिख नहीं सकती, मेरी क्या मजाल है। ऐसी Mastery (स्वामित्व) ऐसी Personality (दिव्य-व्यक्ति) के लिये है ही। भाई मैंने तो वह Personality (परसनैलिटी) ढूंढ ही ली या भाई, उसकी स्वयं ही हम लोगों पर कृपा हुई। मैं कहती हूँ कि यदि साइन्टिस्ट ऐसी Personality (दिव्य-व्यक्ति) को मान कर, लेखों से, पत्रों से, सहायता लें, तो फिर उनसे बड़ा साइन्टिस्ट कोई हो ही नहीं सकता।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ ‘आपने’ जो लिखा कि “सत्रह आने भर मैं न कर सका, मुमकिन है तुम कर ले जाओ”। सो ‘आप’ अपनी बात जाने दीजिये, ‘आपने’ तो किसी आने भर नहीं बल्कि Unlimited (असीमित मात्रा में) किया। हम किन्हीं आने भर भी कर सकें तो कितना अच्छा हो, ‘मालिक’ की कृपा, ‘उसकी’ मेहरबानी सदैव मेरे साथ है। भाई, कुत्ते की किस्मत आला थी। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ ऐसा लगता है कि सूनसान, बियावान, मैदान में चलती चली जा रही हूँ। अब ऐसा लगता है कि जैसे अक्सर ‘आपने’ मुझे लिखा था कि-

बिटिया, यह तो असल शान्ति का तलछट है, सो मुझे न जाने क्यों ऐसा लगता है कि अब उसी मैदान में मैं उसे पार करती हुई, या उसकी छाती पर भागती चली जाती हूँ। कुछ ऐसा है कि बिल्कुल स्वतंत्र सी या ‘आपके’ पत्र में लिखे अनुसार यों कह लीजिये कि अपने से भी वैरागिन सी हुई, बावरी सी किसी की संटी के इशारे से अंधी सी ‘उसी’ की ओर भागती जा रही हूँ, क्योंकि भाई अब रहा नहीं जाता – ‘उसकी’ बेकरारी मुझसे मिलने को मुझे मदहोश, पागल किये है। भाई, मेरा तो यह हाल है कि कौन कहता है कि साधक पूजा करता है, या साधक ‘उससे’ मिलने को बेकरार रहता है, नहीं, नहीं, कुछ भी हो, मेरे लिये तो ‘वही’ पूजा करता है और ‘वही’ मुझसे मिलने को, छाती में छुपा लेने को बेचैन है। हाँ ‘उसी’ की बेकरारी मुझे बेकरार किये रहती है और ‘उसी’ का (यानी ‘उसकी’ बेकरारी का) असर मुझे खींचे लिये जा रहा है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब तो यह हाल है कि हाथ को हाथ नहीं सूझता, ऐसी ही न जाने कैसी मेरी दशा है और ऐसे ही मैदान में मैं पैर रही हूँ। या यों कह लीजिये कि ऐसे ही मैदान में पैर रही हूँ, जहाँ हाथ को हाथ नहीं सूझता। अब तो ऐसा हो गया है कि वह जो मैंने अक्सर ‘आपको’ लिखा है कि “नम्रता की हालत में भिदती जा रही हूँ, वही मेरा रूप हो गया है।“ सो अब न जाने क्यों मैं दशा के होते हुए भी अब उसे भूली सी रहती हूँ, भूल जाती हूँ, परन्तु अन्जाने में भी जब गौर करती हूँ तो उससे भी अब कहीं हल्की व शुद्ध रूप वाली उसी दशा में (यानी नम्रता वाली दशा में) अपने को बिल्कुल घुलता हुआ सा या अपना भिदाव होता चला जाता पाती हूँ। ऐसा लगता है शरीर का या भाई मेरा जर्रा-जर्रा नम्रता मय बन गया है। या सब कुछ नम्रता मय ही बन गया है, परन्तु शायद इसी कारण या न जाने क्यों मैं इसे भूली सी ही रहती हूँ। ‘आपका’ यह कहना बिल्कुल ठीक है कि बेखवरी रहते-रहते बाख़बरी शुरू हो जाती है और यह दशा मैंने शायद ‘आपको’ पहले लिखी भी हो सच में कुछ वही दशा है।

हमारे ‘श्री लालाजी साहब’ से इस ग़रीब की यही प्रार्थना है कि जितना हो सकता है सो जज्बा अपने लिये ‘श्री बाबूजी’ में पैदा कर सकूँ, क्योंकि मुझे तो ‘श्री बाबूजी’ ही चाहियें। इतना प्रेम अपने ‘मालिक’ से कर सकूँ। कैसा समय हम लोगों को दिया, कैसी हस्ती हमें प्रदान की, अब वैसा ही प्रेम ‘मालिक’ से और वैसा ही आशीर्वाद भी कृपया प्रदान करें। अम्मा आपको शुभाशीर्वाद कहती हैं तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मेरे लिये तो सदैव ही होली रहती है, परन्तु मुझ पर दूसरा कोई रंग ही नहीं चढ़ता। मुझे तो उसी से काम।

इतिः-

सदैव 'आपकी' ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-284
शाहजहाँपुर
6/3/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा पत्र मिला इसका जवाब मैं आगे इसी पत्र में दूंगा। इस समय रात के 10 बज चुके हैं और सिर भी भन्ना रहा है, मगर ख़ैर, जो कुछ समझ में आता है, लिखाये देता हूँ और यह पत्र तुम्हारे और शुक्ला जी के लिये होगा। मैंने पिछले पत्र में लिखा है पत्र याद तो नहीं रहा, अटकल से लिख रहा हूँ। Complete Negation (पूर्ण निगेशन) हो जाने से इन्सान Vacuumize (रिक्त) हो जाता है। इस तरह पर कि इस समय तक कोई आला ईजाद नहीं हुआ कि जो किसी चीज़ को Complete Vacuum (पूर्णतः रिक्त) कर सके। मगर इतनी बात और है कि Complete Negation (अपने न होने का पूर्ण भाव) की जब Forgetful State (भूल की अवस्था) आती है, तब कहीं पूरी तौर पर Vacuum (वैक्यूम) बनता है। उसकी ताकत का कहीं ठिकाना नहीं और यह चीज़ अवतारों में भी पाई नहीं जाती। ‘उसके’ हाथ में है कि इससे चाहे Constructive Work (रचनात्मक कार्य) ले, ख़्वाह Destructive Work (विनाश का कार्य) ले ले।

मेरा तरीका यही है कि शुरू से इन्सान Vacuum (रिक्त) बनता चले और ज़ाहिर भी है कि गुरू महाराज ने (कहाँ तक अनेकों धन्यवाद दिया जावे) जब मुझे बिल्कुल ऐसा ही बना दिया, तो फिर वही बीज जाना भी चाहिए। इसलिए अच्छे Guide (मार्गदर्शक) की तलाश की जाती है, और मेरा भाग्य था कि मुझे ऐसे Guide (गाइड) मिल गये। इसमें यह ताकत पैदा हो जाती है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी उसके हुक्म को टाल नहीं सकते। मगर यह बात ज़रूर है कि ईश्वर जब इस Approach (पहुँच) के लिये कोई आदमी ढूंढ़ता है, तो वह ऐसा ही ढूंढ़ता है, कि जो ईश्वर की मर्जी है, वही काम खुद व खुद करे। और मैं तो यह कहूँगा कि वह ऐसे आदमी को उसके गुरू के हाथ में दे देता है और मिलता भी उसी को है, जिसने अपने आपको अपने गुरू के हाथ में दे दिया है। इस Negation (निगेशन) की मैं कहाँ तक तारीफ़ करूँ। असल में यह चीज़ किसी बेहद की beginning (आरम्भ) है। न मालूम अभी और कितना जाना है। हंसी उन लोगों पर आती है कि जो रूहानियत से कोसों दूर होकर रूहानियत का प्रचार Platform (मंच) पर करते हैं।

मैं तुमको आज Perfection (पूर्णता) के मानी बतलाता हूँ। वैसे तो Perfect (पूर्ण) वाक़ई परमात्मा है जिसको दूसरे मानों में जात ही जात कह सकते हैं और इसी मानों में यह शब्द यहाँ पर इस्तेमाल किया है। मगर ख़ैर, जहाँ तक पूरे तौर पर बन्दे का Perfection (पूर्णता) कहा जाता है, वह यह है कि Nature (प्रकृति) से जितनी बातें पैदा हुई या उसमें मौजूद हैं, वह Ignorant (अज्ञानी) रहते हुए सबसे वाक़िफ़ हो। कोई इल्म या Science उससे न बचे। जरा कोई आँच दे दे और उससे वही बातें कुदरती तौर पर निकलने लगे जो वह जानना चाहता हो। यह कसौटी है पूर्ण आदमी की जाँच की।

मैंने अवतार लाने का पिछले ख़त में नुस्ख़ा लिख दिया है, ताकि लोग जब चाहें इस नुस्खे को इस्तेमाल कर लें। इससे सहज नुस्खा भी मुमकिन है धार्मिक पुस्तकों में तलाश करने से मिल जाये। हालांकि जो नुस्खा मैंने बताया है ‘भूमा’ के बाहरी हद के करीब Vacuum (खालीपन) पैदा करने का, मेरे ख्याल से एक सेकण्ड का काम है। Time Limit (समय की सीमा) का इतने अर्से में, अवतार आवे, मुमकिन है, दो-तीन सेकण्ड और ले ले। अब एक चीज़ इसके मुतल्लिक और बतलाता हूँ, कि जब मुसीबत इस हद तक मिलती है कि महात्माओं को भी इस हद तक दिल में ग्लानि पैदा होती है, कि जैसे किसी का दिल बैठा जाता हो, तो भी Automatically Vacuum (अपने आप ख़ालीपन होना) बन जाता है और उनके बगैर जाने बूझे हुये।

यह बात सिर्फ रामावतार के कुछ पहले हुई थी, मगर ज़्यादा Strong (सबल) नहीं थी, जिसका नतीजा रामचन्द्र जी का अवतार था। अब कृष्ण अवतार कैसे हुआ? जो भभूका कि रामावतार के समय फूट चुका था, उसका असर यह था कि वह खुद अपनी असली शक्ल में जो ज्यादा तेज़ था, कृष्णावतार के रूप में सरजद हुआ। इसी लिये वह ज्यादा ताकतवर था। इस ख़्याल को मैं ज्यादा अच्छी तरह Express (अभिव्यक्त) नहीं कर सका, अनुभव से ज़रूर दिखाया जा सकता है। दुबारा अवतार क्यों हुआ? मेरे ख्याल से उस वक्त जरूरत थी।

(डिक्टेट) Dictate:-लाला जी साहब-

“यह ख्याल ठीक है। ऋषियों ने रामावतार से पहले जो कुछ किया था, वह उस वक्त के लिये काफी था, मगर उनका ख़्याल जो कुछ कि असल में शोलाज़न (भभूका फूटना) कृष्णावतार के वक्त हुआ। तभी वह पूर्णावतार थे। अब यह मलका जो इस वक्त है, किसी में पैदा नहीं हुआ। कुदरत भी जब अपने किसी बन्दे को इख़त्यारात दे बैठती है, तो फिर उसमें वह अपना दखल नहीं देती।“

Swami Vivekanand Ji:-

“He becomes part and Parcel of Nature, Nay, he governs it. I am not using the word for God-Almighty. Nature is after God. You can call the present Personality above Nature or nearest God. “

स्वामी विवेकानन्द जी :-

“वह प्रकृति का अभिन्न अंग बन जाता है। नहीं, वह उस पर (प्रकृति पर) शासन करता है। मैं यह शब्द सर्वशक्तिमान ईश्वर के लिए प्रयोग नहीं कर रहा हूँ। प्रकृति, ईश्वर के बाद है। तुम वर्तमान दिव्य-पुरुष को प्रकृति से ऊपर या ईश्वर के निकटतर कह सकते हो।“

एक बात अवतार के बारे में मुझे और याद आ गई। वह यह है कि जो ईश्वर के हुक्म की पाबन्दी नहीं करते और भक्तों को तकलीफ देते हैं, या अच्छे मनुष्यों को दुःखी करते हैं, तो उसको ख़त्म कर देते हैं। Special Personality (विशिष्ट व्यक्तित्व) का भी यही काम होता है, मगर वह कोई ज़ाहिरा तौर पर मार-धाड़ नहीं करता, इस कारण ज्यादातर लोग उसके काबू में नहीं आते। अब एक बात मैं और लिखता हूँ कि अवतारों में Concentrated will (अटल या एकाग्र इच्छा-शक्ति) सिर्फ इसी पर होती है कि जो काम उनके सुपुर्द होता है और उनके सिर्फ एक ही काम सुपुर्द होता है। और भाई रही Special Personality (विशिष्ट-व्यक्तित्व) की ताकत उसकी Concentrated will (कन्सेन्ट्रेटेड-विल) अवतारों की तरह कैसे हो सकती है? इसलिये कि उसकी निगाह कुल Universe (विश्व) में रहती है, जैसे बड़े बादशाह की निगाह अपनी कुल सल्तनत पर। मुमकिन है कि इस ख़त में (विचार) पिछले ख़त के Repeat (दोहरा गए हों) हो गये हों, इसलिये कि पिछला कुछ Thoughts ख़त ज़्यादातर याद नहीं है और यह ख़त कोई मज़मून नहीं है, बल्कि जैसे विचार आते गये, लिखाता गया।

अब अभ्यासी Negation (निगेशन) और उसके बाद वाली हालत के काबिल कब बनता है? और कैसे उस हालत को पहुँचता है? एक तो जवाब इसका यह है, कि अगर Guide (मार्गदर्शक) इस हालत को पहुँचा हुआ है, तो उसकी मेहरबानी से वह पहुँच सकता है। अभ्यासी को यह चाहिये कि ‘उसे’ यह हालत देने पर मजबूर कर दे। अब यह कैसे हो सकता है? यह सब लोग जानते है; जिसके पास अक्ल है। वैसे भाई मेरा तो यह हाल है कि मैंने बहुत कुछ approach (पहुँच) एक साहब को डाट-डपट से दी थी और वह इसलिये कि मैं उनको खुश रखना चाहता था और वह उम्र में मुझसे बहुत बड़े भी थे, इसलिये और भी। मगर ईश्वर का धन्यवाद है कि मैंने उनको सिर्फ A, B, C, D, (ए, बी, सी, डी,) ही बता पाया था कि उनका रंग बदलने लगा। नतीजा उसका यह हुआ कि उन्होंने खुद ब खुद ऐसी बातें पैदा कर लीं और वह मुझसे ख़िलाफ़ हो गये। वह अपने आप इस कदर नीचे आये कि किसी दीन के न रहे और मैं उनकी अब भी इज्जत करता हूँ और बड़ा समझता हूँ। मेरे दिल में उनसे इतनी मोहब्बत भी है जितनी कि इन्सान को इन्सान से हो सकती है और अब दूसरी कमज़ोरी यह है कि अभ्यासी को मैं ठहरा हुआ नहीं देख सकता। इसका फायदा भी लोग उठा जाते हैं और जल्दी तो मेरे मिज़ाज़ में है ही। दूसरी चीज़ जो Negation (निगेशन) और उसके ऊपर तक पहुँचा सकती है वह तड़प और बेक़रारी है और भक्ति और प्रेम तो होना ही चाहिये। अगर प्रेम पैदा हो जाता है तो बेचैनी होना ज़रूरी है। अब तुम अपने सत्संग में टटोल लो कि कौन वाकई तौर पर ईश्वर का प्रेमी है।

किसी को एक मोहब्बत है, किसी को 1/2, किसी को 1/4 और इतने गिरे हुए भी निकलेंगे कि अगर उनको समझाने के लिये कोई सख़्त मजमून लिख दिया जाय तो सत्संग छोड़ने पर तैयार हो जायेंगे और किसी की तबियत में मलाल और गुस्सा पैदा हो जायेगा। इसके मानी यह है कि अपना आपा छोड़ने के बजाय उसको और मज़बूत करते हैं। भाई, मुझे तो लोग मुमकिन है, यह समझते हों कि यह मेरी Duty (कर्तव्य) है जो मैं कर रहा हूँ और यह सही भी है, मगर उन्हें इतना और सोचना चाहिये कि जितना वह Deserve (योग्य होंगे) करेंगे, उतनी ही मेरी Duty (ड्यूटी) होगी। मुझे सबसे मोहब्बत है, मगर उतनी, जितनी कि मेरा फर्ज़ है। मैं सबको मर मिटने के लिये कहता हूँ, मगर अफसोस यह है कि जो मर मिटने की Elementary (प्रारंभिक) बातें हैं, उस पर लोगों की निगाह नहीं जाती। मैं भी भाई, मजबूरन खुशामद-बरामद से काम निकालता हूँ। मुझे अक्सर पत्रों में शब्द बहुत तौल नाप कर रखने पड़ते हैं, इसलिये कि कोई बुरा न मान जावे।

Negation (निगेशन) का ख़ास तौर पर और सब आध्यात्मिक बातों का देने वाला तो ईश्वर ही है, इससे सबको इकरार है, मगर भाई, मुझे तो जो कुछ मिला, वह अपने गुरू महाराज से ही मिला। यह जरूर है कि ईश्वर का मुझे बहुत ज़्यादा शुक्रिया अदा करना चाहिये। इस बात का कि मेरी तबियत उसने ऐसी बना दी कि ऐसे बड़े महात्मा से मैं रूजू हुआ। ईश्वर से काम निकालने का तरीका यही है, जो हम अपने गुरू के साथ करते हैं और उससे Direct (सीधे) प्रेम भी पैदा हो सकता है और यह बहुत अच्छी चीज़ है। मगर इस चीज़ के करने वाले बहुत कम हुए हैं। हालांकि इससे अच्छा तरीका कोई भी नहीं हो सकता। अभ्यासी को चाहिए कि अपनी लगन बढ़ाता जाय और अगर ज्यादा न सही तो अपने Guide से इतना ही Submission (लगाव)) रखे जितना मख़तब में लड़के अपने उस्ताद से रखते हैं और भाई इतनी Duty (ड्यूटी) भी है। इस चीज़ से Guide को कुछ नहीं मिल जाता, बल्कि अभ्यासी को यह फायदा होता है कि वह चीज़ आने के लिये पात्र बन जाता है। जो वाकई Guide (गाइड) है, उसको अपनी इज्जत या शोहरत की आशा नहीं होती, बल्कि मिसालें ऐसी भी मिलती हैं, कुछ फ़कीरों की, कि जिन्होंने जाहिरा बातें ऐसी भी की हैं, जिससे Public (जन-सामान्य) उनकी इज्जत न करे और शिष्य भी छंट-छंटाकर ख़ास ख़ास रह जावें। ऐसी एक मिसाल कबीर की भी मिलती है कि उन्होंने एक समय पर ऐसा ही किया था।

भाई, शुक्ला जी ऐसे बनो कि मैं उस हालत को आप में दाखिल कर सकू कि जो मुझको सबसे प्रिय है। अगर यह न सही तो कम-अज-कम मेरी ज़िन्दगी में Complete Negation (पूर्ण निगेशन) की ही हालत पैदा कर लो और यह मैं सबसे कहता हूँ। मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि हमारे गुरू महाराज की संस्था गो सबसे छोटी है, मगर इस प्रकार की Masterly (आधिपत्यपूर्ण) तालीम संसार में किसी संस्था में नहीं मिलेगी और यह सही भी है कि हर युग में इस चीज़ के जानने वाले और सीखने वाले कम ही हुए हैं।

जिसको मोक्ष प्राप्त करना हुई, वह सच्ची लगन से इस तरफ लगा। इस जमाने में लोग बहुत से मोक्ष चाहते ही नहीं, इसलिये कि वह मोक्ष के मानी और हालत न समझते हैं और न समझने की कोशिश करते हैं। उन्होंने मोटर और कोठी का होना और रुपया ज़रूरत के लिहाज़ से काफ़ी होना ही मोक्ष से अच्छा समझ लिया है। यह उनके समझ में नहीं है कि अगर कहीं यह चीजें उनसे छिन जावें तो फिर उनकी खुशी का क्या हाल होगा और देखा तो यह गया है कि बहुत ज़्यादा रुपये वाले इस क़दर फ़िक्रमन्द रहते हैं कि किसी को नींद न आने का मर्ज़ और किसी को और कोई मर्ज हो जाते हैं। उनको तमाम जीवन भर मूंग की दाल और रोटी-तुरई और लौकी से ही साबका रहता है।

हमारे भारतवर्ष में स्वामी लोगों ने और खासकर सन्यासियों ने हम पर वह अत्याचार किये हैं और कर रहे हैं और ऐसा नुकसान पहुँचा रहे हैं कि मुसलमानों की तलवार भी नहीं पहुँचा सकी और हमारी अक्ल पर भी पर्दे पड़ गये। हमको Right और Wrong (सही और गलत) की तमीज़ जाती रही और रंगीन कपड़ों पर हम इस हद तक गिरे कि अपनी समझ Exercise (क्रियान्वित) करने को हमने कुफ्र समझा। काबिल सन्यासियों पर भी मुझे यह एतराज़ है कि उन्होंने नाकारा आदमियों को क्यों सन्यास दे दिया? जिसकी वजह से वह अपने आप को गुरू और काबिल समझने लगे। उसमें से जो पढ़े लिखे थे, वह सब Stage (मंच) पर उगलने लगे। अपना Experience (अनुभव) उनका कुछ भी नहीं। अब कुछ काबिल भी उनमें हैं। उन्होंने क्या काम किया कि दिक़ के मर्ज़ को उन्होंने और अच्छा करके बतला दिया।

अगर कोई शख्स ठोस पूजा में रमण करता है, फिर उसकी बड़ी तारीफ़ होती है और जब वह खुद बतलाते हैं तो ठोस किस्म की पूजा ही। वजह क्या है? मैं यही कहूँगा कि वह गिरोहबन्दी कायम करना चाहते हैं। मैं अपने तुच्छ विचार के अनुसार यही कहूँगा कि जिस संस्था में असली आध्यात्मिक शिक्षा नहीं है, वह गिरोहबन्दी ही है। जितने तरीके उनको बतलाये जाते हैं, उससे वह परमात्मा के निकट होने के बजाय और दूर हो जाते हैं। गोया लकड़ी से वह फ़र्नीचर बन जाते हैं। इससे तो यही अच्छा था कि वह कुछ न करते और हरी लकड़ी रहते कि जिस तरफ़ ज़रूरत होती, झुका दिये जाते। अब तो सन्यासी का मुख्य कर्म यही रह गया है कि Revival of Stone age (पत्थर-युग की पुनरावृत्ति) और जनता को यह चीज़ खूब पसन्द आती है और ऐसे ही आदमी को लोग महात्मा समझते हैं और उनको Submit (शरण जाना) भी करते हैं।

यह ऐसी बवा फैली है कि इसको ताउन और हैजे की बीमारी कहना चाहिये। कबीर साहब ने कितना सुन्दर कहा है- “ब्रह्म छाँड़ि पूजन लागे पथरा।“ मूर्ति पूजन तो सबसे ज़्यादा ठोस पूजा है, बल्कि जाप वगैरह जो बतलाते हैं, वह भी ठीक नहीं बतलाते, जिससे लोग और ख़राब हो जाते हैं। गर्जे मैं कहाँ तक कहूँ; संक्षेप के साथ अभ्यासियों के लाभ के लिये बयान कर दिया। मुझे तो भाई कहना ही है, वह भी चन्द आपस के लोगों से इन सन्यासी और उनके Followers (शिष्यों) से मैं कहूं, तो वह मुझसे नाराज हो जायें, इसलिये खामोश हूँ और सोच कर रह जाता हूँ। इतनी Warning (चेतावनी) मैं ज़रूर दे सकता हूँ, कि कुदरत इस चीज़ को बड़ी तेज निगाह से देख रही है और नहीं मालूम क्या होता है। यह जरूर है कि कुदरत ने जो भी इख़त्यारात मुझको दे दिये हैं, उसमें उसको इतनी मेहरबानी है कि वह दखल नहीं देती। मगर मैंने अपने आपको और कुदरत ने भी मुझको गुरू महाराज के हाथ में दे दिया है, इसलिये बन्दे को हुक्म का इन्तज़ार रहता है।

एक मुश्किल यह भी है कि आप लोग मेरा ज्यादा समय लेते रहते हैं, इसलिये मुझको ईश्वरीय काम करने के लिये ज्यादा समय नहीं मिलता। समय ज्यादातर कौन लोग लिया करते हैं, जिनको ब्रह्म विद्या की असली मानों में प्यास नहीं है। अगर वह Submission (शरणागत) भी कर लें तो भी मेरा बहुत समय बच जावे चाहते लोग यह हैं कि चीज़ मुफ्त मिल जावे और मेहनत न करना पड़े। मुझे इसमें कुछ आर नहीं, क्यों कि मैं तो इसलिये बनाया ही गया हूँ। मगर इस सेवा के ही एवज़ में मुझ पर लोग तरस खायें ताकि मुझको और कामों का भी अवसर मिल जावे। अगर अभ्यासी वाक़ई तौर पर ऐसे बन जायें जैसा उनको होना चाहिये तो मेरे पास से चीज़ खुद व खुद उनमें जाती रहे। इस पत्र का और इससे पिछले पत्र का मतलब यही है कि लोग सब फेर को छोड़कर सिर्फ एक ही फेर में पड़ जायें और इन चीज़ो को देखकर उनमें, ब्रह्मविद्या को सीखने की तड़प और शौक़ पैदा हो जावे। ईश्वर करे ऐसा ही हो।

बिटिया व शुक्लाजी, मैंने यह लम्बे-चौड़े पत्र लिखकर आपका बड़ा समय नष्ट किया है। कहीं आप लोगों के दिल में यह ख्याल तो पैदा नहीं होगा कि इतनी देर अगर अभ्यास करते या मैं इतनी देर आप लोगों को तवज्जोह देता, जितना समय मैंने खत लिखने में लगाया है तो ज़्यादा फायदा होता। सो आप लोग पत्र को ज़रा पढ़कर तो देखें तो मालूम हो जायेगा कि आप लोगों का समय नष्ट नहीं हुआ और ‘मालिक’ की कृपा से यह चीज़ मेरे हर ख़त में मिलेगी।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-285
लखीमपुर
6/3/1953
मेरे परम् पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा पत्र पहुँचा होगा। केसर की तबियत वैसे तो ठीक है, परन्तु ज़ुकाम खाँसी अभी है, उसमें भी लाभ है। ‘मालिक’ की कृपा से बड़े भइया को दिल्ली में Service (नौकरी) रेलवे Exhibition Train (एक्ज़बीशन-ट्रेन) में मिल गई है। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई अब तो ऐसा लगता है कि अब तक की सारी दशा मुझमें लय हो गई हैं, ख़त्म हो गई हैं। अब तो जो दशा मैंने अक्सर लिखी है कि निगाह में ऐसा लगता है कि एक तस्वीर कुदरतन सी ही खिंची हुई है, परन्तु अब न जाने क्यों मुझे नहीं मालूम है या नहीं है मैं तो वह भी बिसर सी गई हूँ, या यह कहिये ‘मालिक’ ने इसके भी एहसास से स्वतंत्रता दे दी है। न जाने क्यों मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब कुछ Practical (व्यवहारिक रूप में भी) में भी यानी अंधेरे, उजेले किसी का कुछ एहसास ही नहीं रह गया है। कभी-कभी अंधेरे में यह ध्यान भी दूं कि अंधेरा है तो भी अंधेरे का एहसास नहीं होता और यही हाल उजेले का हो गया है। अब तो भाई, ज़रूरत कुछ करा ले, चाहे अंधेरे में उजेले की सूझ दिलाये या कुछ वरना मुझे किसी की आवश्यकता नहीं रह गई है। सच तो यह है, कि मुझे इनकी तमीज़ ही नहीं रह गई है। मैं सब चीजों की ख़ासियत को कतई भूल चुकी हूँ। मैं तो जहाँ हूँ, बस ‘मालिक’ से मतलब यदि तड़प को ही मैं कह लिया जावे तो शायद ठीक होगा। मेरे ‘बाबूजी’ ऐसा लगता है कि खुद अपने ही अन्दर मैं गुम हो चुकी हूँ। बस ऊपर जो मैंने तड़प लिखी है, वही मैं समझ लिया जावे। अब तो न जाने कैसे ऊपर लिखा सब कुछ मुझसे ओझल हो चुका या भाई, मैं खुद ही ओझल हो गई हूँगी। न जाने क्यों अब नम्रता, अनम्रता की भी दशा मुझे नहीं मालूम पड़ती। ऐसा लगता है कि उस (नम्रता की दशा में) दशा में मेरा फैलाव हो गया है और वही दशा फैल कर एक समान रूप में सब ओर बहने लगी है। अब तो कुछ यह हो गया है कि अपना फैलाव कभी नहीं महसूस होता है, वह तो ख़त्म हो चुका; बल्कि दशा ही फैली महसूस होती है। मुझे मालूम नहीं, शायद मैं उसमें घुली रहती हूँगी। अब तो भाई दशा का इतना सहज-रूप हो गया है कि ऐसा लगता है कि मानों कुदरतन ही एक हालत है। कोई, किसी प्रकार का Weight (वजन) वगैरह का लेशमात्र लगाव दशा में छू तक नहीं गया है, बिल्कुल निखालिस, अब मेरी दशा है। ऐसा लगता है कि दशा अपने शुद्ध रूप में निखर आई है। अब कुछ यही या ऐसी ही दशा मुझे महसूस होती है। सब ओर, सब तरफ यही या ऐसा ही महसूस होता है। अब तो कुछ ऐसी दशा है कि कुछ ऐसा महसूस होता है कि ‘मालिक’ पर मेरी सारी कलई खुल जाती है। ऐसा लगता है कि बिल्कुल Naked (नग्न) सी ही हर समय रहती हूँ या Naked (नग्न) हो गई हूँ। मेरे ‘श्री बाबूजी’ ऐसा लगता है कि अब दशा क्या है, बिल्कुल शीशा (आईना) है। ‘आप’ ने लिखा था कि “तुम जल्दी-जल्दी एहसास करो” मैं अब बहुत जल्दी की ही कोशिश में लगी हूँ। खैर, ‘मालिक’ जाने। जैसी ‘उसकी’ मर्जी। अब तो मेरी दशा बिल्कुल Naked (नेकेड) हो गई है। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा केसर प्रणाम कहती हैं। इतिः-

सदैव 'आपकी' ही, स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-286
शाहजहाँपुर
6/3/1953
प्रिय बेटी, शुभाशीर्वाद।

इतनी आल्हा लिखने के बाद अब तुम्हारा चौथी मार्च सन् 53 के पत्र के उत्तर लिखाने का अवकाश मिला। इसको आल्हा मैंने यूं कहा है कि जब लोग आल्हा सुनने जाते हैं, तो उतनी देर के लिये तबियत में हिम्मत आ जाती है। ऐसे ही मेरे पत्रों को सुनकर थोड़ी देर के लिये अपनी तबियत ताज़ा कर लेते हैं, इसलिये उसको आल्हा ही कहना चाहिये। राम कहानी तो यह उस समय बन सकती है, जब कि अभ्यासी इतनी तड़प पैदाकर लें कि बिला उसके हासिल किये हुये उनको चैन ही न आवे।

मैं तुम्हारे साहस और Faith (विश्वास) पर बहुत खुश हुआ। मगर Faith (फ़ेथ) की इससे ऊंची भी अवस्था है, जो मुझ पर एक बार गुजरी है। जब वह आवेगी, तो मैं लिख दूंगा। वह चीज़ भी अभी बहुत दूर है, मगर पैदा इसी तरह से होती है, जो तुम्हारी हालत है और मैं तुम्हारी हालत देख-देखकर बड़ा खुश होता हूँ और सबसे प्रशंसा भी करता हूँ, यानी उन लोगों से, जो इस रास्ते पर चल रहे हैं, मगर मैं अपनी निगाह को क्या करूँ। मुझे तो उन्नति के सागर में अभी बुलबुला ही दिखाई देती हो। बिटिया! कहीं यह न कह बैठना कि मेरा सब प्रेम और परिश्रम केवल बुलबुले भर ही उन्नति बताई है, सो बिटिया! इसके लिये मैं क्या करूँ कि इतनी तरक्की करने पर भी तुम बुलबुले मात्र दिखाई देती हो। कहीं यह मेरी निगाह का कसूर तो नहीं है।

चिन्ह ऐसे ज़रूर हैं कि अगर यही शौक बना रहा जैसी कि उम्मीद है, तो आला दर्जे की तरक्की का आनन्द ईश्वर ने चाहा चक्खोगी। तुम्हारा पत्र बता रहा है कि मेरे जुनून की आँच तुम पर कुछ ज़रूर असर कर गई है। अगर इतनी ही बात अभ्यासियों में पैदा हो जाये तो भी बहुत कुछ सुधर जायें। तुमने शुरू में प्रेमी का भाव लिया था, जिसका नतीजा यही होता है कि अभ्यासी प्रीतम बन जाता है, मगर अभी पूरी तौर पर तुम प्रीतम नहीं बन सकी। हो सकता है कि यह चीज़ बहुत कुछ किसी वक्त पैदा हो जावे। मगर मैं यह जरूर कहूँगा कि अभी तक पूरे तौर पर अपना आपा मिट नहीं सका। यह चीज बहुत कुछ आगे बढ़ कर ईश्वर देता है, तो कुछ न कुछ नसीब हो जाती है।

असल में तो अपना आपा Complete negation (पूर्ण निगेशन) में जाता है और दर्जे मेरी समझ से जिसको असल महत्वगीरी कहते हैं, उसके बाद शुरू होते हैं। यह किसको ख़बर है? मुझे तो अब किसी किसी समय यही तड़प रहती है कि लोग इस हालत को पहुँचे। तुमने लिखा है कि “नम्रता की हालत में भिदती चली जा रही हूँ” और फिर लिखा है कि “वही मेरा रूप हो गया है और उस दशा के होते हुए भी मैं उसे भूली सी रहती हूँ” और यह भी लिखा है कि “उसमें भिदाव होता चला जा रहा है।“ यह तो बड़ी अच्छी हालत है और इसके मानी यह हैं कि तुम उसकी लय-अवस्था के किनारे पर आ गई। मैं अभी देखता हूँ कि तुम किस क़दर अपने आप भिद रही हो और अपनी कोशिश से कितनी हो सकती हो? ऊपर तो मैं तुम्हें ले ही जा रहा हूँ, उसका असर भी इसमें लय-अवस्था हो सकता है और कहीं मुझे उचंग आ गई तो मुझसे यह भी कुछ दूर नहीं कि मैं इसमें तुमको लय कर दूं या लय करने की शक्ति पैदा कर दूं। यह सब ‘मालिक’ की मौज पर है, तुमको मैं नीचे छोड़ना नहीं चाहता। मैंने तुमको इस समय पत्र लिखाते-लिखाते ‘N’ (एन) स्थान पर खींच दिया है। ईश्वर ने चाहा तो दो-चार रोज़ में, ही उसकी सैर भी शुरू हो जावेगी। वक्त 9.50 P.M. (पी.एम.) है, जब ‘N’ (रात्रि 9 बजकर 50 मिनट पर) पर खींचा है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-287
लखीमपुर
9/3/1953
मेरे परम् पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा पत्र पहुँचा होगा। छोटे भइया तथा मंजू के भी बड़ी चेचक निकली हैं, आशा है आज शाम से बाग़ ले जायें कोई फिक्र की बात नहीं है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

ता. 7,8 कुछ ऐसी दशा रही, जैसी कि एक Stage (स्थिति) और आने वाले Stage (स्टेज) के बीच की, यानी दोनों के बीच की दशा रही, इसीलिये हर तरह से सुस्ती सी रही। परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से कल से यानी ता. 8 की शाम से 6 या 7 बजे से दशा बदल गई है। अब तो ऐसा लगता है जैसे कोई, कुछ भी दशा ही नहीं है। अब तो यह हालत है कि ख़्याल में ‘मालिक’ का ख्याल, चाहे वह बेख्याल ही हो, जाने रहता है या नहीं। रहे या न रहे और रहे कहाँ जब तब ख़्याल या बेख़्याल ही अपना न रहा। अब ऐसा लगता है कि दशा और भीतरी या गम्भीर हो गई है। भाई, ऐसा लगता है कि कल शाम को ‘आपने’ कृपा करके ‘N’ point (एन पॉइंट) पर खींच दिया है। सैर भी शुरू हो गई है, बहुत-बहुत धन्यवाद है। ख़्याल और बेख़्याल की जगह तो सफाचट मैदान लहरा रहा है। पूज्य श्री बाबूजी अब महसूस होना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उससे शायद ख्याल को ज़ोर मिलता है। बेख़्याल होना यूं नहीं कहा जा सकता कि वह हालत तो कब की ओझल हो चुकी और कहीं उसका (यानी बेख़्याली दशा) का ध्यान आ जावे तो लगता है कि तबियत अपनी दशा से किसी अरोचक दशा में पहुँच गई, इसलिये अब तो ऐसा ही कह लीजिये कि जो है, जैसा है, बस है, ‘मालिक’ जाने। अब तो ऐसा लगता है कि निगाह और शीशा हो गई है, नहीं-नहीं तबियत या दशा ही और आईना हो गई है। कुछ ऐसा होता है कि जब दशा दो Point (पॉइंट) के बीच की होती हैं, तो ख़्याल उथला सा रहता है और जहाँ ऊपर Point (पॉइंट) पर 'मालिक' ने खींचा, बस सोई दशा को फिर गम्भीरता तथा चलने का मैदान मिल गया। जब आगे का रास्ता खुला मिलता है। तो फिर उस पर चलना तेज़ी से शुरू हो गया। शायद ‘मालिक’ ने अनुभव भी कुछ शीघ्र कराना शुरू कर दिया है। परन्तु न जाने क्यों कुछ यह भी होता है कि ज्यों-ज्यों ख़्याल को या दशा को गम्भीरता मिलती है, त्यों-त्यों वह उथला होता है। अब तो ऐसा लगता है कि सब दशा वगैरह सफाचट आईना हो गया है। अब तो दूर से भी कुछ बात आई कि झलक पड़ी परन्तु वह आईना ‘मालिक’ ने बहुत दूर रखा है, इसलिये ‘मालिक’ का दिया आईना साफ़ ही रहता है। ‘उसके’ बनाये आईने पर ‘उसी’ की मेहरबानी से किसी की झलक पहुँचने नहीं पाती, इसलिये वह ज्यों का त्यों रहता है। आत्मिक-दशाओं की झलक तो उस आईने को और भी उज्ज्वल बनाती हैं, इसलिये उन्हें ‘मालिक’ जाने। और ‘उसकी’ कृपा से वह और साफ़ ही होता जाता है। तबियत का तो अब यह हाल है कि उसमें तो कोई चीज़ कोई बात है ही नहीं। वह तो बस आईना ही बनी हुई है। अब कुछ है यह है कि मुझे पहले की तरह इतना यह महसूस नहीं होता कि ‘वह’ मेरे लिये बेक़रार है। परन्तु फिर भी खिंची तो बेरोक-टोक मैं जा रही हूँ। ऐसा लगता है कि ‘उसी’ में मिटी जा रही हूँ। ‘बाबूजी’ क्षमा कीजियेगा पत्र बहुत जल्दी में लिख रही हूँ, पूज्य मास्टर साहब जी बैठे हुए हैं, इसलिये कुछ ‘आपको’ पढ़ने में शायद दिक्कत पड़े, ख़ैर, क्षमा करियेगा। इतिः-

सदैव 'आपकी' ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-288
लखीमपुर
12/3/1953
मेरे परम् पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा पत्र पहुँचा होगा। आज शायद दद्दा भी पहुँच गये होंगे। ताऊजी केसर को आज कानपुर पहुँचाने गये हैं। छोटे भइया तथा मंजू की चेचक परसों से भर गई है। खिचड़ी वगैरह खाने लगे हैं। ख़ैर, ता. 18 से इम्तहान है, तब तक ठीक ईश्वर की कृपा से हो जायेंगे। आशा है ‘आपकी’ तबियत भी ठीक ही होगी ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है सो लिख रही हूँ।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ अब तो मेरा यह हाल है कि “दास कबीरा जुगति सों ओढ़ी ज्यूं की त्यूं धरि दीन्ही रे” अब तो न जाने कुछ जो Automatically (अपने आप) ही निगाह में या ख़्याल में ‘मालिक’ रहता था, परन्तु अब ऐसा लगता है कि मैं इससे भी ओझल हो गई हूँ। या यों कह लीजिये कि Automatically (अपने आप) पना ही अब स्वतः ही गायब हो गया। न जाने क्यों कुदरतन भी जो ‘उसका’ ध्यान निगाह में रहता था, उसे यदि ख्याल भी कहूँ तो अच्छा नहीं लगता है। अब तो यह दशा हो गई है कि अब जो है, जैसी दशा है, सोई न जाने क्या ख़्याल में रहती हूँ। नहीं, नहीं, भाई अब तो ‘मालिक’ की कृपा से कुछ यह दशा है कि जो है, सो है और मैं कुछ नहीं जानती।

मेरे ‘बाबूजी’ अब निगाह या तबियत को आगे चलने की या आगे की दशाओं में ही इतना शुद्धपना या भाई इतना अच्छा लगता है कि वह तो सदैव उधर ही, आगे पर ही डटी रहती है। अब तो ऐसा लगता है कि एक आईना की तरह ही और एक ही आईना सा सब ओर महसूस होता है। या यों कह लीजिये कि अब ऐसे ही मैदान या दशा में मैं पैर रही हूँ। परन्तु अब इधर मैं देखती हूँ कि अधिकतर शायद इस दशा को मैं भूली सी ही रहती हूँ, कुछ स्मरण नहीं रहता और जब ख़्याल आता भी है, तो न जाने क्यों अब आईना की तरह, जो मैंने लिखा है, वह उतना साफ महसूस नहीं होता है और बहुत हल्की तौर पर महसूस सा होता है। ऐसा लगता है मेरे ‘बाबूजी’ कि वह दशा या मैदान भी हल्का हो गया है। धुंधला सा हो गया है और वह भी घुलता सा या समाप्त हुआ सा, अब धीरे-धीरे ओझल सा ही हुआ जा रहा है। मेरी याद से परे हुआ जा रहा है।

जिया के पत्र से मालूम हुआ कि बिब्बो का बुखार अब उतर गया है, पहले से ठीक है, परन्तु अभी प्लास्टर चढ़ा हुआ है। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा केसर प्रणाम कह गई हैं।

सदैव केवल आपकी ही, स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-289
शाहजहाँपुर
14/3/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत 9 मार्च सन् 53 का भी मिल गया। तुम्हें मालूम है कि जो मुकाम तुम तय कर रही हो, उसके नाम मैंने A,B,C,D रख दिये हैं। जहाँ तक कि हमारा ख़्याल है, A से Z (ए से ज़ेड) तक जाने कितनी गिन्तियाँ ख़त्म हो जायेंगी। मुकामात के गिनने का तजुर्बा कर रहा हूँ। तबियत ज़रूर घबराती है कि कब तक गिनता रहूँगा। तुम बताओ मुझे क्या करना चाहिये? वैसे इससे अच्छा और हो ही क्या सकता है कि हर मुकाम की सैर होती चले। जब हम ऊपर को खींचते हैं, तो एक निगाह सैर कराने की ज़रूर डाल देते हैं, मगर तुम्हें सैर कराने की तबियत यूं चाहती है कि तुम्हारा एहसास ईश्वर की कृपा से बहुत अच्छा है। चीज़ उतनी ही सब में पैदा हो जाती है, मगर अभ्यासी जान नहीं पाता। मुझे अपने बारे में पता नहीं है किन्तु ‘लाला जी’ साहब ने फ़रमाया है कि महासमाधि लेने से पहले जब मैं आपके यहाँ चन्द दिनों के लिये गया था, कमाल दे चुके थे। मगर उसके बाद बारह साल और लिये और इस दौरान में जाने क्या-क्या मुकामात और क्या-क्या सैर कराई और फिर जब हालत मौजूदा खुलना शुरू हुई तो फिर तीन महीने रात-दिन मुझ पर रूजू रहे। रात में मैंने यह अनुभव किया है कि बराबर मुझको आध्यात्मिक Force (शक्ति) से भरते रहते थे। मेरी अक्ल काम नहीं करती क्योंकि मिज़ाज़ में जल्दी है और चाहता यह हूँ कि जिन लोगों को शौक है, और मोहब्बत है, उनको कम से कम पाँचवे Circle (सर्किल) तक पहुँचा ही दूं, ताकि मैं उनसे फारिग होता चलूं। उसके बाद वह हिम्मत करें तो मैं और आगे बढ़ाऊं। अब मास्टर साहब से मैं बेफिक्र हूँ। निगाह ज़रूर कभी-कभी डाल लेता हूँ, यह तो मेरा फर्ज़ ही है। उन्हें मिशन की मोहब्बत और काम अब आगे बढ़ा रहा है।

कभी-कभी ख़्याल तुम्हारे बारे में भी आ जाता है, कि पाँचवे Circle (सर्किल) तक खींच दूं ताकि तुमसे भी इत्मिनान हो जाये। मगर यह न समझ लेना कि इससे आगे मैं किसी को बढ़ाना नहीं चाहता। मुझे तो खुशी उस वक्त हो, जब मुझसे भी ज्यादा लोग तरक्की करें। हमारी तरक्की ही क्या - एक सोये हुये से हैं और सोने का एहसास नहीं। मगर ख़ैर, जो कुछ भी है, उसका शुक्र अदा करता हूँ और चाहता यह हूँ कि लोग इससे ज़्यादा हिम्मत करें। अगर कहीं दस-बारह भी मुझसे बन गये और बोलने के लिये उनकी जबान भी पैदा हो गई तो ईश्वर ने चाहा मिशन का नक्शा ही बदल जायेगा। अब तुम्हारे ख़त का जवाब देता हूँ। तुमने लिखा है कि “दशा और भीतरी व गम्भीर हो गई है।“ इसके माने यह है कि लय-अवस्था और बढ़ गई और यह उस मुकाम की लय-अवस्था है जहाँ पर कि तुम हो। हर मुकाम पर लय-अवस्था और सारूप्यता की हालत होती है। तुम्हें ‘N’ Point (एन पॉइंट) पर मैंने खींच दिया था और यह एहसास सही है।

हम ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते जाते हैं, सूक्ष्म होते जाते हैं। यहाँ तक कि हम कुछ नहीं रहते। हमें कुछ न रहना ही चाहिये। अब थोड़ा सा और बताता हूँ। हम जब सूक्ष्म होते हैं तो, हमारे चित्त में सूक्ष्म लहरें उठा करती हैं और हम जब कुछ नहीं रहते तो चित्त में लहरें उठ जाना बन्द हो जाती हैं। लहरें चाहे जितनी सूक्ष्म क्यों न हो, कुछ न कुछ हमारी शान्ति में बाधा ज़रूर डालती हैं और Senses (वृत्तियाँ) भी कुछ मज़े का एहसास करते रहते हैं। अब उनसे छुटकारा तभी हो, जब हमें सूक्ष्मपने से छुटकारा मिले। संक्षेप में लिख दिया, इतनी ही इसकी ज़रूरत थी।

आज इस समय 9.20 A.M. (प्रातः) पर ता. 15.3.53 पर तुम्हें ‘O’ (ओ) स्थान पर खींच दिया। अम्मा को प्रणाम।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-290
लखीमपुर
16/3/1953
मेरे परम स्नेही ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा पत्र ‘आपका’ आज मिला - पढ़कर हर्ष हुआ। मैं वास्तव में Point ‘O’ (पॉइंट ओ) के धन्यवाद के लिए ‘आपको’ पत्र लिखने वाली थी, परन्तु आज ‘आपके’ पत्र का इन्तज़ार था, बहुत-बहुत धन्यवाद है। ईश्वर की कृपा से बड़े भइया दिल्ली Exhibition (नुमाइश) में 250/- की Pay पर Service (नौकरी) में अभी डेढ़-दो महीने को लग गये-अम्मा तथा सब लोग ‘आपको’ बधाई देते हैं।

‘आपने’ अगले पत्र में लिखा था कि “उन्नति के मार्ग में अभी तुम मुझे बुलबुला दिखाई देती हो” और यह लिखा है कि “कहीं यह मेरी निगाह का कसूर तो नहीं है”। यह ‘आपने’ बहुत ठीक लिखा है। ऐसा ही, क्योंकि पहले नहीं, परन्तु अब मैं कुछ ज़रूर ‘मालिक’ की कृपा से समझने लगी हूँ, क्योंकि मैं देखती हूँ कि मेरे ‘मालिक’ का हृदय अगाध है, और जिसके बारे में केवल ‘नेति’ ही कहा जा सकता है। उसमें तो ऐसा है कि “जोई जोई पैरूँ, तेई ऊबरू” यानी जैसे-जैसे पैरती हूँ, वैसे-वैसे उथली ही पाती हूँ, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा भी अगाध है, यह मैं भली-भाँति जान गई हूँ। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ ‘आपने’ अपने इस पत्र में लिखा है कि “तुम्हारा अनुभव अच्छा है” परन्तु मैं तो यही कहूँगी कि यह दिया किसका है। केवल ‘आपकी’ ही मेहरबानी ने मुझे यह भी बख़्श दिया है। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो ‘श्री बाबूजी’ कमर बाँधकर संग चलने को तैयार हूँ। जहाँ ले चलियेगा।, वहाँ चलूंगी- जो दिखाइयेगा, देखूंगी। परन्तु जनून सदा बढ़ता ही जावे, यहीं निशि-दिन ‘मालिक’ से मेरी प्रार्थना है। ता. 15.3.53 से जो दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो ऐसा लगता है कि उस नम्रता के सागर में डूबी रहती हूँ। परन्तु अब नम्रता का वह रूप पहले वाला नहीं है, बल्कि ऐसा लगता है कि नम्रता पिघल गई है, उसी पिघली हुई नम्रता के सागर के भीतर या सागर में पैठ गई हूँ। शायद इसी कारण अब वह भिदाऊ नहीं महसूस होता है, बल्कि अब सब ओर, हर समय वही सागर है और मैं उसी में पैठी हूँ। नहीं बल्कि भाई अब तो कुछ ऐसा हो गया है कि मैं उस सागर को पीती सी जा रही हूँ गटकती सी जा रही हूँ, इसलिये ऐसा लगता है कि वह मुझमें सब गटकता सा जा रहा है और सारा का सारा ऐसा लगता है कि मुझमें समाया जा रहा है। अब तो न जाने क्यों अक्सर मैं यही नहीं जान पाती हूँ कि यह सागर मेरे पेट में है या मैं उसमें हूँ। परन्तु सच यही है कि यह वास्तव में मेरे पेट में समा गया है और मेरा रूप ही हो गया है। हाँ इतना ज़रूर है कि यह बात भी अब अक्सर मैं भूली बिसरी सी रहती हूँ, इसलिये इस बात से अनजान ही रहती हूँ कि यह मेरे पेट में है या मैं उसमें हूँ। तबियत ‘मालिक’ की कृपा से अब Innocent (मासूम सी) ही हरदम, हर समय रहती है। कुछ यह भी हो गया है कि मैं अब अपने को Innocence (मासूमियत) के सागर में हर समय सराबोर पाती हूँ। तबियत ऐसी नहीं रहती है कि जैसे मुझे कुछ नहीं मालूम। दशा के जानने के लिए गौर करती हूँ बस तब तो एक बात अवश्य पहचान जाती हूँ।

न जाने भाई कुछ ऐसा लगता है कि भूल के सागर में हरदम गड़प रहती हूँ। यह भी लगता है कि भूल के सागर की सतह बराबर सी रहती है और उस सतह में मैं पैठी रहती हूँ, मिली रहती हूँ। नहीं-नहीं बल्कि खोई रहती हूँ। भाई कुछ यह हो गया है कि है ऐसा लगता है कि Innocence (मासूमियत) का सागर मुझमें गटकते-गटकते अब खोया सा जा रहा है और यही हाल भूल के सागर का होता सा लगता है। अब तो ऐसा है कि जितना गहरा पैठती जा रही हूँ उतना ही शुद्ध, निर्मल, मोती (यानी दशा) मिलता जाता है। भाई, अब कुछ ऐसा लगता है कि जैसे अब आत्मा के कपाट खुलने लगे हों या इतने झीने पड़ गये हैं कि उसमें से उसके (आत्मा के) झीने-झीने और भीने-भीने प्रकाश से अन्तर प्रकाशित हो उठा है। उजेले से रहित, इतना शुद्ध निर्मल और भीना भीना प्रकाश या ज्योति है कि अन्तर खुद उसी मय ही बन गया है।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं तथा केसर ने प्रणाम लिखा है। बिट्टो छोटे भइया प्रणाम कहते हैं और कहते हैं कि कल से इम्तिहान है। इतिः-

सदैव केवल 'आपकी' ही स्नेहसिक्ता
पुत्री–कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-291
शाहजहाँपुर
20/3/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा पत्र 12 मार्च और 16 मार्च का मिल गया। 12 मार्च के ख़त का जवाब देता हूँ। तुमने लिखा है कि “निगाह में ‘मालिक’ रहता था, कि मैं उससे भी ओझल हो गई हूँ।“ इस ख़्याल को तुम ठीक Express (अभिव्यक्त) नहीं कर सकीं। जहाँ तक मैं इनको समझा हूँ, जवाब दे रहा हूँ। यह एक लय-अवस्था की हालत है। जब तुम ‘मालिक’ के ध्यान में जाना चाहती होगी तो ख़्याल उलटता होगा और तुम्हारे जिस्म पर बधंता होगा। क्या यह बात ठीक है? अगर ठीक है तो तुम्हारा कुल शरीर यही एहसास दिलाता होगा कि तुम खुद ‘मालिक’ हो। लिहाजा अब यही ध्यान बाँधना चाहिये और ख़्याल में रहना चाहिये कि यह शरीर वगैरह जो कुछ है, यह सब ‘मालिक’ ही का शरीर है। फर्ज़ कर लो तुम ‘A’ (ए) का ध्यान करती थी तो अगर मेरा अनुभव ठीक है और तुम्हारी वही हालत है जो मैंने ऊपर लिखी है तो तुम ‘A’ का मय उसके जिस्म के अब अपने आप को मान कर ध्यान करना शुरू करो और मानना क्या, अगर वाकई तुम्हारी यही हालत है, तो आज खुद ऊपर के तरीके में तुम्हें अपना ही ध्यान शुरू हो गया होगा। तुम लिखना कि मेरा एहसास कहाँ तक ठीक है। तुमने जो शुद्धपन लिखा हैं, तो जितना आगे बढ़ती जाओगी शुद्धता ही शुद्धता मिलती जायेगी।

अब 16 मार्च के ख़त का जवाब देता हूँ। तुमने लिखा है, मेरे लिखने पर कि तुम्हारा जो कुछ भी अनुभव है, वह मेरी बदौलत है। वास्तव में ऐसा नहीं है। अगर मुझमें काब्लियत होती तो जितने मेरे पास आते सबका ऐसा ही एहसास हो गया होता। यह सब तुम्हारी जाती मेहनत, प्रेम और लगाव का असर है। Innocence (मासूमियत) की जो हालत लिखी है, यह तुममें कुदरती हालत मौजूद है जिसके मानी यह हैं कि तुम पैदाइश ही से बहुत कुछ शुद्ध आई हो। तुमने जो नम्रता लिखी है, यही ठीक है। इस नम्रता को तुम इतना अपना रही हो कि उसमें भी लय-अवस्था की शुरूआत है। अभ्यासी को हर हालत में लय होना चाहिये, तब कहीं Master Minded (स्वामी) आदमी बनता है। हमारे यहाँ तो लोग पूजा और ध्यान के बाद जो कुछ भी थोड़ा बहुत करते हों, उससे ताल्लुक़ ही नहीं रखते। कहकर और लिखकर हार गया मगर उनके जूं ही नहीं रेंगती। यह हो सकता है कि उनको एकदम से खींचता ही चला जाऊं। कुछ कर भी जाता हूँ। मगर इससे न मुझको आनन्द आता है और न उनको। मेरा दिल तो सबके लिये यही चाहता है। जितनी लालसा अभ्यासी को होगी, उतनी ही जल्दी ईश्वर को आकर्षित करेगा। मसल मशहूर है कि जब तक बच्चा रोता नहीं, माँ दूध नहीं पिलाती। बाकी अबकी जवाब आने पर लिखूंगा। अम्मा को प्रणाम।

ईश्वर की मर्ज़ी उस समय तक नहीं होती, जब तक कि बन्दे को ‘मालिक’ के पाने की लालसा नहीं होती।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-292
लखीमपुर
20/3/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। यहाँ सब अच्छी तरह से हैं। आशा है ‘आप’ भी अच्छी तरह से होंगे। छोटे भइया व बिट्टो के Papers ईश्वर की कृपा से काफी अच्छे हो रहे हैं। केसर के पत्र आने पर लिखूंगी कि Papers (प्रश्न-पत्र) उसके कैसे हुए। ‘मालिक’ की कृपा जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब इधर कभी-कभी न जाने क्यों एक आध दिन को Innocence (मासूमियत) के सागर या दशा में कभी-कभी थोड़ी बहुत गुंजलक सी आ जाती है या भाई दशा कुछ छितर सी जाती है। मेरा तो कुछ यह हाल है कि पहले जैसे अक्सर मैं कहा करती थी और इस बात की बहुत इच्छा भी हर समय रहती थी कि ‘मालिक’ में सोलहों आने भर लय हो जाऊं, परन्तु न जाने क्यों अब तो तबियत में हर समय यही रहता है या इस बात की कमर कसे खड़ी रहती हूँ कि बस जो ‘मालिक’ की मर्जी हो करे। लेने-देने के भाव कुछ नहीं रहते। बस हिम्मत अब उसी बात के लिये कमर कसे रहती है और हिम्मत भी जितनी, जैसी ‘वह’ दे देता है। अब तो भाई उस यानी सोलहों आने भर लय-अवस्था का भार भी ‘उसी’ ने अपने जिम्में ले लिया है। या यह इच्छा अब ‘मालिक’ की मर्ज़ी में मिल गई है। साहस व उन्नति का भार भी ‘कृपालु’ ने अपने ही जिम्में ले लिया है। जैसा ‘मालिक’ चाहेंगे, खुद सम्भाल लेंगे। मुझे तो ‘उसी’ से काम है।

‘मालिक’ की कृपा से तबियत साफ़ आज फिर अधिक है। कुछ ऐसा है मेरे ‘श्री बाबूजी’ कि मैं देखती हूँ कि हर दशा में बेहोशी और भूल की दशा आती है, परन्तु शायद जहाँ एक से दूसरी दशा पर चलती हूँ, या भाई न जाने क्यों फिर होश सा या सचेतन सी अवस्था आ जाती है। अब तो यह दशा है कि होश सी या सचेत सी ही रहती हूँ, परन्तु अधिकतर न जाने क्यों होशपने का एहसास भी कुछ भूली बिसरी सी ही रहती हूँ।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब कुछ ऐसा लगता है कि जैसे ‘मालिक’ की कृपा से नम्रता के सागर में फाँद सी पड़ी और एकदम से जैसे तैराक जल में कूदता है तो शायद पहले एकदम नीचे को, एक बेहोशी या अनजानी हालत में बैठता चला जाता है, फिर हाथ पैर चलाकर ऊपर आकर तैरना शुरू करता है। उसी प्रकार मैं एकदम से उस सागर में बेहोश सी, अनजानी सी गहराई में पैठती सी चली गई हूँ। परन्तु अब ऐसा लगता है कि हवास फिर ठिकाने हो गया है और ‘मालिक’ की कृपा से विश्वास है कि बस अब मैं इसे तैर ले जाऊंगी।

‘आपने’ अपने पत्र में पूछा है कि तबियत ज़रूर मेरी घबराती है, कि Points (पॉइंट्स) कब तक गिनता रहूँगा। तुम बताओ, मुझे क्या करना चाहिये। सो मैं सच कहती हूँ कि मुझे कुछ नहीं मालूम। जैसी ‘आपकी’ मर्ज़ी हो करें। मुझे तो बस कृपा करके वह जनून दे दीजिये, जिससे मैं ‘मालिक’ को पा सकूँ। मुझे तो बस ‘मालिक’ से काम। जैसी ‘आपकी’ मर्जी हो ‘आप’ करें।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। ‘बाबूजी’ शाहजहाँपुर जाने आने के लिये 3 बसें नई निकली हैं। वहाँ से भी यहाँ के लिये शायद नई निकली हों। एक तो सवेरे 7 बजे चलकर साढ़े दस पर शाहजहाँपुर पहुँचा देती है। दूसरी 9 बजे सवेरे चलकर साढ़े बारह पर वहाँ पहुँचाती है। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-293
शाहजहाँपुर
23/3/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

कल बतारीख 22.3.53 अन्दाज़न 2.30 pm पर मुझे ‘O’ point (ओ पॉइंट) पर कुछ कमजोरी मालूम हुई। कमज़ोरी मैंने उसी वक्त रफा कर दी थी। आज ता. 23.3.53 को 10.15 P.M. पर तुम्हें मैंने Point ‘P’ (पॉइंट पी) पर डाल दिया। सैर के परमाणु मैंने इसी वक्त भर दिये हैं, मुमकिन है 2 या 3 बजे से आज ही सैर शुरू हो जाये। अब तुम हाल लिखना। जब तुम्हें पूरा एहसास हो जावेगा, जो शायद दो-चार दिन में हो जावेगा, तब ईश्वर की कृपा से अगले स्थान पर खींच दूंगा। मेरी समझ से मैं इनको गिन न सकूंगा, क्योंकि बहुत अधिक मुकामात हैं। ‘Z’ (जेड) तक ख़तम करने के बाद मुमकिन हो सका तो हर तीसरे रोज़ या जैसा मौका हुआ, एक Point (पॉइंट) ले लिया करूंगा। आज तुम्हारा ख़त 20.3.53 का मिल गया। जवाब की कुछ ज़रूरत नहीं थी। इसलिये नहीं लिखाया।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-294
लखीमपुर
24/3/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा पत्र ‘आपका’ आज मिला -पढ़कर प्रसन्नता हुई। मैं पत्र डालने में कल से ‘आपके’ पत्र का ही इन्तज़ार कर रही थी कि मिल जावे तो एक साथ में ही लिख दूं। अम्मा अब बिल्कुल ठीक हैं, सो रही हैं, फिक्र की बात तनिक भी नहीं हैं।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ आज दद्दा से मालूम हुआ कि ‘आपकी’ तबियत अधिक ख़राब हो गई थी। मुझे इधर कई दिनों से यही दिखाई पड़ता था कि ‘आप’ बीमार हैं, इसीलिये मैंने अपने पत्रों में ‘आपकी’ तबियत के बारे में पूछा था। ख़ैर, अब आप डाक्टरी दवा ही खाइये, जिससे जल्दी से अच्छे हो जायें। ‘आपने’ मेरी दशा को देखकर जो लिखा है, वह बिल्कुल ठीक है, और ता. 25 की डायरी से मिल भी रहा है। मैं इतना साफ़ अब भी नहीं लिख पाई हूँ, जितना साफ ‘आपने’ लिखा है। ख़ैर जो कुछ भी दशा मेरी समझ में आई, लिख रही हूँ और ‘आपने’ जो ध्यान करने को लिखा है, वह तो केवल ‘मालिक’ की कृपा से खुद ही शुरू हो चुका है। कुछ ऐसा है भाई कि मुझे दिमाग लगाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, जो होना होता है, वह ध्यान खुद ही शुरू हो जाता है। कृपा करके ‘आपने’ Point ‘P’ (पॉइंट पी) पर मुझे खींच दिया, बहुत-बहुत धन्यवाद है। मुझे इसका एहसास एक दिन बाद हो सका। ख़ैर, अब जो आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो मेरा यह हाल है कि जैसे पहले एक बार ‘आपने’ लिखा था कि “कोई Working (कार्य) करने से पहले यह ख़्याल कर लिया करो कि मैं कर रहा हूँ। ‘मेरा’ ही ख्याल व ताक़त काम कर रही हैं” सो मैं बराबर कर लिया करती थी, परन्तु इधर अब यह दशा है कि जहाँ इस तरफ़ ख़्याल गया नहीं कि बड़ी सरलता से Automatically (अपने आप) ही वैसा मालूम पड़ता है या यह कह लीजिये कि यह ख्याल तो मेरी चीज़ ही हो गया है। कुछ यह है कि अब ‘मालिक’ का ख़्याल या ध्यान करना चाहती हूँ तो ख़्याल उलट पड़ता है और कुछ अच्छा नहीं मालूम पड़ता था और इससे शरीर और दिल पर कभी-कभी भारीपन सा हो जाता था। इसलिये अब तो भाई अपने बजाय ‘मालिक’ का ही जल्वा दिखलाई पड़ता है, नहीं, नहीं बल्कि मेरा तो कुल शरीर तक अब ‘वही’ हो चुका है।

मेरे ‘बाबूजी’ न जाने क्यों ऐसा लगता है कि दशा अब सोई हुई स्मृति की तरह है। अब तो कुछ ऐसा है कि सब तरफ से बेहोशी रहते हुए भी तथा भूल की अवस्था में हर समय रहते हुए भी मुझे इनका एहसास नहीं रहता। कभी महसूस नहीं होता है। भाई, न जाने क्यों कुछ ऐसा है कि मेरा एहसास अब हरदम ख़ाली ही पड़ा रहता है। दशा महसूस करने पर भी न जाने कैसे एहसास ख़ाली रहता है या यों कह लीजिये कि एहसास का ज़ोर निकल कर वह केवल ख़ाली ही रह गया है। इसी कारण अब अक्सर एहसास के एहसास से अनभिज्ञ सी ही रहती हूँ और अनभिज्ञता भी अब एहसास में नहीं आ पाती है, इसलिए वह सूना सा रह गया है। मैं यह देखती हूँ कि दशा में भी अब अधिकतर सूनापन सा ही होता जाता है। परन्तु दशा का ‘मजा’ मैं ज़रूर अनुभव करती हूँ। परन्तु अनुभव में खालीपन सा भी अवश्य रहता है और अब जो दशा का मज़ा मैं अनुभव करती हूँ, वह इस तरह का मालूम पड़ता है कि जैसे सोई हुई स्मृति में ‘मज़े’ का एक स्पन्दन सा हो जाता है या होता रहता है। बस Senses (वृत्तियाँ) ‘मज़े’ का इतना ही एहसास कर पाती हैं। परन्तु एहसास ‘मज़े’ का एहसास नहीं कर पाता। भाई, मैं कुछ जानती नहीं हूँ कि यह मेरी क्या और कैसी दशा है।

‘अपनी’ तबियत का हाल जल्दी दीजियेगा। ईश्वर करे ‘आप’ अच्छे हों। शायद परसों मास्टर साहब जी तथा शुक्ला जी वहाँ पहुँचेंगे। तब तक कुछ दशा एहसास में और आई तो लिखूंगी। केसर पहली या दूसरी तक यहाँ आ जायेगी और ‘आपको’ प्रणाम लिखा है। उसके तथा बिट्टो और छोटे भइया के Papers भी ‘मालिक’ की कृपा से ठीक हो रहें हैं। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इतिः-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-295
लखीमपुर
29/3/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा पत्र पहुँचा होगा। आशा है ‘आपकी’ तबियत अब ठीक होगी। अम्मा बिल्कुल ठीक हैं। पर्चे अभी तक ईश्वर की कृपा से केसर, बिट्टो तथा छोटे भइया तीनों के अच्छे हो रहे हैं। केसर का तो ता. 25 को समाप्त हो गया। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक - दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरा तो यह हाल है कि ध्यान करती हूँ, परन्तु रस न जाने क्यों कुछ शान्त सा पड़ता जाता है। न जाने यह क्या बात है कि ध्यान तो करती हूँ, परन्तु ध्यान का कुछ ध्यान नहीं रहता। मैं तो अनजान सी होती जा रही हूँ। अज्ञानपन ऐसा है कि न जाने कैसे अब अनजान से भी अनजान ही अपने को हर समय पाती हूँ, या यों कह लीजिये कि अनजान होने का भी होश नहीं रहता, या यह कह लीजिये की एहसास भी कुछ ख़ामोश सा हुआ जा रहा है। मेरे ‘बाबूजी’ अब तो यह हाल है कि सारा शरीर ‘उसका’ ही शरीर महसूस होता है। नहीं, नहीं, केवल ‘उसका’ ही शरीर दिखलाई पड़ता है और ‘वही’ महसूस होता है। अब तो यह सब कुछ ‘उसका’ ही रूप हो गया है।

अब तो यह दशा है कि प्रशान्त सागर में ही डूबी रहती हूँ और सागर ऐसा है जिसमें हिलोर या लहर नहीं उठती। वह तो शान्त हो गई हैं, परन्तु अभी स्पन्दन ज़रूर शेष है, या होता है और सतह सदा बराबर ही रहती है। कुछ ऐसा लगता है कि प्रशान्त सागर तो मेरा अपना रूप ही हो गया है। इसमें अब न गर्जन होती है, न शब्द ही होता है, बस स्पन्दन ज़रूर है। अब तक यह था कि सागर में Senses (वृत्तियाँ) जागती सी रहती थीं, परन्तु अब यह देखती हूँ कि Senses (वृत्तियाँ) में कुछ मुर्दापन सा घर करता जा रहा है। Senses में भी Senseless पना सा बैठता जाता है, या यों कह लीजिये कि उनमें ख़ामोशी सी हुई जा रही है।

मेरे ‘बाबूजी’ अब तो मेरा यह हाल है कि अपनी ही पूजा करती हूँ। अपना ही ध्यान और अपनी ही अर्चना और वन्दना करती हूँ। अब तो अन्तर भी खुद मैं ही हो गई हूँ या अन्तर मेरा रूप ही हो गया है। परन्तु यह ज़रूर है कि इस ‘अपने’ या ‘मेरे’ की तह में तो कोई और ही छिपा हुआ है, ‘जो’ या ‘जिसके’ मिलने की तड़प ने अन्तर को मथ सा डाला है और मथे डाल रही है। अब तो भाई, ऐसा लगता है कि आन्तरिक दृष्टि भी ख़ामोश हो गई है, या यों कह लीजिये कि अन्तर भी सब बाहर हो गया है, तो आन्तरिक दृष्टि कहाँ रहे या भाई, यह है कि अब तो सब केवल अन्तर ही अन्तर हो गया है। वैसे तो चाहे यह कह लीजिये अब अन्तर या बाहर कुछ है ही नहीं। शायद कुछ स्पन्दन के कारण Senses (वृत्तियों) में पूरा मुर्दापन नहीं आ पाया है, क्योंकि शायद स्पन्दन से Senses (वृत्तियों) को कुछ चेतना सी मिलती है। सपाट सतह की तरह कुछ होगा, मुझे नहीं मालूम। ‘आप’ ही जाने, जो दिया होगा, सो ही होगा।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा बिट्टो, छोटे भइया, प्रणाम कहते हैं। अम्मा और हम सब लोगों की प्रार्थना है कि उत्सव में 4 अप्रैल को आने की कृपा करें। माया, छाया तथा दादी से भी कह दीजियेगा कि अम्मा सबको उत्सव के लिये बुला रही हैं, कृपया अवश्य आवें। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-296
शाहजहाँपुर
2/4/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे खत 24.3.53 और 29.3.53 के मिल गये। 24.3.53 के ख़त का जवाब दे रहा हूँ। जब लय-अवस्था बढ़ जाती है तो इस ख़्याल करने की ज़रूरत कम रहती है, कि यह काम ‘मालिक’ कर रहा है। ‘मालिक’ में जितनी पैवस्तगी ज़्यादा होगी, उतनी दुई कम होगी। पूजा में दुई आ जाती है, इसलिये दिल पर भारीपन महसूस होता है। ऐसी हालत में हल्का-हल्का Natural way (स्वाभाविक रूप में) में ध्यान करना चाहिये। जितनी दशा हल्की होती जाती है, उतना Expression (अभिव्यक्ति) के लिये शब्द नहीं मिलते। आगे हालत में सूनापन ही बढ़ता है और फिर वह भी नहीं रहता।

29.3.53 का जवाब यह है, मैं इस हालत को पढ़कर उछल पड़ा कि “अपना ही ध्यान और अपनी ही अर्चना और वन्दना करती हूँ।“ यह अच्छी लय-अवस्था की खुशख़बरी है। किसी ने कहा है :-

“अपने सजदे के सिवा गैर का सजदा है हराम।”

मैं 29.3.53 के खत का बहुत जवाब लिखाना चाहता था, मगर मुझे लिखने वाला न मिला। ख़ैर, ईश्वर की मर्जी। अपने आप जो लिखा है, बहुत टूटा-फूटा लिखा है और उसका भी Expression (अभिव्यक्ति) ठीक नहीं। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-297
लखीमपुर
4/2/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

आशा है पोस्टकार्ड ‘आपको’ मिला होगा। ताऊजी का फोड़ा अब अच्छा दीखता है। भीतर की सूजन बढ़ना रूककर एक तरफ़ की पटकना भी शुरू हो गई है, यह आज होम्योपैथ डाक्टर ने कहा है। फोड़ा ऊपर को उमस आया है, यह भी अच्छा बताया है। बुखार भी 100o से आगे नहीं जाता है। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो कुछ ऐसा है कि मुझे अब न तो अपनी चाल तेज़ ही मालूम पड़ती है, न धीमी, कुछ एहसास ही नहीं होता, बस रफ़्तार से और क्रम से चल रही हूँ। अब तो न मुझमें कोई रफ़्तार है, न खड़ी हूँ, और चल रही हूँ तो इसलिये कि हालत यद्यपि भीतरी एक सी ही रहती है, परन्तु दशाएँ आती रहती हैं, इस प्रकार जैसे कि ऋतुएँ बदलती रहती हैं, परन्तु वर्ष या साल पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। अब कुछ ऐसा लगता है कि निगाह या ध्यान अपने ज़रें- ज़र्रे में भीतर की ओर हो गई है, या यो कह लीजिये कि कुछ ऐसा लगता है कि बाह्य-शरीर में कुछ एक हल्का सा प्रतिबिम्ब शायद भीतर है। निगाह या ध्यान अब उसी के ज़र्रे-ज़र्रे में अपने ‘मालिक’ ही ‘मालिक’ को महसूस करती हूँ। अब तो उसी में भिद रही हूँ। या भाई, उस ज़र्रे-ज़र्रे में ‘मालिक’ ही ‘मालिक’ समाया जाता है। अब तो मेरी यह दशा है कि मुझे तो बाहर कोई कुछ महसूस नहीं होता, कुछ, कोई नहीं दिखाई देता है। जहाँ ध्यान है, बस वही है।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। ‘मालिक’ की कृपा से ताऊ जी को कुछ लाभ हो रहा है।

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-298
लखीमपुर
4/4/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ आज शाम को मिला-पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘आपके’ कृपा-पत्र से आज दिन की प्रसन्नता में और प्रसन्नता बढ़ी। ‘आपकी’ कृपा, आपके पत्र मुझे मंजिल पर चढ़ने के लिये सीढ़ी का काम देते हैं। इधर जो कुछ भी मेरी दशा है, सो लिख रही हूँ।

न जाने क्या बात हो गई है बाबूजी कि हर समय तबियत उनींदी सी रहती है, परन्तु नींद तो नहीं आती। जब मन में जोश बढ़ाती हूँ तो तबियत कुछ देर को हरी सी हो जाती है, और ऐसा लगता है कि आँखें खुल गई, परन्तु जहाँ याद भूली तो फिर वही दशा हो जाती है। यद्यपि कुछ सुस्ती के तौर पर (शरीर की) नहीं है। अब तो जब घर में चहल-पहल सी मचे, तो भी उनींदी सी ही दशा रहती है। हाँ, यह जरूर है कि फिर कुछ देर को जैसे तबियत उछर आई और फिर नींद सी में और कुछ नशे सी में भरी तबियत रहती है। वैसे तो जो दशा ‘मालिक’ दे, सो सिर माथे है, परन्तु मैं देखती हूँ कि दशा के अनुभव करने में कुछ बाधा सी पड़ती है, क्योंकि मैं अपने वश में नहीं रहती, मैं तो अजीब नींद सी दशा में रहती हूँ।

मेरे ‘बाबूजी’ न जाने क्यों मुझे अब ‘मालिक’ के नाम में श्री वगैरह लगाने की न सुधि रहती है और न मुझे खटकता है। मुझे ‘उसे’ जैसे कहूँ, वैसे ही अच्छा लगता है। अब कुछ ऐसा लगता है कि अन्तर और बाहर के बीच का पर्दा या बाँध टूट कर दोनों एक होकर, समान रूप हो गये हैं। यदि मैं यह कहूँ कि कुछ-कुछ ऐसा ही हाल मेरा, ‘मालिक’ से शुरू हो गया है तो शायद ठीक हो। अब पत्र समाप्त करती हूँ, रात काफी हो गई है। जल्दी में इतना लिख दिया, अब अनुभव होगी दशा सो अगले पत्र में लिखूंगी। अम्मा 'आपको शुभाशीर्वाद तथा चिरंजीवी होने का आशीर्वाद दे रही हैं। केसर कल आ गई, वह तथा बिट्टो और छोटे भइया प्रणाम कहते हैं। आज शुभ दिन श्री लालाजी साहब को हम सब की बहुत-बहुत बधाई है तथा प्रार्थना है कि ‘बाबूजी’दीर्घायु हों और मिशन की खूब उन्नति हो। अम्मा प्रसाद आप सबके लिए और हरी दद्दा के लिए भेज रही हैं। इति:-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-299
लखीमपुर
4/4/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ लिखा हुआ कल मिला। कुछ उत्तर कल लखनौर वाले भाइयों के हाथ भेज चुकी हूँ, मिल गया होगा। बाबू करुणा शंकर जी अभी मास्टर साहब के यहाँ हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

न जाने क्यों, भाई ऐसा लगता है कि आध्यामिकता का Pure रूप या नग्न रूप ही मेरी दशा है। अब तो Pure (प्योर) आध्यामिकता के प्याले ही पिया करती हूँ। मेरी आध्यात्मिक दशा रूपी फुलवारी, मुझसे ही निकलती, या उत्पन्न होती Pure आध्यात्मिकता से खिंचती रहती है। भाई न जाने क्यों मुझे तो यही महसूस होता है कि Pure आध्यात्मिकता की सुगन्ध मुझसे ही हर समय निकला करती है या खुद मुझसे ही पैदा होती रहती है, या यों कह लीजिये कि खालिस आध्यात्मिकता मेरा रूप ही हो गया है | अब ऐसा महसूस होता है कि खालिस आध्यात्मिकता ही मुझमें उतरने लगी है।

मेरे ‘बाबूजी’ कुछ ऐसी दशा है कि दृष्टि निर्मल हो गई। मुझे तो अब सब शुद्ध ही शुद्ध दीखने लगा है, जिससे मैं खुद अपने दर्शन करने लगी हूँ और जिससे अपने की पहिचानने लगी हूँ। अपने में ही रहती और अपने में ही रमण करने लगी हूँ। अब तो मैं नहीं जानती कि मुझे तृष्णा ‘मालिक’ की बढ़ गई या अपनी, परन्तु कहना तो यही है या ठीक तो दूसरी बात (यानी अपनी) मालूम पड़ती है। परन्तु फिर भी ‘अपनी’ की तह में कोई और ही छिपा है, परन्तु बहुत सूक्ष्म रूप से तभी मुझे शायद उस तह वाले की याद नहीं रहती है।

मेरे ‘बाबूजी’ सच तो यह है कि अब तो यह कहूँ तो ठीक होगा कि “दिल में है तस्वीरे यार, जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ली।“ अब तो यह उल्टी रीति हो गई है। कुछ ऐसा लगता है कि, वैसे तो ‘आप’ जानें किन्तु शायद Reality (वास्तविकता) अपने वास्तविक रूप में कुछ मुझमें झलकने लगी है। न जाने क्यों, मुझसे अब यह ठीक नहीं बन पड़ता कि यह काम ‘मालिक’ कर रहा है, फिर भी अब यह चीज़ कुछ होती ज़रूर है, परन्तु दूसरे रूप में या अन्दर ही अन्दर कुछ बहुत हल्के से तौर पर कर पाती हूँ, परन्तु करती ज़रूर हूँ।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-300
लखीमपुर
8/4/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा पत्र मिला होगा। ‘आपकी’ तबियत अब कैसी है। अम्मा कहती हैं। कि बड़े भइया की तनख्वाह के 100/- आज आये हैं, उसमें से केवल 10/- ‘आप’ नज़र-स्वरूप स्वीकार अवश्य करियेगा। प्रसाद भी कल चढ़ेगा। प्रिफेस तो मास्टर साहब ने Correct (ठीक) कर दिया है। मैंने और ताऊजी ने भी देख-भाल लिया है। ‘आपको’ अकेले इसमें वहाँ परिश्रम बहुत पड़ेगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरा तो यह हाल है कि मुझे तो अब हर समय यही कहने में अच्छा लगता है और यही रट लगी रहती है कि :-

“अपने सिजदे के सिवा, ग़ैर का सिजदा है हराम”

‘मालिक’ की कृपा से अब मुझमें तो यही दशा आईने की तरह चमकने लगी है। मेरा तो अब यही हाल है। कुछ ऐसी दशा है कि बाहर तो कुछ नींद सी, उनींदी सी ही तबियत रहती है, यद्यपि जब से ‘आपको’ लिखा था, तब से कुछ कम हैं, परन्तु अन्तर में कुछ चेतना जो शेष है, इसी से शायद शारीरिक-सुस्ती व हर समय सोने से बची रहती हूँ।

मेरे ‘बाबूजी’ न जाने कुछ ऐसा लगता है कि न मृत्यु ही है, न जिन्दगी ही। परन्तु अब तो अक्सर कुछ यही दशा मालूम पड़ती है कि केवल ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी है, जहाँ पर मृत्यु का तो प्रश्न ही नहीं रह जाता है। उसी अमर जिन्दगी की ही मेरे ‘मालिक’ ने शुरूआत कर दी है। कुछ ऐसा लगता है कि वाह्य तथा अन्तर की वृत्तियाँ तथा इन्द्रियाँ शायद अब नष्ट या समाप्त ही हो गई हैं। क्योंकि उनमें भी अब ऐसी दशा है कि न मृत्यु ही है और न जीवन ही है। अब न जाने क्या है।

मेरे ‘बाबूजी’ न जाने कुछ यह दशा है कि ऐसा लगता है कि शरीर में और नस-नस में ‘मालिक’ भिदा जाता है। इस शरीर के ज़र्रे जर्रे में ‘वह’ समाया जाता है और शायद इसी कारण मेरे अंग-अंग में, नस-नस में नम्रता भी भिदती चली जाती है। या भाई, हज़्म होती चली जाती है। या कुछ ऐसी दशा है कि बुन्द में सिन्धु का सिन्धु समाता और सूखता सा चला जाता है। नहीं, नहीं, अब सिन्धु है, और न बिन्दु है दोनों ही न जाने कहाँ चले गये, न जाने कहाँ बिला गये - मुझे नहीं मालूम। मेरे 'बाबूजी' आप शायद Point ‘Q’ (पॉइंट-क्यू) पर भेजकर मुझे लिखना भूल गये, कृपया लिखियेगा। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं।

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री–कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-301
शाहजहाँपुर
12/4/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

तुम्हारे ख़त सब मिल गये। हिन्दी मुझे नहीं आती। लिखने में भी हाथ काँपता है और जो सोचता हूँ उसको, जब लिखने बैठता हूँ तो, विचारों की लड़ी ठीक नहीं बन पाती। कहाँ तक मैं अपने नुक्स लिखूं। दूसरे का मोहताज ही रहना पड़ता है। एक चना भाड़ फोड़ नहीं सकता। चाहता यह हूँ कि सब मिलकर जो काम जिसके लायक है, उसको करें, मगर लोगों में दिलचस्पी पैदा नहीं होती। जिसकी ईश्वर-विषय में दिलचस्पी पैदा नहीं होती, तो वह मिशन के ही काम में दिलचस्पी पैदा करे, तो भी हो सकता है, क्योंकि अगर Sincerity (निष्कपटता) साथ है तो ईश्वर-विषय में भी दिलचस्पी पैदा हो जाय। मगर पित्तामारी कोई करने ही क्यों लगा, गरज़ तो मेरी रह गई है और है भी ऐसा ही। इसलिये वास्तव में मैं खुशामद ही सबकी करता हूँ। इसलिये कि इस चापलूसी से ही कोई फायदा उठा ले। लोग इस इबारत को देखें तो वाकई हंसेंगे, मगर मैं अपनी तबियत को क्या करूँ कि मैं सबकी सब, सब में उड़ेलना चाहता हूँ। मुमकिन है कि यही वज़ह हो कि लोग ग्रहण करने के लिये तैयार न होते हों। उड़ेल तो मैं जाऊंगा ही, ख़्वा वह फिर छलक क्यों न पड़े और जिसमें उड़िल गई, तो फिर दूसरे छलकी हुई चीज़ पा सकेंगे। इसीलिये मैं चाहता हूँ कि सब में उड़ेल दूं। और इस वक्त में तो ऐसा है कि सबमें या जो चाहें उनमें, असल हालत उड़ेली जा सकती है।

अब यह तो और लोगों के बारे में कहा, अब मैं अपनी कहता हूँ। इतना सुस्त हो गया हूँ और नाकारा कि ऐसी मिसाल तो शायद कहीं न मिले। सुस्ती की यह हालत है कि जैसे किसी में जान न रही हो। चारपाई पर अगर लेटा हुआ हूँ, तो छः महीने उठने की तबियत नहीं चाहती। खाना तैयार है और सुस्ती इस क़दर कि कौन खाये इस वक्त; फिर देखा जायेगा। प्यास लगी हुई है, और इस इतंजार में है कि आराम से कौन उठे; जब उठेंगे, पानी पी लेंगे। काम पड़े रहते हैं और करने का जी नहीं चाहता। ठीक है, ईश्वर के यहाँ इंसाफ़ होता है। ऐसे सुस्त और काहिल आदमियों को काहिल और सुस्त आदमी मिलते हैं। मैं जानता हूँ, हमारी संस्था में काहिली और सुस्ती का ज़िम्मेदार मैं ही हूँ, और यही वजह मालूम होती है कि लोग मेरा कहना ज़्यादातर नहीं सुनते। मुर्दे से भला किसको जिन्दगी मिली है और सुस्ती से भी चैतन्यता कब हो सकी है? दोनों एक दूसरे के खिलाफ (Opposite) हैं।

अच्छा, अब मतलब पर आता हूँ। मैं ‘P’ (पी) स्थान पर ज़्यादा तवज्जोह दे गया था, और वह यह थी कि मुझे कुछ अन्दाज़ नहीं लग सका और यह गलती हमेशा जल्दी की आदत से होती है। कुछ ऐसी आदत पड़ गई है कि जल्दी से इस चीज़ को ख़त्म कर दूं, ताकि बार-बार रूजू न होना पड़े। मैं अक्सर काम को ख़त्म करने में Special will (विशेष इच्छा शक्ति) इस्तेमाल कर जाता हूँ और उसमें जल्दी की वज़ह से यह अन्दाज़ नहीं होने पाता कि कितनी Intensity (गहराई) होनी चाहिये। मैं बड़ी कोशिश करता हूँ, मगर यह चीज़ अब तक ठीक नहीं आई है। ‘P’ (पी) स्थान पर ज्यादा तवज्जोह देने की वजह से उसमें इतनी शक्ति पैदा हो गई कि तुम उसको हज़म ही नहीं कर पा रहीं थीं। जब देखा कि चीज़ हजम नहीं हो रही है, तो फिर उसे हज़म कराना पड़ा और साथ ही उसके यह भी ख़्याल रक्खा कि उसमें Mind कहो या चैतन्यता कहो, ऐसा पैदा कर दिया तुम खुद अगले मुकाम पर पहुँचो। चुंनाचे आज 11.45 A.M. पर तुम आगे बढ़ने लगीं। जरा सा सहारा मेरी लगाने की ज़रूरत थी, वह लगा दिया और तुम 'Q' (क्यू) स्थान पर पहुँच गई।

यह ख्याल तुम्हारा ठीक है कि सुगन्ध - आध्यात्मिक तुमसे हर समय निकलती है। तुमने लिखा है कि पैदा होती रहती है पैदा नहीं होती, बल्कि सबमें मौजूद है। आवरण पड़े होने के ख़ातिर, जो इंसान के खुद डाले हुए हैं, महसूस नहीं होती। तुमने लिखा है, कि सब शुद्ध ही शुद्ध दीखने लगा है - यह एहसास तुम्हारा सही है। जब इंसान बहिर्मुखी नहीं रहता, बल्कि अन्तर्मुखी हो जाता है, तो वही अन्दर वाली हालत बाहर मालूम होने लगती है। वैराग्य इसीलिये जरूरी है कि जब राग उस चीज़ से हो जाता है, तो उसका Weight (वज़न) ख़्याल में पूर्ण वैराग्य हो जाने पर नहीं रहता और चीज़ निगाह और ख़्याल से हट जाती हैं। जब यह हालत हो जाती है, तो फिर ईश्वर ही ईश्वर रह जाता है और जंगल में बैठने और तपस्या करने की ज़रूरत नहीं रहती। तुमने यह भी लिखा है कि “जिससे मैं खुद अपने दर्शन करने लगी हूँ और जिससे मैं अपने को पहचानने लगी हूँ।“ इसमें से मैं इसका मतलब नहीं समझा कि “मैं अपने को पहचानने लगी हूँ।“ तुम लिखो कि तुमने क्या पहचाना। जब ‘मालिक’ में ज़्यादा प्रवेश हो जाता है तो फिर अपनापन जाता रहता है और अपने से मतलब ‘मालिक’ का हो जाता है, यानी यह काम सब ‘मालिक’ कर रहा है। मगर यह कच्ची लय-अवस्था है। जब यह भी ख्याल जाता रहे यानी इसका Weight (वजन) भी न रहे कि काम कौन कर रहा है, तब अच्छी लय-अवस्था कही जा सकती है। मगर इसके बाद अभी कुछ और है। यह ज़रूर है कि तुम अब अपना ध्यान करने लगी हो। जहाँ तक कि मेरा ख़्याल है और मुमकिन है उसी को तुमने अपना पहचानना लिखा हो। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-302
लखीमपुर
13/4/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ आज मिला - पढ़कर प्रसन्नता हुई। 'Q' (क्यू) स्थान पर खींच देने के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद है। मेरी तबियत भी कुछ ऊबती सी मालूम पड़ती थी, सो ठीक हो गई। न जाने इस गरीब की प्रार्थना कब मंजूर होगी कि ब्रह्म-विद्या के प्यासों की संख्या दिनों दिन बढ़ने लगे। देखिये कब ‘उस’ तक आवाज़ पहुँच सके, क्योंकि हम ‘उससे’ ज़रूर दूर रहते हैं, परन्तु ‘वह’ हमारे सबसे पास है। ‘आपके’ पत्र का उत्तर देने की गरज़ से नहीं, बल्कि जो ‘मालिक’ की कृपा से कुछ मालूम है, कुछ रत्तीभर ‘उसकी’ ही कृपा से अनुभव हो गया है, सो निवेदन कर रही हूँ -

‘आपने’ लिखा है कि “मुर्दे से भला किसको जिन्दगी मिली है?” सो भाई, जहाँ तक मेरी तुच्छ बुद्धि है तो असली ज़िन्दगी मुर्दे से ही मिलती है और मुर्दे को ही मिलती है, हाँ, हम पहिचान पावें या नहीं। मुर्दा हमें वैराग्य का सबक देता है। जिससे हम झूठी, पानी फेरी हुई दमक की ओर से आँखें बन्द करके असल ज़िन्दगी की खोज करते हैं। परन्तु यदि हम केवल रोने में ही लगे रहें और बुद्धि को काम में न लावें तो उसका क्या दोष और मुर्दा होने के बाद ही नया शरीर, नवजीवन या नई जिन्दगी मिलती है। दूसरे ‘आपने’ लिखा है कि “सुस्ती से चैतन्यता कब हो सकती है?” सो भाई, मैं तो यही सीख रही हूँ और देख रही हूँ कि सुस्ती से ही असल चैतन्यता मिल सकती है और मिलती है। चैतन्यता तो वही है जो ‘मालिक’ की तरफ को ‘उसके’ लिये हमें हर समय चौकन्ना रखे। यदि हम उस ओर के लिये चैतन्य नहीं हैं तो हम ज़रूर सुस्त हैं। कहा जाता है कि मुर्दे के भी कान होते हैं, तो अचैतन्यता कैसी। अपनी चेतना खोने पर ही चैतन्यता मिलनी शुरू होती है। मुझे तो ‘श्री बाबूजी’ ‘आप’ यही सिखा रहे हैं। यह ‘आपकी’ दशा नहीं बल्कि काहिल और सुस्त हम हैं जो केवल अपने को ही पूजने में लगे रहते हैं। ‘आप’ तो हमें एक-एक शब्द से Light (प्रकाश) देते हैं, परन्तु हम अन्धे चौंधिया कर आँखें और बन्द कर लेते हैं। खैर ‘मालिक’ की कृपा से जो भी कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ। ‘आपने’ जो लिखा है कि अपने ध्यान करने को ही अपना पहिचानना लिखा हो - यह ठीक है मेरे ‘बाबूजी’ मेरा तो अब कुछ यह हाल होता जाता है कि :- “खुदी को मिटाने में एक जन्म खोया, मैं क्या जानता था कि खुद खुदा है।“ अब तो भाई, न जाने कैसी उल्टी रीति ही मेरी दशा हो रही है कि ‘मालिक’ की कृपा से ऐसा दिखाई पड़ता है, यह महसूस होता है कि अब ‘मालिक’ पिघल-पिघल कर अंग-अंग में समाता या भिदता चला जा रहा है। पिघल-पिघल कर जरें ज़रें में मिल जाता है। बिन्दु 'सिन्धु' को पिये जाता है। ऐसा लगता है कि अब तो ज़रें ज़र्रे में से, साँसों में से नम्रता ही निकलती रहती है। हर समय नींद वाली या सुस्ती वाली दशा परसों से ठीक है। मेरे ‘बाबूजी’ मेरा तो अब यह हाल हो गया है कि ऐसा लगता है कि मैं खुद अपने में ही समा या भिद गई हूँ, भिदती जा रही हूँ। ऐसा लगता है भीतर सब कुछ सिमट सिमटाकर न जाने क्या हो गया है। इति :-

सदैव केवल 'आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-303
लखीमपुर
16/4/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

आशा है पूज्य मास्टर साहब जी के हाथ पत्र भेजा था, सो मिल गया होगा। वहाँ तो तीनों जनों को मास्टर साहब जी, भइया (शुक्ला जी) तथा कुकरा वालों को खूब ही आनन्द रहा होगा- और भाई, अपने आराध्य के पास में रहने से कौन ऐसा होगा, जिसका हृदय पिघला न रहता होगा, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से मैं भी इस आनन्द से वंचित न रही। रात-रात भर तो, आँखें खुलने पर भी वहीं रहने की सी दशा पाई है, वैसे सोने पर तो बराबर यही रहता है कि वहीं ‘आप’ से कभी कुछ पूछना, ‘आपका’ उत्तर देना और उन सब लोगों के साथ बराबर ‘आपके’ समीप ही बैठे रहना। हाँ, दिन में तो वैसी नहीं, परन्तु जिस दशा में रहती हूँ, वह लिख रही हूँ। मेरी तो वही दशा रहती है कि “रैनभई तब ही उठ जाऊं, भोर भये उठ आऊं”। रात में शरीर के भी साथ में और मन तो बिक ही चुका है। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ यह दशा है कि रग-रग में मैं समा गई हूँ। अपने ज़र्रे जर्रे में अब अपना ही जल्वा देखती हूँ। अब जो दशा महसूस होती है, वह कुछ इस तरह की दिखाई पड़ती है, जैसे Natural-Scene (स्वाभाविक दृश्य) आया, फिर बदल गया - कुछ लगाव-लपेट नहीं मालूम पड़ता है, परन्तु फिर ऐसा लगता है कि हृदय खुला नहीं है, इसलिये ऐसा लगता है कि हर दशा उस सीमा के अन्दर ही रहती है - असीमित नहीं हो पाती। वैसे मन से या दशा से तो सम्भव है ‘मालिक’ की कृपा से इससे अवश्य परे हो सकती हूँ - या भाई, यों कह लीजिये कि निगाह तो इसके परे है ही मैं उस बंधन में क़तई नही हूँ, बल्कि शायद ‘मालिक’ अवश्य ही स्वतंत्र होते हुए भी बंधन में आ गया है, खैर मुझे कुछ नहीं मालूम, अपनी ‘वह’ जाने। मेरे परम स्नेही बाबूजी मैं देखती हूँ कि “अपने सिजदे के सिवा, गैर का सिजदा है हराम” या भाई, मैं खुद ही ‘मालिक’ हूँ - यह दशा होते हुए भी मुझे अब इसकी याद नहीं रहती, याद नहीं आती। कुछ इस तरह पर है कि मैं नहीं जानती कि है भी या नहीं। हाँ, यद्यपि मुझे तो अब इसकी भी याद नहीं रहती कि अपने जरें ज़र्रे में मैं समा चुकी हूँ और कुछ ऐसा है ‘बाबूजी’ कि ‘मालिक’ से इतनी साफ़ हो गई हूँ कि हृदय से कुछ पर्दा न रहा। कहीं ऐसा तो नहीं है कि बराबरी के से रिश्ते की सी दशा की कुछ ‘उसकी’ कृपा से झलक न पड़ने लगी हो। यह बात ‘बाबूजी’ यद्यपि शरीर तथा मन से कभी न हो सकेगी। यह ‘आप’ जानते ही हैं, हाँ ‘आप’ की कृपा से कुछ दशा ऐसी कि झलक हो तो हो, ‘आप’ ही सब जानते हैं, जो ‘आपने’ दिया है। यह बात बेतमीजी की है, कृपया लिखने के लिये क्षमा करियेगा वैसे, वैसी दशा की झलक हो तो ‘आप’ की ही हूँ। भाई, अब तो यह दशा है कि ऐसा लगता है, कि शरीर का ज़र्रा जर्रा आईना हो गया है और कुछ ऐसा लगता है या यों कह लीजिये कि मानो मारफत के समुंद्र में से भी ‘मालिक’ ने Pure वास्तविकता के सच्चे मोतियों को चुगकर मेरे रोम-रोम में, ज़र्रे-ज़रें में जड़ दिया है जिससे कुछ अजीब वैसी ही झलक निकलती रहती है। मेरे ‘बाबूजी’ अब तो कुछ यह दशा है कि न मैं कहने में, मैं का बोध होता है, और न 'तू' कहने में 'तेरा' का बोध होता है, क्योंकि अब तो 'तू' भी मुझसे कोई अलग, कुछ फर्क नहीं रह गया है। अब तो दशा में एक ऐसा आनन्द रहता है या ऐसे Pure (शुद्ध) आनन्द की झलक रहती है कि जिसमें से आनन्द का Weight (वजन) निकाल लिया गया हो। सब शुद्ध ही शुद्ध रह गया है, नहीं, नहीं, शुद्धता है या नहीं, मैं यह भी नहीं जानती क्योंकि मैं तो अबोध हूँ। हाँ, परन्तु दशा में कुछ रहता ज़रूर है, जिसे मैं आनन्द कहती हूँ। परन्तु मेरा तो यह हाल है कि जो कुछ वह दशा में रहता हो, आनन्द ही सही, मैं उसमें साझीदार या अलग रहती हूँ। मैं नहीं कह सकती-मेरी समझ में नहीं आता जब साझीदार समझती हूँ, तो वही हो जाती हूँ, परन्तु अलग-अलग ही अनुभव करती हूँ। अब ‘आप’ ही जाने क्या है। अब तो यह कह लीजिये कि अनुभव में चाहे वह आनन्द हो, मज़ा हो, या जो कुछ हो, मैं तो मिली हुई भी उससे अलग या परे रहती हूँ। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा केसर, बिट्टो और मुन्नी नमस्ते कहती हैं। मुन्नी की तबियत अभी ठीक नहीं है, ताऊ जी को भी कुछ जुकाम है, खैर 3-4 दिन में सब ठीक हो जायेंगे। इतिः-

सदैव केवल 'आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-304
शाहजहाँपुर
22/4/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारा 16 अप्रैल का मिल गया। योग-मार्ग में अपना भिदाव अतंरिक्ष होता है। तुमने लिखा है कि “रग-रग में समा चुकी हूँ।“

“अभी और समाना बाकी है और रास्ता अभी बहुत चलना है। अभी तो शायद रुपये में एक पैसा या दो पैसा भर चल पाई होगी। यह अनुभव तुम्हारा ठीक है कि अपने ज़रें ज़रें में अपना ही जल्वा देखती हो, यह जल्वा अभी पूरी तरह से नहीं देख पाया है, इसमें भी अभी बहुत कमी है। हमें तो शुरू से आखिर तक ऐसी आँख बना देना है कि रोशनी ही रोशनी रह जाये और आँख आँख को न देख सके।“

यह तुम्हारा ठीक अनुभव है, इसको मैंने पहले लिखा भी था कि तुम्हारा दिल नहीं खुला है। दिल हमारे यहाँ खोला जाता है, जिससे हदबन्दी एक तरह की ख़त्म हो जाती है। तुमने अच्छी याद दिलाई, दिल को मुझे अभी ठीक करना है। ऊंचा तो तुमको मैंने पहुँचा दिया, मगर दिल से बेखबर रहा। तुमने लिखा है कि “‘मालिक’ स्वतंत्र होते हुए बन्धन में आ गया है,” इसके यह माने है कि ‘उसकी’ ताकत तुममें समा रही है और उसमें ‘उसका’ अनुभव हो रहा है। क्योंकि तुममें खुद बन्धन मौजूद है, इसलिये ‘वह’ भी बन्धन में महसूस होता है। बन्धन वाले आदमी में ईश्वर भी सीमाबद्ध दिखाई पड़ता है। यह भी वजह है कि ईश्वर का जब कभी ख़्याल किया, वह अपना जैसा समझ में आया और ठोस पूजाओं की शुरूआत हो गई। तुमने जो बराबरी वाली बात लिखी है, वह ब्रह्म की झलक है और यह हालत बताती है कि अब तुम सीधी उसी में जा रही हो।

तुमने लिखा है कि “मेरे शरीर का अंग-अंग शीशा हो रहा है।“ इस हालत को या तो तुम घुमा गईं या समझ नहीं पाई। मुझे यह ऐसी हालत मालूम होती है कि तुम्हारे जिस्म के हर जर्रे में ‘मालिक’ की शक्ल मालूम होती होगी और यह बड़ी अच्छी हालत है, ईश्वर मुबारिक करे।

तुमने लिखा है कि “मैं कहने में न मैं का बोध होता है, और न तू कहने में, तेरे का बोध होता है।“ यह लय-अवस्था की अच्छी गति है। अभी Body Consciousness (शरीर की चेतना) बाकी है और इसके समाप्त होने में ज़रा देर लगेगी। इसकी पहिचान यह है कि तुम अपने जिस्म को ‘मालिक’ का जिस्म मान कर ध्यान कर रही होगी और यह लय-अवस्था की दूसरी हालत है। मगर इसको ऐसा ही करती जाओ, जब तक कि यह अपना ठिकाना खुद न बता दे। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-305
लखीमपुर
22/4/1953
मेरे परम स्नेही ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

पूज्य मास्टर साहब जी से ‘आप’ सबकी कुशलता के समाचार ज्ञात हुए ‘आपको’ दौरा करीब घंटे भर सुबह और शाम हो ही जाता है, ईश्वर शीघ्र ही इसे अच्छा कर दें।

भाई, मेरा तो अब यह हाल है कि भीतर-बाहर हर ज़रें में उसी वास्तविकता की झलक दिखलाई पड़ती है। हर ज़र्रे में ‘वही’ झलक या रोशनी निकल रही है। दशा में एक अजीब Pure (शुद्ध) मस्ती की महक रहती है, और दशा में ही क्या, बल्कि हर ज़रें - ज़र्रे में से इसी महक का एहसास पाती हूँ। मेरे ‘बाबूजी’ अब कुछ यह है कि मैं वास्तविकता कहती हूँ, परन्तु उससे दशा के लिये शायद कुछ ठीक नहीं पड़ता है। कुल नज़ारा मेरे में और सब जगह है, वह न जाने क्या है और यह दशा है कि वह नज़ारा मुझसे ही उत्पन्न है। भाई, मेरा तो यह हाल है कि मेरे तो Sense (ज्ञान) वगैरह कुछ है ही नहीं। ‘मेरा’ और अब ‘तेरा’ कहने में कोई Sense (अर्थ) नहीं है। दशा आजकल, अब तो कुछ बड़ी भीनी-भीनी मालूम पड़ती है। मैं देखती हूँ कि अब जो दशा है और आती है, उसमें कुछ लगाव लपेट नहीं होता है। कोई Weight (वज़न) किसी प्रकार का महसूस नहीं होता है। बिल्कुल खाली सी, कुछ भीनी सी, दशा होती है।

मेरे ‘बाबूजी’ मेरे तो जैसे अब Sense (ज्ञान) ही नहीं रह गया है, अजीब भूली सी, भटकी सी दशा रहती है। मुझे तो इसका भी कुछ पता नहीं है, कि ‘मालिक’ से मिली हूँ या गैर हूँ। अब तो यह न जाने क्या हो गया है कि मेरा तो मन-वन जैसे अब कुछ काबू में नहीं रह गया है। Senses (वृत्तियों) पर कुछ कन्ट्रोल नहीं है और न यह पता कि यह सब कोई चीज़ है या नहीं। भाई, कुछ ऐसा लगता है कि जैसे ‘मालिक’ ने Senses (वृत्तियों) के बन्धन को भी हटा दिया हो या स्वतंत्र कर दिया हो। अब तो ऐसा है, मेरे ‘बाबूजी’ कि किसी की तबियत खराब है, तो घबड़ाती जरूर हूँ, प्रार्थना करती हूँ, परन्तु देखती हूँ कि घबड़ाने का मुझे कोई Sense (अर्थ) नहीं, उद्देश्य नहीं होता।

अब तो भाई तबियत इतनी झुकी हुई महसूस होती है कि छोटे, बड़े मुझे जैसे सब अपने से बड़े के सदृश लगते हैं और वैसे यह भी है कि सब बड़े-छोटे समान ही प्रतीत होते हैं। अपने से छोटा तो मेरे लिये संसार में कोई रह ही नहीं गया है, चाहे कोई पूजा करे या न करे, इससे कुछ मतलब नहीं। ऐसा लगता है कि मुझे चाहे कोई कुछ कह ले, परन्तु फिर भी न जाने क्यों इसे व्यवहार में इतना घटित नहीं कर पाती हूँ। क्योंकि मेरे ‘बाबूजी’ न जाने कुछ यह हो गया है कि मेरे तो जैसे अब अपने कन्ट्रोल में कुछ नहीं रह गया है। पहले ‘मालिक’ की कृपा से हर चीज़, मन, बुद्धि, व्यवहार, सब कुछ मेरे बस में था। अब जब मैं तो भूली सी, भटकी सी हूँ, तो ‘वही’ जाने, जैसे रखता है, वैसे ही रहती हूँ। यही नहीं बल्कि भाई, यह दशा है, ऐसा लगता है कि, हर आदमी, बच्चा-बच्चा मुझे सब कुछ सिखा सकता है। चाहे दुनियाँ की बातें और आध्यात्मिकता भी।

कुछ ऐसा है कि न मुझे अब Reality (वास्तविकता) की तमीज़ है, न कुछ की, बल्कि यह Reality (वास्तविकता) कहने से दशा का मतलब ठीक नहीं निकलता। अब तो ‘मालिक’ ही जानें। भाई, कुछ यह है कि जितना मैं ‘उसे’ समेटना चाहती हूँ, उतना कर नहीं पाती। समेट ही नहीं पाती। प्रेम यदि कुदरती हो तो ‘मालिक’ जानें, परन्तु अब मेरी दशा में नहीं महसूस होता, मैं कहाँ से लाऊ, और मैं करूँगी भी क्या, ‘मालिक’ जाने, मैं ‘उसे’ ज़रूर और ज़रूर चाहूँगी।

अब तो यह दशा है कि जर्रे जर्रे में हर तरफ, एक अजीब जल्वा, अजीब - मस्ती का सा अनुभव करती हूँ। अब तो जल्वा, मेरी ही मस्ती, मेरा ही एक अदना रूप की तरह है। मैं नहीं कह सकती कि मुझमें प्रेम नहीं है, हाँ यदि अपने से भी हो तो भी गैर का नहीं हुआ। हाँ प्रेम, प्रेम के रूप में नहीं, किन्तु ‘उसके’ रूप में हर समय रमा हुआ है।

भाई, मैं क्या कहूँ, मेरा तो यह हाल है कि न स्वतंत्र हूँ, न कोई बन्दिश ही मालूम पड़ती है। अविच्छिन्न हूँ। न होश में हूँ, न बेहोश हूँ, क्योंकि यह सब एक दशायें हैं। और मेरी अब यह कोई दशा, दशा नहीं होती। यदि निर्गुण हूँ, निरजंन हूँ, तो भी ‘वही’ जाने, क्या है। मैं शायद अब यह सब कुछ नहीं, एक अदना बहुत अदना हूँ। खैर, ‘आप’ जाने, जैसी हूँ, ‘आप’ की हूँ, बस यही है। ऐसा लगता है कि मैं अविच्छिन्न एक केवल कुछ एक सी रह गई हूँ। मेरे ‘बाबूजी’ आप जाने, मेरी क्या दशा है, जो ‘आप’ कहेंगे, वही ठीक है। मेरी तो जैसी दशा समझ में आई, लिख दी।

किताबें मिल गईं। धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेंगी। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा बिट्टो, छोटे भइया प्रणाम कहते हैं। इतिः-

सदैव केवल 'आपकी' ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-306
शाहजहाँपुर
25/4/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 22 अप्रैल का लिखा हुआ मिला, पढ़कर गदगद् हो गया। यह कुछ जमाने की खूबी है कि शीशा और हीरा एक ही भाव बिक रहें हैं और ज़माने की भी ख़ता नहीं, ख़ता उनकी है, जिन्होंने ज़माने को बिगाड़ा। यहाँ तो मामूली पढ़े-लिखे और कुछ धार्मिक विचार वाले ‘गुरु’ बन जाते हैं और उनको सिखाने वाले भी अधिकतर वैसे ही मिल जाते हैं। कहीं वेश फकीरी बदल लिया, तो फिर जगत गुरु बन बैठे और लोगों को बढ़िया-बढ़िया पूजायें सिखाने लगे। वेश के कारण लोगों को भी विश्वास जमने लगा और उन्होंने उन पूजाओं को करना आरम्भ कर दिया। यहाँ मुझको कौन पूछे कि जहाँ वेश तो क्या रंग तक नहीं रहा। अगर हम किसी से कुछ कहते भी हैं तो कोई माने क्यों। इसलिये जो अदायें साधुओं में होती है, उनका तो पता भी मुझमें नहीं है। स्वामी विवेकानन्द जी ने अपने एक लेक्चर में कहा है कि अगर कहीं हम बीस आदमी ऐसे बना सकें, जिसकी नज़र अन्तरिक्ष हो गई हो और अपने को अपने में देखने लगे तो मेरा काम ख़त्म हो गया। मैं समझता हूँ कि उनको एक ही दो आदमी मुश्किल से मिले होंगे और मैं सैकड़ों चाहता हूँ तो यह चीज़ बिना ‘ईश्वर’ की मदद के नहीं हो सकती और यह सब ‘उसकी’ मर्ज़ी पर है। हम बस काम किये जाते हैं, जो इसके लायक मिलता है।

तुमने हमारे Pamphlet (पेम्फ्लेट) गुरु-सन्देश में पढ़ा होगा कि ईश्वर-दर्शन की हालत क्या है, हमें तो वही हालत चाहिये। शंख-चक्र-गदा-पद्म वाला तो उन्हीं को मुबारक रहे, जो इसी को असल चीज समझते हैं और जिन्होंने ईश्वर को अपने जैसा शरीर वाला समझ लिया है। उनके यह समझ में नहीं आता कि ईश्वर को Material (भौतिक) समझ लेने से उनका आध्यात्मिक लाभ कुछ नहीं होता है और यह ईश्वर की तौहीन है। इससे अपना नुकसान यह है कि अपनी निगाह Matter (भौतिक पदार्थ पर) ही कायम हो जाती है और मैं यह समझता हूँ कि वह ईश्वर को नाराज़गी का भी मौका देते हैं। किसी साफ-पाक आदमी को अगर गन्दा कह दिया जावे तो, वह जरूर नाराज़ हो जावेगा। तुम्हारी हालत ईश्वर-दर्शन की इससे पहले भी आ चुकी है, मगर इतनी निखरी हुई नहीं थी। मगर तुम्हें अभी इससे आगे जाना है। इसको ऐसा समझो, जैसे बच्चों के लिये खिलौना। हमें यही चाहिये कि हम अपने अन्दर भिदते जायें और अपना जल्वा अपने आप देखें; अन्तर्मुखी होने का यही फायदा है। मगर यह हालत भी ऐसी नहीं है कि उस पर हम ठहर जावें और काफ़ी समझ बैठें। यह तो असल ब्रह्म-विद्या की शुरूआत ही है, अभी तुम्हें और आगे जाना है। जब यह दृश्य देखने का भी एहसास बाक़ी न रहे, तो उसकी दूसरी सीढ़ी होगी और जितना आगे बढ़ती जाओगी, उसकी शक्ल भी तबदील होती जावेगी। अभी अथाह समुद्र, जिसमें हमें मिल जाना है, कोसों दूर है।

तुमने लिखा है कि “अब जो दशा आती है, उसमें कोई लगाव-लपेट नहीं होता है। और न किसी प्रकार का वज़न” इसका मतलब यह है कि अपना आपापन जो ठोस था, जा चुका है और अब तुम किसी काम की कर्ता नहीं रहीं और न संस्कार बन रहे हैं। तुमने लिखा है कि “हमारे Senses (वृत्तियाँ) ही नहीं रह गये हैं” यह बहुत कुछ ठीक है। मगर अभी Senses (वृत्तियों) में भद्दापन बाकी है, अभी Refined (शुद्ध) नहीं हुए हैं और उस वक्त यह सही आते चलें जायेंगे, जितनी कि लय-अवस्था बढ़ती जावेगी और Negation (निगेशन) की पूरी हालत आ जाने पर Senses (वृत्तियाँ) भी पूरी हालत में आ जाते हैं। मैं अपनी निगाह को क्या करूँ कि तुम जहाँ उन्नति कर के पहुँचती हो, हमें शुरूआत ही मालूम पड़ती है।

मेरा Realization (साक्षात्कार) का ख़्याल बहुत ऊंचा है। जब तक कि अभ्यासी अपने आप को ईश्वर में बिल्कुल लय न कर ले, तब तक मैं उसको Perfectly Realized Soul (पूर्णरीत्या साक्षात्कार प्राप्त करने वाली आत्मा) नहीं कह सकता हूँ।

मेरी राय में मुझे ऐसा आदमी इस वक्त कोई नज़र नहीं पड़ता। यह और बात है कि हमारे गुरु महाराज ने किसी को ऐसा बना दिया हो, यह वह जानें। बिटिया! कहीं मेरी निगाह खराब तो नहीं हो गई है। एक किस्सा सुनाता हूँ; एक मर्तबा दुर्योधन ने कृष्ण जी से पूछा कि आप अर्जुन को क्यों ज़्यादा मुहब्बत करते हैं और रिश्तेदार मैं भी हूँ, मुझसे मुहब्बत नहीं करते। कृष्ण जी ने कुछ समय व्यतीत होने पर इसका जवाब दिया। वह यह था कि अर्जुन से कहा कि तुम्हारे राज्य में जितने बुरे आदमी हों, उनकी फेहरिस्त बना लाओ और दुर्योधन से कहा कि तुम्हारे राज्य में जितने अच्छे आदमी हों उनकी फेहरिस्त बना लाओ। दोनों चल दिये। अर्जुन जब लौटा तो उसने कहा- “मुझे कोई बुरा आदमी ही नहीं मिला, जिसका नाम फेहरिस्त पर लिखता” और दुर्योधन ने यह खबर दी कि मुझे कोई अच्छा आदमी ही नहीं मिला, जिसको फेहरिस्त पर दर्ज करता। तब कृष्ण जी ने कहा कि यही कारण है कि मैं अर्जुन से इतनी मोहब्बत करता हूँ। वह इतना अच्छा है कि उसको सब अच्छे ही दिखलाई देते हैं और तुम इतने बुरे हो कि तुम्हें कोई आदमी अच्छा मालूम ही नहीं दिया। तो कहीं मुझमें दुर्योधन वाली आँख तो पैदा नहीं हो गई। अपने से छोटा तुमने लिखा है कि संसार में कोई नहीं रह गया है, यह एक गति है, जो ब्रह्म-गति से बहुत कुछ निस्बत रखती है। इसमें भी इससे ऊंची हालत पैदा होगी, मगर वह हालत भी आख़िरी हालत नहीं होगी। इसके बाद जो हालत पैदा होती है, मैं उसको बता देता, मगर इसलिये बताना नहीं चाहता कि पहले से कहीं उसका ख़्याल न बाँध लो। ईश्वर ने चाहा तो वह हालत भी आ जावेगी। तुमने लिखा है कि “पहले मन, बुद्धि, व्यवहार, सब कुछ मेरे वश में था और अब भूली भटकी सी हूँ।“ इसके माने यह है कि सब रंग मिलना शुरू हो गये हैं, मगर अभी सब रंग मिलाकर सफेद रंग नहीं बना। यह भी हो जावेगा ईश्वर की कृपा से। तुमने लिखा है कि “अपना ही जल्वा, अपनी ही मस्ती, मेरा ही एक अदना करिश्मा है” इसका मतलब यह है कि Non-Duality (अद्धैत) की हालत शुरू है। इसकी पूर्ण गति हो जाने पर, इसका रूख कुछ और बदलेगा, जिसको मैं पहले से बताना नहीं चाहता और वह ईश्वर-दर्शन की हालत से बहुत ऊंची हालत होगी। Quotations (उद्धरण) के आगे जो तुमने ख़त में लिखा है, वह सब Non-Duality (अद्धैत) पर आने की खुशख़बरी दे रही है। अभी तुम्हारा अहंभाव अच्छी तरह से नहीं गया है। तुम्हारी यही हालत रही तो ईश्वर-कृपा से यह चीज़ भी पैदा हो जावेगी।

यह हालतें बिना योग-मार्ग पर चलने से पैदा नहीं हो सकती और उसके साथ शर्त यह भी है कि हमारे गुरु महाराज सा Guide (मार्ग दर्शक) भी हो और हम सब के वही Guide (गाइड) हैं और खुद अपनी मिसाल हैं। अगर यह सब हालतें सबके सामने रख दी जावें तो भी बहुत कम ऐसे मिलेंगे कि उनका जी इस चीज़ को हासिल करने के लिये ललचा आवे। मुझसे एक-आध शख़्सों ने इस विषय में बातचीत भी की, मगर उन्होंने यह यकीन नहीं किया कि यह हालतें मेरे जरिये से प्राप्त भी हो सकती हैं, कारण यह था कि मैं उनकी ‘महात्मा’ की तारीफ़ के अनुसार कोई महात्मा नहीं था और यह है भी सही मैं तो एक इन्सान हूँ और गुरु महाराज ने मुझको बनाया भी ऐसा ही है। मगर भाई, तुम महात्मा हो और हमारी राय में महात्मा होना अच्छा होगा, क्योंकि यह बड़ी बात है।

तुम्हारा शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-307
लखीमपुर
25/4/1953
मेरे परम स्नेही ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ कल आया-पढ़कर प्रसन्नता हुई। मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। मुन्नी की तबियत ठीक है। खाना भी कल से मिलने लगा है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई, कुछ ऐसा है कि दशा अंधेरा ही अंधेरा है और अंधेरे में ही पैरती या भिदती चली जा रही हूँ। कुछ यह हाल है कि अंधेरा सा ही मेरा रूप हो गया है। भाई अब तो कुछ ऐसा है कि मेरा ज़र्रा-ज़र्रा आईना है, यानी मेरे ज़रें ज़रें में ‘वही’ दिखाई पड़ता है। भीतर बाहर ज़र्रे जर्रे में मेरा ‘मालिक’ ही ‘मालिक’ महसूस होता हैं। न जाने अब कुछ ऐसा है कि अब अपने शरीर को ‘उसका’ शरीर नहीं, बल्कि कुछ ऐसा हो गया है कि ‘वह’ तो स्वयं ही, स्वभाविक ही ज़र्रे-ज़रें में मौजूद है ही। अपना शरीर का मानना, अब नहीं रह गया है, बल्कि अब तो हर जर्रे जर्रे में केवल ‘वही’ महसूस होता है, ‘उसे’ ही देखती हूँ। ऐसे ही मेरे क्या, बाहर प्रत्येक ज़र्रे में एक ‘वही’ भिदा हुआ सा, समाया हुआ सा महसूस होता है। मेरे ‘बाबूजी’ मैं तो ऐसी अदना और एक कुछ बिल्कुल अविच्छिन्न ही हो गई हूँ।

ऐसा लगता है कि शरीर का जर्रा जर्रा पिघल कर बहा जाता है और उसमें अब ‘मालिक’ समा गया है। भाई, अब तो ऐसा लगता है कि अनुभव और अनुभव करने वाला एक हो गया है। ऐसा ही धीमा सा अनुभव मेरा है।

मेरे ‘बाबूजी’ न मालूम क्या बात है कि मुझे अपने ज़रें ज़रें से, रोयें-रोयें से प्रेम हो गया है और ज़रें ज़र्रे में रस या गुदगुदी और सिहरन सी बस गई है। जी चाहता है अपने रोएँ-रोऍ में लिपटी रहूँ और ‘उसकी’ कृपा से लिपटे रहने या समाये रहने की सी ही दशा शुरू हो गई लगती है। भाई और यह न जाने मेरी अब ऐसी दशा है कि संसार के, जड़ हो या चेतन, सब मेरे लिये यही है कि :- “दर दीवार दर्पण भये, जित देखूं तित तोय”। कुछ यह है कि हर एक की मेरे लिये एक ही हस्ती हो गई लगती है। पत्थर से लिपट जाऊं तो मेरी और उसकी (पत्थर की) हस्ती बराबर ही महसूस होती है। भाई, मेरा तो यह हाल है कि जैसे अपने में जर्रे जर्रे से लिपटे रहने को जी चाहता है, उसी प्रकार संसार के प्रत्येक ज़र्रे जर्रे से ऐसा ही जी चाहता है और कुछ यह जरूर हैं कि भीतर बाहर के हर ज़र्रे जर्रे से लिपटी या समायी हुई ही महसूस होती हूँ। जर्रा जर्रा पिघलकर, गलकर उस अजीब गुदगुदी में मिला ही रहता है। अपना ही क्या बल्कि हर कण-कण में ‘वही’ दीखता है। परन्तु अब न जाने यह जी कैसा हो गया है कि न हंसने को जी चाहता है और न रोने का। कुछ भीतर अजीब सा हुआ करता है। हल्की सिहरन, धीमी गुदगुदी और ठंडी आह सी महसूस होती है।

मेरे ‘मालिक’ अब तो ऐसी दशा है कि कुछ अजीब मस्ती सी, झूमती सी दशा है। परन्तु बीच-बीच में अक्सर खाली सी दशा आती है। ऐसी मस्ती है कि ऐसा लगता है कि मैं तो अविच्छिन्न हूँ। न मर सकती हूँ, न जीती हूँ, न किसी से कट सकती हूँ, न डूब सकती हूँ, न कुछ हो सकता है। बस मैं तो जैसी हूँ, वैसी ही रहूँगी। भाई, अब तो ऐसा लगता है कि हर कण-कण की हस्ती एक है, और कण-कण में मैं मौजूद हूँ और हर कण मुझमें मौजूद है। परन्तु यह मस्ती उछालने वाली नहीं है, बल्कि सीधी सादी हैं, जो हर कण में मौजूद है। सच तो यह है कि अब तो न कण है, और न मैं, बस कुछ एक ही हस्ती रह गई है और उसे ‘मैं’ कह लूं तो, कुछ नहीं ‘वह’ कह लूं तो कुछ नहीं, ईश्वर कह लूं तो कुछ नहीं, कुछ ऐसी ही सादी सी, सरल सी मेरी हालत है। ऐसा लगता है कि जैसे मेरे हर ज़र्रे जर्रे की ठोसता या ग्रन्थि साफ सी होने लगी है, पिघलने लगी है।

आज से ता. 26 से कुछ ऐसा मालूम पड़ता है कि निगाह भीतर को जा ठहरती है। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं, बिट्टो, छोटे भइया प्रणाम कहते हैं। ताऊ जी को गर्दन में पीछे एक छोटा फोड़ा 4-5 दिन से निकला है, कल से कुछ फूट भी गया है। तकलीफ भी कम हो गई है, कोई फिक्र की ज़रा भी बात नहीं है। न जाने क्यों शरीर में कुछ आलस या बेपरवाही सी रहती है, परन्तु वैसे नहीं। इति:-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-308
लखीमपुर
28/4/1953
मेरे परम स्नेही ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ आज मिला-पढ़कर प्रसन्नता हुई। मुन्नी की तबियत तो ईश्वर की कृपा से बिल्कुल ठीक है, कमज़ोरी भी काफी ठीक है। ताऊजी के गर्दन में पीछे फोड़ा बड़ा निकला है, उसमें मुंह तो 5-6 हैं, किन्तु पस निकलता कम है। अभी तो तकलीफ काफ़ी है परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से शायद 2-3 दिन में फोड़ा ठीक होने लगे। फिक्र की बात नहीं है, ठीक हो जायेगा। ‘आपने’ मास्टर साहब जी को लिखा है कि एक महीने की जून की पूरी छुट्टी लेकर उत्तरकाशी जायेंगे। सो मेरे ‘बाबूजी’ हम सब की यही प्रार्थना है कि वहाँ से लौटते में थकान ही मिटाने के लिये कृपया 2-4 दिन को ‘आप’ यहाँ आ जायें। आयेंगे ‘आप’ अवश्य। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी मेरी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई अब तो कुछ यह है कि न जाने क्यों निगाह शरीर पर नहीं जाती और और न अब शरीर कुछ महसूस ही होता है। मेरा तो अब यह हाल है कि मुझे अब वह दशा कि “अपने ज़र्रे जर्रे में और संसार के जर्रे जर्रे में ‘मालिक’ ही दीखता है,” यह चीज़ अब न जाने कहाँ चली गई और अब इस दशा को लाने में दशा अच्छी नहीं मालूम पड़ती कुछ बोझा सा लगता है, इसलिये दशा शुद्ध सी नहीं रह जाती, परन्तु मैं तो ‘मालिक’ की मर्जी पर हूँ। मुझे तो ‘वह’ चाहिये और मैं कुछ नहीं जानती। भाई, न जाने क्यों अब यह दशा मेरे एहसास में नहीं रही, या यों कह लीजिये कि ‘मालिक’ ने ख्याल को इस दशा के एहसास के बोझ से भी स्वतंत्र कर दिया है।

मेरे ‘बाबूजी’ एहसास भी न जाने क्यों बिल्कुल खाली ही सा होता जाता है और एहसास, एहसास करता है तो इतने हल्के कि अपने में बोझा नहीं आने देता। दशा का एहसास किया और बरी भी रहा, मेरी कुछ दशा हो रही है आजकल / भाई मुझे कुछ ऐसा लगता है कि दशा में भी Material (भौतिकता) होगा तो इतना हल्का कि जो महसूस नहीं होता। इसलिये दशा भी इतनी हल्की व ख़ाली सी आती है कि यदि मैं लिखूं न, तो यह ख़बर ही न रहे, कि यह दशा बदली है या अब यह दशा है। अब तो ऐसा लगता है कि दशा और एहसास और एहसास करने वाले में एकता सी होती जाती है। न जाने क्यों मुझे अब यह महसूस नहीं होता कि ‘मालिक’ मेरे ज़रें ज़र्रे में समाया हुआ या भिदा हुआ है। मेरे ‘बाबूजी’ मेरा तो कुछ अब यह हाल है कि ऐसा लगता है कि दशा आती है बदल जाती है, परन्तु भीतर की स्थिति एक सी ही रहती है, और भाई ऐसा लगता है कि दशा भी अब एक ही रंग की आती है, इतनी हल्की कि अब तो बदलती है तो इतने हल्के तौर पर कि Catch (अनुभव होना) करती हूँ, परन्तु यह एहसास नहीं होता कि यह दूसरी है या क्या है, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से समझ ज़रूर कुछ काम दे जाती है, यद्यपि अब यह भी रंगी तो उसी रंग में रहती है, परन्तु रंग कह लीजिये तो, ऐसा कि जो यदि हम आँख मूंद लें, तो जो कुछ रहता हो, ऐसा ही समझ लीजिये। ‘मालिक’ की कृपा से ताऊजी के फोड़े में आज पस भी कुछ ज़्यादा निकला है, इसलिये आराम है।

ता. 29.4.53 अब तो भाई, ऐसा लगता है कि दशा में न कुछ बनाव होता है, न कुछ श्रृंगार होता है, बस जैसी आती है, वैसी आती है। मैं तो बस अदना और कुछ इतनी अदना हो गई हूँ कि कुछ पता नहीं। एक कंगाल कह लीजिये, परन्तु ऐसी जिसे अमीरी का स्वप्न भी न हो और अपनी कंगाली का एहसास भी न हो। यह मेरी अब एक अदना सी हालत है और शायद एहसास खाली रहता है। शायद इसीलिये या क्या, चाहे कितनी हल्की या अदना सी दशा आई नहीं कि स्वयं ही पता लगती चली जाती है, कुछ कोशिश भी नहीं करनी पड़ती, बस जरा से उसे देखने भर का ख़्याल कह लीजिये, बस लिख लेती हूँ। मेरे ‘बाबूजी’ न जानें कैसे मुझे कुछ अभी-अभी ऐसा एहसास हुआ कि इस इतनी अदना वाले समुंद्र में मैं एकदम डूब गई हूँ। अब ऐसा लगता है कि रग-रग में वही जल बह रहा है और कुछ ऐसा लग रहा है, कि मैं उसी में भिदती सी जा रही हूँ। इस समुंद्र का जल मुझमें भिदता या समाता ही चला जा रहा है। मेरे ‘मालिक’ यह Mastery (स्वामित्व) केवल ‘आपकी’ ही है, वरना ऐसी रीति न कभी देखी गई है और न सुनी गई है। ऊपर जो मैंने अभी-अभी लिखा है, उसके मतलब करीब सबेरे साढ़े आठ बजे हैं। भाई अब तो न कुछ मेरा करिश्मा है और वास्तव में न कुछ करिश्मा ही है न कुछ मेरा जल्वा ही है और न जल्वा ही कोई चीज़ रह गये। अब तो यह दशा है कि एक ही रंग हो गये हैं और मैं नहीं जानती ‘आपने’ जो दिया होगा, सो होगा। पूज्य ‘बाबूजी’ न ‘आपकी’ निगाह ख़राब हो गई है और न ‘आपने’ जैसा लिखा है, दुर्योधन वाली आँख पैदा हुई है, वरन् मैं तो इतना ही कुछ थोड़ा सा अब यह जान पाई हूँ कि ‘आप’ हमारी सारी ठोसता को गला कर, रग-रग को शुद्ध करके हमें अपनी कृपा व प्रेमवश असली रूप दे देना चाहते हैं। हमें अपने असली निखार में खड़ा कर देना चाहते हैं। शुरूआत की जो ‘आप’ ने लिखी, सो मैं तो सच में खुद भी ऐसा ही अनुभव करती हूँ, नहीं, नहीं बल्कि इतना भी नहीं, क्योंकि न मुझे शुरूआत से काम है, न पूर्ण से मतलब, मुझे तो जैसा मेरा ‘मालिक’ है, बस उसी को पाना है।

अभी मास्टर साहब जी 'आपका' पोस्टकार्ड लाये। Point 'R' (पॉइंट-आर) के लिये 'आपको बहुत-बहुत शुक्रिया। इतिः-

सदैव केवल 'आपकी' ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-309
लखीमपुर
5/5/1953
मेरे परम स्नेही ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

‘आपका’ Postcard (पोस्टकार्ड) कल मास्टर साहब जी ने सुनाया-शुक्ला जी के रोम-रोम में अजपा खोलने की कृपा के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद एवं बधाई है। ताऊजी का फोड़ा भी ‘मालिक’ की कृपा से चारों ओर से सिमिट कर फूट गया है, बहुत बहता है। फोड़े के लगे में बाँई ओर अभी बहुत कड़ापन है, शायद वहाँ से भी कहीं फूट न जाये, परन्तु डाक्टर ने कहा है कि कोशिश यही करूँगा कि सारा मवाद एक ही मुंह से होकर बह जाये, आगे ईश्वर की मर्जी। कमजोरी काफी है, परन्तु ठीक रही है। सब ईश्वर की, ‘मालिक’ की कृपा है। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक -दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई ऐसा लगता है कि शरीर के भीतर रोम-रोम में, ज़रें-ज़रें में यह दशा फैल चुकी है, रम चुकी है। अब तो यह समझ लीजिये कि शरीर भीतर-बाहर हर कण-कण में धूनी रमी हुई है।

मेरे ‘बाबूजी’ ऐसा लगता है कि आँख, आँख में खो जाती है। निगाह दृश्य में खो सी गई है, भिद सी गई है। भाई, न जाने कुछ ऐसी दशा महसूस होती है कि तीर निशाने पर बैठ चुका है। ऐसा लगता है कि दृश्य, दृष्टि (निगाह) में समाया जाता है। कुछ यह हो गया है कि एक ही आँख और एक ही रंग हो गया है, परन्तु न जाने क्यों आँख को रंग की तमीज़ ही नहीं रह गई है। या यों कह लीजिये कि रंग भी आँख ही हो गया है। कुछ ऐसा दिखाई देता है कि एक ही गति हो गई है और अब उसी मैदान में, या ऐसे ही मैदान में, जैसे ‘मालिक’ चाहता है, लिये जाता है। या यों कह लीजिये सब गति मिट कर एक ही गति रह गई है, या अब एक ही गति बन गई है। अब इसी मैदान में चली जाती हूँ, जिसमें बस एक ही आँख है और एक ही रंग है, परन्तु दृश्य नहीं है, क्योंकि वह तो शायद आँख में खो चुका है या भिद चुका है। और यह भी Innocence (मासूमियत) पना है कि ऐसी भी दशा लगती है कि न जाने कुछ है भी या नहीं। इस मैदान में या भाई हर एक का यही हाल है कि हर कण मुझे प्यारा है और हर कण को मैं।

मेरे ‘बाबूजी’ हर कण से मुझे रस मिलता है, हर जर्रे से मुझे रोशनी मिलती है, और बात यह भी कि हर कण-कण जर्रा जर्रा मेरे रस से पल रहा है और ऐसे मैदान में चली क्या जाती हूँ, बल्कि वह स्वयं ही मेरे में चलता आता है।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ पहले जैसा मैंने लिखा था कि “हर तरफ़ मेरे लिये एक ही हस्ती हो गई लगती है और पत्थर से लिपट जाऊं तो उसकी और मेरी एक ही हस्ती लगती है।“ परन्तु अब तो ऐसा है कि कोई हस्ती ही जैसे नहीं रह गई है। किसी की कुछ हस्ती ही नहीं है। मैदान साफ़ पड़ा है, न कुछ हस्ती है, न कुछ। अब तो हस्ती ही मिट चुकी है, अब न जाने क्या है।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा ताऊजी, बिट्टो, छोटे भइया ‘आपको’ प्रणाम कहते हैं। ताऊ जी को हरारत भी 99.4 तक ही अब जाती है। इतिः-

सदैव केवल 'आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-310
लखीमपुर
9/5/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ ताऊ जी के लिये तथा शुक्ला जी के लिये आये। ताऊ जी वाले ‘आपके’ कार्ड को सुनकर तबियत एकदम थरथरा सी उठी, परन्तु हमें तो ‘उसकी’ कृपा का ही आसरा है। ता. 7 को सबेरे अपने ‘समर्थ जी’ से प्रार्थना कर रही थी, तभी अचानक ही एक क्षण को ऐसा रूप कि कद लम्बा, रंग साँवला, ऐसा समझ लीजिये कि मास्टर साहब जैसे क़द का और वैसे ही रंग तथा वैसी ही कुछ भारी सी देह की झलक एक क्षण को मिली और अपना नाम कस्तूरी सुनाई पड़ा, बस फिर गायब हो गई। परन्तु तब से एक अजीब उमंग और ऐसी सान्त्वना सी मुझे मिली, और मेरे ‘बाबूजी’ उस सुमधुर आवाज़ में मुझे उतना ही प्रेम मिला, जितना ‘आपके’ में मिलता है। ‘मालिक’ को बहुत-बहुत धन्यवाद है, और अपने ‘समर्थ जी महाराज जी’ को मैं भला क्या दूँ, उनसे क्या कहूँ, बस बारम्बार प्रणाम है। परन्तु मुझे न जाने क्या हो गया कि न मुझे यह याद है, कि मैं क्या प्रार्थना कर रही थी, अब ‘आप’ ही जाने, मुझे याद नहीं आती। ताऊजी का फोड़ा ‘मालिक’ की कृपा से दिनों दिन अच्छा हो रहा है। फोड़े के लगे में जो सूजन थी, वह भी काफी पटक गई है। शुक्ला जी वाले ‘आपके’ एक कार्ड में ‘आपके’ पेट में बहुत दर्द का हाल पढ़कर तबियत में चिन्ता है। मैं कहती हूँ और अम्मा भी यही कह रही हैं, कि यह कहीं ताऊ जी के फोड़े का जहर खींचने के कारण ही तो नहीं है।

मेरे ‘बाबूजी’ ‘आपका’ शरीर इस योग्य नहीं है, यदि ‘आपका’ जी नहीं मानता तो मुझे दे दीजिये मुझे कोई तकलीफ न होगी, परन्तु ‘आप’ का दर्द बेचैन ज़रूर कर देता है। ‘आप’ अच्छे रहें, फिर चाहे कुछ हो या न हो, हम सबको अपने ‘मालिक’ से यही प्रार्थना है। दुनियाँ में मेरे लिए रोशनी और बहार केवल अपने ‘मालिक’ के साथ है और मैं हमेशा ‘मालिक’ के साथ हूँ और ‘वह’ मुझमें। कृपया ‘अपने’ पेट के दर्द का हाल ज़रूर दीजियेगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी थोड़ी सी मेरी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरी दशा तो भाई, अब ऐसी है कि न मुझे कुछ महसूस होता है, न कुछ दिखाई देता है। बस सफाचट मैदान है। न मैदान है, न कुछ, बस कुछ उजाड़ सी है। भाई, न जाने क्यों मेरी कुछ ऐसी तबियत हो गई है कि मुझे न बनाव पसन्द है न सिंगार। यहाँ तक कि कमरा भी खाली ही मुझे अच्छा लगता है। इसके यह मतलब नहीं है कि मैं उदासीन सी हो गई हूँ। हाँ, मुझे हर चीज खाली ही भली मालूम होती है। दुनियाँ अब दुनियाँ नहीं, बल्कि मेरे लिये एकान्त जगह ही हो गई है। हर चीज हर जगह मेरे लिये एकान्त है। कुछ ऐसी तबियत मेरी बन गई है कि आँसू बिखेरने की चीज नहीं, बल्कि हृदय में सिमटना ही अच्छा लगता है। हर चीज मुझे बस भीतरी, या मन की अच्छी लगती है। अब ऐसा लगता है कि जैसे मेरा सम्बन्ध केवल भीतर से या मन ही से रह गया है और सारे अवयव घुलकर हर चीज खाली सी हो गई है। मेरा हर रोयाँ रोयाँ खाली हो चुका है। मेरे ‘बाबूजी’ कुछ ऐसा लगता है कि अब बाह्य सम्बन्ध तो बिल्कुल ख़त्म हो चुका है और न जाने क्यों कुछ यह भी है कि हर समय हर चीज मुझे बस खाली-खाली सी ही दिखाई देती है। भाई, अब न बन ही दीखता है, न मैदान, न जाने क्या है।

जैसा मैंने पहले लिखा था कि एक ही आँख और एक ही रंग हो गया है, परन्तु अब यह हाल है कि न आँख ही है, न रंग ही।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-311
शाहजहाँपुर
12/5/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे पत्र सब मिल गये। 5 मई के पत्र का सिर्फ इतना जवाब है कि तुम्हारी लय-अवस्था, जिसको फ़नाइयत भी कहते हैं, बढ़ रही है और अभ्यासी की, जिसके भाग्य होते हैं, उसमें यह चीज़ पैदा होती है और बढ़ती रहती है। इसका छोर अभी दूर है और उसी की कैफियत अन्दर और बाहर महसूस होती है। अपने में ही घुल-मिल कर अपने आप को छोड़ देना ही Spirituality (आध्यात्मिकता) है।

एक बात मैं तुमको लिखना भूल गया। तुम धार्मिक किताबों की Study (अध्ययन) किया करो। हर किताब, उपनिषद वगैरह, सब देख सकती हो और ईश्वर ने चाहा, तुम्हारी समझ में भी बहुत से शेखीबाजों से अच्छी आवेगी। मैं भी पढ़ने लगा हूँ, परन्तु भूल जाता हूँ। पढ़े-लिखे आदमी के सामने मुझे एक तरह की खिफ्फ़त होती है। तुम अपने में यह कमी न रहने दो।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-312
लखीमपुर
14/5/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ कल मिला-’आपके’ पेट के दर्द का हाल पढ़कर सबको चिन्ता है। ईश्वर से प्रार्थना है कि जल्दी से जल्दी दर्द कम हो जाये। अम्मा भी कहतीं हैं कि ‘आप’ जहाँ तक हो, आराम करने से भी शायद कुछ लाभ पहुँचे। ‘बाबूजी’ ‘आपने’ यहाँ कई बार कहा था कि आलू के झोर से ‘आपके’ पेट में दर्द को आराम मिलता है, सो मास्टर साहब जी के हाथ आलू का झोर ज़रुर भेजूंगी, ‘आप’ जल्दी से पी लीजियेगा, बस ‘आपको’ जरूर आराम होवेगा। मास्टर साहब जी से भी कह दूंगी कि वे सीधे ‘आपके’ ही यहाँ जावें, जिससे ‘आपको’ जल्दी से आराम हो जावे। क्या करूँ भाई, मैं तो ‘आपको’ रोज़ झोर बनाकर पिलाती तो शायद पेट का दर्द बढ़ने कदापि न पाता। ताऊजी का फोड़ा बस छोटा सा रह गया है, गिल्टी भी आज नरम हो चली है, कोई जरा सी भी चिन्ता की बात नहीं है।

भाई, ‘आपने’ लिखा है कि तुम धार्मिक किताबों की study (अध्ययन) करो। हर किताब, उपनिषद, सब देख सकती हो और ईश्वर ने चाहा, तुम्हारी समझ में भी बहुत से शेखीबाजों से अच्छी आवेगी सो मेरे ‘बाबूजी’ मुझे तो सब बातें ‘आप’ ही में प्रतीत होती हैं। मेरा तो Literature (साहित्य) सब कुछ ‘आप’ ही हैं। Literature (साहित्य) के अतिरिक्त आपशनल subject (विषय) मैंने कुछ नहीं लिये, फिर मैं क्या देखूं। फिर मैं तो यही देखती हूँ, यही महसूस करती हूँ कि हिन्दी भी मुझे ‘मालिक’ ने ही बताई है। ऐसा क्रम से मुझे मेरा ‘मालिक’ बता रहा है कि सब कुछ मुझ सी तुच्छ बुद्धि वाली की समझ में आ जाता है। फिर ‘मेरे बाबूजी’ धार्मिक ग्रन्थ हैं, मैं मानती हूँ, परन्तु जो धर्म की परिभाषा ‘आपने’ बतलाई है कि “अपने में रम जाना धर्म है,” किसी ग्रन्थ में नहीं लिखा, तो फिर मैं भाई, यही करूंगी कि जो सीधी सी, मेरी समझ के लायक आपने परिभाषा बताई है, उसे अपने में ठीक जब Reading (पढ़) कर लूंगी, तब तो फिर ‘आप’ जो पढ़ायेंगे, सो पढूंगी। सच तो यह है कि मुझे subject (विषय) के अनुसार ही ‘मालिक’ बता रहा है। मैं क्या देखूं, मुझे कुछ दिखाई नहीं देता है, मैं क्या सुनु, कुछ सुनाई नहीं देता है? क्या सीखूं, जब कुछ समझ में आये, तब न। ‘आपकी’ आज्ञा मानना हर तरह से मेरा कर्तव्य है, परन्तु मैं तो बिक चुकी हूँ। खैर, अब ‘आप’ जैसा चाहें। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब कुछ ऐसी दशा है कि कुल जैसे अब आखें ही आखें रह गई हैं, परन्तु ऐसी कि उसमें देखने की शक्ति या माद्दा ही नहीं रहा। मेरे ‘बाबूजी’ अब तो ऐसा लगता है कि जोश तो गलकर जैसे जर्रे जर्रे में, नस-नस में शायद बह चुका है, वह भी मुझ में खो गया है। इसी कारण उसमें उफान ही नहीं आ पाता है। ताकत भी (इच्छा-शक्ति) गल गलाकर न जाने कहाँ चली गई है, कुछ पता ही नहीं। मुझे तो भाई, अब ऐसा समझ लीजिये कि जैसे मैं एक समुंद्र के समान हो गई हूँ और सब उसमें समाकर लापता हो चुके हैं। बस जल ही जल है, सो भी कैसा, जिसमें अब भिगोने की ताकत ही नहीं रही है। अब कुछ ऐसा है कि जैसे कोई मुझमें जान फूंकता रहता है, बस वही मेरी ज़िन्दगी हो गई है, और जो समुद्र के सदृश मैंने लिखा था, वह भी उथला है, गहराई कहीं रह ही नहीं गई है, सब कुछ बराबर हो गया है।

मेरे ‘बाबूजी’ ‘आपने’ जो ईश्वर-दर्शन वाली हालत लिखी थी, वह तो भाई, मुझमें अब हज़्म हो चुकी, फिर ख़ाली की ख़ाली रह गई हूँ। कुछ यह भी हो गया है कि ऐसा लगता है कि प्यास तो अब सीमित न रह कर नस-नस में भिद चुकी है, नहीं, नहीं, मन का ज़र्रा ज़र्रा अब प्यासा ही प्यासा महसूस होता है। यद्यपि प्यास तो पिघल कर ज़रें-ज़रें में समा चुकी है, अब उसका कोई खास रूप नहीं रह गया है, जिससे मैं यह कहने या सोचने तक की गुंजाइश रख सकती कि मुझमें प्यास है। मैं तो खाली हूँ, हाँ प्यास मेरा रूप ही हो गया लगता है। अब तो भाई, ऐसा लगता है कि मन में भी गलाव दौड़ने लगा है। कृपया लौटते में थकान यहीं मिटा लीजियेगा।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। झोर भेजने में सब लोग कहते हैं, कि खराब हो जायेगा। इसलिये क्या करूँ। अब मास्टर साहब जी ‘आप को’ या माया ही खिला देगी, तो लाभ हो जायेगा। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-313
लखीमपुर
19/5/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

पूज्य मास्टर साहब जी के पत्र से ‘आपके’ पेट के दर्द का हाल पढ़कर तबियत परेशान है। जिस दिन ‘आपने’ ज़हर खींचने के बाद एक पत्र में पेट का दर्द लिखा था, उसी दिन से मेरी तबियत यही कह रही थी कि इसकी वज़ह वह जहर का कुछ असर भी है। बस यही है हमारी भक्ति और यही है हमारा प्रेम सच तो यह है ‘बाबूजी’ कि प्रेम तो असली हम सत्संगी लोगों से भी ‘आप’ ही करते हैं, हमारा तो प्रेम नहीं, किसी हद तक बनावा ही होगा। खैर, ‘ईश्वर’ से हृदय से हमारी यही प्रार्थना है कि दर्द जल्दी ही हल्का पड़ जावे। ताऊ जी तो ‘मालिक’ की कृपा से करीब-करीब बिल्कुल ठीक हैं। गिल्टी भी सारी नर्म होकर पटकने लगी है। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो ऐसा लगता है कि जैसे मन सिकुड़ने लगा है, सूक्ष्म होने लगा है। अब इधर दो-एक दिन से तो ऐसा लगता है कि हर चीज़, हर मनुष्य तक खाली है। ऐसा महसूस होता है कि हर जगह, हर चीज़, जैसे कुछ नहीं है। कुछ नहीं को जैसे कुछ कर ही शायद व्यवहार चालू है। मेरा तो अब यह हाल समझ लीजिये कि सब कुछ, कुछ नहीं है और इसमें भी कुछ अजीब मस्ती की दशा लगती है। सब चीज़ ही नहीं, मेरे ‘बाबूजी’ बल्कि मैं भी ऐसी हो दीखती हूँ, जैसे कुछ नहीं हो। आजकल तो कुछ नहीं ही मेरी हालत है और कुछ यह हो गया है कि इस कुछ नहीं में समस्त संसार तथा खुद मैं भी बिला गये हैं। यह होते हुए भी न जाने भाई, ऐसा लगता है कि यह दशा अभी पूर्ण शुद्ध रूप में नहीं आ पाई है, ऐसा लगता है कि ‘R’ Point (आर पॉइंट) की सैर ख़त्म हो गई है। ‘उसकी’ कृपा का इन्तज़ार है। परन्तु तबियत ‘आपकी’ जरा कुछ ठीक हो जाये। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। तथा जिया पैर छूना कहती हैं। इति:-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-314
शाहजहाँपुर
25/5/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारे सब मिल गये। 19 मई का पत्र मिला गया, जिसका जवाब लिख रहा हूँ। कल 11 बजे दिन के तुमको ‘R’ (आर) के मुक़ाम से निकाल कर ‘S’ (एस) पर डाल दिया है। तुम्हें पढ़ना ज़रूर चाहिये, अपने लिये नहीं, बल्कि दूसरों की ख़ातिर। किताबें कुछ चौबे जी के पास जरूर होंगी। मैं खुद अपने में इस कमी को महसूस करता हूँ। मैंने कल रात कुछ बन्दिशें (Limitations) हल्के कर दिये हैं। तोड़े ज़रूर नहीं, मगर इससे भी किताबें समझने में मदद ज़रूर मिलेगी और समझ तेज़ ज़रूर होगी। जो हालत तुमने लिखी है, अच्छी है। तुमने लिखा है कि “हर जगह, हर चीज़, जैसे कुछ नहीं है।“ इसके मतलब यह है कि असल में चिमटना शुरू हो गया है। यह हालत अभी और बढ़ेगी। मन का सिकुड़ना, जो लिखा है, वह यूं महसूस होता है कि उसका रुख ऊपर को काफी खिंच चुका है और उसमें जो बातें नहीं होनी चाहिये थीं, वे बहुत कुछ हट चुकी हैं।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-315
लखीमपुर
26/5/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

पूज्य मास्टर साहब जी के पत्र से ‘आपके’ पेट का दर्द कम पढकर सबको प्रसन्नता हुई और यह भी मालूम हुआ कि ‘आप’ किसी जरूरी काम में आज कल लगे हुए हैं।

कृपया मेरी भी यह प्रार्थना है कि जो ज़रा सा Work (काम) ‘आप’ मुझे बता गये थे, वह ‘आपकी’ इच्छानुसार ही हो रहा है या कुछ कमी तो नहीं है, यद्यपि असम्भव है, परन्तु ठीक ‘आप’ ही जाने। ताऊ जी के फोड़े में कल कुछ सूजन तथा कर्रापन फिर आ गया था, परन्तु डाक्टर ने कहा कि यह केवल 2-3 दिन उसमें से खून अधिक निकलने के कारण नसें सूज गई हैं, फिक्र की कोई बात नहीं है। कल से खून निकलना बिल्कुल बन्द है, कुछ सूजन भी कम है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी अब आत्मिक- दशा चल रही है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ यह हाल है कि हर हाल शून्य है। हर चीज़, जड़, चेतन और खुद मैं भी शून्य हूँ। मेरे ‘बाबूजी’ यहाँ तक है कि ऐसा लगता है कि बात तक जो कहती हूँ और जो सुनती हूँ, वह भी केवल शून्य ही महसूस होती है। या यों कह लीजिये कि मेरी तो देखने, सुनने और अनुभव करने की ताकत भी जैसे सब शून्य हो गई हो। या यों कह लीजिये कि मुझे जीवित रखने की शक्ति भी शून्य हो गई है।

भाई, आजकल बड़ी मासूम हालत है। हर चीज़, हर हालत, यहाँ तक कि मेरे ज़रें-ज़रें में केवल मासूमियत ही महसूस होती है। अन्तर का कण-कण मासूम बन चुका है। अब मुझे न जाने यह क्या हो गया हैं ‘श्री बाबूजी’ की जब किसी को पूजा कराती हूँ, तो भी इतनी शून्यता सी रहती है कि यह एहसास तक नहीं हो पाता कि Sitting (सिटिंग) में वह भी कुछ है भी, बिल्कुल शून्य सी रहती है। ख़्याल बाँधती हूँ, तो शून्य ही हो जाता है। इसीलिये टिकता नहीं। ‘मालिक’ को सौंप देती हूँ, नहीं तो जो कोई पूजा करे, या मुझे कोई देखे तो, यह बैठने का केवल खिलवाड़ या रसम मात्र ही समझे और ‘मालिक’ की कृपा ही से बैठने वालों की तबियत लगी रहती है।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब तो ऐसा लगता है कि हृदय-तंत्री में केवल एक ही रागिनी हमेशा लहराती है, वह क्या है, यह मुझे नहीं मालूम या ऐसे कह लीजिये कि अन्तर का कण-कण अपने ‘मालिक’ के सम्मिलन से कुछ अजीब मस्ती से भरा रहता है। परन्तु अब तो यहाँ तक हो गया है कि मुझे तो कण-कण भी, भीतर या बाहर का भी, उसमें बिला गया लगता है। बस फिर रह क्या गया, एक अपूर्व मिलन की केवल मस्ती। नहीं, नहीं बल्कि शायद सम्मिलन में अब केवल शून्यता ही शून्यता रह गई है क्योंकि अब वह मिलन भी शून्यता ही से ही लगता है। भाई, नहीं, नहीं, बल्कि मिलन की मस्ती भी क्या है, केवल अन्तर में सबमें शून्यता ही शून्यता है।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ और देखती हूँ कि हृदय-तंत्र में जो रागिनी बजती है, उसके स्वर, शून्य ही होते हैं और शून्यता ही उसकी लहरी होती है। कुछ ऐसा हो गया है कि मेरे ‘मालिक’ का रूप भी कुछ शून्य ही हुआ जा रहा है। शक्ल है, परन्तु ऐसी कि शून्य महसूस होता है। मेरी तो अब कुछ ऐसी हालत हो गई है कि शरीर तक का जर्रा जर्रा मासूम हो चुका है। संसार का कण-कण मासूम बन चुका है, सब कुछ शून्य हो चुका है। जो कुछ भी दृष्टि है, जो कुछ भी पसारा है और जिसका पसारा है, सब मासूम है, शून्य है, कुछ नहीं है और शायद इसीलिये हर कण में चमक हैं, परन्तु देखने की चीज नहीं, वरन् महसूस करने भर की है, बल्कि वह भी नहीं, शून्य है।

ईश्वर की कृपा से बड़े भइया की नौकरी इधर तो 14 जून तक बढ़ गई है, और फिर 14 जून को वे ब्राड गेज में Exhibition Train (एग्जबीशन ट्रेन) पर, जो भारत का Tour (यात्रा) करेगी, चले जायेंगे, फिर आखिरी नवम्बर या शुरू दिसम्बर में लौटेंगे। मास्टर साहब जी के पत्र से यह जानकर बहुत हर्ष हुआ कि ‘आप’ लौटने पर जून के तीसरे हफ्ते में यहाँ आयेंगे।

इधर कुंवर की दाहिनी वाली आँख पर टीन पर से भंवर के हाथ से छूटकर बाँस गिर गया था, सो उसमें चोट काफी आ गई थी। जैन के इलाज व डालने वाली दवा और मलाई बाँधने से आँख करीब-करीब बिल्कुल ठीक हो गई, कोई फ़िक्र की बात नहीं रही। कल जिया आई थीं, वे ‘आपको’ पैर छूना कहती थी और कहा कि ‘श्री बाबूजी’ हम पर भी अपनी कृपा बनाये रहें और मुंशीयाइन जी भी ‘आपको’ पैर छूना कह गई हैं। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं।

न जाने यह क्या बात है कि मैं देखती हूँ कि ‘मालिक’ की कृपा से मेरा दिमाग़ व समझ खुलती जा रही है। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-316
लखीमपुर
27/5/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा पत्र मिला होगा। पेट का दर्द तो ‘आपका’ कम हो गया, परन्तु अभी कमज़ोरी होगी, सो अम्मा कहती हैं कि कुछ ताकत की चीज़ और गरम कपड़ों का उत्तरकाशी में काफी इन्तज़ाम रखियेगा। ताऊजी भी धीरे-धीरे ठीक बराबर हो रहे हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई, ऐसा लगता है कि सर्वत्र (Zero) (जीरो) का ही साम्राज्य है, Zero (ज़ीरो) का ही पसारा है। हर दशा, हर चीज़ सब कुछ Zero (ज़ीरो) ही हो गया है।

मुझे तो Zero (जीरो) ही दिखाई देता है और Zero (जीरो) ही महसूस होता है। आजकल यही विशुद्ध दशा ही मेरी दशा चल रही है। मेरी दशा क्या है अब? कि न कुछ करिश्मा है, न कोई करिश्मा है, और न किसी का करिश्मा है, पसारा है, न कुछ है, बस कुछ नहीं है। सब कुछ शून्य है, Zero (ज़ीरो) है और मेरी तो नस-नस में, कण-कण में यही हालत समाई जा रही है। सच तो यह है कि अब यह हाल सम्भव है। पागलपन का ही है कि जड़, चेतन, सब कुछ मुझे तो अब Zero ही महसूस होता है, चाहे पेड़-पौधे तक। चाहे यों कह लीजिये कि बस अब यही (Zero) (जीरो) दिखाई देता है, बस ऐसा ही महसूस होता है।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ ऐसा लगता है कि न कोई Power (शक्ति) है, न कुछ। ईश्वर तक की भी कुछ Power (पावर) नहीं। मुझे तो सब कुछ Zero (जीरो) रह गया है। यहाँ तक कि भाई, ईश्वर भी Zero (जीरो) ही हो गया है। शायद, क्योंकि मुझे तो कुछ अब महसूस ही नहीं होता। बस अब तो यह हाल हो गया है कि अब तो केवल कुछ नहीं ही दिखाई देता है और वही महसूस होता है। मुझे तो ऐसा लगता है कि मैं भी बिल्कुल Powerless ( शक्तिहीन) हूँ और न कहीं से मुझमें Power आती ही महसूस होती है, परन्तु फिर भी ‘मालिक’ का Working (काम) ज़रूर होता है, हर प्रकार का। यही मेरी मस्त दशा चल रही है। ऐसा लगता है कि शुद्धता, मासूमियत सब कुछ Zero (ज़ीरो) हो गई है। एक ही रंग है, एक ही नक्शा है और एक ही नज्ज़ारा है और वह सब कुछ शून्य ही, Zero ही है। जिसका कोई अर्थ नहीं है, परन्तु यही शून्य मस्ती ही मेरी दशा है। ‘श्री बाबूजी’ यह सब क्या हो गया है, शून्य मस्ती में शब्द से परे बस मस्ती ही समझ लीजिये।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। मास्टर साहब जी से मेरा, केसर तथा बिट्टो का प्रणाम और अम्मा का शुभाशीर्वाद कहियेगा। मास्टर साहब से कह दीजियेगा कि पेचिश की दवा अपने संग जरूर ले जायें, क्योंकि उन्हें अक्सर दस्त हो जाते हैं। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-317
लखीमपुर
27/5/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

‘आपका’ कृपा-पत्र कल मिला-पढ़कर प्रसन्नता हुई। Point ‘S’ (पॉइंट एस) के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद। Limitation (सीमा) हल्के करने से जो असर हुआ था, वह तो लिख ही दिया था। मेरे दोनों पत्र मिले होंगे। किताब अंग्रेज़ी वाली ‘आपकी’ तथा ईशावास्योपनिषद पढ़ना तो 4-5 दिन से शुरू कर दिया है। मैंने पढ़ने के बारे में लिखा जरूर था, परन्तु ‘आपने’ मुझे पढ़ने को लिखा था, इसलिये मैं भला बिना पढ़े रह कैसे सकती थी, तबियत ही नहीं मानी। ‘आपका’ दर्द कुछ ठीक पढ़कर प्रसन्नता हुई थी, आज मास्टर साहब जी के कार्ड से यह जानकर कि ‘आपको’ 3-4 दिन से दस्त भी आने लगे और कमज़ोरी भी होने लगी, पढ़कर फिक्र हो गई है। परन्तु दस्तों से यदि कहीं यह लाभ हो जाये कि ‘आपके’ रक्त में प्रवेश हुआ ज़हर निकल जावे, तो ईश्वर को बहुत-बहुत धन्यवाद है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ हमारे ‘श्री लाला जी साहब’ ने केवल हम बच्चों पर, ग़रीबों पर कृपा के ही हेतु प्राणेश्वर के लिये ‘आपकों’ कहा है। प्राणेश्वर छोटी शीशी में है, एक चने के बराबर खुराक है। हमें बड़ी प्रसन्नता है, दस्त तो ‘आपके’ इससे अवश्य ही थम जायेंगे। गरीबों पर कृपा कैसे हो, वे खुश हों, इसी का अवसर ‘आप लोग’ कृपा कर हमें देते हैं। अम्मा कहती हैं कि इतना ‘आपका’ पेट ख़राब है, कमज़ोरी भी है, कुछ साँस का दौरा भी हो ही जाता है, इस कारण यदि हो सके तो यह उत्तरकाशी की यात्रा इस साल के लिये हटा दीजिये। वैसे ‘आप’ जानें। वैसे सबसे बड़ा रखवाला तो सदैव ‘आपके’ पास है। वैसे मैं हाल तो अपना लिख चुकी हूँ, कुछ थोड़ा सा इतना और है।

भाई, जैसे पहले मैं लिखा करती थी कि दूसरी दुनियाँ में, जहाँ मैं अपने को पाती हूँ, वही वायु मुझे अच्छी मालूम पड़ती है। परन्तु अब यह हाल है कि न तो दुनियाँ है, बस एक ही न जाने क्या हाल है कि न वायु है, न साँस है, सब अंधेरा कहूँ या क्या कहूँ। सब शून्य है, परन्तु शायद ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी है।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा फूलो जिज्जी, केसर, बिट्टो ‘आपको’ प्रणाम कहती हैं। लल्लू B.Com III पास हो गये। अलीगढ़ में सुरेन्द्र B.A. तथा विमला M.A, पास हो गये हैं, सब ईश्वर की कृपा है। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-318
लखीमपुर
2/6/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

कल जिया तथा विष्णु से वहाँ के समाचार मालूम हुए। ‘आपको’ शुक्र को, बहुत दस्त आये, न जाने क्यों मुझे यह बराबर महसूस हो रहा था, चाहती थी कि उसी दम उड़कर किसी तरह वहाँ पहुँच कर, वह दवा देकर ही देखूं, परन्तु इसी समय अपना लड़की होना महसूस होता है, खैर ‘आप’ कमज़ोर बहुत हो गये हैं, कृपया उत्तरकाशी पहुँच कर भी अपनी तबियत का हाल बराबर मास्टर साहब जी से लिखवाकर दिया करियेगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब इधर तो अक्सर यही हाल रहता है कि भीतर, अन्तर में कचोटपन सी हर समय मची रहती है। कभी-कभी जी चाहता है कि अकेले में बैठकर छाती कूटा करूँ, परन्तु न जाने क्यों यह अच्छा नहीं लगता, क्योंकि सच में अब तो यही मेरी मस्ती है, इसी में झूमती हूँ। बस इसे ही अन्तर में समेटे बैठी हूँ। और क्या हो सकता है, एक भिखारी ग़रीब के पास, सो भी मेरे ‘बाबूजी’ गरीबाई ऐसी कि उसे भी भूली हुई और ऐसी कि मानों, वह मेरी कुछ चीज़ ही नहीं है। आँसू रुठ चुके हैं, और मुझे अच्छे लगते हैं और कुछ यह भी है कि अब तो ठंडी आग अन्तर में लगी हुई है, जो पानी (आँसू) से भी कुछ लाभ नहीं पाती। न जाने यह क्या बात है कि अन्तर में हूक उठती रहे, परन्तु मुंह से उफ निकालना मुझे अच्छा नहीं लगता, मन नहीं चाहता। बस कचोटन हृदय को बेधती रहे, यही मुझे अच्छा लगता है, बल्कि अन्तर में भी आह खींचना अच्छा नहीं लगता। बस हृदय को दबाये चुपचाप बैठी रहूँ और जहाँ अकेला हुआ बस ऐसे ही बैठी रहती हूँ।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब तो यह हाल हो गया है कि न शून्य ही रह गया है न अशून्य। न कुछ नहीं है और न कुछ है। कुछ ऐसा लगता है कि शून्य वाली हालत भी मेरे में हज़्म हो गई है, पचती चली जा रही है। या यों कह लीजिये कि शून्य भी शून्य हो चुका है। कुछ ऐसा महसूस होता है कि एक बिल्कुल सीधे एवं सहज-मार्ग पर तेज़ी से चली जा रही हूँ, जहाँ न कुछ रुकावट है न ठहराव। कुछ यह भी हो गया है कि 2-4 दिन की भी अब तो यदि अड़चन आ जाती है, नहीं, बल्कि यदि अगली हालत पर नहीं पहुँच पाती हूँ तो बेचैनी रहती है, क्योंकि मुझे तो कोई आकर्षण शक्ति अब ज़ोरों से ऊपर बराबर खींचे लिये जाती है। ‘मालिक’ का अथाह प्रेम मुझे अपने पास खींचे लिये जाता है, नहीं, नहीं बल्कि अपने में समेटे लेता है, अपने में चिपकाये ले रहा है। मैं तो अब ‘उसी’ में चिपकी, ‘उसी’ में समाई जा रही हूँ और ‘वही’ मेरा असली रूप है। मैं सच कहती हूँ, मेरे ‘बाबूजी’ मैं तो अपने ‘असल’ में ही चलती जा रही हूँ। यदि यह कहूँ कि अब असल ही मेरा रूप हो गया है। यहाँ तक हो गया है कि मैं अपने स्वरूप को भूलकर असल ही असल को महसूस करती हूँ। हर चीज़ मुझे असल हो महसूस होती है। मेरा Naked (असली रूप ही असल है और असल अब असल में ही समाया जा रहा है। असल में इतना आकर्षण है कि तेजी से उसमें समाती हुई भी अधीर हो उठती हूँ।

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-319
लखीमपुर
3/6/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

एक पत्र डाल चुकी हूँ-शायद कल मिल जायेगा। अब ‘आपकी’ तबियत कैसी है, कृपया लिख दीजियेगा। ‘मालिक’ की कृपा एवं Blessings (आशीर्वाद) से छोटे भइया तथा रमा First (प्रथम) तथा बिट्टो भी Second (सेकेण्ड) पास हो गई। ‘आपको’ तथा सबको अम्मा कहती हैं, कि हम सब की ओर से बहुत-बहुत बधाई है। मास्टर साहब जी को भी हम सबकी ओर से बहुत-बहुत बधाई है। मुंशी जी का भी लड़का पास हो गया, उसकी भी हम सब ‘आप’ सब तथा मास्टर साहब जी को बहुत-बहुत बधाई है। परन्तु ‘आपकी’ तबियत कैसी है, क्या ‘आप’ को कुछ लाभ हुआ है, ‘आप’ कमजोर हो गये हैं। दादी शायद लखनऊ से अब लौट आई होंगी। अपनी आत्मिक-दशा के बारे में मैं लिख ही चुकी हूँ। पढ़ने में जैसा ‘आपने’ लिखा था Notes (नोट्स) मैं थोड़े बहुत लेती जाती हूँ। जब ‘आप’ आयेंगे तब सुना दूंगी।

मेरी दशा में तो इधर ‘मालिक’ की कृपा से बराबर भीतर शुद्ध सी होती चली जा रही है और मैं देखती हूँ कि ज्यों दशा शुद्ध हो रही है बुद्धि भी जैसे निर्मल और चेतती सी चली जाती है। कुछ मैं यह भी देखती हूँ कि जैसे दशा हल्की सी होती जाती है, वैसे ही मेरा अधीर पन अन्दर ही अन्दर बढ़ता जाता है और हाज़मा तो इतना तन्दुरूस्त है कि जैसे अब तो सब कुछ हज़्म होकर सब ख़ाली-खाली हो गया है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ मैं तो यही कहती हूँ कि जितना मेरे ‘मालिक’ मुझपर मेहरबानी कर रहे हैं, मैं तो भाई, जी भर कर कुछ प्रेम तक नहीं कर पाती हूँ, मैं क्या करूँ। कभी मेरे मन में आता है, कि ऐसे अपने ‘मालिक’ के लिये मैं क्या करूँ, फिर यही decide (तय) होता है कि अपने को पूरी तौर से बस ‘उनके’ हवाले कर दूं, फिर जो चाहेंगे, जो मर्जी होगी, अपना गुलाम समझ कर स्वयं ही करवा लेंगे। अब हालत यही है, सब असल ही असल दीखता है।

बस सब वही, खुद मैं भी, मेरा भीतर-बाहर, ज़र्रा जर्रा भी, बस वही (असल ही) महसूस होता है। मेरे ‘मालिक’ अपना naked (वास्तविक) रूप देख रही हूँ और सब समझ रही हूँ, परन्तु वास्तविक बात यह है कि इस दशा को इतनी शुद्ध, पवित्र दशा को, किन शब्दों में लिखूं, शब्द समझ में नहीं आते। स्पर्श है, किन्तु शब्द नहीं है। मैं यह भी महसूस कर रही हूँ कि जितने हम शुद्ध या हल्के होते जाते हैं, तभी चाल अदृश्य रूप से तेज़ होती चली जाती है, जो मैं जान नहीं पाती, किन्तु ‘मालिक’ की कृपा से कभी-कभी कुछ दिखलाई पड़ जाती है। मुझे तो ऐसा लगता है कि शून्य भी शून्य हो गया है।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। मास्टर साहब जी से मेरा, केसर का प्रणाम तथा अम्मा का आशीर्वाद कह दीजियेगा। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता

सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-320
शाहजहाँपुर
6/6/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे सब ख़त मिल गये। मैं इसलिये चाहता हूँ कि तुम कुछ पढ़ों, क्योंकि तुम्हारी अनुभव-शक्ति अच्छी है। मैंने कुछ Limitations (सीमा) बहुत मध्यम व धीमे कर दिये हैं। इस तरह, पर कि सम्भव है कि वह अपने आप जल्दी ख़त्म हो जावें। हल्के तो होना शुरू हो गये हैं, और इसकी पहिचान यह है कि तुम में इल्म खुद-ब-खुद बढ़ना शुरू हो गया होगा। आज मुझे बहुत हल्के नजर आ रहे हैं। मुमकिन है श्री रामचन्द्र मिशन के स्तम्भ में से तुम भी एक हो। मैं लिखता तो यही कि तुम बोलने की भी आदत डालो, मगर लिहाज़ यह है कि तुम कमज़ोर हो, बोलने में तुम्हें तकलीफ होगी।

तुम्हारी किताब ‘सहज-समाधि’ छप गई है। पचास कॉपी में भेज रहा हूँ। तुम्हारे हर ख़त का मैं जवाब देना चाहता हूँ। यदि कोई लिखने वाला मिल जाता है, तो लिखाता रहता हूँ। इसलिये कि मैं यह चाहता हूँ कि तुम ख़त एक रजिस्टर में नकल करो और उसके जवाब जो कुछ हैं, वह भी नकल करो। किसी वक्त में छपने की ज़रूरत होगी।

27 मई को जो ख़त आया है, जिसमें Zero (जीरो) करीब-करीब छः जुमलों में तहरीर है, तो Zero (जीरो) तो अभी बहुत दूर है। जब अभ्यासी सब कुछ पा लेता है, तो लाजिमी तौर पर कुछ नहीं रहता, जिसको Zero कह सकते हैं। अभी तो सेर भर में छटाँक भर भी नहीं बढ़ पाई हो, मगर बढ़ोगी, अगर ईश्वर को मंजूर है।

वैराग्य की पूर्ण अवस्था पर पहुँचने की, तुम्हारा खत कुछ खुशखबरी दे रहा है। वैराग्य की पूर्ण हालत यह होती है, कि कोई चीज़, सिवाय ईश्वर के अन्दाज़ नहीं होती। अब तुम में यह हालत आती है और कभी इससे ऊंची हालत भी आ जाती है। इसकी वजह यह है कि कभी-कभी मेरी हालत की तलछट उसमें शामिल होती है।

29 मई के ख़त में जो तुमने शून्य गति लिखी है, ठीक है। यह ऐसी गति है, जिसमें से होकर असल में जाना होता है और यह अब बड़ी हालत की तहरीर की तख़्ती समझो और यह गति दूर तक चली जाती है। यह भी किसी वक्त में गायब होती सी दिखाई देगी, मगर साथ यह नहीं छोड़ेगी। जब तक कि असली ठिकाना न मिल जाये।

‘S’ (एस) की सैर पूरी नहीं हुई है। उत्तरकाशी पहुँचने तक मैं कोशिश करूँगा कि सैर पूरी हो जावे। उसके बाद फिर ‘T’ (टी) मुकाम पर डाल दूंगा।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-321
लखीमपुर
11/6/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ मिला-समाचार मालूम हुए। ‘आपकी’ तबियत अच्छी पढ़कर संतोष हुआ। ईश्वर कृपा ऐसी बनाये रखे। अब मैं पढ़ती भी हूँ, कुछ notes (नोट्स) भी लेती हूँ और ‘मालिक’ की कृपा से मेरा जी भी अब ऊबता नहीं और ‘मालिक’ की ही कृपा से समझ में भी सब आता है और आईना की तरह बात साफ़ आती है। ‘श्री बाबूजी’ मिशन तो इतना सुदृढ़ और सुचारू हो चुका है कि उसमें स्तम्भ ऐसा कह लीजिये कि जैसे गोवर्धन पर्वत को उठाने पर ग्वालबालों ने अपने छोटे-छोटे डण्डे भी उसमें लगा दिये थे। हमारे मिशन के Master (मालिक) से आज संसार Light (प्रकाश) पा रहा है और बराबर पाता रहेगा, आँखें खुलने पर हम उसे पहिचानेंगे, देखेंगे। आशा है ‘आप’ सब लोग उत्तरकाशी पहुँच गये होंगे। बड़ी दूर का सफ़र है। ‘आप’ कब तक लौटेंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी मेरी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो कुछ ऐसा लगता है कि मैं अपने अन्तर में, मन में डूब सी गई हूँ, और डूब कर शून्य हो चुकी हूँ। Zero (जीरो) से मेरा मतलब केवल शून्य की ही हालत से है, बल्कि दशा अब तो ऐसी हो गई है कि जैसे शून्य भी शून्य हो गया है। न जाने अब तो कुछ ऐसा लगता है कि दशा में हल्केपन की भी गुंजाइश नहीं रह गई है। भाई, अब तो उसकी (हल्केपन की) सीमा को पार कर कहीं पर चली गई है। नहीं, नहीं गई कहीं नहीं है, बल्कि, शून्य हो गई है। और मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब तो ऐसा लगता है कि प्रेम का पलड़ा भारी हो गया है और मेरा पलड़ा शून्य पड़ गया है, इसीलिये अब हल्केपन की गम नहीं रह गई है। मेरी दशा में और फिर प्रेम क्या जानूं मैं। फिर क्या दशा लिखूं। अब तो यह कह लीजिये कि मेरा जर्रा जर्रा शुद्धता को भी पीकर हज्म कर गया है। अब तो भाई, कुछ ऐसी दशा लगती है कि जैसे मेरे जर्रे जर्रे से, कण-कण से आँसू बहते रहते हैं, नहीं, नहीं बल्कि मेरा जर्रा जर्रा, कण-कण आँसू बन गया है। कण-कण ईश्वर बन चुका है, शायद इसी कारण यदि देखा जाय तो मेरे रोम-रोम में, जर्रे जर्रे में, बिना गम्य के भी असीमित Power (शक्ति) भरी हुई है। मेरे कण-कण में अपरिमित शक्ति मौजूद है। यह जरूर है कि इसका होश तो केवल मेरे ‘मालिक’ को ही है। भीतर-बाहर सब कुछ ईश्वर हो चुका है। जड़, चेतन, कण-कण मेरे लिये ईश्वर हो चुका है। अब सिवाय इसके दूसरा कुछ महसूस नहीं होता और न जाने क्या है कि ईश्वर भी ऐसा, जैसे शून्य हो चुका है। जैसे कुछ है ही नहीं, बिल्कुल शून्य, ख़ाली है और इसी तरह का ही समस्त संसार का कण-कण, जड़, चेतन, अब मुझे वैसा ही महसूस होता है। और सच तो यह है कि सिवाय इसके, दूसरी चीज़ समाप्त हो चुकी है।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ ऐसा लगता है कि हृदय-तंत्री के एक-एक तार ‘मालिक’ में समाते जाते हैं। मन का एक-एक तार ऐसा लगता है शून्यता के सागर में मिटता जाता है। मन का एक तार टूट चुका है। परन्तु बस एक बेतार के तार की तरह बिना किसी आधार के एक ख़्याल का तार स्वाभाविक ही लगा हुआ शेष रह गया है, जो मेरे में जीवन लाता रहता है। इधर बराबर कुछ ऐसा महसूस होता है कि मन सिकुड़ता सा, सिमटता सा या सूक्ष्म होता चला जा रहा है। कुछ ऐसा लगता है भाई, कि अपने रोम-रोम में असीमित Power (शक्ति) भरी हुई है और समस्त संसार उस Power (शक्ति) के करतलगत (Under) हो सकता है। हर प्रकार की Power (शक्ति) मौजूद है। ऐसा महसूस होता है। परन्तु हाल यह है कि किसी का भी गम नहीं है मुझमें।

अम्मा ‘आपको’ तथा मास्टर साहब जी को शुभाशीर्वाद कहती हैं तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं।

इधर कुछ ऐसा लगता है कि शायद आँखों के सामने कुछ मिटता या साफ़ होता चला जाता है, जिससे समझ साफ़ होती जा रही है। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका–कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-322
उत्तरकाशी
13/6/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

मैं 12 जून को यहाँ आ गया। सर्दी यहाँ नहीं है। अभी यहाँ 4-6 रोज़ रहने का इरादा है। यहाँ पर वेदान्ती और हठयोगी हैं। Transmission (प्राणाहुति) का चाहनेवाला कोई नहीं मालूम होता। अभी मैं लोगों से मिल भी नहीं पाया हूँ। तुम किताब जो पढ़ती हो, उसका नोट लेती जाना, यह अच्छा रहेगा। आज मैंने तुमको ‘T’ (टी) स्थान पर खींच दिया है। मैंने यह सोचा कि जब और लोग यहाँ के फ़ायदा नहीं उठाना चाहते तो हमारे आपस के लोग फायदा उठा लें। मास्टर साहब को तीर्थ का फल मिल गया और जो मेरे साथ हैं, कुछ न कुछ रोशनी उन्हें भी पहुँची।

यहाँ के बारे में मैंने यह तय नहीं किया है, कि इस जगह को कैसा कर के छोडूं। ऐसा कि जैसा यह है, या ऐसा कि इस जगह पर कोई महात्मा अपनी योग सिद्धि न कर सकें। मेरी तबियत ठीक है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-323
लखीमपुर
17/6/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

एक पत्र लिख चुकी हूँ। आशा है ‘आप’ सब वहाँ अच्छी तरह से होंगे। अभी तक कोई पत्र नहीं मिला, शायद वहाँ busy (व्यस्त) होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो ऐसी दशा है कि मानो ‘मालिक’ के सामने प्याला हर समय खाली पड़ा रहता है और ऐसा लगता है कि कभी भरता ही नहीं, परन्तु दशा का भी यही हाल है कि इसमें जैसे शून्य की ही गम्य हो सकती है। न जाने क्यों कुछ ऐसा लगता है कि जैसे मेरा रोम-रोम जाग उठा है, सजीव हो उठा है। यही नहीं, बल्कि ऐसा लगता है कि मेरे रोम-रोम में अद्भुत शक्ति भरी हुई है, समाई हुई है, परन्तु मेरे ‘मलिक’ ने उसके होश का भी जिम्मा खुद ही सम्भाल लिया है, क्योंकि मेरा तो ज़र्रा-ज़र्रा, रोम-रोम Innocent (मासूम) हो चुका है। रोआँ-रोआँ आसूं बन चुका है। क्योंकि कुछ ऐसा हो गया है कि प्याला खाली हो चुका है और कुछ भी सम्भालने का माद्दा ही जाता रहा, इसीलिये सारा जिम्मा, सारा होश अब ‘वही’ जाने। ता. 15 की शाम से ऐसा लगता है कि जो Limitations (सीमायें) ‘आपने’ हल्के कर दिये थे, वे और साफ हो गये। अब समझ साफ और स्वतंत्र हो गई है।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ यह हाल है कि मैं तो इतनी Innocent (इन्नोसेन्ट) हो गई हूँ, कि मेरा यह हाल है कि न मैं पूजा करती हूँ, न कुछ और करूँ तो क्या करूँ, किसकी करूँ, कुछ समझ ही नहीं रह गई है। अब तो ऐसा लगता है कि मन का हर तार टूटकर वह (मन) साफ़, स्वतंत्र हो चुका है, और मैं तो उसमें (मन में) जैसे गड़कर रह गई हूँ। और ऐसा लगता है कि उसे भेदकर या उसकी हालत को गटकती हुई धंसती चली जा रही हूँ। भाई, मेरा तो ऐसा हाल है, न पूजा करती हूँ, न उपासना और न अभ्यास। अब तो मेरा मन खुद ही पूजा हो चुका है और वही उपासना। अब तो ऐसा लगता है कि मन पानी-पानी हुआ जा रहा है और मन को भेदकर उस पार निकली जा रही हूँ और न जाने ऐसे अद्भुत समुंद्र के किनारे आ गई हूँ कि अभी तो बस उसकी हवा या दशा शुद्ध कह लूं और कुछ कह नहीं मिलता है। ऐसा लगता है कि मन का ज़र्रा जर्रा पिघला तथा बिखरा सा जा रहा है।

‘आपने’ अपने पत्र में कुछ बोलने की भी आदत डालने को लिखा था, मुझे बस यह समझ में नहीं आता कि किसके सामने और कहाँ बोलूं। हिम्मत मुझमें ‘मालिक’ की कृपा से ज़रूर है और फेफड़े-कमजोरी की बात है, सो दिन भर भाई, कुछ न कुछ तो बोलती ही रहती हूँ। ‘आप’ इतनी निष्काम, निःस्वार्थ सेवा करते हैं, इसकी शिक्षा से हमें कुछ न कुछ सीखना ही चाहिये। अम्मा ‘आपको’ तथा मास्टर साहब को शुभाशीर्वाद कहती हैं तथा केसर, बिट्टो, फूलो जिज्जी प्रणाम कहती हैं। इतिः-

सदैव केवल 'आपकी' ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-324
लखीमपुर
3/7/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है ‘आप’ अच्छी तरह से होंगे। यहाँ अम्मा को कमज़ोरी हो गई है, पेट भी खराब है, इसलिये कुछ ढीली तबियत आजकल उनकी है। आशा है 3-4 दिन में ठीक हो जायें। फूलो जिज्जी कल जायेंगी, छोटे भइया पहुँचाने जायेंगे। केसर, बिट्टो उनके संग जायेंगी। जब 8-10 दिन में वे लौट आयेंगी, तब मैं चली जाऊंगी। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ। पहले उधर ता. 27.6.53 से अब ता. 2-3 तक का हाल लिख रही हूँ।

अब तो भाई, कुछ अजीब साफ़ सुथरी सी दशा रहती है। कुछ अजीब स्थिर सी. किसी भी ओर क्षण को भी न झुकने वाली स्थिर सी तबियत रहती है। बल्कि यों कह लीजिये कि स्फुरण से रहित जमकी हुई सी तबियत हर समय रहती है। अब तो कुछ यह हाल है कि अजीब नशीली सी दशा रहती है और यह भी लगता है कि मेरा जर्रा जर्रा मानों चैतन्य हो चुका है। ऐसा मालूम पड़ता है कि अब तो दशा शून्य वाली दशा से ऊंची उठ गई है और उससे भी साफ़-सुथरी हो गई है। शायद इसी कारण अब तो शून्यता वगैरह का भी एहसास मुझे नहीं है, बल्कि अजीब अचल और स्थित सी दशा हो गई है। इधर न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि ‘आप’ न जाने क्या-क्या मुझे सिखा देना चाहते हैं।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब तो दो-तीन दिन से यह हाल है कि अक्सर मन के होने का एहसास तक नहीं रहता है। कुछ ऐसी दशा है कि जैसे मन से भी वैराग्य हो गया है उससे भी मुंह फिर गया है या भाई, यों कह लीजिये कि मेरा कुल शरीर तक मन ही हो गया है, या मन ही मेरा शरीर हो गया है। न जाने क्या बात है कि पीछे यानी रीढ़ में भी कुछ खोखलापन सा आने लगा है।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं तथा केसर, बिट्टो और फूलो जिज्जी ‘आपको’ प्रणाम कहती हैं। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-325
लखीमपुर
5/7/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

दोनों पत्र संग ही भेज रही हूँ। पूज्य मास्टर साहब जी से मालूम हुआ कि ‘आप’ ता. 8 के सबेरे तक लौट आयेंगे। अम्मा को अभी कमज़ोरी है। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो ऐसा लगता है कि मन में ही हर समय रहती हूँ। मन में ही सोती हूँ और मन में ही जागती हूँ। अब तो यह हाल है कि न बिछौने पर सोती हूँ और न ज़मीन पर, जागती या चलती-फिरती हूँ। बस, अब तो मन में ही सोती, वहीं जागती, नहीं, नहीं, वरन् वहीं अपनी दशा में स्थित रहती हूँ। आज सबेरे से ही दशा बदली हुई है। आजकल तो ऐसी दशा है कि जैसे कमल पर बैठा हुआ भौंरा सूरज निकलने पर उसकी पंखड़ियों के बन्द हो जाने से उसी के अन्दर बन्द हो जाता है। उसी प्रकार ऐसा लगता है कि जैसा मैंने लिखा है कि मैं मन में ही हर समय रहती हूँ और मन की पंखड़ियाँ या पंजे चारों ओर से सिकुड़ते हुए ऐसा लगता है कि मानों मुझे अपने अन्दर बन्द सा कर लेंगे। नहीं, नहीं, भाई, मुझे बन्द क्या कर लेंगे, क्योंकि मुझे तो ऐसा लगता है। कि मन के पंजे तो सिकुड़ते और मिटते चले जाते हैं। पंजे से मेरा मतलब वृत्तियों से ही है। ऐसा लगता है कि अब तो मन की वृत्तियाँ भी मिटकर मन जैसे खुद मेरा रूप हो गया है।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब तो कुछ यह हाल है कि ऐसा लगता है कि जैसे मन मेरे ‘मालिक’ का ही सरूप हुआ जा रहा है। अन्तर की जगह मुझे अब ‘उसी’ की शक्ल दिखलाई पड़ती है। मन की जगह अब ‘उसी’ का रूप महसूस करती हूँ। कुछ ऐसा लगता है कि अन्तर के पर्दे न जाने क्यों धीमें और धुंधले पड़ते जाते हैं। यहाँ तक है कि मुझपर अब किसी का Weight (वज़न) नाम मात्र को नहीं रह गया है और प्रभाव तो मुझपर बस ‘उसका’ ही, मेरे ‘मालिक’ का ही मालूम पड़ता है। मेरा तो अब यह हाल है कि - “सूरदास कारी कमरी पर चढ़े न दूजा रंग”। सो भाई, अब तो मैं कारी कमरी ही हो गई हूँ, अब क्या रंग और क्या प्रभाव पड़ सकता है। मेरे ‘मालिक’ अब ऐसा लगता है कि अन्तर की शक्ल ‘मालिक’ में ही बदलती जा रही है। कुछ ऐसा लगता है कि मेरा ज़र्रा जर्रा, रोआँ-रोआँ खुल सा गया है और चैतन्यता की चमक सी भर गई है। भाई, मेरा तो यह हाल है कि अब न मैं बेहोश रहती हूँ, न बेख़बर सी, बल्कि अब तो नस-नस में जैसे चैतन्यता है। रोम-रोम जाग उठा है, सारा अन्तर जाग उठा है, चैतन्य हो उठा है, परन्तु यह चैतन्यता अजीब सुहावनी चैतन्यता है। ऐसा लगता है कि मानों मेरा रूप ही चेतन हो उठा है। मैं देखती हूँ कि मेरा रूप कुछ और हो चुका है, और अपने उसी रूप में या दशा में, मैं स्थित सी रहती हूँ। स्थिरता ही मेरा रूप होता जाता है। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-326
शाहजहाँपुर
11/7/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे ख़त तीसरी और पाँचवी जुलाई के मिल गये। पढ़कर खुशी हुई। तुमने अपने पत्र में लिखा है कि अन्तर के पर्दे न जाने क्यों ढीले और धुंधले पड़ते जाते हैं। दुनियाँ पुकार-पुकार कर रोशनी देखने के फेर में पड़ी है। कोई सूर्य की भाँति रोशनी देखना चाहता है और कोई चन्द्रमा जैसी। कोई-कोई इस रोशनी को यहाँ तक बढ़ाना चाहते हैं और कहते भी हैं कि वहाँ हजारों सूरज से ज़्यादा रोशनी है और इसी की कोशिश करते हैं। यह ज़रूर है कि योग की शुरूआत उस वक्त होती है, जब कि एक दफा भी रोशनी दिखाई पड़ जाये, मगर इसके यह माने नहीं कि बस असल रोशनी Matter (पदार्थ) है। जो चीज़ असल है, वह न रोशनी है और न अंधेरा और इसको धुंधलापन ही कह सकते हैं। Originality (मूल वस्तु) बस यही है कि हमारी कुल इन्द्रियाँ यही धुंधली शक्ल अख्तियार कर लें।

तुम्हारे ख़त की अगर हर लाइन का जवाब दिया जावे तो बहुत लम्बा-चौड़ा ख़त हो जावेगा, लिहाज़ा संक्षेप के साथ इतना कहता हूँ कि तुम्हारा Body Consciousness (भौतिक चेतना) अब खत्म हो चुका है, Soul Consciousness (आत्मिक चेतना) शुरू है। इसके खत्म होने में वक्त लगेगा। ईश्वर ने चाहा तो यह भी इसी तरीके से हो जावेगा।

आज इसी वक्त 3.25 PM. (रात्रि) पर तुमको ‘T’ स्थान से निकाल कर ‘U’ (यू) स्थान पर डाल दिया है। इससे एक घंटा पहले ‘T’ (टी) स्थान पर तुम्हारे रोकने की ज़रूरत मालूम होती थी। मगर अब ऐसी बात महसूस नहीं होती।

तुम्हारा शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-327
लखीमपुर
11/7/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा एक पत्र मिला होगा। अब तो शायद सभी लोग विवाह से लौट आये होंगे। इधर मुझे पत्र लिखने का अवकाश ही न मिला, क्योंकि इलाहाबाद से बड़े चाचा, विमला वगैरह सब लोग आये थे, कल चले गये। ‘मालिक’ की कृपा से अब बड़े चाचा कह गये हैं, मास्टर साहब से भी कहा कि अब वे ब्रह्म-विद्या को ही सीखेंगे, आगे ईश्वर मालिक है। अम्मा का फोड़ा भी 3-4 दिन से फूट कर बह गया। अब बैठने में भी उन्हें कोई तकलीफ नहीं है। पेट का दर्द भी ठीक हो गया। ‘मालिक’ की कृपा से इधर जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ। ताः 8 के सबेरे से दशा कुछ बदली हुई सी लगती है।

मेरा तो अब यह हाल है कि अक्सर मुझे हर चीज़, हर खाना, प्रसाद ही मालूम पड़ता है। मेरे में तो देखती हूँ कि न कुछ भावना होती है, न कुछ, बस यह स्वतः ही कुछ हो गया है। अब भोजन का Taste (स्वाद) नहीं, वरन् सब प्रसाद ही मालूम पड़ता है, चाहे वह जूठा हो, या अनूठा, इससे कुछ मतलब नहीं, और मेरे ‘श्री बाबूजी’ न जाने यह क्या है कि मुझे तो किसी से न कोई शारीरिक और न मन से ही कोई रिश्ता रह गया है। न भाभी, न बहन, न कोई, बस जो सामने आता है, वह तो बस अपना ही महसूस होता है। किन्तु रिश्ता कोई नहीं रहता। इसी कारण मन हर एक से, सब बात कहने में, साफ हो गया है। मुझे न दुराव है, न छिपाव, जो है भाई, सो है।

भाई, कुछ यह हो गया है कभी-कभी शायद कुछ हल्के आसमानी या समुद्री रंग की झलक लिये हुए कुछ ऐसी चमक की सी किरणें पूरे शरीर से बाहर, अपने चारों ओर, कुछ निर्मल सी ऐसी चमक लिये महसूस होती हैं कि जिनसे चकाचौंध नहीं, वरन् शायद कुछ ठंडक सी रहती है। अक्सर गर्दन से ऊपर सिर के चारों ओर ऐसी ही प्रकाश की किरणें सी मालूम पड़ती हैं, परन्तु ‘श्री बाबूजी’ मेरी आँखें अब यह सब देखने बाहर नहीं आती। क्योंकि अब तो वे ऐसा लगता है कि शायद अन्तर में चिपटी ही नहीं, वरन् उसमें लय सी होने लगी हैं और शायद इसका कारण यह हो सकता है कि मुझे तो ऐसा महसूस होता है कि अन्तर ‘मालिक’ के ही रूप में परिवर्तित होता जा रहा है। ऐसा लगता है कि अब तो अन्तर का रूप या मेरा स्वरूप स्थिरता ही हो गया है। ऐसा होते हुए भी तीर तो अन्तर को भी बेधकर पैठ चुका है।

अम्मा ‘आप’ को शुभाशीर्वाद कहती हैं। फूलो जिज्जी, केसर तथा बिट्टो ने ‘आपको’ प्रणाम लिखा है। बड़े भइया Train (ट्रेन) पर कल Tour (यात्रा) पर गये होंगे पहले जोधपुर, फिर आसाम जायेंगे। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-328
लखीमपुर
17/7/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

‘आपका’ बहुत दिनों से कोई पत्र नहीं आया इस कारण कोई समाचार नहीं मिल सके। अम्मा बिल्कुल ठीक हैं। ‘मालिक’ की कृपा से मेरी जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरा तो यह हाल है कि निगाह के बाहर-भीतर सब सूक्ष्म ही रह गया है। स्थूलता तो बाहर भीतर कहीं महसूस ही नहीं होती। यानी मेरे लिये तो हर चीज़ की स्थूलता समाप्त हो चुकी है। इधर न जाने क्या बात है कि कभी-कभी कुछ अन्दर थोड़ा भारी पन सा लगता है, फिर ठीक हो जाता है। कुछ यह देखती हूँ कि मेरा अन्तर मानों स्थिरता का रूप ही होता चला जा रहा है। यहाँ तक है कि अब चाहे कुछ हो, परन्तु वह सोते, जागते, अपने रूप से विचलित नहीं होता। कभी कुछ परिवर्तित नहीं होता। हालत आती हैं और बदलती हैं, परन्तु वह अपने स्वरूप (स्थिरता) में ही स्थित रहता है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ ऐसा लगता है कि मन जैसे अपने वास्तविक रूप में बदलता जाता है। इधर न जाने क्या बात है कि स्मरण शक्ति बहुत कमजोर पड़ रही है। यहाँ तक यह दशा हो जाती है कि अक्सर तरकारी में नमक डालना भूल जाती हूँ। सुस्ती भी इधर इतनी शरीर में रहती है कि न किसी को पत्र डालने की तबियत चाहती है, न कुछ, जबरदस्ती करती हूँ। यहाँ तक कि ‘आपको’ पत्र लिखने की सोचते-सोचते दो-तीन दिन बाद लिखना जबरदस्ती से शुरू कर पाती हूँ। इधर दो दिन से दशा में चाल नहीं आ पाती है, सुस्ती भी छाई रहती है। तबियत न काम करने को चाहती है और न आराम ही। अक्सर तबियत अकारण ही बेचैन हो जाती है। कुछ रो लेने से तबियत हल्की ज़रूर पड़ती है, परन्तु न जाने क्यों मैं रो भी नहीं पाती हूँ। हाँ, शायद आँसू आन्तरिक-नेत्र भले ही बहा लेते हों, परन्तु ऊपर वाली आँखें कम। कभी-कभी हृदय पर हल्का बोझ सा होकर फिर साफ़ जाता है।

अम्मा कहती हैं कि फूलो ने मोती के लिये लिखा है, सो कृपया मैं उनका पता लिखे देती हूँ। हो सके तो एकाध दिन में भेज दीजियेगा।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-329
लखीमपुर
19/7/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ आज मिला- पढ़कर प्रसन्नता हुई। Point ‘U’ (पाइंट-यू) पर मुझे डाल देने के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद है। मेरा तो अब अपने ऊपर बीतने पर यह दृढ़ और सत्य निश्चय है कि भाई, बिना ‘सिखाने वाले’ के चढ़ना असम्भव है, चाहे कोई कितना ही क्यों न फड़फड़ाये। बिना किसी की ताकत की सहायता से ऊपर कदापि क़दम पहुँच ही नहीं सकता और यह भी मैं सत्य शपथ से कह सकती हूँ कि Points (पाइंट्स) पार कराना तो आज संसार में केवल और केवल एक ‘आपकी’ ही ताकत और ‘आपकी’ ही शान है। भाई, यह दुनियाँ कब देखेगी, कब जागेगी? ईश्वर जाने। जिसने हमें जगाया है, वह ही दुनिया को जगायेगा। प्रकाश छाया है, चेतावनी मिलती है, अपनी आत्मा से; परन्तु हम अन्धे हो गये हैं और चेतावनी की ओर से Unmindful (असावधन) हैं, फिर क्या हो, और ऐसी ही दुनिया के लोगों में से हम सत्संगी भाई लोग हैं, देखें समय कब आता है।

मेरे दो पत्र मिले होंगे। मैंने जो सुस्ती लिखी थी, वह अब आज जाती रही। चाल में भी गति फिर ठीक हो गई, सब ‘मालिक’ की कृपा है। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है सो लिख रही हूँ।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ मेरी तो अब यह दशा हो गई है कि मानों सत्य ही मेरी दशा हो गई है। अन्तर, बाहर केवल मुझे सत्य ही सत्य दिखलाई पड़ता है और कुछ है ही नहीं। अब तो सब ओर सत्य ही दरशता है। मेरा रोआँ-रोआँ सत्य रूप हो गया है। बोलती हूँ तो लगता है कि सत्य की ही दशा मानों निकल कर फैल रही है। वास्तव में ऐसा लगता है कि मेरी Natural Condition (स्वाभाविक-दशा) सत्यता का ही रूप हो गई है। बस सत्यता के ही निर्मल स्वच्छ प्रकाश से मैं तथा सब ओर, सब कुछ जगमगा उठा है। कुछ ऐसा लगता है कि मेरी Natural Condition (स्वाभाविक-दशा) ही सब ओर फैली हुई है। भाई, अब तो ऐसा लगता है कि ‘मालिक’ ने मुझे सत्य का स्वरूप दिखला दिया, उसकी पहिचान करवा दी है। भाई मेरे ‘श्री बाबूजी’ यह सत्य है क्या, यह ‘आप’ जानें, मुझे तो जो अनुभव हुआ, लिख दिया।

फूलो जिज्जी का पता लिखकर भेजा है। बड़े चाचा आये थे। यहाँ बड़ी धूमधाम रही। मिलने वालों का ताँता और Dinner (डिनर) तथा Party (पार्टी) की अधिकता थी। एक दिन रात के 9 से 12 बजे तक सत्संग भी हुआ। बाद में उन्होंने कहा कि उनकी आत्मा केवल इसी पूजा को करने की गवाही देती है, और यही उनका इरादा भी था तथा ‘आपको’ पत्र खुद भी लिखने को कहा था। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं तथा फूलो, केसर, बिट्टो ने ‘आपको’ प्रणाम लिखा है। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-330
लखीमपुर
24/7/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा पत्र पहुँचा होगा। पूज्य मास्टर साहब के पत्र में लिखा था कि ‘आपकी’ तबियत मथुरा से लौटने पर कुछ ख़राब हो गई, सो कृपया लिखियेगा कि तबियत कैसी है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो यह दशा है कि ऐसा लगता है कि सारा अन्तर धूमिल या धुंधला पड़ गया है। उसमें कोई चीज़ साफ़ नहीं दिखाई पड़ती है, सब चीज़ धुंधली पड़ गई है। ऐसा लगता है कि आईना ही धुंधला पड़ गया। यहाँ तक है कि मैंने जो ‘आपको’ लिखा है कि “सत्यता मेरी दशा हो गई है” सो भाई वह प्रकाश भी धुंधला है और जगमगाहट भी धुंधली है। या यों कह लीजिये कि सत्य का रूप ही धुंधला है। ऐसा लगता है कि उसी धुंधलाहट में अब मैं घुस रही हूं, पैठ रही हूँ। कुछ यह भी हो गया है कि धुंधलाहट का असर कुछ बाहर भी मालूम पड़ता है। आँखों पर विशेषकर है, क्योंकि मुझे आँखों से बाहर की चीजें तक सब धुंधली सी ही दिखाई पड़ती हैं।

'मेरे ‘श्री बाबूजी’ मैं देखती हूँ कि जैसे एक धुंधले, अँधाधुन्दी मैदान में धंस रही हूँ, जहाँ पर कुछ दिखाई नहीं पड़ता, सूझता ही नहीं। परन्तु मैं तो न जाने किसके आकर्षण से Unmindful (चेतनाहीन) की तरह धंसती ही चली जा रही हूँ। न जाने कौन सी शक्ति मुझे बरबस अपनी ओर खींच रही है। मैं रुक नहीं सकती, किसी की तरफ़ देखने की मुझे फुर्सत ही कहाँ है। फिर देखूं क्या, सिवाय धुंधलाहट के कुछ है ही नहीं आँखें बन्द हैं, परन्तु वह जादूभरी शक्ति मुझे खींचे लिये जा रही है। कहाँ? बस यहाँ कह सकती हूँ और यही महसूस होता है कि “अनन्त की ओर”, खींच कर पहुँचाकर ही मानेगी। किसी ताकत की मजाल नहीं जो मुझे एक क्षण को भी रोक सके।

भाई, जहाँ तक मेरा अनुभव पहुंचता है, तहाँ तक लिखती हूँ कि उस शक्ति में, शक्ति कोई नहीं मालूम पड़ती है, आकर्षण कह लीजिए Natural (स्वाभाविक) और वह भी इतनी सूक्ष्म कि शक्ति की वहाँ गुज़र ही कहाँ है। अब तो जाना ही है, और भाई उस अनन्त का द्वार आज मेरे लिये खुल गया है और लगता है कि मेरा उसमें प्रवेश हो गया है।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ जहाँ तक मेरा अनुभव पहुँचता है कि वह आकर्षण क्या है? शायद कुछ नहीं, जैसे जम्बक और सुई की तरह मामला दिखाई पड़ता है। भाई, और भी है, मेरे ‘मालिक’ की कृपा से जहाँ तक एहसास पहुँचता है, अनन्त भी Inactive (अकर्मण्य) नहीं, इसमें जान है, परन्तु अभी मेरे ‘मालिक’ के साम्राज्य की सीमा की असल किरणों का मुझे यहाँ कहीं पता ही नहीं दिखलाई पड़ता है। इसके माने है कि अभी मुझे दूर, कोसों दूर चलना है। परन्तु ‘उसकी’ कृपा सदैव सिर पर है, इसीलिये कुछ दूर नहीं।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ मेरा तो अब यह हाल हो गया है कि जैसे बिना जम्बक के सुई भागती नहीं, उसी प्रकार बिना ‘उसकी’ महर के मैं बेजान रहती हूँ। सच पूछिये तो मेरा यही हाल है कि बाह्य-इन्द्रियों में भी धुन्ध छा गई है, हाथ-पैर बेकाम हो चुके हैं। आँखों की रोशनी समाप्त हो चुकी है सो उन्होंने देखने से जवाब दे दिया है। अब तो बस आठों याम यही रटना है जिबह पर यही गीत है, रोम-रोम की यही ध्वनि है कि:-

“प्रभु बिना भक्ति तारो, तब तारिबो तिहारो हैंI”

मेरे ‘श्री बाबूजी’ ‘मालिक’ की ही कृपा से कुछ ऐसा दिखाई पड़ता है, महसूस होता है कि अनन्त के पीछे या परे भी किसी का आकर्षण मुझे अपनी और खींच रहा है। कोई मुझे मार्ग दिखला रहा है। यह सब मुझे ‘उसी’ की ही, अपने ‘मालिक’ के ही नेत्रों की ज्योति से दिखाई पड़ता है।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं, तथा केसर, बिट्टो व फूलो जिज्जी ने ‘आपको’ प्रणाम लिखा है। अपनी तबियत का हाल दीजियेगा। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-331
लखीमपुर
25/7/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

आशा है ‘आपकी’ तबियत ठीक होगी। मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। शुक्लाजी आये थे, मुझे लगता है कि उनमें लय-अवस्था की शुरूआत हो चुकी है। वैसे ‘आप’ जानते ही हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, कुछ यह दशा है कि ऐसा लगता है कि वाह्य इन्द्रियाँ तथा अन्तर की इन्द्रियाँ सब बेकार हो गई हैं। वृत्तियों ने काम करना बन्द दिया है। वृत्तियों में, इन्द्रियों में लगता है कि मानों खुद कोई action (क्रिया) कोई सुरक्षा ही नहीं रह गई है। ऐसा लगता है कि जैसे सारी इन्द्रियाँ, वृत्तियाँ लुप्त होकर न जाने कहाँ धीरे-धीरे अब विलीन हो गईं। बस, केवल ध्यान से देखने पर सम्भव है, उनकी धुंधली छाया मात्र ही हो तो हो, और मानों स्थिरता वाली दशा ने सब पर साम्राज्य कर ही लिया हो। मेरे ‘श्री बाबूजी’ जैसा पहले अक्सर ‘आपको’ मैं लिखा करती थी कि “लगता है कि हृदय और ख़ाली हो गया”, परन्तु अब कुछ नहीं होता। अब तो न ख़ाली होता है, न भरता है, एक अजीब स्थिति स्थिरता सी में रहती है। एक बात कुछ यह न जाने क्या हो गई है। कि बाहर के लोगों का कोई भी, किसी का चेहरा मुझे साफ़ दिखाई नहीं पड़ता। केवल एक धुंधली सी छाया मात्र के अतिरिक्त कुछ महसूस नहीं होता। परन्तु लिखती-पढ़ती सब हूँ, काम में कोई हर्ज नहीं पड़ता। दिल में दर्द क्या, परन्तु कुछ ऐसा लगता है कि एक काँटे के सदृशय कुछ पैठ चुका है, जो समय-समय पर रह-रह कर उकस पड़ता है। अब अन्तर में न जाने कैसी मसोस सी होती रहती है। आजकल तो ‘श्री बाबूजी’ न जाने तबियत क्यों रोने को बहुत रहती है, परन्तु रो तो नहीं पाती हूँ, इसलिये मन में मथन सी होती रहती है। ऐसा लगता है ‘आपने’, मेरे ‘मालिक’ ने मेरी चाल में फिर गति भर दी है, यानी चाल में जो थकान सी लगती थी, वह दूर हो गई और चाल में फिर गति आ गई।

Point 'U' (पाइंट-यू) की सैर भी 4-5 दिन से शुरू हो गई लगती है। अब तो स्थिरता मेरा रूप क्या, बल्कि वह ऐसा लगता है कि मुझमें समाती या हज़्म होती सी जा रही है। मैं तो अब इन सब से परे अपने को किसी और ही दुनियाँ में महसूस करती हूँ। मैं तो बराबर ‘मालिक’ के पास जाती जा रही हूँ। कुछ यह हो गया है कि जैसा पहले मैं लिखती थी कि “अन्तर रोया करता है” परन्तु अब यह दशा है कि रोता नहीं, बल्कि पसीजा करता है।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। फूलो जिज्जी, केसर, बिट्टो ने प्रणाम लिखा है। केसर के पत्र से मालूम हुआ कि ‘मालिक’ की कृपा से फूलो जिज्जी का मन पूजा में अब खूब लगता है। मैं शायद छोटे भइया के साथ शनिवार को कानपुर चली जाऊंगी, तब केसर, बिट्टो, छोटे भइया के साथ लौट आयेगी। इतिः-

केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-332
लखीमपुर
3/8/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

‘आपके’ दो पोस्ट कार्ड मास्टर साहब जी ने सुनाये थे। ‘आपके’ सिर का दर्द कम हो गया, सुनकर सन्तोष हुआ। मेरे सिर में भी इधर कई दिनों तक काफी दर्द रहा, परन्तु ईश्वर की कृपा से सब ठीक हो गया, बिल्कुल ठीक है, फ़िक्र की ज़रा भी बात नहीं है। ‘आपको’ परिश्रम अधिक पड़ जाता है। अब सुना है नारायण दद्दा का Transfer (तबादला) शाहजहाँपुर ही हो गया है, शायद ‘आपको’ कुछ आराम मिले।

मैं अभी तक कानपुर न जा सकी, शनिश्चर को सवेरे चार बजे मैंने ‘आपको’ लिखा था जाने के लिये, परन्तु ताऊ जी ने ता. 29 को आने को लिखा था और आज ता. 3 तक नहीं आये। अब जब वे आयेंगे, तब जाऊंगी। अभी कुछ ठीक नहीं है मेरे जाने का। ‘मालिक’ की कृपा से बड़े भइया को 3 रोज़ Train (ट्रेन) पर 215 रुपये तनख़्वाह के अतिरिक्त और मिल रहा है, इसलिये हम लोग बसन्त पंचमी के अलावा एक बार और वहाँ (शाहजहाँपुर) आने को ताऊजी से कहेंगे।

मेरे ‘बाबूजी’ इधर दशा भी कोई विशेष नहीं चल रही है। बेकार के ख़्याल भी बहुत आते रहते हैं। ऐसा लगता है कि मानों याद कोई विशेष बात ही नहीं रह गई है, परन्तु तबियत इसके विपरीत ही है। कोशिश करती हूँ और यह ‘आपका’ वाक्य सामने आ जाता है कि “बिटिया हमारे यहाँ बुरी हालत कोई नहीं होती, क्योंकि बुरी हालत अच्छी हालत खोलने की कुंजी होती है।“ इसलिए ‘उसका’ धन्यवाद ही देती रहती हूँ और आँखें भी ललचाई सी, बेबस सी ‘मालिक’ की कृपा को ताकती रहती हैं। दशा भी बस जो थोड़ी सी महसूस होती हैं, लिख रही हूँ।

अब न जाने क्यों अपनी सर्वव्यापकता का भास होता है। जिस प्रकार अपने ‘मालिक’ को हर समय, हर जगह यदि महसूस करूँ तो हर समय पाती हूँ, उसी प्रकार ‘मालिक’ ने मुझे अब कुछ ऐसी ही दशा प्रदान की है। यही नहीं, हर मानव में मैं मौजूद हूँ, परन्तु यह ज़रूर है कि ‘मालिक’ को होश मैंने इस दशा का ‘उसके’ पास रख दिया है, जब चाहे दे दे। कभी-कभी न जाने कैसे या तो ऐसी सर्वव्यापकता वाले प्रसंग आ जायें तो यह दशा मेरी बिल्कुल साफ़ दरशने लगती है। उन ख्यालों से, जो मैंने ऊपर लिखे हैं, मुझे तकलीफ कुछ नहीं होती है, क्योंकि वह भी एक दशा ही होगी। ‘आपको’ लिखते-लिखते वह बात कम हो रही है।

ज़रा सा सिर में अभी पत्र लिखने आदि से दर्द हो जाता है, परन्तु जहाँ उठी कि ठीक हुआ कोई तकलीफदे नहीं है। अम्मा को इधर कमज़ोरी अधिक बढ़ गई थी, परन्तु अब कल से लाभ होने लगा है। पेट के कारण उन्हें भूख वगैरह भी बिल्कुल नहीं लगती थी, ‘मालिक’ की कृपा से धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा। कोई चिन्ता की बात नहीं है। अम्मा कहती हैं कि इधर बहुत दिन ‘आपका’ पत्र न आने के कारण चिन्ता लगी रहती है, सो ‘अपनी’ केवल राजी खुशी की दो लाइनें ही लिखवाकर, ज़रूर डलवा दिया करिये। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-333
लखीमपुर
14/8/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ बहुत समय से कोई नहीं आया, इसलिये ‘आपकी’ तबियत का कोई हाल न मिल सका और ‘आपको’ पत्र की लाइनों से जो स्फूर्ति मिलती थी, वह भी प्राप्त न हो सकी। कृपया मुझ पर ‘अपनी’ कृपा-दृष्टि डाल लीजियेगा, क्योंकि मेरी दशा न जाने क्यों शुद्ध नहीं हो पाती। यहाँ दाँत के डाक्टर को दिखलाया था। 10 इन्जेक्शन लिवर एक्सट्रैक्ट + विटामिन B के तथा छः इन्जेक्शन रेडाक्स 4 + कैलशियम के लगाते हुए और ज़रूरत होगी तो और लगाकर मसूढ़े वगैरह काटने व साफ़ करने को कहा है। वैद्य को भी दिखाया था, उसने कम से कम दो महीने दाँत का नहीं, पेट तथा कमज़ोरी के इलाज को कहा है। 10-12 बीमारी बताई हैं, जो मेरी Condition (हालत) से मिलती हैं। दाँत वाले ने कम से कम दाँत के एक महीना बताया है। देखिये, जो होगा, देखा जायेगा। कोई बिल्कुल भी फिक्र की बात नहीं है। मेरी बस दशा में जो कमी हो, उसे ही देख लीजियेगा। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ यह दशा है कि ‘मालिक’ के प्रति जो मुझमें अटल विश्वास की दृढ़ता थी, कि ‘मालिक’ की शक्ति तथा ‘उसकी’ कृपा से होकर रहेगा, परन्तु अब तो यह बात भी धुंधली सी हो गई है। न तो तेजी, न उतनी साफ़ ही आ पाती है। कोशिश भी बेकार जाती है। यही क्या, मुझमें तो अब श्रद्धा, विश्वास तथा प्रेम वगैरह कुछ भी, वैसा नहीं है। ऐसा लगता है कि सब की धुंधली सी छाया-मात्र हो गई है। पूजा में मन भी अब धुंधला सा ही लगता है। सब कुछ बहुत धुंधला ही हो गया है। यहाँ तक कि चाहे जितनी कोशिश करूँ, ‘मालिक’ की भी शक्ल केवल बहुत ही धुंधली ही मुझे दीखती है। क्या करूँ, मैं अब जल्दी नहीं चल रही हूँ। अब ‘आप’ ही संभालिये। फूलो जिज्जी ‘आपको’ प्रणाम कहती हैं। केसर, बिट्टो 4-5 दिन हुए लखीमपुर गईं। इतिः-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-334
शाहजहाँपुर
7/8/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे सब पत्र मिल गये। मैं बिल्कुल ठीक हूँ। हालत तो तुम्हारी ईश्वर की कृपा से अच्छी है ही। तुम ‘U’ (यू) स्थान पर हो और वह मुझे इतना अच्छा मालूम देता है कि नहीं मालूम क्यों मुझे इससे ऊपर स्थान पर ले जाने को तबियत नहीं चाहती। मेरी निगाह जब तुम्हारे ‘U’ (यू) स्थान पर जाती है, तो मुझे बड़ी Peace (शान्ति) महसूस होती है और कैफियत बड़ी उम्दा हो जाती है।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-335
लखीमपुर
19/8/1953
परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’ को, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आगे मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। आशा है ‘आप’ अच्छी तरह से होंगे। कोई समाचार न मिलने से चिन्ता है। कहीं मेरी साधना में कोई कमी तो नहीं आ गई है, क्योंकि ‘आपने’ तो कृपा करके आठ-नौ दिन में ही एक-एक Point (पाइंट) पार करने को कहा था, परन्तु मुझे बहुत देर हो जाती है। कोशिश ज़रूर करती हूँ और करूँगी। परन्तु यह सब होते हुए भी आसरा यही है कि ‘मालिक’ परम कृपालु है। यदि कोई कमी होगी तो स्वयं ही सुधार लेगा। यही दृढ़ विश्वास रहता है, और क्योंकि माँ से डर नहीं रह गया। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

दशा शान्ति कहूँ तो ठीक होगा, अजीब सी है। परसों से दशा में परिवर्तन लगता है। ऐसा लगता है कि अब दशा कुछ बेरंगीनी सी ही बदलती जाती है। रंगीनी का आवरण भी साफ होता सा लगता है। कुछ उजाड़ सी दशा रहती है परन्तु मन को अब कुछ बुरी नहीं लगती है, बल्कि ऐसी ही अच्छी लगती जाती है। मेरे ‘बाबूजी’ कुछ ऐसा लगता है। कि मन पिघल कर छोटा सा हो गया है और ऐसा लगता है कि मुझसे दूर हो गया है और धुंधला पड़ गया है। न शुद्ध, न स्वच्छ है, बस धुंधला और सूक्ष्म पड़ गया है। और हल्का इतना कि कभी-कभी होने और न होने में सन्देह हो जाता है। अब न जाने क्यों ऐसा लगता है कि मेरे हृदय वगैरह भी कुछ नहीं रह गया है। भाई, ऐसा लगता है कि मानों इन्द्रियों की छाया तक मिट चुकी है, क्योंकि ध्यान देने पर भी मैं इतना तक नहीं पाती हूँ कि इनका काम Automatic (अपने-आप) ही हो रहा है। ऐसा लगता है कि Senses Loose (इन्द्रियाँ ढ़ीली) हो गये हैं। मेरे ‘बाबूजी’ ‘आप’ तो मेरे हैं ही, अब मैं क्या करूँ, मैं तो कुछ अधिक कर नहीं पाती हूँ।

फूलो जिज्जी प्रणाम कहती हैं और मोती के लिये पूछती हैं। पत्र अवश्य कृपा कर इस पते से दीजियेगा। आज ‘आपका’ कृपा पत्र मिला। इतिः-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-336
लखीमपुर
28/8/1953
परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आगे मेरा एक पत्र ‘आपको’ मिला होगा। बहुत दिनों से ‘आपका’ कृपा-पत्र न आने के कारण परेशानी अवश्य हो जाती है। मुझे भी पत्र लिखने के लिये कम से कम ही समय मिल पाता है, इसलिये मेरे पत्र में भी देरी हो जाती है। न जाने क्यों मुझे बिना ‘आपके’ कृपा पत्र के धीरज नहीं हो पाता है। जन्माष्टमी में मैं और फूलो जिज्जी यहाँ अवश्य व्रत करूँगी। मेरे ऊपर के मसूढ़े परसों सब कट चुके हैं, अब दवा लगवाने रोज़ जाती हूँ। नीचे के शायद ता. 1 या 2 को कटेंगे, ऊपर के मसूढ़े ठीक हो जाने पर। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो मेरी ऐसी दशा है कि वह याद आती है कि जैसा एक बार मीरा जी ने किसी से कहा था कि केवल एक श्रीकृष्ण के कोई दूसरा भी मनुष्य है, यह मैं नहीं जानती, बस यही दशा है। खुद मैं तक नहीं, सिवाय ‘उसके’। मुझे तो अब जैसे पहले लिखा था कि अन्तर में ही धंसी रहती हूँ, सो अब कुछ नहीं, अन्तर तक मुझे नहीं दीखता। अब तो ऐसा लगता है कि ऐसी दशा हो गई है कि सोना-मिट्टी मेरे लिये सब बराबर है। ता. 25 से दशा कुछ बदलती मालूम पड़ती है। कुछ ऐसा लगता है कि बड़ी मासूम हालत है। अब तो शून्यता वगैरह कतई खत्म हो गई लगती है और एक अजीब सी स्थिरता तथा दृढ़ता सी हालत में होती जा रही है, और वह भी बिना नींव की क्योंकि जब यही नहीं मालूम कि किस चीज़ की दृढ़ता और स्थिरता है, किन्तु हालत में स्थिरता तथा दृढ़ता सी एक अजीब प्रकार की है। कृपया मेरी दशा अवश्य देख, सुधार लीजियेगा, क्योंकि दशा में उतनी शुद्धता नहीं मालूम पड़ती है। पत्र अवश्य दीजियेगा। शायद पूज्य मास्टर साहब जी जन्माष्टमी पर वहाँ होंगे। उनसे तथा शुक्ला जी से मेरा प्रणाम कहियेगा। मेरा कुछ यह हो गया है कि चाहे कोई मसूढ़े काटे या कुछ, न डर लगता है, न कुछ परवाह, बेपरवाही सी ही रहती है। फूलो जिज्जी ‘आपको’ तथा मास्टर साहब जी से प्रणाम कहती हैं। इतिः-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता

सेविका–कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-337
शाहजहाँपुर
31/8/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

मैंने एक पत्र ता. 17.8.53 को कानपुर के पते से भेजा था, मालूम होता है कि तुमको नहीं मिला। तुम्हारे ख़त सब मिल गये। आज जन्माष्टमी है। मैंने तुम्हें लिखा था कि मेरा जी तुम्हें ‘U’ (यू) स्थान से अभी ऊपर ले जाने को नहीं चाहता है, और अब भी वही बात है और यह इतना अच्छा स्थान है कि मैं देख-देख कर खुश हो लेता हूँ।

आज जो पोस्टकार्ड तुम्हारा मिला है, उससे यह मालूम होता है कि अभी तुम्हें हटाना भी नहीं चाहिये, जब तक कि कुल बातें उस स्थान की तुम पर न खुल जावें और खुलना ईश्वर की कृपा से शुरू भी हो गई हैं और उसी की Sitting (सिटिंग) मैंने तुमको दो-एक दी हैं और दूंगा भी।

तुमने लिखा है कि अन्तर तक नहीं दीखता। इसके मानी यह हैं कि अंतर बाह एक होने की शुरूआत हो चुकी है, गो अभी बहुत कुछ बाकी है। भगवान की तारीफ तुकाराम ने खूब की है:-

“गुड़ से मीठे हैं भगवान, बाहर-भीतर एक समान।“

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-338
कानपुर
6/9/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ मिला- पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। ‘आपकी’ तबियत केसर के पत्र से मालूम हुआ कि ख़राब है, परन्तु ‘आपने’ मुझे लिखा नहीं; कृपया अपनी तबियत का हाल शीघ्र दीजियेगा। मेरे ऊपर के Gums (मसूड़े) तो ता. 26 को ही कट गये थे, परन्तु बहुत अधिक काटे जाने के कारण अच्छा होने में समय लग रहा है। अब परसों से रोज़ 4 मसूढ़े नीचे के बिना dead (डेड) किये करते हैं, जिससे जल्दी अच्छे हों, परन्तु ‘आप’ विश्वास रखिये, जरा भी चूं तक करने की तकलीफ़ मुझे ‘मालिक’ की माधुरी मूर्ति के कारण महसूस ही नहीं होती। अब मुझे मालूम हुआ मेरे ‘मालिक’ कि प्रह्लाद जी किस विश्वास व कैसे प्रेम के कारण आग में बैठ गये थे तथा पर्वत से गिराये जाने पर भी चूं तक न की थी। वे शरीर के ऊपर उठ चुके थे। मेरे ‘श्री बाबूजी’ न जाने क्यों दाँत का डाक्टर कोई शुद्ध चरित्र का आदमी मुझे नहीं दीखता है। परन्तु जिसकी आँखों में, जिसके समस्त शरीर के रोम में ‘श्री बाबूजी’ समाये हुए हैं, जो एक क्षण को भी किसी दूसरे की कोशिश करने पर भी अनुभव नहीं कर पाती, जिसे केवल मर्द या जो कुछ ‘श्री बाबूजी’ ही दीखते हैं और साँसारिक परछाई तक मिट चुकी है, उसे किसी से क्या मतलब और उसका क्या बिगाड़ सकता है। अब ‘आप’ ही जाने, यदि ‘आपको’ इस विषय में मुझे कुछ उपाय बताना हो तो बिना डाक्टर का हवाला दिये केवल उपाय लिख दीजियेगा। आखिरी सितम्बर तक मसूढ़े अच्छे हो जायें। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है सो लिख रही हूँ। कृपया क्षमा करियेगा कि Time (समय) की कमी तथा कुछ शायद थोड़ी सी ही तकलीफ़ के कारण हालत को जान कर भी डायरी में लिखने में देरी हो जाती है।

अब तो कुछ ऐसा हो गया है कि भीतर-बाहर सब समान हो गया है, नहीं-नहीं यों कहिये कि न मेरा भीतर है, न बाहर, कुछ महसूस ही नहीं होता। बस एक सफा मैदान पड़ा है, ऐसा कि जिसमें न कोई लाइन है न रेखा तक है। तबियत बड़ी नम्र सी रहती है। तबियत ही क्या, बल्कि नम्रता अपना रूप ही है ऐसा ही महसूस करती हूँ, नहीं, नम्रता स्वयं मुझसे ही उत्पन्न हो रही है। भाई न जाने यह क्या हो गया है कि किसी भी बात की तबियत, न आगा सोचती है, न पीछा आगा-पीछा कुछ आता ही नहीं, बस दशा में दृढ़ता, निश्चलता, स्थिरता अजीब प्रकार की है, ऐसी कि जिसका Weight (वजन) मुझ पर नहीं रहता। तबियत में बस अडिगता है, बिल्कुल बचपने की मासूम, निर्दोष कैफियत घर कर चुकी है। मेरे ‘मालिक’ भूल की अवस्था निराले ढंग की चल रही है, ऐसी कि जैसे एक बावला अपनी सी दुनिया में पहुँच कर सब कुछ भूल जाता है। वह यह भी भूल गया है कि वह बावला है, बस यही मेरी अवस्था है। कुछ ऐसी दशा है, इतनी दृढ़ता कि जैसा यदि ‘मालिक’ के नाम पर कोई छत से कूद जाने को कहे तो बिना आगा-पीछा तबियत में आये ही वैसा हो जायेगा और कुछ यह है कि उस गिराने वाले के प्रति मन में कोई बात या कोई दोष नहीं आ सकता, बल्कि वह रहेगा अपना ही, यह उदाहरण स्वरूप दे दिया है। अब कुछ यह हो गया है कि दशा की दृढ़ता या अडिगता या जैसी कुछ भी मेरी अवस्था है, उसके Weight (वजन) से भी इतनी निर्दोष हूँ कि कुछ पता ही नहीं है। और ऐसा लगता है कि दिल में ठौर तो कहीं है ही नहीं। न ठौर अन्तर में है न बाहर, क्योंकि अब तो केवल एक सफा मैदान के अन्तर-बाहर की भी गुंजाइश नहीं रह गई है और यह याद नहीं रहता है कि मैं भूली सी रहती हूँ, बस तबियत सादा सी रहती है। फिर भी न जाने क्या हो गया है कि मैं तो यही कहूँगी कि मेरा हृदय पत्थर हो गया है। नहीं, बल्कि पत्थर भी नित्य पानी भरने की रस्सी की घिसट लगने के कारण उसमें लाइन हो जाती है, परन्तु इस पत्थर के हृदय पर नहीं। अब तो मेरे ‘श्री बाबूजी’ यह हालत है कि खुद अपने मन का भी Weight (वज़न) मुझ पर नहीं रह गया है। अब तो बन्दा बेफिक्र फिरता है, परन्तु टीसन साथ है। अपनी तबियत का हाल दीजियेगा। लखीमपुर से केसर के पत्र द्वारा मालूम हुआ कि अम्मा भी कमजोर काफी हैं। फूलो जिज्जी व जीजाजी ‘आपको’ प्रणाम कहते हैं। इतिः-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-339
शाहजहाँपुर
16/9/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारी चिट्टी मिली। मेरी तबियत अब ठीक है। तुम्हारी हालत ईश्वर की कृपा बहुत अच्छी है, मगर ‘U’ (यू) स्थान से ऊपर ले जाने की अभी तक मेरी तबियत नहीं सी चाहती है। इसमें भी ‘मालिक’ की मौज मालूम होती है और यह स्थान मुझे इतना अच्छा मालूम होता है कि उसे देख-देख कर जी खुश होता है। अभी यह खुलेगा और बड़ी शान्ति और साम्य अवस्था तथा सादगी महसूस होगी। खैर, तुम मुझे लिखना।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-340
कानपुर
17/9/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ बहुत दिनों से कोई नहीं मिला इसलिये तबियत चिन्तातुर है, आशा है तबियत ठीक होगी। केसर के पत्र से मालूम हुआ कि ‘मालिक’ ने किसी पागल पर फिर मेहरबानी की है, कृपया लिखियेगा कि वह बड़भागी कौन था, कहाँ से आया था। परन्तु परिश्रम के कारण ‘आप’ कमज़ोर हो गये, ईश्वर करे ‘आप’ जल्दी से जल्दी तन्दुरुस्त हों। मेरे नीचे के Gums (मसूड़े) भी पूरे कट चुके हैं, बस अब ऊपर, नीचे के Gums Cure (मसूड़े) ठीक होने भर की देर है। डाक्टर का अन्दाज़ है कि 10 दिन में Cure हो जायेंगे और बीमारी के लिये होमियोपैथिक इलाज है। लाभ है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ कृपया ‘आप’ दशहरे की छुट्टियों में लखीमपुर अवश्य आवें। मुझे ‘आपको’ देखने की, ‘आपसे’ मिलने को बहुत तबियत चलती है। कभी-कभी मेरा मन बहुत उचाट हो जाता है, परन्तु बस से बाहर ‘कोई’ लगाम लगा देता है जिससे बाहर नहीं हो पाता। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई, ऐसा लगता है कि जैसे ढाल ही ढाल हो गई है कि जैसे उस पर तलवार तक लग कर टूट जाती है, परन्तु ढाल को कोई नुकसान नहीं पहुँचता। ऐसे ही कुछ साफ़ सा, बेअसर सा मेरा हृदय हो गया है, परन्तु इस ख़्याल से भी सोई हुई रहती हूँ कि तबियत बेअसर या कैसी है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ ऐसा हाल है कि मेरी समझ में नहीं आता है कि लोग त्यागी, वैरागी कैसे और कब हो जाते हैं। मुझे तो न त्याग की पहिचान है, न वैराग्य की जानकारी है। कुछ ऐसा हाल है कि न भक्ति की समझ है, न प्रेम की पहिचान है। मेरा हृदय तो इतना चिकना हो गया है कि उस पर यह कोई भी चीज़ अब मेरे हृदय में असर नहीं पहुँचाने पाती है। मेरी समझ में तो अब न संत, न महात्मा, न फकीर, सब कुछ समझ के बाहर, उससे परे हो चुका है।

मेरे ‘मालिक’ मेरा तो केवल यह हाल है कि हृदय को मैं अब केवल पत्थर ही कह सकती हूँ और ऐसा कि जो न पसीजता है और न जिस पर कोई लकीर तक ही अंकित हो सकती है। भाई, मैं देखती हूँ कि मैं अब लकीर का फकीर नहीं रही, बल्कि जाने क्या हो गया है। मैं तो कोरी हूँ। न कुछ पूजा करती हूँ, न नाम ही जपती हूँ, प्रभो, जैसे चाहे, पार लगावे या न लगावे न जाने क्या मेरी दशा अब Innocence (मासूमियत) की नहीं, बल्कि कोरी हो गई है, शायद कोई चाह नहीं उठती। ‘आपके’ बहुत दिन पत्र न आने से शरीर जो कि ‘मालिक’ की कृपा के उत्साह से शक्तिमान लगता है, सो वैसा उत्साह नहीं आने पाता। बड़े भइया की Train (ट्रेन) सीतापुर गई थी। लखीमपुर से अम्मा, ताऊ जी वगैरह सब लोग देख आये। इलाहाबाद से बड़े चाचा तथा विमला वगैरह ने बहुत बुलाया है, देखिये, हो सका तो 4-5 दिन को ही जाऊंगी, परन्तु जब मसूढ़े वगैरह बिल्कुल ठीक हो जायेंगे तब उन्होंने बंगा भाई साहब को भेजने को लिखा है। कुछ यह दशा है कि मानो सतह की सतह सर्वत्र संगमरमर ही संगमरमर बिछा हुआ है। भाई, ऐसी दशा है कि सम्भव है इसी दशा में नरसी भक्त रास में मशाल लिये थे। मशाल जलकर समाप्त हो गई और उनका आधा हाथ तक जल चुका था, परन्तु उन्हें पता न था, बस अब यही मेरी हर समय की दशा रहती है। परन्तु मेरा ‘मालिक’ अपने इस बच्चे पर फिर भी कोई ऐसा ख़तरा नहीं आने देता। अब न जाने क्या हर प्रकार की तमीज़ ही जाती रही, अब ‘आप’ ही जाने। कृपया कुछ मुझे दो लाइन दुआ की ही अवश्य लिख दीजियेगा। अब तो न होश में ही हूँ, न बेहोश ही हूँ, जैसी हूँ ‘मालिक’ के सामने हूँ।

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-341
कानपुर
18/9/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ शाम को मिल गया- तबियत को बड़ी प्रसन्नता एवं सन्तोष प्राप्त हुआ। बड़े भइया ‘आपके’ पास आये थे, पढ़कर तबियत प्रसन्न हुई, अब न जाने क्यों मुझे उनको देखने की जो इच्छा थी, वह मानों पूरी हो गई, अब न रही। मैं एक पत्र सबेरे डाल चुकी हूँ, हालत उसी में सब लिख चुकी हूँ। कुछ ऐसा लगता है कि तबियत बिल्कुल ठण्डी सी पड़ चुकी है। ‘आपकी’ कमज़ोरी तथा परिश्रम न जाने क्यों मुझे महसूस होता था अक्सर, परन्तु कारण अब मालूम हुआ। ‘आपको’ सचमुच मुरव्वत में बड़ी तकलीफ़ तथा परिश्रम उठाना पड़ता है। यह तो हमें चाहिये कि ऐसे परिश्रमों में डालकर ‘आपको’ क़तई तकलीफ न दें। मैं तो चाहती हूँ कि ‘आपके’ शरीर के एक-एक रोएँ तक को पलकों पर रखूं, परन्तु किसी न किसी ओर से लाचारी हो ही जाती है। ‘मालिक’ की जब मौज हो, तब point ‘U’ (पॉइंट-यू) से हटावें। मुझे कुछ नहीं, बस क़दम आगे ही रहे। मैंने फूलो जिज्जी से मोती के लिये तभी कह दिया था, उन्होंने कहा है कि न लें।

मैंने गौर किया है, अपने चारों ओर चक्र अवश्य पाती हूँ। अपने ‘मालिक’ की कृपा और ‘उसी’ के बल पर ही मैं तो निर्द्वन्द रहती हूँ और चक्र को देखकर बिल्कुल बेफिक्र हूँ। स्त्री तो उनकी बड़ी सचरित्रा तथा पूजा वाली हैं। ‘आपने’ जो दिमाग का ठस होना लिखा, सो बात बिल्कुल ठीक है, सिर में दर्द उसके बराबर रहता है। बीमार भी काफ़ी पड़ चुका है, खैर, वह इन पर गौर नहीं करता है, क्योंकि विवेक-शक्ति नष्ट हो चुकी है, परन्तु फिर भी विश्वास रखिये कि अपने ‘मालिक’ के बन्दे के लिये उसे अशुद्धता के विचार छोड़ने पड़ेंगे।

मुझे तो उस पागल पर बड़ा अफ़सोस आता है, जो ‘मालिक’ की शक्ति का कितना Misuse (दुरुपयोग) कर रहा था। ख़ैर ईश्वर से मेरी यही हार्दिक प्रार्थना है कि ‘आपकी’ कमज़ोरी भी वह दूर कर दे शीघ्र। मेरे ‘श्री बाबूजी’ ‘आप’ शायद दशहरे पर लखीमपुर आवेंगे ही, क्योंकि यह पागल भी ‘आपको’ ही मिलना चाहा करता है। हो सका तो ताऊ जी से पूछकर 6-7 दिन को इलाहाबाद भी होती आऊंगी, बहुत बुलाया है। सम्भव है, वहाँ दो-एक सत्संगी भी बढ़ें, वैसे ईश्वर जाने। मेरे Gums (मसूड़े) नीचे के भी सब कट चुके हैं, बिना dead (सुत्र) किये ही, जिससे घाव जल्दी भरें। परन्तु दुःख और पीर मुझे नहीं हुआ। ‘मालिक’ की मधुर छवि आँखों में थी, इसलिये। अभी बाहों में Injections (इन्जेक्शन) रोज़ एक लग ही रहा है। अब घाव जल्दी भरें, इसलिये दो दिन से कास्टिक लगाया जाता है। तकलीफ़ कुछ नहीं होती, फिक्र बिल्कुल न करियेगा। कल एक दाढ़ जो करीब-करीब बिल्कुल सड़ चुकी है, वह उखड़ जायेगी। डाक्टर 8-10 दिन और लगेंगे बताता है। आधा-आधा इंच मसूढ़े काटने पड़े थे, परन्तु ताज्जुब है कि जैसी पीर होनी चाहिये थी, वैसी न हुई। तबियत में सादगी का ठिकाना नहीं, परन्तु है सब ऐसी कि जैसे एक स्पन्दनहीन सतह बिछी हुई है। फूलो जिज्जी ‘आपको’ प्रणाम कहती हैं। पत्र अवश्य दीजियेगा। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-342
कानपुर
25/9/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपके’ मिल गये। पूजा तो अब बहुत कम, बल्कि नहीं के बराबर ही है। मैं तो ‘मालिक’ की कृपा पर निर्भर हूँ। अब तो चाल बहुत मध्यम या धीमी है। हालत क्या है, जैसे एक बेकार Plot (मैदान) पड़ा है। दशा में चमक-दमक या उत्साह नहीं है। मेरी तबियत ठीक नहीं थी, परन्तु धीरे-धीरे सुधर रही है, सो चिन्ता न कीजियेगा। बस कृपया मेरी आध्यात्मिक दशा अवश्य देख लीजियेगा।

सदैव केवल ‘आपको’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-343
शाहजहाँपुर
28/9/1953
प्रिय बेटी, खुश रहो।

पत्र मिले। ता. 24.9.53 की सुबह को 8.30 बजे मैंने तुमको ‘V’ (वी) स्थान पर डाल दिया है। अब तुम्हारी तबियत ठीक होगी। तुम इलाहाबाद, जहाँ तक हो सके, चली जाना। वहाँ सबको लाभ होगा और जज साहब को भी Sittings (सिटिंग्स) देना। मुझे उनके दिल पर मकड़े के जाले की भाँति कुछ मालूम होता है। इसकी वजह उनके पहले का गलत अभ्यास है। वह पार्वती जी की शक्ल का ध्यान करते थे।

अच्छा तो यह है कि तुम थोड़े दिनों बीमारी जाने का Meditation (ध्यान) खुद करो। मैंने तुम्हें एक बार बतलाया भी था। वह यह है कि धुंयें (Smoke) की शक्ल पीछे से सब बीमारियाँ निकल रही हैं और ब्रह्माण्ड से Energy (शक्ति) आ रही है जो बीमारियों को दूर कर रही है। अम्मा को प्रणाम।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-344
कानपुर
30/9/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ आज मिला पढ़कर प्रसन्नता हुई। स्थान ‘V’ (वी) पर डाल देने के लिये ‘आपको’ बहुत-बहुत धन्यवाद है। अम्मा तो 5-6 दिन हुए आ गई हैं। ‘आपने’ चक्र को हल्का कर दिया, यह अच्छा ही है, क्योंकि अब इतनी ही आवश्यकता है। ‘मालिक’ की ही कृपा के बल पर गुलाम निर्द्वन्द, मस्त फिरते हैं, फिर भाई, मैं तो ‘अपने’ ‘मालिक’ को पाकर निहाल हो गई, परन्तु अभी पूरी तौर पर नहीं, परन्तु मेरे ‘मालिक’ मैं तो ‘उसकी’ हो ही चुकी। अब कुछ कमी या अधिकता वही जाने। बालिका को तो बस 'माँ' चाहिये। इलाहाबाद जाने के लिए मैं विमला को लिख रही हूँ कि भाई साहब मुझे आकर ले जायेंगे तो अवश्य जाऊंगी और ‘मालिक’ की कृपा से बड़े चाचा के दिल पर जो ‘आपने’ मकड़ी के जाले की तरह कुछ लिखा है, साफ़ हो जावेगा। ‘आप’ एटा जायेंगे तो अच्छा है, खैर, हम लोग हो सका तो ‘आपसे’ मिलेंगे ज़रूर, कहीं मिलें, मन नहीं मानता। मैं तो यह समझ ही रही थी कि ‘मालिक’ की कृपा से अबकी ‘आपके’ पत्र में आगे point (पॉइंट) पर जाने की खुशखबरी मिलेगी। क्या ‘आपने’ अभी सैर के परमाणु नहीं डाले हैं। मेरे मसूढ़े अभी नहीं भरे हैं, किन्तु शायद डाक्टर 5-6 दिन में जाने की इजाज़त दे दे, परन्तु अभी आशा कम है। होमियोपैथ का इलाज तो हाल लिखकर भी होता रहेगा। दो महीने खाना छोड़ने को कहा है, 8 दिन हो चुके हैं, परन्तु ‘आप’ विश्वास रखें कि ‘मालिक’ की कृपा मुझे चला रही है, शक्ति देती है। यहाँ तक कि कोई यह मानने में अचम्भा करते हैं कि बिना अन्न के 8 दिन हो गये, परन्तु उन्हें ‘मालिक’ की इस निरन्तर कृपा का क्या पता है, जो मुझे जीवन प्रदान करती रहती है। सूजन पेट की भी कम हो रही है। मज़े में मस्त हूँ। फिक्र कतई न करियेगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो ऐसा लगता है कि सूने से देश में हूँ, हालत में सूनापन है। अब तो न जाने क्यों दशा में पहले की तरह पवित्रतापन का अनुभव नहीं मालूम पड़ता है। दशा में लगता है इससे भी ख़ालीपन हो गया है। न पवित्रता, न अशुद्धता ही है और ऐसा लगता है कि शून्य की दशा भी सूनी हो गई है। कुछ यह है कि दशा तो ऐसी है ही कि “बिना भक्ति तारो, तब तारिबो तिहारो है।“ परन्तु मन इसके भाव के स्पर्श तक से सूना हो गया है और सूनापन कह लीजिये, वह तो एक शायद बंजर Plot (प्लॉट) सा होता जा रहा है।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा फूलो जिज्जी व जीजा जी प्रणाम कहते हैं आशा है ‘आपकी’ तबियत ठीक होगी। इतिः-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-345
कानपुर
4/10/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

पोस्टकार्ड ‘आपका’ दूसरा भी मिल गया। समाचार मालूम हुए। बीमारी का इलाज होमियोपैथिक हो रहा है और डाक्टर ने कहा है कि चाहे जहाँ रहो, हफ्ते में हाल लिखती रहना, बस दवा होती रहेगी। वैसे ‘आप’ जैसा लिखेंगे, वैसा ही करूँगी। यहाँ वैसे तो कुछ नहीं, कुछ कारखाने के झगड़े के कारण और कुछ वैसे ही कलह के कारण जी कभी-कभी ऊब उठता है। डायरी भी जब मन चाहता है, लिख नहीं पाती हूँ, फिर हाल भूल जाती हूँ, खैर, यदि ‘मालिक’ की मर्ज़ी हो, ‘आप’ जैसा चाहें, वैसा ही मैं करूँगी। ‘आपकी’ कमज़ोरी वगैरह कैसी है? ‘आप’ ऐटा जायेंगे या नहीं। वहाँ से बुलावा आया या नहीं। लखीमपुर तो ‘आप’ शायद नहीं पहुँच पायेंगे।

आध्यात्मिक दशा क्या लिखूं, हालत में शुद्धता नहीं मालूम पड़ती। मालूम पड़ता है कि मानों अभी सैर शुरू नहीं हुई। दशा में कुछ तेजी नहीं मालूम पड़ती। शायद इसी कारण शरीर की भी फुर्ती कम है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ ‘आपने’ जो मेरा हाल हफ्ते भर बाद पूछा है, सो मैं लिखूंगी अवश्य, किन्तु मेरी यह इच्छा है कि ‘आप’ कृपया परिश्रम अधिक न करें। दौरे कमज़ोरी के पड़ते हैं, ठीक हो जायेंगे। ‘आप’ इस ओर से बिल्कुल बेफिक्र रहें। बस आध्यात्मिक-दशा की ओर अवश्य निगाह रक्खे रहें, जैसी कि ‘आप’ सदैव ही कृपा करते हैं। मुझे जब तक दशा ठीक नहीं आती चैन नहीं पड़ता है, क्योंकि मेरी तो खुराक यही है कि ‘मालिक’ की कृपा रूपी अमृत का दुग्ध पीकर ही यह बालिका पल और बढ़ रही है। मेरी याद में तो कमी नहीं हो गई, कृपया ‘आप’ अवश्य लिखियेगा, क्योंकि मुझे तो अब इसकी भी तमीज़ नहीं रह गई है। हालत को हल्का ही क्या लिखूं, नहीं के बराबर मालूम पड़ती है। चाहे कुछ भी हो, अब मैं यह तो मन की अवस्था अवश्य देखती हूँ कि चाहे कैसी परिस्थिति हो, चाहे कहीं रहूँ, मन की जो शाश्वत, शान्ति, एकाग्रता और आनन्द कह लीजिये, उसमें कोई कमी नहीं आती और ‘श्री बाबूजी’ उसमें बढ़ती भी महसूस नहीं करती हूँ। हाँ, दृढ़ता ज़रूर दृढ़ होती जाती है। वह तो जैसी है, वैसी ही रहती है। हाँ, दशा तो अवश्य बदलती रहती है।

अम्मा की तबियत वैसे तो ठीक है, परन्तु कहती हैं कि बाईं ओर कूल्हे का दर्द नहीं गया है। कृपया ‘अपनी’ तबियत का हाल भी अवश्य लिखियेगा। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इतिः-

सदैव केवल ‘आपको’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-346
कानपुर
8/10/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा एक पत्र मिला होगा। अम्मा परसों लखीमपुर चली जायेंगी। ‘मालिक’ की कृपा से कमज़ोरी तो मुझे कम ही है। पेट में सूजन तो आज डाक्टर ने बताई है कि लिवर, तिल्ली तथा आँतों में अभी करीब वैसी ही है। नमक के पानी का सेंक बताया है। यदि पेटेन्ट दवा डाक्टर दे देते, तो शायद मैं अम्मा के साथ चली जाती, परन्तु अभी वे दवा ठीक नहीं तै कर पाये हैं। दूसरे, फूलो जिज्जी इम्तहान तक के लिये मुझे रोक रही हैं कि बच्चों को मैं रख लेती हूँ, तो वे पढ़ लेती हैं, परन्तु अक्सर मेरा मन उचट जाता है। टट्टी भी Test करवाई थी, उन्होंने पुरानी आँव के कारण सारी सूजन वगैरह बतलाई है। 22 दिन अन्न छोड़ने पर भी ‘मालिक’ की कृपा ने विशेष कमजोरी नहीं आने दी। परसों से इन्फ्लुएंजा फिर जोर का हो जाने के कारण तथा पेट में कोई लाभ न होने के कारण सबसे बड़े डाक्टर भल्ला हैं, फूलो जिज्जी ने उसे दिखाया है। उन्होंने कहा है कि पेट की T.B. (टी.बी.) शुरू हो चुकी है और इसका इलाज न होने पर बढ़ती जावेगी। पेट में सूजन बहुत है। 300 दिन तक बराबर रोज़ Injection (इन्जेक्शन) लगाने तथा पीने वगैरह की भी दवा दी है। फिर इसके बाद बिजली Health (स्वास्थ्य) बढ़ाने के लिये देंगे। Cure (ठीक) हो जाने व कमजोरी वगैरह सब ठीक हो जाने की गारन्टी ली है। ढाई-तीन महीने लगकर इलाज करने को कहा है। Health (स्वास्थ्य) जरा ठीक होती तो इतने दिन न लगते।

‘आपने’ एक सप्ताह में पूरा-पूरा हाल लिखने को कहा था, इस लिये लिख दिया। ‘आप’ जरा भी चिन्ता न करें, मैं तो चलती फिरती मस्त हूँ। यहाँ यह ज़रूर है कि डायरी या पत्र लिखने के लिये भी कम समय मिल पाता है, इस कारण दिमाग ज़रूर कुछ मट्ठ सा हुआ जाता है। खैर, ‘मालिक’ की जैसी कृपा होगी, सब ठीक हो जायेगा। मेरी दशा (आत्मिक) तो बड़ी धीमी सी, नरम सी, सरल सी चल रही है। पूजा मैं कैसे कहूँ कि करती हूँ कि नहीं। ऐसी दशा लगती है कि मानों अन्तर-बाहर समान या एक हो गया है। भाई, दशा क्या है संगमरमर (पत्थर) की चट्टान कह लीजिये। या यों कह लीजिये पुनरावृत्ति है कि ‘मालिक’ की कृपा से अब ऐसी दशा है कि जैसा एक बार ‘आपने’ किसी पत्र में संग- (पत्थर) बेनमक का जिक्र किया था, उसी दशा के आसार अब अपने में पा रही हूँ, वैसे तो देने वाले ‘आप’ तो सब जानते ही हैं। एक बात यह मैं ज़रूर देख रही हूँ कि Fame चारों ओर फैलती जा रही है। न जाने क्यों शायद ‘मालिक’ को ऐसी ही मर्जी है, इसलिए ऐसा है। मुझे अब परवाह इसकी भी नहीं रही, क्योंकि भाई शरीर को पालने वाला जिस प्रकार प्राण है उसी तरह सेविका को उन्नति देने वाला है केवल ‘स्वामी’। उसी माँ की कृपा रूपी अमृत दुग्ध का अहिर्निशिपान करके यह बालिका पुष्ट हो रही है। मेरा बुखार आज उतर गया है, चिन्ता की कोई बात नहीं है, बस एक यही लालसा केवल अपने ‘मालिक’ को प्राप्त करने की, उसे ही देखने की लगी रहती है और कुछ नहीं। क्या बताऊं छुट्टियों भर तो मेरा भी मन वहीं लगा रहेगा, ‘आप’ हमेशा आते थे। ख़ैर, वैसे मैं तो सदैव ‘मालिक’ के पास हूँ और ‘वह’ मेरे पास है। इतिः-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-347
कानपुर
18/10/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

पोस्टकार्ड ‘आपका’ परसों मिल गया। सर्वेश को टायफाइड हो गया, पढ़कर सबको चिन्ता है। अबकी से दशहरे में वहाँ तो बहुत लोग आये होंगे। बड़े चाचा के Heart (दिल में) में अब वह बात नहीं देखती जो ‘आपने’ मकड़ी के जाले के सदृशय लिखी थी। वहाँ पहुँचने में तो लाभ ही लाभ है, और आनन्द ही आनन्द तथा आत्म-सन्तोष। मेरे आँत की T.B. के लिए 8 Injection (इन्जेक्शन) लग चुके हैं। कल से पेट की सूजन में 19-20 का फर्क है। कल 36 दिन बाद मैंने दलीया- दाल लिया है। अब 24 घंटे में एक बार दलिया मिलेगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक- दशा है सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ यह दशा है कि ऐसा लगता है कि सारे अवयव (Senses) शान्त अपनी-अपनी जगह पर स्थित हो चुके हैं। उनकी विशेषता ही जाती रही, केवल धुंधली छाया मात्र रह गई है। दशा आजकल बड़ी सौम्य सी, सरल सी चल रही है। दशा आज कल बहुत हल्की, धूमिल, पर्दा या सतह की तरह हो गई है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ सब तरफ़, सब ओर बस ऐसी ही दशा दिखाई पड़ती है। हर तरफ, हर जगह सतह की तरह यही, ऐसी ही दशा बहती दिखाई पड़ती है। अब तो ऐसा लगता है कि Point ‘V’ (पॉइंट-वी) की सैर ‘मालिक’ की कृपा से शुरू हो गई है। केवल एक धूमिल, धुधंली सतह की तरह के अतिरिक्त मुझे अब सामने आँखों से कोई चीज़ दीखती ही नहीं। दशा का रंग बिल्कुल श्वेत, धवल नहीं है, वरन् स्वच्छ, शुद्ध रंग है। बड़ा Pure (पवित्र व शुद्ध) सा रंग या सतह है। अभी अधिक नहीं लिखा जा रहा है, क्योंकि न दिमाग़ ही इतना काम देता है, न हाथ। खेर, चिन्ता की कोई बात नहीं है। ‘मालिक’ की कृपा से सब ठीक हो जायेगा। यदि मेरे पत्र डालने में देरी भी हो जाये तो चिन्ता कदापि न करियेगा। मुझे जरा यह नुकसान जरूर है कि कमजोरी की वजह से दशा अनुभव देर में कर पाती हूँ।

अम्मा ‘आपको ‘शुभाशीर्वाद तथा फूलो जिज्जी प्रणाम कहती हैं। इतिः-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-348
कानपुर
22/10/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-कार्ड ‘आपका’ मिला- पढ़कर प्रसन्नता हुई। ताऊजी के कल के पत्र से यह जानकर और भी प्रसन्नता हुई कि ‘आप’ भी अच्छे हैं और सर्वेश की भी तबियत ठीक है। मेरी तबियत के बारे में ‘आप’ चिन्ता न करियेगा क्योंकि इलाज ठीक-ठीक हो रहा है। यह जरूर है कि खाट से उठने की सख्त मनाही होने के कारण इंजेक्शन घर पर ही लगता है। सब ईश्वर की कृपा है। आप विश्वास रखिये, मेरा एक-एक रोयाँ तक ‘मालिक’ ने खरीद लिया है। जिन्दगी उसी के लिये है, मृत्यु भी उसी की खुशी के लिये है, दोनों समान हैं। मिशन की सेविका तो मैं हूँ ही। उसके हर तरह के काम के लिये सदैव तैयार हूँ और रहूंगी। मैं लेटे-लेटे भी अब स्वामी विवेकानन्द की (ज्ञानयोग) नामक पुस्तक पढ़ा करती हूँ। फिर दाँत वाले डाक्टर की बहू से स्वामी जी के लेक्चर्स का संग्रह मांग कर पढूंगी। ज्ञानयोग में अपने मिशन की प्रणाली खूब System (सिस्टम) से मिलती है और भी बहुत कुछ है, बहुत अच्छी पुस्तक है, मैं ख़रीद लूंगी। ‘आपकी’ यह तो अत्यन्त सेविका पर, अपनी बिटिया पर कृपा है कि खत देखकर perfection (पूर्णता) देने को तबियत चल आती है। सो ‘आप’ विश्वास रखिये कि जो कुछ भी आध्यात्मिकता में प्राप्त हो सकता है, वह तो ‘आप’ मुझे दिये बगैर रहेंगे ही नहीं, परन्तु साथ ही मेरी इस बात की भी कोशिश है और मेरी कोशिश क्या, ‘मालिक’ की ही कृपा है कि कभी कोई यह उंगली न उठा सके कि यह ‘श्री रामचन्द्र मिशन’ की मेम्बर है। ऐसी ही दृढ़ता हर बात में ‘मालिक’ मुझे प्रदान करता जाता है और ‘मालिक’ मैं मर मिठुंगी, परन्तु मुंह से यही निकलेगा कि अभी कुछ नहीं, अभी कुछ नहीं। कमज़ोरी भी धीरे-धीरे कम हो रही हैं। हाँ, अक्सर उस ‘माधुर्य मूर्ति’ के दर्शनों को जब तबियत तड़पती है, ‘मालिक’ तभी स्वप्न में अवश्य दर्शन देता है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो कुछ यह दशा है कि ऐसा लगता है कि अब दशा (आत्मिक) कहीं से आती नहीं मालूम पड़ती, वरन् स्वयं ही अंतर में से ही स्वतः मालूम पड़ती है। कुछ आना जाना महसूस नहीं होता है। महसूस क्या, सच तो यह है कि वास्तव में तो दशा का आना जाना होता ही नहीं। वास्तव में तो मेरे ‘श्री बाबूजी’ ऐसा लगता है कि मेरे स्वतः स्वरूप जिसे नहीं या न होना कह लीजिये, वही शुद्धरूप खुलता चला जाता है। अब तो ऐसा लगता है कि सूक्ष्म शरीर के अवयव और निशान मिटते चले जाते हैं। बहुत ही धीमे हल्के से रह गये हैं। नहीं, नहीं, भाई सूक्ष्म शरीर ही मिटता और धीमा सा पड़ता चला जाता है। अब तो ‘श्री बाबूजी’ कुछ यह दशा है कि ऐसा लगता है कि भीतर से खुद व खुद प्रेम का सागर सा उमड़ा पड़ता है। परन्तु सागर होने के कारण छलकता नहीं। परन्तु यह अवश्य है कि अन्तर स्थल में प्रेम का सागर हिलोर मार रहा है। उसमें आनन्द की लहरें सी उमड़ रही हैं।

पूज्य ‘श्री बाबूजी’ Perfection (पूर्णता) की मुझे जरा भी परवाह यों नहीं रही क्योंकि Perfection (पूर्णता) तो मेरा उसी दिन हो गया, जिस दिन Perfection (परफेक्शन) मूर्ति ‘आपके’ दर्शन किये थे। मेरा ही क्या, यह दावे के साथ मैं कह सकती हूँ कि जिसको ‘आप’ पर श्रद्धा हो गई, उसे Perfection (परफेक्शन) ही क्या, सब कुछ मिल गया समझिये।

अम्मा आपको शुभाशीर्वाद तथा फूलो जिज्जी प्रणाम कहती हैं। इतिः-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-349
कानपुर
26/10/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा एक पत्र मिला होगा। मुझे लाभ धीरे-धीरे हो रहा है, फिक्र न कीजियेगा। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूं।

भाई, अब तो कुछ यह दशा है कि अब तो ब्रह्म-दर्शन की दशा कह लीजिये, विशुद्ध रूप में हर समय रहती है और ब्रह्म-दर्शन भी कैसा कि उसमें हर समय मानों उसी रस में घुली सी एक रहते हुए रहती है और क्या, मेरा रूप ब्रह्म हो गया है। बड़ी Pure (शुद्ध) दशा है। भाई, मेरी तो दुनियाँ ही और है, जहाँ बस कुछ एक ही महसूस होता है और मैं देखती हूँ कि वास्तव में वह एक भी है कुछ नहीं। न जाने क्या है। शब्द नहीं मिलते, कैसे लिखूं। अब तो भाई कुछ यह दशा है कि कुछ ऐसा है कि यदि नहाने को देर हो जाती है या जैसे डाक्टर ने नहाने को रोज नहीं बताया है, परन्तु नहाऊं या न नहाऊं, मैं तो गन्दगी या ऊब कभी अनुभव करती ही नहीं, मैं तो नित्य शुद्ध, साफ-सुथरी ही रहती हूँ, इसलिये मुझे शारीरिक कर्मों की कोई Importance (महत्त्व) ही नहीं रह गई है। वास्तव में आनन्द क्या है, मैं तो कहूंगी कि कुछ नहीं। गूंगे के गुड़ जैसी दशा है। वास्तव में मुझे तो ऐसा लगता है कि अब आनन्द कोई चीज़ नहीं है, वह तो केवल आत्मा की कुछ अनुभूति (एहसास) मात्र है, उसके पीछे जो छुपा है, वह बड़ा Pure (शुद्ध) कुछ है, जो कुछ नहीं की झलक मात्र है, कुछ ऐसी दशा आजकल चल रही है। आनन्द की Importance (महत्व) यों नहीं अनुभव होती कि कुछ ऐसी दशा है कि दशा आनन्द के पर्दे को भेद कर अब उस पार का एहसास करने लगी है या यो कहिये कि वास्तव में आनन्द का श्रोत मुझमें सोख चुका है, इतना झीना पड़ चुका है कि उस पार की दशा की झलक मुझमें आने लगी है। मैं तो हर समय ब्रह्म में ही स्थित रहती हूँ, नहीं-नहीं, मेरा रूप ही वही हो गया है। अहं ब्रह्मास्मि की दशा है, किन्तु ऐगी कि जिसमें अहं नहीं रहा है। Pure (शुद्ध) दशा है।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ यह है कि ऐसा लगता है कि कुछ मेरे अन्दर से बहता सा, छलकता सा मालूम पड़ता है। वह सब केवल Pure (प्योर) ब्रह्म ही ब्रह्म महसूस होता है। कुछ ऐसा लगता है कि मेरा तो कुल अंतर, बाहर तक सब ब्रह्म-ज्योति से ही चमकता है, किन्तु चमक कैसी है कि जो विशुद्धता, Purity (पवित्रता) की झलक है, चमक है, बस वैसी ही है। ऐसा लगता है भाई, कि सूक्ष्म शरीर पिघल- पिघला कर समाप्त हो चुका है। कुछ यह है कि अब जो दशा है, या होती है, वह कुछ नहीं की तह से झलकती है। मेरे पूज्य ‘श्री बाबूजी’ कुछ यह अनुभव है कि ब्रह्म भी बिल्कुल ख़ालिस नहीं है, वरन् उसकी तह में कुछ अवश्य है, जो महसूस होता है और उसमें सुहावनेपन की बू कुछ न कुछ है, किन्तु ऐसा है कि कहा नहीं जा सकता है। अब तो कुछ ऐसा लगता है कि ब्रह्म अवस्था का भी यह श्रोत मुझमें सोखता जाता है। भाई, मैं तो सोखता हो रही हूँ। हर दशा, हर चीज़ मुझमें सोखती चली जाती है और क्या लिखूं। ‘मालिक’ भी रग-रग में, कण-कण में समा चुका है। मुझे अनुभव हो या न हो, यदि दूसरा कोई करना चाहे तो वह यही पायेगा। मुझे कुछ यों अनुभव नहीं होता कि खुद मैं भी अपने अन्दर सोख सी गई हूँ।

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका=कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-350
शाहजहाँपुर
31/10/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र २० अक्टूबर सन् ५३ का अभी मिल गया। तुम्हारा पत्र देखकर तबियत उछल पड़ी, इसलिये कि मेरी जिन्दगी में ऐसी हालतें मेरे सामने आ रही हैं। यहाँ तो मिशन के मेम्बर्स का यह हाल है कि उन्हें अपने से ही फुर्सत नहीं। कुछ ऐसे भी हैं कि यह उम्मीद लगाये बैठे हैं कि में एकदम से उन्हें सब कुछ कर दूंगा। लाखों जन्म गुजर गये, अब तक अपने वतन को वापसी नहीं हुई और अब भी इसका ख़्याल पैदा नहीं होता। मैं भला क्या कर सकता हूँ, जब कोई चलना ही नहीं चाहता। यह सब ईश्वर के हाथ में है, जब ‘वह’ चाहेंगे, यह भी हो जावेगा। मैं तो यही चाहता हूं कि मुझ को कुछ थोड़ा बहुत आता है, उतना ही लोग सीखें और इतना सीखने के बाद भी अगर उनकी तडप बुझ न चुके, जैसा कि होना चाहिये, तो मैं आजादी से कहने के लिये तैयार हूँ, कि मुझसे ज्यादा जानने वाले को तलाश कर लें, इसलिये कि मेरी खुशी इसी में है कि लोग मुझसे बेहतर निकलें। मेरा क्या और मेरी हालत क्या? ठीक तो गुरू महाराज को ही खबर है। इतना जरूर मैं जानता हूँ कि Infinite (अनन्त) में Swimming (पैराव) ज़रूर कर रहा हूँ और इसका छोर नहीं, इसलिये मैं आत्मिक उन्नति के बारे में क्या राय कायम कर सकता हूँ, जब कि न मालूम कि अभी कितनी Swimming (पैरना) बाकी है। एक बात में ज़रूर लिखे देता हूँ कि मुमकिन है मेरी थोड़ी बहुत हालत जो कुछ भी है, अगर कहीं कोई किसी समय में इसका समझने वाला मिल गया किसी तरीके से और लोग भी इसको मालूम कर सकें और ख़ास कर मिशन के Member (सदस्य) तो फिर उनको मुमकिन है, तमाम उम्र अफ़सोस से हाथ मलना पड़े।

बिटिया ! जाने क्या बात है कि मैं बराबर कहता भी रहता हूँ और लिखता भी रहता हूँ, मगर ज्यादातर उनके जूं नहीं रेंगती, और मैं तो भाई, इसको अपनी ही कमज़ोरी कहूंगा, और वाकई कसूर भी मेरा है। यह हो सकता है कि मुझमें कुछ कच्चापन हो, जिसकी वजह से मेरे कहने सुनने का और तवज्जह का उन पर असर न पड़ता हो। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनकी जाति का अभिमान ज्यों का त्यों है, और इसी हैसियत से वह मुझको देखते हैं जिससे ऊंच को, नीच को देखना चाहिये। मैं तो भाई ऐसे तबके में पैदा हुआ हूँ, जिसको ऊंच कुल वाले को नीच समझना ही चाहिये। उनकी निगाह मेरे जिस्म और जाति पर रहती है; उस हालत पर नहीं रहती, जिससे उनको मदद लेना है। मुझे इसका कुछ खेद नहीं है। मैं तो वह च्यूंटी हूँ, कि लोग मुझे अपने पैर से मलें, वह बर्र में नहीं हूँ, कि जिसके पकड़ने से या अपनाने से काट खाऊं और उनको तकलीफ पैदा हो। जाति का अभिमान एक बहुत बड़ी रुकावट है और यह पहली चीज है, जो दूर होना चाहिए। ईश्वर का हजार-हजार बार धन्यवाद है कि मैं सबसे ऊंचे कुल में पैदा नहीं हुआ, जो यह कमजोरी मुझमें रहती। कबीर साहब ने क्या अच्छा लिखा है:-

नीच-नीच सब तर गये, सन्त चरन लवलीन।
जाति के अभिमान से, बूड़े राकल कुलीन।।

तुम्हारे पत्र के उत्तर देने से पहले मैं संक्षेप में कुछ जीव व ब्रह्म के बारे में लिखना चाहता हूँ। किताबों में नहीं मालूम क्या लिखा हो। मेरी समझ में जो है, वह मैं लिख रहा हूँ। किताबों से जो कोई Tally (मिलान) करना चाहे, कर लेवें।

जीव को अपना जीवपन कब महसूस हुआ, जब उसने अपने बैठने का ठिकाना बना लिया; यह ब्रह्म था और है। उसमें इसलिये जीवपन पैदा हुआ, इसलिये कि उसकी बैठक ऐसी जगह थी, जहाँ कि उसको उसी की बू आ रही थी। इस बात ने और इस एहसास ने उसकी रंगवत और भी ज्यादा कर दी। इसलिए कि जब एक रंग का एहसास हुआ, दूसरा रंग वह खुद-ब-खुद ढूंढने लगा और उसमें अनेकता पैदा हो गई। फिर क्या था, लालच, मोह, हर चीज की ख्वाहिश उसमे पैदा होने लगी; गोया सोने का कौवा एक लोहे के पिंजरे में बन्द हो गया और इसका मोहताज कि उसकी सैरी के लिये, उसको दाना-पानी की जरूरत हुई।

कहाँ तक कहा जावे, यह सब जीवपने की बातें हैं। अगर उसको कोई ऐसा मिल गया कि जिसने उसको यह ख़्याल दिला दिया कि तुम असल हो तो उसके बाहरी पर्दे फिर टूटने लगे। अब हम चूंकि जीव हैं, इसलिये इसी ने अपनी ऊंची हालत की ख़बर दी, यानी ब्रह्म की। असल में यह दोनों एक हैं। अब मैं थोड़ी सी रोशनी बेपढ़ों की भाषा में फेंकता हूँ। जीव में चूंकि हरकत (Movement) मौजूद है, उसको ख़बर हरकत वाले की ही हो सकती है और वह किसकी? ब्रह्म की। ‘ब्रह्म’ शब्द ‘ब्र’ और मनन निकला है, जिसके मानें हरकत और सांचने के हैं। जो Function (क्रियायें) कि जीव के अपने छोटे शरीर में होते हैं, वह Function (फन्कशन) ब्रह्म के अपने बड़े शरीर में होते हैं। बंधन जीव में भी हैं, और ब्रह्म में भी। अन्तर केवल इतना है, कि जीव में बंधन ज्यादा और ठोसता लिये हुए है और ब्रह्म में सूक्ष्मता लिये हुए। मगर अपने-अपने लिहाज़ से Limitations (सीमायें) दोनों में हैं। वेद में 24 प्रकार के ब्रह्म लिखे हैं, या 26 हों इसको एक विद्वान सन्यासी ने मुझे बतलाया था और आखिरी ब्रह्म को भूमा कहते हैं। महात्माओं ने इससे ऊंची हालत को पार-ब्रह्म कहा है, मगर भाई, इस असल की न मालूम कितनी हालते होती चली गई हैं। जैसी संगत मिलती गई, वैसा ही असर उस पर आता गया।

हमारी उन्नति में जहाँ तक सिलमिलावट और तरकत मौजूद है वहाँ तक हम उसी तरह के ब्रह्म के बंधन में हैं और में तो भाई, इन सब हालतों को फंसाव ही कहूँगा। जहाँ हमारा ठिकाना है, वहाँ हवा क्या, रोशनी की भी गुजर नहीं। एक बुझे हुए दीपक की महफिल है, जहाँ न कोई चमत्कार है और न चंचलता, सब Light-Light (प्रकाश) पुकार रहे हैं और मैं भी यही कहता हूँ, क्योंकि रास्ते में यह सब चीजे आती हैं, मगर ठिकाने पर पहुँच कर यह सब खत्म हो जाती हैं। मैं समझता हूँ कि अगर हम Light (प्रकाश) ही को चाहते हैं, तो एक जुगनू, जो अपनी Light (लाइट) दूसरों को भी दिखा देता है और Proof (प्रमाण) देता है कि उसके पास Light (लाइट) मौजूद है, तो उसके महात्मा होने में कोई शक नहीं रहता। किसी ने खूब कहा है:-

“हम जहाँ हैं, वहाँ से हमको भी कुछ हमारी ख़बर नहीं आती।“

अब मैं तुम्हारी हालत के बारे मे लिखता हूँ। तुमने लिखा है कि “ब्रह्म भी खालिस नहीं है, उसमें कुछ न कुछ अवश्य है।“ इसका उत्तर मैं बहुत कुछ ऊपर दे चुका हूँ। फिर उसमें लिखा है कि “उसमें सुहानेपन की बू मौजूद है।“ जहाँ तक सुहानापन है, वहाँ तक असल ब्रह्म नहीं कह सकते, इसलिये कि बहुत कुछ माया का लेस-पोत सूक्ष्म हालत में मौजूद है। मुझे तो ऐसी सूनी महफिल में तुम सबको ले जाना है, जहाँ कि सूनापन भी हजारों गुना भारी है और वाक़ई Perfection (पूर्णता) जो कि मनुष्य के लिये सम्भव है, वही है। हमारे यहाँ इतनी खूबी जरूर है कि Perfection (परफेक्शन) सब चाहते हैं, मगर मेहनत और Devotion (भक्ति) के लिये उनको उनकी सुस्ती इजाजत नहीं देती। मान लो कि ईश्वर इतनी कृपा करे कि बिना मेहनत उनको यह हालत कहीं मिल जावे, तो नतीजा क्या होगा? कि मेरी शकल से बेजार हो जावेंगे, इसलिये कि इस हालत में मज़ा क्या बल्कि शुबह और गुमान तक नहीं। भाई, मज़े की हालत में अपने ऊपर अक्सर तारी कर लेता था, अब मौजूदा हालत जो कुछ है, बेमजे की है। उससे एक Second (सेकेण्ड) भी हटने को जी नहीं चाहता। सो लोग मज़े की हालत लेते हुए जब बेमज़े की हालत में पहुँचेंगे, तब उनका यह हाल हो सकता है, जैसा कि मेरा कि बेमजे की हालत से हटने को जी नहीं चाहता। अगर कोई मुझसे यह कहे कि तुम अपनी जान दे दो या मौजूदा हालत से अलग हो जाओ तो, जान की Sacrifice (बलि), मुझे दिल से कबूल होगी। अब यह नहीं कहा जा सकता कि वह हालत क्या है? शब्द नहीं, जुबान नहीं कि उसको बयान कर सकूं।

तुमने अपनी वर्तमान हालत को ब्रह्म-दर्शन की हालत लिखा है, वह इस लिहाज़ से तो सही है कि ब्रह्म की हालत सूक्ष्म से सूक्ष्म हर जगह होती चली गई है, मगर जो ब्रह्म का एहसास इस वक्त है, अर्थात ‘V’ (वी) स्थान पर उसमें अभी लय अवस्था पैदा नहीं हुई। हल्का-हल्का इशारा तो मैं करता जाता हूँ, ताकि हालत आहिस्ता खुले, इसलिये कि तुम बीमार हो और इस समय तन्दुरुस्त हो जाना ही तुम्हारा धर्म है। तुमने यह भी लिखा है कि “मेरा तो रूप ही ब्रह्म हो गया है” तो ब्रह्म रूप तो हो ही और यह सब कह सकते हैं, मगर तुम्हारे लिये मैं यह लिखता हूँ कि हिरण्यगर्भ की हालत से तुम बहुत ऊंची निकल चुकी हो। Purity (शुद्धता) तो जिस जगह पर तुम हो, अधिक है। मैं इस हालत को भी बंधन की हालत कहता हूँ। जब Purity (शुद्धता) और Impurity (अशुद्धता) दोनों का एहसास ख़त्म हो जावे, तब Reality (वास्तविकता) की शुरूआत समझना चाहिये और उसके आगे अनगिनत Stages (दशायें) हैं, जो गिनने में नहीं आती। मगर यह याद रहे कि Purity (प्योरिटी) और Impurity (इम्प्योरिटी) मिटने का ख्याल मत बाँधना, कुदरती तौर पर जो हालत आती जावे, उसको एहसास करती चलो; रफ्ता रफ्ता वह हालत भी ईश्वर देंगे। तुमने यह भी लिखा है कि “अहं ब्रह्मास्मि की दशा है।“ यह सही हो सकता है, मगर बिटिया, यह हालत हर पर्दे पर और हर स्थान पर महसूस होती है। जितनी ऊंची हालत होती जाती है, उतने अच्छे रूप में यह दिखलाई देती है। इसको मैं क्या लिखूं? मेरी मानेगा कौन? वेदान्ती तो यही कहेंगे, अगर मैं जुबान खोलूं कि यह गलत कहता है, और वेद-वाक्य के सम्भव है कि यह खिलाफ पड़े। जब हमको अहं ब्रह्मास्मि का भास होता है, तो यह आवश्यक है कि किसी चीज़ से हम उसको Differentiate (भेद करना) कर लेते हैं, गोया कोई चीज़ अभी ज़रूर ऐसी है जो Difference (भेद) का एहसास दिला रही है। यह तो रही Philosophy (दर्शन) और समझाने की बात। असलियत वहाँ है, जहाँ यह Difference (भेद) ख़त्म हो जाये और फिर न अहं ब्रह्मास्मि का एहसास रहे और न इसके विरूद्ध ! अब भी भाई, कहने को तो perfection (पूर्ण) हो गया, मगर नहीं मालूम, अभी क्या-क्या बाकी है। मैं तो यही कहूँगा कि यहाँ पहुँचने पर भी दिल्ली दूर रह जाती है। अब बिटिया, बताओ मैं क्या लिखूं? इसके आगे भी कुछ न कुछ ज़रूर लिखा जा सकता है मगर कौन समझेगा और कौन मानेगा। ख़ैर, एक बात मैं इससे आगे की भी लिखे देता हूँ। वह यह है कि वहाँ पहुँचने पर सूक्ष्मता बिल्कुल ख़त्म हो जाती है, मगर बहुत बढ़ने के बाद। बस इससे आगे Expression (अभिव्यक्ति) के लिये शब्द नहीं मिलते। इतना मैं और कहे देता हूं कि इस हालत पर पहुँचने के बाद भूमा के करीब पहुँचने के लिये हजारों वर्ष भी कम हैं। बल्कि उस दशा पर (जहाँ की सूक्ष्मता ख़त्म होती है) जाने के लिये हजारों वर्ष चाहिये और फिर नहीं मालूम कितनी हज़ार सीढ़ियाँ भूमा के निकट पहुँचने में लगेंगी। मैं तो यही समझता हूँ कि इन हालतों को पार कराने की शक्ति सिवाय हमारे गुरू महाराज के किसी में पाई नहीं जाती और यह ईज़ाद ‘आप’ ही की है कि जिस्म रखते हुए यह Stages (दशायें) पार कराई जा सकती हैं।

कहाँ तक धन्यवाद ऐसी बुजुर्ग हस्ती को दिया जाये कि जिसने बज़रिये Transmission (प्राणाहुति) एक Second (सेकेन्ड) में उस आखिरी हालत पर पहुँचाना मुमकिन बना दिया। हम लोग वाकई अंधे हैं जो ऐसी बुजुर्ग हस्ती की तरफ नहीं देखते, जिसने वह काम कर दिखाया, जिसके लिये Spiritual History (आध्यात्मिक-इतिहास) ख़ामोश है। ईश्वर करे हम सबको यह हालत नसीब हो। यह important (महत्वपूर्ण) पत्र है। जब लखीमपुर जाओ, तब इसको लेती जाना, ताकि मास्टर साहब की File (फाइल) में लग जाये।

शुभचितंक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-351
कानपुर
3/11/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा पत्र पहुंचा होगा। न जाने क्यों, करीब 5-6 दिन हुए, अचानक तोपों की गड़गड़ाहट सुनाई पड़ने लगी। आग और हाय-हाय तो जो हो रही है, ‘मालिक’ की कृपा से सामने थी ही। केसर से मालूम हुआ कि ‘आपका’ इलाज एक यूनानी वैद्य कर रहे हैं, कृपया लिखियेगा कि लाभ है या नहीं। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

  भाई, अब तो यह दशा है और दशा क्या है, दशा तो बहुत भारी चीज़ है, अब तो वह ऐसी है कि उसे केवल अनुभूति ( एहसास) मात्र कह सकते हैं, क्यों कि जब हालत को एहसास करने की कोशिश करती हूँ या एहसास करती हूँ तो इतना हल्का डूबना पड़ता है, और जितना डूबती हूँ, वह कम ही मालूम पड़ता है। वैसे स्वयं चाहे डूबी रहूँ। यदि हालत एहसास करने की natural condition में रहती हूँ तो भी इस condition में बिना डुवे या गहरे पैठे बिना शुद्ध, साफ़ बिलकुल साफ (clear) हालत ही एहसास में आती और एहसास करूँ भी क्या इन सब हालतों के पीछे एक न जाने कैसा श्रोत बह रहा है, उसी में डूबती, उतरती हूँ। उस श्रोत में अब कुछ ऐसी दशा है कि आनन्द का मूल्य न जाने क्यों जाता रहा। अब तो कुछ ऐसी भीनी सी अनुभूति है, जिसमें आनन्द के लिये ठौर ही नहीं रह गई हैं। परन्तु भीतर कुछ ऐसा रहता है कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि यदि कुछ छलक पड़े तो हृदय को बर्दाश्त के बाहर हो जावे और वह फट जावे, किन्तु ‘मालिक’ की कृपा की बन्दिश ऐसा होने ही नहीं देती। न जाने क्यों कल से तबियत उदास बेहद है। अकसर रुलाई आने लगती है। दशा बिल्कुल शून्य और सूनी सी लगती है, उजाड़ और बेरौनक।

  कृपा-पत्र लिफ़ाफ़ा ‘आपका’ अभी मिला - पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता एवं सन्तोष हुआ। आपका आर्शीवाद और कृपा ही मेरा जीवन है और जीवन ‘आपके’ ही लिये है। ‘मालिक’ की कृपा से सब ठीक हो रहा है, बिल्कुल भी चिन्ता ‘आप’ न करें। वृक्ष और जीव के विषय में जैसा ‘आपने’ समझाया है, वैसा सम्भव है कहीं कभी न समझाया गया हो। ज्ञानयोग में स्वामी विवेकानन्द जी ने भी बहुत अच्छा समझाया है, परन्तु क्षमा करियेगा, सम्भव है, ऐसा वे भी न समझा सके हों। भाई, कोई यह कह ले तो कह ले कि ‘आपका’ समझाया हुआ मेरी समझ में आता ही अधिक है। श्री बाबूजी, स्वर्ण युग बीत रहा है, परन्तु हमारी नींद नहीं टूटती। लखीमपुर में भी सत्संग में शौक नहीं के बराबर है, शुक्ला जी को समय जैसा ‘आपने’ लिखा है, सचमुच कम है। मैं ही अब न जाने क्यों चाहते हुए भी शीघ्रता नहीं कर पाती। ‘आप’ कुकरा जा रहें हैं, उन सब का बड़ा सौभाग्य है। ‘आप’ मेरी हारी बीमारी की परवाह न करें, मुझे तो ‘मालिक’ में मर मिटना है, यही ध्येय है। मेरे लिये तो जीवन-मृत्यु बराबर हैं, क्यों कि जिन्दगी ही जिन्दगी है। परन्तु मैं तो सेविका हूँ और सदैव ‘मालिक’ की ऋणी हूँ।

  सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-352
कानपुर
10/11/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

लिफाफा ‘आपका’ मिल गया-पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। ‘आपकी’ तबियत अब यूनानी वैद्य के इलाज से कैसी है।

(मेरे कल 30 इंजेक्शन लगेंगे। अक्सर मेरी तबियत बहुत ऊब जाती है। शायद लेटे रहने की वजह से, यद्यपि मैं थोड़ा बहुत तो चलती ही हूँ)

‘आप’ कुकरा गये थे या नहीं। ‘आप’ कुकरा गये होंगे तो शायद लखीमपुर भी गये होंगे। मैं यही सोचकर और केवल इसी खुशी में सारी बीमारी खुशी-खुशी झेले जा रही हूँ कि जब मैं यहाँ से लखीमपुर जाऊंगी तो अपने ‘श्री बाबूजी’ के पास शाहजहाँपुर जाऊंगी। वैसे तो भाई, आजकल के जमाने और स्थिति में सच में मैं अपने परिवार में श्राप रूप आई हूँ, परन्तु ईश्वर की यह कृपा ज़रूर है, कि वह किसी न किसी ज़रिये काम तो बनाता ही है। मैंने यह बेकार ही लिख दिया है, ‘आप’ बिल्कुल ध्यान न दीजियेगा। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी मेरी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ यह दशा है कि जैसे पहले मैंने लिखा था कि ब्रह्म में सुहानेपन की बू है, परन्तु अब देखती हूँ कि उस दशा में ज्यों घुस रही हूँ, वह बू समाप्त होती जा रही है। अब कुछ ऐसी दशा लगती है कि ‘मालिक’ ने प्रकृति में मुझे ऐसा घोल दिया है कि बिल्कुल उसी condition में, और कुछ यह भी है कि प्रकृति का हर movement मानो मेरी ही निगाह से होता है, किन्तु ‘मालिक’ ने उस ओर से मानो मेरी आँखे मूंद दी हों, मुझे कुछ मतलब नहीं, परन्तु मैं तो इसके अतिरिक्त बहुत दूर अपने ‘मालिक’ के पास पहुँच चुकी हूँ। सम्भव है इस दशा को clear साफ़-साफ़ न लिख पाई हूँ। अब तो ऐसा लगता है कि हल्कापन भी यदि मैं कहूँ कि समाप्त हो चुका है, तो बिल्कुल ठीक है। अब तो दशा भी कुदरती ही होती है। मेरे श्री बाबूजी कुछ ऐसी दशा है मानो जीव को अपने वतन की खुशबू मिलने लगी है और ऐसा लगता है कि जिस कारण से जीव ‘जीव’ हुआ वह चीज़ 'मालिक' की कृपा से अदृश्य होती जाती है और वह अपना स्वरूप पाने लगा है। अब तो कुछ यह हाल है कि पहले जैसे मैंने लिखा था कि खुद को अपनी महक मिलने लगी है और अब तो उस महक में महब होने लगी हूँ। कुछ ऐसा लगता है कि हर तार उसी Condition से तारी हो चुका है और अपनी तो कहने मात्र को है। हर तार-तार ‘मालिक’ के heart में लय सा हो चुका है। मेरे ‘मालिक’ यही थोड़ा सा हाल मेरा है। ज्ञानयोग में अधिकतर बातें जो ‘आपकी’ ही बातों से एक-एक शब्द मिलता है। धर्म वगैरह के बारे में बातें बिल्कुल मिलती हैं। अक्सर मुझे इस बात का ध्यान आ जाता है कि हमारे सत्संगी भाई बहिनों को कभी इतनी फुर्सत मिलेगी कि वे ज़रा आंखें खोल कर अपने सर्वस्व को देखने की कोशिश करेंगे। मुझे तो सब फुर्सत ही फुर्सत में दीखते हैं। हाँ Time की कीमत हम नहीं समझते। फूलो जिज्जी तथा केसर ‘आपको’ प्रणाम कहती है। इति:-

  सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-353
कानपुर
21/11/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा पत्र अबकी से ‘आपका’ कई दिनों से नहीं आ रहा है, सो क्या बात है। कृपया अपनी तबियत का हाल शीघ्र दीजियेगा। बीमारी रुपये में चार आना भर रह गई है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

  भाई, अब तो ऐसा लगता है कि अंतर के कण-कण छितर कर बिखर गये हैं और एक समानान्तर condition लिये हुए और condition क्या, एक अजीब सा अनुभव-मात्र है। कुछ ऐसी दशा है कि ये कण-कण माया से रहित हैं। शुद्धता या अशुद्धता हो तो मैं कुछ नहीं जानती। श्री बाबूजी, न जाने क्यों अनुभव ही समाप्त हो गया है। कुछ यह हाल है कि ऐसा लगता है कि हर कण बिखरे से हैं, ऐसा मालूम पड़ता है कि हर कण में एक अजीब निश्छल सी या शब्द से परे ऐसी कैफियत मौजूद हैं। ‘मालिक’ की कृपा से एहसास तो मुझे अवश्य होता है, किन्तु लिखने से परे है। यह अवश्य है कि वे कण आईना समझ लीजिए।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ यदि मैं यह लिखूं कि ऐसा लगता है कि प्रत्येक कण में एक अजीब दुनियाँ की झलक है। न जाने क्यों, भाई, ऐसा लगता है कि एक-एक कण को यदि जोड़ा जावे तो पूरा ब्रह्माण्ड तैयार हो जावे, या भाई, ऐसा लगता है, मेरे रोम-रोम में से एक-एक दुनियाँ तैयार हो सकती है। यद्यपि दशा यह है कि किसी प्रकार की शक्ति या क्या लिखूं, इसका तो गुमान तक नहीं है। यदि यह लिखूं कि यहाँ पर Force नाम की चीज़ सो चुकी है, नहीं, नहीं, मर चुकी है तो ठीक होगा। होश भी मर चुका है। पवित्रता यदि है तो ऐसी कि जिसकी, जैसे जान खिच चुकी हो। सब सौदा ही सौदा है। बिना चीज़ का सौदा है, सम्भव है, इसलिये ‘श्री बाबूजी’ खरीददार मुश्किल से मिलता है। फिर आजकल यदि खरीददार हिम्मत भी बाँधे तो वहाँ ले जाने वाला नहीं मिलता, परन्तु मुझे तो मिल गया और ऐसा मिला कि जो ले भी जा रहा है और हिम्मत भी देता है। परन्तु अभी यह कुछ नहीं, मुझे तो ऐसा लगता है कि अभी तो न जाने क्या प्रदान करने को ‘मालिक’ मुझे पात्र ही बना रहा है। बस ‘उससे’ यही प्रार्थना है कि ईश्वर कभी ऐसा दिन लाये कि पात्र बनकर तैयार हो जावे और होगा तो ऐसा ही, बस देर-सबेर की बात है। जरा सी कमजोरी है कि पत्र ‘आपको’ शीघ्र नहीं डाल पाती हूँ। मेरी यह समझ में आ गया कि मनुष्य केवल मनुष्य नहीं, बल्कि जाने क्या-क्या होता जाता है। मुझे ऐसा लगता है कि ब्रह्म भी मानों मेरे लिये घिसता जाता है, नहीं, नहीं, बल्कि ‘मालिक’ ही मुझे जाने क्या काट -छाँट कर बना रहा है। ऐसा ले जा रहा है कि जहाँ अब मुझे न जीव का एहसास है और न ब्रह्म का गुमान, यही कुछ दशा है।

  शुक्लाजी से न जाने क्यों बहुत आशा बंधती है। उन्हें Time मिले या न मिले उनके अन्दर कोई ऐसी चीज़ है, जिससे मिशन को अवश्य सहायता मिलेगी। जजी का क्या हुआ, उन्हें मिली या नहीं मिली। फूलो जिज्जी तथा केसर ‘आपको’ प्रणाम कहतीं हैं। इतिः-

  सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-354
शाहजहाँपुर
22/11/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारा व केसर का मिल गया। मैं दीवाली में कुकरा रहा, लखीमपुर न जा सका। चौबेजी, मास्टर साहब और कई लोग वहीं आ गये थे। अंग्रेज़ी किताब का proof इलाहाबाद से आ रहा है, इसलिये बिल्कुल फुर्सत नहीं है। खत पहुंचने की इत्तिला दे दी। वैसे उस खत का जवाब यदि लिखाया जाय, तो बहुत लम्बा-चौड़ा हो जावेगा। तुम्हें भी इस वक्त सब काम छोड़कर सिर्फ तन्दुरुस्ती बढ़ाने की फ़िक्र करनी चाहिये। चौबे जी ने भी मुझसे कहा था कि वह लखीमपुर तुम्हें साथ लेकर शाहजहाँपुर ठहरते हुए जावेंगे। बड़ा अच्छा है, तुम आ जाओ। मैं अपना इलाज एक हकीम का कर रहा हूँ, और उससे कुछ फ़ायदा भी है। तुमने अपनी उन्नति, सच पूछो तो खुद ही की है। थोड़ी बहुत मदद मैं ज़रूर देता गया और देता रहूँगा। इसलिये कि अगर मुझमें काब्लियत होती तो जितने सत्संगी है, सब तरक्की खूब कर गये होते। ईश्वर तुम्हें जल्द तन्दुरुस्त कर दे। केसर, फूलो व उनके बच्चों को दुआ।

  शुभचिंतक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-355
कानपुर
27/11/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-कार्ड ‘आपका’ मिला-समाचार मालूम हुआ। अंग्रेज़ी किताब के proof के कारण ‘आपको’ फुर्सत नहीं मिलती, तो न सही, बस ‘आपका’ कार्ड भर मिलता रहे, बस मैं खुश हूँ। मेरे आने का कोई निश्चित नहीं, क्योंकि Injections की कोई Limit नहीं है। फिर बिजली वग़ैरह का देखा जायेगा। ‘आप’ बिल्कुल चिन्ता न करें। बड़ा अच्छा हुआ कि अंग्रेज़ी किताब छपने लगी। ‘आपको’ हक़ीम की दवा से लाभ पढ़कर सब को बहुत प्रसन्नता हुई। ईश्वर करे ‘आपको’ यह दमे की तकलीफ़ कभी न होवे। मेरी तो सारी आत्मिक-उन्नति के एकमात्र कारण ‘आप’ ही हो। मेरी सी झींझरी, टूटी-फूटी नैया को केवल ‘आप’ ही ऐसे हैं, जिन्होंने कृपा कर पार लगा देना मंजूर कर लिया। केवल ‘आप’ ही हैं, जिन्होंने अपने क़दमों में लेकर मुझे निर्द्वन्द कर दिया। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

  कुछ ऐसा लगता है कि अंतर भी टूट-फूट कर बिखर गया है। कुछ ऐसा हो गया है कि बिखरे हुए ज़रें-ज़र्रे में ‘मालिक’ को ही पाती हूँ। मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ ऐसी दशा हो गई है कि ऐसा लगता है कि अब ऐसे मैदान में बढ़ती जाती हूँ कि जहाँ पर वाइब्रेशन होते हुए भी हरकत महीन पड़ते-पड़ते समाप्त हुई जाती है। अब तो कुछ ऐसा लगता है कि मेरे लिये मानों प्रकृति ही शान्त हो चुकी है। या यों कह लीजिये कि ज़र्रा-ज़र्रा, कण-कण में मानों हरक़त लगभग शान्त पड़ चुकी है। कुछ ऐसी दशा है कि ऐसा लगता है कि समस्त विश्व या प्रकृति के कण-कण में मैं व्याप्त हो चुकी हूँ और इस ‘मैं’-के बारे में मैं क्या लिखूं, हाँ इतना कहूँगी कि माया से रहित बेदम हो चुका है। मेरा रोआँ-रोआँ ज़र्रा- ज़र्रा ऐसा लगता है कि बिखर गया, छिन्न-भिन्न हो गया है और माया से रहित हो चुका है। सब हरक़त शान्त हो चुकी है। सेवक और स्वामित्व भाव विदा हो चुके हैं। भाई, ऐसा लगता है कि आन्तरिक दृष्टि की भी दृष्टि समाप्त हो चुकी है। अब तो ऐसा लगता है कि सारे रंग व रूप समाप्त हो चुके हैं। मैं तो कोरी की कोरी ही होती चली जाती हूँ।

  केसर को फुर्सत नहीं मिलती, वह आपको प्रणाम कहती है और कहती है कि मैं तो कुछ कर नहीं पाती हूँ, ‘आप’ कृपया मुझ पर कृपा बनाये रखियेगा। फूलो जिज्जी ‘आपको’ प्रणाम कहती हैं। इति:-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
  सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-356
कानपुर
5/12/1953
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है, मेरा पत्र मिला होगा। मुझे ऐसा लगता है कि ईश्वर ने इस बीमारी के द्वारा मेरे अन्तर की सफ़ाई कर दी है। ताकि मैं ‘उसे’ अन्तर में और अधिक बैठा सकूँ। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

  अब तो ऐसा लगता है कि कुछ ऐसी दशा मुझमें फ़ना हो रही है, जो न ऐसी कही जा सकती है और न वैसी। मुझे लगता है कि प्रकृति भी मेरे लिये लय हुई जा रही है, या मिटती चली जा रही है। अब ऐसी जगह है, जहाँ पर कि हर तरफ़, हर चीज़ मौन है। ऐसा लगता है कि मैदान क्या है, श्मशान-भूमि है। आशा है, आप स्वस्थ होंगे।

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-357
शाहजहाँपुर
7/12/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारा मिला। तुमने अपने खत में मर-मिटने का अक्सर ज़िक्र किया है। मर-मिटने के यह मानी नहीं हैं कि जिस्म छोड़ने की कोशिश की जाय, जिसका तन्दुरुस्त रखना भी अपना धर्म है, बल्कि इसके मतलब यह है कि अपना आपा या शुद्ध और भद्दे अहंकार को दूर कर दे और जब आपा जाता रहे, तो इन्सान वही रह जाता है, जो वाकई है और इसी की कोशिश में तमाम महात्मा लगे रहते हैं। अब मर-मिटने के मानी तुम समझ गई होगी। इस वक्त तुम्हें तन्दुरुस्त बनने की ही कोशिश करना चाहिये। एक मर्तबा तन्दुरुस्ती बन गई तो सोचो तो सही कि यह अभ्यास और मिशन के काम में कितना काम देगी। तुम ख्याल बाँधो कि तुम्हारी सब बीमारियाँ जा रहीं हैं और तुम तन्दुरुस्त हो रही हो। इससे सेहत बहुत जल्द होगी।

शुभचिंतक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-358
कानपुर
11/12/1953
परम पूज्य एवं श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है, मेरा पत्र मिला होगा। आजकल आध्यात्मिक- दशा तो ‘मालिक’ की कृपा से मध्यम सी पड़ गई है। या तो शायद यह है कि पाइंट (Point) बदलने की दशा है। किताब का Proof (प्रूफ) आता होगा। किताब कैसी छप रही है। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं।

सदैव केवल ‘आपको’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-359
शाहजहाँपुर
14/12/1953
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा ता 5.12.53 का खत मिल गया। जिस्म का तन्दुरुस्त रखना भी हर एक का धर्म है। जब जिस्म तन्दुरुस्त होता है तो उसी लिहाज से सूक्ष्म शरीर भी तन्दुरुस्त बनता है और दिमाग़ सोच-विचार के लिये बहुत अच्छा काम करता है। पिछले खत में मैंने यह लिखा था कि मर मिटने के मानी यह है कि अपना आपा या अहंकार न रहे। इसके यह मानी नहीं कि जिस्म की परवाह छोड़ दी जाय और वह कमज़ोर होकर जल्द खत्म हो जाये। इसी आपा को मेटने के लिये लोग बड़ी मेहनत करते हैं और हमारे यहाँ बहुत सहज में मिट सकता है और उसकी तरकीब वही है जो तुमने की है। वैसे और भी तरकीबें हैं, मगर वह ज़रा मुश्किल हैं। चूंकि लोगों को इसका शौक नहीं, इसलिये कौन करे और हर एक को यह चीज़ बताई भी नहीं जा सकती, जब तक कि पूरा Faith (विश्वास) न हो जाये और बतायें भी तो करता कौन है। सिखाने वाले को इसमें बहुत कुछ अहंकार रहित ज़रूर होना चाहिये, वरना तरकीब अच्छा काम नहीं देगी। मेरी फ़िक्र न करो, मेरी मौत अभी नहीं है। किताब का Proof आ रहा है।

  शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-360
कानपुर
14/12/1953
परम पूज्य एवं श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आज कृपा-कार्ड ‘आपका’ ता 7.12.53 का लिखा हुआ मिला-पढ़ कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से Energy दिन-दिन बढ़ रही है। मैं ‘आपके’ परिश्रम को बेकार नहीं जाने दूंगी, चाहे कुछ भी हो। आपकी कृपा को Receive करना ही मेरी पूजा है। मर मिटने का मतलब जो ‘आपने’ लिखा है, बहुत अच्छा है, परन्तु इसमें ‘मालिक’ की कृपा से मैं गलती पर नहीं थी। मेरे बाबूजी, मिशन मेरा है, मेरा रोआँ- रोआँ इसकी सेवा करेगा, क्योंकि यह मेरी Duty है और फिर ‘मालिक’ को पूर्णतया प्राप्त करना है, अतः तन्दुरुस्ती बनानी है, इसमें सन्देह नहीं। अभ्यास को भी बीमारी से नुकसान पहुंचता ही है, परन्तु ‘आप’ से मेरी प्रार्थना है कि ‘आप’ अधिक परिश्रम व फ़िक्र न करें, क्योंकि स्वयं आपका भी शरीर कमज़ोर है।

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्त
सेविका कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-361
लखीमपुर
27/12/1953
ओ मेरे श्री बाबूजी साहब, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

मेरा पत्र मिला होगा। मास्टर साहब जी भी पहुंच गये होंगे। आशा है ‘आप’ स्वस्थ होंगे। आज दिनभर तो कान ‘पंडितजी’ ऐसी आवाज़ सुनने को सत्याग्रह कर-कर बैठते थे। पैर पुनः पुनः दफ़्तर तक दौड़ जाने को मचल उठते थे। हाथ स्वतः ही आपस में जुड़कर मानों अपनी एकता की दुहाई दे रहे थे। परम सौम्य तथा सुमधुर चेहरे के दर्शन को आँखे लालायित थीं, पलक-पाँवड़े बिछाकर अपने ‘इष्ट’ के स्वागत में विलीन थीं। परन्तु अब रात हो चुकी और ‘आपके’ आने का समय निकल चुका, इस लिये पत्र लिख रही हूँ। खैर, मुझे लगता है कि Proof और कमज़ोरी की दशा के कारण शायद ‘आप’ नहीं आ सके। खैर, मुझे यह विश्वास है कि ‘आप’ जहाँ भी हैं, मेरे हैं, और रहेंगे। और अब तो बस बसंत पास ही आ गया है, तब तो अवश्य ही ‘आपके’ दर्शन होंगे।

  मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब तो यह हाल है कि भूल की अवस्था का ही सब ओर निवास। कुछ यह दशा हो गई कि दशा में सुहानेपन की बू भी नहीं रह गई है। न उदासी है, न कुछ ऐसा लगता है कि दशा सूनेपन में खोती सी चली गई है। होशी, बेहोशी जैसी दशा आती रहती है और होशी, बेहोशी क्या कुछ तबियत कहीं गोते लगाती रहती है, परन्तु पाती कुछ नहीं। अब तो कुछ ऐसी दशा है कि हृदय में कुछ लिखा ही नहीं, तो पढूं क्या। मेरे ‘श्री बाबूजी’ कहीं लगाव की डोरी में कमी तो, ढीलापन तो नहीं आ रहा है, यद्यपि इस मन से ऐसी रंचमात्र भी आशा नहीं है और फिर मन का तो यह स्वयं ही न जाने क्या हाल हो गया है कि देखती हूँ कि मन सब जगह है, और कहीं नहीं है, इस लिये कहीं नहीं है। परन्तु सम्भव है, कहीं आह दबी रह गई और यह वही (मन) हो। कुछ ऐसी दशा है कि रूप है नहीं, और रंग भी धुल चुका है। भाई, अब तो ऐसी दशा है कि जैसे बुझते हुए दीपक की लौ कभी स्वतः ही तेज़ और फिर मद्धिम पड़ जाती है। सम्भालना ‘आप’ ही को है मैं तो जैसी हूँ, सामने हाज़िर हूँ। मेरी तो यह दशा है कि जैसे न बिगड़ी हूँ, न बनी हूँ।

  तबियत का हाल इसलिये नहीं दिया कि ठीक ही है और ताऊ जी बता ही देंगे। परन्तु अब ताऊ जी नहीं आ रहे हैं। अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद तथा केसर, बिट्टो और लल्लू प्रणाम कहते हैं। इति:-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
  सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-362
लखीमपुर
3/1/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आज मास्टर साहब जी से ‘आपकी’ तबियत का हाल सुनकर सन्तोष हुआ। मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। भाई मेरे ‘श्री बाबूजी’ मुझसे अब धीरे-धीरे की उन्नति सहन नहीं होती, और अपना हाथ अधिक काम नहीं देता, इसलिये ऐ मेरे मेहरबान ‘मालिक’ ! अब पहले की तरह या उचित समझें तो कुछ और भी हाथ खोल दीजिये। मेरा जी ऊब-ऊब उठता है, धीरे-धीरे चलने से। केवल दबने से या वैसे भी केवल पेट की नसों में दुःखन ही होती है, वह धीरे-धीरे ठीक हो जावेगी, ‘आप’ चिन्ता न करें, और एक प्रार्थना मेरी यह भी है कि Working (कार्य) मैंने अपना पहले की तरह शुरू कर दिया है। मुझे जरा भी तकलीफ़ नहीं होती। ‘मालिक’ की कृपा से मेरी जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

  भाई अब तो कुछ यह दशा है कि ऐसा लगता है कि अब जहाँ भी मैं हूँ, वहाँ साँस की भी गुजर नहीं है। अन्तर-बाहर समाप्त हो चुके हैं। सूक्ष्मता ओझल सी होती जाती है। सूक्ष्मता भी गल चुकी है। साँस की गुज़र नहीं है, परन्तु फिर भी ज़िन्दगी कुछ ज़रूर है। हाँ, यह बात ज़रूर है कि दीपक का तेल समाप्त होता आता है। कुछ ऐसा लगता है कि सूक्ष्मता भी गल कर भिदती जा रही है। सूक्ष्मता भी पानी हो चुकी है और मुझमें सोखती चली जा रही है और मेरा क्या हाल है कि ‘मालिक’ की नस-नस में भिद चुकी हूँ, मुझे ऐसा ही लगता है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब सूक्ष्मता लिखती ज़रूर हूँ, परन्तु अब तो यह है कि न कहने में, न सुनने में, और न अनुभव में ही उसकी कैफियत, उसका Weight (वजन) निगाह में आता है। ऊपर जो मैंने ज़िन्दगी लिखी है वह ज़िन्दगी भी ज़िन्दगी नही है, बल्कि वह ‘मालिक’ की तरफ़ से बख्शी हुई ज़िन्दगी है, जो मुझे आगे बढ़ायेगी। भाई, ऐसा लगता है कि मेरा सूक्ष्म-रूप ‘मालिक’ में भिद चुका है। न जाने क्या दशा है कि हाथ पर हाथ रखे बैठी हूँ परन्तु Touching (स्पर्श) के एहसास से दूर और अछूती ही बनी रहती हूँ और बेहोशी सी भी दशा नहीं रहती है। यही दशा सूक्ष्म-रूप की हो चुकी है कि अपने सूक्ष्म - रूप से अछूती ही रहती है और इसके आगे या भीतर कह लीजिये, अब घुस रही हूँ या ‘मालिक’ स्वयं भिदता या घुसता चला जा रहा है। पहले जैसे मैं ‘मालिक’ से हर समय अन्तर से Touch में रहती थी, परन्तु अब न जाने कैसे Touching (स्पर्श) एहसास से मैं अछूती ही रहती हूँ, मेरे अनुभव में वही सिहरन की अनुभूति नहीं आती, बल्कि जो कुछ भी है जैसे भी है, केवल ‘मालिक’ ही है। नहीं, नहीं बीच में से Touching हटकर वह और एक और अंतस में भिद रहा है। अब तो ऐसा लगता है कि भीतर की इन्द्रियों में से भी Touching की अनुभूति निकाल कर साफ़ हो चुकी है। बे Touching की ‘मालिक’ की कृपा से दशा आज से ठीक चल निकली लगती है। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इति:-

  सदैव केवल ‘मालिक’ की ही अनुग्रह कांक्षिणी
  सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-363
लखीमपुर
5/1/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

एक पत्र लिख चुकी हूँ। एक बात यह लिखने को भूल गई थी कि एक चतुर्वेदी लखनऊ में हैं, उनका बड़ा लड़का या कोई और है, वह बहुत पागल हो गया है, सो उन्होंने यहाँ ताऊजी को लिखा था उसे लाने को और ‘आपके’ पास ले जाने को, परन्तु ताऊ जी ने उन्हें मना लिख दिया था, तो उन्होंने अभी छोटे चाचा लखनऊ आये थे, उनसे ‘आपका’ पता लिख लिया है, सो शायद वे उसे आपके पास लावें, परन्तु अम्मा तथा हम सब का यही कहना है कि ‘आपकी’ Health (सेहत) बहुत वैसे ही कमज़ोर है, इसलिये ‘आप’ केस को हाथ में न लें। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

  भाई, मुझमें देखते ही देखते पागलपन, बावलापन, जो लिखा करती थी, नहीं रहा, समाप्त ही हो गया। कुछ ऐसी दशा है कि वह तो शून्यता की दशा से भी अछूती सी हो गई है। या यों कह लीजिये कि ख्याल या अनुभव Touching Less (स्पर्श विहीन) हो गया है। हाँ Vacuum (खालीपन) की Condition का असर ‘मालिक’ देता जा रहा है। भाई, मैं क्या हूँ केवल Vacuum जिसमें इस अनुभव को भी Touching नहीं है। न कोई, कैसी भी हवा ही इस दशा को छू पाती है। आध्यात्मिक हवा से भी रहित है और ‘मालिक’ की कृपा से ऐसा लगता है कि अब इसी में भिदती चली जा रही हूँ और भिदती भी क्या, जब कि केवल Vacuum ही Vacuum है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ Condition क्या है, ऐसा लगता है कि मानों ‘मालिक’ ने चीज़ को Vacuum करके रख दिया है मेरे ‘मालिक’ ने जाने कैसे Vacuumise कर दिया। अब ‘वह’ चाहे जो करे, जैसी मर्ज़ी हो करे।

  आज शुक्लाजी आये हुए हैं, अभी यहाँ तो नहीं आये, परन्तु उनमें प्रेम के कारण आकर्षण अधिक मालूम पड़ रहा है। लय-अवस्था भी अच्छी मालूम पड़ती है। मेरा अब कुछ यह हाल है कि शून्यता थी, परन्तु अब तो किसी की गुज़र नहीं है। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा केसर बिट्टो प्रणाम कहती हैं। अम्मा के दिमाग़ में कमज़ोरी है, कुछ खुश्की है, इसलिये कभी-कभी चक्कर सा आ जाता है, चिन्ता की बात नहीं है। ईश्वर की कृपा से सब ठीक हो जायेगा। इति :-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-364
लखीमपुर
10/1/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

‘आपका’ कृपा-कार्ड पूज्य मास्टर साहब जी के लिये आया-समाचार मालूम हुए (अम्मा आज से जो ‘आपने’ उन्हें खाना खाने के बाद बताया है, सो खायेंगीं। दादी शायद कल गई होंगी)। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा चल रही है, सो लिख रही हूँ।

  अब तो भाई यह दशा है कि यदि ‘मालिक’ को अपने में भिदा हुआ या ‘मालिक’ को अपने में भिदा हुआ पाने वाली दशा को लाऊं, तो भी Condition (दशा) में न जाने क्यों न तो सुहावनापन ही आता है और न कुछ और ही एहसास होता है, बस जैसी है, बस वैसी ही Untouching (स्पर्श विहीन) दशा ही रहती है। ब्रह्म वाली दशा से भी दूर और अछूती सी मेरी दशा चल रही है।

  मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ ऐसी दशा है मेरी कि ऐसा लगता है कि ईश्वरीय-धारा तक मुझे छू नहीं पाती, मुझमें घुस ही नहीं पाती, या घुसती ही नहीं। यही हाल न जाने क्यों मेरे लिये ‘मालिक’ का हो गया है, कि यदि मैं ‘मालिक’ का ध्यान करती हूँ, तो भी ऐसा लगता है कि मैं उसे स्पर्श तक नहीं कर पाती हूँ। वह मुझे न जाने क्यों स्पर्श नहीं होता है। सम्भव है इसलिये सुहानापन जाता रहा। अब ‘मालिक’ ही जाने।

  मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ ऐसी दशा है कि ‘मालिक’ की नस-नस में भिदी होने पर भी मैं ‘उसकी’ स्पर्श की Feeling से अलग ही, अपने को अछूती सी ही पाती हूँ। एक कुछ यह भी है कि ‘मालिक’ ने मुझे Vacuumise (खाली) करके रख दिया है, उसी तरह ‘मालिक’ भी मुझे बिल्कुल Vacuumise ही हरदम लगता है। शक्ल ध्यान करूँ तो उसमें भी कुछ नहीं, बिल्कुल खाली, सफ़ा सी अनुभव होती है। सम्भव है इसी कारण मेरा पहले का एहसास कि ‘मालिक’ स्वतंत्र होते हुए भी बन्धन में आ गया है स्वप्न के समान समाप्त हो गया है। ऐसा लगता है कि Heart (हृदय) बन्धन-रहित है, इस लिये Vacuumise ही एहसास कर पाती हूँ। यही नहीं, बाहर-भीतर यही Condition समान रूप से हो रही। न ब्रह्म-दर्शन, न अखण्ड अविचल सी दशा है। अब तो मेरे ‘श्री बाबूजी’ दशा सहित नहीं रहित है। नहीं, नहीं, भाई अब तो दशा न सहित है न रहित है।

  (‘मालिक’ की कृपा से फूलो जिज्जी को ता: 30.12.53 को लड़का हुआ है। तथा इलाहाबाद में बंगा भाई साहब को भी ता: 6.1.54 को लड़का हुआ है) अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इधर 7-8 दिन से मुझे रात-रात भर न जाने क्या हाल है कि नींद नहीं आती। औंधा नींदी सी ऐसी रहती है कि मैं रात भर मानों जागती रहती हूँ, किन्तु कोई विशेष तकलीफ़ दे नहीं मालूम पड़ती। पेट दाहिनी ओर तो बिल्कुल ठीक लगता है, बस बाई ओर दबने से ही कुछ दुखन सी होती है। वैसे अब विशेष तकलीफ़ नहीं है। फ़िक्र न कीजियेगा। इति:-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-365
लखीमपुर
18/1/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

मेरा पत्र पहुंचा होगा। अम्मा, छोटे भइया और बिट्टो ता: 20 या 21 को इलाहाबाद जा रहे हैं। वहाँ से सबने और बड़े भइया ने भी बहुत-बहुत बुलाया है। वहाँ से अम्मा वगैरह ता: 6 को उत्सव के लिये शाहजहाँपुर पहुंच जायेगी और यहाँ से हम लोग भी ता: 6 की रात को 11 बजे वहाँ पहुंच जायेंगे। अबकी से ‘श्री बाबूजी’ यद्यपि मैंने लेख “राज-योग में प्रेम और भक्ति का सामन्जस्य” लिख तो लिया है, किन्तु यदि ‘आप’ आज्ञा दें तो मैं अबकी से बोलने की कोशिश कर रही हूँ। बोल मैं अवश्य ले जाऊंगी, क्योंकि देखिये, ‘आपने’ कहा था कि “बिटिया ! तुम लिख सकती हो, लिखा करों” बस मैं लिखने लगी। पारसाल आपने कहा था कि “बिटिया ! तुम बोल सकती हो” तबसे मुझे कुछ धुन है कि मैं बोल लूंगी, वैसे जैसा ‘आप’ कहें। यदि हिन्दी में Allowed होता, तो मैं पार्लिमेन्टरेलिजन में भी अपने मिशन को Represent (प्रतिनिधित्व) करने की कोशिश करती, खैर देखा जावेगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

    भाई अब तो यह दशा है कि जैसा मैंने लिखा था कि ईश्वरीय धारा मुझे स्पर्श ही नहीं हो पाती, वैसे ही पवित्रता, शुद्धता का हाल हो गया है कि अपने आस-पास तक इसका पता ही नहीं पाती हूँ। न नम्रता, न कुछ मुझे स्पर्श नहीं हो पाते। मेरे Heart (दिल) का यह कुछ भी Touch (स्पर्श) ही नहीं होता। यदि Condition लाऊं तो ऊपर ही जैसे तैरती रह जाती है और मुझे या मेरे heart को कोई चीज़ Touch ही नहीं कर पाती है। यही नहीं, बल्कि कुछ यह है कि ‘मालिक’ का ध्यान करती हूँ तो न जाने क्यों तब भी पवित्रता तक भी कुछ अनुभव नहीं कर पाती हूँ, बस केवल खाली Vacuumise शक्ल सी तैरती मालूम पड़ती है। बस वही शक्ल ही अब मेरी Condition (दशा) है, वही मेरा रूप कह लीजिये, वही मैं हूँ या भाई कुछ यह दशा है कि “रूप मिलयो, रंग बिसर यो”। और कुछ ऐसा है कि चाहे वह (‘मालिक’ का स्वरूप) खाली है, Vacuumise है, बस वह भी ऐसी स्वतंत्र कि चाहे उसे अपना रूप माँनू तो वैसी, चाहे heart मानू तो वैसी ही, चाहे सामने रखूं तो वैसी ही, चाहे अन्तर में रखूं तो वैसी ही रहती है। इतनी हल्की ही कहिये कि तैरती मालूम पड़ती है। ऐसा ही इतना खाली सा मेरा रूप हो गया है, कि जैसे कहते हैं, कि फूक मारो तो उड़ जाय। सम्भव है एक तिनका भी भारी बैठेगा। बस कुछ ऐसी ही दशा में मैं रमती जा रहीं हूँ। बस ऐसे ही अपने में मैं आप ही भिदती जा रही हूँ, और मैं इस दशा के लिये क्या लिखती, जैसे-तैसे कुछ लिख दिया है। यद्यपि कुछ मेरी Condition से सम्भव है ठोस ही पड़े। यह है कि रोओं भी सम्भव है भारी बैठेगा। कुछ ऐसा ही खाली मैदान मुझमें समाया हुआ है। कुछ ऐसा लगता है कि मेरा सूक्ष्म रूप भी सफाचट मैदान हो गया है, वह भी Vacuumise (रिक्त) हो गया है।

  अम्मा आपको शुभार्शीवाद तथा केसर, बिट्टो और लल्लू आपको प्रणाम कहते हैं। इति:-

  सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
  सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-366
लखीमपुर
23/1/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है, मेरा पत्र मिला होगा। ‘आपका’ कृपा-कार्ड पूज्य मास्टर साहब ने सुनाया। सुनकर अत्यन्त हर्ष हुआ। सचमुच मास्टर साहब जी के धन्य भाग हैं जो अपने ‘मालिक’ की सेवा तथा अपना कर्त्तव्य पालन करने में सदैव अग्रणी हैं। उन्होंने लखीमपुर का नाम उज्जवल कर दिया और ‘मालिक’ की कृपा ने ही यह सुअवसर दिया है। उनका बहुत-बहुत धन्यवाद है।

  न जानें क्या बात है कि ‘आपकी’ कृपा तथा स्नेह ने मुझे Work (कार्य) पहले ही से बता दिया तथा काम से पहले ही सचेत कर दिया था। वैसे Work तो सारा ‘मालिक’ के इशारे मात्र से ही हो चुका है और ‘उनकी’ कृपा तथा मास्टर साहब जी के परिश्रम से पूर्ण सफल होगा। मेला Ground (ग्राउंड) में मास्टर साहब जी का Work काफ़ी तेज़ और बिखरा हुआ मालूम पड़ता है, समा अच्छा बंधा मालूम पड़ता है। वैसे ‘आप’ तो सब जानते ही हैं. ‘मालिक’ की कृपा ही खूब है।

  ‘मालिक’ की कृपा से वहाँ के लोगों के अन्तर की सफ़ाई का काम मैं अवश्य संभाल लूंगी, जरा भी परिश्रम मुझे नहीं पड़ रहा है, और न जाने क्या यह नई बात देख रही हूँ कि मेला Ground (ग्राउंड) में निगाह जाती हैं, तो अपनी छाया को वहाँ Work में लगी हुई पाती हूँ और छाया में ‘मालिक’ की उपस्थिति पाती हूँ। यह बात मैं ‘आपके’ पत्र आने से पहले ही से देख रही थी।

    हम लोग भी उत्सव की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अब धीरे धीरे उत्सव आ ही रहा है। आत्मिक दशा तो अगले पत्र में लिख चुकी हूँ, इतना कुछ और हो गया है कि लय-अवस्था का एहसास मुझे नहीं होता। इतना हल्का लफ़्ज यह है कि मैं इसमें तैरती ही रहती हूँ, किन्तु इस अवस्था का अनुभव नहीं कर पाती हूँ। मिशन के काम में इलाहाबाद में पूर्ण सफलता हो, ईश्वर से यही प्रार्थना है। वैसे तो यथार्थ प्रकट होने का समय है और यह हो कर ही रहेगा, इसमें सन्देह नहीं। केसर ‘आपको’ प्रणाम कहती हैं कि श्री बाबूजी मैं तो पूजा में अभी कम परिश्रम कर पाती हूँ, बस आपकी ही कृपा का भरोसा है। इति:-

सदैव केवल आपकी ही
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-367
लखीमपुर
31/1/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

‘आपके’ दो कृपा-कार्ड आये सुनकर प्रसन्नता हुई। भाई मेरे पास यदि कुछ है तो ‘आपका’ ही दिया हुआ है। नॉलेज या इल्म भला मैं क्या जानूं, मुझे इनसे भला क्या मतलब और उनका भी भला मुझसे क्या काम। हाँ, मेरा इनका तभी साथ है, जब कुछ ‘उसकी’ ही याद में लिखूं या पढूँ। तबियत तो ‘श्री बाबूजी’ वहाँ जल्दी पहुंचने के लिए बेकाबू हो जाती है, किन्तु धैर्य रखना पड़ता है। यदि रुपया यहाँ जैसा ताऊ जी ने मास्टर साहब से चाचा को जल्दी के लिये कहलाया है, आ गया तो ता: 5 की रात को नहीं तो ता: 6 की रात को पहुंचेंगे। मेहमान (फोड़े) तो विदा हो गये। बस परसों और नरसों दोनों फूट तो गये हैं, किन्तु अभी कुछ पतला पानी सा निकलता है, सो भी होम्योपैथिक दवा से आशा है, परसों-नरसों तक बिल्कुल साफ़ होकर ठीक भी हो जायेंगे। पूज्य मास्टर साहब जी आज डेढ़ बजे दोपहर को इलाहाबाद जा रहे हैं, कल सवेरे 5 बजे पहुंच जायेंगे।

  लेख जैसा ‘आपने’ लिखा था, अभी साफ़ नहीं उतार पाई हूँ, कोशिश करूंगी दो-एक दिन में उतार लूंगी। इधर Condition तो अच्छी ही चल रही है। लेख के बजाय Condition fair ( दशा शुद्ध) हो गई है। इधर ऐसा लगता है कि ज़रा सी बोझ वाली दशाओं से Free (स्वतंत्र) हो गई हूँ। मेरी तो जैसी हालत है कि मौत के बाद जैसा मनुष्य Free या जो उसके साथ जाता होगा, उससे भी गई बीती, उससे भी हल्की ही हालत है। यदि अंतर टटोलती हूँ तो खोखला, बाहर तो वह भी खोखला। न अन्तर में बंधी हूँ, न बाहर ही। ऐसा समझ लीजिये कि एक जरा सी डोंगी बड़े समुद्र में निधड़क तैरती चली जा रही है। समुद्र में लहरें नहीं, जिनसे उलटने का डर हो, वायु भी माफ़िक ही आती है, जीव नहीं, जन्तु नहीं, कहीं डोरी भी बंधी नहीं, जिनसे उलझने का डर हो, स्वच्छ, निर्मल, खाली समुद्र पड़ा है। यह मेरे ‘श्री बाबूजी’ मेरी दशा की दशा है और ‘मालिक’ की क्या कहूँ उससे तो कुछ ऐसा सम्बन्ध हो चुका कि ‘मालिक’ कहूँ तो कुछ सोचना नहीं पड़ता है। और न कहीं देखना या टटोलना पड़ता है और न कुछ इसका Weight (वजन), न कुछ। ऐसा लगता है कि उस चतुर ‘केवट’ ने धीरे से डोंगी की सारी डोरियाँ काट दीं और उसे प्रशान्त- सागर में छोड़ दिया कि यह चली जावेगी और स्वयं उसमें हो कर भी डोंगी को ‘अपने’ होने के एहमास के बारे से भी स्वतंत्र कर दिया जिसमें बस चलती चले। परन्तु कुछ एक इतनी हल्की सी हवा आती है, जिससे डोंगी को ‘उसके’ होने की अनुभूति की हवा मिलती जाती है और ‘उसके’ होने की हवा या अनुभूति के सहारे ही चली जा रही है। मेरे ‘मालिक’ कुछ ऐसी ही दशा है कि जहाँ भी मैं हूँ, न जाने क्यों वहाँ से अपनी अब कुछ खोज खबर नही पाती हूँ, कुछ पता नहीं मिलता है। केसर, मंजू, मुन्नी ‘आपको’ प्रणाम कहती हैं।

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-368
शाहजहाँपुर
2/2/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत मिला। यह तुमने खूब लिखा कि “मेरे पास जो कुछ भी है, सब आपका ही दिया हुआ है”। अगर देने-लेने का सवाल है तो, जब मैं सोचता हूँ तो मुझे यह मालूम होता है कि मेरे पास जो कुछ है, वह सब तुम्हारा दिया हुआ है। तुम्हारी हालत पढ़कर मुझे ऐसा प्रतीत होता है, वैसे सही बात ईश्वर जाने कि तुम बन्धन से छुटकारा पा चुकी हो। इसमें भी अभी जाने कितना पैराव बाकी है। मतलब तो तुमने अपना बना लिया और इन्सान अगर बहुत उपज चाहता है तो यहीं पर उसकी दौड़-धूप समाप्त हो जाती है, मगर मेरी आँखें तो आँख ही नहीं रहीं। अब देखूं तो किससे देखूं। न मालूम मेरी क्या हालत है। शुक्र हर हाल में है।

  शुभचिंतक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-369
लखीमपुर
16/2/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

हम सब कल बहुत आराम से यहाँ पहुंच गये।

  मेरे ‘श्री बाबूजी’ वहाँ से तो चला ही नहीं जाता, किन्तु चलना तो पड़ता ही है। सच में उत्सव हो तो ऐसा हो। मैंने वहाँ के कण या एक जरें की Reading (पढ़ने की शक्ति) में जो कुछ भी अपनी थोड़ी सी Capacity के मुताबिक अनुभव किया है, सो लिख रही हूँ, किन्तु मुझे Sure (विश्वास) है कि अधिक ऊंची Capacity वाले को इससे अच्छा Read हो सकता है। मैंने यह पाया कि एक कण में वह हालत थी जो समस्त ब्रह्माण्ड का आत्मिक-पालन कर सकती है। या समस्त ब्रह्माण्ड का आत्मिक-Force (शक्ति) से पालन कर सकती है। मैंने पाया कि हर सत्संगी के Heart (हृदय) एक ऐसी Condition (दशा) से चिपके हुए हैं, जो सम्भव है हजार वर्ष की तपस्या के बाद यदि सचमुच एक सद्गुरु की शरण अभ्यासी हो तो शायद पा सके या नहीं, सन्देह है। मैंने तो ‘आपकी’ Transmission ( प्राणाहुति-शक्ति) को अभी केवल इतना ज़रा सा ही अनुभव कर पाया है, किन्तु मेरा दृढ़ विश्वास है कि ‘मालिक’ की कृपा से मैं ‘उसमें’ अधिक से अधिक पैर सकूंगी। कहाँ मिलते हैं ऐसे आत्मिक दृश्य और कहाँ मिलती है ऐसी Transmission Power कि जिसमें सांसारिक मनुष्यों को केवल उत्सव में सम्मिलित होने के नाते ऐसी दशा से जो शब्दों की गम्य से बाहर हैं और जहाँ ख़ालिस Purity (पवित्रता) और खालिस दशा का ही राज्य है, चिपका देने की शक्ति आज क्या, सम्भवतः किसी में कभी न होगी। यह तो अवश्य पढ़ा और सुना भी है कि जब वर्षों की तपस्या, और संयम और साधना के पश्चात साधक योग्य हो जाते थे, तभी महात्मा लोग एकाध शिष्य को ही ऊंची दशा पर पहुंचा देते थे। मैं तो बारम्बार अपने समर्थ ‘श्री लाला जी’ के चरणों में शत-शत प्रणाम करती हूँ कि जिन्होंने आजकल के समय में हमें ऐसी ‘रोशनी’ दी जो बराबर आत्मिक-प्रकाश कर रही है, चाहे हम जाने या न जाने। मैं अपनी दशा के बारे में क्या लिखू ‘श्री बाबूजी’ ?

  मेरा तो यह हाल है कि चैन की हवा में मुझे साँस लेना भी दूभर मालूम पड़ता है। भाई, अब तो ऐसा लगता है कि दशा इतनी हल्की ही कहिये कि उसमें अब साँस की भी गम्य नहीं रह गई है। ऐसा लगता है कि श्वाँस अलग है, मानों मुझे स्पर्श नहीं कर पाती है, मुझ तक पहुंच ही नहीं पाती है। मैं तो, बस यह लगता है कि अपने में ‘मालिक’ के रमें होने की अनुभूति (एहसास) की वायु सी ही आती है, बस उसी वायु की साँस में रहती हूँ, उसी से मैं पल रही हूँ। किन्तु वह ऐसी वायु है कि यदि दोनों को मिला दिया जावें, तो भी वे एक दूसरे के स्पर्श तक से अछूती ही रहेंगी, जैसे गंगा-यमुना की धारा। ‘मालिक’ की कृपा वगैरह, मैं कहती जरूर हूँ, किन्तु सच में तो मुझे अब केवल ‘उसी’ के अब इस ओर, यानी ‘उसकी’ कृपा की ओर निगाह नहीं ठहराती क्योकि मेरे ‘श्री बाबूजी’ ‘उसकी’ कृपा तो मानों मुझ-मय ही हो चुकी है। भाई ऐसा लगता है कि हालत खुलती चली आती है और उसी निर्मल दशा में मैं मिलती या धुलती चली जाती हूँ। ऐसा लगता है कि ऊपर लिखी उस दशा में कि जो ‘मालिक’ के अपने में रमा होने की अनुभूति या एहसास की वायु है, मेरा ज़र्रा-ज़र्रा भीग चुका है और अब सूखने या सोखने लगा है। जब से आई हूँ, कुछ ऐसा लगता है कि सूक्ष्म शरीर के बन्धन लगभग साफ़ हो गये हैं। कुछ ऐसा लगता है कि अंतर की भी आँखे खुली या फैली रह गई हैं। खुशी या तड़प ऐसी उठती है कि कभी-कभी कलेजा थाम कर रह जाती हूँ। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं।

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-370
लखीमपुर
18/2/1954
मेरे परम पूज्य प्रभुवर, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। अम्मा की तबियत भी काफ़ी ठीक है। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

  भाई, अब तो यह दशा है कि अक्सर ऐसी दशा होती है कि अंतर में जाने क्या होता है, कि जी चाहता है कि कलेजा कूटती फिरूँ, नोच डालूं, ऐसी कचोटन सी मचती है किन्तु हाय-हाय करने को तबियत नहीं चाहती है, और न इससे कुछ सन्तोष ही मुझे हो सकता है। सम्भव है इसी कारण अक्सर कलेजे में, जाने Heart (हृदय) में कभी धीमा और कभी एकदम से ज़ोर दर्द उठ कर फिर दब जाता है। किन्तु यह कोई नई या तकलीफ़ देह बात नहीं है। यह तो भाई जब से ‘मालिक’ के चरण पकड़े हैं, तब से ही शुरू हो गया, खैर। मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ ऐसा लगता है कि नम्रता की दशा धुल-धुलाकर शुद्ध आईना की तरह हो गई है और कुछ ऐसा है कि यही नहीं कि मेरा रूप ही ऐसा हो गया है, बल्कि ऐसा ही बस एक यही आईना निगाह में जड़ गया है। हर तरफ़, हर चीज़ से ऐसा ही प्रकाश निकल रहा है या यों कह लीजिये कि सब ओर इसका ही राज्य है। ऐसा लगता है कि मेरी निगाह इसी में धुलकर फैल गई या देखने की ताक़त इसी में धुलकर या यही देखने की ताक़त में धुलकर फैल गई है। भाई, अब तो ऐसा लगता है कि पुतली ही पुतली सब ओर फैली हुई है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब यह हाल है कि जिधर देखो, बस अपनी ही शक्ल दिखाई पड़ती है। धुल-धुलाकर कहने में Pressure ( दवाब) और कुछ ठोसता सी आ जाती है, इसलिए केवल धुली हुई उसे (शक्ल को) कहूँगी। भाई, यह हाल है कि ऐसा लगता है कि कुल आँख ही आँख फैली हुई है, फिर क्या देखूं और किसको देखूं। देखने की ताक़त तो कुल फैली हुई है, इसलिये हर चीज़ से रोशनी ही निकल रही है। मेरा तो यह हाल है कि मैं तो यही कहूँगी कि “मैं क्या जागूँ, मेरा मनुंवा जागे”।

    अम्मा ने ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा फूलो जिज्जी ने ‘आपको’ प्रणाम लिखा है। केसर, बिट्टो ‘आपको’ प्रणाम कहती हैं। दादी की तबियत अब कैसी है?

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही
  सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-371
लखीमपुर
21/2/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

दोनों पत्र साथ ही भेज रही हूँ। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ। भाई, वैसे तो केवल एकता का ही साम्राज्य है, किन्तु अंतर में बंदगी जाग रही है, जो मानो आगे बढ़ने का मार्ग है और जो खुद ही मानों ‘मालिक’ की कृपा से या ‘उससे’ ही प्रकाशित है। अंतर में या Vision में केवल और एक ही मार्ग दिखाई पड़ता है, और इसी पर मैं चली जा रही हूँ और ऐसा लगता है कि जिसके छोर का अंदाज़ तक नहीं पड़ता है। Vision में बस इसी सीधे एवं सहज मार्ग में से मैं चली जा रही हूँ। न मोड़ है न चौराहा बस चलती ही जा रही हूँ। यदि कोई कहे क्यों? तो इसका उत्तर इस भिखारनी के पास अब यही है कि इस बंदगी को भी, जो उसी ‘मालिक’ की ही देन है, तो इसे (यानी बंदगी को) भी उसे ही सौंपने के लिये। ‘उसको’ इस देन को भी ‘उसे’ ही सौपने चली जाती हूँ क्योंकि मेरे पास अब इसके सिवा कुछ दिखाई नहीं देता। मेरे ‘श्री बाबूजी’ मैं तो मानो बन्दगी-रूप हो गई हूँ। मेरा ज़र्रा जर्रा बन्दगी की ही दलील है और अन्तर के कण-कण से बंदगी ही बंदगी की आवाज़ आ रही है। यदि लिखूं कि मेरे में बन्दगी भिद गई है, तो भिदना शब्द अब भारी पड़ता है। केवल इतना कहती हूँ कि चाहे यों कह लीजिये कि मैं बन्दगी में फैली हुई हूँ, नहीं यों कहिये कि बन्दगी मुझमें फैली हुई है। सब ओर, बाहर-भीतर सबसे बस ऐसा ही निर्मल प्रकाश आ रहा है।

  ‘श्री बाबूजी’ एकता भी कैसी है, कि मेरा कण-कण उसमें फैल चुका है, समाया हुआ है। ऐसा कि एक क्षण भी इसके (एकता के) विरुद्ध, या इससे अलग देखना असम्भव है। अब तो यह हाल है कि झाड़-झंकार ऐसे साफ़ हुए कि निशान भी नहीं, मानो सदैव से ऐसा ही स्वच्छ मार्ग बिछा हुआ है। शरीर से मेरा मतलब स्वप्न में भी नहीं, यह तो गल-गलाकर साफ़ हो चुका, अब अन्तर में हल्के बंद तक का पता नहीं। ‘मालिक’ ने ऐसा लगता है कि सूक्ष्म से सूक्ष्म बन्द भी मानों साफ़ करके अंतर को आज़ाद फैला दिया है। भाई, न जाने कुछ यह हाल है कि जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों या झाड़-झंकाड़ों को भी कृपालु ‘मालिक’ ने साफ़ करके मानों बुहार दिया हो। शरीर में, हर चीज़ में, इन्द्रियों, Senses ( वृत्तियाँ) मन तक इतना धुंधला पड़ गया है कि होने और न होने का भी होश नही। ऐसा लगता है कि ‘मालिक’ ने आज़ाद करके बन्दगी के निर्मल स्वच्छ प्रकाशित मार्ग में छोड़ दिया है और छोड़ क्या मैं ‘उसके’ अतिरिक्त हूँ ही नहीं। यदि मैं हूँ तो वह उसमें समाया हुआ पहले है। वही सब कुछ मार्ग में दिखाता हुआ लिये जा रहा है। केसर की दशा इतनी हल्की तथा स्वच्छ लगती है कि बेचारी जान नहीं पाती और बात बात में झल्ला पड़ती है। खैर, सब ‘मालिक’ की मेहरबानी है। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-372
लखीमपुर
22/2/1954
मेरे परम पूज्य प्रभुवर, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

दो पत्र डाल चुकी हूँ-मिले होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक -दशा है, सो लिख रही हूँ।

  भाई, अब तो भिखारनी ही कहूँगी, इसका यह हाल है कि ऐसा लगता है कि प्याला ही प्याला सब ओर फैला हुआ है। धुला धुला शुद्ध प्याला ही सब ओर फैला हुआ है और ऐसा कि भिखारनी को होश नहीं कि प्याला कौन पकड़े है, कैसे टिका हुआ है किन्तु आँखें मानो मुंद चुकी हैं, बस एक प्याला ही सर्वत्र फैला हुआ महसूस होता है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ हृदय में कचोटने का यह हाल है कि कभी क्या तबियत अक्सर ही ऐसी हो जाती कि गला काट कर फेंक दूं। कपड़े-लत्ते सब अपने नोंच-फाड़ डालूं। हृदय से आवाज़ नहीं निकलती, वह तो मानों मौन है। बस तबियत में फड़फड़ाहट है। बस एक ‘मालिक’ की माधुरी मूर्ति सामने है और उसी का सहारा है। अक्सर ऐसा लगता है कि इसी बेचैनी के परमाणु भी मुझसे निकले हैं। बस ऐसा लगता है कि ‘मालिक’ हृदय को थामे हुए है, जो मुझे ऊपर लिखे कोई कर्म करने को मजबूर नहीं होने देता। वही Mind को Upset नहीं होने देता। किन्तु अन्तर में वह हाल है कि हृदय को खसोटने और मारने-पीटने को तबियत मजबूर हो ही जाती है, किन्तु लाभ इससे कुछ नहीं होता। भीतर तो किलौनी लग चुकी हैं। देखती हूँ कि प्याले के तह में यह चीज़ या दशा छुपी हुई है।

  पूज्य महात्मन् ! इधर दो-तीन दिन से जाने क्या बात है कि शाम होते ही जानें क्यों डर सा लगा करता है। क्यों ? यह समझ में नहीं आता, किन्तु कमरे से निकलने तक में भी भय सा लगता है, चाहे सब लोग जगते भी हों तो भी। अंधेरा तो बर्दाश्त नहीं होता। यह न जाने क्या बात है, यह तो डरना मेरे स्वभाव के विरुद्ध बात थी। अब दो-तीन दिन से न जाने क्या बात हो गई है। तबियत तो बिल्कुल सादा व इतनी हल्की रहती है कि बस कुछ इधर मुझे ही हो गया है। डर इधर कुछ, केसर कहती है कि उसे भी लगता है किन्तु श्री बाबूजी डर से कुछ हल्की चीज़ है। हृदय सिहरता सा रहता है, शायद भय से ही किन्तु भय का कारण कुछ नहीं मिलता और क्यों लगता है, यह भी नहीं मालूम। कभी उदासी, कभी बेचैनी, यही मेरा हाल है।

ताऊजी, केसर व बिट्टो ‘प्रणाम’ कहते हैं। इति:-

आपकी ही सदैव सेविका
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-373
शाहजहाँपुर
27/2/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुलसी दास आये थे और कोई चालीस मिनट तक मेरे पास रहे। उन्होंने 16 फरवरी सन् 54 का खत दिया। इस खत में तो मैं समझता हूँ कि सब हमारे लालाजी की तारीफ़ थी और वह वाकई सराहने के लायक हैं। उत्सव में उन्हीं का चमत्कार है। तुम्हारी Reading जो कुछ भी है बहुत ठीक है। असल में मेरे ज़रिये से जो कुछ हो जाता है उसका पता मुझको भी नहीं हो पाता। यहाँ तो खैर कोई बात नहीं है, मगर Tour (यात्रा) की दशा में मुझ पर अक्सर डाट भी पड़ी है, इसलिए कि मुझे अन्दाज़ा अक्सर ठीक नहीं हो पाता और बेजान चीज़ को जब मैं Charge (चार्ज) करता हूँ तो अक्सर मैं उससे बहुत ज्यादा कर देता हूँ। गो घर पर यह ख्याल रखा था कि बच्चे भी मौजूद हैं। एक गलती मुझसे पहली मर्तबा गोवर्धन पहाड़ पर हुई थी, उस वक्त मुझे यह अन्दाज़ न था कि मुझसे ऐसी चीजें भी हो सकती थीं, क्योंकि मेरा पहला मौका था। इसका लिखना बेकार हैं, हमारे नोट में सब कुछ मौजूद हैं।

  मेरे पास लोग आते हैं। सत्संग तो उन्हें मैं कराता हूँ, मगर जब कोई कुछ दिनों ठहरता है तो अक्सर मुझे सही हिट (Hit) हो जाता है कि क्या करना चाहिए और उसे समझ कर जब मैं करता हूँ तो नतीजा बहुत अच्छा होता है। बस तुम्हारा यही हुआ है, जिसका नतीजा यह हुआ कि Soul (आत्मा) के bondage (बंधन) बहुत कुछ मध्यम पड़ गये हैं। यहाँ तक कि मुश्किल से अनुभूति होती है।

    जिसका हाल तुमने 18 व 22 फरवरी में लिखा है। उसका भी मैं संक्षेप के साथ जवाब देता हूँ। शुद्धताई तो तुममें ऐसी है, मेरा भी जी इस शुद्धताई के लिये ललचाता है। मुझमें अगर कोई शुद्ध चीज़ है तो वही है, जो लालाजी ने प्रदान की है, बाकी भाई मुझे ऐसा समझो, मिसाल की तौर पर कि जैसे कुल Universe (सृष्टि) मेरे पेट में हो, जितनी खटक कि होती रहती है, वह सब मुझमें टकराती रहती है। शुद्धता और अशुद्धता सब उसमें शामिल रहती है इसलिये और भी जब मैं तुम में शुद्धता देखता हूँ तो उसी को देखकर खुश हो लेता हूँ। क्या कहूँ, ईश्वर के धन्यवाद के लिये मेरे पास कोई शब्द नहीं है। बहुत Higher Approach (ऊंची पहुंच) यानी वह आध्यात्मिक उन्नति जो अपने आखिर दर्जे तक पहुंची हुई हो, में जो बात है, वह कुछ ऐसी है कि कहते नहीं बनता और यह भेद भी है। जी मेरा छुपाने को भी नहीं चाहता और पूरे तौर से यों नहीं खोलता कि कोई शख्स इसको मानने के लिये तैयार नहीं होगा और अगर होगा भी तो ऐसी तरक्की को कोई पसन्द नहीं करेगा और वह तरक्की भी ऐसी कि जिसको ईश्वर पहुंचा दे तो उससे हटने को जी नहीं चाहता। बहुत कोशिश करता हूँ, आगे ज़बान खोलने को जी नहीं चाहता, दिल रोकता है। खैर रहने दो, यह तो इतना बड़ा राज है कि शायद इसका इशारा ही मैं किसी एक को कर जाऊं और जो पहुंच गया, वह तो जान ही लेगा। मगर खुश तो तब हूँ कि जब मेरी ज़िन्दगी में ही एक काना और बने। तुमने लिखा है कि जिधर देखती हूँ अपनी ही शक्ल दिखाई देती है। यह तो बड़ी अच्छी हालत है। इसी को महात्माओं ने Realization (साक्षात्कार) कहा है और इस हद तक पहुंचे हुए लोग Natural Course (स्वाभाविक रूप ) में शायद ही कोई मिले और मिलेगा तो शायद कोई इससे एक Step (कदम) आगे मिले और यह Perfection (पूर्णत्व) है। सब की दौड़ धूप यहाँ पर ख़त्म हो जाती है और मेरी राय में यह Realization की पहली सीढ़ी है। अगर मैं Realization को नापूं तो तबियत मेरी यही कहेगी कि तुमने A, B, C, D, (ए. बी. सी.डी.) अब शुरू की है। यह बातें किसी से अगर कहूँ तो, मुझे बावला समझेगा और उसे यह मालूम हो कि यह भी कुछ रूहानियत में कदम रखे हुए हैं तो वह यह कहेगा कि अपनी बड़ाई जता रहा है। यह शख्स कुछ नहीं जानता, मगर मैंने अपनी किताबों में किसी न किसी तरीके पर कह सब कुछ दिया है। मौजूदा हालत को तुम निखरी हुई तुरीयावस्था कह सकती हो।

  21 फरवरी सन् 1954 के पत्र में जो बन्दगी करना लिखा है, यह बड़ी बात है। बन्दा फिर भी बन्दा रहेगा। इस लिहाज से जो उसको मालिक मानते हैं, इसीलिये हममें बन्दगी का ख्याल रहना बड़ा अच्छा है। आज मुझे दिन भर यह ख्याल रहा और बड़ी कोशिश की मुझसे भी बात निभ जाये, क्यों कि यह अच्छी है। मुझे इस बात का कभी पता न चला और चला हो तो याद नहीं। बन्दगी जहाँ तक हो, छोड़ना कभी न चाहिये, अब यही चीज़ आगे पहुंचायेगी। तुम सोचकर लिखना, चाहे मास्टर साहब से भी मश्विरा ले लेना कि मैं अब इस बात को अपने में कैसे लाऊं अथवा बन्दगी, कैसे करूँ ? चीज़ बड़ी अच्छी है।

    अम्मा को प्रणाम

  शुभ चिंतक
  रामचन्द्र  ऊपर का खत खत्म कर चुका तो 23.2.54 का लिखा हुआ खत भी मिल गया। तुमने जो यह लिखा है कि तबियत चाहती है कि कपड़े नोच डालूं, वगैरह। मैं समझता हूँ कि यह सब बातें बेचैनी हटाने के लिये मजबूर करती होंगी। यह भी दर्द की एक हालत है। तुमने लिखा है कि यह मालूम होता है कि दिल कोई थामे रहता है ताकि ऊपर की बातें न हो सकें। यह सब हमारे लाला जी का करिश्मा है। वरना ऐसी हालत पर और खास तौर पर जो चन्द महिने पहले आ चुकी है, अवधूत हो जाने का अन्देशा रहता है। हमारे यहाँ कोई अवधूत नहीं होता।

  तुमने डर और खौफ़ के बारे में जो लिखा है, यह बड़ी अच्छी हालत है। इसके बारे में शायद 6 या 7 महीने हुए हों या ज़्यादा मैंने या तो किसी खत में लिखा है या जुबानी पूछा है कि तुम्हें खौफ़ तो मालूम नहीं होता। तुमने शायद कहा था कि हाँ, कुछ मालूम होता है। उस वक्त यह हालत उभार पर न थी अब पूरे उभार पर है। इस हालत को “खुदा-तरसी” हालत कहते हैं। तरस के माने डर के हैं, अर्थात् ईश्वर से खौफ़ पैदा हो जाना। जब यह हालत पैदा हो जाती है, तो शास्त्र विरुद्ध काम अगर मन कराना चाहे तो इस भय की वजह से नहीं हो पाते और इस हालत की फ़कीरों ने बड़ी तारीफ़ की है। तुम्हें यह हालत ईश्वर मुबारक करे। मैं इसको कम नहीं करूंगा। अपने आप जैसी सूरत उसकी होगी ठीकमठीक आ जायेगी। हमने जो काम चलते समय सुपुर्द किया है और जिसकी याद मास्टर साहब ने भी की होगी, उसका ध्यान रखना।

  शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-374
लखीमपुर
27/2/1954
मेरे परम पूज्य प्रभुवर, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

‘आपका’ कृपा- कार्ड जो पूज्य-मास्टर साहब के लिये आया, सुनकर फ़िक्र है। ईश्वर से प्रार्थना है और ‘वह’ हमारी अवश्य सुनेगा। मैं मंगल के सवेरे ताऊजी के साथ इलाहाबाद जा रही हूँ। चाचा व अम्मा को भी इच्छा थी, वैसे विशेष बात कुछ नहीं है। मिस्टर और मिसेज सिन्हा का शौक ‘मालिक’ की कृपा से काफ़ी अच्छा चल रहा है। Faith (विश्वास) और अनुभव भी काफ़ी अच्छा है, वैसे तो ‘मालिक’ सब जानते ही हैं। दोनों जने शाहजहाँपुर से आने के बाद करीब-करीब रोज़ ही पूज्य मास्टर साहब या मेरे यहाँ आते भी रहते हैं। मेरे पेट में बाईं ओर जो ‘आपने’ पूछा, सो दर्द तो नहीं, किन्तु कुछ कुसकुसाहट व थोड़ा सा ही भारीपन अभी लगता है। वैसे आँतों में ताकत व पेट में आराम काफ़ी महसूस होता है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ। ‘आप’ कृपया मुझे अब जो पत्र डालें, वह इलाहाबाद ही डालें।

  भाई, कुछ ऐसी दशा लगती है कि मानों देने-लेने का अब होश ही समाप्त हो चुका है। फिर प्याला ही तो प्याला फैला है, यह ‘उसकी’ मर्ज़ी है, चाहे सो दे, मन चाहे सो ले, किन्तु प्याला उथला है। मेरी निगाह, सारे Senses ( वृत्तियाँ) वगैरह, सब ऐसा लगता है कि ऊपर ही कहीं ‘स्थित’ हैं, हृदय में कुछ नहीं। फिर मेरे ‘श्री बाबूजी’ प्याला भी कैसा है कि जिसका कण-कण ‘मालिक’ की कृपा-मय है। या यों कह लीजिये कि शायद उसका कण-कण ‘मालिक’ की याद से ही पिरोया गया है, इसलिये कण-कण बस ‘वही’ हो गया है या कण-कण में ‘वही’ ओत-प्रोत है। कुछ यह दशा है कि ऐसा लगता है कि मेरा ज़र्रा ज़र्रा मानो अब केवल याद ही याद रह गया है या यों कह लीजिये कण-कण, रोम-रोम जो यदि है बस ‘उसी’ मय ही है या यों कह लीजिये कि मैं में ‘वह’ लय हो चुका है, भिद चुका है। भाई कुछ ऐसा है कि अपना कण-कण यदि पसार कर देखती हूँ तो केवल एक ‘वही’ महसूस होता है और कण-कण को पसारना क्या, वह तो ऐसा लगता है कि मेरा कण-कण स्वतः ही पसर चुका है। शरीर तक का, सूक्ष्म तक का ऐसा लगता है, मानो ज़र्रा ज़र्रा फैल गया है, सिमटाव कहीं है ही नहीं और बस उस हर कण के फैलाव में ‘उसका’ ही पसारा या पसार है या यों कह लीजिये कि निगाह में देखने की जो ताकत है, उन बिन्दुओं की जगह ‘वही’ जड़ा हुआ है और जड़ना क्या बल्कि कभी ऐसा था ही नहीं जब ‘वह’ नही था और भाई मैं उसकी ‘था’ और ‘है’ के विषय में क्या कहूँ, मुझे तो कुछ ऐसी बयार लग चुकी है, जो ‘उसी’ के होने की सिहरन दिलाती है। मेरे क्या, बल्कि कण-कण में इतनी शुद्ध और Free तथा हल्की Condition है जो ‘उसी’ का एहसास दिलाती है। इतनी नाजुक दशा है, जो ‘उसी’ बयार में रहती है और उसी बयार से ‘उसके’ होने का एहसास पता लगता है, नहीं तो या ऐसी ही बयार में मैं हूँ या ऐसे मैदान में जहाँ केवल उससे ओत-प्रोत ही बयार बहा करती है, नहीं तो मुझे होश नहीं वही सब जाने। मेरे ‘श्री बाबूजी’ ऐसा लगता है कि मानों बीज ही जल चुका है। अब बहाव ही बहाव है। और दशा क्या है, आतिशी शीशा है, जिसमें मेरी तस्वीर खिंच चुकी है। अब तो यह हाल है कि –

  +  “हर दिल में है तस्वीरे यार, जब ज़रा गर्दन झुकाई, देख ली।“

  डर लगना जो मैंने लिखा था, वह ‘आपको’ उस पत्र लिखने के दिन से ही समाप्त हो गया, किन्तु कभी-कभी उसकी ज़रा सी झटक या सिहरन सी आ जाती है, फिर दूर चली जाती है। मेरी कुछ यह दशा है कि जाने-अनजाने में मेरा स्वभाव, मेरी रहन, चाल, ढाल मानों Nature या प्रकृति से ही मिली रहती है। नेचर (Nature) ही मानों मेरा Heart, मेरी रहन हो गई है।

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-375
लखीमपुर
2/3/1954
मेरे परम पूज्य ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ लिफ़ाफ़ा कल मिला-पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘आपने’ चलते समय जिस काम के बारे में कहा था, वह तो मेरा ही समझिये, भला उसे भूलती कैसे? और ईश्वर की कृपा से सफलता ही अनिवार्य है। मैं कल दोपहर में इलाहाबाद जाऊँगी। ‘मालिक’ की कृपा से अब जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ यह हाल हो गया है कि यद्यपि सर्वत्र दृष्टि ही दृष्टि फैली हुई है, किन्तु जैसे दिखाई नहीं पड़ता, बल्कि यो कहिये कि जो मैंने लिखा था कि देखने की ताकत ही फैली हुई है, किन्तु उनमें जैसे प्रकाश अब नहीं है या यों कह लीजिये कि अंतर-दृष्टि का भी प्रकाश समाप्त हो चुका है। भाई, ऐसा लगता है कि मानों दीपक का तेल समाप्त होता आता है, बत्ती सारा तेल जैसे चूसे लेती है, कुछ ऐसा हो गया है कि यदि मैं लय-अवस्था में होने की कोशिश करूँ तो लय-अवस्था नहीं, बल्कि ऐसा ही लगता है कि हर कण-कण में ‘उसी’ के रमे होने की अनुभूति की केवल बयार मात्र ही बह रही है। मेरे श्री बाबूजी ऐसा लगता है कि मानों लय-अवस्था ने अपनी अवस्था को मुझमें लय कर दिया है और स्वयं Free हो गई और मुझे भी अपने बन्धन के एहसास से Free कर दिया है। कुछ यह है कि ‘उसकी’ याद में लगना अब खुद एक बन्धन सा बन जाता है। अब तो भाई, यह है कि प्याला या शुद्धता ही ‘उसकी’ याद मौजूदा की दलील है। ऐसा लगता है कि इस शुद्धता को भी दशा जैसे चूसे लेती है या हज़्म किये जाती है।

    अब तो ‘श्री बाबूजी’ ‘मालिक’ की कृपा से दूसरों की भी दशा करीब-करीब पूरी तौर से अनुभव हो जाती है। ‘आपने’ जो Realization रियलाइजेशन के बारे में लिखा है, वह अब तो मुझे भी यही दिखाई पड़ता है कि A, B, C, D (ए, बी, सी, डी) ही शुरू है और भाई, शुद्धता की भी अब ही शुरुआत होते दिखाई देती है। ‘आपने’ बंदगी के बारे में जो लिखा है, सो भाई, जहाँ तक मेरा शुद्ध विचार है, बंदगी बंदे के लिये होती है, मास्टर के लिये नहीं, फिर मास्टर भी कैसा कि कुल विश्व (Universe) जिसके हस्त-गत हो। परन्तु जिसे इसके होने का गुमान तक नहीं। फिर भाई, जिससे (Mastery) स्वामित्व का (Weight) भार भी नहीं निभ सकता, वह कैसे सम्भव है कि बंदगी को निभा सकेगा। जिसमें ॐ की शक्ति पैदा कर देने की (जहाँ तक मेरी निगाह है और यह ठीक है) शक्ति मौजूद है, वह बंदगी को किस कोने में ठौर दे सकेगा।

  ताऊजी ‘आपको’ प्रणाम कहते हैं। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही
  सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-376
शाहजहाँपुर
6/3/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत 27.2.54 का भी मिल गया। पिछला खत जो मैंने भेजा था उसमें एक बात तुम्हारी जानकारी और तजुर्बे के लिये लिखने को रह गई थी, वह यह है कि जब ईश्वरीय भय की हालत शुरू होती है, तो भय एहसास होता है, मगर उसमें यह पता नहीं चलता कि किससे भय है। बस यही और भय में और इस भय में फ़र्क है।

  तुम्हारे कुल खत से और इस हालत से यह अन्दाज़ होता है कि तुम्हारी हालत Realization की है और जिसकी तलाश थी, वही अब चीज़ है। मुझे बड़ी खुशी है कि किसी को Realization हुआ तो मैं बिटिया क्या करूँ? मेरी कोई सुनता ही नहीं। नहीं तो अब तक जितने लोग भी मेरे पास आ रहे हैं पहिले के, उनमें से कुछ और लोग Realized हो चुके होते। मोती मैं बिखेरना चाहता हूँ, मगर दामन कोई अपना फैलाता नहीं। यह मेरी किस्मत है। उन लोगों की खता भी क्या हो सकती है। मगर तुम्हारे लिये इतना और कहूँगा कि हालत तुम्हारी ज़रूर Realization की है, मगर इसको काफ़ी न समझ बैठना। अभी जाने कितना और चलना बाकी है। मुझे तो भाई अभी तक उसका छोर न मिला, न मालूम कैसे लोग परम सन्त और परम हंस अपने को ख़्याल करने लगते हैं। यहाँ तो मैंने यह हाल देखा है कि सन्यासियों में और दूसरे सम्प्रदायों में भी यह बात होगी, कि पढ़-पढ़ाकर और कीर्तन वगैरह करके और जप और पूजा करके अपने आपको ब्रह्म समझने लगते हैं। मैंने ‘W’ स्थान से आगे नहीं बढ़ाया, इस लिये कि कुछ तन्दुरुस्ती का भी ख्याल है कि कुछ ज़रा और अच्छी हो लो। यह ज़रूर है कि इस स्थान की सैर अब जल्द खत्म होना चाहती है और यह सब हाल जो कुछ तुमने लिखा है, सब इसी स्थान का खेल है। तुम्हारी तन्दुरुस्ती का हाल मुझे मिल गया।

  आध्यात्मिकता की मुझे ज्यादा ज़रूरत नहीं, इस लिये कि यह तो लालाजी के बाँयें हाथ का खेल है।

  तुम्हारा खत 2.3.54 का लिखा हुआ आज अभी मिला। जब लय- अवस्था हो जाती है, तो उसकी कोशिश में बंधन महसूस होता है। Realization के बाद उसकी याद में कोशिश करने में दिल घबरा जाता है। तुम्हारे खत से मालूम हुआ कि तुम अब Realization के दूसरे Chapter में क़दम रख रही हो।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-377
इलाहाबाद
9/3/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ आया-पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘आपको’ मैं केवल शत-शत धन्यवाद के और क्या लिखूं, समझ में नहीं आता। मुझे तो ‘आप’ ऐसा ही आशीर्वाद दें कि मैं तो ‘उसकी’ ही खुशी (इच्छा) में बह जाऊं, न्योछावर हो जाऊँ। मैं तो अपने को हार चुकी हूँ, क्योंकि ‘आपकी’ इतनी कृपा व इस बालिका के प्रति स्नेह ने इसे खरीद लिया है। कश्मीर वाले सज्जन अपने एक और मित्र के संग दो दिन से आ रहें हैं, पूजा भी की और प्रश्न भी पूछे, ‘मालिक’ की कृपा से सन्तुष्ट हैं। मेरी आँतो में भारीपन कतई नहीं है, बल्कि ऐसा लगता है कि आँतों में जैसे ताकत को हज़म कर लिया है। ‘आपकी’ ग्लानि की बात पढ़कर मुझे कुछ अफ़सोस हुआ कि मैंने क्यों लिख दिया। खैर, मेरे ‘श्री बाबूजी’ ‘आप’ इस बात पर हरगिज़ कृपया ध्यान न दें। मुझे तकलीफ़ तो सचमुच नहीं हुई और न अब है, भारीपन भी क़तई नहीं है। भय की तो जो ‘आपने’ लिखी, वैसी हालत थी कि किससे भय लगता है, इसका पता नहीं। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

  ता. 3 को सवेरे आठ बजे पूजा में बैठी थी तो बीच सिर में एकदम से जाने क्या हुआ कि ऐसा लगा कि एकदम से कुछ खुल कर एक भीनी सी कैफ़ियत कुल सिर में फैल गई और सिर में ही नहीं, इसका असर कुल शरीर पर था। वह कोई इतनी हल्की भीनी कैफ़ियत थी, जिससे कुल शरीर तक affected था। ऐसा लगता था कि सिर से सम्बन्धित नसों द्वारा वह कैफ़ियत कुल शरीर में फैल गई। कोई इतनी Slight दशा खुली, उसी से कुछ सनसनाहट या कुछ भनभनाहट सी दो मिनट तक हुई, फिर कुल शरीर पर Injection की तरह असर हो जाने पर शान्त हो गई। कुछ यह हो गया है, कि कोई कहे आज व्रत है तो मुझे ऐसा लगता है कि मानो हमेशा से व्रती हूँ, और कोई खाने को कहे तो एक क्षण ऐसा होता है, मानों मैं कभी भूखी न थी, खाती ही रहती हूँ।

    मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ यह दशा है कि ऐसा लगता है कि जो बंदगी का साम्राज्य फैला था, वह सिमट कर मेरे हृदय या मन में समाता चला जा रहा है और कुछ ऐसा लगता है कि शुद्धता भी, जो आईना की तरह मानों मेरा वस्त्र ही बनी हुई थी, उसको भी मन ने जैसे चूस लिया है और वह कोई एक खाली चीज़ रह गई है। भाई, कुछ ऐसा लगता है कि अब आध्यात्मिकता के साम्राज्य की तो मुझे झलक भी नहीं दिखलाई पड़ती है। वह तो ऐसा लगता है कि पीछे छूट गया है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ ऐसा लगता है मानों अब निचुड़ी हुई शुद्धता के मैदान में हूँ। शुद्धता और बंदगी का साम्राज्य ऐसा लगता है कि सिमट चुका है और इतना ही नहीं, वह तो भाई, खुली हुई दशा तो हज़म हो चुकी, अब जाने क्या है। भाई, ऐसा लगता है कि अब तो जैसे Soul के मैदान में चल रही हूँ। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इति :-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-378
शाहजहाँपुर
13/3/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो।

अम्मा की तबियत के बारे में अक्सर फ़िक्र रहती है। ईश्वर जल्द आराम करें। X, Y स्थान पर अर्थात् इन दोनों के दरमियान कुछ गुजंलक थी, अब वह साफ़ हो गई। Left corner पर कुछ थोड़ी सी अब भी है, वह भी एक दो रोज़ में साफ़ हो जावेगी। तुमने जो हालत 9 मार्च सन् 54 के खत में लिखी है, वह उसी स्थान की हालत है। सैर शुरू हो गई है, मगर X Y दोनों स्थानों की मिली-जुली हालत की सैर है। तुमने जो यह लिखा है कि अगर कोई व्रत का ख्याल दिलाये तो मुझे यह मालूम होता है कि व्रती हूँ। यह तो बड़ी उम्दा हालत है। इससे यह मालूम होता है कि ईश्वर या Reality कहना अच्छा होगा की हालत से सम्बन्धित हो चुकी हो। इसलिये कि इसका एक गुण यह भी है कि वह कभी नहीं खाता। अगर कोई खाने को कहे तो यह मालूम होता है कि मैं खाती ही रही हूँ। इसके मानी यह है कि तुममें उस गुण वाले से निस्बत हो गई है, जैसा कि ऊपर लिखा है कि जो बिना खाये हुए अपने आपको खाया हुआ समझता है यानी दोनों हालतें उसके लिये एक सी हैं।

    आगे जो लिखा है बन्दगी के बारे में कि वह बन्दगी समाती चली जा रही है, इस चीज़ का कुल समा जाना Reality की ही अच्छी हालत है। एक बात मैं और लिखे देता हूँ बतौर इशारे के। सम्भव है कि इस Writings को किसी समय लोग सोंचे। जब तक कि बन्दगी है, हम बन्दे हैं। और जब इस चीज़ में हम समा गये तो फिर बन्दे नहीं रहे, मगर इन्सानी शराफ़त यही है कि हम मालिक को मालिक समझते रहें। इसके यह मानी भी नहीं कि लोग बन्दगी करना छोड़ दें, यह समझकर कि बन्दगी करने से हम बन्दा ही रहेंगे। यह तो एक हालत है कि जो बन्दगी करने से ही मिलती है, इसके बाद मुमकिन कि ‘Z’ स्थान पर इससे भी अच्छी हालत मिलेगी, ईश्वर ने चाहा। यह तुम्हारा ख्याल सही है कि Spirituality से आगे तुम्हारा क़दम है, जैसा मैंने Reality At Dawn में कहा है “शुद्धता की अनुभूति न रहना ही असल शुद्धता है और जब सब कुछ गायब हो जाये तो फिर असलियत ही असलियत है।“

  यह तो सब तुम्हारी तारीफ़ थी। अब आगे मैं क्या लिखूं। चाहता तो यही हूँ कि तुम्हारी तरह हर अभ्यासी सब नुक़्ते समझता चले। इस इल्म का कहीं छोर नही और सच पूछो तो मुझे भी पता नहीं। जब कोई इन हालतों में पहुंचता है तो पता हो जाता है। Self-Thinking से ही Intelligence बढ़ती है, तो यहाँ तो लोगों को इतनी फुर्सत ही कहाँ? और फुर्सत भी हो जाती, अगर शौक़ पैदा हो जाता मैं चाहता तो यही हूँ कि मुझे जो कुछ थोड़ा बहुत आता है, अपनी ज़िन्दगी में ही सबको सिखा जाऊं, उसके बाद फिर वह उससे आगे तरक्की करते रहें। मगर एक दो के सिवा कोई हिम्मत करके सामने आता हुआ दिखाई नहीं देता। कितनी सहज चीज़ और कितने सहज तरीके से बताई जाती है, फिर भी लोग अपने आप को उस हद तक तैयार नहीं करते। यह ज़रूर है कि ज्यादातर ऐसा ही देखा गया है, अभी तक ऐसी तरक्की करने वाले इक्का-दुक्का ही मिलते हैं।

  अम्मा को प्रणाम।

  शुभ चिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-379
इलाहाबाद
13/3/1954
मेरे परम पूज्य ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपके’ दो आये-पढ़कर हर्ष हुआ। ईश्वर का बहुत-बहुत धन्यवाद है जो उसने सबकी सुनली। प्रार्थना तो ‘श्री बाबूजी’ क्या बताऊं, जब से लखीमपुर से चली थी, निगाह ही नहीं जाती थी, ऐसा ही लगता था कि काम हो गया, इसलिये क़रीब क़रीब सब छोड़ दिया। X तथा Y Point के लिये ‘मालिक’ को बहुत बहुत धन्यवाद है। मैं ‘उन्हें’ क्या दे दूं, समझ में नहीं आता, जब कि लेना देना का भी होश ‘मालिक’ ने ही सम्भाल लिया है। जैसे ‘आपकी’ मर्जी हो, मुझे ले चलिये। मुझे बस यही आनन्द और यही खुशी है।

    X और Y दोनों स्थान खुल रहे हैं और सैर भी होने लगी है, परन्तु दशा अभी पूर्ण एहसास में नहीं, किन्तु कुछ तो आ रही है। यहाँ यह ताज्जुब है कि मैं Point Cross होने के धन्यवाद में प्रार्थना की तैयारी की राह देख रही थी। ‘आपके’ कृपा-पत्र की राह थी, खैर, मेरे ‘मालिक’ की कृपा ही ऐसी है।

  डाक्टर सिन्हा ने जाने कैसे मेरी तबियत खराब लिख दी, जब कि मैं ‘आप’ से झूठ नहीं बोलूंगी कि जब से लखीमपुर से आई थी, तब से हर हालत अच्छी ही है। आँतों और मेदों में शक्ति है, हाँ, अन्तर इतना है कि उन्होंने शक्ति को चूस लिया है, इसीलिये जो धीमी-धीमी सी दुखन थी, वह भी शान्त हो गई। भूख पहले से अधिक बार लगती है, केवल इतना है कि भारी चीज़ व ज़्यादा एक बार खाने से ज़रूर भारीपन व बेचैनी हो जावे परन्तु ऐसा मैं होने तो नहीं देती हूँ पूज्य बाबूजी ! कुल शरीर में भी ताकत अभी ऐसी मालूम पड़ती है कि कभी अधिक कभी कम। जैसे ‘आप’ लिखते जाते हैं, मैं शरीर के भी लिए करीब करीब वैसे ही कोशिश करती हूँ कि ठीक रहे। विमला, उमा व बड़ी भाभी भी पूजा में उत्साह बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। विमला के संस्कार एकदम से पूजा कराते ही सामने आ गये, तमाम गुदे हुए थे। जो कुछ भी थोड़ी सी आत्मिक- दशा समझ में आई है. सो लिख रही हूँ।

    भाई, कुछ ऐसा लगता है कि अब तो Soul के मैदान में चल रही हूँ। अब न पूजा है, न लय-अवस्था। बस जैसी दशा है, वही पूजा है और वही लय-अवस्था। पूजा से आँख बन्द करते ही तबियत घबराने लगती थी, किन्तु अब तरीका समझ में ‘मालिक’ की कृपा से आ ही गया। न निगाह अब शुद्धता के मैदान में है, न बंदगी के। निगाह को इनसे परे हल्की मुर्दनी सी दशा में पाती हूँ। दशा पूरी तौर से Vision में जो आई है, अब की पत्र में लिखूंगी। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-380
इलाहाबाद
24/3/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। आशा है, पूज्य मास्टर साहब होली में वहाँ ‘आपके’ पास आये होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

  इधर तो कुछ ऐसी सुस्ती रही कि चार-पाँच दिन चाहकर भी पत्र लिख न सकी। दशा क्या है ‘श्री बाबूजी’ कुछ यह हो गया है कि तड़पना शब्द हृदय पर बर्छी की सी चोट करता है। मीरा पद हृदय को चीरने लगते हैं, किन्तु लगते बहुत अच्छे हैं। यहाँ तक कि सिनेमा के गाने में भी ऐसे शब्द या भाव सुनकर तबियत भीतर ही भीतर अधीर सी होने लगती है। बस कुछ ‘मालिक’ की कृपा रूपी सुई और हाय शब्द की डोर मानों हृदय को दो टुकड़े होने से रोके रहती है। दुनिया का कुछ ऐसा दृश्य दिखलाई पड़ता है कि मानो मुर्दानगी छाई हुई है। कहीं मार-काट, कहीं Trains लड़ीं, कहीं आग की लपटें सी, पृथ्वी में ज्वालामुखी और भूचालों के लक्षण मालूम पड़ते हैं। इंग्लैण्ड में लन्दन में मानों हाल में ही ज्वालामुखी फटने वाला है, क्योंकि कुछ मामूली ही कसर बस शेष लगती है और समुद्र उसकी जगह लेने वाला। बस यह समझिये समस्त पृथ्वी रक्तमय बन चुकी है, क्योंकि हर जगह ऐसे ही परमाणु पाती हूँ, किन्तु साथ में भाई, आगामी बहार का यह हाल है कि ऐसा लगता है कि भारत मानों रानी की तरह सजा हुआ है। हरी-भरी लताऐं बन्दनवारों की तरह शोभित हैं और मानों दूध की नदियाँ बह रहीं हैं। किन्तु फिर भी ऐसा लगता है कि कहीं ‘मालिक’ की Will Force और कहीं परमाणुओं में ऐसे ही Creations मौजूद रह कर काम कर रहे हैं।

  कुछ यह हो गया है कि अंतर पत्थर सा हो गया है, क्योंकि चाहे कुछ हो, उसमें कुछ होता ही नही, ज्यों का त्यों रहता है। भाई, पहले मैं लिखा करती थी कि मेरा हृदय मानों संगमरमर और आईना की तरह चमकता रहता है, किन्तु अब देखती हूँ कि वह कोरा पत्थर मात्र सा ही रह गया है, हाँ परन्तु इसके (यानी पत्थर के ) अंतर में अवश्य सिलसिलाहट है, जो दशा को Read करवाती है। अब ‘मालिक’ जानें, जो कुछ ‘उसने’ दिया हो। बड़े चाचा की हालत तो अच्छी चल रही है। मुझे माथे के चक्रों पर भी अब काफ़ी असर लगता है। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपा कांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-381
शाहजहाँपुर
26/3/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

आज करीब दो बजे दिन के मुझे तुम्हारी बराबर याद आ रही है और विचार भी अक्सर काम करता है। चार बजे दिन के करीब तो मेरी यह हालत थी कि इलाहाबाद जाने के लिये जी बहुत चाहता था, तुम वापसी डाक जवाब दो, क्या बात है? मुझे स्वतः फ़िक्र हो रही है। अम्मा का भी हाल लिखना।

अम्मा और तुम्हारे चाचा जी को प्रणाम।

  शुभचिंतक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-382
इलाहाबाद
29/3/1954
मेरे परम पूज्य श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-कार्ड ‘आपका’ अभी मिला। समाचार मालूम हुए। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ आपके कार्ड में जो मेरी याद आने के बारे में लिखा है, यह मेरा सौभाग्य है। मुझे कभी यह मालूम न था कि इस नाचीज़, की भी याद में ‘मालिक’ का जी यहाँ आने को चाहने लगेगा। मेरे ‘श्री बाबूजी’ ‘आपकी’ जो मेहरबानी इस गरीब पर है, और होगी, उसका ऋण क्या कभी चुकाया जा सकेगा। ‘आपने’ जो याद का कारण पूछा है, उसका उत्तर भला मैं क्या दे सकती हूँ। कोई विशेष बात केवल अपनी कुछ बेचैनी के और कुछ समझ में नहीं आ रही है। कुछ याद नहीं आ रहा है। मेरी करबद्ध स्वयं ‘आपसे’ ही प्रार्थना है कि यदि ‘आप’ उचित समझें तो मुझे इसका कारण अवश्य लिखने की कृपा करें। मुझमें कुछ कमी तो नहीं आ गई। मुझसे कोई धोखे से ग़लती तो नहीं हो गई, कृपया लिखियेगा। मुझे तो ‘मालिक’ की कृपा का ही भरोसा है और यही मेरा जीवन है। ‘आप’ मुझे ज़रूर लिखने की कृपा करें। श्री (आपके) चरणों में आकर मेरा तो जीवन बन गया। यदि भूले से या सुस्ती के कारण कोई कमी आ गई हो तो लिखियेगा। कृपया उत्तर शीघ्र दिलवा दीजियेगा।

  मेरा तो यह हाल है कि याद से मेरा जी घबराता है। पूजा तो Automatically होती थी उससे बन्धन हो गया। दीनता, गरीबी का मुझमें नाम नहीं है। नम्रता भी महसूस नहीं होती। किन्तु कुछ तरह की Condition से ज़रूर Touch है, इससे अलावा मुझसे कोई पूजा नहीं होती। इधर न जाने क्यों चाल ज़रूर मध्यम सी पड़ती है और दशा न जाने क्यों उतना साफ़ Read नहीं कर पाती हूँ, यद्यपि अनुभव तो साफ़ है, और Feelings भी उसके साथ-साथ है। कुछ यह हो गया है ‘श्री बाबूजी’ कि चाहे Condition हो या कभी-कभी Working तक, सत्य बात मुझसे यदि उसके विषय में कोई कुछ चलावे तो छुपती नहीं। क्योंकि ‘आपके’ देन को कहाँ सम्भाल कर रखूं। जब हृदय को ‘मालिक’ ही खरीद चुका है। दशा क्या है, आकाश तत्व उससे भारी ही पड़ेगा। धुएँ से हल्की ही होगी। अपने को खाली छोड़ने से भी अच्छी दशा नहीं लगती। भाई, न जाने क्या बात है कि निगाह के अंतर की ओर जाते ही, जी सा घबराने लगता है। ‘आपका’ कार्ड आने से ऐसा लगने लगा है कि मानों यदि मुझमें कुछ कमी आ गई हो, सो दूर हो चुकी, यद्यपि मुझे कोई कमी या गलती एहसास में नहीं आई और न आ रही है। इस समय मैं भी Anxious हूँ, जानने के लिये। कृपया लिखियेगा ज़रूर। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपा काँक्षिणी सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-383
शाहजहाँपुर
31/3/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो।

तुम्हारा पत्र 24 मार्च सन् 54 का मिला। तुमने जो कुछ होने वाली बातें जल्दी होने को लिखी हैं, वह ठीक ही होगा। आज 29 मार्च 54 का भी पत्र मिल गया। मुझे स्वयं आश्चर्य है कि मुझे इतनी बेचैनी क्यों पैदा हुई, कि इलाहाबाद आने की तबियत चाहती थी। अब वजह जब तुम पूछती हो तो यही मालूम होता है कि यह आकर्षण तुम्हारी ओर से था। सम्भव है कि तुम्हें मेरी याद किसी कारण से कुछ तीव्र हो गई हो। याद जब Sub-Conscious mind में पहुंच जाती है, तब उसमें बहुत तीव्रता और आकर्षण बढ़ जाता है। Sub-Conscious mind की खोज (Research) का मुझे इसी समय विचार पैदा हुआ। Research कहाँ तक की जावे अब इसको तुम्हीं सब सोचो। इतना इशारा किये देता हूँ कि Sub-Conscious mind ऐसी जगह है, जहाँ पर कि एक प्रकार की बिजली सी बनती है। जिसका ख्याल किया जाय उस ओर तीव्रता बहुत बढ़ जाती है। मंत्रों का जाप खामोशी से करने को यों ही बताया जाता है कि उस कैफियत में यह चीज़ आ जावे कि उसका प्रभाव उसके नतीजे पर ज़्यादा पड़े और यहाँ पर ख्याल बाँधने से इच्छा-शक्ति बहुत तेज़ काम करती है। Special Will इसी Sub-Conscious mind से होती है, गो इससे भी Higher एक Region है, वहाँ को बनी हुई Special-Will चन्द मिनट या सेकण्ड ही में दुनियाँ का नक्शा पलट सकती है। Special Personality जब कहीं ईश्वर के हुक्म से आ जाती है, तो इसी स्थान पर शक्ति अधिक होती है और कहीं ईश्वर की अनुकम्पा कहीं किसी पर अधिक हो गई और बड़े खास कार्य करने को हुए तो इससे आगे Special Will के तीन स्थान और हैं, जहाँ पर इन्तहाई Power है। यहाँ तक तो बन्दा पहुंच जाता है, इसके आगे वह एक ही स्थान है, वह बिल्कुल ईश्वर के Will की जगह है और यह उसी के पास रहती है। इस वस्तु का हक़दार मुमकिन है कि अभी तक कोई न हुआ हो, मगर उसका हक़दार बनने की तरकीब बस यही हो सकती है कि अपनी हालत ऐसी बना लें, जैसी कि होनी चाहिये, अर्थात् अपने आपको वास्तव में बिल्कुल लय कर दे। इस क़दर जितना बन्दे कि लिये सम्भव है। और एक साधारण बात मैं तुम्हें लिखता हूँ, जिसको समझ लेने से ईश्वर और जीव के फ़र्क जो लोग पूछते हैं, समाप्त होते हैं और इच्छा शक्ति की बहुत सी बातें हल हो जाती हैं। हमें दर हक़ीकत Higher Pressure से Lower Pressure में जाना है। हवा सब जगह एक ही है, मगर उसका Pressure पृथ्वी की ओर Higher है, और ज्यों हम ऊपर जाते हैं, हवा का Pressure Low हो जाता है, अर्थात् हवा भारी से हल्की हो जाती है। यहाँ तक कि आगे चलकर Pressure रहता ही नहीं बल्कि Vacuum हो जाता है। मैंने तुम्हें ब्रह्म और जीव का एक मज़मून लिखकर कर भेजा था, अब यह दो वाक्य और लिख दिये। Higher Pressure जब है वह तो जीव-गति है और Lower Pressure जो है, वह ब्रह्म-गति है। वस्तु एक ही है। चौबीस प्रकार के ब्रह्म जो वेद में लिखे हैं, उन सबको इसी में घटित कर लो। जितनी हल्की हवा है, उतनी ही ब्रह्म-दशा समझनी चाहिये। बस इशारे के तौर पर लिख दिया, इस लिये पढ़े-लिखे लोग संभव है, कि जीव और ब्रह्म के प्रश्न करें।

  तुमसे कोई ग़लती नहीं हुई, इस विचार को दूर करो। पूजा अब तुमसे होना बड़ा कठिन है, इसीलिये मैंने बहुत पहिले से पूजा की पाबन्दी के लिये मना कर दिया था। तरकीबें नई निकालती रहो, मगर वह थोड़े ही थोड़े दिनों काम देगी और अंत में परिणाम यही होगा। आंख से यह कहो कि वह अपने आपको देखे, तो यह कैसे हो सकता है या आईना मुंह खुद देखे, तो यह कैसे सम्भव है। तुमने लिखा है कि दीनता, ग़रीबी और नम्रता भी महसूस नहीं होती, यह सब रास्ते की बातें हैं। बस ऐसे समझ लेना चाहिये कि मनुष्य संसार में रहता हुआ हर वस्तु से प्रेम रखता है और जब मृत्यु होती है तो कोई वस्तु साथ नहीं जाती। इसी प्रकार से लय- अवस्था समझनी चाहिये कि उस दशा में मनुष्य कुछ अपने पास नही रखता और महा-प्रलय की भी तारीफ़ यही है कि कुछ न रहे। तुमने लिखा है कि ‘इधर चाल मन्द सी प्रतीत होती हैं’। गति मन्द नहीं है, बल्कि वहाँ का भान इस कदर मन्द है कि ठहराव सा दृष्टिगोचर होता है। दशा में तुम्हारे ईश्वर की कृपा से कमी नहीं, प्रत्युत्तर बढ़ती ही है। 

  ईश्वर को धन्यवाद है कि अम्मा को सेहत हो रही है। पण्डित लक्ष्मी चन्द्र, पण्डित रामेश्वर प्रसाद का जन्म दिन अपने मौज़ा लखनौर में 15 अप्रैल को मनावेगे, सब सत्संगियों को निमंत्रित किया है।

  अब हिन्दी के लिखने वाले दो मिल गये हैं, उसमें एक बहुत काबिल हैं। अब हिन्दी के पत्रों के उत्तर बहुत सुगमता से पहुंच सकेंगे। तुम अपना खत अपने चाचा को पढ़कर सुना देना, शायद कोई बात उनके काम की इसमें निकल आवे।

शुभचिंतक 
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-384
शाहजहाँपुर
6/4/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो।

तुम्हारा खत 4.4.54 का लिखा हुआ आज मिला। पूजा अब तुमसे होना मुश्किल है। इसलिये मैंने पाबन्दी हटा ली है। अब तो तुम्हारी वह हालत है कि दूसरे लोग तुम्हारी पूजा करें। मगर इससे अहंकार नहीं होना चाहिये, इसलिये कि ऐसा तो होना सबका धर्म है। अहंकार का तो तुममें गुज़र भी नहीं हो सकती। पूजा में जब हम किसी की पूजा करते है तो दुई बढ़ती है और हालत तुम्हारी Non-Duality की है और ऐसी हालत में पूजा करती हो तो Duality की तरफ़ जाना पड़ता है, इसलिये घबराहट पैदा होती है, क्योंकि जब दूसरा माना जायेगा, तब तो हम पूजा करेंगे। जब दूसरों को सत्संग कराती हो, तो तुम दुई का ख़्याल ले लेती होगी। इसी वजह से उस वक्त घबराहट पैदा होती है। यही वजह है, जैसा कि तुमने लिखा है कि जब याद करती हूँ तो उससे Touch नहीं हो पाती। यहाँ Touching का सवाल ही नहीं, जिसकी तुम याद करती हो वह तुम ही खुद हो। इसलिये तुम्हारा यह ख्याल पैदा होता है कि तुम Touch नहीं कर पातीं कोई दूसरी चीज़ होती तो याद Touch करते हुए दिखाई पड़ती। तुमने यह लिखा है कि कहीं ठहराव तो नहीं हो गया है। यद्यपि यह है तो असम्भव बात पर यह दोनों बातें सही हैं। ठहराव हो भी गया है, और नहीं भी हो गया है। मेरा मतलब यह है कि X, Y के मैदान में एक साफ़ चटियल हालत है, जिससे कि तुम In-Touch हो। और इसकी चौड़ाई इस क़दर है और इस क़दर खुला हुआ है और तुम्हारा गुज़र भी उस मैदान में है और निगाह तुम्हारी अंदरूनी जाती है, तो सिवाय मैदान के और कुछ नज़र नहीं आता, उसको तुम ठहरी हुई हालत कह सकती हो, मगर इसको ठहरा हुआ कहना भी गलती होगी इसलिये कि इससे आगे जाने की हिम्मत और ताक़त इस मैदान में रहते हुए पैदा हो रही है और इसीलिये जब तक तुम में आगे उड़ान की ताकत पैदा न हो जावेगी, आगे मुकाम पर नहीं बढ़ाऊंगा और ईश्वर ने चाहा तो पैदा हो जावेगी और मैं भी जो कुछ थोड़ी बहुत मदद दे सका, दूंगा। इस मुकाम पर बेइंतिहा ताकत है और थोड़े दिन रुकना और अच्छा होगा।

  तुम जो लखनौर के उत्सव में लिखकर भेजोगी वह पढ़वा दूंगा।

  शुभचिंतक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-385
लखीमपुर
19/4/1954
मेरे परम पूज्य श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कल ताऊजी व मास्टर साहब जी आराम से यहाँ पहुंच गये। लखनौर के उत्सव का सारा हाल सुन-सुनकर मेरे हृदय में बड़ी प्रसन्नता हुई। भाई लखमीचन्द जी का सा उछाह, यदि सत्संगी भाई बहनों में फैल जाये, तो कितना अच्छा हो। मैं भी अम्मा व केसर के साथ परसों यहाँ पहुंच गई। कानपुर में डा. तिवारी होम्योपैथ को अंग्रेज़ी की किताब दी थी, आधी ही पढ़कर बहुत प्रसन्न थे। उनका कहना था कि जब से यह चीज़ Educated man के बीच में आयेगी, तब से इसका बहुत प्रचार होगा और सबको बहुत पसन्द आयेगी, परन्तु कुछ देर इसीलिये लगेगी कि महात्माओं और स्वामियों ने जनता के ऊपर काला आवरण डाल दिया है। अब उन्हें एक पुस्तक अंग्रेजी की और दो, दो हिन्दी की इलाहाबाद में प्रोफेसर राना डे के लिए भेज रही हूँ। उनका कहना था कि ‘आपसे’ मिलकर वे बहुत खुश होते, परन्तु मुझे कुछ पता न था, नहीं तो मैं ज़रूर मिलाती। जो कश्मीरी सज्जन व उनके मित्र आते थे, उन्होंने बीच-बीच में कहा था कि यह प्रोफेसर राना डे ने भी बताया था, परन्तु मेरा ध्यान न गया। खैर ‘मालिक’ की मर्ज़ी होगी तो फिर देखा जायेगा। ‘बाबूजी’ डा. तिवारी ने कहा है कि मेरा मन नहीं मानता, आप जरा सा मनोयोग (मन का योग) मुझे दें, जिससे मैं कुछ योगिक क्रिया से आँत की T.B. को दूर करने की कोशिश करूँगा, दो दिन उन्होंने किया। लाभ तो मुझे है, किन्तु मेरी तबियत किसी दूसरे को गवारा नहीं कर सकती। उन्होंने आँत में पार्थिव तत्व की कमी के कारण ही T.B. होना बताया है। पार्थिव तत्व चन्द्रमा में अधिक है या मूलाधार से सहायता लेने की Will लगाने को कहा है, किन्तु ‘आप’ मुझे बतावेंगे, मैं वही करूंगी। उत्सव में ‘आपने’ शर्बत ले जाने को मुझसे कहा था, परन्तु मैं लाई नहीं, सो कृपया यदि उत्सव में कोई यहाँ आवे तो उसके हाथ अवश्य भेज दीजियेगा।

  अम्मा कहती हैं और सबकी प्रार्थना है कि यदि हो सके तो उत्सव में जो ताः 23 को है, ‘आप’ भी पधारें। यदि थकान व कमज़ोरी हो तो हम ज़ोर नहीं देतीं। ‘मालिक’ की कृपा तो होवेगी ही। अब इलाहाबाद में कम से कम मालूम तो पूजा के विषय में बहुतों को हो गया है। मेरा मन कहता है कि कभी न कभी वह दिन अवश्य आयेगा, जब लोग ‘मालिक’ के नाम व पूजा से ही परिचित मिला करेगें। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

  अब तो ऐसा लगता है कि जो हृदय लम्बा-चौड़ा मैदान सा लगता था, सो कुछ बंदिश टूट जाने से भीतर-बाहर एक ही Flow हो गया है, इसी कारण शायद आगे बढ़ने की ताकत पैदा हो गई है। कुछ यह हाल है मेरे ‘श्री बाबूजी’ कि जो कुछ भी है, सब ‘मालिक’ की कृपा से ही है, क्योंकि मैं देखती हूँ कि भाई, साधना के लिये Time मैं कहाँ से लाऊं, जब रात-दिन सबेरा-शाम से तथा Time से ही मेरा सम्बन्ध समाप्त हो चुका है। न जाने यह क्या बात है कि देखती हूँ कि यदि पूजा करवाने में जैसे अमुक लोग कर रहे हैं, ऐसा (दुई सी) हो जावे, तो भी जी बंधने सा लग जाता है। अच्छा नहीं लगता है, बस सफाचट मैदान समझकर जैसी दशा में हूँ, वैसे बैठूं तो कुछ नहीं। अब तो समझ में नहीं आता कि पूजा जाने करवा पाती हूँ या नहीं, ऐसी दीन सी नहीं, खाली सी दशा है और दशा यह है कि न खाली हूँ न भरी हूँ, जैसी हूँ, ‘वही’ जाने। यहाँ तक है कि सामने दूसरे को पूजा करने बैठा समझू, तो रूप-नाम तो कुछ अनुभव में आता ही नहीं फिर भी इस ख़्याल (दूसरे के) मात्र से जी बंध सा जाता है। कुछ ऐसा लगता है ‘श्री बाबूजी’ कि जो लम्बा-चौड़ा मैदान हृदय में था, वही बंदिश टूट कर सामने भी आ गया है, इसीलिये अब ठहराव की सी Condition नहीं मालूम पड़ती। अब तो भाई, दशा क्या है, यही कि जिसका नाम तत्व-मसि ( वही तू है) सुना करती थी, भीतर-बाहर अब वही दशा अनुभव में स्वतः ही आती है। मैं तो देखती हूँ कि यह इतनी हल्की दशा है कि किंचित (ज़रा सा) दशा को अनुभव की कोशिश से ही जी घबराने लगता है। यह तो अपने आप ही कुछ स्वाभाविक-दशा सी फैली हुई है, फिर समझ में नहीं आता कि लोग इसको कहने या रटने से कैसे प्राप्त कर सकते हैं। यह तो जाने भाई, केवल ईश्वर की कृपा का Result ही Result है। अब तो बस यही दशा अनुभव होती है। ‘श्री बाबूजी’ अब तो रहित हूँ, Power, वायु, साधना, साध्य, सब कुछ समाप्त हो चुका। अब तो जो है, वह केवल फल ही फल है। फल भी ‘मालिक’ के हवाले है, क्योंकि मैं रखूंगी कहाँ, मेरे पास ठौर नहीं है। नम्र सी दशा होती चली जाती है। दशा में गहराई है ही नहीं न उथली है, एक समान Condition में है।

  अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इति:-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-386
शाहजहाँपुर
25/4/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

इलाहाबाद से भेजा हुआ खत मिला और 19.4.54 को लखीमपुर से भेजा हुआ पत्र भी मिला और उसी का मैं जवाब दे रहा हूँ। प्रोफेसर राना डे को तुम Efficacy of Raj Yoga भी भेज देना। अब मैं तुम्हारी हालत का जवाब देता हूँ। लिखने से पहले सन्त तुकाराम का एक पद आया “गुड़ से मीठे हैं भगवान्, बाहर-भीतर एक समान”। बस, अब मुझे तुम्हारी यही हालत मालूम होती है। जब जिस्म का भान नहीं रहता और रूह का भान भी थोड़ा-बहुत समाप्त हो जाता है, तो ऐसी हालत प्रतीत होने लगती है। दुई का अब तुम में पता कहाँ और यह हमारे लालाजी की Teaching की बरकत है कि जो एक Step ऊंची ही रहती है। Non-duality है, मगर भान उसका कम है और यह Stage बढ़ना चाहिये और यह Stage एक Limitless समुन्दर है और इसमें जाने कितना पैराव होता है। बेदों में अद्वैत (Non-Duality) कहा है, सम्भव है, इससे आगे भी कोई कह गया हो, मगर यक़ीन कम है, इसलिये कि बहुत सी बातें खुद अनुभव के लिये भी छोड़ दी जाती मैं बग़ैर कहे नहीं रह सकता, सम्भव है लोग इससे सहमत न हों। जब हम ऐसी हालत में पहुंच जाते हैं, कि जहाँ न Duality महसूस होती है, न Non-Duality इस तरह पर, अर्थात् इसकी पहिचान यह है कि चाहे सौ वर्ष या हज़ार वर्ष तक द्वैत-अद्वैत पर Meditate करें, तो भी यह ख्याल में न आवे कि हम Duality में हैं या Non-Duality में, तब यह हालत सिद्ध हुई। अव्वल तो, जो वाकई इस हालत में है, उसमें इतनी शक्ति ही नहीं रहती कि वह इस पर Meditate कर सकें। एक ही मिनट में Meditate करने से दिल घबरा उठेगा। जब इन्सान इस हालत पर आ जावे, तो फिर असलियत पर आ गया, मगर पैराव अभी बहुत बाक़ी है, इसकी हद नहीं। बिटिया ! मैं वाचक ज्ञानियों की भाँति कह भी जाता हूँ, मगर सच पूछो तो, मुझे खबर नहीं। जब कोई अभ्यासी ऐसी हालतों में आ जाता है तो, मुझे खबर होती जाती है। मुझे आता तो खैर कुछ नहीं, मगर जो कुछ भी आता है, मैं चाहता हूँ कि लोग सीख लें, ताकि वह खुद ही ऐसे हो जायें, अगर उस हालत तक औरों को न पहुंचा सकें। मैं इस बात को कल सोच रहा था कि हो सकता है कि इक्का-दुक्का अगर मेरी तक़दीर मदद करे, तो ऐसे लोग बन जावें, मगर फिर इन हालतों में दूसरों को पहुंचाना बड़ी कठिन चीज़ हो जावेगी, जब तक जिस्म का ज़र्रा ज़र्रा (परमाणु) भूमा की असल कैफ़ियत न ले आवे और यह हो सकता है। कहूँगा यही, इसलिये कि जब हमारे गुरु- महाराज में कोई कमज़ोरी नहीं, तो मुझमें भी नहीं हो सकती, ख्वा लोग इसे अहंकार समझें, इसकी परवाह नहीं। जिस्म से कमज़ोर ज़रूर हूँ, मगर हिम्मत और ताकत में कमी नहीं कि यह एक Second का काम है। बिटिया ! मेरा तो यह ख्याल है कि अगर रुहानी सम्बन्ध में किसी Stage पैदा करने में एक Second से दूसरा Second लग गया, ( बशर्ते कि उस एक Second में काम करना भी चाहूँ) तो मैं पतित हो गया और इस काबिल नहीं रहा कि दूसरों को तालीम दे सकूँ। लोग इसको अहंकार समझेंगे, समझा करें। अब सवाल यह है कि एक Second में सब कुछ कर देने का धक्का बर्दाश्त कर सकेगा और मुझे इसका अक्सर खेद रहता है कि कोई शख्स अगर इतना ज़्यादा नहीं तो इतना ही सिखाने वाला इस मिशन में पैदा हो जाये। यह सब ‘मालिक’ के हाथ में है, जो ‘वह’ चाहेगा, वही होगा। अन्त में कहना यही पड़ता है, क्योंकि हम फिर भी बन्दे हैं और इसलिये एटीकेट कायम रखना जरूरी है। हमारे यहाँ तो यह हाल है, कि अगर हम चाहें भी Special Will से तालीम करना, तो लोग मेरे ख्याल में जंजीर डाल देते हैं। अब यह उनकी किस्मत है या मेरी।

  पूजा के वक्त जो तुम्हें दुई समझ पड़ने पर घबराहट मालूम होती है, इसके बारे में मैंने जो खत इलाहाबाद भेजा था, उसमें मैं लिख चुका हूँ। तुम्हें पूजा कराने का ख़्याल तो नहीं हो जाता, इसलिये यह चीज़ महसूस हो जाती हो? आगे बढ़ने पर मुमकिन है, यह बात खुद-ब-खुद न रहे। मैंने X, Y स्थान से अभी आगे नहीं बढ़ाया है। ताकत अच्छी पैदा हो गई है, मगर अभी और ताकत पैदा होने का इन्तज़ार है। इसका असर अभी कुल जिस्म में नहीं भिदा है। ईश्वर ने चाहा, यह भी हो जायेगा ठहराव नहीं है, ताकत बढ़ रही है। भाई-बहनों को आशीर्वाद।

  शुभचिंतक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-387
लखीमपुर
25/4/1954
मेरे परम पूज्य श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा पत्र पहुंचा होगा। बहुत दिनों से ‘आपकी’ तबियत का समाचार नहीं मिला-इस कारण कुछ फ़िक्र है। उत्सव परसों बड़ी अच्छी तरह हो गया सब ‘मालिक’ की ही कृपा व उन्हीं की मर्ज़ी थी। अम्मा अच्छी हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ। ‘आपकी’ साँस तो ठीक है, अवश्य लिखियेगा।

  कुछ यह दशा है कि ऐसा लगता है कि मानों ऐसा कभी नहीं था जब मैं नहीं थी, ऐसा नहीं है जब मैं नहीं हूँ, और ऐसा कभी नही होगा जब मैं नहीं रहूँगी। और यहाँ तक है कि लखीमपुर आई, तो यही नही लगता था कि मैं यहाँ से कहीं गई थी, इलाहाबाद गई तो यह नहीं लगता था कि मैं यहाँ कभी नहीं थी। और जब कानपुर गई तो, वहाँ भी नहीं लगा कि मैं अभी ही यहाँ आई हूँ।

  भाई, अब तो यह दशा है कि ऐसा लगता है कि जो सत्ता केवल एक सत्ता, जो स्पन्दन-रहित सी है, और हर जगह एक ही दशा सी है, ऐसा लगता है कि वही मैं हूँ। जो न कभी बदलती है, न बदलेगी। एक समान, चेतन या अचेतन कहूँ, ऐसी जो सत्ता है, वही मैं हूँ। जहाँ न रात है, न दिन, न प्रकाश है, न अन्धेरा, न हवा का Pressure है, बस ऐसी स्थिति में मेरा बसेरा है। न बोलती हूँ, न अनबोलती हूँ। ‘मालिक’ जाने, जो कुछ भी हूँ ‘उसी’ की हूँ। चेतन, यों कह लीजिये कि उस सत्ता का बोध होता है, किन्तु ऐसा नहीं भी है, क्योंकि अवस्था अचेतन सी भी है, किन्तु शायद उसमें चेतन मन की चैतन्यता, उसका बोध कराती है, वह जैसी भी हो एक समान नहीं, वरन् सहज अवस्था है। जो सदैव एक ही है और यही रहेगी। उसमें Deep जाने से या उस अवस्था में अनुभव करने से कभी नींद सी कुछ Inactiveness सी आती रहती है, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से चेतना लुप्त नहीं होती, जिससे मुझे आगे उन्नति करने का अवसर मिलता जाता है। ‘उसका’ हज़ार- हज़ार धन्यवाद है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ मुझे ऐसा लगता है कि यह Condition मृत्यु से पहले नहीं मिल सकती थी, वह केवल Special Personality की ही कृपा व शक्ति है, जो ज़िन्दगी में भी मृत्यु के बाद की आनन्द दायक Conditions का जलवा दिखा रही है और आगे और दिखाती ही रहेगी। ऐसा लगता है कि अब तो जीवन के रहस्यमय पर्दे या Chapters खुलते जाते हैं। भाई, चेतना भी ऐसी लगती है कि मन का कुछ हल्का सा Pressure पड़ने से ही अनुभव में आ पाती है। न जाने क्यों ऐसा लगता है कि दशा तो प्रकृति से भी परे पहुंच चुकी है। न जाने क्यों पहले से अधिकतर परन्तु अब कभी-कभी माथे के बीच में बड़ा गड्ढा सा हर समय महसूस होता है। अब तो यह हाल है कि शुद्धता की मुझमे गुजर नहीं, वह तो जैसे, जब कोई पीछे फिर कर देखे तो महसूस हो, किन्तु वैसे तो अब एक रहित-सत्ता या दशा में मेरी दशा घुसती चली जा रही है। इधर ‘श्री बाबूजी’ दो दिन से न जाने क्यों ऐसा लगने लगा है कि न मैं कभी थी, न हूँ और न रहूँगी। कल करीब एक घंटे शाम को बाँयें पैर के तलवे के बीच से करीब एक सूत ही बाँयें हटकर कुछ ऐसा लगा, जैसे कोई चीज़ खुलने के लिये फड़-फड़ सी हो रही थी, फिर बन्द हो गई और कुछ गुदगुदी सी भी थी, अब ‘आप’ ही जानें, मुझे तो कुछ नहीं मालूम मुझे सुस्ती बहुत है और नींद सी बहुत लगती रहती है। अम्मा ‘आपको’ आर्शीर्वाद कहती हैं। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-388
लखीमपुर
28/4/1954
मेरे परम पूज्य एवं कृपालु श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ कल मिला- पढ़कर अत्यन्त हर्ष हुआ। ऐसी कृपा की रीति कि भगवान अहेतु की कृपा वाला है, ऐसी अनोखी कृपा-रीति मैंने पूर्णतया ‘आप’ ही में पाई। भला मैं कुछ कर भी पाऊँ या नहीं, किन्तु ‘आपकी’ कृपा तो जिस क्षण से प्रारम्भ हुई है, एक क्षण का भी नागा नहीं होने दिया। सच तो यह है कि मेरी ऐसी की गुज़र भी ऐसे ही (आपके ही) दरबार में ही हो सकती थी, और है, और होगी। दर-दर की ठोकरों ने आखिर को ‘स्वामी’ के द्वारे ला ही खड़ा किया और ‘मालिक’ भी इस अकिंचन और अपाहिज पर प्रसन्न है। बस मैंने सब कुछ पा लिया, ऐसी ही कृपा ‘स्वामी’ की बनी रहे। मेरे ज़र्रे ज़र्रे से यही प्रार्थना की ध्वनि निकलती है।

  ‘मालिक’ की कृपा से पूजा करने, करवाने की घबराहट स्वयं ही साफ़ हो गई, क्योंकि अब तक की पुरानी रीति ‘उसने’ स्वयं ही सुधार दी। दशा के अनुसार काम होने लगा। अब तो ऐसा लगता है कि दशा का मेरे में भिदाव भी होना शुरू हो गया है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ जो कुछ भी Gain हो सकता है ज़िन्दगी में तो, मेरे ‘मालिक’ के क़दमों में लोटती हर दशा को चाहे भूमा की हो या कोई, पाना ही है, क्योंकि बिना उनके (चरणों के) चैन कहाँ ? अब तो भाई अकिंचन सी नगरी में से इसी दशा में होकर चल रही हूँ, इस लिये किसी प्रकार के भार या बोझ का पता नहीं। न जाने क्यों इधर कुछ दिनों से सुस्ती, नींद तथा बेबात की खीझ सी लगने लगती है। किसी पर नहीं, लेकिन खीझ हो जाती है। मेरा भी विचार कुछ यह लग रहा था कि X Y Point की सैर तो क़रीब क़रीब पूरी सी लगती थी, किन्तु भिदाव न जाने क्यों नही हो रहा था या कुछ कमज़ोरी के कारण अनुभव अधिक साथ न देता हो। परन्तु ‘आपने’ लिखा है कि X Y Point की ताक़त काफ़ी पैदा हो गई। इसके माने मैं ठीक नहीं समझी, शायद उसकी दशा को हजम करने की ताकत या क्या। वैसे तो बड़ी हल्की, नम्रता की हल्की फुल्की सी दशा रहती है। किन्तु ऐसा लगता है कि यह हल्की भी (या हल्कापन) मुझमें हज़म होता, पचता चला जाता है। मेरे श्री बाबूजी, अब न जाने क्यों ऐसा लगता है कि अब रास्ता, रास्ता नही महसूस होता है, जैसे पहले लगता था कि मार्ग पर चली जा रही हूँ। अब ऐसा नहीं है। अब तो बिना मार्ग के चलती हूँ ‘श्री बाबूजी’। बिना गति के ही बढ़ती हूँ या गति (चाल) अनुभव में नहीं आती है और बिना पैरों के चलती, बिना कानों के सुनती और बिना हाथों के काम करती तथा बिना मुख, बिना शब्द और वाणी के बोलती। फिर भला Power का एहसास किस तरह हो और आगे चलकर तो भाई, जैसा ‘आपने’ लिखा कि Duality और Non-Duality एहसास करने की शक्ति ही नहीं रहती और अनुभव करने से जी घबरा जाता है ठीक ही है। यह दशा ऐसी लगती है कि पीछे फिर कर देखने पर यह अनुभव होती है और अब तो भाई, पूज्य ‘बाबूजी’ ऐसा लगता है कि अक्सर बिना है या नहीं के भी शायद है या हाँ करती चलती हूँ, जाने यह क्या दशा है। ‘आपने’ लिखा है कि दुई तुम में नहीं है, किन्तु मेरा तो यह हाल है कि न दुई और न अद्वैत ही अनुभव कर पाती हूँ। मेरे ‘श्री बाबूजी’ आपने लिखा है कि मैं आधी Century पार कर चुका हूँ और आधी में चाहे जितना पार कर लूं, किन्तु ‘श्री बाबूजी’ मेरा तो यह विचार और अनुभव है कि बिना ‘आपके’ दुनियाँ कभी थी ही नहीं और न कभी होगी और जिस दिन ‘आपके’ मन में यह होगा, उस दिन महाप्रलय हो जावेगा और उसमें भी यदि कुछ रहेगा तो वह केवल ‘मालिक’ का ही अस्तित्व शेष रहेगा। यही मेरा दृढ विश्वास और दृढ स्वाभाविक विचार है। ‘आपने’ लिखा है कि “मुझे अभी जीना है” पढ़कर सबको अत्यन्त प्रसन्नता हुई। मैं तो केवल इतना चाहती हूँ कि ‘मालिक’ के ही क़दमों और सदैव ‘उसकी’ ही छाया में रहूँ और ‘मालिक’ कृपा से ऐसा ही होगा।

  मेरी एक प्रार्थना है ‘श्री बाबूजी’ कि ‘आप’ बीमारी को System में से बाहर फेंकने लगे हैं तो इसका अवश्य ध्यान रखें कि उसका एक छींट भी ‘आप’ तक न पहुंचने पावे। ‘आप’ तो Master हैं, इस लिये ऐसा लिख दिया।

    अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। सेविका तो मिशन की मैं हूँ ही और ज़िन्दगी भर और जीवन पर्यन्त रहूँगी। मेरा सब कुछ मिशन के ही लिये है। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही
  सेविका-कस्तूरी 
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-389
शाहजहाँपुर
29/4/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे 25 अप्रैल व 28 अप्रैल के खत मिल गये। मैं पहले खत का जवाब दे रहा हूँ। तुम्हारा यह ख्याल बिल्कुल सही है कि ऐसा कभी न था, जब तुम नहीं थीं और ऐसा कभी नहीं होगा जब तुम नहीं होगी। मैं इसको पढ़कर गद्गद् हो गया। मगर बिटिया ! Perfection होते हुए यह असलियत की A, B, C, D हैं। तुम कहीं यह न कहने लगो कि बाबूजी तुम्हारी हर अच्छी हालत को A, B, C, D बता देते हैं। मैं अपनी निगाह को क्या करूँ? कि मुझे ऐसा ही मालूम होता है। ईश्वर वह समय लावे कि जिस असलियत की मैंने यह A, B, C, D बतलाई है, उस पर भी पहुंचो, तब तुमको मालूम होगा, कि मेरी निगाह ठीक थी। इस दायरे के आगे एक ऐसा दायरा आता है कि जहाँ पर ईश्वरी बातें आती हैं। ईश्वरी बातों से मेरा मतलब यह है कि जहाँ पर वैदिक ऋषियों के निकट ईश्वर के भेद खुले हैं, और उससे ऊपर वाले दायरे में श्रुति आना शुरू हो जाती है। अब मैं यह नहीं कह सकता कि कौन-कौन इस हालत में पहुंचे हुए थे। Brighter World में अगर मैं टटोलता हूँ तो गुरू महाराज (अपने) को छोड़कर एक शख्स निहायत ऊंचा -ऊंचा हुआ मिलता है, और मुमकिन है कि नारदीय सूत्र का लिखने वाला वही हो ओर दो उससे कम मिलते हैं। मगर बिटिया ! मैं अपने Writings छोड़ता चला जाता हूँ। अगर यह छप गये तो मुमकिन है किसी समय में कोई समझे कि जिस ऋषि ने नारदीय सूत्र लिखा हो, वह सम्भवतः Seven Rings के थपेड़ों को न पार कर सका, इसलिये उसके Expressions में गड़बड़ी रही। यह हमारे गुरू महाराज ही थे, जो Centre तक पहुंचे और दूसरों का पहुंचाने का रास्ता खोल गये। ऐसी Personality अब आना कठिन है। मैं तुम्हें खतों में अक्सर बेकार बातें लिख देता हूँ, वह इस लिये कि पढ़कर लोगों का शौक बढ़े।

  उससे आगे जो हाल लिखा है, कि जिस हालत में तुम हो, उसमें स्पन्दन नहीं है, वह ठीक है। X, Y स्थान की यही हालत है। तुमने यह लिखा है कि Special Personality के कारण जीवन मृत्यु की हालत का मज़ा ले रही हूँ, मैं कहूँगा कि तुम अपने ही कारण आनन्द ले रही हो।

  अब एक बात खुशखबरी की लिखता हूँ। चौबे जी ने तुम्हारे Realisation की मिठाई तो मुझे खिलाई नहीं, अब तुम्हारी जीवन-मोक्ष की दशा है। अब यह दूसरी वाजिब हो गई, तो यह मिठाई हमारी अम्मा हमें ज़रूर खिला देगीं, जब मैं वहाँ आऊंगा। तुमने यह जो लिखा है कि बाँये पैर के तलवे के बीच से कुछ हटकर सरसराहट मालूम होती है, यह वह स्थान है कि यहाँ पर Meditation करने से ब्रह्मरन्ध्र का स्थान खुल सकता है और इसमें सरसराहट पैदा होने का मतलब यह है कि उसके क़रीब का स्थान खुलना चाहता है। ब्रह्मरन्ध्र का स्थान ऐसा है कि जब ईश्वर को कोई बात बतलानी होती है तो इसी स्थान से आती है गोया यह Receiver है और जब बन्दे को कोई खबर भेजनी पड़ती है, तो वह सहस्त्रदल कमल के बीच की पंखुड़ी से भेजता है। गोया एक चीज़ ईश्वर के काम के लिये, और एक चीज़ बन्दे के काम के लिये गोया सहस्त्रदल कमल Transmitter है। एक बात और है, ईश्वर ब्रह्मरन्ध्र से देता है, मगर उसका एहसास सहस्त्रदल कमल में होता है। यह हमारी Research है, जो किसी अवसर पर किसी सवाल के जवाब में मैने बतलाई थी। अब दूसरे खत का थोड़ा सा जवाब देता हूँ।

    तुमने लिखा है कि X, Y स्थान का भिदाव अब शुरू हो गया है, मगर अभी पूरी तरह से भिदाव शुरू नहीं हुआ है। जब हो जायेगा, आगे बढ़ा दूंगा। मैं तो यह चाहता हूँ कि इसका भिदाव ज़र्रा-ज़र्रा और नस-नस में हो जाये, ताकि जीवन मोक्ष की दशा परिपक्व हो जाये। नींद इस कारण से भी हो सकती है कि मैंने कुछ Sittings तन्दुरुस्ती बढ़ाने के लिये दी है। और खीझ शरीर की कमज़ोरी की वजह से हो सकती है, इसका कोई आध्यात्मिक कारण नहीं हैं। तुमने जो मुझसे यह पूछा है कि X, Y Point पर ताकत आ जाने से मेरा क्या मतलब है, इससे मेरा मतलब यह था कि X, Y पर जो Conditions हैं, वे पूरी तौर पर उतर जायें और उन पर Command हो जाये अब इसकी ताकत मैं बताता हूँ। इस स्थान की ताकत अगर किसी सितारे पर झोंक दी जाये तो, टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा, मगर हम इस हद तक ताकत का एहसास नहीं होने देते। इसको अगर कोई शख्स इस्तेमाल करना चाहे तो, सबसे पहले इसके लिये यह लाज़मी होगा कि Limitations तोड़ दे, यह इसका खराब इस्तेमाल इसका यह है और इस हद तक हमारे यहाँ हो भी जाता है कि इसके ज़रिये से दूसरे की हालत भी ऐसी ही पैदा कर दे। बिना कानों के सुनना, बिना हाथ-पैर के चलना, इत्यादि जो तुमने लिखा है, यह ब्रह्म की दशा है। रास्ते पर तुम अब भी जा रही हो, मगर जैसा कि तुमने लिखा है, तुम्हें मालूम यों नहीं होता कि तुम्हें अपना होश ही नहीं है। तुमने यह जो लिखा है कि माथे के बीच में बड़ा गड्ढा सा हर समय महसूस होता है, यह मेरी समझ में नहीं आया। ज़रा इसके ऊपर Meditation करने के बाद समझ में आ जावेगा। तुम इसकी वजह सोचो ओर लिखो। मई के महीने में मिशन का Foundation day जो मुरादाबाद में होने को था, कुछ कारणवश मुलतबी कर दिया है।

  शुभचिंतक
  रामचंन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-390
लखीमपुर
1/5/1954
मेरे परम पूज्य श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ मिला-पढ़कर हर्ष हुआ। मेरी कमज़ोरी अब काफ़ी ठीक है| ‘मालिक’ की कृपा व परिश्रम तथा भाई डाक्टर सिन्हा के परिश्रम से फिर ठीक हूँ, कोई चिन्ता की बात नहीं है। पूज्य मास्टर साहब जी पत्र लिखने को भी मना करके Complete Rest दिलवा रहें हैं, किन्तु आज मुझसे ‘आपको’ पत्र लिखने की हुड़क न रुक सकी, इसलिए लिख दिया। ‘आपने’ जो लिखा है कि असलियत की A, B, C, D है, यह ठीक है, और जैसा ‘आपने' लिखा है कि “जिस असलियत की यह A, B, C, D मैंने बतलाई है, उस पर भी पहुंचो, तब तुमको मालूम होगा कि मेरी निगाह ठीक थी” तब तो ठीक होगा ही। ‘आपके’ पत्र कृपा से मुझे भी कुछ बातें मालूम हो जाती हैं। मुझे ऐसी दशा तो अब कभी कभी मालूम होती है, कि जैसे जीवन के रहस्यमय पर्दे या Chapter कुछ साफ़ होते जाते हैं, किन्तु न जाने क्यों, जैसे पहले मैं लिखा करती थी कि Intelligence खुलती व फैलती चली जाती है, परन्तु अब लिखने को मैं कुछ न कुछ अब भी लिखा ही करती हूँ, परन्तु मुझे न जाने क्यों अब ऐसा अनुभव नहीं होता है। मुझे Intelligence का भी भान नही होता, मैं समझ लेती हूँ कि मुझे तो ऐसा लगता भी है कि Intelligence के लिये मुझमें गुंजाइश ही नहीं रही। मुझे कुछ ऐसा लगता है ‘श्री बाबूजी’ कि जैसे मेरा तो मैंपना मैं लिखा करती थी, मुझे अनुभव नहीं होता, किन्तु अब देखती हूँ कि जैसे मेरा अस्तित्व भी मिटता जा रहा है या भाई, ऐसा लगता है कि मेरा अस्तित्व कही लय हुआ जाता है। अस्तित्व है क्या, यह मुझे मालूम नहीं। ‘आपने’ लिखा कि “रास्ते पर तुम अब भी चल रही हो, तुम्हें मालूम यों नहीं होता कि तुम्हें अपना होश नहीं” सो मेरे ‘श्री बाबूजी’ न जाने क्यों मुझे अपना होश नहीं। मुझे तो इसका भी एहसास नहीं होता। ‘आपके’ ऐसा लिखने पर मैंने ध्यान दिया तो भी न मालूम पड़ा और भाई, मालूम भी कैसे पड़े, मैं तो ध्यान किसी भी प्रकार को भी अपने में स्थान देने की गुंजाइश ही नहीं कर पाती हूँ। बस ऐसी दशा है कि ऐसा लगता है कि एक स्थिर से समुद्र में मैं क्या, बल्कि मेरे अस्तित्व की धूमिल छाँह सी तैरती चली जाती है और ऐसा है कि मेरे अस्तित्व के तैरते चले जाने पर भी अथाह समुद्र के जल में कोई परिवर्तन या स्पन्दन तक नहीं होने पाता और मेरा अस्तित्व अवश्य ही ऐसा लगता है कि मानो तिलतिल कर उसी जल में मिलकर धूमिल या धुधला सा होता जाता है। मुझे ऐसा लगता है कि जब धूमिल अस्तित्व भी बिल्कुल जल में मिल जायेगा, उसी दिन जीवन-मोक्ष दशा पूर्ण होगी और मुझे न जाने क्यों ऐसा भी लगता है कि जितना जल अस्तित्व पार कर चुका है, उधर यानी उतने जल में मैं उसे ही यानी अपने अस्तित्व को ही पाती हूँ। पता नहीं यह मेरी क्या दशा है, अब हल्कापन या सूक्ष्मता कहते में भी ठीक Expression नहीं पाती हूँ, इसलिये कि शायद वह भी कहीं पीछे छूट गया था कहीं लय हो गया, अब ‘आप’ ही जानें। ऐसा लगता है कि अब condition से ज़र्रा-ज़र्रा भींग तो चुका है, हाँ भिदाव में जितना समय लग जावे। माथे में गड्ढा होने की जो वजह पूछी, सो मेरी इतना समझ में कुछ आता है कि इसका कुछ connection ब्रह्म-रन्ध्र से तो नहीं है। यह उसका ही शायद मार्ग हो, ठीक तो ‘आप’ ही लिखियेगा।

  अम्मा कहती हैं कि ‘आपको’ देखे एक वर्ष हो गया। ‘आप’ अब काँठ की छुट्टी यहाँ के लिये ही ले लीजिये। मिठाई खानी है तो जल्दी आइये। जिन जिन के पत्र थे, उनके पास भिजवा दिये। अम्मा कहती हैं, लिखियेगा कि कब आ रहें हैं। याद अब सबको ‘आपकी’ बहुत आ रही है। छुट्टी जून में पहले या बाद में अब की से लेंगे। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। ताऊजी के सीने में हल्के प्रकाश के बादल से मालूम होते हैं। अब जकड़न नहीं, बल्कि सब ऊपर आ गया लगता है, किन्तु इच्छा शक्ति कतई नहीं, उनके बहुत ही कम है। ‘मालिक’ की कृपा से दशा में लय सी होने लगी हूँ। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही सेविका,
पुत्री=कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-391
लखीमपुर
4/5/1954
मेरे परम पूज्य श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है लिफ़ाफ़ा पहुँचा होगा। मुझ में अब काफ़ी ताकत पैदा हो गई है। ‘मालिक’ की कृपा ने मुझे भीतरी ताकत दी है, धन्यवाद है ‘उसका’। क्या करूँ, जब कमज़ोरी अधिक हो जाती है, तो बिना सहारे के आँख नहीं खुलती, परन्तु सहारा मिलता भी अवश्य है, ‘मालिक’ का बहुत-बहुत धन्यवाद है। कल, परसों से कुछ ऐसी हुड़क सी है, कि कभी लगता है, ‘आप’ छड़ी लिये सामने खड़े हैं, कभी लगता है, अब आवाज़ दी। खैर, ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक -दशा है, सो लिख रही हूँ।

  ऐसा लगता है कि जब शरीर का ज़र्रा ज़र्रा, कण-कण, छिन्न-भिन्न हो चुका है, तो भाई, ध्यान के लिए spot ही न रहा और सच तो यह है कि जिस दशा में हूँ, वहाँ एक कण, परमाणु तक की गुज़र नहीं है। कुछ ऐसा लगता है कि मानों दशा मुझमें समाती चली जा रही है। ऐसा लगता है कि मेरे उस धूमिल से अस्तित्व में दशा का समुंद्र समाता चला जा रहा है और अचम्भा यह है कि समुंद्र का सारा जल अस्तित्व में समाता चला जा रहा है और अस्तित्व ज्यों का त्यों है। वह तो मानों मुर्गाबी हो गया है। सारा जल सोखते चले जाते हुए भी उसके परों में पानी की बूदं तक ठहरती ही नहीं। सूखा का सूखा सा ही है।

  यद्यपि मेरी नस-नस में दशा के समुंद्र का जल भिदता, समाता चला जाता है, परन्तु वह तो ज्यों का त्यों स्पन्दन रहित, नीरव है।

  मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ ऐसा लगता है कि माथे के बीच, सिर के पीछे की तरफ़ तक जो गड्ढा सा महसूस होता है, उसका सम्बन्ध कुछ Inter-commune से लगता है और कुछ ऐसा है कि सुराख सिर को भेद कर ऊपर तक गया है, और फिर ऐसा लगता है कि उसका सम्बन्ध ऊपरी दुनिया से रहता है, मानों वहाँ की खबर लाने का यंत्र सा लगता है, ठीक तो ‘आप’ ही बतावेंगें। भाई, मेरा तो यह हाल है कि अपनी Condition को Read करने के लिये न जाने क्यों मैं स्वयं उस तक नहीं पहुंच पाती, बल्कि मुझे तो ‘मालिक’ की कृपा से, बिना अपने झाँके ही अब दशा Read हो जाती है।

  मेरे प्रभुवर ! तबियत तो कुछ ऐसी है कि स्वयं अपने आपको एक क्षण भी बर्दाशत नहीं कर पाती है। खुद मेरे हृदय में मेरी गुंजाइश ही नहीं रही, तभी तो ऐसा लगता है कि जो कुछ धूमिल सा मेरा अस्तित्व है, वह भी मेरे हृदय में नहीं, बल्कि दूर, बहुत दूर, न जानें कहाँ है और जिससे मेरा सम्बन्ध टूट चुका है, बिसर भी चुका है और अस्तित्व भी शेष है तो क्यों? किसी से मिलने के लिये, ‘उसे’ पाने के लिये। कुरेदन ही मानों मेरा अस्तित्व है और कुछ नहीं। अब तो बिना डोर के भी ‘मालिक’ से जुड़ा है, बिना हृदय के भी मिला हुआ है। अब तो दूर कहूँ तो ‘वही’ और पास है तो ‘वही’, केवल ‘उसी’ का Heart है, ‘वही’ जाने। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीवार्द कहती हैं। इतिः-

  सर्व-साधन विहीना
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-392
लखीमपुर
10/5/1954
मेरे परम पूज्य प्रभुवर श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

‘आपका’ पोस्टकार्ड एक आया-सुनकर प्रसन्नता हुई। मैं अब सेहत के लिये ज़रूर परिश्रम करूंगी। मैं सदैव यही चाहती हूँ कि मेरी तरफ से ‘मालिक’ को कोई फ़िक्र, कोई परिश्रम अधिक न पड़े, इसलिये मैं बराबर कोशिश करूंगी कि बीमारी नस-नस से दूर हो जावें। किन्तु ‘श्री बाबूजी’ कभी-कभी शरीर की कमज़ोरी के कारण बिल्कुल will बांधने में सुस्ती मालूम पड़ती है, यद्यपि ‘आपका’ पत्र तो मेरी नस-नस में ताकत पैदा कर देता है। कुछ नींद सी, कुछ सुस्ती सी, मुझ में पूरी will power नहीं आने देती। खैर, शरीर तो अच्छा होकर रहेगा, चाहे कैसे हो। ‘आप’ अब चिन्ता न करें, मैं कतई ठीक हो जाऊँगी। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

    भाई, ऐसा लगता है कि point ‘Z’ सामने है। कुछ यह दशा है कि ऐसा लगता है कि सहज अवस्था मुझ में पचती चली जाती है। नहीं, नहीं, बल्कि सहज अवस्था तो मेरा रूप ही हो गया है। मेरा तो मानो सहज रूप हो गया है। मेरा हर कण-कण सहज रूप को प्राप्त हो चुका है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ दशा क्या है, एक अजीब छटा है, जो देखते ही बनती है। कहने में कुछ शब्द का आवरण सा आ जाता है। मुझे तो बाहर-भीतर बस यही दशा अनुभव होती है, या यों कह लीजिये कि सहज अवस्था की महक मानों मेरे कण-कण में बस चुकी है। भाई, अब तो दशा में साम्यावस्था तथा Individuality का भी लेश मात्र लगाव तक नहीं लगता। यहाँ तक कि इन दशाओं को सोचने से मेरी दशा पर दबाव सा पड़ने लगता है तथा मेरी स्वतंत्रता में कुछ धब्बा सा लगने लगता है। हाल यह है कि ऐसा लगता है कि न तो बंधन ही है और अब तो स्वतंत्रता भी एहसास में नहीं आ पाती। अब तो ऐसी दशा है कि समुंद में चाहे मणि-मुक्ता कुछ हो, किन्तु मुझे तो एहसास केवल जल ही जल मात्र का है और कुछ नहीं। भाई, ऐसा लगता है कि अन्दर तथा बाह्य वृत्तियों का अस्तित्व भी मिट चुका है। ऐसे ही बाहर की वस्तुओं तक का भी। वस्तुएँ दीखती तो हैं, किन्तु अस्तित्व नष्ट हो चुका है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ ऐसी दशा है कि मैं तो ऐसी लगती हूँ, दुनियाबी ही कहिये। जैसे अभी क्या, बल्कि जन्म-जन्मान्तरों तक जिसका ध्यान पूजा या ईश्वर की ओर कभी गया ही न हो, और अब भाई, आशा ही क्या है। क्यों कि ऐसा लगता है कि पूजा-व ईश्वर-प्रेम के तो मुझमें जैसे संस्कार ही नहीं पड़े, फिर श्रद्धा और Faith कहाँ से आवे, वैसे ‘मालिक’ जानें। अब न जाने क्या बात है कि पहले जैसे फैलाव सा लगता था पर अब इसका वहम तक समाप्त हो चुका, और फैलाव होता क्या है, मुझे यह तक याद नहीं। अब तो ऐसा लगता है कि पैराव ही पैराव है। कुछ यह है कि जो पैराव आता है, उसमें भी मैं मौजूद रहती हूँ और जो गुजर चुका, उसमें भी समाई रहती हूँ। यह न जाने क्या बात है। कुछ यह है कि सब में हूँ और कहीं नहीं हूँ। यही उल्टी सीधी मेरी हालत है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ कहीं, मुझमें ख़्याली थकान तो नहीं है।

    अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-393
लखीमपुर
17/5/1954
मेरे परम पूज्य श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है, मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

    कुछ इतनी हल्की हो, खाली सी दशा है कि शरीर तक ऐसा लगता है कि हल्का फुल्का सा इधर -उधर उड़ा करता है। ऐसा लगता है, उसे कहीं उठाकर ले जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, बल्कि वह तो स्वयं ही उड़ता सा फिरता है। कुछ भाई ऐसी दशा है कि कोई ज़रा सा भी Pressure या दबाव उसे स्वप्न में भी स्पर्श तक नहीं कर पाता है। ऐसा लगता है कि मेरी दशा तक पहुंचते-पहुंचते हल्कापन भी निकल जाता है, क्यों कि देखती हूँ कि मेरी दशा तो ऐसी है कि हल्के-फुल्केपन के दबाव या Pressure में आ ही नहीं पाती, बंध ही नहीं पाती और बंधेगी तो भला क्या, क्यों कि देखती हूँ कि उसे तो स्वतंत्रता कहने तक का Pressure स्पर्श तक नहीं कर पाता। मेरे ‘श्री बाबूजी’ वह तो बस जैसी भी है, बस उसी की गम है उसमें। नहीं तो, वह तो, मुक्त फिरती है, उसमें किसी का भी गम नहीं और अब शायद मुक्ति की भी नहीं, क्यों कि वह तो उस यानी मुक्ति की भी दशा में भूली सी, भटकी सी, विस्मृत सी ही है। न जाने क्यों, ऐसा लगता है कि मुक्त की दशा के मैदान में भी मुक्त सी बेसुध सी चली जा रही है। कुछ ऐसा है कि उस मैदान में भी जहाँ देखती है, मानो अपना ही मुख दिखाई पड़ता है। उसे उस दर्पण में भी मानों स्वयं ही स्वयं दीखता है और स्वयं को या सत्य भी कह लीजिये को भी देखती है, तो भी मुक्त ही रहती है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ अजीब दशा है कि जो कहूँ, मेरे रोम-रोम में दशा (मोक्ष की) भिद गई, कह नहीं सकती, क्यों कि उस मैदान से रोम-रोम मुझे अनुभव में ही नहीं आ पाता, किन्तु यह भी है कि यह दशा पाती भी रोम-रोम में हूँ। न जाने क्या बात है कि जैसे पहले मैं लिखा करती थी कि अपने को दूर, बहुत दूर पाती हूँ, किन्तु अब तो कुछ नहीं कह सकती, चाहे दूर कह लीजिये या पास। मेरे लिये समान है। दूरी, नज़दीकी का प्रश्न ही नहीं उठ पाता, दोनों समाप्त हो चुके। मेरे तो कुछ अनुभव में ही नहीं आ पाता। या यों कह लीजिये कि मुझे अब जाने क्या हो गया है कि मुझे तो अब कुछ नहीं दिखाई पड़ता, शायद रोशनी भी नहीं रही और है, तो मुझे पता नहीं। मुझमें तो न दुई थी और अब न एकता ही महसूस होती है। मैं तो सब से मुक्त हूँ, मुझे कुछ पता नहीं। जाने कैसे बस ‘मालिक’ की ही कृपा से बिना प्रकाश के भी चलती जा रही हूँ।

  अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-394
शाहजहाँपुर
21/5/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

सब खत मिल गये। 10 मई व 17 मई के जो खत मिले हैं, उन सबका जवाब एक साथ लिखे देता हूँ। X, Y पर जो तुम हो, उस हालत का भिदाव अच्छा हो गया है, मगर अभी पिण्ड में होना बाकी है। तुमने यह लिखा है कि Z स्थान की हालत तक तुमको नहीं पहुंचाया गया है। कुछ जीवन-मोक्ष की दशा के भिद जाने का इन्तज़ार है। यह तुम्हारा एहसास सही है कि तुम में Non-Duality Reign कर रही है। तुमने यह लिखा है कि कण-कण सहज रूप को प्राप्त हो चुका है, इससे मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझा। बाहर वृत्तियों का अस्तित्व मिट जाना लिखा है, यह सही है। वृत्तियाँ तुम्हारी सब Suspended हालत में आ चुकी हैं और यह फिर लय अवस्था की शुरुआत है, मगर अभी वृत्तियाँ पूरी शुद्ध हालत में नहीं आई हैं। इनकी सफ़ाई मुझे करनी होगी। इस समय तो मुझे तुम्हारी तन्दुरुस्ती की चिन्ता है। अभी बहुत कुछ बाकी है, इसलिये तन्दुरुस्ती की और भी ज़रूरत है।

  17 मई के खत में तुमने यह जो लिखा है कि “पहले मैं अपने आप को दूर पाती थी, मगर अब दूर और नज़दीकी का ख्याल नहीं है।“ इसके मानी यह हैं कि ईश्वर से कुछ नज़दीकी ज़्यादा और बढ़ गई है। तुमने त्रिकुटी में जो गड्ढा एहसास किया था और उसकी वजह मैंने तुम्हीं से पूछी थी। तुमने उसके बारे में जो कुछ लिखा है, वह सही है। अब तुम एक बात और एहसास करना कि जहाँ पर चोटी रक्खी जाती है, वहाँ पर कुछ चौड़ाई तो महसूस नहीं होने लगी है? या कुछ गड्ढा सा तो नहीं मालूम होता है? अभी मैं अपने आने की तारीख मुकर्रर नहीं कर सकता, दो-तीन दिन में यह बात मालूम होगी।

  शुभचितंक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-395
लखीमपुर
21/5/1954
मेरे परम पूज्य श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है पूज्य मास्टर साहब व जिया वगैरह आराम से पहुँच गये होगें। इधर मुझे ऐसा लगता है कि कुल system मेरा मानों बीमारी से रहित हो चुका है। लगता है एक निशान भी न बीमारी का और न वैसे भी रह गया है। बड़ी साफ़ दशा झलकती है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

    भाई ऐसा लगता है कि मेरी conscious तो sub-conscious mind में ही रहती अब इससे नीचे कभी रुख तक नहीं फेरती, बल्कि वही उसका घर समझ लीजिये या यों कहिये कि नीचे उसके लिये कुछ है ही नहीं और शायद यह ठीक भी होगा। उसमें भी मानों सर्वत्र मैं समा चुकी हूँ। वह भी ऐसा दर्पण बन चुका है कि जहाँ देखती हूँ, अपना मुहँ दिखलाई पड़ता है। किन्तु यह न जाने क्या बात है कि अपना मुख दिखाई देते हुए भी मैं तो मुक्त या स्वतंत्र ही रहती हूँ। बधंन में आ ही नहीं सकती। मैं तो जाने कहाँ विचरती हूँ, पता नहीं।

    मेरे ‘श्री बाबूजी’ मेरा तो यह हाल है कि मुझे खुशी बहुत लगती है और ऐसी है कि उसमें बंधन नहीं है। स्वतंत्र खुशी है। बंधन यों नहीं कहा कि अब न तो ऐसा ही लगता है कि हृदय में हो रही है, बल्कि एक आज़ाद और सर्वत्र दशा है। न तो यह लगता है कि पैदा हो रही है, और न कुछ उत्साह व उमंग मिश्रित है, बल्कि स्वतः कुछ यही दशा है। कुछ ऐसा भी लगता है कि इस खुशी में एक मीठा दर्द अवश्य मिला हुआ है और इतना झीना कि पकड़ाई में मुश्किल से ही आता है, कुछ बस ऐसा कि काँटे की तरह कसकता ही रहता है। कुछ ऐसा लगता है कि कोई बड़ी शुद्ध सी दशा, साफ़ सी दशा हो गई है। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ यद्यपि यह खुशी की दशा सर्वत्र मालूम होती है, बाहर-भीतर सब जगह, किन्तु न जाने क्या बात है कि सदैव पास या उसमें रहते हुए भी मैं उसे भी भूली सी रहती। मुझे ऐसा लगता है कि मैं अपनी conscious (सुध-बुध) को भी भूल चुकी हूँ। भूल ही क्या चुकी मेरा तो मानों किसी से सम्बन्ध ही नहीं रह गया है। मेरा तो यह हाल है कि अपनी आत्मा की भी मुझे खबर नहीं। मेरा तो शायद आत्मा से भी सम्बन्ध टूट सा ही चुका है। मुझे तो ब्रह्म या अहम् ब्रह्मास्मि वगैरह सब स्वप्त-वत् हो चुके हैं। कुछ यह हो गया है भाई, कि पहले जैसे आत्मा Prick किया करती थी, परन्तु अब यह सब समाप्त हो चुका और Prick आत्मा क्या करे, जब मुझे तो ऐसा लगता है कि आत्मा जाने मुझमें है या नहीं, मुझे कुछ एहसास ही नहीं होता। इधर मुझे जाने क्या हो गया है कि मुझे लगता है, जैसे Brighter World की मुझे झलक मिलने लगी है। प्रार्थना अब गाई जाती है तो वहाँ मुझे कुछ हलचल सी मालूम पड़ती है। अब ‘आप’ ही लिखिये कि क्या बात है। मुझे ऐसा लगता है कि शरीर यहाँ होते हुए भी मैं चाहे कहीं घूम, फिर सकती हूँ, कुछ ऐसा ही हल्कापन अब हो गया है। मेरा तो सम्बन्ध सबसे है यानी जड़-चेतन और किसी से भी नहीं है। मुझे खुशी अधिक है और कुल system तक शीशे की तरह साफ़ पड़ा है। बीमारी वगैरह भी सब साफ़ है। हर चीज़, हर हालत अपने असली रूप में दिखाई पड़ती है, नहीं, नहीं, बल्कि असल तत्व या असली रूप ही मेरे नेत्रों की ज्योति में समा चुका है।

  सब कुछ ‘आप’ ही जानिये। मेरे पास तो वही है, जो ‘आपने’ दिया है। ऐसा लगता है कि कोई अब मेरे सामने नया Chapter खुल गया है। लगता है, नवीन और असल तत्व या असल दशा में प्रवेश कर रही हूँ।

  पूज्य मास्टर साहब से मेरा भी प्रणाम कहियेगा। मेरे ‘बाबूजी’ मैं तो ‘आपकी’ हूँ और ‘आपकी’ ही होकर रहूँगी। मुझे तो पता नहीं कि खुशी बहुत है या कसक है, मुझे पहिचान नहीं, ‘आप’ ही लिखेगें, तो पता चलेगा। इतिः-

सदैव ही कृपा कांक्षिणी सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-396
लखीमपुर
22/5/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

मेरा एक पत्र जो पूज्य मास्टर साहब जी के हाथों भेजा था, सो मिला होगा। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

  वहाँ ‘आपके’ पास आने को तबियत बेकाबू हो जाती है, किन्तु मैंने तो ‘आपसे’ हर हालत में तबियत को काबू करना ही सीखा है। शायद इसीलिये मैंने अपने मन को भी मालिक के ही पास रखा दिया है, कि यदि कभी वह बेकाबू होने भी लगे, तो ‘वही’ इसे ठीक भी ला देंगे। अब तो ‘आप’ 6, 7 जून को यहाँ पधारेंगे ही। मेरी तो यही इच्छा रहती है कि कैसे इन नेत्रों की ज्योति बिन्दुओं में अपने मालिक' को ही रमाये रखूं। भाई, ‘उसने’ तो यह कृपा भी कर ही दी है, परन्तु मैं ही ऐसी भूली बिसरी हूँ कि इस दशा को भूली रहती हूँ, नहीं तो मेरे में अब केवल ‘उसके’ और है ही क्या?

  मुझे तो अब ऐसा ही लगता है कि शायद Brighter World में ही मेरी रहन रहने लगी है। अन्दाज़ से कह दिया, वैसे तो ‘आप’ ही जाने, जहाँ लिये जा रहे होंगें, वहीं मेरी रहन है। मैं तो ऐसी निर्दोष (innocent) ही कहिये, दुनिया में रहती हूँ कि जिसका मुझे स्वयं ही पता नहीं। मेरी तो स्वयं अपने को पहिचानने की भी शक्ति विस्मृत ही नहीं, बल्कि लुप्त ही हुई जा रही है। System दमक रहा है, उसमें बीमारी का नाम निशान तक रहीं है। नरवस system में से भी कमज़ोरी कुछ हटती ही मालूम होती है। पीलापन भी शरीर से कम है, चेतनता भी अधिक है, शेष हाल डाक्टर साहब स्वयं ही बता देगें।

    मेरी तो यह दशा है कि स्मृति सोई हुई रहती है, किन्तु न जाने कैसे बस ‘मालिक’ की कृपा से कुछ से कुछ 'वही' सिखाता तो जाता ही है। मुझे तो स्वयं अपनी Health की धुन सवार है। ‘मालिक’ पर कम से कम परिश्रम पड़े, मैं ऐसा ही उद्योग करूंगी। पूज्य मास्टर साहब से मेरा प्रणाम कहियेगा। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इति:-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-397
लखीमपुर
23/5/1954
मेरे परम पूज्य श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

एक पत्र कल डाल चुकी हूँ। आज केसर का Result निकल आया। ईश्वर का बहुत-बहुत धन्यवाद है। ‘मालिक’ की कृपा से वह IInd पास हो गई। पुनः पुनः मुबारक बादी तथा धन्यवाद है। ताः 21 के पत्र में ‘आपने’ पूछा था कि जहाँ पर चोटी रखी जाती है, वहाँ पर चौड़ाई या गड्ढा कह लो तो महसूस नहीं होती, इसका उत्तर तो मैं 10 ताः या इससे पहले लिख चुकी हूँगी, क्योंकि ता. 2 की डायरी में लिखा है, खैर, अब लिखती हूँ कि मुझे गड्ढा व चौड़ाई महसूस होती है और गुदगुदी या सरसराहट भी रहती है और ऐसा लगता है कि माथे से ये हर Point तक मार्ग बिल्कुल साफ़ व खुला सा है। तथा सम्बन्ध कुछ ऊपर कहीं भी होगा। किस तरह का है, यह मैं कह नहीं सकती और मुझे कुछ मतलब भी नहीं ताऊजी ‘आपसे’ प्रणाम तथा अम्मा शुभाशीर्वाद कहती हैं। पूज्य मास्टर साहब जी से भी मेरा प्रणाम कहियेगा। इतिः-

  सदैव ‘आपकी’ ही सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-398
शाहजहाँपुर
24/5/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

मैंने एक पत्र भेजा है, जो पहुँच गया होगा। चाहता मैं यही हूँ, कि तुम निरोग हो जाओ। बात यह है कि दुनियाँदारी में मोहब्बत गरज़ से होती है, और मेरी गरज़ यह है कि तुमसे लोगों को फायदा अब पहुंचता है, मगर ढोलक की डोरी जब तक कसी नहीं होती, आवाज़ में सम पैदा नहीं होता।

  अब मतलब पर आता हूँ। तुमने 22 मई सन् 54 के पत्र में लिखा है कि “शायद Brighter World में ही मेरी रहन होने लगी है।“ बस इतना ही अन्तर है कि तुमने उसको ‘शायद’ लिखा है। अगर वाकई यह हालत हो जाती तो यह शब्द ‘शायद’ जी से कभी नहीं निकलता। अब मैं तुम्हें बताता हूँ कि Brighter World अभी इतनी दूर है कि अगर उस तरफ निगाह दौड़ाई जावे तो भी वह (निगाह) थकने लगेगी। मगर हाँ, जो कुछ तुम्हारी मौजूदा हालत है, वह Brighter World का Grossest (स्थूल) form है।

  वह दुनियाँ तो भाई केवल कहने के लिये ही है, इसलिये कि और क्या शब्द हो सकता है, जिससे उसको ज़ाहिर किया जावे। शब्द Bright यों कह लेते हैं कि वह चीज़ उन्नति किये हुए लोगों के लिये है और जहाँ बड़े लोग रहते हैं, उस जगह का नाम भी बड़ा ही करके इज़हार करते हैं। वैसे अगर कोई मुझसे पूछे कि आप उसका नाम क्या रखेंगे, तो मैं उसको No World कहूँगा। मगर खैर, क्यों कि तुम्हारे ख्याल में Brighter World मौजूद है और यह शब्द भी तुमने मेरे मुंह से सुने हैं, इसलिये अच्छा है कि तुम्हारी रुचि उस तरफ़ है। मगर क्या कोई अक्लमन्द आदमी आजतक वहाँ पहुंच सका है? और बेवकूफ तो उससे कोसों दूर है। इस बात को कि क्या कोई अक्लमन्द आदमी आजतक वहाँ पहुँचा है, मुमकिन है कि चौबेजी अच्छा समझा सकें। बताते वक्त यह ख्याल ज़रूर रहना चाहिये कि उनका अक्लमन्द से मतलब ज्ञानी से तो नहीं होगा, अगर इससे मतलब है तो मैं यही कहूँगा कि ज्ञानियों की वहाँ गुज़र नहीं। हाथी से अगर कहा जाये कि कुलिया में बन्द हो जाये, तो वह कभी नहीं हो सकता। बेवकूफ़ आदमी यों नहीं पहुँच सकता कि उसके पास भी कुछ है, और है क्या, कुछ सामान और असबाब और वह जाना चाहता है, मगर उसके और वहाँ उसके रखने की जगह नहीं। अब ज्ञानियों की सुनो वह त्याग-त्याग कर के अपने को खाली समझते हैं। मगर उनको अभी इतनी समझ मौजूद है, बस यह एक ऐसी चीज़ है, कि अगर कहीं वहाँ पहुँच जायें तो World और Brighter World में कोई फ़र्क नही रहेगा। अब पहुँचता कौन है, जिनमें यह दोनो चीज़ ऐसी लय हो गई हैं, कि उनकी ताकत (जो कुछ कि Creative Power थी) खत्म होकर अपने असल में फिर चुकी है। अब यह चीज़ कैसे हो सकती है, जब कि अपनी निगाह अपनी समझ पर न रहे, बल्कि वहीं रहे, जहाँ पर रहने से, अपने ठीये का पता मिलता है। अब यह चीज़ कैसे नसीब हो? जब इन्सान अपने ठीये को छोड़ दे। अब तुम मुझसे पूछो कि ऐसी जगह भला कोई क्यों पहुंचने का इरादा करे, जहाँ बे- ठीये का होना पड़े। मैं समझता हूँ कि इसीलिये लोग वहाँ पहुँचने की कोशिश नहीं करते।

  तुमने 21 मई के खत में जो खुशी के बारे में लिखा है, तो जो खुश होता है, उसे तो खुशी महसूस ही होती है, जहाँ शादी विवाह का मौक़ा होता है, हर आदमी खुश नज़र आता है। Environment भी असर डालता है। इन्द्रियाँ जब External Object से Intact होती है तो, वही असर मानस ले लेता है। अगर इन्द्रियों में शुद्धता (originality तो खैर मैं अभी नहीं कहूँगा) पैदा हो चुकी है और मानस उसकी लज्जत (Taste) ले चुका है तो जिस चीज़ की उसमें लज्ज़त है, उसी चीज़ को वह बाहर देखती हैं और वही अब उसके देखने की चीज़ है। यही हालत सब Conditions की है, कि अगर उसमें हम अपने आपको बिल्कुल रुजू कर देते हैं, तो मानस की Depth में उसका छींटा लग जाता है, और वही चीज़ सामने दिखाई पड़ती है। मिसाल के तौर पर एक चोर अपने माल की बहुत हिफ़ाजत कर सकता है, इसलिये कि खुद चोर होने की वजह से वह सबको चोर समझता है। इसी तरीके से जो अच्छा आदमी है, वह सब को अच्छा समझता है। मगर जब इन्द्रियों में Originality शुरू हो जाती है, तो मन्ज़र (Scene) ही बदल जाता है और इस खुशी को, जो इस वक्त है, इसको समझने के लिए Happiness कह लो, Bliss में तबदील हो जाती है। Brighter World के जो लोग हक़दार बन जाते हैं, उनकी कैफ़ियत यह हो जाती है कि Bliss भी नहीं रहती। यह तो तुम्हारी खुशी की कहानी है। अब Bliss की कहानी मुमकिन है, कि मेरे लखीमपुर पहुँचने पर शुरू हो, बशर्ते कि मैंने तन्दुरूस्ती अच्छी पाई। कहो तो इसके बाद वाली भी कहानी लिख दूं। मान लो Originality पैदा हो गई, तो हम में क्या विशेषता हुई। यह चीज़ तो जिस वक्त हम पहली ही बार आये थे, हम में मौजूद थी। बात बुरी ज़रूर है, मगर कहूँगा ज़रूर कि इसमें ईश्वर का कुछ एहसान न था। अब अगर इससे आगे हम बढ़ते हैं, तो हम यह ज़रूर कहेंगे कि अब हम उस शक्ल में आये हैं कि जो शक्ल हमारी Originality बनने से पहले थी। एक बात मैं लिखता हूँ, मुमकिन है, सोचने वाले मेरे बाद किसी वक्त में गौर करें कि हम तो इस तरीके से Brighter World के हक़दार बनते हैं, मगर हम तो इस तलाश में हैं कि कहीं ऐसा नुस्खा हाथ लग जाये कि उसको इस्तेमाल करने से कहीं यह बात हो जाये कि Brighter World हमको लेने का हक़दार बन जाये। आगे कहने की मुमानियत हो गई।

  तुमने जो कसक लिखी है, यह तो रहनी ही चाहिये। यह वह ओस है कि इच्छा -शक्ति की गर्मी से ऊपर को उड़ती है। यही एक ज़रिया है, जो धुर तक पहुंचा देता। यह वह औज़ार है कि खता नहीं करता। इसकी शुरूआत बेचैनी है और इसकी तरक्की की हुई चीज़ कसक हैं। तुमने एक जगह पर यह लिखा है कि “मैं अपनी consciousness को भी भूल चुकी हूँ।“ यह सही है। Reality के शुरू होने पर यह चीज़ पैदा हो जाती है। एक जगह पर तुमने यह भी लिखा है कि “मुझे तो अपनी आत्मा की भी खबर नहीं।“ चूंकि तुम्हारा Attention दूसरी तरफ Divert है, इसी से इसका पता नहीं चलता। उस हालत के सिद्ध होने का तरीका भी यही है। मगर यह चीज़ अभी बिल्कुल बाकी है। यह जो तुमने लिखा कि “ब्रह्म और अहं ब्रह्मास्मि” सब स्वप्तवत् हो चुके हैं, यह बहुत कुछ ठीक है, मगर इसका अंकुर अभी बाकी है। चीज़ बदल गई है और वह रास्ते की बातें थीं। मैं तो “अहं ब्रह्मास्मि” वालों को बस ऐसा समझता हूँ, जैसे मनुष्यों में पहलवान और इतनी ही उसकी तारीफ़ कर देता हूँ कि वाकई सैण्डो में बड़ी ताक़त थी और राम- मूर्ति भी बढ़ा-चढ़ा था। बस तुम्हारे खतों का इतना ही जवाब है। हाँ, एक चीज़ और नज़र पड़ गई। तुमने लिखा है कि “मेरे पास तो वही है, जो आपने दिया है” तो मैं भी कहता हूँ कि “मेरे पास भी वही है, जो तुमने दिया है।“ तो अब किसी का एहसान नहीं रहा और न शुक्रिया की ज़रूरत रही।

शुभचिंतक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-399
लखीमपुर
27/5/1954
मेरे परम पूज्य श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

‘आपका’ कृपा-पत्र जो डाक्टर साहब के हाथ मेरे और केसर के लिये भेजा, सो मिल गया और एक दिन पहले लिफ़ाफ़ा भी मिल गया। वहाँ जा कर तो ये सब लोग इतने प्रसन्न है कि कुछ कहने को नहीं और बात भी सच ही ऐसी ही है। ‘आपका’ पत्र पाकर अत्यन्त हर्ष हुआ। मैंने जो लिखा था कि नस-नस में सेहत के परमाणु समाये हुए हैं और जिसको नस-नस चूसे ले रही हैं, किन्तु एक बात मुझे कुछ यह मालूम हो रही है कि कुल शरीर की नसें शीघ्र और पूरी तौर से चूस रही हैं, किन्तु पेट में नसें बहुत धीमे-धीमे कम मात्रा में ले पा रहीं हैं। मैं तो जब नसों को कुछ चूसने को न रहेगा, तब अवश्य लिखूंगी। यह तो sure है ‘श्री बाबूजी’ कि बीमारी मुझ में अब नहीं रही। मेरा कुल system साफ़ पड़ा है। पेट में इधर 4-5 दिन से भीतर हल्कापन अधिक और करीब हर समय रहता है। अन्दर कुछ पिघलता सा लगता है। बस अभी ताकत की पेट में ज़रूर कमी है। अब तन्दुरुस्ती की मुझे चिन्ता है और ज़रूरत शायद ‘आपके’ ही लिखने से मालूम पड़ती है। खैर, मुझे तो न जाने क्या हो गया है कि Health की एक-एक बात को Realize करते तथा लिखते मुझे ऐसा ही लगता है, जैसे आध्यात्मिक दशा ही लिख रही हूँ। जरा सा खा कर मैं अपने स्वाद में पड़ कर ‘मालिक’ के अनमोल परिश्रम को व्यर्थ न होने दूंगी। मैं अपने ‘मालिक’ के परिश्रम तथा इच्छा में अवश्य योग देती रहूँगी। मेरा कुछ यह हाल है ‘श्री बाबूजी’ कि जैसा ‘मालिक’ की कृपा से मन व अंतर सादा सा रहता है, तो ऊपर भी मुझे अच्छा कपड़ा पहिनने या जेवर पहनने में मुझे रुचि नहीं लगती।

  मुझे तो अंतर-बाहर सीधी सादी सफ़ेद धोती ही अच्छी लगती है, परन्तु खेर, अम्मा व सबकी इच्छा से पहिनती हूँ, किन्तु कभी -कभी क्योंकि जाती भी कहीं कभी-कभी ही हूँ मेरा मन विद्रोह तो नहीं करता किसी बात के लिये, क्यों कि वह ‘मालिक’ का हो चुका है। वैसे तो मुझे अतंर-बाहर, सब ओर सब सीधा-सादा, स्वच्छ ही दीखता है। मुझे तो काम व चाह ‘मालिक’ से ‘मालिक’ की ही है। मुझ पर यदि कोई कभी चिल्लाये भी तो मुझे ऐसा लगता है कि जैसे मुझे तो कुछ पता ही नहीं और न वह चिल्लाहट ही मालूम पड़ती है। वैसे भाई, गुस्सा या खीझ कभी- कभी जाने कैसे, कहाँ से मुझे आ जाती है और एक-आध मिनट में शान्त भी हो जाती है। कुछ यह है कि यदि मैं यह करूँ कि यह सोचूं कि कल ऐसे कहूँगी, यह कहूँगी, तो 4-5 बार ऐसा सोचने से शायद इस विचार की गर्मी से मुझे कुछ हरारत कभी-कभी हो जाती है। मेरे में अब गुंजाइश नहीं रही, खुद मेरी भी नहीं। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

  भाई, कुछ यह हालत है कि नई दुनिया में जैसे क़दम रखा हो और यह वाक़ई लय-अवस्था का New Para खुला है, जिसे मैं Brighter World समझ गई और इसके अलावा मैं समझती भी कैसे, किन्तु अब तो मुझे हर बात ‘आपकी’ ही कृपा व पत्र से आईना हो गई। मेरे ‘श्री बाबूजी’ मेरी समझ में नहीं आता कि मैं कैसे जल्दी-जल्दी चलूं। खैर, अपने वश की नहीं, जैसे ‘मालिक’ चलावे, वैसे ही चलूंगी। ऐसा लगता कि दशा हल्की इतनी और धुएँ की तरह मेरे में समा रही है। कुछ यह है कि देखती हूँ कि दशा, जो कुछ भी मेरी दशा की पहुंच है, ऊपर या भीतर से भिदना शुरू होती है और भिदते-भिदते तब बाहर पिण्ड की बारी आती है। भाई दशा क्या है, कुछ हल्का धुआँ-धुआँ सा कह लीजिये और दशा ही क्या, बल्कि मेरा स्वयं का अस्तित्व ही यही है। वैसे दशा तो वहम शब्द से भी पतली या धीमी है। ऐसी ही सत्य- दशा है कि सब सत्य ही सत्य महसूस होता है। कुछ ऐसा हो गया है कि पहले जैसे कोई दशा आई, बस वही कैफ़ियत निगाह में रही और फिर बस उसमें घुसना शुरू हो गया और लय होना भी, परन्तु अब तो यह है कि दशा, निगाह या अंदाज़ में रहते हुए, जैसे मैं अपने को या उसे भूल-भूल जाती हूँ। अब तो अपने आप ही ‘मालिक’ की कृपा से हो और यह बात बे कन्ट्रोल सी है, शायद इसी कारण दशा रम जाने में शायद पहले से अधिक Time लग जाता है और यह भी है कि पहले दशा भी कुछ सीमित सी होती थी, बल्कि मैं भी सीमित थी। अब दशा इतनी मद्धिम, हल्की धुऐं सी रहती है और निगाह को दिखाई नहीं पड़ती, किन्तु अन्दाज़ में रहती है और निगाह का मुझे पता नहीं, कसक में रहती है, जाने कहाँ, क्योंकि कसक से निगाह की याद आती है। शायद इस कारण दशा में रम जाने में देरी लग जाती है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ मेरा तो अब यह हाल है कि Non-Duality Reign करते हुए भी मैं तो उससे भी बेखबर रहती हूँ और यही नहीं, मेरा तो कुछ यह हाल है कि भाई, बेखबरी से भी बेखबर रहती हूँ। किन्तु यह जाने क्या बात है कि खबर भी मुझे हर बात की रहती है, जिनकी रहनी चाहिये। कण-कण सहज रूप को प्राप्त हो चुका, के माने केवल यही हैं कि भाई, कण-कण शुद्ध रूप में आ चुका है। कण-कण से विकार, ठोसता समाप्त हो चुकी है और एक भीनी, नहीं जाने कैसी दशा सब में समा गई है। भाई ऐसा लगता है कि अब दशा मेरे कण-कण में समा चुकी है और हर कण-कण मानों सजीव हो उठा है। नव जीवन प्राप्त कर चुका है। एक अजीब जागृति सब में हो गई है। बस कसक ही मेरा आसरा व खुशी है। ‘आपके’ पत्र का उत्तर यह नहीं है और न मैं दे ही सकती हूँ। मैं तो बस यही प्रयत्न करती हूँ और करूंगी कि एक-एक शब्द, एक-एक दशा, जो ‘आप’ लिखते हैं, सब में पैर कर, हर घाट का पानी पीकर, ‘मालिक’ के कदमों तक जा पहुंचू और साथ में जो चलना चाहे, उसकी भी ‘मालिक’ की कृपा से कुछ मदद कर सकूं मैंने डाक्टर साहब से सारे Instructions दवा व Injections के विषय में ले लिये हैं तथा दवा भी लिखवा ली है। आज जा रहें हैं। ‘आपने’ जो नस एक दो मिनट हाथ में दाबने को बताया, सो 4-5 बार दाब लेती हूँ, लाभ भी होता है। ‘आपने’ नुस्खा चने वाला लिखा है, वह भी आज से शुरू करूँगी। अब की बार तन्दुरुस्त तो मैं ‘आपको’ अवश्य मिलूंगी। अपने आने की तारीख अवश्य लिखियेगा तथा सब की यही प्रार्थना है कि यहीं ठहरें तो बहुत अच्छा हो।

  अम्मा ‘आपको’ तथा मास्टर साहब जी को आशीर्वाद कहती हैं। मुझे अपने Heart का भी ठिकाना भूल चुका है। इति:-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-400
लखीमपुर
1/6/1954
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है, मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। ‘मालिक’ की कृपा से पेट की नसें भी करीब-करीब कुल शरीर की नसों की तरह सेहत के परमाणुओं को जिस दिन से ‘आपके’ पास पत्र पहुंचा, उसी समय से चूसना शुरू कर दिया है। किन्तु अब सेहत के परमाणु नसों में थोड़े रह गये हैं। जो चूसना बाकी है, ऐसा ही लगता है। पेट हर तरह से मुलायम तथा भीतर से बड़ा हल्का और बड़े आराम में लगता है। जी, वैसे तो मचलाता ही नहीं, बस दबने से बहुत नाम-मात्र को मचलाता है और कुछ थोड़ा सा सतासी नसों की तरह दुखता है। किन्तु कमज़ोरी अभी कम नहीं है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

    मेरा तो भाई, यह हाल है कि न Purity ही है, और न Impurity ही लगती है। बस जैसे एक बिल्कुल सादी सी दुनियाबी मनुष्य की तरह हूँ, जिसमें कोई विशेषता नहीं है। न पवित्रता ही लगती है और न अपवित्रता ही। बस एक सादा सी ही Condition मेरा ओढ़ना है और वही बिछावन है। वैसे ही तबियत में न तेज़ी है और न मुलायमियत ही महसूस होती है। जैसे सब दुनिया के लोग हैं, वैसे ही मैं हूँ और सच ही यही मेरी दुनिया है। मुझे न कोई भक्त, न ज्ञानी, न अच्छे, न बुरे, मुझे तो सब ही समान दीखते हैं। यदि भक्त हैं, तो भी सब और अज्ञानी हैं, तो भी सब एक से ही महसूस होते हैं। मेरे ‘श्री बाबूजी’ मेरी समझ ही इतनी हल्की हो गई है कि Innocent कहूँ तो भी समझ में नहीं आता, बेसमझ कहूँ तो भी समझ में नहीं आता और होशियारी तो मुझसे न जाने कब विदा हो गई, मुझे यह भी पता नहीं। हाँ, भाई, दुनिया के लोग भाँति-भाँति के विचारों से परेशान हैं। किन्तु मैं कभी-कभी विचार आ जाने पर भी और कभी कभी क्या, विचार आते रहने पर भी परेशान नहीं हूँ। न जाने कुछ यह है कि कोई मुझे कमज़ोर कहे किन्तु न जाने क्या बात है, मैं शायद कमज़ोरी से कोसों दूर हूँ और यह नहीं है कि पहले की तरह यह सोचने पर कि मेरे 'मालिक' में कमज़ोरी नहीं, तो मुझमें कहाँ से आई। बल्कि मुझमें तो अब कुछ स्वाभाविक यह दशा पैठ चुकी हैं कि न बलशाली हूँ और न कमज़ोर हूँ। मुझे अपनी कमज़ोरी यह महसूस नहीं होती और यही हाल बीमारी तक का भी है। मेरी समझ में ही नहीं आता कि मैं कोई खास बीमार हूँ या कुछ भी, यद्धपि इस ओर से लापरवाही नहीं है, बल्कि मेरी कुछ यह स्वभाविक दशा ही बन चुकी है। और भाई मेरी दशा क्या, बल्कि दशा का शुबह सा बना रहता है या हो जाता है कि यह दशा है। बस ऐसी ही तबियत बन जाती हैं। मेरे प्रभुवर! मेरा तो यह हाल है कि जीवन और मृत्यु दोनों पहलू समान हैं। क्यों कि खुशी हर हालत में है। यह दशा कह लीजिये कि “जैसे राखे साईयाँ, वैमेई रहूँ सुभाय”, “पीर, हंसी दोऊ समान एकई भाय बिकाय”।

  भाई, कलेजा कसकता है, वही खुशी है, और शान्ति में मज़ा ही कहाँ। यह होते हुए भी अभी Originality की शुरूआत नहीं हो सकी है, यद्यपि मेरे ‘श्री बाबूजी’ की कृपा से न जाने कैसे मैं कभी-कभी उसकी झलक-मात्र अवश्य ले आती हूँ। एक उस बयार की सिहरन सी मिल जाती है। बस उसमें पहुंचते ही एहसास होने लगेगा। उसकी झलक मात्र में एक अजीब जागृति का नया पैरा एहसास में आता है। भाई, ऐसा लगता है कि संस्कारों का पर्दा इतना झीना पड़ चुका है कि मुझे पता नहीं कि संस्कार मुझ में हैं या नहीं और मेरी ही क्या, मुझे तो कुल दुनिया में एक अजीब शुद्ध दशा ही दरसती है, जिसमें संस्कारों का गुजर नहीं लगता, ‘आप’ ही जाने। अब ‘आप’ का यह लिखना कि “तुम लिखती हो कि जो ‘आपने’ दिया है, वही मेरे पास है और मैं कहता हूँ कि मेरे पास वही है, जो तुमने दिया है” अब ‘आपकी’ कृपा से ‘आपकी’ यह बात कुछ समझ में आने लगी है। क्या? यह मुझे मालूम नहीं, ‘आप’ ही जानें। मैं तो सचमुच ‘आपको’ पाकर निर्द्वन्द हो गई।

  अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। केसर कहती है कि आज सबेरे से ऐसा लगता है, जैसे मैं शून्य में हूँ, मेरे चारों ओर शून्यता ही शून्यता फैली हुई है और उस शून्यता में मैं बढ़ती और घुसती जा रही हूँ। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही सेविका
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-401
लखीमपुर
18/6/1954
मेरे परम पूज्य श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है आज ‘आप’ कुकरा से शाहजहाँ पुर पहुंच गये होंगे। कृपया शीघ्र लिखियेगा कि माया Compartmental में आ गई या नहीं, हम बहुत उत्सुक हैं। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

  भाई, मेरा तो यह हाल है कि न मुक्ति की तमन्ना रही न Realisation की चाह है। मुझे तो कसक ‘मालिक’ से मिलने की चाह के अतिरिक्त, सो भी कसक के रूप में तमन्ना ही जाती रही। यह न जाने क्या बात है, ‘श्री बाबूजी’ कि अब यदि ‘आपकी’ लिखवाई चीज़ जैसे जो ‘पथिक’ के लिऐ ‘आप’ लिखवा गये हैं, कोई चीज़ मैं अपने लिखे में जोड़ लेती हूँ तो मन में वह अटक अब नहीं होती जो पहले होने लगती थी और मन को गवारा नहीं होती थी, परन्तु अब तो जैसे कोई बात ही नहीं हुई, कुछ खटक नहीं होती। इसलिए तो मैं कहती हूँ कि मेरे पास तो बस ‘मालिक’ की कृपा और सब ‘उसी’ की चीज़ है। बस यह अवश्य है कि जितनी मेरी Capacity है, उतना ही मैं खींच पाती हूँ। मेरे ‘मालिक’ कुछ यह दशा है कि लगता है आँखे पथरा चुकी हैं। शायद इसीलिये यदि मुझे कोई अंधी कह ले तो बुरा नहीं मालूम पड़ता और बहरी कह लें तो परवाह नहीं है।

  अब तो भाई कुछ ऐसा लगता है कि मानो हर नस सोई रहती है। पूजा में बैठूं या वैसे भी ऐसा हो गया है कि जहाँ-जहाँ नाड़ी है, वहीं Action या हरकत होती है, नही तो हर कण-कण, मेरे शरीर का ज़र्रा-ज़र्रा सूक्ष्म भी सो चुका है। हाँ, ‘मालिक’ से मिलने की तड़प ही ज़रूर उनमें जीवन पैदा करती है और सोई क्या रहती है, एक अजीब प्रशान्त- सागर में डूबी रहती है, जिसमें केवल बस एक कसक की ही हिलोर रह गई है सो भी ऐसे, जैसे कि बड़वानल यानी समुद्र के भीतर जो आग लगती है और जिससे उसके भीतर के सारे जीव-जन्तु जल कर समाप्त हो जाते हैं और हर नस-नस तक इतनी खाली हो चुकी है, मानों ‘मालिक’ ने धो-माँज कर रख दीं। मेरे ‘श्री बाबूजी’ ऐसा लगता है कि भीतर के Senses (खवास) ही मानों लुप्त से हो गये हैं। न जाने क्या बात है कि ‘आपके’ सामने भी Alertness मुझमें अब ठीक या पूरी तरह से नहीं हो पाती, खैर, ‘मालिक’ जाने। मेरी तो ‘वे’ ही सदैव से सुधारते आये हैं, ‘वे’ ही सुधारेगें। ता-14-6-54 को ‘आप’ यहीं थे, तो पता नहीं उस दिन मुझे क्या हो गया था कि मालूम नहीं क्यों रो लेती थी, गा भी लेती थी। बिना बात अश्रु बहते थे। मन में यद्यपि न रंज ही कुछ था और न प्रेम ही, किन्तु फिर भी झर-झर आँसू बहते थे। ऐसा कभी-कभी न जाने क्यों हो जाता है। पहले जैसे मैं लिखा करती थी, मेरे ‘मालिक’ कि हाथ उठाती हूँ तो यह ज्ञान नहीं रहता कि किसका हाथ है, क्यों उठा है, अब अंतर का भी यही हाल हो चुका है। यानी सूक्ष्म रूप का भी एहसास कुछ ऐसा ही हो चला है। हर नस-नस सो गई है। हर इन्द्रियाँ मृत्यु की दशा में पड़ी हैं। ऐसा लगता है कि सूक्ष्मता की भी मानों मृत्यु होने लगी है। कुछ ऐसा हो गया है कि मेरे ‘श्री बाबूजी’ कि गाती हूँ तो आवाज़ का कहीं ताल्लुक नहीं रहता। रोती हूँ तो अश्रु का अंतर से भी सम्बन्ध टूट चुका है, बल्कि हर चीज़ का, हर Action का, जैसे सूक्ष्मता से भी ताल्लुक टूट चुका है, क्यों कि मुझे तो अब कुछ सूक्ष्म सा भी अनुभव नहीं हो पाता है। हर Action का जैसे Cause (कारण) से सम्बन्ध टूट चुका है। अब तो प्रभुवर ! जो कुछ होता भी है, सो cause (कारण) रहित रहता है। ऐसा लगता है कि हर चीज़ का कारण मुझमें विलीन हो चुका है। cause (कारण) की मुझ में गुंजाइश ही नहीं रही, क्यों कि समझ से भी सम्बन्ध टूटता जाता है और यही नहीं, यह न जाने क्या बात है ‘श्री बाबूजी’ कि ऐसा लगता है कि अब कसक भी घिसने लगी है या कसक भी अब मुझ में लय होने लगी है। नस-नस में, मेरे हर कण-कण में समाई जा रही है। 

मेरे ‘श्री बाबूजी’ ‘आप’ चले गये और इन चार दिनों में ही ऐसा लगता है मानों ‘आप’ जाने कब से गये हैं। जब ‘आपने’ यहाँ कहा था कि “मुझे आये सात दिन हो गये”, तो मानों एकदम से मैं स्वप्न से जागी होऊं, मुझे कुछ पता नहीं चला। ‘आप’ ही ऐसे हैं, जो हम सब पर कृपा करने स्वयं पधारते हैं। यही तो मैं कहती हूँ कि सुना था ईश्वर कृपालु है, परन्तु मैंने तो आँखों देख लिया। शायद इसीलिये मुझमें तो कभी कोई स्वप्न में भी तमन्ना ही नहीं उठती। कभी-कभी जाने क्यों कुल शरीर पर, पलकों तक पर कभी-कभी कुछ भीनी ठंढी सी बूंदों की बौछार सी पड़ने लगती है। ठंढे पिपरमिन्ट की तरह।

  फूलो जिज्जी तीन-चार दिन से अक्सर यही कहती हैं और विशेष सबेरे चार बजे कि “श्री बाबूजी मुझे” sitting दे रहे हैं। अम्मा ‘आपको’ व मास्टर साहब को सस्नेह शुभाशीर्वाद कहती हैं। मेरा भी मास्टर साहब से नमस्ते कह दीजियेगा। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही चरण-सेविका
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-402
लखीमपुर
25/6/1954
मेरे परम पूज्य प्रभुवर ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा पत्र पहुंचा होगा तथा भाई डाक्टर सिन्हा भी पहुंचे होगें। इधर जब से ‘आप’ आये, तब से हर तीसरे दिन एक पाउण्ड वज़न बढ़ता जाता था, किन्तु क्या बताऊं, परसों रात को साढ़े आठ से साढ़े नौ तक ऐसा दौरा पड़ा, जो कभी-कभी एक आध सेकण्ड ही होकर ठीक हो जाता था यानी एकदम ऐसा मालूम पड़ा कि नाभि से नीचे कुल पेट की नसें एकदम से ढीली पड़कर नीचे को लगता है कि गिरने सी लगीं, उसमें तकलीफ़ काफ़ी हो गई थी। दर्द भी बहुत होता है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

  भाई, अब तो कुछ यह दशा है कि ऐसा लगता है कि अंतर-बाहर कहीं वाइब्रेशन रह ही नहीं गया है। न आँख खोलने पर बाहर और न आँख बंद करने पर अंतर में ही है। वाइब्रेशन समाप्त हो चुका है। मेरा तो यह हाल है कि शरीर तक नस-नस तक में भी अब वाइब्रेशन महसूस नहीं होता। सब केवल जड़ ही जड़ रह गया है। हाँ, बस इतना ज़रूर है कि दशा आगे ज़रूर बढ़ती या बदलती जाती है। परन्तु कुछ यह है कि यदि ‘मालिक’ की आज्ञा हो और या कुछ लिखना चाहूँ तो ज़रूर कुछ ऐसी चेतना ऊपरी या ‘मालिक’ की कृपा की चेतना से ही कर सब कुछ लेती हूँ। किन्तु फिर जड़ता ही जड़ता समझ लीजिये परसों बायें पैर के तलवे में जहाँ पहले सरसराहट लिखी थी बड़ी फड़कन होने लगी और करीब 15 मिनट तक रही। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपा कांक्षिणी सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-403
शाहजहाँपुर
27/6/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारा मिला। तुम्हें जो Injection जनित पीड़ा नहीं होती, यह सब तुम्हारी ख़ूबी है। जब मेरे कहने का तुम्हें यकीन हो गया तो तुम्हारी ही शक्ति ने काम किया और यह तो तुम्हें कई दफे लिख चुका हूँ कि तुम्हारी आत्मिक उन्नति तुम्हारी ही वजह से है और तुम्हारी भक्ति तथा अभ्यास का यह फल है। अगर मुझमें कुछ विशेषता या ऐसी शक्ति होती तो सब सत्संगी अभी तक आध्यात्मिकता की उच्च श्रेणी को प्राप्त कर चुके होते। तुमने लिखा है कि न मुझे मुक्ति की आकांक्षा है न Realization की चाह। यह तो बड़ी अच्छी अवस्था है। तुम्हें Realization हो चुका और अब जीवन-मोक्ष गति है। जब चीज़ हासिल हो गई, फिर तमन्ना काहे की। जब तक मानव अपनी इष्ट वस्तु नहीं पाता, तब तक उसको चाह रहती है और जब पा गया तो चाह किसकी। तुमने लिखा है कि “हर कण और नस-नस बस सोई सी रहती हैं” इसके यह अर्थ हैं कि जो आडम्बर कि लाखों जन्म से संचित किया था, सो समाप्त हो चुका है और सत्यावस्था उत्पन्न हो चुकी है अर्थात् अब वह हालत है जो इस आडम्बर से प्रथम थी, मगर इसमें भी अभी बहुत कुछ होना बाकी है।

  तुमने लिखा है कि भीतर के Senses मानों लुप्त हो गये हैं, यह अनुभव तुम्हारा सही है और सोई हुई अवस्था, जो तुम्हें मालूम होती है, वह इसी वजह से है। इन्द्रियों को Original हालत पर लाने के लिये मैंने Research करके तुमको तीन Points बताये और उनका तजुर्बा भी मुझे हो चुका है, कि ये सही हैं और तुम भी इसे देख चुकी हो। अब इसके बाद भी उसी सीध में तीन सूक्ष्म Points और हैं, जो खत लिखाते -लिखाते मेरे ध्यान में आये। फिर उसके बाद Points तो नहीं और कुछ समझ में आता है। जब तुम स्वस्थ हो जाओगी तो मैं इन सूक्ष्म Points पर और उसके बाद जो कुछ मालूम हुआ है उस पर रूजू होऊँगा। तुमने जो रोने के बारे में लिखा है, ये प्रेम की वजह से है। मैं तो इस प्रेम का प्यासा ही रहा और अगर कोई मुझे प्रेम दे सके तो सैकड़ों विलायत अर्थात् समझने के लिये Godly Sub-State सम्भव है देने के लिये तैयार हो जाऊं। मेरा जब कोई बस नहीं चलता तो गाना गाकर थोड़ी देर के लिये दुई ले लेता हूँ ताकि कुछ नहीं तो एक-आध ही लहर प्रेम की आ जावे। तुमने यह लिखा है कि “सूक्ष्मता की भी मृत्यु होने लगी है।“ यह चीज़े लय अवस्था होने की वजह से मालूम होती है। वास्तव में अभी मुझे ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा है। सूक्ष्मता की जब मौत हो जाती है, उस वक्त Soul का एहसास कतई जाता रहता है और वह ऐसा कि हज़ारों वर्ष तक इस हालत का पहुंचा हुआ मनुष्य इस पर ध्यान लगाये तब भी Soul का एहसास नहीं हो सकता। जब यह अवस्था पहुंच जाये तो अभ्यासी को Negation की तैयारी समझना चाहिये। इसमें भी न जाने कितनी Stages हैं। नहीं मालूम मुझे क्या हो गया है कि अगणित Stages का ख्याल मुझमें कायम ही रहता है। नहीं मालूम मेरे इन लेखों को देखकर क्या समझेंगे लोग। मुझे तो छोर नहीं मिला। यहाँ तो लोग ऐसे भी हैं कि बड़ी जल्दी अपने आपको परमहंस और जीवनमुक्त गति को प्राप्त हुए समझने लगते हैं और कोई बिरला ही इस गति को यदि पा जावे तो अपनी दौड़ वहीं पर समाप्त कर देता है और ठीक भी है, इसके आगे बढ़ना तभी सम्भव है, जब कोई मिटा हुआ मिल जावे। मुझे तो भाई एक ही गति पसन्द है-Complete Ignorance की दशा और Negation की दशा। 

  तुमने लिखा है कि “कभी-कभी कुल बदन पर, पलकों तक पर पिपरमेन्ट की तरह बूंदों की बीछार सी पड़ने लगती हैं।“ इसकी वजह यह है कि इस्नोफेलिया का मर्ज़ जाने के लिये मैं ऐसी तवज्जोह दे देता हूँ। तुमने यह लिखा है कि “मेरा Heart ‘मालिक’ के Heart से चिपका रहता है।“ यह बहुत कुछ सही है। अभी तक तुम मैदान ही में चल रही हो। समुद्रान्वेषण में यह अत्यन्त आवश्यक है कि तबियत “और लाओ” करती रहे। तृप्ति अभ्यासी की वहीं पर होती है, जहाँ पर व्यष्टि और समष्टि की तमीज़ नहीं रहती है।

  अम्मा की इच्छा-शक्ति बहुत बलवती है और इससे मैं भयभीत रहता हूँ। उनसे कह देना कि जुबान यथा सम्भव काबू में रखें। अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-404
शाहजहाँपुर
29/6/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा पत्र ता. 25.6.54 का लिखा हुआ प्राप्त हुआ। तुमने जो अपनी आध्यात्मिक दशा लिखी है, कि ‘वाइब्रेशन’ अन्दर और बाहर नहीं मालूम पड़ता इसका कारण यह है कि जब हम Lower Pressure पर पहुंचते जाते हैं, सफाई बढ़ती जाती है और Pressure घटता जाता है। जैसा मैंने जीव और ब्रह्म के बारे में किसी पत्र में लिखा है। ज्यों-ज्यों हम आगे बढ़ते जाते हैं, Pressure कम होता जाता है और इसी प्रकार से हम शनैः शनैः ब्रह्म गति प्राप्त कर लेते हैं। बहुत आगे चलकर Pressure स्वल्प रह जाता है, इतना कम कि एहसास में नहीं आता; आगे फिर यह भी नहीं रहता। इतना मैंने लिख दिया जो तुम्हें अपनी हालत समझने के लिये समुचित है।

शुभचितंक 
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-405
लखीमपुर
29/6/1954
मेरे परम पूज्य प्रभुवर ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। मेरी तबियत बिल्कुल ठीक फिर हो गई। ‘आपने’ जो Tube दिये हैं, उससे तथा ‘मालिक’ की कृपा से कमज़ोरी बहुत शीघ्र ठीक हो गई। चिन्ता की कोई भी बात नहीं रही। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है सो लिख रही हूँ।
    ऐसा लगता है कि हृदय में कोई दशा खुल रही है। भाई, अब तो कुछ यह हाल है कि जिस दशा या Heart से मैं चिपकी सी रहती थी, ऐसा लगता है कि वह कुल मुझमें उतर आई। मेरा तो स्वरूप ही वही हो गया है। कुछ इतनी आंतरिक खुशी व आनन्द की दशा है कि यदि एकदम से मुझमें उड़ेल दी जाती, तो हृदय फट जावे या बावरी सी हो जाऊं, क्यों कि मुझमें तो इतनी भी ठौर की गुंजाइश नहीं रही कि कोई दशा चाहे जितनी आनन्दकारी हो, मुझमें अब स्थान ही नहीं। ऐसा लगता है कि मेरा रूप आनन्दमय हुआ जा रहा है, किन्तु वह कुछ ऐसा है कि कोई ऐसी दशा नहीं है, जिसकी अनुभूति आनन्दमय है, वरन् वह चीज़ है जो आनन्द की स्वयं कैफ़ियत है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ इधर दो दिन से दशा बदली तो नहीं मालूम पड़ती, परन्तु अन्तर इतना सा अवश्य लगता है कि वह चीज़ मुझमें पच चुकी है, इसलिये उससे चिपकी नहीं लगती, वरन् वह मुझमें घुलकर एक हो गई है। मैंने जो एकता के बारे में लिखा था, सो भी गई है कि ग़ौर करने पर तो नस-नस उसे चूस कर हज़्म कर चुकी है। परन्तु वैसे तो अधिकतर खाली सी दशा रहती। ऐसा लगता है कि समुंद्र में ही चटियल, अब सूक्ष्म से सूक्ष्म लहर भी उठना ही समाप्त हो चुका। वाइब्रेशन ही नहीं, तो लहर कहाँ से आवे। ऐसा लगता है कि चटियल मैदान अब चटियल ही रह गया है। उसमें बयार नहीं बहती, इसलिये तिनका तक नहीं उड़ता। कहीं तिनका भी लगता ही नहीं, तो उड़े क्या। अब तो हृदय क्या है, बस एक सपाट चटियल मैदान ही रह गया है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ ऐसा हो गया है कि चाहे कोई दशा रहे, चाहे स्वयं ‘मालिक’ ही मुझमें वास करे, परन्तु मुझे कुछ स्मरण नहीं रहता। मैं तो विस्मृत सी, भूली सी, खाली दशा में ही रहती हूँ।

  अम्मा ‘आपको’ शुभाशीष तथा मास्टर साहब को भी शुभाशीष कहती हैं। इति:-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
  सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-406
शाहजहाँपुर
5/7/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

29 जून सनू 54 का खत मिला, जिसका जवाब दे रहा हूँ। तुमने लिखा है कि “ऐसा लगता है कि मेरा रूप आनन्दमय हो रहा है”, यह एहसास तुम्हारा सही है। मगर मैं तुम्हारी हालत को सर्वानन्दमयी हालत पर लाना चाहता हूँ। निरोग हो जाने का इन्तज़ार है, और इसलिये आगे नहीं बढ़ा रहा हूँ। चाहता यह हूँ कि जीवन-मोक्ष दशा जो तुम्हारी है, उसके पूरे आनन्द की हालत का एहसास करा दूं। उस हालत में मुझे तुम्हारी पूरी निगरानी रखनी होगी और यह ईश्वर की कृपा से हो जायेगी, क्योंकि वाकई सब के निगराँ पूज्य लाला जी हैं। इस जीवन-मोक्ष दशा पर जाने कितने लोग आये होंगे और ऐसा भी है कि आने से पहले बल्कि यों कहो कि शुरुआत होने से पहले अपने आप को जीवन-मुक्त समझ बैठे होंगे। गरज रहे तो यहीं तक रहे होंगे और कोई पहुंच गया हो तो ज़्यादा पता नहीं। यह मोक्ष की सबसे ऊंची गति ज़रूर है, और फिर इसके बाद दूसरी चीज़ शुरू होती है। Vibration के बारे में मैं पहले लिख चुका हूँ और कुछ Pressure के बारे में भी लिख चुका हूँ। इस मैदान में बाकई Vibration नहीं है। मगर कुछ तो है ही, जो कुछ तो खामोश हो रहा है और यह भी ब्रह्म की अच्छी गति है। इसी चीज़ को मैं उभारुँगा।

  तुम लय-अवस्था की तीन Stages पार कर चुकी हो, चौथी अभी शुरू नहीं हुई जहाँ तक मुझे याद है, इसकी चार ही Stages है। चौथी Stage में बड़ी देर लगती है और उसके पार हो जाने के बाद फिर मैं क्या कहूँ कि क्या हो जाता है। मैंने जब यह चारों stages पार कर लीं-यह चौथी Stage, हमारे पूज्य लाला जी ने बतलाई थी-इत्तिफ़ाक से मैं उनकी प्रेरणा से पहले ही पार कर रहा था, मगर वह तरीका ख़्वाब में तसदीक कर दिया गया। जब इसकी लालाजी की कृपा से पूर्ति हो गई तो इसकी पाँचवी stage मेरी समझ में आ गई और वह समझने के लिये Negation के भी Negation की तरकीब थी। मगर इसको आपने मुझे करने नहीं दिया ओर मौजूदा हालत पर खड़ा कर दिया और उस तरफ़ से ख्याल ही हटा दिया और कहा कि जब तुम इस हालत (पाँचवे Stage) पर जाने लगे तो मैं ने तुम्हारी हालत खोल दी, इसलिये कि फिर तुम मेरे काम के लिये बेकार हो जाते और यह भी कहा कि अगर तुम पाँचवी Stage तलाश करके शुरू न करते तो मैं अभी कुछ समय और लेता। अम्मा को प्रणाम।

  शुभचितंक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-407
लखीमपुर
5/7/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ मिला-पढ़ कर अत्यन्त हर्ष हुआ। मेरा तो अब न जाने क्यों उल्टा हाल हो गया है कि मुझे तो सच ही तन्दुरुस्ती की धुन लगी हुई है। जब से ‘आपने’ प्रार्थना करने को लिखा है, तो मैं जब करती हूँ, तो लगता है मानों कि बालक की तरह Innocent अपने ‘मालिक’ के सामने अपनी तन्दुरुस्ती के लिये हाथ फैलाये खड़ी हूँ और ऐसी ही मेरी Condition है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है सो लिख रही हूँ।

  कुछ ऐसा है कि यदि दशा या ‘मालिक’ के Heart से जैसे चिपकी सी लगती थी, तो अब अनुभब नहीं होता और यदि वैसा ही अनुभव करूं तो अच्छा नहीं लगता, जी परेशान सा कभी-कभी हो जाता है। न जाने क्यों मेरी तबियत खाली-खाली सी रहती है और उसमें मुझे अच्छा लगता है। कुछ ऐसी दशा है कि एकता वाली दशा अब अपने में नहीं ला पाती तो कुछ नहीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो। और ध्यान का तो यह हाल है कि ऐसा लगता है कि एक समतल मैदान में एक बिन्दु पर निगाह जमी हुई है। बिन्दु भी कहने को है, नहीं तो बस निगाह कुछ पकड़े हुए है, ऐसा समझ लीजिये और वही ध्यान का Point है, मेरे लिये अब।

    मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब तो कुछ यह दशा है कि ऐसा लगता है कि जैसे पहले मैं लिखा करती थी कि ऐसा लगता है कि कोई Attraction मुझे अपनी ओर बरबस खींचे ले रहा है, परन्तु अब न जाने क्यों ऐसा नहीं होता और प्रयत्न करने से जी घबराने लगता है, वरन् वह Attraction स्वयं मुझमें, अंतर में कुछ मौजूद लगता है और ऐसा लगता है, Attraction मुझमें सिंच कर या उपस्थित हो कर थोड़ा-थोड़ा मुझमें न जाने कैसे स्वयं ही समाता सा एहसास होता है। इसलिये शायद अब Attraction कैसा भी हो, इस नाम की चीज़ मेरे लिये समाप्त हो चुकी है। हाँ, मेरा मन स्वयं उस Attraction को अपने में लय सा करने लगा है। भाई, कुछ ऐसा लगता है कि दशा मेरी कुछ भी हो, वह पच कर हृदय बिल्कुल खाली सा रहता है। मेरा तो कुछ यह हाल है कि यदि एकता की दशा का ख्याल करूँ तो जी घबरा कर तुरन्त आँखे खुल जाती हैं। वैसे अपने ‘मालिक’ के लिये ऐसा लगता है कि जैसे मेरे अन्तर का हर तार सूखी हाय-हाय किया करता है। आजकल बिल्कुल खाली और निखालिस Innocent की दशा है, बालक की तरह। मेरे पूज्य प्रभुवर, कुछ ऐसा हो गया है कि तबियत बंधन रहित है। मेरी एक प्रार्थना है कि जिससे ‘आप’ पत्र लिखावें, तो वह वैसा हो, वही शब्द लिखे, जो ‘आप’ बोलें, चाहे उर्दू ही क्यों न हो। नहीं तो मज़ा का Flow बहुत मध्यम पड़ जाता है और आत्मिक-उन्नति चाहे मेरी वज़ह से हो या ‘आपकी’ बस यही प्रार्थना है, ‘मालिक’ चाहे कुछ हो जो कदम ‘मालिक’ की ओर उठ चुके हैं, वे उन्हें प्राप्त कर के ही सन्तोष पायें और ऐसा ही होगा, इसमें सन्देह नहीं। ‘आपके’ तीन Points की Research बिल्कुल नई और सत्य अवस्था की है और सूक्ष्म Points व कुछ लिखा है, वह भी बिल्कुल ‘आपका’ correct Hit है।

  अम्मा के लिये जो ‘आपने’ लिखा सो कह दिया। वे, ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं।

सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-408
लखीमपुर
9/7/1954
मेरे परम पूज्य प्रभुवर ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ कल शाम को पूज्य मास्टर साहब द्वारा मिला। ‘आपकी’ तथा सबकी कुशलता के समाचार उनसे तथा और चर्चा भी सुनकर अपार हर्ष हुआ। कल शाम से ही ‘आपका’ पत्र पढ़ते-पढ़ते ही मैंने Homeopathy इलाज छोड़ दिया है और सख्ती जो ‘आपने’ लिखी, सो आज लेडी डाक्टर को दिखाया, उसने कहा है कि कुल पेट में है, परन्तु वह यह न बता सकी कि यह सख्ती आँतों में अच्छी है या बुरी, यद्यपि निगाह उनकी बुरी ही की ओर थी। जैसा कि मास्टर साहब जी ने पूछने को कहा था। मैं अब उनका ही इलाज कर रही हूँ, क्यों कि डा. सिन्हा का अभी तक कोई पत्र व नुस्खा नहीं आया।

  पुत्ती बाबू वाला पत्र भी मैंने नकल कर लिया है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ। भाई, मेरा तो यह हाल है कि लगता है कि कसक भी पीघल-पीघल कर मेरे रक्त में समा चुकी है, क्यों कि कसक जो हृदय में काँटे की तरह कसक नहीं है, बल्कि वह चीज़ मेरे रक्त में मिल चुकी है, जिससे हर नस-नस, कण-कण में तो सूखी हाय-हाय पाती हूँ और शब्द के बारे में मुझसे कोई पूछे तो यह हाल है कि Vibration मेरे में लगता ही नहीं, किन्तु यदि ध्यान दूं तो, नसों के हर स्पन्दन से ‘मालिक-मालिक’ सुनाई पड़ता है। यही मेरे शब्द और यही Vibration है। मेरी यह दशा है कि मुझ में उफान नहीं आने पाता, वरन् मुझे तो ऐसा लगता है कि मेरा ‘मालिक’ उफानने के बजाय कूट-कूट कर हर दशा को इसी प्रकार मानों मुझ में बसा देता है। कल से तो कुछ यह दशा है कि लगता है कि मेरे हृदय की बागडोर कोई ऐसे पकड़े है कि आनन्द की दशा जो भीतर अक्सर नस-नस में उफनाने सी लगती है, उसे साध लेता है। दशा कुछ उभरने पर मेरा कण-कण ‘मालिक-मालिक’ आनन्द से विभोर हो चिल्ला उठता है। लगता है, कोई नया अध्याय खुलना चाहता है। परन्तु बागडोर धीमे-धीमे काम करने देती है। कुछ ऐसा है कि आनन्द की दशा नहीं, वरन् स्वयं मैं ही मानो आनन्द स्वरूप व आनन्दमय हो उठती हूँ। भाई, मेरे ‘बाबूजी’ बीमारी वाली कस्तूरी कोई और होगी, मुझे तो कोई बीमारी नहीं। अक्सर हृदय पकड़ कर बैठना अच्छा लगता है। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहाकांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-409
लखीमपुर
16/7/1954
मेरे परम पूज्य प्रभुवर ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा पत्र पहुंचा होगा। ‘आपको’ मास्टर साहब जी से बहुत आराम मिल जाता है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

  मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब तो कुछ ऐसी दशा लगती है, कि अन्दर जैसे कोई चीज़ पसीजती सी है और जिसका फल यह होता है कि आनन्द नहीं, बल्कि कुछ जिसे आत्मानन्द सुना है, वह चीज़ अब सामने आती है। अब शरीर तो ऐसा नहीं, किन्तु अन्दर का कण-कण जैसे पुलक उठता है। कुछ ऐसा है कि पसीजन से लगता है कि कोई पर्दा खुल रहा है और अन्तरात्मा मानों बिखरना चाहती है, क्यों कि उस पर्दे के अन्दर मुझे वह पसीजन अन्तरात्मा के ही पीघलने की एहसास में आती है। भाई, ऐसा लगता है कि अन्तरात्मा ने पसीजना शुरू कर दिया है। पीघलन की भी शुरूआत होने लगेगी ‘मालिक’ की कृपा से अन्तरात्मा मैंने यों लिखा है ‘श्री बाबूजी’ कि दृष्टि को अब वहीं स्थित पाती हूँ। वह और कहीं टिकती ही नहीं। ऐसा लगता है कि मेरे अभ्यंतर में आनंन्द जाग उठा है। कुछ अजीब दशा है ‘प्रभुवर’ कि रक्त में, धमनियों में तो बेचैनी, कसक बह रही है और अन्तर का यह हाल है कि मानों अन्तरात्मा का कण-कण खुशी से बिखरा जाता है। यही नहीं, बाहर-भीतर का कण-कण आनन्द से व्याप्त हो गया लगता है तथा बीज में हाय ‘मालिक’ हाय ‘मालिक’ की पुकार है। परन्तु मेरे ‘बाबूजी’ दशा खुली है, परन्तु पूर्णतया नहीं। मैं उसे अभी भूल-भूल सी जाती हूँ। मेरा तो यह हाल है कि न रंग है, न राग; न रोग (प्रेम) है न औषधि, परन्तु कुछ और, यह बदली दशा है। मैं तो अविनाशी अविछिन्न रूप हूँ, परन्तु न मैं व्याप्त ही लगती हूँ न लुप्त ही, क्यों कि कहते हैं अविनाशी का नाश नहीं होता, किन्तु व्याप्त है आसमान की तरह। अविछिन्न, छिन्न-भिन्न नहीं हो सकता, किन्तु लुप्त नहीं है, प्राप्त किया जा सकता है। मेरी यही समझ है कि ‘मालिक’ की ही कृपा से यह दशायें प्राप्त हो सकती हैं, अन्यथा नहीं।

  अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। फूलो जिज्जी ने ‘आपको’ प्रणाम लिखा है और लिखा है, इस पूजा में जो आनन्द व सुख है, वह किसी में नहीं। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-410
शाहजहाँपुर
20/7/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

एक बजे रात के बाद तुम्हारा खत लिखना शुरू कर रहा हूँ, क्यों कि लिखने वाला आज रात भर के लिये मिल गया है। तुम्हारे पत्र दिनांक 1.7.54 व 16.7.54 के मिल गये। दोनों खतों का साथ ही साथ जवाब दे रहा हूँ।

    जन्माष्टमी पर आने का मेरा अभी कुछ ठीक नहीं है। अगर आऊँगा तो खबर 4-5 रोज़ पहले हो जायेगी। मैं तुम्हारी मौजूदा गति की पूरी तौर से सैर करा कर यहाँ का आनन्द एहसास कराना चाहता हूँ और यह मेरे चाहने का अवसर है कि थोड़ी-थोड़ी हालत तुम पर खुलती जाती है तुमने एक जुलाई के खत में ठीक लिखा है कि बागडोर मैं अपने ही हाथ में रखता हूँ, ताकि कहीं बेतहाशा न भाग निकलो और हाथ से बेहाथ हो जाओ। किसी ने ठीक कहा है-

  “जिनके रुतबे हैं सवा, उनको सिवा मुश्किल है।“

  तुमने ‘कसक’ के बारे में जो कुछ लिखा है, वह तो अभी चलती ही रहेगी। उस समय तक, जब तक कि कसक, कसक में न मिल जाये। तुम्हारी जो मौजूदा दशा है, उसका आनन्द खुल रहा है और जो पसीजना लिखा है, वह वहाँ के कण-कण पिघल रहें हैं, इसलिये कि आनन्द जहाँ तक कि अभ्यासी बर्दाश्त कर सकता है, खुल जावें। तुम्हारी, निगाह जो अंतरिक्ष रहती है और हालत में मिली-जुली रहती है और उन्नति का ध्यान रहता है, और साथ ही कसक भी मौजूद है, ये सब आगे उन्नति करने के लिये बहुत काफ़ी हैं। आध्यात्मिक उन्नति तो बिल्कुल ही तुम्हारे घर की चीज़ है, जब चाहो और जितनी चाहो, तरक्की करो।

  एक बात मैं तुम्हारे तजुर्बे के लिये लिखता हूँ कि बरसात गड़बड़ थी और पानी बरसने में बहुत देर मालूम होती थी; परेशान था। नेचर को जब टटोलता था तो पानी बरसाने के काम पर रूजू होने के लिये तबियत न होती थी। कुछ Reason करके और कुछ अपने हुकूक़ का ख्याल दिला कर ज़बरदस्ती इज़ाज़त हासिल ही कर ली। परन्तु पानी बरसने का सामान न था। मैंने अपनी मेहनत बचाने के लिये अत्रि ऋषि को इस काम के लिये कह दिया। चुनांचे वह समुंद्र पर मानसून उठाने को रूजू हो गये। तीसरे दिन पानी आ गया-उनकी तर्ज- तवज्जोह का भी अंदाज़ लग गया। अत्रि ऋषि ज़िन्दा हैं और मुझे गंगा और यमुना के दरमियान मालूम होते हैं-उत्तर की तरफ। तर्ज-तवज्जोह बताऊंगा, जुबानी पूछ लेना जिस कारण यह बात लिखी।

शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-411
लखीमपुर
22/7/1954
मेरे परम पूज्य ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ आज अभी मिला पढ़ कर अत्यन्त हर्ष हुआ। ‘आपकी’ तन्दुरुस्ती का हाल पढ़ कर अम्मा तथा हम सब को बड़ी प्रसन्नता है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

    भाई, अब तो कुछ यह दशा है कि “हाय न जाने क्यों ‘मालिक’ से मुझे प्रेम नहीं पैदा होता, क्या करूँ कहाँ से लाऊं।“ अब तो अन्तर की यह दशा लगती है कि जैसे सूर्यास्त हो जाने पर एक-एक कर कमल की सारी पंखुड़ियों बंद हो जाती हैं, इसी प्रकार लगता है कि जैसे सारी चेष्टाएँ, सारी वृत्तियाँ सिमट कर स्पन्दन-रहित कमल बन्द हो गया हो। अब तो लगता है कि बुद्धि भी संकुचित सी ही सिमटी सी ही रहती है, किन्तु कुछ लिखने पर या विचार करते ही लगता है Broad Minded हो जाती हूँ। मेरे स्नेही ‘श्री बाबूजी’ मेरा रूप तो बस एक खोखले की तरह रह गया है। मेरा तो यह हाल है कि न जाने क्या बात है कि जब ‘मालिक’ की Greatness का ख्याल करती हूँ तो ऐसा लगता है कि मेरे में ही वह Greatness उभार खाती है, परन्तु फिर कुछ नहीं। कुछ ऐसी दशा कल शाम से है कि जैसे कहा जाता है कि सब की आत्मा जगन्निवास वह परमात्मा ही है, बस सच में ही मेरी आत्मा के स्थान पर स्वयं ‘मालिक’ विराजमान है। और मैं तो जो हूँ सो हूँ ही। मैं क्या हूँ, एक खोखला कोटर है, जिसमें केवल आत्मा ही शेष है। भाई, पहले मैं लिखा करती थी कि लगता है कि निगाह गड़ गई है, परन्तु अब तो उल्टा मामला है कि निगाह ही मानों आत्मा है, वही लक्ष्य है या निगाह में ही आत्मा या लक्ष्य समा चुका है। और निगाह उसमें लुप्त सी है। मेरे परम प्रभुवर ! लगता है मेरा तो अविनाशी सम्बन्ध है क्यों कि आत्मा का नाश नहीं। मेरी आत्मा तो पिघलने लगी है। उस पिघलन में अविनाशी ही दशा बह रही है।

  कल शाम को पूजा में कुछ ऐसा एकदम से निगाह के सामने से क्षणिक-दृश्य घूम गया। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। अब ‘आप’ ही जानिये। एक क्षण को ऐसा लगा मानों चटियल मैदान नहीं वरन् बलुहा कह लीजिये, उसके बीच में एकदम से मैं स्वयं ही दिखाई पड़ी, किन्तु एक पल में जाने क्या हो गया कि मैं उस मैदान के अन्दर पूरी समा गई, उस मैदान में डूब गई और मेरे ऊपर फिर सब वही बलुहा मैदान समतल फैल गया। यह मैदान, किन्तु निगाह मेरी है, और कभी वही दृश्य घूम जाता है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ वह मैदान है, किन्तु ज़मीन नहीं है, क्यों कि पृथ्वी तत्व तो उससे बहुत ठोस है, उसकी गम ही नहीं है उसमें।

    ‘अपने’ आने की सूचना अवश्य दीजियेगा। मैं आराम करती हूँ। पाबन्दी पूजा की भी नहीं करती। आध्यात्मिक उन्नति ‘आपने’ सच ही लिखा है, मुझे स्वयं भी ऐसा लगता है कि यह मेरे घर की ही अपनी चीज़ है, जब और जितनी भी चाहूँगी ‘मालिक’ की कृपा से प्राप्त कर ही लूंगी। स्वास्थ्य की ही वाकई मुझे चिन्ता है क्यों कि ‘मालिक’ की वह मूर्ति मेरे नेत्रों में रहती है जो मेरी तन्दुरुस्ती के लिए चिन्तित है और इसी कारण मुझ से बदपरहेज़ी नहीं हो पाती। भाई, मेरे तो वेद ‘आप’ ही है तथा शिक्षक भी, जितना पढ़ायें, ‘आप’ जानें।

    केसर एल. टी. में आ गई है, परसों इलाहाबाद जा रही है। अम्मा ‘आपको’ शुभाशीष कहती हैं। इतिः-

  केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-412
लखीमपुर
25/7/1954
मेरे परम पूज्य तथा सर्वस्व प्रभुवर ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

मेरा पत्र पहुंचा होगा। मैंने कल डाक्टर को पेट दिखाया था, उसका कहना है कि अब ग्लैन्ड्स कभी उभर आती है, कभी दब जाती है, परन्तु नाभि के नीचे जहाँ ग्लैंड की सख्ती है, परन्तु कम। आँतो में पहले से काफ़ी अधिक ताकत भी बताई है, जो मैं ‘आपको’ लिख चुकी हूँ मुझे स्वयं भी अनुभव होती है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

    भाई, अब तो कुछ ऐसी दशा है कि ऐसा लगता है कि मेरी निगाह अब तो, अंतरिक्ष वगैरह, तो मैं जानती नहीं, बस यह जानती हूँ कि ‘मालिक’ का ख्याल, जो मेरी ओर है, उसमें ही मेरी निगाह समा कर खो गयी है। इसलिये बस केवल ‘मालिक’ का ही ख्याल या कृपा पर ही मेरी उन्नति या मैं स्वयं हर प्रकार से निर्भर हूँ। मुझे तो केवल अब उसका ही ख्याल जो मेरी तरफ़ है वही हर समय महसूस होता रहता है, और वही मेरी ज़िन्दगी है, और बस उसके ख्याल की हरकत ही, जो मेरी उन्नति के लिये है, मेरे में स्पन्दन है तथा वही स्पन्दन मेरे Heart की Beating में है। मेरे परम पूज्य प्रभुवर ! कुछ ऐसा लगता है कि मैं तो ‘उसकी’ प्रेममयी दृष्टि में अपनी दृष्टि न्योछावर कर चुकी हूँ। अब तो जितना और जो कुछ ‘वह’ सुझाये, बस उतना और वही मुझे सूझता है। भाई, अब मैदान ऐसा है कि सूनसान-पन प्रारम्भ होता है, परन्तु मेरे आनन्द की जड़ है वही, ‘मालिक’ की कृपा-दृष्टि, वही है ‘उसका’ ख्याल, जो मुझे हरदम आनन्दित और उत्साहित रखता है। ऐसा लगता है कि मेरी सारी देखने की शक्ति, मनन की तथा सब कुछ ही ‘मालिक’ की आकर्षक -दृष्टि ने खींच ली है। मैं तो एक बस खोखले पुराने कोटर की भाँति हूँ। दशा इतने धीमे-धीमे खुल रही है कि आनन्द हर समय मेरे कण-कण में भरा लगता है, परन्तु उफनने नहीं पाता है, इसकी पूरी दशा नहीं आने पाती है, यधपि मेरा मन धीरे-धीरे पन से अक्सर अब अधीर हो उठता है, परन्तु यह बंधन तोड़ने की शक्ति नहीं मुझमें। थम- थम जाती हूँ। परन्तु मेरी मौज मालिक की मौज में ही है। अम्मा ‘आपको’ प्रणाम कहती हैं तथा केसर, बिट्टो प्रणाम कहती हैं।

  पूज्य मास्टर साहब जी के बारे में जो ‘आपने’ लिखा, यही मुझे भी साल भर पहले कानपुर में एहसास हुआ था, मैंने लिखा भी था, परन्तु पूज्य मास्टर साहब जी को पत्र नहीं मिला। इसके कारण के तह में मुझे कुछ गुस्सा का असर मालूम पड़ा था, वैसे ‘आप’ जानें। मगर पूज्य मास्टर साहब जी को ऐसा नहीं मालूम पड़ता। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी 

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-413
लखीमपुर
29/7/1954
मेरे परम पूज्य प्रभुवर ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। मेरा पेट तो अभी जैसा ‘आपको’ लिख चुकी हूँ, उसी हालत में चल रहा है। कोई विशेष बात नहीं है। हाँ, भारीपन वैसे तो नहीं, किन्तु शाम को ज़रूर हो ही जाता है। आजकल जो कुछ भी आत्मिक- दशा चल रही है, सो लिख रही हूँ।

    भाई, अब तो यह हाल है कि यदि जागते में भी, चलते-फिरते भी, कभी-कभी कोई ज़ोर से चिल्ला पड़े या ताली पीटे तो मेरे हृदय पर न जाने क्यों कभी-कभी धक्का सा लगता है। जागते में लेटी हूँ तो यदि मेरी चारपाई जोर से हिला देवे तो न जाने क्यों बहुत बुरा लगता है। प्रार्थना करती हूँ या गाती हूँ तो यद्यपि मैं उसमें तन्मय तो कदापि नहीं हो पाती, परन्तु न जाने क्यों उसमें भी यदि कोई ताली बजा देवे तो धक्का सा ही लगता है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब तो कुछ ऐसा लगता है कि मन पर कोई अनोखा, चटक और बेरंग चढ़ चुका है। ऐसा लगता है कि मन का कण-कण उससे रंजित है, मन के कण-कण में वही रंग बस चुका है।  इधर तो मेरे ‘मालिक’ कुछ ऐसा हो गया है कि ऐसा लगता है कि मन का ज़र्रा-ज़र्रा मानो अलग -अलग बिखर गया है और हर कण में वही कुछ बेचैनी सी व आनन्द- मिश्रित दशा बह रही है। समस्त शरीर के रक्त की बूंद में यही दशा बह रही है। न जाने क्या बात है कि यदि उंगली कटने पर जो रक्त निकलता है तो उससे बस 'अनलहक़ की आवाज़ और प्यारे की ही तस्वीर दीख पड़ती है। उस रक्त को छूने में मुझे यही प्रतीत होता है, मानों 'मालिक' को ही स्पर्श कर रही हूँ और मैं स्वंय भी उससे अलग नहीं बस, उसके स्पर्श में यह भी एहसास होता है। कुछ ऐसा हो गया लगता है कि अक्सर अपने, आप चलते-फिरते, उठते-बैठते, न जाने क्यों मेरा ज़र्रा ज़र्रा उमंग-उमंग उठता है। परन्तु check हर हालत में हर समय रहता है। मुझे न जाने क्यों इसमें भी आर नहीं। अक्सर तबियत फड़फड़ाने सी लगती है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ आप मुझे मिल गये, मैंने ‘आपको’ पा लिया, अब त्रिभुवन का राज्य भी कोई मुझे दे तो, ‘आप’ पर न्योछावर कर के, बस श्री चरणों में ही लोटते रहना मुझे भाता है।

  अम्मा ‘आपको’ सस्नेह शुभाशीर्वाद कहती हैं तथा बिट्टो, लल्लू, व कान्ता ‘आपको’ प्रणाम कहती हैं। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-414
शाहजहाँपुर
31/7/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे दो पत्र मिले। 22 ताः के ख़त का जवाब दे रहा हूँ। तुमने Greatness का जो हाल लिखा है, कि जब ‘मालिक’ के ख्याल में होती हो तो वह Greatness खुद तुम में मालूम होती है। बात तो यह बड़ी अच्छी है, मगर इसका सिर्फ़ एक ही जवाब है, कि लय अवस्था जितनी ज्यादा ईश्वर में होती जाती है, उतनी ही उसकी बातें अभ्यासी में उतरती जाती हैं। जिसका ध्यान करोगी, उसी की बातें आवेगीं इसलिये Incomplete गुरू का ध्यान कभी नहीं करना चाहिए।

    तुमने लिखा है कि “निगाह ही मानों आत्मा है, वही लक्ष्य है, या निगाह में ही आत्मा या लक्ष्य समा चुका है।“ जब आदमी अपने से ऊंचा उठ जाता है, तो निगाह का भी सीन बदल जाता है। वही निगाह ठोस से सूक्ष्म होती चली जाती है और सुरत भी इसी का नाम है। मगर जब तक कि निगाह रहती है, तब तक उसको अधूरा ही कहना चाहिये। हमें तो अपनी हर चीज़ Divine हालत में ले जाना है और फिर जब हम उस हालत पर आ जावें तो उससे भी अपना पीछा छुड़ा लेना है। यह बात बहुत ऊंची है, यह एक भेद है।

  वेदों का Further Development अभी तक नहीं हुआ, इसलिये कि ऋषियों ने Non-Duality पर चीज़ खत्म कर दी, वहाँ तक आखिरी दौड़ कही जाती है। क्या यह नहीं हो सकता कि इसके आगे कुछ और भी हो? यह ज़रूर है वह Non-Duality की ही हालत में होगा। मैंने जो हालत अभी ऊपर लिखी है, उससे बल्लियों ऊपर जाना पड़ता है। वेद में पुकार -पुकार कर कहा है- “नेति नेति” गोया यह इशारा है कि इससे आगे कुछ और भी है। फिर समझ में नहीं आता कि लोगों ने वेद की आखिरी बात को हद क्यों मान रखा है। बिटिया ! मेरा दावा यही है और मुमकिन है इसको लोग अहंकार समझें या ना मालूम क्या कहें, मगर जो बात सच है, उसको कहने की हिम्मत मुझमें आ ही जाती है। वह यह है कि मैं एक छोटे से छोटे Point पर यदि मेरी और सीखने वाले की उम्र इस क़दर हो कम- अज़- कम दस हजार वर्ष तक तालीम दे सकता हूँ। मैंने जो छोटे से छोटा Point लिया है, जैसे Point इन्सान में अरबों से ज़्यादा मिलेंगें और फिर कोई तमाशा देखे कि इस छोटे से छोटे Point में वह बातें मिलेगी कि लोग चकित रह जायेंगे। यह चीज़ है दूसरों के सोचने के लिये और यह हिदायत है सबके लिये कि सिर्फ़ उस चीज़ के जानने की कोशिश करें, जिसके जानने से सब कुछ जाना जा सकता है। किताबी खुदा तो सब लोग देखते हैं, और ज़िन्दा खुदा कोई ज़िरबिल्ला और ऐसा शायद ही कोई हो कि उसको देखने की कोशिश करे, जो वाकई है या समझने के लिये इन दोनों खुदा की जान है और इस खुदा को वही देख सकता है, जिसने अपने आपको बिल्कुल रूखसत कर दिया हो। फिर उससे जितना कोई चिमट सके, उतना ही कामयाब है और चिमटना क्या है, बस घुल-मिल जाना, ऐसा कि अपनी सत्ता का भी पता न रहे। यह शब्द ‘सत्ता’ मैंने इस अर्थ में लिखा है कि Being और Non-Being किसी पर अपना ख्याल न ठहरे, बल्कि इन दोनों को भूल जावे।

  यह बलुहा मैदान के बारे में जो तुमने लिखा है, यह तो बड़ी अच्छी हालत सामने आई। यह चटियल मैदान, जिसको मैंने अक्सर कहा है, उसकी भी सूक्ष्म गति है। गोया उजाड़ के भी उजाड़ का नक्शा है और यह बड़ी उम्दा हालत है। इसके बाद ईश्वर ने चाहा, कुछ इससे भी ज्यादा मिटा हुआ मैदान मिलेगा और फिर और भी, जो तुम हालत आने पर खुद लिखोगी। 

तुमने 25 जुलाई का खत भेजा है, उसमें Faith और Devotion का सबूत है और इसके सिवाय कोई ऐसी बात नहीं है, जो जवाब देने कबिल हो।

  31 जुलाई को रात के 12 बज कर 10 मिनट पर मुझे ऐसा मालूम हुआ कि तुम्हारी चाल एकदम से रुक गई और कुछ ऐसा मालूम हुआ कि हालत में कुछ मुर्दनी सी छा गई। मगर पाँच मिनट के बाद यह देखा कि यह सब होते हुए भी तुमने उसी मैदान में फिर घूमना शुरू कर दिया। वह मैदान Right side के एक corner पर है। चूकि रात का समय है, दिमाग़ काफी मेहनत कर चुका है, इसलिये ज़्यादा ठीक तौर पर समझ में नहीं आया। इसको फिर सोच कर लिखूंगा और तुम भी सोचकर लिखना। मुर्दनी तो अब नहीं रहेगी। अम्मा को प्रणाम।

  शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-415
लखीमपुर
4/8/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा एक पत्र मिला होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

    भाई, अब तो कुछ इतनी हल्की दशा है कि उसका अन्दाज़ लगाने या बैठने में तबियत में Disturb होने से कुछ घबरा सी जाती है शायद कुछ भारीपन आ जाता हो इससे यही नहीं, ईश्वर का नाम भी मुझमें कुछ उबन व घबराहट सी पैदा करता है।

  मेरे परम पूज्य प्रभुवर ! मन की कुछ यह दशा है कि वह न कभी सोता है, न थकता है और न आलस्य ही स्पर्श कर पाता है। इसी कारण ऊपर यानी शरीर पर भी यह कोई लक्षण नहीं आने पाता। ‘मालिक’ मुझसे रात कहे तो रात भर, दिन कहे तो दिन भर साधना में तत्पर हूँ। यह न जाने क्या बात है कि यद्यपि मैं एक आसन से बैठती केवल एक घंटे भर ही हूँ, क्यों कि कुछ ऐसा लगता है कि मेरी हर नस-नस तक हर समय ऐसी अवस्था में मालूम पड़ती है, मानो ध्यानावस्थित हो। कुछ यह मालूम पड़ता है कि मेरा कण-कण, नस-नस सरलता में बस चुका है। इधर दो दिन तो दशा का कुछ अधिक शुद्ध रूप नहीं रहा, परन्तु अब तो बिल्कुल साफ चल रही है। अब तो मेरा ज़र्रा-ज़र्रा जागता ही रहता है। कुछ ऐसा हाल है कि मुझे हर आदमी की दशा अपनी ही तरह लगती है। मेरे स्नेही ‘श्री बाबूजी’ ऐसा लगता है कि मेरा हर कण-कण सदैव भीतर का स्थिर, स्थाई हो गया है, स्थिर ही रहता है। और कुछ ऐसी दशा मेरे अन्तर की है कि लगता है, कण-कण का हर तार प्यासा सा ऊपर ही स्थिर है, अजान अवस्था में भी ऊपर को ही देख रहा है। आध्यात्मिकता में कोई छोटा नहीं लगता।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। मेरे ‘श्री बाबूजी’ मेरा एक-एक तार कभी कभी न जाने क्यों अधीर हो उठता है कि ओह! ‘मालिक’ में मेरा प्रेम नहीं हो पाता। मेरी आँखे तृषित ही रहती हैं। कृपया अपने आने की तारीख अवश्य लिखियेगा। इतिः-

    सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपा कांक्षिणी

सेविका
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-416
लखीमपुर
5/8/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ कल मिला पढ़कर हर्ष हुआ। ‘आपने’ जो ता. 31 जुलाई की रात को 12 बजकर 10 मिनट पर चाल एकदम से रुक गई एवं मुर्दनी आ गई आना लिखा है, इसका उत्तर मैं अगले पत्र में दे चुकी हूँ कि दो दिन दशा बिल्कुल अनमनी व शुद्ध न रही, परन्तु आप के पत्र लिखाते न लिखाते, जो कि कल आया है, उसी दिन उसी समय ठीक हो चुकी है। मुर्दनी बिल्कुल नहीं है, परन्तु मुझे बड़ी चिन्ता 31 ता. की रात वाली दशा पर है कि क्या हो गई कैसे हो गई। क्या मेरी कोई त्रुटि तो नहीं हो गई अथवा क्या वे पाँच मिनट मैंने बिना याद के तो नहीं गुज़ारे? ये पाँच मिनट भी ‘मालिक’ के क़दमों में जब से आ पड़ी हूँ तब से बेकार जाना 5 वर्ष के समान मुझे मालूम पड़ते हैं। सम्भव है ‘मालिक’ की याद ही तो नहीं बिसर गई, इसी कारण मुर्दनी आ गई हो, क्योंकि जब प्राण ही बिसर गया तो ज़िन्दगी कहाँ। ‘आप’ कृपया जरूर लिखें। यद्यपि मेरी कोशिश तो यही है और रहेगी कि यदि मुझे एक राई भर भी प्रेम हो तो वह भी कलंकित न होने पावे। इसके बिना याद में इधर न जाने क्या हो गया है कि लगता है कि मेरी आंतरिक दृष्टि भी स्थिर और जड़ सी हो गई है, परन्तु तृषित की भाँति ऊपर को उठी हुई अपलक हो गई है। उसमें न ‘है’ कि अनुभूति है और न ‘नहीं’ है की प्रतीति। आँखे पथराई सी हैं। मेरी तो जीवन नैया का कर्णधार ‘मालिक’ ही हैं, इसलिए चिन्ता मुझे किसी प्रकार की नहीं होने पाती। परन्तु मुझे तो छटपटाहट है, जो मेरी जान है या जिसका आधार मेरा जीवन है।

  अम्मा ‘आपको’ शुभाशीष कहती हैं। इति:-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही स्नेहाकांक्षिणी
पुत्री- कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-417
लखीमपुर
10/8/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा कार्ड पहुंचा होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

  मेरे परम् पूज्य प्रभुवर ! इधर ता. 7 को मुझे जाने क्या रहा कि जाने कुछ अटकाव था या क्या कह नहीं सकती। कुछ ऐसा हाल रहा कि तबियत उचटी-उचटी हो गई। इतनी खाली सी उचटी सी रही कि मुझे पूजा व ‘मालिक’ का ध्यान ऐसे भी करने में जरा भी लगाव ही नहीं था। तबियत में नम्रता नहीं वरन् कुछ खरापन ही कहिये, किन्तु उजड्ड़ता व बकने-झकने वाला नहीं था। स्थिरता व एकाग्रता भी नहीं लगती। अब चक्र सुई होती ही नहीं। ‘श्री बाबूजी’ अब उचाट व खरापन सब कल परसों से बिल्कुल ठीक है। किन्तु मुझे ऐसा लगता है कि जो यह था, यह मेरी दशा की गंदगी को साफ़ करने या कुछ अटक साफ़ होने के कारण ही था, परन्तु बिल्कुल ठीक तो ‘आप’ ही जाने और मुझे लिखियेगा भी ज़रूर।

  कल दोपहर को पूजा के कमरे में लेटी थी, तो आँख लग गई, तो न जाने क्या हो गया कि उस सोने में जब से आँख लगी तब से नींद में ही प्यास का यह हाल था कि पानी पीते-पीते यह हाल था कि जितना पीती थी, उससे अधिक प्यासी हो जाती थी। पानी पीते-पीते ओर छोर न था। परन्तु जब आँख खुली तो प्यासी की प्यासी उठी। मुझे ऐसा ही अपनी दशा का एहसास होता है कि उसमें ‘मालिक’ का प्रेम कूट-कूट कर नहीं भरता, तभी खाली-खाली सी व उसमें हर समय जगह खाली ही मुझे एहसास में आती रहती है और लगता है अभी यद्यपि दशा में पाचक शक्ति तो मौजूद है, परन्तु अभी उसमें पचने के लिये मानों कोई चीज़ आई ही नहीं, इसलिए खाली है। मेरे श्री बाबूजी दशा में अब वह आनन्द जो मैं लिखा करती थी कि शरीर पुलक-पुलक उठता है अब 7-8 दिन से एकदम से उसी दिन से यानी 31 अगस्त से लोप हो चुका है। अब कुछ ऐसी दशा है कि न तो दशा में ऊबन है, न निराशा, न तबियत भारी सी ही लगती है, वरन् हृदय पर एक प्रकार की कचोहट है, जिसमें बेबसी की दशा मिली हुई है, जो बेचैनी की याद देती है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ न उमंग है, न उछाल ही, वरन् तबियत क्या बल्कि मेरी रग-रग बेकरार है। मेरा तो यह जीवन है क्या सचमुच मैं अपने प्रभु को प्राप्त कर लूंगी, मुझे आशा है। ‘आप’ पधार रहे हैं, दिन-रात यही उत्सुकता लगी रहती है। अम्मा की तबियत ठीक है। अम्मा ‘आपको’ शुभार्शीवाद कहतीं हैं। अब केवल 9 दिन अभी ‘आपके’ यहाँ आने में और शेष हैं। इतिः-

    सदैव केवल ‘आपकी’ स्नेहाकांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-418
शाहजहाँपुर
18/8/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

मैं 25 जुलाई के खत का जवाब दे रहा हूँ। तुमने खत के दूसरे पैरा में बहुत सी बातें लिखी हैं। एक जगह पर यह लिखा है कि ‘मालिक’ का ख्याल हर समय महसूस होता है, और ‘मालिक’ का ख्याल मुझमें स्पन्दन पैदा करता है। जब लय अवस्था बढ़ जाती है, ‘मालिक’ और बन्दे में सम्बन्ध गहरा हो जाता है, और याद में अभ्यासी जब Vacuum बनने लगता है तो ‘मालिक’ के पास जो चीज़ है, वह उसमें आने लगती है और आते-आते यहाँ तक हाल हो जाता है कि दोनों की निस्बत करीब-करीब बराबर हो जाती है, और इसको लय-अवस्था की अच्छी हालत कहते हैं। ईश्वर का शुक्र है कि तुम्हारी इस लय-अवस्था की शुरुआत हो चली है। मुझे भी अपने अभ्यास के ज़माने में ऐसा मालूम हुआ है और वाकई Devotion या भक्ति इसी को कहते है कि ‘मालिक’ की याद करते-करते अपनी सुध-बुध भूल जाये। अपनी सुध-बुध भूलने के अर्थ ये हैं कि हमारे पास जो कुछ है, सब विदा हो जाये, फिर तो भाई अपनी जगह पर मालिक ही रह जाता है। और यह कब ? जब हमारे होश के भी होश उड़ जाते है मगर एक बड़ी उम्दा चीज़ पैदा होती है। उस वक्त होश गुम होते हुए भी होश पैदा हो जाता है। इसके अर्थ ये हैं कि बेहोशी में जो होश होता है (बेहोशी में होश खास किस्म का होता है जिसकी शुरुआत पहले से हो जाती है, मगर आखिरी हद बहुत बाद को आती है) बस, वही एक किस्म की याद समझना चाहिए और याद क्या? जिन्दगी की असली हालत होती है। फिर होता क्या है-न अपनी याद न ‘मालिक’ की याद। मैं खतों में बहुत आगे की बातें भी लिख जाता हूँ। तुमने लिखा है “जो कुछ वह समझाये वही समझती हूँ।“ इसके अर्थ ये है कि तुमने Self-Surrender पूरी तौर पर कर दिया है। यह भी लिखा है कि जो कुछ मनन शक्ति है, वह सब ‘मालिक’ ने अपनी ओर खींच ली हैं। इसके अर्थ यह है कि ईश्वर ने चाहा तो यह हालत भी आ जावेगी, जैसा कि कबीर ने कहा है:-

  “मन थिर, चित्त थिर, सुरत थिर, थिर भया सकल शरीर।
ताके पीछे हरि फिरें, कहैं कबीर- कबीर।।“

  आगे लिखा है कि मेरी मौज ‘मालिक’ की मौज है। यह तो बड़ी उम्दा हालत है। इसको सूफ़ोइज्म में ‘तस्लीम बरजा’ की हालत कहते हैं।

  अब 5 अगस्त के पोस्टकार्ड का, जो मुझे 14 अगस्त को मिला है, जवाब देता हूँ। यह उस खत का जवाब है, जिसको मैंने लिखा था कि बारह बजकर दस मिनट पर रात को तुममें मुर्दनी सी मालूम हुई और एक शक्ति सिर के बाईं तरफ अपनी जगह से उतरती हुई, मालूम हुई। यह कोई खराब बात नहीं है। हल्के-हल्के तुम्हारी सैर हो रही है। आगे बढ़ने की ताकत किसी अभ्यासी में मुझे नहीं मालूम होती और यहीं पर मैं शब्द ‘गुरु’ का इस्तेमाल करता हूँ। गो मेरा ख्याल कभी इसका पैदा नहीं हुआ कि गुरू की ही शक्ति आगे बढ़ा सकती है। अब गुरू कौन? वही लालाजी और उनकी शक्ति। बस जब एड़ लगाई जायेगी तब इस मुकाम से तुम पार होगी। अब बाईं तरफ क्यों शक्ति उतरती मालूम हुई? उसे ऐसा समझ लो कि नदी में जब फैलाव बहुत आ जाता है, तो नदी, नाले, जहाँ गुजांइश होती है, पानी भरने लगता है। सैर तो तुमने रफ़्ता-रफ़्ता जीवन-मोक्ष दशा की खत्म कर दी थी, मगर उसमें अभी लय होना बाकी है। स्वास्थ्य ठीक हो जाने पर मैं यहाँ के आनन्द का मज़ा एक बार फिर तुमको दिखलाना चाहता हूँ। भाई यह चीज़ वेद के गुलामों को मिल ही नहीं सकती उस वक्त तक, जब तक कि गुलामी का तौक उस पर पड़ा हुआ है। यह तो उसी के नसीब में है, जो बिना ज़र (धन) किसी के हाथ बिक गया हो और वह भी कैसा हो, जिसके हाथ वह बिके, वह खुद ही बिक चुका हो।

4 अगस्त के खत का जवाब ज्यादा लम्बा-चौड़ा तो न दूंगा, दो जुमलों का जबाव दे रहा हूँ। तुमने लिखा है कि ‘ईश्वर का नाम भी अब ऊबन और घबराहट पैदा करता हैं’। उसका ख्याल या ध्यान भी घबराहट पैदा करता होगा। बात यह है कि ख्याल करने में दुई पैदा होती है और तुम्हारी कुछ न कुछ Harmonious Condition है। किसी शायर ने कहा है:-

  “शिर्क (दुई) से खाली नहीं, ऐ शेख जी ताअत (पूजा) कोई।
ख्वाह बुत (मूर्ति) को पूजिये या लीजिये नामे अल्लाह।।“

  तुमने यह लिखा है कि “हर आदमी की दशा अपनी ही तरह मालूम होती हो” इससे यह मतलब है कि कि तुम बहुत कुछ ‘आत्ममयी’ हो चुकी हो और वही चीज़ तुम्हें हर शख्स में दिखाई पड़ती है।

  अब 10 अगस्त के खत का मैं जवाब देता हूँ। दूसरे पैरे का जवाब मैं इसी खत में दे चुका जो 5 अगस्त के खत के जवाब में है। तुमने एक शब्द उसमें यह लिखा है-‘क्या मैं सचमुच अपने’ ‘मालिक’ को प्राप्त कर लूंगी। इससे मुझे बड़ी हंसी आई और एक शायर का कथन याद आया- “राहें तलब में ऐसे खुद रफ्ता हो रहें हैं, मंजिल पर हम पहुंचकर, मंजिल को ढूंढते हैं।“ मतलब यह है कि ईश्वर-प्राप्ति में हम इतने बेसुध हो रहे हैं, कि हम ठिकाने पर पहुंचकर ठिकाना तलाश कर रहे हैं। यह तो ऐसी बात है कि जैसे किसी को शक्कर का बनाया हुआ खिलौना खिलाया जाय फिर उसे शक्कर के ज़ायके की तलाश रहे। अब फ़र्क क्या है? कि वह शक्स वही शक्कर खिलौने की शक्ल में खा रहा है, मगर उसे शक्कर खाने की लालसा लगी हुई है। बात क़रीब-क़रीब एक ही है, फर्क स्वाद में है कि खिलौने का मज़ा और है, और शक्कर का और गो चीज़ एक ही है। एक बात मैं मतलब से अलहदा लिखता हूँ कि शक्कर खिलौना नहीं हो सकती और खिलौने में शक्कर मौजूद होती है, अर्थात् ब्रह्म और जीव में यही फर्क है। खिलौना जीव है और शक्कर ब्रह्म। तुमने हृदय में कचोटपन लिखा है और यह कि जो बेचैनी को दाद देती है। यह चीज़ तो किसी न किसी शक्ल में कायम ही रहेगी और उस वक्त तक, जब तक ‘मालिक’ और ‘बन्दा’ शीरा-शक्कर नहीं हो जाते, जैसे दूध में शक्कर। मुझे तो बारह वर्ष के बाद चैन मिला था, जब मेरी हालत खुली। मैं कोशिश करता हूँ कि तुम्हारे हर खत का जवाब दूं। इसलिए मैं तुम्हारे खत और अपने जवाब छपवाना चाहता हूँ, इससे आम जनता को बड़ा फ़ायदा होगा।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-419
लखीमपुर
23/8/1954
मेरे परम पूज्य प्रभुवर ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है, ‘आप’ व भइया आराम से पहुंच गये होंगे। किन्तु Bus से जाने में इतना आराम न मिला होगा। केवल हम सब पर कृपा करने के ही हेतु ‘आप’ सफ़र का कष्ट व रुपये खर्च करते हैं, ऐसी भला किसकी रीति है। सुना पहले ‘आप’ कल रुकने वाले थे, किन्तु फिर चले ही गये। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

  अब तो कुछ ऐसी दशा चल रही है कि ‘आप’ ता. 19 की रात को जब यहाँ पधारे तो ‘आपके’ सामने भी दशा में कुछ उजाड़पन सा ही बढ़ा रहा। यही नहीं मेरे ‘श्री बाबूजी’ कि ऐसा लगता है कि बहार व आनन्द व रुचि कैसी भी हो यह सब तो मेरे रोंये-रोंये तक में ढूंढे से नहीं मिलती। बस कुछ बेकारी, बेचैनी, यही Permanent मेरी दशा है, जो मेरे जीवन में घर कर गई है।

  कुछ ऐसी दशा है कि ‘मालिक’ से मिलने व दर्शनों की चाह की बेचैनी सी रहती है, किन्तु जब सामने आ जाते हैं, तो भी बजाय शक्ति के तड़पन और बेकारी बढ़ती है। भाई ऐसी दशा है कि शान्ति विदा हो चुकी है, आनन्द तो और बेकरारी पैदा करता है; अब तो ठंडक से गर्मी ही होती है, जो आग तो पैदा नहीं करती। मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब सच तो यह है कि अब तो न मैं हूँ, न मालिक और न उसकी याद। क्योंकि मेरी निगाह में अब यह कुछ नहीं है, सिवाय बेकरारी और तड़पन के, और जिसके बिना मेरा जीवन नहीं।

    भाई, अब तो लय-अवस्था तक का भी चाव व शौक न जाने क्यों जाता रहा और कुछ यह भी है लय-अवस्था को Touch करने से तबियत में घबराहट पैदा होती है। अब तो मुझे वही दिन नज़दीक लगता है कि मेरे तो हाथ-पैर बेकाम हो गये, किन्तु अब स्वयं मेरा ‘मालिक’ ही, भले ही मुझसे लय हो जावेगा, तब मेरा भी जी न घबरा सकेगा क्योंकि न जाने क्यों अक्सर मैं यह अहसास करती हूँ कि ‘वह’ स्वयं मुझमें लगा हुआ है, और रास्ते पर ला रहा है, और मुझे तो रास्ते तक का एहसास नहीं होता।

  ता. 21 की शाम को जब से ‘आपने’ बैठाला था, तब से कुछ ऐसा लगता है कि ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी होश रहता है, उसमें घुसने पर बिल्कुल सादा सी दशा में पैठती मालूम होती हूँ और तब से ही दशा का खरापन, या भद्दापन सा समाप्त हो गया। वैसे इन दिनों ऐसा लगता था कि दशा स्थिर नहीं होने पाती है, भटकी-भटकी सी फिरती है, समतल सी नहीं आती है और लगता था दशा में पैठने के स्थान ही नहीं रह गया, सो बात भी उसी शाम से जाती रही। अब दशा में पैठने को फिर कुछ गुंजाइश सी निकल आई है। मेरे परम पूज्य प्रभुवर ! अब तो बिना बाँह पकड़े एक कदम भी आगे नहीं चल सकती हूँ. क्योंकि न अब आँखो में ज्योति है, न आगे चलने की शक्ति और न अनुभव में मार्ग ही दिखाई पड़ता है।

  भाई, अब तो कुछ यह दशा है कि जहाँ तक मेरा अनुभव या समझ पहुंचती है तो यह लगता है कि होश के भी होश बिसर जाने पर भी अन्तर में जो कुछ होश जागता है, ‘मालिक’ की कृपा से, सो अब इस होश में कुछ नहीं को है मान कर चलने की दशा की कुछ झलक मात्र ही महसूस करती हूँ। वैसे ठीक तो वही होगा, जो ‘आप’ लिखेंगे। मैं क्या और मेरी समझ ही क्या। मेरे श्री बाबूजी मुझे तो ऐसा लगता है कि यह चेतना भी और कुछ नहीं, बस एक कसक है, टीसन है, हूक है, जो ‘मालिक’ की देन का वह प्रकाश और वरदान है, जो आगे बढ़ने के लिये मार्ग प्रकाशित करता है। मुझे तो मेरे परम् पूज्य महात्मन् न जाने क्या हो गया है कि अब यहाँ देखते हुए भी अनदेखती सी ही दशा रहती थी, अनदेखने की सी ही दशा हो जाती है। पास सामने बैठे हुए भी न जाने क्यों एहसास में ऐसा नहीं आ पाता था। कुछ ऐसा पागलपन सा दशा में उत्पन्न हो चुका है कि जब आने वाले थे, तो जल्दी आने की बेचैनी, जब आ गये तो दशा विस्मृत सी कहिये या देखते हुए भी शायद अनदेखती सी और जब चले गये तो जाने से हैरान। भाई, मुझे कुछ लगता है कि मेरी आतंरिक दृष्टि भी जाती रही, जिसके कारण मैं ‘मालिक’ को ठीक से देख न सकी और देखना क्या, तबियत तो ‘मालिक’ को हृदय में रख लेने के लिये बेकरार है, फिर आँखों का क्या दोष। लगता है कि ‘प्रभु’ के दर्शनों ने तो हृदय का वह तार स्पर्श कर दिया कि मेरे कण-कण में हर समय झनझनी ही मची रहती है। मेरा हर जर्रा जर्रा झनझन-झनझन हुआ करता है और उस झनझन शब्द की प्रतिध्वनि है हाय-हाय, हाय-हाय। मैं तो यह चाहती हूँ ‘श्री बाबूजी’ कि मेरा दिल बेकाबू हो उठे ‘उसे’ पाने को, परन्तु मेरे हृदय में लगाम सी लगी रहती है और मैं इसे जानती हूँ कि यह जो कुछ है, ‘उसकी’ मौज है, इससे तबियत में कुछ सहूलियत सी आ जाती है। नहीं तो दुनियां में किसी की शक्ति नहीं जो मेरे हृदय में लगाम दे सकता। बस मेरे ‘मालिक’ की लगाम है। इसे सोचते ही तबियत में समाधान सा हो जाता है। कुछ यह हो गया है मेरे ‘श्री बाबूजी’ कि जैसे पहले मैं लिखा करती थी कि मेरी जगह केवल ‘मालिक’ है, परन्तु अब तो यह हाल है कि न ‘मैं’ न ‘वह’ न ‘उसकी’ याद, केवल उस चेतना के, जो मुझे पूरी तौर पर बेहोश नहीं होने देती और ऐसा लगता है कि मैं शायद उस चेतना में ही अब जैसे घुसती सी जा रही हूँ। या ऐसा कह लीजिये कि कुछ नहीं की तह में मैं समाती सी जा रही हूँ।

  मैं तो ‘आपको’ ही सब कुछ लिख देती हूँ। पेट मेरा ठीक है और सेहत भी क्या, लगता है सेहत के परमाणु अब नसों ने फिर चूसना प्रारम्भ कर दिया है। ऐसा देखती हूँ कि जब ‘आप’ भरते हैं, तो 3-4 दिन तक नसें खामोश सी रहती है. फिर धीरे-धीरे चूसना शुरू करती है, कुछ दिनों बाद तेजी पर आती है।

  ‘आप’ जो पत्र लिखवा कर मेरे लिये लाये थे, उसमें तो सब ‘आपकी’ ही कृपा व स्नेह भरा हुआ है। मैं तो वाकई भक्ति व Devotion की ही तलाश में हूँ। ‘मालिक’ की कृपा से शायद सफलता प्राप्त कर ही लूंगी। अब मुझे हर आदमी की दशा अपनी तरह नहीं, बल्कि अपने से ऊंची व अच्छी ही महसूस करती हूँ। केसर ने दो साल के पत्रों व ‘आपके’ उत्तर तो नकल कर दिये हैं और अब कभी-कभी मैं कर देती हूँ। भाई काशीराम जी ने मेरे पत्र मांगे हैं, भला उन पत्रों में है क्या, बस केवल ‘मालिक’ की ही कृपा-दृष्टि का एक अदना करिश्मा मात्र ही तो है।

  अम्मा ‘आपको’ स्नेहाशीष कहती हैं। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-420
लखीमपुर
31/8/1954
मेरे परम पूज्य प्रभुवर ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। शायद कल ‘आपका’ कृपा-पत्र आ जावे, क्योंकि ‘आपके’ जाने के 3-4 दिन बाद मुझे दशा में फिर Force बढ़ता अनुभव हुआ, जो सवेरे से ही फिर समाप्त लगता है, शायद परसों रात में किसी समय ‘आपने’ पत्र लिखाया होगा, इसलिये ऐसा लगता है। ऐसा लगता है कि दशा बढ़ न सकने के कारण ऊपर उठने को जोर मारती है, इसीलिए Force पैदा हो जाता है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है सो लिख रही हूँ।

  कुछ ऐसा हाल हैं कि लगता है कि सुरत या यक-सुई मुझमें है भी या नहीं महसूस ही नहीं होती, क्योंकि एकाग्रता या कुछ ऐसी चीज मुझे अनुभव ही नहीं हो पाती हैं। लगता सब कुछ बस एक हो गया है और वह एक क्या, यह मुझे एहसास नहीं होता, सिवाय जो कुछ बेकरारी है, उसके। मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ ऐसा लगता है कि मेरा अंग-अंग ही क्या, नस-नस, कण-कण अविचल सा रहता है। बेकरारी में भी मानों इन पर कुछ असर ही नहीं पड़ता। यही हाल आंतरिक दृष्टि का है कि लगता है कि मेरे अंतर में सब कुछ जड़ हो गया है। सोचने-समझने की भी शक्ति ध्यान या स्थिरता, एकाग्रता या यों कह लीजिये कि सुरत भी सब जड़ हो गई है। लय- अवस्था तक का भी यही हाल है कि उसमें प्रवेश करना चाहूँ तो मानों कुछ हरकत ही नहीं रह गई है। सूखी-सूखी सी लगती है, उसमें पैठने पर भी भीगती नहीं, सूखी की सूखी ही रहती है। इसीलिये शायद विचारों ने हमला बोल दिया है। रात-दिन मैं नहीं जानती, कुछ न कुछ विचार आते ही रहते हैं। 

मेरे परम पूज्य प्रभुवर! अब तो ऐसी दशा है कि वर्तमान दशा में भींग कर भी फिर सूखी की सूखी ही निकल आती हूँ। या भाई, अब तो यही हाल है कि दशा में डूबी तो कुछ नहीं परन्तु निकली तो सूखी ही लगती हूँ। जल में भी जैसे कमल का पत्ता जल से अछूता ही रहता है, वही हाल मेरा न जाने क्यों अब अपनी दशा से हो गया है। कभी-कभी मुझे यह ध्यान आता है कि जैसा ‘श्री बाबूजी’ ‘आपने’ लिखा था कि “लोग दुनियाँ से बेलौस होने के बजाय ‘मालिक’ से बेलौस हो रहे हैं” कहीं ऐसा ही छींटा तो मेरे में नहीं छू गया, परन्तु यह नितान्त असंभव है, यह निश्चय है मेरा। परन्तु यह हो क्या गया? कल से दशा में घनापन या force फिर नहीं लगता। हल्की सी दशा ही रहती है। बेचैनी हृदय में शान्ति पैदा करती है। चाहे मिज़ाज में कभी गर्मी आ जाये, परन्तु दशा में अब गर्मी नहीं मालूम पड़ती।

शायद कल से मैं शाम को पौन घंटे को Music सीखने जाऊं अभी ठीक नहीं है। अम्मा ‘आपको’ शुभार्शीवाद कहती हैं। ताऊजी भी ‘आपको’ प्रणाम कहते हैं। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-421
शाहजहाँपुर
1/9/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा 23/24 अगस्त का पत्र प्राप्त हुआ, पढ़कर हर्ष हुआ। अच्छा है कि उजड़ी हुई बस्ती का अन्दाज़ तुम्हें प्रतीत होने लगा। ‘बहार’ और बाग की सैर तो सब को पसन्द आती है। जो खामोश तबियत है, वह तो चल-फिर कर सैर करते हैं, और जो चंचल-मन हैं, वह मजीरा और करतालों से अपनी तृप्ति कर लेते हैं और समझ लेते हैं कि बस सैर हो गई। मगर जो अपने प्रियतम (ईश्वर) की याद में है, उनकी सैर तो बिल्कुल इनके विरुद्ध है। प्रेम करने वालों को झनकार और गड़बड़ी से मतलब ही क्या? उसे तो वही चीज़ पसन्द आवेगी जो ‘मालिक’ के ठिकाने की खबर दे। उसका ठिकाना तभी मिलता है, जब हमारे सब मनोरंजन समाप्त हो जाते हैं और हम उनके चमत्कार से ऊंचे उठ जाते हैं। तुम्हारी हालत यह ज़रूर बताती है कि उस बस्ती की सैर जो कि चमत्कार से परे है, करने को जी चाहने लगा है और जब यह हाल है तो वजह नहीं मालूम होती कि सैर नसीब न हो। तुम्हारे कुल पत्र से यह मालूम होता है कि तुम्हारी तबियत का रुझान उस ओर हो चुका है, मगर अभी दिल्ली दूर है और अभी सच कहता हूँ कि बिटिया। कि सेर में पौनी भी नहीं कटी है। मगर आशा ज़रूर है कि तुम वहां तक पहुंचोगी और यह सब लक्षण उसी के हैं, जो पत्र में तहरीर किये हैं। तुमने खुद लिखा है कि “देखते हुए भी अनदेखी सी दशा हैं”। यह इस बात की खबर देती है कि Negation भी शुरू होगा और यही उसके चिह्न हैं। हाँलाकि अभी यह चीज़ कोसों दूर है, मगर इस लिखने से तुम घबरा मत जाना। इसलिये कि जब आदमी सफ़र कर लेना ठान लेता है और चल पड़ता है तो कोसों दूर की जगह पर भी पहुंच ही जाता है। 

  तुमने यह जो लिखा है कि “आप आने वाले थे, तो जल्दी आने की बेचैनी और जब चले गये तो जाने से हैरान” यह सब प्रेम की दलील हैं। मेरी हालत किसी वक्त में इस क़दर बढ़ गई थी और तुम समझ लो कि वह क्या हालत होगी। उसके लिये एक फ़ारसी मिसरा है, जिसका तर्जुमा यह है कि न तो दर्शन की योग्यता अर्थात् अगर दर्शन मिले तो वह चीज सहन नहीं होती थी और अगर हम ‘उससे’ अलहदा रहे, तो भी बर्दाश्त नहीं होता और इस हालत में न जाने कितने दिनों रहा हूँ और इस तकलीफ़ को सहन किया है। जब इस तकलीफ़ का अन्त हुआ, तो तकलीफ़ की दूसरी शक्ल सामने आई कि यदि कोई ईश्वर का नाम ले देता तो कलेजा पकड़कर रह जाता और मुंह से ‘हाय’ निकल जाती। अब यह कैसी अजीब बात है कि जिससे प्रेम करो, उसी के नाम लेने से तकलीफ़ हो। बिटिया ! और तो नहीं, ‘उसे’ रहसदार कहूँ या ‘उसकी’ निर्दयता कि उसने जब मुझे मार लिया तब अपने में बैठने दिया। यह ज़रूर है कि यह सब चीजें सस्ती में ही मिल जाती हैं। हाँ, मास्टर साहब ( ईश्वर सहाय ) ज़रूर खुश किस्मत है कि उनको निहायत ऊंची-ऊंची हालतें बिना तकलीफ़ के मिल चुकी हैं। यह तो ज़रूर है कि उन बेचारों को यह खबर नहीं कि यह चीजें उनमें मौजूद हैं। मुमकिन है कि रफ़्ता- रफ़्ता खुले। पहुंच तो वह बल्लियों आगे गये हैं और ऊंचे कि यदि चिराग़ लेकर ढूंढा जाय तो मुमकिन है इतनी आध्यात्मिक पहुंच का आदमी न मिले। हाँ, तुम ही हमारे मिशन में एक मिसाल हो, जिसके अनुभव और एहसास आध्यात्मिक दशा का नमूना है।

  तुमने “यह लिखा है कि हर आदमी, बच्चे तक की दशा अब अपनी तरह नहीं, बल्कि अपने से ऊंची ही लगती है।“ यह ऐसी दशा है कि ईश्वर का बहुत बड़ा भेद है। हमारे ‘लालाजी साहब’ ने इशारे से कुछ समझा दिया था। मैं भी इशारे के तौर पर इतना लिखता हूँ कि... Transmission करते वक्त कुल ईश्वरीय शक्ति तालीम पाने वाले में दाखिल हो जाये और उसका Nervous System Shattered हो जाये और सीखने वाला दम तोड़ दे। मेरी यह हालत पैदा हुई थी, जिसकी वजह से तालीम पाने वाला आधे मिनट को भी तवज्जो सहन न कर सकता था। गुरू महाराज ने मुरव्वत की वजह से Limitations नहीं डाले। जब मैंने देखा कि ऐसी हालत में मैं किसी को सिखा न सकता था, तो मजबूरन गुरू महाराज से प्रार्थना की। उन्होंने ज़रूरी बन्धन डाल दिये और यह वादा भी किया कि जब तुम कहोगे, मैं यह बन्धन तोड़ दूंगा, मगर इसकी ज़रूरत मुझे कभी न हुई।

  अब चोला छोड़ने के बाद सत्संगियों को यह फायदा पहुंचता है कि सिखाने वाले की कुल कमाई (हिस्सा रसदी) दीक्षित अभ्यासियों में पहुंचती है। इसके अलावा एक चीज़ यह भी है, कि जिसमें प्रेम और लय-अवस्था जितनी ज्यादा है, उतना ही हिस्सा उसको ज़्यादा मिलता है और ऐसे ही लोग सिखाने वाले के दुनियाँ से कूच कर जाने के बाद भी फ़ायदा उठाते रहते हैं और उन्ही के ख्याल के तार की झन्कार वहाँ पहुंच सकती है। लय-अवस्था से बहुत फ़ायदे हैं, क्योंकि जब अपना आपा मिटा दिया जाये तो ‘वह’ ही रह जाता है, जिसकी तुमको तलाश है। जिस हद तक अभ्यासी अपनी लय- अवस्था कर लेता है, उसी हद तक वह कामयाब है। तभी मैं पुकार-पुकार कर कहता हूँ कि लय- अवस्था हासिल करो, मगर लोगों को अपने से फुरसत ही नहीं, उस तरफ कौन घुमे हर शख्स यह चाहता है कि मैं ही अपनी ताकत से सब कुछ कर दूं। मुरव्वत की वजह से थोड़ा-बहुत (लय-अवस्था न सही, यह तो अभ्यासी की Duty है) किया भी, मगर जब घूम कर देखा तो फिर दुनिया भर का उसके विचार के अनुसार मलगोवा से भरा ही पाया। अब भाई, मैं उसको साफ़ करता चलूं और वह उसको भरते चलें, तो मेरी मेहनत से फ़ायदा क्या। अगर अभ्यासी भी ठीक तरीके से करते चलें तो भी मेरी डाली हुई रोशनी में अंधेरा शामिल न हो। लय-अवस्था का पैदा कर लेना बिल्कुल अभ्यासी की ड्यूटी है। तरीका तो मैं बताता ही रहता हूँ। दूसरा फ़ायदा जो Teacher के चोला छोड़ने के बाद Taught को होता है, वह यह है कि बिल्कुल खालिस फ़ैज अभ्यासी को मिलता है और इस किस्म की तालीम भी उनको मिलती है, जिसकी जानकारी ज़्यादातर Teacher को चोला छोड़ने के बाद होती है और भी दो एक बातें ऐसी हैं जिनके करने के लिये शब्द नहीं मिलते। मैं अपना किस्सा सुनाता हूँ। गुरू महाराज ने चोला छोड़ने के बाद भी मुझे मौजूदा ( Present) हालत में लाने के लिये बारह साल और लिये यह कहा कि अभी मैं वक्त और लेता, मगर जब मैंने यह देखा कि तुम थोड़े दिनों के बाद किसी के सिखाने के योग्य न रहोगे तो मैं मजबूर था। बात यह थी कि मैंने Negation का भी Negation जहाँ तक मुझे याद है करना शुरू कर दिया था, जिसका नतीजा यह होता कि मैं Practically NIL हो जाता और अगर उसके बाद वाली हालत जो Negation की Negation है, उसकी भी भूल की अवस्था कही जा सकती है, उस पर आ जाता तो मुमकिन था जिस्म छूट जाता।

  अब मैं तुम्हारे खतों का जवाब देता हूँ। एक नवम्बर सन् 54 के खत में तुमने लिखा है कि “दिमाग़ पर एक नशे की खुमारी सी छाई रहती हैं” नशा तो Matter में होता है, और जब उसकी तेज़ी कम हो जाती है तो खुमार रहता है। मगर तुम अगर और करके देखो तो, खुमार नहीं होगा, बल्कि ऐसी हालत होगी कि जैसे नदी के निकट बैठने से कुछ तरावट मालूम होती है। इतना ज़रूर है कि तुम्हारी मौजूदा हालत तरावट से भिन्न ज़रूर होगी, वह इसलिये कि एकाग्रता भी है। आगे इसको समझाने के लिये शब्द नहीं मिलते अब खुमार क्यों हैं? इसकी वजह यह है कि ‘Z’ स्थान के असर में तुम शामिल हो रही हो और इसकी सैर अब शुरू होना चाहती है, जो मैं जल्दी शुरू करा दूंगा। अभी किनारे-किनारे थोड़ा साफ़ होने को रह गया है। तुम्हारी तबियत जैसा कि तुमने लिखा है कि “न जाने कहाँ भाग कर जाने को बेचैन रहती है”- ठिकाने पर जाने को बेचैन रहती है और यह चीज़ हर अभ्यासी में होना चाहिये। तुमने जो हाल लिखा है वह ‘Z’ स्थान का दृश्य है। अपनी हस्ती सबसे कमतर समझना बड़ी सभ्यता की बात है। तुम्हें जो ठंडक मालूम हुई है, उसका कारण यह है कि Matter की गर्मी बहुत कुछ समाप्त हो रही है। इसको मैने “सहज-मार्ग के दस नियमों की शरह” में समझाया है। इस ठंड के अनुभव ने तुम्हें यह खबर दी है कि तुम Matter से अलग हो रही हो। पीठ की हड्डी में फड़कन और गुदगुदाहट की अनुभूति होना यह माने रखती है कि वह स्थान धीरे-धीरे खुल रहे हैं। मुर्दे की सी कैफियत क्षण मात्र के लिये भी हो जाना अच्छा है। इसके मानी यह हैं कि इस कैफियत का भी अन्दाज़ तुममें आने लगा। मैं चूंकि ज्यादातर ऊंची हालत की तवज्जो दिया करता हूँ, इसलिये अभ्यासियों में अक्सर ऊंची हालत दर्श जाती है। मुर्दे का एहसास होना यह एक बहुत ऊंची हालत है, मगर हालत तुममें अभी पैदा नहीं हुई।

  तुम्हारा 7.11.54 का खत भी मिला। अपने में ईश्वर का Heart समाया हुआ पाना, यह मानी रखता है कि Heart Region के Cross करने की तैयारियाँ हैं। चाहता तो मैं यह हूँ कि मैं इसी वक्त Cross करा दूं, मगर कराता यूं नहीं कि हर Point की सैर मैं करा रहा हूँ। शुरू में मैंने वाकई बहुत जल्दी कर दी थी, कि तुमको पिण्ड और ब्रह्मांड दोनों की विलायत (Mastery) दो ही दिन में दे दी थी और इससे तुम्हारा वक्त बच गया और ईश्वर की रचना में बहुत कुछ दखल हो गया। मगर अब मैं हर Point को सैर करा के ले जा रहा हूँ, ताकि तुम्हें वाक्फ़ियत हो। यह ठीक पता नहीं चलता कि Point कितने और हैं। मुमकिन है, हज़ारों न सही, सैकड़ों निकलें। जब बेशुमार Points ख्याल में आने लग जायें, तब तो फिर जल्दी करनी ही पड़ेगी और पूरी सैर मिनटों और सेकण्डों में करानी पड़ेगी। इसलिए कि मुझे अपनी इसी उम्र के अन्दर यह सब Points तय कराना है। तुम्हारा यह ख्याल सही है कि वाकई जिस चीज़ पर तुम Attempt कर रही हो, वह Heart Region से बहुत ही ऊंची है और वही चीज़ हासिल करना है जिसके लिए तुमने अपने आप को इस्तेमाल किया है।

  सच पूछो तो Heart Region बच्चों के खेल-कूद की जगह है मुझे यह चीज़ ऐसी ही मालूम होती है। मगर अफ़सोस यह है कि लोग इसको भी Cross नहीं कर पाते। कीर्तन और भजन में स्वामी लोग तमाम उम्र अपने शिष्यों को बहलाते रहते हैं। मैं समझता हूँ कि स्वामी लोगों को खुद इसकी खबर नहीं है। और हो कैसे ? बजाय बेरंग होने के रंग उनका गाउन बन जाता है। जो रंग उनके गाउन का होता है, वह रंग सन्यास का नहीं है। सन्यास का रंग दर हकीकत बेरंग है और यह बेरंग क्या होता है? जिसमें किसी रंग की झलक न हो। अब जिसमें कोई रंग नहीं होगा, उसको सफ़ेद कहते हैं। जब सब रंग मिला दिये जाते हैं, तो सफ़ेद बन जाता है। अब अगर वह सफ़ेद पहने तो, गृहस्थ और स्वामी में कोई फ़र्क प्रतीत न हो, लिहाज़ा आम लोगों के पहिचानने के लिये कुछ रंग जो हमारे Vision में मटीला आ रहा है, कपड़ों में दे दिया जाता था, जिसका मतलब भी यह कि हम अपने आपको मिटा कर खाक कर चुके है। और इस चिन्ह से लोग उनको पहिचानते थे। अब तो एक चीज रिवाज़ी हो गई है कि हर शख्स कपड़े पहिन कर सन्यासी बताया जा सकता है। मगर Public में मैं समझता हूँ कि अभी ज़्यादा Awakening पैदा नहीं हुई और न अक़ीद और विश्वास बढ़ा। वरना इस रंग के बैल ओर कुत्तों को भी उन्हें सन्यासी समझना चाहिये। इनमें एक फौकियत (विशेषता) है कि वह रंग के ऐतबार से सन्यासी पैदा ही होते हैं। मेरा इस इबारत से स्वामी लोगों पर Attack करने का मंशा नहीं है बल्कि यह है कि वह अपनी विवेक शक्ति (Discriminative Faculty) इस्तेमाल करें ताकि उन पर खुद-ब-खुद मामला खुल जाये और वह वैसे ही बनें कि जो सन्यस्त से मकसद (अभिप्राय) है। सोचने से ही भद्दापन लगने के माने ये हैं कि तुमसे दुई सहन नहीं होती। अभी वह हालत पैदा नहीं हुई कि एकता ओर दुई दोनों एक सी हालत मालूम हो। जैसे स्वप्न में आदमी बर्रा जाता है, मगर उसको अक्सर खबर नहीं होती। अगर बर्राने की खबर हो जाये तो बर्राये ही नहीं। ऐसे ही अगर तुम्हें एकता की खबर रहे तो दुई की तकलीफ़ न हो। असल में हमें एकता और दुई, दोनों से अलहदा रहना चाहिये तब “जो है सो है” की हालत आने की खुशखबरी होती है। लिखते-लिखते एक ख्याल आ गया। अल्लाह मियां के पास जो कुछ था, वह सब दुनियां बनाने के वक्त दे बैठे और आप दीवालिया हो गये। अब हम अगर जो कुछ अपने पास रखते हैं, वह दे बैठे तो उन्हीं की तरह हमारा भी शुमार दीवालिया में ही जायेगा। मैं समझता हूँ कि आजकल लोग इसीलिये जो कुछ उनके पास है, नहीं दे बैठते कि दीवालिया की फेहरिश्त में उनका नाम न आ जाये, बल्कि कोशिश लेने की करते हैं, ताकि पूंजी उनकी बढ़ती रहे। तुमने लिखा है कि “नम्रता का एहसास भी कुछ भद्देपन का ही एहसास दिलाता है।“ इसकी वजह यह मालूम होती है कि तुमने नम्रता को असलियत से अलहदा समझ लिया है और इसीलिए उसका एहसास बाकी है। असल नम्रता वह है कि कुछ न रहना और वह चीज़ Zero को याद दिलाता है। यह बात जो तुमने आखिर में लिखी है कि “पास जाने को भी तबियत नहीं चाहती थी और न अलहदा होने की।“ पास न जाने की तबियत चाहना उस वक्त अभ्यासी में पैदा होती है, जबकि ईश्वरीय हालत उसको सिखाने वाला ज़्यादा दे जाता है और अलहदा होने पर तकलीफ़ यों होती है कि यह प्रेम का तकाज़ा है तो यह कोई शर्म की बात नहीं है। ऐसा होता रहता है और इसमें कोई हर्ज़ या नुकसान भी नहीं।

  शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-422
लखीमपुर
6/9/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-कार्ड 'आपका' आज मिला- पढ़कर प्रसन्नता हुई। पूज्य मास्टर साहब जी आपके पास आ रहे हैं, जी चाहता है मैं भी पहुंच जाँऊ, परन्तु और कोई इरादा ही नहीं करता, नहीं तो मार्ग निकल ही आवे। खैर, ‘मालिक’ की जैसी मर्ज़ी। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

    अब इधर तो मेरा यह हाल है कि ऐसा जी चाहता है कि हर आदमी, चाहे छोटा हो या बड़ा, बच्चे तक को, यहाँ तक जानवर तक को, चेतन या जड़ तक को प्रणाम करूँ, सिर झुकाँऊ। मेरे परम् पूज्य प्रभुवर! दशा क्या है, ऐसा लगता है कि जिन्दगी का नया पहलू शुरू हो गया है। ऐसा लगता है कि अब ऐसी ठंडी दुनिया में आ गई हूँ कि गर्मी का पता ही न रहा निरंतर सेंकने वाली चीज़ ठंडी पड़ गयी है, लगता है, राख में भी ठंडक आने लगी है। तरी तो समाप्त सी हो चुकी है। अब नमी भी सम पर आने लगी है। मेरा तो यह हाल है कि आग के पास बैठी होऊं, तब भी मानों गर्मी ही नहीं लगती। जल भी जाऊं, तो भी गर्मी या जलन मुझ तक नहीं पहुंच सकती और ऐसा हो भी जाता है। कुछ ऐसी दशा है मेरे ‘श्री बाबूजी’ कि न जाने कैसे न आग मुझे जला सकती है, न पानी भिगो सकता है, न वायु सुखा सकती है, मुझे यह सब कुछ स्पर्श ही नहीं कर पाते हैं। कुछ न जाने क्या बात है कि लखनौर वाले शास्त्रज्ञों को “ईश्वर सुबुद्धि दे, उनकी बुरी भावना नष्ट कर दे”, यही प्रार्थना सी निकलती है, गर्मी नहीं। बहुत सोचती हूँ कि ‘श्री बाबूजी’ को इससे तकलीफ़ है, तब जरा क्षणिक जोश सा ही आता है, फिर वही हाल, अब ‘आप’ ही जानिये। पहले दशा बदलने पर लगता था कि अब फिर से नया मैदान आया तथा फिर A,B,C,D शुरू हो रही है, परन्तु अब तो यह लगता है कि जो अब तक पढ़ा था, सो भी सब भूल चुका और अब A, B, C, D की भी तमीज़ न रही और अब A,B,C,D शुरू होने का भी अहसास नहीं होता। अब तो नये, सादे से पहलू में Innocent Condition है। मैं नहीं जानती कुछ भी, न मुझे यह याद है कि अब तक कुछ सीखा भी है या नहीं। ‘आपने’ जो लिखा है “बिटिया, अभी सेर से पौनी भी नहीं कटी” यह बात बिल्कुल मेरी समझ में आ जाती है। कुछ यह हो गया है कि अब किसी औरों को जब पत्र लिखना चाहती हूँ, तो कोई ख्याल, कोई बात नहीं समझ में आती कि क्या लिखूं और जाने आलस्य या सुस्ती के कारण मन नहीं चाहता, इसलिये टालती रहती हूँ, बैठती तो जबरदस्ती हूँ, पत्र लिखने, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से लिख तो कुछ न कुछ जाता है। अब तो यही है कि जब ‘मालिक’ मखतब करावे, तब देखा जावेगा। वैसे ख्याल दिमाग़ में टकराया बराबर ही करते हैं, परन्तु मैं नहीं जानती कि क्या-क्या। अब यह हाल है कि खालीपन की दशा का कुछ अन्दाज़ ‘मालिक’ की कृपा से लगने लगा है।

  अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। आज मन वहां आने को बेकरार हो उठता है। इति:-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-423
लखीमपुर
12/9/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा पत्र मिला होगा। पूज्य मास्टर साहब जी तो वहाँ अनिर्वचनीय आनन्द में मग्न होंगे। वह कैसा ? कि आनन्द को भी धो-माँज कर शुद्ध कर दिया जावे, उसी शुद्धानन्द में पूज्य मास्टर साहब जी का कण-कण भीगा हुआ होगा। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है सो लिख रही हूँ।

  भाई, अब तो कुछ यह हाल है कि 'मालिक' की ऐसी कृपा हुई है कि आँखें फूटीं तो तब जब कि लगता है कि न अब दायें, बायें मुड़ना ही है। न काँटों का ज़रा भी सन्देह। मुझे तो कहने को कह लीजिये, नहीं तो अब मैदान भी एहसास में नहीं आता है। मुझे तो भाई, चलने तक का एहसास नहीं, बस बदलती हुई दशा का एहसास ही केवल सबूत है कि मैं चल रही हूँ। मेरे पूज्य प्रभुवर ‘श्री बाबूजी’ मेरा तो कुछ यह हाल है कि मुझसे यदि कोई पूछे कि तुम क्यों अन्धी हुईं ? तो जवाब यही निकलता है कि मैं अंधी कहाँ हूँ, मैंने तो ‘मालिक’ को पुतलियों में बैठा कर आँखे सदैव के लिये बन्द कर ली हैं। बस यही मेरी दशा है, और आँखे ही क्या, हर Senses का यही हाल हो गया है। कुछ यह लगता है कि Senses भी मुंद गये और लगता है पीछे ही छूट गए हैं। इस मैदान में उनका गुमान भी नहीं है। कानों ने तभी जवाब दिया जब लगता है बस अब Sound सुनने को नहीं है। मेरे परम पूज्य महात्मन्! मुझे तो कुछ ऐसा लगता है, यह दिखाई पड़ता है कि जैसे मेरी कुल रीढ़ सीधी, सतर खड़ी रहती है। कुल बनावट तक मेरे सामने आ जाती है और मुझे तो बस हर एक की यक्षुई, दशा बिल्कुल अपनी तरह सीधी, सतर स्थिर सी एहसास में आती है। भाई, अब तो न जाने यह क्या बात है कि प्रार्थना चाहे आत्मिक उन्नति के लिये ही करती हूँ, तो भी यह लगता है कि जैसे ऊपर ही ऊपर रह जाती है। मेरी प्रार्थना स्वयं मुझ तक मानों नहीं पहुंच पाती है, न टकरा पाती है। बल्कि यह लगता है कि प्रार्थना तो मानों मेरे जर्रे जर्रे में कूट-कूट कर भर दी जा चुकी थी। वह तो स्वयं मेरा एक अंग ही है। कुछ भी हो, अब प्रार्थना की भी गुज़र मुझसे नहीं है। कुछ ऐसा लगता है कि कुल रीढ़ के भीतर से कुछ धीमा-धीमा प्रकाश बाहर आ रहा है। कुछ यह हो गया है इधर बहुत दिनों से कि मैं देखती हूँ कि मेरे अन्दर का वह Check कि ‘यह करो, वह न करो’ आदि कभी उठता ही नहीं। ऐसा लगता है, मेरे अतंस के सारे करिश्में, सारी पेचीदगियें समाप्त हो चुकी हैं। सादगी जीवन में घर कर गई और सादगी भी ऐसी कि जिसके होते हुए भी उससे भी Untouched ही एहसाम करती है। अब तो भाई, अशान्ति की गुज़र नहीं और शान्ति की पहचान नहीं और न उससे प्रेम ही है। बस यही मेरा हाल है।

  अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। यदि पत्र पहुंचने तक मास्टर साहब जी हों तो उन्हें प्रणाम। इतिः-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तुरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-424
लखीमपुर
15/9/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ जो पूज्य मास्टर साहब जी के शाहजहाँपुर से लौटने के पूर्व आ चुका था, परसों मास्टर साहब से मिला। पढ़कर हर्ष हुआ, परन्तु अभाग्यवश जो पत्र मास्टर साहब जी साथ लाये थे, वह उनकी ऐनक के साथ बस में ही खो गया। पूज्य मास्टर साहब जी से यह जानकर कि ‘आपको’ दो-तीन दस्त आ जाने के कारण फिर ज़्यादा कमज़ोरी आ गई, अम्मा कहती हैं कि आप अपने आप कभी यह ख्याल न करें कि ज़्यादा तन्दुरुस्ती बढ़ गई, क्योंकि अपनी नज़र आपको बड़ी जल्दी लग जाती है। मैं फिर बिल्कुल ठीक हूँ। पैदल कॉलेज आने-जाने पर भी थकान अब अधिक नहीं सताती है।

  मैंने ‘आपको’ Music College में Admission के बारे में नहीं लिखा, क्योंकि मेरी तवज्जो पर मेरा अधिकार नहीं है, सोच रही थी कि छोड़ने के लिये बीमारी का बहाना तो मौजूद है ही, परन्तु विश्वास रखिये, अब ऐसा नहीं होगा क्योंकि जब से ‘आपका’ कृपा-पत्र मिला है, तब से ‘आपकी’ खुशी ने मुझे खुश कर दिया है और मेरा जी नहीं ऊबता, परन्तु इतनी विनती पूज्य महात्मन् ज़रूर है मेरी कि बस इससे अधिक तवज्जो Divert न हो, यह काफ़ी है क्योंकि इससे मेरी बेचैनी इतनी देर को मुझसे बिछुड़ती है, यद्यपि पूर्णरूप से नहीं। फिर भी मेरे ‘श्री बाबूजी’ मैं यह स्वप्न में भी नहीं कह सकती कि इसकी याद मेरी परवरिश करती है, वरन् मैं तो केवल इतना ही जानती हूँ कि मैं तो कछुए की तरह अलग ही रहती हूँ। परवरिश तो इसकी कोई और ही करता है। बस निगाह ज़रूर मेरी उस ओर ही रहती है। मैं तो बस ‘मालिक’ की हर Research का Proof हो जाऊं, जिससे शायद कभी कोई सोचे कि कितनी महान छत्रछाया ‘माता’ की सदैव ही है और ‘उन्ही’ के बीच हम रह रहे हैं। ‘आपने’ जो एक गाने की चीज़ लिखी है, उस तरह से मैंने Trial ले लिया और Trial क्या, वह तो स्वयं ही अपना Proof था कि जैसे वातावरण की कुल हरकत समाप्त हो गई और बस एक अजीब सरल सी गूंज थी और पूजा में जो बैठे थे, उनका कहना था कि उनके दिल-दिमाग़ मानों Suspend हो गये हों। सुननेवालों को कंपकंपी तथा झनझनाहट बहुत लगती थी तथा सुनने वाले न जाने क्यों अपने को जैसे भूल-भूल जाते थे। गूंज तथा कंपकंपी या कम्पन गाना समाप्त होने के बहुत देर बाद तक रही। परन्तु मैं पूरी तौर पर अभी वैसा नहीं कर सकी हूँ जैसा कि हो सकता है। भाई, और चाहे कुछ हो, खुशनसीब मैं हूँ जिसको ऐसे (मालिक) सिखाने वाले मिले। अब कुछ-कुछ Perfect व Real मास्टर की तारीफ़ ‘मालिक’ की कृपा से मेरी समझ में अभी सिर्फ़ इतनी ही आई है कि वाकई Perfect व वाक़ई मास्टर वही है, जिसको उन Subjects पर भी जिनके बारे में वह बिल्कुल बुत है, उस ओर तवज्जो देते ही एक-एक गुत्थी उसके सामने सुलझ जावे। ‘आपने’ जो मेरे विचारों को बहुत आने का कारण लिखा है, वह मेरी समझ में बिल्कुल आ गया और जो मुझे ‘मालिक’ से बेलौस रहने के एहसास का कारण लिखा है, वही सत्य है और कुछ ईश्वर के उस भेद से सम्बन्धित लगता है कि जो ‘आपने’ अगले पत्र में मेरे यह लिखने पर कि “हर आदमी की दशा अपने से ऊंची लगती है” ऐसे----करके छोड़ दिया है। लखनौर में सत्संगी भाइयों के लिये जैसा ‘आपने’ लिखा है, वैसा ही कर रही हूँ और उसी दिन से, जिस दिन से इस बारे में ‘आपका’ पहला पत्र आया था। जो कहानी का मज़मून ‘आप’ लिखा गये थे, उनकी हिन्दी तो मास्टर साहब जी ने कर दी है, परन्तु अभी कहानी का रूप उसे नहीं दे सकी हूँ, अब कोशिश कर रही हूँ। तब तक एक कहानी ‘धर्मयुग’ में भेज दूंगी। मास्टर साहब जो कहेंगे, वही भेज दूंगी। परन्तु जैसा ‘आपने’ लिखा है, मैं यही चाहती हूँ कि यदि वह नाम के बजाय भी ‘श्री रामचन्द्र मिशन’ की एक ‘क्षुद्र सेविका’ के ही नाम से छपेगा तो ही छपेगी, नहीं तो वापिस ले लूंगी। मेरे एहसास खुले होने के बारे में जो ‘आपने’ लिखा है सो तो ‘मालिक’ की कृपा से होगा ही, क्योंकि जब कि लगता है कि दिमाग की हर पंखुड़ी खुली हुई है, हर नस-नस जाग चुकी है, और दिमाग़ ही क्या जब कि कुल शरीर की नस-नस लगता है जागृत है। इतना सोती हूँ, फिर भी मुझे न जाने क्यों सोने का एहसास ही नहीं होता और संग में यह भी है कि अगर दो-तीन रात, चाहे दो-तीन घंटा ही सोने को मिले या न मिले, तो भी जागने का एहसास नहीं होता, तो भी अंतस को खुमारी नहीं सताती। मेरा तो यह हाल है कि ‘श्री बाबूजी’ कि मेरे लिये तो नींद, भूख, कुछ सीखना, भूलना, जीवन-मरण, सब एक कहानी सी लगते हैं और आध्यात्मिकता एक पहेली है, जो ‘मालिक’ के बुझाये ही बूझी जा सकती है। कुछ यह हालत है, मेरे पूज्य महात्मन कि मुझे अब डूबना नहीं आता और न उथलापन है, न छिछलापन, न गहराई ही है, बस अब तो एक सीधी सरल सी दशा है। मुझसे दशा में अब महब रहना भी नहीं हो पाता। कुछ यह हाल है कि न घुसकर देखना आता है, न बाहर रहकर भूलना ही आता है। दशा तो कुछ है ही, परन्तु लगता है कि गति से मैं पार हो चुकी हूँ और गति (चाल) भी मुझे अब एहसास में नहीं आती है।

  अम्मा ‘आपको’ शुभाशीष कहती हैं। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-425
लखीमपुर
19/9/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा पत्र पहुंचा होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

  अब तो कुछ यह दशा है कि चाहे जो कुछ करूँ, परन्तु लगता है कि मेरा ज़र्रा-ज़र्रा निश्चल सा ही बना रहता है। उसमें हरकत या स्पन्दन कभी होता ही नहीं। लगता है कि जिन ज़र्रातों से मेरा सृजन हुआ है, वह केवल अचल है, निश्चल है। कुछ ऐसा होता है कि जब मेरा हाथ जल जावे या कहीं दर्द हो तो, चाहे कितना उसमें दर्द हो, तो भी मेरा तो हर कण-कण निश्चल ही बना रहता है। इतनी शरीर में Activeness होते हुए भी मेरा तो ज़र्रा ज़र्रा मानो शून्य सा पड़ा रहता है।

  मेरे परम पूज्य प्रभुवर ‘श्री बाबूजी’ अब तो कुछ ऐसी भूल की Condition में रहती हूँ कि जिसको याद करने से भूल की दशा का स्मरण आता है और उसके क्या करने से कहूँ, जब कि दशा तो यह है कि याद करूँ तब भूल की दशा सामने आती है और भूल जाऊं तो याद नहीं। कुछ यह है कि मेरी आँखों में न जाने क्या हो गया है कि चाहे जितना खोल कर देखूं, सब कुछ, आदमी तक, सब एक धूमिल रेखा से या एक परछाई सदृश्य ही दीख पड़ते हैं ओर ऐसा भी यदि गौर करें तो दिखाई पड़ता है नहीं तो Blank (बुत) हूँ।

  मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ यह है कि इसे अभिमान कहूँ तो मन नहीं ग्रहण करता कि अपना ख्याल तो चाहे कैसे हो रहता ही है, हाँ, अपने ख्याल का एक धूमिल सा ख्याल बना रहता है। परन्तु इसे तय नहीं कर पाती हूँ कि यह ख्याल या होश ‘उसका’ कहूँ या अपना। न जाने भाई, कुछ यह हाल है कि रात को यदि अधिक सो जाऊं, तो बर्दाश्त नहीं, यों कि कहीं ‘मालिक’ से गाफ़िल रहने की बेचैनी रहती है और जो याद करूँ तो बर्दाश्त नहीं होती। याद से घबराहट होती है और नहीं तो कहीं गाफिल तो न थी, इसकी बेचैनी, इसी द्वन्द में दिन-रात पड़ ही जाती हूँ और यही अब केवल द्वन्द मेरे में है। शेष द्वन्द तो समाप्त हो चुके, कुछ पता ही नहीं। एकता या दुई तक यह द्वन्द भी या ऐसे विचार भी मुझको नहीं आते। मुझे तो न जाने क्यों बेलौस (भूले से रहने में) ही अच्छा लगता है। क्योंकि इस दशा में मुझे ‘उसी’ की ही महक मिला करती है। ‘वही’ मेरा तो सब कुछ सम्भाले हुए है।

  अम्मा ‘आपको’ शुभार्शीवाद कहती हैं। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

  सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-426
लखीमपुर
25/9/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ बुध को ही मिला था, परन्तु सीधे हाथ में ही बर्र के काटने से काफ़ी सूजन के कारण कुवर के हाथ पत्र बहुत भेजने की इच्छा होते हुए भी सफल न हो सकी। किन्तु आज तो हाथ ठीक हो गया। ‘आपने’ जो आँतों में तवज्जोह देने के लिये लिखा और Self-Training का तरीका लिखा, सो मालूम हो गया, परन्तु मेरे में कोई Power ही नहीं महसूस होती है। मैं तो हर काम के लिये बस ‘मालिक’ के सहारे पड़ी हूँ, और यही मुझे प्रिय है, और बर्दाश्त भी मुझमें बस केवल इतनी ही शेष है। लखनौर वाले काम के लिये मेरी तबियत अब अधिक लगी रहती है। किताबें मास्टर साहब के यहाँ देख आई, और तो अच्छी है, परन्तु Photo का कागज़ अच्छा नहीं रहा। मैं अंग्रेज़ी की किताब 2-3 बार पढ़ चुकी हूँ किन्तु न जाने क्या बात है, बातें तो ‘आपकी’ कभी भूलती नहीं, परन्तु किताब भूल-भूल जाती हूँ। मेरी समझ में भी ‘मालिक’ की ही कृपा से आ जाती है, इंग्लिश सरल है। रीढ़ के बारे में जो ‘आपने’ पूछा, वह दोनों ही बातें होती हैं, यानी Vision के अन्दर भी दिखाई देती है और कभी-कभी सूक्ष्म रूप से सामने भी मालूम पड़ती है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

  कुछ ऐसा हो गया है कि जब दशा को देखती हूँ तो कबीर का वह दोहा याद आ जाता है कि-“एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहूँ तो गारि” कुछ ऐसा लगता है कि मानों मेरे में सत्य का या सत्य की अनुभूति का पर्दा फट चुका हो और वह सत्य बिखर गया हो। भीतर-बाहर कुछ अजीब गति या पद की दशा फैली हुई लगती है। मेरे परम पूज्य महात्मन् ‘श्री बाबूजी’ यही नहीं, कुछ ऐसा लगता है कि मेरा हर कण-कण अब अलग ही अलग बिखरा पड़ा है। बस एक श्वाँस ही सबको मानों जोड़े हुए है और हर कण में वही सत्य- दशा पाती हूँ। मेरा ज़र्रा ज़र्रा ही मानों सत्य-रूप हो चुका है और शायद इसी कारण से ऐसा लगता कि मानों मेरे सृजन के ज़र्रातों से मायिक (माया का) सम्बन्ध समाप्त हो चुका है और लगता है कि ‘मालिक’ ने ऐसी स्थिति प्रदान कर दी है कि जिससे अब हर आध्यात्मिक Conditions का भी मेरे जर्रातों में अब रहन नहीं है।

    मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब तो कुछ यह दशा है कि जीवन-मोक्ष-दशा तो इतनी साम्य अवस्था को प्राप्त हो गई है कि यदि सोचो है, तो ऐसे ठंडे रूप में है कि जिसमें दम नहीं रह गया है और सोचो नहीं है तो नहीं है, कोई बात नहीं। ऐसा लगता है कि इस दशा की तो गर्मी ही समाप्त होकर पैठ गई है, इसमें अब जान नहीं रही, या मुझसे अब इसे धारण करने का सामर्थ्य या बर्दाश्त ही नहीं रह गई है। अब तो भाई कुछ यह दशा है कि जाने क्या हो गया है कि चाहे किसी बात पर बच्चों पर गुस्सा होऊं, चिल्ला लूं, चाहे थप्पड़ भी मार दूं, यद्यपि ऐसा होता नहीं, तो भी अंदर तक अब गर्मी चाहे कैसी हो, सेंक तक नहीं पहुंच पाता। अब तो यह है कि बाहर की चीज़ बाहर है और भीतर की भीतर है। अब तो मैं स्वयं अपना रूप ही नहीं समझ पा रही हूँ। मैं क्या हूँ, कौन हूँ, कहाँ हूँ, इन प्रश्नों का उत्तर ही मेरे पास नहीं रह गया, मुझे कुछ पता ही नहीं रह गया है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ पहले मुझे भीतर-बाहर बस केवल एक ही रूप, एक ही धारा, एकता ही एहसास होती थी, परन्तु इधर कुछ यह हो गया है कि मुझे अब हर आदमी का रूप अलग-अलग जैसा है, वैसा दीखता है, हर आदमी दीखता है परन्तु अंदर की दशा तो मैं नहीं कह सकती कि कैसी रहती है।

  अब तो भाई कुछ यह दशा आ रही है कि जब ‘मालिक’ की याद आती है तो एक कलेजे पर धक्का सा लगता है। शायद जी भर कर ‘उसकी’ याद न कर पा सकने के कारण जब याद आती है तो अजीब Mood, अजीब सी दशा होती है। पहले तो इससे इतनी खुशी व इतना उत्साह होता था, परन्तु अब तो कुछ अजीब उलझन बेचैनी सी ही लगती है। क्यों न हो, जबकि दशा तो यह रहती है कि भरी हुई सी अवस्था में, तिस पर भी भूली, खोई या बिकी हुई सी तबियत रहती है।

  अम्मा ‘आपको’ शुभाशीष कहती हैं। इति:-

  सदैव केवल 'आपकी ही कृपाकांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-427
लखीमपुर
29/9/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ कल मिला-पढ़कर हर्ष हुआ। डॉक्टर सिन्हा को भी जो पत्र ‘आपने’ लिखा था, सो नकल कर लिया। यह सब, जो कुछ भी ‘आप’ लिखते हैं, यह ऐसी शिक्षा है, जो स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है और ऐसा भी दिन आवेगा अवश्य। ‘परमार्थ पत्रिका’ के लिये लेख भेज रही हूँ। छोटा सा है। नाम ‘परमार्थ अभ्युदय’ है। आशय केवल इतना है कि परमार्थ की ओर अग्रसर होने वाले साधक का स्वरूप मात्र है। ‘आप’ सुन लीजियेगा फिर जैसा उचित हो कीजियेगा। ‘धर्मयुग’ में ‘अमर- ज्योति’ कहानी भेज रही हूँ तथा ‘कल्याण’ के लिये ‘अनोखी प्रीति की रीति’ भेजूंगी। कहिये Direct भेज दूं या इलाहाबाद भेज दूं और लिख दूं कि एक पत्र चाचा इसमें रख दें कि चाहे मेरा नाम न छापें, परन्तु ‘श्री रामचन्द्र मिशन’ अवश्य छापें। जैसा ‘आप’ कहेंगे, वैसा ही करूंगी। वैसे दूसरी ‘पथिक’ कहानी उचित थी भेजना, परन्तु वह अभी तैयार नहीं कर पाई हूँ।

  अब तो ‘श्री बाबूजी’ इतनी धीमी चाल है कि स्वयं अपनी तबियत परेशान व ऊबने सी लगती है। स्थान इतने धीरे-धीरे साफ़ हो रहा है कि मुझे अच्छा नहीं लगता। जब तक तबियत साफ़ नहीं होती, तब तक कुछ उलझन सी बनी रहती है। परन्तु शुक्र है कि कल से ‘आपके’ पत्र पढ़ने के प्रभाव से ज़र्रातों का भारीपन भी हल्का पड़ने लगा है तथा दशा में शुद्धता आने लगी है। कुछ निखरने सी लगी है, परन्तु अभी बिल्कुल ठीक नहीं आई है। मेरी तो यह छोटी सी समझ यह कहती है कि इन Points का इल्म और वाक्फ़ियत बढ़ाना केवल ‘आप’ ही का काम है। जिस तर्ज़ और तरीके से मैं चल रहीं हूँ, इसमें साधक का शौक व उत्साह बढ़ता है। थकान कभी आ ही नहीं सकती। यही नहीं, इसका प्रभाव शरीर पर भी यह है कि चाहे भागती फिरूँ लेकिन थकान की शिकन भी नहीं आती। कुछ यह भी है कि सोती भी हूँ तो एक तबियत से चाहे कितनी तेज़ सोऊं परन्तु दूसरी से भी यदि सो जाऊं तो शायद फिर वह अंतिम, यानी सदैव की नींद कहीं न हो जावे। शायद इसी कारण जाग्रत अवस्था बनी रहती है। अभी कुछ दशा खुली नहीं, जो साफ़ पढ़कर लिख सकूं, फिर भी आशा है ‘मालिक’ की कृपा से अब इसमें भी विलम्ब नहीं लगता। 

अम्मा ‘आपको’ शुभार्शीवाद कहती हैं। मैं कल्याण में 'पथिक' कहानी ही भेजूंगी, जब तैयार हो जायेगी। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपा कांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-428
लखीमपुर
8/10/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

केसर से ‘आपकी’ कुछ बातें एवं ‘आपकी’ तबियत के बारे में भी जानकर खुशी हुई। अब की बार मुझे पत्र डालने में इतनी देर हो गई, परन्तु मेरी प्रार्थना व आशा है कि ‘आप’ इसके लिये मुझे अवश्य क्षमा कर देगें। इधर न जाने क्यों कुछ समय न मिला और रात में कुछ थकान से आये अलसाये होने के कारण न लिखा, परन्तु मुझे इसके लिये पत्र न लिख पा सकने की बेचैनी से चैन न मिला और यह चीज़ बहुत ही ज़रूरी है, हम साधकों के लिये। ‘धर्मयुग’ में कहानी भेज दी है, अब जो वे लिखेगें, सो ‘आपको’ लिखूंगी। पेट ठीक है, परन्तु इधर अब जितनी थी, उतनी से नहीं बढ़ रही है। इधर 5-6 दिनों से ताऊजी की दशा अच्छी पा रही हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि जैसे उनके मन की, यहाँ तक कि कुछ कणों में से भी स्थूलता साफ़ हो रही है, उसकी जगह अभी बहुत हल्की-हल्की रोशनी की छाया सी मालूम पड़ती है। कुछ थोड़ी-थोड़ी इलाहाबाद में सब की आत्मिक उन्नति जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की ही कृपा-शक्ति के एक अदने करिश्मे से पत्थर भी पिघलकर चलने लगते हैं। आगे उन्नति के लिये हमें पत्थर को पिघलाने की बहुत ही आवश्यकता होती है। फिर मेरे ‘श्री बाबूजी’ पत्थर हमें कैसे पार लगा सकते हैं, परन्तु यह भेद भी खुलता तभी है, जब कोई इस हद तक पिघला हुआ मिल जावे कि जिनके देखते-देखते पत्थर (यानी पार्थिव शरीर का ज़र्रा-ज़र्रा और पार्थिव-पना) भी पिघल जाये। मेरी तक़दीर ने तो ढूंढ ही लिया। इसके लिये ईश्वर को कोटि-कोटि धन्यवाद है। 

इधर मेरा कुछ यह हाल है कि मैं गुम तबियत सी अधिक रहती हूँ। और यह हाल है कि इस बात का भी होश नहीं रहता। हाँ, इसका भी होश आता है तब, जब बहुत भीड़ अथवा शोरगुल हो। यहाँ तक होता है कि मेले से मैं बिना किसी के बताये निकल ही नहीं पाती। यदि कभी जाती हूँ मेले तो यह हाल हो जाता है। बाएँ पैर के अगूंठे के पास वाली उगंली में तो जाने क्या बात है कि इतनी ज़ोर की रेंगन लगती है कि ज़्यादातर यह सोचकर कि कोई जानवर चढ़ रहा है, पैर फटक देती हूँ। दाहिने में तो केवल कभी-कभी ही होती है और ऊपर तथा नीचे दोनों ओर होती है। दशा में अभी जागृति नहीं मालूम पड़ती। मेरे परम पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मेरा मन इसलिये अधीर रहता है कि मैं पूरी तरह से ‘उस’ ओर यानी ‘मालिक’ की ओर लग ही नही पाती हूँ। पूरी तबियत नहीं ले जा पाती हूँ उस ओर। Senses की मुझे चाहे विरक्ति हुई कह लीजिये या कुछ, परन्तु तबियत (दशा) की अनुभूति की अनुभूति मुझे ज़रूर रहती ही है। इसे ही ‘आप’ याद कहें तो स्मरण कहें तो।

  मेरे परम पूज्य प्रभुवर ‘श्री बाबूजी’ कुछ ऐसी दशा है कि न जाने क्यों एक तबियत, तो लगता है विचारों के सागर में निमग्न रहती है। यह हाल है कि यदि Neglect न करूँ तो दिन भर कुछ न कुछ लिखती रहूँ। परन्तु ऐसा ज़रूर लगता है कि यह सब मेरे दिमाग़ से परे है, क्योंकि मेरा दिमाग़ तो उन विचारों को Collect करके लिखने में ही अधिक थक जाता है, फिर उसमें इन विचारों के ठहरने की कहाँ गुंजाइश है। यह भी अचम्भा है कि जिस तरफ़ दिमाग जावे, बस वैसे ही विचार आने लगेंगे। अब तो कुछ ऐसा लगता है कि बलुहा मैदान भी ओझल हो चुका, क्योंकि उस मैदान का ख्याल भी अच्छा नहीं मालूम पड़ता। परन्तु अब का मैदान भी साफ़, सपाट सामने नहीं आ रहा है।

  केसर, इतवार को इलाहाबाद जावेगी। अम्मा ‘आपको’ शुभार्शीवाद कहती हैं। अब तो दीवाली भी पास आ रही है, और ‘आप’ रात के बारह बजे से दिन ग्यारह बजे तक यहाँ रहेंगे। लखनौर में तो शक्ति का एक Focus जिसका रुख नीचे की ओर है, मालूम पड़ा करता है, 7-8 दिन से। केसर चिट्ठियां दो कॉपी तो यहाँ उतार गई थी, तीन कॉपियाँ और उतार लाई। अब फाइल मेरे पास है, मैं भी कुछ न कुछ उतारुंगी। दशा में सफ़ाई न होने के कारण या खुली न होने के कारण तबियत में अभी चेतना नहीं आ पाई। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपा कांक्षिणी

  सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-429
लखीमपुर
12/10/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कल पूज्य मास्टर साहब जी आ गये, उनसे समाचार तथा ‘आपकी’ तबियत का हाल जानकर प्रसन्नता हुई, परन्तु ‘आपकी’ सांस की तकलीफ़ कुछ उभरने लगी है, तथा बार-बार दस्त आ जाते हैं, जानकर फिक्र है। ‘आपको’ दस्त अब जाने क्यों हो जाते हैं सांस से ‘आपको’ कमज़ोरी आ जावेगी, ‘आप’ कुछ दवा लीजिये। मेरी तन्दुरुस्ती फिर बढ़ने लगी है, जब से ‘आपको’ लिखा था, तब से ‘मालिक’ की कृपा से ही जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

  मेरे परम पूज्य महात्मन्! मैं ‘मालिक’ से प्रेम नहीं कर पाती हूँ, अपने से यह शिकायत है। मेरा एक-एक कण प्रेम के लिये खाली पड़ा है, संभव है कभी ‘ईश्वर’ मुझे यह अमूल्य रत्न प्रदान कर दे। मेरे तो शरीर का ज़र्रा ज़र्रा प्याला बन चुका है। कुछ ऐसी दशा है कि अब तक सुना करती थी कि मन से हल्का सूक्ष्म कुछ नहीं है, तभी तो इसकी गति भी पल में यहाँ, पल में वहाँ रहती है। परन्तु मेरा तो यह हाल है कि बस गति को निकाल लिया जावे, तो मेरा एक-एक कण मानों मन ही के समान हो चुका है या मन ही हो चुका है। अब तो लगता है कि दशा में खाली से खालिसपन की कुछ महक आने लगी है। परन्तु हर कण-कण की गति व मन की गति एक ही बन चुकी है। केवल एक ही ध्वनि में लय हो चुकी है कि “हाय ! प्रेम कहीं ‘मालिक’ का मिल जाता”। मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ ऐसा है कि मन व मेरे ज़रें-ज़रें व भीतर-बाहर की समान ही दशा चलती है। एक समान ही दशा बहती है। मेरा तो यह हाल है कि अब तड़प लगती है, न कसक; अब तो टीसन दिल का दर्द बन गई है, जो अक्सर ‘मालिक’ की याद दिला दिया करती है। 

अब तो ऐसा लगता है कि मैदान तो सीधा-सादा है, परन्तु Limitless है। परन्तु इसमें क्या चीज Limitless है, यह मैं स्वयं नहीं कह सकती, क्योंकि शान्ति कहूँ तो, उस दशा की भी Limit है, और यदि कोई उससे परे झाँके तो उसे शान्ति नाम से सम्बोधन नहीं कर मिलता। यदि आनन्द कहूँ तो है नहीं, क्योंकि उसकी भी हद है, और यदि उससे परे सोचा जावे तो, वह फिर इस योग्य नहीं रहती कि उसे आनन्द नाम दिया जावे, बस मेरे ‘श्री बाबूजी’ एक ही शब्द पाती हूँ, जिससे उसका कुछ अन्दाज़ लगा मिलता है, जो बेचैनी, तड़प, कसक व टीसन से बदल कर अब दिल का दर्द बन गई है।

    मुझे कुछ ऐसा लगता है कि सारी रीढ़ से लेकर पूरे दिमाग़ तक एक अविचल, स्थिर सी नाड़ी खड़ी रहती है, जिसमें चाहे कैसी कितनी हरकत हो अंतर ही नहीं पड़ता। इसे मन की गति कह लें, तो भी कोई हर्ज़ न होगा, और यह सम्बन्धित सदैव दिमाग़ से ऊपर किसी ऊपरी दुनियाँ से ही रहती है, जो विचार लाया करती है। परन्तु न जाने, एहसासों को कौन चुनता है। अब कुछ ऐसा है कि शरीर से अंतर तक देखने में कोई बन्धन व आवरण नहीं दिखाई पड़ता है, या यों कह लीजिये कि ज़रें से ज़रें तक में कोई सम्बन्ध नहीं है, सब शुद्ध या खाली और स्वतंत्र हैं। ज़िन्दगी अब तो विचारों से पल रही है। मेरे परम पूज्य महात्मन्! कोई ‘मालिक’ के इस महान चमत्कार को देखे कि ऐसा चमत्कार क्या किसी में हिम्मत है जो दिखा सके। मैं तो देखकर बस पुलक उठती हूँ। मेरी दुनियाँ में अब शब्दों का आडम्बर भी नहीं है, जिससे मैं अपने ‘मालिक’ का धन्यवाद तक दे सकूँ। मेरा तो यह हाल है कि लगता है, मेरा मस्तक तो हमेशा इतना नत या झुका हुआ रहता है कि यदि ‘मालिक’ को धन्यवाद देने के लिये मुंह ऊपर उठाऊं तो यह तो समझ में आता नहीं कि क्या कहूँ और न जाने कब मस्तक स्वयं ही नत हो जाता है। फिर इसे भी भूल जाती हूँ कि नत हूँ। यही दशा प्रेम की है कि सिवाय सिर झुकाने के और मेरे पास कोई कोशिश नहीं रह गई है। परन्तु मुझे अब न जाने क्या हो गया है कि लगता है कि अब ‘मालिक’ मुझे अपनी मिल्कियत की तरफ़ खींचे लिये जा रहा है और मैं उसी मार्ग में अब हूँ। दशा तो इतनी हल्की या खाली हुई पाती हूँ कि एहसास या अनुभव से भी हल्की पाती हूँ। परन्तु ऐसा होते हुए भी ‘मालिक’ की कृपा से दशा इतनी शुद्ध सामने आती है और निगाह भी तुरंत वैसी ही बनकर उसे पढ़ ही लेती है, फिर ‘उसी’ (मालिक) की कृपा से न जाने कैसे कुछ न कुछ शब्दों द्वारा उगल ही जाती है। मेरी तो इतनी भूली या बेसुध दशा अब रहती है अब चाहे दशा कितनी साफ़ सामने हो परन्तु जब तक तबियत को उकसाती नहीं, तब तक होश नहीं रहता, जागती नहीं दशा Read ही नहीं करती और यदि उकसाना बन्द कर दो फिर ठप हो जाती है। यही हाल कुछ भी लिखूं तो होता है। बात करने में हो जाता है। इति:-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपा कांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-430
लखीमपुर
17/10/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ कल मिला-पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। जब परम पूज्य महात्मन् के स्नेहसिक्त इन शब्दों को पत्र में पढ़ती हूँ कि “तुम्हारी बागडोर मैं अपने हाथ में रखता हूँ” तो अपार हर्ष होता है और कभी यह सोचती हूँ कि क्या अब एक साधक की श्रेणी में मेरी गिनती हो सकती है? क्योंकि जब तक ‘मालिक’ साधक की बागडोर न सम्भाल ले, तब तक तो यह प्रश्न ही बेकार है और ‘मालिक’ का हज़ार-हज़ार धन्यवाद है कि जब बालिका में साधना का भी बल न रहा तो ‘उसने’ सम्भाल लिया। सम्भाला तो अब तक ‘उसी’ ने है और ‘वही’ आगे भी सम्भालेगा, हाँ अब कहीं गलती होने का भी भय मुझे नहीं रहा और गलती भी कैसे हो जब सही ही नहीं होता। मैं कुछ ऐसी निर्द्वन्द रहती हूँ, बेफ्रिक घूमती हूँ। शुक्लाजी वहाँ चले गये, ‘आपसे’ मिल लिये, बड़ा ही अच्छा रहा, एक अंधेरे में पड़े रहते और उसे उजाला समझा करते। मेरे में ‘श्री बाबूजी’ यह कुछ ऐसी कमी है कि ज़रा भी प्रेम ‘मालिक’ का किसी में देख पाती हूँ तो अपनी तबियत इतनी उछलने लगती है फिर उसके दोष कुछ दिखाई नहीं पड़ते। पूज्य मास्टर साहब जी में यह बात नहीं है, इससे उनका Reading ठीक बैठता है। ‘आपने’ अपनी Value, Zero या सिफ़र दी है, इससे ठीक Expression और कुछ ‘आपके’ लिये मिलता ही नहीं। यह ऐसी अपनी अनोखी चीज़ है कि इसकी उपमा आज तक शायद कभी किसी ने न दी हो और इससे उपमा देता ही कौन जब इसकी तह तक कोई पहुंच ही नहीं पाया। ‘आपके’ दमे की तकलीफ़ सुनकर सबको चिन्ता है। न जाने क्या बात है ‘श्री बाबूजी’ कि करीब 7-8 दिन से अनजाने में ही तबियत को प्रार्थना में रुजू पाती थी और वह प्रार्थना क्या थी कि “ईश्वर ‘मेरे बाबूजी’ को दमे की तकलीफ़ न हो” इस कारण एक-आध दिन इच्छा-शक्ति ने भी ज़बरदस्ती यह काम किया। यद्यपि बहुत धीमा कि न जाने यह क्या बात है। मेरी भी सांस इधर 4-5 दिन से कुछ खराब थी, कल दवा ले आई। अब ठीक हो गई। पेट में मर्ज़ के Symptoms तो मुझे नहीं मिलते, परन्तु 6-10 वर्ष का मर्ज़ होने के कारण Practical way में आते-आते जितना समय लग जाये, वह भी शीघ्रता से हो रहा है। बसंत पंचमी अबकी हम लोगों को जल्दी बुला रही है, बड़ी खुशी है। अब ‘आपके’ यहाँ आने के केवल छः दिन रह गये है, किसी तरह जल्दी कट जायें बस। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

  मेरा तो कुछ यह हाल है कि जब ‘आप’ यह लिखते हैं कि “तुम्हारी तबियत असलियत की तरफ़ तेज़ रुजू है” तो मैं अचम्भे में पड़ जाती हूँ, परन्तु एक दृढ़ विश्वास के साथ कि जो ‘आपने’ लिखा है। अचम्भा यों लगता है कि मैं दिन-भर इस बात की कोशिश करती हूँ कि तबियत उस ओर रुजू हो, परन्तु याद इतनी खराब है कि आधा सेकण्ड भी न गुजरता होगा, कि ख्याल बहक जाता है और फिर बहुत समय बाद याद आती है कोशिश करने की। परन्तु कुछ यह हो गया है मेरे ‘श्री बाबूजी’ कि पहले जैसे याद आने पर एक दशा में जैसे झटका सा लगता था परन्तु अब तो झटका-वटका कभी लगता ही नहीं। दशा में शायद मेरी याद का कुछ असर ही नहीं पड़ता या याद की पहुंच भी वहाँ तक नहीं हो पाती। पहले जैसे लगता था कि दशा से तबियत नीचे आ गई और अब तो चाहे तोपें गरजें, भीड़ हो, याद आये या न आये, परन्तु तबियत में झटका लगना व नीचे झुकना असंभव है, क्योंकि ‘श्री बाबूजी’ कुछ यह हाल है कि तबियत तो मेरी खोकर जाने कहाँ चली गई या यों कह लीजिये कि तबियत दशा में पगी रहती है। मेरी सुस्त, याद का डोरा सम्बन्ध सब कुछ खो गया। मैं तो यहाँ एक बहकी हुई सी रहती हूँ, जिसे इससे भी (यानी बहकी हुई से भी) एक प्रकार को बेहोशी रहती है। रीढ़ के आस-पास कन्धे से नीचे बीचों-बीच रीढ़ के आस-पास, रीढ़ के लगे ही हल्की सरसराहट व गुदगुदी रहती है। कुछ यह है कि अक्सर मैं देखती हूँ कि, अनजाने में भी मैं जो बात करती हूँ, चलती हूँ, फिरती हूँ, या सारे स्पन्दन एक अजीब सपाट, सीधी दशा में मिले रहते हैं। एक अजीब प्राकृतिक रहन में होते हैं। एक अजीब प्राकृतिक रहन में मैं रहती हूँ, जिसका मुझे अहसास कुछ बेखबरी में होता है।

  कल ‘धर्मयुग’ ने कहानी वापिस कर दी है कि यहाँ यह कहानी नहीं छपेगी अब ‘नवनीत- पत्रिका’ एवं ‘हिन्दुस्तान’ में Try कर देखूंगी। मौसा जी को भी लिखकर पूछूंगी यदि रेडियो में बोलने के लिये दस मिनट मिल जायें। Subject स्वयं दूंगी या उन्हीं से मागूंगी, देखिये जैसा होगा देखा जावेगा। Notes तो मैंने कहानी में दिये थे। अब तो ‘आप’ आ रहे हैं, बस यही खुशी बहुत है।

  अम्मा ‘आपको’ शुभार्शीवाद कहती हैं। इतिः- 

सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपा कांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-431
लखीमपुर
29/10/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है, ‘आप’ भईया, दद्दा के साथ आराम से पहुंच गये होगें। मैं भी ‘मालिक’ की कृपा से ताऊजी के साथ आराम से पहुंच गई। मेरे आँखों के सामने तो अभी बस ‘श्री बाबूजी’ घूम रहे हैं। मेरा तो जी नहीं लगता किसी काम में एक ही छवि के आगे सब कुछ न्यौछावर हो चुका है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही।

  अब तो कुछ ऐसी दशा रहती है कि हर समय ‘मालिक’ के लम्बे हाथ मेरे ऊपर रहते हैं, नहीं तो यह हाल है कि बिच्छू सामने पड़ा है और मैं उसे देख रही हूँ, किन्तु होश नहीं है। जब उसे लकड़ी पर उठाकर एक ओर फेंकने चली तो जैसे किसी ने हाथ पकड़ कर झटक दिया हो और आँखों में रोशनी दी जिससे बिच्छू समझ कर मार दिया। कुछ ऐसी दशा रहती है कि बेहोश रहूँ तो होश नहीं रहता और होश में रहूँ तो होश नहीं रहता। मुझे आश्चर्य है कि जब स्कूल में मुझसे गाना पूछा जाता है, तो स्वयं ही उस बहकी सी दशा में भी गाना अपने आप ही सही-सही मुंह से निकलने लगता है।

  इधर दो-तीन दिन शायद 26-27 तारीख से कुछ यह जाने क्या है कि ऐसा लगता है कि मानों पीठ पर रीढ़ पर एक मुट्ठी बन्द रक्खी हुई है, या हाथ बल्कि Touch रहता है, जिसके कारण मेरी कुल पीठ में हर समय Vibration रहता है और सबसे ज़्यादा तो कुल रीढ़ की लाइन में रहता है। रीढ़ के हर गुरिये में Vibration है तथा किसी तरह की हल्की Light निकलती है। अक्सर उनमें से कुछ गर्मी निकलती महसूस करती हूँ। मेरे पूज्य महात्मन् कुल पीठ कुछ खुली हुई हल्की-हल्की सी मालूम पड़ती है। कभी लगता है कि कुल पीठ में इस तरह का कुछ छाया हुआ है। ऐसा शायद तेज़ Vibration के कारण लगता होगा। परन्तु कुल Vibration से भी मैं देखती हूँ कि रोड़ के बीचों-बीच जो नस खड़ी हुई हैं, उस पर तो कुछ प्रभाव ही नहीं पड़ता यानी कुंडलनी पर। और लगता है वह तो अचल, स्थिर, ज्यों की त्यों खड़ी हुई है। कुछ यह है कि कुल पीट में शायद Vibration द्वारा या कैसे एक अजीब हल्की शान्त, सौम्य दशा सी फैली अनुभव होती है। कुल पीठ के जोड़-जोड़, नस-नस मानों ढीली पड़ गई है या पिघल चली है।

  मेरे परम पूज्य ‘श्री बाबूजी’ अब तो कुछ यह दशा है कि लगता है कि मन नाम की तो अब मेरे पास कोई चीज़ ही नहीं रह गई हैं। कुछ ऐसा है कि मन की बंदिश या बन्धन टूट गया है, जिससे उसे सर्वव्यापी कह लीजिये तो कुछ नहीं या सब जगह फैला हुआ कह लीजिये तो ठीक ही होगा। यदि कुछ है ही नहीं कह लीजिये तो भी कुछ नहीं है। ऐसी बेपरवाही सी दशा है। मेरे परम पूज्य प्रभुवर ‘श्री बाबूजी’ ऐसा लगता है कि सम्पूर्ण जगत, ब्रह्माण्ड तक सब मानों मेरा Heart ही फैला हुआ है। अब तो लगता है कि ‘मालिक’ की कृपा से ‘Z’ Point शुद्ध साफ़ खुला हुआ पड़ा है, क्योंकि अब ऐसे ही सपाट मैदान में अपने को बढ़ता हुआ पा रही हूँ। हाँ, और न जाने क्यों वह फैला हुआ Heart लगता है कि मुझमें जज्ब हुआ जा रहा है। न जाने क्या बात है कि कभी- कभी पागलपन के Action करने को तबियत उतारू सी हो जाती है, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा रूपी बागडोर बुद्धि में इतना होश ज़रूर रखती है, जिससे ऐसा नहीं होने पाता, परन्तु देखती हूँ कि कुल इन्द्रियों के Senses बिल्कुल समाप्त हो चुके हैं और बिल्कुल अचल, स्थिर सा अनुभव करती हूँ। कुछ ऐसा एहसास होता है कि ‘मालिक’ की कृपा-दृष्टि, भाई मुन्ने-बाबू के रुपये के भण्डार भरने को कुछ रुजू है। मैं देखती हूँ जैसे मेरे अन्दर सब कुछ अचल है, बस एक क्षोभ है, वही मन के रूप में मेरे पास है और वह है कचोटन। न जाने क्यों मेरे ‘श्री बाबूजी’ अबकी से जब तक ‘आपके’ पास रहती थी, तब तक तो वहाँ से हटने की तबियत न होती थी और घर आकर न जाने क्यों फिर ‘मालिक’ के ही पास जाने की कुछ तबियत नहीं मालूम पड़ती थी, परन्तु तैयारी पास जाने की ही रहती थी। 

अम्मा ‘आपको’ शुभार्शीवाद कहती हैं। इतिः- 

सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपा कांक्षिणी

  सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-432
लखीमपुर
1/11/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ आज मिला- पढ़कर हर्ष हुआ। मेरा पत्र मिला होगा। दीदी की तबियत का हाल दीजियेगा और कृपया अपनी का भी। मैंने इतना तेज़ दर्द का दौरा ‘आपका’ अब तक कभी नहीं देखा था, जैसा कि अब की बार देखा है, और अभी तक नहीं रुका। ईश्वर न जाने क्यों हमारी गुहार पर ध्यान नहीं दे रहा है, परन्तु अब तो उसे ध्यान देना ही होगा। बालक की सच्ची पुकार पूरी होकर रहेगी। ज़रूरत से ज़्यादा दर्द मुझे बर्दाश्त नहीं होता। क्या इसके लिये कोई दूसरा पात्र यानी ज़रूरत से ज़्यादा दर्द के लिये कोई और नहीं हो सकता। खैर, ईश्वर कृपालु है, इसमें सन्देह नहीं और ‘आपके’ दर्द के तेज़ दौरे भी मध्यम पड़ ही जायेंगे ईश्वर ने चाहा तो ताऊजी सुबह मास्टर साहब जी के यहाँ ही चले जाते हैं। Right Condition वाली हालत के पर्दे बराये नाम ही कुछ हैं, बस वे भी मालिक की कृपा से साफ़ हो जावेंगे।

    गोला आने से पहले मेरे आँसू न थम सके, यद्यपि मैं यह प्रयत्न करती रही कि इससे ‘श्री बाबूजी’ को कुछ तकलीफ़ न पहुंचे। यद्यपि चौबीसों घंटे ‘मालिक’ का सूक्ष्म रूप प्रतिछाया के सदृश्य अनुभव करती हूँ, परन्तु फिर भी न जाने क्या हो जाता है। अभी तक कुछ यह हाल है कि यदि कोई ‘श्री बाबूजी’ कह देता है, तो एक प्रकार की छटपटाहट अंतर में लगती है, परन्तु कुछ भी हो, ज़ब्त में ही आनन्द है मुझे आँसू बहाना एक अपनी कमज़ोरी मालूम पड़ती है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ आपने जो तारीफ़ लिखी है, वह तो ‘आपकी’ ही सेविका, बिटिया की है और वह तो न तो स्त्री है, न पुरुष, जो कुछ भी है, अपने ‘मालिक’ की है और जो कुछ इसमें तारीफ़ काबिल बात है, वह तो ‘मालिक’ का ही एक अदना करिश्मा है, ऐसा मेरा सुदृढ़, सत्य निश्चय है। ‘आप’ मुझे रफ़्ता-रफ़्ता ही ले चलिये। जैसे मर्ज़ी हो, वैसे ही ले चलिये। मैं तो हर हाल में खुश हूँ। स्वामी प्रसन्न रहे, सेवक का यह फर्ज़ है। मुझे तो ‘मालिक’ से काम है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

  अब तो यह हाल है कि लगता है कि दिमाग़ पर मानों कुछ एक नशे की खुमारी सी छाई रहती है। अब चाल तो सीधे सपाट मैदान में वही है, जैसी की होनी चाहिए परन्तु मेरी तबियत तो तब भी सिवाय फड़फड़ाने के जल्दी से उड़कर न जाने कहाँ भाग कर जाने को बेचैन रहती है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ आजकल तो यह हाल है कि लगता है एक शुद्ध, हल्की दशा मुझमें हर समय समा रही है, भिदती जा रही है। परन्तु देखती हूँ कि ज्यों-ज्यों वह समाती है, अंतर और पिघलता जाता है और Space होती जाती है, और Space क्या? वही खालीपन बढ़ता जाता है। ऐसा हल्का सौम्य मैदान का मैदान मुझमें हर समय समाया जाता है। हज़्म हुआ जा रहा है। कुछ ऐसा लगता है कि मानों बुद्धि, मन हल्कापन, तथा स्पन्दन, सब अटल, स्थिर, अचल रह गया है, सब ठप सा हो गया है। अब न जाने क्यों कुछ यह हो गया है कि चाहे कोई हो, मुझसे बड़ा हो, छोटा हो, आँख से आँख नहीं मिला पाती, क्योंकि सबकी चरण-धूलि के समान मेरी हस्ती लगती है। कुछ ऐसी ही हल्की दशा हो गई है। मेरे परम पूज्य ‘श्री बाबूजी’ मेरी तो कुछ यह दशा हैं कि भीतर-बाहर, सब कुछ अचल, स्थिर ही मुझे महसूस होता है। हर जड़, चेतन, अटल ही अनुभव करती हूँ।

  परसों सिर के बीचों बीच, मांग के लगे-लगे में, बाईं ओर, बीच माथे के ऊपर से, जहाँ से मांग शुरू होती है, वहाँ से और जहाँ पर चोटी रक्खी जाती है लड़कों के, वहाँ तक पूरी लकीर भर में पिपरमिन्ट की तरह बड़ी ठंडक सी करीब दो-ढाई घंटे बराबर रही। अब भी कभी-कभी कुछ बहुत धीमी सी मालूम पड़ती है। कुल पीठ में तो चौबीसों घंटे स्पन्दन रहता है। गुदगुदी सरसराहट, तथा कभी-कभी ठंडक सी भी हो जाती है। आजकल कभी-कभी पीछे गर्दन में जहाँ रीढ़ शुरू होती है, उससे चार अंगुल की नीचे बाली गुरिया तथा पीठ के बीचोबीच वाली में तो बहुत फड़कन रहती है। वैसे तो कुल पीठ में हर समय रहती है। यह न जाने क्या बात है कि अक्सर बैठे-बैठे एक मुर्दे की सी हालत हो जाती है, परन्तु एक हल्का सा Sense Lose नहीं होता है।

  अम्मा ‘आपको‘ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपा कांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-433
लखीमपुर
4/11/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ कल मिला- पढ़कर हर्ष हुआ। ‘आपने’ यह तो बहुत ठीक लिखा है कि मन का कुछ बन्धन शेष है, उसी के कारण कुछ भद्दा force असर करता है। मैं भी कुछ इसके कारण तबियत में शुद्धता में कमी पाती हूँ। कमी क्या पूरी तौर से स्वतंत्र शुद्धता में नहीं हो पाती, परन्तु यह मालिक की ही कृपा व शक्ति है कि इसके कारण कभी दशा में मुझे रुकावट अथवा भद्दापन नहीं मालूम पड़ता। अब फिर मुझे फ़िक्र ही क्या, जो ‘आपका’ मन चाहे कीजिये। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी मेरी आत्मिक दशा है सो लिख रही हूँ।

  न जाने क्या है मेरे ‘श्री बाबूजी’ कि मेरी कुछ एक इस प्रकार की हालत रहती है कि उसमें ख्याल डटाने या बाँधने से शरीर में शिथिलता आने लगती है और बिल्कुल मुर्दापन। वैसे वहमी तौर पर तो रहती ही है, मगर मुझे अब Condition का भी कुछ स्मरण नहीं रहता और कुछ विचारों की लड़ी उससे तबियत को जुड़ी रहने या रम जाने से थामे रहता है और विचार भी क्या मुझे इसका पता ही नहीं। कुछ ऐसा एक वहम सा रहता है कि जैसे एक तबियत विचारों के सागर में कुछ डूबी रहती है, परन्तु मुझे उनका इतना एहसास नहीं होता, इसलिये कुछ थकान नहीं। मेरे ‘श्री बाबूजी’ मेरी तो जड़-अवस्था हो गई लगती है, बस चेतन इतनी है, जितना या जैसा कि पेड़-पौधे ज़िन्दगी के लिये रस खींचा करते हैं। अक्सर यह न जाने क्या बात है कि लगता है कि हज़ार ब्रह्माण्डों की रचना से भी Heart का फैलाव कहीं अधिक है, थाह नहीं है। ‘मालिक’ की कृपा से कुछ ऐसी सुदृढ़ स्थिति है कि चाहे कोई आग में जला दे, पानी में डुबा दे, परन्तु अपनी स्थिति में तिल भर भी अन्तर आ ही नहीं सकता। लगता है कि ख्याल या सुरत हिलती ही नहीं, ज्यों की त्यों अटल है, स्थिर है, परन्तु ऐसा होते हुए भी इधर कुछ यह हाल है कि मुझे इसका एहसास ही या भान नहीं रहता। ऐसी तबियत है, जैसे मेरे पास कुछ है ही नहीं, मुझे कुछ मालूम ही नहीं और यह दशा तो रहती ही है, इसे भी अक्सर भूली सी रहती हूँ, कभी याद आ जाती है, यह और बात है। आज सबेरे से तबियत बिल्कुल खामोश और खाली है। तबियत की आदत में गम्भीरता बनी रहती है। आज से मेरी दशा में कुछ और भी Change है, परन्तु अभी ठीक अधिक Catch नहीं कर पाई हूँ। दशा तो शुद्ध सामने है, परन्तु लिखने में अभी नहीं आ रही है। और शुद्ध क्या अब तो शुद्ध कहने में तो कुछ भद्दापन लगता है, उस दशा के सामने अब तो ऐसी चीज़ हूँ कि न फैलाव है, न कुछ। मैं तो खोई सी रहती हूँ और खोये हुए का भी भान मुझे नहीं है। क्यों जब शब्द खोना कोई कहता है, तब खोने की याद आती है। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपा कांक्षिणी

  सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-434
लखीमपुर
7/11/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। ‘आपके’ पत्र में ‘आप’ जो अपनी आदत के विषय में लिख देते हैं, उन मोतियों को सहेज कर मैं हृदय में समेटना चाहती हूँ, परन्तु देखती हूँ अभी मेरे हृदय में उन मोतियों को बिल्कुल चूस लेने का मलका नहीं पैदा हुआ और इसका कारण है, जो मैं जानती हूँ और रफ्ता रफ्ता पढ़ती चली आ रही हूँ। मेरी समझ यही एहसास करती है, फ़नायत की कमी और हृदय में एक ऐसा बन्धन अभी महसूस करती हूँ, जो मुझे ‘मालिक’ में या शायद दशा में बिल्कुल घुल-मिल जाने में बाधक है और वह बन्धन अभी बिल्कुल धुंधला तो नहीं है ऐसा महसूस करती हूँ, हाँ कुछ तो महसूस करती हूँ और सम्भव है कि यह वही बन्धन हो जिसे ‘आपने’ मन्मई-कोष लिखा है और यही बन्धन मेरे मन के पूरे फैलाव के एहसास में एक लकीर के सदृश है, क्योंकि मेरे ‘मालिक’ के लम्बे हाथों ने मुझे उस पार खींचकर उसकी दशा का भी एहसास करा ही दिया और करा रहा है। ‘उसकी’ ही कृपा से मेरी उन्नति के शूल-फूल बनकर मेरे मार्ग में आये। पीठ पर के हाथ का जो स्पर्श है, उससे मेरा लगाव है, इसलिये मैं समझ गई थी कि यह ‘आप’ ही का वरदहस्त है। ताऊजी के लिये ‘आपने’ बिल्कुल सही बात लिखी है, मेरा यही अनुभव था, परन्तु इधर गड़बड़ी के कारण सब गंदगी में छिप गये थे, परन्तु अब ‘मालिक’ की कृपा से दशा में फिर झलक आ गई है। ‘मालिक’ का हज़ार-हज़ार धन्यवाद है, नहीं तो यह नामुमकिन ही सा हो चुका था अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक -दशा है, सो लिख रही हूँ।

  कुछ ऐसा लगता है कि ईश्वर का सारा Heart मानों मेरे अन्दर सब समाया जा रहा है और सब का सब न जाने कैसे मुझमें भिदता जा रहा है। कुछ ऐसा लगता है कि इतना विस्तृत Heart क्षेत्र सब मेरे अन्तर में सिमटा आ रहा है, उसकी सारी दशा मुझमें भिद सी गयी है, परन्तु मेरे ऊपर तो न जाने क्यों सिवाय इस एहसास के मानों कोई असर ही नहीं पड़ता। इससे भी अनजान, अनभिज्ञ सी दशा रहती है। क्योंकि मेरे ‘श्री बाबूजी’ मैं तो अपने को इससे भी अलग या परे पाती हूँ, परन्तु यह न जाने क्या बात है कि अब लफ़्ज अपने को पाती हूँ मुझसे कहा नहीं जाता है, भद्दा सा लगता है, चाहे अलग या परे कहूँ तो भी। मुझे तो न जाने क्यों हालत गम्भीर में रहने से शुद्धता और दशा में चंचलता आने से, नहीं बल्कि सोचने से ही भद्दापन लगता है, परन्तु ‘मालिक’ ने इस चीज़ को जो भद्दापन पैदा करे, हटा ही दिया। न जाने अब क्या हो जाता है कि नम्रता का एहसास भी दशा में कुछ भद्दापन ही एहसास दिलाता है। एक बात मैंने कुछ शर्म के कारण नहीं लिखी, परन्तु वह कोई खराब बात मुझमें न हो गई हो, इसलिये लिखे देती हूँ। मैं इसे अपनी तमाम कोशिश से भी ठीक न कर सकी। अब ‘आप’ ही जानें, कि जब ‘आप’ यहाँ आये तो ‘आपके’ पास तबियत न जाने क्यों जाने को नहीं चाहती थी और अलहदा होने में भी जी फटता था। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-435
लखीमपुर
13/11/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ कल पूज्य मास्टर साहब जी द्वारा मिला- पढ़कर हर्ष हुआ। कृपया ‘आप’ अपना इलाज अब डाक्टरी ही करवाइये। ऐसा हो सकता है कि वे दमें ब पेट के दर्द दोनों का इलाज साथ-साथ करके दोनों मर्जों को लाभ कर दें।  ‘आपने’ जो लय- अवस्था तथा दीक्षित होने की जो महिमा लिखी है, वाकई सही है। आपने अपने दर्द व तकलीफ व शिक्षक के चोला छोड़ने से सत्संगियों को जो फ़ायदा लिखा है, वह यथार्थ है, परन्तु मेरी निगाह इस फ़ायदे की ओर देखने को भी नहीं मुड़ती। ‘मालिक’ की उम्र दराज़ हो और ‘उनकी’ तकलीफ़ कम हो जावे, मेरी तो दिन-रात ईश्वर से यही विनती है। हाँ, यदि ‘आप’ माफ़ करें तो मैं यह कहूँगी कि यदि हम सत्संगी बहुत ही जल्दी फायदा चाहते हैं तो बजाय ‘आपके’ दर्द व तकलीफ़ से लाभ उठाने के इस बात पर क्यों न राज़ी हों कि ‘आपकी’ पूरी शक्ति से एक सेकण्ड में ही कुछ से कुछ होने के लिए तैयार हों। फिर शरीर रहे या जाये, Nervous System Shatter हो जाये। लय- अवस्था प्राप्त करने के लिए वास्तव में हर सत्संगी भाई बहिन को पूरी कोशिश करनी चाहिये। ‘मालिक’ का हम सब की ओर से हज़ार-हज़ार शुक्रिया कि जिसने ताऊजी के case को भी अन्त में सम्भाल ही लिया। यह है कि कृपा की हद और यह श्री चरणों की ही महा महिमा है। वाकई में गुरू, माता है जो हर तरह से बच्चे को सम्भाल कर वाकई ज़िन्दगी में ढार देता है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

  मेरा तो कुछ यह हाल है कि मेरे अन्तर में न अब गलाव होता है, न कभी पिघलन ही लगती है, वरन् अब तो एक ऐसा हल्का सा सेंक सा रहता है अन्तर में कि यद्यपि जिसकी गर्मी मेरे अन्दाज में नहीं आती या जिसमें गर्मी है ही नहीं। अब तो गलन व पिघलन यह सब शब्द मुझे ऊपरी लगते हैं, जिनमें अब कुछ असर ही नहीं है। हाँ, मुर्दापन तो ‘मालिक’ की कृपा से ज़रूर आता रहता है। भूल की दशा का तो यह हाल है कि इसका तो मुझ पर कुछ असर ही नहीं पड़ता। भूल कहूँ तो वैसी हालत न कहूँ तो वैसी। मेरे परम पूज्य ‘श्री बाबूजी’ ऐसा लगता है मानों बिल्कुल सादी सी, कुछ बिल्कुल साधारण सी दशा है। जो अटलता व स्थिरता मैं लिखा करती थी कि “मेरा कण-कण लगता है, स्थिर-रूप हो गया है”, परन्तु अब तो कुछ मैं स्वयं नहीं समझ पाती हूँ कि जाने मुझमें स्थिरता है भी या नहीं। मैं तो बिल्कुल अनभिज्ञ सी हूँ। मुझे तो हर तरफ बस एक सादा सा ही संसार दीखता है, बल्कि लगता तो यह है कि सादगी व अचलता, एकाग्रता की दशा स्वयं मुझमें डूब चुकी हैं। कुछ ऐसी नेचर होती जा रही है कि न जाने क्यों चुप रहना ही अच्छा लगता है। शब्द दशा के लिए fit नहीं बैठता, बल्कि दशा ही चुपचुपाती हो गई है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ ‘आपके’ लिखने पर मैंने गौर किया तो एकाग्रता मन के थोड़े से बन्धन तक ही महसूस होती है, परन्तु इससे आगे नहीं महसूस होती। यह भी जाने सादगी बन गई है। लगता है कि दशा क्या, बल्कि सब रंग मिल-मिलाकर बजाय सफ़ेद के एक कोई ऐसा रंग बन गया है, जो मुझे पता नहीं कि क्या है, परन्तु उसमें रंग कोई नहीं। यदि यह कहूँ कि सब बेरंग हो गया और सब हालतें उसमें डूब कर लय होकर समाप्त हो गई, क्योंकि कोई दशा उसमें मिली या घुली भी नहीं दिखाई पड़ती। मैं क्या लिखूं ? मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब मैं जाने ठीक लिख पाती हूँ, क्योंकि ऐसा लगता है कि मैं देखती हूँ कि हर दशा में से मेरे पंख अन्त में सूखे के सूखे ही निकल आते हैं। सादा में खालीपन कह लीजिये, क्योंकि सूनसान भी Fit नहीं बैठता। अब मेरा कोई भी रूप नहीं है, फिर मैं अपनी कौन सी दशा कहूँ। ‘आप’ ही जानें कि मेरी क्या दशा है। पिपरमिन्ट की बूंदों की तरह मुझे कुल में ठंढक की अनुभूति होती है। ‘आप’ जैसे चाहिये, वैसे ही मुझे ले चलिये। मेरी उन्नति या आगे बढ़ने में तो ‘मालिक’ की कृपा से रत्ती भर भी कसर आती नहीं, फिर चाहे जब Heart Region Cross हो। परम पूज्य ‘श्री बाबूजी’ आज ‘आपकी’ कृपा से Heart Region मुझे भी बच्चों के खेल-कूद का ही स्थान लगता है। गम्भीरता उसके बाद वाली दशा से शुरू है और अब ‘मालिक’ की कृपा से बेरंगी का भी रंग समझ में आता है। परन्तु मेरा ख्याल इसमें भी डूब कर सूखा ही निकलता है।

  अम्मा ‘आपको’ स्नेहाशीष कहती हैं। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपा कांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-436
लखीमपुर
16/11/1954
मेरे परम पूज्य प्रभुवर ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा पत्र पहुंचा होगा और ईश्वर की कृपा से ‘आपकी’ तबियत अब ठीक हो। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरे ‘श्री बाबूजी’ मेरा तो कुछ यह हाल है कि हर दशा का आत्मिक-का मेरे लिये अन्त हो चुका, क्योंकि अब मैं जो दशा लिखती हूँ, या लिख रही हूँ वह तो ‘है’ के अन्तर्गत आता है, और वास्तव में मेरी स्थिति के लिये यह ‘है’ शब्द कतई नहीं है। मेरे तो पंख सूखे के सूखे हैं। यही नहीं, कुछ यह है कि मन की न जाने क्या स्थिति हो गई है, उसे देखकर यह समझो कि ‘मालिक’ मुझमें रमा हुआ है, तो कुछ अनुभूति नहीं और मुझे प्राप्त करना है तो कोई अनुभूति नहीं। दोनों एक समान ही मालूम पड़ती है। यही नहीं बल्कि मालूम पड़ना या अनुभूति शब्दों को इसमें से हटा लीजिये। न जाने यह क्या बात है ‘श्री बाबूजी’ कि चाहे श्रद्धा, विश्वास, प्रेम, भक्ति, आनन्द, रस या ‘मालिक’ के स्पर्श में अपने को कितना डुबाऊं, परन्तु अन्त में पंख सूखे के सूखे ही निकलते हैं। किसी दशा की Touching होती ही नहीं। यहाँ तक कि ‘Z’ Point की दशा में भी मेरा यही हाल रहता है कि अब मैं रम ही नहीं पाती हूँ क्योंकि कोशिश के बाद पंख सूखे के सूखे ही निकल आते हैं। मैं यह कहूँ कि निगाह फैल चुकी है तो इसका एहसास नहीं, यदि यह कहूँ कि सिमट कर सतहीन हो गई है, मर गई हैं, तो भी बेपरवाही सी दशा है। अब ‘मालिक’ ही जाने कि क्या दशा है। वास्तव में तो यह दशा है कि द्वन्द (यानी यह हैं, और यह नहीं है) का तो दीवाला पिट चुका है और अपना याद नहीं है।

  मेरे परम पूज्य महात्मन् ‘श्री बाबूजी’ लगता है कि दशा ऐसी हो गई है कि उसमें एकता की भी गुज़र नहीं। नहीं भाई, ऐसा लगता है कि सूखे हुए पंखों का भी स्मरण भूला सा रहता है। पता नहीं शायद वे भी झड़ने लगे हों। लगता है कि दशा में कुछ ऐसा सम पड़ चला है, कि दशा अच्छी कहूँ तो किसी भी हालत में मन की दशा में कोई अन्तर नहीं पड़ता। क्योंकि दशा तो यह है कि वास्तव में मन ही का पता न चला कि कब और कौन, कहाँ ले गया उसे और अब जाने वह है भी या नहीं, कुछ पता ही नहीं। कभी-कभी दाहिने पैर के अंगूठे में नोक से लेकर बीच की नस में पिपरमेन्ट की तरह ठंढक भर जाती है और इसका Connection सिर में जहाँ चोटी रखी जाती है, वहाँ से रहता है। पीठ पर तो वह ‘मालिक’ का हाथ हर समय लगता है सहलाया करता है। कन्धे से नीचे पीठ की जो इधर-उधर हड्डियाँ होती हैं, उसमें बाई वाली हर समय फड़फड़ाया करती है।

  अम्मा ‘आपको’ शुभाशीष कह गई हैं। इति:-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-437
लखीमपुर
19/11/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आज ‘आपका’ कार्ड ताऊजी ने पूज्य मास्टर साहब के यहाँ से लाकर सुनाया सुनकर कि ‘आपकी’ वह फड़फड़ाहट वाली तकलीफ़ जाती रही। ‘मालिक’ का हज़ार- हज़ार धन्यवाद है कि ऐसा सुअवसर केवल ‘उन्हीं’ की ही कृपा से आ सका है। हम सबकी ओर से धन्यवाद है कि गलती करने पर भी ‘आप’ कृपा ही बनाये रहे। ‘आपने’ लिखा है कि “कस्तूरी ने पेट का कुछ हाल नहीं लिखा”, तो मेरे ‘श्री बाबूजी’ ‘आपको’ मुझसे कहीं अधिक तकलीफ़ है, परन्तु ‘आप’ तो मुझे कभी नहीं लिखते, यहाँ तक कि कार्ड में कहीं ज़िक्र तक नहीं किया और मैं ‘आपको’ तकलीफ़ में भी अपना ही हाल लिखती हूँ। खैर, ‘आप’ चिन्ता न कीजियेगा, वैसे पेट ठीक है, परन्तु इधर कई दिनों से उसे कुछ ठंढक सतास जाती है। तलवों में कडुवा तेल लगाने से सुनती हूँ ठंढ नहीं सतासती, तो अब मैं वह लगा लेती हूँ आराम हो गया है। खाँसी क़तई नहीं है। कृपया अपनी' तबियत का हाल अवश्य दीजियेगा। अच्छा है ‘आप’ जौनपुर जा रहे हैं, मुझे बड़ी खुशी हुई, वहाँ वालों को अत्यन्त लाभ होगा पर ‘आपको’ रास्ते में तो कष्ट ज़रूर होता ही है, परन्तु वहाँ Complete Rest मिल जायेगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

    ता. 17 से कुछ ऐसा लगता है कि न जाने क्यों मन में कोई बन्धन एहसास नहीं होता। लगता है ईश्वर का Heart सब जैसे मुझे हज़म हो गया। मेरे ‘श्री बाबूजी’ लगता है, जैसे कोई चीज़ एकदम से सटक गई हो, लिल गई हो, इसी तरह Heart ईश्वर का हो गया, मानो लिल कर कोई बात ही न रही, मानो सब अपनी मुट्ठी में आ गया। 

  न जाने क्यों मेरे परम पूज्य महात्मन् ‘श्री बाबूजी’ लगता है कि रम जाने का माद्दा ही मुझमें न रहा। यहाँ तक कि दशा तक में रमने का प्रयत्न असफल रहता है, क्योंकि प्रथम तो भूल के कारण ध्यान ही नहीं आता, दूसरे किसी में रम जाने की (‘मालिक’ तक में) माद्दा भी बह गया, साफ़ हो गया। मेरा तो हाल क्या है, मुर्गाबी समझ लीजिये कि पानी में जाकर भी सूखी की सूखी ही अपने को पाती है। या यों कह लीजिये कि Heart क्या है, ऊसर है, अन्तर इतना फिर भी है कि ऊसर किसी प्रयत्न से शायद कभी उपजाऊ बनाया भी जा सकता है, परन्तु इसमें वह बात नहीं रही। इसका तो पानी मर चुका है। यह हाल है कि इस पर पानी की बूंदें लाने की कोशिश कभी करूँ तो देखती हूँ कि वह बीच में ही सूख चुकी होती है। मुझे क्या, ‘मालिक’ जाने। न जाने क्या बात है, मैंने लिख तो दिया कि पानी में जाकर मुर्गाबी की तरह सूखी की सूखी रहती हूँ, परन्तु वास्तव में तो यह है कि पानी तो दशा के आस-पास तक कहीं एहसास में नहीं आता, इसलिये कहना यही पड़ता है कि सूखे में ही तैरती फिरती हूँ। मेरे परम पूज्य श्री बाबूजी ! लगता है ‘Z’ Point तो अब बिल्कुल साफ़ होकर खुल पड़ा है और है सब मेरे Heart में ही या मेरे पेट में ही, परन्तु न जाने क्यों मुझे अपने ख्याल का एहसास वहाँ भी नहीं होता, यद्यपि Point तो मुझ में सिमटता ही चला आता है और साथ ही मानों पचता भी जा रहा है। मेरा ख्याल भी बिला गया है और जो ख्याल का वहम सा रहता था, उसका भी सत् निचुड़ चुका। अब कोई निखालिस कह लीजिये या कुछ मत कहिये। होगा हमें क्या, हम तो गुलाम ‘राम’ के हैं, परन्तु गुलामी का होश नहीं रहता, इसलिये वह भी संभाले नहीं संभलती। ‘मालिक’ ने वह भी बोझा उतार फेंका। अब क्षमा कीजियेगा, कहते अच्छा नहीं लगता, कुछ equality का सा मामला होता जा रहा है, यद्यपि मन में कुछ नहीं है, परन्तु न जाने क्यों दशा ही कुछ ऐसी ही आ जाती है।

    ताऊजी, लल्लू, छोटे भईया ‘आपको’ प्रणाम कहते हैं। इतिः-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी
  सेविका - कस्तूरी बिटिया
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-438
शाहजहाँपुर
21/11/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो।

तुम्हारे दो पत्र 13 नवम्बर व 16 नवम्बर को मिले। तुम्हारा हाल डॉ. बी. एन. सिन्हा ने मय दवा के भेज दिया। दवा, वह तुम्हें भी लिख गये होंगे, इस्तेमाल करना चाहिये। एक बात जो तुम्हारे मर्ज़ को बिल्कुल अच्छा कर सकती है, वह है कि तुम्हारा इरादा बन जाये कि तुम अच्छी हो रही हो और सब मर्ज दूर हो रहे हैं। तुम इसका ध्यान (Meditation) एक-आध घण्टे रोज़ाना किया करो। ऐसा अगर तुम लगातार कर गई तो कोई मर्ज़ नहीं जो आराम न हो जाये। मुझे उम्मीद है कि तुम ऐसा करना आरम्भ कर दोगी और इसे लगातार करती रहो, इससे महीने डेढ़ महीने में सब शिकायतें दूर हो जायेंगी।

  मैंने पिछले दो खतों में अपनी बीमारी से जो फ़ायदा सत्संगियों को लिखा है और दुनियाँ छोड़ने के बाद जो लाभ सत्संगियों को होता है, वह भी लिख दिया। अब एक बात पिछले खतों में लिख तो चुका हूँ, संक्षेप के साथ इसमें भी लिखे देता हूँ ताकि बात पूरी हो जाये। Teacher अगर High Caliber का है तो उसको Representative कायम ही करना पड़ता है। अगर उसके शिष्यों में से उसके जिस्म छोड़ते वक्त कोई तैयार नहीं है तो उसे इन्तज़ार करना पड़ता है। यहाँ तक कि मैंने एक लेख देखा है कि एक महात्मा ने अपने दुनियाँ से जाने के बाद डेढ़ सौ वर्ष बाद अपना Representative कायम किया था। स्वामी विवेकानन्द जी के बारे में तुम्हें मालूम ही है कि महासमाधि लेन के कितने दिनों बाद अपना प्रतिनिधि स्थापित किया और जब उनको अपने Mission में उनकी तबियत के मुताबिक आदमी न मिला तो अपना Connection दूसरी संस्था से जोड़कर कायम कर दिया। बात क्या है कि कुल ताकत को Absorb कर सके, क्योंकि गुरु की कमाई (जो वास्तव में गुरू है) सब यहीं रह जाती है, और जब कोई इस योग्य नहीं मिलता, तो कहीं Store कर देते हैं। अब इसके माने यह हुए कि गुरू की ज़िन्दगी ही में शिष्यों को इस योग्य बनना चाहिए कि उसमें से किसी एक को अपना प्रतिनिधि Select कर सकें। मैंने तो अपना हाल ही अपनी Diary में लिखा है कि समर्थ गुरू महात्मा रामचन्द्र जी महाराज फतेहगढ़ निवासी ने जब महासमाधि ली तो मुझे ऐसा भान समाधि लेने के बाद ही हुआ कि कुल ताकत एकदम से अन्दर व बाहर अनुभूति होने लगी और मैं यह समझ गया कि यह हालत Transfer की हुई है, उसके बाद ही महासमाधि लेने की खबर हुई। इसको Absorb करने में मेरी सब Nerves गड़बड़ हो गई और सख़्त बीमारी के बाद जो नसों की गड़बड़ होने की वजह से थी, इसको अपने अन्दर रख सका। अब उनकी कमाई तो मेरे पास है और मेरी जो कुछ भी कमाई है, वह भी है, गोया गुरू की दी हुई चीज़ को मैने बढ़ाया ही है, घटाया नहीं। अब मेरे बाद यह भी कहीं Transfer होगी और इसकी मुझे फ़िक्र भी रहती है कि इस वक्त तक कोई अभ्यासी मालूम नहीं होता है कि कुल ताकत को बर्दाश्त कर सके, इसलिये कि लोग ऐसा बनने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, ऐसा न हो कि मुझे भी वर्षों इन्तज़ार करना पड़े। अब मतलब पर आता हूँ।

  Representative में कुल कमाई दाखिल हो जाती है और फिर उसके ज़रिये से Initiated Members को हिस्सा रसदी पहुंचती है। ताकत का केन्द्र Representative ही रहता है और उससे Inter-communion अपने गुरू से रहना लाज़मी है, ताकि वह उनके आज्ञानुसार उनका काम चला सके और उनके हुक्म की पाबन्दी दूसरे लोग भी कर सकें और Disciples को भी, अगर काफ़ी तरक्की कर चुके हैं, कि सिर्फ़ उनके मुतल्लिक इशारे मिलते रहते हैं। और जिस हालत पर Representative पहुंचा हुआ है, दूसरे सत्संगी भी पहुंच सकते हैं, फ़र्क सिर्फ़ इतना रहता है कि वह अपने गुरू की शक्ति का केन्द्र होता है और गुरू उसमें खुद लय होता है। यह गुरु के जाने के बाद का फ़ायदा है।

  चौबे जी की हालत जानकर खुशी हुई और भाई, मैं तो दो-तीन वर्ष से सिर पटक रहा हूँ, मगर मेरे बूते कुछ न हो सका। जब ‘मालिक’ की मर्ज़ी हुई और उनका संस्कार उदय हुआ तो वह एक अच्छी हालत पर खड़े हो गये। मगर सत्संग और मेहनत उन्हें बराबर करते जाना चाहिये और ईश्वरीय प्रेम से सरोकार रखें, जो बार-बार याद करने से हो सकता है। तुमने अपने 13 नवम्बर के पत्र में जिस चीज़ के लिये लिखा है कि एक तरह का सेंक सा रहता है, यह एक किस्म की हालत है, जो प्रेम से पैदा होती है और प्रेम जब निखरता है, तब इस वस्तु का भान होता है। मुर्दापन जो आता रहता है, इसके माने यह है कि जो हालत आने वाली है, ख्वाह कितने ही दिनों में आवे, उसी कैफ़ियत का अन्दाज़ है और यह मुर्दापन की कैफ़ियत लय- अवस्था का, अगर स्थाई हो जाये, तो अच्छी Stage है। साधारण हालत रहना एक अच्छी हालत है और यह आत्मा से निस्बत रखती है। स्थिरता का न समझ में आना, यह उससे भी ऊंची हालत है। चुप रहना इसलिये अच्छा लगता है कि खामोशी में आनन्द का भान होता है और इस कारण बोलने की फुरसत नहीं होती है। तुमने एक बड़ी अच्छी हालत लिखी है कि “सब रंग मिल मिलाकर एक सफेद रंग बन जाता है, मगर उसमें एक ऐसा रंग है कि जिसका पता नहीं चलता।“ यह रंग जिसका तुम्हें पता नहीं चलता, यह असलियत का तलछट है और समझने के लिए Dawn Colour कहा जा सकता है। अब 16 नवम्बर का जो पत्र है, उसमें कोई बात जवाब देने लायक मालूम नहीं होती। बस यह कि “मालिक अगर रमा हुआ हो, तो कुछ अनुभूति नहीं” इसके माने यह है कि वह चीज़ मौजूद है, जो इन दोनों के ख्याल बाँधने से एहसास होती है। मेहमान जब घर में आ जाता है, तो उसका इन्तज़ार नहीं रहता। तुम्हारे ‘Z’ Point की सैर मुझे अब खत्म मालूम होती है, मगर बहुत हल्के-हल्के और Dim तरीके पर हुई है, इसलिये तुम्हें उसका अन्दाज़ नहीं मिला और ऊंचे स्थानों की सैर ऐसे ही हुआ करती है। अभ्यासी को चाहिये कि जब ऊंचे स्थानों की सैर शुरू हो जाये तो अपने ख्याल को उस तरफ़ चिपकाये रखे ताकि उसमें Absorbency हो जाये और उसका मास्टर बन जाये। अब मैं इस स्थान के बारे में सोच लूं कि इसमें कोई कमी तो नहीं रह गई है, तब मैं आगे बढ़ाऊँगा। कमी नहीं रही होगी, मगर फिर भी सोच-विचार कर तय कर लेना है।

  मैंने जौनपुर जाने का 6 Dec. की शाम को इरादा कर दिया। पेट की तकलीफ़ पहले से कम है, फिर भी ज़्यादा है। साँस की तकलीफ़ करीब-करीब ठीक है। जौनपुर जाने से तीन-चार रोज़ पहले मैं इसकी दवा डाक्टर से लेकर खा लूंगा कि जो थोड़ा बहुत फायदा कर जाती है। खर्च का लिहाज़ करते हुए दर्द बर्दाश्त कर रहा हूँ और डाक्टर के पास नहीं जा रहा हूँ। मैंने 18 November 1954 को 12.30 बजे दिन के, तुम में कुछ थकान होना महसूस किया, मैंने उसी वक्त दुरुस्त कर दिया। शायद तुमने भी इसका एहसास किया हो। यह सैर करने में पैदा हो जाती है और यह उन अभ्यासियों को पैदा होती है, जो तेज़ी से रास्ता तय करते हैं। यह थकान भी मुबारिक चीज़ है। क्यों ? यह उसके तेज़ चलने की खुशखबरी देता है। मगर यह ज़रूर है कि जब तक थकान रहती है, तब तक अभ्यासी को सैर और सफ़र नहीं कर मिलता। इसलिये यह काम Teacher का है कि जहाँ थकान मालूम हो, उसको फ़ौरन दूर कर दे, ताकि उसका वक्त बेकार न जावे।

    27 नवम्बर को तुम्हारे चाचा Allahabad से हमारी Provincial Association में आ रहे हैं और 28 नवम्बर को चले जायेंगे। चौबे जी को प्रणाम।

  शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-439
लखीमपुर
22/11/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है, मेरा पत्र पहुंचा होगा। इतनी बड़ी ‘मालिक’ की मेहरबानी का शुक्रिया का प्रसाद चढ़ाया और ‘आपके’ पास विष्णु आने वाले थे, सो उनके हाथ ‘आपकी’ पसन्द के मुलायम मक्खन बरे मंगवा कर बंधे रखे रहे, परसों से, आज भी वैसे ही बंधे रखे हैं, परन्तु फिर प्रधान जिनके साथ विष्णु आने वाले थे बीमार हो गये, फिर विष्णु भी नहीं गये। मेरे बाबूजी के हैं, इसी ख्याल में बेहोश थी, पर आज प्रधान आया कि आखिर को यह प्रसाद चढ़ा हुआ सड़ जायेगा, इसलिये शाम को खोल कर सबको फिर दे ही दूंगी। इरादा किया कि मैं ही चली जाऊं ‘श्री बाबूजी’ को खिला आऊं, परन्तु यह असम्भव सा दीखा। खैर, ‘मालिक’ का प्रसाद तो है ही, चाहे वहाँ पहुंच सका या नहीं। मेरा दृढ़ विश्वास है कि वह तो ‘आपके’ पास पहुंच ही चुका और ‘आप’ खा चुके। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

  अब न जाने क्या बात है मेरे ‘श्री बाबूजी’ कि दशा में ‘मालिक’ का भी दबाव व लिहाज़ की गुंजाइश ही न रही। परन्तु मेरा सर्वस्व तो वह ज़रूर है, चाहे कुछ हो। इधर कुछ यह लगता है कि तबियत हर समय मानों अपने ‘मालिक’ से बड़बड़ाया (बातें सी किया) करती है। क्या ? यह कुछ पता नहीं, परन्तु न जाने क्या उसकी यह कुछ बड़बड़ाने की इधर कुछ आदत ही बन गई है। जो हर समय न जाने किससे और क्या बड़बड़ाया करती है। सोने के बाद भी जागने पर अक्सर यही एहसास होता है कि मानों कुछ बड़बड़ा रही थी। क्या विचार रहते हैं, कुछ पता नहीं ? कौन हृदय में समा कर उसे मथ गया है, जिससे तबियत बातें किया करती है। सो तो यह हाल है कि हर पर्दा ‘मालिक’ बन चुका है, श्वाँस-श्वाँस उसी में समा चुकी है। परन्तु न जाने क्या बात है कि, फिर भी हाल यह है कि मिल गया कहूँ या दूर हो गया कहूँ, मेरे लिये दोनों दशा समान हैं। यद्यपि मेरे ‘श्री बाबूजी’ वाणी तो मूक ही रहती है, वह कुछ कह नहीं पाती, हृदय को सामने व्यक्त नहीं कर पाती, क्योंकि उसके शब्दों का खजाना शायद लुट चुका, तबियत ही बड़बड़ाया करती है। क्या ? यह मालूम नहीं। और हृदय ? वह तो जाने क्या हो गया कि उसका हाल मेरी समझ में नहीं आता। खजाना लुट चुका, दीवालिया हो गया, परन्तु बिल्कुल बेपरवाह है। इतना हीन बन चुका कि यह शब्द उसके लिये बेकार हो चुका। स्वभाव ने सादगी एवं सरलता का जामा पहिन लिया है, परन्तु तबियत को होश नहीं। ऐसी दशा समझ लीजिए कि जैसे मुर्दे से कोई समझाये कि तुम में यह गुण थे या यह तुम्हारी बढ़िया-बढ़िया दशायें थीं, परन्तु फिर भी वह ज्यों का त्यों ही रहता है, यही दशा है। कुछ समझ में नहीं आता। मेरे परम पूज्य महात्मन् न जाने कुछ यह हाल है कि यद्यपि न आँखों में आँसू हैं, न दिल में दर्द और न साँसों में आह है, बस एक पत्थर है, परन्तु बस ऐसी तबियत चाहती है कि कोई पास बैठा मेरी सुनता रहे। क्या ? यह पता नहीं। लगता है जीवन का वह पहलू है, जो ‘उसी’ के रंग में, जिसमें रंग की छींट नहीं, सादा या सरल या ‘सहज’ कह लीजिये, उसमें समाया जाता है। हृदय का वह हल्का सा पर्दा जो ‘मालिक’ में पूरी तौर से समा जाने में कुछ अड़सता सा था, तबियत में Free होने के लिए कुछ धूमिल लकीर के सदृश था, वह भी ‘मालिक’ की कृपा से साफ हो चुका। अब तो नैं Heart Region से परे अपनी दशा में सूखे मैदान या सोखते में तैर रही हूँ और वह मुझ में भिद कर सूखती चली जाती है। दशा क्या है, सोख्ता है। अब तो बस यही लगता है कि मेरे बाबूजी कि हृदय है ही नहीं। बल्कि सब केवल ब्रह्म ही रह गया है। हर कण-कण में, रक्त में ब्रह्म ही ब्रह्म के रूप में मेरा ‘मालिक’ ही रमा हुआ है। हर डार-डार, पात-पात में, समस्त जड़ में एक ब्रह्म ही समाया हुआ है और ब्रह्म में मैं समाई हुई हूँ, चीज़ एक ही है, इसलिए अदृश्य रूप में, मैं ही समस्त में समाई हुई हूँ। बस जरा होश नहीं है इसका। यद्यपि यह शोभा नहीं देता, परन्तु दशा लिखते मैं लिख रही हूँ, क्षमा करियेगा। ‘श्री बाबूजी’, कि जैसे ईश्वर समस्त में समाया हुआ है और सबसे पृथक है, शायद इसलिये कि ‘उसे’ इसका होश न होगा। यही दशा है कि समस्त में हूँ और होश न होने से, सबसे पृथक भी कह लीजिये।

  रही सही बंदिश भी ‘मालिक’ ने धीरे से काट दी, साफ़ कर दी, बस अब केवल शरीर का ही बन्धन कह लीजिये, जिसका मुझे एहसास नहीं, इसलिये मैं तो इससे भी मुक्त हूँ। किसी की दबैल नहीं। बड़बड़ाती रहती हूँ तो क्या, केवल शायद ‘मालिक’ को ही न जाने क्या सुनाया करती हूँ और वह सुना करता है। या मैं स्वयं अपने से ही कहा करती हूँ, पता नहीं। कभी जब मुकुल आ जाती है तो उससे न जाने क्या-क्या कहा करती हूँ, क्यों कि उससे मुझे कुछ पर्दा नहीं। Sitting तो इस लोक, परलोक तक में हर समय, जो चाहे उसे दे सकती हूँ। अपनी दशा को देखकर कबीर का पद याद आ गया-“कौन ठगवा, नगरिया लूटल हो”। सब काम-वाम यदि मुझसे होते हैं तो तैसी, न होते हो तो तैसी। मेरे ‘श्री बाबूजी’ लगता है मेरा ‘मालिक’ आत्मा को भी भेदकर उसमें समाने लगा है, समाया जाता है, परन्तु दशा तो सोखता की सोखता ही रहती है। रात में आज आग की लपटें बड़ी-बड़ी सी कुछ सोते-जागते से में दीखती रहीं। सोती-जागती सी दशा तो रात-दिन रहती है। दशा तो एक सी है, चाहे कुछ कह लीजिये। इति:-

सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

  सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-440
लखीमपुर
23/11/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ आज मिला -पढ़ कर हर्ष हुआ। ‘आपके’ पेट के दर्द की दवा के लिये इस समय मेरे पास यद्यपि केवल सब मिलाकर चार ही रुपया है, भेज रही हूँ कृपया अपना ही जान कर मुझे रुपये न तो वापिस ही कीजियेगा और न बचा ही रखियेगा, वरन् ज़रूर-ज़रूर दवा खा लीजियेगा। वैसे भी मेरे पास जो कुछ था सब ‘मालिक’ का ही दिया हुआ था और जो कुछ भी मेरे खाने-पहिनने में खर्च होता है, सब ‘मालिक’ का ही है और मेरे पास जो कुछ होगा, सब ‘मालिक’ का ही होगा। मेरे तो नाम से ही जो चीज़ बनी या बनेगी, वह तो ‘श्री रामचन्द्र मिशन’ की ही होगी। ‘आपके’ जौनपुर जाने से सम्भव है, ‘आपकी’ कुछ तन्दुरूस्ती सुधर जावे।

  ‘आपने’ जो पत्र में लिखा है कि 18 नवम्बर को साढ़े बारह बजे दिन में ‘आपने’ मुझ में थकान देखी, सो अब ऐसी समझ में आया, क्योंकि यद्यपि मुझे अबकी थकान का अनुभव तो नहीं लगा, परन्तु जब ‘आपने’ ठीक किया, तब मुझे एहसास हुआ, क्यों कि मुझे लगता है कि यह शिथिलता बहुत ही कम समय के लिये हुई, जिसे मैं समझ न सकी। जब ‘आपने’ ठीक किया, तब मुझे यह विचार आया कि आज ‘मालिक’ ने मुझ पर कुछ कृपा कर के किया है परन्तु चाल की थकान के विषय में नहीं ध्यान आया। 

सैर ‘Z’ की समाप्त है, इसका अन्दाज़ मुझे भी ‘मालिक’ की कृपा से हो गया, परन्तु ‘आपने’ यह ठीक ही लिखा है कि मैं अपने ख्याल को पूरी तौर से उधर चिपकाये न रख सकी। क्यों कि न जाने क्यों ‘श्री बाबूजी’ मुझे अबकी बार अन्दाज़ लगता था, परन्तु फिर न जाने क्यों कोशिश करने पर भी याद भूल-भूल जाती थी। क्षमा कीजियेगा मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब आगे ऐसा नहीं होगा। न जाने अब की बार मुझे क्या हो गया कि हल्का-हल्का उस दशा का ख्याल रखूं तो याद ही भूल-भूल जाती थी और रमने की कोशिश अधिक ठहरा नहीं सकती अब की सैर क्या ‘आपके’ मन मुताबिक नहीं हुई ? ऐसा अब मैं कभी नहीं होने दूंगी। कुछ यह हाल है, मेरे ‘श्री बाबूजी’ कि मुर्दापन की हालत की कुछ खुमारी सी भी मुझमें या दिमाग़ में रहती ही है। ‘आपने’ लिखा है कि चुप रहना इसलिये अच्छा लगता है कि खामोशी में आनन्द का भान होता है मैंने देखा तो आनन्द की अनुभुति मुझे नहीं हुई, बल्कि चुप ही का एहसास हुआ, परन्तु मुझे यह लगता है कि चुप रहना अच्छा लगता है तो ज़रूर कोई आनन्द होगा। परन्तु होता तो यह है कि तबियत चुप ज़रूर रहती है, परन्तु उसे चुप रहना न अच्छा लगता है, न बुरा। बोलूं तो कुछ नहीं, न बोलूं तो कुछ नहीं। इधर कुछ यह हो गया है, मुर्दापन की दशा का मेरी हालत में वहम सा बना रहता है, जिसे ऊपर मैंने खुमारी सी लिखा है।

  अब अक्सर न जाने यह क्या हो गया है कि यदि कोई ‘मालिक’ की चर्चा करने लगता है तो जी चाहता है, वहाँ से उठकर भाग जाऊं और कभी -कभी तो यहाँ तक होता है कि यदि कोई उनका नाम बार-बार लेता है तो कलेजा पकड़ कर रह जाती, यद्यपि कुछ एहसास तो नहीं होता न जाने यह क्या हो जाता है। कोई बात मुंह से नहीं निकल पाती। यह जो सेंक सा लगने के बारे में मैंने लिखा तो उसका अब यह हाल है कि रहने पर भी उसका एहसास कम होता चला जाता है। क्यों कि मुझे उसके एहसास की भी याद भूलती जा रही है। मुझे कुछ ऐसा लगता है, जैसे मेरे दिमाग़ में कुछ तरावट ही कहिये या ऐसा ही कुछ रहता है।

    मेरा इरादा अच्छे होने का है और रहेगा। और इरादा ही क्या, ऐसा मेरा विश्वास है कि बीमारी तो मुझे कोई नहीं है, कमज़ोरी सब लोग कहते हैं, इसलिये है, वरना मुझे अनुभव नहीं होती। हाँ, ‘आपकी’ कमज़ोरी व तकलीफ़ का अन्दाज़ मुझे ज़रूर लगता रहता है। नुस्खा तो डाक्टर साहब ने मुझे कोई नहीं लिखा यहाँ, मास्टर साहब से पूछ देखूंगी, उनके पास शायद दे गये होगें तो होगा। ‘आप’ दवा ज़रूर खाइयेगा और जिससे ‘आप’ शीघ्र अच्छे हो जायेंगे। मैं कभी-कभी उधार की हालत ले लेती हूँ, जिससे तबियत की सरलता कम हो जाती है। अब ऐसा नहीं करूंगी। जो हालत है, सोई रहने दूंगी। 

मेरे ‘मालिक’ की ही शान है कि अपनों की पल-पल की खबर रखते हैं। चाल की थकान को दूर कर दिया, बहुत-बहुत धन्यवाद है, यद्यपि यह तो ‘आपकी’ कृपा बनी ही रहती है। इति:-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-441
लखीमपुर
26/11/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है, मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

  मेरे ‘श्री बाबूजी’ समझ में नहीं आता कि तबियत का बड़बड़ाना कहूँ या यह कहूँ कि एक तरह की ठक-ठक सी आवाज़ से वह सम्बन्धित रहती है। तबियत में चाहे कुछ हो, लेकिन वह हिलती नहीं, वह कौन रस है, यह मैं जानती नहीं। कुछ ऐसा लगता है कि कसक, कसक में मिल गई है, और मुझे कुछ पता ही न चला। अब एक तरह का हुबाबी चिपकाव कहूँ या क्या, जिससे मानो स्वप्न-वत् एक सेंक सा लगा करता है, परन्तु सेंक में गर्मी है या ठंढक, पता नहीं। सेकं तो मुझे लगता है, हुबाबी चिपकाव या सेकं, जो हर समय सम्बन्धित रहता है, कुछ ऐसे देश से है या दशा से, जिसे मैंने अक्सर लिखा है कि कोई चीज़ मुझे अपनी ओर खीचं रही है, उसमें खिचाव नहीं रहा, वह क्या है, कैसी है, यह मैं नहीं जानती, क्यों कि उसमें मुझमें बीच में बस सेंक का अन्तर है, परन्तु देखती हूँ कि यह चिपकाव भी अब धीमे-धीमे गलने लगा है, सेंक तो चाहे किसी शक्ल में रहता है, सेंक तो रहता है, परन्तु उससे जो चिपकाव या एहसास की अनुभूति में लगता है, कुछ गलन दौड़ चली है।

    मेरे परम पूज्य प्रभुवर! ‘श्री बाबूजी’ मुझे ऐसा लगता है कि कुल प्रकृति ही मानों उस हल्के से नरम से, सेंक से सिंकती रहती है, जो इसे चेतन बनाये हुए है। मुझे ऐसा लगता है मानों हर समय कोई मेरी तबियत को सम्भाले रहता है, रोके थामें रहता है। वास्तव में मैं तो ऐसी जानवर हूँ जो उसी रास के इशारे पर ही चलती हूँ। परन्तु अन्तर इतना है कि न अपने ऊपर रास का बोझ ही अनुभव करती हूँ और न अपने चलने का ख्याल ही रहता। ऐसी Innocent (अनजान सी दशा है मेरी, मैं तो पशु के सदृश हूँ।

  मेरी तो कुछ यह दशा है ‘श्री बाबूजी’ कि बंदगी, बदंगी में समा गई और मिल्कियत है नहीं, परन्तु ‘मालिक’ मेरा ज़रूर है, सर्वस्व है, मिल्कियत हो या न हो। बल्कि यही नहीं, न जाने क्या है कि शुद्धता, शुद्धता में समा गई और नम्रता, नम्रता में रह गई तथा मिल्कियत भी, मिल्कियत में मिल गई। मेरे ‘श्री बाबूजी’ स्मृति (याद), स्मृति में रह गई और भूल, भूल में समा गई। यही नहीं, मुझे तो लगता है कि मानों मुझसे मेरे ख्याल का नाता या लगाव ही नहीं रहता, बल्कि लगता है कि ख्याल, ख्याल में मिला जाता है। अब मेरे पास क्या है, यह सही तो ‘मालिक’ ही जानता है, क्यों कि मुझे खुद नहीं मालूम। दशा को देख कर लगता है कि हर दशा तक अपने अपने सूक्ष्म में समा जाती है, साथ कुछ नहीं जाता। मनुष्य आता है अकेला और जाता है अकेला, परन्तु अकेलापन भी साथ नहीं जाता, यही हाल है मेरा। कहने को कह लूं, परन्तु मुझे तो खामोशी भी एहसास में नहीं आती। हाँ, अक्सर mind कुछ ठक् ठक् सी आवाज़ से सम्बन्धित रहता है, परन्तु वह मुझे बुरा नहीं लगता, क्यों कि कुछ Disturb नहीं होता। न जाने क्यों कुछ यह है कि जैसे पहले मेरे परम पूज्य ‘श्री बाबूजी’ ‘आपने’ लिखा था कि “विचार तुम्हें ज्यादा आ रहे हैं, ईश्वर की महान् कृपा है, इसलिये कि तुम जहाँ हो, वहाँ बहुत कुछ Balanced state है”, वही विचार अब विचार नहीं रह गये हैं, बल्कि जिसे मैंने बड़बड़ाना लिखा है, अब ठक् -ठक से mind सम्बन्धित लिख रही हूँ, कुछ अब यह चीज़ हो गई है। 

  मेरी तबियत ठीक है, ‘अपनी’ तबियत का हाल लिखियेगा। इतिः-

    सदैव केवल ’आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

  सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-442
शाहजहाँपुर
29/11/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो।

तुम्हारे तीन पत्र मिले, 19 नवम्बर, 22 नवम्बर और 26 नवम्बर के। मैंने डॉक्टरी इलाज शुरू कर दी है और दर्द Normal आ गया है। सांस की तकलीफ़ तो पहिले ही बहुत मामूली थी। तुम्हें तन्दुरुस्त बनना है और ख्याल से और इच्छा-शक्ति से ऐसा हो जाना चाहिये और यही अपनी पूजा समझो। दो तरह के ध्यान में इसी तन्दुरुस्ती के लिये लिखता हूँ, जो तुम्हें करना चाहिये। इसे ख्वाह मेरा कहना समझो या प्रार्थना समझो।

  नम्बर एक-पन्द्रह मिनट तक कम से कम यह ध्यान करो कि तुम्हारे जिस्म में जो कुछ बीमारी है, जिस्म से निकल कर पीछे सब धुएँ की शक्ल में उड़ती चली जा रही है। एक वक्त तो इसके लिये रखो। नम्बर दो-यह ध्यान करो कि तुम बिल्कुल तन्दुरुस्त हो रही हो और बीमारी सब निकल गई है। यह भी हो सकता है कि पहले नम्बर एक किया जावे और उसके बाद नम्बर दो किया जावे। सुबह, शाम या रात में किसी वक्त कर सकती हो।

  अब मैं 19 नवम्बर के पत्र का संक्षेप में उत्तर दे रहा हूँ। मन का बन्धन बिल्कुल हल्का पड़ गया है, इसलिए तुम्हारे एहसास में नहीं आता। अभी कुछ है, इसलिये कि मैने मन्मई- कोष अभी नहीं तोड़ा है। Heart Region अभी Cross नहीं कर चुकी हो, अभी कुछ बाकी है, मगर उसके आखिरी सिरे तक तुम पहुंच चुकी हो करीब-करीब। 

  तुमने जो यह लिखा है कि ईश्वरीय Heart निगल लिया है, इसके माने यह है कि तुम उसमें ओत-प्रोत हो चुकी हो। रम जाने का माद्दा तुम्हें नहीं मालूम होता कि तुम रम चुकी हो और रमती जा रही हो। दूसरी बात यह भी है कि दुई अन्दर से बहुत कुछ दूर हो चुकी है और यह लय- अवस्था होने के कारण है। मैं तुम्हारे इस Expression से बहुत खुश हुआ कि Heart ऊसर हो चुका है। जब किसी का Heart ईश्वरीय Heart हो चुका हो तो, उसमें फिर तरी कहाँ ? तरी तो हम खुद अपने ख्याल से पैदा कर लेते हैं, जिससे तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूल उगते हैं और मनुष्य अपने लगाये हुए बाग में मस्त रहता है, तो इसका तुममें अब ज़िक्र ही क्या ? ख्याल जब बहुत बारीक पड़ जाता है, तब उसका एहसास नहीं होता।

  अब 22 नवम्बर के खत का जवाब देता हूँ। तुमने लिखा है कि “दशा में ‘मालिक’ का दबाव व लिहाज़ की गुंजाइश नहीं रहीं”। इसके मतलब मैं ज्यादा नहीं समझा, मगर अन्दाज़ तुम्हारा समझ गया और यह लय- अवस्था के कारण है। बड़बड़ाना कुछ बेजा नहीं है। जब ख्याल In-touch रहता है, ‘मालिक’ से, तो वह अपने रंग की बात ‘मालिक’ से निस्बत रखते हुए खुद कह लेता है। तुम्हारे विचार की तासीर का यह कुल खत पता दे रहा है और चप्पा-चप्पा ‘मालिक’ के ही होने का पता देता एहसास हो रहा है। वह चीज भी तुममें खुल चुकी हैं कि जिसको मैंने गुरू-सन्देश के Pamplet में दर्शन की हालत में कहा है। भगवान के दर्शन ऐसे ही होते हैं।

    तुम्हारा एक खत 23 नवम्बर का भी मिल गया, उसका जवाब देकर फिर 26 नवम्बर का जवाब दूंगा। इसमें क्या अच्छी हालत लिखी है; ईश्वर मुबारक करे। इस हालत में मैं भी रह चुका हूँ और हमारे गुरू महाराज बहुत ज्यादा। जिसमें यह चीज़ पैदा हो गई, उसके लिये यह कहा जा सकता है कि वह अन्त तक पहुंचने की खुशखबरी ज़रूर देगा। भाई, तुम्हें एहसास लाजवाब है, वैसे लोग इसी रास्ते से गुजरते हैं मगर इन चीजों का एहसास नहीं होता। वह हालत क्या है कि जिसकी मैंने तारीफ की है कि “ईश्वर के नाम आने पर दिल पकड़ कर रह जाना”। दिल पकड़कर अभ्यासी यों रह जाता है कि जब कोई ‘उसका’ नाम लेता है तो विरह की हालत महसूस होती है और प्रेम की वजह से विरह सहन नहीं होता। यह तो इतनी उम्दा हालत है कि शब्द समझाने को नहीं मिलते। 

    अब 26 नवम्बर का जवाब बहुत छोटा सा देता हूँ। यह खत और भी विचित्र है और कुल खत का मतलब सिर्फ़ एक शब्द अदा हो सकता है। वह यह कि सब कुछ मिलाकर एक हो जाने की खबर मिल रही है। अभी ऐसी जाने कितनी दशायें आयेंगी कि जो आ आकर इतनी हल्की होती जायेंगी कि लापता मालूम होंगी। Unchanging हालत पैदा होने के यही चिन्ह हैं। तुम्हारी लय-दर-लय की चल रही है, बस सिर्फ़ इतना ही इस तारीख़ के खत का उत्तर है। 

    काशीराम आसाम से तुम्हारे खत पढ़ने के लिये और दिखाने के लिये मांग रहे हैं। मैं वहाँ भेजना नहीं चाहता, तुम्हारा पता पूछा है, मुमकिन है, तुमसे भी माँगे। तुम उन्हें लिख देना कि कुछ तो रामचन्द्र ने मेरे पास नकल करने के लिये भेजे हैं; जो जब मौका होता है, नकल करती हूँ और कुछ रामचन्द्र के पास हैं और वह उनको छपवाना चाहते हैं। फिर हर शख्स देख सकेगा; और उसके बारे में जो कुछ कहना है, रामचन्द्र से कहना।

    तारीख 29.11.54 रात को करीब 10.30 PM. 'Z' स्थान से आगे निकाल दिया। अब इन स्थानों के नाम A1 B2 रखे हैं; इसलिये अब तुम्हारी सैरगाह ‘A1‘ पर है। ऊपर जब तुमको खींचा, तो तीन दफ़ा नीचे उतर आयीं याने ‘Z’ स्थान पर, फिर ‘लालाजी’ साहब ने कहा कि झटका दो। जब ऐसा किया, तब ‘A1‘ पर ठहरी। बात यह थी कि ऊपर का Force नीचें फेंक देता था। जितना ऊपर अभ्यासी बढ़ता जाता है, Nature का Force बढ़ता जाता है, इसीलिये दूसरे की मदद की ज़रूरत पड़ती है। 

    शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-443
लखीमपुर
2/12/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा एवं स्नेह संचित पत्र ‘आपका’ कल मिला- पढ़कर अत्यन्त हर्ष हुआ। ‘मालिक’ का बहुत बहुत धन्यवाद है कि ‘A1‘ Point पर मुझे लाकर खड़ा कर दिया। ‘आपने’ लिखा है कि “तुम तीन बार नीचे उतर आई” सो जाने क्या बात है कि ता. 21 की रात को मैं कॉपी में ‘आपका’ अगला पत्र नकल कर रही थी, जो अबकी से नकल करने में आराम के कारण पिछड़ गया था; तो न जाने क्या हुआ कि जैसे तबियत ऊपर से नीचे को फिर लौट आती है, फिर लौट आती है, दो-तीन बार ऐसा लगा, परन्तु फिर ऐसा लगा, जैसे किसी ने मन में कुछ जगा सा दिया है। न जाने क्यों उस रात नींद भी कम आई। ‘आपका’ दर्द Normal हो गया, मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई तथा सबको ही खुशी हुई। ‘आपने’ जो मेरी पूजा के लिये दो ध्यान बताये हैं, सो एक सबेरे और एक शाम को मैने करना शुरू कर दिया है। न जाने क्यों इधर सिर का दर्द बहुत जुकाम होने पर भी बिल्कुल बन्द सा रहता है। मुझे लगता है कि ‘आपने’ शायद मेरे Low Blood Pressure के लिये कुछ किया है, वैसे ‘आप’ जाने। अब मैं ‘मालिक’ की कृपा से दर्शन की हालत समझ गई, पूरी तरह से, वास्तव में मैं क्या कहूँ कुछ समझ में नहीं आता। भाई काशीराम जी का पत्र जब यहाँ आयेगा तो ज़रूर लिख दूंगी। ‘आपने’ बार-बार नीचे आ जाने का कारण Nature का Force लिखा है, यह ठीक है, परन्तु मुझे तो Force की छींटे भी वहाँ अनुभव में नहीं आतीं। लगता है Force तो Force में मिल चुका कहीं इसका अंदाज़ लगता ही नहीं।

    मुझे लगता है कि जैसे मैं एक ऐसे किनारे पर लाकर खड़ी कर दी गई हूँ, जहाँ की हवा में केवल Ignorance का ही अन्दाज़ आ रहा है। परन्तु किनारे पर हूँ, अभी ‘मालिक’ ने उसमें मुझे डाला नहीं। मुझे लगता है कि ऐसे तो जो दशा आती ही है, परन्तु साथ ही एक Unchanging दशा भी अंतर में अन्दाज़ में धुंधली सी आती है और जहाँ तक अन्दाज़ है मुर्दे की अवस्था कही जा सकती है, परन्तु उसमें मुर्दापन एहसास में नहीं आता है। मुझे लगता है कि दशा का सूनापन एवं अकेलापन भी साथ नहीं जाता है। 

  ‘आप’ इतनी तकलीफ़ के बाद भी इतनी दूर जा रहे हैं और कोई तो जाने की हिम्मत नहीं करता, मैं तो झट चल दूं। परन्तु खैर मुझे तो समुंद्र के किनारे की Refreshing वायु, परन्तु उसमें वायु का Pressure नहीं है या यों कह लीजिये कि यदि शान्ति कहिये तो एक तरावट या कुछ कह लीजिये सामने आती है, कुछ ऐसा ही हाल है क्योंकि गर्मी तो, गर्मी में समा चुकी और ठंडक, ठंडक में मिल चुकी है। मैं तो एक अजीब Ignorance की दशा के अन्दाज़ में या वायु में हूँ। 

  मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ ऐसा लगता है कि मानो मेरा कण-कण सत्ताहीन या बिल्कुल Pressure हीन होकर एक अजीब शान्त या ignorance ही सही दीखता है, के वातावरण में मिल चुका है। बल्कि जाने क्या है, मैं तो हर समय Refreshing सा ही अनुभव करती हूँ लगता है मेरे कण-कण का अब कहीं पता ही नहीं चलता, वह तो जाने कहाँ मिल मिला गये हैं। कुछ यह है कि ज़रें ज़रें की गर्मी मानों गर्मी में समा गई और मेरे में Refresh वातावरण सा है। ठंडक भी नहीं है, वह तो अपनी सत्ता में समा चुकी। अब मैं कण-कण नाहक कहती हूँ, जबकि मुझे यह कुछ अनुभव तो होते नहीं, बल्कि जबकि इनके बजाय एक हल्का शान्त सा वातावरण हो चुका है। परन्तु कुछ यह देखती हूँ, मेरे में Refresh वातावरण होते हुए भी कुछ उदासी या लापरवाही सी मिली कहूँ, नहीं-नहीं बल्कि एक अज्ञानता का ही साम्राज्य है। प्रेम कहने को कह लीजिये, वरन् प्रेम तो शायद प्रेमी में समा कर लुप्त हो गया मुझमें अब उसका पता ही कहाँ है। अब तो मेरी शरीर की भी सत्ता, लगता है सत्ता में मिटकर मिल चुकी। अभी दशा पूरी Express नहीं कर सकी हूँ, फिर लिखूंगी।

    अम्मा ‘आपको’ शुभार्शीवाद कहती है। इतिः-

   सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

  सेविका
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-444
लखीमपुर
5/12/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा पत्र मिल गया होगा। नारायण दद्दा ‘आपके’ साथ जा रहे हैं, ऐसा आज पूज्य मास्टर साहब जी के यहाँ ‘आपके’ कार्ड से मालूम हुआ। मैं ’बाबूजी’ क्या करूँ, मेरे मन में यद्यपि कभी यह आता ही नहीं कि मैं बीमार हूँ, परन्तु फिर भी अच्छे होने में कुछ देर लग ही जाती है। अब मैने दोनों समय ध्यान भी करना शुरू कर दिया है। अब मैं जल्दी से अच्छी हो ही जाऊँगी। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

    दशा क्या है, मुर्दा कह लीजिये, परन्तु मुर्दापन तो एहसास में नहीं आता। लय- अवस्था तो मेरे ‘बाबूजी’ लगता है, कि वह भी मानों हजम होकर कुछ नहीं बचा। क्योंकि मुझे अपने में उसका भी आभास तक नहीं मिलता। यही हाल जीवन-मोक्ष-गति का हो चुका है कि मेरे तो कण-कण में टटोलने पर कहीं आभास तक नहीं मिलता। शायद Pressure हीन कणों में इसकी भी गुंजाइश कहाँ रह सकती है। हर कण भीतर-बाहर तक की गर्मी भी लगता है, शीतल हो चुकी। कण-कण तो एक कुछ खाली ही कहती हूँ। ऐसी अवस्था में, कण-कण मिलकर सत्ता हीन हो चुके हैं। यही नहीं बल्कि देखती हूँ कि कण-कण का आपस में ही कोई सम्बन्ध-सत्ता नहीं रह गई है।

    मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ ऐसा हो गया है कि मेरी निज का कोई स्वभाव, कोई प्रकृति ही नहीं रह गई। जैसे कहते हैं कि इसका ऐसा Nature, उसका ऐसा Nature। नेचर तो नेचर में समा गई। मुझे इससे कुछ मतलब ही न रहा। मुझे तो लगता है कि जैसे सब अवस्था, तुरिया भी, अपनी अवस्था में ही रह गई। मुझे तो ‘मालिक’ ने सबको दिखा समझाकर अलग कर लिया और यह भी है कि सूनापन भी अब मानों मेरे साथ नहीं जाता। न जाने क्यों लगता है, गर्मी का माद्दा भी शीतल बन चुका है, परन्तु यह शीतलता भी जाने कैसी है कि कुछ पानी की तरावट कह लीजिये या ‘आप’ जाने, मुझे तो नहीं मालूम।

   न जाने क्या है ‘श्री बाबूजी’ कि सिर के पीछे बीच में एक गोल सा Point पर, जहाँ सीधी मांग खतम होती हैं, उससे कुछ ही नीचे हड्डी में अक्सर अब बड़ी खटखट व फड़कन होती है। दूसरे जाने क्या बात है कि जहाँ से रीढ़ शुरू होती है, वहाँ से खोखली रीढ़ के बीचों बीच होकर सिर तक एक मानों साँप सा खड़ा है, परन्तु जाने उसमें जीवन नहीं है, जाने क्या वह सदैव अचल सा खड़ा रहता है। याद का तो अब यह हाल है कि चाहे ‘मालिक’ की बातें मास्टर साहब जी व घर में करती हूँ, परन्तु देखती हूँ कि याद फिर भी नहीं आती। वह तो कुछ ऐसा है कि महिनों में एकदम से धोखे से आई और कलेजा चीरती हुई फिर फौरन निकल गई और मैं कलेजा दाब कर रह गई।

    अम्मा ‘आपको’ स्नेहाशीष कहती हैं। इति:-

    सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

  सेविका
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-445
जौनपुर
8/12/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो।

पत्र 2 दिसम्बर सन 1954 का मिल गया और यह 6.12.54 को चलते वक्त मिला था। नारायण शाहजहाँपुर स्टेशन पर मुझे मिल गये, जो हमारे साथ मौजूद हैं। ता. 11.12.54 को दोपहर को गाड़ी से रात को ग्यारह बजे शाहजहाँपुर पहुंचने का इरादा है। मेरी यहाँ, जौनपुर आने की ज़रूरत भी थी, इसलिये कि शुक्ला जी की गड़बड़ी बहुत कुछ इलाहाबाद में दूर कर चुका था और शाहजहाँपुर में भी दर्द और तकलीफ़ ने जितनी इज़ाजत दी, रुजू रहा, फिर भी दो-चार रोज रह कर ईश्वर ने चाहा तो फिर उस हालत से बेहतर ले आऊँगा। तुम्हारे तजुर्बे के लिये मैं लिखता हूँ और यह ज़िन्दगी में पहला ही अनुभव है, वह यह दिल की हालत ऐसी थी जैसे उसकी Life जाती रही हो। अब Life काफ़ी पैदा हो गई, मगर जल्दी में मुझसे गल्ती हो जाती है और Special will इसी वज़ह से इस्तेमाल कर जाता हूँ। Life जितनी देना चाहिए थी, उससे ज़्यादा दे गया और इसका एहसास फ़ौरन हुआ। बोझ तो हटा दिया, अब यह देखना है कि कितनी कमी और कर दी जाय ताकि Moderation पैदा हो जाये। एक नस से दिल के पीछे रीढ़ से Connect है, उसमें कालिमा तो दूर कर दी, मगर भारीपन अभी दूर न कर सका। इसका तरीका सोचना है, कि कैसे दूर की जाय। मैंने इस गुरिया पर जब शुक्लाजी लखीमपुर से शाहजहाँपुर आये थे तो इस पर कुछ थपथपा दिया था; हाथ की उगंली से; ताकि उनको अपने आप को भूलने में मदद मिले और यह मेरी Research थी। उन्होंने न मालूम कैसे भारी कर लिया। वह ठीक करना बाकी है। बाकी सब ठीक हो गये हैं। Special Traning के लिये मैं समझता हूँ वह आदमी Fit है, जिसे ईश्वर बना बनाया भेजे। मैं चाहता तो यह हूँ कि Super Conscious State तुम सब लोगों की इतनी Develop हो जाये कि जिस चीज़ पर निगाह जाये, नुस्खा बिल्कुल सही मालूम हो जाये। अब जो मुझे मालूम होता है, मैं कह तो देता हूँ, मगर उसको करने के लिये भी इतना एहसास और अंदाज अभी तक किसी का नज़र नहीं आता और भाई मसल मशहूर है कि ”सिखाये पूत दरबार नहीं जाते” और बहुत सी ऐसी बातें हैं जो अब तक मेरे ख्याल में नहीं है; ज़रूरत पर ज़रूर ईश्वर बता देता है। मैं इस क़दर सुस्त पड़ गया हूँ कि अपनी मेहनत बचाने के लिये जल्दी कर जाता हूँ और उसका नतीजा यह होता है कि ज़रूरत से ज़्यादा force पड़ जाता है। इसमें दोनों शख्सों का लिहाज़ है कि अभ्यासी का वक्त बचा रहे और मेरा भी। System of Training इतना है कि मैं उसके मुकाबले में अभी भी नहीं जानता। मैने काशीराम को लिख दिया है कि मैं कस्तूरी के पत्रों को यों भी नहीं भेजना चाहता कि उसमें बहुत सी घरेलू बातें हैं; जो मैं यह नहीं चाहता कि हर शख्स जाने। 

  तुम्हारी सैर को जगह 'A' One (A) है। तुमने अपने खत में 'A' लिखा है। मैंने उसको सही कर दिया है। 'A' से 'Z' तक स्थान तुम पार कर चुकी हो, चूंकि Alphabet इससे ज़्यादा नहीं हैं, इसलिए A, B और C इत्यादि चलेंगे। तुम अब 'A1' पर हो और जब मेरी निगाह 'A1' पर जाती है, तो मैं गद्गद् हो जाता हूँ। उसकी सुगन्ध कुछ मुझे भी आ जाती है और जी खुश हो जाता है। इस मुकाम पर ऐसी महक है, जिसमें खुशबू कहना इस स्थान को भारी बना देना है। मगर भाई, कुछ अजीब मज़ा है। मेरी तबियत तो भाई, यह चाहती है कि तुम्हारे इस स्थान को देखता ही रहूँ; देखने से निगाह थकती ही नहीं। इस क़दर सफाई है कि आईना भी उसकी मिसाल गलत होगी। अगर रोशनी कही जावे तो वह भी उससे भारी पड़ेगी। मुझे तो अपने स्थान अब ढूंढे नहीं मिलते। Negation के चक्कर में इस हद तक पड़ गया हूँ और उससे एक Moment के लिये भी अलहदा होने का जी भी नहीं चाहता। इसलिये इस हालत के पहुंचे हुए अभ्यासी की गति देख-देखकर खुश हो लेता हूँ। मेरी हालत तो यह है कि “संग (पत्थर) बे नमक है।” अब ज़ायका बदलने के लिये अगर मसाला नहीं खाता तो उसकी झरप से ही जी खुश कर लेता हूँ। यहाँ की हालत इतनी Soothing है कि उनको देख-देखकर मेरे दिल में तस्कीन सी हो जाती है। तुमने जो Unchanging Condition को लिखा है कि “अंतर में धुंधला सा एहसास होता है” इसका ताल्लुक कुछ इस स्थान से नहीं है, मगर अन्दाज़ ज़रूर बता रहा है कि यह भी कोई हालत है। जहाँ पर Change खत्म हो जाता है, फिर Unchanging की शुरुआत होती है। यह तो बिल्कुल Divine Condition है और बड़े-बड़े महात्मा और योगी इसके लिये तरसते चले गये हैं। कबीर साहब इतने बढ़े हुए थे, मगर उनको भी इस चीज की हवा भी नहीं लगी। यह हमारे गुरू महाराज (समर्थ गुरू महात्मा श्री रामचन्द्र की महाराज) ही का गुर्दा था कि खुद इस हालत पर पहुंचे और दूसरों के लिये दरवाज़ा खोल दिया। तुम्हारी चाल और अन्दाज़ यह ज़रूर बता रहा है कि तुम्हें ईश्वर ने चाहा किसी वक्त यह हालत नसीब हो उम्मीद श्री ईश्वर सहाय मास्टर लखीमपुर से भी हैं और वह बहुत कुछ उस हालत की तरफ़ पहुंच चुके हैं। ईश्वर का धन्यवाद ज़रूर है अगर संस्था में एक भी ऐसा निकल जाये। मगर मुझे पूरी तौर से तो उस वक्त मिले, जब सब के सब उस हालत पर पहुंचे। अगर सब के सब न सही हो तो कम से कम चार-छः ही पहुंच जायें; मगर अफसोस यह है कि इस हद तक तरक्की की किसी को लालसा पैदा नहीं होती। हाँलाकि मैं कहे जाता हूँ कि Unchanging Condition सच्ची गति है और इसके लिये कोशिश करें। बिटिया ! मैं सच कहता हूँ कि इसका हासिल करना (ईश्वर मदद करे) मुश्किल नहीं है और खासकर ऐसे जमाने में जबकि कुदरत दोनों हाथों से अपनी दौलत लुटा रही हो। मुश्किल शब्द तो रूहानी सम्बन्ध में निकाल ही देना चाहिये, इसलिये कि हम में जो चीज़ है, उसी को तो हम Realize करना चाहते हैं। तो ताज्जुब है कि अपनी चीज़ को देखना और समझना इन्सान मुश्किल समझे। हमारी जौनपुर आने की ख्वाहिश थी, हम आ ही गये और कहीं अगर सफ़र की तकलीफ़ का ख्याल हमें रहता तो आने का इरादा भी न बनता और फिर भला हम कैसे आ पाते।

   तुमने यह जो लिखा है कि “Ignorance के लिये, कि इसको मुर्दापन की अवस्था कही जा सकती है, परन्तु मुर्दापन की कैफियत एहसास में नहीं आती” मुर्दापन से मतलब यह होता है कि Lifeless अर्थात् अपने को दूसरे के हाथ में ऐसा दे देना कि वह जिधर चाहे हिलाए-डुलाए। यह उस वक्त होता है जब कि दुनिया की धड़क-भड़क और उसके अन्दाज़ तबियत से ऐसे जाते रहते हैं, जैसे जागे हुए आदमी के सामने सपना। यह चीज़ Ignorance से सम्बन्धित की जा सकती है, मगर Complete Negation उसी को कहेंगे जब उसमें (ईश्वर में ) हम ऐसे घुल मिल जाते हैं कि हमें अपना और ईश्वर दोनों का पता नहीं रहता। या, यों कहो कि दोनों लापता से हो जाते हैं। इसको सूफियों ने ‘फ़नाफ़िल्लाह’ हो जाना कहा है और इसी की उमरभर कोशिश करते रहे। और मुमकिन है कि जितना कि बंदा हो सकता है, न हो सके हों। इसलिए कि Upward Current में जब तक कोई ले जाने वाला न हुआ तो जाना कठिन क्या, बल्कि असम्भव है। उसमें सिर्फ वही Stages रहते हैं कि जितना ज़्यादा अपने आपको कोई उसमें मिटा या मिला सका। वहाँ तो यह बात है जैसे अंधों में से किसी ने हाथी की दुम पकड़ ली और किसी ने सूंढ और किसी ने पैर और वह सब लोग उसी एक चीज़ को हाथी समझने लगे। ज़रा वहाँ की हवा आई और अपने आपको पूरी तौर से ईश्वर में लय समझने लगे। यहाँ पर हमने कठिन लफ्ज ज़रूर इस्तेमाल किया है, वह सिर्फ इसलिये कि ऐसा अभ्यासी मिलना बड़ा मुश्किल है कि अभ्यास शुरू करते ही उसके ख्याल की Current असल भण्डार पर गिर पड़े और वही उसके जाने का रास्ता बन जाये। हिम्मत अगर है तो यह भी हो सकता है; मगर यह चीज़ आसान हो जाती है जबकि, उस हद तक पहुंचे हुए को हम अपना Guide मान लेते हैं। यह चीज़ भी ऐसी है कि अगर जिन्दगी में न हो पाये तो Liberation पर कोई असर नहीं पड़ता और ज़्यादातर लोगों का उद्देश्य यहीं तक होता है, वैसे Nature पर Control कर लेना असल में योगी का मक़सद है और पूरा Control उसी वक्त कहना चाहिए जबकि खास तौर पर उसमें (ईश्वर में ) कोई लय हो जावे।

     तुमने जो अपने आपको Refreshing महसूस होना लिखा है, वह सही है। गर्मी और ठंडक के बारे में पिछले खत में लिख चुका हूँ। अब Pressure ज़रूर कम होता चला जा रहा है, बल्कि बहुत कम है। यह एहसास सही है। बाकी और हाल सब ठीक है, उसका कहाँ तक जवाब दिया जाये। शुक्लाजी व नारायण सबसे नमस्ते कहते हैं।

    एक बात जो मैं लिखना चाहता था, उसको भूल गया, अब लिख रहा हूँ। चाहता यह हूँ कि अभ्यासी Nature के Force को Cross करते हुए बिना मेरी मदद के ऊपर बढ़ते चले जायें; इसीलिये कि यह मामला हमेशा के लिये आसान हो जावे। यह तो मैं पहले ही कहीं लिख चुका हूँ कि अभ्यासी अपने आप अपने को कैसे तवज्जो दे ताकि वह मेरे ज़्यादा मोहताज न रहे। मगर ऊपर की लिखी हुई बात सोचना है। तुम भी कोशिश करो, मास्टर साहब भी जिसके समझ में आ जावे। यह लाज़मी नहीं कि हर बात मेरी ही समझ में आवे और हर काम मैं ही अच्छा कर सकूँ। एक मिसाल विमला की तुम्हारे सामने है कि मैं महीनों मेहनत करता और मुमकिन था कि इतना अच्छा नतीजा बरामद न होता, जितना तुमसे हो गया। असल में तुमने उसको बिल्कुल बदल दिया। विमला अबकी उत्सव में जज साहब के साथ आ भी रही है। यह जज साहब ने मुझसे कहा था।

    अब मतलब पर आता हूँ। यह तो हो सकता है कि ऐसी Special will बाँधी जाय कि शुरू से ही वह शक्ति पैदा कर दी जाय कि वह कुदरत की Upward Current में बहता चला जाय। मगर यह शक्ति मुमकिन है कि सहन न हो सके, इसलिये इस तरीके से कोई फायदा भी नहीं। कोई Point ऐसा होना चाहिए कि अभ्यासी उस पर Meditate करे और बेड़ा पार होता ही चला जावे। वैसी उस्तादी तरकीबें तो हो सकती हैं। एक इस वक्त लिखते-लिखाते ख्याल में आ गई; गो अभी इसको ज्यादा सोचा नहीं है सही कि Human brain का Centre जिसको Efficacy of Raj Yoga में मैंने Occipital bone कहा है, वहाँ पर इतनी कशिश (आकर्षण शक्ति) पैदा कर दी जावे और कुछ Duration कायम कर दिया जावे कि वह अभ्यासी को घसीट कर अपने पास तक ले आवे और यह ईश्वर की कृपा से मुमकिन भी है। मगर यह तो मेरे करने का काम रहा और Special will ईश्वर जिसको देवे, उससे सब कुछ काम बन सकते हैं। मगर सोचना यह है कि अभ्यासी क्या करे, जिससे यह मुश्किल आसान हो जाये। लिखाते-लिखाते यह तरकीब भी समझ में आ गई कि जिस स्थान पर अभ्यासी हो और समझ ले कि अब उसकी सैर पूरी हो गई है, तो उससे अगले मुकाम पर Meditate करे। यह तरकीब अभी मुझे “लालाजी साहब” ने बताई है। “लालाजी” की इज़ाज़त से मैंने उसमें इतनी तरमीम (संशोधन) कर दी है कि Master cell पर Meditate करे। Master cell इस स्थान का Centre होता है और उसमें Concentrated Energy होती है। यह चीज़ आसान हो गई, मगर उसमें एक डर भी है कि कहीं ब्रह्माण्ड में हो और पारब्रह्माण्ड में जाने के लिये Meditate न करने लगे। ऐसे वक्त में जब कि ब्रह्माण्ड मण्डल की सैर पूरी न हुई हो। यह दूसरा खत मास्टर साहब को देना।

    शुभचिन्तक 
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-446
जौनपुर
10/12/1954
प्रिय बेटी कस्तूरी, प्रसन्न रहो।

मैं एक पत्र यहाँ से भेज चुका हूँ, मिल गया होगा। कल आज़मगढ़ से नन्ही आ गई और सुबह डाक्टर साहब आ गये, इस वजह से हम भी रुक गये। अब 12.12.54 की रात को शाहजहाँपुर पहुंच जायेंगे। तुम्हारे पत्रों में जो कुछ भी तुमने लिखा है, ज़ाहिर होता है कि तुमने अच्छी लय अवस्था हासिल की है और यह चीज़ तो अभी बराबर ही चलती रहेगी।

   जब प्रकृति से बहुत कुछ सम्बन्ध टूट जाता है, तो उसका असर, जो गर्मी के मानिन्द है, एहसास में नहीं आता, बल्कि प्रकृति से जो ऊंची चीज़ है, उसका एहसास होता है, और वह असर गर्मी से विरुद्ध होता है। माँग जहाँ पर खत्म होती है और उसके नीचे जो फड़कन होना तुमने लिखा है, 'A1' स्थान करीब-करीब वही पर है। उसमें जो Actions जाग्रत के लिये शुरू हैं, वह फड़कन के रूप में मालूम होते हैं। रीढ़ में होकर जो खोखलापन बतलाया है, फिर साँप का एहसास, यह कुण्डलिनी का एहसास मालूम होता है। भाई याद तो वही ठीक है, जो कभी न आवे। अब यह है कि सुन-सुनाये अगर कहीं आ जाती है, तो वह भी समझना चाहिये कि ऊपर लिखी हुई हालत पर ले आना चाहती है।

    मास्टर साहब के दो खत मिले और चौबेजी की डायरी भी। मास्टर साहब से कह देना कि आपने जो राय दी है, मेरे पूछने पर वह सही है और मैंने उसी पर अमल किया। मास्टर साहब ने कुछ अपनी हालत भी लिखी है, वह खत पहुंचते-पहुंचते बहुत कुछ साफ़ हो जावेगी, अगर ईश्वर ने चाहा। मुझे बड़ी खुशी है कि चौबेजी व मास्टर साहब बड़े दिन की तातील में आवेंगे। मैंने एक खत पिछले लिफाफे में मास्टर साहब के लिये भेजा था, तुमने दे दिया होगा।

    चौबेजी व अम्मा को प्रणाम। नारायण सबसे नमस्ते कहते हैं।

   शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-447
लखीमपुर
12/12/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है, मेरा एक पत्र मिला होगा। इधर मैंने भी बहुत दिनों से ‘आपको’ पत्र नहीं लिखा, कारण इधर जुकाम, खाँसी बहुत अधिक आने के कारण अक्सर हरारत शाम तक हो ही आती है और थोड़ी सी कमज़ोरी भी है। वैसे ठीक हूँ और ‘आपके’ लिखे हुए दोनों ध्यान बराबर कर रही हूँ, जिससे आशा है कि मैं पूर्ण-स्वस्थ हो जाऊँगी। अब तो उत्सव के दिन नज़र आने लगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

     मेरे ‘श्री बाबूजी’ मेरा तो कुछ यह हाल है कि ‘मालिक’ मेरी आँखों की ज्योति होते हुए भी या ज्योति में रमा होते हुए भी, मैं इतनी खोई रहती हूँ, जागती ही नहीं, इसलिये मेरे लिये बराबर है। परन्तु इसका एहसास कि वह मेरी दृष्टि में पैठा हुआ है, का आभास कब होता है कि जब कभी कितने ही समय बाद ‘उसकी’ याद या ‘उसका’ ध्यान भूले से आता हुआ निकल जाता है, तब आँखों में वही तस्वीर पाती हूँ, परन्तु आँखों की उस तस्वीर को सहेज लेने की मुझमें कुब्बत ही न रही। मैं देखती हूँ कि यह न जाने क्या बात हो गई है कि अक्सर Vision में या स्वप्न-वत् कहिये जाने कितनी सैर सी किया करती हूँ या मन ही मन बात करने में उस सैर का या बात करने का धूमिल सा ख्याल के अलावा जैसे पहले लिखा करती थी कि मेरा ख्याल ‘मालिक’ के साथ घूम रहा है। यह भी समाप्त हो चुके या यों कह लीजिये कि मेरे लिये सब कुछ समान हो गया या Vision में समा गये। मेरे ‘श्री बाबूजी’ कुछ यह लगता है कि जहाँ मैं हूँ, वहाँ ऐसी महक़ है कि महक की गुज़र नहीं। यदि शुद्धता कहती हूँ, तो भद्दापन आ जाये। आईने स्पर्श की ठंढक, चाहे कुछ कह लीजिये परन्तु आईना नहीं, उसकी शुद्धता नहीं। लगता है हर समय मानों समुंद्र के किनारे रह रही हूँ। कुछ वैसा ही निस्तब्ध-वातावरण मेरा कुल शरीर, कुल ज़र्रा-ज़र्रा तक में अनुभव करती हूँ। उसकी (महक़ भर) अनुभव करती हूँ, परन्तु अभी उसमें दाखिल नहीं हुई। लगता है सामने वाले समुद्र की सैर ही मेरी सैरगाह होगी। इधर २-३ दिन से जाने क्यों तबियत उदासी में खो जाती है। और वहाँ उसे इसका भान नहीं रहता, अब क्या कहूँ। कभी लगता है, तबियत ठहरी हुई सी हैं। कभी-कभी बिना बातों इतना डर लगता है कि मानो अपने से भय हो। कुछ समझ में नहीं आता, यह क्या बात है बार-बार अपने में से ही कहिये निकल भागने को तबियत रहती है। कहाँ चली जाऊं, कुछ समझ में नही आता। मेरे ‘श्री बाबूजी’ कहते हैं सत, रज, तम तीन गुणों बगैर आदमी जिन्दा नहीं रह सकता, परन्तु मैं देखती हूँ, मेरी तबियत तो तीनों को भी त्याग, जाने कहाँ चली गई। मैं तो बिना श्वाँस के बिना तत्वों के, और बिना गति के जीवित कहलाती हूँ। मुझे कोई मरा नहीं कहता। मृत्यु से मेरा सम्बन्ध नहीं और जीवन से मेरी मानों मुलाकात नहीं। मेरी तो कुछ ऐसी दशा है कि यदि बिल्कुल दीन-हीन कहूँ तो दीनता-हीनता से रहित हूँ। मेरी दशा तो उस अज्ञानी बालक की तरह कह लीजिये, जिसे कुछ किसी प्रकार का ज्ञान नहीं और समझने की कुब्बत नहीं। मेरी दशा Innocence भी नहीं, बल्कि अज्ञान ही ठीक शब्द है या ‘आप’ जानें। मैं देखती हूँ मेरे ‘श्री बाबूजी’ कि स्वयं अपनी तबियत से मेरा सम्बन्ध विलग हो गया। यहाँ तक कि मैं निज की Nature ही कुछ नहीं पाती हूँ। Nature तो Nature में मिल गई।

    अम्मा ‘आपको’ शुभाशीष कहती हैं। इतिः-

   सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

  सेविका
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-448
लखीमपुर
16/12/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

‘आपका’ कुपा-पत्र कल मिला- पढ़कर प्रसन्नता हुई। नारायण दद्दा ‘आपके’ साथ गये, पढ़कर बड़ी प्रसन्नता हुई। सचमुच में समय के मूल्य को वही ठीक आँक सकता है जो अपने समय की गति को मेरे ‘मालिक’ के चरणों में जोड़ सके। जितना समय साधक ‘आपके’ साथ चाहे जिस तरीके से क्यों न हो रह सके, वाक़ई वे ही क्षण सच्चे जीवन में जोड़ने योग्य हैं। परन्तु जहाँ तक निगाह दौड़ती है, तो यही दीखता है कि जितना लाभ उठाना चाहिये, हम उतना नहीं उठा पाते। 

  मेरे ‘श्री बाबूजी’ ‘आपकी’ यह Research कि एक नस, जो दिल के पीछे रीढ़ से Connect है, जिसमें शुक्ला जी के भारीपन था और जो दूर भी हो चुका होगा, जब शुक्ला जी लखीमपुर से शाहजहाँपुर गये थे तो लिखा है कि मैंने हाथ की ऊंगली से उस गुरिया में कुछ थपथपा दिया था ताकि उनको अपने आप को भूलने में मदद मिले यह बहुत ही सही है, क्योंकि शायद शुरू की चिटिठयों में मुझे याद आया कि जहाँ मैंने यह लिखा है कि “काम करते हुए भी मानों ध्यान नहीं रहता, शायद भूल-भूल सी जाती हूँ” वहाँ मैंने कई बार यह भी लिखा है कि Heart के बिल्कुल पीछे पीठ की रीढ़ में बड़ी फड़कन होती है और कुछ गुदगुदी या सरसराहट सी लगती हैं यह बात ‘आपके’ Research लिखने से अब मुझे बिल्कुल Clear हो गई। न जानें यह क्या हो गया कि जैसा ‘आपने’ लिखा है कि “दिल की हालत ऐसी थी जैसे उसकी Life जाती रही हो।” 

    मेरे ‘श्री बाबूजी’ हम लोगों की Super Conscious State इसलिये अधिक Develop नहीं हो पाती कि जितना संग मन से, या लगन से हमें Super Human Being का करना चाहिये, उससे ज्यादा Time, Lower में (यानी संसार में) जाता है। इसीलिये शायद Super Conscious में जागृति ज़्यादा नहीं आने पाती। ‘आपने’ जो नई Research की कि ‘अभ्यासी’ बिना ‘आपकी’ मदद के Nature के Force को Cross करता ऊपर बढ़ता चला जावे तो कुछ एक-आध Second को मैंने ज्यों ही ‘आपकी’ लिखी हुई तरकीब से 'A1' के Master Cell को गौर से देखा तो लगा कि कुछ हल्का सा स्पन्दन अन्दर हुआ, परन्तु मैं तो ‘श्री बाबूजी’ जहाँ आप ले चलेंगे, वहीं चलूंगी और तो मुझे कुछ मतलब नहीं। कुछ यह है कि अब, मैं किसी पर, लगता है Meditation नहीं कर पाती हूँ, क्योंकि मुझमें न जाने क्यों इसकी कुब्बत ही नहीं रही। ‘मालिक’ जैसे रखे वैसे रहूँगी। ध्यान में तो मानो मेरा ज़र्रा ज़र्रा खाली दीखता है। और खाली क्या दीखता है, बल्कि न जाने क्या बात है कि ज़र्रा जर्रा है भी या नहीं ‘राम’ जानें और ‘राम’ क्या जाने, क्यों कि ‘नहीं’ तो ‘है’ नहीं हो सकता और है ‘नहीं’ नहीं हो सकता।

    मेरा तो न जाने क्या हाल है कि सामने कोच पर या वैसे भी ‘मालिक’ आँखों के सामने रहते हुए भी, यही नहीं, बल्कि आँखों से दीखते हुए भी न जाने क्यों मुझे ‘उसकी’ तब भी याद नहीं आती। एक यह न जानें क्या बात है कि कभी-कभी मास्टर साहब जी व औरों से बात करते-करते न जाने क्यों कुछ Mood सा हो जाता है। अब तो मेरे ‘श्री बाबूजी’ यह हाल हो गया है कि दिल पत्थर हो गया है कि अब तो चाहे कोई कितनी देर ‘मालिक’ की बात क्यों न करे, परन्तु देखती हूँ याद का पता नहीं। याद कहती हूँ, तो भी याद का पता नहीं। बस न जाने कब, कैसे मुझे कुछ याद नहीं, हृदय में कुछ मानों चुभा और चुभा क्या दर्द, जब पता नहीं चलता है, परन्तु कभी-कभी तो याद के लिये तो मैं पत्थर हूँ और याद मेरे लिये पत्थर है, बस यह कह लीजिये कि पत्थर धोखे से कभी आपस में टकरा भर जाते होंगे। मैंने जो अक्सर बात करते में या वैसे भी याद के बारे में लिखा है, वह सूनापन ही होता है न जानें क्यों अब तो Refreshing वाली दशा भी नही अनुभव होती।

    अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद व ताऊजी, ‘आपको’ प्रणाम कहते हैं। इतिः-

   सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

  सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-449
लखीमपुर
22/12/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा एक पत्र मिला होगा। आज ताऊजी यहाँ से लखनऊ जा रहे हैं, फिर वहाँ से ‘आपके’ पास पहुंचेंगें, किन्तु मेरे सफ़री ख्याल का तो सफ़र मानों आज से ही पूरा होकर ‘आपके’ चरणों में बड़े दिन की छुटियों की शायद बहार देखेगा। बसंत पंचमी की तो बयार बहनी शुरू हो गई है। बस बसंत पंचमी आने की देर है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

     मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब तो दशा को देखकर कभी-कभी ऐसा लगता है कि वह शायद स्थिरता के कारण या सूनी सी के कारण, कि कहीं सन्तोष तो मुझे नहीं आ गया है, परन्तु निगाह की, बिछी हुई पलकों को ‘मालिक’ के ही अभय-कर कमलों का भरोसा है। न जाने क्यों चलना तो दूर रहा, अब मैं स्वयं अपनी चाल को रेंगती हुई भी नहीं अनुभव कर पाती हूँ, यद्यपि साँस तो मुझे आ ही नहीं सकती या ठहर तो मैं सकती नहीं और न ऐसा है। ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। कुछ चाल की गतिविधि शायद पलट गई है।

    मेरे परम पूज्य महात्मन् ! जैसे पहले मैं अपने को भूली ही रहती थी, परन्तु न जाने क्यों अब तो मुझे कभी एक क्षण को भी ऐसा प्रतीत नहीं होता। मैं यदि देखती भी हूँ तो वैसे तो कभी निगाह ही नहीं जाती, तो दुविधा में पड़ जाती हूँ कि आखिर इस दशा को क्या कहूँ। ‘श्री बाबूजी’ जब चीज़ हो तो उसे भूला भी कहाँ जा सकता है। जब मूल धन हो तो मिश्रधन भी हो सकता है, किन्तु जब चीज़ ही न हो, मूल ही न हो, तो क्या कहा जावे। यदि अपने पास का कुछ गया होता, तो उसकी कुछ याद ही रहती, परन्तु ऐसा भी नहीं हुआ। न जाने क्या हुआ मुझे कुछ खबर नहीं। यदि दीवालिया कहूँ तो, यह भी ठीक नहीं, कि दूसरों का धन मारकर दीवालिया होता है, तो सो भी नहीं हुआ। यों कह लीजिये कि दीवालिया थी और वही रही।

  मेरे परम पूज्य प्रभुवर ! कुछ यह कहूँ तो शायद ठीक होगा कि अपने के ही नहीं, बल्कि कुल संसार मुझे एक छाया के समान प्रतीत होता है। गौर करूँ तो केवल छाया-मात्र है। भाई, न जाने क्या बात है कि अब तो बंधन और मुक्ति यह दोनों शब्द अपने लिये मुझे अर्थ रहित ही मालूम होते हैं। न जानें क्या हो गया है कि श्रद्धा, विश्वास, प्रेम, भक्ति, शुद्ध, अशुद्ध मेरे लिये सब बेकार के शब्द लगते हैं। यही नहीं, बल्कि जीवन-मृत्यु, पूजा-ध्यान, स्थिरता और शान्ति, साम्यावस्था तक का मानों कोई अर्थ ही नहीं रह गया। बस ये सब कोरे शब्द ही लगते हैं मुझे, किन्तु कोई सार रहस्य या गम्भीरता न जानें क्यों मुझे अनुभव में नहीं आती। कुछ यह हो गया है ‘श्री बाबूजी’ कि अब तो ऐसा लगता है कि शब्द ‘सहज’ या कुदरत से मानों मेरी जान पहिचान हो गई है और जान पहिचान ही क्या बल्कि इनकी गम्भीरता अथवा रहस्य मेरी रहनी ही बन चुका है, किन्तु कुदरत है, हकीकत नहीं। कुछ ऐसी दशा है कि ‘है’ और ‘नहीं’ मेरे लिये सब समान हैं। इति:-

   सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

  सेविका
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-450
लखीमपुर
27/12/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है ताऊजी पहुंच गये होंगे तथा मेरा पत्र व प्रणाम भी श्रीचरणों में पहुंचा होगा। पूज्य मास्टर साहब जी कल मुझे Tube दे गये हैं, यद्यपि मैं ‘आपके’ बताये ध्यान को कर लेती हूँ। इस लिये मुझे अब आवश्यकता मालूम नहीं पड़ती। भाई काशीराम जी ने आसाम से १०-१२ दिन में आ सके तो आने को लिखा है।

    मुझे न जानें क्यों ऐसा लगता है कि मैं अपनी दशा से भी न जाने क्यों बेपरवाह सी रहने लगी हूँ, इसके लिये मैं क्या करूँ, ‘आप’ ही बताइये। आध्यात्मिक, जो कुछ भी दशा है, ‘मालिक’ की कृपा से, सो लिख रही हूँ।

    अब तो भाई मेरा यह हाल है कि मेरे शरीर का कुल कण-कण, कुल Points में यही पाती हूँ कि पूजा, ध्यान से भी धुले पड़े हैं। मेरा तो यह हाल है कि केवल एक ऐसी सांसारिक-एकीभाव में स्थित मनुष्यों में गिनती है कि जिन्हें सिवाय संसार के ईश्वर दुई मालूम पड़ता है। जिनके ख्याल को कभी ईश्वर की ओर मुड़ने की फुर्सत ही नहीं, बस उन्हीं में मेरी गिनती है। ऐसा लगता है कि गुड़ खाकर भी मिठास न लगी, परन्तु मैं तो यह भी कहती हूँ कि जब गुड़ में मिठास न हो तो क्या होवे, खैर, ‘मालिक’ के बन्दे कहलाती रहूँ, यही मेरी मिठास है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ मेरी तो ऐसी दशा है कि जैसे कोई-कोई फूल बहुत सुन्दर होते हैं, किन्तु महक नहीं होती, ऐसी दशा है मेरी। मेरे शरीर की तो यह दशा है, कि कुछ एक अजीब ऐसी दशा कुल शरीर में रम चुकी है कि यदि मैं उँगली को देखूं तो, यही लगता है, मानों जिन्दगी, मौत दोनों से रहित, न अपनी के अर्थ उसमें लगते है, न पराई के। लकड़ी कह लो चाहे उँगली, मुझे कुछ पता नहीं। 

    मेरे ‘श्री बाबूजी’ न जाने क्या बात है कि अपनी जगह बजाय शरीर तक के स्थान पर जैसे एक धुला हुआ वस्त्र होवे। परन्तु सफ़ेदी भी है नहीं, उस वस्त्र में। यही नहीं, न जाने क्या बात है कि दशा को स्वतंत्र कहूँ तो परतंत्र कहूँ तो, मेरी दशा पर जूं नहीं रेंगती। 

    अब तो भाई दशा ही मेरा शरीर कह लीजिये और मेरे शरीर को ही दशा कह लीजिये। ऐसा लगता है कि कोई दशा शरीर बन गया और और शरीर क्या है, केवल एक धुला वस्त्र और वस्त्र भी कहने को ही कह लीजिये। कुछ ऐसा लगता है कि शरीर के आगे पीछे हर Points क्या है, बल्कि केवल एक धुली हुई चादर बिछी है। किन्तु उस बेरंग चादर पर शिकन तक नहीं है, चाहे कुछ कर डालो, परन्तु वह ज्यों की त्यों है। न जाने क्यों ‘श्री बाबूजी’ कभी-कभी ऐसा लगता है कि मानों कोई एक फर्ज़ सा पूरा हो गया, किन्तु वह फर्ज़ क्या है, यह मैं स्वयं नहीं जान पाती। इस हिसाब से जो मैंने अगले पत्र में कभी-कभी कुछ सन्तोष या तसल्ली सी ही कहिये पता लगता है, किन्तु निगाह तो ज्यों की त्यों डटी हुई है। न जाने, जो ‘मालिक’ से कुछ मन में कहती थी, वे भी बातें ‘उन्हीं’ में लय सी होती जाती है। अब दशा सूनी नहीं उजड़ी हुई है। इधर करीब ६-७ दिन से जाने क्यों मुझे साँझ को मन ही मन कुछ डर सा भीतर ही भीतर रहता है, परन्तु फिर रात भर तो नहीं रहता, अंधेरा हो चाहे उजाला हो, यह कुछ बात नहीं है। तसल्ली के बारे में यों कह लीजिये कि कुल शरीर के ज़र्रे जर्रे में तसल्ली है। बस किसी एक कण में, जिसे ख्याल कह लीजिये या चाहे कुछ, उसमें तो नहीं है। अब तो मेरे ‘श्री बाबूजी’ मेरे शरीर को ही चाहे राजयोगी कह लें या कुछ परन्तु मेरा तो पता नहीं चलता कि मैं कहाँ हूँ, क्या हूँ, जीवित हूँ, या मर चुकी हूँ कुछ खबर नहीं मिलती। बस उजड़ी हुई बस्ती, जहाँ कुछ भी चारों ओर नहीं दिखाई पड़ता, बस वहीं डेरा या बसेरा है, सो भी चंद दिनों का, ऐसा ही मुझे लगता है या यों कह लीजिये कि वहीं मेरा पसारा है। ऐसी दशा है कि लगता है कि अपने ही घर में मैं खो गई और ऐसी कि ढूंढ-ढूंढ कर हार चुकी, परन्तु पता न चला। आखिर खोज ही छोड़ दी। हाँ ख्याल कुछ अवश्य वहमी सा साथ रहता है पीछे, किन्तु अब याद नहीं आती।

   अम्मा ‘आपको’ शुभाशीष कहती हैं। इतिः-

     सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

  सेविका
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-451
लखीमपुर
29/12/1954
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा एक पत्र मिला होगा। कल परम पूज्य मास्टर साहब जी ‘आपके’ पास पहुंच रहे हैं, जिससे यहाँ की याद एक बार पुनः ‘आपको’ ताज़ी हो जायेगी। कल भाभी व सरला जिज्जी इलाहाबाद चली जायेंगी। ‘आपको’ प्रणाम कह रही हैं। 

  इधर ‘श्री बाबूजी’ न जाने क्या हो गया है कि मन ही मन न जाने क्या-क्या सैर किया करती हूँ, जाने क्या। रात में, सोने में, स्वप्न में यही दशा रहती है, परन्तु यह देखती हूँ कि मन ही मन जो सैर सी रहती है, उसके पीछे ‘मालिक’ का ख्याल ज़रूर छिपा रहता है, ऐसा मेरा विश्वास है, क्योंकि परसों रात मैंने एक स्वप्न देखा और करीब ३-४ घंटे लगा कि मन से ही ‘आपके’ साथ जाने कहाँ सैर करती फिर रही हूँ और उन बस्तियों या जगहों, जहाँ-जहाँ मेरा ख्याल गया, उजाड़ ही पाया। बड़ी देर तक यह देखा, फिर लगा जैसे मास्टर साहब और ‘आप’ खाट पर बैठे हैं। न जाने कहाँ से मैंने ताज़े-ताज़े बड़े लम्बे-लम्बे पेड़े ‘आपके’ सामने रखे, तो ‘आप’ खूब खाये चले जा रहे हैं, जिसे देख-देख कर मेरा जी बड़ा प्रसन्न है। मास्टर साहब जी ने भी खाया है। ऐसे ही मैं देखती हूँ कि इधर मेरे मन में न जाने कहाँ-कहाँ भटकने का वहम सा बना रहता है, किन्तु न जाने कैसे वह बहका हुआ ख्याल जब इधर (मेरी) की तरफ़ आता है, तब मुझे उपरोक्त एहसास होता है। कल से मेरे मन में शाम को जो भय सा हुआ करता था, सो नहीं है। न जाने क्यों मेरे ‘श्री बाबूजी’ कभी-कभी एक पीड़ा से मैं कराह सी उठती हूँ कि क्या कभी ‘मालिक’ मुझे अपना प्रेम देगा। क्या जी भर कर मैं उससे प्रेम कर सकूंगी। बस यही कराह कभी-कभी क्या, बल्कि अक्सर दिमाग़ में घूम जाती है, वरना तो यह हाल है कि तड़प या कसक ने भी डेरा-डण्डा उठा कर घर खाली कर दिया। पूज्य ‘श्री बाबूजी’ दशा में ख्याल को मैं कैसे चिपकाये रक्खूं। मुझमें हर बात की याद की बहुत कमी है और भूल भी भाग खड़ी हुई। अब मैं जहाँ जाती हूँ, आगे-पीछे सब उजाड़ पथ है। ‘मालिक’ का ही सहारा है, वही पार लगायेंगे। मेरे पास तो अपने डंडे का भी सहारा न रहा। बस आ रही हूँ, बेहोश हूँ, पता नहीं कदम पड़ते हैं या नहीं, उठते हैं या नहीं, ‘मालिक’ सम्भालेंगे, सहारे की, तिनके का सहारे के सदृश कह लीजिये। आज सबेरे पूजा में कुछ अजीब लगा कि पूजा में बैठी थी तो जैसे पानी का भरा गिलास लौटकर झप से पानी जहाँ सीधी माँग खतम होती है, उससे कुछ नीचे तक, हथेली से कुछ ही कम दायरे के बराबर पड़ा तब से मानों वहाँ कोई सुराख सा खुल गया हो। न जाने क्या बात है कि ‘मालिक’ मुझमें अंटता ही नहीं। कोशिश करूँ तो भी अटा नहीं पाती। अंटाती हूँ, तो भी खाली ही रहता है। चाहे कितना भरूँ, परन्तु रहता नहीं, बल्कि कुल ब्रह्मांड कुल सृष्टि तक का ज़र्रा-जर्रा छिन्न-भिन्न, तितर-वितर है। आंखों के आगे तो ‘मालिक’ बैठे एहसास में भी आते हैं, किन्तु सृष्टि में समाये हुए नहीं, क्योंकि अपने में गुंजाइश ही नहीं निकलती। परन्तु फिर भी मेरे बाबूजी मेरा बिछोह कभी होता ही नहीं, यद्यपि संयोग का होश नहीं रहता। यहाँ तक कि न जाने क्या बात है कि यद्यपि वह मुझमें अंटता तो नहीं, किन्तु अपने को छूती हूँ या कोई वस्तु उठाती हूँ तो होश में रहूँ तो हर Touching में केवल उसका ही स्पर्श रहता है। बस मुझमें होश की कमी है।

    अम्मा ‘आपको’ शुभाशीष कहती हैं। इतिः-

    सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

  सेविका
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-452
शाहजहाँपुर
1/1/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, सदा सुखी रहो।

तुम्हारे कई खत पहुंचे। अब मैं ताः 16.12.54 के खत का जवाब दे रहा हूँ। अब मैं तुम्हारे तजुर्बे के लिये शुक्ला जी का Reference देते हुए कुछ लिखता हूँ, ताकि हर बात साफ़ हो जावे। शुक्ला जी प्रेमी जीव हैं, और बहुत शुद्ध-चित्त। लखीमपुर में रहे, दिल और System साफ़ ही रहा और यह चीज़ देखकर मैं उनको नये ढंग की तालीम देने को सोचने लगा और आरम्भ भी कर दी। मगर तजुर्बे ने बतलाया कि मेरी गलती थी। कानून कुदरत है कि हर चीज़ का Anti-dote उसके पास ही मिलेगा। Atom-Bomb का Anti-dote लोग तलाश कर रहें हैं, मगर अभी तक उनकी समझ में न आया। यह Scientist Atom कि जिसको समझने के लिये मैं Master-Piece कहूँगा, उसको फाड़ देते हैं, जिससे तबाही नतीजा होता है। उसका Anti-dote उसके क़रीब है, और उसकी शक्ल छोटे Bracelet की तरह है। अगर उस ताकत का इस्तेमाल किया जाये तो Atom का असर खत्म हो जायेगा। मैं इस Research में बिल्कुल Definite हूँ। कोई Scientist Research करके देखे। जिसने अपने आप को Study कर लिया है, उसके लिये कोई चीज़ ऐसी नहीं रह जाती, जो Study न हो गई हो। Socretes ने लिखा है कि ‘Know Thy Self’ और अपने यहाँ भी यही कहते हैं। योग-मार्ग में हम जहाँ तक हो सकता है, वही चीजें ले लेते हैं, जिस पर कि आखिर में हमको पहुंचना है। और भक्ति मार्ग जिसको आज कल कहते हैं, उसमें वहीं चीज़े लेते हैं कि जिससे हमको हटना और बचना है, इसीलिये वह हटते और दूर ही होते चले जाते। बस यह तो ऐसी बात रही कि जैसे अखाड़े में दो घंटे लड़ आये और कसरत पूरी हो गई। कोई दो घंटे पूजा करता है, कोई इससे ज़्यादा और वह समझ लेते हैं कि हमारी Mental Drill पूरी हो गई और पूजा का इत्मिनान हो गया।

    अब मतलब पर आता हूँ। शुक्ला जी के जिस गुरिया पर मैंने Push दिया था, वह बड़ा अच्छा असर पैदा कर रहा था। मगर ज़माने की गर्दिश और विचारों की परेशानी की वज़ह से उन्होंने उस हिस्से से अपना सम्बन्ध जोड़ दिया, जहाँ कि रोशनी के विरुद्ध अंधेरा था। चुनांचे जैसे Atom का असर उसकी करीब की चीज़ से कायल हो जाता है और अपना रंग ले आता है, उसी तरह से शुक्ला जी बजाय रोशनी के अंधेरा दाखिल करने लगे और दिल एक अंधेरी कोठरी बन गया, जिसने कुल System को Dark कर दिया। यह Darkness मैंने कुछ इलाहाबाद में दूर की और बाकी यहाँ। System की Darkness तो जौनपुर जाने तक मैंने साफ़ कर ली, मगर दिल का अंधेरा जौनपुर में कोशिश करने से न गया। यहाँ भी कोशिश की, मगर बेकार हुई। आखिर कार ईश्वर ने मुझे परेशान देख कर मेरी मदद की और मास्टर साहब को खत लिखते-लिखते मेरा ध्यान उस तरफ़ पहुंच गया। फिर जब मैंने उस चीज़ को रोका है, तब उनको अंधेरे से छुटकारा मिला। अब भी कुछ मकड़ी के जाल की तरह कुछ बाकी है। अब भाई, उसको दूर करना होगा। अंधेरा तो अब नहीं है, मगर पूरी रोशनी अभी नहीं पैदा हुई, यह मेरी बेवकूफी की कहानी है और देखो, इस मकड़ी के जाल को कब तक दूर कर पाऊं। ईश्वर मेरी मदद करे, तुम भी ज़रा दिल की हालत देख लिया करना और जो समझ में आवे, लिख देना।

     यह चीज़ ज्यादातर Faith और मोहब्बत में कमी हो जाने से पैदा हो जाती है। एक बात जो तुमने पूछी है, वह यह थी कि “दिल की हालत क्यों ऐसी हो गई है, जैसे उसकी Life निकल गई हो”। इसका जबाब मैं ऊपर दे चुका हूँ। रोशनी-आध्यात्मिक ज़िन्दगी है, जो सत्य का भान कराती है और अंधेरा रूहानी ज़िन्दगी की मौत। इसके पैदा हो जाने से तमोगुण वृत्ति के जुज़ पैदा हो जाते हैं, फिर ज़िन्दगी कैसी ?

    Super Conscious State के बारे में जो तुमने लिखा है, वह ठीक है और यही है जो Develop नहीं होती। मिसाल के लिये तुम्हारे ताऊजी हैं। इनकी Super Conscious State दिमाग तक की जगी हुई है, मगर उससे काम नहीं लेते। वज़ह यह है कि लगन व चाव, शौक़ नहीं है। जो चीज़ बिना मेहनत के मिल जाती है, उसका यही हाल होता है। बड़े-बड़े लोगों की उम्र गुज़र जाती हैं, और दिल की Super Conscious State भी पूरी तरह से जाग नहीं पाती। मैं चाहूँ तो कुण्डलिनी भी इनकी जग सकती है, मगर वह महज़ उनके खुश करने के लिये होगी कि यह चीज़ उनमें है। जिसका नतीजा यह होगा कि अहंकार बढ़ेगा, मगर उससे फ़ायदा न उठा सकेंगे। यह उसूल पुराना है कि जब गुरू लोग अभ्यासी से खूब मत्था रगड़वा लेते थे, तब कहीं शुरुआत कराते थे। वह सिर्फ़ इसीलिये था कि ताकि पता चल जाय कि कितनी तलब है। ज़माना गिरने पर गुरू लोगों ने इसका Misuse शुरू कर दिया और अपने आराम की खातिर शिष्य को तकलीफ़ देने लगे। सेवा कराना फर्ज समझा और सेवा करना कुफ्र। इसलिये इस चीज़ को रायज रखना किसी तरीके से मुनासिब नहीं, बल्कि गुरू को शिष्य की सेवा करनी चाहिये। यह हमारे लालाजी ने अमली (Practically) तौर पर दिखा दिया। 

    तुमने याद की जो शिकायत लिखी है, यह शिकायत नहीं है, बल्कि बड़ी अच्छी बात है। कबीर ने लिखा है-

    “एक एक का करइ विचार, जहाँ मिलौनी, तहाँ विचार"

    फिर भी तुममें अभी कुछ दुई बाकी है, इसलिये याद की टटोल बाकी है। याद जब अपनी न रहीं, तब दूसरे की याद बढ़ती है और जब दूसरा सामने न रहा तो फिर उसकी याद ही नहीं आती। मैंने “सहज मार्ग के दस उसूलों की शरह” में एक जुमला (Sentence) लिखा है, बिल्कुल ठीक तो इस वक्त याद नहीं, मतलब लिख रहा हूँ कि याद तो ऐसी होनी चाहिये, जो कभी न आवे या दूसरे मानों में याद की भी याद जाती रहे। सूनापन जिस तरह से भी तुम्हें एहसास होता हो, वह उजड़ी बस्ती का एक नमूना और वहीं हमें पहुंचना भी है।

    22 दिसम्बर का खत जो तुमने भेजा है, उसमें कुछ हालतें हैं। उसमें पहली चीज़ सन्तोष है, जो तुममें नहीं आया है और उस वक्त यह आना चाहिये कि जिसके कोई हालतें ही न पैदा हों। तुमने लिखा है कि “पहले भूली हुई सी हालत रहती थी, अब ऐसा प्रतीत नहीं होता” इसके माने ये हैं कि तुम भूली हुई हालत को भी भूल गई हो और यह लय-अवस्था की एक अच्छी हालत है। तुमने इस खत में बड़ी उम्दा बात लिखी है कि बंधन और मुक्ति यह दोनों शायद तुम्हें अपने लिये अर्थ-रहित मालूम होते हैं। यह बड़ा ऊंचा ख्याल है, अगर कोई सोचे तो मुक्ति खुद बन्धन है, इस लिहाज़ से भी कि हम उसमें ख्याली बन्धन डाल देते हैं, और उसमें एक हद पैदा कर लेते हैं, बेहद की गति उसमें नहीं रहती और जिससे यह नुख्स पड़ता है कि हमारे ख्याल से हद नहीं होती और इस वजह से भी हम बेहद की तरफ़ नही बढ़ पाते। दुनियाँ तो मुक्ति के ऊपर मर रही है, बन्धन से छुटकारा मुक्ति है और मुक्ति से छुटकारा असलियत। हमको तो इन दोनों को ही छोड़ना पड़ेगा, तब हम Infinite की तरफ जा सकते हैं और फिर यह भी नहीं। अगर तबियत Infinite का ख्याल मौजूद है तो हममें महदूदियत है और ‘बेहद’ की तरफ़ हम नही बढ़ पाते। अगर कोई हमारे गुरू महाराज की तालीम पर ग़ौर करे तो यह पता लगेगा, किसको? सच्चे जिज्ञासुओं को कि हम शुरू से ही Finite और Infinite को ख्याल में आने ही नहीं देते। कहने को तो भाई हम भी कह देते हैं कि भाई Infinite की तरफ़ जाना है, इसलिये कि और कोई शब्द वहाँ के लिये नहीं मिलता, जहाँ कि हमको जाना है। बाकी इस तारीख के खत में अच्छी लय- अवस्था का ही ज़िक्र है।

     27.12.54 का जो तुमने खत भेजा है, उसके हर ख्याल की व्याख्या हो सकती है या उसकी ज़रूरत नहीं मालूम होती, क्योकि समय का बचाना भी मतलब है। एक बात ज़रूर उसमें बहुत पसंद आई कि जीवन और मरण एक ही सा महसूस होता है। और यह चीज़ कुछ Originality का सबूत दे रही है, उसकी व्याख्या ज़्यादाकर नहीं मिलती है। 29.12.54 का जो खत तुमने भेजा है, उसकी कोई जवाब की ज़रूरत मालूम नहीं होती। यह गिलास का पानी जो चोटी पर गिरा हुआ मालूम हो रहा है और जिसकी वजह से एक सूराख मालूम होता है, इसके माने मुझे यह मालूम होते हैं कि ‘मालिक’ ने अपने खबर भेजने के लिये स्थान कायम कर लिया है। यह चीज़ वहाँ तक पहुंचने पर मुमकिन है कि अपना हाल खोल देवे। अब जो तुम्हारा 'A1' स्थान है, उसकी सैर तो कुछ शुरू है, मगर बहुत रफ़्ता-रफ़्ता। मास्टर साहब के ज़रिये से तुम्हारी तन्दुरुस्ती का हाल तो मिल गया, जो काबिल शुक्र है। अब मैं सैर की तरफ रुजू हूँगा। मेरी भी तन्दुरुस्ती अब अच्छी है, और अच्छे के माने ये है, कि खराब नहीं है। 

  चौबे जी वादा करते हैं कि मेरा प्रणाम अम्मा तक पहुंचा देगें, इसलिये इसमें नहीं लिखा केसर, विमला व उमा के खत आते रहते हैं। जवाब मुश्किल से पहुंच पाता है। तुलसी दास इलाहाबाद पहुंच कर 30.12.54 को देहली चले गये होंगे। कुछ मास्टर साहब कहते हैं, कुछ मेरी तबियत भी चाहती है कि कुछ और किताबी शक्ल में लिख डालूं। मगर सोचता हूँ तो यह मालूम होता है कि जितना मुझे मालूम था, सब लिख दिया। अब विचार उस तरफ दौड़ता ही नहीं और ऐसा लगता है कि Matter Exhaust हो चुका है। अब तुम बताओ, हम क्या लिखें।

    ट्यूब जब तक मिलते जायें, इस्तेमाल करती रहो। दामों की फ़िक्र मत करो। एक किताब जो श्री रामचन्द्र मिशन के ज़रिये से तुम्हारे लिये आई थी, वह भेज रहा हूँ। उसमें मनीआर्डर भी रखा था कि यथा शक्ति जो कुछ हो, भेज दिया जावे। मैंने तुम्हारी तरफ़ से एक रुपया भेज दिया। मैंने चौबेजी को दो रोज़ के लिये रोक लिया है, अब वे मंगलवार को आवेंगे और वे अच्छी तरह से हैं। नारायण सबसे नमस्ते कहते हैं। इति :- 

  शुभचिन्तक 
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-453
लखीमपुर
1/4/1955
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ भाई पुत्ती बाबू द्वारा मिला तथा किताब भी मिली। पत्र पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। आज ताऊजी भी तीन बजे आ गये। उनसे ‘आपके’ स्वास्थ्य एवं तमाम बातें सुनकर बड़ा हर्ष हुआ। एक Tonic शीशी जो ‘आपने’ भेजी, सो मिली और पुती बाबू से चुकन्दर भी मिले। मैं तो इस कोशिश में हूँ कि बसन्त में आने तक इतनी तन्दुरुस्त हो जाऊं कि ‘आप’ देखकर खुश हो जावें। भाई शुक्लाजी की हालत पढ़कर तो वाकई बड़ी चिन्ता थी, किन्तु यह केवल ‘आपकी’ ही पकड़ का नतीजा हुआ कि ‘आपने’ कोई न कोई उपाय निकाल ही लिया। यदि उन्हें भी इतनी फ़िक्र अपनी ही होती तो यह हाल ही न होने पाता, खैर। 

  अब तो मेरे 'श्री बाबूजी' मुझे लगता है, सैर की चाल में कुछ तेजी तो आई है परन्तु बागडोर खिंची हुई है, परन्तु यह भी जहाँ तक मेरा ख्याल है, यदि यह बागडोर न हो तो अभ्यासी को थकान बहुत जल्दी-जल्दी आये। मुझे तो यही अच्छा लगता है कि “गले राम की जेवरी, जित खींचे तित जाऊँ”। मेरी तो दशा कुछ ऐसी है कि जैसे बुझते दीपक में कभी-कभी ज्योति जाग उठती है, उसी प्रकार याद अथवा प्रेम के लिये दूसरे में प्रेम देखकर लौ कुछ जाग उठती है, किन्तु तेल समाप्त है। दीपक कब तक चलेगा। तबियत का तो यह हाल है ‘श्री बाबूजी’ कि न जाने क्यों उसे एक अथवा ऐक्य का भी होश नहीं और हो भी कैसे, जबकि मेरी दशा के लिये तो वह भी अर्थहीन ही प्रतीत होता है। अब तो जहाँ जाती हूँ, सब उजाड़ स्थान है, बीहड़ मैदान है किन्तु बेहोश ऐसी हूँ कि कदम कहीं पड़ते हैं या नहीं; उठते हैं या नहीं; कुछ पता नहीं। न जाने क्या बात है, मैं बेहोश हूँ, यह मुझे खबर नहीं, इस लिये पता तो यही लगता है कि बेहोशी होती तो ज़रूर पता लगता। अब ‘मालिक’ ही जानें। यों कह लीजिये कि एक लावारिस मुर्दा पड़ा है उजाड़, निर्जन मैदान में, तबियत जब घूमती है या लौटती है, तो यही पाती हूँ। यही नहीं, बल्कि अब तो हर चीज़ जड़-चेतन, सब मेरे लिये कारण-रहित मुर्दा ही हैं। जब cause ही नहीं है, तो सब अर्थ-हीन, बेमतलब है। मेरे ‘श्री बाबूजी’ यही हाल याद का है, कि इसका (यानी याद का) नाम मुझे अब नहीं आता, क्योंकि हाल तो यह है कि मुर्दा (मेरे लिये) के लिये किसी का कुछ अर्थ नहीं, बेमतलब है। जैसे पहले मैंने लिखा था कि कोई ‘मालिक’ का नाम ले देता है तो कलेजा पकड़ कर रह जाती हूँ, परन्तु अब कुछ नहीं। अब तो यह हाल है कि लाश पर चाहे ढेले फेंको या फूल चढ़ाओ, मेरे लिये किसी का कुछ अर्थ नहीं। स्वयं मेरा ही, न कुछ अर्थ है, न मतलब। न जाने क्या है, बस केवल चारों ओर उजाड़ खण्ड है, सूना बसेरा है।

   मेरे ‘श्री बाबूजी’ आपने मुझसे मज़मून लिखने के लिए पूछा है, किन्तु मैं क्या बताऊं, मेरे तो कुछ ज्ञान ही नहीं। मुझे तो जब जितना ‘आप’ बता देते हैं, उतना ही मैं जान पाती हूँ। बस और भला मैं क्या जानूं। इसलिये क्षमा कीजियेगा श्री बाबूजी’ ‘आप’ तो जो कुछ भी लिखेंगे, वह संसार के कल्याणार्थ ही होगा।

    सच तो यह है ‘श्री बाबूजी’ कि अर्थ, मतलब-रहित दशा है, इसलिये मुर्दा कह लिया, वरन् न जाने क्या है, ‘मालिक’ ही जानें।

    अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद तथा मास्टर साहब जी को भी शुभाशीष कहती हैं। मास्टर साहब जी से मेरा भी नमस्ते कहियेगा। इति :-

  सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

  सेविका
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-454
लखीमपुर
9/1/1955
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय ‘श्री बाबूजी’, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा एक पत्र मिला होगा। पूज्य ‘मास्टर साहब’ से ‘आपके’ पेट दर्द कुछ बढ़ जाने का हाल मिला, अब उत्सव के ज़माने में तो ‘आपको’ कदापि अधिक तकलीफ़ नहीं हो सकती। मैं भी आजकल बहुत अच्छी हूँ। हम सब तथा पूज्य मास्टर साहब वग़ैरह तो ता.25 को रात में 11 बजे वहाँ पहुंच ही जायेंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आध्यात्मिक दशा है सो लिख रही हूँ। 

    मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब मैं एक अजीब अर्थ-हीन बेमतलब हूँ। न जाने क्या हो गया कि जाने कब मेरी Soul भी मुझमें से निकल गई। निर्जन वन में पड़े-पड़े मुर्दा भी जाने बिला गया, जाने कहाँ लोप हो गया। मुझे तो अब वह भी नहीं दिखाई पड़ता है। मुझे अब जाने क्या हो गया है कि दशा को ब्रह्म-गति भी कहते अच्छा नहीं लगता, क्योंकि यह कहने में न जाने क्यों मुझे कुछ भीतर ही भीतर हल्की बेचैनी सी लगने लगती है। बिल्कुल यही हाल Soul का है, कि Soul कहूँ तो न जाने क्यों अन्तर में कुछ अजीब घबराहट सी लगने लगती है। लेकिन मेरे ‘श्री बाबूजी’ बिना आत्मा के भी शरीर तो शायद जीवित है, ‘आप’ ही जानें। भाई, मुझे तो अब कुछ भी नहीं मालूम, न मेरे में बुद्धि है, न वाणी, न आँख, न कान, फिर मैं क्या कहूँ। किन्तु जाने कैसे लेख तो लिख गया, परन्तु फिर भी मुझे कुछ ऐसा याद पड़ता है, कि लेख लिखने वक्त भी मुझमें कुछ न था, जबकि शायद मैं ही न होऊं। क्या हुआ, कैसे हुआ, कुछ समझ में नहीं आया, खैर ‘मालिक’ जाने। मैं क्या, जब आत्मा ने ही शरीर छोड़ दिया और कुछ यह है ‘श्री बाबूजी’ कि मुझमें ही नहीं बल्कि सब कुछ मुझे अपने ही जैसा Soul रहित, अर्थ-हीन, बेमतलब, बिना कारण के ही लगता है और यदि लगता है को निकाल दीजिये तब शायद ठीक दशा आवे यह एक बात अगर किसी से कहूँ तो सब हंसेंगे कि न जाने क्यों मुझे स्वयं अपने से डर लगा करता है। पीठ को तो बाबूजी जाने क्या कीड़े से लगे हैं, जो सब चुन-चुनाकर एक ढाँचा मात्र है जिसमें केवल पसलिये और रीढ़ की जगह पर एक हड्डी सीधी सतर कह लीजिये, बस रह गई है। अपना मुर्दा यदि कहूँ दशा को तो वह मुर्दा भी अपरिचित सा लगता है। जाने किसका है, क्योंकि जब आत्मा नहीं तो, वह किसका? मुर्दा भी जाने है या नहीं। होगा कोई, मुझे क्या, जो निर्जन विदेश में मर कर चला गया। यदि उसे Touch करती हूँ, यानी शरीर के मुर्दे को, तो चाहे नोच डालू, परन्तु Touching की अनुभूति नहीं, जाने कपड़ा है, जाने मुर्दा है। किन्तु दशा यह है कि या तो मुर्दा भी मर गया या उदासीन हो गया। अब ठीक तो ‘श्री बाबूजी’ ‘आप’ ही बताइये। मेरा तो यह हाल है कि न कभी ईश्वर की खोज की, न कभी आशा है, किन्तु ऐसा लिखने में भी मेरी दम सी एकदम घुटने लगती है। मैं तो उदासीन सी हो गई हूँ। ऐसी ही दशा सी कुछ रहती है। न जाने क्या ‘श्री बाबूजी’ अबकी से तो जहाँ ध्यान आया कि उत्सव में जाऊंगी, ‘आपके’ पास जाऊंगी, तो इतना विचार आते ही इतना जी घबड़ाता है कि एक पल भी नहीं टिका सकती इस ख्याल को। यद्यपि मैं इसमें प्रसन्नता भी नहीं आने देती। किन्तु वैसे वहाँ आने के लिये चाहे तैयारी भले करते रहो, तो कुछ नहीं होता। यही नहीं, वैसे चाहे विचारों के सागर में डूबी रहूँ, परन्तु अपने मन से कोई विचार नहीं कर सकती। जैसे हो वैसे ही रहो तो कोई परेशानी नहीं। यह सब क्या हालत है ‘श्री बाबूजी’ मुझे तो सिवाय ‘आपके’ कुछ नहीं सूझता। ‘आप’ जैसे चाहें, वैसे रखें। मैंने तो ‘आपका’ दामन पकड़ लिया है, सो तो अब छुटाने से भी नहीं छूटता, चाहे स्वयं ‘आप’ ही क्यों न छुटायें, परन्तु होश तो मुझे दामन का है न ‘मालिक’ का, बस केवल विश्वास ही है मेरा ऐसा।

     अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। इति :-

    सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

   सेविका
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-455
लखीमपुर
14/1/1955
मेरे परम पूज्य श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा-पत्र ‘आपका’ अबकी बार शायद Busy होने के कारण बहुत दिनों से नहीं आया। मेरा पत्र शायद मिला होगा। आज तो उत्सव के केवल दो हफ़्ते ही शेष रह गये हैं। ‘मालिक’ की कृपा से अब जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

    मेरे ‘श्री बाबूजी’ अब तो ऐसा लगता है कि उजाड़ अवस्था नहीं, बल्कि स्वयं मेरा स्वरूप ही निर्जन उजाड़ शून्य हो गया है। उदासीन रूप हूँ। कोई चीज़ जो देखती हूँ और गाना ही सीखती हूँ तो कुछ ही देर बाद यदि उसे याद करूँ तो लगता है मानों स्वप्न को याद कर रही हूँ और जहाँ उसे छोड़ा तो फिर सब समाप्त। वैसे देखती हूँ कि दिमाग़ विचारों से हर समय लीन रहता है, जो मेरी समझ के परे हैं कि कैसे हैं, कहाँ हैं। परन्तु यह भी देखती हूँ, मेरे परम पूज्य महात्मन् कि उधर विचार हैं और इधर स्वयं उदास-रूप मैं। यदि ये दोनों एक साथ न रहें, तो सम्भव है Practical शब्द उड़ जाये मेरे लिये। मुझे ऐसा लगता है कि एक उदास, उजाड़, कुल दशा की दशा मानों मुझमें, मेरे स्वरूप में समाती, सोखती चली जाती है। किन्तु उसे यदि उदास का सहज रूप कहिये, तो ही ठीक है, क्योंकि मैं देखती हूँ कि मैं भी एक न जाने क्या बिल्कुल सहज सी हो गई हूँ। जो मुझे केवल अब शून्यता का ही आभास कराती है और ऐसा ही कुल की कुल दशा मेरे में समाती आ रही है, जिसका छोर नहीं है। न जाने यह क्या बात है मेरे ‘श्री बाबूजी’ कि यदि अपनी ओर भी निगाह जाती है तो केवल एक सहज- साम्य अवस्था सी धारा के और कुछ नहीं अनुभव होता। मुझमें ही क्या बल्कि हर समय हर जगह, बस एक ही साम्य- धारा, उसे चाहे गतिहीन कहिये या कुछ बहुत ही धीमे-धीमे से बहती कह लीजिए, अनुभव होती है। किन्तु यह दशा तो शायद निगाह में फैल कर पग चुकी है, किन्तु हृदय या मैं तो केवल उदास या शून्य ही पड़ा है। उसमें यही शून्यता ही या उदासी सिमटती चली आ रही है। यही नहीं मेरे परम पूज्य प्रभुवर ! हर समय, हर चीज़ अपने भीतर-बाहर सब उदास हैं या शून्य हैं। स्वयं मेरा रूप क्या है ? बस शून्य, इतना ही हवाला दे सकती हूँ। एक कुछ भाई, उसे अपनी दशा में कहूँ या अपना मैदान कहूँ, कुछ समझ में नहीं आता कि मुझे बस एक मैदान से में ऐसा ::: दिखलाई पड़ता है। यह क्या है ‘श्री बाबूजी’ मेरी समझ में नहीं आता है। मैं तो उदासी में भिदकर अब वहीं हूँ। मेरा हर कण-कण, बल्कि समस्त ब्रह्माण्ड का कण-कण शून्य रूप है, और शून्य क्या है, नहीं मालूम। अब कुछ यह भी है कि ‘श्री बाबूजी’ क्या हैं, कौन हैं, कुछ जैसे पता ही नहीं। यदि शाहजहाँपुर में हैं, तो देखती हूँ हर कण-कण में उनका ही प्रकाश पाती हूँ। अब मैं क्या कहूँ, मेरी कुछ समझ में नहीं आता, क्योंकि मुझे तो जैसे कुछ याद नहीं है, ऐसी ही दशा है और तिस पर भी यह भी कहने की हक़दार नहीं कि याद नहीं, क्योंकि याद को भी याद करती हूँ तो भी बेयाद ही रहती हूँ। सच तो यह है कि कस्तूरी के तो ख्याल का भंडा फूट गया, दशा की भी कलई खुलने लगी, अब ‘मालिक’ ही जानें। मैं शून्य या उदास जो कुछ भी कहती हूँ, यह मेरी दशा का वहम है। इति :-

     सदैव केवल ‘आपकी’ ही कृपाकांक्षिणी

   सेविका
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-456
शाहजहाँपुर
15/1/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारे दो पत्र दिनांक 4.1.55 और दूसरा 9.1.55 का मिला। काशी राम मय अपनी धर्मपत्नी के 9.1.55 को उत्सव में सम्मिलित होने के लिये आ गये। काशीराम की हालत बहुत अच्छी पाई, देखकर जी खुश हो गया। उनकी धर्मपत्नी भी ब्रह्म-विद्या सीखने की इच्छुक हैं। मैंने एक अभ्यास आसाम में उनको करने के लिये लिख दिया था, जिसको वह बराबर कर रहीं हैं। अब वह बाकायदा सीखना चाहती हैं। मैंने उनसे कहला दिया कि 26.1.55 को कस्तूरी यहीं होंगी, वह तुमको बतलायेगीं। काशीराम ने इस मिशन का प्रचार आसाम में बहुत अच्छा किया है। चीनीज़ और बर्मीज़ भी सीखना चाहते हैं. मगर उनका यहाँ आना कठिन है।

     बागडोर तुम्हारी, वाकई मेरे हाथ में है, जो बहुत ज़्यादा तरक्की कर चुके हैं, उनकी बागडोर हाथ में रखना ही होता है। वजह यह है कि कहीं किसी चमत्कार में ऐसे मस्त न हो जायें कि बस उसी में जमे रहें। हमारे गुरू महाराज की कुछ ऐसी तालीम है कि अगर हज़ारों आदमी भी ऊंची तरक्की करने वाले हों, तो भी Automatically उनकी बागडोर मेरे हाथ में रहेगी। इससे बड़े फ़ायदे हैं, एक तो यह कि मुझे उनके हालत की जब ज़रूरत होती है, तो मिनट मिनट पर खबर रहती है। दूसरे, चलने की रफ़्तार सहज तरीके में, जितनी ज़रूरत है, उतनी ही रहती है और इस बागडोर से उनको अपने आप चलने की ताकत भी मिलती रहती है। यह भी तुम्हारा लिखना किसी हद तक ठीक है, कि थकान भी आ सकती है। मगर एक बात पर तुमने ग़ौर नहीं किया, जो इस बागडोर का नतीजा है और उससे हमारे गुरू महाराज की बड़ाई व महानता टपकती है। वह यह कि चलते हुए अभ्यासी को कितना Soothing प्रतीत होता है और जी नहीं घबराता। इसकी अनुभूति उन अभ्यासियों को हो सकती है, जो अपनी उस हालत में चिपके रहते हैं, जो ईश्वर उन्हें देता है। 

    तुमने इस पत्र में बेहोशी का रहना लिखा है। मैं बहुत पहले किसी पत्र में लिख चुका हूँ कि तुममें बेहोशी रहती है, मगर तुम उस वक्त एहसास न कर सकीं, मगर अब कर रही हो। असल में बेहोशी क्या है ? यह आत्मा की एक रंगत है, जिसका एहसास उस वक्त होता है जब दुनिया हमारे ध्यान से विदा हो जाती है। यह रंगत बढ़ती ही जाती है उस वक्त तक, जब तक कि हम ईश्वर में अपने आपको बिल्कुल लय नहीं कर देते। ऐसा हो जाने पर फिर तो हमारे पास वही हवा रहती है, जिसमें हमने अब ठिकाना लिया है, अर्थात् बेहोशी के भी होश जाते रहते हैं। मैं अपनी कहानी सुनाता हूँ और यह एक अजीब कहानी है। कहने के लिये मैं अपनी हालत भी बिल्कुल बेहोशी की कह सकता हूँ और है कुछ ऐसा ही, मगर उसका एहसास मुझे उस वक्त हुआ, जब कि मैं किसी से बातें कर रहा हूँ और बातों में यह ख्याल आ जावे कि हम दूसरे से कुछ कह रहे हैं। यह भी हुआ है कि Super Conscious State मुझे समझाने के लिये, या किसी के जवाब देने के लिये उस हद को लेना पड़ा हो, जहाँ कि बेहोशी की हालत है। असल में बिटिया ! यह बात हो जाती है कि बेहोश होते हुए भी हमको होश बाकी रहता है। बात यही है, सम्भव है, आमतौर पर लोग इसको न समझ सकें, इसलिये कि उन बेचारों की पहुंच इस हद तक नहीं है।

   जब अभ्यासी अपनी हालत में लीन रहता है, और शौक़ और दिलचस्पी उन्नति करती रहती है, तो जो उसकी हालत होती है, वही दुनियाँ में छाई हुई मालूम होती है। कारण यह है कि निगाह बदल जाती है। बस यही तुम्हारा हाल है कि हर जगह मुर्दनी छाई हुई देखती हो और मुर्दा के लिये तो एक मुर्दा ही है, इसलिये कि उसका अब किसी से लगाव ही नहीं और भाई, लगाव छूट जाने पर ही यह हालत नसीब होती है।

    अब मैं 9.1.55 के खत का जवाब दे रहा हूँ। जवाब देने से पहले 13.1.55 को जो मैंने ख्वाब देखा है, उसको लिख रहा हूँ। देखा यह है कि तुम मय अपनी बहनों और अम्मा के अपने घर मौजूद हो और मैं तुम्हारे स्थान 'A1' पर तवज्जोह दे रहा हूँ। उस दिन मैं कई बार इस स्थान पर तवज्जोह दे चुका था। अब मतलब पर आता हूँ। तुमने एक हालत इतनी अच्छी लिखी है, कि मुझे इतनी खुशी होती है कि शायद जब मैं इस हालत पर था तो मुझे इतनी खुशी नहीं हुई होगी। वह यह कि मुर्दा हालत की भी मौत हो गई। यह मेरी क़िस्मत है कि मुझे एक अभ्यासी से ऐसी हालत की खबर मिली। यह तो बड़ी ही अच्छी हालत है और इस हालत को लय-अवस्था का भी लय-अवस्था होना कहते हैं। इसके बाद शुरुआत बक़ा की हो चुकी है, अर्थात् जिसकी कि हालत शुरू हो गई है, इस बक़ा का नाम ‘लालाजी’ ने तुरिया दिया है। तुरिया-अवस्था लोग बहुत चाहते हैं, मगर भाई, तुरिया की भी कई क़िस्में हैं। तुममें तुरिया-अवस्था पहले से मौजूद है। मगर अब यह तुरिया जो आवेगी, वह इससे ज़्यादा निखरी हुई होगी। जब अभ्यासी में लय- अवस्था ज़्यादा बढ़ जाती है तो ईश्वर के ख्याल करने से घबराहट मालूम होती है, इसलिये कि उतनी देर के लिये उनसे अलग हो जाते हैं, जो तबियत को बर्दाश्त नहीं होता। इसी वज़ह से मैंने तुमको कहा था कि अब तुम्हें पूजा व ध्यान करने की ज़रूरत नहीं। यह भी वजह है कि उत्सव में आने का जब ख्याल पैदा होता है, तो भी तबियत घबराने लगती है, क्योंकि ऐसे ख्याल से दुई पैदा होती है और तुम एक में रमी हुई हो। इस खत में बहुत सी बातें जवाब देने योग्य हैं, परन्तु जो भी कुछ लिख दिया है, यह भी काफ़ी है। तुमने यह भी लिखा है कि “मुझे स्वयं अपने से डर लगता है” यह इतनी अच्छी हालत है कि समझाने के लिये शब्द नहीं मिलते। यह एक ऐसा भेद है कि जिसको खोलने का जी भी नहीं चाहता और वास्तव में यह ईश्वर का भेद है।

    अब तो तुम सब लोग आ ही रही हो, बड़ी प्रसन्नता की बात है। केसर, विमला एवं उमा के दो दिन हुए खत आये। अगर हो सका तो कुछ उनको भी लिख दूंगा। अम्मा और चौबेजी को प्रणाम और अब की चौबेजी ज़्यादा अच्छे मिले होंगे। 

  शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-457
शाहजहाँपुर
2/2/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम सब दूसरी तारीख को अपने घर के लिये रवाना हुए। मुझे हरी से 12.30 बजे दिन को पता मिल गया था कि तुम सब बस-स्टेशन पर पहुंच गये हो और 2.30 बजे की गाड़ी से जा रहे हो। मैंने चाहा कि स्टेशन पहुंचूं और तबियत ने भी मजबूर किया, मगर कुछ यह हाल था कि घंटे भर के लिये इज़ाज़त लेनी पड़ेगी और कुछ यह भी कि जब हम स्टेशन से वापिस आयेंगे तो, तुम्हें विदाई की फिर तकलीफ़ होगी। यह बातें सोच-समझ कर मैं स्टेशन नहीं पहुंचा। हालांकि बस स्टेशन कचहरी से करीब है, मगर इतना ज़रूर किया कि तुम्हें घर तक पहुंचा दिया और तीसरी फरवरी को करीब एक बजे दिन को वापिस हो आया। रास्ते में तुम्हें सफ़र की तकलीफ़, कम मालूम हुई होगी। यह यूं कि मरीज़ को तीमारदार की ज़रूरत पड़ती है और चौबे जी कुछ तुम्हारे पेट में सूजन का आना बता चुके थे। मोम की रोटी तुम बाँधती रहना, यह मुफ़ीद मालूम होती है। मुझे भी फ़ायदा किया और तुमने भी फ़ायदा एक ही रात में इसका अच्छा बताया अच्छी तो तुम हो। इसके बाद सूजन की तकलीफ़ ईश्वर करे फिर न पैदा हो। डाक्टरनी ने तुम्हें कुछ दवा बतलाई है, उसे खाना और तन्दुरुस्ती के बारे में जो ध्यान बतायें हैं, उनको तो तुम कर ही रही हो। उनसे बड़ा फ़ायदा होगा।

     तुम ईश्वर की कृपा से B1 स्थान पर आ ही गई, मगर B1 पर मुझे कुछ तेजी मालूम हो रही है। उसकी वजह यह है, मैं तुम्हें बताये देता हूँ, इसलिये कि तुम खुद दूसरों को सिखाती हो। जब A1 स्थान पर से तुम्हारे हटने का जी नहीं चाहता था, तो मैंने A1 पर Vibration पैदा किया था और मय उस Vibration को अगर मुनासिब समझा और उससे ज़्यादा फ़ायदे की उम्मीद पाई तो B1 पर Absorb कर दूंगा और फिर सैर की हालत ले आऊंगा। अब मैंने सोच लिया, मैं Vibration को उसमें Absorb करूँगा और फिर सैर की हालत पैदा करूँगा और इतना मैं ज़रूर रखूंगा B1 पर कि उसके आगे मुकाम तक भी वह चीज़ जाये। ऐसा करने से फिर यह चीज़ पैदा नहीं होगी कि तुम्हारा किसी मुकाम से निकलने का जी न चाहे। इसलिए कि जब वह चीज़ साथ होगी तो ठहराव का सवाल पैदा नहीं होगा। इसलिये कि जहाँ पर सूक्ष्म-रूप में हरकत मौजूद है तो ठहराव की शक्ल पैदा नहीं हो सकती, इसलिये कि हरकत और ठहराव यह दोनों opposite चीजें हैं। जहाँ हरकत होगी, वहाँ ठहराव नहीं हो सकता; और वह हरकत भी इतनी सूक्ष्म मैं कर दूंगा कि सिर्फ़ उसका असर ही असर रह जाये। फिर आगे चलकर अगर ज़रूरत हुई तो फिर जो कुछ समझूंगा वह करूँगा। खैर, यह बात तो वहाँ की है, जहाँ पर कि उसकी जरूरत होगी। थोड़ा इन्तज़ार में यह ज़रूर करूंगा कि तुम्हारा पेट ठीक हो जाय और वह ज़रूर ठीक होगा और एक हफ़्ते में ही तुम्हारी तन्दुरुस्ती की हालत ठीक आ ही जानी चाहिये।

   मैंने लखनौर की बाबत तुमसे, मास्टर साहब और चौबेजी से बहुत सी बातें कहीं, उसमें से एक बात बहुत ऊंची की है, जिसका मुझे कल ख्याल आया। वह यह है कि एक शख्स को अब यह ठीक याद नहीं आता कि किसको, मगर शायद पण्डित हरी सरन जो उनके सत्संगी हैं, उनको यह बतलाया है कि तुमको इसी जन्म में मोक्ष मिल जावेगी और यह बात मुझसे कल उस शख्स ने कही, हालांकि जिस शख्स के बारे में इस जन्म में मोक्ष हो जाना कहा है, उसके character की उन्होंने मुझसे बहुत बुराई की है।

     शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-458
लखीमपुर
4/2/1955
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

‘आप’ का पत्र मिला। समाचार पढ़कर खुशी हुई। न जाने क्या बात है कि जब शाहजहाँपुर से चली, तो विरह की आग का ठिकाना न था और यहाँ पहुंचते-पहुंचते वह सब रह गया केवल एक धूमिल चित्र छाया की भाँति। सब कुछ एक वहम सा हो गया कि शाहजहाँपुर गई, उत्सव में सम्मिलित रही और फिर यहाँ चली आई। न जाने क्या बात है कि परसों जब शाहजहाँपुर से आई, तो यह हाल था कि यदि कोई दूसरा होता तो आत्म-हत्या पर उतारू हो जाता और आज यह हाल है कि मानों यह तक याद नहीं कि मैं कहाँ गई थी। मैं तो लगता है, न कहीं गई थी, न आई हूँ, जहाँ की तहाँ हूँ, जैसी हूँ वैसी हूँ। उत्सव हो गया, पता नहीं। बस अन्तर इतना है कि तब जाने की तैयारी करती थी और अब नहीं। केवल उत्सव में सम्मिलित होने का धूमिल वहम सा है और जिन्हें वहाँ देखा था, यह सब एक स्वप्न सदृश था। अब आजकल की जो आत्मिक दशा है, वह लिख रही हूँ।

    भाई, कुछ ऐसा लगता है कि कुल सिर में, सिर से लेकर पीठ में रीढ़ के बिल्कुल निचले सिरे तक एकदम से लगता है कि धुएँ की तरह से कुछ छा गया है, परन्तु वह इतनी हल्की हालत है, जिसे expression के लिये धुआँ कह लिया है। भाई, कुछ ऐसा लगता है कि दिमाग में (सिर में) एक प्रशान्त सा कोहरा पड़ा करता है। मैं देखती हूँ कि मेरा स्वरूप तो ऐसा प्रशान्त सागर हो गया है, जिसमें बुलबुले तक नहीं उठते। कुछ यह देखती हूँ कि ‘मालिक’ की कृपा-बागडोर मुझे सहज चेतना प्रदान किया करती है और इस सहज चेतना का ही दिल को दर्द कह लीजिये या कुछ नहीं तो मैं न जाने कहाँ अचल, स्थिर बनी हूँ। वही मुझे होश दिला-दिला कर दशा का भान कराती है। उसमें समाती है, भरती है और पचा देती है। नहीं तो मेरा अणु-अणु गतिहीन है। मेरा ही क्या, बल्कि, समस्त जगत ही मुझे गतिहीन, स्थिर, मानों मेरी दशा में ही मिला रहता है। न जाने तबियत क्यों बेख्याल बनी रहती है।

    मेरे ‘श्री बाबूजी’ आप ने मुझे B1 पर खींच दिया, इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। कुछ ऐसी दशा है कि होश का तो केवल एक वहम सा रहता है और बेहोश हूँ नहीं। कुछ यह देखती हूँ कि Present दशा ही मेरा रूप हो जाता है। वर्तमान दशा ही स्वयं अपना रूप अनुभव में आता है, नहीं तो कुछ नहीं है। एक कुछ यह हाल है कि मैं ध्यान कहाँ लगाऊं, जबकि कुल ब्रह्माण्ड में मेरा ही Heart फैला हुआ है। मेरी वर्त्तमान दशा ही मेरा Heart होता है ध्यान के लिये। यही मेरी सहज सी स्थिति हो गई है। अजीब सहज दशा है, क्या लिखू ‘श्री बाबूजी’। कुछ यह हो गया है कि ‘मालिक’ के सामने रहते हुए भी मुझे पहिचान नहीं रह गई है। इधर हिम्मत काफ़ी बढ़ी हुई पाती हूँ और दशा तो आईना रखी हुई है। कुछ ऐसा लगता है कि बेहोशी मेरा रूप है और वर्तमान दशा की Feeling मेरा होश है। यही नहीं, बल्कि, भीतर-बाहर सब एक बेहोश हालत फैली हुई है, किन्तु मैं यह नहीं जानती कि किस Point पर चेतना भी अवश्य है, जो मुझे आगे पथ पर बतलाती है यांनी सर्वत्र बेहोशी का साम्राज्य होते हुए भी होश ज़रूर बाकी है।  अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। इति :-

    आपकी दीन-हीन, सर्वसाधन विहीना
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-459
लखीमपुर
8/2/1955
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

भाई, अब देखती हूँ, हिम्मत के साथ-साथ एक ऐसी हालत पैदा हो गई है, जो अन्दर ही अन्दर मानों पच रही है। वह इतने Level पर है कि यदि ज़रा भी ऊपर आ जावे तो सम्भव है कि आत्म-हत्या पर उतारू हो जाऊं। न तो भाई, उसे तड़प कहते हैं, न वह कसक है। वह तो जाने मेरा हृदय ही यह कोई दशा बन गया है। अब इसी दशा में ही मानों मैं पग रही हूँ। भाई, कुछ ऐसा लगता है कि सिर से पैर तक समस्त जगत बस केवल एक आँख ही आँख बन गया है। नहीं, बल्कि रोशनी ही रोशनी बन गई है, जिससे आँख की आवश्यकता ही नहीं रह गई। कुछ यह दशा है कि आँखे बन्द करने पर भी, बन्द का, सोते-जागते कभी एहसास ही नहीं होता। न जाने क्यों लगता है कि मेरा रूप आईना बन गया है, परन्तु कैसा, यह तो मैं स्वयं समझ नहीं पाई हूँ। ‘आप’ ही बताइये, कि यह क्या है ? दशा इतनी soft है कि जो कहने में नहीं आती। अब तो भाई, न जाने क्या, मानों ऐसा रहस्य खुल गया है कि अब तो हर चीज एक ऐसी रोशनी बन गई है कि जिसमें रोशनी की गुज़र नहीं, किन्तु रोशनी निकलती रहती है। स्वयं अपना रूप भी ऐसी ही रोशनी बनकर सब में एक हो गया है। हाल यह हो गया है कि अंधेरे में भी अंधेरा का एहसास नहीं होता और प्रकाश भी नहीं मालूम। कुछ ऐसी बेचारी या Soft दशा है कि ‘मालिक’ के चरणों की ऐसी अदना भिखारिणी कि जिसमें ‘कुछ’ का use करने से दशा में धब्बा सा लगा देता है और ‘नहीं’ कहने में भी कुछ भद्दापन लगा देना है। वह तो भाई, इन सब से परे जैसी है, वैसी है और देखती हूँ, वैसी ही रोशनी उसमें से आती रहती है। यह रोशनी, ऐसी नम्र बेहोशी कह लीजिये, जिसमें बेहोशी का भी होश नहीं है। बस मेरा अन्तर-बाहर, सब में ऐसी ही दशा व्याप्त है और यही मेरा रूप है। देखती हूँ कि छोटे से Heart में कुल दशा सिमटती आ रही है, कुछ ऐसा लगता है भाई, कि बूंद में सिन्धु सिमटता जा रहा है परन्तु बूंद ज्यों की त्यों बनी हुई है। उसे होश कहाँ, वह ऐसी नम्र बेहोशी में लय है कि वह एक अदना से अदना भिखारिणी की हालत-मय हो गई है। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इतिः-

   आपकी दीन-हीन, सर्वसाधन विहीना
   पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-460
शाहजहाँपुर
5/2/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे दो पत्र एक 4 फरवरी 55 का और एक 8 फरवरी 55 के मिले। हालतें इतनी बारीक हैं, कि इनका जवाब देना मुश्किल है। फिर भी कुछ न कुछ लिखता हूँ। असल हालत यों तुम्हारी है, उसका अगर ठीक तौर से कोई लिखना चाहे तो शब्द नहीं मिलेंगे। जो change की हालत असल हालत की वजह से होती है, उसको तुम बहुत अच्छा लिखती हो। तुम्हारी असल हालत जो है, वह जहाँ तक मेरी reading है, वह यह है कि जैसे कोई मनुष्य न सोता हो, न जागता हो, यानी सोने और जागने के बीच की हालत जो होती है, वह है। Point B1 जो मुझे इस वक्त एहसास हो रहा है, उसमें काफ़ी ज़ोर हैं और वह इस वजह से है कि मैंने A1 काफी Vibrate किया था और मैंने B1 में डाल दिया था। इसकी वजह है कि ऐसा मैंने क्यों किया पिछले खत में लिख दी है। इस ज़ोर को काफ़ी सोच समझकर और देखभाल कर...। अब चौथी फरवरी में जो लिखा कि सहज-चेतना सो अन्दर रहती है, हमारे यहाँ दो हालतें साथ-साथ चलती हैं। एक तो वह हालत, जो बिल्कुल असल है और दूसरी वह जो असल की वज़ह से हो। असल की वज़ह से जो हालत होती है, वह यह बताती रहती है कि यह change है मन की हालत का। यानी मन उसकी वजह से तरक्की करता है, उन्नति के माने ही यही है कि नीचे से ऊंची हालत पर जावे और जब मन उन्नति करते-करते अपने असल में लय हो जाता है फिर changeless हालत पैदा हो जाती है, जो ईश्वर को भी नसीब नहीं। यह हक सिर्फ भूमा का है, यह तो तत्व की बात रही, अब अपनी सुनो। तुमने यह जो लिखा है कि सहज-चेतना हालत का एहसास कराती है, वह मन की गति है और यह चीज़ मनुष्य जब तक जीवित है, कितनी ही उन्नति क्यों न कर जावे, कुछ न कुछ बाकी रहती ही है। यह ज़रूर है कि मन असल हालत से इतना रंग जाता है कि उसे अपनी असली हालत का होश नहीं रहता। तुमने यह भी लिखा है कि मुझे यह याद तक नहीं कि मैं कहीं गई थी और जिन्हें वहाँ देखा था, वह एक स्वप्न सा मालूम देता है। इसके माने यह है कि मन का चिपकाव बहुत कुछ असल से हो चुका है। यह मन ही है कि ज्यों-ज्यों असल में कायम होता जाता है, एक भाव भासने लगता है और द्वैत कम होने लगता है और लय यही चीज़ होती है। यह ज़ाहिर है कि मौत के बाद दूसरी ज़िन्दगी शुरू होती है। जो मरेगा, ज़रूर पैदा होगा। इसी तरह से जब हम जीवित रहते हुए मर जाते हैं, तो उसमें उस ढंग की ज़िन्दगी शुरू होती है और जब उस ढंग की ज़िन्दगी आती है, जो उस ढंग की मौत की वजह से है, तो फिर हमारे आने का कोई सवाल नहीं रहता। इसलिए कि वह ज़िन्दगी, जो जीवित रहते हुए मौत की वजह से आई थी, उसकी भी मौत होती रहती है। उसका ढंग ज़रूर और होता है, और आखिर में वह जिन्दगी आ जाती है कि जिसे हमेशा की ज़िन्दगी कहते हैं, और उसमें सुबह-शाम नहीं होती।

    आठ फरवरी के खत में जो हाल लिखा है कि सब कहीं रोशनी ही रोशनी मालूम होती है। रोशनी ज़रूर मालूम होती होगी, अगर उसमें तेज़ी है (जो उम्मीद है कि नहीं होगी), तो अभी B1 स्थान की हालत अपनी असली हालत में नहीं आई है। तुम यह भी लिखना कि दिमाग़ पर तुम्हें कुछ ज़ोर तो नहीं मालूम होता, जो Vibrated condition होने की वजह से हो सकता है। आज रात में तुम्हारी हालत को देखकर ठीक हालत में ले आऊंगा। रोशनी जो जगत में निकलती मालूम होती है, वह रोशनी नहीं है, बल्कि B1 पर जो ज़ोर और कंपन Vibration की तेज़ी है, उसका पसारा का इन्साफ़ है। जहाँ असलियत है, वहाँ न रोशनी है, न अंधेरा, एक अजीब चीज़ है। चौबे जी की Diary मुझे मिल गई और उनकी हालत का जहाँ तक मुझे एहसास है, मुझे ज़्यादा साफ़ मालूम देती है, मगर कुछ खफ़ीफ़ स्याही सीने की दाहिने तरफ़ मालूम देती है और soul Bondages मैंने कुछ साफ़ किये हैं, मगर फिर भी उसके साफ़ करने की ज़रूरत है। अब उन्हें ख्याल भी कुछ रहने लगा है। तुम भी देख लेना ताकि यह मेरा एहसास सही है और जो समझ में आ जावे. लिखना।

     मास्टर साहब को मैंने यह लिखा है कि गुस्से को दूर करो और वह बेचारे चेष्टा कर रहे हैं। इस चीज़ को हर मनुष्य को बचाना चाहिए। मेरा तो भाई यह हाल है कि मैं ‘लाला जी’ से क़दम क़दम पर डरता हूँ और अपनी गुस्सा से मुझे डर यह लगता कि फिर उन्हें भी गुस्सा आ जाती है। मैं प्रार्थना के ज़रिये से अपनी गुस्सा दूर करूंगा और तुम भी इसके लिए दुआ करो और मास्टर साहब को सत्संग कराके इस कालिमा को दूर करो। नतीजा इसका ज़रूर अच्छा होगा। यहाँ पर छोटे-बड़े का सवाल नहीं, एक दूसरे को मदद देनी चाहिए। 

  शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-461
लखीमपुर
2/11/1955
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

कृपा पत्र ‘आप’ का मिला, पढ़कर प्रसन्नता हुई। मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ। 

    मेरी तो यह न जाने क्या दशा है कि संसार की हर चीज़ एक बेहोशी के रंग में ही रंगी दीखती है। इधर कई महीनों से मेरी नाभि में हल्का-हल्का हर समय दर्द रहता है और जब दर्द कुछ बढ़ता है तो फड़कन भी बहुत होती है। सिर के पीछे, जहाँ गर्दन में गड्ढा सा है, उसी के सीधा-सीध में इतनी अधिक फड़कन होती है। आज सबेरे ताऊजी को खाना खिलाते समय लगा कि जैसे एक आगे को झटका सा लगा, तो आँखों के आगे बहुत ही हल्का कुछ पीला सा प्रकाश हो गया, फिर दोबारा, फिर झटका सा लगकर लगा मानों आँख सी खुली या सोते से उठ पड़ी। यह न जाने क्या है, ‘आप’ जानें, आप का काम जानें।

   भाई, अब तो ऐसा लगता है कि सूक्ष्म रूप का भी एहसास नहीं होता। यदि बहुत सोचो, तो ‘मालिक’ का ही रूप सामने आ जाता है। भाई, वह तो स्वयं मुझ मय या मैं ही हो चुका है तो ढूँढने से भला कहाँ मिले। लगता है, वह तो बन्धन मुक्त स्वतन्त्र हो चुका है। अब तो भाई, यह हाल है कि न जाने क्यों ‘आप’ की बातें अधिक करने से दशा में भद्दापन आता है। न जाने क्यों, ज़ोर-ज़ोर से बोलने से भी दशा में भद्दापन आता है। न जानें यह क्या हो गया है कि ईश्वर को अब अपनी ही तरह मानकर लगी रहूँ, बस यही होता है और अपने से super मानकर नहीं बर्दाश्त होता। मैं क्या, मेरा रूप ही क्या, गरीब सफाचट दशा। यही हाल लय का हो गया कि लय-अवस्था तो खुद मैं हो गई। अब मुझे लय अवस्था कहीं दिखलाई ही नहीं पड़ती, तो लय क्या होऊंगी। कुछ ऐसी दशा है कि यदि Balanced State कहूँ तो मेरे लिये वह अब अर्थहीन ही ठहरती है। अब वह तो ऐसी दशा है कि मानों किसी ने ज्यों का त्यों खड़ा कर दिया है, और भाई, जिसमें अब ग़म की गम नहीं रह गई। कहने को सफाचट कह लीजिये और क्या लिखूं।

   छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

   आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-462
लखीमपुर
21/2/1955
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आप’ का प्राप्त हुआ। पढ़कर प्रसन्नता हुई। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

    भाई, अब तो लगता है कि प्रेम के दायरे से कदम ओझल हो चुका। मुझे तो हर समय शून्य सी, बिल्कुल खाली सी दशा लगती है। मुझे तो गहरी या उथली, दोनों शब्द व्यर्थ लगते हैं, क्योंकि दोनों ही मेरी हालत के लिये बेमतलब हैं। जैसे जन्नत और दोज़ख का मानों मेरे लिये अर्थ ही नहीं। मुक्ति का भी बोध नहीं या यों कह लीजिये कि शब्दों का ही मेरे लिये अर्थ नहीं। कुछ ऐसी उदास व खाली हालत है कि ‘हैं’ कह लो तो कुछ नहीं, और ‘नहीं’ कह लो तो कुछ नहीं। मेरे लिये तो दोनों ही समान हैं। भाई, अब जब किसी भी तरह हालत में शिकन ही नहीं आती तो, जो होगी, सो होगी। भाई, अब तो न सिन्धु कहती हूँ, न बूंद ही कहती हूँ और कुछ न ही कहने में संतोष रहता है, नहीं तो दुविधा हो जावे। इतना कह सकती हूँ कि हालत कुछ एक से भी अलग हो गई है, क्योंकि उसमें द्वन्द के थिगरे अब लगते नहीं और एक भी कहा नहीं जाता और वह भी अन्तर की उस सहज दशा से चिमटा हुआ।

     भाई, अब तो कुछ ऐसा हाल है कि जैसे पहले मैं अक्सर लिखा करती थी कि ऐसा लगता है कि मानों किसी चीज़ को प्राप्त करने का हृदय या मैं मानों पात्र बन गई हूँ, परन्तु अब यह हाल है कि न तो पात्र है, न चीज़ ही अनुभव में आती है। अब तो सफाचट रूप है मेरा, और बाहर भी यही हाल है कि केवल सफाचट मैदान के मुझे न जाने कुछ दीखता ही नहीं। सब कुछ खाली-खाली है और मेरा स्वरूप ही खाली है या खाली रूप हूँ। बाहर-भीतर खाली दशा ही फैली हुई है, किन्तु खालीपन तो एहसास में है नहीं, क्योंकि वह तो मैं स्वयं खाली रूप हो चुकी हूँ। कुछ आराम सी दशा मेरा रूप होकर फैल गई है। सब ओर एक अजीब आराम है, जो मुझ में फैला है, किन्तु मैं उसे कहने की कोशिश करते भी कह नहीं सकती। मिसाल के तौर पर यों कह लीजिये कि जैसे तकलीफ़ या रोग के बाद शरीर में बड़ा आराम सा आ जाता है। पूर्ण Rest सी दशा है। बाहर, भीतर, कण-कण Rest मय बन चुका है। अब तो भाई, लय का भी, प्रलय का भी, प्रलय हो गया। अब मेरे लिये तो कुछ मानों सार ही नहीं रह गया है। या यों कह लीजिये कि मैं तो बेमतलब एक रूढ़ सी संख्या हुई जाती हूँ। क्योंकि दशा ऐसी देखती हूँ कि उसमें कुछ अब जुड़ ही नहीं सकता। किन्तु ऐसा होते हुए भी कुछ न कुछ तो कहा ही जाता है और कहती हूँ, क्योंकि यह मैं ज़रूर देखती हूँ कि अभी Rest मय होने पर भी अन्तर के किसी कोने में Restless दशा शेष है। अब तो ऐसी दशा है कि ऐसा समुंद्र सामने है कि जिसमें मानों Rest ही Rest का पसारा है, किन्तु जिसमें न यह कहा जा सकता है, न यह। उसे तो चाहे ऐसा कह लो कि मानों मुर्दा, मुर्दे को पढ़ने का प्रयत्न कर रहा हो। उसे पढ़ना तो ऐसा है, मानों मुर्दा, मुर्दा को पढ़ने का प्रयत्न कर रहा हो। चाहे बिल्कुल शान्तिमय वातावरण कह लीजिये।

    अम्मा ‘आप’ को शुभाशीर्वाद कहती हैं। इति:-

   आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
   पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-463
लखीमपुर
1/3/1955
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है ‘आप’ को मेरा एक पत्र मिला होगा। मेरी तबियत अब धीरे-धीरे ठीक हो रही है, चिन्ता की कोई बात नहीं है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

     कुछ ऐसा एहसास में आ रहा है कि वास्तविक Destruction ठीक सामने और शीघ्र आता दीख रहा है। सूखी जमीन पर समुंद्र, और समुंद्र के स्थान पर पर्वत एवं ज्वालामुखियों व भूकम्पों की धड़धड़ाहट से पृथ्वी गुंजायमान लगने लगती है। सब कुछ लोट-पोट मामला लगता है। कुछ ऐसा लगता है कि माथे से लेकर सिर के पीछे तक जहाँ सीधी माँग खतम होती है, उसके सीध में चार अंगुल और नीचे तक कई सूराख से हो गये लगते हैं और आपस में सम्बन्धित सब हैं।

   भाई, न जाने क्या बात है कि अक्सर बैठे ही बैठे तबियत न जाने किस हालत में चिमट कर बिल्कुल Inactive हो जाती है। उस समय कोई हाथ पकड़ कर भी उठाये, तो मानों, ज़रा भी हरकत ही नहीं है, फिर ज़रा सी देर में ठीक अपनी दशा पर आ जाती हूँ। अब इसे चाहे कोई यह कहे कि भूल की अवस्था है, चाहे कुछ क्यों कि एकाएक ही ऐसा हो जाता है। आज रात से, जब से ‘आप’ ने Sitting दी है, ऐसा लगता है, सारी तेज़ी मानों दशा में पग कर अपनी Individuality खो बैठी। अब तो तबियत में केवल दो ही नज़ारे रहते हैं, एक तो Inactive से सम्बन्धित, दूसरे अपनी दशा में लयलीन सा रहते हुए चलना। अब तो कुछ यह हाल है कि चाहे दुनिया इधर से उधर हो जावे, परन्तु मेरी एक सार दशा Changeless हो चुकी है। चाहे जो बात करूं, चाहे कुछ करूं, परन्तु उसमें अन्तर कहाँ, बल्कि मैं ही अक्सर Inactive सी होकर, विस्मृत सी ही रहती हूँ। कभी-कभी यह लगता है कि मानों हालत भीतर ही भीतर काँप सी रही है, परन्तु वह कम्पन कुछ बाईं ओर गोलाई लिये होता है, परन्तु अपनी स्थिर दशा में इसका भी कुछ असर नहीं पड़ता। वह तो ज्यों कि त्यों समान रूप में ही बनी रहती है और यह कोई दशा नहीं, बल्कि यह तो मेरा मानों ढाँचा ही बन गई है। ‘मालिक’ को प्राप्त करने के लिये ही मानों यह ढाँचा तैयार हुआ है और इसमें Touch करती रहती हुई Inactiveness मानों जान है। किन्तु मैं पहले जैसे बेहोशी की हालत भीतर-बाहर फैली हुई लिखा करती थी, परन्तु अब तो मैं होश की हालत ही फैली लिख रही हूँ, क्योंकि बेहोश हालत में अब कुछ होश का रंग चढ़ चुका है। अचेतन अवस्था में चेतन स्वरूप बन कर आ रहा है। या यों कहिये कि दशा अब चेतन और अचेतन का मिश्रण है। मैं अब इसकी अनुभूति से भी विस्मृत (यानी भूल जाती हूँ) हो हो उठती हूँ। अब तो लगता है खाली दशा से भी दशा खाली हो, चली है। अब तो लगता है कि धरणी के कुल कण-कण में construction समा चुका है और Destruction जिसका Result है।

    छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

    आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-464
शाहजहाँपुर
2/3/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे कई खत आये। मेरा आना और न आना-एकसा मालूम होना, इस बात की दलील है कि तुम्हारे ख्याल से अहं का वजन बहुत कुछ दूर हो चुका है। अहं के माने “मैं हूँ” के लगाये जाते हैं और यह चीज़ अहंकार के दायरे में आती है। यह इसका अंधेरा पहलू है और इसका उजेला पहलू यह है कि दूसरे के एहसास का वज़न अपने दिल पर आवेI गोया यह अहंपने की सूक्ष्म-दशा है। यह दोनों हानिकारक हैं। शुक्र है मालिक का कि पहले का वज़न तो बिल्कुल ही नहीं है और दूसरे का वज़न निहायत ही कम, मगर अभी है ज़रूर। तुम्हें जो Inactivity की दशा से चिमटना एहसास होता है, वाकई यह उससे चिमटना नहीं है बल्कि एक.. के बजाय आगे के धुएँ में अभी चिमटना है या यों समझ लो कि गरम पानी के भाप से चिमटी हो, न कि खुद गरम पानी बन गई हो। तुमने यह जो लिखा है कि दुनिया इधर से उधर हो जाये मगर मेरी condition changeless रहती है। इसको changeless condition नहीं कहते, बल्कि दृढ़ वैराग्य इसको कहना चाहिए या वैराग्य की बहुत ऊंची हालत कहना चाहिए। यो changeless होने में भी यह बात पैदा हो जाती है। मगर इस condition और असल changeless condition में अन्तर है। इस बैराग्य की हालत में तो दुनिया के अच्छा-बुरा हो जाने पर निगाह नहीं जाती और उस changeless condition में इस तरफ़ निगाह रहती है। वह तो नशेबाजी की बात है, जो मैंने पहले लिखी और इसमें नशे का लेशमात्र भी गुमान नहीं। 

    Swami Viveka Nand-what a nice expression and quite correct. can a Swami give this Kind of expression? Has any body dare to say so? This is the Divine wisdom. I would have given you a thousand words as a reward for this Sentence, but as you have a word of your own on these things have no value.

     हज़रत किबला-भाई यह चीज़ आब-ए-ज़र से लिखने लायक है। इतना अच्छा Expressions मैंने देखा ही नहीं।

    Swami Viveka Nand-This is a very Important letter.

    तुमने बाईं ओर जो गोलाई सा कम्पन लिखा है, उसे ज़रा observe करके लिखो कि इस कम्पन के साथ ज़रा दिल तो नहीं हिलता, फिर मैं इसका जवाब दूंगा। अच्छा, मैं जवाब दिये देता हूँ। अगर दिल हिलता है तो इसके माने यह होंगे कि Vibration असल भण्डार से तेज़ आ रहा है, और उसका असर हो रहा है। अगर सिर्फ़ कुछ चिनचिनाहट सी मालूम होती है, तो इसके माने यह होंगे कि दिल उसका पूरी तौर से असर नहीं ले रहा है। बाकी होश और बेहोश के बारे में जो लिखा है, यह सब C1 की सैर है, जहाँ की हालत एक छाया की तरह से है, यानी इसमें कोई वज़न नहीं।

    दूसरे खत में जो विचारों का ताँता लिखा है, तुम बता सकती हो कि वे क्या विचार हैं। वैसे तो असल चीज़ का असर जब भद्दी पर्दों पर पड़ता है, तो कुछ तार की तरह झनझनाहट दे जाते हैं और वह झनझनाहट चूंकि हममें जिन्दगी है, विचारों से तस्वीह (उपमा) दे देते हैं। अब जैसा हाल हो, वैसा ही समझ लो।

   चौबे जी और अम्मा को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

     शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-465
लखीमपुर
4/3/1955
मेरे परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम स्वीकृत हो।

आशा है मेरा पत्र पहुंचा होगा। पूज्य मास्टर साहब के पत्र में लिखा था कि ‘आप’ की तबियत फिर खराब हो गई थी, सो कृपया लिखियेगा कि अब तबियत कैसी है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ। 

    भाई, अब तो यह हाल है कि मेरे लिये हर चीज़ NIL है। यहाँ तक कि हर हालत भी मेरे लिये अन्त में NIL ही हो जाती है। इधर विचारों का ताँता सा पूरा रहता है, किन्तु मैं अभी तक यह तय नहीं कर पाई हूँ कि विचार हैं या यह अनजाने में कहीं कुछ Vibration का result है। हालत को साफ़ कह लीजिये, वरना क्या लिखूं, कुछ कह नहीं बनता। परन्तु लगता है C1 point साफ़ होकर मेरी आँखों के सामने फैलने लगा है और मैं उसी दशा में भी मानों अपने को पहले से ही मिली सी पाती हूँ। न जाने क्या बात है कि जो मैं चाहती हूँ, वह मैं स्वयं नहीं कर पाती हूँ क्योंकि दशा तो ऐसी है कि फूंक-फूंक कर कदम पड़ते हैं। अब देखती हूँ कि एक Natural Course में ‘मालिक’ मुझे लिये चल रहा है, जिससे हर अणु-अणु एक अजीब Natural Condition पर आ गया है और दशा भी भीतर-बाहर समान ही रहती है। मैं तो कुछ ऐसा Proof हो गई हूँ कि ‘हाय’ तो मानों मेरे लिये एक व्यर्थ चीज़ हो गई है या यों कह लीजिये कि मेरी हाय में असर नहीं रह गया है या मैं ही Proof हो गई। ‘मालिक’ को देख कर भी मुझमें प्रेम की उत्पत्ति नहीं होती। मैं तो एक ऐसा यंत्र हो गई हूँ कि जो चाहे, तोड़ो, मोड़ो, चाहे कुछ किया जाय, परन्तु यंत्र ज्यों का त्यों ही है और यंत्र भी कहने को कह लीजिये।

    अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती हैं तथा केसर प्रणाम कहती है।

   आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-466
लखीमपुर
8/3/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र ‘आप’ को मिला होगा। यहाँ सब कुशल पूर्वक है। आशा है ‘आप’ भी अच्छी तरह से होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

    कभी-कभी ऐसा होता है कि जैसे जब मैं सबेरे सो कर उठती हूँ, तो आँख खुलते ही ऐसा लगता है, मानों मैं स्वयं अपने से अलग हो गई। यद्यपि देखती हूँ, वह अलग दशा भी साम्य अवस्था का स्वरूप ही होती है। लगता है, अपने में से बाहर निकल आई। कुछ यह भी है कि मानों अपने से अलग भी कभी नहीं होती और ऊपर वाली दशा भी लगती है। कुछ समझ में नहीं आता। ऐसा समझ लीजिये कि जैसे आदमी घर से निकल कर अहाते में आ जावे, तो वह घर से भी सम्बन्धित रहता है, बाहर भी निकल आया। देखती हूँ कि यह दशा सो कर उठने पर ही नहीं, बल्कि दिन भर में भी, चलते-फिरते, जब मानों एकदम से आँख खुलती है या कुछ अचैतन्यता में होश आता है, तब ऐसी ही दशा पाती हूँ, बल्कि भाई, अब तो यह कहूँगी कि जब चैतन्यता की दशा में बेहोशी की दशा का भान होता है तब ऐसी ही दशा पाती हूँ। लगता है, अपने घर में चैतन्यता ही है, परन्तु अहाते में बेहोशी की दशा का भान होता है। घर से यद्यपि देखती हूँ कि मैं एक ही रहती हूँ, अलग होती ही नहीं, परन्तु अहाते में आना शायद जरूरी होता है और अहाते में आने पर सोने-जागने के बीच की दशा हो जाती है और लगता है दशा ने साम्य-अवस्था को भी त्याग दिया। यही नहीं, बल्कि घर में तो भाई ईश्वर भी नहीं, इसलिये तो ईश्वर दर्शन की हालत से भी रिश्ता टूट गया। मुझे एहसास नहीं होता, किन्तु अहाते में इनकी खुशबू मिलती है। परन्तु मेरा तो एक डग घर में, और एक डग अहाते में, परन्तु जैसे निगाह घर में खोई रहती है। परन्तु अब तो घर ही मेरा घर हो गया है। कुछ यह भी हुआ जाता है कि निगाह में अहाता भी घर हुआ जाता है, क्योंकि मैं स्वयं ही अपना घर जो हुई जाती हूँ। मैं घर कहती हूँ, परन्तु स्वरूप अपना ही पाती हूँ और मैं अपना स्वरूप खुद भूल गई। यों कह लीजिये कि बुलबुले ने पानी को पहिचान लिया। इति :-

  आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-467
शाहजहाँपुर
13/3/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारा 8.3.55 का प्राप्त हुआ। अपने स्वास्थ्य के विषय में भी लिखना। एक पत्र मैंने छोटा सा डा. सिन्हा को भी लिखा है, उसकी नकल तुमको मास्टर साहब द्वारा भेज दी थी। लिख तो मैंने दिया है, मगर इसका असर उन पर शायद ही पड़े और वह ‘मालिक’ हैं अपने, इस लिये उनके जो समझ में आवेगा करेंगे। हमें तो ऐसा व्यक्ति चाहिए कि जो ‘मालिक’ उसको समझे, जिसकी मिल्कियत छाई हुई है और अपने आप को मोहताज समझे। मोहताज ही को तो ‘मालिक’ देता भी है और जिसे खुद ही आवश्यकता नहीं और अपनी ही मिल्कियत के झंझटों में जकड़ा हुआ है, उसके पास वह पात्र कहाँ से आ सकता है. जिसको ‘मालिक’ भर दे।

   तुमने अपने पत्र में एक बात बहुत अच्छी लिखी है कि जब तुम सो कर उठती हो तो तुम्हें यह लगता है कि तुम अपने से निकल आई। हमारे यहाँ की Training में एक बात यह है कि मन का सम्बन्ध कुछ न कुछ उसकी असल गति से कर देते हैं। तो सोते समय जब मन के लिये यह कहा गया है कि अभ्यासी को एकदम से जगाना नहीं चाहिये। इसलिये कि उसको धक्का लगता है। अब तुममें यह हालत बहुत उन्नति कर गई है और सोते समय तुम्हारा फैलाव अधिक हो जाता है, जो जागने पर तुम्हें ऐसा मालूम होता है कि तुम अपने आप में से निकली और उस समय अगर तुम गौर करो तो तुम्हें यह भी अनुभूति होगी कि कोई न कोई सोते समय आनन्द ज़रूर रहा है। हालांकि वह आनन्द अब कुछ इस ढंग का है कि सोने और जागने की हालत को अगर compare करो तो कुछ भेद समझ में आ जावेगा, यों गो उसकी अनुभूति करना भी कठिन पड़ेगी। तुम्हारे इस लिखने ने मुझे अपनी हालत के याद करने की याद दिला दी। मगर भाई कोई यह न समझ जाये कि मैं अपनी बड़ाई कर रहा हूँ। मगर क्यों कि मेरी जुवान में लगाम नहीं और आदत भी ऐसी डाल ली है, वह भी इस वजह से कि मेरे कहने सुनने से ही लोगों को इस हालत पर पहुंचने का शौक़ पैदा हो, खैर लिखे देता हूँ। जब आदमी सोता है तो, जो उसके सैर करने का स्थान होता है, ज़्यादातर उसी में विचरता है, मगर जब Limitations और Bondages टूट जाते हैं, तो फिर उसका पसारा बहुत बड़ा हो जाता है और मैं तो यह कहूँगा कि ईश्वर से मिलने का वही वक्त होता है। एक बात तुम्हें और बताता हूँ कि इन सब Bondages के टूट जाने पर ऐसा क्यों होता है, और क्यों लाज़मी है ? वजह यह है कि Centre के नीचे जो Energy है, उसको वह अपने फैलाव के द्वारा सब में Distribute करता है, यों वैसे भी Energy असल भण्डार से सबको मिलती रहती है, मगर यह रूहानी Energy जिस वक्त कि कम होने लगती है, उस वक्त ऐसी Personality ईश्वर भेज देता है। अब हाल तो मैंने लिख ही दिया, अब तुम किसी का हाल समझो और मुझे तो भाई सोने में बड़ा मजा आता है और कुम्भकरण की नींद मुझे पसन्द है। इसलिये कि मैं उस हालत में अपने घर में विचर लेता हूँ और Brighter World में घूमता रहता हूँ और वहाँ से जो कुछ भी मुझे मिल जाता है, अपने पास कुछ नहीं रखता। यही वजह है ख्वाह यह गति मेरी हो, या और किसी की। कण-कण आध्यात्मिक Energy से बहुत कुछ भर चुका है। जो लोग या महात्मा इसको grasp करते हैं, वह ज़्यादा फ़ायदा उठा जाते हैं। तो अब कहो बिटिया ! सुख की नींद कौन सोता है। पता नहीं कि वेद में इसको तुरिया या तुरियातीत या कुछ और कहेंगे। तुम बिटिया ! चौबे जी से पूछ कर लिखना कि वेदों में इसके लिये क्या शब्द इस्तेमाल किया है, यह कौन सी नींद कहलाती है। तुम पूछना जरूर, मुमकिन है, वह बतला सकें। मैंने तुम्हारी एक बात का तो जवाब दे दिया, अब बाकी बातें जो हैं, वह C1 की हैं और जो वाकई हालत है, उसका तरजुमा तुमने अच्छा किया मगर फिर भी अनिवर्चनीय है। अब C1 की हालत जो है, वहाँ पर अब मैं एक बात देख रहा हूँ कि तुम्हारी तो ठहरने की उस जगह पर फिर तबियत चाहती है। मगर यह कम्पन (Vibration) का बीज जो B1 पर मैंने डाला है, वह अब C1 पर फिर पैदा हो गया इसलिये कि तुम्हारा उठान आगे जाने को पैदा रहे। इस कम्पन (Vibration) को मैंने जब लखीमपुर में था, खामोश करीब-करीब कर दिया था, मगर उसका बीज नष्ट नहीं किया। अब तुम्हारी जहाँ पर ठहरने की तबियत चाहेगी, यह Vibration ठहरने नहीं देगा। अब सच पूछो तो मेरी मदद की अब बहुत ज्यादा ज़रूरत नहीं रही और तुम्हारी चाल में Vibration ने खुद-ब-खुद तेज़ी बढ़ा दी। तुम्हारा निकलने का जी न चाहे और कम्पन (Vibration) तुम्हें ऊपर को घसीट ही ले। मगर निगरानी मेरी थोड़ी ज़्यादा बढ़ गई, बस छोटा सा काम इतना ज़रूर बाकी है। या यूं कहो कि कम्पन का Control करना मेरा काम रह गया। मैं जब ज़रूरत समझुंगा, शान्त कर दूंगा। इसलिये कि इस चौकीदारी की चौबे जी तनख्वाह बहुत थोड़ी दे रहे हैं। यह ज़रूर है कि कुछ दे रहे हैं। मगर मंहगाई का ज़माना है, पेट नहीं भरता। उनसे कह  दो कि मेरी तनख्वाह कुछ और बढ़ा देवें। South India में एक दो साहब और शुरू कर रहे हैं, मगर उनका आना मुश्किल है। वहीं से Training चाहते हैं। अभ्यास मैं उन्हें लिख दूंगा। ईश्वर हर जगह मौजूद है, वह उनकी खुद फ़िक्र कर लेगा। अब तो कुछ ऐसे चिन्ह जरूर ईश्वर की कृपा से मिल रहे हैं कि यह चीज़ जल्दी उन्नति करे। अम्मा से यह कह देना कि वह मेरा जन्मदिन तो मनाती ही हैं, खर्चा 4 या 5 रुपये से अधिक नहीं होना चाहिए।

     “सहज-समाधि” किताब जो लिखी है, मैं चाहता हूँ कम से कम 40 या 50 सफ़े हो जावें और यह मेरी दुआ है कि जिस दिन तुम लिखने का इरादा करोगी, तुम उसको इतना अच्छा लिखोगी कि तुम्हें खुद ताज्जुब होगा, ईश्वर करे, ऐसा ही हो। अगर हो सके तो मेरी किताबों या खतों में से जैसा मुनासिब समझो कुछ Quotations दे देना। मैं बद-दुआ दूर करने की बहुत संक्षेप के साथ तरकीब बताता हूँ। ‘लाला जी’ ने मुझे यह सब बातें बताई हैं। महात्मा जिस हालत में होगा, उसी हालत से दुआ या बद-दुआ देगा ज़्यादातर। इसलिये जब उसका असर दूर करना चाहे, तो उससे अगले मुकाम पर बद-दुआ दूर करने का ख्याल बाँधे या अगर किसी की ब्रह्म-गति पूरी तौर पर है, इतनी कि जितनी हो सकती है, तो फिर वह एक झटके में उसे खत्म कर सकता है। कोई Point तलाश करने की ज़रूरत नहीं।

     शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-468
लखीमपुर
15/3/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

‘आप’ का कृपा-पत्र मिला। पढ़ कर समाचार से अवगत हो, प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा का एहसास हुआ है, सो लिख रही हूँ।

    मेरा तो इधर यह हाल है कि तबियत में हर जगह, हर घड़ी, ऐसा सन्नाटा रहता है कि जैसे, किसी की मौत के बाद, लाश उठ जाने पर, एक अजीब सन्नाटा, एक अजीब हालत छा जाती है। मैं हर समय, हर जगह, ऐसे ही वातावरण में खोई रहती हूँ। न तो पूजा के कमरे से निकलने की तबियत चाहती है, और न ही किसी से बात करने की। बस यह जी चाहता है कि मुझ से कोई न बोले, कोई बात न करे। यद्यपि पूजा के कमरे में भी पूजा नहीं करती हूँ, बस बैठी रहती हूँ। पूजा क्या करूँगी, जब पूजा से प्रेम ही नहीं और पूजा से क्या प्रेम हो, जब ‘मालिक’ से प्रेम नहीं, क्योंकि ‘मालिक’ की बातें करने या सुनने को भी तबियत ही नहीं चाहती, मुझे रस ही नहीं आता। मेरा तो यह हाल है कि जैसे मानों दिल के भी आँसू सूख चुके। अब घर (दिल) क्या है, मशान है, मेरे लिये श्मशान है। तबियत बुझी हुई है, फूंकने पर भी राख ही उड़ती है। अब तो यों कह लीजिये कि अदृश्य भाप की गर्मी के सहारे रास्ता तय हो रहा है और वह भी अब इतनी ठंडी हो चुकी है कि उसमें गर्मी का पता नहीं मिलता और ठंढक की लौ बुझ चुकी। कुछ ऐसी ही अटपटी दशा है। अब तो मुझे लगता है कि ‘मालिक’ भी मुझ से गुम हुआ जाता है। पहले तो यह हाल था कि ”दिल के आईने में है तस्वीरे यार” और अब यह है कि दिल स्वयं एक बुझी हुई सी तस्वीर बन गया है, जो अदृश्य हुई जाती है। एक अजीब नज़ारा ही कहिये कि जैसे-जैसे ‘मालिक’ गुम हुआ जा रहा है, वैसे-वैसे निगाह व नज़ारा भी उसी के साथ-साथ डूबता जा रहा है और एक दिन महाप्रलय का सम्राज्य हो जायेगा।

    भाई, इतना सा एहसास मुझे सोने-जागने की हालत में ज़रूर लगता है कि जागते में कुछ नहीं, तो भी Limit रहती है, और सोते में तबियत को Limitless पाती हूँ। दूसरे यह कह लीजिये कि जागते में तबियत ‘मालिक’ से अलहदा और सोते में मिली सी रहती है। ऐसा लगता है कि C1 की सैर खत्म हो चुकी है। कुछ यह देखती हूँ कि तबियत जागना चाहती है, तो फिर कोई मानों थोड़ा और थोड़ा और करके बार-बार सोने में मिलाये रखता है। कुछ यह भी देखती हूँ कि जागने पर तबियत कुछ ज़रूर बंधी या सिमट सी हो जाती है और सोने में स्वतन्त्र, बन्धन-रहित।

  अम्मा ‘आप’ को शुभाशीर्वाद कहती हैं। इति :-

   आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-469
लखीमपुर
24/3/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र पहुंचा होगा। यहाँ सब कुशल पूर्वक है। आशा है ‘आप’ भी सकुशल होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

    न जाने क्या दशा है कि अक्सर ऐसी तबियत अपने आप ही हो जाती है कि रोना- हंसना, बोलना, चलना-फिरना, खाना-पीना, यहाँ तक कि ज़िन्दा रहना भी, दूभर मालूम पड़ने लगता है। ज़िन्दगी में मौत का नशा छाया रहता है। देखने वाले लोग यह समझते हैं कि बहुत बीमार हूँ, परन्तु जब तकलीफ़ पूछने पर मैं नहीं बता पाती हूँ तो सब लोग जानते हैं कि छिपाती है। मानों मेरे लिये सब प्रलय ही हो गया। तामसी प्रवृत्ति बिल्कुल हो गई है। न नहाने का मन न धोने की तबियत, यहाँ तक कि पखाने का भी हाथ न धोऊँ ऐसी ही बैठी रहूँ और मैं ऐसी अंधी हूँ कि मुझे सिर्फ़ अपनी यही तामसी हालत सब ओर दिखाई पड़ती है, मानों तामस का पर्दा छा गया है, आँखे बन्द हैं। पूजा या सत्संग में भी जाने से तबियत भागती है। कोई बोलता है, तो गुस्सा आने लगता है, परन्तु करती नहीं। जिन्दगी पर मौत का नशा है और मौत है नहीं। यह मुझे क्या हो गया है श्री बाबूजी ! ‘आप’ ही बतायें।

   यह ऊपर वाली Inactiveness की हालत केवल इसीलिये लगती है और तभी होता है, जब मैं अपने में से दिन-रात निकलती ही नहीं, भीतर ही समाई रहती हूँ, तभी प्रलय का नशा सवार रहता है क्योंकि मैं देखती हूँ कि जब मैं अपने से बाहर निकलती हूँ, तब नशा उतरा लगता है। आँखें खुल जाती है, क्योंकि भीतर तो वाकई मानों प्रकृति की भी प्रलय हो चुकी है। हाँ, इधर कल से यह ज़रूर देख रही हूँ कि महाप्रलय रहते हुए भी, यानी उसमें समाये या मिले रहते हुए भी अपने से बाहर ही रहने लगी हूँ। अब कुछ दशा को देखते हुए यह भी लगता है कि अब मुझे नशे के दौरे का डर नहीं, क्योंकि मेरी सुरति या तबियत ने अपना मुख इससे परे उठा दिया है। अब मेरी दशा के लिये सुरत- सुहागिन शब्द बिल्कुल unfit सा ही बैठता है। अब तो कुछ यह देखती हूँ कि हालत में से ज़िन्दगी और मौत, यह दोनों नशे समाप्त हो चुके हैं। जागने-सोने के बीच की अवस्था का भी नशा उतरा सा मालूम पड़ता है। अब तो दशा के लिये न कहीं समुंद्र है, न मैदान। अब जो है, वह पता नहीं। क्योंकि मेरी बुद्धि और मन का ही मेरे लिये कुछ अर्थ नहीं रह गया। यहाँ तक कि मेरी आत्मा भी मानों मेरे से ओझल हुई जाती है। कुछ यह भी है कि पहले मैं अपने भीतर, बाहर और स्थूल शरीर पर भी, जब मेरा ध्यान जाता था तो केवल ‘मालिक’ ही ‘मालिक’ का एहसास होता था, परन्तु अब यह भी नहीं है। सब कुछ मानों मेरी निगाह से ओझल हो गया। अब मुझे कुछ नहीं दीखता। मेरी तो समझ मर गई। जीवन- मोक्ष गति भी अहं में मेरे लिये बेकार ही, अर्थहीन ही साबित हुई। अब न जाने भाई, हर दशा का ही अन्त NIL है, या स्वयं मेरा ही अन्त NIL है। लगता है मेरे हृदय का खजाना खाली हो गया, लुट गया। अब तो नीरव शान्ति या नीरव प्रलय का साम्राज्य है भीतर, बाहर। अब तो न सावन हरी खेती होती है, न भादों सूखी। 

    छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति :-

   आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना 
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-470
शाहजहाँपुर
28/3/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारे सब के सब मिल गये। काम कुछ ज़रूर इन दिनों ज़्यादा है। मद्रासियों के पत्र अक्सर चले आते हैं और उनके जवाब देने पड़ते हैं। हमारे यहाँ ऐसे दो चार ही आदमी हैं, जो mission की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर भी समझते हैं। मुमुक्षु आश्रम में जलसा अच्छा रहा। हम और काशीराम वहाँ दो दफ़ा गये और दो रुपया खर्च हो गया। बहुत काबिल लोग आये थे। अब अगर अपने mission की तरक्की की फ़िक्र पैदा करें, तो वह ऐसी है कि सुबह हज़ार तारों का खून करके पैदा होती है और यही आसार दुनिया में पैदा हो रहे हैं और ईश्वर की मन्शा भी यही है कि हम लोग सुबह का मुख देखें। इसलिए हर जगह गड़बड़ी की उम्मीदें हैं। क्या मालूम किसी को कि ब्रह्मपुत्र नदी भी अपना मुंह बंगाल की तरफ़ फेर दे। न मालूम कितनी बातें ऐसी हो सकती हैं। पाकिस्तान का एक बड़ा हिस्सा Barren हो जावे, दरिया खुश्क होने लगे, गरीबी फैलने लगे, गरचे कि यह जो कुछ भी हो रहा है, यह सब उन महात्माओं की ज़िम्मेदारी है, जो जौ बेचते हैं, मगर ग्राहक को गेहूँ दिखाते हैं और इसी से अंधेरी बढ़ती जाती है। मैं अभी इन बातों पर रुजू नहीं हुआ हूँ, इसलिए कि मुझे फुरसत बिल्कुल नहीं मिल रही है। काम का Pressure बहुत है, दिमाग पचपा रहता है। अगर यहाँ मास्टर साहब, ऐसा एक भी आदमी मेरे पास होता तो मैं इन कामों पर रुजू हो जाता, जो मुख्य हैं। आदमी तो मैं ऐसा बना ही लेता, मगर कोई ऐसा मिलता ही नहीं और जो है, उसे इस बात की तमन्ना नहीं। जहाँ इतनी बातें लिखीं, वहाँ पर एक खुशखबरी भी है कि हिन्दुस्तान में सोना (Gold) भी बनना शुरू हो गया है और अभी वहाँ उम्मीद है कि जहाँ काशीराम रहते है (आसाम में) इसलिये कि हिन्दुस्तान के लिये ज़माना अच्छा आ रहा है और भी कई जगह इसकी शुरुआत है और दक्षिण में विशेष करके और कोई धातु पैदा हो रही है। अब तुम्हारे खत में जो कुछ लिखा है, अब दुबारा कौन पढ़े; कि Reality की झलक तो अच्छी आने लगी है। D1 पर कल रात 11 बजे तुमको घसीट दिया। यहाँ पर inactivity की शक्ल कुछ बदली हुई मिलेगी। तुमने यह जो लिखा है कि ज़िन्दगी, मौत के नशे उतर चुके हैं। यह जब वाकई नशा उतर जावे तो Reality की अच्छी हालत कही जावेगी।

    ईश्वरीय काम कुछ सुपुर्द किये थे, उनके करने की ज़रूरत नहीं। वह अब हो गये। mission की तरक्की के लिये जो कुछ कर रही हो, ठीक है, वह किये जाओ।

   शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-471
लखीमपुर
28/3/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आप’ का आज मिला, पढ़ कर प्रसन्नता हुई। आप ने मुझे D1 पर खींच दिया, इसके लिये बहुत-बहुत धन्यवाद। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

    भाई, कुछ ऐसा लगता है कि कभी दशा एकदम धुएँ सी हो जाती है, कभी हल्की बेहोशी से नशे की तरह, कभी वहम् की तरह और कभी बिल्कुल नीरव, शान्तिमय ही रहती है। मुझे ऐसा लगता है कि मानों ‘मालिक’ ही होकर मैं ‘मालिक’ को चाहती हूँ या याद करती हूँ क्योंकि बिल्कुल होश या सुधरी दशा में मैंने यही पाया है। लगता है जिन्दगी में से सिज़दा उठ गया। वैसे यह हाल है कि हर आदमी क्या जानवर तक के कदमों पर ही सिर रहता है। अजीब दशा है कि सिज़दा ही सिज़दा है और सिज़दा जिन्दगी में से उठ चुका है। इधर ‘मालिक’ को अपने में ही सम्पूर्ण रूप से पाती हूँ, मानों मुझ में सम्पूर्ण रूप से वह समा गया है। कुछ ऐसी दशा है कि बेहोशी कभी होती नहीं और होश कभी आता नहीं। कुछ यह हाल है कि न सूक्ष्म शरीर, न कारण शरीर, सब मेरी ज़िन्दगी में से उठ चुके हैं। वे तो मानों मुझ में बनाये ही नहीं गये थे और आत्मा ही आत्मा अब शरीर में झलकती है और उसमें भी लगता है ‘मालिक’ लय हो गया है। अब तो यदि ‘कुछ नहीं’ कहती भी हूँ, तो तबियत एक हल्के बोझ का अनुभव करती है। अब तो लगता है, पंछी पिंजड़े से उड़ कर रम गया। अब तो ‘उसके’ सेंक की भी अनुभूति नहीं। नीरवता भाँय-भाँय हो रही है। नहीं, नहीं, नीरवता भी मौन पड़ी है, क्योंकि मुझे अब वह भी अपना नाम नहीं लेने देती क्योंकि इसे कहने से उस हालत में धब्बा सा लग जाता है। असली बात तो यह है कि खाली पिंजड़ा पड़ा रह गया। कुछ यह देखती हूँ कि हालत को देखने से अधिक देर तक तो मैं अचल सी होने लगती हूँ। अब यह क्या है, ‘आप’ जानें, ‘आप’ का काम जानें।

    अम्मा ‘आप’ को शुभाशीर्वाद कहती हैं और केसर ‘आप’ को प्रणाम कहती है।

   आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
   पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-472
शाहजहाँपुर
1/4/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

28 मार्च सन् 55 का पत्र प्राप्त हुआ। आज राम नवमी का दिन है। बड़ा शुभ दिन है। मगर भाई राम की जाप हमने गिनती से की है। नतीजा यह हुआ कि गिनती से हमने पूरा हिसाब बना दिया, और हम उलझन में फंस गये। उलझन तो रह गई और राम गायब हो गये। अब अगर हम राम को पाना चाहें तो, हमको यही चाहिए कि गिनती की उलझनों को हम दूर करके उस चीज़ पर आ जावें, जिस पर हिसाब और Geometry की बुनियाद है। वह चीज़ क्या हो सकती है ? वह नुक्ता ही हो सकता है, जो हर अदद हर लेख में सम्मिलित है, और जब तक वह अदद या गिनती में सम्मिलित नहीं होता, तब तक उसकी हैसियत ज़ाहिर नहीं होती, अर्थात् हमको हर अदद और हर तरफ़ की पहिचान कराने में यही नुक्ता काम देता है। अब हम नुक्ता तो भूल गये, जो सम्मिलित है, सिर्फ़ वह चीजें बस सामने हैं और याद हैं। यह तो भाई वही मसल हुई कि हमने अपने घर के अन्दर घर के मालिक को गुम कर दिया। हम मण्डलेश्वर हो जावें या महा मण्डलेश्वर हो जावें, हैसियत हमारी अगर न बदली, तो हमने अपने पसारा में भी इजाफा (बढ़ा) कर लिया। नुक्ते को और छिपा लिया और कहीं हमारा मण्डलेश्वर और महा मण्डलेश्वर होने का ख्याल पैदा हो गया, तो भाई हमारे हर हिसाबी पसारे में Square लग गया। अब तो और भी मुश्किल पड़ गई कि इस हैसियत को मिटाने में Square Root के Formula की भी याद आने लगी और घिसे पड़ते पड़ते यहाँ तक पढ़ना पड़ेगा कि जब तक हम खुद न अचेत पड़ जायें, हमारा फन्दा नहीं छूटता। अचेत पड़ना कठिन है, इसलिये कि हमारे ख्वाब में तो हमारी हैसियत घूम रही है और चक्कर पर चक्कर पड़ते चले जा रहे हैं। अब कौन हो सकता है कि इससे छुटकारा दिलाये, सिवाय इसके कि ईश्वर खुद जैसे बनाने में मुब्तला या उसी ताकत से बिगाड़ने में मुब्तला हो तो भाई ईश्वर को गर्ज़ ही क्या, इसलिए कि आप अपनी गर्ज़ उसकी गर्ज़ समझ लेते तो मुमकिन था कि उसके ख्याल के रंग में तुम्हारी आह का झटका पहुंच जाता। 

  अब मैं तुम्हारे पत्र का उत्तर देते-देते तुम्हारी तबियत को, ऊपर जो मैं लिख रहा हूँ रुजू करता हूँ। हिसाबी दौड़-धूप तो तुम में थी ही कहाँ और अगर हो भी तो बस मण्डलेश्वर और महामण्डलेश्वर और आजकल के महात्मा लोगों की गर्मी का असर आम लोगों पर जो पड़ रहा है, वह कुछ हो सकता है या उनके व्याख्यान का थोड़ा बहुत धुआँ जो कुछ भी विचार के तह पर आ गया हो वह अब नहीं है। गिनती तो खत्म ही है, नुक्ते की तरफ नज़र है, और वह नज़र अभी ऐसी है कि तुमने अभी उसको (मालिक) अपनी नज़र में भरा है, इसीलिये मनुष्य और जानवर के क़दमों पर सिर रहता है। अभी ऊंचा उठना है, तब फिर निगाह जब तक कि तुम खुद न चाहोगी, कदमों पर न रहेगी। यह एक हालत है, जबकि ‘मालिक’ का आभास सबमें होता है और यह तत्वमसि अर्थात् Thou art that, इसको “हमाओस्त” फ़ारसी में कहते हैं और यह अहं ब्रह्मास्मि से बहुत ही ऊंची हालत है। अहं ब्रह्म को चुपके-चुपके खटखटाता ज़रूर रहता है, इसलिए कि आखीर पर इसी की बदली हुई हालत पर आना है और लोगों के लिये तो अहं ब्रह्मास्मि सच्ची न सही, झूठी ही हालत पर आ जाना बहुत कुछ है। ईश्वर जाने क्या है ? जान वही सकता है, जिसमें जानकारी नहीं रहती और यह बड़ी ऊंची हालत है और फिर उसके बाद जाने क्या-क्या है? यह वही जान सकता है जो न कभी पैदा हुआ हो, न मरा हो। तुमने लिखा है कि कण-कण में झाँकती हूँ परन्तु कस्तूरी मिलती ही नहीं, इस टुकड़े का जवाब यह है कि कस्तूरी तो सचमुच खो चुकी, मगर उसकी महक अब भी मौजूद है, इसलिये तुम आगे खुद लिखती हो कि ऐसा लगता है मानों ‘मालिक’ ही होकर मैं ‘मालिक’ को चाहती हूँ। यह बात और यह महक यह बतला रही है कि अभी Soul की Forgetful State नहीं आई है। यह भी लिखा है कि बेहोशी कभी होती ही नहीं और होश कभी आता ही नहीं, यह आत्मा की असल हालत है। बाकी बातें जो खत में है, वह सब इसी हालत से भिड़ी हुई हैं। उसका एक-एक कर कहाँ तक जवाब दिया जावे।

   काशी राम अब आसाम जल्दी जाने वाले हैं और वहाँ खूब रुपया पैदा करेंगे और ईश्वरीय कमाई भी करेंगे। अम्मा और चौबेजी को प्रणाम, तुम्हारे भाई-बहनों को प्रणाम।

    शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-473
लखीमपुर
1/4/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आप’ का मिला। समाचार पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ ‘आत्मिक दशा’ समझ में आई, सो लिख रही हूँ।

    भाई, न जाने क्यों मुझे लगता है कि अन्तर की खुशी का भी Bondage समाप्त हो (या टूट) गया, तो अन्दर खुशी भी Unlimited भरी हुई है, परन्तु उस पर check है ‘मालिक’ के हस्त कमल का। ‘वह’ डोरी थामे हुए हैं, ज़रा भी ढीली नहीं होने देते। लगता है, जरा सी ढील दी, फिर खींच ली। अब तो लगता है खुशी का भण्डार पिघल कर कुल कण-कण में अन्दर-बाहर सब भर गया है। कुछ यह लगता है कि मानों मेरी आत्मा भी पिघल कर ‘मालिक’ में ही समा गई है।

    भाई, मेरा कुछ यह हाल है कि अब तो लय अवस्था मेरे लिये बिल्कुल अर्थहीन हो गई है। लाख प्रशंसा दूसरों से लय-अवस्था की करती हूँ, परन्तु स्वयं मेरी तबियत पर उसका कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता। लगता है कि Inactivity भी खामोश पड़ गई, साम्यवस्था में लय हो गई। न जाने क्या बात है कि असल में तो ‘मालिक’ का महत्व, ‘उसके’ गुणों की बड़ाई, ‘उसका’ Greatness न जाने क्यों कुछ मेरे दिल में नहीं रह गई और प्रयत्न करने का भी जी नहीं चाहता है। अब तो आध्यात्मिकता में भी कोई रुचि मेरी नहीं रह गई। एक बेहोशी का सा नशा या धूमिल छाया की तरह, जो कुछ दशा सी छाई रहती थी, वह साफ़ हो गई। कुछ यह हो गया है कि ‘मालिक’ का check जो हर समय मुझे लगता था, अब न जाने क्यों बिल्कुल ही धुंधला पड़ गया। निगाह में जाने क्या हो गया है कि अपनी हालत के प्रति तो खैर ठीक था कि एक बिल्कुल साधारण से घरेलू आदमी की तरह रहती हूँ, परन्तु अब ‘मालिक’ को भी मेरी निगाह ऐसे ही देखती है तो मैं कभी-कभी कुछ सिहर सी उठती हूँ, कि यह क्या हो गया। परन्तु ग़लती मेरी कुछ भी नहीं है। अब मुझे न नशा है, न नशे के बाद की सुस्ती, बल्कि एक Fresh कह लीजिये, थिर हालत है। बल्कि Innocent हालत है, कह लीजिये तो ठीक होगा। मेरी हालत की दमक जाती रही। अब ऐसी चमक है जो चकाचौंध नहीं करती। कहीं भी, किसी में विशेषता मानों मेरे लिये नष्ट हो गई। सादी सी दशा ही व्याप्त है। इति :- 

  आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-474
शाहजहाँपुर
7/4/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

मैंने एक पत्र मास्टर साहब के पते से भेजा था, मिल गया होगा। उस पत्र में इस पहली अप्रैल के खत का भी जवाब था, वही हालत अब भी है। D1 की हालत अभी खुली नहीं है, मगर खुलना चाहती है। इस पत्र में तुमने लिखा है कि खुशी का भण्डार पिघल कर भीतर-बाहर कुल कण-कण में व्यापक हो गया है। यह बिल्कुल आत्मा की हालत है, जिसमें न खुशी है, न रंज, न अपना है, न ग़ैर तुम इस मैदान में आ गई हो, मगर उसमें अभी लय- अवस्था नहीं हुई है और इसी हालत को तुमने तरह-तरह से लिखा है। 

    तुमने लिखा है कि ‘मालिक’ की Greatness दिल में नहीं रह गई है, यह हालत और भी अच्छी है। जब तक हमारी तबियत में Greatness है, बंधन से छुटकारा नहीं मिला और बिना इसके शुरुआत में काम भी नहीं चलता। बाकी जो भी खत में है, आत्मा की ही हालत बता रही है।

    अब एक बात नई, खत से अलग लिखता हूँ। गीता प्रेस से एक पुस्तक छपी है- “मन से वार्तालाप” और इस बात पर स्वामी शुकदेवा नन्द जी ने भी काफ़ी ज़ोर दिया है। इसका तजुर्बा तो तुम्हारे घर ही में हो चुका है, जिससे साबित है कि किस मुसीबत में लोग पड़ जाते हैं। इसमें शुकदेवा नन्द जी की बड़ी तारीफ (वाह, वाह) हुई है। अब तुम तसफ़िया करो कि स्वामी लोग किस कदर जनता को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ईश्वर चाहता है, आध्यात्मिकता पैदा हो, और स्वामी लोग ईश्वर का मतलब पूरा नहीं होने देते। नहीं मालूम क्या होना है। अगर ऐसे स्वामी लोगों को सजा दी जावे तो, इसकी अनुभूति अपनी ज़िन्दगी बाद होगी। और वैसे वे अपने आपको खुद सज़ा दे रहे हैं। यह भी अच्छा है कि स्वामी लोगों की इच्छा-शक्ति ज्यादा तरक्की किये हुए नहीं होती, वरना ज़हर और तरक्की कर जाता है। 

  अम्मा को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ। 

  शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-475
लखीमपुर
8/4/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र ‘आप’ को मिला होगा। यहाँ हम सब सकुशल है और ‘मालिक’ से प्रार्थना करते हैं कि ‘आप’ सदा स्वस्थ रहे ताकि ‘आप’ की कृपा हम सबको बराबर मिलती रहे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

    पिछले पत्र में मैंने जो नशा के बारे में लिखा था, अब समझी कि भाई, वह नहीं था, बल्कि एक सूक्ष्म सी भूल की अवस्था ही छाई हुई थी और अब वह छाई नहीं है, बल्कि देखती हूँ कि भीतर-बाहर से सिमटा-सिमटा कर मुझमें लय या पचती जा रही है। दशा का रंग कुछ हल्का भूरा सा है। न जाने क्यों उसे अधिक रमने या देखने या मिले रहने का प्रयत्न करने से मुझ में अचेतना सी छा जाती है, निष्कामता सी छा जाती है। परन्तु अब तो यह हाल है कि जब वह स्वयं मेरा स्वरूप ही हो गई, फिर मिले रहने का प्रश्न ही कहाँ उठता है। यह सब होते हुए भी न जाने क्यों एक धीमी छटपटाहट या Craving सी दिल में बनी रहती है, परन्तु वह भी कुछ ऐसी है कि उसमें फिर भी दुई का सम्बन्ध नहीं, क्योंकि देखती हूँ उसका कोई लक्ष्य नहीं। न जाने क्या बात है कि देखती हूँ मानों भीतर-बाहर का कण-कण संतोष में पैठ गया है या संतोष बन गया है। परन्तु जो Craving है, वह मुझ से परे है। कुछ यह हो गया है कि देखती हूँ कि ईश्वरीय-मार्ग में भी चाह कुछ है नहीं और ‘मालिक’ जो दे देता है, तो मंज़ूर भी है। न जाने क्यों कुछ बेरुचि ने घर कर लिया है कि न ‘उसके’ ध्यान में रुचि है, न Constant Rememberance में रुचि और न मुझ में जीवन में रुचि है, न मौत में, न जाने क्यों लगता है, जो कुछ मैं बोलूं, या बात करूँ या लिखूं, मानों जैसे बच्चा जब पहली किताब लेकर बैठता है तो हर शब्द उसके लिये नये होते हैं, यही दशा रहती है। अब तो यह हाल है कि जिन्दगी का हर पहलू, सुबह-शाम, मेरे लिये मानों एक नये पहलू के सदृश हैं। किन्तु फिर भी मुझे इनमें कोई रोचकता नहीं। सामने संसार जो कुछ है, जड़, चेतन, सब केवल हल्के धुएँ के समान हैं, बस कुछ नहीं। अब तो यह हाल है कि ज़िन्दगी का एक नया नहीं बल्कि अति प्राचीन पहलू, जो भूले-बिसरे की हालत है, बस जाने क्या है। सादगी, पाक़ीजगी कहने को कह लीजिये, न कुछ नया है, न पुरातन है। मैं अपने भीतर-बाहर कहती हूँ, किन्तु मानों बिना किसी Sense के। मुझे अब भीतर-बाहर कुछ अनुभव नहीं होता। 

    अब तो यह हाल है कि दिन-दिन भर मेरी समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूँ। बीच सिर में माँग के बिल्कुल लगे-लगे एक नस सी में ऐसा लगा करता है कि जैसे कोई पतले तार को उँगली से हिलाते हिलाते छोड़ दे, ऐसे ही वह खटका करता है और उसमें पिपरमिन्ट की तरह कुछ ठंढा-ठंढा सा लगा करता है। कभी-कभी सा लगा करता है। कभी-कभी ठंढक माथे तक में आ जाती है, लेकिन बड़ी महीन सी ठंढक होती है वह। लगता है कि मेरे ‘मालिक’ को भी लीला का पहलू समाप्त, यहाँ अब समाप्त हो गया।

    छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति :-

   आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-476
लखीमपुर
13/4/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

यहाँ सब कुशल है। आशा है ‘आप’ भी सकुशल होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

     भाई, ऐसा हो गया है कि दशा ऐसी शायद ठस हो गई है, किन्तु यद्यपि ऐसा नहीं है, परन्तु फिर भी, अचेतन दशा कहूँ, तो है नहीं, चेतन दशा कहूँ, तो भी है नहीं। खाली कहूँ, तो भी नहीं, शून्य कहती हूँ, तो भी दशा का वास्तविक रूप नहीं आ पाता है। मेरे लिए सब वृथा है, बेकार है। बात तो यह है कि दशा यह है, जहाँ शब्द ही नहीं, ध्वनि ही नहीं है। स्पर्श भी है या नहीं, इसका होश नहीं। ब्रह्म-दशा कहती हूँ, तो भी दशा ठीक अदा हो नहीं पाती है। दशा तो महाशून्य की ओर जुड़ी लगती है। लगता है खालीपन या शून्यता और मर-मिटना भी मानों मिट गया। जाने क्यों उत्सव आदि में, मेरी तबियत में, इतनी अच्छी नहीं रहती कि जितनी उसके बाद। एक अजीब साम्य अवस्था कह लीजिये कि जिसमें साम्यावस्था भी मिट चुकी है। लगता है बेहोशी की दशा भी मुझ से दूर जा पड़ी है कुछ ऐसी हालत रहती है कि ‘मालिक’ से मेरा नाता तो नहीं छूट गया। यद्यपि ‘मालिक’ जिसे पकड़ लेता है, उसे सहेजता ही जाता है। मेरी तो ‘उसकी’ ओर से भी केवल एक बेलौस हालत ही रहती है। मुझे न जाने क्यों ‘उससे’ मिलने की तड़प नहीं होती। कुछ दर्शन की उत्कंठा ज़रूर बनी रहती ही है। न जाने क्यों ‘मालिक’ का आकर्षण जो मुझे हर समय अपनी ओर खींचे रहता था, वह भी अब नहीं लगता। पीठ तो पूरी मानों दीमक ने चुन ली है और अब सिर भी।

    छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति :-

    आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
   पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-477
शाहजहाँपुर
17/4/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा पत्र 13.4.55 का मिला। तुम्हारा D1 का स्थान है। इसमें तुम आधे के करीब, बल्कि उससे कुछ ज़्यादा फैल चुकी हो। यह तुम्हारी हालत को मैं खबर देता हूँ। असल में चेतनता और अचेतनता दोनों में से कुछ नहीं है। अगर चेतनता का भास रहा तो, वह भी एक तरह का फंसाव है और अचेतनता का भास रहा तो उसके माने यह होते हैं कि चेतनता की दूसरी शक्ल में तबियत ठहरी हुई है और इसलिए चेतनता का ख्याल बाकी है। इन दोनों से रहित रहना ही अच्छा है, ताकि उसका Impression हम पर न पड़े इसके बाद भी एक और हालत आती है, जिसको Potentiality कहते हैं। जब हम इसको भी लाँघ जायें तब समझना चाहिये कि अब किनारा करीब है। वक्त को बचाने के लिये संक्षेप के साथ थोड़ा और लिखे देता हूँ। ब्रह्म-दशा तो तुम्हारी है, इसमें शक नहीं, मगर समझाने के लिये यों कहना पड़ता है कि जैसे कोई ब्रह्म के गुबार का एहसास कर रहा हो या उसकी हवा का चक्कर या मंडल में अभी हो। हैं यह सब ब्रह्म की ही चीजें। मगर इसका एहसास कि ब्रह्म-गति जब तुम कहती हो, तो कहने भर को रह जाती है। यह चीज़ यह ज़रूर बतलाती है कि उसकी शुद्धताई का कुछ न कुछ अन्दाज़ हो चला है, जिससे यह उम्मीद है कि ब्रह्म के गुबार वाली हालत से ऊंची जाओगी। पंथाई को यह बातें सब आती ही हैं।  बाकी और खत में लय- अवस्था इत्यादि का जो कुछ लिखा है, इन सबका जवाब यही है, जो ऊपर लिखा है। इस ख्याल से बाज़ आओ कि “मालिक से कहीं नाता तो नहीं छूट गया है”। मैं यह समझता हूँ कि ‘मालिक’ की ज़ात से तो नाता छूट गया है, मगर ‘मालिक’ से बहुत तेज़ जुड़ गया है। Saint तो West में कहलाये जाते हैं और अपने यहाँ सन्त कहते हैं। मगर अभी तुममें सन्त-गति पैदा नहीं हुई है। उम्मीद ज़रूर है, इसलिये तुमको Saint लिखना शुरू किया है, गोया सन्त से Saint लिखना शुरू किया है। बस उससे इतना ही अन्तर है, इसलिये Saint लिखता हूँ। पीठ और सिर का दीमक से चुनना, जो तुमने लिखा है, इसके मतलब मेरे ठीक समझ में नहीं आये। क्या इससे तकलीफ़ है? और जो कुछ भी है, तुम्हारे एहसास के अनुसार रीढ़ की हड्डी में मालूम होती है या कुल पीठ पर ? और सिर में मालूम होती है तो कहाँ पर ? क्या गुदगुदाहट और सरसराहट को तुमने दीमक का चुनना तो नहीं कहा है? अम्मा व चौबेजी को प्रणाम। भाई-बहनों को दुआ।

   शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-478
लखीमपुर
16/4/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

‘आप’ का कृपा-पत्र मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। भाई, मेरे लिये तो Saint शब्द का कोई अर्थ ही नहीं, कोई Importance ही नहीं। जब यह शब्द ‘आप’ ने लगाना शुरू किया था, तब जो कुछ था, अब वह भी नहीं है और दशा के लिये कहूँ कि खालीपन है, तो वह भी अन्दाज़ तक में नहीं आता। अब तो भाई, Saint का Paint भी उतरते-उतरते खत्म हो गया। खैर, जो है, सो ‘आप’ जानें, ‘आप’ का काम जानें। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

    मैं देखती हूँ कि जब कुछ न कह कर चुप हो बैठती हूँ, तब मेरी दशा का Sense कुछ न कुछ आ जाता है। गूंगे का गुड़ कहूँ, तो मिठास नहीं, न जाने कुछ यह है कि बेहोश रहती नहीं, परन्तु जाने क्यों, जब कोई कहता है-“कस्तूरी, श्री बाबूजी का तुम्हारे लिये पत्र आया है”, तो मैं ले तो लेती हूँ, क्योंकि वह मेरी ओर बढ़ाता है, नहीं तो मेरी समझ में नहीं आता कि कौन कस्तूरी, कौन बाबूजी, पता ही नहीं। यही नहीं, बल्कि कोई कुछ कह भी रहा है या नहीं, मुझे पता ही नहीं रहता और उस पर भी मुझे पता नहीं रहता, इसका भी पता नहीं रहता है। मेरी तो अन्तर शक्ति, मेरी अन्तरात्मा सो गई। न जाने मुझे क्या हो गया है कि तबियत ने ‘मालिक’ के कदमों को भी कहीं छोड़ न दिया हो, क्योंकि तबियत को अब मैं वहाँ भी नहीं पाती। कुछ अजीब तबियत है कि न गाती है, न रोती और न चुप ही बैठे देखती हूँ और उसका चलना भी एहसास में नहीं आता। लगता है मेरे ‘प्रभु’ कि मैं उस ओर बढ़ चुकी हूँ कि जहाँ केवल अंधेरा ही अंधेरा है और अंधेरा भी ऐसा कि जिसमें अंधेरा नहीं है, जिसमें एक अंधेरी, सोई सी अवस्था फैली है। यह मुझे न जाने क्या हो गया है कि अब तक मैं अपनी हालत में हर समय फ़ना सी रहती थी, परन्तु अब मुझसे वह भी नहीं हो पाता है।

     अम्मा ‘आप’ को शुभाशीर्वाद कह रही हैं और केसर तथा बिट्टो प्रणाम कहती हैं। इतिः-

    आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
   पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-479
लखीमपुर
19/4/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा एक पत्र मिला होगा। यहाँ सब लोग सकुशल हैं। आशा है ‘आप’ की खाँसी अब तक ठीक हो गई होगी। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

    भाई, अक्सर ऐसा लगता है कि तमाम कुल शरीर पर मानों किसी ने पिपरमिन्ट की बूंदों की वर्षा कर दी हो। ऐसा हो जाता है और बड़ी देर तक ऐसा रहता है, किन्तु बाईं ओर बहुत अधिक रहता है और सिर तथा कुल माथे में, माँग के लगे-लगे में दाहिनी ओर अधिकतर ऐसा हुआ करता है। लगता है कि मैं तो अब ऐसे मैदान में हूँ कि जहाँ केवल सुषुप्त अवस्था भी सुषुप्ति अवस्था में फैली हुई है। ऐसा लगता है कि यदि कोई मुझे मरा कह दे तो मरी हूँ और ज़िन्दा कह दे तो भी परवाह नहीं। पता नहीं मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है। मेरा तो यह हाल है कि कोई किसी को चाहे बाल-विधवा कह कर दया प्रकट करता है, मैं फिर भी चुप की चुप रहती हूँ। मुझे कोई विधवा, सथवा नज़र नहीं आता। स्वयं मुझे कोई जैसा कह दे तो वही मेरी समझ में आ जाता है। यहाँ तक कि अनजाना आदमी यदि मंजू, मुन्नी को पूछ बैठे कि ये आपकी लड़कियाँ हैं, तो मेरी समझ में वही आ जाता है। यदि ‘मालिक’ की हर समय निगरानी न रहती, तो दुनिया जाने क्या-क्या कह डालती, किन्तु मुझे इसकी भी परवाह नहीं, क्यों कि मुझे दुनिया दीखती नहीं। भाई, एक ऐसी हल्की हालत मेरे कण-कण में समा गई, ऐसी भोली सी दशा मुझमें ‘मालिक’ ने पाग दी है कि मुझे अनुभव तो होता है, किन्तु चुप रहना अच्छा लगता है और ‘अच्छा लगता है’ अलग कर दीजिये, तब ठीक होगा। यह हाल भी है कि मैं चुप दशा में ही पग चुकी हूँ। मैं तो न कभी बोली थी, न बोलूंगी। न अपना बोलना सुनाई पड़ता है, न दूसरे का। ऐसी अज्ञान, चुप सी हालत है कि जिसे ‘मालिक’ ही जान सकता है, मैं कह नहीं सकती और यह अज्ञान हालत की भी मुझे याद नहीं रहती।

   छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

    आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-480
शाहजहाँपुर
23/4/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे दो पत्र 16 और 19 अप्रैल के मिले। दोनों का साथ ही साथ जवाब दे रहा हूँ। मेरे एक जुम्ले के माने तुम ग़लत समझ गई हो; जो 19 अप्रैल के खत में दर्ज है, वह यह है कि “इस ख्याल से बाज़ आओ कि कहीं ‘मालिक’ से नाता तो नहीं छूट गया”। इसका मतलब यह है कि नाता बिल्कुल नहीं छूटा है और यह ख्याल नहीं करना चाहिए कि नाता छूट गया। एक तो Initiation है, यह बिल्कुल पक्का नाता है और जिनका हो गया है, उनका नाता तो कायम ही है। दूसरी चीज़ इससे बढ़ कर है और वह प्रेम और आध्यात्मिकता का रास्ता।

    अब मैं तुम्हें समझाता हूँ। प्रेम करते-करते जिस्म से अभ्यासी ऐसी हालत पर पहुंच जाता है कि प्रियतम की अंतरिक्ष हालत से नाता जुड़ना शुरू हो जाता है और अभ्यासी की निगाह उसी पर जम जाती है अर्थात् प्रियतम की अंतरिक्ष हालत में वह घुस ही नहीं पड़ता, बल्कि मिलकर एक हो जाता है। अब जब अपने आपको उसमें लय कर दिया, तो ताल्लुक जिस्म को छोड़कर उसी से जुड़ता रहता है। गुरू जिस्म नहीं है, और अगर उसको जिस्म समझा जावे तो कबीर साहब की कहावत के अनुसार वह अभ्यासी गुरू-पशु है पर याज्ञवल्क्य ने अपनी स्त्री मैत्रेई से बहुत सख्त कहा है, जिसका मतलब यह है कि गुरू को गुरू की हैसियत से समझना और पूजना चाहिये। पहले मोहब्बत जिस्म से की जाती है, फिर अभ्यासी आत्मा में सम्मिलित होने लगता है। मैंने पिछले खत में यह लिखा है कि जात से नाता छूट चुका है मगर मुझसे बहुत तेज़ जुड़ गया है, जिसका मतलब यही था, जो ऊपर लिखा है। कुछ न कुछ नाता जिस्म से अभ्यासी का ज़रूर रहता है, मगर उसका एहसास उस वक्त होता है, जब कि वह हालत ले लेता है। ऊपर उठने के माने यही हैं कि गुरू की Innermost condition में लय हो जावे और अगर यह बात नहीं होती तो जीवन का उद्देश्य प्राप्त ही नहीं हो सकता। तुम तो कहीं ऊपर जा रही हो, तुम हमारी इबारत को गलत कैसे समझ गई, जबकि तुम्हें हर बात का खुद एहसास है मुझे उम्मीद है कि तुम अब समझ गई होगी। अगर न समझी हो तो हम फिर समझाने की कोशिश करें। मैं 13 अप्रैल के खत का जवाब पहले दे चुका था, अब आगे जबाब 19 अप्रैल का समझो। तुमने इस खत में लिखा है कि जीवित रहने का मन कुछ नहीं होता, यानी जीवन की ओर से तबियत बेपरवाह सी रहती है आगे यह भी लिखा है कि कोई मुझे मरा कह दे तो मरी हूँ और ज़िन्दगी की बात चले तो परवाह नहीं। इसका मतलब तो यह है कि तुम जैसी हो, वैसी ही रहो और यह इस बात को साबित कर रहा है, कि ईश्वर ने चाहा तो आगे बढ़कर यह हालत भी आवेगी कि यह एहसास होने लगे कि न कभी तुम पैदा हुईं, न मरी; यह बड़ी उम्दा हालत की शुरूआत है। मैंने किसी वक्त इस हालत के बारे में चौबे जी को लिखा है। मगर हालत तो तब है कि जब कोई भी एहसास न रहे और अभ्यासी को यह अख्तियार पैदा हो जावे कि जिस हालत में जब चाहे आ जावे। यह हालतें उसी वक्त पैदा हो सकती हैं, जब कि सिखाने वाले की अंतरिक्ष हालत में पहुंचना शुरू करें और फिर पहुंच जावे। गुरु का जिस्म अगर ख्याल किया जावे तो जिससे कि जानवर बने हैं उसी से वह भी बना है; चीज़ तो वह चेतनता है, जो इसके पीछे है। तुमने अपना उद्देश्य पूछा है; जीवन का उद्देश्य हर शख्स का यही है कि अपने आपको अपने असल में लय कर दे। अब यह उद्देश्य जिस तरह से प्राप्त हो, प्राप्त करें और यह अपनी तबियत पर है कि इस मतलब के सिद्ध होने के लिये अपनी रुचि के लिहाज़ से तरीका इख्तयार करे। अगर जंगल में रहने से यह चीज़ प्राप्त हो सकती है और उसका ख्याल इसके लिये मजबूर करता है तो वही करना चाहिए। और अगर तबियत में इतना ठहराव है कि घर में रहकर उसकी तबियत असल की तरफ भागती है तो वह घर ही में रहे और अगर घर में रहकर उसकी वृत्ति सन्यस्त की तरफ जाती है तो इसी हैसियत से उसको घर में रहना चाहिए। लोग ऐसे भी हैं कि घर में रहते हुए शादी वगैरह नहीं करते, इसलिये कि उनकी तबियत इसी क्रिया से उनको फलीभूत कर सकती है, तो वह भी ठीक है। इसलिए तुम कह सकती हो कि जीवन का उद्देश्य हासिल करने के लिये तुम्हारी, संस्कार द्वारा ऐसी ही वृत्ति बन गई कि यही हालत जिसमें तुम हो प्राप्ति के लिये मुनासिब थी, क्योंकि मुख्य चीज़ यही है कि जीवन का उद्देश्य जैसा कि ऊपर लिखा है हासिल करे और उसमें जो भी Sacrifice जरूरत है, करे सो तुमने तो Sacrifice अपने उद्देश्य प्राप्त करने के लिये की है। तो इससे तो हर conscious मनुष्य को खुश होना चाहिये और तुम्हारी कद्र करनी चाहिए।

     तुमने कहीं पर लिखा है कि D1 पर कुछ सख्ती है, यह एहसास तुम्हारा सही है। ईश्वर ने चाहा, यह चीज़ भी ठीक हो जावेगी। Dr.K.C.Vardhachari का खत आया है, जिसकी नकल भेज रहा हूँ। तुम भी इसको पढ़ कर समझ लेना और इसके मुताबिक जैसा मुनासिब हो, इनको फ़ायदा पहुंचाना। वह रोशनी देखना चाहते हैं। उन्होंने खत में यह भी लिखा है कि मैं उनको पैदाइश का दिन और वक्त लिखूं और जिन्दगी में खास बातों की तारीखें। मेरी जन्मपत्री चौबेजी के पास है उसमें पैदाइश का दिन यानी Date of birth देखकर मुझे लिख दो, क्योंकि मेरी माँ यहाँ नहीं हैं, वरना मैं उनसे पूछ लेता। चौबेजी को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

     शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-481
लखीमपुर
1/5/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आप’ का मिला। पढ़ कर प्रसन्नता हुई। मैं तो यह देखती हूँ कि मेरी हालत सदैव समान रहती है। खैर, जो कुछ भी हो। ‘मालिक’ की कृपा से मेरी जो आध्यात्मिक हालत है, वह मैं लिख रही हूँ।

   मैंने यह देखा है, न मैं कभी मरी थी, न पैदा हुई थी, न मरूँगी। उसका अब यह हाल है कि अब मुझे यह याद तक नहीं पड़ता कि कभी-कभी मुझ में यह थी या हो सकती है। यदि निगाह पीछे देखें, तो आशा है कि केवल उसका आनन्द भर ले सकूंगी, अपना नहीं कह सकती और केवल इसी के लिये क्या, बल्कि जो भी हालत एहसास में आ सकती है, सबका यही हाल है कि Temporary आ सकती है, क्योंकि मैं तो अपने को जल में कमल के पत्ते की तरह सूखी की सूखी पाती हूँ। किन्तु एहसास उस सूखेपन के एहसास में भी असमर्थ ही है। निर्बोध तबियत रहती है। मेरी दशा में ऊंची, नीची, किसी का भी एहसास नहीं होता। ऐसी दशा है, जैसे मुर्दा नहलाने वाले के हाथ में रहता है, वरना जीवन में न कोई ऊंचाई की बात लगती है। जैसे चलता है, चला जाता है। बिल्कुल मामूली घरेलू सा जीवन हो गया है।

    तारीख 24 को रात में बाबूजी को अपनी सूक्ष्म हालत का धब्बा साफ़ करते देखा। मैंने यह देखा कि चाहे मौत ही सामने आवे, किन्तु, अन्दर न तो कुछ भय होता है, न अंतर की हालत में रंचमात्र भी हरकत होती है। दशा में मस्ती नहीं, बेखुदी कह लीजिये, वह भी विस्मृत दशा में एक कुछ यह है कि पहले मैं घर में घुस रही थी और अब घर मुझ में समाया जा रहा है क्योंकि अब मुझे घर का कुछ एहसास नहीं। न जाने क्यों मुझ पर अक्सर खुमारी की हालत आ जाती है, तभी कुछ आलस्य हो जाता है, वैसे ठीक रहती है। कुछ यह है कि मुझे तो केवल ‘मालिक’ की कृपा व स्नेह का Vibration ही लिये चल रहा है। वरना मुझ में अपना उछाह, उत्साह व प्रेम कभी कहीं नज़र नहीं पड़ता। यही नहीं, स्वयं अपना चलना भी एहसास में नहीं आता, परन्तु न जाने क्यों रुकी हालत तो तुरन्त पहिचान में आती है।

    कुछ यह हो गया है कि मेरी हालत में जो एक तरह की दृढ़ता सी रहती थी, वह नहीं दिखाई पड़ती और शिथिलता भी नहीं कह सकती। हाँ, अब दृढ़ता, उत्साह, प्रेम, सब मुझे पराये से नज़र आते हैं। यानी ‘मालिक’ की आज्ञा पर तो, उस आज्ञा-पूर्ति के लिये दृढ़ता व उत्साह आ गया, फिर चला गया। जब ‘मालिक’ जो दे देवे, सोई चीज़ है, फिर कुछ नहीं। इसलिये मुझे अब ताव नहीं आता, तेज़ी नहीं आती। कोई पूजा करता है, तो मैं नहीं जानती कि मेरे Through कुछ पूजा उसकी हुई या नहीं, किन्तु वह तो कहता है-तबियत लगी। मेरे अन्दर तो न ताव है, न ठंढक। मुझे तो जब-जब ‘मालिक’ कुछ देर के लिये जो दे देता है, सो दे देता है। किन्तु खुमारी आकर कभी-कभी मुझ में आलस्य फैला देती है और देखती हूँ कि आलस्य रहते हुए भी मुझ में तो वह कुछ नहीं आता निर्बोध तबियत रहते हुए भी मैं उससे अनभिज्ञ ही रहती हूँ।

    अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

    आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-482
शाहजहाँपुर
4/5/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारा 1 मई का पत्र मिल गया। डा. वर्धाचारी का खत आया, उसकी नक़ल मैं तुम्हारे पास भेज रहा हूँ। इसको पढ़ लेना, जहाँ पर समझ में न आवे, चौबेजी से समझ लेना। इसकी नकल मैं तुम्हारे पास इसलिये भेज रहा हूँ कि तुम भी उन्हें Training दे रही हो तुम्हें उनका हाल मालूम होना चाहिए, ताकि तुम उनकी कमियों को समझ लो और उनको दूर करने की कोशिश करो। मैंने तुम्हें जो सत्संगियों की फेहरिस्त दी थी, उसमें कुछ नाम और बढ़ा लो, अगर मैं उसमें भूल गया हूँ- 1. S.K. Raja Gopalan, Engineer at Delhi. 2. Kumara Swami और उनकी बीबी।

    तुम्हारे खतों का जवाब देना अब यों मुश्किल पड़ रहा है कि दो ही हालते गहरी होती चली जाती हैं कि इधर से तोड़ना और उधर को जोड़ना अर्थात् बिल्कुल यही हालत हो रही है कि तुम ऐसी लय होती चली जाती हो कि अपने आपको खोती चली जाती हो। तुमने अपने पत्र में लिखा है- “कस्तूरी को यदि चिट्ठी लिखवा दें, तो मैं दे दूंगी।” इसमें वह हालत छिपी हुई है कि इसकी जहाँ तक तारीफ़ की जाये थोड़ी है और यह तुम्हारे खो जाने का पूरा सबूत है।

    अभ्यासी जब अपने आप को बिल्कुल लय कर डालता है, तब असली ज़िन्दगी शुरू होती है और उसी हालत में ठीक तौर से यह तीन बातें होना शुरू हो जाती हैं-1. Divine thought, 2. Divine action और 3. Divine wisdom. इस खत में जो कुछ भी लिखा है, सब लय अवस्था की अच्छी कैफ़ियत है। अभी अन्त दूर है और फिर इसके बाद जो ज़िन्दगी आती है, वह भी लय होना शुरू होती है। अंत-गति मुझे तो यह मालूम होती है कि oneness में पहुंच कर इस चीज़ की खबर न रहे। मैं समझता हूँ, इतना जवाब के लिए काफ़ी है। तुम तो ईश्वर की कृपा से बहुत काबिल लड़की हो। तुम से mission को बहुत काफ़ी फायदा पहुंचेगा।

    शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-483
लखीमपुर
12/5/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

‘आप’ का कृपा-पत्र मिला। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ। ‘आप’ ने कृपा करके मुझे E1 पर खींच दिया है, इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

   अब तो कुछ यह हाल है कि यदि कस्तूरी की बात हो रहीं हों, तो सुनती रहती हूँ, परन्तु यह ध्यान नहीं जाता कि यह मेरी ही बातें हो रही हैं। कुछ यह देखती हूँ कि अपना अन्तर तो ऐसा है कि सारे में निकल जाऊं, घूम आऊं, परन्तु कोई फाटक नहीं पड़ता। सब open पड़ा हुआ है, चाहे कोई आवे, चाहे कोई जावे। भीतर कभी निगाह करती हूँ तो ऐसा ही पाती हूँ। कुछ यह है कि निगाह करती हूँ Heart पर, परन्तु न जानें क्यों लगता है कि मानों Heart तो स्वयं मेरी आँख ही बन गया है। किन्तु भई, कुछ यह भी है कि मैंने तो Heart कभी देखा ही नहीं, ‘मालिक’ को ही देखा है। मैंने घर कभी देखा ही नहीं। मेरी निगाह तो घर के ‘मालिक’ के पीछे लगी रही। अब तो यह हाल है कि घर-बार का पता नहीं, किसी का पता नहीं। बस, चूंकि ‘मालिक’ के पीछे भागती रही, तो उसकी याद को एक कसक या उस कसक की याद कहीं है, परन्तु वह ऐसी कि पता नहीं कहाँ है और क्यों है। यह कसक भी देखती हूँ, अब अन्तर में नहीं रहती, बल्कि इसे Divine कह लीजिये, तो ही ठीक होगा और Heart भी केवल Divine House है, इसके अलावा कुछ भी नहीं। यही नहीं, बल्कि दशा भी मेरी कुछ नहीं। Soul ही मेरी कहीं नहीं। मेरे अन्दर तो Divine Condition और Divine Soul और Divine Spirit ही इस घर को यानी कस्तूरी नामक खोल को Represent कर रही है। कुछ ऐसा है कि दशा भी मेरी अपने में नहीं, बल्कि मानों कहीं धरोहर की तरह एहसास में आती है।

    भाई, मेरा तो अब यह हाल है कि न तो वह एक ही दीखता है, न अनेक ही और न अब कोई मुझे दीखता है। परन्तु यद्यपि कोई नहीं दीखता, फिर भी न जाने कैसे, विमला को केसर या उमा को मिला तो नहीं समझ जाती। किसी की भी Individuality मुझे नहीं दिखाई पड़ती और न समानता का ही एहसास होता है, क्योंकि मुझे इन शब्दों में कोई तत्व या अर्थ ही नहीं भासता। कुछ यह है कि सब Immortal यानी ऐसे ही लगते हैं कि न कभी पैदा हुआ है कोई, न मरेगा। इसकी ओर कभी स्वप्न में भी एहसास नहीं होता और न जाने क्यों, स्वप्न, स्वप्न नहीं लगता, क्योंकि नींद, नींद नहीं मालूम पड़ती और जागरण, जागरण नहीं लगता, क्योंकि दुनिया, दुनिया नहीं लगती हैं, शरीर, शरीर नहीं लगता। कुछ एहसास नहीं होता। यहाँ तक कि अब हालत में केवल कहने की भी गुंजाइश नहीं पाती हूँ।

    दशा क्या लिखूं भाई, अब तो आनन्द, आनन्द नहीं है और रंज की भी दशा कह नहीं सकती। Active पना है, एहसास नहीं, और Inactive की दशा भी नहीं है। पहले मैं लिखा करती थी कि दूसरी दुनिया में रह रही हूँ, परन्तु अब न जाने क्या हो गया है कि दूसरी दुनिया के भी मानों मेरे लिये कुछ अर्थ नहीं। अब मेरी कोई दुनिया नहीं है। आदमी बोलता है, गाना होता है, किन्तु आवाज़ का एहसास नहीं होता और यद्यपि बात का जवाब ज़रूर देती हूँ और ग़लत नहीं देती। यही नहीं, भजन गाती हूँ, परन्तु अपनी Voice स्वयं नहीं सुन पाती। बात कहती हूँ, तो खुद अपने को यह एहसास, यह पता नहीं रहता कि झूठ कह रही हूँ या सच और बात की Sound की गुज़र नहीं। इसलिए अपने पर अब मानो विश्वास नहीं। कोई झूठ कह दे, तो ठीक, सच कह दे तो वही लगने लगता है। किसी को पूजा कराती हूँ तो, जब भी कोई यह कह देता है कि आज मन नहीं लगा। क्या आज आपने Sitting नहीं दी, तो मुझे वही लगने लगता है, परन्तु ऐसा होता नहीं। पूजा ‘मालिक’ ज़रूर करवाता है। मुझे ‘उसी’ का भरोसा है। दूसरी दुनिया का एहसास कैसे हो, जबकि मेरी रहनी ही नही रह गई। शब्द रहनी नहीं तो उसका स्थान कहाँ।

    छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

     आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-484
लखीमपुर
14/5/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

इधर जो आत्मिक दशा मेरी समझ में आई है, सो लिख रही हूँ। भाई, कुछ यह हाल है कि न जाने कैसे जब तक भजन गाती हूँ या सुनती हूँ तो मानो श्री ‘बाबूजी’ हर जगह दिखाई पड़ते हैं और उसके बाद फिर जाने क्या हो जाता है, पता नहीं। यही नहीं, बल्कि कुछ यह हाल है कि जहाँ भी, जब भी ‘मालिक’ को याद करती हूँ, तो वहीं पाती हूँ, मानों वे पहले से ही उपस्थित रहते हैं। कुछ यह देख रही हूँ कि शब्द ज्यों की त्यों भी दशा के लिये उचित नहीं पाती हूँ, क्योंकि ज्यों की त्यों कहने में कुछ एक idea सा पाती हूँ, जो मेरी दशा से अछूता ही रहता है। कुछ अज्ञान सी दशा रहती है और इस दशा की ओर भी निगाह में जाने क्यों स्थिरता नहीं है। कुछ यह हाल है कि ‘मालिक’ सब जगह है, और कहीं नहीं है। ऐसा लगता है कि मानों ‘मालिक’ ही याद को अपने संग लाता है और फिर ले जाता है। फिर भला वह छोड़े भी तो किस बूते पर, क्योंकि मैं तो बिल्कुल शक्तिहीन, निर्बल हूँ। रग-रग शक्तिहीन है, किन्तु चलती-फिरती हूँ। शरीर में कमज़ोरी नहीं है। जाने अब मानसिक शक्ति भी मुझमें कभी नहीं फटकती। बस, जब ‘मालिक’ अपने काम के लिये दे देता है, तब कुछ एहसास होता है। फिर जहाँ काम ख़त्म किया और वह भी गई। एक बात कुछ यह है कि लगता है कि मैं कहीं फैल चुकी हूँ। लगता है कोई दशा मुझ में हज्म हो चुकी और अब तो वह हज्म हुई दशा भी मिट चुकी है और बहुत सम्भव है कि वह किसी प्रकार की लय-अवस्था हो क्योंकि यह लय-अवस्था भी देखती हूँ कि ‘मालिक’ अपनी याद के साथ लाता है और फिर ले जाता है। अब मेरा हाल यही है कि मेरा तो सब कुछ वही है, क्योंकि जब उसे देखती हूँ, दर्शन करती हूँ, तभी मेरे में सब दशा लगती है, वरना कुछ नहीं। चेतना सी ही नहीं रहती।

   छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

    आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-485
शाहजहाँपुर
20/5/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारे 12 व 14 मई के पत्र मिल गये। मैंने पढ़ाई की वजह से केसर के ख्याल का रुख कुछ आध्यात्मिकता से हटा कर पढ़ाई की तरफ़ कर दिया, मगर उससे उसका कुछ नुक़सान हुआ। अब मैं नतीजा आने पर उसे ठीक कर दूंगा।

    तुम्हारे खतों के जवाब देना अब बड़ा मुश्किल है क्यों कि अब लय-अवस्था और फिर उसकी ज़िन्दगी ही चली जावेगी। जिन्दगी के माने बक़ा के हैं, और बक़ा को तुरिया कहते हैं। मेरी समझ से हर लय-अवस्था के बाद एक तुरिया आती है और यही दौर चला जाता है। Fine और Super Fine का हिसाब रहता है। तुमने जो कुछ भी हालत लिखी है, यह सब लय की लय अवस्था बता रही है। जिन-जिन पर तुम Working कर रही हो, उन सब की आध्यात्मिक दशा अच्छी है। माता जी को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहनों को दुआ।

     शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-486
लखीमपुर
23/5/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आपका कृपा पत्र मिला। पढ़ कर प्रसन्नता हुई। यहाँ सभी लोग कुशल पूर्वक हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

    भाई, कुछ यह हाल है कि कुछ दिन पहले एक दिन, दिन में लेट गई और ज़रा सी आँखे मूंद ली, तो आँखें मूंदते ही मानों सिर के पास चारों ओर एकदम से बड़ा भारी लम्बा-चौड़ा साँप लोट गया और फिर एकदम से गायब हो गया। तुरत उठकर देखा तो कुछ नहीं। यह एकाएक कुछ हो गया। अब यह क्या है, ‘आप’ ही जानें।

    अब तो भाई, कुछ यह हाल है कि बच्चे को गोदी लिये फिरती हूँ, फिर भी उसकी Touching का अनुभव नहीं होता। यही नहीं, बल्कि कुछ ऐसा लगता है कि कोई शक्ति मेरी तबियत को यहाँ (दुनिया में खींचे रहती है, जिससे कुछ स्वप्नवत् एहसास या चेत दुनिया के कामों को करने का रहता है, क्योंकि मैंने यहाँ तक देखा है कि मान लीजिये कि डाक्टर मुझ से कुछ हाल बतावे या कोई सत्संगी अपनी हालत बताता है तो अक्सर मैंने देखा है कि कोई शक्ति मेरी तबियत को नीचे खींचे है। उसी से मैं दूसरों की बात सुन पा रही हूँ। बस यही हाल है कि-“एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहूँ तो गारि”। यही नहीं, न जाने क्या बात है कि, देखती और सुनती आई हूँ कि ईश्वर सर्वव्यापी है, सर्व अन्तर्यामिन है, परन्तु मेरा अब यह हाल है कि मुझे उसके गुणों का या विशेषता का एहसास नहीं होता और असल बात यही है कि मुझे ‘वही’ एहसास नहीं होता या यों कह लीजिये कि न ईश्वर है, न कोई है। यह सब मानों भ्रम था। वास्तव में कुछ है ही नहीं। न कोई बनाता है, न बिगाड़ता है। न कुछ बनता है, न बिगड़ता है। कहीं कोई शक्ति नहीं और जब कुछ है ही नहीं तो बने बिगड़े क्या। न समय है, न आदि है, न मध्य है और न अन्त है। यह सब कुछ तो केवल भ्रम था। अब तो ‘मालिक’ जाने। लगता है मानों निगाह का जाला सा साफ़ हो गया हैI

    छोटे भाई-बहिनों को प्यार। 

  आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-487
लखीमपुर
27/5/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

‘मालिक’ की कृपा से यहाँ सब कुशल है। आशा है ‘आप’ भी कुशल होंगे। मेरी आत्मिक दशा, जो मेरी समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

    भाई, अब तो कल से ऐसा लगता है कि E1 की सैर समाप्त हो गई है। अब तो ‘मालिक’ के हाथों में है। मैंने जो निगाह का जाला साफ़ होना लिखा है, उसी के बाद ही मानों E1 की सैर भी समाप्त हो चुकी है। न जाने अब तो कुछ यह बात हो गई है कि 'मालिक’ शब्द का मानों मेरे लिये कुछ अर्थ ही नहीं रह गया है। न उसके लिये कोई जिज्ञासा होती है और न अर्थ ही उसका कुछ निकलता है। अन्तर में कोई change नहीं आता। ‘मालिक’ शब्द में तो मानों मैं ही विलीन हो चुकी हूँ, फैल चुकी हूँ।

    केसर ‘आप’ को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार।

   आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-488
शाहजहाँपुर
3/6/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे दो खत 23 मई और 27 मई के पहुंचे। केसर का भी खत आया। उसके System में वह डोरे तो अब नहीं हैं, मगर अभी यह ज़रूर मालूम होता है कि यहाँ पर डोरे थे। इसके माने ये हुए कि कुछ सूक्ष्म और हवाई रूप में कहने मात्र कुछ है। बाकी हाल जो कुछ उसने अपने खत में लिखा है वह सब यह बता रहा है कि धीरे-धीरे अच्छी उन्नति हो रही है। उसको विस्तार करने में क्यों समय नष्ट किया जाये, इसीलिये कि आपकी हालत खुद प्रशंसा कर रही हैं।

   तुम्हारा यह ख्याल सही है कि तुम्हारी E1 की सैर समाप्त हो चुकी है। मैं इसको देख चुका था, मगर न जाने क्यों हमें यह स्थान देख-देखकर और खास कर उसी पवित्रता को देख-देखकर यही जी चाहता है कि अभी कुछ दिन और रखा जावे और इसीलिए मैंने अभी ऊपर नहीं चढ़ाया है। मगर, खैर अब ज़्यादा नहीं रोकूंगा। तुमने अपने खत में लिखा है कि “मालिक शब्द के कुछ माने ही नहीं रह गये”, यह ठीक है। जिस चीज़ की तलाश थी या जिस ‘मालिक’ की ज़रूरत थी वह तो तुम खुद होती जा रही हो। यह ‘मालिक’ या गुरू का दिल में Conception रहना खुद एक बन्धन है। यह तुमने लिखा है, जिसको तुम ठीक तरह से Express नहीं कर सकीं, कि “ईश्वर इत्यादि सब भ्रम था”। यह एहसास बहुत अच्छा है और यह बात बता रहा है कि महा-प्रलय, जहाँ कि सब चीज नाश हो जाती है, उस हालत से तुम सम्बन्धित रहने लगी हो। मगर इस असली चीज़ के आने में अभी बहुत समय लगेगा। इसलिये कि इसमें भी बहुत सी हालतें बदलती रहती हैं। इतना तो ज़रूर हो गया है कि Unity का एहसास रखते हुए बहुत कुछ खत्म हो चुका है। तुमने यह जो लिखा है कि ‘मालिक’ को कब पाऊंगी, और कैसे पाऊंगी, इत्यादि, जब प्रेम ज़्यादा होता है तो यह चीज पैदा हो जाती है और फिर करते-करते आदत भी ऐसी बन जाती है कि मंजिल पर पहुंचने पर भी हम मंज़िल को ढूंढ़ने लगते हैं। तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

   मुरीद खाल खाल होते हैं, और फ़िदाई हज़ारों में एक।

   शुभ चिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-489
लखीमपुर
6/6/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा पत्र ‘आप’ का मिला। पढ़ कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

    एक दिन प्रार्थना के बाद भजन में न जाने क्या हुआ कि श्री बाबूजी तो सबको प्रत्यक्ष लग ही रहे थे, दूसरे भजन में जब यह लाइन आई कि- “जागो मन, नेकु विचार करो”, तो जागो शब्द आते ही actually ऐसा लगा मानों ‘श्री चरणों’ में से प्रकाश निकल कर हम सब की ओर आया और अकस्मात सब के हृदयों में जैसे ईश्वरीय प्रकाश के दीपक सब एक साथ जल उठे हों। किन्तु न जाने क्यों मेरे हृदय में नहीं जला। भाई, सच तो यह है कि जितना ‘मालिक’ हमें प्रेम करता है, हम उसे नहीं कर पाते। मैं तो प्रेम और Devotion की परिभाषा ही भूल गई। परिभाषा ही याद करके क्या करती, जबकि मुझ पर तो न जाने क्यों इन शब्दों का कुछ असर ही नहीं पड़ता। पहले मैं देखती थी कि प्रेम या Devotion का नाम आते ही अन्दर पिघलन सी शुरू हो जाती थी, मानों हृदय के आँसू झरने लगते हो। परन्तु अब यह हाल है कि मानों जैसे अन्तर अडिग और अविचल सा बना रह गया है। भाई, अब तो ऐसा मैदान है कि जहाँ पर, हद का सवाल कहाँ। न जाने क्यों बेहद का भी एहसास नहीं लगता। सब शून्य पड़ा है। अन्तर-बाहर, सब कुछ शून्य पड़ा है। न जाने क्या बात है कि दिल ‘मालिक’ के दर्शनों के लिये बेचैन हो हो उठता है, परन्तु न जाने क्यों देखती हूँ कि तबियत ऐसी नहीं बंध जाती कि ‘आप’ यहाँ आ ही जायें। लगता है, तबियत ने मुझे छोड़ दिया और ‘आप’ में जा मिली। कुछ ऐसी दशा है कि ऐसा कभी न था, जब मैं थी और न कभी होउंगी। सब ओर शून्यता व्याप्त है, यही कहना पड़ता है, नहीं तो क्या कहूँ, ‘आप’ ही जानें।

    भाई, मेरा तो यह हाल है कि मानो पथराई आँखों के सामने कोई चाहे कितने बढ़िया-बढ़िया चित्र रख दे, परन्तु उसके लिये केवल अन्धकार के कुछ नहीं। जाने क्या बात है कि मै शून्य दशा लिखती हूँ, परन्तु शून्यता का एहसास तो नहीं हो पाता। क्या जानू अब क्या है। कहने मात्र के लिये ही यह शब्द ले लिया है। वैसे तो ऐसा हुआ कि मेरी तो कलई खुलकर ‘मालिक’ के सामने बिखर गई। अब तो यह कह लीजिये कि-

   “बीती सो तो बिसर गई, आगे की सुधि नाहि।
   पथराई अंखियान सों, अब तो दीखत नाहिं।।”

    आज ‘आप’ ने कृपा कर के मुझे E1 से निकाल कर F1 पर कर दिया है, इसके लिए ‘आप’ को धन्यवाद देने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। अब तो ऐसा लगता है कि अन्दर-बाहर सुनसान मैदान है। अब तो ऐसा लगता है कि तबियत या दशा में पढ़ने को कुछ रह ही नहीं गया। हाँ, अनुभव में जो कुछ ‘मालिक’ दे देवे। मेरा तो न कोई है, न मैं किसी की हूँ। संसार है या नहीं, कुछ पता नहीं। अब तो मैं वहाँ चल रही हूँ कि जहाँ ज्योति की सम्भावना नहीं, अन्धकार कह लें, परन्तु पता नहीं, वह भी है या नहीं।

   अम्मा ‘आप’ को शुभाशीर्वाद कहती है। छोटे भाई-बहनों को प्यार।

   आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-490
शाहजहाँपुर
11/6/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 6 जून का मिला- पढ़ कर हर्ष हुआ। ‘मालिक’ का धन्यवाद है कि हममें से कोई पथराई आँखों से देखने वाला बन तो रहा है। असल में ब्रह्म-विद्या का दृश्य देखने के लिये पथराई हुई आँखों की ही ज़रूरत है। जब दुनिया को देखने वाली आँख फूट जाती है, तब कहीं इसके ऊपर का दृश्य सामने होता है। आँख फूटने से मेरा मतलब यह नहीं है कि सूरदास की तरह अपनी आँखें फोड़कर भक्ति में मसरुक हों। यह ज़रूर है कि उनके लिये उस वक्त सम्भव है कि यही मुनासिब हो। यों बात यह ज़रूर है कि अगर यह चीज़ कहीं और जगह मिले तो यह कहना ही पड़ेगा कि यह बड़ी कायरता है और पाप भी। तुम्हारे कुल खत में राम-कहानी लिखी है जो इस बात का सबूत है कि innocence की गति है। वह ज़्यादा प्रेम होने में हो जाती है। एक बात मैं और बताता हूँ कि अगर इस प्रेम में किसी के बावलापन पैदा हो जाये तो वह रूह (आत्मा) सम्बन्धी प्रेम नहीं। प्रेम तो वही है कि उसका पता न चले और अन्दर ही अन्दर सुलगता रहे। तुमने जो शून्य की अवस्था लिखी है, और यह भी लिखा है कि इस शून्यता का एहसास नहीं होता। इस हालत के लिये अगर खालीपन कहा जावे तो ज़्यादा स्पष्ट होगा। 

  तुम्हारा ख्याल यह ठीक था कि तुमने F1 पर कदम रख दिया और यह कदम तुमने अपने आप रखा। मगर हालत यह थी कि एक पैर तुम्हारा E1 और एक F1 पर। अब कल 10 जून की रात को 11 बजकर 53 मिनट पर मैंने तुम्हारा दूसरा कदम भी F1 पर रख दिया। अब तुम्हारा स्थान F1 है। केसर का भी पत्र मिला। उसकी हालत भी बहुत अच्छी होती जा रही है। तुमने अपने पत्र में राम कहानी लिखी है और उसने प्रेम-कहानी। आजकल मेरी तन्दुरुस्ती बहुत अच्छी है। कोई शिकायत ज़्यादा तकलीफ़देय नहीं है। रोटी दोनों वक्त खा रहा हूँ। Dr. Sen दवा के ज़ोर से खिला देते हैं। A. Ganeshan त्रिचनापल्ली चले गये। ख्याल ऐसा है कि वे सन्तुष्ट हो गये।

   अम्मा को प्रणाम, तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

   शुभचिन्तक
  रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-491
लखीमपुर
12/6/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आप’ का मिला। यह जानकर प्रसन्नता हुई कि ‘आप’ का स्वास्थ्य ठीक है। अब ‘मालिक’ की कृपा से, मेरी जो आत्मिक हालत है, सो लिख रही हूँ।

    अब तो भाई, दशा क्या है, एक ऐसा आईना कह लीजिये कि जिसमें कोई फ़ोटो नहीं दीखती। यहाँ तक कि अपना चेहरा भी नहीं दीखता। यद्यपि दिन भर चलती-फिरती हूँ और उसी के सामने या उसी में, परन्तु तब भी कोई चित्र नहीं, कोई छाँह तक नहीं पड़ती उसमें। ऐसा लगता है कि यह ऐसा आईना है, जो न कभी बनाया गया है, न बिगाड़ा ही जा सकता है, ज्यों का त्यों पड़ा है।

    भाई, अब तो कुछ यह हाल है कि जब सब लोग कहते हैं कि तुम खाट क्यों उठाती हो, बच्चों को गोदी क्यों लेती हो, इतना बोझ मत उठाया करो। परन्तु मैं अपनी दशा क्या बताऊं कि मुझे कभी ऐसा लगता ही नहीं कि कोई बोझा मैंने Touch तक किया है। यही नहीं, मैं तो अनबोलती ही हूँ। मैं कभी बोलती थी, यह पता नहीं। कभी कुछ बोलूंगी, खबर नहीं। न मेरे पास वाणी है, न शब्द है, न भाव है, और न भावना है। मेरे लिये तो भाई, रात कभी होती नहीं और दिन कभी आता नहीं। हाल कोई है नहीं, बेहाल कहूँ तो होश नहीं। कुछ ऐसा है कि हालत को शुद्ध कहूँ तो एहसास में नहीं आती। हल्की कहूँ तो भी कोई अर्थ नहीं निकलता। हालत बेअसर कह लें तो कह लें। तुरिया अवस्था कहूँ तो मानों इससे बिल्कुल ही अनभिज्ञ हूँ।

     कुछ ऐसा है, न जाने क्यों, कि अक्सर देखती हूँ कि खुद अपने बोलने तक का भी जैसे Shock लगता है, यद्यपि अपने शब्द, मैं स्वयं ही नहीं सुन पाती। न जाने क्यों अब तो ऐसा लगता है कि मेरी आत्मा पिघल कर बिखर गई। इससे भीतर-बाहर, हर कण-कण, मानों आत्मा ही हो गई है। जब मैं यह सुनती हूँ कि अपनी आत्मा को Realise करना है तो मेरे में आत्मा ही नहीं तो मैं Realise क्या करूंगी। वास्तव में Realization शब्द मेरे लिये कोई माने ही नहीं रखता है। मेरी कुछ ऐसी अनभिज्ञ हालत है कि पता नहीं ‘मैं’ क्या करूँ, क्या न करूँ मैं ‘मालिक’ की हूँ, यह मैं माने हुए हूँ। वरना न जाने क्यों मुझे इसका अब एहसास क्यों नहीं हो पाता है।

     इधर कुछ यह न जाने क्या बात है कि Heart पर मानों किसी Vibration का shock सा लगा करता है। इधर न जाने क्यों, जो भी कपड़ा पहनती हूँ, उसका तार-तार और जो भी चीज़ मेरे शरीर से Touch हो जाती है, उसमें मुझे यही लगता है कि मानों श्री बाबूजी ही भर गये हैं और अपनी ओर देखती हूँ तो अपने को ‘श्री बाबूजी’ से भी खाली पाती हूँ। हृदय के कोने-कोने में घूम आती हूँ परन्तु श्री बाबूजी को नही पाती हूँ। अब तो यह लगता है कि बेचैनी मुझे ढूंढ़ते-ढूंढ़ते पीछे ही रह जाती है। मैं खुद अपने को नहीं जानती, तो उसे कहाँ पहुंचाऊ। यहाँ तक है कि अपनी फ़ोटो को भी पहिचान ही नहीं पाती हूँ। 

  अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती हैं और केसर प्रणाम कहती है। इति:-

  आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
   पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-492
लखीमपुर
15/6/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

यहाँ सब कुशल हैं, आशा है, ‘आप’ भी सकुशल होगें। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

    न जाने क्या बात है कि कल 4-5 घंटे मुझे ताऊ जी से बाबूजी की बातें सुनते बीता, परन्तु फिर भी न जाने क्यों, तबियत में बजाय खुशी के एक अजीब उदासीनता ही भरी रही। मैं देखती हूँ कि भीतर तबियत में शायद इतनी गाढ़ी उदासीनता पड़ी है कि वह कभी खुश होना जानती ही नहीं। ऊपर तो कभी-कभी खुश होती रहती है, और वह भी ‘मालिक’ ही रखता है, परन्तु ऊपर की खुशी पृथक ही चीज़ होती है, उससे तबियत का कुछ वास्ता नहीं रहता, क्योंकि बात तो यह है कि उस खुशी की मुझे खबर ही नहीं होती। मुझे तो जाने क्या हो गया कि प्रार्थना, भजन, पूजा करना, सब एक मामूली दिनचर्या की भाँति रह गया है। अब तो भाई, आँखें पथरा गई, इसकी भी खबर नहीं, क्योंकि इसका भी एहसास नहीं रह गया है। ‘आप’ के पत्र पढ़ने पर भी मानों कुछ समझ तो कभी आती ही नहीं। अब तो दशा यह है कि, शान्ति नहीं, अशान्ति नहीं, बस दिल में एक ऐसा दर्द सा रह गया है, बस उसके अनुभव में अशान्ति या बेचैनी कह लीजिये और जब वह अनुभव न हो तो शान्ति कह लीजिये। मैं तो देख रही हूँ कि मैं तो मानों एक अंधेर नगरी में घूम रही हूँ, जहाँ अंधेरा कहने भर को ले लिया है। अब यह तो ऐसी नगरी है, जिसमें लगता है कि कभी कुछ था ही नहीं, किन्तु फिर भी कुछ भाँय-भाँय नहीं होता कि डर लगे और डर क्या लगे, जब अंधेर नगरी तो मेरा रूप ही हो गया है। हाँ, कुछ न होने से खालीपन में तबियत तो पग सी गयी है। उस कुछ को, जब मैं Read करती हूँ तो वह ‘मालिक’ की ऐसी सहज कृपा लगती है कि जैसे, ऐसी खाली नगरी भी मानों मेरे लिए एक Soothing way के समान है। कहानी तो मेरी समाप्त प्रायः है, क्योंकि कुछ कहने के लिये बात नहीं है।

    छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

    आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-493
शाहजहाँपुर
19/6/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे 12 व 15 जून के पत्र मिले। मैं दोनों खतों का एक साथ जवाब दे रहा हूँ। तुम्हारे खतों को देखकर एक टुकड़ा याद आया। यह याद नहीं कि किसका कहा हुआ है। मगर ख्याल यह है कि कबीर ने कहा है- “हाँ, नहीं के बीच जो है सो है”। दुनिया में दो ही सूरतें पाई जाती हैं, ठंडी और गर्म। जो चीज़ इसमें प्रधान है, समझ लो कि हम उसी शक्ल में हैं और जब इनकी प्रधानता जाती रहती है तो वही चीज़ रह जाती है, जो असलियत है। अब इसमें तो तुम्हारा पैराव शुरू है ही, मगर असल चीज़ से फिर भी भारी है। तुम्हारे खत में यह चीज़ मुझे बहुत पसन्द आई कि मेरे लिए रात कभी होती नहीं और दिन कभी आता नहीं, इसके मानी यह हैं कि एकसार हालत चल रही है। हालत तो एकसार ही कही जायेगी या समासम, मगर अपनी राख में गर्मी कुछ मौजूद है जिसका एहसास होना बहुत मुश्किल है। तुमने एक बात यह जो लिखी है कि हृदय पर किसी Vibration का shock सा लगा रहता है; हो सकता है कि मेरे दिल का Vibration तुम्हारे दिल में पहुंचता हो और मैं यह इसलिये कहता हूँ कि मुझे कुछ अच्छी उन्नति करने के बाद यह कम्पन इस शक्ल में बराबर महसूस होता रहा है जो हमारे गुरू महाराज की तरफ़ से आता था। तुमने यह जो लिखा है कि आत्मा भी गल कर समाप्त हो गई, ऐसा लगता है, सो आत्मा अभी गल कर समाप्त नहीं हुई। यह तो आखिरी मंजिल है, मगर उसके बहुत ख़फ़ीफ ज़रूर आगे होने की उम्मीद मालूम होती है, अभी वह भी पैदा नहीं हुआ। यह भी लिखा है कि Realization शब्द के कोई अर्थ ही नहीं रह गये, और न महत्व, यह ठीक है, इसलिये कि प्रेम में डूबे हुए को यह पता नहीं रहता कि हमारे प्रेम की गरज़ क्या थी।

   15 जून का जो खत है, उसका जवाब तो हो ही गया। तुम्हारी लय-अवस्था चल रही है, जो बहुत अच्छी है और बढ़ती चली जा रही है।

    अम्मा व चौबे जी की प्रणाम। सब भाई-बहनों को आशीर्वाद।

     शुभचिन्तक
   रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-494
लखीमपुर
21/6/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आप’ का मिला। ‘आप’ ने जो कुछ लिखा है, वह सब तो ‘आप’ की इस गरीबनी पर कृपा का फल है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

     भाई, अब न जाने क्या बात है कि जी चाहता है कि किसी तरह से हर समय सोया ही करूँ, कभी जागूं नहीं। क्योंकि जागने से न जाने क्या परेशानी सी हो जाती है; अच्छा नहीं लगता। वह चैन नहीं मिलता कि जो सोने में आता है।

    भाई, मेरा यह न जाने क्या है कि मैं यदि कोई काम भी जैसे रोटी बनाना ही हो, दो दिन ही छोड़ दूं तो फिर जब बनाने जाती हूँ तो लगता है कि मानों कुछ बनाना आता ही नहीं, परन्तु ‘मालिक’ जाने कैसे सब ठीक बनवा देता है। कुछ यह है कि मान लीजिये एक दिन न नहाऊं, तो कभी तबियत तो चलेगी ही नहीं कि नहाऊं। अब देखती हूँ कि हर Point को मैदान का फैलाव अनुमान में नहीं आ पाता उससे परे है। मेरा तो यह हाल है कि मैं नहीं जानती कि मुझे उन्नति की फिक्र है या निश्चिन्त हूँ। अभी लगता है कि Point ठीक खुला नहीं। मुझे तो जाने क्या हो गया है कि आनन्द चाहे आत्मिक भी कभी आता ही नहीं और कभी गुस्सा या कोई बात बुरी भी लगती नहीं। सब कहते हैं कि ईश्वर से मिलने में बड़ा आनन्द आता है, परन्तु मुझे पता नहीं ‘उसमें’ भी आनन्द होगा या नहीं। मुझे तो कोई इच्छा भी तो नहीं होतीI पूजा भी पता नहीं, मैं करवा पाती हूँ या नहीं।

    मुझे ऐसा लगा करता है कि अधिकतर सिर में माँग के बाई ओर आगे पाँचो उंगली रखी हुई हैं, यहाँ तक कि कुछ बोझ सा प्रतीत होता है और फिर जाने क्या इतनी झनझनाहट व सरसराहट या गुदगुदी रहती है कि कुछ कहना नहीं। इसी प्रकार माँग के दाहिनी ओर होती है, परन्तु कम। बाईं ओर की हड्डी के भीतर तो कुछ तेज़ हो जाती है, जिसका असर फिर कुल सिर की नसों तक में रहता है और इससे कभी-कभी बहुत हल्का सा दर्द क्या, कुछ लपकन सी, कुछ सिर के नसों में रहती है। आगे बहुत ही अधिक और सिर के पीछे उससे कुछ कम। सीधी माँग जहाँ खत्म होती है, वहाँ एक गड्ढा सा लगा करता है। ऐसा लगता है, वैसे तो कुल सिर को Bones व नसों में कुछ न कुछ झनझनाहट व लपकन तो हर समय रहती है और जैसे यह (1) बीच में माँग है तो इधर-उधर की जो बड़ी-बड़ी हडिडयों है, उनमें प्रकाश भरा हुआ लगा करता है और इसके कारण कुछ न कुछ प्रकाश कुल सिर की हडिडयों व नसों में रहता है, परन्तु हल्का-हल्का सा रहता है, चकाचौंध पैदा नहीं करता। 

  अब तो भाई, यह हाल है कि समस्त संसार की, जड़ चेतन, पशु-पक्षी, सब की एक समान ही हस्ती लगती है और दशा असली तो यह है कि उसमें से भी हस्ती और एक, इन दो शब्दों को निकाल दीजिये। मेरा तो कुछ यह हाल है कि सब कहते हैं कि care नहीं करती। परन्तु मैं किससे कहूँ, क्या कहूँ कि जीवन एक खेल था जो खत्म हो गया और मौत एक बहाना थी, जो मिट गई। मुझे जाने इतनी बड़ी ज़िन्दगी में कभी प्रभु की याद आई कि नहीं, कुछ पता नहीं, कभी आयेगी मालूम नहीं। यह सब ‘आप’ जानें, ‘आप’ का काम जानें, मुझे क्याI

   छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति :-

     आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-495
लखीमपुर
29/6/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

यहाँ सब सकुशल हैं, आशा है ‘आप’ भी सकुशल होंगें। अपनी आत्मिक दशा, जो मेरी समझ में भाई है, सो लिख रही हूँ।

   अब तो कुछ यह दशा है कि यदि हम हैं तो ऐसे कि जिसका कुछ cause नहीं, और प्रमाण नहीं। एक कुछ मैं यह दशा देख रही हूँ कि अब ऐसी जगह है, जहाँ ईश्वर है या नहीं इसका कोई प्रमाण नहीं। यही नहीं, हर चीज़ अब निरालम्ब सी हो गई है मेरे लिये। अब तो ऐसी दशा है कि जिस पर से ईश्वर नाम का भी रंग घुल चुका है। कुछ यह दशा है कि कहाँ तो ईश्वर हर चीज़ में, बाहर-भीतर, जड़-चेतन सब में सर्वत्र ईश्वर ही लगा करता था, परन्तु अब यह हाल है कि ईश्वर कहीं महसूस ही नहीं होता बाहर-भीतर, कहीं अनुभव नहीं होता। मैं हूँ, इसका कोई cause नहीं, कोई प्रमाण नहीं। 

  अब तो यह हाल है कि लगता है कि जो अब तक था, सो भी खत्म हो गया। यद्यपि यह तमीज़ नहीं कि क्या था और क्या खत्म हो गया। न जाने क्या बात है कि एक छोटे से छोटे अभ्यासी की दशा मुझे अपने से ऊंची लगती है। अब तो दशा का तो यह न जाने क्या हाल है कि भूख कभी लगती नहीं और पेट कभी भरता नहीं। हर छोटे से छोटे अभ्यासी में प्रेम पाती हूँ, परन्तु स्वयं उससे अछूती ही रहती हूँ। कुछ यह दशा देखती हूँ कि चाहे कितना काम, चाहे कितने लोग आ जायें, चाहे चौबीस घण्टे में एक सेकण्ड भी फुर्सत मिले या न मिले, परन्तु Disturbance नहीं होता। लगता है, तबियत के लिये Disturbance शब्द ही बेकार हो गया है। कभी सोचती हूँ कि कुछ करती नहीं, तो Disturbance काहे में हो।

    केसर ‘आप’ को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति :-

    आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-496
शाहजहाँपुर
3/7/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारे 21 जून और 29 जून के पत्र प्राप्त हुए। मैं F1 की सैर अभी पूरी तौर से न करा सका। कुछ-कुछ ख्याल ज़रूर किया है, जिसका फल यह हुआ कि वहाँ पर शक्ति फैलने लगी है; अब सैर भी जल्दी शुरू हो जावेगी। तुम्हारे पत्रों का जवाब देना बड़ा मुश्किल हो गया है, इसलिये कि अब अच्छी लय-अवस्था और फिर उसकी तुरिया ही आती रहती है, और वह कुछ ऐसी चीज़ है कि जिसकी व्याख्या करना शब्दों में बड़ा मुश्किल है। सिर के अन्दर बहुत से स्थान हैं, और लपकन और सरसराहट यह बताती है कि वह जागृति हालत में आ रहे हैं। सिर के बाईं ओर जो पाँच उंगली मालूम होती है, अब समझ में आ गया कि वह क्या चीज़ है। यहाँ पर एक ताकत है, जिसमें क्रौंधे की सी लपक है। वह जब तक कि काबू में नहीं आ जाती, तब तक गुरू महाराज का हाथ उस पर रहता है। इसलिये कि उसमें काबू में आने से पहले ढील दे देना अपने आपको भी नुकसान कर जाती है। भनभनाहट का रहना यह बताता है कि वहाँ की सोई हुई चीज़ अब जग पड़ी। तुमने गड्ढे के बारे में जो लिखा है, उसका जवाब किसी खत में मैं दे चुका हूँ। सिर के पीछे जो कम्पन मालूम होता है, वह ही centre Region है। हमारे यहाँ कुछ Reflection करीब-करीब हर जगह पड़ जाता है। सबको एक हस्ती हो जाना, या Reality में ज़्यादा पैर जाना है। तुमने एक अजीब बात पूछी है कि जाने ‘मालिक’ की कभी याद आई है या नहीं। गुमे हुए की याद भी याद करने वाले को गुम कर देती है। लापता का पता चलाते-चलाते भी इन्सान खुद लापता हो जाता है और यह खुशखबरी इस बात की है कि Infinite के अंदाज़ की तैयारियाँ हो रही हैं और फिर यह सवाल तुमने मुझसे पूछा, यह तो ऐसी बात हुई कि जैसे कोई जन्म के अन्धे से रोशनी की व्याख्या पूछे। तुमने लिखा है कि “मैं हूँ” इसका न कोई cause है, न प्रमाण, यह ठीक है, मगर अभी तुम हो ज़रूर, cause और प्रमाण चाहे समझ में आवे या न आवे। यह और बात है कि होने का भाव बहुत कुछ मिट चुका है। यह मिटने की हालत है। दर्शन तो वही करेगा, जो जीवन-दशा में है और जो मिटी हुई दशा में है, यानी मुर्दा, ऐसी हालत में है, उसे तो रंग घुला ही मालूम पड़ेगा और फिर खुद मिट गये तो फिर सब कुछ मिटा ही हुआ मालूम होता है। “आप डूबें, तो जग डूबा”।

  श्री विश्वनाथन महायोग महर्षि रमण का कर रहे हैं, साथ-साथ अपने यहाँ का भी अभ्यास कर रहे हैं। उनके लिये भी कुछ न कुछ किये जाता हूँ, किन्तु उनमें co-operation की बहुत कमी है। बाकी सब तरक्की कर रहे हैं। 5 जुलाई को डा. वर्धाचारी का खत आ गया, जिसकी नकल उनकी हालत समझने के लिये तुम्हें भेजी जा रही है। खत में Commitment नहीं होता और बड़ा Guarded होता है। इति:-

    शुभचिन्तक
   रामचन्द्र  कस्तूरी का नोट : श्री बाबूजी ने बताया कि जिस समय F1 पर पैर रखा, उसी समय Fourth circle में पैर शुरू हुआ।
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-497
लखीमपुर
2/7/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आप’ का मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

    अब तो कुछ ऐसी दशा है कि आंधी तूफ़ान तो दूर रहे, कभी दशा के लिये मानों मन्द बयार भी नहीं डोलती। आत्मिक दशा या दुनियाबी दशा एक ही हो गई है। मैं स्वयं यह नहीं समझ पाती कि ‘मालिक’ को यह आत्मिक दशा लिख रही हूँ या क्या, क्यों कि मेरा तो यह हाल है, कि न सांसारिक कहते बनता है और न आत्मिक। यह देखती हूँ कि एक Unchangeable condition ही चल रही है। अब तो यह हाल है कि तबियत घर से न भागने को चाहती है और न घर में ही लगती है। इतनी खाली दशा है कि जिसमें सूनेपन की गुज़र नहीं, क्योंकि ऐसा लगता है कि बिल्कुल खालिस खाली मैदान में ही मैं फैली हुई हूँ, बल्कि मेरा तो स्वयं रूप ही ऐसा खाली बन गया है कि जिसमें अक्सर खुद अपने से ही डर सा लगने लगता है। बोलने को तो न जाने क्यों कभी भी क़तई तबियत ही नहीं चाहती है। यद्यपि ध्यान तो कभी करती ही नहीं और देखती हूँ कि ऐसी दशा है कि न कभी करवाती हूँ। पता नहीं भाई, कि मेरे यहाँ पूजा करने आने वाले लोग कहीं धोखा तो नहीं खा रहे हैं। मुझे कुछ पता नहीं। भाई, दशा क्या है, खुद अपना नमूना है, मैं क्या लिखू और क्या कहूँ। 

  अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती हैं और केसर प्रणाम।

     आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-498
लखीमपुर
7/9/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

पूज्य मास्टर साहब के पत्र से आपका समाचार मालूम हुआ। ‘आप’ स्वस्थ हैं, जान कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो दशा तक में भी लगता है, फैलाव तक नहीं हो पाता, क्योंकि देखती हूँ कि मुझे तो अब फैलाव तक की ताकत नहीं रही और यह शायद इसलिये है कि देखती हूँ कि मुझ में तो दशा को मनन कर सकने तक की ताब और ताकत नहीं रही। अब तक यह दो चीज़े सामने चाहे धुंधली सी ही रहती थीं, परन्तु अब तो लगता है कि बिल्कुल ही सीधी सादी बिल्कुल स्थिर सी दशा रहती है। स्थिरता का तो यह हाल है, भीतर-बाहर का कण-कण मानों स्थिरता का स्वरूप ही हो गया है, अविचल स्वरूप है। मानों ज्यों का त्यों रह गया है। मानों केवल मेरे लिये तो केवल जड़ ही जड़ रह गया है। क्योंकि देखती हूँ कि पेड़-पौधे, ज़मीन-आसमान की तरह ही सब जड़वत हो गया है। मेरा तो ज़र्रा जर्रा भीतर तो भीतर, शरीर तक लगता है कि सब जड़ हो गया है। यहाँ तक कि मुझे धुकधुकी तक का पता नहीं चलता है। कुछ जाने क्या बात है कि कोई चाहे ‘मालिक’ की चर्चा इस तरह करे कि जिसमें ज़िन्दादिली पैदा हो, परन्तु मैं तो भाई बेअसर हूँ। यद्यपि मेरी निगाह में यह ख्याल, बात आने की भी गुंजाइश नहीं रही, फिर भी मुझे एक बार घर में कुछ चर्चा के समय सबने ऐसा ही बताया, सोई लिख रही हूँ, क्योंकि मेरा तो यह हाल है कि बेअसर कहने पर भी कोई असर मुझ पर नहीं होता। मुझे तो सब असर ठीक दीखते हैं। कुछ न जाने क्या बात है कि जब कोई निर्गुण, निराकार की चर्चा चलाता है, तो मुझे दीखता है कि मानों उस निर्गुण, निराकार में मुझे अपने में समेट कर मुझे उसी रूप में कर दिया है। किन्तु यदि चर्चा किसी की न चले तो मुझे कुछ नहीं लगता।

कल विद्यालय से आ रही थी तो, एकाएक सिर के पीछे, जो ‘आप’ ने Centre Region का Point बताया है, उस Point के बिल्कुल सीध में सीधी तरफ Point से तीन अंगुल हटकर, लगा कि मानों कोई नस या कोई चीज़ एकदम से टूट गई और इतने ज़ोर से टूटी कि पाँच मिनट तक उस जगह को दबाये खड़ी रही। दर्द वगैरह कुछ नहीं था। उसी जगह पर आज बहुत हल्का सा फिर वैसे ही हुआ। अब कुछ नहीं है। इति :-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-499
शाहजहाँपुर
14/7/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

तुम्हारा खत 9.7.55 का मिल गया, जिसमें केसर ने भी अपना हाल लिखा है। Logic और Psychology की जो किताबें प्रह्लाद के पास हैं, उसमें से Psychology की किताब मैं पढूंगा। केसर का हाल बहुत अच्छा चल रहा है, मगर System में थोड़ी सी गड़बड़ी अभी ज़रूर है, वह रफ़्ता-रफ़्ता ठीक हो जायेगी। केसर के खत से मालूम हुआ कि तुम्हारी तबियत खराब है। तुमने क्या Energy ब्रह्माण्ड मण्डल से खींचना बन्द कर दी है। अगर बन्द कर दी हो तो यह दोनों तरीके फिर शुरू कर दो। एक हफ़्ते बाद अपनी तन्दुरुस्ती का हाल लिखना। ईश्वर ने चाहा तुम हफ़्ते भर में काफ़ी अच्छी हो जाओगी।

तुम्हें मेरे काम की इतनी फ़िक्र है कि दिल से दुआ निकलती है। तुम तनख्वाह के लिये रुपये की फ़िक्र मत करो। ईश्वर को देना होगा तो अपने आप देगा और मैं समझता हूँ कि इसके लिये किसी से कहने की ज़रूरत नहीं। इसलिये कि जब उसकी तरफ़ से प्रेरणा होगी तो लोगों के दिलों में खुद-ब-खुद ख्याल पैदा होगा।

“मंगबो भलो न बाप से, जो बिधना राखे लाज”।

मैं तो भाई तुम लोगों के लिए ईश्वर से अभी तक सिर्फ आध्यात्मिकता ही माँगता हूँ और उसकी कीमत सिर्फ यही हो सकती है कि वह असल मालिक को मालिक समझे और उसकी मौज में राज़ी रहे। तुमने अपने सत्संग में एक बात ग़ौर नहीं की होगी वह यह कि खुदगर्जों की तादाद ज़्यादा है यही वजह है कि वे कुछ sacrifice करना नहीं चाहते। यह भी ईश्वर ने चाहा दूर हो जायेगी।

तुमने यह जो लिखा है कि फैलाव कभी होता ही नहीं। इसकी वजह यह है कि फैलाव हो चुका है और वह इस कदर स्वाभाविक हो गया कि उसका पता नहीं चलता। ज़मीन और आसमान की तरह तुमने जो जड़वत् होना लिखा है, इसके अर्थ यह हैं कि कुल विचार और ख्याल उस तरफ खिंच चुके हैं, इसीलिये जिस्म का भान भी अब नहीं है। तुम्हें जब ख्याल आ जाया करे तो कुछ गहरी साँस ले लिया करो, ताकि जिस्म में ऑक्सीजन काफ़ी पहुंचता रहे। मेरा तो यहाँ तक हाल है कि जाने कितने अर्से तक मैं साँस लेता ही नहीं हूँ। जब महीने दो महीने में ख्याल आ जाता है तो कुछ गहरी साँस ले लिया करता हूँ। अब मैं भी इसका ख्याल रखूंगा।

तुमने जो Central Region के करीब नस का टूटना लिखा है, मुझे भी कहीं पर यह तड़खन अभ्यास के वक्त महसूस हुआ था। इसके मानी यह है कि वहाँ की शक्ति जाग गई। दाहिने पैर के अंगूठे की नोंक पर जो जलन लिखी है, वह जलन नहीं है, बल्कि उभार की गर्मी है। वहाँ का Foreign Matter साफ़ हो जाने से यह बात जाती रहेगी। इसका ताल्लुक Central Region से बहुत दूर से है। अंगूठे की जो बीचो-बीच की नस है, यह बिल्कुल central Region से ताल्लुक रखती है। मैंने Training की कुछ बातें जो कहीं पर लिखी हैं, उसमें यह भी लिखा है कि अंगूठे के बीचोबीच में ध्यान करने से Central Region खुलता है और इसके बारे में बहुत सी बातें लिखी हैं। बड़ी खुशी की बात है Third World Religion की conference जो जापान में हुई थी, उसमें तुम्हारे Mission का लेख निकल गया।

एक बात तुम्हारे समझने और सोचने के लिये और लिखता हूँ, जिससे यह भी तुम्हारे खत के साथ-साथ छापी जानी चाहिए और यह उन लोगों के लिये है, जो जाति का अभिमान (कि जिससे कोई फ़ायदा नहीं, हानि ही हानि है) लिये बैठे हैं। अगर ब्रह्म को अपने ब्रह्म होने का एहसास हो जाये तो वह अपनी हैसियत से गिर जावे और यहाँ तो लोग ब्रह्म-गति में भी नहीं होते और दूसरों को लट्ट के ज़ोर से अपने आपको ब्रह्म मनवाना चाहते हैं। ऐसे लोग ब्रह्म से दूर ही होते चले जाते हैं और यह चीज़ मनुष्य-सभ्यता के विरुद्ध भी है। मेरा कोई हर्ज नहीं, ब्रह्म कोई बना करें, मगर जब वह अपने गिराव की सूरत पैदा कर लेता है तो अफ़सोस ज़रूर होता है, मगर मजबूरी है। जिसकी किस्मत में ब्रह्म-विद्या न बदी हो और ईश्वर अपनी तरफ़ न खींचना चाहता हो, उसकी यही दशा होती है। जिसके Group में यह बात पैदा हो गई वह पत्थर बन गया, इन्सान नहीं रहा और उसने एक हवा फैला दी, जिससे दूसरों को भी नुकसान हुआ।

अम्मा को प्रणाम व सब भाई-बहिनों को आशीर्वाद। 

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-500
लखीमपुर
19/7/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आप’ का मिला। समाचार मालूम हुए। मेरा स्वास्थ्य अब ठीक है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मैं देखती हूँ कि न जाने क्या बात है कि Point A1 से F1 तक घूम आई, परन्तु ऐसा लगता है कि मानों कहीं कुछ अच्छा ही नहीं लगा। बस जो ‘आप’ मुझे अच्छे लगते हैं, वैसा अच्छा मुझे कहीं लगता ही नहीं। एक कुछ यह देख रही हूँ कि हर हालत में, चाहे तकलीफ़ हो या आराम, चाहे कोई आत्मिक दशा हो या न हो, अपने अन्दर एक Everlasting आनन्द का Vibration सा बना ही रहता है। उसे सोते जागते हर दशा में अपने अन्दर पाती हूँ। मैं उसे एहसास करती हूँ, परन्तु दशा कुछ यह रहती है कि लगता है, मैं तो लापता ही हो रही हूँ, क्योंकि यह Everlasting आनन्द का Vibration रहते हुए भी मुझे यह पता नहीं रहता कि यह मेरे अन्दर है या कहाँ है। हाँ, इसका एहसास शारीरिक तकलीफ़ अधिक होने पर कुछ आता है, नहीं तो मैं तो इतनी खाली हूँ कि खाली की खाली रहती हूँ। दशाएँ बदलती हैं, गुजर जाती हैं, परन्तु मैं ज्यों की त्यों बनी रहती हूँ। इसीलिए किसी बात का एहसास अपने अन्दर तो कभी पाती ही नहीं हूँ। यह आनन्द भीतर-बाहर, हर जगह फैला दिखाई पड़ता है। तब लगता है, जैसे ईश्वरीय आनन्द का कोष फैला पड़ा है, आँखें या निगाह, लापता हैं। कुछ ऐसा है कि हर जगह, हर समय न जाने क्या कुछ कम्पन सा पाती हूँ और वह इस तरह का कि जैसे लपकन सी रहती है। यद्यपि मेरी दशा का उससे कुछ सम्बन्ध नहीं है, परन्तु न जाने क्यों मुझे ऐसा दिखई पड़ता है।

कुछ यह हाल है कि आँखे मूंदे बैठी रहती हूँ, परन्तु दशा का अन्दाज़ नहीं लगा पाती। दशा क्या है, एक ऐसी शून्य भीति है कि जिस पर चितेरे अनेकों चित्र बनाकर बिगाड़ा करते हैं, परन्तु उस शून्य भीति को क्या पता। बस मेरा तो यही हाल है, पता नहीं क्या दशा है। भाई, अब मैं दशा थोड़े ही लिखती हूँ, बल्कि केवल Hint भर समझ लीजिये। दशा मेरी क्या, बल्कि देखती हूँ सब कुछ, कुछ नहीं हो गया। या यों कह लीजिये कि सब कुछ ज्यों का त्यों है, परन्तु मेरी समझ व निगाह ही जाती रही। परन्तु मैं क्या कहूँ मुझे कुछ पता नहीं। लगता है शून्य या खाली हालत में मैं घुसकर अदृश्य हो गई, समा गई। अब तो जिधर देखती हूँ, सब शून्य या खाली पाती हूँ। न जाने क्या बात है कि खाली कह देने से भी दशा की शोभा नहीं बनती। अब तो ‘आप’ ही जानें, ‘आप’ का काम जानें।

केसर ‘आप’ को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। 

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-501
शाहजहाँपुर
25/7/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र तुम्हारा 19.7.55 का मिल गया। ब्रह्माण्ड से Energy से खींचने से ज़रूर फायदा होगा। सुबह के वक्त तो कर ही लिया करो फिर दिन में अगर चाहो तो एक आध दफ़े कर सकती हो। मगर इस ख्याल के बाँधने में एक बात बहुत ज़रूरी यह भी है कि Energy खींचते वक्त यह भी ख्याल रहे कि जितनी System को जरूरत है, उतनी ही Energy आ रही है। दूसरी बात मैंने और बताई है कि किसी वक्त ध्यान यह भी करना चाहिए कि जितनी बीमारी जिस्म में है वह सब धुएँ की शक्ल में पीछे से या दायें-बाँयें निकल रही है और जिस्म अरोग्य हो रहा है। आँख खोलकर करो, कोई हर्ज नहीं। अब अपना कुल हाल लिखना कि कमज़ोरी रफ़ा हो गई और अगर शिकायत है तो क्या और कहाँ है? या अगर दर्द है या सूजन या सख्ती है, तो कहाँ है ?

कम्पन या लपकन का कम हो जाना, जो तुमने लिखा है यह समाप्त तो कभी नहीं होता, मगर Dim ज़रूर हो जाता है। Dim होना इस बात का चिन्ह है कि उन्नति की हालत है। मगर बिल्कुल Dim तो उस वक्त पड़ता है जब सोलहों आने भर हम अपना आपा मिटा चुकते हैं, और जितना कि Vibration Dim है, उतनी ही बीज रूप में शक्ति आ जाती है और हम Dim Vibration को मजबूत करके जब कम्पन पैदा कर देते हैं, तो बड़े-बड़े काम कर डालते हैं। इसका बीज रूप में आ जाना ही असल शक्ति में प्रवेश हो जाना है। हाथ जो सिर पर अब मालूम नहीं होता, उसकी वजह तुमने खुद लिख दी है कि वह कम्पन या शक्ति को ज़रूरत से ज्यादा उभरने नहीं देता था। हाथ है अब भी मगर इतना, जितना कि ज़रूरत है।

बड़ा अच्छा हुआ, केसर को 150 रूपये की नौकरी मिल गई। केसर ने जो लिखा है, उसे परेशान होने की ज़रूरत नहीं, वह सब ठीक हो जायेगा। Self Cleaning का Process वह कभी कर लिया करे, वह तुम उसे बता देना, जैसी ज़रूरत हो। हालत वैसे उसकी बहुत अच्छी है।

भाई-बहनों को आशीर्वाद।

शुभ चिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-502
लखीमपुर
30/7/1955
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

लगता है कि सम्पूर्ण प्रकृति जड़ हो गई है। कुछ ऐसा लगता है कि चलना-फिरना, सोना-जागना, कभी कुछ होता ही नहीं, और मानों कभी हुआ ही नहीं। भाई, पता नहीं, हालत शुद्ध कह लीजिये या Innocence कह लीजिये।

भाई, मेरा तो न जाने क्या हाल हो गया है कि मैं अब जड़वत् दशा से भी खाली हूँ, क्योंकि जड़वत दशा कहने पर भी दशा में अन्तर नहीं पड़ता। अब तो यह दशा है, कि जिन्हें मैं ‘बाबूजी’ कहती हूँ, वे कैसे हैं, कहाँ हैं, कुछ पता नहीं। मानों कभी मुलाकात ही नहीं हुई हो। कभी मैं सोचती हूँ कि श्री ‘बाबूजी’ बस से उतरेंगे, तो मैं पहिचान भी पाऊंगी या नहीं। कहाँ हर कण-कण में बस वे ही दिखलाई पड़ते थे परन्तु अब न जाने क्या हो गया है कि अब कहीं कभी दीखते ही नहीं, या यों कह लीजिए कि आँखों में प्रकाश ही नहीं रहा, जो उन्हें देख सके। दशा को जड़ कह लें, परन्तु अब तो उस पर इसका असर ही नहीं पड़ता। अब तो यह लगता है कि कितनी सौम्य सी जगह में सैर हो रही है। बिना किसी हवा के, वहाँ कैसी हवा की Feeling है, जो बड़ी ही कुछ सीधी सी, सुरत सी, या शुद्ध या Innocence का Essence कह लीजिये। मैं तो अनुभव करती हूँ, समाती जाती हूँ उसमें, परन्तु शब्द भारी पड़ते हैं। हवा तो वहाँ है नहीं, परन्तु कुछ यह है कि उस दशा की Feeling करते-करते भी अक्सर यह पता नहीं रहता कि मुझे कोई हालत Feel हो रही है, वरन् इतना साम्य हो जाता है कि Feeling जाती रहती है, बल्कि वही मेरा रूप हो रहता है। ‘आप’ कृपया देख लीजियेगा यह क्या दशा चल रही है।

अम्मा आप को शुभाशीर्वाद कहती है। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-503
शाहजहाँपुर
3/8/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 30 जुलाई का लिखा हुआ मिल गया। अबकी तो इस पत्र में कुछ अजीब विचार और अजीब दशा और अजीब ढंग से लिखी पाई तो इससे यह मालूम होता है कि लिखने वाला भी अजीब और अद्भुत होगा। क्या तुमने तो नहीं लिखा है? तुम यह कहोगी कि लिख ही गई। कैसे? तो पता नहीं। पता यों नहीं होगा कि उसका पता नहीं रहा होगा। यानी पता, पता देकर न जाने कहाँ चला गया होगा। बस यही है Reality में अच्छी तौर पर प्रवेश हो जाना, होना इसको भी खत्म है, इसलिये कि पते का पता तो नहीं रहा मगर लापते का भी पता है। मैं इन दो चार Sentences जो तुमने लिखे हैं, पढ़कर गद्गद् हो गया और इन्होंने तुम्हारी कुल हालत का मुझे अन्दाज़ बता दिया। सच तो यही है कि अगर हममें आखिर पर भक्ति भी रह गई अर्थात् उसका अन्दाज़ रह गया, तो हमें पूरी तौर से छुटकारा नहीं मिला।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-504
लखीमपुर
8/8/1955
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा पत्र ‘आप’ का मिला। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो लगता है कि वह सारा Dim Vibration भी मानों हज़्म हो गया है। मुझे तो अब कुछ नहीं दिखाई पड़ता। परन्तु अभी यह देखती हूँ कि यदि ख्याल बाँधूं तो वे Dim Vibration स्पष्ट अनुभव होने लगते हैं। अब तो यह दशा है कि अब चलती-फिरती क्या हूँ, देखती हूँ ज़मीन पर कभी पैर ही नहीं आते। अब तो यह तक समझ में नहीं आता कि Heart बाहर है या भीतर और कुछ यह भी है कि Heart का ख्याल बाँधने से कोई असर नहीं होता, वरन् मुझे तो लगता है कि बाहर-भीतर कहीं है ही नहीं। भाई, अब तो लगता है, मन Vibration हो गया है, और Vibration भी लगता है कि अब उसका ख्याल ही न जाने क्यों कभी नहीं आता है। लगता है कि Vibration ही मन है, या बुद्धि, या जो कुछ है सो भी लगता है कि सब मानों हज्म हुआ जा रहा है। यहाँ तक हाल है कि अपनी तबियत से जब उसे तेज़ करती हूँ, तब जाकर अनुभव हो पाता है। भाई, दशा क्या है, सरलता तथा Innocence तो बस उस दशा की केवल एक Quality मात्र ही की गणना तक ही आ पाते हैं और Vibration मानों मेरी दशा का सहज स्वभाव मात्र भर ही है। याद की भी याद भूल गई है।

लगता है कि जो हाथ मेरे सिर पर था और पीठ पर था, उस हाथ की Feeling मानों अब मेरा स्वयं रूप बन गया है। दशा में बनावट भी नहीं है, तथा सहजता भी नहीं। सहजता तो केवल मेरी दशा का एक गुण मात्र भर है और मुझमें तो कोई गुण नहीं। इधर रह-रहकर जाने कभी क्या हो जाता है कि रात-रात भर मानों तबियत किसी से बातें कर रही हो, परन्तु मैं तो इतनी अनजान हूँ ‘बाबूजी’, कि लगता है, कि सबेरा होते ही मुझे कुछ होश नहीं। रात भर सोते में तो मानों कुछ होश सा रहता भी है, परन्तु सबेरा होते ही वह लापता हो जाता है। कुछ यह है कि होश में थकान लगती है, यानी रात में और बेहोशी में थकान भाग जाती है।

भाई, मैंने तो दीवानी बनने की कोशिश की थी, परन्तु ‘मालिक’ ने यह सोचा कि यह दीवानी बन घूमेंगी तो इसकी कहीं भद्द न हो जाये। इसलिये मेरा तो अब यह हाल है कि दीवानी तो मैं सच में न बन सकी, परन्तु मुझे अब यह भी पता नहीं लगता कि मुझे अब यह इच्छा भी है या नहीं। फिर यह भी तो पता नहीं कि दीवाना होता कैसा है, वह क्या करता है और वह क्यों दीवाना बन जाता है, ‘बाबूजी’ आप ही बतायें। मुझे तो कुछ पता नहीं है। शायद ‘आप’ के बताने से कुछ पता हो जाये तो कुछ कोशिश भी करूँ और यह कृपया बतावें कि मैं दीवानी किसकी बनूँ और कैसे बनूँ और दीवाने को क्या-क्या मज़ा आता है? ‘आप’ जानें, क्योंकि मैं देखती हूँ या कुछ समझने का प्रयत्न करती हूँ, तो अपना सार, अपना रहस्य, ‘आप’ को ही पाती हूँ। इसलिये, मेरा तो सब ‘आप’ ही जानें। जो 'आप' बताना चाहेंगे, वही तो मेरी समझ में कुछ आ सकता है अन्यथा नहीं। किन्तु ‘आप’ भी भला पत्थर को क्या बतावेंगे। पशु-पक्षियों को तो कदाचित् समझाया जा सकता है, परन्तु पत्थरों को कदापि नहीं। परन्तु मेरा तो कुछ यह हाल भी तो है ‘बाबूजी’, कि पहले मुझे तो यह भी बताना पड़ेगा कि मैं पत्थर हूँ, जानवर हूँ, मनुष्य हूँ या कुछ भी नहीं। मुझे क्या पड़ी, जो ‘आप’ कहें, सोई तो मैं हूँगी।

अब तो अक्सर यह दशा हो जाती है कि, अक्सर देखती हूँ कि बैठे ही बैठे आँखें फटी की फटी ही रह जाती हैं और ख़ो जाती हूँ, नहीं भाई, मैं शायद कुछ नहीं हो जाती हूँ, क्योंकि ‘बाबूजी’ कुछ नहीं ही तो मैं हूँ, वही तो मेरा स्वरूप है।

केसर ‘आप’ को प्रणाम कहती है। छोटे भाई बहिनों को प्यार।

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-505
शाहजहाँपुर
14/8/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 8 अगस्त का मिल गया। तुमने किसी पत्र में लिखा है कि पाइन्ट F1  की सैर पूरी हो चुकी है, ऐसा नहीं है। बल्कि उस स्थान पर जो शक्ति है, वह फैली हुई है, मगर ज्यों की त्यों है, अभी उसने सैर की शक्ल अख्तयार नहीं की है। कुछ थोड़ी सी जरूर हुई है, जिसकी वजह से तुम आजकल रुकी हुई हो, अर्थात् बढ़ नहीं रही हो। मगर इसकी परवाह मत करो, यह मेरा काम है और इसे मैं दुरूस्त कर लूंगा। बाकी हालत, जो तुमने लिखी है, वह Reality में सम्मिलित होना जाहिर कर रही है। दीवानगी के बारे में जो कुछ तुमने पूछा है, उसका उत्तर दीवाना ही दे सकता है, और जहाँ दीवानगी है वहाँ द्वैत मौजूद है। बातों के बारे में जो लिखा है, यही बात मालूम होती है कि सोते-सोते ‘विचार के बहाव’ का मुख मेरी तरफ हो जाता होगा। वैसे तो मुझे अभ्यास में इधर-उधर जो लोग बोला करते हैं, वह मेरे पास आवाज़ अक्सर आ जाती थी। कभी इत्तफाक़ से अब भी हो जाता है। मसलन काश्मीर में जिस वक्त गोली चली थी, उस गोली की आवाजें उसी वक्त कान में आने लगीं। मैंने जब नक्शे को देखकर निगाह जमाई तो मालूम हुआ कि उसी तरफ गोली चल रही है। कहीं रेल लड़ गई तो उसके लड़ने की आवाज़ और चोट खाने वालों की हाय-हाय भी आ गई है। मगर यह चीज़ हर वक्त नहीं होती, न मालूम कब और किस वजह से कभी ऐसा हो जाता है।

काशीरामजी Assam में काम अच्छा कर रहें हैं और Mission की आवाज़ उस हिस्से में खूब पहुँच चुकी है और 6-7 सत्संगी बन भी चुके हैं, जो स्थाई रुप में हैं।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-506
लखीमपुर
13/8/1955
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आप’ का मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। मालिक की कृपा से जो कुछ आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरा तो यह हाल है कि Consciousness और Unconsciousness मेरे लिए कुछ ऐसी चीज़ हो गई है कि जब चाहूँ तो, अपने से पैदा भले कर लूँ, ‘मालिक’ से भले माँग लूँ, वरना भाई, मुझे तो कुछ पता नहीं कि क्या है, क्या नहीं है। वैसे जीवन जैसा चल रहा है, तो उसका यह हाल देख रही हूँ, कि पता नहीं ‘मालिक’, मन को चाहे चेतन कह लें, चाहे अचेतन कह लें। मुझे तो दोनों या मेरे लिये तो अब दोनों में कोई अन्तर नहीं रह गया है।

अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
  पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-507
लखीमपुर
15/8/1955
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

यहां सब कुशल है, आशा है आप भी स्वस्थ होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरी तो अब यह दशा है कि मेरे लिये तो मानों ‘प्रेम’ शब्द उड़ चुका है। न मुझे अपने से प्रेम कभी आता है, न दुनिया से है और न ईश्वर से आता है। कहाँ एक Second भी ‘उसकी’ याद भूलते ही तड़प उठती थी, अब मुझे कभी तड़प नहीं उठती। जब मन से ही नहीं है तो भला लाने से क्या आवेगी। न मन में तड़प के लिए Craving ही होती है। मैं तो, ऐसी समझ लीजिये कि जैसे मेरा तो सारा रस निचोड़कर मुझे धूप में सुखा डाला गया हो। बस एक मेरे ‘मालिक’ की कृपा से इतनी सी बात ज़रूर बाकी है, कि श्री बाबूजी की आज्ञा होते ही तबियत स्वत: ही वही करती है। ‘उसकी’ इच्छा के विरूद्ध स्वप्न में भी नहीं कर सकती और यह बात Automatic ही देखती हूँ।

लगता है कि F1 point की सैर समाप्त हो गई है। मैं तो बस सूखी लकड़ियों के समान लगती हूँ। जैसी ऊपर तैसी भीतर हूँ। अक्सर अब यह हो जाता है कि सामने ‘श्री बाबूजी’ का ही ख्याल रहने पर भी, जाने क्या हो जाता है कि तबियत उन्हीं से कहने लगती है कि हमारे ‘बाबूजी’ को क्या कभी देखा है? वे बड़े अच्छे हैं और जाने क्या-क्या, कुछ मुझे पता नहीं। यही हाल अपना पाती हूँ कि अक्सर मुझे यह याद नहीं आता कि मैंने सचमुच कभी ‘आपको’ देखा है। अब यह भी ‘मालिक’ जानें।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी 
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-508
शाहजहाँपुर
17/8/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

मैंने एक चिट्ठी मास्टर साहब के पते से 4 अगस्त को डाली थी, उसमें तुम्हारी चिट्टी का जवाब भी था, जो मिल गया होगा। इस साल जन्माष्टमी का व्रत 10 अगस्त दिन बुधवार को रहेगा। मैं यह चाहता हूँ कि तुम व्रत अगर रखना ही चाहो तो दोपहर को दूध या फल या कोई और हल्की चीज़ ख़ाओ और सूरज अस्त होने के बाद पेट भरकर कोई हल्की चीज़ ख़ा लो। चूँकि तुम आजकल कुछ कमजोर हो, इसलिये ज्यादा सख्त कायदे की पाबन्दी करने की ज़रूरत नहीं। केसर से कह देना कि ईश्वर की कृपा से हालत उसकी भी अच्छी है और वह तुम्हारे क़दम -ब-क़दम चलने की कोशिश कर रही है मगर कुछ Limitations ऐसा पड़ा हुआ है कि जिसकी वजह से पूरी तौर पर अपनी लालसा के मुताबिक चल नहीं पाती और यह सबमें होता है। इसमें कोई हर्ज नहीं। धीरे-धीरे अभ्यास और सत्संग से दूर हो जाता है मैंने उसकी हालत जो कुछ भी है, एक खत में उसे लिख दी थी। लय-अवस्था अगर किसी में है तो तुम्हारी लय- अवस्था के बाद उसी का नम्बर आता है और लोगों में से कुछ अच्छे भी हैं और कुछ रश्मी तौर पर लगे हुए हैं।

चौबेजी को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को आशीर्वाद।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-509
शाहजहाँपुर
23/8/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र मिल गये। चाहा था कि उत्तर दें, इतने में एक खत इलाहाबाद से आ गया। उससे पता चला कि तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक नहीं है। इसलिए मैंने इरादा कर लिया कि शनिवार की शाम को Bus से गोला होकर लखीमपुर आऊँगा। बसन्त पंचमी 16.2.56 को पड़ रही है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-510
लखीमपुर
16/8/1955
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र आपके पास पहुँचा होगा। मालिक की कृपा से जो कुछ मेरी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, कुछ ऐसा हाल है कि पता नहीं मैं द्वैत हूँ या अद्वैत हूँ। ‘आपके’ लिखने पर गौर किया तो कुछ समझ में ही नहीं आया। खैर यह तो ‘आप’ ही जानें। यही क्या, मुझे तो अपनी अब कोई हालत ही नहीं लगती है। नासमझ हालत भी अब हालत के लिये कहना ठीक नहीं पाती हूँ। लगता है जैसे नेत्रों की कोई ग्रन्थि साफ़ हो गई हो और ‘मालिक’ की कृपा से देखा तो वह द्वैत-अद्वैत का झगड़ा मेरे लिये समाप्त हो चुका है। जगते में न जाने क्यों कभी-कभी चौंक पड़ती हूँ, किन्तु चौंकने पर भी Feeling कुछ नहीं होती। Condition में तो न समा ही है, न Simplicity की छाया वह तो उसका एक प्रभाव मात्र ही है। आगे ‘आप’ जानें।

अम्मा ‘आपको’ शुभाशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति :-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-511
लखीमपुर
18/8/1955
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, मेरा एक पत्र ‘आपको’ मिला होगा। मेरी तबियत भी अब ठीक है। 'मालिक' की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब देखती हूँ कि दशा में पसीजन कभी आती ही नहीं और निश्चलता भी पता नहीं है, या नहीं। और साम्यवस्था की तो लगता है जान ही निकल गई हो। अब तो दशा मानों (.) घेरे के बीच का Centre है और circle के चारों ओर भी साम्यावस्था या Simplicity का क्षेत्र है, अंदाज नहीं पाती हूँ। मुझे तो लगता है कि मानों दरियाए मारफ़त में कभी कुल्ला तक नहीं किया हो। Simplicity में आनन्द था, परन्तु अब उस अन्दाज़ तक तबियत ही नहीं पहुँचती, किन्तु जो भी एहसास अब है, चाहे वह कैसा भी हो, उससे तबियत अलहदा नहीं होती, बल्कि देखती हूँ कि तबियत का वही स्वरूप हो जाता है, जैसा कि एहसास होता है।

मेरा तो यह हाल है कि दरियाये-मारफ़त में मेरी दशा कमल का वह पत्ता है, जो उसके स्पर्श से परे है। भला मैं ब्रह्म विद्या क्या सीखूँगी, जबकि मुझे इन्सानियत का भी अन्दाज़ नहीं, तमीज़ नहीं। अब तो यह है भाई, कि न कुछ क्रय हुआ है, न विक्रय ही हुआ है।

केसर ‘आप’ को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति :-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-512
शाहजहाँपुर
25/8/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे 16 अगस्त और 18 अगस्त के खत मिल गये। डा. वरदाचारी का ख़त जो आया, उसकी नकल तुम्हें भी देखने को मिल गई होगी। तुमने उनके बारे में जो लिखा वह ठीक ही निकला और मुझे तो अब तुम्हारी मदद की पग-पग पर ज़रूरत पड़ती है। इसलिये कि तुम्हारी हर बात अनुभव ही होती है और मैं यह चाहता हूँ कि कोई ऐसा मेरे करीब ही रहे कि इन चीज़ों की मदद मिलती रहे। मेरा अनुभव मुझे बता तो ठीक-ठीक देता है, मगर जब उसे कोई दूसरा ठीक-ठीक बताता है, तो मैं समझ लेता हूँ कि अब मेरा ख्याल ठीक है। मेरा अनुभव तेज़ ज़रूर था किसी वक्त और सम्भव है अब भी हो, मगर कुछ पता नहीं चलता।

मैं समझता हूँ कि तुम चाहती हो कि मैं वहाँ आ जाऊँ, तो देखो तो सही कि मैं आ तो नहीं गया। अच्छा मैं आ गया, तो यह बताओ, मैं गया कब था? तुमने अपने खत में जो लिखा था, यह प्रेम की बड़ी ऊँची अवस्था है और अपने आपको भूल जाने की एक उम्दा दलील। न होश का पता लगना और न बेहोशी का, यह बात बता रही है कि तुम्हारा रिश्ता गहरा उससे जुड़ गया है, जो इन तमाम बातों से अलहदा है। मगर कहीं जिससे कि रिश्ता जुड़ चुका है, वह भी भूल जाओ, तो फिर असलियत ही असलियत है। मगर फिर भी छोर नहीं। F1 के बारे में जो लिखा है, वह ठीक है कि रुक जाने पर चिड़चिड़ापन पैदा होने लगता हैं। मैं Training ( सिखलाने) में गलती भी कर जाता हूँ। वह यह कि ताकत बाज़दफे जरूरत से ज़्यादा पहुँचा देता हूँ, जो हज़्म नहीं हो पाती। मैं अब इसका ख्याल रखूँगा। अब मैंने उस स्थान को ज़रा मुलायम किया है जिसका नतीजा यह हुआ होगा कि तुममें लोच और नर्मी की अनुभूति हुई होगी। अब मैं, ईश्वर ने चाहा, इसी गति में सैर की हालत ले आऊँगा और इस वक्त तो तुम्हारी हालत इतनी मुलायम और सूक्ष्म होगी कि तुम अपने आपको बहुत हल्का-फुल्का महसूस करती होगी न मालूम क्या बात है कि मैं गलती कर ही जाता हूँ। इच्छा-शक्ति का Moulding बाज दफ़े अभ्यासी को तौल कर नहीं करता। न उस स्थान को तौलकर कि वहाँ पर कितनी ज़रूरत है, यही वज़ह ग़लती को मालूम होती है और मुझे इसका अफ़सोस भी है। ईश्वर और बन्दे की पहचान भी यही है, कि ईश्वर से कभी गलती नहीं होती और बन्दे से हर वक्त हर समय सम्भव है।

आदमी अगर एक भी अच्छा मिल जावे, तो वह Mission को ज्यादा बढ़ा सकता है, वनिस्बत पचास आदमियों के जो नाकारा हों। अब काशीराम की आवाज़ आसाम भर में गूँज पैदा कर देगी इसलिये कि उनमें प्रेम बहुत है। इसीलिये मैंने उनको सिखाने के लिये एक दम से तैयार कर दिया है। हालांकि मैं यह डरता जाता था दिल में कि कहीं मास्टर साहब यह न कह बैठें कि आपने जल्दी की।

चौबेजी को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-513
लखीमपुर
23/8/1955
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

यहाँ सब कुशल है, आशा है ‘आप’ भी सकुशल होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

इतवार की रात का एक स्वप्न कहूँ या ख्याल कहूँ। ऐसा देखा कि मानों भरे समुद्र के बीच खड़ी हुई मैं तीर पर खड़े ‘आप’ को देख रही हूँ। अचानक देखते-देखते समुद्र सूख गया और सूखी की सूखी, न पानी, न रेत में खड़ी हूँ। ‘आप’ को देख रही हूँ और कुछ ऐसी अपलक हो रही हूँ कि पता नहीं कब ‘मालिक’ ने अपने हाथों से उठा लिया किन्तु उठाते, न उठाते ही मैं जाने उन्हीं हस्त-कमलों में समा गई। फिर अपने को नहीं पाया और इतने में ही ‘आप’ को भी कहीं नहीं पाया।

एक न जाने क्या बात है कि इधर विचार बहुत दिमाग में भन्नाया करते हैं। यह जरूर है कि यदि में चाहूँ, तो ये दूर हो जाते हैं, परन्तु न जाने क्यों ऐसा चाहने की ओर तबियत नहीं जाती है। मेरी दशा उस इन्सान की तरह है कि जिसे कभी यह बताया ही नहीं गया हो कि ईश्वर कुछ है। उसकी ओर भी विचारधारा को कुछ मोड़ना चाहिए। न जाने क्या अब कुछ यह बात है कि पानी बरसते में चाहे घूमती हूँ, किन्तु फिर भी सूखी की सूखी ही फिरती हूँ। लगता है, मानों मेरे ऊपर बरसात ही नहीं हो रही है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-514
लखीमपुर
26/8/1955
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा पत्र ‘आपका’ मिला। पढ़कर समाचार मालूम हुए। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो लगता है कि शरीर का कण-कण मानों महा-समाधि या चिर-समाधि में लय हो गया है; सदैव के लिये महा-शान्ति को प्राप्त हो गया है। दशा ऐसी है कि उसे बेहोशी या सोई हुई नहीं कह सकती, बल्कि लगता है कि मेरा तो मानों महा-समाधि या महा-शान्ति या चिर-शान्ति स्वरूप हो गया है। न जाने क्या बात है कि किसी Condition की Feeling अब नहीं हो पाती है। एक कुछ यह देखती हूँ भाई, कि एक नली सी जो Heart दिमाग से Connected है और वह नली दिमाग के ऊपर कहीं दिमाग से सम्बन्धित रहते हुए भी हवा में जाकर गायब हो जाती है। उसके परे से भी कोई शायद ज़िन्दगी मुझमें डाला करती है। परन्तु मुझे इतना होश नहीं कि ज़िन्दगी क्या चीज है। शरीर तो केवल एक खाली-साफ़ पिंजड़ा मात्र ही दिखाई पड़ता है कि जिसका पक्षी उड़ गया हो और पिंजड़ा भी कहने को कह लिया है, वरन् मेरा तो यह हाल है कि उससे इतना भी सम्बन्ध नहीं कि वह अपने दर्द, पीर की भी मुझसे कुछ कह सके। न जाने क्या बात है कि होश में भी अपना हाथ पकड़ती हूँ तो भी Touching का पता नहीं रहता। अब तो यह हाल है कि जैसे हर समय एक अजीब होश-बेहोश सी दशा रहती थी, परन्तु देखती हूँ कि मैं अब बेहोश कभी नहीं होती। मेरी दशा को अब न नशा छू पाता है, न खुमारी। वह तो साफ़ की साफ़ है। हालत में न मज़ा कह सकती हूँ, न बेमज़ा ही। बस तबियत लगी रहती है, यही कह लीजिये। मेरा तो यह हाल है कि मुझे ऐसा लगता है कि मानों अपनी कुल विचारधारा को केवल ‘मालिक’ की खुशी के लिये ही मोड़ दें और ‘मालिक’ को हर समय अपने सामने बैठा हुआ अनुभव करें। यही नुस्खा है दोष से बचने का कि ओह, ‘मालिक’ के सामने मुझसे यह ग़लती हुई। फिर न होने के लिये प्रार्थना करें।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-515
लखीमपुर
27/8/1955
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

हम सब यहां कुशल हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी मेरी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

ब्रह्म-विद्या तो बिल्कुल ईश्वरीय धारा या ईश्वरीय रूप का स्वरुप है। कुछ यह दशा है कि लगता है कि मेरा अपना स्वयं का प्रतिबिम्ब ही मानों Reality है। यही नहीं, बल्कि उसी प्रतिबिम्ब से यह संसार रौशन है, चेतन है, परन्तु प्रतिबिम्ब के ऊपर मेरा तो यह हाल है कि मेरे में या मेरी दशा में तो कोई भी चीज़ का पता नहीं मिलता है। अपना तो यह हाल है कि यदि खाली कहती हूँ, तो भी कुछ तो अनुभव होता है, परन्तु मुझमें तो कुछ नहीं है। मैं प्रतिबिम्ब नहीं, इसलिये मुझमें से तो मानों Reality निचोड़ ली गई हो। ऐसा भले कह लें कि ‘नहीं’ को ‘है’ का अनुभव मान कर चल रही हूँ। अब तो यह हाल है कि लगता है कि न आर जाना है, न पार जाना है, न रुकना है। न समुद्र है, न किश्ती है, न इधर है, न उधर है। यद्यपि मेरे दिल में एक Regular पीर रहते- रहते, न जाने क्यों अब मुझे पीर का भी आभास नहीं हो पाता, लेकिन फिर भी जब कभी होता है, तो मानों कुछ होश दिला जाता है, या यों कहिये कि कुछ सजग कर जाता है।

केसर ‘आप’ को प्रणाम कहती है और अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-516
शाहजहाँपुर
29/8/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे तीन पत्र 23.8.55, 26.8.55 व 27.8.55 के मिल गये। 23 अगस्त के पत्र में जो तुमने लिखा है कि समुद्र में जाना और फिर मेरे हाथों में समा जाना बड़ा अच्छा मतलब रखता है। इसके बारे में मैंने मास्टर साहब के खत में बहुत पहले लिखा था, वह चीज अब Vision या वारदात या घटना की शक्ल में उतरी है। अर्थात् तुम मुझमें लय हो चुकी हो। अब तुम कस्तूरी, जैसा तुम्हारे माता-पिता ने पैदा किया, वह नहीं रही। जब यह बात है तो मैं यह समझता हूँ कि मेरी हालत और तुम्हारी हालत में बस इतना फर्क मालूम होता है कि जो Stages मेरे गुरू महाराज ने अपनी महासमाधि के बाद दिये थे; अब वह जो कुछ भी हो, बस इतना ही फर्क है। वह सब जो कुछ महा-समाधि के बाद मुझे दिया है, वह कुछ Speciality रखता है। मैंने किसी खत में लिखा था कि सिखाने वाले के महासमाधि लेने के बाद सीखने वाले को क्या फायदा पहुँचता है वह ख़त, जो बात मैं कहना चाहता हूँ बता देगा। Simplicity और सादगी का एहसास या अनुभूति न होना, कब? उसमें रंगने के बाद, यह बात बता रही है कि तुम्हारी Ignorance की हालत शुरू हो गई है। नहीं, नहीं, बल्कि उसमें और उन्नति कर चुकी हो। अब Ignorance के खात्मे के बाद आध्यात्मिक तालीम खत्म हो जाती है मगर मेरी निगाह कहीं पर ठहरती ही नहीं है। इसके आगे कुछ और भी है, परन्तु अब लिखकर मैं क्या करूँ? इसलिये कि Ignorance के बाद की दशा पर जो मैं जुबान खोलता हूँ तो मुमकिन है आजकल के वेदान्ती मेरी आलोचना करेंगे, हालांकि कर वे नहीं पायेंगे। फिर क्या है? बेवकूफी का खिताब जरूर दे सकेंगे, क्योंकि यह चीज उनके हाथ में है। इसलिये मैं यह चाहता हूँ कि वहाँ पर पहुँचने पर तुम खुद Ignorance के आगे का हाल दो ताकि मैं खुद इस खिताब से बच जाऊँ। वेदान्ती की कदर हमारे चौबेजी ने खूब की है। उन्होंने जिसके दाँत न हो, उसको हँसी में वेदान्ती कहा है और ठीक भी है, जिसके दाँत नहीं रहते, वह गिजा चबा नहीं सकता और जब चबा नहीं सकता तो उसको मैंदा भी हजम नहीं कर सकता, और जब बिना चवाई हुई गिजा मैंदे में जाती है तो मैंदे का Function बिगड़ जाता है। बस वेदान्तियों का यही हाल है कि रूहानी गिजा और शक्ति को ग्रहण करने की शक्ति नहीं रहती। कथनी से कोई फायदा नहीं, रहनी होनी चाहिए।

Swami Viveka Nand- “This is an Excellent Thought of expression, To abide by the Real State is really a spiritualism”

23 अगस्त के पत्र में सिर्फ एक बात का जबाब देना है। वह इस चीज का कि तुमने लिखा है कि विचार बहुत आ रहे हैं। इस पर तुम कभी गौर करना, तो पता चलेगा कि तुम विचारों से अपने आप को अलग पाती होगी। ईश्वर की कितनी अपार दया है कि इस दशा में विचारों का ताँता लगाये रखता है। वजह यह है कि इस हालत Ignorance में अगर विचार न उठें तो जिस्म छिन्न भिन्न हो जावे, इसलिये कि फिर Perfect Balance State हो जावेगा, जो संसार के उत्पन्न होने के पहले थी।

26 अगस्त का जो खत है, कुछ उत्तर उसका दिये देता हूँ। लिखा है कि कण-कण चिर-समाधि ले चुका है और महा-शान्ति को प्राप्त हो चुका है। बस इतनी ही कमी है कि तुम्हें किसी न किसी तरह पर महा-शान्ति होने का एहसास अगर लिखा नहीं, तो क्या तबियत में है? जब इसकी अनुभूति ऐसी चली जावे कि शान्ति को विचार भी न पकड़ सके, तब हालत असली है। और तब ही Ignorance की पूर्णता है। मैं तो भाई शान्ति से बहुत घबराता हूँ। यह चीज स्वामी लोगों को ही मुबारक हो जो शान्ति आने से पहले अपने आप को शान्त समझ लेते हैं। तुमने लिखा है कि होश में अपना हाथ पकड़ने से हाथ का एहसास नहीं होता, यह लय-अवस्था है, अव्वल दर्जे की। लिखा है कि दशा को न नशा छिपाता है, न खुमारी, तो नशा तो जिस्म से ताल्लुक रखता है। और खुमार सूक्ष्म शरीर से तुम इससे ऊँची उठ चुकी हो तो अब नशा व खुमार कैसा? नशे का मजा तो तब आता और रहता भी कि जब कहीं तुम कायस्थ होती और जो कुछ नशा पैदा भी हुआ, यह कायस्थों की मुँह की क्या, दिल की भभक थी और भाई मुसलमान सूफियों ने तो नशे-मारफत लिखा है जो ठीक नहीं होता। अब तुम खुद समझ लो कि तुम किस हालत में हो।

27 अगस्त का खत जो तुमने लिखा है, उसमें यह लिखा है कि मेरा अपना स्वयं का प्रतिबिम्ब ही मानों Reality है किन्तु न जाने क्यों मैं स्वयं प्रतिबिम्ब नहीं हो सकती इसलिये मुझमें से तो मानो Reality भी निचोड़ ली गई हो। इस इबारत का मतलब मेरी समझ में नहीं आया। तुमने यह लिखा है कि आर जाना है, न पार जाना है, न समुद्र है, न किश्ती, इत्यादि-इत्यादि। जब असल में अभ्यासी लय होने लगता है, तब ऐसी अनुभूति शुरू हो जाती है और ठीक भी यही है कि न कोई चीज़ आती है, न जाती है। हम जहाँ के तहाँ ही रहते हैं, जहाँ कि हम हमेंशा से थे और हमेंशा रहेंगे और यह बात भी सही है कि आत्मा इतनी निर्मल और शुद्ध है कि उस पर किसी का रंग नहीं चढ़ता, मगर उसका होना ही, अर्थात् उसके होने का भाव अक्ल समझ लेती है तो यही सबसे बड़ा पर्दा बन जाती है और चूंकि वह आत्मा से बहुत नजदीक है, इसलिए वह जो आत्मा की वज़ह से है, अपने को सब कुछ समझ कर अहम् के चक्कर में पड़ जाती है। इसको चाहे Intelligence कह लीजिए ख्वाह समझने के लिए कोई और चीज़। चाहे इसको मन कह लीजिए / गरज़ कि आत्मा की पहिचान भी यही कराती है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-517
लखीमपुर
29/8/1955
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

न जाने क्यों मुझे कुछ ऐसा लगता है कि मानों ब्रह्माण्ड से Automatically ही कोई चीज़ निकल-निकल कर ऊपर Atmosphere में बहती रहती है, परन्तु वह क्या चीज़ है, यह मुझे पता नहीं। कुछ यह देखती हूँ कि सब लोग कहते हैं कि योगी जब मरता है तो उसका ब्रह्माण्ड फटकर तब मरता है और मैं तो अपना ब्रह्माण्ड Automatic ही फटा पाती हूँ। मेरा तो यह हाल कह लीजिये कि बेमज़े का मज़ा और ‘नहीं’ को ‘है’ मानकर बढ़ रही हूँ।

छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-518
लखीमपुर
7/9/1955
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

पूज्य मास्टर साहब के पत्र द्वारा ‘आपका’ समाचार मिला। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो न जाने क्या बात है कि जैसे पहले एक बार मैंने लिखा था कि चलते-फिरते, काम-काज करते भी मेरा कण-कण तो सदैव निश्चल ही बना रहता है। हाथ हिलाते हुए भी हाथ का एहसास नहीं होता। परन्तु अब तो अजीब तबियत है, चाहे बहकी हुई सी कहने भर को कह लीजिये। यह हाल है कि अब तो बाबूजी चाहे निश्चल कह लें या चंचल किन्तु मेरा तो यह हाल है कि तबियत में अब कुछ भी कहने का असर नहीं। तबियत तो अब ऐसी रहती है कि कुछ कहते नहीं बनता, क्योंकि वह तो ज्यों की त्यों है। उसमें तो कहने के लिये कुछ है ही नहीं।

मुझे तो अब यह भी पता नहीं चलता कि तबियत या दशा भी कोई चीज़ है या नहीं। अब तो यह दशा है कि कहने को भाई, चाहे Ignorance कह लें, परन्तु मैं तो अब यह भी कुछ न कहूँगी। क्योंकि अब तो यह दशा है कि Ignorance का भी मानो रंग उड़ गया हो। जैसे धोती रंग कर धूप में डाल देने से रंग उड़ जाता है और धोती सफ़ेद की सफ़ेद रह जाती है। अंतर इतना है कि मेरे में तो सफ़ेदी भी न कभी थी न है। अब मैं क्या कहूँ? अब तो यह हाल है कि दशा को ज्यों की त्यों कहती हूँ, तो वह भी कहते नहीं बनता। मैंने तो रंग का उड़ना भी जाने क्यों लिखा है, क्योंकि मेरे पास तो कोई रंग था ही नहीं और न तबियत ही थी, तो मैंने तो कुछ नहीं किया और न करूँगी। मैं क्या हो गई हूँ, यह आप ही जानें। मैं यह दशा देखती हूँ कि यद्यपि मुझे तो कुछ चाहिये ही नहीं, परन्तु फिर भी दिल में एक ऐसी कराह है कि पता नहीं वह क्या चाहता है। ‘मालिक’ के साथ रहते हुए भी कहीं वह उसे ही तो नहीं देखना चाहता। ‘वह’ ही जानें। मुझसे तो कभी वह फ़रियाद ही नहीं करता और शायद करता हो तो मैं सुन नहीं पाती हूँगी। न जाने क्यों मुझे अपने पर विश्वास नहीं। मेरे सन्मुख तो एक ‘आप’ ही रहते हैं। परन्तु मैं कहीं ‘आप’ को भूल तो नहीं गई ? यह भी ‘आप’ ही जानें। मैं तो कुछ नहीं कह सकती। जैसे ‘मालिक’ रखेगा, बस वही मेरी रहनी है। कथनी तो कुछ है ही नहीं। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-519
लखीमपुर
14/9/1955
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

यहाँ सब कुशल है। नारायण दद्दा से ‘आपकी’ कुशलता का समाचार मिला। सुनकर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो यह दशा है कि अनभिज्ञता से भी मानों परे हटती जा रही हूँ। अब तो यह हाल है कि अनभिज्ञता का भी ज्ञान विस्मृत हो चुका है। ऐसा लगता है कि मेरा हर काम मानों अब Nature ही स्वयं करती है, बातचीत तक भी। भाई, मुझे ऐसा लगता है कि श्री बाबूजी की बिटिया समझ कर Nature ने उसकी नौकरी बजाने की तो नहीं सोच ली, ‘मालिक’ ही जानें। मेरा तो अब कुछ यह हाल है कि किसी भी दशा को विचार में नहीं बाँध पाती, क्योंकि मैं तो स्वयं ही विचार में नहीं बँध पाती। अब तो यह हाल है कि कहने को कुछ कह जाती हूँ, परन्तु वास्तव में मेरे पास तो अब कहने के लिए कुछ है ही नहीं।

इधर दो-तीन दिन से दशा कुछ साफ़ या खुली हुई नहीं चल रही है और ऐसा अब जल्दी-जल्दी होता है। न जाने क्या बात है कि हालत में सुहानापन कभी नहीं आता या कुछ यह हो कि पता नहीं अब मैं हालत मैं घुस भी पाती हूँ या नहीं। परन्तु हालत, फिर भी लगती अच्छी है। वह भी इसलिये कहती हूँ कि तबियत बुरी भी मालुम नहीं पड़ती। कुछ यह हो गया है कि तबियत में दशा को गौर या मनन कर सकने की शक्ति ही नहीं रह गई है। न जाने क्यों तबियत में ऊबन के साथ-साथ कुछ अन्दर बेचैनी ऐसी रहती है कि न किसी काम में कहीं भी मन लगता है और न बिना काम के ही लगता है। तबियत हमेंशा ऊबती रहती है। कभी सोचती हूँ कि कहीं सफ़ाई की तो जरूरत मुझे नहीं है। अब ‘मालिक’ ही जाने। कुछ इतनी भी मानसिक शक्ति नहीं रह गई है कि चाहते हुए भी इस ऊबन को दूर नहीं कर सकती। शायद इसीलिये कभी-कभी बेकार ही रोने की इच्छा होने लगती है। अब तो तबियत बस ऐसी है कि रोऊं-गाऊं या सोऊँ और ये बातें अब अपने बस की नहीं रही। तबियत को अब ‘मालिक’ के हाथ में दे देने की भी सामर्थ्य नहीं रही।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार।

आपकी दीन हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-520
शाहजहाँपुर
19/9/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र सब के सब मिल गये। हालत तो तुम्हारी अच्छी है ही। ईश्वर का धन्यवाद आज 7.30 बजे शाम को मैंने तुमको G1 पर डाल दिया। ईश्वर ने चाहा तुम Central Region की सैर ज़रूर करोगी। तन्दुरूस्ती, कहीं ईश्वर ऐसा करता कि ठीक हो जाती, ताकि Misson का काम बिना थके हुए कर सकती।

केसर हमारे यहाँ आई थी। हमने उनकी Pind Desh की सैर खत्म करा दी। वैसे ब्रह्माण्ड- मण्डल में उसकी सुरत अक्सी प्रतिबिम्ब तौर पर पहुँच चुकी थी। एक दिन तो मैंने उसे थोड़ा सा सत्संग दिया, जिसमें वह यह न कहे कि हमारा आना निरर्थक हुआ। दूसरे दिन बहुत मरी हुई हालत से उसे सत्संग दिया अर्थात् कुछ तबियत नहीं चाही, मगर कुछ बिना इच्छा के सत्संग कराया। मेरा इरादा पिण्ड- देश की Mastery देने का था और उसी की मैं तैयारी कर रहा था, मगर एक दम से देने की उसमें Capacity नहीं पाई इसलिए मजबूरी रही। काम तो मैंने उसके सुपुर्द कर दिया है और वह ठीक कर रही होगी।

तुमने जो “सहज-समाधि” बढ़ा दी है, मैं जब आऊंगा, तो उसको सुनूँगा फिर छपने का इन्तज़ाम हो ही जावेगा।

चौबेजी को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-521
लखीमपुर
23/9/1955
परम् पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरी तो न जाने यह क्या दशा है कि पहले मेरे अन्दर कोई चीज़ थी, जिससे मुझे अपनी उन्नति का पता मिलता रहता था, परन्तु अब तो उसका भी पता नहीं रहा। शायद इसीलिये मुझे अपनी उन्नति का पता नहीं रहता। बल्कि अब तो यह दशा है कि मानो बस यह दुनियाँ ही मेरी दुनियाँ है और यही तो अब मेरी रहन है। बल्कि यह नहीं, अब तो यों कहिये कोई दुनियाँ न रही। भाई, मैं अपने को अब भला किस गिनती में गिनूँ, समझ में नहीं आता, क्योंकि विचार में अब किसी गिनती का महत्व नहीं। यहां तक कि मुझे तो यदि दुनिया में भूली मानवी कहा जावे, तो शायद गलत न होगा, असर तब भी नहीं है और यह हाल भी है कि लगता है कि मानों इस दुनिया से ऊपर उठने की मुझमें सामर्थ्य हो नहीं रही और न मेरी अब इसमें कुछ रूचि ही रह गई है। अब तो यह दशा है कि कोई घर की कहे या बेघर की कहे, कोई दुनियां की कहे या बे-दुनियां की कहे, परन्तु तबियत में इसकी कोई रूचि नहीं, कोई अन्तर नहीं पड़ता।

भाई, अब मैं कैसे अपनी दशा को, किन शब्दों में लिखूँ। कुछ यह देखती हूँ कि मेरे विचारों में अब कोई ज़ोर ही नहीं रह गया है, न दृढ़ता ही है, क्यों? मैं तो अब यह देखती हूँ कि दशा में यदि Innocence की या नम्र महा-समाधि या Simplicity कहती हूँ तो भी अब तो ये सब निरर्थक हो गये हैं या मेरे विचारों में इतनी शक्ति नहीं, जो इन्हें पकड़ सके।

सब लोग कहते हैं कि अपनी ही प्रलय हो जाती है, परन्तु बहुत सोचने पर भी मेरी प्रलय कहाँ हुई? जैसी की तैसी हूँ। अब जब मैं सत्संग में जाती हूँ तो मुझे यह लगता है, जाने यह क्या उत्सव है, जिसका मुझे कुछ पता नहीं। पहले की तरह अब मेरी आँखों में खोज नहीं रही। सोते-जागते सी दशा में एक ऐसी पीर है, जिसे मैं न तो पीर है, कह सकती हूँ, न कुछ कह सकती हूँ। अब तो आंखों में जाला न रहा, जिसके साफ़ होने पर यह कहती कि भाई, अब कुछ और दीखा, अब ज्यादा अच्छा दीखा और जाला हटने पर दीखा, क्या?, कुछ नहीं। अब तो भाई यह दशा है कि कुछ ऐसा हो गया है कि मन में या मेरे अन्दर कोई स्मृति ही नहीं रह गई है। यहाँ तक कि किसी आत्मिक क्षण, आत्मिक आनन्द तक का भी कभी स्मरण ही नहीं आता है। वहां तो न कोई चित्र बना है, न बिगड़ा है। मैं तो जाने बुत हो गई हूँ। कोई मेरे पास पूजा करने को आता है, तो जब तक वह कहता नहीं, तब तक नहीं समझती कि मेरे पास कोई पूजा करने को भी आ सकता है और करवाती भी हूँ तो नासमझी की हालत में। बस केवल ‘आपके’ ही सहारे तो सब होता है।

केसर ‘आप’ को प्रणाम कहती है और अम्मा आप को आशीर्वाद कहती है। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-522
शाहजहाँपुर
29/9/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 23 सितम्बर को मिला। तुमने श्री वी. विश्वनाथन के बारे में जो कुछ लिखा ठीक है। वह महायोग में मस्त हैं, जो अहंकार ख़त्म करने का तरीका है, मगर अचम्भा यह है कि अहंकार उनमें बढ़ रहा है। डा. वर्धाचारी का पत्र फिर आया है, जिसकी नकल मैं भेज रहा हूँ। आदमी बहुत अच्छा है, मगर नहीं मालूम, कभी कुछ लिख देते हैं, कभी कुछ लिख देते हैं। उनके हृदय में कालिमा ठोस हालत में तो नहीं है, मगर अभी है और यह चीज़ कुल System में तुम उनके पाओगी।

अब अगर तुम्हें अपनी हालत को लिखने के लिए शब्द नहीं मिलते, तो मुझे भी तुम्हारी हालत समझने के लिए शब्द नहीं मिलते हैं। जो चीज़ कि तुम्हें अपनी हालत का पता देती थी, वह द्वैत थी, जो अब अपना आपा छोड़ता जाता है, या मुरझाता चला जाता है, इसलिये पता नहीं चलता। मगर फिर भी कोई चीज़ होती ही है, जो कुछ न कुछ अपनी हालत का पता दे रही हो, तो फिर भला वह पता क्या दे। कबीर ने कहीं पर लिखा है:-

“जहाँ मिलौनी, तहाँ विचार, एक एक में कहाँ विचार॥”

  ‘मालिक’ अगर विचार में नहीं आता तो यह तो बड़ी अच्छी चीज़ है। इसलिए कि जिसकी तलाश थी, वह स्वयं मौजूद है। मगर अभी यह हालत पूरे तौर से पैदा नहीं हुई है। तुमने लिखा है, कि अपनी दशा में कोई विशेषता नहीं लगती, बल्कि और सब मनुष्यों के समान मालूम होती है, यह खुद बड़ी अच्छी हालत है। मगर पूरे तौर से यह हालत भी अभी नहीं आई है, आरम्भ जरूर है। असली हालत, जो इन्तहाई पहुँच के बाद पैदा होती है, वह इतना बड़ा भेद है कि उसको मैंने अभी तक जुबान से भी नहीं कहा है। इसलिए कि नहीं मालूम कि लोग मेरे बारे में क्या ख़्याल करें। कम से कम यह तो फ़तवा दे ही देंगे कि इसने आध्यात्मिकता में अभी क़दम भी नहीं रखा और लोगों को बहका रहा है। दूसरे यह बात भी है कि इस आखिरी हद के पहुँचने का नतीजा अगर किसी को बता भी दिया जाये तो फिर कोई ऐसी बात नहीं रह जाती कि जो मनुष्य के लिए ऐसी हो कि ब्रह्म-विद्या की ओर उसको ले जाते। तबियत बहुत चाहती है कि उसे कहीं पर कह ही डालूँ। मगर इसका न बताना ही अच्छा है जो पहुँचेगा, खुद जान लेगा। सम्भव है कि वेदों और ऋषियों की किताबों में इसीलिये इसका छींटा भी न दिया गया हो या यह भी हो सकता है कि यह बात मुझ ऐसे अकिंचन के लिये ईश्वर ने Reserve रखी हो क्योंकि बड़ी बातें तो बड़े लोगों के लिये रखी गई हैं और छोटी बातें मुझ जैसे मामूली आदमी के लिये ही हों। ठीक है कि एक भिखारी जब माँगता है तो उसको पैसा या रोटी का टुकड़ा दे दिया जाता है और जब कोई बड़ा आदमी माँगता है तो हज़ारों का चैक उसे लोग देते हैं। तुमने लिखा है कि ऐसा लगता है कि हाथ से मानों सब कुछ निकल गया। इसके माने या तो यह समझ लो कि हाथ में सब कुछ आ गया या यह समझ लो कि जिस चीज़ को तुम पकड़े बैठी थी, उस बोझ से हाथ खाली हो गया। तुमने यह लिखा है कि एक ऐसी कसक मौजूद है, जिसको न तो कह सकती हूँ या नहीं ही कह सकती हूँ। यही चीज़ बस आगे बढ़ा रही है, और यह उस वक्त विदा होगी जबकि अपना काम पूरा कर लेगी। आखिर पर रहना इसको भी नहीं है।

केसर का भी ख़त आया। उसे तबियत में इस बात की ग्लानि नहीं होनी चाहिये कि जिस हद तक मैं उसे देना चाहता था, उस हद तक उसमें Capacity न थी। रफ्ता रफ्ता पैदा हो जायेगी, ईश्वर ने चाहा। जापान भेजने के लिए मैंने फोटो खिंचवा लिये हैं। मैं सब के सब भेज रहा हूँ मास्टर साहब ने तो वाकई दुनिया के हर हिस्से में ज़्यादा न सही तो दो-दो, एक- एक आदमी में ही सही, Mission का नाम तो पहुँचा ही दिया। बस इतना अपने हाथ में था, आगे अब ईश्वर के हाथ में है।

चौबेजी को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-523
लखीमपुर
22/10/1955
परम् पूज्य श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आप’ का मिला। मेरा भी एक पत्र ‘आपको’ मिला होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

पहले मुझे जब कुछ होश या ध्यान आता था, तो लगता था कि तबियत व कुल शरीर के नसों तक की Activities का खिंचाव ऊपर की तरफ़ अनुभव होता था, परन्तु अब तो यह दशा है कि लगता है कि मैं तो यहीं की यहीं बनी रहती हूँ, ऊपर कभी जाती ही नहीं। अब तो यह हाल है कि ख्याल कभी कोई आता नहीं, और बेख्याल भी तो रहती नहीं। भाई, मेरा तो यह हाल कह लीजिये कि सोई हुई तबियत को सोने का एहसास नहीं, या गुमी हुई तबियत को गुम होने का गुमान नहीं। बस जीवन एक साधारण सांसारिक लड़की की तरह चल रहा है। अब न जाने क्यों तबियत में बेचैनी का एहसास न होते हुए भी चैन नहीं पाती हूँ। इधर तबियत फड़फड़ा कर कहीं भागती चली जाऊँ, ऐसा चाहती है। कैसे चली जाऊँ, कहाँ चली जाऊँ, यह तो कुछ पता नहीं है। परन्तु भाई, अभी अन्दर कोई ऐसी बन्दिश ज़रूर है, जो फड़फड़ाने से भी टूट नहीं जाती और तबियत खुल नहीं जाती। यही कारण है कि न घर न बाहर न सत्संग न किसी से बात में एक क्षण को भी तो जी नहीं लगता। मेरी यह दशा है कि बेचैन और चैन का भी एहसास नहीं है।

अब तो भाई, यह हाल है कि बन्दिश भी है नहीं और स्वतंत्रता का भी पता नहीं। अब तो भाई, अपने को देखती हूँ तो अपने ‘मालिक’ से पूछती हूँ कि मैं अस्थिर हूँ या स्थिर हूँ, कुछ पता नहीं चलता मुझे। किसी समय में मुझे याद है कि मैंने यह ‘आपको’ लिखा जरूर था-“मन थिर, चित थिर, सुरत थिर, थिर भया सकल शरीर”। परन्तु अब तो मैं यह भी नहीं कहती। वह भी नहीं कहती। अच्छा तो यह है कि मैं चुप ही क्यों न बैठी रहूँ परन्तु दशा तो यह है कि न बोलना, न चुप रहना, न सुनना, न सुनाना, मुझे तो अब कुछ भी आता नहीं। अपने को अब देखती जरूर रहती हूँ, परन्तु कोई विशेषता, कोई Change, ख़ास तो मालूम नहीं पड़ता है। अब तो दशा ऐसी कह लीजिये कि जैसे, जब दुनिया में जो सबसे पहला आदमी पैदा हुआ हो, तो न तो उसे स्वयं ही पता रहेगा कि वह क्या कर रहा है, क्या नहीं कर रहा है, और जो कुछ उससे हो रहा है, वह ग़लत है या ठीक है। बेचारे को न तो कुछ ईश्वर का पता है, न पूजा का, न कोई, वह उसकी जरूरत ही समझता है और न कोई उसके सामने ऐसा है, जिसे देखकर ही कुछ सीखे। वह तो जो करता है, ठीक है, बस यही दशा है मेरी। हाँ, इतना जरूर है कि मुझे अभी यह भी पता नहीं है कि मैं पैदा हुई भी कभी हूँ या नहीं। शायद इसीलिये मुझे तो न जाने क्या हो गया है कि अब अपनी दशा सब मनुष्यों के समान भी नहीं अनुभव होती, क्योंकि मेरी तो यह दशा है कि मुझे कुछ यह भी तो पता नहीं कि दुनिया अभी बनी भी है या नहीं। लेकिन यह जरूर देख रही हूँ कि इस दशा को मानों कोई अपने हाथ में पकड़े है। बड़ा धीमें धीमें खुलने दे रहा है। यह जरूर मेरे ‘मालिक’ की कृपा है। मैं ऐसी दशा में समाने या मिटने तो लग ही गई हूँ अब तो यह एक ऐसा नया Para शुरू है कि जिसमें ज़िन्दगी और मौत, ये दोनों पहलू तबाह हो गये, जिसमें बनना और मिटना, ये दोनों बातें नहीं है। विद्या और अविद्या का पता नहीं है। बस यह अब मेरी दशा कह लीजिये या मेरा ऐसा स्वरूप ही कह लीजिये, तो ठीक होगा। अब तो भाई न हद की बंदिश है और न बेहद का मैदान है। जाने क्या है कुछ पता नहीं। बस ‘मालिक’ का वरदहस्त ढ़ील बहुत ही धीमें धीमें दे रहा है, जिससे बहुत ही धीमें-धीमें यह दशा खुल रही है।

ऐसा लगता है कि मेरे अन्दर मानों जबरदस्ती कोई एक बंधन लगाये है और वह बंधन, बंधन नहीं लगता, वरन् आगे बढ़ाता है। भाई, अब तो लगता है कि ‘मालिक’ भी हाथ से मानों निकल गया हो। मेरा तो यह हाल है कि मुझमें तो अब कोई Capacity ही न रही। अब क्या करूँगी, पता नहीं। और इसीलिये शायद Heart में भी Broadness कभी आती नहीं और लाने की मुझमें क्षमता नहीं रही और न Capacity ही बनाने की।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-524
लखीमपुर
29/10/1955
परम् पूज्य श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र ‘आपको’ मिला होगा। यहाँ सब कुशल है, आशा है, आप भी सकुशल होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब देखती हूँ कि जो भी दशा ज्यों-ज्यों खुलती जाती है, वैसे ही वैसे पहले की तरह वह पहले ऊपर फैलकर भीतर नहीं जाती, वरन् अब तो वैसे ही वैसे वह मेरा मानों स्वरूप ही होती जाती है या यों कहिये कि वह मेरा स्वरूप होती नहीं जाती, वरन् वह तो मानों मेरा स्वरूप होती ही है। मेरी तो न जाने क्या दशा है कि लगता है मैं तो खाने-पीने और, और कामों में ही चाहे व्यस्त न भी रहते हुए भी व्यस्त रहती हूँ, मानो मुझे और कुछ मालूम नहीं है। अब ‘आप’ ही बतायें, मैं क्या करूँ?

मेरा तो अब कुछ यह हाल रहता है कि सोई हुई सी तबियत रहती है, परन्तु सोये हुए का एहसास नहीं रहता है। पहले रात में जब सोती थी, तो बड़ी फैली हुई व कुछ हल्की-हल्की बड़ी अच्छी दशा लगती रहती थी। जागने से सोना भला लगता था, परन्तु अब तो यह दशा है कि रात दिन बस यही दशा रहती है कि सोई हुई सी तबियत में सोये हुए का भान ही नहीं रहता है। मुझे तो अब इनमें कोई अन्तर ही नहीं लगता है। सादगी कहती हूँ तबियत में, तो यह भी मात खाती है। वास्तविक बात तो यह है कि दशा कोई है ही नहीं। दशा की तो अभी शुरूआत ही नहीं हुई है। लगता है तबियत ने नम्रता को भी छोड़ दिया है। बन्दगी के भी चिन्ह या आसार पाये नहीं जाते हैं। बस एक उचाटपन सा ही मानों तबियत में घर कर गया है और कुब्बत मुझमें रही नहीं और न इरादा बाँधने की ही गुंजाइश रही, फिर तो ‘मालिक’ ही सम्भाले। आत्मा भी लगता है मर गयी है, क्योंकि जो तबियत को अच्छे-बुरे किसी में टोकती ही नहीं।

भाई, मेरा तो यह हाल है कि- “तेरी एक मुश्त खाक के बदले तू न अगर वहिश्त भी मिले”। और शायद यह इसलिये है कि ऐसा हो गया है कि मुझे यही लगता है कि जैसे मैं ‘मालिक’ के Sub Conscious Mind में समा चुकी हूँ या उसके Sub Conscious Mind में फैल चुकी हूँ। मेरी तबियत तो लगता है कि ‘मालिक’ की मुट्ठी में है और यही बस ज़रा सी बंदिश मालूम पड़ती है, नहीं तो तबियत कहीं भाग-भाग जाने को बेचैन हो उठती है। अब हालत क्या है, केवल एक अन्दाज़ भर है और अब तो केवल अन्दाज़ को अन्दाज़ की भी खबर नहीं रहती, क्योंकि अब मैदान भी क्या है। एक बराबर सतह सी चली गई है, जिसका छोर नहीं, परन्तु मेरी निगाह तो सतह पर भी नहीं मिलती। जाने क्या हो गया है, यह तो ‘आप’ ही जानें।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:- 

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-525
शाहजहाँपुर
2/11/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र 22 अक्टूबर और 29 अक्टूबर के लिखे हुए मिल गये। डा. के. सी. वर्धाचारी में अब अंधकार और कालिमा बहुत ही कम है। तुमने उन पर मेंहनत बहुत अच्छी की और मैं भी सोचता रहा कि कौन सी तरकीब की जावे कि जिससे वे साफ हो जावें। मेंहनत मैं भी उनके साथ कई महीने से इसको दूर करने की कर रहा था। उनके दिल की हालत ऐसी थी कि जैसा अंधा कुँआँ। अब ‘मालिक’ की कृपा से यह बातें बहुत ही कम हैं। मेरे बहुत हाल ही में तरकीब समझ में आई कि जो अंधकार का कारण है उस पर Concentrate करके दूर किया जावे। चुनांचे ऐसा ही किया और उन्हें फ़ायदा भी हुआ, मगर मुझे बड़ा ताज्जुब है कि मेरे किसी वक्त में ऐसी चीजें फौरन समझ में आती थी और अब महीनों बाद यह चीज़ समझ में आई। कमजोरी की वज़ह से दिमाग उतना अच्छा काम नहीं करता।

तुम्हारे ख़तों का जबाब देना बड़ा मुश्किल पड़ रहा है, इसलिये कि आगे लय-अवस्था और उसकी तुरिया, जिसको फ़ारसी में बका कहते हैं, शुद्ध रूप में घूम फिर कर आती रहती है और इनका छोर नहीं, कब तक आवे। आखिरी बका बस यही होती है कि Changeless (अपरिवर्तन) दशा पैदा हो जावे। फिर न तड़प रहती है न कोई दशा और यह इतनी ऊँची हालत है कि इसके बाद फिर और कुछ नहीं है। ईश्वर करे यह हालत सबको नसीब हो। मगर कठिनाई यह है कि मैं अपने साथियों से इसके लिये बकता ही रहता हूँ मगर कोई तवज्जोह नहीं करता। मैं इस पर भी तैयार हूँ कि क्षण मात्र के लिये उनको यह दशा दिखला भी दूँ। जो यह निहायत मुश्किल काम है, इसलिये कि जो बंधन है, उसको पकड़े रहना पड़ेगा, ताकि रूह (आत्मा) कहीं अपनी असल में न मिल जावे। क्योंकि एक मुसाफिर कितना ही दूर क्यों न हो मगर जब घर सामने पड़ जावे तो फिर अन्दर जाने की तबियत ही चाहेगी। फिर यह सब कुछ किया भी जावे तो भी कोई इसके लिये तैयार नहीं मालूम होता। मैंने अक्सर छोटी-छोटी हालतें लोगों को दिखलाई है, ताकि उनको ब्रह्म विद्या से शौक बढ़े; मगर उससे कोई लाभ न हुआ। तुमने अपने खत में लिखा है कि “मैं हालत से चिमट नहीं पाती” यह एक मरतबे पहले भी हो चुका है। मगर इस मरतबे तुम्हारी ख़ता नहीं है। मैं अब तक यह तय नहीं कर पाया कि किस तरह से तुम्हें चलाया जावे। जिस तरह से अब तक तुम्हें चलाता रहा उस तरह से चलाने में सब बातें वहीं पैदा होगी जो मुझे मिली हैं। खैर उसमें भी मैं हर्ज नहीं समझता। मगर फिर यह सवाल उठ सकता है कि दो एक सी Personality एक वक्त में नहीं रह सकती। अगर दूसरी Personality ऐसी तैयार हो जावे इत्तफ़ाक से तो पहली की ज़रूरत नहीं रहती और उसको फिर दुनिया छोड़ना ही पड़ती है। गुरू महाराज ने यह भी कहा है कि जो Personality इस वक्त काम कर रही है, हजारों वर्ष तक आगे नहीं आवेगी। खैर, यह भी कोई बात नहीं। खास तौर पर प्रार्थना करने पर यह हो सकता है कि एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, कुछ समय तक आती रहे अगर तबियत मेरी यही मजबूर करती है कि जैसा अब तक तुम्हें चलाता रहा हूँ, वैसा ही चलाऊँ, जितना मैं तुम्हें अभी तक ले आया हूँ, उसका परिणाम यह है कि तुम्हारी अवतारी हालत (Prophetic Condition) शुरू है और तुम अगर गौर करके देखो तो तुम्हें यह पता सम्भव ही चल सके कि ईश्वरीय शक्ति तुमसे आदेश लेने के लिये और काम करने के लिये इन्तज़ार में रहती है। अभी तक मैंने यह चीज़ नहीं लिखी, अब लिखता हूँ। यह ज़रूर है कि मैंने वह Instinct अभी तुममें Develop नहीं की, कि जिससे ईश्वरीय शक्तियों से काम ले सको और न मैंने अभी तुम्हारा रूख उस तरफ़ घुमाया है।

तुमने लिखा है कि कम्पन होता है तो ऐसा लगता है मानों मैं मालिक के Sub-Conscious Mind में समा चुकी हूँ। यह ख्याल ठीक मालूम होता है और जो तुमने जो लिखा है कि अपनी शक्ति ही याद नहीं आती और Photo को देखकर अपने आपको न पहिचानना, यह सब इस बात को ज़ाहिर करती है कि कस्तूरी जैसी इस दुनिया में बनकर आई थी, अब बिगड़कर वैसी ही रह गई, अर्थात् जो आने से पहले थी और इसी को अपने आपको पहिचानना कहते हैं। विचारों का तांता आना जो लिखा है, यह विचार तुम्हारे नहीं है, बल्कि उस सूक्ष्म रूप के विचार हैं, जो मनुष्यों ने बनाये हैं और वह टकराते रहते हैं। मेरी भी यह हालत बहुत दिनों रही है।

ज्यादा ऊँचा चढ़ जाने पर फिर इनका टकराना बन्द हो जाता है। मगर फिर भी जैसे Environment सामने आ जाते हैं, उसी के मुताबिक ख्याल पैदा हो जाते हैं, मगर वह विचार ज़्यादातर उसके नहीं होते।   अम्मा को प्रणाम और भाई बहिनों को आशीर्वाद। असम संदेश तुम्हारे पास भी श्री काशीराम ने भेजा होगा। उसमें तुम्हारा भजन छप चुका है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-526
लखीमपुर
4/11/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आप का कृपा-पत्र मिला। पढ़कर समाचार मालूम हुआ। 'मालिक' की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो कुछ ऐसी दशा है कि मुझे अंतर में हर समय अच्छा लगा करता है और यही नहीं, बल्कि वही तो मेरा स्वरूप हो गया है लेकिन मैं देखती हूँ कि अब अपने उस (अच्छा लगने के) स्वरूप से भी यानी उस अच्छाई से मेरा सम्बन्ध है या नहीं, यह पता नहीं। क्योंकि अच्छाई का अन्दाज़ भी तो अन्दाज़ में नहीं आता है। कुछ यह है कि इतना अधिक Absorb उस आनन्द में हो चुकी लगती हूँ, या न जाने क्यों रह-रह कर लुप्त होने लगती हूँ। अब न जाने क्यों देखती हूँ कि विचारों का कुछ तांता सा दिन-रात सोने में भी लगा रहता है और वह कुदरतन ऊपर से जुड़ा रहता है। इसलिये मेरा तो उन विचारों से कोई मतलब कोई सम्बन्ध नहीं रहता है। अब तो यह दशा है कि न तो अनजान दशा रह गई है और न कुछ जानती ही हूँ। खुद अपनी हालत से मुझे अपना कुछ सम्बन्ध नहीं लगता है और कोशिश किसी बात की करने से लगता है कि मानों ज़बरदस्ती मज़े से अलग होने की कोशिश करती हूँ, यद्यपि हो नहीं पाती। भाई, सच बात तो यह है कि मैं देखती हूँ कि कोई हालत अब आती ही नहीं कि जिससे मैं सम्बन्धित हो सकूँ या जिसमें मैं लय हो सकूँ। दशा तो Naturality का मानों खुद नमूना बन गई है परन्तु Naturality भी तो है या नहीं, मुझे कुछ पता नहीं। यही नहीं बल्कि लगता है कि यह शब्द मैं ऐसा सुन रही हूँ कि जो मैंने कभी नहीं सुना। मैं देखती हूँ कि शरीर का, अंतर का कण-कण एक ऐसे मज़े का स्वरूप बन चुका है कि जिसे न तो मज़ा ही कहते बनता है और न बेमज़ा ही कहते बनता है। बस यही हाल है।    मेरा तो भाई यह हाल है कि न तो मुझे कुछ मालूम है और न यह मालूम है कि कुछ नहीं मालूम है। यदि मालुम है तो क्या कुछ पता नहीं और यदि नहीं मालूम है तो यह भी पता नहीं कि क्या नहीं मालूम है। पहले मैं देखती थी कि Dim ही सही, कुछ कम्पन सा हर समय मुझे एहसास होता था, परन्तु अब तो न जाने क्या हो गया है कि कुल शरीर भर में कम्पन कभी होता नहीं। यहां तक कि भीतर बाहर मुझे कहीं हरकत या कम्पन का कभी एहसास ही नहीं होता है। भाई पता नहीं कि क्या मेरा अन्दाज़ ही खतम हो गया होगा। परन्तु नहीं, दशा तो यह है कि अन्दाज़ और बेअन्दाज़ का भी तो अन्दाज़ नहीं लगा पाती। और अन्दाज़ क्या रह गया है, जबकि हालत यह है कि आध्यात्मिकता से तो सम्बन्ध ही टूट चुका और Reality से फिर रिश्ता ही क्या है। न जाने भाई, मैं तो जाने इतना नीचे आ गई हूँ कि कभी आत्मिक बातें मुझे याद ही नहीं आती और ‘मालिक’ की बातें मैं भला जानूँ ही क्या ? कुछ जानती भी हूँ मैं या नहीं, यह मुझे मालूम नहीं और मैं क्या जानूँ? या क्या मुझे जानना चाहिये, यह ‘मालिक’ ही मुझे बतावें।

हालत में Simplicity मुझे पसन्द है, परन्तु अब तो मैं विचार तक में उसे पकड़ नहीं पाती और Simplicity भी इसलिये पसन्द है कि मैं सुनती हूँ कि मेरे ‘मालिक’ को Simplicity पसन्द है। कुछ यह हो गया है कि न मुझे अब यह एहसास होता है कि चल रही हूँ, न रुकती ही हूँ, परन्तु फिर भी देखती हूँ कि न जाने मुझे क्या हो जाता है कि हालत में Break जल्दी-जल्दी फिर लगा, फिर ठीक, फिर लगा, फिर ठीक। अगर ‘मालिक’ न हाथ पकड़ कर चलाये तो मुझे लगता है कि Break ही लग जावे। लगता है ज़बरदस्ती घुमाते लिये चल रहे हैं। अम्मा ‘आप’ को आशीर्वाद कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:- 

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-527
लखीमपुर
19/11/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र ‘आपको’ मिला होगा। यहां सब कुशल है। आशा है वहाँ भी सब सकुशल होंगे ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

वैसे तो कुछ मालूम ही नहीं रहता, परन्तु देखती हूँ कि कभी-कभी अक्सर मुँह से यह ज़रूर निकल जाता है कि जो चाहूँ सो ईश्वरीय शक्ति से काम करा सकती हूँ, परन्तु यह तो हँसी की बात रही। मैं तो अजीब खाली रहती हूँ। विचार भी टकराते नहीं, परन्तु अब देखती हूँ कि एकाध दिन को कभी विचार कुछ आने भी लगे, तो भी मैं खाली की खाली रहती हूँ। हर आदमी ही मुझे खाली मालूम पड़ता है। यही नहीं, हर आदमी चलते फिरते हुए भी मुझे उनमें कभी हरकत ही नहीं मालूम पड़ती है। न तो जड़वत् ही कुछ दीखता है और न यह तबियत ही किधर को भी कुछ जानने समझने को उत्सुक होती है। देखती हूँ कि तरक्की की भी इच्छा जैसे कभी कुछ उठती नहीं बस, मालिक जानें।

अब तो यह दशा है कि कुछ अनजानना मेरे लिये असम्भव सा लगता है और कुछ जानना मानो उससे भी असम्भव हो गया है। अब तो यह हाल है कि ‘मालिक’ का Sub-Conscious Mind मुझमें एकदम सब समाकर हज़्म हो गया है और मेरी सैर या गति उससे परे शुरू हो गई है और तभी से लगता है, मानों विचारों का वह तांता सा, जो मेरे जाने अथवा अनजाने में भी यहाँ तक कि सोने में भी हर समय लगा रहता था अब वह भी मुझमें सब हज़्म हो गया है और दशा में अब मुझे आराम सा लगा करता है और यह आराम भी मानों मुझमें सब हज़्म होता जा रहा है। दशा अब बिल्कुल खाली है, परन्तु उसमें खालीपन नहीं है। पहले यह लगा करता था कि जैसे दशा को मैं देखती चलती हूँ, अनुभव करती चलती हूँ, परन्तु अब तो दशा स्वयं मानों मेरा स्वरूप ही हो गई है। एक कसक अक्सर मन में कसकती रहती है कि ‘मालिक’ को जी भरकर न चाह सकी। परन्तु अब यह ऐसा कांटा है, जो अब खटकता नहीं। अब तो मुझे यह शिकायत नहीं रही कि दशा में चिमट नहीं पाती। बिल्कुल सरल सी, शुद्ध तबियत है परन्तु फिर भी कुछ ठीक नहीं कह सकी। ‘मालिक’ की कृपा से दशा जैसी अनुभव में आती है, वैसी कह नहीं मिलती है। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-528
लखीमपुर
26/11/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

पूज्य मास्टर साहब के पत्र से आपका समाचार मिला। यहाँ भी सभी सकुशल हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

हालत क्या है, खुद अपना नमूना है क्योंकि वह खुद अकेली है। उसकी उपमा के लिये कुछ जब दूसरा हो, तब तो उपमा देवे। जब वह वही है, तब क्या होवे। भाई, मेरा तो यह हाल है कि जाने मुझे लगता है कि फ़ैज तो मानो मुझमें कभी पहुँचता ही नहीं। फ़ैज (Transmission) का तो मुझे स्पर्श ही नहीं हो पाता। भाई, मुझे कभी ‘श्री बाबूजी’ दिखाई ही नहीं पड़ते हैं। कहाँ से आँखें लाऊँ, जो देखूँ अपने प्रभु को। क्या मुझे ज़िन्दगी भर कभी अपने ‘श्री बाबूजी’ की याद नहीं आयेगी? बस केवल ‘श्री बाबूजी’ की Sitting में अच्छा सा या Rest सा मिला करता है। मेरा तो कुछ यह हाल है कि मुझे एक क्षण को भी यह पता ही नहीं लगता कि मैं ‘श्री बाबूजी’ के यहाँ आई हूँ। यही नहीं, अब तो यह दशा है कि बार-बार ‘श्री बाबूजी’ से ही पूछने की बात जुबान पर आ जाती है, परन्तु जाने कौन थामें रहता है कि ‘श्री बाबूजी’ कहाँ हैं, घर में कब आवेंगे। मेरा तो यह हाल है कि लगता है कि कुल आत्मिक हालत की ज़िन्दगी लय हुई जा रही है। कारण का भी कारण सब कुछ समाप्त हो चुका है। ‘श्री बाबूजी’ के अपने सामने बैठे रहने पर भी, न जाने क्यों मुझे उनका एहसास नहीं होता है। यह तो आप ही जानें कि यह क्या है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती है। छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति:- 

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-529
लखीमपुर
29/11/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र आपको मिला होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अभी हाल ही में जब मैं शाहजहाँपुर से लौटी, तो बस पर बैठते ही यह पता नहीं रहा कि मैं शाहजहाँपुर गई भी थी। बस एक ऐसा अनजान नशा तो नहीं कहना चाहिये, परन्तु कुछ ऐसा है, जो मुझे बस चुप बैठे, बिना काम के जी लगा रहता है। कहीं जाने को तबियत ही नहीं चाहती है।

मेरा तो यह हाल है कि कभी-कभी आमने-सामने बैठे-बैठे एकाएक मालिक से यह अलग बैठा शरीर भी भार होकर छटपटा उठता है, उनमें समा जाने के लिये, परन्तु ऐसा हो नहीं पाता। शरीर वही नहीं हो जाता। जबसे शाहजहाँपुर से लौटी हूँ, कुल पीठ में, विशेष कर रीढ़ में, व रीढ़ के लगे-लगे में, इधर उधर हर समय कुछ गुदगुदी सी, कुछ सिहरन सी हुआ करती है। रीढ़ के ऊपर से लेकर निचले सिरे तक ऐसी ही कुछ हरकत सी हुआ करती है।

छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-530
शाहजहाँपुर
4/12/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभ-आशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र 26 नवम्बर और 29 नवम्बर के लिखे हुए पहुँचे। मैं मथुरा से 30 नवम्बर की शाम को आ गया था। नारायण के यहाँ उनके कहने पर छः घंटे ठहरे। एक मुख्तार साहब, जिन्होंने नारायन से शुरु किया था, भी मेरे पास बैठे थे और बहुत खुश हुए। इससे जाहिर होता है कि वह स्थाई रूप से करते रहेंगे। वह डा. चतुर्भुज साहब के पास भी बैठ चुके हैं और उनको यह यक़ीन हो गया है कि वहां पर आडम्बर ही आडम्बर है। डा.चतुर्भुज साहब की किताबें उन्होंने सब पढ़ी हैं और वह कहते थे कि जो किताबें इस Mission की निकल रही हैं, और जो उनमें बात है, उसकी पासंग भी वह नहीं है और उसमें विचार भी पूर्ण रूप से दर्शाये नहीं गये हैं। मेरा विचार तो यह है कि सम्भव है कि किसी समय में लोगों के समझ में यह आ जावे कि इतना अच्छा विषय और Original कहीं और नहीं है यह सब हमारे गुरू महाराज की आशीष और बरकत है और मुझे पूरा यकीन है कि उनका Mission उन्नति करके ही रहेगा। यह जरूर है कि अभी तक लोग मुझे सेवा का मौक़ा नहीं दे रहे हैं और न ज्यादातर ऐसे लोग मिल रहे हैं, जिनमें Burning Desire (उत्कंठा) असलियत हासिल करने के लिये मौजूद हो, या तो यह मेरी तकदीर का करिश्मा है या अभी समय पूर्ण रूप से ऐसा नहीं आया।  अब मैं कुछ गोद- गाद तुम्हारी हालतों के विषय में कर रहा हूँ। ऐसी सूक्ष्म गति का जवाब देना बड़ा कठिन है। इसलिये कि लय अवस्था की ही गति जो तुम्हारे पत्र में मौजूद है वही बढ़ती चली जा रही है और वही हालतें भाँति भाँति से तुमने दर्शायी है। तुमने लिखा है कि ऐसी सुस्त हालत रहती है कि पत्र लिखने को भी तबियत नहीं चाहती है। यह शुक्लाजी वाली हालत नहीं है, बल्कि Soul का यह Characteristic है कि हम Inactivity की तरफ रहने लगे हैं, और जिस्म से सम्बन्ध बहुत कम हो गया है। इसमें दो बातें होती हैं, जब हम ज़िस्म से काम लेना चाहते हमारी गति ऐसी हो जाती है, जैसे जब ईश्वर ने दुनिया पैदा की तो Soul हमारे पैदाइश का कारण बन गई और वह ऐसा Base बन गई कि विचार आते ही उसमें हरकत काम करने के लिये शुरू हो जाती है। विचार आत्मा से बहुत निकट है, इसलिये हम कहेंगे तो यही कि वह खुद आत्मा से ताकत घसीट कर जिस्म से काम लेना शुरू कर देता है और आत्मा में कुछ ऐसी गति है कि उसकी ताकत से विचार जो चाहे सो काम ले ले। जैसे बिजली की ताकत कि उससे चाहे रोशनी का काम ले लो, चाहे पंखे का और चाहे अंगीठी का। इसलिये हम कोशिश यह करते हैं कि विचार भी आत्मा का रंग ले ले और इसी के लिये अभ्यास है। जब हमारा विचार इतना शुद्ध हो जाता है और उसमें सब रंग उतर जाते हैं तो मनुष्य से वही काम होते हैं, जो धर्म-शास्त्र के अन्दर हैं और वह जो कुछ करता है, उसमें शास्त्र का विरोध नहीं होता। शास्त्र में बहुत सी पाबन्दियाँ ज़ाहिरी भी रख दी है ताकि विचार शुद्ध और पवित्र बनते रहें। कुछ कवियों ने अपनी तबियत इन विषयों पर ज्यादा आजमायी है और ठोसता से भी काम लिया है, जिसका नतीजा यह हुआ कि हमारा आधार ठोसता ही रह गया और इसी को लेकर, चूँकि यह चीज़ आसान थी, हमारे यहाँ के रंगे हुए महात्मा लेकर चल दिये। विवेक-शक्ति तो तीव्र हो नहीं पाई थी कि Right और Wrong में फ़र्क समझ में आता और काम करना शुरु कर दिया और प्रमाण के लिये उन्हीं कवियों को पेश कर दिया, जिनके बारे में ऐसे विचार लिखने पर लोगों की राय यह हो गई कि आध्यात्मिकता में भी यह पूर्ण थे। इतनी हालत तो महात्माओं में पैदा हुई नहीं कि उनकी शक्ति का अन्दाज़ा लगा सकते। मैंने उर्दू, फ़ारसी Literature देखा है, उसमें भी बड़े अच्छे-अच्छे विचार मिलते हैं, मगर उनको आध्यात्मिकता में निपुण बनाकर कोई सामने नहीं रखता। विचार की तारीफ़ जरूर है, और उसके Quotations भी दिये जाते हैं। यह सिर्फ हिन्दी कवियों की ही किताबें महात्मा लोग प्रमाण समझते हैं और मैं तो यही नतीजा निकालता हूँ कि सिर्फ संस्कृत पढ़े हुए लोग जो हैं, उनका Vision बहुत Broad नहीं रहता। उसकी वजह यह मालूम होती है कि संस्कृत में अभी तक सिर्फ Set Literature ही रहा है उससे आगे Nature को देखते हुए और मुख्तलिफ़ विचारों को तौलते हुए अभी तक लिखा नहीं गया है। मनुजी ने लिखा है कि अगर वेद की बातें अक्ल और Reasoning के खिलाफ़ हों तो उनको भी नहीं मानना चाहिए। तुम बिटिया, चूँकि ब्राम्हण हो जाति से भी, हालांकि लखनौर वालों के तरीके की नहीं, इसलिये मुझे क्षमा करना। मैं तुलसी दास की एक चौपाई लिखता हूँ :-

“पूजिये विप्र सकल गुन हीना, शूद्र न गुनगन ज्ञान प्रवीना”

इस चौपाई को मैंने ब्राह्मणों को प्रमाण देते हुए सुना है कि वह यह चौपाई इस लिये पेश करते हैं कि लोग उनकी कद्र करें। इससे मतलब यह है कि वह समझते हैं कि हम इस कदर गिर चुके हैं कि लोग हमारी कद्र नहीं कर रहे हैं। इसलिये तुलसीदास का Injunction पेश कर देते हैं। ऐसी बहुत सी बातें और जगह भी मिलेंगी। इन बातों को मनुजी का वाक्य जो ऊपर लिखा हुआ है उससे तौलना चाहिये। जाति का अभिमान वहाँ पर टूटा समझना चाहिये। जहाँ पर कि अन्दर से सोचने से भी यह आवाज़ न आवे कि मैं ब्राह्मण हूँ या वैश्य या शूद्र या कोई और जाति।

तुमने लिखा है कि तुम मुझको हर कण कण में देखती थीं, मगर अब यह हो गया है कि ‘आप’ मुझे कहीं नहीं दीखते। यह तो खुली हुई चीज़ है कि आँख-आँख को नहीं देख सकती। जिसको तुम देखती थी, अब बहुत कुछ जब तुम वही हो गई तो फिर देखोगी किसको? तुमने यह भी लिखा है कि फैज़ तो मानो मुझमें पहुँचता ही नहीं। इसका मतलब यह है कि जो चीज़ कि तुम तक पहुँचती थी, अब तुम उसी में डूब चुकी हो। दरिया में घड़े दो घड़े पानी के पड़ जाने से उसके Volume में क्या वेशी महसूस हो सकती है। तुमने लिखा है कि ऐसा मालूम होता है कि आजीवन कभी ‘आपकी’ याद ही नहीं आई। एक मिसाल मैं लिखता हूँ कि जब लड़कियाँ अपनी ससुराल में पहली, दूसरी बार जाती हैं तो उन्हें अपने घर की याद बहुत आती है। रहते-रहते उनकी ससुराल ही मैंका बन जाती है। फिर उन्हें मैंके की याद ऐसी नहीं आती है और ससुराल ही को मैंका समझ में आने लगता है और वही घर बन जाता है। बस यही हालत तुम अपनी समझो कि याद करते-करते तुम याद ही बन गई। बाकी हाल जो 26 नवम्बर के खत में लिखे हैं, मसलन मेरे ज़िस्म का एक छाया-मात्र मालूम होना, यह सब बातें यही बताती हैं कि जो चीज़ मुझमें है, उसमें तुम अच्छी लय हो चुकी हो। मगर इतनी कमी अभी है कि मैं तुम्हें छाया मात्र नज़र आ जाता हूँ। मैंने जो अक्सर कहा है कि अभ्यासियों को सिखाने वाले की रूचि का अन्दाज़ होना चाहिए; इसका मतलब यह है कि उनको इस मामले में अपने आप को हर वक्त होशियार और Alert रखना चाहिये और यह तभी हो सकता है जब कि अपने विचार का रिश्ता सिखाने वाले से जुड़ा रहे। इसकी बहुत सी तरकीबें भी हैं। मसलन एक बफादार नौकर जो यह चाहता है कि मालिक को मुझसे आराम ही मिले। वह कहीं भी बैठा हो, उसकी तबियत मालिक की तरफ इस टटोल में रहती है कि उसको इस वक्त क्या जरूरत होगी। यह तो मिसाल है जो मिसाल ही तक है। अब आध्यात्मिक सम्बन्ध में अगर सिखाने वाले से कोई रिश्ता सच्चे रूप में पैदा कर लिया जाता है तो यह चीज़ पैदा हो जाती है कि किस वक्त हमें सिखाने वाले से मुखातिब होना चाहिए और किस वक्त हमें क्या बात करनी चाहिये। अब ये बातें तुम्हारे लिये नहीं हैं।

27 नवम्बर के पत्र में तुमने लिखा है कि पूजा करते समय यह मालूम हुआ कि जीभ का पर्त उचल गया है। यह एक अजीब चीज़ है, जो सामने आई। शब्द आकाश में है और हमारे पास जीभ, इसलिये कि जो बात हम कहना चाहते हैं, उसमें वह असल चीज़ जो ख्याल के द्वारा शब्दों में आती है, उसको जीभ घुमा-घुमाकर और लौट-पौट कर ऐसी सूरत में ले आती है कि दूसरे लोग उसको समझ सकें। मतलब यह है कि असल चीज़ को किस कदर घुमा-घुमाकर जीभ उसके लिए एक औजार बन जाती है अब जीभ के पर्त का उचलना यह साबित करता है कि आवाज़ की तोड़-मोड़ खत्म हो गई है और जो शब्द है, वह वैसा ही Natural तरीके में निकलना चाहिए। आध्यात्मिकता में इसके माने यह हुये कि शब्द जो तुम्हारे मुँह से निकलेंगे, उसमें बिल्कुल असलियत और खालिस-पन (Pure) होगा, बनावट नहीं होगी इसके माने यह हुए कि जो कुछ कहोगी, उसमें फ़ैज और असर होगा और वह बातें दूसरों के दिल पर असर ज्यादा करेगी और आध्यात्मिक लाभ आवाज़ की Vibration से उनको ज्यादा पहुँचेगा। रीढ़ में रेंगन महसूस होना, इसके माने है कि यह स्थान जाग्रत हालत में आ रहे हैं। कोशिश करके अपने बोलने के लिये श्याम प्रकाशजी से जरूर तय कर लेना। चौबेजी के कहने से वह ऐसा जरूर कर देंगे और खुद भी उन्हें तुम्हारा ख्याल है।  तुम्हारी सैर H1 Point की अभी शुरू नहीं हुई, मगर ख़त पहुँचने के बाद देखना कि उसकी शुरुआत हो चली है।

तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ। अम्मा व चौबेजी को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-531
लखीमपुर
8/12/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आपका मिला। पढ़कर समाचार मालूम हुआ। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

कुछ यह है कि कुल पीठ में और कंधों तक में हर समय कुछ रेंगा करता है न जाने अब यह बात कुछ हो गई है कि कोई मर गया हो, तो भी मुझे ऐसा प्रतीत ही नहीं होता है। मुझे इसकी याद ही नहीं रहती या जाने भाई, क्या हो गया है और मज़ा यह है कि मरने पर रो भी लेती हूँ, परन्तु मरने की प्रतीत नहीं होती है और जीवित मनुष्य भी प्रतीत नहीं होते। यह सब क्या जीवन मरन में भ्रम सा है। यह सब कुछ मेरी समझ में नहीं आता है और न तबियत इन पर कुछ विचारने को ही चलती है, क्योंकि तबियत में कोई लहर कोई चंचलता या जिज्ञासा अब लाने से भी तो नहीं आती है। Problems तो Solve हो गई लगती है, फिर परवाह काहे की रहे।

मेरा तो यह हाल है कि मैंने जो ‘मालिक’ का दर्शन शाहजहाँपुर में छाया-मात्र दर्शन होना लिखा है, वास्तव में मैंने, अब तो लगता है कि यह भी ठीक नहीं लिख पाई हूँ। सम्भव है, इतनी मर्यादा का आवरण लग गया हो। न जाने क्यों पहले जब कभी ‘आप’ अपने पत्र में ‘मुझे क्षमा करना’ लिख देते थे, तो मुझे एक ठेस सी, कुछ ग्लानि सी होने लगती थी परन्तु अब तो यह ‘क्षमा करना’ भी पढ़कर ज्यों की त्यों हूँ। कोई बात उस मेरी हालत तक पहुँच कर उसमें धब्बा नहीं आने देती। निश्चलता ही मेरा स्वरूप हो गया है और स्वरूप भी ऐसा कि जो मुझे अब भासता नहीं और शायद इसीलिये अब अपने में चिमट कर चलना भी मुझे नहीं आता है। अब तो मैं न जाने क्यों ‘मालिक’ के पधारने की बाट भी नहीं देख पाती। बस, पैर स्वयं Bus Stand पर पहुंच कर Bus में ‘मालिक’ को खोज कर लौट आते हैं, परन्तु मुझ पर तो कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता। अब ऐसा लगता है कि जैसे कुल हड्डियों के भीतर से पर्त उचल जाते हैं और रोशनी बड़ी भीनी-भीनी सी रहती है, परन्तु इन सब का मेरी हालत से कोई सम्बन्ध नहीं रहता। यह तो इस शरीर का हाल है। उँगलियों तक की हड्डी-हड्डी में एक भीना सा प्रकाश रहता है। कुल शरीर में कहीं से हर समय एक Vibration सा आया करता है, ऐसा मैं देख रही हूँ। इति :-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-532
लखीमपुर
19/12/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र ‘आपको’ मिला होगा। यहां सब कुशल है। आशा है आप सब लोग भी सकुशल होंगे। 'मालिक' की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई, लगता है एक बराबर सतह सी में डूबती और पार करती चली जा रही हूँ, बल्कि अपना स्वरूप अब एक बिल्कुल ऐसी सहज सी अवस्था का ही स्वरूप हो गया है कि मैं उसमें डूब नहीं पाती हूँ। आज दो दिन हुए, अचानक ऐसा लगा कि पीठ में बाँई ओर कंधे से नीचे ही जो पीठ की चौड़ी सी हड्डी होती है, उसके बीच में एक Point सा है और जैसे पका हुआ फोड़ा भीतर से कुछ उबरने को करता है, वैसा ही Sensation उसमें होता है। तब से कुल पीठ बड़ी हल्की-फुल्की हो गई है और मानों कुल शरीर में मिलकर एक हो गई है। अब तो न जाने क्या दशा हो गई है कि चाहे मेरे ‘श्री बाबूजी’ आयें अथवा चले जायें, परन्तु बेचैनी होने पर भी हालत अपनी हालत से नहीं हटती। आँखे नहीं, जो ‘उन्हें’ देख सके, कान नहीं, जो ‘उनकी’ बात सुन सके, सुरति (याद) नहीं, जो ‘उन्हें’ स्मरण रख सके और अनुभव नहीं, जो ‘उनकी’ उपस्थिति को ही अनुभव कर सके। कभी कुछ रौ में किसी से कुछ दशाओं के बारे में बोलने लगती हूँ, तो बाद में कभी, यह लगता है कि कहीं मैंने इन्हें धोखा तो नहीं दिया है, किन्तु शायद इसकी जिम्मेदारी ‘मालिक’ लिये रहता है। इसीलिये इस ख्याल में (धोखे में) ठहराव नहीं रहता है। इसीलिये कभी- कभी मुझे बेचैनी सी होने लगती है। मुझे ऐसा लगता है कि मानों मन गल गया है और मन के परे फिर मुझमें मनन शक्ति कहां से आये और मन का आवरण उठ जाने से अब तो मन के परे तबियत को एक Limitless क्षेत्र में पा रही हूँ और ऐसा लगता है कि शरीर के कण-कण से सम्बन्ध छूट चुका है। अब तो यह न जाने क्या बात होती जा रही है कि दशा के अन्दाज़ का अन्दाज़ भी अब मुझसे नहीं सम्भल पा रहा है। अन्दाज़ की तह में डूबने के लिये मानसिक शक्ति भी भारी पड़ती है। मुझे तो अब ऐसा लगता है कि जो कुछ मैं बोलती हूँ, जीभ का उससे कुछ मानों शब्द बोलने में भी सम्बन्ध नहीं रहता है। इति :-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना

पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-533
शाहजहाँपुर
22/12/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र 8 दिसम्बर और 19 दिसम्बर 55 के मिल गये। तुम्हारे स्थान H1 पर नहीं मालूम अँधेरी क्यों आ जाती है। मैं हटा देता हूँ और फिर वह चीज़ पैदा हो जाती है, इसको सोचना है। गुरू महाराज की कृपा से उम्मीद तो यही है कि वज़ह समझ में आ जावेगी और दूर करने की कोशिश करूँगा। परेशानी की कोई बात नहीं और तुम्हारे समझ में आ जावे तो तुम खुद लिखकर भेज देना। आठ दिसम्बर के खत में तुमने लिखा है कि न कुछ पता है, न बेपता। यह तो ब्रह्मगति की हालत है, मगर इसको बहुत कुछ अभी निखरना बाकी है। अभ्यासी जितना ऊँचा जाता है, उतना ही नीचे की चीजें उसे धुँधली मालूम होती हैं। जैसे बहुत ऊँचे पहाड़ पर चढ़ जावें तो वृक्ष और मनुष्य एक छाया मात्र ही नज़र आवेंगे। बस यही जबाब इस बात का है कि तुम मुझे छाया मात्र ही दीखती हो और अगर गौर करो तो यही हालत सबके साथ मिलेगी। तुमने जो कुल शरीर में Vibration होना लिखा है, इसके माने यह है कि तुम मेरी हालत से बहुत कुछ चिमट चुकी हो और यही असर तुम्हारी हड्डियों में प्रवेश होता चला जाता है। तुमने लिखा है कि हड्डी-हड्डी से रोशनी निकलती हुई मालूम होती है तो जो चीज़ कि अन्दर है, वही बाहर निकल रही है और यह ईश्वर का धन्यवाद है कि अच्छी हालत है। अब 19 दिसम्बर के ख़त पर आता हूँ। तुमने लिखा है कि जी में आता है कि मैं रौ में आकर कुछ बोलने लगूँ या किसी को कुछ बताने लगूँ, मगर फिर यह विचार होता है कि मैंने कहीं गलत बताकर उन्हें धोखा तो नहीं दे दिया। बस इतनी ही कमी है कि तुममें अपने अस्तित्व का ख्याल अभी बाकी है। इसको उर्दू के शब्दों में कुछ अहमियत का होना कहा जावेगा। ( अहमियत यानी अहं भाव) अब मैं कुछ अपना हाल भी लिखता हूँ। मैं जब बोलता हूँ तो न मुझे यह समझ में आता है कि कौन बोल रहा है, बल्कि अपनी बकवास में मैं definite होता हूँ और यही हाल लिखने में है। इसलिये हर जगह Commanding Tone ही मिलेगी। अब लोग इसे अहंकार समझ लें तो मजबूरी है। यह मैंने इसलिये लिख दिया कि यह हालत अगर ठीक है, तो हर अभ्यासी को इस पर आना चाहिए। तुमने यह लिखा है कि बराबर सतह सी है, जिसमें दिल डूबकर स्वयं बराबर सतह सा हो गया है। इसके माने यह है कि साम्य अवस्था का प्रकाश शुरू हो गया है। साम्य- अवस्था की ऋषियों में बड़ी तारीफ़ है और यह वाकई बड़ी ऊंची हालत है। अगर यह किसी में ईश्वर दे देते हैं तो यह समझ ही लेना चाहिए कि जीवन का मसला Problem तो हल ही हो गया और इस हिसाब से तुमने ठीक लिखा है। 8 दिसम्बर सन् 55 के खत में कि Problem Solve हो गई है। बड़े-बड़े ऋषि इसको काफी समझकर आगे बढ़ने की कोशिश नहीं करते और ठीक भी है यह बहुत बड़ी और ऊँची हालत है जो तुममें अभी पूरी तौर से नहीं आई है, मगर उम्मीद आ जाने की जरूर है। मगर इस हालत का पहुँचा हुआ अभ्यासी दूसरों को सेकण्ड में छुटकारे का हक़दार नहीं बना सकता। अभ्यास कराते हुए तो वर्षों में वह सब कुछ करा सकता है, मगर मेरी चाल तो कहीं पर खत्म नहीं होती। लोगों की निगाह में यह Perfection ( पूर्णता ) है और ऐसा कहना गलत भी नहीं है। मैं तो उस राह का राही हूँ कि जहाँ से गुज़र कर यह पता भी नहीं रहता कि कभी इस रास्ते पर चला था और यह भी नहीं कि किसी=किसी की अनुभूति बाकी रह जावे। साम्य अवस्था के लिये मैं भी कोशिश करता हूँ कि अभ्यासियों में यह चीज़ पैदा हो जावे क्योंकि यह चीज़ भी पैदा हो गई तो उनकी जिन्दगी का मसला तो हल हो ही गया। मेरी तृप्ति अगर यहां तक पहुँचाने पर भी नहीं होती तो न सही। जुबान पूरी तौर से यदि खोल देता हूँ तो वह ईश्वरीय भेद निकल जाने का शुबह होता है। इसलिये बस इतना ही लिखे देता हूँ, समझने वालों के लिये, कि जब हम किसी राग के न रहे, तब असल में संलग्न होना कहना चाहिये और फिर उसमें जो बात पैदा होती है, उसके लिये शब्द नहीं।

तुमने इस पत्र में यह भी लिखा है कि अन्दाज़ ठहरता नहीं, इसलिये मन की भी मनन शक्ति उससे बरी रहती है। इस विचार का तुम ठीक वर्णन नहीं कर सकी। मगर खैर अगर ठीक तरह से वर्णन कर सकती तो उसका जवाब यह है कि ब्रह्म के तलछट में एक अच्छी लीनता प्राप्त है। तुमने बाँये कंधे के नीचे की हड्डी में जो Sensation होना लिखा है, उसके Point को अभी सोचना है, मगर इसका कारण बताये देता हूँ। तुम जब शाहजहाँपुर आई थीं, मैंने तुम्हारी पीठ की नसें और हड्डियाँ साफ़ की थी। इसलिये कि साम्य अवस्था में कहीं भी भारीपन न रह जावे, उसको अभी और भी साफ़ करना होगा। इन हड्डियों और नसों को साफ़ करने से साम्य अवस्था असली रूप में दरसना शुरू हो जाती है। सोच मैं यह रहा हूँ कि मामूली अभ्यासी भी जो हमारे पास आते हैं, उनकी भी यह हड्डियाँ और नसें भी साफ क्यों न की जावें, मगर ऐसा करने में कठिनाई यह होती है कि इतना समय वह मुझे नहीं देते कि उसकी यह चीजें साफ़ होने की नौबत आ जावे। इसलिये कि सिर्फ सूक्ष्म शरीर और पिण्ड और ब्रह्माण्ड के स्थान की सफ़ाई में वह बहुत ज्यादा वक्त ले लेते हैं। अगर कहीं उनमें भक्ति (Devotion) और ईश्वर-प्राप्ति की प्यास की वृद्धि हो जावे तो मुझे इतना वक्त न देना पड़े। चाहता तो मैं यह हूँ कि सब काम अपने ही जिम्मे ले लूँ, मगर भाई, क़ायदा यह है कि अपने ही धर्म और फ़र्ज का पालन करने से ईश्वर-शक्ति को वह अपना सकते हैं।

केसर का भी खत मिल गया। मैं उसे पढ़कर प्रसन्न हुआ। केसर भी अच्छी उन्नति कर रही है। मैंने उसके ख़त का विस्तारपूर्वक जवाब यों नहीं दिया कि तुम तो उसे खुद समझा सकती हो और इसलिये अपना वक्त बचा लिया। खैर उसको जानने के लिये मैं यह लिखे देता हूँ कि रोशनी का चारों तरफ उससे निकल कर फैलना यह बतलाता है कि उसके पिंड-देश की विलायत (Mastery) पर पग रख दिया है। मैं एकदम से उसको देना चाहता था, मगर उसकी अन्दर की हालत (Transparent) पारदर्शक नहीं थी बल्कि Opaque (अपारदर्शक ) थी, इसलिए मैं रुक गया, कि ऐसा न हो कि किसी नस में कोई नुक़सान पहुँच जावे, मगर खैर, वह इरादा जो मैंने बाँधा है, ईश्वर उसे धीरे-धीरे पूरा कर रहा है। उसको जो काम बता दिया है, वह करती ही होगी। अब उसकी Sitting लेने की तबियत यों नहीं चाहती कि उसमें ताज़गी (Freshness) प्रेम की वजह से मौजूद रहती है, मगर उसको Sitting से जी नहीं चुराना चाहिये, ताकि वह ताज़गी बढ़ती जावे।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-534
लखीमपुर
24/12/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। यहाँ भी सभी लोग सकुशल हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो लगता है कि शरीर के भीतर-बाहर, कण-कण में महा-प्रलय की सी नीरवता बस गई है और यह न जाने क्या बात है कि मेरे चारों ओर एक बहुत ही Dim कहने मात्र को प्रकाश-युक्त Vibration सा हर समय रहता है, परन्तु शरीर से उसका कोई सम्बन्ध नहीं। किन्तु यह Dim प्रकाश सा तो मेरी हड्डी-हड्डी से भीतर स्वयं निकला करता है। अब मैं देख रही हूँ कि चाहे कितनी खुशी या हँसी की बात क्यों न हो, परन्तु या तो मेरा स्वभाव ही गम्भीर हो गया है, या हँसी ही मुझ तक नहीं पहुँचती। मैं चाहते हुए भी इनमें शामिल नहीं हो पाती। मैं देख रही हूँ कि मेरी Body में भी अब कुछ Changes पैदा हो रहे हैं। भीतर ही भीतर कुछ हो रहा है और कुछ यह है कि मेरा शरीर का कण-कण तो बिल्कुल हल्का फुल्का सा, नीरव ही हो गया है, परन्तु उनमें से, रोम-रोम में से मानों एक कुछ Power सी निकला करती हैं। अब तो अनुभूति का जनाज़ा जा चुका है और अनुभूति के लिये कोई चीज़ भी सामने नहीं आती है जो आती है, वह NIL है और मुझ में ठहराव नहीं, जो उस NIL को एहसास में ठहरा सकूँ।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-535
शाहजहाँपुर
26/12/1955
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 24 दिसम्बर का लिखा हुआ प्राप्त हुआ। मैंने सुन लिया कि तुम गीता-जयन्ती में बहुत अच्छा बोली और मुझे इसकी खुशी है। अब तुम Speaker हो गई और झिझक जाती रही। तुमने खत में लिखा है कि बात करने में यह मालूम होता है कि जीभ से कोई सम्बन्ध ही नहीं रह गया है। यह लय- अवस्था का अच्छा Expression है। महा-प्रलय की भाँति नीरवता का एहसास होना यह ज़ाहिर करता है कि चित्त की वृत्तियों का निरोध हो चुका। मगर इस हालत में अभी फिर भी भारीपन है। तुमने यह लिखा है कि चारों ओर एक Dim Vibration मालूम होता है। यह उस स्थान की झलक है, यानि H1 जिस पर तुम हो। तुमने यह लिखा है कि रोम-रोम खुला हुआ सा लगता है, इसका मतलब मैं यह समझ रहा हूँ कि सब एक ही सी हालत छाई हुई है, जैसे पेड़ की छाया। Vibration इसमें जरूर नज़र आ रहे हैं। अब इसके आगे जब लिख़ोगी तो और साफ़ तौर से मैं वर्णन कर सकूँगा। जब तक समझ में आवे, लिखती रहो, आगे तो वाकई शब्द Expression के लिये किसी को नहीं मिलते।

केसर ने लिखा है कि ऐसा मालूम होता है कि मेरी मृत्यु हो गई है, और इस संसार से मेरा नाता बिल्कुल छूट गया है, यह अनुभूति बहुत कुछ सही है। मगर अभी संसार से नाता जुड़ा हुआ है।

चौबेजी व अम्मा को प्रणाम व तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-536
लखीमपुर
29/12/1955
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ मिला। समाचार पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मुझे तो ऐसा लगता है कि मेरी तो अब हड्डियाँ भी पिघल-पिघल कर गल-गल कर बराबर हुई जा रही हैं, गायब हुई जा रही हैं। न जाने क्यों भाई, Tone में मेरी, सब कहते हैं कि अब Mastery सी होती जा रही है और मुझे लगता है कि जो मैं बोलती हूँ, सब सत्य होता है और Confidence रहता है। पीठ में भी हड्डियों में, गुरियों तक में भी गलाव दौड़ गया है और कुल स्वरूप ही एक बराबर सतह सा ही हुआ जा रहा है। मेरे सिर के पिछले भाग में हर समय करीब- करीब लपकन हुआ करती है। कुछ पिघलन व कुछ रेंगता सा रहता है। वैसे तो मुझे कुछ एहसास ही नहीं होता, परन्तु जब मैं स्वयं को पढ़ने का प्रयत्न करती हूँ तो हर आदमी के क़दमों में सिर झुक जाता है, परन्तु तबियत तो एक समान सतह रूप हो गई है। उसे तो कुछ मतलब नहीं रहता है। अब तो मेरी दशा यह है कि मुझे तो अब छाया मात्र भी कुछ नहीं दीखता है। मैं देखती हूँ कि घर में ही सबसे बातें करती हूँ, बोलती हूँ, परन्तु अक्सर मुझे यह पता नहीं रहता कि अम्मा से अभी बोल रही थी या ताऊजी या केसर अथवा अन्य किसी से। लगता है, ऐसा हो गया है कि न मुझे अब किसी की बोली की ही पहिचान रह गई है, न स्वयं अपनी बोली को ही जान पाती हूँ। यद्यपि बोलती हूँ, बात करती हूँ, अब चेतना तो जैसे कभी जाती ही नहीं। कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि सब कहते हैं कि अपने को तथा सब कुछ भूल कर ईश्वर में लगना चाहिये परन्तु मैं तो प्रयत्न करके हार गई। मुझे तो हर समय चेतना रहती है। अचेतनता एक क्षण को भी तो कभी नहीं आती, तो अब भला मैं क्या करूँ। मुझे लगता है कि ‘मालिक’ से कुछ कहना चाहती हूँ, परन्तु उस कुछ में कुछ है नहीं, फिर क्या अर्ज़ करूँ।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती है, केसर आपको प्रणाम कहती है। छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-537
शाहजहाँपुर
1/1/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 29 दिसम्बर 55 का मिल गया। H1 Point पर अँधेरी आ जाने का मतलब अभी तक ठीक समझ में नहीं आया। कुछ-कुछ अन्दाज होने लगा है। जब ठीक समझ में आ गया तो, तुम्हें बता दूँगा। South India में कुछ लोगों ने और शुरु किया है और एक शख्स का ख़त कलकत्ते से आया है उसको Practices भेज दी गई है।

दृढ़ता तबियत में रहनी ही चाहिये और जिस किसी ने इसके ख़िलाफ कहा है, उसकी गलती थी। अगर कोई सोने को पीतल बता दे तो जानने और परखने वाले की निगाह में सोना ही रहेगा। तुमने लिखा है कि हड्डियाँ पिघल पिघल कर, गल गलाकर बराबर हुई जा रही हैं। तो ईश्वर की कृपा से हड्डियाँ नहीं पिघल रही हैं, और न गायब हो रही हैं बल्कि Negation की तैयारी है। यह तुम्हारी अनुभूति कि भीतर बाहर एक ही सी सतह रहती है, इसके बारे में पिछले ख़त में लिख चुका हूँ। सिर के पिछले भाग जिसकों Occipital Prominence कहते हैं, और यही ब्रह्म का भण्डार है उसमें लपकन का महसूस होना यह बताता है कि वहाँ पर असर शुरु हो गया है। यह देखा भी गया है और यह हमारे लालाजी की काबलियत का सबूत है कि अभ्यासी जिस स्थान पर होता है, उससे आगे उसका खेमा गड़ चुका होता है बल्कि तजुर्बे में यह बात भी आई है कि थोड़े ही दिनों के अभ्यास के बाद अभ्यासी के Occipital Bone पर कुछ लहरें पैदा होने लगती हैं। बात यह है कि उनमें असल तत्त्व अर्थात् जैसा कि उनको बनना है वह शुरू में ही डाल दिया जाता है और इससे बहुत जल्दी हो जाती है। बात करने में यह तमीज़ न होना कि तुम अपनी माता से बात कर रही हो या पिता से यह हालत अच्छी है और यह चीज़ बताती है कि रिश्तेदारी का नाता टूट चुका है मगर इसमें समता भी हो जायेगी। कुछ वज़ह उसके ज्यादा बढ़ जाने की यह भी है कि जिस्म के लिहाज़ से दिमाग में थोड़ी सी कमजोरी है और उस पर Pressure ज्यादा होने की वजह से अपने Function में कुछ कमी ही रखता है। इस इबारत से मेरा यह मतलब नहीं है कि तुम्हारा दिमाग बहुत कमजोर है, बल्कि यह मतलब है कि जितनी उसमें ताक़त है उससे ज्यादा उससे काम लिया जा रहा है। वैसे तुम्हारी बुद्धि ईश्वर-कृपा से तीव्र है और दिमाग अच्छा। दूसरों की बोली जल्दी न सुन पाना एकाग्रता और उसके फलस्वरूप ध्यान उस ओर न जाने की वज़ह से है। तुम ईश्वर की याद में बेख़बर तो पहिले ही हो चुकी, मगर यह बात जब थी जब दूसरा सामने था। अब एक ही है तो बेख़बर किससे होगी?

केसर का ख़त पढ़ा। उसकी हालत ईश्वर की कृपा से अच्छी चल रही है। अम्मा और ताऊजी को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-538
लखीमपुर
4/1/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ मिला। समाचार मालूम हुए। यहां भी सभी लोग सकुशल हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो लगता है कि शरीर में कोई बोझ ही नहीं रह गया है। हल्का फुल्का मानों स्वयं ही इधर-उधर डोलता रहता है। उसके चलाने में देखती हूँ न तो मेरा कोई इरादा ही रहता है और न इसके चलने-फिरने का शायद इसीलिये मेरे पास कोई पता ही रहता है और स्वयं अपना ही नहीं, बल्कि सबके शरीर मुझे तो ऐसे ही लगते हैं। मेरा तो शरीर जाने क्या हो गया है कि मुझे पता नहीं ज़मीन पर चलता है या आसमान में उड़ता रहता है। मेरा तो कुल शरीर चेतन हो गया है। चेतन कहने को कह लिया है, वरन् अब तो यह दशा है कि जर्रे-जर्रे से प्रकाश निकलता है, किन्तु रोशनी वाला प्रकाश नहीं है, वरन् लगता है कण-कण आँख बन गया है और उससे प्रकाश निकलने लगा है। ‘मालिक’ ने मेरी दृष्टि में अब असल तत्त्व का प्रकाश भर दिया है, अर्थात् मेरे लिये अब केवल असल तत्त्व की ही अनुभूति है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। मेरे शरीर के कण-कण में ईश्वरीय शक्ति का रुप ही मुझे एहसास में आता है। स्वयं मेरा शरीर है या जाने ईश्वरीय शक्ति का रूप ही हो गया है। मैं ईश्वरीय शक्ति रूप कहती हूँ, वह इसलिये कि यही चीज़ दशा के लिये कहते बनती है, नहीं तो, न शक्ति है, न भक्ति है, न मुक्ति है, न बंधन है। स्वभाव का भी कुछ ऐसा साम्य हो गया है कि जब तक दशा में अंधेरा रहता है तब तक चिड़चिड़ापन रहता है। तबियत काबू में ही नहीं आती है परन्तु जहाँ शुद्ध हुई, तो चाहे फिर कोई मारे, गाली दे, फिर असर नहीं, क्योंकि हर काम शरीर पर होता है और शरीर ईश्वरीय शक्ति रूप हो गया है, तो फिर उस पर प्रभाव कहाँ पड़ सकता है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-539
लखीमपुर
8/1/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र ‘आपको’ मिला होगा। पूज्य मास्टर साहब से आपकी कुशलता का समाचार सुनकर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो यह दशा हो गई है कि अब मुझे रात दिन कभी यह पता ही नहीं मिलता कि मेरा शरीर है या नहीं। हड्डी-माँस सब कुछ गलकर बराबर सतह में समा गया। मैं अक्सर लिखा करती थी कि मेरा तो स्वरूप ही यह हो गया, वह हो गया, परन्तु अब बिल्कुल यह बात देख रही हूँ कि स्वरूप मेरा कुछ है ही नहीं। अब मैं भाई, क्या लिखूँ? कलम बन्द होने लगती है, परन्तु ख़ैर चलाने वाला अब यह सब जाने क्या चलाकर कुछ लिखवा ही देता है और अंत तक वह कलम चलवाता ही रहेगा, ऐसा मेरा विश्वास है, क्योंकि ‘मालिक’ की कृपा से दशा क्या आती है, सामने आईना आ जाता है, जिसमें मुख देखकर अपना ही बयान किया करती हूँ। परन्तु अब क्या करूंगी? नहीं मालूम, क्योंकि अब तो देखती हूँ कि आईना के सामने कोई तस्वीर ही नहीं आती। अब तो लगता है कि Inactivity का भी सम्बन्ध मुझ से टूट चुका है। Activity थी नहीं और Inactivity भी अब कहते ठीक नहीं बैठती, अब जाने क्या है।

H1 तो बिल्कुल साफ़ है। कोई अड़चन, जैसे कभी आई ही नहीं थी। मुझे अब तो लगता है कि अड़चन मानों ऊपर से आती है। न जाने क्या बात है कि लय-अवस्था मुझमें अब कभी प्रवेश ही नहीं करपाती है। मुझे तो लगता है कि दशा की भी दशा मेरे में हज्म होती चली जाती है, यानी मुझे लगता है कि न जाने क्यों अब न मेरे पास कुछ आता है (दशा) और न मेरा कुछ जाता है। पता नहीं क्या हो गया है, यह तो ‘आप’ ही जानें।

केसर आप को प्रणाम कहती है और अम्मा आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-540
शाहजहाँपुर
11/1/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे दो पत्र मिले। तुमने यह लिखा है कि जब साधक शाहजहाँपुर आते हैं और लौटकर वापस आ जाते हैं, तो उनका मन मेरे पास ही छूट जाता है। यह अनुभूति तुम्हारी ठीक है कि उनका ध्यान मेरी ओर रहता है, मगर इसे अगर इस तरह से देखो कि मेरा मन भी कुछ दिनों उनके साथ रहता है, तो ज्यादा सही मिलेगा। यह ज़रूर है कि जब उनका आकर्षण मेरी ओर होता है तो मेरा चित्त भी उनकी तरफ़ हो जाता है, मगर यह चीज़ सबके साथ नहीं मिलेगी। अगर कहीं उनका मन हमेंशा के लिये मेरे पास छूट जावे तो फिर उनके लिये किसी चीज़ की तलाश की ज़रूरत न रहे। तुम्हारी अनुभूति यह सही है कि Nature की तरफ से Point पर जो अँधेरी थी वह उसकी रोक थी, इसलिये कि कहीं Special Personality तुम न बन जाओ, जो मुझे यहाँ से जाना पड़े, और यह स्वामी विवेकानन्दजी ने जब कि मेरी तबियत किसी तरह से न मानती थी रोककर दी है। इसमें तुमको कोई हानि न पहुँची। मेरा जहाँ तक ख़्याल है कि यह बिल्कुल Prophetic स्थान है, और तुम्हारी यह हालत पहले से शुरू हो चुकी थी, उसको न उभरने के लिये भी एक तरक़ीब कर दी गई है, इससे भी कोई हानि नहीं है। कल साढ़े नौ बजे रात को मैंने तुम्हारा झुकाव I1 पर कर दिया है। पूरी तौर से उस तरफ इसलिये नहीं खींचा है कि H1 पर की अँधेरी जाती रहे जो सतह सी जगह भीतर-बाहर मालूम होती थी, वह उस वक्त तक दूसरी चीज़ थी। अब तुम और वह मिलकर एक हो रही हो। पीर या दर्द जब अपने हद से गुज़र जाता है तो वह ख़ुद दवा हो जाता है और तुम्हारे खत में जो कुछ लिखा है, उसके जवाब में कुछ पंक्तियां लिखता हूँ।

सब लोग कहते हैं कि अपने आपको पहिचानो, अर्थात् यह देखो कि तुम कौन हो ? वह लोग सही ज़रूर होंगे, मगर कोई मुझसे पूछे तो अपने आप को भुला देना ही और अपनी Body Consciousness और Soul Consciousness को ख़त्म कर देना ही सब कुछ है। जब हममें पहिचानने की शक्ति रही या जानने की शक्ति रही तो एक हम और दूसरे वह चीज़ जिसको हम पहिचानने की कोशिश करते रहे, कभी पहिचान नहीं सकता। अत: सरल नुस्खा यही है कि अपने आपको भुलाने की कोशिश करता रहे और इसी की मैं कोशिश कराता हूँ और लोगों को ऐसे ही अभ्यास बताता हूँ। मैं समझता हूँ Know Thyself का मसला Socretes ने तो लिखा ही है, और उसी की नकल होती रही और सम्भव है कि भारतवर्ष के ज्ञानी महात्माओं ने इस पर और ज़ोर दिया हो। हमें तो अपने आपको इतना मथना है जो ध्यान की मथनी से हो जाता है कि हीर का हीर ( मक्खन ही मक्खन) रह जावे। तुमने अपने पत्र में सही लिखा है कि अबकी बार- मैं लखीमपुर ही रह गया और ऐसा रहा कि आना मुश्किल।

केसर का भी ख़त मिल गया। उसके संस्कार बनना बन्द हैं। फ़िक्र पैदा न होने के माने ये है कि अन्दर वह मग्न रहती है और बाहर के ऊपर जो अँधेरा सा लगता है उसमें यह मालूम होता है कि त्रिकुटी की सैर शुरू है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-541
लखीमपुर
11/1/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र आप को मिला होगा। यहां सब सकुशल है, आशा है आप सब लोग भी सकुशल होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरी तो अब यह न जाने क्या दशा है कि आँखें बन्द करती हूँ तो भी मेरे लिये अँधेरा नहीं होता और आँखे ख़ोले रहती हूँ, तो भी उजेला कभी नहीं होता। मेरी दशा में एक अजीब सन्नाटा समाया हुआ है, परन्तु देखती हूँ कि इस सन्नाटे में भाँय-भाँय नहीं होती, बल्कि यह सन्नाटा मेरी दशा है। शायद इसीलिये मुझे अब यही अच्छा लगता है। सुनसान बियावान दशा लगती है।

तो यह हाल है कि अन्दर देखती हूँ तो सन्नाटा ही मानों मेरा अन्तर और शरीर भी सन्नाटा स्वरूप हो गया है। शरीर के कण-कण में सन्नाटा छाया हुआ है। भीतर-बाहर एक अजीब सन्नाटा अनुभव करती हूँ जो मुझे बुरा नहीं लगता है। किन्तु न जाने क्या हो गया है कि तबियत में एकाग्रता कभी आती नहीं। दक्षिण में पूजा कराते हुए देखा कि तमाम गाढ़ा Blood कुल पृथ्वी पर जमा हुआ है। मेरी तो यह दशा है कि न मुझे स्थूल, सूक्ष्म कुछ भी एहसास में नहीं रहता। सब कुछ जो जैसा है, वैसा ही एहसास आता है और एहसास में कुछ है नहीं, दिखाई कुछ पड़ता नहीं। इधर एक बात देख रही हूँ कि शरीर का ज़र्रा-ज़र्रा ईश्वरीय प्रकाश व ईश्वरीय शक्ति मय हो गया है। यद्यपि न उसमें प्रकाश की अनुभूति है और न शक्ति की, वरन् मेरे कण-कण से जो किरणें फूटती हैं, उनमें इसी बात का एहसास पाती हूँ। कुल दिमाग़ की हड्डी में, कुल शरीर की किरणों में तथा उसके चारों ओर के वातावरण में ईश्वरीय चेतना का आभास पाती हूँ, परन्तु स्वयं हर चीज़ से खाली हूँ। यद्यपि इधर कई दिनों से कुल दिमाग़ में दर्द रहता है, परन्तु लगता है कि ईश्वरीय- प्रकाश, दैवी चेतना सी उससे छिटकने लगी है। अब तो कस्तूरी, कस्तूरी नहीं रही, बल्कि ‘श्री बाबूजी’ की कस्तूरी हो गई है। मुझे तो न जाने क्या हो गया है कि लगता है कि मेरे मन में अब आत्मा ही नहीं है, बल्कि न जाने क्या हुआ कि आत्मा मेरे कुल नस-नस में, रोम-रोम में व्याप्त हो गई। भीतर-बाहर कुल में व्याप्त हो गई। अब तो सब लोग मुझे अपने और अपने से मालूम पड़ते हैं और एहसास मुझे कोई लोगों का, किसी वस्तु का होता नहीं है। समझ में नहीं आता कि आत्मा है या ईश्वर है, खैर कुछ भी हो। अब तो लगता है कि आत्मा अपने घर में समा गई, फिर मेरे अन्दर कहाँ से आवे। पहले अक्सर अपने अंतर में जो एक सी तबियत का एहसास लिखा करती थी, वह कुल स्वरूप ही बन गई है। अब तो लगता है कि यह सब नज़ारा बदलते हुए भी दशा नहीं बदलती। एक समान गति रहती है। वह कभी डिगती नहीं, क्योंकि देखती हूँ कि उसका न कहीं आदि है, न अन्त हैं।

अम्मा आप को आशीर्वाद कहती है। केसर व बिट्टो आप को प्रणाम कहते हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-542
लखीमपुर
14/1/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र आप को मिला होगा। यहां सब कुशल है, आशा है आप सब लोग भी वहां सकुशल होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

आज तो दशा बिल्कुल तेजी पर है। मेरे कण-कण से ईश्वरीय किरणें फूटी पड़ती हैं। जिस पर हाथ रख दूँ, रस हो जावे। मेरे चारों ओर Vibration बहुत तेज है। परन्तु Moderation नस-नस में व्याप्त है। यह सब आपकी ही कृपा का फल है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-543
शाहजहाँपुर
31/1/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे दो पत्र तारीख 11 जनवरी एवं 14 जनवरी सन् 56 के मिले। पत्र का उत्तर देने से पहले मैं यह खुशखबरी देना चाहता हूँ कि कल काशीराम तथा गजानन्दजी आसाम से आ गये। अब मैं तुम्हारी आध्यात्मिक दशा पर कुछ लिख रहा हूँ।

तुम्हारी दशाओं को समझना भी अब हर का काम नहीं रहा और मुझे भी उसको समझने में दिक्कत पड़ती है और शब्द उसके लिये नहीं मिलते। वाह ! क्या अच्छा लिखा है कि आँख बन्द करने पर अँधेरा प्रतीत नहीं होता और आँख खोलने पर उजियाला मालूम नहीं होता। यह उस असल चीज़ का तलछट समझना चाहिये, जहाँ न अँधेरा है न उजाला। लोग उसको रोशनी कहते हैं और मैं भी विचार के प्रगट करने के लिये यही शब्द इस्तेमाल करता हूँ। अगर भूमा की तरफ कोई उचक कर देखे तो जो तुम्हें अनुभूति है उसी की निखरी हुई हालत (Refined) मिलेगी। मगर उचक वही सकता है, जिसके पास दिल न रहा हो। इसके बारे में मैंने किताब ‘अनन्त की ओर’ में भी लिखा है। तुमने यह लिखा है, भीतर-बाहर एक सन्नाटा सा छा गया है, इसके लिए अच्छा Expression अंग्रेजी में Wilderness हो सकता है या सूनापन कह लिया जावे, मगर यह इसके बाद वाली हालत है। मगर अभी असली हालत बहुत दूर है। अभी तुम्हारी हालत में कुछ परमाणु (Matter) के बहुत हल्के कण शामिल हैं और यह I1 की हालत है। कुछ हल्की तिलमिलाहट भी है, जो बहुत गौर करने से मालूम होती है। यह तिलमिलाहट और कुछ नहीं है, बल्कि कम्पन की सूक्ष्म गति है। Negation में यह कुछ चीज़ नहीं रहती। एक सूखी हुई हालत Changeless रहती है और इसकी भी अनुभूति नहीं रहती। उससे आगे बढ़कर जहाँ पर कम्पन माध्यम हो जाता है, उसमें बेशुमार शक्ति होती है और Negation को तो मरी हुई हालत कहना चाहिए। मगर तमाम ज़िन्दगी की जड़ वही है। हम असल में मरकर ही जिन्दा होते हैं। जब एकाग्रता एक अच्छा रूप धर लेती है, फिर इसकी अनुभूति नहीं हो पाती। ईश्वर और आत्मा तुम्हें उड़ती-उड़ती बातें लग रही हैं। इसे तो ऐसा समझो कि जैसे लाल (Ruby) के सामने कोई रंग की दूकान खोले असल में ब्रह्म विद्या की प्राप्ति के लिये लोग रंग की दूकानें ही ख़ोलते हैं और तमाम उम्र इसी को बेचते-खोंचते रहते हैं। जिन लोगों की निगाह इन रंगों पर पड़ती है, उनकी तबियत में भी वही रंगीनी बढ़ जाती है, जिसको वास्तव में हममें जो भी (रंगीनी) थी, उसको उतारना ही चाहिये था।

हर कण-कण में ईश्वरीय प्रकाश का उठते हुए पाना, यह बात बता रही है कि घटियापने के ब्रह्म में तुम्हारी लय-अवस्था हो चुकी है। पहले किसी ख़त में मैंने लिखा है और ऋगवेद भी यही कहता है कि ब्रह्म कई प्रकार के होते हैं। यह हालत जो तुम्हारी है, अच्छे-अच्छों को नसीब होना मुश्किल है। अफ़सोस यह है कि इस मिशन की शिक्षा इतनी आसान है कि उसको कोई अपनी निगाह में नहीं लाता और इसीलिये उसका मूल्य भी कम हो गया है। मूल्य से मेरा मतलब यही है कि इसकी कोई क़दर नहीं रही है। तुमने जो दक्षिण में रक्त देखा है वह तो बहना ही है। मैंने किसी वक्त बातों बातों में किसी से कहा था कि यह बातें दक्षिण भारत से शुरू होंगी, सम्भव है यह ठीक हो। तुमने अच्छा किया कि सत्संगियों के लिये रक्षा कर दी और उनकी रक्षा तो वैसे ही रहेगी, ईश्वर ने चाहा। आत्मा कण-कण में तो व्याप्त है ही, मगर तुम्हारी अनुभूति इस विषय में जो है, उसके माने यह हैं कि तुम्हारा वही रूप बन गया है, जिसकी लोग तलाश में है, मगर अफ़सोस यह है कि हाथी को कुलिया में ढूँढते हैं।

तुमने I1 का हाल तो ठीक ही लिखा है। यह सही समझो कि मुझमें अगर गुरू महाराज का ज्ञान व अक्ल काम न करे तो ऊँचे दर्जे की शिक्षा देना दूभर हो जावे। H1 की स्याही हटाने के लिए I1 पर और उसका पूरा जोर I1 पर रुज़ू कर दिया था, जिसका परिणाम यह हुआ कि H1 भी ठीक आ गया और I1 पर अपने आप दूसरा पैर उठ रहा है। H1 पर जो स्याही मुझे अनुभूति होती थी, वह कोई कालिमा या नुक्स नहीं था, बल्कि मेरी गल्ती से उस पर Force या शक्ति अंदाज़ से ज़्यादा पहुंच गई थी, जिसकी वज़ह से शक्ति की एक तह जम गई थी और वह जोर मेरे हटाये नहीं हटता था। मालिक की कृपा से यही तरकीब समझ में आई, जो मुझे करनी ही पड़ी। इससे मेरी गल्ती का भी असर दूर हो गया और इस गल्ती की वज़ह से तुम्हें अगले Point पर बहुत ज़्यादा मदद मिल गई।

तुम्हारे माता पिता को प्रणाम तथा भाई-बहिनों को आशीर्वाद।

शुभचिंतक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-544
लखीमपुर
30/1/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा तथा केसर का पत्र पहुँचा होगा। यहां सब कुशल है, आशा है ‘आप’ भी स्वस्थ होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी मेरी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो दशा क्या है, कुछ ऐसी खाली दशा है कि जिसको कह सकने के लिये कोई शब्दों की वहाँ गम्य ही नहीं हो पाती है। सूनसान या बियावान कहने से दशा के लिये बिल्कुल ज़रा भी ठीक नहीं बैठता। यहाँ तक लगता है कि मानों कण-कण में से ईश्वर नाम की सुगन्ध को भी किसी ने चूस कर फेंक दिया हो या ऐसे कह लीजिये कि एक जगह की कुल वायु को यदि किसी यंत्र द्वारा खींच लिया जावे तो फिर उसके लिये क्या कहा जा सकता है। सन्नाटा कहती थी, परन्तु अब तो वहाँ दशा में सन्नाटा कहने को भी नहीं रहा। अब तो यह दशा है कि प्रेम का भी तो पता नहीं रह गया है कि कहाँ से लाऊँ, कैसे लाऊँ, जो ‘बाबूजी’ से प्रेम कर पाऊँ। एक दिन शाम को पूजा के कमरे में कुछ लिख रही थी, तो लगा एक Power जिसके लिये मेरा अन्दाज़ विष्णु ठहरता है, मेरे सामने आई, रंग साँवला (काला), बोली, कुछ माँगो। मैंने कहा कि मुझे तो कुछ चाहिये नहीं। मुझे तो सब मिल गया। बोली- नहीं, कुछ तो माँगो। तो मैंने कहा कि क्या आपने मेरे श्री बाबूजी को देखा है, तो वह चुप रही। फिर मैंने कहा कि श्री बाबूजी के ध्यान में लयलीन हो जायें, मैं यही माँगती हूँ बस तुरत ही वह ग़ायब हो गई।

मेरी हालत तो ऐसी है कि हल्की शब्द भी तो उसे छू तक नहीं पाता है। मैं तो बस उसे खाली कहती हूँ। वह भी इस तरह कि जो है, वह स्वयं ही है और कुछ कहने की गुंजाइश नहीं है।

अब तो मेरी दशा यह है कि भीतर-बाहर सब जैसे अँधेरा ही अँधेरा है। कण-कण मानों अँधेरा स्वरूप हो गया है और भीतर-बाहर अजीब शून्यता ही शून्यता व्याप्त है। अपने को देखती हूँ तो रोम-रोम, नस-नस में शून्यता ही व्याप्त हो गई है। अक्सर अब ऐसी दशा रहती है कि भीतर-बाहर, सब शून्यता ही शून्यता लगती है किन्तु जाने क्या बात है कि अपने भीतर देखती हूँ तो कण- कण में अन्धेरा सा शून्यता सी रहती है परन्तु शरीर से Vibration निकलता अनुभव होता है, अजीब बात है। वैसे तो मैं शून्यता की दशा कहती हूँ, परन्तु दशा यह है कि मैं तो स्वयं ही मानों शून्यता रूप ही हो गई हूँ। एक कुछ यह देख रही हूँ कि पहले मुझे सदैव लगा करता था कि जैसे एक ऊपरी अनन्त शक्ति मुझे अपनी ओर खींचा करती थी, कभी मैं सुस्त भी पड़ जाती थी, बीमारी के कारण, तो भी मुझे यही लगता था कि ऊपर की शक्ति, आकर्षण मुझे अपनी ओर खींचे रहता है, परन्तु अब देखती हूँ कि कुछ नहीं, तुरंत ठप होने लगती हूँ, जैसे कोई आगे का द्वार बन्द कर देता है। अब तो मैं भूलती, जागती चलती हूँ।

अम्मा ’आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर आपको प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-545
लखीमपुर
2/2/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

‘आपका’ कृपा पत्र मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ का अनेकानेक धन्यवाद है क्योंकि धन्यवाद के अतिरिक्त अपने अहेतुकी कृपा वाले ‘मालिक’ के लिये और कहूँ ही क्या। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो यह दशा है कि न जाने क्या हो गया है कि भीतर बाहर सब जगह, सब ओर मुझे खाली-खाली मालूम होता है। देखती हूँ कि दशा की तिलमिलाहट भी पैठ सी गई है या यों कह लीजिये कि उसकी भी जान सी निकल गई है। कुछ ऐसी दशा देख रही हूँ कि जो कह दिया या कर दिया, उस पर फिर कभी दूसरा विचार मन में नहीं उठता है कि कहीं यह न हुआ तो, बल्कि तबियत निश्चिन्त हो जाती है। यद्यपि अभी इसमें पूर्ण दृढ़ता नहीं आई है। अब तो ऐसी दशा है कि कोई कहता है अब दिन हो गया। कोई कहता है रात हो गई परन्तु मुझे कुछ एहसास ही नहीं होता। सब कहते हैं हवा चल रही है, पानी बरस रहा है परन्तु मुझे तो कुछ एहसास नहीं होता। मैं तो सूखी ही रहती हूँ, जैसी की तैसी। कुछ तबियत ऐसी एक सी हो गई है कि वह उसी में ही रहते रहते वही बन गई है। देखती हूँ कि जब सब रात कहते हैं, तब भी कभी न मुझे नींद मालूम पड़ती है और न सुस्ती और न कभी चुस्ती ही एहसास होती है। अब तो वास्तव में मेरी दशा यह है कि ऊपर लिखी बातें तो सब ऊपर की ही उड़ती-उड़ती बातें रह गई हैं। I1 point मुझे साफ़ बहुत हो गया लगता है, किन्तु मैं अब अपनी तबियत को पकड़ नहीं पाती हूँ और पकड़े तब, जब कुछ हो। क्योंकि मेरी तबियत तो मैं स्वयं ही हो गई हूँ। सब ओर बियावान हो गया है, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से मुझे अब ऐसी ही दशा अच्छी लगती है।

आज रात में एक स्वप्न सा देखा कि एक बिल्कुल सुनसान जगह में एक नदी बह रही है। पानी उसका मटमैंला सा है और बहुत हल्का सा है। मैं उसमें नहा रही हूँ किन्तु फिर भी भींगती नहीं, सूखी की सूखी निकल आती हूँ। यद्यपि कुल नदी के पानी में लगता है कि मेरे ‘श्री बाबूजी’ समाये हुए हैं, फिर भी नहीं भीगती और उसमें दूसरे तीर पर श्री बाबूजी ऐसे एहसास में आते हैं कि जैसे केवल एक ख्याल की गम्य के भी बाहर हो। छाया भी कहना, उससे कई गुणा भारी पड़ता है। लोग कह रहे हैं-तुम विधवा हो गई, परन्तु मैं तो बिल्कुल एक बेख्याल खाली दशा में हूँ, इसलिये कुछ पता नहीं। फिर आँख खुल गई।

अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-546
लखीमपुर
23/2/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र आप को मिला होगा। इधर मेरी तबियत कुछ खराब हो गई थी, परन्तु अब बिल्कुल ठीक हूँ। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई मेरी तो यह दशा है कि जब श्री बाबूजी को देखती हूँ, बात करती हूँ, परन्तु यदि कोई महानता के साथ स्मरण करती हूँ, तो तबियत घबड़ाने लगती है, जी घुटने लगता है। असली बात यह है कि दशा तो यह है कि कुछ दशा मेरी है, परन्तु उसे समझने की कोशिश करने से जी घबरा उठता है। अब तो न उत्सव, न कोई भीड़, न श्री बाबूजी, मुझे तो अब कुछ दीखता ही नहीं।

मेरी तो अब यह दशा है कि तबियत या दशा तो मर गई है। एक अजीब भरी हुई दशा पाती हूँ। देखती हूँ कि बिल्कुल Thoughtless दशा रहती है। यही नहीं, बल्कि मेरा स्वरूप ही यही हो गया है और शायद इसीलिये मुझे न उत्सव न भीड़ कुछ दिखाई ही न पड़ा। उत्सव में मैं गई, परन्तु मेरे लिये उत्सव पता नहीं आया या शायद आये, मुझे कुछ दीखता ही नहीं। अब तो यह दशा है कि ईश्वरीय धारा की भी वहाँ गम्य नहीं। जवान की भी गम्य नहीं, बिल्कुल सब कुछ सब ओर एक Thoughtless दशा है। न कुछ आना (आता) है, न जाना (जाता) है। पहले मुझे बहुत Dim Vibration महसूस होता था, परन्तु अब तो सब कुछ समाप्त हो चुका। बिल्कुल लगता है दशा में बस सम ही सम हो गया है। बिल्कुल Thoughtless दशा है, यही स्वरूप है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-547
शाहजहाँपुर
29/2/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तारीख 23.2.56 का लिखा हुआ पत्र प्राप्त हुआ। Sri M.K.Gaurshan बहुत अच्छे तरीके से लगा हुआ है। ता. 25.2.56 को 7.15 PM. पर वह आत्मा के स्थान पर खुद-ब-खुद आ गया और उसने दिल की सैर, जहाँ तक पिण्ड का सम्बन्ध है पार कर ली। कुछ सफाई, जो कुछ अँधेरा लिये हुए दिल में करने को अभी रह गई है, सो यह मेरा और तुम्हारा काम है।

मैं भूल गया हूँ जरा लिखना कि तुम्हारे सैर का स्थान क्या I1 है? मेरा ख्याल यही है। पिछले खत से पता चल जावेगा तुममें ईश्वर की कृपा से साम्य अवस्था पैदा हो चुकी हैं, मगर उसमें सफ़ाई और शुद्धता पैदा नहीं हुई है। कुछ उस हालत के सामने अलहदा कहने को भारीपन छाया की तरह स्याही लिये हुए मालूम होता है, यह भी ईश्वर की कृपा से दुख दूर ही हो जावेगा। उत्सव के रंग की अनुभूति न होना यह माने रखता है, कि तुमने बहुत कुछ अपने में चिमट कर लय- अवस्था हासिल कर ली है और यह बहुत ही अच्छी बात है। तुमने Thoughtless की हालत जो बताई है, यह साम्य अवस्था का तर्जुमा है और सूनापन भी इसीलिये प्रतीत होता है। यह तुमने ठीक लिखा है, जहाँ पर कि तुम हो, वहाँ पर हवासों की भी गम नहीं है। किसी उर्दू कवि ने लिखा है :- “न वहाँ ख्याल पहुँचे, न जेहन की है रसाई” अर्थात् न वहाँ ख्याल की गुजर है और न Intelligence की पहुँच। तुमने लिखा है कि जितना प्रेम तुम करना चाहती हो, नहीं कर पाती मैं भी यही कहता रहा और कहते-कहते उसी में झुलस गया।

केसर का भी खत आया। उसके स्वप्न की ताबीर (Interpretation) मैंने यह बताई है कि Soul अपनी Naked Form में आ गई है। इसकी व्याख्या बड़ी मुश्किल है, सिर्फ इतना लिख देना काफी है कि उसमें लग लिपटान, जो कुछ भी था, वह अलहदा सा है और इसी को Naked Form कहा जा सकता है। उसने लिखा है पूजा करने और न करने में कोई अन्तर नहीं मालूम पड़ता है, इसको वह ठीक तौर से प्रगट नहीं कर सकी। उसका मतलब यह मालूम होता है कि पूजा करने में जो हालत रहती है, वही न करने पर भी जो अगर स्थाई रूप में आ जावे तो बड़ा अच्छा है मगर इस हालत के लिये कोशिश नहीं करनी चाहिये, इस चीज को खुद-ब-खुद आने देना चाहिये। प्रार्थना के समय जो युद्ध का दृश्य आ जाता है, वह हो सकता है, सही निकले। मुझे गोण्डा से एक अभ्यासी ने लिखा था, जिसने थोड़े दिनों अभ्यास के बाद छोड़ दिया कि “मैंने ध्यान के समय यह देखा है कि हिन्दुस्तान पर एक पर्दा पड़ा हुआ है, और उसमें शब्द Danger लिखा हुआ है” उसको हटाकर मैं खुद दाखिल हो गया और स्वप्न भी उसने देखा था। अब ईश्वर जाने क्या होने वाला है। उत्सव में मेरे पास से इस साल कुछ भी नहीं लगा, बल्कि 30-40 रूपये अंदाजन बच रहेगा, जो Bank में जमा हो जावेगा। चौबेजी व अम्मा को प्रणाम व तुम्हारे भाई- बहिनों को आशीर्वाद।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-548
लखीमपुर
28/2/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, मेरा एक पत्र पहुँचा होगा, परन्तु आज फिर जी चला आया। कोई खास बात नहीं है, फिर भी जो दशा आजकल है, सो लिख रही हूँ।

अब तो यह दशा है कि लगता है कि केवल बीज ही बीज है और उसी में मैं समाती जा रही हूँ और वही मेरा स्वरूप होता जा रहा है। भाई, मेरी तो अब यह दशा है कि भीतर-बाहर मुझे तो अब कुछ भी नहीं महसूस होता है। कुछ यह देख रही हूँ कि अब कुछ नहीं में ही मैं मस्त हूँ और उसमें मैं समाती या घुसती चली जा रही हूँ। कुछ ऐसी दशा रहती है कि अब दिन भर कभी मुझे उजेला ही नहीं लगता। धाम में भी बैठने पर उजेला नहीं लगता और गहरी से गहरी रात में भी लालटेन बुझ जाने पर भी लिहाफ में मुँह ढाँकने पर भी अँधेरा ही नहीं होता। बहुत पहले भी अक्सर मैं यह बात लिखा करती थी कि वैसे तो दशा यह है, परन्तु अपने अंतर में मुझे एक Changeless दशा अनुभव होती है और अब देख रही हूँ कि वही दशा मेरा स्वरूप हो गई है या यों कहिये कि एक वही दशा भीतर-बाहर, कण-कण में व्याप्त है।

अब तो मेरी यह समझ में नहीं आता कि Thoughtless दशा कहूँ या क्या, क्योंकि मेरे तो शरीर का कण-कण वही स्वरूप हो चुका है। मैं पहले लिखा करती थी कि मेरे अंतर में एक अजीब अनन्त एकरस आनन्द बना रहता है, परन्तु अब या तो मेरा अंतर ही गलते-गलते समाप्त हो चुका या भाई, मुझे तो कुछ पता नहीं क्योंकि मैं तो अब यह देख रही हूँ कि अंतर है ही नहीं और मेरे शरीर का कण-कण, भीतर-बाहर सब कुछ एक ही बिल्कुल विचारहीन (Thoughtless) दशा ही हो गया है और वह एक रस Thoughtless आनन्द अब मेरा स्वरूप ही हो गया है, इसलिये अब आनन्द कहते अच्छा नहीं लगता। बस स्वयं एक मस्ती है, जो मुझे पता चला कि मैं स्वयं ही हूँ। वह स्वयं मेरा ही स्वरूप है और अब तो यह कुछ भी नहीं, बस हर समय बिल्कुल Thoughtless दशा है।

अब तो भाई, यह दशा है कि वह तो अब जो है, सो है। अब तो सूक्ष्म भी नहीं है, बल्कि सूक्ष्मता तो मुझे एक पर्दा ही लगता है, जो मुझमें नहीं है। दशा तो बिल्कुल एक सी है या यों कह लीजिये कि एक Unlimited मैदान है। उसे या दशा कह लीजिये या कुछ भी कह लें। हालत का तो दीवाला निकल गया है। सच तो यह है भाई कि Thoughtless जो मैंने ऊपर लिखा है, वह भी कोई दशा नहीं है, वरन् बिल्कुल खाली या सूने के लिये यही कहते बना। अब मुझे ऐसा लगता है कि जबरदस्ती मुझे कोई शक्ति दुनिया की ओर ऊपर से दाबे रहती है और जो मुझमें शारीरिक Activity बनाये रखती है। अब तो दशा में न कोई चमत्कार है, न चंचलता है, न सुहानापन ही है, क्योंकि वह तो जो है, सो है, फिर दूसरी चीज कहाँ से आवे।

दशा तो ऐसी है कि उसमें अब किसी की गुजर नहीं और सबकी गुजर है। अब तो अथाह मैदान सामने है, जिसमें में समा चुकी हूँ। अब तो दशा ऐसी है कि न आना मालूम है न जाना मालूम है और यह भी नहीं मालूम कि कुछ मालूम है और न यह मालूम है कि क्या मालूम करूँ। अब तो मैं भिखारिन भी नहीं रह गई हूँ, तो फिर अपने दर (ठिकाने) का भी क्या पता।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं और केसर आपको प्रणाम कहती है। छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-549
शाहजहाँपुर
15/3/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

असल जिन्दगी क्या है? कि जिन्दगी की जिन्दगी जाती रहे। वह जिन्दगी क्या है, जिसको जाना चाहिये? वह, वह है जिसमें पता लगा हो, जैसे ‘जीव-पना’। अब कहीं जिन्दगी जाने के बाद वह जिन्दगी आ गई कि जो तलाश की दौड़-धूप खत्म कर दें, तो फिर उसको दुनिया से मुर्दा होना ही कहा जावेगा और ईश्वर से जिन्दा रहना शब्द ही ठीक हो सकेगा। अब तुमने जो लिखा है कि मैं आया और गया, मगर तुम्हें इसकी अनुभूति नहीं, उसके माने यह है कि उस असल जिन्दगी की शुरुआत हो चुकी है। मगर यह भी लिखा है कि तबियत बाबूजी, बाबूजी कहकर पुकारती है, यह चीज बता रही है कि अभी वह टीसन बाकी है, जिससे कि अभी असल जिन्दगी में जिन्दा होना है। असल ज़िन्दगी को निगाह में रखते हुए “बाबूजी-बाबूजी” तबियत का पुकारना कमजोरी ही कही जावेगी, मगर उस ज़िन्दगी को जिसमें तुम्हें जिन्दा रहना है उसके लिये यही जज्बा हथियार भी है।

बाकी कुल पत्र का जवाब यह है कि तुम बबूल का दरख्त बन रही हो कि जो न सावन हरा न भादो सूखा। बाकी और बातें इस वक्त बहुत ऊँची लय- अवस्था बता रहे हैं और फिर यह तो होता ही रहता है कि कभी लय तो कभी उसकी तुरिया।

अब मैं तुम्हारी कहानी पर आता हूँ और या समझ लो कि मैं अपनी ही कहानी बयान करता हूँ। मैं जब लखीमपुर में अभी आया था तो मैंने तुम्हें J1 स्थान पर खींच दिया था, उसकी सैर अभी अच्छी तरह से तो आरम्भ नहीं हुई, मगर चिन्ह पैदा हो रहे हैं, और उसमें सूक्ष्मता बढ़ रही है। असल पूछो तो मैं तुम्हारी हालतों को देखता हुआ चलता हूँ और बाज हालत मुझे इतनी भा जाती है कि मुझे उसके देखने में मजा आता है, इसलिये तुम्हें देर लग जाती है। अब जो हालत उस स्थान पर छाई हुई हैं, अब तक उसे देख-देखकर खुश हो रहा हूँ, मगर अब सैर की हालत पैदा करूँगा, हलाँकि जी देखने का ही चाहता है।

मैंने, चौबेजी ने जो ऋग्वेद दिया था, उसको पढ़वा कर सुना और सुन रहा हूँ। उसमें सोम रस का वर्णन किया गया है और उसमें टीकाकारों ने अपनी राय भी दी है, जिनसे मैं सहमत नहीं हूँ। अबकी इरादा ये किया है कि जब मैं लखीमपुर आऊँ और बहुत से सत्संगी मौजूद हों, तो सब लोगों को मैं सोमरस पिलाऊँ। इससे मुझे भी तजुर्बा होगा और ख्याल तो यह है कि जो असर सोमरस पीने से होता था, वही असर सब पर दौड़ेगा, ईश्वर ने चाहा। और फिर अगर कहीं यह नुस्खा वन जावे तो उससे इसकी जाँच हो जावेगी। सोम के मानी केसर से कहना और ठा. हरदत्त सिंह से भी, कि पुराने किसी कोष में बबूल के तो नहीं हैं, मेरा ऐसा ख्याल हो रहा है।

ऋग्वेद में सरस्वती के मंत्र आये हैं और अग्रि और वायु और इन्द्र के भी और इनका Force इन्हीं स्थानों पर है, जो इसकी जगहें हैं। सरस्वती के स्थान की मैंने बहुत पहले Research की है, चुनांचे उसमें जितने मंत्र आये हैं, उनमें सब में, उसी स्थान पर जोर पड़ता है और उनकी लय ऐसी है कि वह स्थान जाग उठता है और अगर वह सब मंत्र उसी धुन से बार-बार पढ़े जावें, तो उस स्थान की कुल सैर हो जाती है। इसी तरह से मैंने किसी Speech में कहा है कि दीपक राग कंठ चक्र के करीब से अलापा जाता था, चुनांचे अग्रि के मंत्र जितने आये है, उनकी ध्वनि (धुन) कण्ठ-चक्र से ही निकलती है और उसमें सैर के वही तरीके हैं, जो मैं अपनी इच्छा-शक्ति से करवाता हूँ। अभी थोड़े ही से मंत्र मैंने सुने हैं, उसका नतीजा तुम्हें लिख दिया, इसीलिये स्वाध्याय सिर्फ वेद का ही मुफीद हो सकता है। आर्य लोग शब्द से चले हैं, जो धुर तक पहुँचता है। अब अगर मैंने कुल वेद सुन लिया तो मैं यह भी बता सकूँगा कि वैदिक जमाने के ऋषियों की कहाँ तक पहुँच हुई है।

हम चौबेजी के इस मद में बहुत एहसानमन्द हैं कि उन्होंने यह किताब देकर मुझे सोचने का मौका दिया।

तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ और अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-550
लखीमपुर
4/3/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कल हरि दक्ष आ गये। उनसे ‘आपके’ समाचार जानकर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई अब तो मेरी यह दशा है कि जिसमें Spiritual Waves कभी भूले से भी आ ही नहीं सकती। पहले मैं कितनी अच्छी-अच्छी दशायें लिखा करती थी कि नम्रता, सरलता, इत्यादि परन्तु अब तो कोई बात, कोई दशा आती ही नहीं। अब तो बस “मन थिर, चित्त थिर, सुरति थिर। थिर भया सकल शरीर”। है नहीं, बल्कि अब तो न मन है, न चित्त है, न शरीर है। अब तो एक समान, अविचल गति ही मेरा स्वरूप है। अब तो जैसे मैं भीतर पिघलन लिखा करती थी, वह पिघलन भी समाप्त हो चुकी। अब तो एक समान गति है। अब तो अपने श्री ‘बाबूजी’ का ध्यान करने का भी मुझ पर कुछ प्रभाव ही नहीं पड़ता। कभी एक क्षण को भी मुझे यह नहीं लगता कि मैं कभी Spiritual आदमी थी। अब तो स्थिरता भी अनुभव नहीं होती। बस खाली रहते ही रहते दिन रात बीत जाता है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-551
शाहजहाँपुर
4/4/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पोस्टकार्ड मिल गया। ख़ैर, उसका उत्तर फिर दूँगा। एक बात जो इस वक्त सामने है, उसके बारे में मैं कुछ लिखना चाहता हूँ। मैं जो कुछ कहता हूँ, उसमें यह सोचना चाहिये कि इसकी वजह क्या है और मेरी राय जो कुछ भी है, वह मोहब्बत से भरी हुई है, या उसके विपरीत। मोहब्बत से भरी हुई उस समय समझना चाहिये, जबकि उसमें कुछ लाभ प्रतीत हो। मैंने चौबेजी से बहुत पहले कहा था कि मेरे जन्म दिन में पाँच रूपये से ज्यादा न व्यय करें। और इसके लिये चौबेजी ने भी कहा था कि ऐसा ही होगा। चुनांचे मुझसे कहा भी यही गया कि इसकी पाबन्दी की गई मगर अम्मा के और तुम्हारे कहने सुनने से यह मालूम हुआ कि खाना वगैरह और तो और आदमियों का किया जाता है, जिसमें 50 या 60 रूपये से कम न ख़र्च होते होंगे। तुम जरा सोचो तो सही कि तुम्हें रूपये की कितनी तंगी रहती है और उस पर यह Taxing कितना ज्यादा होगा जो काम 4 या 5 रूपये में हो सकता हो उस पर इतना रूपया बेकार सर्फ करना कहाँ तक अक्लमंदी होगी। मैं तो खर्च के मामले में इतना सख्त हूँ कि मैं बराबर कहता रहता हूँ कि प्रसाद चढ़ाना जरूरी नहीं है। अब जरा सोचो तो सही कि मेरी राय कहाँ तक सही है ? सिर्फ इस वजह से इतनी सख्ती का ख़त लिखा था। एक बात लिखता हूँ, अपनी प्रशंसा में नहीं कि मुझे जब यह मालूम हुआ कि हमारे लालाजी को पैर छुआना पसन्द नहीं है, तो मैंने उनके पैर छूना छोड़ दिया। इसलिये कि हमें तो वही चीज़ करना चाहिये, जिसमें वह राज़ी रहें। अगर कहीं हम लोगों में मेरा नहीं बल्कि किसी उनके शिष्य का मामला होता, जो तुम लोगों के साथ इस समय है, तो ‘लालाजी’ की मनसा देखते ही, वह चीज़ खत्म कर दी जाती और इसका बोझ दिल पर न आता। वैसे अगर तुम लोग खर्च ही करना चाहते हो तो मेरा कुछ हर्ज नहीं, जितना चाहो, करो। इसकी तकलीफ़ तुम्हीं लोगों को होगी।

इस बात को तुम फिर जरा सोच लेना कि आध्यात्मिक गंगा में डूबने से ज्यादा लाभ होता है या माया की नदी बहाने से। मुझे खेद ज्यादा होगा अगर गुरू- पशु होने का तुम लोगों ने सबूत दिया। तुम लोगों को यह बात नागवार हुई हो तो मैं अपने शब्द वापिस लेता हूँ और यह गुरू महाराज की आज्ञा है, इसलिये मजबूरी है, मगर जो मेरे कहने और लिखने में असर हो गया हो, उसको हटाने का मुझमें इस वक्त काबू नहीं। वैसे तबियत तो मेरी यह चाही कि इस चीज़ को खत्म ही कर दिया जावे, इसलिये कि गैर जरूरी झंझटों से जितना ही बचाव हो सके अच्छा है। क्या तुमको तो अफसोस नहीं हुआ, उस खत पर जो मैंने लिखा था ? चौबेजी को तो अफसोस हुआ होगा और अम्मा को भी। तो चौबेजी से तो मुझे यह कहना है कि वह जन्मदिन पर कितनी ही दौलत लुटा दें, मुझे अफसोस नहीं होगा, इसलिये कि जो मेरे मना करने का भेद था, उस मोहब्बत का उन्हें पता न चला और यह तो हर समझदार आदमी का काम था कि अगर उसका दिल इस हद तक नहीं बना है कि मेरे कहने को माने और बर्दाश्त करे तो उसकी वजह पर पहले ख्याल जाना चाहिये था। यह तो मैं समझता हूँ कि तुम्हारे यहाँ जन्मदिन क्या मनाया गया, एक नई उलझन सी पैदा हो गई, जिसने तुम लोगों को अफसोस में डाल दिया। मेरे गुरू महाराज में यह आदत थी कि अगर कोई सत्संगी उनके लिये कुछ ज़रूरत से ज्यादा खर्च करता था, तो उन्हें अच्छा न मालूम होता था और वे उसे टोक देते थे। यह आदत मुझमें भी आ गई। इतना मुझे अफसोस जरूर रहेगा कि मेरी अच्छी बात ने तह तक न पहुँचने की वजह से ख़राब असर पैदा किया और मैं अपनी इस आदत से मजबूर हूँ कि बाज औकात मैं कड़ा Step ले लेता हूँ हलाँकि मैंने इस मामले में बड़ा Strong Step लिया है और मुझे तो वैसे ही शर्म आती है यह सुनते हुए कि मेरा जन्म दिन कहीं मनाया गया। इसलिये कि लोग कहीं यह न ख्याल करने लगे कि ‘रामचन्द्र’ अपने आपको पुजवाना चाहते हैं। एक बात मेरे समझ में यह और आई कि मैं इस जन्मदिन के मामले को तुम्हारे ही ऊपर छोड़ता हूँ। तुम जैसा चाहो इसमें इन्तज़ाम रखो, इसलिये कि तुम्हारा दिल दुखी न हो। मैंने सब बातें और इसकी वजह भी ऊपर लिख ही दी है, जिससे मेरा असल मतलब रोशन हो जावे और यह चौबेजी और अम्मा को भी सब बता देना। चौबेजी अब भी सन्तुष्ट न हों तो मैं यही बातें क्षमा मांगते हुए उनको भी अलहदा से लिख सकता हूँ। मेरे कहे हुए का असर तो कुछ कुछ ऊपरी तौर पर तो हटा है, मगर पूरी तौर पर तो उस वक्त हटेगा जबकि तुम और चौबेजी और अम्मा लालाजी से इसके हटने की प्रार्थना करें। इससे मेरी तबियत भी वैसी ही बन सकेगी। अगर कोई कमी मेरे रह गई हो तो चौबेजी मुझे लिखें, ताकि मैं उसको भी साफ कर दूं।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-552
लखीमपुर
13/3/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा पत्र पहुँचा होगा। शायद आपको जो थोड़ी सी साँस की तकलीफ़ मालूम हुई थी, वह ठीक हो गई होगी। ईश्वर से प्रार्थना है, आप हमेंशा स्वस्थ रहें। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो यह दशा है कि ज़रा सा भी Vibration तक है, न कोई नॉलेज है, और न Intelligence है। ऐसा लगता है कि श्री बाबूजी की Soul में मैं समाती चली आ रही हूँ और मेरा वही स्वरूप हुआ जा रहा है। भाई, मेरी तो यह दशा है कि नींद, भूख, प्यास, श्वास, प्राण अब कुछ भी मुझ तक पहुँच ही नहीं पाते। पहले मैं लिखा करती थी कि मुझे कुछ दीखता ही नहीं, सिवाय एक आत्मा के परन्तु अब तो यह दशा है कि न आत्मा, न कुछ मालूम ही नहीं पड़ता। पहले हर आदमी, हर चीज़ से शायद इतना मुझे प्यार था कि हर एक से लिपट जाने को तबियत चाहती थी, परन्तु अब तो मुझे कुछ दीखता ही नहीं, तो मुझे मानों किसी से प्रेम ही नहीं रहा। अब तो यह दशा है कि यह भी मुझे पता नहीं कि मुझे दीखता है या नहीं, कुछ एहसास होता है या नहीं। हालत अब बहुत शुद्ध अथवा साफ़ है। यह भी नहीं पता है कि शरीर चल रहा है या स्थिर है। मैंने भाई, दशा के लिये कुछ तो कहा है, परन्तु दशा यह है कि उसमें तो न कोई पर्दा है, न बंधन, न कुछ। बेनक़ाब दशा कह लीजिये। लगता है कि ‘बाबूजी’ की आत्मा में डूब गई हूँ, फैल गई हूँ।

भाई, लिखा तो करती हूँ कि मेरा यह स्वरूप हो गया है, वह हो गया है, परन्तु अब तो देखती हूँ कि स्वरूप तो ज्यों का त्यों ही है। अब तो भाई, बका ही बका रहती है, फ़ना कभी नहीं आती।

आपने कृपा करके मुझे J1 Point पर खींच दिया, इसके लिये मैं किस मुख से आप को धन्यवाद दूँ। मैं तो इस योग्य भी नहीं हूँ। इति :-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-553
लखीमपुर
16/3/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा पत्र पहुँचा होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो दशा बिल्कुल Blank है। न यह है न वह है, तो भाई Blank दशा के लिये शब्द भी Blank है। पहले मैं एक सर्वव्यापक दशा के बारे में लिखा करती थी, परन्तु अब तो चाहे सर्वव्यापक कहो, या कुछ, कुछ असर ही नहीं पड़ता। मैं यह देख रही हूँ कि न कोई रूप है, न रंग है, न चाल है, न ढाल है और न उसमें कोई सार है और न कोई रहस्य ही छुपा हुआ है। अब तो यह दशा है कि शायद ईश्वर सर्वव्यापी भी नहीं है। करुणा, दया जो कुछ भी उसके लिये कहा जाता है, मैं तो देख रही हूँ, कि उसमें तो कुछ नहीं है। वह तो बिल्कुल Blank है। मुझे तो अब लगता है कि मेरे बाबूजी का कोई स्वरूप ही नहीं है, कोई नाम नहीं है। आत्मा वगैरह भी कुछ है नहीं, कुछ होती नहीं। मुझे तो लगता है कि शरीर का कण-कण Blank है। रीढ़ में केवल दो नालियों के अतिरिक्त अब लगता है, कुछ है ही नहीं, जो सिर तक चली गई है। लगता है कि सारी पेचीदगियाँ समाप्त हो गई हैं।

मुझे तो लगता है कि शरीर की बनावट की किल्ली उतर गई। अब तो मुझे इसकी बनावट भी एहसास में नहीं आती, बल्कि यह भी शुद्ध एक समान दशा में मिलकर बराबर हो गया है। अब तो यह दशा है कि पहले एक दिल था, जिसमें श्री बाबूजी विराजमान थे और वही उन्हें पुकारता था, परन्तु अब नहीं मालूम हर कण-कण ही दिल हो गया है और उन्हें पुकारने लगा है, परन्तु पुकार में आवाज नहीं है, पसीजन नहीं है। बस न जाने कहाँ मेरे कानों में सूखी पुकार ‘बाबूजी’, ‘बाबूजी’ की आया करती है। मुझे तो दिल का भी एहसास नहीं है। मैं देखती हूँ कि मैं नहीं पुकारती हूँ परन्तु न जाने कहाँ से ‘श्री बाबूजी’, ‘श्री बाबूजी’ की पुकार मेरे कानों में आया करती है। सब ओर Blank ही मुझे लगता है, जहाँ न पुकार है, न कुछ गुहार है। कुछ ऐसा है, मेरी यह दशा है कि जिसके होने या न होने का प्रमाण मेरे पास कुछ नहीं है। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-554
शाहजहाँपुर
12/4/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र मिला। उससे यह इतमिनान कर लिया कि तुम लोगों को वजह समझ में आ गई होगी, कि मैंने इतना खर्चा जन्मदिन पर करने के लिये क्यों मना किया है। वैसे अगर कोई दौलत लुटा दे तो मेरा कोई हर्ज नहीं मगर चूँकि तुम लोगों की तकलीफ़ रूपये की मुझको ख़ल जाती है और एक तरह से फ़िक्र पैदा करती है, इसलिये सख्ती के साथ रोका गया। यह मिसाल तो यहाँ पर ठीक नहीं होगी, मगर मैं लिखे देता हूँ कि अगर कोई लड़का इस कदर ख़ैरात (दान) करने पर लग जावे कि माँ बाप को और दूसरे लोगों को उसकी वजह से तंगी हो जावे तो सोचो तो सही कि यह ख़ैरात कितना बड़ा पाप होगा। इसलिये कि इतने लोग जिसकी जिम्मेदारी उस लड़के पर है, इस ख़ैरात की वजह से तकलीफ उठावें। जिस रूपये पर दूसरों का हक़ हो, उसको दान-पुण्य में लगा देना बिल्कुल पाप है जबकि उतना खर्च कर देने से सबको तकलीफ़ होती है।

मेरे गुरू महाराज ने मुझे एक बहुत उम्दा बात बताई थी कि बुतपरस्ती या मूर्ति पूजन यही नहीं है कि पत्थर पूजा जावे, बल्कि किसी आदत का गुलाम हो जाना यह भी बुत-परस्ती है। दूसरे, एक बात और है कि अगर हम अपने ही विचार की पूर्ति में रहते हैं और अगर उसके ख़िलाफ कोई बात पैदा होती है, तो धक्का लगता है। ऐसे लोगों को मनमत कहते हैं। उसके लिये यह नहीं कहा जाता कि वह ‘मालिक’ की मौज में खुश हैं, अर्थात् उसको गुरू-मत नहीं कह सकते। अब इसमें कोई जितनी ही तरक्की कर ले, उतनी ही in-confirmity with the Lord कहा जाता है। हमें तो वह बात करनी चाहिये जिससे ‘मालिक’ खुश रहे और इसी में हमारा काम बनता है और सम्बन्ध घना होता जाता है।

मुझमें भी बहुत सी बुरी आदतें होंगी। एक तो सुबह देर करके उठने की, दूसरे हुक्का पीने की और यह सब जानते हैं। और न मालूम क्या-क्या होंगी, इसकी मुझे ख़बर नहीं। यह तो दूसरे ही लोग मुझे बतावें तो पता चल सकता है। एक नुक्स जो मैं कहे ही देता हूँ, यह है कि मैं Extremist जरूर हूँ। अगर रूहानी (आध्यात्मिक) Approach का ख्याल एकाग्रता में पड़ गया तो जब तक मैं वह चीज़ दे न लूँ, मुझे चैन नहीं आता। साथ ही उसके अगर कोई और बात मैंने Seriously ले ली और वह विचार की गहराई में पड़ गयी तो फिर उस वक्त सिवाय उस बात को करने के और किसी तरफ ख्याल नहीं जाता। इसलिये हर चीज़ मैं Lightly लेता हूँ, मगर कभी ऐसा भी हो जाता है कि वह विचार की गहराई में पड़ जाती है। चुनांचे इस case में जो तुम्हारे सामने है, ऐसा ही हुआ और उसका Explanation तुम्हारे ख़त में उस वक्त आया जबकि तीर कमान से निकल चुका था। अब तुम निराशा मत हो। मैंने यह कुल मामला तुम्हारे ही ऊपर छोड़ दिया है, इसलिए तुम चाहे खर्च करो 5 रूपया या उससे ज्यादा, मुझे एतराज नहीं, मगर यह मजबूरी जरूर पड़ गई है कि मेरा ख्याल कुछ इस तौर पर अटक गया है कि जिससे यह हो सकता है कि जन्म-दिन पर फ़ैज कुछ बँधा रहे और इसी के लिये मैंने तुमको लिखा था कि तुम लोग इसके लिये ‘लालाजी’ से प्रार्थना करो कि वह बँधाव हट जावे। मैंने भी प्रार्थना की है और करूँगा भी मगर अभी तक पूरी तौर से नहीं हटा है। हुकुम यही है कि जन्मदिन मनाया जावे, इसलिए मजबूरी पड़ गई, वरना मैं तुम सबको इसके लिये मना कर देता।

मेरे दिल में एक विचार और पैदा हुआ कि समय वह अब नहीं रहा कि जब शिष्य गुरू को Submit करते थे, इसलिये जमाने की रफ्तार देखकर इस बात को यूं होना चाहिये कि गुरू खुद शिष्य को Submit करे और यह विचार मेरा अभी तक बंधा हुआ है। अब लालाजी साहब से इसकी रोशनी लेकर इस तरीके को बदलना चाहता हूँ, इसीलिये मैंने चौबेजी से और अम्मा से क्षमा मांगी है। मेरी समझ से यह चीजें अच्छी है, अगर लालाजी पसन्द करें। चौबेजी से पूछना कि इस मामले में उनकी क्या राय है और मास्टर साहब से भी। मैं तुम्हें यह भी इत्मिनान दिलाता हूँ कि मैं किसी से भी नाख़ुश नहीं हूँ। एक बात थी जो भन्नाटे में पड़कर जोर पकड़ गई और मैं कर गुज़रा जिसका मुझे ख़्याल भी है।

चौबेजी और अम्मा को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-555
लखीमपुर
21/3/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। यहाँ सब अच्छी तरह से हैं। आशा है आप भी अच्छी तरह से होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो यह दशा है कि मैं हर कण-कण लिखती हूँ, परन्तु मुझे कण-कण का एहसास नहीं होता। अब तो यह दशा है कि न कभी पैदा हुई न हूँ, न होऊंगी। नहाना, खाना, रूप, रस, गंध, स्पर्श ये सब कभी मानों होते ही नहीं। जैसे नहाती जाती हूँ, परन्तु पानी का मुझे स्पर्श ही नहीं होता। वायु का कभी स्पर्श नहीं होता। साँस लेने की क्रिया तो चालू रहती है, परन्तु साँस मुझ तक कभी पहुँचती ही नहीं। न जाने ‘हुँ’, न जाने ‘नहीं हूँ’। यही नहीं, यही हाल मुझे सबका लगता है। कुछ अब ऐसी भूल की सी दशा रहती है कि जो न इधर की है, न उधर की। कुछ खबर ही नहीं रहती है। मैंने पिछले पत्र में Blank दशा लिखी है, परन्तु अब तो देख रही हूँ कि मैं तो उसे भी भूल गई हूँ। Blankness का मुझे अन्दाज़ ही अब कभी होता नहीं। लगता है कि वह खुला मैदान ओझल होते-होते अब मुझे पता नहीं अब मैं कहाँ चली गई। बिल्कुल नम्र सी दशा है। मुझे लगता है कि सिर के पीछे फैलाव सा हो गया है और उसमें वही दशा फैली है, जो बड़ी ही हल्की हल्की सी अब मेरी है। किन्तु देखती हूँ कि उसके भीतर-भीतर दशा फैली है, परन्तु उसका जैसे द्वार अभी नहीं खुला है। दशा जरूर उसमें बाहर भी फैल रही है।

भाई मैं अपनी दशा क्या लिखूँ। सूखी ठठरियों में रस निचोड़ रही हूँ। फिर भला सूखी ठठरियों की दशा क्या लिखूँ। अब तो यह दशा है कि न दुई है, न एकता की ही अनुभूति कभी होती है। मेरे लिये तो यह समान ही हो गई है। किन्तु अब इन सूखी ठठरियों में रस नहीं, केवल ‘मालिक’ ख्याल में रस या तरी की फ़ायदे देता है।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती है। केसर आपको प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-556
लखीमपुर
29/3/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। आशा है ‘आपकी’ तबियत अब ठीक होगी। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो मैं देख रही हूँ कि मेरी सैरगाह का वह स्थान है कि जहाँ पर “पना” की गुंजाइश ही नहीं है। यहाँ तक कि खाली या शून्य या सूनी दशा, जो मैं लिखती हूँ, उसने “पना” लगाते ही दशा भद्दी या भारी सी हो उठती है। अब तो भीतर-बाहर, कण-कण में, कुल शरीर तक के ज़रें ज़र्रे में एक अजीब नम्र सी दशा बसी हुई है। शरीर तो मैंने लिखने को लिख दिया है, वरना कुल एक यही Atmosphere ही हो गया है। शरीर तो Atmosphere में या हवा में ही मिल गया है ऐसा कि कुल दशा का अब Atmosphere ही मुझे एहसास में आ पाता है, बस अन्य कुछ नहीं। यद्यपि दशा के लिये तो Atmosphere भी कहना ठीक नहीं, क्योंकि मैं यदि चाहे दशा को ही Atmosphere कहूँ तो एक ऐसा दबाव सा लगता है, जो साँस न आवे, परन्तु मेरी तो दशा ऐसी है कि उसके लिये केवल दशा ही कहती हूँ और कुछ नहीं।

मेरी तो दशा यह है कि कोई Atmosphere मुझे कभी एहसास में ही नहीं आ पाता है, न जाने क्या बात है कि तबियत में Activity रह ही नहीं गई है। यही नहीं, बल्कि मेरा स्वरूप ही बिल्कुल Inactive हो गया है। शायद इसीलिये मुझे तो अब सदैव यह भी पता नहीं रहता कि Active या InActive होता क्या है। यद्यपि मेरी तबियत न उदास ही है, न एकान्त ही चाहता है, न कुछ लेकिन जब बिल्कुल ही InActive हो गई है, तो ऊपर मुझसे Active पना लाया नहीं जाता। इसलिये न मैं स्वभाव की गंभीरता ही बदल सकती हूँ, क्योंकि मुझे कुछ चाह ही नहीं होती। स्वभाव भी बिल्कुल Inactive हो गया है। अब तो दशा न एक समान है, न कुछ। दशा के लिये अब तो कुछ कहना या कुछ न कहना बिल्कुल व्यर्थ या समान है। न जाने मेरी क्या दशा है कि जो मैंने Inactive लिखी है। यह भी पता नहीं है कि बोलती हूँ या चुप रहती हूँ न कहीं आवाज़ है, न शब्द, कुछ नहीं लगता। इति:-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-557
लखीमपुर
11/4/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

पुज्य मास्टर साहबजी से ‘आप’ सब की कुशलता के समाचार ज्ञात हुए। ‘आप’ को दौरा करीब घंटे भर सुबह और शाम हो ही आता है। ईश्वर शीघ्र ही इसे अच्छा कर दे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरी तो यह दशा है कि मुझे लगता है कि न कोई है, न कुछ था। मैं भी नहीं हूँ, कोई भी नहीं है। न आवागमन का आन्दोलन ही है, न शान्ति की शीतलता। अब जो भी हो, कुछ कह नहीं सकती, क्योंकि मैं तो अब यह देख रही हूँ कि अब जो कुछ भी है, वह केवल कुछ नहीं को ‘है’ मानकर ही कुछ कहा जा सकता है। या यों कह लीजिये कि जब मैं दशा के लिये कुछ कहती हूँ, तो भी दशा को ज्यों का त्यों ही पाती हूँ। मेरी तो भाई, यह दशा है कि बनना, बिगड़ना मुझे कुछ एहसास नहीं होता। मुझे तो किसी ने नहीं बनाया है, तो फिर बिगड़ेगा क्या। भाई, अपनी दशा के क्षेत्र को No Word कहना ही ठीक होगा, फिर कुछ नहीं रहता कहने को।

भाई, मेरी तो अब यह दशा है कि बीज भी नाश हो गया है। मेरा अंतर क्या है, लगता है ऐसी पृथ्वी जिस पर कभी बीज़ भी न डाला गया हो। ऊसर हृदय है, ऊसर दशा है। मुझे तो ऐसा लगता है, सब कुछ ज्यों का त्यों है। मुझे तो जाने क्या हो गया है कि स्थिरता जो हर समय, हर चीज़ ज्यों की त्यों स्थिर लगती थी, अब तो मुझे स्थिरता का जैसे कुछ अर्थ ही नहीं प्रतीत होता है और न कुछ। जो मैं सब कुछ ज्यों की त्यों लिखा करती थी, वह भी कुछ नहीं मालूम पड़ता। मेरा तो यह हाल है कि मुझे कुछ नहीं मालूम पड़ता, कोई चीज़ नहीं मालूम पड़ती है परन्तु अब तो यह भी स्मरण नहीं रहता कि कुछ नहीं मालूम पड़ता और न यह हाल है कि कुछ मालूम पड़ता है। मेरी दशा तो अब ऐसी हो गई है कि उसमें एक शून्य तक की गुंजाइश नहीं। शून्य कहती हूँ तो वह भी ऊपर ही छलकने लगता है, अलग चीज़ हो जाती है परन्तु हालत तो बस हालत है। मैं और बात नहीं जानती। मेरी तो यह दशा है कि मुझमें अब लगता है कि Creative Power ही नहीं रह गई है। यह तक नहीं कि मैं इसकी कोशिश कर सकूँ कि ‘मालिक’ की मौज़ में मेरी मौज़ रहे। हाँ, यह अवश्य देख रही हूँ कि इतनी कृपा श्री बाबूजी की इसमें है कि यदि मुझमें कोशिश करने का ताव नहीं रह गया है, तो तबियत की लगाम भी ‘आपने’ ऐसी रखी कि उसे ‘उसकी’ तबियत के ऊपर न आने दिया। मुझमें तो अब न बनने की शक्ति रह गई है, न मिटने की और कुछ ऐसा देख रही हूँ कि जब शक्ति नहीं रह गई है तो अशक्ति का भी पता नहीं चलता है। न जाने यह क्या बात है कि हर शख्स मुझे अपने से बलवान लगता है। (आत्मिक मामले में भी) तो शायद सबसे तबियत में कुछ दबी सी होती है, परन्तु जब भाषण या वैसे भी आध्यात्मिक विषय पर बात करने लग जाती हूँ, फिर तो मुझे लगता है कि मैं मानो Master हूँ या कहिये कि उस समय दशा में Mastery आ जाती है। परन्तु बाद में फिर कुछ नहीं। हाँ, ‘मालिक’ के प्रेम की प्यासी रहती हूँ, चाहे भीतर छुपे तौर पर या कैसे, यह मुझे पता नहीं है।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-558
शाहजहाँपुर
13/4/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

इससे पहले मैं एक लिफाफा डाल चुका हूँ। उसके बाद तुम्हारा खत 11.4.56 का प्राप्त हुआ। इसका जवाब मैं इससे पहले ख़त में लिख चुका हूँ कि मैं चौबेजी से या अम्मा से नाखुश नहीं हूँ और नाख़ुश होने का सवाल ही क्या? मैं तो सिर्फ एक रिवाज़ और खर्च को कम करना चाहता था। मास्टर साहब ख़ुद भी नहीं समझे, इसलिये तुमसे ऐसा कह दिया। इसको कि मैं इसके पहले ख़त में मैं लिख चुका हूँ, मतलब यह है कि कहने का असर कि रहमत बरसेगी, जो कुछ थोड़ा बहुत हो गया हो, उसकी दुआ की जरूरत है अर्थात् यह असर साफ़ आ जावे, अगर 5 रूपया से ज़्यादा खर्च हो तो। इसलिये लालाजी से यह प्रार्थना करनी चाहिये कि मेरा दिल इस विचार से साफ़ हो जावे। यह सब बातें इससे पहले ख़त में मैं साफ़ कर चुका हूँ और तुम बिल्कुल परेशान मत हो। पिछले ख़त को गौर से पढ़ना, चित्त तुम्हारा साफ़ हो जायेगा फिर भी कोई बात रह जावे तो मुझसे पूछ लेना। मैं भी आखिर इन्सान हूँ, तो यही समझ लो कि इसी हैसियत से मैं इतना तेज कह भागा।

चौबेजी और अम्मा को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-559
लखीमपुर
16/4/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का कल आया। पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो यह दशा है कि ‘मालिक’ से मेरा आंतरिक या अंतरिक्ष सम्बन्ध लगा करता था, परन्तु अब तो जिधर देखती हूँ, न तोड़ने का एहसास होता है, न जुड़ने का। बस एक समान दशा ही व्याप्त है। दशा भी इतनी हल्की कि बस कहने भर को, वरना उसमें जान नहीं है। शायद इसीलिये मैं देख रही हूँ कि विचार, काम व बुद्धि भी हालत से मिले-जुले ही रहते हैं, या दशा में लय हो चुके हैं। इसीलिये मुझे इनका एहसास ही कभी नहीं होता। अब तो ऐसी दशा रहती है कि कोई हालत भी मेरे एहसास में नहीं रहती है और न अन्दाज़ में रहती है। और यह भी पता नहीं कि आखिर तबियत रहती कैसी है? अब तो न बूँद है, न सागर है। यहाँ तो प्रारम्भ या समाप्त का प्रश्न नहीं। अब तो यह दशा है कि जहाँ कभी तनिक क्षोभ का भी प्रश्न नहीं उठ सका है। इसलिये स्पन्दन या Vibration के प्रश्न का प्रश्न ही उठ सकता है। अब दशा यह है कि एहसास भी बोझिल हो जाता है। मुझे तो अब यह लगता है कि बका या तुरिया कहना भी हालत में शून्य (डाट) के समान ऊपरी और अलग चीज़ हो जाती है, जो मेरी हालत से मेंल नहीं ख़ाती और भाई, बक़ा आवे कहाँ से, जब फ़ना ही नहीं है, और फ़ना भी कहाँ से आवे, जब कुछ है ही नहीं या जब यह ही पता नहीं कि तबियत रहती कैसी है। दशा तो अब यह है कि मुट्ठी बन्द करिये तो भी खाली की खाली रहती है। मैं हाल लिखती हूँ, तो भी यह पता नहीं कि तबियत कैसी रहती है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:- 

सदैव आप की ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-560
लखीमपुर
22/4/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

पूज्य मास्टर साहबजी से ‘आपका’ समाचार मिला। ‘आपके’ पेट के दर्द का हाल सुनकर सबको चिन्ता है। ईश्वर से प्रार्थना है कि जल्दी से जल्दी दर्द ठीक हो जाये। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

कल रात को 9 या 9 1/2 बजे जब प्रार्थना के बाद सबको पूजा करवा रही थी, तो कल कुछ मुझमें बहुत अजीब बात हुई। यद्यपि मैं कह नहीं सकती कि क्या हुआ। शायद J1 से ऊपर खींच दिया हो। श्री बाबूजी ने तो भी नहीं कह सकती हूँ और आज यह लगता है कि मानों (अपनी) हालत भी हाथ से निकल गई है और अब ऐसा हाल है कि जैसे खाली बैठे आदमी को यह पता न रहे कि वह खाली बैठा है। लगता है कि मानों जैसे अब कुछ काम ही न रह गया हो। काम घर का सब बराबर कर रही हूँ, परन्तु दशा यही है कि जैसे कुछ काम ही नहीं रह गया हो। न जाने क्या बात है कि पूजा करती भी हूँ, कराती भी हूँ, बात भी करती हूँ, परन्तु तो भी रात-दिन कभी भी, अब तो हल्कापन भी कभी आता नहीं। आज तो मुझे लगता है कि केवल Point नहीं, बल्कि जैसे कोई Region का Region एकदम से गटक गया हो, हज़्म हो गया हो और फिर बाद में आज कुछ इसका भी पता ही न हो ( रहे )। खाली तबियत अथवा सूनी तबियत जो लिखा करती थी, उसका तो मैदान ही मानों भटक गया हो। सारा पसारा या फैलाव या मनन शक्ति या हालत तथा अंतर-बाहर, मुझे तो जैसे सब कुछ गटक गया हो।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:- 

सदैव आप की ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-561
लखीमपुर
30/4/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

एक पत्र लिख चुकी हूँ। आशा है आप सब वहां अच्छी तरह से होंगे। आप का कोई पत्र अभी तक नहीं मिला, शायद आप और जरूरी काम से Busy होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो यह दशा है कि पहले, अब तक मैं देखती थी कि मेरे ख्याल में मेरे श्री बाबूजी के आकार का एक अक्स सा बना रहता था। यद्यपि इधर धीरे-धीरे मुझे ख्याल में वह आकार का अक्स भी इतना कम अनुभव में आ पाता था, परन्तु मैं पकड़े थी। किसी न किसी तरह जब भी ख़्याल में कुछ हरकत आती थी, तब मेरा पहला ख़्याल उसी आकार को टटोलता था, तो बहुत ही धुँधला सा, सो भी भूल-भूल कर आता था, परन्तु अब तो लगता है कि जैसे किसी ने बिल्कुल धो दिया हो। जब ख़्याल में नहीं है तो Conception तक नहीं बँध पाता है और अब तो भाई, न ख़्याल में जान है और Conception खाली है तो फिर अब तो लगता है कि सब Beyond Conception है, नहीं, बल्कि न यह पता है कि कुछ है और न यह होश है कि कुछ नहीं है। मेरी तो यह दशा है कि ख़्याल का भी ख़्याल मुझे रहता ही नहीं है। शायद इसीलिये ‘मालिक’ के आकार की कल्पना करती हूँ परन्तु वह भी तो नहीं, अब नहीं कर पाती हूँ। कल्पना जब बँधती नहीं तो दृष्टि भला उसे देखेगी क्या, बुद्धि समझेगी क्या और अक्स भी क्या रह सकेगा। मेरा तो यह हाल है कि न तो जीवित में ही हूँ, न मुर्दा में ही हूँ। पता नहीं आपको पत्र कौन लिखता है, किसको लिखता है और लिखकर भी मुझे कागज़ कोरा का कोरा ही लगता है। मुझे तो पता नहीं कि मन कहाँ चला गया और कौन ले गया। कभी था भी, या नहीं, कुछ पता नहीं। क्या करूँ? मेरी तृप्ति भी नहीं है और प्यास का भी एहसास नहीं कर पाती हूँ।

पूज्य मास्टर साहब को मेरा प्रणाम कह दीजिएगा। छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति :-

सदैव केवल आप की ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-562
लखीमपुर
2/5/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, ‘आपकी’ तबियत ठीक होगी। मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

मुझे तो लगता है कि मानों मैं अब तक एक स्वप्न सा देख रही थी, जिसका Impression मेरे दिमाग़ में भी कुछ याद नहीं पड़ता। वह स्वप्न भी जैसे अब समाप्त हो गया। हालत क्या, बल्कि हालत का मानो एक स्वप्न सा था, जो एकदम समाप्त हो गया। अब तो मुझे कुछ भी याद नहीं पड़ता। मानों अब तक स्वप्न में विचर रही थी और वह एकदम से मुझमें सटक गया, मेरे में हज़्म हो गया। अब तो यह दशा है कि जैसे कुल संसार या शक्ति किसी के पेट में हो, परन्तु उसे कुछ इसका गुमान तक न हो। अब न जाने यह क्या बात हो गई है कि जब किसी को पूजा करवाती हूँ या कोई और Work करती हूँ, बल्कि ऐसा लगता है कि मानों ‘मालिक’ के पास से इच्छा शक्ति उस समय आ जाती है और बाद में मुझे फिर कुछ ख़बर नहीं रहती। वह इच्छा शक्ति शायद फिर ‘मालिक’ के पास ही वापिस लौट जाती है। मानों कोई सब चीज़ बेचकर ‘मालिक’ का गुलाम हो जावे, तो वह समय पर उसे सामान दे देता है, फिर कुछ नहीं। किन्तु यह देखती हूँ कि गुलाम को कभी इसका गुमान तक होता कि कोई चीज़ उसकी है। यहाँ तक कि उसे तो गुलामी तक का भी कभी ख़्याल या होश नहीं आता है। गुलामी भी चीज़ ‘मालिक’ की ही हो जाती है। यह और बात है कि यदि मर्ज़ी हो तो ‘वह’ कभी उसका एहसास-मात्र भर करा देवे, परन्तु तो भी देखती हूँ कि चीज़ ‘मालिक’ की ही रहती है। बस इतना समझ लीजिये कि केवल शरीर-मात्र भर गुलामी का चिन्ह गुलाम के पास रह जाता है जिससे ‘उसी’ की सेवा होती है किन्तु फिर भी न जाने क्यों सेवकाई में भी सेवक का भाव ‘मालिक’ कभी पास भी नहीं फटकने देता। यही बस मेरी दशा है।

जो कुछ है का ख़्याल आता है, तो लगता है कि ‘मालिक’ सामने है और ‘उसी’ के पास रखा है। यहाँ तक कि अंतर का तो सवाल ही क्या, शरीर तक का उससे कोई सम्बन्ध ही नहीं होता। कुछ ऐसी दशा है कि ‘मालिक’ की मर्जी पर छोड़ने का भाव नहीं आता बल्कि मालिक ही वास्तव में काम लेता है। कस्तूरी तो वास्तव में संसार के लिये जैसे केवल एक फोटो मात्र भर है, जिसमें संसारी लोग उसे देखते हैं और पहिचानते हैं। कस्तूरी को तो उस फोटो की भी याद नहीं। कस्तूरी तो ‘मालिक’ के अंतरिक्ष में विलीन हो गई और यह हाल है कि अंतर में पूछती हूँ तो Inner Voice कोई उत्तर नहीं देती और फिर जवाब कौन दे, जब कि Inner कुछ है ही नहीं। जो है, वह बस बाहर ही बाहर ( शरीर मात्र) भर है।

मेरा तो यह हाल है कि लगता है कि ‘मालिक’ का अंतरिक्ष ही मैं सटक गई हूँ, या अंतरिक्ष-गति ही न जाने क्या हुआ कि मुझे तब कुछ पता न चला, एकदम से मानों गले के नीचे सटक गई। अब कुछ हो नहीं सकता और भाई, यह भी पता नहीं ‘मालिक’ के गले से मेरा अंतरिक्ष ही सटक गया हो। अब तो कुछ खबर नहीं। अब तो बस वह मेरा Centre हो गया है। इच्छा-शक्ति भी जब और जितनी वह दे देता, काम हो जाता है और बाद में कुछ पता नहीं रहता।

सच तो यह है कि काम करने का भी होश नहीं, मानो मेरा ‘मालिक’ अपने Centre (मेरे शरीर) द्वारा सब कर देता है। अब तो देखती हूँ कि पूजा करवाते समय मेरा शरीर भी Medium नहीं रहता बल्कि Direct श्री बाबूजी से ही रहता है। शरीर का तो यह हाल है कि अपना हाथ पकड़ती हूँ तो भी यह एहसास ही नहीं होता कि कुछ पकड़े हूँ, तो फिर अपने का ही भला क्या हो सकता है।

अब तो हालत, बेहालत हो गई है। मैं देखती हूँ कि श्री बाबूजी अक्सर मुझे लिखा करते थे कि जो हालत उस असल हालत की वज़ह से होती है, उसे तुम अच्छा Express कर ले जाती हो, परन्तु मेरा तो अब यह हाल है कि असल ही नहीं दीखता तो उसकी वजह से क्या होगा।

अब तो अजीब दशा है कि न कुछ लक्ष्य है, न उद्देश्य है, न बेचैनी है, फिर भी चैन नहीं है। न दिल है, तो फिर दर्द कहाँ उठे। अंतर तो लुट गया। दिन भर खाली बीतता है, उसमें यह बेख़बरी कि जैसे कोई सोता-जागता आदमी हो। नहीं, नहीं बल्कि ऐसा, जिसे न कभी सोना है और न कभी जागना है। कुल शरीर में Vibration बना ही रहता है। कुल शरीर तक क्या है, लगता है, जैसे हवा का दबाव भी जहाँ समाप्त हो चुका है।

अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं। केसर आपको प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-563
शाहजहाँपुर
7/5/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, खुश रहो।

पत्र मिला। जबाब देना अब खतों का मुश्किल पड़ रहा है। इसलिये कि बड़ी Deep Thinking की जरूरत पड़ती है। मगर आजकल कई दिन से तवज्जोह मैं तुम्हें अक्सर दे रहा हूँ। कुछ ठहरने के बाद जब अपना काम पूरा कर लूँगा तब लिखने की कोशिश करूँगा।

अम्मा को प्रणाम और सब छोटों को प्यार।
शुभचिन्तक रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-564
लखीमपुर
7/5/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र आपको मिला होगा। बहुत दिनों से आप का कृपा पत्र न आने के कारण परेशानी अवश्य हो जाती है। जाने क्यों, मुझे बिना आप के पत्र के धीरज नहीं हो पाता है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मुझे याद है कि कई पत्रों में आपने लिखा कि तुममें उस असल ज़िन्दगी की शुरूआत हो चुकी है, मगर मेरी तो (अब यह) दशा कहती है कि उस असल ज़िन्दगी में भी ज़िन्दगी नहीं रही। अब तो न ज़िन्दगी है, न मौत है, या यों कह लीजिये कि जैसे सोये हुए को सोने का एहसास ही नहीं है। अब न जाने क्या हो गया कि सिर के पीछे लगता है कि कुल सिर बिल्कुल हल्का, खाली-खाली हो गया है। कुल सिर और कुल शरीर भर में आगे पीछे सब एक ऐसी नरम सी, मुलायम सी दशा व्याप्त रहती है कि यदि हल्कापन कहा जावे तो उससे हजारों गुणा भारी पड़ेगा। मुझे कुछ यह भी लगता है कि बाँये पैर के अंगूठे के द्वारा कोई दशा या कोई चीज़ मेरे कुल शरीर में व्याप्त हुआ करती है। इसके अलावा इसके द्वारा मुझे लगता है कि मानों कुल शरीर में Vibration सा भी बना रहता है। लगता है कि कुल सिर का पिछला भाग भी गल-गला कर सब कुछ एक समान हो गया है। बाँये अँगूठे के पास वाली उँगली में भी एक प्रकार की रेंगन सी या Vibration सा रहता है।

अब तो ऐसा लगता है कि मानों कोई मेरी बागडोर को और अधिक कसकर खींचे रहता है और मैं शायद इसीलिये टीसन, मानों मेरा एक अंग ही बन चुकी है। मेरे लिये तो भाई, ख़्याल और बेख़्याल तबियत किसी का कोई अर्थ ही नहीं रह गया है। खाली का भी मेरे लिये कोई अर्थ नहीं रह गया है, न Zero, न कुछ नहीं। मुझे तो अपने लिये अब न जाने क्यों सब कुछ बेकार हो गया लगता है, जिसका कोई अर्थ नहीं रह गया है। मेरी तो कुछ यह दशा है कि देखती हूँ कि जब चाहती हूँ तो दिमाग़ में भजन इत्यादि तुरन्त आने लगते हैं और जब चाहती हूँ कहानी या लेख लिखने लगती हूँ, परन्तु न जाने क्या बात है कि कुछ लिखने बैठती ही नहीं हूँ। कभी तबियत ही नहीं होती।

मेरा तो यह हाल है कि मुझे न सिर की अनुभूति है, न पैर की, न हृदय की, न पीठ की, न हाथ की। मेरे लिये तो सब कुछ एक समान ही है। बाँये पैर के अँगूठे की नस, सिर के पिछले भाग में लगता है, जुड़ी हुई है। यह शरीर तो ऐसा हो गया है, मानों किसी ग़ैर का हो और उसकी भी याद न रहे। इसमें भाई, कुछ बोझ ही नहीं है, क्योंकि लगता है इसमें न कोई अवयव है, न हडूडी, न माँस, न रक्त, न खाल। यही नहीं, बल्कि न आकार है, न कोई स्व है, न रूप है, न रंग है। शरीर तो मानों हवा हो गया है। ( रात में मुझे अब यह भी नहीं लगता है कि मेरा शरीर सो रहा है, या यह कौन है, क्या है, कोई एहसास ही नहीं होता। यह तो मानों गैर की चीज़ है) और मुझे न जाने क्या हो गया है कि मुझे न सोने का मज़ा याद आता है, न जागने का मज़ा याद आता है। जब देखती हूँ कि अपना ही शरीर सो रहा है, किन्तु तब भी सोने का मज़ा याद में नहीं आता। न पूजा का मज़ा याद है, न ध्यान का, न ‘उसकी’ याद का। ऐसा लगता है कि जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं, यह हाल है।

भूत, भविष्य तथा वर्तमान मेरे लिये, किसी का, अब कुछ अर्थ नहीं है। मेरा तो यह हाल है कि मुझे चाहे कोई दुनिया की ओर घसीट ले, चाहे ईश्वर की याद दिलाये, मेरे ऊपर मानों कुछ असर ही नहीं पड़ता। मैं तो जगह की जगह पर हूँ, किन्तु जगह या ठिकाने की भी याद नहीं है। क्या कहूँ, क्या न कहूँ। ‘मालिक’ बचाये रखना मुझे दीन-दुनिया, किसी की भी तमीज़ नहीं है। भले-बुरे की भी तमीज़ नहीं। मेरी तो यह दशा है कि सोती भी रहती हूँ और इधर-उधर की बातें भी कान में सुनाई पड़ा करती है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर आप को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-565
लखीमपुर
15/5/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ मिला। पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। आप की तबियत केसर के पत्र से मालूम हुआ कि खराब है, परन्तु आप ने मुझे नहीं लिखा। कृपया अपनी तबियत का हाल शीघ्र दीजियेगा। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

पूज्य मास्टर साहब जी कहते हैं कि तुम्हें श्री बाबूजी पर तेजी आई, किन्तु मुझे Past की कुछ याद ही नहीं आती और न जाने क्यों अब यह शब्द सुनना भी मुझे बर्दाश्त नहीं होता है। लगता है कि मानों दिल पर कोई चोट कर रहा है, परन्तु यह ‘मालिक’ की कृपा है कि उसका मुलायम सा हाथ फेरते ही वह चोट तुरन्त ऐसी साफ़ भी हो जाती है कि फिर मुझे कुछ पता ही नहीं रहता है।

भाई, अब तो लगता है कि पहले मैं लिखा करती थी कि मेरा हर कण-कण मानों स्थिरता का स्वरूप ही हो गया है, परन्तु अब तो दशा में न अस्थिरता का पता है और न ही स्थिरता का ही एहसास है। तबियत इन दोनों से भी खाली या उपराम हो गई लगती है। तबियत को एक समान या सतह सी कहने में कुछ अर्थ नहीं होता है। अब तो बिल्कुल ख़ाली दशा रहती है, परन्तु ख़ालीपन नहीं लगता है। मैं देखती हूँ कि कोई भी बात मैं मन में रोक ही नहीं पाती हूँ। सबके सामने जैसी बात होती है, वैसी ही निकल जाती है, छिपती नहीं है और दूसरे Confirmity है। तेजी यह है कि जो बात आती है मन में, वह तड़ाक से निकल जाती है। न जाने क्यों अब तो यह भी पता या एहसास नहीं होता कि मेरी बागडोर किसी के हाथों में है और अपने ही वश में हूँ। इसीलिये अब तो यहाँ तक होता है कि अब न तो चैन में ही हूँ और न जाने क्यों बेचैन भी हो नहीं पाती। मेरे दिल में तो अब न कसक है, न टीसन है, मुझे कुछ एहसास नहीं होता है। अब तो चाहे समझ उतनी न हो, किन्तु लगता है कि मैं तो पूरी दुनियादार हो गई हूँ। कभी ‘मालिक’ की याद नहीं आती। उद्देश्य का भी पता नहीं। क्या कर रही हूँ या क्या करना है, कुछ पता नहीं है। क्या हो रहा है, या क्या हो, कुछ मालूम नहीं। न ऊपर हूँ, न नीचे हूँ, न यहाँ हूँ, न वहाँ हूँ, न बनावट है, न असल है, न किसी Point के अन्दर हूँ, न बाहर हूँ। मुझे न जाने क्या हो गया है। क्या खोजती हूँ, कुछ पता नहीं। कुछ पास है नहीं। ‘मालिक’ भी कहीं छुप गया है। दिल में दर्द है, पता नहीं। हाथ, पैर, सिर, किसी की तमीज़ नहीं, कि कहाँ दर्द है, कहाँ पीर है। क्या चाहिये, कुछ होश नहीं है। बस, काम दिन भर ही कुछ न कुछ करती हूँ,परन्तु न तो ‘मालिक’ का ही करती हूँ, न दुनिया का करती हूँ। अब कुल अँधेरा ही अँधेरा है। भीतर बाहर कुल अँधेरा ही फैला है। परन्तु यह अँधेरा भी ऐसा है, जिसमें उजेला है नहीं और मुझे अँधेरा का भी एहसास नहीं होता है। अब तो न जाने क्या कुछ ऐसा हो गया है कि ऐसा लगता है कि न तो हालत से अलग ही रहती हूँ और न अब हर समय चिमटे रहने का ही एहसास होता है। कुछ यह दशा है कि तेज़ी भी एकदम से आ जाती है, तो भी मुझे कुछ पता नहीं रहता है। मुझे कोई बात बुरी लगती है, इसका भी पता नहीं रहता। कोई बात अच्छी लगती है न इसका ही कुछ पता लगता है।

अब तो भाई, मैं नहीं समझ सकती कि मैं सीधी हूँ या टेढ़ी हूँ। फिर मैं अपने को सुधारूँ क्या? मेरे हाथ में कुछ भी नहीं है। ‘मालिक’ आप ही मुझे सुधार लें।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-566
लखीमपुर
19/5/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा पत्र मिला होगा। मास्टर साहब जी भी वहां पहुँच गये होंगे। आशा है, ‘आप’ स्वस्थ होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरा तो यह हाल है कि कभी जुनून या पागलपन या बेचैनी आने ही नहीं पाती, लेकिन मैं देखती हूँ कि जब यह था, तब मन में कुछ बंधन सा था, परन्तु अब न मन है, न आराम है, न शक्ति है और न अशक्ति है। मेरे लिये तो ये दोनों बराबर हैं। यही नहीं, बल्कि यदि कहीं कुछ बंधन है, तो वैसा नहीं है। स्वतंत्रता या बंधन, मेरे लिये दोनों समान हैं। मेरे लिये प्रेम या निःप्रेम दोनों बराबर हैं। हाय ! क्या कभी ‘मालिक’ से प्रेम कर सकूँगी। अब तो देखती हूँ कि शायद बेचैनी की Limit, Limitation टूट कर एक समान सतह सी हो गई है। एकता या दुई, ये दोनों हालत मेरे लिये एक सी है। अब तो मेरा हर कण-कण, भीतर-बाहर, सब बेचैन है, परन्तु मैं क्या कहूँ। मेरी हालत तो ऐसी है कि मेरे लिये तो मानों चैन और बेचैनी एक हो गये हैं। कसक कहना भी हालत से भारी बैठता है। यदि मैं हाय कहती हूँ तो मानों हर कण-कण, हाय-हाय कर उठता है और यदि मौन रहती हूँ तो हर कण-कण मौन हो जाता है। परन्तु मेरा यह हाल है कि मैं तो अब दोनों में से कुछ भी नहीं कर पाती हूँ। मैं तो देखती हूँ कि ‘बाबूजी’-‘बाबूजी’ तो मेरे लिये महामंत्र होकर स्वत: ही मेरे प्राणों में रम गया है और मेरे ही क्या, जहाँ भी सुनती हूँ, हर आवाज़, जड़ में हो या चेतन में हो, मूक हो या बुलन्द हो, सब ‘बाबूजी’-‘बाबूजी’ की आवाज़ स्वत: ही मेरे अन्दर पहुँचाया करते हैं।

समझ में नहीं आता, क्या करूँ ? रोके से भी रुकती नहीं। कहीं भी भागकर छिप जाती हूँ, परन्तु यह आवाज़ पीछा नहीं छोड़ती है। कहीं दर्द होता है तो, बजाय कराह या हाय के स्वत: ही 'बाबूजी'-'बाबूजी' आवाज़ आती है, जिससे मेरा वह दर्द तो कम पड़ जाता है, परन्तु दर्द के इस दर्द का इलाज नहीं। यह दर्द तेज़ी पर भी जाने मेरी आत्मा इसे तेज़ी पर भी आने नहीं देती और आ भी सकता नहीं, क्योंकि भण्डा फूट गया है। आये भी तो कहाँ से। एक फूटे खोल में भला हवा कहाँ टिक सकती है। ‘मालिक’ भी कहीं मिलता नहीं, जो अपनी दास्तान ‘उसे’ सुना दूँ। परन्तु अब तो यह हाल है कि अपने में तो दिल की धड़कन भी नहीं होती, जो ‘बाबूजी’ का नाम ही सुना दे, ‘उनका’ स्मरण दिला दे और न जाने क्यों बाहर भी कभी मानों कोई आवाज़ नहीं होती, जो मेरे कानों में पहुँचकर मुझे ‘उसकी’ याद दिला दे। जाने दुनिया में आवाज़ या ध्वनि ही समाप्त हो गई है या मेरे ही कानों का पर्दा फूट गया है, नहीं तो कभी तो कोई खटक पहुँचती ही।

क्या मुझे अब कभी भी कोई ‘मालिक’ का स्मरण न दिला सकेगा। मुझे ऐसा लगता है कि ध्वनि तो न कभी थी, न है, फिर आये कहाँ से। मैं तो यही रास्ता देखती हूँ कि शायद कभी ‘वही’ मुझे याद कर ले। कोई विचार भी रात दिन कभी टकराते नहीं। जो कुछ शायद होश आ जावे, परन्तु होश आवे कहाँ से। यदि गया हो, तो आवे। पता नहीं अब मैं अपनी हालत लिखती हूँ या क्या लिखती हूँ मुझे तो कागज़ कोरा का कोरा ही दीखता है, फिर भला हालत क्या होगी। हालत के नाम पर तो मुझे कोरा कागज़ भी एहसास में नहीं आता है किन्तु ऐसा सब होते हुए भी मेरी तो एक अखण्ड गति हो गई है। या यों कहिये कि वह अखण्ड गति ही मेरा स्वरुप हो गया है। अब तो प्रार्थना या भजन इत्यादि गाने में मेरी कुछ रूचि ही नहीं रह गई है, मानों कोई मुझे रोक लेता रोने भी नहीं देता, गाने भी नहीं देता। पागल सी नहीं हो जाने देता और चैन भी आता नहीं। न कुछ सुनना चाहती हूँ और न कुछ कहना चाहती हूँ। मुझे लगता है कि असल नम्रता वह है कि कुछ न रहे, परन्तु मैं तो न नकल ही हूँ, और न असली ही हूँ। मानों हर हालत की परिभाषा समाप्त हो गई है और हालत ही नहीं, हर परिभाषा ही समाप्त हो गई है। हालत में न मज़ा है, न बेमज़ा है।  अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं और केसर प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-567
लखीमपुर
26/5/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

दो पत्र डाल चुकी हूँ, मिले होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मुझे तो ऐसा लगता है कि हालत क्या है, बल्कि स्वयं अपने को मानों धोखा दे रही हूँ, कि हर दशा जो मैं लिखती हूँ, सो ‘है’ मानकर परन्तु असल में तो हर हाल नहीं है, या जब फिर देखती हूँ तो कुछ नहीं दीखता। Creative Power ही समाप्त, नष्ट हो गई है। न जाने क्या बात हो गई है कि न तो दशा में Activeness ही है और न InActive ही है, बल्कि ऐसा लगता है कि मानों इन दोनों शब्दों का अर्थ कुछ है ही नहीं और यही हाल दशा का है कि यदि दशा कहती हूँ तो और बेदशा कहूँ तो मानों ये शब्द जैसे स्वप्न में बर्रा रही होऊँ, कोई अर्थ ही नहीं लगता और हालत के लिये ही क्या, बल्कि मेरी तो हालत ही यही हो गई है, कि जिसका कुछ अर्थ नहीं रह गया है और अर्थ का भी तो कुछ अर्थ नहीं है और न व्यर्थ ही कुछ है। (मेरी तो यह दशा है कि हालत और मैं एक समान हूँ) और मैं ही क्या हर चीज़ मेरे लिये तो एक समान ही हो गई है और एक समान का भी कोई अर्थ नहीं रह गया है। अब तो बस हालत स्वयं ही है। अब जो कुछ भी हो। न वह व्यक्त है, न अव्यक्त है। न वह है और न वह नहीं है।

कल रात अचानक शायद 11-12 बजे, जब मैं सो गई थी, कि अचानक मुझे लगा कि ‘आप’ कह रहे हैं कि-कस्तूरी मुझे तुम्हारी बहुत याद आ रही है। तुम्हारी आत्मा मेरे हृदय में समा गई है और मैं बेचैन हूँ। बस इतने में चौंक कर उठ बैठी, तो देखा कि गालों पर कुछ आँसुओं की न जाने क्यों लकीरें सी बनी हैं, वरना जागते में तो आँसू कभी आते नहीं।

अम्मा ’आप’ को आशीर्वाद कहती हैं और केसर प्रणाम कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-568
लखीमपुर
4/6/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। यहां सब कुशल है। 'मालिक' की कृपा से जो आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो अब ऐसी गरीब हालत है कि मैं देखती हूँ कि मेरे पास तो अब अपने ‘मालिक’ के प्रेम का कोई सबूत ही नहीं है, फिर मैं भला उसे क्या दिखाऊँ या क्या सुनाऊँ। न सुनाने को कोई दासताँ है, न दिखाने को दिल है। मुझे बस भीतर-बाहर एक अजीब बिल्कुल शुद्ध Pure ही दशा कहती हूँ, फैली लगती है और कुछ यह दशा है कि मैं देखती हूँ कि जो मेरी बुराई भी करते हैं, वे भी मुझे ऐसी शुद्ध दशा में ही सराबोर महसूस होते हैं। सब कहते हैं कि ईश्वर जो करता है, भलाई के लिये करता है, परन्तु मेरी जाने क्या Innocent दशा है, या जाने क्या कि मुझे कुछ पता ही नहीं। यह भी पता नहीं कि वह कुछ करता भी या नहीं। उसे भी जाने कुछ पता है या नहीं। न जाने क्या बात है कि मैं अब तक यही कहती थी कि ‘मालिक’ की मर्ज़ी में ही मेरी मर्ज़ी है। जैसी ‘उसकी’ मर्ज़ी है, सो है परन्तु अब मैं नहीं जानती कि ‘उसकी’ कुछ मर्ज़ी भी है, या नहीं। न मेरी मर्जी, न किसी की, मानों कुछ मर्ज़ी ही नहीं रह गई है। सब Automatic चल रहा है, सो चल रहा है। मेरी तो कुछ ऐसी बेमज़े की दशा है कि जिसका मज़ा कहा नहीं जा सकता है। ऐसी बेकैफ़ी हालत है कि जिसमें बिना कैफ़ियत के कैफ़ियत का नज़ारा व मज़ा है। मैं चाहती हूँ कि कोई ‘बाबूजी’ न कहे, रेडियो या ग्रामोफोन भी नहीं। कस्तूरी तो बिना न्यौछावर (दाम) के न्यौछावर हो चुकी है। 

कल से तो यह दशा है कि ऐसा लगता है कि यह मेरा शरीर नहीं, बल्कि श्री बाबूजी की आत्मा ही साक्षात् मानों हो गई है। दशा क्या है, Imagination का Imagination भी उससे इतना भारी है कि जैसे एक जान और एक बेजान चीज़ है।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं। छोट भाई बहिनों को प्यार। 

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-569
लखीमपुर
24/6/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

बहुत दिनों से आप की तबियत का समाचार नहीं मिला है। इस कारण कुछ फिक्र है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो यह दशा है कि आँख बन्द करने पर भी मानो कभी बन्द नहीं होती और न कभी खुलती हैं। न जाने क्यों यद्यपि अपने ‘श्री बाबूजी’ के ख्याल के लिये मरती हूँ, चैन नहीं पाती हूँ, परन्तु हाल यह है कि उनके ख्याल का स्मरण आते ही तबियत घबरा जाती है। जैसे मान लेती हूँ कि अमुक भाई को जब पूजा कराऊँ, तो यह ख्याल करूँ कि मेरे ‘श्री बाबूजी’ के हृदय से ईश्वरीय-धारा अमुक भाई के हृदय में प्रवेश कर रही है, यह विचार भी सहन नहीं होता है। मेरी तो यह दशा है कि ठहराव का भी एहसास नहीं होता है और न जाने क्यों कभी चाल या चलने की अनुभूति वहीं होती है। मेरी तो बिल्कुल रूखी हालत है। मेरी हड्डी-हड्डी रूखी पड़ी है, मेरा स्वरूप, बातचीत, सब बिल्कुल रूखा हो गया है। यहां तक कि अपने ‘श्री बाबूजी’ से बातचीत करने में भी, मैं तो लगता है कि रूखी की रूखी ही रही। परन्तु इसमें भी मेरा वश नहीं। जैसी हूँ, वैसी ‘मालिक’ के सामने भी रह पाती हूँ। पहले मुझे याद है कि जैसे हरदम मैं एक बरसात सी में भींगती रहती थी, परन्तु या तो अब बरसात ही नहीं होती या मैं ही भींग नहीं पाती हूँ।

भाई, मेरी तो कुछ ऐसी दशा है कि बीमार रहूँ, दिन भर पड़ी रहती हूँ तो तैसी और अच्छी रहूँ और दिन भर काम करूँ तो तैसी, मुझे कोई बात महसूस नहीं होती है। किसी से बोलूँ, बात करूँ तो तैसी और दिन भर चुप पड़ी रहूँ तो भी कुछ नहीं। किसी भी हालत में कोई अंतर ही मुझमें नहीं आता है। पूजा पर बैठ जाती हूँ तो तैसी और बीमारी के कारण दिन भर न बैठूं तो तैसी। मुझे तो अब न Activity का पता है और न Inactivity कभी रहती है। मेरी तो यह दशा है कि मेरा कण-कण मानों सदैव सोता रहा है और सोता ही रहेगा। यही नहीं, बल्कि सारी प्रकृति मानों सो गई है। इतनीं चहल-पहल, शोरगुल में भी तो मानों सोई ही पड़ी रहती हूँ। चलते-फिरते आदमी मुझे सब सोये हुए सी दशा में लगते हैं।  छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-570
शाहजहाँपुर
26/6/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 25.6.56 का मिल गया। तुम्हारी सैरगाह का स्थान अब K1 है और उसकी सैर भी भीनी-भीनी शुरू हो गई है। इस वक्त इस स्थान पर मेरा ख्याल जो पहुँचा, उसे देखकर इतनी ताज़गी (Soothing) मिली कि चित्त प्रसन्न हो गया और अपने सूखे-साखे स्थान की ख़बर न रही। इस जगह का अगर वर्णन किया जाये तो बहुत कुछ Dawn से समानता मिलेगी। इसमें परमाणु बहुत सूक्ष्म हालत में है और माया की चमक और दमक बहुत ही कम है। वह कुछ ऐसा स्थान है, जहां सब कुछ सोया हुआ मालूम होता है। जैसे दुनिया छिन्न-भिन्न करके या अपना घर बिगाड़ के उसका मालिक आराम से सो रहा हो और उसे इस फ़िक्र से छुटकारा मिल गया हो। बस ऐसी ही हालतें तुम अपने पत्र में बयान कर रही हो। पूजा के वक्त यह ख्याल न बाँधना कि मैं प्राणाहुति दे रही हूँ यह लय-अवस्था की अच्छी दलील है। कण-कण सुन्न और सोता हुआ, जो तुम्हारी अनुभूति में आ रहा है, यह सब उस स्थान की सैर का परिणाम है। केसर का भी पत्र आया। वह भी एक अच्छी हालत की खबर दे रही है और मुझे उम्मीद है कि जो काम मैंने उसे Mission के बारे में दिया है, वह कर रही होगी।

तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ और अम्मा को प्रणाम।

तुम्हारे खत और मेरे जवाब जहाँ तक हो सकें, केसर उसकी नकल करती रहे, ताकि छप सकें।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-571
लखीमपुर
30/6/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आपका पत्र मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। मैं अब सेहत के लिये जरूर परिश्रम करूँगी। ‘आप’ चिन्ता न करें। मैं ठीक हूँ। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरा तो यह हाल है कि चाहे काम करूँ या लेटी रहूँ, दशा में कोई अन्तर नहीं आता। शारीरिक दशा में भी मुझे इसमें कोई अन्तर ही नहीं लगता है। न जाने क्या बात हो गई है कि ‘आपके’ अविरल Faith के कारण हर काम, हर चीज़ में एक अदम्य उत्साह भरा रहता था, परन्तु अब न जाने क्या हो गया है कि काम अब भी करती हूँ, परन्तु वह चीज़ नहीं आती, वरन् लगता है कि बड़ी शीतलतापूर्वक स्वत: ही काम होता रहता है। हाँ, अवश्य है कि निराशा या आशा भी उस समय या कभी भी अब कुछ नहीं रहती है। अब न तो मुझे चैन का एहसास होता है और न बेचैनी की ही अनुभूति होती है। अब तो कुछ ऐसी दशा है कि न वह व्यक्त है और न अव्यक्त ही है। कोई विचार भी रात-दिन टकराते नहीं, जो शायद कुछ होश आ जावे। परन्तु होश भी आवे कहाँ से, यदि कुछ गया होता, इतना तो आता भी, परन्तु जब कुछ गया नहीं तो फिर आवे कहाँ से। व्यक्त और अव्यक्त, वास्तव में मैं तो कहती हूँ कि Useless बातें हैं।

लगता है कि अंतर-बाहर अब मानों कभी कोई कुछ Work ही नहीं होता है। सारी प्रकृति में बस, सोई सी अवस्था में ही सब ओर व्याप्त है। अब तो ऐसी दशा है कि जहाँ पर न किसी के मन की गम्य है और न विचार की पहुँच है और अनुभूति के बन्धन से भी परे है। मेरे मन में तो ‘मालिक’ की शरण हूँ, इतना भी कहने व अनुभूति करने की क्षमता नहीं रह गई है।

अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-572
लखीमपुर
3/7/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र जो पूज्य मास्टर साहब जी के हाथों भेजा था, सो मिला होगा। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ ऐसी दशा है कि जैसे सब ओर रात्रि का नीरव सन्नाटा छाया हुआ है। सारे Senses में मानों रात का नीरव सन्नाटा छा गया है। दिल की धड़कन भी कभी सुनाई नहीं पड़ती। उसमें भी मानों मौत की खामोशी छा गई है। कुल शरीर की नस-नस में, कण कण में, बाहर-भीतर, सब ओर बस मानों रात्रि का सन्नाटा ही बस गया है। मानों बस, सब ओर रात्रि ही रात्रि बस गई और इस रात के सन्नाटे में एक तरह का मानों Complete Rest सा मुझे मिल रहा है। मेरी तो यह दशा है कि मानो हर समय मैं मुर्दा-आसन में ही पड़ी रहती हूँ, किन्तु बस मुझे आसन का होश नहीं है। मानों मेरा अंतर तथा बाहर-भीतर सब ओर मानों एक Everlasting Rest में फैला पड़ा है। मेरे हर कण-कण में मानों नीरव प्रलय ही व्याप्त हो गई है। अब तो कुछ ऐसी दशा रहती है कि मानों मुर्दा-आसन मेरा स्वरूप ही हो गया है। ऐसा लगता है कि वह रात्रि के सन्नाटे की दशा मानों मेरे कण-कण में, नस-नस में समाती चली जा रही है, यहाँ तक कि अब तो मानों मेरा स्वरूप ही वही हो गया है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आपकी ही चरण-सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-573
शाहजहाँपुर
6/7/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा 30.6.56 का पत्र मिल गया। तुम्हारे सैर करने की जगह जैसा पहले मैंने लिखा है, K1 है और वहीं की हालत बता रही है। यह स्थान ऐसा है कि जिसकी मिसाल एक जंगल या उजड़ी हुई बस्ती हो सकती है। इस स्थान में प्रकृति अपना बहुत कुछ आवरण उतार चुकती है और उसमें बोझ, वज़न, सब ख़त्म हो जाता है, मगर फिर भी सूक्ष्म रूप में वह मौजूद रहती है। जब यह भी जाती रहे, तब महाप्रलय की गति या Original हालत कही जा सकती है। अब इससे आगे इसी का रूप बिगड़ता चला जायेगा और उसके आवरण उतरते चलेंगे। यही वजह है कि सारी प्रकृति तुम्हें सोई हुई सी प्रतीत होती है। अब इन स्थानों को पार करना अभ्यासी के वश का रोग नहीं रहा। सिर्फ उसकी यात्रा का और असल में पहुँचने का चाव ही रास्ते में आगे क़दम रखने में मददगार होता है, और इसी चीज़ को देख कर Transmitter आगे बढ़ाता चला जाता है।

मैं कह सकता हूँ कि हजारों वर्ष ध्यान में रहे, मगर यह हो ही नहीं सकता कि बिना अच्छे पथ-प्रदर्शक की मदद के अभ्यासी आगे बढ़ सके। अपनी ही मेंहनत से काम अगर लिया जावे तो इस बात में Pressure बढ़ता चला जायेगा और एक गुत्थी सी बन जावेगी, जो आगे बढ़ने से रोकेगी। यह हमारे ‘लालाजी’ की ही दया और कृपा है और उन्हीं की शक्ति कि जो आगे बढ़ाती चली जा रही है, और किसी का बस नहीं।

तुम्हारी चाल में थकान नहीं आई है, बल्कि वह स्थान ही ऐसा है, जहाँ कि इतनी मन्द-मन्द सैर हो रही है, और धीरे-धीरे भी। अब अगर इसमें तेजी बढ़ा दी जावे तो, वह आवरण, जो प्रकृति ने उतार दिया है, फिर चढ़ने लगेगा। इसलिये जैसी गति उसकी, सूक्ष्म होती चली जाती है वैसे ही सूक्ष्म सैर उसकी कराई जाती है। फिर लिखता हूँ कि इन बातों की पूर्ति कराने वाले सिवाय हमारे ‘लालाजी’ के और कोई हो ही नहीं सकता है। यहीं पर Divine Intelligence का काम है।

अम्मा और चौबेजी को प्रणाम और तुम्हारे भाई बहिनों को आशीर्वाद !

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-574
लखीमपुर
6/7/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मैंने एक पत्र भेजा है, सो पहुँच गया होगा। ‘मालिक’ की कृपा से मेरी तबियत अब ठीक है। चिन्ता की कोई बात नहीं। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

न जाने क्या बात है कि मैं सोई हुई प्रकृति के उस पार ही सैर कर रही हूँ। नहीं, बल्कि लगता है कि प्रकृति भी मानों मुझे हज़्म होती जा रही है। मुझे तो ऐसा लगता है कि अब जो मेरी सैर होती है, वह मेरे Sub-Conscious Mind द्वारा स्वत: ही होती रहती है। उसमें भी अब मेरे मन या हाथ की बात नहीं रह गई है और मुझे लगता है कि मेरा Sub-Conscious Mind भी घुलता या मिटता अथवा लय होता चला जा रहा है। अब कुछ यह भी देखती हूँ कि मेरा Sub-Conscious Mind ही मानों कुल प्रकृति का वास्तविक स्वरूप है। इसलिये मेरी नज़रों से अब प्रकृति भी बिल्कुल ओझल सी ही होती जा रही है। मेरे लिये तो प्रकृति भी केवल एक मिटी हुई जीवन रेखा के समान है और अब तो देखती हूँ वह भी मिटती चली जाती है। मैं देखती हूँ कि ऐसी दशा में Sub-Conscious Mind ही अभ्यासी की रहनी का स्थान हो जाता है। यद्यपि मेरी तो यह दशा है कि मैं तो Sub-Conscious Mind में भी नहीं रहती हूँ। मैं तो न यहाँ हूँ, न वहाँ हूँ, न कहीं और। ऐसा लगता है कि कुल अँधेरा मेरे अन्दर समाया जा रहा है। मेरे हृदय में समाया जा रहा है।

अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहनों को प्यार। इति:-

सदैव आप की ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-575
शाहजहाँपुर
12/7/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारा बाबू श्यामबिहारी द्वारा मिला। तुमने जो हाल तीसरी जुलाई के खत में लिखी है, उसका जवाब मैं इससे पहले के ख़त में लिख चुका हूँ; जिसका जबाब तुमने अपने ख़त दिनांक 6th जुलाई सन् 56 में दिया है। तुमने जो Expression अपनी हालत का रात्रि की उपमा देते हुए लिखा है, वह K1 के स्थान का है। ईश्वर लोगों को क्यों नहीं मिलता? इसलिये कि लोग उसको चमक में ढूँढ़ते हैं। वह तो अँधेरे में ही टटोलने से मिल सकता है। दिन में कोई रात्रि को ढूँढ़े, तो उसको नहीं मिलेगी और इस हिसाब से यह भी सही हैं कि रात्रि में कोई दिन को ढूँढे, तो वह भी उसको नहीं मिलेगा अर्थात् ईश्वर को जिसने पा लिया, फिर चमक के सहारे का ध्यान उसके दिमाग़ में भी नहीं आ सकता। इसीलिये मैं तो तुम्हें अब अँधेरे में लिये जा रहा हूँ, जहाँ तुम खुद अपने आप को सुझाई नहीं देती और भाई, इससे आगे अँधेरा ही अँधेरा मिलेगा। यह जरूर होगा कि आगे बढ़कर उसको अँधेरा भी नहीं कह सकते और यहाँ पहुँच कर हम उजाले को भी अलविदा (Good-Bye) कह चुकते हैं। फिर आगे हमको अँधेरे को भी Good Bye कहना पड़ेगा। तब हम असल भण्डार में दाखिल हो सकेंगे। अब वहाँ क्या है ? न अँधेरा है, न उजाला, न रात और न दिन, मगर चल-चलाव अभी मौजूद है।

केसर का भी खत मिल गया। उसकी भी हालत ईश्वर की कृपा से अच्छी है। अम्मा व चौबे जी को प्रणाम और तम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक

रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-576
लखीमपुर
16/7/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का मिला। पढ़कर अत्यन्त हर्ष हुआ। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

न जाने क्या बात है कि इधर दिन भर में, बीच-बीच में अकस्मात् मेरी इतनी सूखी तबियत हो जाती है कि फिर बाहर-भीतर मुझे बस इतना सूखापन व्याप्त हो जाता है कि फिर मैं लाचार फिरा करती हूँ। अब तो यह दशा है कि मुझे तो अपनी Reality का ही कुछ पता नहीं और अपनी ही क्या, हर आदमी व हर चीज़ के लिये ही मेरी यही दशा है। मानों कुछ भी है ही नहीं। Reality ही समाप्त हो गई। अब कुछ पता ही नहीं, क्या है, कहाँ जा रही हूँ, कुछ पता नहीं है। अब तो यह दशा है, हर तत्त्व, हर अणु-अणु ही गलकर समाप्त हो गया है। भाई, मेरा तो यह हाल हो गया है कि लोग ‘मुझ चींटी’ को चाहे मसल डालें, परन्तु मैं वह बर्र नहीं हूँ जो काट खाऊँ। न जाने क्यों हर आदमी व हर चीज़ मुझे एक सी ही अनुभव होती है, या यह कहिये, बस एक हालत ही नज़र आती है, नहीं, बल्कि उस हालत की हालत ही मेरा स्वरूप हो गया है।

आज न जाने क्यों मानों एक सूक्ष्म Covering या एक मेरे अनजानता Covering आँखों के सामने से एकदम साफ़ हो गया। उसके बाद अब यह हाल है कि अब ऐसी दशा बाहर-भीतर है कि मानों जिसमें कभी कोई दाग़ ही न लगा हो, सफ़ेदी भी न रही हो एक बेरंग हालत ही व्याप्त है और वही मेरा स्वरूप है। और मेरा स्वरूप क्या, बेस्वरुप का स्वरूप और बेरंग का रंग मान लिया है। अब तो न कुछ असलियत है, न नकलियत का ही कुछ पता है। अब तो न कोई तार है, न कोई खटक है। हाँ, Heart पर अपने आप अक्सर कुछ Vibration सा होने लगता है। परन्तु मैं नहीं कह सकती हूँ कि मेरी जानकारी उससे हो पाती है या नहीं। न जाने क्या रास्ता है भाई, सच तो यह है कि न अब राह में राह है, न राही में राही है, और न रहबर ही कहीं है।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-577
लखीमपुर
23/7/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा पत्र पहुँचा होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो न जाने क्या रास्ता है भाई, सच तो यह है कि न राह है, न राही है, और न रहबर ही कोई हैं। एक चटियल मैदान पड़ा है, मानों खुद मौत ही सोई हुई है। अब तो यह दशा है कि मैं खुद अपने को ही कभी जगा नहीं पाती हूँ। यदि कहती हूँ कि मौत हो गई तो मौत कैसी कहूँ, जहाँ जन्म की तैयारियाँ ही नहीं हैं। मेरी तो अब यह दशा है कि जहाँ ज्ञान और अज्ञान, दोनों ही समान हैं, व्यर्थ है, कुछ अर्थ ही नहीं रह गया है। अनुभव का भी कुछ अर्थ अब मेरी समझ में नहीं आ पाता है। दशा के लिये तो न जाने क्यों, न तो मैं Purity, न Simplicity ही कह सकती हूँ, बल्कि मुझे तो लगता है कि जैसे इनका Origin ही समाप्त हो गया है। न जीवन है, न मुक्ति है। यह दशा है कि मानों आंखे मुँद गई हैं या आँखे मूँद कर चल रही हूँ। मानों Rest भी यहाँ अब Rest करने लगा है। अब तो Conscious है, न Potentiality है। मेरी तो यह दशा है कि न कोई तत्त्व है और न Reality है। अब तो लगता है कि एक अधर सा मैदान मेरे अंतर में समा गया है। मुझे तो न अब Activeness है और न InActiveness ही रह गई है, दोनों बिला या समा लय हो गये हैं। कहाँ ? यह पता नहीं। कब ? यह भी मालूम नहीं है।

अब यहाँ विराट कहाँ। यहाँ तो सूक्ष्म रूप का भी पता नहीं है। जीवन मुक्त अवस्था की भी समाप्ति हो गई। सच तो यह है कि Expression नहीं। तुरिया अवस्था कहती हूँ तो स्वयं को ही लगता है कि मानों बेकार बक रही हूँ। अब तो यह दशा देख रही हूँ कि रंग (प्रेम का रंग ) की भी छींट को कोई मानों पहले ही अपने ऊपर ले लेता है। मुझे पता नहीं क्यों उससे भी बचाये रखता है और बचाने वाला अपनी शक्ल को भी न जाने क्यों मुझसे बचाये रखता है। तरस गई हूँ, परन्तु ‘वह’ अपने को मानों साथ रखते भी ओझल रखता है। मुझमें तो अब न इतनी ताब है, न अक्ल है, कि मेरी उन्नति हो रही है या नहीं होगी या नहीं, कुछ विचार ही नहीं रह गया है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति :- 

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-578
शाहजहाँपुर
28/7/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे दो पत्र दिनांक 16.7.56 व 23.7.56 के मिल गये। Existence of God तो साबित करने की चीज़ नहीं है, बल्कि अनुभव करने की चीज़ है और शब्दों से अभी तक साबित नहीं हो सकी। जो चीज़ उसके देखने की है, उसी से वह अनुभव में आ सकता है और देखा जा सकता है।

यह तो ठीक है कि तुम्हारे सैर और यात्रा का स्थान K1 है और उसके करीब करीब 1/3 सैर समाप्त हो चुकी है और वहां पर तुम रुक गई हो। इसलिए कि तुम्हारे चलने का अब बस नहीं रहा। क़दम-क़दम पर अब एड़ लगाने की जरूरत है। मैं कुछ इन दिनों दूसरी ओर Attentive रहा हूँ। कुछ उलझनें भी ऐसी आ गई हैं, जो अगर ईश्वर ने सुलझा दी तो नवम्बर में South India जा सकूँगा। इसलिये तुम्हारी ओर मैं ध्यान नहीं दे सका। अब सैर फिर शुरू होगी, ईश्वर ने चाहा और ख़त पहुँचते-पहुँचते इस चीज़ की तुम्हें अनुभूति होने लगेगी। तुमने जो दो पत्र भेजे हैं, उसमें इसीलिये कोई बात ऐसी न मिली कि जिसका जबाब दिया जा सके। दूसरे एक बात यह भी है कि ऐसी सूक्ष्म गतियों का जबाब देना भी अब बड़ा मुश्किल है। इसलिये कि शब्द मुश्किल से मिलते हैं और अब उन बातों के कारण लिखना उससे भी ज़्यादा कठिन है। फिर भी मैं कोशिश कर कराकर चाहता तो यही हूँ कि कुछ न कुछ जवाब हो जावे।

काशीराम जी का ख़त आया था। वह पत्रिका निकालने की जल्दी कर रहे हैं। अब उन्होंने 24 सफ़े हिन्दी के लिये और 8 सफ़े अँग्रेजी के लिये रखे हैं। तुम अपने लेख भेजती चलो। सालाना चन्दा इसका तीन रूपया है। मैं चाहता हूँ कि कुछ मैं भी लिखूँ, मगर मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। नहीं मालूम कि मेरा दिमाग़ बूढ़ा तो नहीं हो गया? वैसे तो जब ईश्वर की कृपा होती है, तो मज़मून खुद-ब-खुद उतरता है, और मेरी कोशिश से कुछ नहीं होता।

तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ। चौबेजी व अम्मा को प्रणाम। केसर का खत मिल गया। उसकी हालत अच्छी चल रही है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-579
लखीमपुर
25/7/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कल पूज्य मास्टर साहब जी आ गये। उनसे समाचार तथा आप की तबियत का हाल जानकर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, न जाने क्या, मेरा तो यह हाल है कि मुझे लगता है कि मानों सब कुछ Powerless है। भीतर-बाहर सब कुछ Powerless है। यहाँ तक कि ..., परन्तु मैं तो यह देख रही हूँ कि Power का तो कुछ अस्तित्व ही नहीं है, या भाई, मुझे ही कुछ हो गया है। कुल प्रकृति, सब मुझे Powerless ही दीख रही है। Existence नाम की तो मानों कोई चीज़ ही नहीं है। सब मानों कल्पित था। पता नहीं क्या है। मुझे अब कुछ नहीं मालूम है। यहाँ तक कि मुझे अपने शरीर तक में न तो Power का एहसास होता है, न Weakness का ही और ऐसा ही हाल सबके लिये ही हो गया है। न कोई शक्ति का केन्द्र ही नज़र आता है, जिसमें Power हो। बस ‘मालिक’ के चरणों से जरूर लिपटी हूँ। हालाँकि शक्ति का अन्दाज़ कहीं भी नहीं होता या भाई, मेरा ही यह कोई हाल बेहाल हो गया है। Powerless से मतलब किसी असहायावस्था से, Helpless से बिल्कुल भी नहीं है।

भाई, न जाने क्या बात है, कि अमीरी का निशान नहीं, आशा नहीं और ग़रीबी का भी कभी अंदाज़ नहीं हो पाता है। अमीरी-गरीबी मेरे लिये सब कुछ Powerless है, समान है। अब तो हालत का न सबेरा होता है, न शाम। कुछ है एक सहज-चेतना या क्या है, वह भी सवेरे शाम में तो शामिल नहीं है, जिससे अपनी दशा का बोध होता रहता है। यद्यपि ज्ञान या अज्ञान मेरे लिये तो सब समान हैं, सब Powerless है। भाई, पहले मैं लिखा करती थी कि मेरे अन्तर में सदैव जाने और अनजाने में भी एक स्थाई आनन्द बना रहता था और मुझे अपने अंतर से एक आत्मिक प्रकाश, जिससे कुल शरीर तक भीतर-बाहर, सबमें एक पावन प्रकाश की सी अनुभूति रहती थी, परन्तु अब तो यह है कि भीतर-बाहर, शरीर, आत्मा, मुझे तो अब कभी कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता है। सब कुछ मिलकर एक हो गया है, जिसे अब अंधेरा भी नहीं कहा जाता है, और प्रकाश तो बहुत ही भारी चीज़ है।

अब तो न जाने मुझे क्या हो गया है कि अपने को मान कर काम करती हूँ, तो भी Existence का कभी गुमान तक नहीं आ पाता है। जान भी निकली नहीं कही जा सकती है और बेजान भी नहीं हूँ। मेरे लिये तो दोनों ही समान हैं। अब तो आनन्द या बेआनन्द कह लें, मेरे लिये दोनों एक समान ही हैं। सब कुछ Powerless है। सब कुछ एक हो गया है।

मुझे तो अब लगता है कि जैसे सब कुछ कल्पित ही था और वास्तव में तो वह है, जो अब है या पता नहीं, जो ‘मालिक’ देगा किन्तु है क्या, यह कुछ पता नहीं और कुछ बेपता भी नहीं है। मानों कोई तत्त्व ही नहीं है। सब कुछ Powerless है। किसी की कोई Existence ही नहीं है। पहले मुझे लगता था कि कोई चीज़ मानों ताक़त देती है, परन्तु अब मैं कुछ नहीं कहती। अब तो Existence की Existence ही समाप्त हो गई। सब कुछ एक हो गया है। जाने भाई, क्या है। मैं लिखा करती थी कि कोई चीज़ मुझे अपनी ओर खींचे रहती है, परन्तु अब तो कुछ नहीं है।

मैंने दशा लिखी है, परन्तु मुझे अपने मन का शब्द नहीं मिला जिससे उसे व्यक्त करूँ। मुझे इधर न जाने क्यों ऐसा लगता है कि मेरे सिर (Mind) के भीतर का बहुत सूक्ष्म सा पर्दा कोई फाड़ दे तो मानों मैं कहीं उड़ जाऊँ। जहाँ चोटी ख़त्म होती है, वहाँ कुछ होता है। मैं उसे कह नहीं पाती हूँ।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आप की ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-580
शाहजहाँपुर
30/7/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

इससे पहले जो पत्र आये, उनका जबाब इसी लिफाफे में रख दिया है। अब 25 जुलाई का जो पत्र आ गया, उसका उत्तर भी इस पत्र में दे रहा हूँ। मैंने पिछले पत्र में लिखा है कि तुम्हारी चाल ठहरी हुई थी और K1 की 1/3 सैर करने के बाद रूकी है। अब आज से फिर उसमें जागृति पैदा होने लगी है। खत पहुँचने तक जैसा कि मैंने लिखा है, ईश्वर ने चाहा, सैर शुरू हो जावेगी। जितनी चाभी भर देता हूँ, उतनी ही तुम चल लेती हो और इसमें तुम्हारी ख़ता नहीं। बहुत ऊँचे स्थानों में बिना Push दिये कोई नहीं चल पाता। इस मेरे कहने का विश्वास उसी को हो सकता है, जिसको ऐसी सूक्ष्म गतियां प्राप्त हो रही हैं। इक्का-दुक्का Saint ऐसे भी हुए हैं कि जिन्होंने अपनी हालत ईश्वर से Direct प्रेम पैदा करके कर ली है और यह प्रेम भी बहुत अच्छा है, अगर कोई ऐसा कर सके। किन्तु ये Circles जो Egoism के हैं, उनको पार अपनी ज़िन्दगी में सिवाय “लालाजी” के कोई न कर सका। मैंने जहाँ तक इसकी खोज की है, इतनी ऊँची उड़ान अगले-पिछले महात्माओं में कहीं नहीं मिली। मेरा ख्याल भी है कि इसमें अपनी मेंहनत से सफ़ल होना भी कठिन है, इसलिये कि जब अहंकार रहित होने की, जितना सम्भव है, अगर बिना गुरू के कोशिश की जावेगी, तो जिस्म नहीं रह सकता। इसलिये तरकीब यह है कि उसको थोड़ा सा अन्दर दबा देना चाहिये। इस तरह पर, कि न उसकी अभ्यासी को कभी ख़बर हो सके और न आँखों वाला भी जान सके। इस तरह पर, कि जैसे कुर्सी की गद्दी के नीचे धूल पड़ी होती है तो बैठने वालों को कभी पता नहीं चलता। जिस्म के क़ायम रखने के लिये कुछ न कुछ यह हालत रखना ज़रूरी है और सच तो यह है कि Egoism का बिल्कुल ख़ात्मा, जैसा कि मैंने Efficacy of Rajyog में लिखा है, महाप्रलय के वक्त ही होता है, जो सब मिल-मिलाकर एक Identity की शक्ल में हो जाता है, जिसमें संसार की उत्पत्ति फिर शुरू होती है। बस समझ लो कि अभ्यासी के शरीर में जब वह Egoism के Circles पार करता है, अहंकार की शक्ल Identity की कर दी जाती है।

अब मैं तुम्हारे ख़त पर आता हूँ। तुम्हें अस्तित्त्व ग़ायब मालूम होता है। यह लय-अवस्था की एक बहुत ऊँची हालत है। मगर यह हालत ऐसी स्थायी होनी चाहिये कि अभ्यासी कितना ही ख्याल करे, तो भी इसका Impression दिल में न बने। तुम्हारी यह अनुभूति का समाप्त होना कि प्रकृति को कोई चीज़ मानों ताक़त देती है, व्यक्त करती है कि Consciousness समाप्त होना चाहती है, मगर अभी उसकी झीनी हालत मौजूद है या यों कहो कि Consciousness की सूक्ष्म गति अभी मौजूद हैं। यह भी ईश्वर ने चाहा, अपने से आगे बढ़ने की खुशखबरी देगी। संसार की दौड़-धूप सिर्फ Pure Consciousness तक है, और इसी को वह ईश्वर-प्राप्ति समझ रहे हैं, मगर कोई मुझसे पूछें तो वास्तव में यहाँ तक पहुँचे हुए को अभी असल मैदान ही नहीं मिला। अगर मैं किसी से कहूँ तो यही कहेगा कि अपनी बड़ाई दिखाने के लिये एक नई चीज़ गढ़ ली है, और वह अपने विचार में जैसा कि उन्हें वातावरण मिला है, सही भी, अपनी जगह पर हो सकते हैं और फिर यह भी बात है कि बड़े-बड़े महात्माओं के सामने जो बड़ी-बड़ी पूजायें बताते हैं, मुझ ज़ाहिल को सुनने भी कौन लगा।

तुमने लिखा है कि तुम्हारे सिर के स्थान पर अगर कोई पर्दा फाड़ दे तो मैं कहीं पहुँच जाऊं। यह एहसास तुम्हारा सही है। मगर जहाँ चोटी रखी जाती है, उसको ब्रम्ह रन्ध्र का स्थान कहते हैं। यहाँ पर Direct Revelation होता है। यह स्थान अभी दूर है। सम्भव है कि इसके बीच में बहुत से Points हों। हालाँकि जिस स्थान पर हो, वहाँ पर नापने से फासला निहायत ही थोड़ा मिलेगा, मगर फासले पर नहीं जाना चाहिये। हर स्थान खुद एक ईश्वर का बड़ा Sphere है और इन स्थानों को अगर नापा जावे तो ऐसे संसार जिसमें कि हम रहते हैं, हज़ारों समा जावेंगे।

केसर का जो 16 जुलाई का खत आया है, उसमें उसने लिखा है कि रोशनी होते हुए भी अँधेरा प्रतीत होता है। इसके मतलब यह है कि उसकी त्रिकुटी की सैर हो रही है, जिसको सूफ़ी लोग सैर नफ़स कहते हैं।

तुम जो आसाम में छपने के लिये मज़मून भेजो, उसमें हमारी तारीफ़ नहीं होनी चाहिये, वरना यह Advertisement समझा जावेगा। बल्कि तत्त्व की बात होनी चाहिये। हमारी किताबों का Reference आने में कोई हर्ज नहीं और ‘लाला’ जी का नाम आ जाना तो बहुत अच्छा है, मगर Advertisement उसमें ज़ाहिर न हो, बल्कि वह असल बात जो उन्होंने कही या लिखी है, या उन्होंने Philosophy बयान की है, वह भी आ सकता है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-581
लखीमपुर
2/8/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, न जाने क्या बात है कि ऐसा लगता है कि मेरी तबियत खुद अपनी तबियत के पास नहीं पहुँच पाती है, उससे घुल नहीं पाती है। दूसरे अब मुझे न जाने क्या हो गया है कि हर आदमी मुझे अपने ( सगे ) की तरह प्यारा लगता था, परन्तु अब तो मुझमें Universal Love नहीं रह गया है। अब तो मेरा कोई सगा है, न प्यारा है और मुझमें किसी से प्यार नहीं है। मुझे लगता है कि Universal Love की मानों कोई Existence ही नहीं है, कोई तत्त्व ही नहीं है, सब कुछ खाली हो गया है। अपने जीवन सर्वस्व ‘मालिक’ तक से मुझे किंचित मात्र भी प्रेम नहीं रह गया है। यह सब मुझे न जाने क्या हो गया है।

स्थिरता अब कभी होती नहीं और अस्थिरता भी कभी होती नहीं। मेरे लिये न जाने क्या दोनों एक समान ही हो गये हैं। यद्यपि ‘श्री बाबूजी’ को बुलाती जरूर हूँ, परन्तु कभी भी यह ध्यान नहीं आता कि किसे बुला रही हूँ, क्यों बुला रही हूँ। देखती हूँ कि कोई रंग या रूप आंखों के सामने कभी नहीं आता। दिन भर आंखें देखती हैं, परन्तु सब कुछ एक समान ही हो गया है। वैसे यह न जाने क्या है कि यदि मानों कोई हरी चादर माँगता है, तो मैं देती हूँ और वह ठीक ही निकलती है, परन्तु Mind पर हरे, नीले, पीले किसी का कोई Expression नहीं। यदि कोई केसर को बुलाता है, तो मैं केसर को ही भेजती हूँ, बिट्टो को नहीं। परन्तु Mind पर देखती हूँ कि बिट्टो का कोई रूप है, न कोई केसर ही है। भाई, यह सब क्या है? कैसे होता है? मेरी कुछ समझ में नहीं आता। न जाने सब कुछ Powerless हो गया है। रात में घंटो आँखें बन्द किये पड़ी रहती हूँ, परन्तु आँख बन्द करने पर अँधेरा नहीं प्रतीत होता और आँख खोलने पर भी उजेला नहीं हो जाता है। कहने को एक मरी हुई Condition रहती है, इतना ही कह लीजिये। भाई, मैं तो जितना प्रेम ‘मालिक’ से चाहिये, उतना नहीं कर पाती हूँ। परन्तु कसक भी अब कसक में मिल गई है। मेरे लिये तो कसक और बेकसक दोनों एक समान ही है। मेरी हालत में अब कभी जोर नहीं आता है और न हल्की ही का कुछ Mind पर Expression है, सब कुछ खाली हो गया है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः- 

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-582
लखीमपुर
8/8/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। ईश्वर की कृपा से अब आप की तबियत ठीक होगी। ‘मालिक’ से सदा यही प्रार्थना है कि आप हमेंशा स्वस्थ रहें। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

न जाने क्यों आज मेरे अंतस में आनन्द का ठिकाना नहीं है। आज लगता है कि ‘आप’ मुझे मिल गये। मैं एक हो गई हूँ। आनन्द है और साथ में बिल्कुल Balanced State है और आनन्द भी ऐसा है कि न जाने क्यों मुझे यह भी अनुभूति नहीं होती कि आनन्द मुझे है या कहाँ है या ‘श्री बाबूजी’ पुलकित हो रहे हैं। लगता है कि Sub-Conscious Mind एकाकार हो गया, ‘बाबूजी’ में समा गया। आनन्द है, परन्तु उसमें कोई Power मानों नहीं है, Powerless है।

भाई, मेरी तो यह दशा है कि लगता है कि मानों मैं तो एकता और दुई, दोनों से अलहदा हो गई हूँ। पहले मुझे लगता था कि जो एकता की दशा के अनुभव करने में मुझे कुछ घबराहट सी होने लगती थी, परन्तु अब तो न जाने क्यों चाहे कितनी कोशिश करो, एकता कभी आभास होती ही नहीं जैसे चिकने घड़े पर एक सेकेण्ड को भी बूँद नहीं ठहरती चाहे कोई लाख प्रयत्न करे, वही हाल मेरा है, कि अब मानों कोई दशा मेरे लिये आती नहीं। मेरा तो यह हाल है कि मुर्दा कह लीजिये या जिन्दा, जो ‘आप’ कह देंगे, वही हूँ। मुझे लगता है कि मेरी दशा को खालिस नम्रता की दशा कहना ही ठीक लगता है कि जिसमें एक बिल्कुल ही क्या, खाली सी दशा है। अब तो यह दशा है कि मुर्दे को चाहे कपड़े पहनाओ या नंगा पड़ा रहने दो। अब तो सब से जुदा हो गई हूँ। आनन्द मैं कहती हूँ और भला ‘मालिक’ में ओत-प्रोत हो जायें, इससे बढ़कर आनन्द की बात ही क्या हो सकती है, परन्तु अब तो मेरी तबियत ने तबियत को ही छोड़ दिया है न विचार ही तबियत को पकड़कर तबियत में जोड़ सकते हैं। वह तो दूर न जाने कहाँ चली गई।

कहाँ तो भाई, मैं सब में एक थी, लगता था कि बिल्कुल जड़-चेतन तक में मेरी एकता थी, परन्तु मैं तो अब निर्मोहिन हो गई हूँ। सच ही सबसे जुदा हो गई हूँ। मुझे न किसी से प्रेम है, न योग है। अब तो मैं भोगी भी नहीं, क्योंकि मेरी स्थिरता या अटलता भी लुप्त हो गई है। लगता है, मैं, मैं ही हो गई हूँ। परन्तु यह फ़िक्र मुझे जरूर है कि आखिर मैं हूँ क्या ? क्योंकि कोई स्वरूप नहीं मिलता, कोई अन्दाज़ नहीं मिलता। न यही लगता है कि ‘मालिक’ में ही लय हो गई हूँ, बस मैं, मैं हो गई हूँ। अब मेरे ‘बाबूजी’ कहाँ गये ? क्या अब ‘आप’ मेरे सर्वस्व हैं? असल में दशा तो कुछ ऐसी है कि केवल खालिस नम्रता ही कह लीजिये कि जो एक बिल्कुल दीन या खाली दशा है।

भाई, मेरी तो यह दशा है कि अब मनोरंजन नाम की तो मेरे लिये कोई चीज़ ही नहीं रह गई है। स्वयं अपनी दशा में भी मनोरंजन नहीं, वरन् एक शून्य हालत है। ऐसी अकेली अवस्था या स्थान है कि जहाँ से मानों दूसरा कभी गुज़रा नहीं और जहाँ ईश्वरीय चमत्कार की गुज़र नहीं। भाई, यद्यपि मेरे बाहर-भीतर, कण-कण में ‘मालिक’ का ही प्रकाश व्याप्त है, परन्तु न जाने क्यों, ‘आप’ ने अपना मधुर स्वरुप मुझसे चुरा लिया है, जो मुझे कहीं दिखाई नहीं पड़ता है।

मैंने पहले लिखा था कि सिर का पर्दा फट जावे तो कहीं उड़ जाऊँ और मुझे यह भी लगता है कि तब मानों दशा में पूर्ण रूप से घुसकर अनुभव कर पाऊँ। वैसे ‘मालिक’ की कृपा से दशा तो इतनी साफ़ सामने या अनुभव में आती है, परन्तु यह पर्दा मानों उसमें पूरी तौर से मुझे रमने नहीं देता है। दाहिने हाथ के अँगूठे के ऊपर जैसे हाथ सीधा करें तो जहाँ नब्ज़ होती है ठीक उसके ऊपर कलाई से लेकर अँगूठे तक इतनी तेज़ रेंगन होती है, कि मानों कोई जानवर चल रहा हो और बिल्कुल ऐसे ही दाँये पैर में उसी जगह पर होती है। कभी भौंहों के ऊपर बाईं ओर होता है। लगता है कि मानों बिल्कुल उदासीन दशा सी रहती है। बिल्कुल Pin Drop Silence ही मानों स्वरूप ही हो गया है।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं और केसर आपको प्रणाम कहती है। छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-583
लखीमपुर
16/8/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा पत्र मिल गया होगा। कल परम पूज्य मास्टर साहबजी आपके पास पहुँच रहे हैं। उनसे मिलने पर, यहाँ की याद एक बार पुनः आप को ताज़ी हो जायेगी। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

न जाने क्या दशा है कि आप यहाँ आये हुए थे, किन्तु मुझे इसका स्मरण ही नहीं था। बार-बार भूल जाती थी। यदि कोई चलने की बात न चलाये, तो मुझे ख्याल ही नहीं आता कि ‘श्री बाबूजी’ के पास चलना है। तबियत में ‘श्री बाबूजी’ की रटना मौजूद है, परन्तु न जाने क्यों ‘उनकी’ याद नहीं आती। न रूप, न रंग, न आवाज़, कुछ भी याद नहीं पड़ता है। न तबियत भरी ही लगती है, किन्तु उसमें अब चाह भी नहीं लगती। मैं तो यह देखती हूँ कि ‘श्री बाबूजी’ से बातें करती हुई मैं उन्हें भूली रहती हूँ। अब तो यह दशा है कि तबियत ‘बाबूजी’, ‘बाबूजी’ करती हुई खो जाती है, परन्तु मुझे उनकी याद नहीं आती। उनका स्वरूप नहीं याद आता है बल्कि मुझे अब यह प्रतीत ही नहीं होता कि कभी आप यहाँ आये हुए थे या नहीं।

भाई न जाने क्यों मेरी तो यह दशा हो गई है कि सुख-दुख की भी यही दशा है कि यह कहते किसे हैं, कुछ पता नहीं। रो लेती हूँ परन्तु Cause उसका कभी मानों पता ही नहीं रहता है। हँसती हूँ, परन्तु Cause का कभी पता नहीं रहता है। सच तो यह है, कि न कभी रोती हूँ, न कभी हँसती हूँ। तबियत बिल्कुल उदासीन सी रहती है। पूजा का तो मानों अभी बीज ही नहीं पड़ा है। न जाने क्या बात है कि जब तक ‘आपके’ सामने रहती हूँ तब तक तो ठीक रहती हूँ, परन्तु आप के सामने से हटते-हटते हृदय पर कुछ Tight सा बोझ सा हो जाता है, किन्तु हालत पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। हालत इतनी उजाड़ या बियावान सूखी सी रहती है कि कुछ कहना नहीं और अब मैं देखती हूँ, यह तो स्थाई हो गई है। यही मेरा स्वरूप बन गया है। कभी-कभी तबियत स्वत: बहुत रूखी-रूखी सी ही रहने लगती है या कुछ अजीब उचाटपन है, नई तरह का। मुझे लगता है कि सूखापन तो मानों मेरा स्वभाव ही बन गया है। बात घर में या बाहर, सबसे करती हूँ, परन्तु तबियत सूखी की सूखी ही बनी रहती है। पूजा की ही बातें करती हूँ, पूजा करती हूँ, या करवाती हूँ, परन्तु तबियत में कोई अंतर नहीं पड़ता है। वह तो ज्यों की त्यों, न सावन सूखी, न भादों हरी ही बनी रहती है। पता नहीं कुछ मेरे में कमी तो नहीं आ गई है।

मेरा अब यह हाल है कि जहाँ भी मेरी दशा है, वहां से भी तो अब मुझे कुछ अपना हाल नहीं मिलता है। मेरा तो अब कहीं कोई ठिकाना ही नहीं है। कुछ न पता है, न बेपता है। न कुछ छुपा है न कुछ रौशन है। अब तो यह दशा है कि मैं ही नहीं, वरन् मानों सब कुछ बेहस्ती के, बेघर-बार के फिर रहे हैं। मुझे तो यह लगता है कि हर आदमी मुझे हर बात में अपने से अच्छा, ऊँचा या शक्तिमान लगता है। मेरी दशा तो मानों एक बिल्कुल लाचार हो गई है। न दृढ़ता ही रह गई है और न जाने क्यों पहले तो निगाह दुनिया के, अच्छा-बुरा हो जाने पर कभी निगाह ही नहीं जाती थी, परन्तु भाई, अब सदैव तो नहीं, किन्तु चली जाती है। ऐसा न जाने क्यों है।

मेरी तो न जाने क्या दशा हो रही है कि अब दुनिया से बेलौस नहीं, वरन् मानों ‘मालिक’ से बेलौस हो गई हूँ। किन्तु फिर भी न फ़िक्र है, न कुछ तमन्ना है और ‘मालिक’ से बेलौसी मानों मेरा स्वभाव ही हो गया है। दुनिया की फ़िक्र ज़रूर कुछ रहती है, क्योंकि मैंने देखा है कि अब अन्य घर में किसी की भी बीमारी से मुझे फ़िक्र हो जाती है, जो पहले ज़रा भी नहीं होती थी। घबरा भी जल्दी उठती हूँ।

लगता है कि K1 की सैर ख़त्म हो चुकी। मुझे लगता है कि मानों ‘मालिक’ की Current कभी अब मुझमें Pass हीं नहीं होती। शायद अब मैं Negative ही नहीं हो पाती हूँ। अब मुझमें कुछ करने की हस्ती भी तो नहीं रही। मुझमें अब कुब्बत ही नहीं है, लेकिन हीनता भी नहीं है न दीनता ही है। एक खाली अवस्था ही मेरा स्वरूप हो गया है। जीभ का यह हाल है कि खट्टा, मीठा, चटपटा, कुछ खा लो, सब एक समान ही है। कहती हूँ कि दाँत खट्टे हो गये, परन्तु कैसा या क्या,यह पता कुछ नहीं रहता है। ता. 14 को तबियत अचानक उदास सी हो गई, यद्यपि दशा तो साफ़ ही रहती है और ता. 15 को स्वत: सँभल गई। अब तो हालत इतनी निर्मल सी रहती है, मानों कोई पर्दा ही हट गया और अब निर्मल एक विनम्र दशा ही क्या, बल्कि स्वभावत: ही कुछ ऐसा बन गया। अब वह बात न रही कि :- 

दिल में है दिल का प्यारा, मगर मिलता नहीं।
आँख में है आँख का तारा, मगर मिलता नहीं॥

अब तो दशा व दृश्य बदला हुआ है। सिर पर न जाने क्यों अब पर्दा नहीं है, जो मैंने ‘आपको’ लिखा था, वरन् एक कोमल सी हथेली रखी हुई है, जिसके रखे रहने पर भी बोझ नहीं, बस कोमलता सी सिर में रहती है और इससे चाहे कितना काम करो, दिमाग में थकान का नाम नहीं आता है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-584
लखीमपुर
22/8/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

बहुत दिनों से ‘आपका’ कोई पत्र नहीं मिला। फ़िक्र हो गई है। कृपया अपना समाचार शीघ्र भेजिये। आशा है, ‘आप’ स्वस्थ होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ। 

अब तो भाई, बिल्कुल सपाट दशा है। भीतर-बाहर सब एक सपाट मैदान हो गया है। अब तो दशा न उजाड़ है, न बियाबान कहती हूँ। बस एक ऊसर सपाट मैदान ही हो गया है। सैर-वैर अब तो सब समाप्त है।

भाई, मेरी तो न जाने क्या दशा हो गयी है कि शारीरिक शक्ति व मानसिक शक्ति एक हो गई है। मानसिक शक्ति मुझमें इतनी प्रबल थी, परन्तु पता नहीं अब सब क्या हो गया। अब तो यह कह लीजिये कि शरीर व मन एक हो गया है, क्योंकि बिना किसी इच्छा व ज़रूरत के शरीर ही दिनभर Work करता रहता है। मन कुछ नहीं कहता, न करता है। मेरी तो यह दशा है कि मैं कैसे पाऊँ प्रभु को, जब मेरा मन ही नहीं करता है। शायद मन है नहीं, इसलिये मन में मन के प्यारे को लाना चाहती हूँ, परन्तु वह आता नहीं। न जाने क्यों रूठ गया है। तड़पती हूँ, परन्तु एक क्षण को भी सामने नहीं होता है। कुछ भी मुझे ‘उसके’ बगैर भाता नहीं। सब कुछ सूना हो गया ‘उसके’ बिना। रात भर कभी सोती नहीं उसके बिना न कभी जागती हूँ ‘उसके’ बिना। परन्तु ‘वह’ सामने भूले से कभी नहीं आता।

मेरी समझ इतनी तेज़ थी, परन्तु बिना ‘उसके’ अब समझ भी मुझे छोड़ गई और नासमझी ने भी पल्ला छोड़ दिया। मैं तो अब अकेली सूनेपन के बीच निपट अकेली अँधेरे में खड़ी हूँ। सच तो यह है कि मुझे ‘उससे’ प्रेम भी तो नहीं है। दिमाग़ में दिन भर व्यर्थ के विचार टकराया करते हैं, परन्तु ‘मालिक’ का ख्याल कभी नहीं आता है। ‘मालिक’ मुझे अँधेरे में, इस महासूनेपन में अकेली छोड़कर कहाँ चला गया है, कुछ पता नहीं। भाई, क्यों मेरी हालत ख़राब है। बस मैं-पना ही मैं -पना शेष है और कुछ नहीं। मुझे अब कविता भी नहीं आती, कहानी नहीं आती। मेरा अन्तर सूखे आँसू रोता रहता है तथा सूखे घूँट पीती हूँ। क्यों? पता नहीं।

अब मैं पूजा करा ही नहीं पाती हूँ। यह भी सोच लूँ कि किसी को पूजा करा रही हूँ, तो ही कुछ घुटन सी शुरू हो जाती है। शायद तभी, अब पूजा कराने से जी भागता है। कभी अपने आप ही ठीक बन जाती है, तब तो Rest मिलता है। Sitting से पहले तो जी कुछ उचटने लगता है। जब बैठ जाती हूँ, तो फिर ठीक हो जाता है। न जाने क्या बात है, जी उचट जाता है। भला उजड़े को कौन और उजाड़ गया।

मेरा तो यह हाल हुआ कि ‘मालिक’ तो मानों अपना पिटारा खोल कर भाँति-भाँति की सुखद आत्मिक- दशाओं का जादू दिखलाकर फिर सब पिटारे में समेंट कर चले गये। मैं अकेली बस सूने निर्जन में ‘उसकी’ उस विस्मृत याद में विस्मृत खड़ी ‘उसी’ के सहारे पथ पार कर रही हूँ। न सही, ‘उसका’ कुछ तो है, उसी के सहारे जाऊँगी ‘उसी’ के पास मुझे जाना है और अवश्य जाना है, चाहे न कुछ का ही सहारा लूँ, यही मेरा हाल है। अब न कोई मैदान है, न कोई पथ है, बस, कुछ न सही ही सब कुछ है, यही दशा है और उसी के सहारे पहुँच जाऊँगी। न घर का, न बार का पता है, न बनावट, न असलियत का पता है। न रोशनी, न अँधेरे की तमीज़ है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-585
लखीमपुर
30/8/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। यहाँ सब कुशल है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

23 को अचानक पूजा कराते में लगा कि कुमार स्वामीजी के हृदय में स्याही आ गई है, तो ईश्वर की कृपा से साफ़ (ठीक) तो हो गई। अब यह देखती हूँ कि यद्यपि अब पूजा करना या कराना मेरे लिये दोनों समान हैं। फैज का तो मुझे अन्दाज़ ही भूल गया, परन्तु कुछ ऐसा Confidence कहिये या क्या कि देखती हूँ कि सफ़ाई तो अब बहुत शीघ्र होने लगती है। असर फ़ौरन मालूम पड़ने लगता है और हर काम के लिये यही हाल है कि होकर रहेगा। यद्यपि न अब शक्ति है, न सामर्थ्य है, परन्तु अब असर अच्छा और शीघ्र होता है। उधर M.K.Ganeshan जी की हालत न जाने क्यों रुक गई थी। पूजा कराने में न तबियत लगती थी और न असर होता दिखाई देता था, परन्तु अब तो ‘मालिक’ की कृपा से फिर ठीक आ रहे हैं। यद्यपि अभी पहले का सा ज़ोश व लगन पूरा नहीं आया है, फिर भी आ रहा है।

सिर के पीछे जहाँ चोटी गुँथी जाती है, यानी पीछे, गर्दन से ऊपर जहाँ गड्ढा सा है, उसके कुछ ऊपरी बिल्कुल लगे से, अक्सर कुछ मुलायम, सरल ठंड सी निकलती मालूम पड़ती है। कुछ ऐसा होने लगता है कि मानों कोई पीछे का ढक्कन सा वहाँ का उठाना चाहता है, परन्तु हिल-हिलाकर फिर ठीक हो जाता है। लगता है कि पीछे की सिर की हड्डी नर्म हो गई और उसमें से कुछ छनता है। नर्म नहीं, बल्कि मानों पसीज या पिघल रही है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-586
लखीमपुर
2/9/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

पूज्य मास्टर साहब के पत्र से आप का समाचार मिला। आप का पेट दर्द का हाल सुनकर हम लोगों की चिन्ता बढ़ गई है। ईश्वर करे ‘आप’ जल्दी ठीक हो जायें। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरा तो यह हाल है कि सब ‘मालिक’ की चर्चा करते हैं, मस्त होते हैं, परन्तु मेरा तो यह हाल है कि मुझे तो यह मालूम ही नहीं पड़ता कि वह कोई है। ‘वह’ तो कुछ भी नहीं है। वही क्या, मेरे लिये तो कहीं कुछ भी नहीं है। खाट पर लेटी रहती हूँ, परन्तु मानों उसे छू कभी पाती ही नहीं। दीवाल, पेड़ या फूल छूती हूँ, हाथ में लेती हूँ, परन्तु मानों छू कभी पाती ही नहीं हूँ। दशा तो बिल्कुल निरी स्वच्छ ही स्वच्छ फैली है। उधर ऐसा लगता था मानों कोई शक्ति सिर में फिरती है, परन्तु उसको Sphere नहीं मिलता था, परन्तु ‘मालिक’ की कृपा से इधर 3-4 दिन से मानों कोई हड्डी तक रही नहीं बस हवा है। शरीर तो फूल सा उड़ता रहता है। दशा को हल्का कहना तो उसे भारी बना देना है। शुद्ध और अशुद्ध दोनों एक ही अर्थ रखते हैं। अब तो जैसा था, वैसा था जो है, सो है भी कहते अच्छा नहीं लगता क्योंकि यहाँ तो कोई है ही नहीं। न ऐसा, न वैसा, कुछ है ही नहीं। मुझे तो न जाने क्यों अब अपनी ज़रा सी भी आत्मिक उन्नति ही नहीं मालूम पड़ती है। दशा तो ऊसर ज़मीन है, फिर उसमें अब आशा भी नहीं। मेरी न तो पूजा में स्वयं ज़रा भी रूचि है और सब मुझे खाली ही बैठे लगते हैं। मुझे तो यदि कोई दुनिया के भ्रम में भूली अवस्था वाली कहे तो शायद ठीक ही होगा।    पहले मैं लिखा करती थी कि मुझे यह याद नहीं पड़ता कि मैं उससे कभी खाली और अलग रही हूँ। मेरा कभी भी विछोह हुआ हो, यह असम्भव है, परन्तु अब तो दशा बिल्कुल उल्टी है। लगता है कि मानों मेरा कभी ‘उससे’ या किसी से कभी मिलन ही नहीं हुआ। मेरे कण-कण में कभी ‘वह’ मिला ही नहीं। अब क्या करूँ, समझ में नहीं आता। मेरी दृष्टि तो शून्य हो चुकी है। दृष्टि क्या, मेरा अन्तर-बाहर, सब शून्य हो चुका है और भाई, यही मेरा स्वरूप हो गया है। परन्तु वास्तव में तो अब स्वरूप कुछ होता नहीं, जैसा होगा, वैसा होगा। उत्सव (जन्माष्टमी वगैरह ) के पूजा या Sitting के वातावरण में मेरी तबियत बजाय आनन्द व उत्साहित होने के, घबरा उठती है। दशा रहती सरल व स्वच्छ है, कि उसे नम्रता का ही नग्न रूप फैला है, कहना ठीक है, परन्तु मैं नम्र नहीं हूँ, न दशा ही नम्र है। बस नम्रता का नग्न रूप फैला है, यही कहती हूँ और मेरे शरीर का भी कण-कण मानों ऐसा ही होकर इसी दशा में समाया, बिखेरा हुआ रहता है। अब न जाने क्यों लगता है कि मानों अपने पथ में मैं अकेली, निर्विघ्न, निडर जा रही हूँ, दूसरा कोई नहीं है। ‘मालिक’ का भी एहसास नहीं होता। पहले हर काम ‘मालिक’ ही मानों इस मशीन द्वारा लिया करता था, परन्तु अब तो मैं अकेली हूँ। सब मानों अपने ही लिये होता है।

अब तो मुझे हर आदमी Initiated की तरह लगता है। रात कुछ ऐसा देखा कि मानों हर आदमी मुझसे Initiated हो। यद्यपि कितनी बेजा बात है, परन्तु मेरे न तो ऐसा कभी आज तक स्वप्न में भी विचार नहीं आया, यह मुझे न जाने क्या हो गया। हृदय तो लुट गया है। अब तो सेवा मैं इसलिए नहीं करती कि इसमें मुझे आनन्द आता है, वरन् अपने ‘मालिक’ के लिये, मिशन के लिये करती हूँ। अब तो मानों मेरी आत्मा ‘मालिक’ की आत्मा में समा चुकी है। कहीं कोई अस्तित्व नहीं। अब तो अस्तित्व भी गल गया है, लीनता भी लीन हो गई है। अब तो मेरे पास न कुछ बेचने को है, और न खरीदने की ही कुब्बत है। बस अब तो जो ‘मालिक’ दे दे, हर हाल में शुक्रिया है और शुक्रिया भी मैं भला कैसे दूँ। मेरा तो रोम-रोम शुक्रिया बन चुका है। मेरी तस्वीर खुद ‘मालिक’ के शुक्रिये का ही तो रूप है। अब तो जो ‘मालिक’ का मन हो, सो ही हो। हृदय का हर पर्दा उठ चुका है। हर द्वार खुल चुका है। बुद्धि का दर्पण साफ़ हो चुका है। दृष्टि अब दृष्टि नहीं, वरन् ‘मालिक’ की ही दिव्य दृष्टि बन गई है। अब तो अणु-अणु दर्पण बन चुका है। हर कण साफ़ हो चुका है। किन्तु उसमें कोई तस्वीर, न कोई रूप की छाई नहीं आती। वह तो अटल स्थिर बन चुका है। तबियत जान या अनजान में भी इतनी झुकी रहती है कि अधिक बोलने को भी जी नहीं चाहता है। पहले जो लगता था कि दशा Heart से परे है, सो भी अब कुछ नहीं। न Heart के, न Mind के परे, न कुछ है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। केसर ‘आपको’ प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आप की ही स्नेहसिक्ता
सेविका-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-587
शाहजहाँपुर
6/9/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र 22.8.56, 30.8.56 तथा 2.9.56 के प्राप्त हुए। तुम्हारे जितने पत्र हैं, सब के सब उच्च-लय-अवस्था को बतला रहे हैं। अपने आखिर पहुँच तक नहीं मालूम, कितनी लय-अवस्था और पड़ेगी और लय होना ही उस हालत का कमाल है और फिर उससे उछलना उस कमाल का असर है। मेरे तो होश उड़ते हैं, जब ये हालतें देखता हूँ कि ऐसी-ऐसी लय अवस्थायें भिन्न-भिन्न तरीके की पैदा होती हैं। नहीं मालूम हमने अपनी खोज में कितनी जीवनी गँवा दी है और अब तक बराबर खुलते चले जा रहे हैं। भारत वर्ष के महात्मा तो इतने ज्यादा गिर चुके हैं कि यहाँ तक इक्का-दुक्का कहने लगे कि रामायण सिर्फ घर में रखी रहे और उसकी आरती होती रहे, तो उसकी मुक्ति हो जाती है। एक मसल मज़ाक में लोग कहते हैं, जो ऐसे लोगों के लिये ठीक है कि-“इस हुस्न पर ये नखरे” अगर इसका कोई मिसरा बना दिया जावे-“इस हुस्न पर यह नखरे, चेलों का खुदा हाफ़िज”। मैंने यह लफ्ज नखरा, जो इस्तेमाल किया है, वह बहुत माने रखता है। शब्द मसखरापन का जरूर है, मगर इसके लिख़ने से मैं यों मजबूर हूँ कि इससे ऐसे महात्माओं की अदा प्रकट होती है। जब यह तालीम गुरू की और उस पर अपनी कद्र चाहते हैं और यदि कोई न करे तो उनके थर्मामीटर का पारा बहुत ऊँचा उठ जाता है। वक्त ऐसा ज़रूर आवेगा कि बरसाती धरती की धूल Mushrooms की तरह यह बैठ ही जावेंगे। मेरी तबियत तो चाहती है कि इन बातों पर बहुत कुछ लिखूँ, मगर कुछ फ़ायदा दिखाई नहीं देता, इसलिये बेकार है। ईश्वरीय लहर जब आवेगी, तब असलियत रौशन होकर फिर रहेगी।

5 सितम्बर सन् 56 को साढ़े ग्यारह बजे रात्रि को मैंने तुमको L1 पर डाल दिया है। यह ऐसा मैदान मालूम होता है कि इसको अँधेरा मिला हुआ उजेला कह सकते हैं। इन मैंदानों को, सच तो यही है कि वही पार करता है, जो पपीहा की तरह “पिऊ कहाँ” की खोज में रहता है। तुम्हारा ख्याल सही है कि मैंने अपनी माता के पिण्ड के कुल स्थान पार कराके ब्रह्माण्ड मण्डल में डाल दिया है और कुल जिस्म में अजपा पैदा हो गया है। ब्रह्माण्ड की सैर इस वक्त हो रही है, इस तरह कि इनको इसकी ख़बर तक नहीं हो पाती और यह सिर्फ उनकी कमज़ोरी की वज़ह से ऐसा किया है, ताकि उनके दिमाग पर जोर न पड़े। कमजोर वह इस क़दर हैं कि पखाने-पेशाब के लिए उनको उठाना पड़ता है। आगे फिर देखा जायेगा। दमा बदस्तूर है। मुझे दमा का बहुत मामूली दौरा हुआ था, जो या तो अपने आप ठीक हो गया हो, या एक दो बार शीतोपलाद की चटनी खा ली थी, उससे कुछ फ़ायदा हो गया हो।

श्री काशीराम जी का ख़त आया है, उन्होंने पत्रिका छपने के लिये कलकत्ता भेज दी है और अगली पत्रिका के लिये मज़मून माँगे हैं और यह भी लिखा है कि मज़मून मिलते रहें तो पत्रिका छपती ही रहेगी।

केसर का भी ख़त आया था। उसकी हालत अच्छी चल रही हैं।

एक पर्चा मेरे पास अभी आया है, जिस पर Heading है-

“कछला के श्री श्री 108 स्वामी दयानन्द महाराज सरस्वती की करतूतें” यह महात्मा कछला के हैं जिन्होंने स्कूल खोला है और पर्चा यह बता रहा है कि Govt. ने तीन सौ बीघा काश्त दी है। उसकी कमाई भी सब खा जाते हैं। फर्जी नाम मास्टरों और लड़कों के लिखे हुए हैं, और तनख्वाह सब ले लेते हैं। यह पर्चा Govt. के सभी Ministers के पास भेजा गया है और मेरे पास बहैसियत President Sri Ramchandra Mission के आया है। कमेंटी को किसी तरह Mission का पता लग गया और उसने भेज दिया। यह महात्माओं का हाल है और उस पर ये चाहते हैं, मेरी कद्र करें।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-588
लखीमपुर
6/9/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ कई दिनों से नहीं आ रहा है, क्या बात है। कृपया अपनी तबियत का हाल शीघ्र दीजियेगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो यह दशा है कि कुछ ऐसी भौंचक सी अवस्था या शान्त सी अवस्था है कि मुझे तो पता नहीं। मेरी कोई सत्ता भी है या नहीं, क्योंकि ख़्याल का तो मेरा यह हाल है कि न उसमें है, न नहीं है। दोनों बराबर हैं। बल्कि उसके बारे में कुछ सोचने तक को विचार नहीं जाता है। मानों सब कुछ भूल गया है, या नहीं भूल गया है, कुछ ठीक नहीं है।

श्री ‘बाबूजी’, आज आपने मुझे L1 point पर खींच दिया। इसके लिये बहुत-बहुत धन्यवाद। अपनी गरीब बिटिया पर कृपया इसी प्रकार अपना ख़्याल बनाये रखिये।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति :-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-589
लखीमपुर
11/9/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा पत्र आप का मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

इधर कई दिनों से रीढ़ की हड्डी के बीचोबीच की गुरिया में कुछ बहुत अधिक सरसराहट व रेंगन रहती है और बाईं पीठ की चौड़ी हड्डी जो कंधे से नीचे होती है, उसमें व उसके इधर- उधर भी पसलियों तक में भी बड़ी सरसराहट व रेंगन बहुत रहती है तथा प्रकाश भी उसमें से बाहर निकलता रहता मालूम होता है। मेरी तो तबियत इतनी झुकी या नम्र या कोमल कह लीजिये कि मेरी तो यह दशा है कि मुझे तो अपने में न अच्छा न बुरा कुछ दीखता ही नहीं है तो फिर भला लय-अवस्था जो अब मुझे कहने में ही बहुत ही मानों भारी लगता है, तो अपने में अब इसकी भी अनुभूति कहाँ है। बिल्कुल जैसे कोई एकदम सन्न से रह जाता है, कुछ ऐसी ही दशा हो गई है। हालत ऐसी है कि मानों बस भीतर-बाहर एक टकटकी लगी हुई है। बस ऐसी ही दशा या मैदान अब तो व्याप्त है और मैदान क्या, भीतर-बाहर मानों शून्य गगन ही व्याप्त है।

न जाने क्या बात है कि Point तो आप ने बढ़ाया 5 सितम्बर को, लेकिन परसों रात को करीब 10 बजे मैं लेटी, तो लेटे ही लेटे एकदम से एक क्षण को लगा कि मानों जैसे पैर आगे को रपट जाता है ऐसा कुछ झटका सा लगा कि मैं सन्नाटे में आ गई, मानों एकदम जैसे कोई जाग पड़ा हो, और उस एक क्षण में ही मानों कुल ईश्वरीय-प्रकाश ही एक क्षण को व्याप्त हो गया। यह मेरी तो कुछ समझ में नहीं आया, भौंचक हूँ अब भी और तब से कुछ ऐसी दशा व्याप्त है कि जिसे शून्याकाश या नम्र दशा की Reality या सार कह लीजिये। इतनी मंद-मंद सी दशा व्याप्त है जो Conception में नहीं आ पाती है। कैसे कहूँ, ‘मालिक’ जाने। कल से फिर जिसने भी पूजा की, उसने ऐसी ही दशा बतलाई कि जैसी मेरे भीतर-बाहर सब व्याप्त है। शून्य, निस्तब्ध दशा ही सब बताते हैं।

भाई, न जाने कितनी शून्य दशा है कि इसको चाहे जितना हल्का कहकर व्यक्त करूँ, तो हर शब्द भारी पड़ जाता है, क्योंकि मुझे तो लगता है कि मानों हल्का कहूँ या भारी, मेरे लिये दोनों एक समान हैं। इनके कुछ ठीक अर्थ ही दशा का नहीं निकल पाता है और मैं व्यक्त करूँ क्या, बस वह तो स्वयं ही व्यक्त है। अब इसे जो जाने, सो जाने। अब तो यह दशा है कि -

“कबिरा खड़ा बाजार में, सबकी माँगे खैर। ना काहू से दोस्ती, ना काहूँ से बैर।।”  छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः- 

आपकी दीन हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-590
लखीमपुर
17/9/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, मेरा पत्र मिला होगा। पूज्य मास्टर साहब जी भी वहाँ पहुँच गये होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मैं ‘आपको’ पत्र न तो बड़े उत्साह व प्रेम में भरकर लिखती हूँ, और न उफ़ान की तेजी में, बल्कि गति वही सम रहती है, हर हालत में। सोते-जागते में भी, जाने या अनजाने में भी ऐसी ही सम गति बनी रहती है। पहले तो मुझे ऊपर की होने वाली या वैसे भी तमाम बातें स्वतः ही सामने आ जाती थीं, पता लग जाती थी, परन्तु अब कुछ नहीं पता चलता।

मुझे तो यह लगता है कि अब “मैं” शब्द तो इतना हल्का हो गया है कि मैं इसे Use करती रहती हूँ, परन्तु यह Conception में आ नहीं पाता है। इसे Use करने या न करने में मानों कोई हर्ज़ नहीं है। दोनों बराबर ही हैं। अब तो भाई दशा क्या है, कैसी है, यह मैं नहीं जानती। बस वह तो स्वयं ही व्यक्त है। मेरे लिये तो आगे-पीछे या भीतर-बाहर, मानो कुछ नहीं है। सब एक ही हो गया है। न जाने क्यों अब तो अकेले में कभी अकेलापन नहीं लगता और दुकेले में कभी दुकेलापन नहीं लगता। पहले में सदैव ‘मालिक’ के साथ दुकेली ही रहती थी, परन्तु अब ‘मालिक’ की याद रहे, वह सामने तक रहे, किन्तु मुझे कभी दुकेलेपन का एहसास ही नहीं होता है। ऐसे ही भाई, न काम करते रहने में काम की अनुभूति कभी होती है और न खाली बैठे रहने में खालीपन का ही एहसास होता है। न आराम करने में आराम की अनुभूति होती है, न गाने या बोलने में गाने या बोलने की अनुभूति होती है। किन्तु ऐसा सब होते हुए भी न मुझे कभी यह एहसास होता है कि यह सब शब्द मेरे लिये मानों बेकार के हैं, व्यर्थ हैं और न कुछ काम के ही हैं, ऐसा ही एहसास होता है।

अब तो भाई, हृदय में एक ऐसी धीमी पीर, टीस है, जिसमें दर्द या व्यथा का अनुभव नहीं है। वरन् बस केवल एक कोई बात है, जो मुझे मालूम नहीं। न जाने क्यों लगता है, कि हालत पर धुएँ की तरह मानों अँधेरा छा-छा जाता है, फिर साफ़ हो जाता है। कुछ यह दशा है कि किसी पर तवज्जोह देकर उसे पूजा करवाती हूँ तो उसका मन नहीं लगता और वैसे तबियत बहुत लगती है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-591
शाहजहाँपुर
19/9/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र 11 सितम्बर और 17 सितम्बर के मिल गये। मुझे अनुभव किसी बात का ऐसा नहीं होता कि जैसे दुनियादारी की बातों का शुरू अभ्यास में, जाना था। हाँ Nature की बातें जरूर अनुभव में आ जाती हैं इसलिये मैंने माताजी के सिवाय अन्नमयी कोष के और सब कोष भी तोड़ दिये। अन्नमयी कोष के तोड़ने की जरूरत भी नहीं थी, इसलिये कि इसके टूटने पर कुछ शक्तियाँ खालिस और ज़ोरदार पैदा हो जाती हैं और यह हो सकता है कि मुँह से अच्छा और बुरा निकलने पर वैसा ही हो सकता है।

पंडित लक्ष्मीचन्द्र जो अब ‘स्वामी रामेंन्द्र देव’ हैं, अपना सिलसिला अलहदा करके उसके नियम बना दिये और उसका नाम “दिव्य-पथ-प्रदर्शक मण्डल” रखा है। मुझे इसका खेद बिल्कुल नहीं है। मसल जरूर ठीक होती है कि “मेरे घर सों आगी लाई, नाम धरो वैसन्धर”। मुझे इस शख्स पर अब भी तरस आता है। उनके काबिल शिष्य हरिशरण ने एक किताब बड़े फ़क्र के साथ “योग वेदान्ती मुक्तावली" लिखी है। किताब और नियम भेज रहा हूँ, पढ़ लेना। मास्टर साहब को जब फुर्सत होगी, उन्हें भी देना, वह भी देख लें।

तुम्हारे पत्र अब जो मिलते हैं, उनके जबाब के लिये शायद लफ़्ज नहीं मिलते तुम किसी न किसी तरह से उसे व्यक्त कर ही लेती हो, कि धुँआ का पता होने से यह मालूम हो जाता है कि वहाँ आग जरूर है। सरसराहट रीढ़ पर या उसके करीब होना यह बतलाता है कि कम्पन या Vibration होते हैं, जिससे जागृति पैदा होती है। इसको वह हिलोर समझना चाहिये कि एक जगह पैदा होने से अपना Expansion दरिया में फैला देती है। ताकतें सब रीढ़ की गुरियों में छिपी हुई हैं। इनको आध्यात्मिकता की अगर Back Bone कहा जाय तो गलत न होगा। एक तालीम का तरीका यह भी है कि रीढ़ की गुरियों पर ही Transmission किया जावे। जिस-जिस चक्र पर चाहे, उसी की सैर शुरू हो सकती है। मगर इस तरीके को जहाँ तक मुझे मालूम है, महात्माओं ने रायज़ नहीं किया और उसके चिन्ह भी कहीं नहीं मिलते। सम्भव है कहीं पर इसकी Research किसी ने की हो, मगर मुझे नहीं मालूम। मैं तो इतना सा इशारा जानता हूँ कि जिस चक्र पर असर पहुँचाना हो या उसकी यात्रा करानी हो तो उसके पीछे की (यानी दूसरे तरफ़ की ) गुरिया ले ले। इस क़िस्म की तालीम देने की ज़्यादा ज़रूरत भी नहीं। इसलिये उसकी Research भी बेकार है। मैंने कहीं कहीं पर ज़रूर काम लिया है।

तुमने जो लेटे-लेटे झटका लगना लिखा है, मुझे अभ्यास के साल दो साल बाद ऐसे झटके मालूम होते रहे हैं और इसकी वज़ह जब तुमने ख़त में लिखा है, तब समझ में आई। जब तबियत में यक्षुई होती है, तो यह हो जाता है कि ब्रह्माण्ड में, जो विचार कि लोगों ने बनाये हैं, वहाँ तैरते रहते हैं। उनके Touch होने से झटका लग जाता है, और यह भी होता है कि अपना ही ख्याल जो किसी वज़ह से उठ भागा हो, वह भी छूने से झटका लग जाता है। ऐसी हालत में यह भी मालूम होता है कि जैसे हम चौंक पड़े और यह भी वज़ह होती है कि एक सुई में ईश्वरीय-धार का बाज वक्त रेला आ जाता है। चुनांचे यह तुम्हारी हालत जो थी, वह ईश्वरीय-प्रकाश की वजह से और तुम्हें यह मालूम होना कि तुम्हारे बजाय वही प्रकाश है, इसके माने साफ़ ज़ाहिर है कि तुम्हारी हस्ती अब बिल्कुल मिट चुकी है और अब Originality की शुरुआत है। मगर यह हालत असली चीज़ से अभी हजारों गुणा भारी है।

17 सितम्बर के ख़त में जो लिखा है, उसका जबाब यही है कि लय-दर-लय की हालत है। तुमने लिखा है कि अब यह एहसास होता है कि हृदय में ऐसी पीर है कि जिसमें न दर्द है, न व्यथा। इससे यह पता जरूर चलता है कि कोई चीज़ ज़रूर थी, जिसके लिये दर्द और व्यथा थी। अब इसका गुमान ही रहना कि है पीर जरूर-इसके मानें यह होते हैं कि उसका अन्दाज़ आ चुका है, जिसको हासिल करना है। यह जो तुमने लिखा है कि हालत पर कभी अँधेरा आ जाता है और फिर साफ़ भी हो जाता है। ज़ाहिरा माने तो इसके ये हैं, कि वहाँ की कालिमा निकल जाती है। मगर इतने ऊँचे स्थान पर उस कालिमा का इतना Gross-way में एहसास नहीं हो सकता, इसलिये वहां पर यही चीज़ हैं, कि जैसी रूह, वैसे फरिश्ते। अर्थात् जैसे बढ़िया और सूक्ष्म स्थान है, वैसा ही सूक्ष्म वहां की कालिमा। इसलिये यही कहना चाहिये कि जब वहाँ की यात्रा शुरू होती है और फैलाव तो वह अन्दाज़ वहाँ पर विदा होता है जो हमारी सैर में रुकावट डाल रहा था।

एक बात लिखने से रह गई। वह पीर, जिसमें दर्द और व्यथा नहीं, इसकी हालत मुमकिन है आगे यूँ हो (मगर कुछ समय के बाद) कि जैसे कि कभी चोट लगी थी, तो सोचने पर तो उसे यह मालूम होता है कि चीज़ को भूल जाते हैं तो उसके यह माने नहीं होते कि वह चीज़ ख्याल से हट गई। उससे रिश्ता है तो उसके यह माने नहीं होते कि वह चीज़ ख्याल से हट गई। उससे रिश्ता ज़रूर कायम रहता है, मगर बहुत Internal, इसलिए पीर का मौजूद होना चिन्ह इस बात का है कि उसकी Nature अब वैसी ही हो रही है, जिसके लिये कि हमने पीर पैदा की थी।  केसर का खत मिला। उसकी हालत बहुत अच्छी चल रही है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-592
लखीमपुर
22/9/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा पत्र आप का कल आया। पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। आप की कृपा का धन्यवाद कैसे दिया जा सकता है। कृपया इस गरीबनी पर इसी प्रकार कृपा बनाये रखें। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो पूजा में चाहे घंटो बैठी रहूँ, किन्तु कभी पूजा की खुमारी ही नहीं आती। न जाने क्यों साधना तो मुझे लगता है कि मानों ऐसा हो गया है कि जैसे Use करो, लेकिन कोई अर्थ नहीं। मैं ही नहीं, मुझे तो कोई भी आदमी साधना करते हुए एहसास नहीं होता है। साधना का तो मानों होम हो चुका। आज साधना शब्द सुना तो मुझे बिल्कुल ऐसा नया शब्द सा लगा, जिससे मेरा मानों कोई परिचय ही नहीं हुआ। दिन भर बोलती हूँ, किन्तु किसी शब्द की कभी अनुभूति ही नहीं होती। मानों कभी कोई ध्वनि ही नहीं होती, जो कान में पड़े, इसीलिये सब कुछ मानों सुन्न पड़ गया है। बाहर-भीतर मानों सब कुछ एकाग्र हो गया है किन्तु यह एकाग्रता भी अब कभी एहसास में नहीं आती। अब तो हर काम रहनी, कथनी व करनी, सबकी एक समान गति है। एक Level है, हर काम उसी के द्वारा होते रहते हैं और मेरा तो इस समान गति के आस-पास भी न कही अपना पता पाती हूँ, न कहीं ठिकाना ही है। एक अजीब सरल सी मामूली फकीरी दशा है। न दर्द है, न कुछ आराम की ही अनुभूति होती है। अब तो मेरी तबियत लाचार यही कहती है कि-

“बाँह छुड़ाये जात हो, निर्बल जानि के मोहे।
  हृदय ते जब जाहुगे, मर्द बदौंगे तोहे ॥”

किन्तु मुझे तो ऐसा कहने में भी संकोच है, क्योंकि मुझे तो ‘उसका’ कभी एहसास ही नहीं होता है। न हृदय में इसके लिये पीर है। हाँ, हृदय जबरदस्त जरूर है, हारने वाला नहीं है। इसीलिये उपरोक्त “हृदय ते जब जाहुगे” की बात कह दी है किन्तु मेरे अंतस में कोई भी विचार नहीं है। भाई, न जाने क्यों, एक स्वच्छ दशा, जो अब व्याप्त है, वही मानों मेरा स्वरूप हो गया है। इसके अतिरिक्त एक जो सरल-साम्य दशा सी जान या अनजान सोते-जागते सदा ही रहती थी, उसका मैं Touch भी नहीं कर पाती हूँ। न जाने क्या बात है कि साम्य अवस्था में फैले होते हुए भी उससे परे ही रहती हूँ।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-593
शाहजहाँपुर
28/9/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारा 22 सितम्बर का मिल गया। किताब जिसका नाम “वेदान्त मुक्तावली” है, स्वामी रामेंन्द्र देव जी ने मेरे पास भिजवा दी थी। सम्भव है कि उनकी यह मंशा हो कि वह मुझे यह ज़ाहिर करना चाहते हों, कि उनके यहाँ भी लिखैया मौजूद हैं। तो मैं तो भाई, काबिल आदमियों के सामने हमेंशा कलम टेकने के लिये तैयार हूँ। मुझमें भला क्या काबलियत है और जो कुछ कि लोग समझते भी हों, वह सब ‘उसी’ की काब्लियत है, जिसके दरवाजे पर मैं टिककर बैठ रहा। किताब देहातियों के लिये तो अवश्य अच्छी चीज़ है और कविता भी उसमें है, जो गा-गा कर उनको रिझाया जा सकता है। उसमें एक Chapter तमाखू पीने के ऊपर भी लिखा है, उस पर मैंने सुर्खी का निशान बना दिया। मैं लखनौर गया था तो हुक्का पीने पर मेरे एतराज था और है भी यह चीज़ क़ाबिल एतराज़। एक सतसंघी भाई की राय है कि इससे मुझको ही नसीहत दी गई है, ताकि मैं इसको छोड़ दूँ और इसका उनको हार्दिक धन्यवाद है कि एक बुराई उन्होंने बतला दी।

अब तो उन्होंने अपनी संस्था भी अलहदा कायम कर ली है और नियम भी बना लिये और गुरू तो उनको रंगे हुए कपड़ों ने बना दिया। तुमने देखा कि थोड़ी सी तंग-नज़री ( कहरपन और संकुचित विचार) ने कैसे-कैसे करिश्में दिखा दिये। ईश्वर इस बात से हर एक को बचाये रखे। जहाँ पर हमें अपने ‘लाला जी’ का कौल याद आता है कि कामयाब वही है कि जिसे ईश्वर अपनी तरफ़ खींच ले। जब वह नेत्रहीन हो गये तो मैंने उनकी अंतर दृष्टि खोलने की कोशिश की थी और खोल लाया था, मगर जहाँ पर कि हर हालत का Nucleus ( असल) होता है, वहाँ पर मैं खुद-ब-खुद ठहर गया था, अगर जल्दी कर जाता तो वह टूट गया होता। मैं बड़ा नातजुर्बेकार (Unexperienced) हूँ और तबियत कुछ ऐसी बन जाती है कि फिर इधर-उधर देखने की तबियत ही नहीं चाहती। ईश्वर ऐसी बुद्धि दे कि मुझसे ऐसी त्रुटियाँ न हो। वह करीब के गाँव में दौरा कर रहे हैं, सत्संगी बनाने के लिये। कुछ सत्संगी पुवांया में भी है। 30-34 आदमी तो उनके पास थे ही, सम्भव है, कुछ और हो गये हों। इसमें मेरा कोई हर्ज़ नहीं। बहरहाल वह भी ईश्वर नाम फैला रहे हैं।

अब मैं कुछ थोड़ा बहुत तुम्हारी दशा पर रोशनी फेंकता हूँ। प्रथम इसके कि मैं कुछ लिखूँ, वह चलता जुमला कह देना चाहता हूँ कि हालत लय-दर-लय होती जाती है। ठीहा और ठिकाना का मालूम न होना यह बताता है कि जिस नींव पर कि Structure (इमारत) बनी थी, वह नींव नहीं रही। मतलब यह है कि भक्ति के तेज थपेड़ों ने उसको बर्बाद कर दिया है और अब उसकी जगह विश्वास ने ली है, जिस पर कि वह चीज़ तैयार हो रही है कि कहने के लिये और समझने के लिये हवाई किला कहा जा सकता है। जब यह अटलपना, जिसको विश्वास की उन्नति की (Advanced ) हालत कहते हैं। यह भी घुल जावे, तो फिर समुद्र के किनारे पर पहुँचना कहेंगे। जिन चीज़ों से कि हम उन्नति करते, वही हमारे लिये आधार रेखा होकर sides बना देती है और वह sides यों बनाती हैं, ताकि उसके केन्द्र में ऐसी वस्तु न आ जावे कि जो उसके बने बनाये खेल को बिगाड़ देवे। फिर क्या होता है कि वह अपना काम करने के बाद खुद घुलने लगती है। इसके अर्थ यह है कि वह अच्छी बन्दिशें जो हमारी उन्नति के लिये थीं, वह अपना काम करके विदा होने लगती है।

यह बात जो तुमने लिखी है कि कोई काम कितने ही मन से किया जावे, टटोलने पर यह मालूम होता है कि मानों न कोई इच्छा है, न अनिच्छा। इसका सीधा-सादा मतलब तो यह है कि इच्छायें बहुत कम होते हुए भी अनिच्छाओं का मज़मून है। अब अपने जिले (तालुक Concern) में अगर मैं बयान करूँ तो वह यह है कि मन की हालत बदल चुकी है और उसने अपना वह Covering (पर्दा) उतार दिया है जिससे संसार का ताल्लुक ज़्यादा था और उसमें पहले तो नशा था और अब ख़ुमार की हालत है, जिसमें वह यह खोज करता है कि नशा उतरने पर यह सूक्ष्म गति, जो पैदा हो रही है, इसमें किसकी निस्बत ( ताल्लुक ) है। नहीं, नहीं, तुमने अब ख़ुमार को भी उसके ऊपर से हटा दिया है, इसलिये उसकी गति अब ऐसी मिल रही है कि जो असल वस्तु के निकट है। जब यह बात है, तो फिर उसे तो याद उसी झंझट की रहेगी, जिसमें कि वह अब पड़ा हुआ है। अब उसमें नुक्स क्या है? वह यह, कि वह जिस झंझट में है, उसमें उसको वैसा ही मज़ा आ रहा है, जो उसको उस वक्त आया था, जब दुनियादारी के झंझटों में था। पहले उसको संस्कार का होश था और अब उसे दूसरे संसार (Next World) ( उक़बा ) का होश है और होश होना यों लाज़मी है, ताकि वह हकीकत को, असलियत को ढूँढ सके। तलाश और खोज के माने यही होते हैं कि उसके जी में कोई बात लग चुकी है या कोई सुगन्ध ऐसी आ गई है, जिसके फूल की उसको खोज है।  मैंने इन्हीं चन्द अक्षरों में तुम्हारी सब हालत का जबाब दे दिया, जो कुल पत्र का जबाब है। छोटी-छोटी बातों की व्याख्या नहीं की। कुछ मनुष्य का अजीब तार हो जाता है उस वक्त, जबकि लय- अवस्था जितनी कि मनुष्य को ईश्वर में हो जाती है वह अपने ही आप अपनी दी हुई Faculties से काम करने लगता है। यह एक अजीब बात मैंने बताई है और बात भी क्या, सभी जानते हैं। बस इतनी ही इन्सानियत उसमें बाक़ी रहती है। अगर यह चीज़ भी लय हो जावे तो फिर ज़िन्दगी का उसी वक्त ख़ात्मा हो जावे। यह एक मामूली सी बात अपने बड़प्पन की बता गया। 

तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ। माताजी व चौबेजी को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-594
लखीमपुर
28/9/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, रात में इधर मुझे न जाने क्या हो जाता है कि जब सो कर उठती हूँ तो बीच सिर में, बीच माँग में यानी जहाँ चोटी रखी जाती है, उससे चार अंगुल इधर ही, यानी सामने को जहाँ आप ने सहस्त्र दल कमल के बिल्कुल बीचो बीच से, सोकर उठने पर लगता है कि वहाँ से कोई चीज़ ऊपर से सम्बन्धित रहती है। वैसे सोते में विचार न जाने मुझे कितने आते रहते हैं और यह चीज़ तभी से बिल्कुल रहती है, जब से मैंने, जैसा एक बार लिखा था कि सिर में कोई चीज़ लगता है कि सिर फाड़कर बाहर निकल जाना चाहती है। जब से यह चीज़ ठीक हुई है, तभी से उपरोक्त बातें हो गई हैं। जागते में तो फिर, दिन भर तो नहीं एहसास में आता है।

कुछ न जाने अब अपने में यही लगता है कि मानों दीन या मोहताज़ नहीं रही। दस को खिलाकर खाने की सी दशा हो गई है। अब तो न जाने यह दशा है कि सोती हूँ तो लगता है कि मानों साम्य अवस्था ही फैली रहती है, उसी में व्याप्त रहती हूँ, किन्तु जागती हूँ या वैसे भी तो अपने में साम्य अवस्था का एहसास कभी होता ही नहीं है। यह जरूर है कि Sub-Conscious Mind का स्वरूप तो साम्य, सरल अवस्था ही हो गया है। शायद वही सोते में मेरे एहसास में आता है। मुझे तो ऐसा लगता है कि सोते में मानों आप के निकट जा पहुंचती हूँ। आप की अन्तरात्मा में ही मेरी रहनी फैली रहती है, मानों ‘आपके’ नेत्रों की साम्य- ज्योति में ही मैं व्याप्त हो जाती हूँ, परन्तु जागते ही जैसे सब कुछ समाप्त हो जाता है। हाँ, यह जरूर देख रही हूँ कि मेरा अन्तर मानों उसी दशा का ही स्वरूप हो गया है, किन्तु मुझमें तो कुछ नहीं है, मानों अन्तर में सब होते हुए भी मेरी तो कुछ यह दशा है कि मैं तो कभी जैसे अन्तर में घुसती ही नहीं, और घुसूँ तो कहाँ, मुझे तो, सच तो यह है, न कहीं अन्तर दीखता है और न बाहर। मेरी दशा तो यह हो गई है कि खाली ही मेरी रहनी, कथनी करनी, सब खाली ही है। शायद इसीलिये न मेरे में कुछ बनावट है और न असलियत।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-595
लखीमपुर
5/10/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का कल आया। पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘आपकी’ तबियत को कुछ आराम सुनकर प्रसन्नता हुई। मेरी तबियत भी धीरे-धीरे बराबर ठीक हो रही है, चिन्ता की कोई बात नहीं है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ। 

अब तो यह दशा है कि मालूम पड़ता है कि तुरियावस्था भी सो गई है, नहीं, नहीं, बल्कि उसकी भी मौत हो गई है। Everlasting Peace में समा गई है। मेरी भी समझ में नहीं आता है कि मौत हो गई, या ज़िन्दा हूँ, क्योंकि मैं देखती हूँ कि जैसे कोई अनर्गल बातें बोलता जाता है, किन्तु न उसे उनसे कोई लगाव होता है और न बाद में सुधि। वही दशा अब मेरे लिये, जीवन या मौत के लिये हो गई है। बिल्कुल सफाचट मैदान में हूँ। न अँधेरा है, न उजेला है, न कोई हवा है, न लहर। सदा, सर्वदा बिल्कुल शान्ति का साम्राज्य बना रहता है। बल्कि मेरा स्वरूप ही यही हो गया है।

भाई मेरा अन्तर व स्वरुप तो अब ऊसर हो गया है, जिस पर अच्छे बुरे, किसी बात का असर नहीं होता। या भाई, मुझे तो अब कभी दिल (मन) की अनुभूति ही नहीं होती कि वह है तो फिर जब दिल नहीं तो Expression (असर) कैसे और कहाँ पड़े। कुछ ऐसा मालूम पड़ता है कि जो बातें मुझे आगे बढ़ने में सहायक होती थी, यानी श्रद्धा, विश्वास, प्रेम व भक्ति, वह अब मैं ऐसे समुद्र के किनारे हूँ कि जहाँ पर हर दीवार ढहकर बराबर हो गई है। इतना ही नहीं, बल्कि अब तो मुझे इतना भी ज्ञान नहीं कि मैं बराबर शब्द भी कह सकूँ, क्योंकि अब तो हुआ यही है कि समता भी सो गई है। समुद्र का यह किनारा क्या है, बिल्कुल सन्न और अँधेरा व्याप्त है। अब तो बस इसी समुद्र की (सामुद्रिक हवा) हवा का ही प्रभाव मुझे मानों अपने में समेंट लेना चाहती है और मैं भी बेहोश ही मानों हो रही हूँ। इसलिये पता नहीं, अब तब में कब पैर फिसल कर मैं समुद्र में जा पडूँ। लगता है कि मानों केंचुल उतर चुकी है। शरीर, शरीर नहीं एहसास में होता है। शरीर, शरीर नहीं रहा, क्योंकि रूप तो इस समुद्र की हवा का जो प्रभाव है, वही मेरा स्वरूप बन गया है। बल्कि यह दशा है कि अक्सर यह भी भूल-भूल जाता है कि यह किनारा है या समुद्र में ही हूँ। लेकिन किनारा इसलिये कह रही हूँ कि समुद्र तो जाते ही मैं तैरने लग जाती हूँ, फिर तो मैं रह ही नहीं सकती। ‘मालिक’ को इसीलिये मैं बीमारी की ख़बर नहीं देती कि मुझे बीमारी, बीमारी नहीं, बल्कि दशा ही लगती है। या यों कहिये कि वह भी दशा से ही मिल जाती है।

दूसरे, देरी शब्द की मुझमें बर्दाश्त ही नहीं रही। मुझे कुछ ऐसा लगता है कि समुद्र में आते ही बस मैं उसे तेजी से पैर कर पार कर लूँ। बस उसमें उतरने या पैठने की देरी भर है, क्योंकि इस किनारे से आर-पार मुझे न कहीं रूकावट है, न कोई अड़चन दिखाई पड़ती है, चाहे उसमें उतरी नहीं हूँ, लेकिन न जाने क्यों ऐसा लगता है कि मानों सब मेरे पेट में है। कुल समुद्र मेरे हृदय में हैं क्योंकि शायद उसके प्रभाव में तो मैं समा ही चुकी हूँ।   तुरियावस्था भी मानों सो गई। यहाँ पर एक श्मशान की दशा कह लें या एक अजीब मुर्दे की सी दशा है। अब तो ऐसे समुद्र के किनारे हूँ कि जिसका सारा किनारा सोया हुआ है किन्तु इस सोने में निद्रा नहीं है। सारे सपने भी समाप्त हो चुके हैं। लगता है कि जैसे महाप्रलय की अवस्था में तम ही तम (अँधेरा) छाया हुआ है। नहीं, बल्कि महाप्रलय की अवस्था भी गलकर बराबर हो गई है। बस रह गया है केवल तम ही तम।

भाई, मुझे तो अब अपने में विश्वास का सहारा है न Innocence का सहारा है और अटलता तो गलकर कब की बराबर हो गई है। इच्छा-शक्ति का रत्ती भर पता नहीं। यहाँ तक कि पूजा तो करवाती हूँ, परन्तु यह भी पता नहीं रहता कि Sitting आती है या नहीं और भाई, आवे भी कहाँ से, इच्छा शक्ति जब कि न इच्छा है, न शक्ति।

इधर एक बात यह नई जरूर देख रही हूँ कि किसी की तकलीफ़ में ही मान लीजिये प्रार्थना चाहे कितनी मिन्नतों से, चाहे कितनी देर करती रही, परन्तु मानों कोई असर ही नहीं पड़ता, पड़ा भी तो नाम मात्र को, किन्तु एकदम से जब अपने अन्दर एक ज़िद्द कहिये या जब हठ पकड़ जाता है, तो काम एक्दम ही नहीं, बल्कि इतनी खाली या समर्पण की सी दशा में इच्छा शक्ति काम करने लगती है, तो बहुत अच्छा और बड़ी स्वाभाविक रीति से बन जाता है, किन्तु मुझे यह पता नहीं कि अंतर की वह चीज़ या वह स्थिति, आखिर होती क्या है, कौन बात होती है जिससे अपने आप ही काम बन जाता है और ऐसी स्थिति आते ही मुझे यह तो हो जाता है कि काम बनकर रहेगा, किन्तु न अटलता होती है, न विश्वास ही कहिये। यह तो कोई नई बात है नहीं, बल्कि अनुभव के इस पार व उस पार सब एक हो गया है, न आर है, न पार है।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-596
लखीमपुर
30/10/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

बहुत दिनों से ‘आपका’ कोई पत्र नहीं मिला। आशा है ‘आप’ अच्छी तरह से होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो मेरी यह दशा है कि रात में जब सोती रहती हूँ, तब तक तो लगता है, ‘मालिक’ में एकता होकर फैली थी, परन्तु जब से उठ या जग जाती हूँ तबसे फिर कुछ नहीं, मानों कुछ हुआ ही नहीं। दशा ज्यों की त्यों बनी रह जाती है, फिर निकटता न दूरी, दोनों बराबर हो जाती है।

एक स्वप्न देखा रात में कि ‘आप’ मुझे कुछ खिला रहे हैं। उसमें न कोई स्वाद है, न बेस्वाद है। फिर कुछ कपड़े मुझे पहना कर कहा कि बस अब ठीक है। न जाने क्या अब ऐसी दशा है कि आंखें खुली हैं, कि बन्द, मुझे अब यह पहिचान भी नहीं रह गई है। दोनों एक समान ही हैं। लगता है कि अब ऐसी दशा है कि जैसे एक हारा थका पथिक जब विश्राम लेकर उठता है, सोकर उठता है, फिर न थकावट का पता है, न विश्राम की ही याद है। अब ऐसी दशा है कि जैसे कभी एक क्षण को स्वत: ही आदमी एक शून्य गति में हो जाता है, वही अब मेरा हाल हो गया है। चाहे इसे बेख्याल तबियत कह लीजिये।

मेरी तो कुछ यह दशा है कि अनुभव के पर्दे पर न कोई रंग आता है, न जाता है। हाँ, अनुभव के पर्दे के पार मुझे एक बे सिर पैर, न कहीं आदि न अंत और न अनन्त ही हैं। ऐसे सूखे सागर में मेरी रहनी हो गई है। वहाँ न कथनी है, न करनी है, न रहनी है और न विचार सरनी हो जाती है। लगता है, यह सब कुछ इधर, इस पार ही छूट गया है, इस पार ही रह गया है। न वहाँ हृदय की गुंजाइश है, न दिमाग़ की पहुँच है। इन सब के पार, उस पार एक वीरान मैदान है, वहीं रहनी है।

सूनापन तो उससे कई गुणा भारी पड़ता है। उसकी भी गम्य नहीं। पता नहीं भाई, मेरी तो न जाने यह दशा हो गई है कि यह तन-मन मानों संसार में रम गया है, उसी में ही धुल मिल गया है और संसार कुछ है नहीं।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति :-

आपकी दीन हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-597
लखीमपुर
10/11/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। ‘आपका’ पोस्टकार्ड जो पूज्य मास्टर साहबजी के लिये आया था, सुनकर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो यह दशा है कि न जाने क्यों दिमाग़ कुछ ऐसा हो गया है कि यदि उसमें कुछ विचार Gather करके एक मिनट भी रखना चाहो तो नहीं ठहरता। वैसे चाहे विचार भले ही आते चले जायें और आते क्या है, लगता है कि कोई मानों जबरदस्ती ठूंसता है। दृष्टि अन्तर में एक सेकण्ड को भी कभी जाती ही नहीं, कभी Touch करती ही नहीं और ज़बरदस्ती भी हो नहीं पाती। मानों तबियत कभी एकाग्र होती ही नहीं। मेरे लिये तो दोनों समान हो गये हैं, चाहे एकाग्र कह लो, चाहे चलायमान कह लो। कुछ ऐसा हो गया है कि जैसे Photo के चारों ओर प्रकाश बना देते हैं, वैसा चारों ओर तो नहीं, बल्कि जैसे अपनी परछाई सामने चलती है, उसी प्रकार सामने सदैव एक प्रकाश तो नहीं है, हाँ, कुछ तेज़ सा बना रहता है। या यों कह लीजिये कि बाहर अपने Atmosphere में एक तेज व्याप्त हो गया है। वह बनी तो सदैव ही रहती है, किन्तु मुझे यह तक पता नहीं रहता कि यह परछाईं किसकी है। यह तेज क्यों सदैव मेरे इर्द-गिर्द साथ रहती ही है। कहाँ से आया, क्यों उत्पन्न हो गया, यह कुछ नहीं मालूम है। इस तेज में न अँधेरा है, न उजेला है। यों कह लीजिये कि मेरे ‘बाबूजी’ शाहजहाँपुर रहते हैं, किन्तु ‘उनका’ तेज़ मेरे साथ ही बना रहता है न जाने क्या दशा है कि दृष्टि अंतर में न कभी जाती है और ले जाने पर एक क्षण भी वहां ठहरती नहीं। ध्यानावस्था भी कभी होती नहीं, चाहे पूजा में कितनी ही देर बैठे रहो। मैं तो भाई, अपने प्रियतम् से कभी प्रेम न कर सकी, न कभी अर्चना ही की, न वन्दना ही कर सकी। मैंने तो अपने मन के ‘मालिक’ का कभी दर्शन तक न किया। यही कसक कभी-कभी कसक उठती है। यद्यपि न अब मेरे कलेजे में दर्द है, न टीस है, न हूक है, न कसक है। हाँ, इतना याद है कि कभी इस हृदय के भीतर कहीं चोट लगी होगी, जिसका कभी स्मरण हो आता हो, यद्यपि मुझे पता नहीं है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर आपको प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-598
शाहजहाँपुर
16/11/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 10.11.56 का मिला। तुम्हारी यात्रा अब M1 पर है और तुमने वहीं की हालत लिखी है। इससे पहले स्थान L1 था, उससे आगे का स्थान यह है। तुम चिट्टी में देखकर लिखना कि पिछला स्थान L1 ही था।

तुमने यह जो लिखा है कि दृष्टि अन्तर में कभी जाती नहीं और जबरदस्ती भी मुझसे होती नहीं। एक हिन्दी मसल है कि “नंगी क्या नहायेगी और क्या निचोड़ेगी”। जिस चीज़ में तुम्हें चिपटना था, उसमें चिपक चुकी। अब उसकी तरंग और बाहर मिट मिटकर तुम्हें अनुभूति होती है। तुमने जो तेज अपने सामने होना लिखा है, यह जिस चीज़ में तुम चिपक चुकी हो, उसने यह तीसरी चीज़ पैदा कर दी है, जो शुद्ध है। हर इन्सान में यह चीज़ रहती है, मगर मनुष्य जो बुरे विचारों और दुनियादारी का असर लिये हुए हैं, उनका तेज या अक्स वैसा ही रहता है। एक बात तुम्हें नई बताता हूँ, जब मनुष्य की Changeless Condition हो जाती है, तो फिर इस अक्स का पसारा कुल Universe में हो जाता है। जी का न ऊबने के माने यह है कि अब जी, जी ही नहीं रहा।

तुम्हारा यह खत संक्षेप में जवाब दिया है। छोटों को दुआ। चौबेजी को प्रणाम। 

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-599
लखीमपुर
11/11/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, मेरा पत्र पहुँचा होगा। आप की तबियत अब कैसी है? अपनी तबियत का हाल लिखियेगा। 'मालिक' की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो यह दशा है कि पता नहीं कि कर्म बंधन से मैं बँधती हूँ या स्वतंत्र हूँ। मुझे तो लगता है कि बंधन या स्वतंत्रता एक ही शब्द है। बंधन, स्वतंत्रतता, आत्मा, ईश्वर, साधना, साधक, प्रेम, भक्ति, यह पूजा सब मुझे एक उड़ती सी बातें लगती हैं। अब की बार तो शाहजहाँपुर में कुछ ऐसा हाल रहा कि आप और मैं आमने-सामने खाट पर पूजा पर बैठी रहूँ, तो यह नहीं कभी लगता कि सामने कोई बैठा है। वैसे चाहे मिलना न मालूम हो, परन्तु वापिस आने में जी खिंचता है। यद्यपि उसका भी कारण मुझे पता नहीं। स्वतः ही जी उदास हो जाता है। यद्यपि न आना होता है, न जाना। मेरे लिये तो दोनों एक समान हैं। न जाने अब क्या दशा है कि न मिलन होता है, न विरह ही कभी सताता है। मानों दोनों का अर्थ एक ही है।

पहले तबियत अति दीन व विनम्र सी हो रहती थी, परन्तु अब मेरे लिये मानों सब कुछ समान है। अब तो दशा यह है कि मेरे लिये मैं नहीं और मैं के लिये मेरा नहीं, सब खाली ही खाली है।

भाई ढोल के अन्दर पोल ही निकला, मेरी तो यही दशा हो गई है। मुझे लगता है कि मेरा, तेरा, मैं, तू एक ही शब्द है, एक ही अर्थ है, जो जरूरत के साथ स्वतः न जाने कब-कब Use हुआ करते हैं। मेरी तो यह दशा है कि मैं भोली नहीं, अनजान नहीं, होशियार नहीं, न कुछ, बस जो कुछ, जैसा भी कुछ होता रहता है, कथनी करनी व रहनी सब प्रकृति करवाती रहती है। इसीलिये मुझे कुछ मालूम नहीं। जैसा प्रकृति चलाती है, सब चलता है। मुझे तो अब यह तक पहिचान नहीं कि मेरी तबियत इधर (प्रकृति से मिली) है या उधर (ईश्वर, 'मालिक' से)। हाँ, मेरा काबू न अब इधर है, न उधर है। एक बात कुछ यह देखती हूँ कि वैसे मैं अपने दिमाग़ को चाहे आराम दे लूँ, किन्तु मैं देखती हूँ कि मेरे सोते में भी वह कुछ Work जरूर करता रहता है। अब क्या व कैसा, व कहाँ Work करता है, यह मैं स्वयं नहीं जानती हूँ, यह तो ‘मालिक’ ही जानें।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति :-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-600
लखीमपुर
19/11/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ मिला। ‘आप’ लोगों की कुशलता जानकर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो लगता है कि सर्वांग मेरे याद ही याद हो गया है। नहीं, नहीं, बल्कि यह हालत है कि मानों प्रेम, भक्ति, ज्ञान, अज्ञान, याद, विस्मरण अथवा सारी साधना का ही सृजन मेरे अंग से या इससे प्रकाशित तेज़ द्वारा ही हुआ है और मेरा यह हाल है कि मेरा तेज़-वेज़ किसी से सम्बन्ध नहीं। मैं तो अछूती ही हूँ, सदा अछूती रही और अछूती ही रहूँगी, क्योंकि न मेरे में साधना का निवास है, न सुगन्ध का वास है। मैं तो एक हस्ती, न बनने वाली, न मिटने वाली हूँ और पता नहीं कोई हस्ती भी हूँ या नहीं, क्योंकि बस केवल एक कुछ इसका ख्याल सा ही रह गया है और ख्याल भी एक रिक्त (खाली) सा है, जिसमें न ज़ोर है न ज़बर है।

कुछ यह दशा है कि जहाँ-जहाँ जाती हूँ, वहीं उजाला हो जाता है। विद्यालय में इतनी बिजली जलती रहती है, किन्तु मेरे घुसते ही लगता है कि एकदम से उजाला हो जाता है। मेरी Sub-Consciousness बावली है, बेचैन है, किन्तु मेरी Consciousness को मानों कुछ पता ही नहीं है। मुझे न दर्द है, न टीस है, न कुछ। कुछ ऐसा है कि जब 'आप' ने कहा कि मैं Half Century Cross कर चुका तो मुझे स्वयं को यही प्रतीत होने लगता है और जब एक बच्चे के सामने होती हूँ तो मैं भी वही हो जाती हूँ। मेरी वृत्ति का मुझे स्वयं कुछ पता नहीं। Age का Limitation भी है नहीं। इधर न जाने क्यों एक अवधूत सी दशा हो जाती है, परन्तु वह अवधूत सी अवधूत नहीं, बल्कि मेरी Sub-Consciousness अवधूत गति को प्राप्त हो गई है। मैं देखती हूँ कि हर आध्यात्मिक दशा व चमत्कारों का अस्तित्व मिटकर बराबर हो गया है। तेज़, जो मैंने लिखा था, वह भी मानों लुप्त हो रहा है या व्याप्त हो गया है। हृदय कसमसाता है, तबियत एक अज्ञात अनजान दिशा में समा जाने को भाग निकली है, परन्तु कोई दिशा मेरी अनजानी नहीं, कोई कुछ अज्ञात नहीं। हाल बेहाल पड़ा है, कुछ काबू नहीं, हृदय की किताब खुली पड़ी है, लेकिन उसमें कुछ लिखा ही नहीं गया। अन्तरतल सब सूना, रिक्त पड़ा है। सच तो यह है कि कुछ भी मेरी दशा हो, किन्तु मैं उससे न छूती हूँ, न अछूती हूँ। साथ रहते हुए भी अलग हूँ और अलग रहते हुए भी एक ही हूँ, यही मेरा हाल है।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति :-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-601
लखीमपुर
22/11/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र आप को मिला होगा। इधर मेरी तबियत कुछ खराब हो गई थी, परन्तु अब बिल्कुल ठीक हूँ। फिक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।  लगता है कि इस समुद्र में सब का अन्त है। हर दशा आकर ढह रही है। विशाल समुद्र के हृदय में जैसे पैसा या इकन्नी डालो तो गुप हो जाती है। इसी तरह से हर दशा का अस्तित्व मिट रहा है। यही दशा अवधूतावस्था की भी हो गई है। मानों इस गहन समुद्र में बिला गई है और मेरी तो आजकल यह दशा है कि मानों मैं तो तमाशा देखने वाली हूँ। उसी में कभी शान्त, कभी आनन्द हो जाता है, कुछ देर को। किन्तु मेरा भी अस्तित्व नहीं, वह भी तो इस समुद्र में सर्वप्रथम ही बिला चुका है। इसलिये मैं तो केवल एक तमाशबीन ही हूँ, बस और मेरा कुछ मतलब नहीं। कुछ ऐसी दशा है कि मुझे यह लगता है कि बातें व दशा मुझे अपनी Condition से ऊँची का भी आभास बराबर मिलता जाता है और मुझे तभी कुछ न कुछ अनुभव भी अन्दाज़ में आ जाता है।

भाई, मेरी तो यह दशा है कि मुझे लगता है कि मेरी Sub Consciousness मानों किसी दूसरी दुनिया में खोई रहती है, भूली रहती है। लगता है कि मेरी Sub Consciousness मानों कुल Universe में फैल चुकी है। किन्तु मुझे न जाने क्यों Consciousness हमेंशा, अब हमेंशा एक ही सी बनी रहती है। मुझे कोई काम करना कभी भूलता ही नहीं। हाँ, कुछ इतना सा हो गया है कि दिमाग में कोई विचार एकत्रित मैं कर ही नहीं सकती। एक सेकेण्ड को भी विचार स्थित रह ही नहीं पाते हैं। मैं Sub-Consciousness न जाने क्यों लिखती हूँ, किन्तु Sub-Conscious Mind तो बिला गया। उसका अस्तित्व ही मिट गया।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-602
लखीमपुर
28/11/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र आपको मिला होगा। मेरी तबियत में अभी कोई खास लाभ नहीं हुआ है। ईश्वर की कृपा से सब ठीक हो जायेगा। ‘आप’ चिन्ता न करें। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो निवेदन कर रही हूँ।

भाई, मेरी तो यह दशा है कि अन्तर मेरा बाहर हो गया है, और बाहर अन्तर हो गया है। लगता है मेरे शरीर में अन्दर-बाहर कोई चीज़ ही नहीं मिलती, जिसे ‘मालिक’ में समाहित कर दूँ, लयलीन कर दूँ। अब क्या लाऊँ, कहाँ से लाऊँ? कोई चीज़ उधार भी नहीं मिलती, जो न्योछावर कर दूँ। ‘मालिक’ बस इतना ही है कि मुझे कुछ मन ही मन शायद भाता बहुत है, इसीलिये मन चाहता है, कि सब कुछ उस पर न्योछावर कर दूँ, परन्तु सब क्या, मुझे तो कुछ भी नहीं मिलता। अब तो हैरान सी हूँ। भाई, मैंने प्रेम की परिभाषा जाननी चाही थी, किन्तु बजाय जानने के मुझे लगता है कि जो जानती थी, सो भी भूल गई। नहीं, बल्कि जो जानना चाहती थी, उसे भी भूल गई। फिर भला भक्ति में तो कदम रखना भी मुहाल है।

भाई, अब तो यह दशा है कि मेरी दशा एक बिल्कुल साधारण सब मनुष्यों के समान ही हो गई है जो चीज़ या बात मुझे हालत का पता देती थी, वह स्वयं ही न जाने कहाँ विलीन हो गई है। अब मैं करूँ तो क्या करूँ? मेरी तो अब यही समझ में नहीं आता कि आध्यात्मिकता, ब्रह्म-विद्या ये सब जैसे मानों एक मन का वहम् मात्र था, जो जाता रहा। अब तबियत में लगता है कि स्वयं कुछ नहीं है, बल्कि कुछ कुरेदन सी मानों कोई चिपकाये रहता है। मन तो है नहीं, मानों ज़बरदस्ती कोई मन नामक चीज़ चिपकाये है। चाहे कुछ चीज़ करती हूँ तो लगता है मानों कहती भर ही हूँ, महसूस कुछ नहीं होता है। यही दशा शरीर की है, कि चाहे किसी का नाम लेती रहूँ कुछ एहसास में नहीं आता, चाहे वह सामने ही खड़ा हो। अपना ही शरीर कभी एहसास में ही नहीं आता है। मुझे तो लगता है कि सब कुछ मानों वहम मात्र था, सो वहम रहा, नहीं तो जाने क्या मुझे हो गया है। पता नहीं क्या है, क्या नहीं। बाजे-बाजे समय कुछ सेकण्ड के लिये मानों शरीर मुर्दा हो जाता है। वैसे भी एकदम काया स्थिर ही रहती है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता 
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-603
शाहजहाँपुर
4/12/1956
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र सबके सब मिल गये। लिख़ैया न होने की वजह से जबाब न दे सका। अब कुल खतों का जबाब यह है-“गुड़ से मीठे हैं भगवान, बाहर-भीतर एक समान"। जब असलियत और हक़ीकत से हम सम्बन्धित हो जाते हैं और उसमें घुस पड़ते हैं, तो यह बाहर और भीतर के Vision में कोई अन्तर महसूस नहीं होता।

केसर से कह देना कि वह जो कुछ मिशन को बढ़ाने के लिये कर रही है, करती रहे, मगर जब तक मैं South India में रहूँ, उसे यह ख्याल रखना चाहिये कि वहाँ के लोग मिशन से खूब Attract हो रहे हैं और तुम तो करोगी ही। मैं 10 दिसम्बर की रात को जाकर तिरूपति 14 को पहुँचूँगा और तीन दिन बाद मद्रास। वहाँ से लिखने की कोशिश करूंगा।

तुम्हारे 17 रूपये पहुँच गये, उसमें से 15 रूपये भेजने की जरूरत नहीं थी, इसलिये कि तुम्हारे पास भी कुछ रहना चाहिये।

चौबेजी और अम्मा को प्रणाम और तुम भाई-बहिनों को दुआ। 

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-604
लखीमपुर
1/12/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, मेरा एक पत्र पहुँचा होगा, परन्तु आज फिर जी चल आया। कोई खास बात नहीं है, फिर भी जो दशा आजकल है, सो लिख रही हूँ।  मेरी तो यह दशा है कि मानों जबरदस्ती कोई मुझे इधर (यानी कुछ बेहोश होते हुए भी होश की दशा में) खींचे रहता है, नहीं तो रह-रह कर लगता है कि मानों मैं खो ही नहीं, मानों बिला (बर्बाद हो) जाऊँ। शायद इसीलिए अक्सर अपने आप ही शरीर मानों मृत प्राय हो ही जाता है।

अब तो लगता है कि जैसे कोई जबरदस्ती ज़िन्दगी को मेरे साथ चिपकाये हुए है और एहसास उसका कभी होने ही नहीं देता। हाँ, तब पता लगता है ‘उसकी’ जबरदस्ती का, जब कि अक्सर शरीर (या दशा) मानों मृत प्राय हो जाता है। उसके बाद जब जागती हूँ, तब लगता है कि जबरदस्ती मानों किसी ने जगाया है। उँगलियों से अक्सर इतना तेज Vibration निकलने लगता है कि मानों सब काँप रही हैं। वैसे तो मुझे Vibration का भी एहसास ही नहीं होता है। कुल शरीर का कण-कण स्थिर स्थित है, किन्तु न जाने क्या बात है, कि दृष्टि को, यदि किसी को पूजा कराऊँ तो एक Point पर स्थित करती हूँ, तो न जाने कौन उसमें Vibration पैदा कर देता है। उसे हिला हिला देता है।

मेरी तो यह दशा है कि ब्रह्म या जीव, आत्मा या परमात्मा यह सब उड़ती-उड़ती सी बातें लगती है। मुझे तो न ब्रह्म, न जीव, न आत्मा, न परमात्मा, कुछ लगता ही नहीं है। कहीं यह सब लोगों ने बेकार वहम की बातें तो नहीं, यह सब नहीं लिख दी है। यदि वहम कहती हूँ तो, उसमें भी कुछ तो होता, किन्तु मेरे पास तो कुछ भी नहीं। लगता है कि जो दशा है, वह भी मुर्दा है जो थी, वह भी मुर्दा थी और जो होगी, वह भी मुर्दा होगी। अब यह सब क्या है, आप ही जानें आप का काम जाने।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर ‘आपको’ प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आप की ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-605
लखीमपुर
1/12/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। यहाँ सब कुशल पूर्वक है। आशा है आप भी सकुशल होंगे। मुझे कभी-कभी आप की बहुत याद आती है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा चल रही है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो यह दशा है कि मानों एक ऐसे अथाह ( Infinite ) मैदान में जा रही हूँ, जहाँ न आत्मा की गुजर है, न ब्रह्म की रहाइश। मुझे तो न जाने क्या हो गया है कि लगता है ईश्वर तो ईश्वर होगा, किन्तु आत्मा, आत्मा नहीं है। आत्मा किसी में नहीं है, कहीं भी नहीं है। ईश्वर सबमें है, किन्तु आत्मा किसी में नहीं है। यह सब तो लगता है, अब केवल सुनी-सुनाई उड़ती-उड़ती सी बातें मात्र लगती हैं। मेरी तो यह दशा है कि प्रसाद या खाना, मेरे लिये सब समान हैं। किसी का जूठन भी खाने में मानो वह मेरे लिये प्रसाद ही रहता हैं, किन्तु प्रसाद का न विचार है, न अनुभूति। 

अक्सर कुल शरीर में तेज Vibration होता है और यह मेरा ही Vibration कुल विश्व भर में व्याप्त है किन्तु इस Vibration का स्वरूप पवित्रता है। यद्यपि Vibration तो केवल Vibration है, जो मेरे में है। बोलती हूँ तो Vibration ही निकलता है। यह शरीर जहाँ-जहाँ जाता है, Vibration ही Vibration फैल जाता है और दूसरी चीज़ कुछ ऐसा प्रकाश व्याप्त है, जो प्रकाशहीन है। लगता है कि यदि इस Vibration में तबियत मिलाकर काम करूँ, तो इतना तेज हो जाता है कि फिर तुरंत लगता है कि तबियत न जाने क्यों स्वयं इससे हट जाती है। अपनी न Will है, न Power, बस लगता है, इस Vibration में तबियत ज़रा सी मिला दूँ तो काम होने लगता है। न जाने क्यों हर आदमी ही मानों मेरे लिए गुरू हो गया है, किन्तु मुझे अपने ‘मालिक’ का कहीं पता नहीं मिलता। यदि कुल संसार में मिलकर ढूँढ़ती हूँ, तो वह मैं ही रहती हूँ, कोई और नहीं रहता। अनेकता मानों थी नहीं कभी, और वह एक भी तो नहीं है।

भाई, मुझे तो लगता है कि न कुछ सर्व- शक्तिमान है, न सर्व-व्यापी है, न सर्व-आत्मा है। पता नहीं, यह मेरा क्या हाल है किन्तु फिर भी मैं वियोगिन हूँ, क्योंकि चार-पाँच दिन हुए, मैंने एक गीत ऐसा सुना, बस तबियत उदास हो गई, कण-कण बेचैन हो उठा किन्तु न जाने क्यों, यह पता नहीं, ऐसी तबियत होने पर भी यह लगता है कि मानों यह बेचैनी ‘मालिक’ के पास से आई है, फिर चली जायेगी। किन्तु कलेजा कोई थामें था, नहीं तो कण-कण फट जावे और यह दशा थी कि कोई कह दे कि ‘श्री बाबूजी’ बहुत दूर चले गये, तो लगता है कि मेरे प्राण दूर चले गये हों, मुर्दनी छा जाती है। यह दशा है कि जाने प्रकृति, परमात्मा, यह सब मानों सुनी, सुनाई, उड़ती-उड़ती बातें हैं। मेरे मन में न अब राम पैठता है न रहीम, न प्रकृति न परमात्मा न ईश्वर न कुछ। इन बातों को सुनती हूँ तो लगता है कि मानों ये सब वहम है। आजकल मेरी समझ में कुछ नहीं आता। रात को बस ऐसा लगता है कि मानों जबरदस्ती कोई लिटाये रखता है, कुछ खबर-बेखबर रखता है, तब तक लेटती हूँ, नहीं तो जब भी चाहे, रात को दो बजे ही उठ बैठूं, न सोने की खुमारी कभी आती है, न आलस शरीर में आता है।

मेरी तो यह दशा है कि बेचैनी मानों मेरे में नहीं है। कोई बस चिपकाये रहता है या मानों कभी पीर की याद आ जाती है। किन्तु मुझे ‘मालिक’ स्वयं बेचैन यों नहीं होने देता कि मेरे बेचैन होने से कुल Atmosphere में, कण-कण में मानों बेचैनी के परमाणु दौड़ने लगते हैं।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर ‘आपको’ प्रणाम कहती है। छोटे भाई- बहनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-606
लखीमपुर
21/12/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, आप की तबियत अब ठीक होगी। यहाँ सब लोग कुशल पूर्वक है। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरी तो यह दशा है कि रह-रहकर मानों मर-मर जाती हूँ। भरे बुलावे के बीच बैठी होऊँ, उसमें यदि 5 मिनट को भी शान्त होकर चुपचाप बैठी रहूँ, तो पता नहीं, फिर तो मुझे कुछ खबर ही नहीं रहती कि कहाँ हूँ, कहाँ नहीं। होश आने पर भी न मुझे थोड़ी देर बोलना आता है, न कुछ। वैसे तो यह दशा तो मानों मेरा खवास ही हो गई है, कि होश- बेहाश ऐसे ही दिन बीतते चले जाते हैं।

अब तो भाई, न जाने क्या बात है कि अपने कण-कण में भीतर-बाहर कहीं भी ‘मालिक’ की सुगंध नहीं मिलती। कहाँ तो मुझे हर आदमी से हर चीज़ से अपनायत लगती थी और कहाँ मानो कोई है ही नहीं, कुछ महसूस ही नहीं होता, तो फिर अपनायत कहाँ का, प्रश्न ही कहाँ। खुद ‘मालिक’ में मुझे ‘मालिक’ की सुगन्ध नहीं आती। मेरी तो वह दशा है जो पूजा प्रारम्भ करने के पहले थी। बिल्कुल ऐसी, जिसे सिवाय घर-धन्धों का कुछ ज्ञान ही नहीं है। घर-धन्धे भी होते हैं, तो हों, नहीं तो इसका भी कुछ ज्ञान नहीं, क्योंकि न आगे के कार्य का सोच है, न पीछे की चिन्ता। दशा ऐसे सम पर है कि जहाँ मुझे तो स्वयं का भी ज्ञान नहीं होता और ज्ञान का भी तो ज्ञान नहीं होता। मेरी तो यह दशा है कि मैं चाहे कितना सोचूँ, ध्यान दूँ, अब न Duality का पता है, न यही कि Non-Duality में हूँ और ध्यान क्या, मेरे में अब इतनी शक्ति ही नहीं, जो इन पर Meditate कर सकूँ। मेरी तो यह दशा है कि अणु-अणु से ‘बाबूजी’ की शक्ति प्रकाशित हो रही है। मेरे शरीर के कण-कण से ‘बाबूजी’ की शक्ति प्रकाशित हो रही है। वह शक्ति क्या है, यह मुझे नहीं मालूम है।

सिर का यह हाल है कि लगता है कि कुल में जगमगा रहा है, किन्तु जगमगाने से मेरा मतलब प्रकाश से जरा भी नहीं है। न जाने कुछ कुल शरीर में कुछ ऐसा ही एक Change देख रही हूँ। मुझे तो यह भी मालूम नहीं रहता कि दशा भी मेरी है या नहीं। बल्कि दशा, दशा है या नहीं, क्योंकि मैं तो सूखी की सूखी रहती हूँ। न सावन सूखी न भादों हरी।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती है और केसर प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति :- 

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-607
लखीमपुर
21/12/1956
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा पत्र जो दद्दा के हाथ भेजा था, ‘आपको’ मिल गया होगा। यहाँ सब कुशल पूर्वक हैं। आशा है ‘आप’ भी अच्छी तरह होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो कुछ यह दशा है कि बिना पूजा के मामूली बैठे-ठाले भी आँख बन्द करके खोलूँ तो मुझे कुछ पाँच-सात मिनट तक न जाने क्यों कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता है। वैसे तो आँख खोले रहूँ या बन्द रखूँ, दोनों मेरे लिये एक बराबर है न कुछ दिखाई देता है, न छूने पर महसूस ही होता है। यही नहीं, आँख बन्द करके भी चाहे जहाँ चलती फिरूँ या आँखें खोलकर मुझे तो कोई अंतर ही नहीं मालूम पड़ता है। मैं देखती हूँ कि पहले हर समय मेरे अन्दर एक रटना सी लगी रहती थी कि ‘मालिक’ तक पहुँचना है, ‘उसे’ पाना है, ‘उस’ पर मर मिटना है किन्तु अब न जाने क्यों अन्तर में शान्ति छाई जाती है, न प्यास है, न रटना। अगर मन में यह सब बातें दोहराती हूँ तो लगता है कि जैसे मन में कुछ असर ही नहीं पहुँचता। न जाने क्या हो गया है जो करती हूँ, सो दिखावा मुझे लगता है, क्या करूँ। जिस ‘मालिक’ पर मर मिटने का मेरा प्रण था, प्रति श्वाँस-श्वाँस, नस-नस, जिस मेरे प्रण में शामिल थी, हृदय जैसे उससे भी घुल गया, साफ़ हो गया। उस पर कुछ असर ही नहीं पड़ता है। अपने को मारूँ तो भी चोट नहीं आती। किसी को डाठूँ तो डाँट सुनाई नहीं पड़ती। अब तो इस दीपक का तेल समाप्त हो गया। चाभी भरी खत्म हो गई। कलावे में लाल रंग की तमीज़ नहीं आई। कलावा अम्मा को दे दिया, लेकिन कहा कि यह है, लाल रंग का कलावा नहीं मिला। लेकिन ‘मालिक’ सम्भाले हर हालत में रहता है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्रणाम। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-608
लखीमपुर
16/1/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

पूज्य मास्टर साहब जी से आप का समाचार मिला। आप की तबियत अब ठीक है, जानकर प्रसन्नता हुई। ईश्वर सदा आप को स्वस्थ रखे। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो यह दशा है कि कोई चाहे ‘मालिक’ के प्रेम में ही बेचैन हो, तड़फड़ाये, किन्तु तो भी मेरे हृदय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और चाहता है कि कोई बेकाबू न हो, अन्दर चाहे कुछ हो। हृदय तो वास्तव में पत्थर है, और जो अपने को काबू में करने का प्रयत्न करे तो मुझे ठीक लगता है। न जाने क्या बात है कि भीतर की बात को बाहर निकालने में कुछ अच्छा नहीं लगता है। मेरा तो यह हाल है कि लगता है, प्रेम भी एक मैल है, जो धुल गया। नींद तो अब कभी आती ही नहीं। कुछ यह हाल है कि ‘बाबूजी’ को पत्र लिख रही हूँ और भूख लगी हो, तो लिख जाती हूँ कि ‘बाबूजी’ भूख लगी है। कोई बात छिपती नहीं। ज्यों की त्यों सबके सामने रहती है। यह सब क्या है, यह तो ‘आप’ ही जानें।

अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं। केसर आप को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-609
लखीमपुर
22/1/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरे पत्र मिले होंगे। यहाँ सब अच्छी तरह से हैं। आशा है, आप भी अच्छी तरह से होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो न जाने क्या दशा हो गई है कि मेरी तो तबियत की दृढ़ता वगैरह न जाने कहाँ उड़ गई है। दशा अब शुद्ध है तो स्वभाव भी बिल्कुल मुलायम हो गया है। पहले मेरी यह दशा थी कि यदि कोई मेरी प्रशंसा करता था, तो सबमें एक कुछ लहर खुशी की सी आ जाती थी। मैं चाहे उसे ‘मालिक’ की प्रशंसा में भले ही बदल देती थी, किन्तु खुशी होती थी परन्तु अब देखती हूँ कि लहर हल्की सी अन्तर में आती अवश्य है, किन्तु मानों मेरा उससे Touch नहीं होता, इसलिये अक्सर यही दशा रहती है कि यह पता नहीं रहता कि यह लहर है कहाँ, किसमें है, कुछ मानों खबर नहीं। पहले मेरी यह दशा थी कि मानों मैं हर एक की गुलाम हूँ, और सत्संगी भाइयों के तो चरणों में मानों झुकी ही रहती थी किन्तु अब तो न जाने बुत तबियत रहती है। जाने कुछ वैराग्य ही मानों तबियत का स्वरूप हो गया है। ‘आपके’ पास से लौटने वाले के आगमन में आप की बातें सुनने, आप का संदेश सुनने को बेचैन रहती थी, परन्तु दो-एक दिन भीतर मन में कुछ प्रतीक्षा सी बनी रहती है। किन्तु तबियत से उच्छृंखलता नहीं आती। वह तो ज्यों की त्यों शान्त बना रहता है, मानों हर संदेश मिला हुआ है। अब तो यह एक मन भर गया या दो मन। मुझे यह सब मानों सुनने में अब स्वप्न में बरबराना, बस ऐसी ही बात लगती है। ऐसे ही जब उत्सव का ख्याल आता है, तो जाने को बेचैनी अनुभव होती है, किन्तु यदि ख्याल न आवे तो तबियत ज्यों की त्यों बुत ही बनी रहे। यदि उत्सव का ख्याल ‘मालिक’ न देवे तो उत्सव निकल जावे और मुझे पता ही न लगे।

परसों रात करीब 8-9 बजे दाहिने हाथ के बगल की हड्डी में तमाम फड़कन हुई और लगा जैसे कोई फोड़े की कील सी निकल गई हो। भाई, अब तो न कुछ खबर है, न बेखबर। यह भी तो अब दशा नहीं है।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-610
लखीमपुर
29/1/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

बहुत दिनों से आप का कोई पत्र मुझे नहीं मिला। शायद आप दूसरे जरूरी काम में व्यस्त होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई, मानों बिल्कुल बेख्याली तबियत ही तो मेरी रहनी बन गई है। कथनी करनी, रहनी, मानों सब मिलकर एक हो गई है। यही नहीं, अन्दर, बाहर, सब में ही बेख्याली दशा व्याप्त है। बेदशा की दशा ही तो मेरा स्वरूप बन गई है और मुझे लगता है कि मानों हर एक के अन्दर ही यही दशा व्याप्त है, चाहे वह पूजा करे अथवा नहीं। कुछ ऐसी दशा है कि पूजा के लिये फूल तोड़कर चाहे कहीं रख आती हूँ, भूल से, परन्तु जब उन्हें पा जाती हूँ तो यह नहीं लगता है कि यह बेकार गये। सब मुझे पूजा के चढ़े हुए फूल के समान ही लगते हैं। मुझे कुछ दशा देखकर एक यह शेर याद आया। यही मेरी दशा है कि:-

अब तो दशा क्या है, कुछ ऐसी Resting place (आराम का स्थान) है, कि मानो न कुछ करा-धरा है, न कुछ करना धरना है, न कुछ लेना है, न देना है। न कुछ कहना है, न कुछ सुनना है। अब दशा ध्यान में रखती हूँ तो भी यही दशा है और भूल जाती हूँ, तो भी यही दशा है। अथवा यों कहिये कि चाहे ध्यान (याद) की अवस्था चाहे भूल की अवस्था हो, बस मानों अब अवस्था ही अवस्था Rest कर रही है, तो क्या ध्यान कहूँ, क्या भूल कहूँ। बेख्याल का ख्याल ही व्याप्त है, बस और कुछ नहीं और इतनी सरल और हल्की-फुल्की कि विचार इतना भारी पड़ जाता है कि उसमें डूबना तो दूर रहा, जाने Touch भी कर पाता है कि नहीं। बस मानों निगाह ही दशा में समा गई है।

भाई, सच तो यह है कि ख्याल कहूँ या बेख्याल कहूँ, दशा कहूँ या बेदशा कहूँ, वहाँ तो अब किसी भी गम्य नहीं है। न करे- धरे की गम्य है, और न कुछ करने धरने को शेष ही अनुभव होता है। यही दशा, जो भी पूजा में मेरे साथ बैठता है, उसे भी ऐसा ही अनुभव होता है। बस Rest ही मानों Rest कर रहा है।

कुल रीढ़ बिल्कुल हर समय एक साथ सीधी हो गई है। कुछ हल्की ठंढक सी फुरफुरी उसमें रहती है तथा एक नम्र सी दशा भी उसमें व्याप्त है। मुझे तो ऐसा लगता है कि जिस Basis पर मेरा जीवन टिका है, वह Basis ही मुझे सब दशा में डूब सकने में या समा जाने में बाधक बन रही है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-611
लखीमपुर
24/2/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

बहुत दिनों से आपका कोई पत्र नहीं मिला। चिन्ता लगी है। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

अब भाई, यह दशा है कि बस पर बैठी जा रही हूँ, किन्तु मुझे यह पता ही नहीं लगता कि घर में बैठी हूँ या बस में। कहीं जाने का एहसास ही नहीं होता। चाहे किसी के बैठी होऊँ, किन्तु यह पता नहीं लगता कि अपने घर बैठी हूँ या किसी और के और अपने घर भी बैठी होऊँ तो भी यह पता नहीं कि किसके घर बैठी हूँ और सच तो यह है कि घर वर का तो मुझे एहसास ही नहीं होता, चाहे कहीं बैठूं, एक ही बात है। वीरान ही वीरान पड़ा है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-612
लखीमपुर
25/2/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

अभी कल ही मैंने एक पत्र आपको लिखा है। आज फिर लिख रही हूँ। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ यह दशा है कि यदि कोई पूछे कि पूजा में अच्छा लगा, तो कह नहीं सकती, क्योंकि न तो यह पता लगता है कि अच्छा लगा या बुरा और यदि अच्छा लगने का अनुभव भी होता है, तो यह पता नहीं लगता। भूल-भूल जाती हूँ कि मुझे अच्छा लग रहा है या किसे। मुझे अच्छा लगता है तो सबको ही, वही दशा ही, मुझे एहसास लगती है। कुछ ऐसा है कि सरला जिज्जी की फिक्र लगी है, लेकिन यह पता नहीं लगता कि किसे चिन्ता लगी हुई है। जैसे पहले संस्कार की छींट मेरे हृदय पर नहीं पड़ पाती है।

भाई, अब तो यह दशा है कि यदि कोई कहता है कि कस्तूरी तुम्हें श्री ‘बाबूजी’ ने बहुत याद किया है किन्तु मेरी समझ में यह नहीं आता कि कौन कस्तूरी है, किसके विषय में ये बातें हो रही हैं।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आप की ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-613
शाहजहाँपुर
6/3/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र दिनांक 24 व 25 फरवरी 57 के मिल गये और जज साहब का पत्र भी मिला। इसमें कोई परेशानी की बात नहीं, जरूरत इस बात की है कि लोग अच्छे बनें। अगर एक भी मुझ जैसा बन जाता है, तो फिर हमारा Mission Complete है, मगर अभी तक ऐसा कोई नहीं बना कि उस झोंक को सहन कर सके, जो 22 वर्ष की मेहनत के बाद मुझे प्राप्त हुई है। अच्छे लोग मिशन में अवश्य हैं, और सबमें रोशनी मौजूद है। यह तो बड़ा अच्छा तरीका है कि सिखाने वाले की शक्ल को देखते रहें। मैंने इसको बहुत किया है जब मैं अपने गुरू महाराज के पास जाता था और उनके सन्मुख होता था, तो उन्हीं की शक्ल देखता रहता था। यह तो मैंने कह दिया था कि तुम्हारी पहुँच Point N1 पर है, मगर अभी उस Point पर मैं अधिक ध्यान न दे सका। असर उसका अवश्य है, मगर उसका Working अभी शुरू नहीं हुआ है।

मनुष्य जब सब कुछ खो बैठता है, तब उसे वास्तविक जीवन प्राप्त होता है। असल में सब कुछ खोना ही है और तुम खोती चली जाती हो। मुझे अपना एक वाक्य याद है कि जब मैं तिरूपति से चला और रेनीगुन्टा पहुँच कर मद्रास के लिये गाड़ी बदली तो वहाँ पर Dr. K.C. Vardhachari के कुछ Disciples मिले, जिनको वह आध्यात्मिक पाठ हर 15वें दिन बतौर Lecture के देते हैं। मैंने भी चलते समय एक थोड़ा सा सबक दिया था कि :- “Liquidate Yourself”. तुम ऐसा खुद-ब-खुद करती चली जा रही हो। जैसा कि तुमने अपने पत्र में लिखा है कि जब तुम्हें यह मालूम होता है कि मैं तुम्हारी याद कर रहा हूँ तो खुशी की लहर दौड़ कर फिर ज्यों की त्यों रह जाती हूँ और यह समझ में नहीं आता कि कौन कस्तूरी है। इसके अर्थ यह है कि तुम्हें अपनी खबर क्या बल्कि याद भी भूल गई और इसे बहुत उत्तम प्रकार की लय- अवस्था कहते हैं। एक वाक्य तुमने अपने पत्र में इतना अच्छा लिखा है कि- “मैं अपने स्नेह की डोर से आपको बाँधते- बाँधते स्वयं खो गई”। इसके अर्थ ये हैं कि भक्ति की लड़ी जो जुड़ी थी, उसने अपना आवरण उतार दिया। हमें भक्ति से ही चलना चाहिये और जब उसका आवरण उतर जाता है तो फिर वही ज्ञान है और जब उसकी कुरेद समाप्त हो जाये तो वहीं Reality है। जब भक्ति का आवरण उतर जाता है और ज्ञान की अवस्था आ जाती है, फिर उसमें जो भूल आरम्भ होती है, अर्थात् जब उसका अनुमान जाता रहता है, तब Divine Wisdom का प्रारम्भ है। ज्ञान का प्रभाव जाते ही, विज्ञान का पर्दा, जिसे विज्ञानमयी कोष कह लो, टूटने लगता है। अपनी समझ और अपनी बुद्धि ईश्वरीय होने लगती है। अब विज्ञान का भी पर्दा टूट गया तो फिर क्या ? Divine Wisdom भी अपने भाग को असल भण्डार में लय करना आरम्भ कर देती है। कहीं ऐसा हो गया, तो फिर यहाँ के पहुँचे हुए अभ्यासी के कहने में Automatic Divine Wisdom ही छलकती है, मगर इस नई लड़ी को अभी समाप्त होनी नहीं कहना चाहिये। इसका गुम होना तो तब है, जब कि नस-नस में वही असर पैदा हो जाये, जो असल में है। 

कल 5 फरवरी को रात्रि में मैंने एक स्वप्न देखा कि मैं कुछ सत्संगियों को Sitting दे रहा हूँ। वहां पर क्या देखा कि जहाँ सत्संगी तवज्जोह ले रहे हैं, वहाँ पर से आसमान इतना नज़दीक है कि हाथ से छू सके और आसमान पर सितारे अपनी चमक ऐसे दे रहे हैं कि उसकी रोशनी जो कि Dim इतनी है कि अब भी दिल उसको देखना चाहता है। इस स्वप्न की तावीर (Interpretation) जाने क्या है। स्वप्न अवश्य अच्छा है।

चौबेजी और अम्मा को प्रणाम तथा तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

तुम्हारा शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-614
लखीमपुर
6/3/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का आज ही मिला, पढ़कर प्रसन्नता हुई। पूज्य मास्टर साहबजी से मालूम हुआ कि ‘आपको’ कुछ जुकाम-खाँसी है, ‘आप’ दवा बराबर खाते रहिये। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो यह दशा है कि कहाँ तो अपने को याद करने का प्रयत्न करने पर भी व्यर्थ ही जाता था और कहाँ अब, कि अपने को भूलने का प्रयत्न करती हूँ तो ऐसा लगता है कि मानों जैसे नाटक के ऊपरी पर्दे पर बात रह जाती है, भीतर तो असर लेने का माद्दा ही नहीं रह गया है। Sitting लेती हूँ, तो कोरी बैठी रहती हूँ। देती हूँ, तो भी यह पता नहीं एहसास में आता कि Sitting जा रही है या नहीं। क्योंकि मुझसे तो वह छूती ही नहीं। मैं तो भाई, ऐसा हो गया है कि पत्थर हो गई हूँ। बस इतना जरूर है कि मनुष्य मात्र के लिए मैं पत्थर नहीं हूँ। उनके दुःख-दर्द में सदैव साथ हूँ, लेकिन पूजा के लिये पत्थर हूँ।

मेरी तो ऐसी दशा है कि जहाँ कोई सत्ता नहीं, न मानवीय, न ईश्वरीय ही, न बन्दगी की और न ‘मालिक’ की ही। न पालक सत्ता है, न विनाशक। सत्ता नाम के शब्द का जहाँ कोई अर्थ नहीं है। ऐसा लगता है कि दशा के अनुभव करने में न तो अब रहनी ही पहुँच पाती है और न अनुभव ही पूरा पहुँच पाता है। बस केवल एक अन्दाज़ मात्र ही लग जाता है, वह भी ‘मालिक’ की कृपा से व ज़बरदस्ती से कहिये और भाई, अब तो यह लगता है कि अंदर ही अंदर स्वयं ही मेरी अपनी तवज्जोह हो जाती है। सिर के बीच सहस्त्र दल कमल के बिल्कुल लगे में बाईं ओर लगता है कि जैसे कोई हाथ के अँगूठे से सिर दाबे है। लगता है कि कोई हालत अपने अन्दर से बाहर को फैलती चली जा रही है और ऐसा लगता है कि जैसे अनार में से फुलझड़ी निकलती है, वैसे ही अन्दर से फुलझड़ी के समान दशा बाहर को फैल रही है। ऐसा कभी नहीं हुआ। यदि मुझसे कोई कहता है कि तुम तो स्वतंत्र आत्मा हो, तो भी मुझे इसका कुछ आभास नहीं मिलता कि आखिर स्वतंत्रता क्या है और कुछ ऐसा है कि मुझे हँसी-खेल में कोई बच्चा बाँध देता है, तो भी कभी बंधन एहसास में ही नहीं आता। चाहे कोई दशा फैले या कुछ हो, मुझे लगता है कि मैं तो ज्यों की त्यों ही बनी रहती हूँ। मुझमें तो किसी हालत में कभी भी अब Change ही नहीं होता।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-615
लखीमपुर
15/3/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। यहाँ सब अच्छी तरह से हैं, आशा है, ‘आप’ भी अच्छी तरह से होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

न जाने क्या बात है कि पहले मुझे अपने चारों ओर पवित्रता का पावन Atmosphere मौजूद लगा करता था। जहाँ निकल जाती थी, वहाँ पवित्रता की लहर दौड़ जाती थी। किन्तु अब कभी अन्दाज़ तक नहीं आता, अनुभव तो दूर रहा। यही नहीं, मुझे जब आपके पास जाती हूँ, तो भी कुछ अन्दाज़ नहीं आ पाता है। सच तो यह है कि मुझे तो लगता है कि पवित्रता भी मानों एक मैल था, जो हृदय से धुल गया। यही नहीं, कहने को ‘श्री बाबूजी’, ‘बाबूजी’ रटा करती हूँ, किन्तु वह केवल रटना ही रह जाता है। कोई हस्ती अन्दाज़ में नहीं आती। बस, अब हृदय में नहीं, बल्कि इस पत्थर पर कोई मैला नहीं रह गया है, पूजा का भी नहीं। केवल पत्थर तो पत्थर ही रहेगा, यही मेरा हाल है। कुल शरीर अब पत्थर की मूर्ति ही बन गया है। आगे-पीछे कहीं भी अब पिघलन नहीं, सरलता नहीं, मुलायमपन नहीं अनुभव होता है। बस अब तो कस्तूरी नहीं। उसका रूप तो पत्थर बन चुका है, जो कि जल चढ़ाने पर भी भीगता नहीं। फूल चढ़ाने पर भी सजता नहीं है। हाँ, अब तो श्रीरामचन्द्र मिशन की Building की नींव रखने में ही यह पत्थर ‘मालिक’ के काम आ सकता है। ‘मालिक’ इस पत्थर को उठाकर कभी ऊपर रख देता है, तो कभी कहीं रख जाता है और न रखे तो वहीं पड़ा रह जाता है। चाहे मिट्टी चढ़े या धूल मैं तो ज्यों की त्यों हूँ।

मैंने पहले किसी पत्र में लिखा था कि बेहोशी में भी मेरे अन्दर एक होश सा पैदा हो गया है, किन्तु अब तो लगता है कि बेहोशी का तो आवरण ही उतर चुका है और होश का भी मैल चढ़ता नहीं। मुझे तो अब कुछ पता नहीं लगता है। दृष्टि भी आंतरिक कभी होती नहीं, फिर भी ‘मालिक’ मुझे Saint लिखते हैं। मुझे तो अब कुछ ऐसी दशा एहसास में नहीं आती, लेकिन ‘आप’ मेरे हैं, ‘आपकी’ सब बात मुझे अच्छी लगती है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-616
लखीमपुर
24/3/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

अब तो यह दशा है कि पत्थर को चाहे नदी में डालकर कोई ठंढा बना दे, चाहे अग्नि में डालकर गर्म कर दे, पत्थर, पत्थर ही रहेगा। इसमें से तो राख भी नहीं झड़ सकती। अब तो यह दशा है कि पहले मुझे सब लोग सब कुछ छाया मात्र ही दीखते हैं, किन्तु अब तो पता नहीं, न छाया-मात्र न कुछ, मुझे सब ज्यों की त्यों है। जो हाल पूजा से पूर्व था, सब वैसा ही हो गया और यह दशा भी अब ऐसी है कि जैसे एक धुँधली सी स्मृति मात्र किसी को कभी आ जाती हो। कुल शरीर व दिमाग में जैसे Vibration हुआ करता है, किन्तु मेरी कुछ अजीब दशा है कि कुल शरीर में हर समय Vibration होते हुए भी मानों मेरा इससे कोई सम्बन्ध नहीं, कोई स्पर्श नहीं। न जाने एक अब यह न जाने क्या लगता है कि कुल शरीर की हड्डी-हड्डी, माँस-माँस, नस-नस, जो है, सोई हो गई है। सब जैसी थी, वैसी ही हो गई है। शायद इसीलिए इसमें कोई भार ही नहीं रह गया है। होना या न होना, ज्यों की त्यों हो गया है। अब कुछ ऐसा हो गया है कि दिनभर बोलती हूँ, किन्तु इससे कभी सरोकार तक नहीं कि न कभी कुछ बोझ, कि बोलचाल रही हूँ। ज्यों की त्यों बोलती जाती हूँ, क्योंकि बोलना मुझे पता ही नहीं लगता। चाहे दुनिया की बातें बोलूँ, या पूजा की। मुझे बोलने का कभी एहसास ही नहीं। ‘मालिक’ ने साम्य अवस्था की बड़ी तारीफ़ की, किन्तु मेरी तो हालत इतनी हल्की हो गई है कि कभी साम्यावस्था उसे स्पर्श भी कर सकेगी या नहीं - कभी नहीं, मेरा जबाब है।

न जाने क्या बात है कि आँख बन्द किये पड़े रहने पर भी आँख लगती है, कभी बन्द ही नहीं होती। आँख बन्द अथवा खोलने में दशा एक सी ही रहती है। कुछ ऐसा लगता है कि आँख बन्द करने पर भी चारों तरफ खूब घूम फिर सकती हूँ।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-617
लखीमपुर
27/3/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

पूज्य मास्टर साहबजी से ‘आप’ सबकी कुशलता के समाचार ज्ञात हुए। ‘आपको’ कभी- कभी दौरा हो ही जाता है। ईश्वर शीघ्र ही इसे अच्छा कर दे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई, यह हाल है कि अंतर की कुरेद ही मंद पड़ गई है, शान्त होती जाती है। आग बुझ गई, राख भी झाड़ दी गई। आग भी ऐसी थी, जो कालिख भी न छोड़ गई, जिससे कभी यह कोई विश्वास कर लेता कि यहाँ कभी आग जली भी थी। उन्नति मुझे नहीं मालूम पड़ती। कुछ ऐसा लगता है कि याद सता जाती है, किन्तु उसका अन्दाज़ा नहीं लगता है। ऐसा ही हाल है कि कुछ अन्दर आनन्द जरूर रहता है, लेकिन यह अन्दाज़ा ठीक नहीं लगा पाती कि आखिर खुश कौन हो रहा है। यानी यह आनन्द मुझे है या किसी और को। यही हाल तकलीफ़, दर्द आदि में भी रहता है। बाज समय तो बिल्कुल ही धोखा हो जाता है। कमजोरी में दिन भर आँख बन्द किये पड़ी रही, परन्तु यह अन्दाज़ कभी न स्थिर कर सकी कि मैं कमज़ोर पड़ी हूँ और कुछ यह है कि यह भी नहीं लगता कि कोई दूसरा पड़ा है, बल्कि बस केवल दर्द व कमज़ोरी का तो एहसास हो जाता है, किन्तु किसे है, यह अंत तक तय नहीं हो पाता। यही दशा अपनी आत्मिक उन्नति का भी हो गयी है कि उन्नति तो अन्दाज़ में आती है और दशा का भी अनुभव होता जाता है, परन्तु स्वयं मानों ज्यों की त्यों ही बनी रहती हूँ। यह सब न जाने कैसा मेरा उल्टा-उल्टा हाल हो गया है कि उधर उन्नति में भी ‘मालिक’ शामिल रखता है, किन्तु ज्यों की त्यों भी बनी रहती हूँ। जब कोई Liberated Soul के बारे में कहता है, तो मुझे लगता है कि मानों यह सब मेरा जाना हुआ है, वैसे मुझे कुछ पता नहीं रहता। मैं कुछ भी नहीं जानती हूँ मेरे लिये तो मानों इन सब बातों का कोई महत्व ही नहीं रह गया है। सब जैसा का तैसा ही पसारा है। मेरी तो यह दशा है कि मेरे तो अंतर की श्रद्धा भी मर चुकी है। चाहे कितने बड़े महात्मा का नाम सुनूँ, तो भी श्रद्धा नहीं होती। Liberated Soul के बारे में सुनती हूँ, किन्तु श्रद्धा नहीं उत्पन्न होती। चाहे किसी को 10 Circles या 12 Circles सुनूँ, तो भी अन्तर में श्रद्धा नहीं उत्पन्न होती। चाहे कितने चमत्कारों की बात सुनूँ, किन्तु श्रद्धा नहीं जागती।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-618
शाहजहाँपुर
3/4/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र कई प्राप्त हुए, पर उत्तर इस कारण से न दे सका कि समझ में नहीं आया कि इन बारीक हालतों के कारण बताने में शब्दों का जामा (आवरण) कैसे पहिनाया जावे। मगर फिर सोचा है कि कुछ लिख ही दो। जब लिखने बैठा तो यही आया कि लय-अवस्था और फिर उसकी लय-अवस्था इसका छोर अभी दूर तक चला जावेगा। हमने जितनी बातें अपने में पैदा कर ली है, उन सबको उन्हीं में सिमट जाना है कि जो उसके कारण हैं। किसी ने लिखा है कि संसार नहीं है, बल्कि अपने विचार उसको प्रगट किये हुए हैं। लिखने वाले की यह दिमागी पहुँच थी, मगर बात यह है कि जब हम अपने एक परिवार सहित असल में आ जाते हैं, तो वही असल एक वस्तु भासने लगती है। जब हम अनेक थे, तब हमारे सामने अनेकपन था और जब हम एक हो गये तो वह एक चीज़ सबमें भासने लगी और जब यह बात भी न रही कि एकता का भाव या अनेकता का भाव, फिर सामने अब कुछ नहीं दिखाई देता। मगर यहाँ अभी अन्त नहीं है। यही तुमने लिखा है कि पहले सब कुछ मुझे छाया मात्र ही दिखाई पड़ते थे, अब न छाया है, न कुछ। इस हालत में अगर बोलता है तो वही बोलता है, जिसको बोलना है। बस इसी हाल को तुमने अपने पत्र में तरह तरह से लिखा है।

चौबेजी तथा अम्मा को प्रणाम तथा तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-619
लखीमपुर
3/4/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का पूज्य मास्टर साहबजी के लिये आया था। उसमें ‘आपकी’ कमज़ोरी का हाल सुनकर कुछ चिन्ता बढ़ गई। खैर, ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ ‘आप’ जल्दी ठीक हो जायें। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, न जाने मेरा क्या हाल है कि पावन-ईश्वरीय धारा भी मुझे स्पर्श नहीं करती, तो वह भी मुझे पवित्र नहीं बना पाती है और पूजा का कोई भी लक्षण मुझमें नहीं, क्या करूँ? अब तो न पवित्रता का आभास मिलता है, और न अपवित्रता का, किन्तु चैन नहीं है। आज से दशा की थकान मिट चली है। हाँ, चित्त में मानों कोई पीर, कभी चमक मार जाती है, जिसका असर बेपीर की पीर का अन्दाज़ा मात्र हो जाता है, किन्तु प्रियतम की याद लेकर अब कोई नहीं आता। अब तो मिलन और बिछोह का मैल भी घुल गया है। दशा अब इतनी गहराई में चलती है कि जो कि चिमटे रहने पर भी चिमटे रहने के अन्दाज़ का बोझ नहीं सम्भाल सकती, नहीं, बल्कि न चिमटना, न अन्दाज़, अब कोई मैल नहीं चढ़ता। इस बेराह की राह पर ले चलने वाला केवल एक मेरे ‘श्री बाबूजी’ ही हैं। मैं तो जैसी हूँ, वैसी भी नहीं जानती हूँ। जानने से तो मेरा कुछ अर्थ ही नहीं।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर आप को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-620
लखीमपुर
6/4/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र आप को मिला होगा। बहुत दिनों से आप इधर नहीं आये। कभी अवसर मिले तो यहाँ भी एक-दो दिन के लिये हो लें। यहां सब सकुशल है। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरी तो यह दशा है कि जानना या न जानना, मेरे लिये तो दोनों एक ही समान हो गया है। जानूँ तो क्या जानूँ, यह नहीं पता और न जानूँ तो क्या न जानू, यह पता नहीं। मेरी तो यह दशा है कि मन ने दशा को ही अपना श्री बाबूजी मान लिया है। ऐसे ही श्री बाबूजी से केवल मानकर ख्याल द्वारा चिपटने का ध्यान करती रहती हूँ। यद्यपि मैं देखती हूँ कि प्रभाव इसका भी मानों कुछ मेरे ऊपर होता नहीं और संतोष भी यों नहीं होता कि मानने को भी याद भूल-भूल जाती हूँ। लगता है, न जाने क्यों जैसे कुल सिर की नस-नस मानों ढीली (हल्की) पड़ गई है। यहाँ तक कि हड्डी तक लगता है कि खोखली, नरम पड़ गई है और ईश्वरीय प्रकाश हर नस-नस से निकल रहा है। जिसमें प्रकाश क्या, बल्कि मानों हल्केपन की ज्योति बाहर निकल रही है या हल्कापन बाहर छन-छन कर आ रहा है। 

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार।

सदैव आपकी ही कृपा-कांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-621
शाहजहाँपुर
10/4/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र 3 तथा 6 अप्रैल सन् 1957 के प्राप्त हुए। दोनों का एक साथ उत्तर दे रहा हूँ। अब तुममें तो Energy तन्दुरुस्ती बढ़ाने वाली आरम्भ हो गई होगी। तुमने अपने 3.4.57 वाले पत्र में लिखा है कि “मुझे अपने में पवित्रता का भी कुछ आभास नहीं मिलता”। उसका आभास तो तब होता है, जब अपवित्रता हो। बिना Comparison के किसी वस्तु की वास्तविकता का पता नहीं चलता। ईश्वर की थाह इसीलिए नहीं मिलती कि उसको Compare करने के लिये उसके अनुसार कोई वस्तु नहीं मिलती। दशा में तो परिवर्तन होता ही चला जाता है, परन्तु इतना सूक्ष्म है कि पता नहीं चलता। जहाँ पर कि Changeless दशा है, वह तो मनुष्य के पहुँचने का अन्त है। बिना दर्द के पीर, यह पीर का वास्तविक Nature है। जब मनुष्य पानी की खोज में रेगिस्तान में चलते-चलते दूर पहुँच जाता है और पानी की बेकली उसके विचारों को चकनाचूर कर देती है, तो फिर बेकली भी रहते-रहते एक शान्ति (चैन) की दशा मज़बूरी में कर देती है। मगर पानी की वास्तविक तृप्ति नहीं होती। उसके परिश्रम से कहीं पानी बरसने लगता है, जो कि समुद्र ही से, जिसका कि नदी एक छोटा भाग है, तो फिर जिस पानी की उसे खोज थी और जिस आवश्यकता के लिये थी, वह पूरी हो जाती है और कहीं पानी इतना बरसा कि तालाब भर गया तो नदी व समुद्र की ओर बहुत समय तक ख्याल नहीं जाता। अब ‘उसके’ लिये मिलन की इच्छा तो यूँ कम हुई, क्योंकि वस्तु मौजूद है और विछोह यूँ नहीं कि चीज़ Narrow रूप में मौजूद है। मगर Reservoir उस समय मिलेगा, जबकि इस तालाब का पानी पीकर खर्च कर दो। इसलिये कि फिर उसकी तलाश पैदा हो जावेगी। मैंने विछोह तथा मिलन की हालत जो तुम्हारे पत्र में दी हुई है, यूँ समझाया है। समुद्र अभी बहुत दूर है, इतना कि जहाँ पर तुम हो, वहाँ पर देखने से भी अभी नज़र नहीं आता, मगर यह समुद्र के निकट पहुँचने के चिन्ह अवश्य हैं।

यदि तुम अपने आप को ऋणी समझती हो तो मुझ पर तुम्हारा यह एहसान है कि तुमने वह अमानत (Security) जो तुम लोगों के लिये ही मेरे पास रखी है, उसको लेना आरम्भ कर दिया है और मैं इसलिये उत्तर देने से बच जाऊंगा कि जिन लोगों के लिये यह अमानत जमा थी, उसको बांटा क्यों नहीं।

6 अप्रैल के खत में जो तुमने लिखा है कि “जानूँ तो क्या जानूँ, और न जानूँ तो क्या न जानूँ”। इसके तात्पर्य यह है कि कामनायें (Desires) नहीं रही है। सिर में कुछ Matter पता न चलने के अर्थ यह है कि झीने Matter से भी सम्बन्ध हट गया है और सम्भव है कि अव्यक्त गति निकट हो। जब सूक्ष्मता में लय-अवस्था उत्पन्न होने लगती है तो बाहरी संसार का आवरण हट जाता है, इसलिये बाहर, भीतर एक ही सा प्रतीत होने लगता है। यह गति बहुत अच्छी है, मगर रहना किसी गति में नहीं है और सिर का ढीलापन मालूम होना यह शारीरिक दुर्बलता का कारण है।

अम्मा तथा चौबेजी को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों एवं बहू को शुभ आशीर्वाद !

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-622
लखीमपुर
14/4/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आप के आशीर्वादों से भरा हुआ कृपा-पत्र मिला। पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो कुछ यह दशा है कि सब लोगों के नाम पुकारती हूँ, किन्तु उस नाम के साथ किसी भी रूप का कोई सम्बन्ध ही नहीं होता। जैसे किताब में कल्लू नाम पढ़ा जावे, तो बस, पढ़ता जावेगा, उसकी कोई आकृति सामने कदापि नहीं आती, किन्तु बड़ा ताज्जुब है कि इस पर भी केसर को बिट्टो और बिट्टो को केसर कभी भी नहीं निकलता।

अब तो यह दशा है कि शरीर भर ही क्या, बल्कि, भीतर-बाहर सब कुछ तो Vibration रहित हो गया है। कभी-कभी अचानक Heart में जरूर कुछ Vibration सा होने लगता है, बाकी तो कुल सब व्यर्थ ही रह गया है। न जाने क्या दुनियाँ है मेरी कि काम सब करती हूँ, किन्तु मानों अपना शरीर तक हिलता नहीं। रिश्ता, कुल संसार से है, लेकिन सम्बन्ध का नाम नहीं है। Vibration अब एक ऐसी चीज़ हो गई है कि जिसका मानों कोई अर्थ ही नहीं है। बात सबसे करती हूँ, किन्तु है कोई नहीं, आवाज तक नहीं है। सांस तक से अपना मानों सम्बन्ध नहीं है, आये न आये। मरने की बात या जीने की बात सब एक समान है। मेरी तो अब यह दशा है कि न अपनी मौज है और न ‘मालिक’ की ही मौज होती है। फिर मुझे नहीं मालूम कि मैं ‘उनकी’ मौज़ में चल रही हूँ या क्या बात है, यह तो ‘आप’ ही जानें।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर प्रणाम कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-623
लखीमपुर
15/4/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आप के आशीर्वादों से भरा हुआ कृपा-पत्र मिला। पढ़कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो कुछ यह दशा है कि सब लोगों के नाम पुकारती हूँ, किन्तु उस नाम के साथ किसी भी रूप का कोई सम्बन्ध ही नहीं होता। जैसे किताब में कल्लू नाम पढ़ा जावे, तो बस, पढ़ता जावेगा, उसकी कोई आकृति सामने कदापि नहीं आती, किन्तु बड़ा ताज्जुब है कि इस पर भी केसर को बिट्टो और बिट्टो को केसर कभी भी नहीं निकलता।

अब तो यह दशा है कि शरीर भर ही क्या, बल्कि, भीतर-बाहर सब कुछ तो Vibration रहित हो गया है। कभी-कभी अचानक Heart में जरूर कुछ Vibration सा होने लगता है, बाकी तो कुल सब व्यर्थ ही रह गया है। न जाने क्या दुनियाँ है मेरी कि काम सब करती हूँ, किन्तु मानों अपना शरीर तक हिलता नहीं। रिश्ता, कुल संसार से है, लेकिन सम्बन्ध का नाम नहीं है। Vibration अब एक ऐसी चीज़ हो गई है कि जिसका मानों कोई अर्थ ही नहीं है। बात सबसे करती हूँ, किन्तु है कोई नहीं, आवाज तक नहीं है। सांस तक से अपना मानों सम्बन्ध नहीं है, आये न आये। मरने की बात या जीने की बात सब एक समान है। मेरी तो अब यह दशा है कि न अपनी मौज है और न ‘मालिक’ की ही मौज होती है। फिर मुझे नहीं मालूम कि मैं ‘उनकी’ मौज़ में चल रही हूँ या क्या बात है, यह तो ‘आप’ ही जानें।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर प्रणाम कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-624
शाहजहाँपुर
19/4/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा एक पत्र 14.4.57 का तथा एक 15.4.57 का प्राप्त हुआ। 19 अप्रैल को मेरे जीवन का नया वर्ष आरम्भ हो गया। तुम सब लोगों ने कुछ न कुछ खुशी मनाई और मुझे कुछ यह खेद होना चाहिये कि हमारी गिरह से एक साल निकल गया। आज के दिन के लिये, जैसा तुमने कहा था, वैसा मैंने कर दिया सब लोगों ने ‘मालिक’ के फ़ैज से फ़ायदा उठाया होगा।

पिछले पत्र में तुम्हारी हालत व्यक्त करने के लिये रूपक दशा, अर्थात् (Metopharical Language) में लिख दिया था और कोई ढंग इसको समझाने का नहीं मिला। चलना और न चलना, समान मालूम होना, इस बात का प्रमाण है कि तुम अपने आप को बिल्कुल भुला चुकी हो और उसके बाद जो चीज़ रह जाती है, वह भी लय होती चली जा रही है। यह तुमने ठीक ही लिखा है कि खेमा (तम्बू) जहाँ पर कि तुम्हें वर्तमान स्थान से जाना है, वहाँ गड़ा मिलता है। हमारे ‘लालाजी’ की शिक्षा कुछ ऐसी ही है कि जिस स्थान पर अभ्यासी को पहुँचना चाहिये, वहाँ के जौहर का बीज पहली ही Sitting में आरम्भ हो जाता है। अब जो लोग इस बीज को अपना लेते हैं, वह फिर चलते ही चले जाते हैं। समुद्र का आनन्द तो कुछ ने कुछ, अगर एहसास तेज है तो, पहले ही दिन से आना आरम्भ हो जाता है।

तुमने एक बात अपने पत्र में लिखी है कि किसी के मरने-जीने की बात एक ही सी प्रतीत होती है। इसके यह अर्थ है कि तुम्हें जीवन और मृत्यु से कुछ सम्बन्ध नहीं रह गया है। दोनों सम्बन्ध टूट गये हैं और यह जीवन-मोक्ष-अवस्था, जो कि तुममें बहुत पहले आ चुकी है, उसके प्रमाण में यह वाक्य भी है- “यदि कहीं मृत्यु की भी मृत्यु हो जावे तो, उसमें जो जीवन उत्पन्न होता है, वह जीवन उस हालत को बता देगा और पता देगा कि हम किसकी खोज में हैं”। मगर अभी चलना और रहेगा।

अब जो तुम्हारा 15 अप्रैल का पत्र है, तथा उसमें जो स्वप्न देखा है, वह बड़ा अच्छा है। उसके अर्थ ये हैं कि अब वास्तविक जीवन का प्रारम्भ हो गया है। हमने तो जब से अभ्यास आरम्भ किया, बराबर मोक्ष आत्माओं को स्वप्न में देखते रहे। चिरकाल तक ऐसा हुआ है कि कम से कम सप्ताह में दो बार ऐसे स्वप्न आते रहे और यह भी हुआ कि ऐसा फ़ैज मिला है कि जिसका सहन करना मनुष्य के लिये सम्भव नहीं है। अब यह ‘लालाजी’ की तारीफ़ है कि जो सहने से अधिक होता था, वह उस समय मालूम होता था कि ‘उन्होंने’ ले लिया। जब Initiation की बारी आई तो कई महात्माओं ने स्वप्न में मुझे Initiate किया। जब हम Initiation के लिए सहमत नहीं होते थे तो वहाँ पर हमारी तबियत ऐसी बना दी जाती थी। यह बातें उसको पेश अधिक आती हैं, जिसको ‘मालिक’ से प्रेम बहुत बढ़ जाता है। इस प्रकार की बातें अभी तक और सत्संगियों से मुझे नहीं मिली है।

तुम्हारी N1 की यात्रा पूरी हो चुकी है, अब O1 का स्थान आवेगा। मगर तुम्हारा स्वास्थ्य जरा और ठीक हो जावे। Dr.K.C.Vardhachari के बहुत प्रेम पूर्ण पत्र आते हैं और वह ईश्वर की कृपा से अच्छी उन्नति कर रहे हैं।

चौबेजी व अम्मा को प्रणाम तथा तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ। 

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-625
लखीमपुर
21/4/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। यहाँ सब कुशल पूर्वक है। आशा है, ‘आप’ भी सकुशल होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, न जाने अब तो कुछ यह दशा है कि कोई कहता है कि वृद्धावस्था में यह होता है, कोई कहता है कि बाल्यावस्था में यह होता है, किन्तु मेरा तो यह हाल है कि हर अवस्था मानों एक समान ही रहती है। हर अवस्था एक ही अवस्था ( वह मानों मेरी जो दशा है) बस, वही हो गई है और मेरी अवस्था को अवस्था कहना भी निरर्थक है। एक मानी हुई दशा है, एक माने हुए ‘श्री बाबूजी’ को ही साथ लिये हूँ, वह भी दिन भर भूल भूलकर और साथ क्या लिये हूँ, साथ रखने पर भी मानों साथ कभी होता ही नहीं। प्रत्यक्ष रहते हुए भी मानों प्रत्यक्ष (दर्शन) कभी होता ही नहीं और दर्शन क्या होगा, जबकि दर्शन, दर्शन नहीं है। क्या खूब एक अलौकिक मार्ग है, एक अलौकिक अव्यक्त गति है न कुछ कहना, न सुनना भाता है।

मेरी तो दशा आदि और अन्त के पार ही रहती है। सिर के बीच माँग के लगे में दाहिनी ओर एक पोरे भर जगह में Vibration सा रहता है तथा सिर में आगे माथे भरे में तथा नाक की पूरी हड्डी में नोक तक मानों दिन भर में अक्सर बहुत गुदगुदी की सिहरन दौड़ जाती है ऊँगली का पोर-पोर मानों खाली पड़ा है। पीठ भर में तथा रीढ़ की हड्डियों तक में Tale bone के नीचे तक मानों ऊपर कहीं से सिहरन सी आती रहती है। दो-तीन माह से नाभि के अन्दर बड़ा हल्कापन सा रहता है और लगता है कि अन्दर फैलाव हो गया है। मेरा तो मानो Construction ही Change हो गया है। मुझमें चाहे कोई Change हुआ हो या न हुआ हो, मैं नहीं जानती, लेकिन रूह पलट चुकी है, किन्तु पलट कर क्या हुआ यह नहीं मालूम है, यह तो आप ही जानें और आप का काम जाने, मुझे तो कुछ नहीं मालूम।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर आप को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-626
लखीमपुर
1/5/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का पूज्य मास्टर साहब के लिये आया। उसी से आपके समाचार ज्ञात हुए। आप का स्वास्थ्य ठीक है, जानकर सब को खुशी हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

न जाने क्यों कुल शरीर का तो रंग-रंग साफ़ व खाली लगता है, लेकिन शरीर के होते हुए हृदय पर कुछ भारीपन रहता है। ऐसे ही अपनी दशा से System कुछ भारी ही लगता है न जाने क्यों अब आँखे कभी मूँदना ही नहीं जानती। दशा में खुल जाती हैं।

न जाने क्या बात है कि हृदय में वह बहाव नहीं, जो पहले था। वह मस्तानगी नहीं, जो पहले थी। अब तो एक उजड़ा हुआ वीरान चमन ही भीतर-बाहर सब हो गया है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव ही कृपा कांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-627
लखीमपुर
9/5/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

एक पत्र डाल चुकी हूँ, मिला होगा। इधर दशा कुछ थोड़ी सी और बदल गई है। वह जो कुछ और जितना समझ सकी हूँ, लिख रही हूँ।

याद जो मेरे जीवन का एक अंग थी, वह भी घुल गई है, नहीं, बल्कि याद की याद यानी भूल में भी एक प्रकार का जो विस्मृत स्मरण होता था, वह भी मानो Sub-Conscious Mind में घुलकर हृदय बिल्कुल हल्का व स्वच्छ (खाली) हो गया है। अब तो मैं देखती हूँ कि, बेहोशी में भी मानों Sub-Conscious Mind में या क्या, एक होश बना रहता था, किन्तु अब तो पता नहीं, कौन चीज़ आती है, जो, सबको धोकर चली जाती है, किन्तु अपना पता मुझे नहीं देती है। अब तो न कभी बेहोशी का एहसास होता है और होश का भी तो अन्दाज़ नहीं। लगता है ‘मालिक’ भी मानों ग़ैर हो गया है। मानों न मेरा ‘उससे’ सम्बन्ध है, न कभी था। मैं जिसे ‘मालिक’ पुकारती हूँ, ‘उसका’ अपना कोई पता नहीं। मुझे ‘उसका’ कोई पता नहीं, किन्तु दिल में एक बिना कचोटन की एक कचोटन है, जो मेरे स्वरूप को अचल व स्थिर नहीं हो जाने देती है। Practically Nil नहीं हो जाने देती है। यह दशा है कि कोई मेरा हाथ पकड़े चलता है, तो मुझे एक क्षण को भी न पकड़ने या छूने का एहसास होता है और अलग बिना छूते हुए चलती हूँ तो न अलग चलने का और न बिना छूने का ही एहसास होता है।

आज रात को ऐसा स्वप्न देखा कि एक विशालकाय भव्य मूर्ति महात्मन् मेरे मस्तक पर हाथ रखे हुए कह रहे हैं कि तुमने कोई अपराध नहीं किया, तुम्हें जीना है, अवश्य ही जीना है। उठो, काम करो। तबसे मानों हृदय से यह घुल गया कि ‘आप’ को मुझसे कोई तकलीफ़ पहुँचती है। मेरे Health में ताज़गी आ गई। मैं उठ पड़ी, किन्तु मेरी आँख खुल गई। वे कोई काम मुझे न बता सके। अब तो मुझे जीना है, क्यों? पता नहीं। अब तो हालत कोई आती जान नहीं पड़ती, जाती ही चली जाती है। क्या मैं ‘मालिक’ को जी भर कर प्रेम न कर सकूँगी ? क्या मैं उस मधुर छवि पर न्यौछावर न हो जाऊँगी? क्योंकि मैं देखती हूँ कि मुझमें अब मेरी ही गम नहीं है। प्रकाश जो चारों ओर छाया रहता था, उसका भी पता नहीं है। लगता है कि ‘मालिक’ कोई दिव्य या अलौकिक दशा खोलते जा रहे हैं।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार।

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-628
लखीमपुर
18/5/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

बहुत दिनों से आप का कोई पत्र नहीं मिला और न आपका कोई समाचार ही मिला है। चिन्ता लगी है। आशा है आप कुशल पूर्वक होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ ऐसी खाली दशा है कि नम्रता की दशा भी उससे इतनी ठोस है कि जो सोचने से भी अन्दाज़ में टिक नहीं पाती। उस खाली दशा का अन्दाज़ केवल वीराना, उजाड़ या खाली दशा कहने से ही आभास में आ पाता है, वरना कोई उपमा नहीं। अब तो यह दशा है कि न मिठास है, न कड़वापन (तुर्शी)। लगता है कि जनून की भी अब गुज़र नहीं है। नहीं, अब तो गुज़र की भी गुज़र नहीं है। बस अब तो एक ही बात है कि ‘आप’ मुझे सिखाये जायें और मैं सीखे जाऊं। हालत, वालत कुछ नहीं। प्रेम व भक्ति से कोई सरोकार नहीं, वह भी घुल गया। मुझे तो Initiation का भी पता नहीं चलता। कहाँ कब, कैसा Initiation मानों कभी अब तो कुछ हुआ ही नहीं।

अब तो यह दशा है कि चाहे जिस Function में घूम आऊँ, किन्तु सब वीराना ही वीराना नज़र आता है। मेरा स्वयं का स्वरुप ही वीराना हो गया है। सब लोग जानते हैं कि मुझे कोई तकलीफ़ है, जो कि मैं हँसती बोलती हूँ कम, किन्तु मैं क्या करूँ, मेरा तो स्वरूप ही वीरान हो गया है। चाहे कोई ध्यान में से उठा ले, तो बुरा नहीं लगता है, बैठने दे या न बैठने दे, कुछ बुरा नहीं लगता है और न कोई विशेष पूजा से प्रेम ही रह गया है। जब पूजा में मेरा देवता ही नहीं प्रतीत होता, ..तो पूजा क्या। पूजा तो मेरी शून्य हो गई है। मेरा रूप ही शून्य हो गया है। मेरा तो स्वरूप अचल व स्थिर है। मैं तो जो हूँ, वह पता नहीं। मैं जो करूँ, सो पता नहीं। अब तो लगता है कि बाहर-भीतर सारे में, सब शून्यता ही शून्यता राज्य कर रही है। एक अजीब मुर्दा-अवस्था सी है, कि न एक, न दो, कुछ भासता ही नहीं है। मेरा तो अब न जाने क्या हाल हो गया है कि अपना आगा पीछा मानों घुल घुलाकर सब एक ही हो गया है। व्याह में गई, तो भी मेरे लिये सब मानों वीराना ही था। तमाम भीड़ में भी न मेरे लिये कुछ कचकच थी, न भड़भड़, बिल्कुल शान्त था।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

सदैव आप की ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-629
शाहजहाँपुर
27/5/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारे कई पत्र मिले। सोचता रहा कि जवाब क्या दूँ, इसलिये कि तुम्हें भी अब हालत लिख नहीं मिलती और हमें भी अब जबाब दे नहीं मिलता। मैं चाहता तो यह हूँ कि जब तक जबाब निकल सके देता रहूँ। अब मुझे याद नहीं, तुमने ख़तों में क्या लिखा। अन्दाज़ ज़रूर है कि तुमने वीराने की हवा खाई है और वही वीरानापन पत्रों में व्यक्त किया है। अब वीराने की तह को अगर हम देखें तो कोई चीज़ ऐसी जरूर मिलेगी, जिसका असर ख्याल में मौजूद है। यह जिसको तुम ठीक नहीं लिख सकी O1 की हालत है। यहाँ की हालत ऐसी है जैसे किसी के यहाँ मौत हो गई हो और रौनक इस वज़ह से चली गई हो। मगर हमें जरूरत है कि इस वीराने की भी मौत हो जावे। अभी तो सिर्फ वह यह बता रहा है कि किसी की मृत्यु हुई है, परन्तु वीराने की स्वयं मृत्यु नहीं हुई, इसका इन्तज़ार करना चाहिये और इसमें समय लगेगा। असल में यह हमारी हालत है, जो इतने दिन चलने के बाद व्यक्त हुई है। वीराने की मौत हो जाने के यही माने है कि हम स्वयं उस हालत पर चले जायें। वैसे तो मरने के बाद भी कुछ न कुछ रह ही जाता है, इसलिये इस रह जाने वाली चीज़ की मृत्यु की जरूरत है। मगर जहाँ तक मृत्यु होगी, कोई न कोई सूरत उसकी रहेगी। जब ये सब सूरतें खत्म हो जायें तब भूमा से निस्बत ( सम्बन्ध ) होने की उम्मीद है।

तुम्हारे भाई-बहिनों को आशीर्वाद व अम्मा को प्रणाम !

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-630
लखीमपुर
28/5/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कल पूज्य मास्टर साहब से मालूम हुआ कि इधर ‘आप’ कुछ अस्वस्थ हो गये हैं। आप की साँस उखड़ गई थी। आशा है, अब ‘आपकी’ तबियत ठीक होगी। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मैं ईश्वर-ईश्वर कहती हूँ, किन्तु ईश्वर की कलई मुझ पर खुल चुकी है। “नाम सुन पहुँची वहाँ, देखा वहाँ तो कुछ न था”। मैं तो लुटी हुई, वीराना हुई घूम रही हूँ। अब तो यों कह लीजिये कि जिसकी वज़ह से दशायें आती थीं, वह वज़ह अब नहीं रह गई है। पूजा करने या कराने, किसी में भी ईश्वरीय धारा का आभास तक नहीं मिलता है और मुझे तो यह सब बातें भूल गई लगती हैं। पूजा का मानों कोई तत्त्व ही नहीं है। अब दशा शब्द मेरी हालत से भारी लगता है।

मेरी तो यह दशा है कि जो कुछ अब तक अनुभव किया था, वह भी सब धुल गया खूब गाऊँ-बजाऊँ, किन्तु न शोर सुनाई पड़ता है, न कोई आवाज़ या ध्वनि। लगता है कि जो या जहाँ से Origin हुआ है, उससे ही सम्बन्ध टूटकर बराबर हो गया है। वीराना भी भूल-भूल जाती हूँ। उसे बार-बार याद करके पकड़ती हूँ ताकि कोई अनुभव या आनन्द रहे, किन्तु जब मैं ही बेहोश हूँ, तो सब कुछ मानों अब हाथ या मुट्ठी से निकल गया। रह-रह कर एक ऐसे मैदान (या स्थान) की हवा लग जाती है कि जिसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है। मेरी Power भी अब नहीं रही, जो पकड़ सकूँ। रह-रह कर उस हवा से स्नान हो जाता है, जिसमें नहाकर भी सूखी ही बनी रहती हूँ।

बीच सिर में जहाँ माँग काढ़ी जाती है, तो माँग के किनारे-किनारे बाँईं ओर पाँचों उंगलियों से दबा रहने पर भी उस हाथ के नीचे कोई चीज़ जाग चुकी है जो ऊपर आने को फड़फड़ाती है, परन्तु वह हाथ के नीचे दबी फड़फड़ाती रहती है। कुछ ऐसी दशा है कि पहले जैसे अक्सर Inactiveness की दशा बार-बार आ जाती थी, अब तो लगता है कि वही तो मेरा स्वरूप हो गया है। ऐसा मैदान मैं तो पार कर रही हूँ कि जिसमें मानों मेरा स्वरूप ही समाया हुआ है और यह Inactive स्वरूप पार होता जा रहा है। अब तो ऐसे घेरे में घुस पड़ी हूँ, जहाँ बस सफ़ाई ही सफ़ाई है। मेरा स्वरूप में से मेरा निकाल दीजिए इस घेरे की दशा के बारे में मैं क्या कहूँ, कुछ कहा नहीं जा सकता है। कोई चाहे जितना, चाहूँ भी तो शाहजहाँपुर न जा सकूँ, तो भी कुछ मानों बुरा नहीं लगता। अब तो कुछ ऐसी दशा या मैदान है कि जैसे होश थके पथिक को बिल्कुल आराम व निश्चिन्तता मिल गई हो। मानों पथिक को दरिया का किनारा मिल गया हो। अब दशा क्या है, जैसे राँड़ की रौनक चली गई हो। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-631
लखीमपुर
4/6/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

एक पत्र आपको लिखकर पूज्य मास्टर साहब को दे दिया था, ‘आपको’ मिल गया होगा। मेरी तबियत अब बिल्कुल ठीक है। आशा है, ‘आप’ भी अब स्वस्थ हो गये होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

मुझे तो ऐसा लगता है कि न जाने कैसे अब Points व स्थानों की सैर हो जाती है, वरना जिनमें विचार की भी गम नहीं, मानना भी भूल-भूल जावे, उसकी सैर की गुंजाइश कहाँ, किन्तु ‘मालिक’ कुछ ऐसा कर देते हैं, कि सामने कुछ मैदान सा फैल जाता है और बिना विचारे सैर शुरू हो कर समाप्त भी हो जाती है।  अब तो भाई, दशा क्या है, न हँसी है, न खुशी है, न गाना है, न रोना है। अब तो मुट्ठी खुली है। यह भी पता नहीं कि क्यों चली थी और अब तक क्या हुआ, लेकिन इतना अवश्य है कि फिर भी दशा से कोई एक सेकण्ड पीछे हटा दे तो यह बंदिश स्वीकार नहीं है। तबियत न गहरी है, न उथली है, न प्रकाश है, न अँधेरा है, न आदि है, न अन्त है और न सबेरा है, न शाम है, न ठंढक है, न गर्मी है, न ऊसर है, न बहार है। अब तो आँख बन्द करने पर भी न अँधेरा है और आँख खोलने पर न उजेला ही होता है। हालत न अच्छी है, न बुरी है।

लगता है सिर में माँग के बाईं ओर कोई चीज़ उतरती है, फिर पूरे बाँये सिर में घूमती है। भाई, जहाँ रहूँ, ‘मालिक’ की रहूँ। जैसी रहूँ, ‘उसकी’ रहूँ। चाहे इसका पता भी ‘वह’ दे या न देवे और रहूँ या न रहूँ, फिर भी ‘मालिक’ की ही रहूँ।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। केसर आप को प्रणाम कहती है। छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव ही कृपा कांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-632
लखीमपुर
17/6/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

एक पत्र आपको लिखकर पूज्य मास्टर साहब को दे दिया था, ‘आपको’ मिल गया होगा। मेरी तबियत अब बिल्कुल ठीक है। आशा है, ‘आप’ भी अब स्वस्थ हो गये होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

मुझे तो ऐसा लगता है कि न जाने कैसे अब Points व स्थानों की सैर हो जाती है, वरना जिनमें विचार की भी गम नहीं, मानना भी भूल-भूल जावे, उसकी सैर की गुंजाइश कहाँ, किन्तु ‘मालिक’ कुछ ऐसा कर देते हैं, कि सामने कुछ मैदान सा फैल जाता है और बिना विचारे सैर शुरू हो कर समाप्त भी हो जाती है।  अब तो भाई, दशा क्या है, न हँसी है, न खुशी है, न गाना है, न रोना है। अब तो मुट्ठी खुली है। यह भी पता नहीं कि क्यों चली थी और अब तक क्या हुआ, लेकिन इतना अवश्य है कि फिर भी दशा से कोई एक सेकण्ड पीछे हटा दे तो यह बंदिश स्वीकार नहीं है। तबियत न गहरी है, न उथली है, न प्रकाश है, न अँधेरा है, न आदि है, न अन्त है और न सबेरा है, न शाम है, न ठंढक है, न गर्मी है, न ऊसर है, न बहार है। अब तो आँख बन्द करने पर भी न अँधेरा है और आँख खोलने पर न उजेला ही होता है। हालत न अच्छी है, न बुरी है।

लगता है सिर में माँग के बाईं ओर कोई चीज़ उतरती है, फिर पूरे बाँये सिर में घूमती है। भाई, जहाँ रहूँ, ‘मालिक’ की रहूँ। जैसी रहूँ, ‘उसकी’ रहूँ। चाहे इसका पता भी ‘वह’ दे या न देवे और रहूँ या न रहूँ, फिर भी ‘मालिक’ की ही रहूँ।

मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। यहां सब कुशल पूर्वक है। आशा है आप भी सकुशल होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई अब तो यह दशा है कि याद-याद सबसे कहती हूँ, किन्तु याद के अर्थ तक खुद को मालूम नहीं। अब तो यह दशा है कि जैसे ही ‘आप’ पूजा कराना शुरू करते हैं, वैसे ही, और जब तक, कराते रहते हैं, तब तक Automatic ही विचारों की लड़ी सी बँध जाती है, और इससे मुझे आराम भी मिलता है और इसके सहारे बैठी रहती हूँ, किन्तु यदि यह न आवे तो, आँख बन्द करते ही तबियत घबराकर आँख खुल जाती है और दिन भर कुछ भारीपन व हल्का सा दर्द होने लगता है। ऐसे ही पूजा कराने में भी Heart में कुछ दर्द व भारीपन पैदा हो जाता है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार।

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-633
शाहजहाँपुर
4/7/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभ आशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र मिला। ‘मालिक’ का धन्यवाद है कि तुम सब लोग अच्छे हो रहे हो। तुम्हारी हालत के बारे में यह लिखता हूँ कि-

“नानक शून्य समाधि में, नहीं साँझ नहीं भोर”।

तुम्हारे भाई-बहिनों को आशीर्वाद और चौबेजी और अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-634
लखीमपुर
12/7/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो न जाने यह क्या दशा है कि अक्सर बैठे-बैठे झूमने सी लगती हूँ। पता नहीं क्या, अन्दर देखते ही, अपने आप ही न जाने कब तक, झूमती रहती हूँ। जब अक्सर उस झूमने का झटका या कुछ चेत ही कहिये, आता है, तो अन्दर शून्य ही पाती हूँ। न कोई आनन्द पाती हूँ, जिससे झूमती हूँ और न कोई ऐसी दशा। लेकिन आँखे अंदर जाते ही बस शरीर का स्वत: ही हिलना शुरू हो जाता है। मुझे इसका मन में कुछ अक्सर आश्चर्य हो जाता है कि भला ऐसी लगन व प्रेम कि मालिक मुझे किस तरह सँभालता जा रहा है। लगता है कि अन्दर-बाहर, सब एक अजीब सन्नाटा छाया हुआ है और छाया क्या, बल्कि मेरा रूप ही यही हो गया है। कुछ ऐसा है कि मैं एक अजीब बात देखती हूँ कि शक्ति का या Will Power का तो पता ही नहीं है, वरन् एक प्रकार की दृढ़ता आ जाती है, जो स्वयं Work पूरा कर देती है।

छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-635
शाहजहाँपुर
16/7/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र दिनांक 12.7.57 को हस्तगत हुआ और केसर का भी पत्र मिल गया। यहाँ से इसमें सन्देह नहीं कि चौबेजी अपनी आत्मिक उन्नति चाहते हैं, मगर कुछ स्वभाव ऐसा बन गया है कि अपने जिस्म को आराम हर प्रकार से देना चाहते हैं और अभ्यास जो करते हैं, उससे उनके दिल का लगाव बिल्कुल नहीं होता है, जिसका कारण मोहब्बत की कमी कहा जा सकती है। अलावा इसके कुछ आदत ऐसी बन गई है कि वह ईश्वर-प्राप्ति तो अवश्य चाहते हैं, मगर ईश्वर से कुछ मतलब नहीं रखते, इस कारण से बहुत से नुख्स पैदा हो गये। अभी तक उन्होंने किसी को न अपना बनाया और न किसी के हो रहे। दोनों में से एक काम भी नहीं किया है। इस बात पर अगर वह खुद विचार करें और थोड़ा सा आराम में खलल डालें और लगाव बढ़ायें, तभी जीवन अच्छा सुधर सकता है। यहाँ तक हमें आध्यात्मिक इतिहास बताता है कि लोगों ने ईश्वर प्राप्ति के लिये कितनी- कितनी Sacrifices की हैं, तब कहीं ईश्वर तक पहुँचे और वह भी एक जीवन में नहीं, जाने कितने जीवन लगे होंगे और मैं तो कोई Sacrifice भी नहीं बताता, बस इतना कहता हूँ कि अपनी तबियत उस तरफ ऐसी करें जो हटाये से भी न हटे।

अब तुम्हारी हालत बताता हूँ। यह ठीक है कि O1 की सैर तुम्हारी समाप्त हो चुकी। यह तुम्हें जो सन्नाटा छाया हुआ मालूम होता है, यह उस जगह की सफ़ाई है। यह सन्नाटा जो है, यह एक शक्ति है, जो दूसरे के लाभ के लिये प्रयोग की जा सकती है और किसी जगह को वीरान बना देने में भी प्रयोग हो सकती है। परन्तु इसका प्रयोग नहीं करते, जब तक कि ईश्वरीय-हुक्म इस कार्य के लिये न हो गया हो। यह जो तुमने लिखा है कि “बैठे-बैठे तुम झूमने लगती हो”। इसको Soul का नृत्य कहा है। अगर और गहरे जाओ और इसको प्राकृतिक तरीके में देखो तो इसमें कुछ अर्थ और निकल सकते हैं। जब आत्मा ही आत्मा थी और सृष्टि के पैदा होने का समय आया, तो वह हलचल जो हुई या क्षोभ कह लो, यह नृत्य उसी तरह का है।

केसर का पत्र आया। उसने लिखा है कि “कहीं भी देखती हूँ, परन्तु क्या देखती हूँ, कुछ समझ नहीं पाती” इसके अर्थ यह है कि हृदय बाहरी चीज़ का Impression नहीं लेता और इसलिये संस्कार नहीं बन रहे हैं। बाकी दिल का घुलना और Soul का घुलना जो उसने लिखा है, इसके यह अर्थ हैं कि जिस्म का मान हल्के-हल्के जा रहा है।

अम्मा तथा चौबेजी को प्रणाम।
शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-636
लखीमपुर
14/7/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

पूज्य मास्टर साहब के पत्र से आप का समाचार मालूम हुआ। यह जानकर खुशी हुई कि आप स्वस्थ हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो न जाने क्या हो गया है कि जो कोई शक्ति सदैव से बराबर मुझे अपनी ओर खींचती चली आ रही थी और जिसके सहारे बराबर मैं खिंचती चली जा रही थी, सो अब इधर कुछ समय से बिल्कुल ठप हो गया। खींचने वाला आकर्षण न जाने क्या हो गया और की भी गुंजाइश जाती रही। पता नहीं क्या हो गया है।

इधर जब से ‘आप’ गये, रात भर, रोज सपने में बस Functions देखती रहती हूँ, भीड़ देखती हूँ। उसमें कभी अपने को मालिक की गोद में पाती हूँ, और बराबर पास तो बैठी ही रहती हूँ। इस पर भी अक्सर आप को अपने सिर पर हाथ फेरते या रखे, अब भी याद कर के तबियत गदगद् हो उठती है। अब तक तो भाँति-भाँति की मौन लहरें एवं मौन शिकनें मिलती रहीं, जिनका केवल आभास या अन्दाज़ मात्र ही था किन्तु अब तो सब ओर बराबर सतह ही फैली है। सलवट या लहरों का अन्दाज़ भी अब आभास में नहीं आता। ऐसी दशा है कि मानों तमाम झाड़-झंखाड़ों से निकलते, चलते, पार होते भी अब थकान के बजाय शीतलता में सो कर उठने के बाद सा Rest फैला है।

अब तो बस, सब कुछ भूल गया है। अब तो यह कहना भी व्यर्थ है कि पूजा शुरू करने के पहले की हालत है। हालत शब्द की मानों गुज़र नहीं रह गई है। अब तो न जाने यह हाल है कि अनजाने में झूमने पर भी सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर भी Senses में न मज़े का एहसास आता है, न बेमज़े का ही एहसास होता है।

अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-637
लखीमपुर
28/7/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का आया। पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की अपने ऊपर अहेतुकी कृपा का कहाँ तक धन्यवाद दिया जा सकता है। बस ‘उसकी’ ऐसी ही कृपा इस गरीबनी के ऊपर बनी रहे।

लगता है कि मानों न कोई सृष्टि है, न कोई रचना है, न कार्य है, न कर्त्ता है। लगता है कि अब तो न सन्नाटे का आभास है, न कुछ। बस भीतर-बाहर, आगे-पीछे, पैर से होकर सिर तक सब कुछ Calm and Quiet का स्वरूप हो गया है। सब कुछ एक ही हो गया है। अपना तर्ज़ व तरीका, रहन व सहन, सब कुछ मानों एक ऐसी ही स्थिति में ढल गया है और यह दृश्य ऐसा Natural हो गया है कि दशा तो यह भी नहीं है, वह तो जो है, सो है। दशा तो अपनी जैसी बस स्वयं वही है। लगता है कि मानों ईश्वर का खुला हुआ रूप मेरे चारों ओर फैला है। कुल शरीर के अन्दर समाया है और मेरे हृदय में यह सब समाता चला जा रहा है। लगता है मानों ईश्वर का ईश्वरत्व, विराटत्व मेरे में बिला गया है। कोई Open, Fresh आरामदेह स्थिति में मैं समाती चली जा रही हूँ। लगता है कि कण-कण से स्थूलत्व निचुड़कर बाहर हो गया है। लगता है कि मेरे शरीर का कण-कण मथ लिया गया है और ईश्वर का विराट स्वरूप मेरे हृदय में समाता चला जा रहा है और इतनी तेजी और जल्दी, बस समाता जा रहा है कि मैं नहीं जानती कि यह सब इतना विराटत्व कहाँ समाता चला जा रहा है। यह सब क्या है, यह तो ‘आप’ ही जानें।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आपकी ही कृपा कांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-638
लखीमपुर
12/8/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आप का पत्र पूज्य ताऊजी के लिये आया। उसी से आप की कुशलता का समाचार मिला। यहां भी सब सकुशल है। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक- दशा है सो लिख रही हूँ।

लगता है कि मानों कोई सीमा टूट गई है और इधर कुछ की धारा सी एक बह रही है। हर जीवधारी का अपनत्व या अहं मानों यहाँ डूब गया है। एक विराट स्वरूप फैल गया है और वह सब का सब मेरे हृदय में समाता चला जा रहा है। इतनी शुद्ध व सरल तबियत का स्वरूप ही हो गया है। हृदय बिल्कुल सरल तथा विनम्रता की धारा बन गया है। मेरी तो यह दशा है कि ‘मालिक’ से बिल्कुल बेलौसी सी हालत रहती है। मैं तो इस सबकी केवल दृष्टा-मात्र (देखने वाली भर) हूँ, यह मेरा हाल है। पता नहीं मुझे कि यह सब क्या हो रहा है।

भाई, एक दिन ऐसा हुआ कि दो भाई पूजा करने बैठे, तो एकदम से अपने आप लगा मानों हृदय का सम्बन्ध समर्थ ‘श्री लालाजी’ से हो गया और तवज्जोह बराबर आप ही देते रहे। उस दिन सबके सब आनन्द मग्न हो गये। मेरी यह सब कुछ समझ में नहीं आता है। मैं तो हैरान हूँ। मैं तो एक गरीब उन्हीं की लड़की हूँ। मेरा तो यह हाल है कि ‘मालिक’ से बेलौसी है और पूजा से वैराग्य है।

मेरी तो यह दशा है कि सादगी या Simplicity का भी आभास नहीं है। मेरी दशा तो ऐसी है कि खरीदी हुई चीज़ को कभी ‘मालिक’ किसी से सँवार दे, कभी किसी से सजाकर किन्तु वह तो जैसी की तैसी ही मानों जब उसका आभास भी होवे तबियत में, तो भी मानों मुझे Touch नहीं कर पाती है। शान्ति का एहसास भी यही बताता है कि चाहे कुछ आवे या ना आवे मुझे जाने क्या हो गया है कि कोई भी चीज़ तबियत को Touch ही नहीं कर पाती है। समय पर चीज़ आती है और चली जाती है, किन्तु मुझे मानों अब कोई मतलब ही नहीं है। दशा यह है कि तमाम विचारों के रहते हुए भी विचार तबियत को नहीं पकड़ पाते हैं, किन्तु खाली रहने में भी एक अजीब बात है कि अच्छी लगती है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-639
लखीमपुर
26/8/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र मिला होगा। यहाँ सब कुशल पूर्वक हैं, आशा है आप भी सकुशल होंगे। अब जो अपनी आत्मिक-दशा ईश्वर की कृपा से समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

भाई, न जाने क्या बिल्कुल Blank ही बनी रहती हूँ, मानों यह मेरा स्वभाव व जामा ही बन गई है। 5-6 दिनों से ऐसी कुछ उदास सी भूली सी दशा चल रही है कि मैं तो लाचार सी फिरती हूँ। भूली सी कहूँ या खाली सी कहूँ, कुछ समझ में नहीं आता है। सोचती थी कि सब लोगों के आने से भीड़ में ठीक हो जावेगी, परन्तु ऐसा नहीं हुआ।

भाई कल सबेरे मुझे न जाने क्या हो गया, लगा जैसे कि खुद मेरा कण-कण सामने बिखरा पड़ा है और एक-एक कण मैं उठा कर देखती जाती हूँ, तो मानों अपना नहीं, वरन ईश्वरीय शक्ति का स्वरूप ही पाती हूँ। फिर देखा, कि आप का कण-कण बिखर गया और जिन कणों को मैं देख रही थी, उनमें ये कण समाते-समाते लीन होते-होते समाप्त हो गये। फिर सारे कण-कण अन्तर्ध्यान हो गये। अब मुझे पता भी नहीं, कुछ ऐसी दशा है कि मानों कोई नई बात नहीं हुई। बस अब तो मानों मेरा अन्तर इतना स्वच्छ है, मानों शीशे की तो कोई उपमा ही उसमें नहीं अब बैठती है। बिल्कुल Pure साधारण दशा है। जाने मुझे क्या हो गया है कि पूजा कराते समय यह ख्याल कि आप पूजा करवा रहे हैं, इसको करना, न करना, बराबर हो गया है। मुझसे अब कोई ख्याल ही नहीं बाँधा जाता है और जोर मुझमें रह नहीं गया है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। केसर आपको प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-640
शाहजहाँपुर
31/8/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र 26 अगस्त सन् 57 का लिखा हुआ प्राप्त हुआ। तुम्हारा आध्यात्मिक हाल पढ़कर मैं गद्गद् हो गया। पूजा तो होना अब असम्भव सा है और है तो यह भी बन्धन, मगर इस बन्धन के बिना बँधे हुए छुटकारा भी नहीं होता। तुमने अपने शरीर को जो कण-कण बिखरे हुए देखे हैं, इसका मतलब यह है कि परमाणु जिससे तुम बनी हुई हो और Activity पैदा कर रहे हैं, उन्होंने अपना काम छोड़ दिया है और ऐसा होने के बाद एक Natural दशा, जो बड़ी ऊँची हालत है, आ गई है। यहाँ तो लोग जीवन-मोक्ष-दशा को सब कुछ समझ बैठे हैं और इससे आगे वह और कुछ नहीं समझते। उनके कान में जोर से कहकर पूछो कि यह क्या हालत है ? अब उसमें ईश्वरीय प्रभाव का एहसास होना, यह अर्थ रखता है कि परमाणु ने अपनी Basic (मौलिक) हालत ले ली है, मगर उनमें कुछ भारीपन जरूर है। मगर उसको तौलने में बाट जवाब दे देंगे। अब मेरे जिस्म के परमाणु उस जगह प्रवेश होना यह मतलब रखता है कि यह नमक उन परमाणुओं को भी नमक बना देंगे और Weight और वज़न जो कुछ कि बाकी है, उसको हटाने में सहायक होंगे।

अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-641
शाहजहाँपुर
2/9/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

मैं एक पत्र भेज चुका हूँ- मिल गया होगा। इलाज तो तुम्हारा शुरू हो गया होगा और ईश्वर करे जल्द फ़ायदा होकर तुम्हे सेहत हो। मैं सितम्बर के दूसरे हफ्ते में देहली जाऊँगा, मगर अभी कोई ज्यादा ठीक नहीं है।  अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-642
शाहजहाँपुर
4/9/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र आया। मैं दो पत्र डाल चुका हूँ, मिल गये होंगे। तुम्हें इस वक्त अपनी बीमारी को दूर करने और तन्दुरूस्ती के बढ़ाने का ही ख्याल रखना चाहिये और इस सबको पूजा समझो, क्योंकि जिस्म को ठीक रखना भी हमारा धर्म है, ताकि ईश्वर की याद कर सको और दूसरों की सेवा।

तुमने लिखा है कि आगे जाने के लिये जी हुटहुटाता है, यह ठीक है, मगर तुमने यह गौर नहीं किया कि कुल हालतें, जो अब तक आई हैं, उनका फैलाव हो रहा है। यह भी ईश्वर का एक Boon है।

मैं देहली जाना चाहता तो जरूर हूँ और मैं कोशिश भी कर रहा हूँ, मगर घर की उलझनें जाने नहीं देती। बहुत से जरूरी काम पेट पालने के, इस समय दरपेश है।

अम्मा को प्रणाम !

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-643
लखीमपुर
5/9/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आप’ का मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। यहाँ भी सब लोग कुशल पूर्वक हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, कुछ ऐसा लगता है कि सब दशायें फैली हुई है। मेरे भीतर-बाहर हर कण-कण में (दशा का) फैलाव हो गया है। लगता है कि नाभि में कोई चीज़ खुलना चाहती है। अक्सर कुछ ऐसा दर्द होता है कि मानों कोई चीज़ खुलना ही चाहती है। लगता है कि मानों मेरे भीतर- बाहर सब बड़ी मुलायमियत फैल गई है, या यों कहना ठीक होगा कि वही मेरा स्वरूप हो गया है। न जाने क्या, लगता है कि मानों मेरा कुल रूप सफ़ेद चट्टान की तरह से हो गया है। कुछ ऐसा लगता है कि हृदय पर मानों कुछ Vibration की Link सी बँधी रहती है, कहीं से Vibration आया करता है। अब तो सदैव एक ऐसी समान शान्त दशा रहती है कि सोते- जागते तथा भूले हुए में भी वह दशा तो समान रूप से बनी ही रहती है। ऐसी दशा लगती है जैसे किसी का सारा दर्द, पीर, हर चुकी हो। न रोना आता है, न हँसना आता है, न जीना आता है, न मरना आता है। बस ज्यों की त्यों मैं हूँ या पत्थर की चट्टान सी फैली हुई है। न झूमना आता है न घूमना आता है, न भीड़ बुरी लगती है, न एकान्त प्रिय लगता है, न कोई प्रिय लगता है, न अप्रिय। कोई कैसी भी भावना पास फटकने ही नहीं पाती। मेरे लिये हर बात समान ही रहती है। मेरे स्वभाव में भाई, कुछ ऐसा Change हो गया है, कि मुझे अब बोलना नहीं आता, चाहे प्रेम की बातें हों, चाहे कोई चर्चा हो, क्योंकि मन में कोई बात आती ही नहीं। हाँ, बीच में पड़कर बोलने लगूँ तो बोलने लगूँ।

अम्मा ‘आपको’ आशर्वाद कहती हैं और केसर आप को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-644
शाहजहाँपुर
15/9/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारा 5 सितम्बर का मिल गया। तुमने लिखा है कि ऐसा मालूम होता है कि चलते हुए, चलने का अन्दाज़ मालूम नहीं होता, इससे यह मालूम होता है कि तुम चलते-चलते चाल भूल गई, अर्थात् कार्य के Impressions कहीं पर नहीं बनते। हमने किसी खत में लिखा भी है और फिर लिखता हूँ, ब्रह्म की परिभाषा है-

“बिन पग चलै, सुनै बिन काना ।
कर बिन कर्म, करै विधि नाना ॥”

यह जिसको तुमने होश पैदा होना लिखा है। यह मरने के बाद जो ज़िन्दगी पैदा होती है, वह वही ज़िन्दगी है। गँवारू शब्दों में:-

“चौबेजी की कस्तूरी तो मर चुकी है, अब उसकी कस्तूरी है, जिसकी सब जगह महक़ फैली हुई है।”

तुमने यह जो लिखा है कि दुनिया में जो कुछ किसी के पास है, वह सब आप का ही दिया हुआ है। यदि कहीं ऐसी अनुभूति हो तो, कि तुम्हारे पास जो कुछ है, वह सब इन्हीं लोगों का दिया हुआ है, तो बहुत ही अच्छा है।

अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-645
लखीमपुर
17/9/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ जो पूज्य ताऊजी के लिये पूज्य मास्टर साहब के हाथों आया था, उसे सुनकर प्रसन्नता हुई। ‘आपकी’ तबियत भी ठीक है, सुनकर खुशी हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

आज रात को तो सबेरे इतना आनन्दमय स्वप्न देखा कि कुल प्रकाश ही प्रकाश व्याप्त है। मैं सोच रही हूँ कि अरे ! सारी दुनिया कहाँ चली गई, जो यह सब ईश्वरीय प्रकाश ही प्रकाश व्याप्त हो रहा है। क्या महाप्रलय हो गयी और मुझे पता भी न चला? इतने में देखते-देखते ही मैं स्वयं कुल प्रकाश में व्याप्त हो गई, किन्तु मन के न जाने किस कोने में एक विचार तैर रहा है कि प्रियतम तो मिला नहीं और मैं भी मिट गई। इतने में देखा कि दो हाथ उठते हैं और मैं मिटे ही मिटे कह रही हूँ कि- “उन हाथों को मैं पहिचानती हूँ, जिनकी गोद में मुझे जाना है।” तब वे हाथ मिटकर और दो हाथ आये, फिर और आये किन्तु मैं बराबर यही कहती रही। अंत में दो हाथ जो आये, बस मैं बोल पड़ी- “यही मेरे पहिचाने हुए हाथ हैं और मैं उनमें जाते-जाते ही समा गई। अब जागकर मैं यह सोचती हूँ कि मैं मिटे-मिटे ही कैसे समा गई, किन में समा गई, कुछ मेरी समझ में नहीं आता है क्योंकि कुछ ऐसी दशा हो गई है कि इसे समझ पाना, जी घबड़ाना हो जाता है। अब तो बोलती ही बन्द हो गई है। कुछ कहा नहीं जाता है, कुछ समझाया नहीं जाता है, किन्तु एक कसक, एक कराह से चैन नहीं पाती हूँ। वह किसमें है, कहाँ है, क्यों है, यह तो मुझे पता नहीं, किन्तु पीर है, या ऐसी बेपीर है, जो मारती है किन्तु घाव नहीं होने देती है। मैं तो पत्थर की चट्टान हूँ। सच ही वही स्वरूप है मेरा। पत्थर पसीजता नहीं। यही मेरा भी हाल है। वह ज्यों का त्यों जहाँ डाल दिया जाता है, पड़ा रहता है। नदी के अन्दर डाल दो, तो उसे कष्ट नहीं, किनारे पर डाल दो, तो कोई आराम नहीं। कोई उठाकर दूर फेंक दे, तो भी चोट नहीं। किन्तु पता नहीं भाई, यह उस पत्थर की बात कह रही हूँ या अपनी ही बात कह रही हूँ। मैं अब समा नहीं सकती, क्योंकि मेरे में अब गुंजाइश ही नहीं है। मेरे अन्दर बीज ही नहीं, जो अँखुआ फूटे। हालत, बेहालत का ही स्वरूप बन गई है।

अब तो भाई ऐसी अनजानी दशा है, जिसे स्वयं यह पता नहीं कि दिशा है या दशा है। ऊपर चाहे मैं ‘मालिक’ की बातें करते-करते आनन्द मग्न हो जाऊँ, परन्तु वह आनन्द, वह मस्ती भी मेरे मन तक पहुँचती ही नहीं। यद्यपि मैं देखती हूँ, अन्दर और बाहर तो मेरा कुल एक ही है, फिर भी इतनी बात रहती है। मैं देखती हूँ कि अब दशा चाहे बदलती रहती है, किन्तु एक सरल, साम्य स्थिति में कभी कोई Change नहीं आता है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

सदैव ही कृपा कांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-646
लखीमपुर
19/9/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। यहाँ सब कुशल है। आशा है, वहाँ भी सब कुशल पूर्वक होंगे। 'मालिक' की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, यह दशा है कि साँप, छछुन्दर की सी गति है, न छोड़ते बनती है, न पकड़े ही बनती है। मेरी तो यह दशा है कि कहाँ तो लगता था, मानों मेरा कण-कण मोम सा मुलायम हो गया है। पहले तो कुछ मोम थी और कहाँ अब संग (पत्थर) बन गई। अब तो भाई, मैं क्या हो जाऊँ, यह मेरे हाथ से बात निकल गई है। ‘मालिक’ चाहे मोम बना दे या संग (पत्थर) बना दे। मैं तो जैसी आई थी, वैसे ही मुझे जीना है। नहीं, न जाना है, न आना है, न अपना कोई ठिकाना है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-647
शाहजहाँपुर
22/9/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

पत्र तुम्हारा 11 सितम्बर का लिखा हुआ मिला और दूसरा 15 सितम्बर का, मेरा एक ख़त पिछले पत्र के जबाब में पहुँच चुका होगा।

जब अभ्यासी बहुत ऊँचे शिखर पर पहुँच जाता है, तो फिर एक किस्म की, बिला आवाज़ की गूँज पैदा हो जाती है और फिर उसका रेला नीचे की तरफ़ उतरना शुरू हो जाता है। मैं इस हालत को जानता था, मगर समझ में नहीं आता था, कि यह कैसे होता है। अब तुमसे यह बात तजुरबे में आ चुकी और मैं इसका Observation अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए कर रहा हूँ।

कबीर साहब ने लिखा है कि- “यह सब जानते हैं कि सिन्धु में बूँद समा जाता है, मगर यह कोई विरला ही जानता है कि बूँद में भी सिन्धु समा सकता है”। फलत: तुमने लिखा भी है कि कुल रूप सफ़ेद पत्थर की भाँति हो गया है। यह उस चीज़ का रेला है, जो Infinite है। नाभि में जो चीज़ तुम्हें खुलती हुई मालूम होती है, इससे यह मतलब है कि दो-तीन चक्र नीचे के हैं, और यह हमारे यहाँ बाद में लिये जाते हैं, एक-एक करके खुलना चाहते हैं। इसमें Miracles ( सिद्धि-शक्ति) भी रहते हैं। इसलिये इनको उस वक्त लिया जाता है, जबकि Miracles पर हमारा ध्यान नहीं जाता। यह तुम्हारा अनुभव सही है और इसका मुझे भी अनुभव रहा है।

जो Vibration तुम्हारे दिल में आ रहा है, यह मेरी तरफ से है। तुमने जो स्वप्न देखा है, वह बूँद में सिन्धु की हालत साबित करता है। आखिर में जो हाथ आये, वही ठीक थे, जिनसे तुम्हारा कल्याण होगा।

तुम अब किस स्थान पर हो लिख देना, मैं भूल गया। मैंने धर्म की Definition कहीं लिखी है, अगर याद हो तो लिख देना।

अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-648
लखीमपुर
27/9/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का मिला। पढ़कर सभी समाचार मालूम हुये। ईश्वर बस आप की उम्र बड़ी करे और स्वास्थ्य ठीक रखे। ‘मालिक’ की कृपा से अब तक जो आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

भाई न जाने क्या हो गया है कि अपना मालिक जो इतना महान्, इतना सर्वव्यापी, सर्व शक्तिशाली लगता था, अब साधारण जन की भाँति महसूस होता है। कोई बड़प्पन नहीं, कोई विशेषता नहीं ज्ञात होती है। क्या मेरी ही पुतली कुछ बदल गई है या यह क्या हो गया है। कुछ ऐसा हो गया है कि मानों उस ‘मालिक’ का खज़ाना खाली हो गया। वह भी साधारण जन की भाँति ही हो गया है। कुछ ऐसा हो गया है कि कोई दे तो खा लूँ, न दे तो न खाऊँ। मैं तो मानों अब दुनिया के हाथ की कठपुतली हूँ। हर चीज़ यहाँ तक कि आध्यात्मिकता भी दुनिया ही देती है।

भाई, मेरी तो यह दशा है कि जो बात ‘आप’ जिस दिन से लिखते हैं, जैसे कि जब तक सेहत न हो, हापुड़ नहीं छोड़ना चाहिये। वही बात उसी दिन से अपने आप ही बिल्कुल वही तबियत बन जाती है। अब कहाँ मेरे में जाने की धुन लगी थी, और कहाँ अब बिल्कुल साफ़ हूँ। अब मुझे दशहरे में इकट्ठे हुए सब भाई-बहिनों से मिलने का भी चाव जाता रहा। न इम्तहान की ही चिन्ता है।

कुछ ऐसा लगता है कि मानों कुल शरीर जड़ता का स्वरूप हो गया है। काम चाहे जितना करूँ,परन्तु मानों कण-कण में Activity पैदा ही नहीं होती है। मैं तो जड़ता की ही मानों मूर्ति बन गई हूँ। मुझे लगता है कि P1 Point मेरे में रौशन हो उठा है किन्तु मेरे में अब ऐसा नमक है जो पत्थर है नमकीन नहीं है। कोई ईश्वर-प्रेम में रोता है, तो मेरे लिये खिलवाड़ के समान प्रतीत होता है और किसी को कष्ट में रोते हुए देखती हूँ, तो दिल भर आता है। यह कैसा भेद है किन्तु सेवा करते हुए, दिल भरा हुआ होते हुए भी अन्तर मानों पत्थर ही बना रहता है। पहले मैं मूर्ति-पूजा करती थी, अब स्वयं पत्थर की जड़-मूर्ति बन गई हूँ, किन्तु परवाह नहीं।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। केसर आप को प्रणाम कहती है। छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-649
लखीमपुर
28/9/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

अभी कल ही एक पत्र ‘आपको’ डाल चुकी हूँ। फिर अपनी आत्मिक हालत ईश्वर की कृपा से जो कुछ भी एहसास में आई है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो यह दशा है कि मानों रेला का रेला उतरता आता है, और मेरे में तुरंत का तुरंत हज़्म होता जाता है। रेला तो कहने को, शुद्धता व सफ़ाई का है, इसलिए Weight नाम नहीं, किन्तु पहले जब कोई दशा हज्म होती थी तो मुझे लगता था कि कण-कण, नस-नस मानों उसे चूसे ले रही है। किन्तु अब तो नज़ारा ही और है कि बिना आकर्षण के आकर्षण है, यानी रेला नीचे आकर जज्ब हो रहा है और बिना हाज्मा शक्ति के सब हज़्म है। खजाना खाली है, किन्तु रेला आ रहा है, क्या मज़ाक है। मुझे तो अब लगता है कि ‘मालिक’ की Power मुझमें जज्ब हो रही है। 2-3 दिन से चौबीस घंटे दिन-रात जज्ब हो रही है। केन्द्र ही जज़्ब हो रहा है, किन्तु थाह नहीं है और न वज़न का पता है। शक्ति है, किन्तु Powerless है। एक अजीब तमाशा है, जिसमें न कोई खिलाड़ी है, न खेलने वाला और न बाज़ीगर है, न नाचने वाला है। अपने आप ही चाहे बात करती हूँ, तो लगता है, मानों आपकी कही बात कह रही हूँ और यह इतनी स्वाभाविक हो गई है कि मुँह से भी फटाफट यही निकलता है कि ‘आपने’ कहा है।

कुछ ऐसा है कि अब सब अजीब बात है, अजब तमाशा है, किन्तु मेरे लिये मानों सब Natural है। बिल्कुल ही स्वाभाविक, लापरवाही या उदासीनता सी घर कर गई है और उसे चाहे कुछ कह लें या न कहें, वह तो मानों Nature ही बन गई है। एक Natural Flow सा बना रहता है, तबियत में, हृदय में। मैं चाहे उसे भूल जाऊँ, किन्तु वह तो ज्यों का त्यों ही बना रहता है। एक साफ़ शुद्ध या Purity ही मेरा अन्तर-बाहर का एक सा स्वरूप ही बन गई है। अब तो यह पता नहीं कि बात बोल रही हूँ या Purity या Reality उगल रही हूँ और अजीब बात है कि अपने में कुछ महसूस नहीं होता। मेरे में अब Mind का बन्धन नहीं। चाहे यह Mind कह लें या Sub-Conscious Mind कह लें, चाहे Conscious कह लें या Sub-Conscious कह लें या Super Conscious कह लें। मेरे लिये सबके अर्थ अनर्थ हैं, मानों कोई दिव्यता नहीं। मैं तो जड़ता की प्रतिमा हो गई हूँ, किन्तु क्या परवाह, जो जानें, सो जानें। यहाँ तो एक अलौकिक निश्चिन्तता का सागर ही मेरा स्वरूप बन गया है। मानों मेरे अंग-अंग में, नस-नस में दिव्यता ही भर गई है। यही मेरा स्वरूप हो गया है। माया से परे एक दिव्यता घर कर गई है जीवन में।  अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई बहिनों को प्यार।

आपकी दीन हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-650
शाहजहाँपुर
1/10/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, आशीर्वाद।

तुम्हारे पत्र 27 व 28 सितम्बर के मिल गये। स्वामीजी से तुम्हारी भेंट हुई, अच्छा हुआ। मगर भाई, मेरे पास उनका आना बड़ा मुश्किल है और अगर आ भी कहीं इत्तफ़ाक से गये तो, मेरे बारे में जानें क्या राय कायम करेंगे। इसलिये कि यहाँ कोई हालत ही नहीं रही। तवज्जोह (Transmission) से हर आदमी ख़ुश नहीं होता, इसलिये कि उसमें भी तरी नहीं है। जब Surrender अच्छा हो जाता है, ऐसा कि उसको पता नहीं चलता, तो गति कठपुतली की ही हो जाती है। Surrender क्या है? ‘मालिक’ की हालत की नकल, जो असल हो जाती है और फिर Density से ताल्लुक ही नहीं रहता अर्थात् हम अपनी अंतिम दशा में आ जाते हैं। इसलिये गीता में कृष्णजी ने इसकी बड़ी महिमा कही है। रेला उतरना, यह चीज़ मैंने तुमसे ऐसी सीखी कि मुझे अब इस हालत का पैदा कराना मालूम हो गया। मैं इसको सोचता रहता था, मगर समझ में नहीं आता था। अब, जब कि सामने हुआ, तब सब पता चल गया। इसके लिये अगर बिन्दु में सिन्धु का समाना कह लिया जाय तो यह मतलब अच्छा समझा सकेगा। मगर इस हालत को बिन्दु में सिन्धु का समाना तो कह ही दिया गया है, मगर जब वह Limitation टूट जाये कि बिन्दु हमारे समझ में न आवे कि हम थे और रेला आते-आते ऐसी हालत पैदा हो जावे कि सब एक ही धरातल Surface बन जावे और फिर उसमें भी शर्त यह है कि रेला, जो चीज़ अपने साथ लाई हैं, उसका भी पता न रहे, फिर क्या हो जाये, उसके लिये शब्द नहीं मिलते। शायद इस तरह से व्यक्त हो सके, कि न रेला रहा, न समुद्र, न बूँद, यानी इन शब्दों से वह चीज़ जो Express होती थी, वह न रह जाये। अब उसको क्या कहें? Negation कह लो। अब तो यहाँ पर कुछ कह नहीं मिलता। नहीं-नहीं करते चले जाओ, फिर भी यह ‘नहीं’ ख़त्म नहीं होती और ‘है’ और ‘है’ पीछा भी नहीं छोड़ता।

अम्मा को प्रणाम और तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-651
लखीमपुर
24/10/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। यहाँ भी सभी लोग कुशल पूर्वक हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मैंने तो अब यह जाना कि होश या बेहोशी वास्तव में कोई चीज़ नहीं होती, बल्कि एक झीना आवरण था, जो कि उतर जाने पर अब मानों आँखों का अँधेरा सा साफ़ हो गया। अब तो यह हाल है कि सब ओर प्रकाश ही प्रकाश है। अणु-अणु से बाहर-भीतर, कण-कण से, हर चेतन व जड़ से एक अनुपम शान्ति रूप दिव्य प्रकाश निकल रहा है।

अब तो यह हाल है कि दशा क्या है, बाहर-भीतर, बिल्कुल समतल धरातल फैला हुआ है। अब तो न पत्थर हूँ, न चट्टान, न कुछ। कुछ अजीब सादा, समतल रूप ही मेरा कण-कण प्राप्त कर चुका है। शरीर या रूप क्या है, मानों एक बराबर समतल धरातल फैला हुआ है। अब तो जाने क्या दशा है कि न कोई चीज़ आती है, न जाती है। ‘मालिक’ को सौंप देने को मेरे पास कुछ रहा ही नहीं।

मैंने लिखा था कि कण-कण में एक दिव्यता भर गई है, परन्तु अब कुछ नहीं। अब तक रेले के साथ आने वाली चीज़ के नशे से कुछ दिन भर खोई सी रहती थी, किन्तु अब तो न नशा है, न ख़ुमारी है और न खोई हूँ। होश अब कभी बे-ठिकाने तक नहीं पहुँच पाते हैं। अब तो ठिकाना कहीं है ही नहीं, सब बे-ठिकाना ही बे-ठिकाना फैला है। अब तो मुझे लगता है कि मानों Stages इत्यादि, मानों सब कहने मात्र भर को थी। वास्तव में अब न कहीं Stage है न कुछ। अब तो एक बेनकाब, बेदशा ही फैली हुई है या यों कहो कि बस धरातल ही धरातल फैला है और शरीर तो मेरा मानों धरातल ही बन गया है और ऐसा शीशा बन गया है, सब ज्यों का त्यों झलकता है। पहले Sitting दे लेती थी, किन्तु अब तो मुझसे वह भी नहीं होता। नाम को बैठती हूँ, परन्तु पता नहीं, कुछ Sitting जाती है या नहीं। जाये कहाँ से, जबकि केवल एक समतल धरातल ही मेरा स्वरूप बन गया है।

लगता है कि सारी दिव्यता व अलौकिकता मेरे में हज्म हो गई है और मैं फिर ज्यों की त्यों ‘मालिक’ के सामने खड़ी हूँ, मानों- “सूरदास कारी कामरी पर चढ़े न दूजा रंग”। न पता, सारी चीज़ कहाँ चली जाती है, जो मेरे पर फिर असर ही नहीं रहता है। ऐसा लगता है कि एक माया रहित दशा फैली हुई है और फैली ही नहीं, वरन् सब मेरे अन्दर सिमट कर शान्त हो गई है। माया से परे एक अनुपम दिव्य स्वरूप ही हो गया है मेरा।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव ही कृपा कांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-652
शाहजहाँपुर
27/10/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र दिनांक 14.10.57 का मिल गया। खत के जबाब में अब की बहुत देर हो गई। ता. 5.12.57 को दक्षिण भारत जाना तय हुआ है। तुमने कोई ख़त इधर नहीं भेजा, इसलिये हर रोज़ तुम्हारी तन्दुरूस्ती की फ़िक्र रहती है, जल्दी जवाब देना।

मैंने किसी ख़त में लिखा था, जिसका मतलब यह था कि ऊपर से जो चीज़ उतर रही है, उसका फैलाव नीचे तक हो रहा है। अब एकसार हालत पैदा हो चुकी है और बहुत धीमापन है, जिसके माने यह है कि जिस स्थान की जो हालत कि तुममें है, यानि O1 की, वह करीब-करीब सब एकसार हो गई है। तुम्हें अपना घर और दूसरों के घर एक समान प्रतीत होते है, इसका मतलब है कि ग़ैरियत का भाव तुम्हारे दिल से जा चुका है और सब अपने प्रतीत होते हैं। अब इसके बाद ईश्वर ने चाहा कि कोई भी भाव मन में न रहे, यह Reality की दशा है।

तुमने जो न होश, न बेहोश वाली दशा लिखी है, यह तुम्हारी हालत है। मेरी भी यह हालत है कि जब पैर कहीं नीची-ऊंची ज़मीन पर पड़ जाता है और गिरते-गिरते बचता हूँ तो मुझे यह ख़्याल होता है कि मैं बेहोश था। जब मन की वृत्ति अपने असल में, जितना होना चाहिये, लय हो जाती है, तो यह हालत पैदा होने लगती है। पूरी तौर से अगर मन अपने असल में लय हो जावे तो ज़िन्दगी ख़त्म हो जावे, इसलिये मैं समझता हूँ कि इतना होश ज़रूरी है।

अम्मा को प्रणाम। तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-653
लखीमपुर
28/10/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र मिला होगा। आशा है, ‘आप’ अच्छी तरह से होंगे। ईश्वर की कृपा से जो कुछ आत्मिक-दशा आजकल है, सो लिख रही हूँ।

भाई, कुछ ऐसी शून्य या खाली दशा है या स्थान है कि जिसके लिये No World कहना ही ठीक बैठता है और No World होने के कारण No Word भी कहना पड़ता है। जब बाजे व तमाम शोर होता है तो लगता है कि मानों शून्य हृदय में बाजे का शब्द या छमछमाहट लगकर लौट आती है। सब कुछ शून्य है, शरीर व कण-कण शून्य पड़ा है। भीतर-बाहर, ज़र्रा-ज़र्रा शून्य हो गया है। तबियत शून्यता का ही रूप हो गई है। किन्तु अब यह शून्यता भी ऐसी है कि मैं और ‘वह’, मानों एक हो गई हूँ। जब मैं शून्यता लिखती हूँ तो, मानों अपने को ही लिखती हूँ। खाना-पीना, सबका स्वाद भी शून्य ही हो गया है और एक यह कुछ है कि तबियत के हल्केपन और शून्यता का मैं थाह नहीं ले पाती हूँ। मैं तो धरातल हूँ। मेरा तो स्वरूप यही है। लेकिन अन्तर केवल इतना है कि चट्टान ठोस होता है, परन्तु मेरे में हल्केपन व सरलता की थाह नहीं मिलती है। तबियत अब ऐसी रहती है कि न उसे वैराग्य कह सकती हूँ, न उदास कह सकती हूँ। हाँ, निर्मलता की थाह नहीं मिल पाती है। भीतर-बाहर, बस एक समान ही तबियत रहती है और उसकी भी थाह नहीं मिलती है।

मैं तो भाई, अब इतनी छोटी हो गई हूँ कि अब तो सब कुछ अथाह ही अथाह है, लेकिन उस अथाह में क्या है, तो यही कहूँगी कि Nothing। मेरी दशा तो उस प्याज की गट्ठी की तरह है कि जिसके पर्त्त के पर्त्त छीलते चले जाओ, बाद में Nothing रह जाता है किन्तु उस Nothing पर ही सारे पर्त्त टिके हुए थे। बस वह Nothing ही मेरी दशा है। मेरा कण-कण ही अथाह मानों Nothing हो गया है। एक ओर इस Nothing पर गौर करती हूँ तो अथाह Unlimited पाती हूँ, परन्तु अथाह में गौर करने पर Nothing रह जाता है न जाने अब क्या मामला है, ‘मालिक’ जानें या ‘आप’ जानें, मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-654
शाहजहाँपुर
5/11/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारा 28 अक्टूबर का लिखा हुआ मिल गया। अबकी श्री राघवेन्द्र राव गुलबर्गा में Annual Day of Branch बड़े Scale पर मना रहे हैं। दक्षिण भारत में आग सुलगना तो शुरू हो गया है। लोग कम ज़रूर आ रहे हैं। वहाँ पर मुझे कम से कम हर साल तीन महीने रहने की जरूरत है। ता. 5 दिसम्बर को मैं South India चला जाऊँगा। मुझको त्रिचनापल्ली का Center जिसमें M.K.Ganesan काम कर रहा था, बन्द कर देना पड़ा।

अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-655
लखीमपुर
31/10/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का जो पूज्य मास्टर साहब जी के नाम आया था, सो सुनकर तबियत ख़ुश हुई। ईश्वर आपको हमेशा इसी तरह स्वस्थ रखें, ताकि सब लोगों को रूहानी लाभ मिलता रहे। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो सदैव अचल व स्थिर बनी रहना, जो मैंने लिखा था, वह भी भूल गया है, या अनुभव नहीं होता। अब तो ज्यों की त्यों यानी कुछ भी नहीं बनी हुई हूँ। मेरा तो यह हाल है कि जब मरना और जीना एक ही राह है, ब्रह्मानन्द या बेआनन्द सब एक ही राह है, तो कबीरजी की कहावत कि- “कब मरिहौं, कब पाइहौं, पूरन ब्रह्मानन्द”। भला मैं निपट गँवारिन क्या जानूँ उसका मोल। क्या मरना चाहूँ, क्या जीना, यह भी क्या जानूँ? मेरी तो बस यह दशा है कि- “भैंस के आगे बीन बजाई, भैंस बैठि पगुराये”। जिसे जीने का महत्व नहीं मालूम उसे गवाँना या रखना, एक सा है। मैंने तो भाई, अब यह जाना कि महत्व या विशेषता नाम की तो मानों कोई वस्तु ही नहीं है।

अब तो भाई, भीतर-बाहर, शून्यता, किसी का एहसास ही नहीं होता है। थाह और अथाह, सब मेरे लिये मानों एक सा ही शब्द है। Limited या Unlimited मेरे लिये तो अब, सब कुछ एक ही है और जो अन्त में है, लिखती हूँ, वह कुछ भी नहीं है, महज़ वाक्य पूरा करने का केवल एक बहाना है। अब सच तो यह है कि दशा ही क्या है, लिखने का केवल एक बहाना मात्र है। चाल तो अब बिल्कुल मानों स्थिर थम गई है और चाल ही क्या, कुल System ही मानों स्थिर, स्थित हो गया है, किन्तु अज़ीब तमाशा है कि न स्थिरता है, न स्थितपना ही है। कुल स्वरूप ही ज्यों का त्यों रह गया है, नहीं, ज्यों का त्यों कहने में भी कुछ भारी सा प्रतीत होता है तो कुछ नहीं, कहने को कह लिया है। ‘मालिक’ का आभास भी अब कहने को कह लेती हूँ, मानने को मान लेती हूँ, किन्तु सच तो जो है, सो है ही। अब छिपाये से छिपता नहीं। मुझे तो न जाने अब क्यों यह लगता है कि मेरी तो मुझे पूजा की अभी A, B, C, D शुरू नहीं हुई है। पता नहीं ‘मालिक’ पढ़ायेगा या नहीं, ‘वह’ जाने। तो अब न पढ़ना याद होता है और न रटना ही याद होता है। जैसा ‘वह’ चाहे वही होगा।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-656
लखीमपुर
4/10/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, मेरा एक पत्र मिला होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ। भाई, अब तो न जाने क्या दशा है कि Receiving Power तो मुझमें रही ही नहीं। नहीं, Power नाम की कोई वस्तु अब मेरे में रही ही नहीं। इतना ही नहीं, ‘आप’ पहले मेरे लिये जो कुछ करते थे, हर चीज़ मैं समझ जाती थी, कि ‘आप’ कुछ कर रहे हैं। किन्तु अब तो मैं कभी कुछ अनुभव ही नहीं कर पाती हूँ तो Receive क्या करूँगी। मैं तो बिल्कुल खाली-खाली फिरा करती हूँ। मेरा तो रूप ही खाली हो गया है। रग-रग का ख़ालिस रूप हो गया है और रूप कुछ भी नहीं है, बल्कि बस निरी ख़ालिस हूँ। फिर ख़ालिस की पीर व रूप ख़ालिस ही जानें। मुझे तो कुछ भी पता नहीं कि क्या लिखूँ और पीर क्या, मैं तो बेपीर ही हो चुकी हूँ। अब तो न पत्थर ही हूँ और न मोम ही रही। कण-कण, बाहर-भीतर अब Inactive रहा करता है।

मैं देखती हूँ कि ‘मालिक’ के प्रेम के कोष का वह अथाह खजाना (मेरे में) न जाने कहाँ सोख चुका है। अब तो सहोदर व सहोदराओं का स्नेह इस पाषाण प्रतिमा को अपने स्नेह-जल से नहलाये रखता है। ‘मालिक’ आने वाले हैं, किन्तु मैं तो एक गूँगी प्रतिमा के समान फिरा करती हूँ। मिलन का उछाह ‘मालिक’ ही जब, जितनी देर स्वयं ही इस बालिका का स्मरण करता होगा, बस केवल इतनी ही देर को आता है, फिर जहाँ से आता है, वहीं पर समाप्त हो जाता है। फिर भला मैं सेवा कार्य ही किस भाँति सँभाल सकती हूँ। बस एक यंत्रवत् जाने क्या-क्या स्वयं ही होता रहता है, जिसका मुझे पता नहीं। इसलिये मुझे तो आज अपने को सबकी सेविका कहने तक की भी गम्य नहीं। यहाँ तक कि अन्तर की प्रेरणा तक मुझे नहीं मिलती है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार।

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-657
शाहजहाँपुर
9/11/1957
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारा पत्र आया। अब इस समय लिखना यही है कि जियो और तन्दुरूस्त रहो। मैंने अम्मा से प्रार्थना की है कि वे तुमको वहीं छोड़ देवें और जब तक डाक्टर साहब न कहें, वहीं रहने दें। अगर उत्सव में भी वह वहाँ रखना इलाज के लिये जरूरी समझें तो मैं यही कहूँगा कि तुम्हें उत्सव में भी नहीं आना चाहिये।

अम्मा को प्रणाम !

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-658
लखीमपुर
29/11/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। यहाँ भी सभी लोग कुशल पूर्वक हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरी तो कुछ यह दशा है कि लगता है कि बनावटीपन और नकलियत सब मानों किसी ने धीरे-धीरे निचोड़कर, पिघला-पिघला कर समाप्त कर दी। अब तो दशा में न बनावटीपन है, न नकलीपन। असलियत व नकलियत दोनों मेरे लिये नहीं हैं। मैं तो केवल उस मशीन की भाँति हूँ, जिसका कोई भी अस्तित्व ही नहीं है। अब तो यह दशा है कि स्वतंत्र होते हुए भी स्वतंत्र नहीं हूँ। यह सब क्या है, यह तो ‘आप’ ही जानें, ‘आप’ का काम जानें। मुझे तो बस ‘मालिक’ से मतलब है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। केसर ‘आपको’ प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

सदैव ही कृपा कांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-659
लखीमपुर
17/12/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है ‘आप’ आराम से पहुँच गये होंगे। ‘आपको’ खाँसी बहुत आती थी, सो कुछ लाभ हुआ या वैसी ही है। कृपया दवा बराबर समय से लेते रहिये। यहाँ सब कुशल है। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो कुछ ऐसी दशा है कि रात को कुछ ऐसी नींद हो गई है कि रात को सोती भी रहती हूँ और हर खटपट एवं हर आवाज़ कान में पड़ा करती है। मेरा ‘मालिक’ मुझे अपने में सराबोर कर दें, बस इतनी सी ही प्रार्थना है। अब तो बीज ही दग्ध हो चुका है। प्रेम भी दें या न दें, इस अपनी ही चीज़ को बस अपना लें। ऐसा लगता है कि मानों मेरा सूक्ष्म शरीर या मेरे अन्दर का शरीर एकदम से एक क्षण को प्रकाशित होकर बिल्कुल बिला गया। तबसे ऐसा लगता है कि मानों System का जाल या पर्त्त हटकर बिल्कुल सब खाली-खाली सा हो गया है। दशा कुछ ऐसी है कि शुद्ध कहती हूँ तो, सरल या मुलायम कहूँ तो अब कोई बात ही ठीक नहीं जँचती है। इधर कुछ मेरे अन्दर की कोई चीज़ एकदम से मिट गई है, बिला गई है। यह नहीं कह मिलता है कि क्या चीज़ थी। मेरा स्वरूप जो मैं लिखा करती थी, कि मानों मेरा स्वरूप ही यही या ऐसा हो गया है, वह चीज़ भी अब बिला गई है। अब तो कहने को मेरे पास यह कुछ भी नहीं है। फिर ठीक प्रकार से क्या दशा है, यह मैं कैसे लिखूं ‘आपको’ यह समझ में नहीं आता है।

अब तो भाई हल्कापन भी मेरे में बिला गया। क्योंकि अब तो यह भी कहते नहीं बनता है। सच तो यह है भाई, कि अब तो दशा के लिये हल्कापन, सरलता या पवित्रता जो कुछ लिखती हूँ, तो मानों बनावटी बातें लिख रही हूँ। हालत में अब कोई भी बात या कोई भी विशेषता रही नहीं, तो सब जो भी लिखती हूँ, नकलियत मुझे लगती है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती है। इति :-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-660
लखीमपुर
20/12/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कल पूज्य मास्टर साहब जी के पत्र से मालूम हुआ कि ‘आपकी’ तबियत कुछ अच्छी है, पढ़कर खुशी हुई। मेरी आत्मिक-दशा जो कुछ ‘मालिक’ की कृपा से मालूम हुई है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो कुछ ऐसी दशा है कि जागते में आँखे खोले देख रही हूँ, फिर भी अक्सर कुछ ऐसी दशा हो जाती है कि कोई सन्मुख आवाज़ देता रहे, तो भी सुनाई नहीं पड़ता है। बिल्कुल मानों एक शून्य, निर्दोष दशा मेरा स्वरूप बन गई है। अक्सर यह आँखों में छा जाती है, जो मैं निर्दोष बैठी मानों शून्य को निहारती रह जाती हूँ। उस समय यह कहना उचित ही होगा कि शून्य में बैठी शून्य को निहारती हुई खो जाती हूँ किन्तु एक ऐसा होश जिसका अधिकतर रात को सोते में होश आता है, या दिन में कभी-कभी झटके से लगने पर होश आता है, वह मानों मेरी दशा का एक मुख्य अंग ही बन चुका है। शून्य से मेरा मतलब खाली से बिल्कुल भी नहीं है, बल्कि अपनी परिभाषा में वह स्वयं अकेला ही है। स्वयं एक ही है और नेति-नेति ही उसके लिये कहा जा सकता है। अथाह ही जिसकी थाह है। नम्रता का दायरा भी पीछे ही रह गया है। अब तो कुछ ऐसी दशा है कि उसे चाहे सत् कह लो, या असत् कह लो, उसमें अब किसी का रंच-मात्र भी स्पर्श नहीं हो पाता है। वह तो सबसे परे है, अछूती है, क्योंकि अब उसे कोई छूत नहीं लग सकती। कुछ ऐसा लगता है कि जैसे कहा जाता है कि जब योगी के प्राण निकलते हैं, तो सिर में कोई दराज हो जाती है, उसी से निकल जाता है, किन्तु मैं देख रही हूँ, कि सिर में, माँग के बिल्कुल लगे में, मानों एक दराज़ सी पड़ गई है। यह क्या है, मुझे नहीं मालूम। यह तो आप ही बता सकते हैं। 

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-661
लखीमपुर
26/12/1957
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र आपको मिला होगा। यहां सब कुशल है। आशा है वहां भी सब लोग कुशल पूर्वक होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो यह दशा है कि ज़रा सा ध्यान का ध्यान आते ही तबियत घबड़ा जाती है। हालत कुछ ऐसी हो गई है कि मन की गम्य से परे हो गई है। एक ऐसा अविरल, अजस्त्र श्रोत नितान्त प्रवाहित है, जिसकी गति एक समान है। न जाने क्यों साँस में कुछ भारीपन रहने लगा है। अब तो मानों पीठ के पीछे की सारी आध्यात्मिक दुनिया मेरे हाथों में है, किन्तु मुझे तो मानों अब उससे भी वैराग्य रहता ही है। मन भी देखती हूँ कि इस नित्य, अखण्ड दशा में दशा ही रूप होकर समा गया है, क्योंकि न जाने क्या बात है कि मन की तो मुझे अब सोते, जागते, कभी प्रतीत ही नहीं होती है। अब दशा को Read करने तक के ध्यान में मानों तबियत कैद होकर छटपटा जाती है। एक बिल्कुल सादी व भोली दशा है। महाशून्यता ही मेरा रूप हो गया है।

अब तो बस एक ऐसे ही विलक्षण क्षेत्र में पैरती जा रही हूँ वह भी बिना शक्ति व प्रयास के। एक अजीब विलक्षणता ही मेरी नस-नस में समा गई है। न जाने क्यों गर्दन के ऊपर एवं सिर के पीछे दर्द सा बना रहता है। कभी-कभी तेज़ी पकड़ जाता है, किन्तु दशा पर पीछे कुछ ऐसी चीज़ व्याप्त है, जो कि खुली नहीं प्रतीत होती है। वैसे पीछे दृष्टि घुमाने पर तो Mastery मालूम पड़ती है, किन्तु फिर भी कोई वस्तु उस पर व्याप्त है, फिर भी आगे मैदान खुला है, व खुली हवा है। अब तो ऐसी बात है कि मानों सब दशा जिस कारण से व्याप्त थी, अब दशा नहीं वरन् केवल कारण ही कारण है, या यों कहिये कि महाशून्यता ही आगे पीछे, भीतर-बाहर, नस-नस में व्याप्त हो गई है। अब तो जड़ता ही मेरा रूप हो गया है। किन्तु इस सूखी जड़ता में भी मैं मग्न हूँ। कुछ ऐसी महाशून्यता व्याप्त है कि जहाँ पर न सांय हो रही है न सन्नाटा ही शेष रह गया है। अब तो लगता कि सब ओर साफ़ ही क्षेत्र, नवीन क्षेत्र सामने है। अब तो जो मेरे कण-कण में मानों विलक्षणता व्याप्त हो गई है, क्योंकि अब ऐसा ही क्षेत्र व्याप्त है। नवीन क्षेत्र, बिल्कुल सादगी व्याप्त है। एक भोली दशा ही नित्य एक समान रूप से मेरे में प्रवाहित है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आप की ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-662
लखीमपुर
9/1/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

‘आप’ का कोई पत्र बहुत दिनों से नहीं आया। इस कारण आपकी कुशलता का भी कोई समाचार न मिल सका। चिन्ता लगी है। कृपया ‘आप’ अपना समाचार जल्दी दें। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ ऐसी बेनक़ाब दशा है कि जो नक़ाब से छिपाई ही नहीं जा सकती है। एक अजीब भीनी सी, सरल सी सादगी ही व्याप्त हो गई है। कुछ ऐसी अद्भुत विलक्षणता ही मेरी नस-नस में, बाहर भीतर के कण-कण में व्याप्त हो गई है कि जिसमें अब Mastery ही Mastery व्याप्त हो गई है। मेरी तो अब यह दशा है कि मिटते-मिटते मेरा ‘मालिक’ भी ओझल ही नहीं, वरन् मिट चुका है। अब तो यह दशा है कि :-

“निज को गँवाया रोयकर, पिया गँवाया हाँसि।
घर-बाहर अँधियारा मा, उड़ती बुझती साँसि।।”

  Mastery तो व्याप्त है, किन्तु मानों अब आत्मिक-शक्ति व इच्छा-शक्ति भी विलीन हो चुकी। फिर क्या Mastery और कौन Master अब तो ऐसा मैदान सामने है, जहाँ पर वायु की भी गम्य नहीं। खाली, सपाट, सादा, ऊसर दशा है। महाशून्यता ही जिसके चारों ओर व्याप्त है, या उसके घर है, या यों कह लें कि महाशून्यता ही जिसका नक़ाब है, किन्तु दशा उससे भी अछूती है। वह तो मग्न है अपने में ही। किधर भी देखने की या गर्दन टेढ़ी करने तक की फुर्सत ही किसे है। किनारा पा लिया। अब तिनके की परवाह ही क्या है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः- 

सदैव ही कृपा कांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-663
लखीमपुर
20/1/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

पूज्य मास्टर साहब जी के पत्र से ‘आपका’ समाचार मिला। ‘आप’ लाभ है और साँस की तकलीफ़ कम है, जानकर खुशी हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ यह दशा है कि पूजा करने बैठती हूँ तो मानों अपने अन्दर के चक्र-वक्र तक सब समाप्त हो गये हैं। ईश्वरीय-धारा हृदय में जा रही है। यह कैसे ख्याल करूँ, जबकि हृदय भी गलकर समाप्त हो गया है, कुछ रह ही नहीं गया है। हड्डी- हड्डी गलकर समाप्त हो गई है। बोझ नाम की कोई वस्तु अब मेरे अन्दर-बाहर, या शरीर तक में नहीं रह गई है।

साँस इतनी हल्की आती है कि उससे आने जाने का आभास तक नहीं होता है। यह सब क्या है, यह तो ‘आप’ ही जानें।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। केसर आप को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-664
लखीमपुर
31/1/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा पत्र मिला होगा। आशा है आप स्वस्थ होंगे। यहाँ भी सभी लोग कुशल पूर्वक हैं। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ यह दशा है कि सिर के पीछे, गर्दन से ऊपर एक Point पर मानों ज्वालामुखी की तरह कोई चीज़ ऊपर आने को जोर मारती है। जब से सिर में माँग के लगे में दराज़ सी हुई है, तबसे वह पांचो उंगलियों वाला हाथ सिर पर से मानों हट गया है। मेरी तो यह दशा है कि मानों कुल जड़वत् होते हुए भी काम चलता ही रहता है। रोना-हँसना सब कुछ चालू रहता है किन्तु फिर भी काष्टवत् या जड़वत् होने में तो कोई कमी नहीं आने पाती है वह तो सम-अवस्था में ही रहती है। न उसमें कोई कमी आती है और न कभी तेज़ी, बस जैसी है, वैसी बनी रहती है।

परसों रात अचानक यह कुछ आवाज़ सी लगी कि अब तो मरने की भी गुंजाइश नहीं रही। अक्सर रात के स्वप्न में लगता है कि मानों कई पावन आत्मायें मेरे पर पुष्प से वर्षा कर रही हैं। फूल Actual नहीं मालूम पड़ते हैं, परन्तु कुछ बरसता सा है। कभी कुछ अपने बारे में कनफुसी सी होती लगती है। जागते में ये स्वप्न सी बातें Actual ही मालूम पड़ती हैं। जड़ और चेतन मेरे लिये एक समान अर्थ वाले शब्द ही हैं।

मेरे ‘मालिक’ पहले मुझे दो शरीर एक प्राण मालूम पड़ते थे, किन्तु अब तो न कोई शरीर और न प्राणों का अनुभव होता है। पहले मैंने लिखा था कि कुल संसार मुझे जड़वत् दीखता है, किन्तु अब तो कुछ भी अनुभव ही नहीं होता। अब तो न संसार कुछ था और न अनुभव ही कुछ है। न कुछ खत्म है न अखत्म है। यदि कुछ है तो अथाह है और अथाह का कोई अनुभव नहीं है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आप की ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-665
लखीमपुर
11/2/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ जो ताऊजी के लिये नारायण दद्दा के हाथ भेजा, सो मिल गया। समाचार मालूम हुए। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो कुछ अजीब हाल है। हर तरफ मानों अचम्भा ही अचम्भा है। निराकार व साकार, सब कुछ गलत या भ्रम बात थी। यह भी पता नहीं चलता कि है क्या, लिखूँ क्या ? मुझे तो लगता है कि जो दशा पूजा के पहले थी, वही अब मानों मेरी रहनी का स्थान बन गई है या वही मेरा स्वरूप बन गया है। उन्नति या बेउन्नति का मेरे लिये एक समान ही, अर्थ हो गया है। मालिक मेरा मुझे जगा दे, ताकि मैं चल पडूँ ‘उससे’ मिलने, मुझे तो न जाने क्यों मालिक मिलता ही नहीं। मैं तो अब एक जगह बैठ गई हूँ। शायद कभी वह कृपा कर आता-जाता मिल जावे। किन्तु मार्ग का पता नहीं कि कहाँ बैठूं, आदि में, अन्त में, या मध्य में।

सब ‘बाबूजी’, ‘बाबूजी’ कहते हैं, किन्तु कहाँ है, ‘बाबूजी’ कैसे हैं, कोई मुझे बतावे। जो कोई कहता है- मैं ‘बाबूजी’ के पास से होकर आया हूँ और सब हाल बताता है, तो वह मुझे उड़ती-उड़ती बातें, बहकी सी बातें लगती हैं क्योंकि जो कदाचित् ‘बाबूजी’ के पास पहुँच जायेगा, फिर वह क्या लौटकर भला बताने आयेगा या भाई, क्या वह आ सकता है। मैं भी मन में ‘बाबूजी’, ‘बाबूजी’ रटती हूँ, किन्तु सब ऊपरी बात है, जो न जाने क्यों मन के भीतर लगता है कि पैठती ही नहीं। अब तो सब कुछ खामोश हो गया है। मौत भी, जिन्दगी भी, चैन भी, बेचैनी भी, कुरेदन भी, आह भी, मार्ग भी। पता नहीं कौन चीज़, मेरी हालत पर लगता है मानों हर समय एक पर्दा लिये खड़ी मेरी हालत को सदैव ढाँकने की ही कोशिश में रहती है, फिर भी कभी मेरे ‘मालिक’ का दिया होश बार-बार मानों वह पर्दा हटाकर मुझे कुछ दे जाता है, परन्तु मैं पुन: पुन: वैसी ही हो जाती हूँ। यह सब न जाने क्या है? मैं क्यों नहीं ‘मालिक’ के दिये हुए उस कुछ को समेट पाती हूँ। ज़रा देर भी नहीं सम्भाल पाती हूँ। ‘मालिक’ जितनी देर चाहे, क्षण भर ही कुछ देता है तो क्षण भर ही मैं उसमें मिल पाती हूँ, परन्तु यह मैंने देख लिया कि अब जिसमें मैं क्षण भर ही मैं उसमें मिल पाती हूँ, वह है कुछ भी नहीं, क्योंकि यदि कुछ होता तो मिला ही क्यों न रहता। किन्तु मैं ही कहाँ मिल पाती हूँ। कोई पर्दा हटाकर एक कर देता है, फिर बस मुझे उसकी कुछ याद ही नहीं रहती।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-666
लखीमपुर
28/2/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आज हरि दद्दा से वहां के समाचार मालूम हुए। आप की तबियत ठीक रहे, ‘आप’ स्वस्थ रहें, ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो कुछ ऐसी दशा है कि लगता है कि श्री बाबूजी का कण-कण पिघल-पिघल कर मेरे सारे शरीर में समाता या लय होता चला जा रहा है। बस, रुकता ही नहीं। यही प्रवाह बराबर चालू है। किन्तु मेरा अन्तर व सूक्ष्म कुछ भी तो अब नहीं रहा। अब तो बस इस स्थूल शरीर में ही उनका कण-कण समाकर बिलाया जा रहा है। मेरी तो यह दशा है कि मेरे लिये तो आध्यात्मिकता या सांसारिकता, दोनों एक समान ही अर्थ वाले शब्द हैं। विशेषता व महानता नाम की तो कोई वस्तु का मुझे आभास ही नहीं होता। वास्तव में सारे निरर्थक हैं। शब्द रचना ही निरर्थक है न जाने कुछ ऐसा आभास होता है कि मानों मैं घोड़ा बनी हूँ, और ‘मालिक’ मेरे ऊपर सवार है, किन्तु कोई बोझ ही नहीं है और ‘वह’ हूँ-हूँ कर के अक्सर हुँकारी भरता जाता है, जिससे मुझे पता नहीं क्या हो जाता है। कुछ ऐसा है कि जो मैं अलौकिकता अपने कण-कण में समा गई देखती थी, किन्तु अब तो लौकिक या अलौकिकता, मेरे लिये कहने को केवल समान शब्द भर हैं, अन्यथा यह कुछ भी नहीं। कोई दिव्यता नहीं, कोई महत्ता नहीं, कोई विशेषता नहीं, न पूजा में, न ‘मालिक’ में, और न अपने में। अब तो यह दशा है, वीराना भी वीराना नहीं रहा या यों कह लीजिये कि वीराना ही मेरा स्वरूप बन गया है, बल्कि यों कहिये कि उस पर भी मौत की खामोशी व्याप्त हो गई है, किन्तु अब मौत भी मौत नहीं है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं और केसर आप को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव ही कृपाकांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-667
लखीमपुर
5/3/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा पत्र पहुँचा होगा। आशा है आप की तबियत अब ठीक होगी। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो कुछ ऐसी दशा है कि मानों एक पूरे Circle में मैं समाई हुई हूँ, जिसका रंग कुछ ताँबे के रंग सा है। हर मानव मात्र मुझे केवल एक अवतारी शक्ति भासता है, जन्मता, मरता नहीं, बल्कि सब प्रगट हैं सो हैं। किन्तु फिर भी पैदा होने पर प्रसन्नता व मरण पर कुछ बुरा अवश्य लगता है, यद्यपि एक हल्के ख्याल के तरह ही, किन्तु होता है और मैं मानों हर एक से दबी हुई सी मस्तक झुकाये ही लगती हूँ, किन्तु कुछ ऐसा है कि मैंने अवतारी शक्ति व्याप्त लिखी है, किन्तु मैं उससे बिल्कुल ही अनभिज्ञ, अंजान सी रहती हूँ, क्योंकि शक्ति तो मेरे लिये केवल एक कहने भर का ही शब्द मात्र है, न कोई बोझ, न कोई प्रकाश, न पथ कोई चीज़ भासती ही नहीं। केवल दुनिया में रहती हुई एक आदमी हूँ। दुनिया क्या, कुल सृष्टि Nature प्रकृति व परमात्मा या आत्मा, जीव या ब्रह्म, यह सब मानों कोई ग्रन्थियाँ थीं, जो ‘मालिक’ ने साफ़ कर दी। अब इनके बारे में न कोई बुद्धि ही प्रश्न करती है, न औरों से कुछ सुनकर ही तबियत उधर जाती है। मुझे तो यह सब बेकार बातें लगती हैं, जिन्हें मैं समझ नहीं सकती हूँ। शायद अब न कोई मेरे लिये विषय रह गया है, न प्रश्न, न उत्तर, न कोई उलझन। इसलिये यदि अब कुछ लिखना चाहती हूँ तो कठिनाई पड़ती है। कोई विचार ही नहीं आते कि क्या लिखूँ। लगता है कि कुछ है ही नहीं, क्या लिखूँ। फिर कुछ लिख जाने पर भी यदि उसे पढ़ती हूँ तो पढ़ने पर भी सब कोरा का कोरा ही लगता है। पहले तो यह हाल था कि लिखने का संकल्प मात्र करने पर ही तमाम विषय व उसके बारे में बातें मानों कोई खुद ही मेरे में उड़ेलता चला जाता था, परन्तु अब तो सब मानों मौत की भी मौत सी खामोशी भीतर-बाहर सब ओर व्याप्त है। मैंने पहले लिखा था कि बेहोशी में भी एक प्रकार का होश पैदा हो गया है, किन्तु अब तो कुछ भी नहीं है। मैं तो बस एक संसारी साधारण मानव मात्र हूँ। यही नहीं बल्कि मन में प्रियतम मालिक की रटना रहती है, किन्तु वह भी बस अपने ही समान प्रतीत होता है। यह सब पता नहीं मुझे क्या हो गया है। शायद प्रेम की ही कमी हो।

Note:- Nature के ऊपर के आनन्द में Pressure नहीं रहता, इसलिये मन उसकी अनुभूति में रहता हुआ भी उससे परे ही रहता है। दशा में रहते हुए भी परे ही लगता है। जब हम Nature से आगे बढ़ते हैं, तो आनन्द का स्वरूप बदल जाता है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आप की ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-668
शाहजहाँपुर
12/3/1958
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम्हारी आध्यात्मिक हालत तो अच्छी ही है, फिक्र तन्दुरूस्ती की है। ईश्वर करे तुम तन्दुरूस्त हो जाओ, जो मिशन का काम कर सको। जब अभ्यासी उन्नति करते-करते ऐसे स्थान पर पहुँच जाता है, जहाँ पर कि ईश्वरीय दिमाग जिसको Super Mind कहते हैं, का असर आने लगता है, तो फिर शून्य की अनुभूति होती है। जब उसमें घुल-मिलकर एक हो जाता है, तब उसको उससे सूक्ष्म गति की खबर मिलती है। यहाँ तक कि इतनी हल्की हालत हो जाती है कि जिसको अगर शब्दों में वर्णन किया जाये तो यही कहा जा सकता है कि यहाँ पर Lamp या चिराग़ कभी जला था और उसकी रोशनी थी, अर्थात् बस यह गुमान (ख्याल) ही होता है कि रोशनी का कुछ असर बेअसर हो आने के बाद जो होता है, उसकी अनुभूति होती है, और साफ़ अगर किया जाये तो उसकी सूरत ऐसी मालूम होती है, जैसे टिमटिमाते हुए प्रात:काल का दीपक यानी इन्सान के मन पर जो शक (Doubt) का असर होता है, बस वही असर मालूम होता है। चक्र तो अपना करिश्मा दिखाकर और उन्नति देकर अपना काम खतम कर देते हैं फिर Centre रह जाते हैं, जो Nature का भेद बताते हैं।

दराज सहस्त्र-दल कमल पर पाँच उँगलियों का न मालूम होना यह बताता है कि हमारी सहायता सूक्ष्म मात्र ही रह गई है। यह काम Nature ने बहुत कुछ ले लिया है। जब अभ्यासी में लय- अवस्था सूक्ष्म गति में हो जाती है, तब भीतर-बाहर खामोशी ( Silence) सी छाई रहती है।

जब हर चीज़ की अनुभूति चली जावे, जब भाव अभाव हो जावे, तब यह समझना चाहिये कि असलियत या Reality में पैराव आरम्भ हुआ है। फिर और कुछ भी है, वह यह कि वहाँ के सब परमाणु भी घुल जाये और अपनी असलियत खो बैठे। तुम्हें अपनी इच्छा-शक्ति बैठे- बैठे न सही, लेटे ही लेटे सही, इस बात पर लगाना चाहिये कि तुम्हारी सब बीमारियाँ दूर हो रही हैं और तुम तन्दुरुस्त हो रही हो। तुमने कभी अपनी शक्ति का अनुभव नहीं किया। तुममे वह शक्ति है कि अगर पूरी शक्ति से पत्थर पर जमा दिया जावे तो टुकड़े-टुकड़े हो जायें। पहाड़ और ज़मीन हिलने लगेगी, बीमारी क्या चीज़ है।

अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-669
लखीमपुर
14/3/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का पूज्य मास्टर साहब के लिये आया। आपका समाचार मालूम हुआ। मेरी तबियत ठीक चल रही है। ‘मालिक’ की कृपा से जो आध्यात्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो यह दशा है कि मानों मेरे भीतर-बाहर, कण-कण में से दिव्यता एवं अलौकिकता किसी ने बिल्कुल निचोड़ दी हो और बिल्कुल रूखा छोड़ दिया हो। ऐसी दशा है, जैसे भोजन में नमक न हो। एक बार आप ने मुझे Divine Wisdom के बारे में लिखा था कि हममें मौजूद है। किन्तु अब तो यह दशा है कि मानों मेरे अन्तर-बाहर, कण-कण में से Divine पना किसी ने निचोड़ लिया हो और मैं तो अब एक बिल्कुल साधारण-जन मात्र ही हूँ। पता नहीं कि यह Divine लड़ी कब टूटकर समाप्त हो गई। मैं तो अब कुछ जान भी तो नहीं पाती हूँ। पहले मैं जो कुछ, साधारण बात-चीत भी दिन भर में बोलती थी, या जो कुछ लिखती थी सब मुझे दिव्य एवं अलौकिकता लिये हुए प्रतीत होते थे, परन्तु अब तो न जाने क्या हो गया है कि 6 लाख का घर खाक़ हो गया है।

यही नहीं, बल्कि न जाने यह क्या हो गया है कि खुद तो भीतर-बाहर अब वीरान भी नहीं रहा, किन्तु कुछ ऐसे चरण मानों हो गये हैं कि जिधर से निकल जाती हूँ, मानो वीरानपन बरस जाता है, नहीं, वरन् मानों मौत सी एक मनहूस खामोशी व्याप्त हो जाती है। किन्तु यह अजीब बात है कि स्वयं मैं मनहूसियत से भी गई बीती हूँ, क्योंकि मुझे तो वह भी नहीं छू पाती है। मेरी तो वही दशा है कि :-

“प्रात लेय जो नाम हमारा। ताहि न तेहि दिन मिले अहारा॥ ”

कुछ यह दशा है कि जब तक आप का कृपा पत्र पढ़ती हूँ, कि मैं यह कर सकती हूँ, वह कर सकती हूँ, बस तब तक तो मैं मानो सब कर सकती हूँ, बस उसके बाद ज्यों की त्यों। क्योंकि बात तो सच यह है कि मैं तो केवल एक दुनियाबी साधारण जीव मात्र हूँ। यह सब गूढ़ विषय भला मैं क्या समझ सकूँ। कोई एक समय था कि जब अपने स्नेह की डोरी लेकर ‘मालिक’ को बाँधने चली थी, किन्तु पता नहीं, डोरी कहाँ चली गई और मैं भी डग भर भी चल न पाई और अपने को भी जहाँ की तहाँ, ज्यों की त्यों, खड़ी पाया और बाँधने की मंशा किसे थी, यह भी भूल गई। सारा खेल बिगड़ गया। फिर घर के धन्धे ज्यों के त्यों प्रारम्भ हो गये। न कभी अब बाँधने का ही ख्याल आता है और न कुरेदन ही मुझे जगा पाती है। मैं तो अब अक्सर यह सोचने लगती हूँ कि आखिर मुझे यह हो क्या गया था। शायद इसीलिये ‘उसके’ ख्याल के साथ ही साथ Divine लड़ी व अलौकिकता व दिव्यता की ज्योति भी विदा हो गई। अब तो मानों एक बुझा दीपक पड़ा है, जिसमें घर में कुछ उजाला कर सकने की क्षमता ही नहीं रही। इसलिये घर भी एक सराय है, जहाँ दीपक कभी जलाया ही नहीं गया। चाहे जो अँधेरे में आवे, चला जावे, कुछ पता नहीं।

आप ने लिखा था कि “Reality का प्रारम्भ हो चुका है, तुम उसमें अब आगे तैर रही हो”, किन्तु मैं भला एक साधारण बालिका क्या समझूँ। जिसमें दीपक को जलाकर रखने की क्षमता नहीं रही, बुझा पड़ा है, तो पड़ा रहने दो, वह भला Reality या गूढ़ तत्व क्या समझ पावेगा। किन्तु कुछ भी हो, चाहे दिखे या न दिखे कुछ हाथ तो आगे ही फैले, आगे ही टटोलेंगे। अब यह सब क्या है, यह तो आप ही जानें।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। केसर ‘आपको’ प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-670
लखीमपुर
15/3/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का प्राप्त हुआ। पढ़कर प्रसन्नता हुई। मैं अपनी तन्दुरुस्ती पर पूरा ध्यान रख रही हूँ, चिन्ता की कोई बात नहीं है। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

कई दिनों से गर्दन के ऊपर, सिर के बिल्कुल पीछे निचले सिरे पर एक जगह बराबर दर्द बना रहता है और काफी मात्रा में बढ़ जाता है। सिर में सीधी मांग को पीछे सिर तक काढ़ता जावे तो उसी के लगे दाहिने Point पर जहाँ पहले अक्सर फड़फड़ाहट सी होती थी, वह अब भी बनी हुई है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-671
शाहजहाँपुर
17/3/1958
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

पत्र तुम्हारे सब मिल गये। तुमने अपनी तन्दुरुस्ती अच्छी लिखी, इसलिये खुशी में तुमको P1 के स्थान पर रात डाल दिया। अब वहाँ की सैर शुरू होगी। ब्रह्म-विद्या की दशा को अगर मनहूसियत कह दिया जाये, तो जैसे जिन्दा को मुर्दा कह लेते हैं, सबसे अच्छा Description है और आगे चलकर यही दशा रहकर फिर विदा हो जाती है। कण-कण का निचोड़ देना, जो तुमने लिखा है, वह ठीक है और इसके अर्थ यह हैं कि दुनिया की तरी अब तुमसे विदा हो गई है और हो रही है। तुमने जो दीपक बुझा हुआ की मिसाल दी है, तो दीपक बुझा हुआ नहीं है, बल्कि उसमें असल रोशनी पैदा हो गई है अर्थात् वह रोशनी या शक्ति जिसमें तमाम दीपक जल सकते हैं। एक बात यह है कि तुम्हारे घर में भी तुमसे रोशनी फैली है।

तुम्हारे भाई-बहिनों को दुआ। चौबेजी को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-672
लखीमपुर
19/3/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का मिला। समाचार मालूम हुए। मेरी तबियत अब बिल्कुल ठीक है। ‘मालिक’ की कृपा जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो अब यह दशा है कि ‘मालिक’ से यदि फरियाद होती है, तो बस यही कि:-

“बिना भक्ति तारो, तब तारिबो तिहारो है।”

और तारो या न तारो, यह तरना-वरना अब कुछ मेरी समझ में नहीं आता है। अब तो प्रार्थना भी ‘मालिक’ से होती है, तो सूखी हुई, निचुड़ी हुई, कि केवल फरियाद है, किन्तु इस फरियाद में फरियाद या प्रार्थना कुछ भी नहीं रहती है। कुछ ऐसी दशा अब स्वाभाविक या सहज ही बन गई है, या यह अपना Nature ही बन गया है। अब कुछ यह अजीब बात देख रही हूँ कि दशा मैं अनुभव करती हूँ तो उसका आनन्द जितना या जैसा भी हो, अनुभव होता ही है, किन्तु फिर भी न जाने क्यों Senses ज्यों की त्यों पड़ी रहती है, दिल व दिमाग़ तक ज्यों के त्यों बने रहते हैं। यह सब कुछ समझ में नहीं आता कि क्या है। सब कुछ ठीक बना रहता है, भीतर-बाहर, सब कुछ ज्यों का त्यों पड़ा है, मानों कभी किसी ने हाथ तक न लगाया हो, छुआ तक न हो। कोई नयापन नहीं, न कोई अजीबपन है, मानों जब आँख खुली तो दुनिया को ज्यों की त्यों पाया।

कुछ ऐसी दशा है कि मानों एक पूरे circle में मैं समाई ही नहीं, वरन् मानों सब मेरी मुट्ठी में समाया है। मैं देखती हूँ कि यद्यपि इस Circle व Point को मैं Cross नहीं कर सकी, परन्तु फिर भी पड़ी चैन कर रही हूँ, वरन् ‘मालिक’ क्या कर रहा है, यह ‘वही’ जानें। कुल पूरे-पूरे Circle मैं घूम चुकी हूँ और उसका जर्रा-जर्रा हल्का होकर मेरे अन्दर व्याप्त हो चुका है, किन्तु मुझे खुद अपना ठिकाना व पता नहीं है। पता नहीं ‘मालिक’ ने कहाँ गुम कर दिया और स्वयं भी तो मुझे लेकर कहीं गुम हो गया। मैं ज्यों की त्यों खाली हाथों खड़ी अब भी जब याद आती है तो, ‘उसकी’ बाट निहारती अपने को पाती हूँ, किन्तु सच तो यह है कि याद कभी आती ही नहीं है। सेवा भी तो अपने ‘मालिक’ की अब कभी होती नहीं। क्या सेवा करूँ, कैसे करूँ, यही तमीज़ नहीं रही।

अब न जाने इधर करीब 15-20 दिनों से कुछ ऐसी दशा है कि रात में अचानक चिल्ला पड़ती सोते में और यही नहीं, दिन में भी, न जाने क्यों जागते में भी, रह-रहकर मानों चिल्ला पड़ती हूँ किन्तु इतनी मालिक की कृपा है कि मेरी चिल्लाहट अभी तक घर में कोई दूसरा सुन नहीं सका, नहीं तो भला मैं क्या कारण बताती, न मेरे दर्द है, न मेरे पीर है। Senses ज्यों की त्यों शान्त पड़ी हैं। दिल व दिमाग़ बिल्कुल सम अवस्था का रूप ही हो चुका है, परन्तु यह मुझे न जाने क्या हो गया है।

कल अचानक बाँये पैर के अँगूठे की नोक में इतनी तेज फड़फड़ाहट थी, कि लगता था कि पूरे पैर की वह नस फड़फड़ा उठी थी, फिर कुछ ठंढी फुहार सी उसमें समाने गई और निकलने लगी, फिर सब फड़फड़ाहट शान्त हो गई। अब भी लगता है कि मानों अन्दर अंगूठा खुल गया है, पता नहीं यह क्या है।

अब न जाने क्यों मुझमें एक ऐसी तेजी या Activity रहती है, जिस पर मेरा Control नहीं है। किन्तु मानों मेरा उस Activity या तेजी से रंच मात्र भी सम्बन्ध ही नहीं है।

एक बात और यह हो गई है कि जब मैं कोई चीज़ खाना चाहती हूँ, तो बजाय अपने आप खाने के दूसरों को जब खिला देती हूँ, तो मुझे वही सन्तोष मिलता है, जो अपने आप खाने से मिलता है।

अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं। केसर आपको प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी सदैव ही कृपा कांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-673
लखीमपुर
3/4/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आपका पोस्टकार्ड पूज्य मास्टर साहब के लिये आया था, सुनकर प्रसन्नता हुई। आप ने मुझे P1 Point पर खींच दिया है, बहुत-बहुत धन्यवाद है, ‘आपकी’ मेहरबानी के लिये। ‘मालिक’ की कृपा से जो भी आत्मिक-दशा समझ में आई है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो न जाने क्या दशा है कि लगता है मानों हर मन-मानस पर मेरा अधिकार है। काशी यदि दर-दर मिशन के लिये झोली फैलाता फिरेगा तो कस्तूरी हर मन-मानसों को उस झोली को भर देने को मजबूर कर देगी। परवाह नहीं, जनम-जनम मिशन के प्रचार को मुझे ग्रहण करना पड़े परन्तु मिशन का काम व प्रचार मानों मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। मुझे उसे पूरा ही करना होगा। मेरे ‘श्री बाबूजी’, श्री समर्थ जी से वह प्रतिज्ञा कि मिशन का प्रचार घर-घर कर दूंगा, मानों अब मेरी ही निज की प्रतिज्ञा होकर सामने नाचती है। मुझे करना होगा, हर मानव-मानसों को मिशन की ओर झुकाना होगा। संसार के समस्त तन व मन व सारा धन मिशन का ही है और उसके ही लिये दोनों हाथों से उलीचा जायेगा। यदि मेरी Service लगी होती तो एक जून ही रूखा-सूखा खाकर व एक घड़ी सोकर ही मैं अपने मिशन को रूपयों से अकेले ही भर देती। किन्तु ‘मालिक’ की नौकरी की है, तो यह भी हो जायेगा। यदि ‘मालिक’ ने मेरा Care, take-up किया है, तो मैंने भी मिशन की Care व ‘उनकी’ Health का Case, take-up जो पहले से था, अब पूर्णरीत्या अपने पर ही ले लिया है और यह ‘आपकी’ कृपा से ही पूर्ण होगा।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। केसर आप को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-674
शाहजहाँपुर
7/4/1958
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभ आशीर्वाद।

तुम्हारा एक पत्र दिनांक 31 मार्च सन् 1958 और एक पोस्टकार्ड दिनांक 3 अप्रैल 1958 का मिला। मैंने तुम्हारा पोस्टकार्ड मिलते ही तुम्हें तवज्जोह दी और तुम्हें अच्छा भी लगा होगा। एक अचम्भे की बात यह भी है कि लोग ईश्वर से प्रेम नहीं करते और अगर करना भी चाहते हैं तो कर नहीं पाते। तुमने इस बात को सोचा कि क्या वजह है? हमने सोचा तो नहीं, मगर इस वक्त का विचार लिख रहा हूँ। वह रिश्ता या नाता जो दुनियादारी की तरफ उनको लपेटे हुए है, ईश्वर की तरफ़ उसको कायम करके मजबूत नहीं बनाते। अक्सर यह नाता मुझे जोड़ना पड़ा है और इसकी कोशिश भी की है, मगर अब नहीं मालूम कि मेरा क्या हाल हो गया है कि मैं उस तरफ़ तवज्जोह नहीं लेता, इसलिये कि मेरे नाता जोड़ने से बस यही असर रहा कि जब तक शराब पिलाई गई, नशा रहा और जब पिलाना बन्द कर दी, नशा गायब। अपने में यह चीज़ पैदा नहीं की, कि उस नशे को देख करके नशे की हालत ही पैदा कर लेते।

दक्षिण भारत में ‘मालिक’ की कृपा से जैसा तुम्हारा विचार था, मिशन की आग भड़कना शुरू हो गई है और Dr.K C.Vardhachari के पास अच्छे-अच्छे लोग आना शुरू हो गये हैं। आश्रम के लिये Govt. जल्दी कर रही है और वह लोग इन्तजाम कर रहे हैं, ईश्वर ‘मालिक’ है। एक शख्स ने अकेले आश्रम बनाने का वादा किया है, बशर्ते कि उसको China Clay का पट्टा मिल जाये। एक Retired Deputy Collector ने जाकर उसका काम बनवा दिया। ‘हिन्दू’ अखबार का Asst. Editor जो सत्संग में शामिल हुआ है, उसको 3-4 Sittings लेने के बाद 7 अप्रैल को अमेरिका जाना पड़ रहा है। कुछ दिनों के बाद अगर उसको अमेरिका जाना पड़ता तो कुछ प्रचार का काम हो जाता। फिर भी छ: किताबें Reality at Dawn की मैंने भेज दी है।

अब मैं तुम्हारी हालत पर आता हूँ। तुम्हारी यात्रा का स्थान P1 है, मगर अभी सैर शुरू नहीं हुई है। यह भी हो जायेगी। तन्दुरूस्ती का ख्याल है, इसलिये Natural Way में थोड़ा-थोड़ा करता हूँ। अब तो तुम भी इच्छा बाँध ही दो कि तुम्हें आराम हो रहा है और तुम खूब तन्दुरुस्त हो रही हो। तुमने जो 31 मार्च के खत में यह लिखा है कि जब तुम कोई चीज़ खाना चाहती हो तो बजाय अपने आप खाने के दूसरों को जब खिला देती हो तो तुम्हें वही सन्तोष मिलता है, जो अपने आप खाने से मिलता है। मेरा हाल भी यही वर्षों से चल रहा है और जब तुमने लिखा तो मुझे भी याद आ गया। इसका मतलब यह है कि एक भाव पैदा हो गया है और तुम्हारी कोई इच्छा बाकी नहीं रही। मिशन के फैलाने की जो तीव्र इच्छा तुममें पैदा है, इसकी वजह बहुत मामूली है कि मुझमें तुमने लय- अवस्था बहुत अच्छी पैदा कर दी। इसलिये मेरा यह जज्बा तुम्हारे में पैदा हो रहा है।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-675
लखीमपुर
10/4/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र ‘आपको’ मिला होगा। आशा है ‘आपका’ स्वास्थ्य ठीक होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब आज अचानक मैंने यह अनुभव किया कि Atmosphere में Condition उत्पन्न कर देने की क्षमता ‘मालिक’ ने मुझे दे रखी है। वैसे आज तक कभी न ऐसा अनुभव हुआ और न इधर ध्यान ही गया कभी। न जाने क्या बात है कि मेरे कण-कण में से दुनिया निचुड़ गई हो तो, यह नहीं, बल्कि मानों मेरे ‘मालिक’ को भी किसी ने निचोड़ कर मेरे हृदय को मेरे कण-कण को भीतर-बाहर, सब किसी ने शुष्क करके रख दिया है। न जाने क्यों ‘मालिक’ ने ऐसा किया। लगता है, कि सारे कण-कण में से मानों किसी ने नमक खींच लिया हो। बस मानों कुल में सूखा पड़ गया है और न जाने अब क्या है कि कण-कण तो मैंने लिख दिया है, किन्तु मुझे तो बस केवल कुछ शब्द ही व्यापक मिलता है और कोई एहसास नहीं, अनुभव नहीं और कुल का भी न कोई अनुभव हैं, न प्रतीति ही है। इस मुँह से केवल अब कुल शब्द ही निकलता है, सोई लिखती हूँ। कुछ या न कुछ है या नहीं, भीतर या बाहर, कण-कण कुल मिलाकर बस कुल हो गया है। या यों कहिये कि कुल को निचोड़ या घटाकर केवल यह कुल ही शेष बच गया है, सो भी न ‘मालिक’ के Conception में आता है, न स्वयं के ही, बस रूखा-सूखा, फुटकर केवल कुल ही है, दूसरा कोई Idea नहीं।

कुछ ऐसी दशा है कि जिसे मैं विशुद्ध दशा ही कह पाती हूँ। सारी पीठ इतनी नम्र हो गई है. कि मानों हड्डी-वड्डी का कहीं पता ही नहीं रह गया है। बोझ नाम की कोई वस्तु छू तक नहीं गई है। लगता है कि मानों साफ़ खुले मैदान में मैं बिल्कुल Fresh खड़ी हूँ मानों एक नवीन Circle में मैं खड़ी हूँ, किन्तु फिर भी ‘मालिक’ की कृपा से मानों कुल Circle मेरी दृष्टि के अन्तर्गत है। मानों अब लय- अवस्था की यह एक नवीन एवं अद्भुत Stage के अन्दर खड़ी हूँ, जो श्रद्धा, विश्वास, प्रेम एवं लय और ज्ञान से बिल्कुल अछूती है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-676
शाहजहाँपुर
16/4/1958
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभ आशीर्वाद।

तुम्हारे दो पत्र डाक से और एक दस्ती मिला। बड़ी खुशी हुई, जो तुमने यह लिखा कि अब तुमको आराम होकर ही रहेगा और बात भी ठीक है।

तुम्हारा यह ठीक ख्याल है कि तुममें Atmosphere में Condition पैदा करने की क्षमता मौजूद है, इसलिये कि ब्रह्माण्ड-मण्डल की Mastery तुमको दी गई है। तुम्हारी शुद्ध दशा तो चल ही रही है, मगर अभी तुम शुद्ध और अशुद्ध का ख्याल बाँधे हो। वहाँ न शुद्धता है, न अशुद्धता। तुम्हारा यह ठीक ख्याल है कि तुम लय-अवस्था की नवीन दशा में खड़ी हो। तुम्हारे Soul Consciousness में लय हो जाने का पता जल्द ही मिलेगा- अभी उसके दरवाजे पर हो। शुरुआत नहीं हुई है, मगर कुछ उभार की दशा ऐसी पैदा हो गई है कि लय अवस्था के Circumtances बन रहे हैं। यह तुम्हारे 10 अप्रैल के पोस्टकार्ड का जबाब है।

अम्मा को प्रणाम।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-677
लखीमपुर
16/4/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। यहाँ सब कुशल है। आशा है, वहाँ भी सब कुशल पूर्वक होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ ऐसी दशा है कि मानों मेरी अब कुछ समझ में ही नहीं आता है। कस्तूरी का Form तो केवल नाम मात्र को है क्योंकि लगता है कि इससे तो मानों न मैं सुनती हूँ, न समझती हूँ, न बोलती हूँ और न देखती या अनुभव करती हूँ। कस्तूरी का Form तो अब केवल उसका नकाब मात्र ही है, नहीं तो सारी बातें सुनकर न जाने कहाँ भीतर चली जाती है। कहीं या समझी जावे या न समझी जावे, सुनी जाये या न सुनी जाये, इसलिये समझ या नासमझी का कहीं स्पर्श तक नहीं है। साँस भी भीतर ही भीतर कहीं जाती हो कि जिसका मुझे एहसास नहीं और मैं क्या, भीतर या बाहर कहूँ, जब मेरे लिये तो अंतर-बाहर, दोनों ही एक समान है।

जो उदासी की दशा मैं वर्षों पहले लिखा करती थी, लगता था, तब वह नकाब के रूप में थी, किन्तु अब तो लगता है कि हर दशा एक और केवल एक कुल शब्द में व्याप्त हो गई है, समाप्त हो गई है। मेरे पास अब कुछ भी नहीं है। न खरचने को दाम है और न लेने को हरिनाम ही है। अब तो दशा क्या है कि मानों सर्व अंतर्यामिन या सर्वव्यापी रूप में व्याप्त हो गई है। दशा अपने असल में समा गई है और मुझे अकेला फुटकर छोड़ दिया है।

कुछ ऐसा तमाशा हो गया है कि ज़िन्दगी अपने असल में समा गई है, मौत अपने में समा गई है, गुण भी अपने असल में समा गये। यहाँ तक कि ‘मालिक’ भी स्वयं अपने में समा गया है। मैं तो फुटकर मशीन की भाँति फिरा करती हूँ, पता नहीं किस वेष में और विचार द्वारा बस सब काम करा करती हूँ। आध्यात्मिकता भी स्वयं में समा गई। मुझे कौन पूछता, किन्तु हर हालत में मेरे तो ‘मालिक’ हैं, चाहे जैसे रखें।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-678
लखीमपुर
21/4/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का मिला। समाचार मालूम हुए। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तक तो मानों सब अंतर की लीलाएँ देखा करती थी, किन्तु अब तो सारी लीलाएँ, सारे खेल व तमाशे सब समाप्त हो चुके। अब तो जो है, सो है या नहीं। भाई, अब तो जो था, सो भी अब नहीं है। अब तो खेल व तमाशे व भाग-दौड़ का मैदान जाता रहा। शून्य समाधि की दशा, जो पहले मैं लिखा करती थी, सो भी अपने में समा गई या लय हो गई है। अब तो कुछ लगता है कि कुल या विराट् रूप में समाकर अब उससे भी मानों नाता ही टूटकर एक अकेली जगह मैं खड़ी हूँ। अब तो लगता है कि आत्मा का भी पिघलना शुरू हो गया है।

अब तो वह दशा जो मै लिखा करती थी कि- “जो पहिरावे, सोई पहिरूँ” अथवा “जहाँ बैठारे, तित ही बैठूं”, वे सारी बातें समाप्त हो गई। वह प्रेममयी दशा भी गल-गलाकर बराबर हो गई। कुल दशा मानों अपने में ही समा गई, किन्तु अब तो जो है, उसमें ही पता नहीं क्यों मस्त हूँ। कभी अन्दर से स्वत: ही मानों एक अवधूत गति सी दशा उभर कर ऊपर आती जाती है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

सदैव आप की ही कृपा कांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-679
शाहजहाँपुर
27/4/1958
प्रिय बेटी कस्तूरी, शुभाशीर्वाद।

तुम कुशल पूर्वक दिल्ली पहुँच गई होगी और Ward में दाखिला तो स्टेशन से उतरते ही हो गया होगा। मैंने तुम्हें वनवास भेजा है। इसलिये कि तुम रही सही बीमारी को वहाँ मार सको। तुम्हें हिम्मत रखनी चाहिये और सबको हर हाल में खुश रहना चाहिये।

तुम्हारी आध्यात्मिकता की Stages ईश्वर ने चाहा तो वैसी ही चलती रहेंगी और हृदय में तुम्हारे तसल्ली रहेगी। अगर कुछ भी तकलीफ़ मालूम हो तो प्रार्थना का औज़ार तुम्हारे पास है- उससे सब हालत ठीक हो जायेगी।

शुभचिन्तक
रामचन्द्र
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-680
लखीमपुर
4/5/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

मैं विरोध कर सकती हूँ, किन्तु मेरे अन्तर में ‘आपकी’ कुछ इच्छा देखकर व कुछ कह देने के बाद विरोधी भावनाएँ ही नहीं उठती हैं। यद्यपि अब न यह मालूम पड़ता है कि मेरी यही भावना हर समय रहती है कि ‘मालिक’ की मर्ज़ी में मैं खुश हूँ। अब तो न विरोधी भावनाएँ हैं और न इच्छित भावनाएँ ही हैं। सच तो यह है कि अच्छी या बुरी, अब तो कैसी भी, भावनाएँ उठती ही नहीं हैं। मैं तो इसलिये स्वयं ही अपनी दशा को समझ सकने में असमर्थ हूँ, क्योंकि रोऊँ तो, गाऊँ तो सब बातें बिना अंतर की भावनाओं के उठे ही होता है। मैं तो केवल कठपुतली मात्र हूँ और केवल अपने ‘मालिक’ ही नहीं, वरन् हर मानव मात्र की ही, किन्तु जड़ कठपुतली की भाँति हूँ, क्योंकि यह भी ज्ञान नहीं रहता, जो कि खुश हो लूँ, कि मैं तो कठपुतली मात्र हूँ।

ऐसा लगता है कि अंतरतम् का दरवाजा फट गया, सब कुछ एक धार हो गया लगता है कि अन्तर से प्रेरणा व स्फुरन देने वाली मेरी शक्ति मर चुकी है। नहीं, वरन् एकसार दशा ही व्याप्त हो गई है और मैं तो जैसे बिल्कुल खाली, भूली भटकी सी चुपचाप फिरा करती हूँ। मुझमें बराबर विचार अब नहीं आते, वरना सिर के बीच का भाग जो कि कुछ ऊपर से सम्बन्धित रहता है, तो ऊपर से कुछ Vibration ही आया करते हैं, किन्तु रात में सोने में मानों ऐसा लगता है कि बिल्कुल महाशून्य में ही व्याप्त हो जाती है। ऐसा लगता है कि यहाँ रहती जरूर हूँ, किन्तु मेरा खेमा तो घर में ही लग चुका है, किन्तु इसका एहसास निद्रा में ही होता है। न जाने क्या बात है कि महाकाश को सबसे शून्य कहा गया है, किन्तु मेरी दशा में तो वह भी मेल नहीं खा पाता है, वह तो भारी ही रहती है और मेरी हालत तो बस मानों खाली शब्द की तह का ही रूप हो गई है। अब खाली कहने को कह लूँ, किन्तु उसके लिये तो यह भी ठीक नहीं आता है कि यह अपनी दशा का अनुभव है या केवल एक अपना ही स्वरूप है। अब तो अनुभव और दशा भी एक सार हो गये हैं। बस एक ही चीज़ हो गये हैं अब तो जिसकी वजह से आत्मिक-दशाओं की अनुभूति होती थी मानों वजह ही बिला गई, समाप्त हो गई। शायद इसीलिये वह आकर्षण भी समाप्त हो गया, जो मुझे हर समय ऊपर और अंतर में खींचे रहता था। अब तो ऊपर नीचे, अंतर-बाहर, सब कुछ समाप्त हो गया। इति :-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-681
लखीमपुर
29/5/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। यहां सब कुशल पूर्वक है। आशा है आप भी सकुशल होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा चल रही है, सो लिख रही हूँ।

भाई, न जाने अब तो कुछ ऐसी दशा है कि रात को सोते रहने पर भी दिमाग में मानों आराम नहीं, वरन् थकान ही लगती है। मानों दिमाग़ की नसें कुछ काम करती हैं, जो मुझे पता नहीं, किन्तु दिन में यदि कभी सो जाती हूँ, तब तो न जाने क्यों ज़रूर दिमाग में कुछ Rest मिल जाता है, वैसे नहीं। लगता है कि ‘मालिक’ के मिलन के (या लय-अवस्था की) एक बिल्कुल नवीन मैदान में पैराव शुरू हो गया है। एक बहुत कोमल दशा मेरा स्वरूप बन गई है। भीतर-बाहर, सब कुछ कोमल ही हो गया है। अब तो यदि उसे बहाव कहती हूँ तो वह बहाव या सरल शब्द भी दशा से भारी लगता है। शब्दों के अर्थ की तौल या अब तो दशा का अनुमान तक दशा से भारी लगता है। कैसे व्यक्त करूँ अब दशा को ?

जो है, सो है भी भद्दापन ही लगता है दशा के लिये। नम्रता कहती हूँ, तो भी दशा के लिये उचित नहीं बैठता है। दशा कैसे कहूँ, जबकि वह तो पंच तत्वों व तीनों गुणों से रहित अथवा परे ही हो गई है। दिखावट या लगाव लपेट का जरा सा भी गुमान तक उसमें नहीं रह गया है। एक बहुत ही कुछ नाजुक सी दशा है। कुछ ऐसा हाल हैं कि शरीर भी अब शरीर नहीं, मानों ईश्वरालय या भगवान का घर है। न जाने क्या हो गया है कि अंग-अंग और नस-नस तथा कण-कण, भीतर- बाहर मानों ईश्वरीय शक्ति और प्रकाश से परिपूर्ण हैं। यद्यपि कुछ ऐसी नासमझ दशा भी मेरी कुछ साथ में है कि जिससे शक्ति व प्रकाश मैं नहीं जानती कि क्या है, अथवा कैसी है। सब कुछ असीमित हो गया है और उस असीमित Limitation रहित में ही मैं भी समा गई हूँ। अब तो दशा के लिखने में भी मानों मेरी तबियत एकाग्र होने से घबड़ा उठती है। एकाग्रता अब न जाने क्यों मुझे सहन नहीं हो पाती। स्वयं ही तबियत में कभी कुछ और कभी कुछ आवे या जावें, किन्तु वैसे मुझे अब कुछ भी सहन नहीं होता। सब कुछ असीमित हो गया है। मैं भी पता नहीं, ऐसे ही जाने कहाँ विलीन हो गई हूँ। शरीर, मन व प्राण का कण-कण बिखर कर अकस्मात् ही उस सीमित में ही समा गया है। अब इन सब के कहने में कोई आनन्द नहीं, कोई अर्थ नहीं है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति :-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-682
लखीमपुर
7/6/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा पत्र जो मैंने दद्दा के हाथ भेजा था, मिल गया होगा। यहाँ सब कुशल पूर्वक हैं, आशा है ‘आप’ भी अच्छी तरह होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक- दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो कुछ ऐसी दशा है कि इधर तो P1 Point की सैर समाप्त होने से अब आगे Stopage यानि हाथ पैर बन्द हो गये भी लगते हैं और दूसरी ओर एक नवीन दशा में पैराव होना भी शुरू हो गया है।

कुछ ऐसी दशा हर मिनट रहती है कि पहले जैसे मैं लिखा करती थी, कि एक प्रकार से सेंक से मैं हर समय सम्बन्धित रहती हूँ, किन्तु अब न जाने यह क्या दशा है कि वही सेंक अब निज का मेरा स्वरूप बन गया है। कुछ ऐसा हो गया है, कि भीतर-बाहर, कण-कण में कुल में, वही धीमा सा, कोमल नाजुक सा सेंक व्याप्त हो गया है। आज अचानक माथे पर Last Point माँग तक तमाम एकदम से मानों भीतर वह Point बिल्कुल फैल गया और तमाम नसें ऊपर को खिंची हुई थीं और ऊपरी दशा से सम्बन्धित थी।

अब दशा क्या है, Softness की इन्तहाई दशा है। भीतर-बाहर कण-कण समाप्त होकर कुल में Softness एक सार व्याप्त हो गई है। पहले मेरी दीवानगी दशा थी, अब तो शरीर का कण-कण ही दीवानगी का स्वरूप हो गया है, इसलिये दीवानगी कहना भी बेकार हो गया है। दीवाना दीवाने को भला क्या कहे, या क्या पहिचाने। हर चीज़ इन्तहाई दशा कह लें, या समाप्ति की दशा हो रही है। लगता है कि ‘मालिक’ की Soul में मेरा पैराव शुरू हो गया है। एक ही Soul में लय सी दशा का पैराव शुरू हो गया है। लगता है कि ऐसी दशा है कि मानों जिसमें कभी क्षोभ उत्पन्न ही न हुआ हो।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-683
लखीमपुर
15/6/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, मेरा एक पत्र मिला होगा। यहाँ सब अच्छी तरह से हैं, आशा है ‘आप’ भी अच्छी तरह से होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ ऐसी दशा है कि लगता है कि तमाम Active पना सब समाप्त होकर, शरीर का ज़र्रा-जर्रा तक मानों एकदम से शान्त व मौन पड़ गया है। एक शरीर के कण-कण में, अंतर में तथा बाहर, सब, बस धुंधलापन सा छा गया है। ‘मालिक’ से लगाव का पता नहीं और क्या लिखूँ। ‘मालिक’ पर तो बस यह जीवन न्योछावर है, इतना ही कह सकती हूँ। जैसी मर्जी, वैसी ही रहनी बनाने का प्रयत्न कर रही हूँ। कुछ ऐसी दशा है कि जिसके कारण से Spiritual दशा होती थी, या यों कहिये, जो आध्यात्मिकता का कारण था, वह भी मानों गलते-गलते समाप्त हो गया। अब तो उसका कोई कारण ही नहीं, मानों अब भी वही ढल चुकी है। इसलिये दीवार (दशा रूपी) कैसे अपनी मालूम हो सकती है। यही नहीं, बल्कि जिस कारण से लय-अवस्था होती थी, लगता है कि अब वही कारण भी बराबर पिघलते-पिघलते, पानी-पानी होकर गुम होता जा रहा है।

अब तो कोई शान्ति मिली कहे या कोई आनन्द कहे, किन्तु मेरी तो यह दशा है कि पता नहीं कि तबियत में शान्ति रहती है या अशान्ति, आनन्द है या बेआनन्द। तबियत में या विचार में इतनी शक्ति ही नहीं जो अब शान्ति या अशान्ति, आनन्द या बेआनन्द को पकड़ भी सके। सादगी या Simplicity को भी अब विचार पकड़ ही नहीं पाते। वह तो कोसों दूर की अपने से अलग चीजें लगती हैं और मुझे फिर इनसे काम ही क्या।

कुछ ऐसा हो गया है कि जो चीज़ मुझे मेरी हालत का पता देती रहती थी, वह न जाने कब समाप्त हो गई। मेरा दिल इतना छोटा हो गया है कि कहीं जगह ही नहीं, जो इन किसी भी चीज़ को या आध्यात्मिकता तक को स्थान दे सकती। इसलिये सब विदा हो गई। अब तो बिना मैदान का मैदान सामने है और जिसमें बिना गति अथवा चाल के मैं चलती जा रही हूँ।

एक न जाने क्या हो गया है कि अपनी हालत हर आदमी के सामने चाहे वे पूजा करें या न करें, देखती हूँ तो छोटी रहती है। कोई विशेषता नहीं लगती है। न जाने क्यों मैं अपनी दशा से अब चिमट नहीं पाती हूँ और प्रयत्न करना सब बेकार है। मुझे कोई मेरी हालत की अनुभूति ज़बरदस्ती कोई भुला-भुला कर देता है किन्तु मैं तो अब ऐसा किये रहती हूँ कि Will से विचार को वहीं छोड़ देती हूँ, जिससे पूरी तरह अपनायत तो होती ही रहती है। ‘मालिक’ जैसे भी कृपा कर मुझे लिये चल रहा है। उससे मैं तो एक ही तरह लिपटी रहूँगी। हाथ-पैर नहीं चलते तो न चले। अब हाथ-पैर हैं नहीं तो चलेंगे क्या? वैसे अब कहने सुनने या लिखने को मेरे पास न शब्द हैं, न अनुभूति है और न शक्ति है, किन्तु विचार लिखते समय खुद ‘मालिक’ से शक्ति घसीट कर शब्दों के रूप में कुछ उगल देते हैं। वरना तो शरीर में या बुद्धि या मन में तो Activeness का पता ही नहीं। जरूरत पड़ने पर विचार ही ‘मालिक’ से शक्ति लाकर काम बनाते रहते हैं।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती है। छोटे भाई बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आपकी ही कृपा कांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-684
लखीमपुर
20/6/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

पत्र जो पूज्य ताऊजी के हाथ भेजा था, सो मिल गया होगा। अब ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो भाई, कुछ ऐसी दशा है कि मानों अपना हृदय ही कुल में फैला हुआ है और हर का सुख- दुख, अच्छाई या बुराई सब Vibrations इस हृदय में टकराया करते हैं। सब का रंज व खुशी के Vibrations इस ह्रदय में टकराते हैं। हालत में भीतर-बाहर, न सफ़ाई लगती है, न अँधेरा, कुछ धुँधलापन ही कुल में व्याप्त हो गया है। या यों कहिये कि कुल दृष्टि में धुंधलापन ही पैठ गया है। मैं तो केवल ‘उनकी’ ही दासी हूँ या यों कहिये कि मेरा जीवन ‘उन्हीं’ का जीवन है।

भाई, अब तो एक ऐसी साम्य दशा ही भीतर-बाहर, सबमें सब ओर ही फैली हुई है। एक बार मैंने लिखा था कि जब ‘मालिक’ के ख़्याल में होती हूँ, तो वह Greatness ख़ुद मुझमें मालूम देती है, किन्तु वह सब मानों मेरे लिये केवल कहावत मात्र थी। Greatness नाम की वस्तु सब बिल्कुल मानों व्यर्थ हैं, उसका कोई अर्थ ही नहीं है।

सिर के बाँयें भाग में, जहाँ पर माँग खतम होती है, वहाँ से कान तक तथा उतने ही सिर के आधे भाग में पीछे गर्दन तक करीब 15 मिनट तक इतनी तेज कभी गुदगुदी व सुन्न की अवस्था हो जाती थी कि कुछ कहना नहीं। मुझे लगता है कि जो भी दशा मेरी बीतती जाती है, उस तरफ से कोई मेरा मुख मोड़े रहता है। यहां तक कि बार-बार अवधूत गति रहती है, परन्तु कोई मुझे ज़बरदस्ती मेरा मुख उधर से मोड़े रहता है। कोई मेरी हालत जो कुछ भी बीत चुकी है, या है, उससे मुझे बेलौस रखता है। पता नहीं क्यों ऐसा है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आप की ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-685
लखीमपुर
12/7/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरे तथा ताऊजी के पत्र पहुँचे होंगे। यहाँ सब कुशल पूर्वक हैं, आशा है, ‘आप’ भी अच्छी तरह से होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुल ऐसी दशा है कि जो कुछ भी ‘मालिक’ ने दिया हो, उसको वही जानें, उसको छोड़कर मेरे पास तो अब कुछ नहीं है। यहाँ तक कि आध्यात्मिकता तक भी मानों हृदय भूल चुका। प्रेम को पाने की तलब अब भी है, क्योंकि कभी आह खिंच जाती है स्वयं ही कि हाय ! ‘मालिक’ से जी भर कर प्रेम न कर सकी।

कई दिनों से लगता है कि हृदय में व पीठ में सुइयाँ सी चुभने लगती हैं। मेरी तो ऐसी दशा है कि मानों पूर्ण सम-अवस्था या पूर्ण स्थिरता को कोई शक्ति ऐसी है, जो पूरी तौर से मेरी नहीं हो जाने देती है। जाने कहाँ से हर समय Vibration से मानों एक सम्बन्ध सा जुड़ा रहता है और अब थिर भी क्या हो, जबकि मुझे तो सुरत- वुरत सब ही छोड़ कर चली गई। न जाने मेरा क्या हाल हो गया है कि मैं सदैव अपने ‘मालिक’ से ही बेलौस रहती हूँ। न जाने क्यों अब हर आदमी की Condition जो पहले मैंने लिखा था कि अपने से ऊँची लगती है, परन्तु अब दशा को तो निकाल दीजिये, क्योंकि किसी दशा का मुझे अब अनुमान नहीं है, परन्तु अपनी निग़ाह व तबियत जाने क्यों सबके चरणों में झुकी रहती है। यहाँ तक कि मेहतर के पैर छू लूँ या कुत्ते के पैर तक पकड़ लूँ तो कुछ नहीं। अब अन्तर इसमें पहले से इतना है कि पहले अन्तर में एक प्रकार का इतना उभार था, जिसके कारण ऐसा कर सकने की प्रवृत्ति थी, परन्तु अब अन्तर में तो एक सम-अवस्था विद्यमान रहती है।

मेरी तो अब यह दशा है कि न मनोरंजन ही मुझे अच्छा लगता है, न चमत्कार ही भाते हैं, न उजाड़ की कथा भाती है, न वीराने की बात अच्छी लगती है और सच तो यह है कि मनोरंजन या इन सब बातों का मुझ पर असर ही नहीं पड़ता है, किन्तु पता नहीं अन्तर की कुरेदना किसकी लगी रहती है, जो जोंक की तरह चैन नहीं आने देती है और सच तो यह है कि चैन मुझे भाता भी नहीं है। हालत मानों Nature से मिल-जुल गई है।

अब कुछ ऐसी दशा है कि अब तो आत्मिक दशाओं को देखते हुए भी तथा भीतर-बाहर, सब कुछ देखते हुए भी अनदेखती सी दशा रहती है। क्या मेरे बाबूजी ! मैं अपने ‘मालिक’ को प्राप्त कर लूँगी ? मैं नहीं जानती कि वह मुझे मिलेगा या नहीं। न जाने क्यों अपने चलने के मैदान का भी मुझे एहसास नहीं होता, वरन् कभी-कभी तो मुझे यह भय होने लगता है कि मेरी चाल तो कहीं नहीं रुक गई है ? किन्तु ऐसा सम्भव नहीं हो सकता, क्योंकि ‘मालिक’ मेरा अपना है, उसी का सहारा व भरोसा है, अपने बल का कुछ है नहीं। चाल में थकान अवश्य बीच-बीच में कभी आ जाती है, जो कुछ प्रार्थना से पूरी या ‘आपके’ लिखने से दूर हो जाती है।

मैं तो एक बिल्कुल साधारण सी गृहस्थ बालिका की ही भाँति हूँ, जिसे आध्यात्मिक बातों या ईश्वर-विषय बातों की जानकारी ही नहीं है, मानो सब कुछ भूलकर भी एक बेहोश सा होश मेरे पीछे लगा रहता है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। केसर आप को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-686
लखीमपुर
27/8/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र ‘आपका’ कल शाम को पूज्य मास्टर साहब ने पढ़कर सुनाया। सुनकर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। वास्तव में आप के पत्र की एक-एक पंक्ति सीखने योग्य है। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी तो कुछ यह दशा है कि मैं अपनी दशा से चिमट भी नहीं पाती हूँ, क्यूँ? अब अपने अंतर में पैठे रह सकने की भी गम्य मुझमें नहीं है। एक कुछ यह बात देख रही हूँ कि कोई भी काम अब मानों मेरी आदत में नहीं रहा। जैसे पूजा या ध्यान करना तक भी बस, जब जैसा मौका होता है, वैसा ही कर लेती हूँ और यह ख्याल तक कभी नहीं आता कि यह किया या क्या करती थी, सो नहीं किया। ऐसे कोई विचार तक नहीं आ पाते हैं। मेरी तो यह है कि कर्म में, चाहे दुनिया के हों, या आत्मिक, मेरे में मानों कोई अब पाबन्दी नहीं रह गई है। Right और Wrong की मुझे अब कोई तमीज़ नहीं रह गई है। मेरे में सुस्ती बहुत रहती है। न जाने मेरी क्या दशा है।

मुझे कुछ ऐसा लगता है कि जहाँ पर मेरी ठहरने की तबियत भी कभी चाहती है, तो एक कोई चीज़ मुझे ठहरने नहीं देती और मुझे कुछ याद पड़ता है कि आपने B1 पर जब मैं थी, तो कहा था कि मैंने ऐसा Vibration पैदा कर दिया है, जो कि तुम्हें ठहरने नहीं देगा। क्या उसका ही यह असर कुछ चला आता है ? तबियत में थकान भी आती है, तो भी अंतर की तबियत में मानों कोई थकान को ठहरने नहीं देता है, किन्तु तेजी भी कभी आने नहीं पाती। सतह से ऊपर कभी लहर उठने नहीं पाती है। न जाने क्यों मुझे अक्सर एक झुंझुल सी अपने ऊपर आती है या वैसे भी रह-रह कर आ जाती है, मानों मैं बिल्कुल खाली बैठी हूँ, कुछ काम ही नहीं करती।

मुझे कुछ ऐसा लगता है कि आपके Change के Work में कण-कण का आध्यात्मिक Energy से भर जाने का काम क़रीब क़रीब ख़तम हो चुका है और Destruction के Symptoms भी पूरे मर चुके हैं, परन्तु अभी इतनी सी बात है कि काम के ऊपर धुँधलापन सा या कोहरा सा छाया है, जो मुझे विश्वास है, हम सब ‘आपके’ बालक-बालिकाओं के लिए शुभ है, इसलिये कि ‘आपके’ संसार में रहते रहने का यह हमारे लिये सन्देश व सहारा है।

एक बात कुछ यह देखती हूँ कि अव्वल तो मुझे गहरी नींद बहुत कम ही आती है। तब तो कुछ नहीं मालूम पड़ता वरन् गहरी नींद से सोने पर, उठने पर ऐसा लगता है कि मानों मैं अपने से निकल आई और सोने का या ख़ुमारी का तो नाम तक नहीं रहता है। इसी तरह से समझ लें कि जैसे मुझे आँखें बन्द करने या खोलने में एक समान ही रहता है। न अन्धेरे की प्रतीत बन्द करने में और न उजाले की प्रतीत खोलने में होती है। विचारों का ताँता की भी कुछ ऐसी बेपरवाही हालत, कहने को कह लीजिए कि मानों सोते हुए आदमी को मच्छड़ काटता है तो वह खुजलाता भी जाता है, किन्तु उसकी नींद उससे नहीं टूटती है। बस मेरे में बेहोशी में भी एक होश या होश में बेहोशी या ज़िन्दगी कुछ बाकी है, तो इतनी ही नहीं तो मैं तो एक साधारण सी छोटी बालिका की भाँति ही हूँ।

परसों अचानक बैठे-बैठे लगा कि मानों दिमाग़ का कोई पर्त्त सा उचल गया, तबसे जो बराबर सिर में दर्द रहता था, वह बहुत ही धीमा पड़ गया। पहले जो मैंने लिखा था कि हृदय में व पीठ में ऐसा लगता है कि सुइयाँ सी चुभने लगती है, परन्तु इधर भी कभी-कभी ऐसा बहुत लगने लगता है। पहले ज़ोर था, परन्तु अब ऐसा समझ लीजिये कि ऐसा लगता है कि जैसे कुल शरीर में ही, पीठ में व हृदय में कुछ अधिक मानों हल्का सा पिपरमिन्ट छू गया हो। ऐसी बात कण-कण में से निकलती मालूम होती है या यों कह लीजिये कि अब कण-कण में से जो प्रकाश सा छनता था, उसकी जगह अब इस चीज़ ने ले ली है। इधर कुछ समय से दाहिने हाथ के अँगूठे की नोंक में न जाने क्यों कुछ Sensation सा बना रहता है और उसे चुटकी काटने में कुछ अच्छा लगता है।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं। केसर आपको प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव ही कृपाकांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-687
लखीमपुर
3/9/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। आशा है, आप की तबियत ठीक होगी। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो यह दशा है कि यदि कोई कहे कि अपने मन की करती है या जिद्द कहे, किन्तु मुझे पता ही नहीं लगता कि मन की करती हूँ या बेमन की। अब तो सदैव एक बेकैफ़ी सी कैफियत बनी रहती है। अब तो पूजा में या वैसे भी माना कुछ अच्छा लगे तो भी यह पता ही नहीं लगता कि किसे अच्छा लग रहा है।

मेरी तो यह दशा है कि जान में या अनजान में, सुधि में या बेसुधि में जब ख़्याल आता है तो यही दशा पाती हूँ कि- “बैठे सूते पड़े उतान, कहैं कबीर हम वही ठिकान”। किन्तु फिर भी मेरी बागडोर तो सदैव किसी के द्वारा खिंची सी रहती है, जो मुझे आपे में रहने को मजबूर रखती है, किन्तु ख़्याल अक़्सी तौर पर जाने कहाँ रहता है, यह नहीं पता है और इस पते का भी पता तब लगता है, जबकि अचानक किसी से टकरा जाती हूँ, या एकदम से कभी पैर में या कहीं ठेस लग जाती है। लगता है कि जो दिमाग पर या तबियत में एक बेहोशी व बेलौसी का पर्दा सा पड़ा था, वह अचानक साफ़ हो गया। यह सब न जाने मेरा क्या हाल हो गया है, जो मुझे अब पते का भी पता नहीं लगने देता है और कभी देखती हूँ कि जब ख़्याल का भी ख़्याल आता है, तो ऐसा पता लगता है कि मानों बहका सा फिर रहा हो।

इधर दो-एक दिन से बायें अँगूठे की पास वाली उँगली भीतर मानों खुली सी या Fresh सी हो गई है। तबसे अब रेंगन भी नहीं मालूम पड़ती है। मेरी तो तवज्जोह रखने की शक्ति ही अब समाप्त हो गई है। किसी को पूजा करवाती हूँ, तो भी मानो तवज्जोह मेरे पास नहीं होती, बल्कि तब जाने क्या होता होगा, यह मैं जान नहीं पाती हूँ। अब तो न जाने क्यों पूजा में भी कुछ अच्छा लगता किसे है या किसे अच्छा लग रहा है। यहाँ तक कि अच्छा लग भी रहा है या नहीं। न जाने क्यों अब मुझे अन्दर की कैफियत का तो पता नहीं, किन्तु बाहरी तबियत बिल्कुल सादा रहती है। अब तबियत में आदत की पाबन्दी नहीं रह गई है, बल्कि सब कुछ साधारणतः हो गया है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव आप की ही कृपा कांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-688
लखीमपुर
22/9/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है ‘आप’ आराम से पहुँच गये होंगे। पूज्य दद्दा से आपके समाचार मिले। सुनकर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, इधर कई दिनों से माथे से ऊपर, जहाँ से माँग शुरू होती है, वहाँ से तीन अंगुल ऊपर, बाईं ओर मांग के बिल्कुल लगे में, कुल हड्डी में, कई दिन तो ऐसा लगता रहा, जैसे मानों जब फोड़ा फूटने को होता है, वैसा कुछ होता रहा। हल्का, मीठा सा दर्द भी होता था, परन्तु कल से वहाँ मानों सूराख ही नहीं वरन् मानों पूरी हड्डी खुलकर फैल गया है। कल से दशा बिल्कुल खुली सी लगती है। मैंने आप से, जब मैं वहाँ थी, तब कहा था कि Q1 की सैर, लगता है समाप्त हो गई है, तब से भीतर कुछ होता भी रहता था जिससे गति बिल्कुल रुकने का भी एहसास नहीं होता था, किन्तु हाथ-पैर फैलाने को भी जैसे स्थान नहीं मिलता था, इससे कुछ घुटन सी भी रहती थी, किन्तु कल से लगता है कि ‘मालिक’ की कृपा से सब कुछ साफ़ हो गया है, खुल गया है। हाथ-पैर अपनी जगह पर फैल गये हैं। चैन की साँस आने लगी है, किन्तु संतोष की नहीं। मुझे अब न जाने क्यों अन्तर में या आत्मा तक में मानों कुछ रेंगन सी बनी रहती है।

भाई, अब तो न जाने क्या बात है कि दशा भी बेदशा हो गई है। गति भी अगति हो गई है। अंतर-बाहर, सब Senses तथा शरीर का कण-कण कुल तक मानों नीरव महाप्रलय का ही स्वरूप हो गया है। बस पता नहीं, Heart में एक प्रकार को Vibration सा आता रहता है, जो मेरी जान या अनजान में आता ही रहता है। इस नीरव महाप्रलय में कभी-कभी ऐसा अचानक हो जाता है, मानों दाहिने पैर के अँगूठे से लेकर सिर के बीचोंबीच जहाँ चोटी रखी जाती है, तक एक प्रकार के तार सी झुनझुनाहट एक सेकण्ड में होती हुई निकल जाती है। इसका फिर असर और कहीं नहीं रहता, किन्तु कुल पीठ के रीढ़ में व रीढ़ के बाई ओर की कुल पीठ में काफी असर रहता है।

कुछ यह दशा है कि यदि उसे अब अव्यक्त स्थिति भी कह दूँ, तो उसकी असलियत जाती रहती है। इसलिये अब चुप बैठी ‘उसके’ नज़ारे को देखती हूँ, जिसमें न हाँ कहने की गम्य है और न नहीं है कहने की गम्य है। जैसा है, वैसा है, ‘मालिक’ का है, क्योंकि मैं तो अब उससे लिपट तक नहीं पाती हूँ। मैं तो केवल अब दृष्टा मात्र ही हूँ। नहीं, बल्कि दृष्टा भी नही, केवल साक्षी मात्र हूँ दशा की। बस यह दशा है अब तो कि स्थिति तो मेरी अब नहीं है, किन्तु स्थान या मैदान तो सब मेरा ही फैला हुआ है। मेरा कुल शरीर ही नहीं, वरन् कण-कण तक बस मानों नीरव सपाट मैदान हो गया है, जिसमें ‘मालिक’ की दिव्य विभूति विस्तृत है, किन्तु मेरी तो यह दशा है कि मैं तो बेहाश ही हूँ। मेरी अपनी न कोई दशा है, न मैदान। या यों कह लीजिये कि मैं किसी की नहीं हूँ।

न जाने अब क्या हो गया है कि मानों मेरा कण-कण विराट् हो गया है, जिसका पता नहीं मिलता। किन्तु अब मेरा पता मुझे हमेशा रहता है क्योंकि मै किसी की नहीं हूँ और न मैं स्वयं अपनी ही। पता नहीं मेरी क्या दशा है, ‘मालिक’ ही जानें। अब दशा यह कोई ऐसी है, कि मानों ‘मालिक’ ने मुझे अपना कोई राज़ खोला है, जो मैं केवल कहने में असमर्थ हूँ कि क्या है। दशा क्या है, मानों ‘मालिक’ ने मेरे सन्मुख अपना कोई राज़ खोला है और खोला ही क्या है, बल्कि अपने राज़ को मेरे कण-कण में फैला दिया है, और फिर भी शायद मुझे अपना बना लेने के लिये अपने पास ही रखा है। अब तो सर्वत्र कण-कण में ‘उसका’ ही राज़ खुला फैला पड़ा है, स्वरूप बन गया है, परन्तु मैं तो अब चिपट सकने की मेरे में क्षमता ही नहीं रही। खैर, न सही, मैं तो उसके राज (भेद) की साक्षी मात्र हूँ, मेरा अपना कुछ भी नहीं है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-689
लखीमपुर
4/10/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आपकी साँस की तकलीफ़ आशा है, ईश्वर की कृपा से अब ठीक होगी। ईश्वर से प्रार्थना है, ‘आप’ हमेशा स्वस्थ रहें। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो जाने क्या दशा है कि लगता है कि मेरे हर कण-कण का हर रोम-रोम का Connection मेरे से टूटकर असल भण्डार से हो गया है। अब तो भीतर-बाहर, कण-कण में अपने रोम-रोम से मानों ईश्वरीय प्रकाश निकल रहा है।

भाई, अब तो कुछ यह दशा है कि अब तक तो अपना यह हाल था कि स्वयं अपना हाथ उठाये हुए हूँ, किन्तु यह बिल्कुल भी पता नहीं, जरा सा भी एहसास नहीं कि यह किसका हाथ उठा है और कौन उठाये हुए हैं। कोई आवाज़ देता है, तो सुनती हूँ, परन्तु यह पता नहीं कि कौन बोल रहा है, परन्तु अब तो उससे भी अजीब दशा यह है कि ‘मालिक’ सामने बैठा है, ‘उसे’ छू रही हूँ, परन्तु ‘मालिक’ के पैर का भी एहसास नहीं होता। ‘आपसे’ बोल रही हूँ, सवाल-जबाब कर रही हूँ, परन्तु आवाज़ तो न अपनी, न आप की ही मेरे कानों में जाती है और आवाज़ क्या, ‘आप’ सामने बैठे हुए भी तो अब मुझे दिखाई नहीं देते। न जाने क्या, यह ‘मालिक’ का कोई राज़ है, या मेरी दशा है। अब मैं तो कुछ नहीं जानती हूँ, ‘आप’ ही जानें।

अब तक तो ‘मालिक’ से इतना अपनत्व था, कि ‘उसके’ बिना जी नहीं सकती थी, किन्तु अब अचानक मुझे छोड़कर वह न जाने कहाँ और क्यों चला गया। कहाँ तो भीतर-बाहर, सर्वत्र उससे ही प्रकाश फैलता था, और उसी में मैं रहती थी और अब मानों वह, सब उसकी माया थी और अब उसने अपनी माया को एकदम समेट लिया है। अब मैं कहाँ हूँ, क्या कर रही हूँ, या करूँ, कुछ पता नहीं। परन्तु मेरा यह विश्वास मुझे सहारा लकड़ी की तरह दे रहा है कि उसे मेरी ख़बर ज़रूर है। ‘वह’ मायाबी है। ‘उसने’ अपनी माया समेट ली तो क्या हुआ। यहीं कहीं कुल भीतर-बाहर, शरीर के रोम- रोम तक से मानों किसी ने अपना माया जाल समेट लिया है। न जाने क्यों, अब ऐसा लगता है कि कुल शरीर के अन्दर का एक पूरा पर्त्त का पर्त्त ही किसी ने उतार कर रख दिया है।

‘मालिक’ ने इधर तो न जाने कितने खेल मेरे संग खेले। कभी तो अपनी अलौकिक दिव्यता देकर मुझे लुभाया, कभी अपने विराट् रूप के साथ मेरे भी रोम-रोम को विराट् बना दिया और अब मुझे ऐसा लगता है कि वह सब कुछ केवल एक माया जाल की तरह उन्होंने समेट लिया है। शरीर के भीतर का कुल शरीर का पर्त्त का पर्त्त उचाल कर फेंक दिया है और शरीर का ही क्या, कुल प्रकृति का पर्त्त का पर्त्त उचलकर साफ़ हो गया है। अब तो न प्रकृति कुछ है, न परमात्मा। ऐसा लगता है कि मानों सब कुछ एक वहम के सदृश ‘मालिक’ ने दिखाकर अपना सब जाल समेट लिया है।

अब मैं तो बिल्कुल एक अज्ञान, अबोध बालक की भाँति चुपचाप अकेली एक मैदान सपाट के मध्य खड़ी हुँ। कोई मेरे साथ नहीं है। बस इतना विश्वास हृदय के किसी कोने में दृढ़ है कि ‘उसे’ मेरी ख़बर है। यद्यपि यह विश्वास भी मेरे हाथ में नहीं है, बल्कि ‘मालिक’ ने अपनी रोशनी देने का यह ज़रिया मेरे अन्दर कहीं छोड़ दिया है, जिससे मैं राह में लगी रहूँ, नहीं तो मैं बिल्कुल अज्ञान बालिका कहीं भी भटक जाऊँ। न जानें क्यों ‘उसने’ पहले अपना राज मेरे में खोलकर अब सब समेट लिया है। अपनी दिव्यता, महानता एवं विलक्षणता सब माया जाल को मेरी निगाह के सामने से समेटकर मुझे अकेली एक सपाट और अथाह मैदान में छोड़ दिया है। खैर, मुझे तो चलना है, पता नहीं कहाँ और क्यों। बस इतना मालूम है कि मैदान में खड़ा किया है तो इसे पार करना ही है।

मुझे तो अब यह भी पता नहीं कि यह सब दशा लिखती जा रही हूँ या एक कहानी कहती जा रही हूँ। मेरे ‘मालिक’, ‘आपने’ अपने को मेरे हृदय में से भी निकाल लिया एवं मन में से भी समेट लिया एवं विचारों में से भी मथ लिया है, तो मथ लें, किन्तु मैं तो आपका फिर भी शुक्रिया ही अदा करती हूँ कि ‘आपने’ अपने को मुझमें से तो समेट लिया, किन्तु मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि मुझे ‘अपने’ में से ‘आप’ नहीं समेट पाये और शायद कभी ‘आप’ समेट पायेंगे भी नहीं। बस यह विश्वास जो अब मेरे में नहीं, बल्कि ‘आपकी’ ओर से मुझे प्रकाश के सदृश पथ दिखा रहा है। मेरी हालत तो दो-तीन महीने के शिशु की तरह है, जिसे कि अभी अपनी माता की भी पहिचान नहीं हो पाई है। मेरी आँखों के आगे से तो मानों सारी प्रकृति का मायाजाल ही एकदम से किसी ने समेट लिया है। परन्तु परवाह नहीं कि परमात्मा को ऊपर से ही चढ़कर जाऊँ। मुझे तो अपने प्रियतम ‘मालिक’ तक पहुँचना है। ‘वह’ अपना खेल समेट ले तो मुझे क्या करना है। मैं तो एक अचम्भे में हूँ कि यह सब क्या है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति :-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-690
लखीमपुर
13/10/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो कुछ ऐसी दशा है कि सब रंग मिल-मिलाकर जब एक रंग नहीं, बेरंग हो जावें एवं सब दशा मिलाकर बेदशा हो जावे, उसके बाद जिस स्थान या मैदान को पैरना होता है, वही मैदान सामने है और उसमें भी पैराव शुरू हो गया है, नहीं, बल्कि उसमें काफी चल आई हूँ, बस वही दशा चल रही है। ऐसा देखती हूँ कि बस जितना समय मैदान के किनारे आने के बीच में लगता है, उतना तो लगता है, किन्तु उसमें फाँदते ही मानो हाथ पैर इतने विराट् हो जाते हैं कि फिर स्वयं को ही इसका यानी गति का अन्दाज़ नहीं लग पाता कि गोया मैदान को मैंने पैरकर पार किया है या यह स्वत: ही पार हो गया है। मुझे तो लगता है, यह ठीक लगता है कि जिस वेष और जिस गति (चाल) से हनुमानजी ने समुद्र को लाँघा था और लंका में आग लगाई थी, वही दशा मनुष्य की हो जाती है, किन्तु यह अवश्य है कि माया की शक्ति की यहाँ समाप्त हो जाती है, उसी के साथ यों कहना चाहिये कि अपने में Will Power बिल्कुल रही नहीं जाती है और न अन्तर में ज़ोर न दृढ़ता, बस अब ऐसा मान लिया है कि जब जो ‘उसकी’ तरफ से मिल जाता है, फिर समय के बाद ‘उन्हीं’ के पास लौट जाता है। मुझे तो बस ऐसा लगता है कि शक्ति का तो कोई अस्तित्व ही नहीं है और न उसकी कोई स्थिति है। इसलिये उसमें स्थाईत्व भी नहीं है और शक्ति का ही क्या प्रेम, भक्ति, लगन एवं विश्वास, मैं और तू, इन सबका कोई अस्तित्व नहीं है और न स्थिति है, इसलिये स्थाईत्व नहीं है। सब कुछ एक माया या भ्रम या स्वप्न के सदृश आता और चला जाता है, जैसे माया सदैव आनी जानी कही गई है। बस यही दशा मेरी हो गई है।

अब तो कुछ यह अचम्भा सा हो जाता है कि अपना हाथ सिर के नीचे रखे हुए हूँ, परन्तु यह जानते हुए भी यह पता ही नहीं चलता, एक क्षण को भी यह अन्दाज़ या गुमान तक नहीं आता कि यह हाथ रखे हुए हूँ या नहीं। सच तो यह है कि अब तो यह दशा है कि मेरा शरीर मुझे छूता ही नहीं और केवल शरीर ही क्या अब तो सच तो यह है कि मन, बुद्धि, विचार एवं आत्मा भी मुझमें है ही नहीं तो स्पर्श क्या हो। हृदय पर ध्यान करना चाहिये, यह सब से कहती हूँ, परन्तु मेरा तो हृदय ही नहीं है, तो मैं ध्यान क्या करूँ और क्यों करूँ, यह भी समझ में नहीं आता। सबसे सब कुछ करने को कहती हूँ, परन्तु स्वयं अपनी समझ में कुछ आती नहीं। अब तो न जाने क्या दशा है कि कभी उठते-बैठते, सोते-जागते, कोई भी कैसा भी विचार ही नहीं आता है। भीतर- बाहर, कहीं भी, कभी भी कोई विचार टकराता या उठता ही नहीं है।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं। केसर आप को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आप की ही स्नेहसिक्ता

पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-691
लखीमपुर
23/10/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कृपा-पत्र आप का कई दिनों से नहीं आ रहा है, सो क्या बात है। कृपया अपनी तबियत का हाल शीघ्र दीजियेगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ भी आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो कुछ यह दशा है कि मेरा हृदय तो केवल ब्रह्म-विद्या की स्क्रीन Plate की तरह है, जिस पर ‘मालिक’ आत्मिक दशायें रूपी चित्र स्थित किया करता है। फिर दिखाकर समेट लिया और वह (हृदय) पुन: ख़ाली मैदान का मैदान ही रह जाता है। अब तो ऐसी दशा है कि या तो मैं कायर हो गई हूँ या यह कह लीजिये, सोते, जागते, उठते-बैठते, कैसा भी कोई विचार ही कभी नहीं टकराता है। भीतर-बाहर, नस-नस व मेरे रोम-रोम में मानों एक शून्य सी स्थिति बिछी हुई है, या यों कह लीजिये कि ऐसी दशा पर तकिया धरे मैं निश्चल बैठी हुई हूँ। अब तो अजीब दशा है कि न तो चैन ही में हूँ और न बेचैन ही रहती हूँ। हाँ, कोई तकलीफ़ नहीं है, तो आराम भी नहीं कहा जा सकता है। मेरा तो अब न कहीं ठीहा है, न ठिकाना, न कोई पता है न बेपता। मुझे तो अब यह लगा कि यह सब प्रेम, भक्ति, लगन एवं विश्वास तथा मैं व तू इन सबका कोई अस्तित्व ही नहीं। सब कुछ सुनने पर अब मुझे एक स्वप्नवत् लगता है। मानों सब कुछ माया या भ्रम या स्वप्नवत् आता है और चला जाता है। मैं न जाने क्यों अब जब सबकी बातें सुनती हूँ तो मुझे ऐसा ही लगता है। बस एक कसक तब भी चैन एक क्षण को भी मुझे नहीं लेने देती। अब तो दशा कोई भी आती है, तो उससे चिपटती नहीं, वरन् मानो देखती रह जाती हूँ, मानों दूसरे की चीज़ देख रही हूँ। मेरी दशा तो आजकल के साधु-सन्यासी की भाँति हो गई है, नहीं, बल्कि उनमें विद्वता तो होती है और मेरे पास तो वह भी नहीं है। मेरी तो यह दशा है कि मानों कभी कोई आध्यात्मिक इच्छा पैदा ही नहीं हुई है और यह बिल्कुल सत्य दशा है। आत्मिक-शब्द दशा के लिये अब मैं केवल लिखने के लिये लिख देती हूँ, यद्यपि अब दशा का मानों आत्मा से कभी सम्बन्ध ही नहीं रहा और इसी तरह आंतरिक दृष्टि के लिये चाहे औरों को मैं बताऊँ, किन्तु मेरा हाल बेहाल है। मैं किसी से भी कुछ कहने योग्य नहीं हूँ।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती है। केसर आप को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव ही कृपा कांक्षिणी

पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-692
लखीमपुर
17/11/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, मेरा पत्र मिला होगा। मुझे ऐसा लगता है कि ईश्वर ने मेरी बीमारी के द्वारा ही मेरी अन्तर की सफ़ाई कर दी है, जिससे मेरा हृदय ‘मालिक’ को अपनी ओर खींचने में अधिक सहायक हो सके। ‘मालिक’ की कृपा से जो कुछ आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरी तो न जाने क्या दशा है कि मुझे तो यह भी अब कभी अनुभव नहीं होता कि मैं मिशन की मेम्बर हूँ। ऐसे ही सबसे चाहे ‘आपके’ बारे में कहूँ, परन्तु मुझे लगता है कि मेरा मानों आपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। मैं तो जाने आर्य समाजी हो गई हूँ, या क्या, कि भगवान् या ईश्वर, यह सब कुछ नहीं है। मुझे कभी एक क्षण को भी एहसास नहीं होता। मेरा तो यह हाल हुआ कि जिस डाल पर बैठी थी, पता नहीं, वह डाल ही काट दी। भजन अब गाती हूँ, पूजा भी करती हूँ और करवाती हूँ, परन्तु मुझ पर कुछ असर नहीं पड़ता है। इससे तो अच्छी तब थी, जबकि फड़फड़ाने का कोई इलाज तो अपने पास था, परन्तु अब कोई औषधि काम नहीं देती, ‘मालिक’ ही जाने।

अब तो कुछ ऐसी दशा है कि लगता है कि बाहर ऐसा धुँआ सा फैला हुआ है, जो न काला है, न सफ़ेद, न भारी है, न हल्का। अब तो भीतर-बाहर, कुल मानों कुल उदासीनता का ही स्वरूप हो गया है। शरीर के रोम-रोम में एक समान उदासीन सी दशा व्याप्त हैं, जो न हिलती है, न डुलती है, न चल है, न अचल है, जिसमें न स्थिरता है और न अस्थिरता ही होती है कभी। लगता है, न जाने क्यों कुल शरीर, रोम-रोम तक Transparent हो गया है। जिसमें अब स्थूलता तो है ही नहीं, किन्तु सूक्ष्मता का भी पता नहीं है। दशा के लिये तो अब सूक्ष्मता शब्द का प्रयोग तक अच्छा नहीं मालूम पड़ता है। अब तो दशा ही नहीं, बल्कि कुल कण-कण तक मेरा जो है, सो है। कस्तूरी तो जो है, सो है। बस इसके अतिरिक्त समझने की कुछ तबियत नहीं होती है और न समझ ही कुछ काम देती है और समझ कर करूँगी भी क्या। जो जाने, सो ‘मालिक’ जाने। मेरा तो सम्बन्ध ही कुछ ऐसा विच्छेद हुआ है कि न दीन से रहा, न दुनिया से, न भगवान से, न इन्सान से, किन्तु न जाने यह कुछ हो गया है कि वैसे तो प्रत्येक से मेरा ऐसा नाता है, जैसा सगे सम्बन्धियों से किन्तु पूजा में उन्नति करने वालों से तो प्राणों से भी प्यारे का स्व-सम्पर्क हो जाता है, परन्तु मेरा सम्बन्ध किसी से नहीं होता। नहीं, बल्कि कुछ ऐसी दशा है कि मेरा तो सम्बन्ध न किसी से कभी होता है न विच्छेद होता है, बल्कि यों कहिये कि सम्बन्ध का सम्बन्ध ही मुझसे टूट गया है, नहीं बल्कि कभी था ही नहीं। ‘मालिक’ या कोई, मैं तो अब सबके लिये लाचार हूँ।

मेरे अंतर में जब कोई चीज़, कोई तथ्य ही नहीं रह गया है, तो मैं भला कहाँ से लाऊँ। नहीं, बल्कि मुझे सबकी एक ही, ऐसी ही दशा हो गई लगती है और भाई, सम्बन्ध-विच्छेद क्या होगा, जबकि कभी हुआ ही नहीं। अब एक यह न जाने क्या बात हो गई है कि दशा को लिखने में या तो उसमें In Touch हो जाती हूँ, या क्या, सांस भारी हो जाती है और तबियत लिखना छोड़ने को फड़फड़ा उठती है। साँस फूलने भी लगती है। चुप बैठने को तबियत लाचार हो जाती है। यही कारण है ‘मालिक’ कि अब दशा को डायरी में या पत्र में लिखने से टालती रहती हूँ। इसलिये पत्र लिखने में देर हो जाती है और दो-एक बात भूल भी जाती हूँ। मानों शरीर के कण-कण तक में आवरण साफ़ हो गया है। ठोसता या सूक्ष्मता ऐसी भी अब कोई दशा नहीं रह गई है। यह सब ‘आप’ स्वयं देख लीजियेगा। मेरी समझ में तो जो आया, या जो बन पड़ा वह लिख दिया। बाकी ‘आप’ जानें, आपका काम जानें।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। केसर ने भी आप को पत्र लिखा है, उसे भी देख लीजियेगा। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति :-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-693
लखीमपुर
26/11/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा पत्र मिला होगा। पूज्य मास्टर साहब जी भी वहाँ पहुँच गये होंगे। आशा है, आप स्वस्थ्य होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।  भाई, मेरी तो ऐसी दशा है कि मानों न मुझे ईश्वर से कुछ लेना है और न देना है, इसलिये पूजा या संयम-नियम का ही न अब कोई झगड़ा है, न फ़साद। एक अब यह न जाने क्या बात हो गई है कि पहले हर होने वाली घटना मुझे पता लग जाती थी, या जिससे मैं कहती थी, अधिकतर हो जाता था, किन्तु अब तो जैसे वाणी में मानों कोई प्रभाव या विशेषता नहीं रह गई है और ऐसे ही मुझे तो अब न जाने क्या हो गया है कि उधर दिनेश का आप के घर गिरने का एवं ताऊजी के उस दिन के Accident का केसर को पता चल गया, किन्तु मैं तो एक मृढ़ नासमझ की तरह बैठी सब काम वाम करती रही, मुझे कुछ पता ही नहीं चला। सच तो यह है कि मैं तो बिल्कुल साधारण मनुष्य की भाँति हूँ, बल्कि समझ उससे भी कम है।

मेरी तो कुछ ऐसी दशा है कि मुझे तो अब न शान्ति है और न अशान्ति है। दुनिया शान्ति के लिये उपाय करती है, परन्तु मुझमें पता नहीं शान्ति है या नहीं, न मेरी इच्छा ही किसी प्रकार की रह गई है। न अब भजन गाने की आवाज़ अंतस तक पहुँचती है और न पूजा करने या करवाने में भी मैं अंतस तक पहुँच पाती हूँ। मैं तो स्वयं ही अपने से भिन्न हो गई हूँ। शरीर में लगता है अब कोई दूसरी कस्तूरी Work कर रही है, जिसे न मैं जानती हूँ, न कुछ परिचय है। ऐसे ही ‘आपके’ प्रति मेरी दशा हो गई है, मानों ‘आपका’ नाम लेते हुए भी ‘आपसे’ कोई सम्बन्ध नहीं रह गया है। मेरा तो कहीं न ठिकाना न ठौर है। मेरा तो कहीं क़याम ही नहीं है। ‘आपमें’ रहते हुए भी, ‘आपकी’ रटना लगाते रहने पर भी, मेरा आप से कोई सम्बन्ध नहीं। मैं तो बिल्कुल साधारण गृहस्थ बालिका हूँ। अब तो मानों न कोई अच्छे संस्कार रह गये हैं और न बुरे। अब तो न कोई अपनी चीज़ है, न बिरानी। कोई अपना नहीं है, इसलिये अब कोई पराया भी नहीं है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता

पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-694
लखीमपुर
29/11/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, मेरा पत्र मिला होगा। यहाँ सब कुशल पूर्वक है। आशा है वहां आप सब लोग भी कुशल पूर्वक होंगे। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो यह दशा है कि न हैर है, न हैरानी, न खोज है, न ख़बर और न शान्ति, न अशान्ति। न स्थिरता की अनुभूति होती है और न अस्थिरता ही कभी होती है। बस अन्तर में एक प्रकार का कुछ ऐसा उचाटपन रहता है, जो न बेचैनी का एहसास होने देता है और न पूर्ण शान्ति ही को होने देता है। अन्तर की अजीब दशा है, न ख़ामोश है और न लहर ही उठती है। न सम है और न चंचल है। सारे शब्द मेरी दशा के लिये निरर्थक हो गये हैं, फिर मैं क्या हूँ और सच तो यह है कि मेरी कोई अवस्था नहीं है। सब कुछ एक सा बँधा जैसे का तैसा चलता रहता है, जिसमें अब न कोई नियम है, न संयम और न बन्धन ही है। इधर तीन-चार दिन से बीच सिर में माँग के बिल्कुल लगे-लगे में दाहिनी ओर करीब तीन अंगुल स्थान में बस ऐसा लगता है कि मानों कोई जानवर रेंग रहा हो। अक्सर तो रेंगन इतनी तेज़ मालूम पड़ती है कि बरबस अपना हाथ सिर पर चला जाता है, परन्तु कभी-कभी तो ऐसी दशा रहती है कि न मालूम सोने में रेंगन हो रही है, न मालूम जागने में और न मालूम शरीर में हो रही है और न मालूम दीवार में।

अब तो यह दशा है शरीर के भीतर, बाहर, रोम-रोम व कण-कण मानों सब कुछ वास्तव में ही जड़ हो गया है, परन्तु चेतना व काम सब कैसे होते रहते हैं और कहाँ से चेतना आती है, यह मुझे नहीं मालूम है।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-695
लखीमपुर
4/12/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आज पूज्य मास्टर साहब जी से आप की तबियत का हाल सुनकर सन्तोष हुआ। ‘मालिक’ की कृपा से मेरी जो कुछ भी आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, मेरी दशा तो यह है कि जिस जगह जन्म-जन्मान्तरों के व रोज़ाना के संस्कार एकत्रित होते हैं, मुझे लगता है कि मेरे अन्दर तो वह स्थान ही नहीं रह गया है। सब बाहर-भीतर, कुल शरीर के आर-पार तक Transparent हो गया है। मैं देखती हूँ कि Moderation की दशा अब मेरे हर काम को अपने में खींचे रहती है। यद्यपि आत्मिक-दशा में मुझसे वह पिछड़ चुकी है, परन्तु बाह्य बातों या कर्मों में उसने अपना अधिकार कर लिया है। मेरी तो श्रद्धा एवं विश्वास तक की डोरी या ज्योति न जानें कहाँ विलीन हो गई है। अब तो बिल्कुल खाली कस्तूरी फिरती रहती है। इसीलिये, अब न तो दृढ़ता, जो इतनी मेरे में थी, जरूरत से भी ज्यादा, वह भी न जाने कहाँ विलीन हो गई। हाँ, कमज़ोरी भी नहीं है। मैंने जो लिखा था कि मर कर भी मैंने ज़िन्दगी पाई है, वह ज़िन्दगी जाने कहाँ विलीन हो गई है। अब तो ज़िन्दगी का शब्द ही मेरे लिये बेकार है और पता नहीं, मौत भी कहीं है या नहीं, यह भी बेकार है।

मेरी तो यह दशा है कि बिना सम्बन्ध के सारे सम्बन्धों का पसारा फैला हुआ है। मैं नहीं जानती कि मैं अकेली चुपचाप कहाँ चली जा रही हूँ। राह दिखाकर, उस पर ले चलने वाला, पता नहीं, अब क्यों ख़ामोश है? मेरे तो अंतर व बाहर के सारे पट खुले पड़े हैं। मैं तो राह देखती अब भी हैरत में चली जा रही हूँ। कहीं तो ‘उसका’ पता या ठिकाना मिलेगा ही। ‘वह’ नहीं बोलता, तो न बोले। ‘वह’ अब हाथ नहीं पकड़ता, तो न पकड़े। जैसी ‘उसकी’ मर्ज़ी परन्तु मैं उसके बिना कैसे रह सकती हूँ? मेरी आँखे ‘उसका’ दिव्य प्रकाश पी चुकी है, जो मुझे वीरान जगह, उजाड़ देश में अंधा होते हुए भी पार करवा कर मुझे ‘उस’ तक पहुँचा देगी।

अम्मा आपको आशीर्वाद कहती हैं। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

सदैव ही कृपा कांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-696
लखीमपुर
9/12/1958
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आप का कृपा पत्र पूज्य मास्टर साहब के लिये आया। उन्हीं से आप की तबियत का हाल सुनकर हर्ष हुआ। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरा अंतर-बाहर तो एक सम अवस्था या नहीं, बल्कि शून्य या खाली अवस्था में पड़ा रहता है या यों कहिये, यह ‘उसका’ स्वरूप ही हो गया है। परन्तु फिर भी तबियत में कोई ऐसी चीज़ बनी रहती है, जो चैन नहीं लेने देती अन्दर ही अन्दर कुरेद पैदा करती है। कभी-कभी तबियत इतनी उचाट हो जाती है कि तब अगर आप की कृपा से तबियत अपने आप अन्तर की अवस्था में समा न जाये, तो फिर मेरा जीना ही दुर्लभ हो जाये। किन्तु ‘मालिक’ सब कुछ अपने ही आप ठीक कर लेता है। मैं तो अब यह भी नहीं जानती हूँ कि चाल रूकी हुई है या चल रही हूँ। बस यह जरूर है कि गति अखण्ड, अरूप एवं निर्विकल्प हो गई है। कल रात के करीब साढ़े नौ या दस बजे चारपाई पर लेटी, तो एकदम से माथे में बाईं ओर भौंहो के ऊपर से एकदम से हल्का सा सेंक सा लगने लगा, फिर वह बढ़ते हुए कुल माथे में फैल गया और इतने ही बीच में सिर के बिल्कुल पीछे, जहाँ से रीढ़ शुरू होती है, उसके चार अंगुल ऊपर इतनी तेज फड़कन शुरू हो गई कि मैं कह नहीं सकती। किन्तु यह सब 12-15 मिनट में होकर फिर कुछ नहीं।

कुछ न जाने ऐसी दशा है कि अक्सर मानों कोई संदेश स्वतः मुझ तक अपने आप ही अंतर में आता रहता है और कुछ जाता रहता है, किन्तु मैं कुछ भी नहीं जान पाती हूँ।

अम्मा आप को आशीर्वाद कहती हैं। केसर आप को प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व-साधन विहीना,
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-697
लखीमपुर
13/1/1959
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। अम्मा की तबियत अब ठीक है। मुझे भी स्वास्थ्य लाभ हो रहा है। ‘आप’ चिन्ता न करें। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

अब तो यह दशा है कि सारी पीठ में से व सिर के चारों ओर लगता है कि धीमा-धीमा सा निर्मल प्रकाश बाहर आ रहा है। अंतर का तो ऐसा मन्थन हुआ है कि शुरू से आखिर तक चले जाइये, न कोई कहीं शोर है, चूँ तक नहीं और न कहीं से कोई प्रमाण लेने वाली चीज़ का पता है और न अभाव डालने वाली वस्तु का निशान है। एक यह न जाने क्या बात है कि अंतर में शुरू से आख़िर तक नहीं, वरन् अंतर या वाह्य रूपी चादर पर चाहे कोई आये जाये, उस पर कभी कोई दाग या धब्बा पड़ता ही नहीं और यही नहीं वरन् न कभी पड़ा था और न पड़ता है और न पड़ेगा। कोई धब्बा न होते हुए भी चादर का रंग सफ़ेद नहीं है। हाँ, ऐसा कह सकते हैं कि जैसा रंग, निर्मलता, पवित्रता नहीं, वरन् सरलता व नम्रता का जैसा रंग होता होगा, वही रंग अब मेरी हृदय रूपी या अंतर रूपी चादर का हो गया है और अंतर-बाहर अब मेरे लिये एक समान ही शब्द हो गये हैं।

अब तो ‘मालिक’ ने अपनी इस गरीब बिटिया की चादर ज्यों की त्यों ही उतार कर रख दी, यही मेरी दशा है। अब तो मैं सब टटोलकर हार गई। मेरे पास तो कहीं कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे आपको नज़र कर सकूँ। अब तो बस यही प्रार्थना है कि जो आप को नजर पड़ जाये, आप की बिटिया के पास वह सब ही ‘आपको’ नज़र है।

मेरी तो यह दशा है कि मैं तो यह भी भूल गई हूँ कि मुझे कुछ देना चाहिये या मैं दूँ। मैं तो ‘आपको’ याद रखना भी भूल गई हूँ और भला क्या दूँ। मेरा हृदय तो मानों सरलता व नम्रता का स्वरूप ही हो गया है और न जाने क्या हो गया है कि सबके आगे ऐसा झुका रहता है, मानों सबका ही ऋणी हो।

आप ने कृपा करके मुझे Point S1 पर डाल दिया है, इसके लिये धन्यवाद कहाँ तक और कैसे दूँ।

छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इतिः-

सदैव आपकी ही चरण सेविका
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-698
लखीमपुर
25/1/1959
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

‘आपका’ कृपा-कार्ड, जो पूज्य मास्टर साहबजी के लिये आया, सुनकर फ़िक्र हो गई। ईश्वर से प्रार्थना है, वह शीघ्र ही आपको स्वास्थ्य लाभ पहुँचाये। ‘वह’ हमारी प्रार्थना अवश्य सुनेगा। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरी दशा तो बहुत ही अच्छी चल रही है। चाहे मैं इससे चिपट जाऊँ, या नहीं, किन्तु मुझे उसका सेंक लगातार मिलता ही रहता है और वह मेरा ही स्वरूप होती चली जाती है। मुझे ऐसा लगता है कि मानों किसी ऐसे समुद्र में फेंकने की तैयारी हो रही है, जिसके बारे में मैं कुछ कह नहीं पाती हूँ। हाँ, उसकी अनुभूति का सेंक अवश्य मेरे साथ है। तबियत के अन्दर बस बढ़ते रहने की कुरेदन रहती है कि एक क्षण को भी सुस्ताना नहीं चाहती है। अब यह सब क्या है, आप ही देख लें।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। केसर आप को प्रणाम कहती है और कहती है ‘आप’ उसकी ओर भी ध्यान देते रहियेगा। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव केवल आपकी ही स्नेहसिक्ता
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-699
लखीमपुर
3/2/1959
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

आशा है, मेरा एक पत्र पहुँचा होगा। यहाँ सब कुशल है। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक दशा है, सो लिख रही हूँ।

भाई, अब तो मेरी कुछ ऐसी दशा है कि मैं स्वयं एक विस्मृत, अनजान पहलू के सदृश हूँ। मुझमें अब न कोई रौ है, और न कोई लौ ही लगी रह गई है। लय-अवस्था तो मानों मेरे विचार से भी परे हो गई है, फिर उसमें समाने का तो प्रश्न ही कहाँ है। न कोई ज्योति है, न दीपक, मानों सब कुछ, अंतर-बाहर, सब गुप पड़ा हुआ है। न जाने यह क्या दशा है कि विवाह कार्य कर रही हूँ, यह पता नहीं, वरन् मुझे तो यहाँ भी अपना उत्सव ही उत्सव दिखाई पड़ रहा है। वही उमंग व वही धारा सब जगह पाती हूँ। न जाने यह क्या हालत है कि जो दास्य-भाव यानी बिल्कुल दीन सी मेरी तबियत रहती थी, अब, जब तक ‘उसकी’ महानता का स्मरण मन में करूँ, तब तो वैसी ही तबियत अपनी पाती हूँ, परन्तु जहाँ ज़रा बिल्कुल समान व Natural स्थिति में आती हूँ, तो न जाने क्या हो जाता है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती हैं। केसर आपको प्रणाम कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

सदैव ही कृपा-कांक्षिणी
पुत्री-कस्तूरी
अनंत यात्रा
पत्र-संख्या-700
लखीमपुर
3/3/1959
परम पूज्य तथा श्रद्धेय श्री बाबूजी, सादर प्रणाम।

कल ताऊजी व मास्टर साहबजी आराम से यहाँ पहुँच गये। उन्हीं से ‘आपका’ समाचार भी मालूम हुआ, सुनकर प्रसन्नता हुई। ‘मालिक’ की कृपा से जो आत्मिक-दशा है, सो लिख रही हूँ।

मेरी तो यह न जाने क्या दशा है कि लगता है कि ईश्वर का कुल Mind मेरे में समाया हुआ है और मेरी निगाह अब उससे भी परे न जाने कहाँ क्या खोज रही है। मैं बराबर यह देखती आ रही हूँ कि ज्यों कदम आगे बढ़ता है, त्यों त्यों ‘उसके’ निकट पहुँचती हूँ। खोज व प्यास की Degree में बजाय कुछ संतोष के बढ़ती ही पाती हूँ। इस बका के अनुभव से मेरे अन्तर में यह तीव्रता है कि मैं क्या करूँ? कैसे अपने प्रियतम को पाकर चरणों में लिपट जाऊँ। मेरी तो यह दशा है कि बका जीवन में घर कर गई है। अब तो ब़का ही ब़का है, शेष समाप्त हो गया। अब तो यह दशा है कि- “रहे न काहू काम के। मैं भरोसे अपने राम के॥” अब तो न जाने यह क्या दशा है कि न हँस सकती हूँ और न रो सकती हूँ एवं न कुछ कह सकती हूँ न सुन सकती हूँ। यही नहीं, अब तो न कुछ Imagine ही कर सकती हूँ। बस अन्तर में कुछ कुरेदना मची है, किन्तु पता नहीं क्यों अब चैन और बेचैन, भीतर और बाहर, सब कुछ एक समान ही हो गया है। मुझे तो न जाने क्या हो गया है कि एकता कभी पास फटकती नहीं और दुई से भी अछूती ही रहती हूँ | मैं किसी से एक नहीं हो पाती, दशा तक से एकता नहीं हो पाती। ऐसी दशा, अपनी दशा से भी रहती है कि जैसे स्वप्न में यदि कोई बर्रा पड़ता है, तो उसे उसकी ख़बर नहीं होती। मैं दशा आप को लिखती हूँ, कोई आनन्द भी अन्तर में रहता है, परन्तु मैं अब एक किसी से भी हो नहीं पाती हूँ। मुझे तो बस चाह है, मुझे मिलना है, आगे क़दम बढ़ते जायें, बस इतना सा ही सबक़ केवल याद है। इसके अतिरिक्त मानों कभी कुछ सीखा-पढ़ा ही नहीं है। लगता है कि कुल ब्रह्माण्डों का ब्रह्माण्ड मेरे में समाया हुआ है।

अम्मा ‘आपको’ आशीर्वाद कहती है। छोटे भाई-बहिनों को प्यार। इति:-

आपकी दीन-हीन, सर्व साधन विहीना
पुत्री-कस्तूरी